दखल क्यों


bhopal,Recognized morning Maharana Pratap of Sarvajamaj

ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया 25 मई को महाराणा प्रताप की 480वीं जयंती डॉ. ललित पाण्डेय   प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप की 480वीं जयंती पर सभी को बधाई। महाराणा प्रताप ने मध्यकालीन भारतीय इतिहास में जिस अलौकिक और असाधारण शौर्य अभिव्यक्त कर भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व में जो सम्मान और ख्याति अर्जित की वह असाधारण है। उनके शौर्य ने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को ही नहीं, अपितु अनेक अन्य राष्ट्रों को भी स्वतंत्रता के युद्ध के लिए प्रेरित किया। वे सम्पूर्ण मानवता के लिए एक प्रेरणापुंज बन गए। महाराणा प्रताप के पराक्रम का उल्लेख करते ही यूरोप के चार्ल्स मार्टेल का स्मरण आ जाना स्वाभाविक हो जाता है जो एक ‘डी-फेक्टो’ अर्थात वास्तविक शासक थे और उन्होंने अरब आक्रमणों को रोककर यूरोप की अरब प्रभुत्व से रक्षा की थी। चार्ल्स मार्टेल बप्पा के समकालीन थे। महाराणा प्रताप ने भी इसी प्रकार मेवाड़ को एक सुरक्षा प्राचीर में परिवर्तित कर मातृभूमि के गौरव की रक्षा की। मेवाड़ ने स्वतंत्रता के रक्षार्थ पर्वत शिखर की भांति अविचल खड़े रहकर निरंतर आठ शताब्दियों से भी अधिक समय तक आक्रांताओं को रोककर जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, उससे मेवाड़ स्वतंत्रता का सिरमौर बन गया। विश्व इतिहास में शायद दूसरा उदाहरण खोजने पर भी नहीं मिल सकेगा।   महाराणा के इस ओजस्वी व्यक्तित्व और उनके श्रेष्ठ शासक और उनके सार्वभौमिक अजेय रहने का कारण वे स्वयं तो थे ही, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में गुहिल वंश के पूर्व शासकों की महान परम्परा भी थी। गुहिल वंश का उद्भव और उनका शीघ्र ही सर्वमान्य सम्प्रभु शासक होने के कारणों की जांच पड़ताल करने से यह ज्ञात होता है कि इसके पीछे धर्म के साथ-साथ समकालीन प्रजा की निष्ठा भी थी। नागदा में जिस तरह बप्पा को बहुत स्वाभाविक तरीके से हारित ऋषि की अनुकंपा से शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ, वह प्राचीन भारतीय राजनीतिक सिद्धांतों के अनुरूप ही था। इससे मिलता-जुलता विवरण कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी प्रतिपादित है। कौटिल्य ने एक ओर तो राजा का प्रधान कर्तव्य सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना तो है ही, साथ ही राजा को साम्राज्य की प्रजा की प्रगति का उत्तरदायित्व दिया है और उसे विजिगीषु अर्थात निरंतर विजय की आकांक्षा करने वाला बताते हुए वरुण का प्रतिनिधि बताया है। इसी समान गुहिल वंश को भी शासन करने का अधिकारी हारित ऋषि ने ही ईश्वरीय अनुकम्पा से घोषित किया। दूसरी ओर गुहिल वंश के शासकों को जिस प्रकार तत्कालीन समाज के सभी वर्गों का विश्वास प्राप्त हुआ वह गुहिलों के स्वाभाविक संप्रभु होने की पुष्टि ही करता है। अनेक समकालीन और परवर्ती स्रोतों से भी इसी पुष्टि होती है। इनके उदय के समय मेवाड़ में ब्राह्मणों का आधिपत्य था और उनकी स्वाभाविक स्वीकृति प्रारंभिक शासकों को थी। इसके अलावा समाज के अन्य प्रधान वर्गों में जैन समुदाय और कायस्थ तथा भील समुदाय एवं टामटराडस समुदाय था। इनमें टामटराडस और भीली समुदाय थे। दोनों ही समुदाय स्थानीय थे और इनका साथ में होना एक अनिवार्यता भी थी। जैसा कि टॉड ने तो भील समुदाय को स्थानीय शासक की संज्ञा दी है, इसके अलावा महाराणा का भील प्रमुख द्वारा राज्यारोहण के समय तिलक लगाना इनके महत्व को स्थापित ही करता है। दूसरा प्रमुख स्थानीय समुदाय टामटराडस का था। यह मूलत: नागदा के निवासी थे और यह नागदा एवं चित्रकूट दोनों स्थानोंं पर तुलारक्षक अर्थात पुलिस अधिकारी और सेनापति के कार्यों में संलग्न थे। समुचित न्याय करने के कारण इनका बहुत सम्मान था। महारावल कमरसिंह के 1273 ईस्वी के अभिलेख में टामटराडस जाति का वर्णन है। इसे गुहिलों के प्रसार में बड़ा महत्व माना गया है। ये लोग स्थानीय थे, प्रभावशाली थे और तुला रक्षक (पुलिस अधिकारी) थे। एक अन्य अभिलेख में इन्हें वीरवान बताया गया है और ये सेनापति का भी कार्य करते थे। महाराणा प्रताप को उत्तराधिकार में महाराणा हम्मीर से लेकर सांगा तक की एक महान परम्परा मिली थी जिसने मेवाड़ की संप्रभुता की रक्षा कर एक अद्वितीय परम्परा की पालना की थी और एक अत्यल्प व्यवधान के पश्चात भी गुहिल वंश की निरंतरता को बनाए रखा तो जिसके पीछे उनका पराक्रम तो था ही साथ ही प्रजा का अटूट विश्वास भी था, क्योंकि भारतीय राजनीतिक सिद्धांतों में वैदिक काल से ही राजा की शक्ति का अंतिम अनुमोदन प्रजा के प्रतिनिधि ही सभा, समिति और विदथ जैसी संस्थाओं के माध्यम से करते थे और परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप में यह मध्यकालीन मेवाड़ में भी दिखती है।   महाराणा के इस संग्राम को सफल बनाने में भीलों के सहयोग के साथ ही भामाशाह का सहयोग भी था। इस सम्पूर्ण ऐतिहासिक-राजनीतिक संघर्ष में विजय का कारण मानवीय निर्णय तो थे ही साथ ही मेवाड़ धरा का विशिष्ट प्राकृतिक विन्यास और मेवाड़ भूमि का अभिन्यास भी था। इस संप्रभुत्ता की रक्षा के प्रयास में मानवीय कोशिश तो थी ही साथ ही हल्दीघाटी और दिवेर की विशिष्ट भूआकृति भी एक महत्वपूर्ण कारण था। इस संदर्भ में चावंड की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति थी जिसने उस समय प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान की जब शेष क्षेत्र अपना सामरिक महत्व खो चुके थे। इस संघर्ष में नठारा की पाल का भी अप्रतिम योगदान था। नठारा न केवल सबसे बड़ी पाल थी अपितु मगरे का सबसे बड़ा गांव था। नठारा की पहाड़ियों में ऐसे क्षेत्र थे जो अत्यंत दुर्गम थे और यह क्षेत्र लोहा, जस्ते का प्रधान भाग था तथा गरगल नदी ने सिंचित कृषि भूमि को उपलब्ध कराया था। अत: यह कहा जा सकता है कि महाराणा के अदम्य साहस और शौर्य, प्रजा की राणा के प्रति अगाध आस्था, भौगोलिक स्थिति और शताब्दियों की निरंतर विद्यमान अक्षुण्ण स्वतंत्रता को बनाए रखने की भावना ने महाराणा और मेवाड़ को अपराजेय बनाए रखा।     (लेखक वरिष्ठ पुराविद् व इतिहासविद् हैं।)

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal,Depression of the Corona period and the psychology of the Vedas

हृदयनारायण दीक्षित   कोरोना महामारी ने दुनिया भर में विषाद अवसाद का वातावरण बनाया है। लोगों में हताशा है। निराशा और आशंका है। मनोवैज्ञानिकों के परामर्श अवसाद से उबारने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे में वेदों का मनोविज्ञान उपयोगी है। अथर्ववेद में इच्छाशक्ति कमजोर करने वाले मनोभावों की सूची है, “दुर्भाव इच्छाशक्ति को तोड़ता है। भयग्रस्तता व कायरता ऐसा ही भाव है। हीनभाव भी इस सूची में है। स्वयं को ही दोषी ठहराने वाला आत्म उत्पीड़क मनोभाव भी इच्छा शक्ति में बाधक है।” (16.1.2-5) मनोवैज्ञानिक के लिए यह विश्लेषण ध्यान देने योग्य है। मनोबल या इच्छाशक्ति पर भी अथर्ववेद के समाज में गहन विमर्श था। ऐसी भावनाओं को देव मानना या किसी अन्य देव से भी स्तुति करना वैदिक समाज विशेष की अभिव्यक्ति शैली है। मनन मनुष्य व्यक्तित्व में परिवर्तन लाता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य अपने चिंतन मनन द्वारा व्यक्तित्व बदल सकता है। उपनिषद् दर्शन में भी प्रगाढ़ भाव से मनन चिंतन करने के सकारात्मक परिणाम बताए गए हैं। मनुष्य सोचता है। सोचने से लक्ष्य बनता है। वह लक्ष्य का मनन करता है। चिंतन मनन उसे कर्म के लिए प्रेरित करते हैं। वह मन संकल्प लेता है। संकल्प मनःशक्ति को तीव्र करते हैं। मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसा ही होता जाता है। वैसे ही कर्म परिणाम भी पाता है। अथर्ववेद (3.8.5) में मन विचार व कर्म को एक ही धारा में सक्रिय करने पर जोर दिया गया है।   मन अप्रत्यक्ष है। दिखाई नहीं पड़ता। यह मनुष्य के व्यक्तित्व की अंतःशक्ति है। मन के अध्ययन, विवेचन व विश्लेषण पर विश्वव्यापी मनोविज्ञान विकसित हुआ है। भारतीय दर्शन में मनः शक्ति की जानकारी ऋग्वेद के रचनाकाल से ही मिलती है। ऋग्वेद में मन भी एक देवता हैं। ऋषि मन की गतिशीलता से आश्चर्यचकित थे। मन के लिए समय और भौगोलिक दूरी की कोई बाधा नहीं। पल में यहां, पल में वहां। स्वयं से दूर गया मन सांसारिक कार्यों में बाधक होता है। अध्ययन, विवेचन और निरीक्षण के कार्यों में भी चंचल मन बाधा है। ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं, “हम दिव्यलोक, भूलोक तक चले गए मन को वापस लाते हैं। समुद्र, अंतरिक्ष या सूर्य की ओर गए मन को भी हम यहीं लाते हैं। दूर दूरस्थ पर्वत, वन या अखिल विश्व विचरणशील मन और भूत या भविष्य में गए मन को हम वापस लाते हैं। (10.58.1-12) हम सब संसार में हैं। संसार का भाग हैं। जीवन के कार्य व्यापार संसार में ही होते हैं। संसार से विचलित मन एकाग्र नहीं होता। इस सूक्त के सभी मंत्रों के अंत में ठीक ही एक टेक बनी रहती है कि हे मन यहीं आओ, इसी संसार में आपका जीवन है।   मन हमारे व्यक्तित्व का सक्रिय हिस्सा है। यह संपूर्ण व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। भारतीय चिंतन में मन के कार्य व्यापार पर बहुविधि विचार हुआ है। अथर्ववेद (13.3.19) में “मन को ऋत के तंतुओं को नापने वाला कहा गया है।” प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृति बोध को समझने वाले ज्ञान तंतु होते हैं। इसे आधुनिक विज्ञान में तंत्रिका तंत्र कह सकते हैं। यही ऋत तंत्र है। मन इस तंत्र का परीक्षण करता है। परीक्षण का आधार प्राकृतिक संविधान या ऋत होता है। इसी परीक्षण के अनुसार बुद्धि निर्णय लेती है।   मन का अस्तित्व महत्वपूर्ण है। वह दर्शनीय न होकर भी प्रभावशाली है। मन हमारे व्यक्तित्व में संकल्प का केन्द्र है। मन का हमारे व्यक्तित्व में ही एकाग्र बने रहना बोधदाता है। मन की एकाग्रता वाली बुद्धि मनीषा-मन ईशा है। मन की एकाग्रता वाले विद्वान मनीषी कहे जाते हैं। ऋग्वेद के ऋषि ऐसे मन का आवाहन करते हैं “सतत् दक्ष कर्म के लिए, दीर्घकाल तक सूर्य दर्शन के लिए श्रेष्ठ मन का आवाहन करते हैं- आतु ए तु मनः कृत्वे दक्षाय जीव से, ज्योक च सूर्य दृशे। (10.57.4) मन कर्मठ जीवन का ऊर्जा केन्द्र है।   आधुनिक मनोविज्ञान में मन से जुड़े अनेक विषयों का अध्ययन होता है। इसमें प्रमुख विषय संवेदन- सेनसेशन व ध्यान- अटेंशन हैं। स्मरण व विस्मरण भी महत्वपूर्ण हैं। स्नायुतंत्र की गतिविधि अतिमहत्वपूर्ण है। प्रेरणा या मोटीवेशन भी मन का भाग हैं। चिंतन वस्तुतः मनन ही है। यह मन का ही कार्यव्यापार है। सफलता या विफलता मन की ही अनुभूतियां हैं। अनुमानों से निर्मित काल्पनिक अवधारणाएं या परसेपशन भी मनोविज्ञान के उपविषय हैं। मन अध्ययन सम्बंधी यह सारे विषय प्रत्यक्ष नहीं हैं लेकिन इनके प्रभाव से बने मानसिक रूप आकार प्रत्यक्ष अनुभव में आते हैं। मन के तल पर होने वाली गतिविधि सारी दुनिया के मनस्विदों की जिज्ञासा रही है। इसी में से मनोविकारों की भी पहचान हुई और उनके अध्ययन का काम भी विकसित हुआ। आधुनिक मनोविज्ञान में चिकित्सकीय सुझाव या काउंसिलिंग का उपचार नया व्यवसाय बना है। प्रेम में विफल या अवसादग्रस्त लोगों के लिए मनोरंजन मीडिया में लवगुरू टाइप लोगों के परामर्श चल रहे हैं।   अथर्ववेद में मनोविज्ञान के तमाम सूत्र हैं। मनोविज्ञान सम्बंधी एक मंत्र (6.41.1) में मन, चित्त, बुद्धि, मति, श्रुति और दृष्टि की कुशलता के लिए इन्द्र की स्तुति है, “मनसे, चेतसे धिय, आकूतय उत चित्तये/मत्यै श्रुताय चक्षसे- हम मन, चेतन, बुद्धि, मति, श्रुति व देखने समझने की शक्ति के संवर्द्धन के लिए इन्द्र को प्रसन्न करते हैं।” यहां सारे उल्लेख मन सम्बंधी हैं और आधुनिक मनोविज्ञान के उपविषयों के अनुषंगी हैं। मन की प्रसन्नता में ही वास्तविक प्रसन्नता के सूत्र हैं। आर्थिक समृद्धि ही पर्याप्त नहीं है। आर्थिक अभाव का नाम ही गरीबी नहीं है। गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’ में स्वैच्छिक गरीबी का उल्लेख किया है। स्वैच्छिक गरीबी अपने मन निश्चय का चयन है। स्वयं अपने मन से अपनाया गया कोई भी सार्थक चयन तमाम असुविधाओं के बावजूद आनंद देता है।   मन सर्जक भी है। यह अपने भीतर सुखद सृष्टि करता है और दुखमय सृष्टि भी। अथर्ववेद के कवि ऋषि इस मन प्रपंच से परिचित थे। कहते हैं “यह परम में विराजमान ज्ञान प्रकाशित मन इस सृष्टि का मूल कारण है। इसके द्वारा सृजित अशुभ का प्रभाव भी यही मन हमसे दूर करे। शान्ति प्रदान करें।” (वही 19.9.4) यहां ऋषिमन मन को सृष्टि का मूल कारण बताया है। यह ऋग्वेद की परंपरा है। मूल लक्ष्य मनोविश्लेषण है। मन की शक्ति का आकलन है। इच्छा मन की पुत्री है। वैदिक साहित्य में इच्छाशक्ति के लिए प्रायः आकूति एक देवी हैं। वे सौभाग्य की देवी हैं। स्तुति है कि वे प्रबल इच्छाशक्ति के रूप में हमें प्राप्त हो। हमारे अनुकूल हों। इच्छापूर्ण हो। हमारे मन संकल्प पूर्ण हो।” (19.4.2-3) आधुनिक मनोविज्ञान में अथर्ववेद की की आकूर्ति - इच्छाशक्ति ही ‘विल पावर’ हैं।   अथर्ववेद का मनविश्लेषण केवल अध्ययन योग्य मनोविज्ञान ही नहीं है। इस विवेचन का सामाजिक उद्देश्य है। यहां समाज को मन चंचलता के विकार से बचाने वाली जानकारियां व स्तुतियां हैं। इस विश्लेषण के तमाम तत्व सीधे ऋग्वेद की परंपरा हैं। अथर्ववेद के विचार और मनन संकल्प सदाचरण में उपयोगी हैं। आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा मनोरोगी का उपचार संभव है लेकिन वैदिक संहिताओं में संपूर्ण समाज को प्रसन्न मन बनाने के उपाय हैं। अथर्ववेद की यही पंरपरा चरक व पतंजलि तक विस्तृत है। मन ठीक तो सुख। मन खराब तो दुख। सुख और दुख मन के ही रचे गढ़े उत्पाद हैं।     (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal,India is aware of America

डाॅ. रमेश ठाकुर   दो पाॅवरफुल मुल्कों को आपस में भिड़ाकर, दूर खड़े होकर तमाशा देखने की अपनी पूर्व की हरकतों से अमेरिका कभी बाज नहीं आएगा? जबकि, उसके इस चेहरे से सभी पहले से वाकिफ हैं। अमेरिका को ये भय हमेशा रहता है कि कोई उसकी बराबरी न कर ले। कमोबेश, ऐसा कोई मुल्क करने की कोशिश करता भी है तो उसे किसी न किसी तरह उलझाना शुरू कर देता है। भारत के साथ भी ऐसा ही करने की फिराक में है। लद्दाख मसले को लेकर चीन से बेवजह भारत को भिड़ाने का पासा फेंका है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भारत-चीन सीमा को लेकर ऐसा भड़काऊ और उकसाने वाला बयान दिया है जिससे भारत ताव में आकर चीन पर चढ़ाई कर दे। उसे युद्ध के लिए ललकारे? या फिर कोई ऐसी बचकानी हरकत कर दे, जिससे दोनों देशों के बीच नफरत के बीज उग आएं। हालांकि भारत सरकार ने उसके बयान को हल्के में लेकर आया-गया कर दिया। ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई।   गौरतलब है कि अमेरिका की उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स ने भारत को उकसाने का काम किया है। उन्होंने कहा है चीन अपनी बढ़ती हुई ताकत का इस्तेमाल दक्षिण चीनी समुद्र और भारतीय सीमाओं पर बहुत ही आक्रामक और उत्तेजक ढंग से कर रहा है। इससे भारत को तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। एलिस वेल्स ने हाल ही में भारत-चीन के सैनिकों के बीच बाॅर्डर पर हुई हल्की-फुल्की नोकझोंक का भी हवाला दिया। मई के पहले सप्ताह में चीन और भारत के सुरक्षाकर्मियों के बीच सड़क विवाद को लेकर थोड़ी तनातनी हुई थी, जो बाद में सुलझ गई थी। हैसियत में बराबरी की जहां तक बात आती है तो अमेरिका को खतरा सिर्फ भारत और चीन से ही है। क्योंकि दोनों देश हर क्षेत्र में अब सक्षम हैं। दरअसल, दोनों मुल्कों का सक्षम होना ही तो अमेरिका को अखर रहा है। इसलिए वह किसी भी तरह से दोनों के बीच खटास घोलकर आपस में उलझाना चाहता है। पर, भारत सरकार हर बात को गंभीरता से समझती है, वह किसी के बहकावे में नहीं आने वाली, अपने विवेक और ज्ञान से काम लेती है। ये इक्कीसवीं सदी का भारत है।   भारत की हुकूमत इस बात को ठीक से समझती है कि पक्की दोस्ती की दुहाई की आड़ में अमेरिका उनकी घेराबंदी पड़ोसी मुल्कों द्वारा करना चाहता है। तभी तो लिपुलेख क्षेत्र में भारत द्वारा सड़क बनाने को लेकर नेपाल के साथ भी इन दिनों तनाव बढ़ा रहा है। हालांकि इसके पीछे चीन का हाथ बताया जा रहा है। पर, प्रत्यक्ष रूप से करामात अमेरिका की भी है। समय की नजाकत को भांपते हुए भारत सरकार चीन और अमेरिका दोनों से सर्तक है। दोनों मुल्क एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। अपने फायदे के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। कोरोना वायरस के संक्रमित आंकड़ों को लेकर वैसे दोनों देशों में आपस में छिड़ी हुई है। इसलिए प्रत्यक्ष तौर से पंगा न लेकर भारत को चीन से भिड़ाना चाहता है अमेरिका।   यह तय है भारत बेवजह किसी देश से पंगा नहीं लेगा। पंगा लेने की वैसे जरूरत ही नहीं, क्योंकि भारत किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अब सक्षम है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटे भारत और चीन के भूभाग में कभी-कभार भूल-चूक से और कभी अत्यंत आवश्यक होने पर एक-दूसरे की सीमाओं में दोनों तरफ के सैनिक घुस जाते हैं, जिससे कुछ समय के लिए तनाव जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उसके कुछ मूल कारण भी हैं। भारत और चीन बाॅर्डर पर करीब चार हजार किलोमीटर की नियंत्रण-रेखा सीमा है, नियंत्रण सीमाओं में सैनिकों की चहलकदमी होने से दोनों देशों के जवानों में भिड़ंत भी हो जाती है। ऐसा आज से नहीं, बल्कि कई सालों से होता आया है।   दरअसल, बाॅर्डर इलाके में तीन दर्जन ऐसे स्थान हैं, जिनको लेकर विवाद और जो सामरिक दृष्टि से नाजुक स्थिति एकाध दशकों से बनी हुई है। अच्छी बात ये है यह विवाद आजतक ज्यादा बढ़ा नहीं। स्थिति नियंत्रण में ही रही, अनियंत्रण कभी नहीं हुई। यदा-कदा जब भी विवादों की लपटें उठी, दोनों देशों की हुकूमतों ने उसे शांत करा लिया। मुठभेड़ या युद्ध जैसा माहौल कभी नहीं बना। लेकिन अमेरिका इसी विवाद को हवा देना चाहता है। अमेरिका किसी भी सूरत मेें चीन और भारत के बीच खटास पैदा करना चाहता है आपस में भिड़ाना चाहता है। लेकिन भारत समझदारी से काम लेता है, उनके भड़काने वाले बयानों को गंभीरता से नहीं लेता। अमेरिकी के उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स के बयान को भी वैसे ही ले रहा है। भारत अपने पड़ोसी मुल्कों की हर चाल से वाकिफ है। चाहे चीन हो, पाकिस्तान हो या फिर नेपाल का मौजूदा नक्शा विवाद?    भारत सरकार पहले कोई पहल नहीं करेगी। दूसरी तरफ से पहल होते ही मुंहतोड़ जवाब देगी। वैसे, अमेरिकी उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स की बात पर थोड़ा बहुत गौर किया भी जाए तो चीनी सैनिकों ने इस साल जनवरी से लेकर पंद्रह मई तक करीब साढ़े तीन सौ दफे सीमा का उल्लंघन किया है। इस बात की आपत्ति केंद्र सरकार द्वारा जताई भी जा चुकी है। फिलहाल इस समय दौलतबेग ओल्डी क्षेत्र में बनी भारत की सड़क को लेकर चीन ने अड़ंगा अड़ाया हुआ है जिसको लेकर भी दोनों देशों में विवाद है। सड़क पर चीनी सैनिक तंबू ताने हुए हैं और आवाजाही रोकी हुई है। सड़क के दोनों तरफ जबरदस्ती अपने फौजी वाहनों को खड़ा किया हुआ है। सड़क के पास ही हमारे सैनिक भी अड़े हुए हैं। दौलतबेग ओल्डी क्षेत्र में बनाई गई सड़क पर चीन का तर्क है कि सड़क उसके अधिकृत क्षेत्र में बनी है। माहौल तनानती वाला बना हुआ। लेकिन दोनों देशों में सुलह को लेकर बातचीत जारी है। वैसे ये घटना पाकिस्तान के लिए सीखने जैसी है, गर्माहट के बावजूद शांति का माहौल है। चीन की जगह अगर पाकिस्तान होता तो धरती को सिर उठाकर संयुक्त राष्ट्र से लेकर पता नहीं कहां-कहां रोना रो रहा होता। सब्र और संयम रत्ती भर नहीं है पाकिस्तान के पास।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal,All leaders should learn from Baghel and Chauhan

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने आज वह काम करके दिखा दिया है, जिसका अनुकरण भारत के ही नहीं, सभी पड़ोसी देशों के प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को करना चाहिए। इनमें से एक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेसी हैं और दूसरे शिवराज चौहान भाजपाई हैं। ये दोनों परस्पर विरोधी पार्टियों के प्रांतीय नेता हैं लेकिन कोरोना के संघर्ष में वे अपनी पार्टियों के केंद्रीय नेताओं से भी आगे निकल गए हैं। पुराने मध्यप्रदेश के इन दोनों नेताओं को मैं उनके छात्र-जीवन से जानता हूं। उनका कृतित्व गर्व करने लायक है।   क्या किया है उन्होंने ऐसा? छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल ने घोषणा की है कि वे अपने प्रदेश के 19 लाख किसानों को 5750 करोड़ रु. की अनुदान राशि देंगे। पहले 1500 करोड़ रु. किसानों के खाते में सीधे चले जाएंगे। गन्ना-किसानों को प्रति एकड़ 13000 रु. और धान- किसानों को 10,000 रु. प्रति एकड़ दिए जाएंगे। यह पूछिए कि इस मदद से किसको फायदा होगा? छत्तीसगढ़ के आदिवासी, अनुसूचित, पिछड़े और गरीब किसान, जो कि 90 प्रतिशत हैं, इससे लाभान्वित होंगे। जो भूमिहीन खेती में लगे हुए हैं, उन लाखों विपन्न मजदूरों की भी शीघ्र ही सुध लेने की घोषणा बघेल-सरकार ने की है। क्या केंद्र सरकार अपनी 20 लाख करोड़ रु. की चमक-दमकदार घोषणा में कुछ ऐसे प्रावधान देश के किसानों और प्रवासी मजदूरों के लिए नहीं कर सकती थी? यदि हमारे केंद्रीय नेता आम जनता से सीधे जुड़े होते और नौकरशाहों की घेराबंदी से निकल पाते, तो वे भी ऐसे कई चमत्कारी कदम उठा सकते थे। उनकी निष्ठा और परिश्रम में किसी को शक नहीं है, लेकिन ये सद्गुण अनुभव के विकल्प नहीं बन सकते।   मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान से मैं काफी नाखुश था, क्योंकि उन्होंने उप्र की नकल पर श्रमिक कानून में कई अनुचित संशोधन कर दिए थे लेकिन शिवराज की विनम्रता और लचीलापन लाजवाब है। उन्होंने मेरे-जैसे कई छोटे-मोटे मित्रों की आलोचना का प्यारा-सा प्रतिकार कर दिया। उन्होंने अपने संशोधित श्रमिक कानून को दुबारा संशोधित करके ऐसे प्रावधान कर दिए हैं कि किसी भी मजदूर को उसकी सहमति के बिना 12 घंटे रोज की पाली नहीं करनी पड़ेगी और यदि वह करेगा तो उसे दुगुनी मजदूरी मिलेगी। महिला मजदूरनीयों को समस्त सुविधा दी जाएंगी। इसी तरह के कई अन्य सुधारों से मजदूरों को अब काफी राहत मिलेगी। शिवराज चौहान ने आयुर्वेदिक काढ़े के दो करोड़ पूड़े बंटवाए हैं और करोड़ों लोगों को आसन-प्राणायाम करने की सीख भी दी है। यदि वे और भूपेश भेषज-होम का विज्ञानसम्मत प्रयोग भी शुरू करवा दें तो सारे विश्व को विषाणुओं से छुटकारा मिल सकता है और भारत को अरबों-खरबों रु. की आमदनी भी हो सकती है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 May 2020


bhopal,India-Nepal dispute deepens due to change in map

प्रमोद भार्गव   नेपाल की कैबिनेट ने 18 मई 2020 को एक नए राजनीतिक मानचित्र को मंजूरी देकर भारत से विवाद गहरा देने का नया रास्ता खोला है। इस मानचित्र में चीन और नेपाल से सटी सीमा पर स्थित भारतीय क्षेत्र कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया है। नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने इस पहल की पत्रकारों के समक्ष घोषणा की। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कूटनीतिज्ञ प्रयासों के जरिए इस सीमा विवाद को सुलझा लिया जाएगा। इसी समय वहां के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि नेपाल सिर्फ अपनी भूमि को नक्शे में दिखाने का दावा कर रहा है। किंतु संसद में भारत के राष्ट्रीय चिन्ह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उसपर सत्यमेव जयते लिखा है अथवा सिंहमेव जयते। साफ है ओली ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर शक्ति के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। इस परिप्रेक्ष्य में हैरान करने वाली बात है कि नेपाल ने 2 नवंबर 2019 को जो नया नक्शा जारी किया था उसमें इस तरह के बदलाव नहीं थे। दरअसल चीन की गोद में बैठा नेपाल यह हरकत चीन की शह पर कर रहा है। हालांकि ओली ने सफाई देते हुए कहा कि यह बदलाव चीन के दबाव में नहीं किया है बल्कि यह एक कूटनीतिक चाल है जिससे भारत के साथ दोस्ती प्रगाढ़ करने के लिए ऐतिहासिक गलतफहमियां दूर हो जाएं।   दरअसल मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाने के लिए उत्तराखण्ड के पिथैरागढ़ जिले में आठ मई को भारत सरकार ने लिपुलेख मार्ग का उद्घाटन किया था। इसी का जवाब देने के लिए नेपाल ने अपने नए मानचित्र में कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र को अपने देश के नए मानचित्र में दिखा दिया। इस सिलसिले में भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि बीते साल 2 नवंबर को नेपाल ने नया नक्शा जारी किया था, उसमें इस तरह का कोई परिवर्तन नहीं था। अब नेपाल दावा कर रहा है कि 1816 में नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सुगौली संधि के अनुसार कालापानी क्षेत्र उसका है। 1860 में इस क्षेत्र की भूमि का पहली बार सर्वे किया गया था। इसके बाद 1929 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही कालापानी को भारत का हिस्सा घोषित किया था, नेपाल ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी। भारत की आजादी के बाद भी यही स्थिति बनी रही। किंतु अब नेपाल का झुकाव चीन से किए जा रहे पूंजी निवेश के कारण उसकी ओर बढ़ गया है इसलिए वह भारत को आंखें दिखा रहा है। हमारे पड़ोसी देशों में नेपाल और भूटान ऐसे देश हैं जिनके साथ हमारे संबंध विश्वास और स्थिरता के रहे हैं। यही वजह है कि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई सुलह शांति और दोस्ती की संधि आज भी कायम है। नेपाल और भूटान से जुड़ी 1850 किमी लंबी सीमा रेखा बिना किसी पुख्ता पहरेदारी के खुली है। बावजूद चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह कोई विवाद नहीं है। बिना पारपत्र के आवाजाही निरंतर है। करीब 60 लाख नेपाली भारत में काम करके रोजी-रोटी कमा रहे हैं। 3000 नेपाली छात्रों को भारत हर साल छात्रवृत्ति देता है। नेपाल के विदेशी निवेश में भी अबतक का सबसे बड़ा 47 प्रतिशत हिस्सा भारत का है। बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेपाल का झुकाव चीन की ओर बढ़ रहा है। हालांकि नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2014 में नेपाल की यात्रा करके बिगड़ते संबंधों को आत्मीय बनाने की सार्थक पहल की थी किंतु भारतीय मूल के मधेशियों के आंदोलन ने इसपर पानी फेर दिया।   अब नेपाल और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को जो नए आयाम मिले हैं, उनके तहत ऐतिहासिक पारगमन व्यापार समझौते समेत 10 समझौतों की शुरुआत करके नेपाल ने चीन से रिश्ते मजबूत कर लिए हैं। इस समझौते में सबसे खास एवं विचित्र बात यह हुई है कि नेपाल अब भारत के कोलकाता स्थित हल्दिया बंदरगाह के बजाय 3000 किमी दूर स्थित चीनी तियानजिन बंदरगाह से अपने जरूरी सामानों की आपूर्ति कर रहा है। जबकि भारत का बंदरगाह नेपाल की सीमा से करीब 1000 किमी की दूरी पर है। विडंबना है कि नेपाल चीन के इस बंदरगाह का तुरंत इस्तेमाल नहीं कर सकता है क्योंकि चीनी बंदरगाह ऊंचाई पर है और नेपाल में आधारभूत ढांचा उन्नत नहीं है। बावजूद यह समझौता शायद इसलिए हुआ है क्योंकि इसी समझौते के ठीक पहले नेपाल में मधेशी आंदोलन के चलते भारत से आने वाले नेपाल के व्यापारिक मार्गों को करीब छह माह तक बंद कर दिया गया था, जिससे नेपाल का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। इस नाकेबंदी की भविष्य में पुनरावृत्ति न हो इस आशंका से मुक्ति के लिए नेपाल ने इस समझौते को अंजाम दिया है। इस समझौते के बाद नेपाल का व्यवहार उस रस्सी की तरह हो गया है, जिसका बल जलने के बाद भी नष्ट नहीं होता है।   इस अहम समझौते के अलावा चीन और नेपाल के बीच तिब्बत के रास्ते रेलमार्ग बनाने पर भी संधि हुई है। चीन ने काठमांडू से करीब 200 किमी दूर पोखरा में क्षेत्रीय हवाई अड्डा निर्माण के लिए नेपाल को सस्ते ब्याज दर पर ऋण दिया है। मुक्त व्यापार समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए हैं। नेपाल में तेल और गैस की खोज करने पर भी चीन सहमत हुआ है। इसके लिए वह नेपाल को आर्थिक और तकनीकी मदद देने को राजी हो गया है। चीन ने नेपाल में अपने व्यावसायिक बैंक की शाखाएं भी खोल दी हैं। नेपाली बैंक भी अपनी शाखाएं चीन में खोल रहे हैं। संस्कृति, शिक्षा और पर्यटन जैसे मुद्दों पर भी चीन का दखल नेपाल में बढ़ गया है। ओली ने तिब्बत के रास्ते चीन के रणनीतिक रेल लिंक को नेपाल तक बढ़ाने का भी प्रस्ताव रखा है। चीन के लिए यह प्रस्ताव अपनी रणनीति के अनुकूल है क्योंकि चीन पहले से ही रेलवे को तिब्बती शहर शिगात्से से नेपाल सीमा पार गायरोंग तक बढ़ाने की योजना बना रहा है।   अर्से से इन्हीं कुटिल कूटनीतिक चालों के चलते कम्युनिस्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। चीन नेपाल की पाठशालाओं में चीनी अध्यापकों से चीनी भाषा मंदारिन भी मुफ्त में सिखाने का काम कर रहा है। माओवादी प्रभाव ने ही भारत और नेपाल के प्राचीन रिश्ते में हिंदुत्व और हिंदी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला किया। गोया चीन का हस्तक्षेप और प्रभुत्व नेपाल में लगातार बढ़ता रहा है। हैरानी की बात है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और वामपंथी लेखक इन मुद्दों पर पर्दा डाले रखकर देशहित से दूरी बनाए हुए हैं। चीन की क्रूर मंशा है कि नेपाल में जो 20.22 हजार तिब्बती शारणार्थी के रूप में रह रहे हैं, यदि वे कहीं चीन के विरुद्ध भूमिगत गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं तो उन्हें नेपाली माओवादियों के कंधों पर बंदूक रखकर नेस्तनाबूद कर दिया जाए।   भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतांत्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को नहीं समझा। नतीजतन चीन की हड़प नीतियों के विरुद्ध न तो कभी दृढ़ता से खड़े हो पाए और न ही कड़ा रुख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की उदारता ही जताई। इसी खूली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की धुसपैठ शुरू हुर्ह। इन सैनिकों ने वहां की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई तेवर और धार्मिक संस्कारों में पर्याप्त दखलंदाजी कर दुनिया की छत को कब्जा लिया। अब तो चीन तिब्बती मानव नस्ल को ही बदलने में लगा है। दुनिया के मानवाधिकारी वैश्विक मंचों से कह भी रहे हैं कि तिब्बत विश्व का ऐसा अंतिम उपनिवेश है, जिसे हड़पने के बाद वहां की सांस्कृतिक अस्मिता को एकदिन चीनी अजगर पूरी तरह निगल जाएगा। ताइवान का यही हश्र चीन पहले ही कर चुका है। चीन ने दखल देकर पहले इसकी सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट-भ्रष्ट किया और फिर ताइवान का बाकायदा अधिपति बन बैठा। हांगकांग और नेपाल में भी चीन यही कर रहा है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 May 2020


bhopal, Who is spreading poison of Kovid-19

आर.के. सिन्हा कभी-कभी मन खिन्न हो जाता है कि सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी कुछ धूर्त किस्म के लोग कोविड-19 से बचाव के लिए सरकारी दिशा-निर्देर्शों की बेशर्मी से अवेहलना कर रहे हैं। ये लोग सुधरने का नाम नहीं लेते। ये समझ नहीं रहे हैं कि इनकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार से वैश्विक महामारी कितना गंभीर रूप लेती जा रही है। जाहिर है, इनलोगों के कारण ही भारत की कोविड-19 को हराने की जंग कमजोर हुई है। ये सोशल डिस्टेनसिंग का पालन करना तो अपनी तौहीन समझते हैं। इन्हें मुंह पर मास्क पहनना भी अपनी शान के खिलाफ लगता है। बेशक, इसलिए ही केन्द्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे कोविड-19 के प्रसार की रोकथाम के लिए घोषित सभी उपायों को सख्ती से लागू करें। अब जरा देखें कि दिल्ली की जामा मस्जिद में जुमा अलविदा वाले दिन सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जाती रहीं। अलविदा जुमा को रमज़ान के महीने का जुमा तुल विदा भी कहते हैं।  क्योंकि, इसके बाद ही इस्लाम में खुशियों का त्योहार ईद-उल-फितर आता है। इस बार रमज़ान का महीना कोविड-19 की वज़ह से फीका ही रहा। मुसलमानों ने इबादत, रोज़ा, नमाज, तरावीह सब घर पर रहकर ही पढ़ीं क्योंकि लॉकडॉउन के कारण मस्जिदें बंद थीं। मस्जिद में केवल वहां के इमाम तथा मुअज्जिन आदि समेत पांच व्यक्ति ही नमाज़ अदा कर सकते हैं। इस दौरान बाहर के किसी व्यक्ति को मस्जिद में आने की मनाही है। लगभग सभी मस्जिदों में इस बात का पालन हुआ और मस्जिदों के दरवाज़े बाहरी लोगों के लिए बंद ही रहे। लेकिन गुजरे शुक्रवार को जुमा तुल विदा के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में लगभग 50 से अधिक लोगों ने नमाज़ अदा की जिसमें स्टाफ के अलावा कई बाहरी लोग और कुछ बच्चे भी शामिल थे। ये सब इमाम अहमद बुखारी की मौजूदगी में हुआ। यानी वे खुद ही क़ानून के खुले तौर पर हुए उल्लंघन के ज़िम्मेदार हैं। मुझे राजधानी के मशहूर वकील और शिक्षाविद् श्री मसरूर अहमद सिद्दिकी ने बताया कि इमाम साहब ने लॉकडॉउन के नियमों का पालन नहीं किया, दफा 144 का भी उल्लंघन किया और हरेक आम नमाज़ी के अधिकारों का हनन भी किया जो जामा मस्जिद के दरवाज़े बंद होने की वजह से अंदर नहीं जा पा रहे हैं। मुझे इमाम साहब की तमाम लोगों के साथ नमाज पढ़ते हुए फोटो भी दी गई है। अब सवाल यह है कि क्या इमाम अहमद बुखारी कानून से ऊपर हैं? क्या वे जामा मस्जिद को अपनी पैतृक संपत्ति समझते हैं कि जिसको चाहें मस्जिद में बुला लें और जिसको चाहें भगा दें ? उनके विरुद्ध क़ानून का उल्लंघन करने के लिए तुरंत उचित कार्रवाई होनी चाहिए। निश्चित रूप से दिल्ली पुलिस को इमाम साहब की इस हरकत की जानकारी होगी ही। अब देखना होगा कि उन पर कब और क्या कारवाई होती है। दरअसल, देश भर में विभिन्न स्थानों से गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की सूचनाएं लगातार मिल रही हैं। यह गंभीर मामला है। इस पर रोक लगनी चाहिए। हम सब देख ही रहे हैं कि शराब की दुकानों में भी सोशल डिस्टेनसिंग पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हर छोटे-बड़े शहर में शराब की कतार में लोग एक-दूसरे से सटकर खड़े हो रहे हैं। इन शराब की दुकानों के सामने ग्राहकों की जुटी भीड़ के बीच कहीं भी एक मीटर की शारीरिक दूरी नजर नहीं आ रही। अब पुलिस कितना इन लोगों को समझायेगी। शराब की दुकानें लॉकडाउन में छूट मिलते ही खुलवाई गई है। सरकारों का कहना है कि इससे राजस्व मिलेगा जिससे सरकारें अपना कामकाज चला सकेंगी। अब आने वाले समय में दफ्तर और बाजार खुलने लगेंगे। इसलिए भी यह समझना जरूरी है कि सरकार उन लोगों पर सख्त हो जाए जो कोविड-19 की रोकथाम के लिए किए जा रहे उपायों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि कोई इस बाबत लापरवाही करता है तो उसे तुरंत दंड दिया जाए। रात के कर्फ्यू को भी सख्ती से लागू करने की जरूरत है। इन्हीं प्रयासों से सामाजिक दूरी सुनिश्चित होगी और संक्रमण के प्रसार का जोखिम कम होगा। इस बीच, एक बेहतर काम लॉकडाउन की अवधि के दौरान यह हुआ कि देश में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचों को मजबूत किया जाता रहा। इसी का नतीजा है कि लगभग 50 हजार कोविड-19 के रोगियों का इलाज हो चुका है जिससे देश की मरीजों की रिकवरी दर 40.32 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इसके साथ ही केंद्रीय एवं राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयासों से साढ़े छह लाख कोविड देखभाल केंद्रों के साथ-साथ 3027 समर्पित कोविड अस्पतालों एवं कोविड स्वास्थ्य केंद्र काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त 2.81 लाख आइसोलेशन बेड, 31 हजार आईसीयू बेडों से अधिक तथा 11 आक्सीजन समर्थित बेडों के साथ पहले ही समर्पित कोविड अस्पतालों एवं कोविड स्वास्थ्य केंद्र दिन-रात काम कर रहे हैं। यानी देश कोविड-19 को मात देने का कोई मौका जाने देना नहीं चाहता। उसे सफलता भी मिलेगी। इसी क्रम में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्तशासी संस्थान, जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने कोविड 19 के लिए एक अन्वेषणात्मक भविष्य सूचक मॉडल का विकास किया है जो रोग के उद्भव एवं इसके परिणामस्वरूप, जिन चिकित्सा आवश्यकताओं की जरूरत पड़ती है, उनके बारे में अल्पकालिक पूर्वानुमान उपलब्ध करा रहा है। अगर सारा देश कोविड-19 से बचने के रास्ते पर चलने लगा तो हम इसपर काबू पा ही लेंगे। हां, कोविड-19 का असली अंत तो तब होगा जब इसकी वैक्सीन ईजाद हो जाती है। पर देश के इमाम बुखारी जैसे महत्वपूर्ण नागरिकों को यह समझना ही होगा कि उनकी गैर-जिम्मेदारी के कारण देश में कोविड-19 के रोगी बढ़ सकते हैं। क्या वे भूल गए कि तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद के कारण शुरुआत में ही देश में कोविड-19 के केस तेजी से बढ़े।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 23 May 2020


bhopal, Lockdown: marriage without guests and banquet

अनजाने में ही सही, कुरीति पर ब्रेक फरमान अली कोविड-19 को लेकर घोषित लॉकडाउन के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से इस चुनौती को अवसर में बदलने का आह्वान किया। इस दौरान देश का एक तबका जाने-अनजाने ऐसी सामाजिक कुरीति को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ गया है, जिसमें लोगों ने निकाह जैसे सबसे आसान रस्म को दिखावे के चक्कर में खुद के लिए अभिशाप बना लिया। इस्लाम के जानकारों की मानें तो इस्लाम में परिणय सूत्र में बंधने के लिए निकाह सबसे आसान है, जिसमें मौलवी के अलावा लड़के व लड़की पक्ष के चंद लोग शामिल होते हैं और दूल्हा-दुल्हन का निकाह पढ़ा सकते हैं। इस दौरान यह जरूरी नहीं है कि ज्यादा लोग एकत्र होकर दावतें उड़ाएं और दुल्हन पक्ष पर बिना वजह आर्थिक बोझ लादा जाये। यहां तक कि केवल शरबत के एक प्याले पर भी निकाह पढ़ाया जा सकता है यानि नाम मात्र खर्चे पर सादगी के साथ निकाह किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए।   दिखावे के चक्कर में मुसीबत कुछ पीढ़ी पहले तक लोग अपने बेटे-बेटियों के निकाह इस्लामिक तरीके से बहुत ही सादगी के साथ करते थे। जैसे-जैसे लोगों के पास पैसे की फ़राग़ती (उपलब्धता ) हुई लोग दिखावे में यकीन करने लगे। नतीजा यह हुआ कि शादी या निकाह के अवसर पर हजारों की संख्या में लोगों के लिए शानदार दावतों का आयोजन करने लगे और झूठी शानो-शौकत दिखाने के लिए शादी के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने लगे। मध्यम वर्ग में शानो-शौकत दिखाने का रिवाज चल निकला और यह स्टेटस सिम्बल बन गया। जिसका दुष्परिणाम यह सामने आया कि लोग या तो अपनी सम्पति बेचकर या फिर कर्ज लेकर बेटी की शादी में बड़ी-बड़ी दावतों का इंतज़ाम करने लगे। बाद में इन्हें परेशानी उठानी पड़ी, दावत के लिए लिए गए कर्ज उतारते-उतारते जिन्दगी बीत गयी। बात यहीं नहीं रुकी बल्कि वर पक्ष उनसे भी यही अपेक्षा रखने लगे। जिनके पास बेचने को सम्पति नहीं और न कर्ज लेने की स्थिति, ऐसे लोगों की शादी लायक बेटियां घरों पर बैठने को मजबूर हो गयीं।   लॉकडाउन बना वरदान कोरोना वायरस ने भले ही पूरे विश्व में तबाही मचा रखी हो लेकिन जिन लोगों के यहां बेटे व बेटियां शादी की उम्र को पहुंच गयी लेकिन आर्थिक कमजोरी के कारण शादी नहीं कर पा रहे थे, उनके लिए यह अवसर बनकर आया। मार्च, अप्रैल व मई माह में लोगों की शादी की तारीखें फिक्स थीं लेकिन लॉकडाउन घोषित होते ही सामूहिक दावत या भीड़ एकत्र करने पर रोक लग गयी, जिसके बाद अनेक लोगों ने जहाँ अपनी शादी की तारीखें आगे बढ़ा दीं, वहीं कुछ समझदार लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग सहित अन्य एहतिआतों का पालन करते हुए चंद लोगों की मौजूदगी में बिना दावत का आयोजन किए निकाह कर दिया। जिसके बाद समाज में इसको लेकर ऐसी हवा चली कि लॉकडाउन के दौरान लोगों ने बिना दहेज और बड़ी दावत के ही निकाह कर डाले जो रमजान माह में भी बदस्तूर जारी है।   एक अनुमान के मुताबिक देश प्रत्येक जिले में बड़ी संख्या में ऐसी शादियां हो चुकी हैं। औसतन एक जिले में लॉकडाउन की अवधि में ऐसे एक हजार निकाह भी मान लिए जाएं तो लोगों ने सैकड़ों करोड़ की बचत कर ली। जिसमें मेहमानों के लिए दावत और दावत स्थल के लिए होने वाले भारी-भरकम खर्च शामिल हैं। यह अलग बात है कि लोगों को निकाह के लिए पैदल, मोटर साइकिलों पर जाना पड़ा। कई ने इंटरनेट का फायदा भी उठाया और ऑनलाइन निकाह किया। इस्लाम के जानकार हाफिज इंतज़ार अहमद कहते हैं कि लॉकडाउन समाज के लिए एक सबक है, खासतौर पर निकाह करने की जो परम्परा इस दौरान शुरू हुई इसे सामान्य समय आने पर भी जारी रखा जाना चाहिए।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 22 May 2020


bhopal,The role of agriculture will be decided afresh

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   कोरोना महामारी और उसके कारण लॉकडाउन के तीन चरणों के समाप्त होने के बाद जो बदलाव सामने आ रहे हैं, उससे सोशियो-इकोनोमिक व्यवस्था में नये बदलाव देखने को मिलेंगे। खासतौर से एकबार फिर अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका नए सिरे से तय करनी होगी। हालांकि कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव जीडीपी को प्रभावित करता है, वहीं इसमें दो राय नहीं कि उद्योगों में मंदी के बावजूद कृषि उत्पादन बेहतर रहने से देश की अर्थव्यवस्था का स्तर बना रहा।   लॉकडाउन के बाद स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। एक समय था जब लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। शहरों का विस्तार गांवों को अपने में समाता जा रहा है। पर एक कोरोना ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। अब रिवर्स माइग्रेशन के हालात हो गए हैं। हर कोई अपनों के बीच पहुंचने के लिए कोई साधन नहीं तो पैदल ही आगे बढ़ता जा रहा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश भर में 2 करोड़ से अधिक लोग अपने गांवों तक पहुंचने की कोशिश में लगे हैं। शहरों से वापस गांव की और जाने की बात लगभग अकल्पनीय मानी जाती रही है पर एक कोरोना ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। अब अर्थव्यवस्था और खेती किसानी के क्षेत्र में नई चुनौतियां सामने आने वाली हैं। इसका कारण भी है एक ओर जहां कृषि जोत छोटी होती जा रही है वहीं कृषि में तकनीक के प्रयोग से कुछ खास समय को छोड़ दिया जाए तो खेती के काम में मानव संसाधन की आवश्यकता कम हो गई है। जमीन सीमित है तो अब उसपर निर्भर होने वालों की संख्या अधिक। ऐसे में गांवों के हालात तेजी से बदलेंगे। सरकार को इसी दिशा में सोचते हुए आगे आना होगा।   1947-48 में सकल घरेलू उत्पाद में खेती की हिस्सेदारी लगभग 52 प्रतिशत थी जो अब लगभग 17 प्रतिशत रह गई है। सरकार की बजटीय सहायता में कृषि प्रावधान लगातार कम होता जा रहा है। हालांकि कृषि क्षेत्र में सुधार हुए हैं उससे खाद्यान्न के क्षेत्र में देश आत्मनिर्भर है। देश में जहां जनसंख्या वृद्धि की दर 2.55 प्रतिशत है तो कृषि उत्पादन की विकास दर 3.7 फीसदी होने से देश में खाद्यान्नों की कोई कमी नहीं है। हालांकि सरकार ने अब कृषि में विविधिकरण की आवश्यकता समझी है। यही कारण है कि अब कम्पोजिट खेती की बात की जा रही है जिसमें पशुपालन आदि संवद्ध कार्यों पर भी जोर दिया जा रहा है। दरअसल कृषि में उपकरणों का प्रयोग बढ़ने के बाद पशुधन को लेकर किसानों का रुझान कम होने लगा था। अब सरकार ने पशुपालन को बढ़ावा देने का फैसला किया है, जिससे किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने को महत्वपूर्ण माना गया है। मधुमक्खी, मछली पालन और इसी तरह के संवद्ध गतिविधियों से किसानों को जोड़ा जा रहा है। खेती में सेचुरेशन की स्थिति और रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने को देखते हुए जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि यह सब अनवरत गतिविधियां है।   कोरोना के कारण स्थितियों में जो बदलाव आ रहा है, उससे खेती के लिए दिए जा रहे पैकेज से कोई रास्ता नहीं निकल पाएगा। असल में गांवों में वापस आ रहे लोगों के कारण जो स्थितियां बनेगी उसका अध्ययन कर सरकार को कोई रोडमैप बनाना होगा। जहां तक आर्थिक पैकेज का प्रश्न है यह तो खेती के डोज का काम करेगा पर जो अतिरिक्त लोग गांवों में अपने घर आएंगे उनके कारण उत्पन्न होने वाली स्थितियों को समझना होगा। क्योंकि खेती का रकबा सामने है, आर्थिक पैकेज से जो लोग पहले से खेती में जुटे हैं उन्हें सहायता मिल जाएगी और यह जरूरी भी है पर जो ग्रामीण उद्योग-धंधों में काम करने के लिए, शहर में देनदारी में काम करने, मण्डी में काम करने, स्ट्रीट वेण्डर के रूप में काम कर रहे थे अब उसी बंटी-बंटाई जमीन में कैसे जीवन-यापन कर पाएंगे, यह विचारणीय होगा। यदि जमीन की और बंटाई होती भी है तो जोत इतनी रह जाएगी कि लागत तो बढ़ेगी ही इसके साथ ही पैदावार भी उतनी नहीं हो पाएगी। इसलिए कृषि वैज्ञानिकों और समाज विज्ञानियों को नए सिरे से ग्रामीण अर्थशास्त्र के सूत्र बनाने होंगे।   दरअसल अब कृषि विशेषज्ञों को नए सिरे से सोचना होगा। एक ओर कोरोना जैसे हालातों से निपटने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना पहली आवश्यकता होगी तो दूसरी और कृषि लागत में कमी लाने और किसानों को उनकी उपज का पूरा मूल्य दिलाने के प्रयास करने होंगे। देखा जाए तो लोन का एक हिस्सा या लोन पर दिए जा रहे अनुदान का एक हिस्सा किसानों को इनपुट यानी खाद-बीज के अनुदान के रूप में दिया जाए और किसानों को उसकी लागत से अधिक आय मिल सके यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी हो गया है। हालांकि आर्थिक पैकेज में सरकार कुछ ठोस प्रस्ताव लेकर आई है पर इन प्रस्तावों का क्रियान्वयन समयबद्ध हो यह भी जरूरी हो जाता है। गांवों में आने वाले श्रमिकों/प्रवासियों को पशुपालन या इसी तरह के अतिरिक्त उत्पादक कार्य से जोड़ा जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और शहरों पर पड़ने वाला अनावश्यक दबाव कम होगा। सरकार के साथ ही समाज विज्ञानियों को कोरोना के संदर्भ में आने वाली स्थितियों को लेकर चिंतन मनन करना होगा क्योंकि कोरोना का प्रभाव आज खत्म नहीं होने वाला है अपितु आने वाले कई वर्षों तक इसका प्रभाव समूचे वैश्विक गतिविधियों पर देखने को मिलेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 May 2020


bhopal, Why should India become someone

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक उच्चाधिकारी ने आग में घी डालने का काम किया है। उसने भारत-चीन सीमा को लेकर ऐसा भड़काऊ और उकसाऊ बयान दे दिया है कि यदि भारत उसपर अमल करने लगे तो दोनों पड़ोसी देश शीघ्र ही आपस में लड़ मरें। अमेरिकी उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स का कहना है कि चीन अपनी बढ़ती हुई ताकत का इस्तेमाल दक्षिण चीनी समुद्र और भारतीय सीमाओं पर बहुत ही आक्रामक और उत्तेजक ढंग से कर रहा है। वैसे चीन और भारत के फौजियों की एक छोटी-मोटी मुठभेड़ मई के पहले हफ्ते में लद्दाख में हो चुकी है। लिपुलेख क्षेत्र में भारत द्वारा सड़क बनाने को लेकर नेपाल के साथ भी इन दिनों तनाव बढ़ गया है। इसके पीछे भी चीन का हाथ बताया जा रहा है।    वास्तव में भारत और चीन के बीच जो 3488 किमी की नियंत्रण-रेखा है, उसपर दोनों देशों के जवानों की मुठभेड़ें होती रहती हैं। वे कभी भूल-चूक से और कभी अत्यंत आवश्यक होने पर एक-दूसरे की सीमा में चले जाते हैं। पूरी सीमा पर 29 ऐसे स्थान हैं, जिन्हें लेकर विवाद है और जो सामरिक दृष्टि से नाजुक भी हैं। इस वर्ष चीनी फौजियों ने 300 बार सीमा का उल्लंघन किया है और जब 2017 में डोकलाम-विवाद छिड़ा था, तब उन्होंने 426 बार किया था। जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो वे प्रायः घटना-स्थल पर तैनात फौजी अफसरों के बीच बातचीत से हल हो जाती हैं। अभी भी दौलतबेग ओल्डी क्षेत्र में बनी भारत की सड़क को लेकर दोनों देशों में विवाद छिड़ा हुआ है। चीनियों ने उस सड़क पर तंबू तान लिये हैं और उसके पास फौजी वाहन अड़ा दिए हैं। उनका कहना है कि वह सड़क चीनी क्षेत्र में बनाई गई है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की बातचीत जारी है।   कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों और विपक्षी नेताओं से जब भी मेरी बात हुई है, मैं उन्हें हमेशा भारत-चीन सीमा-विवाद का उदाहरण देता रहा हूं। मैं उनसे कहता हूं कि कश्मीर को लेकर हम युद्ध और आतंकवाद फैलाएं, इसकी बजाय भारत और चीन की तरह बातचीत क्यों न करें? लेकिन इस मामले को अमेरिका अनावश्यक तूल दे रहा है। वह चाहता है कि चीन के साथ चल रहे उसके शीतयुद्ध में भारत उसका पिछलग्गू बन जाए। डोनाल्ड ट्रंप रोज़ पानी पी-पीकर चीन को कोस रहे हैं। उनका कुछ भरोसा नहीं। वे पल में माशा और पल में तोला हो जाते हैं। वे चाहते हैं कि भारत उनकी तरह तालिबान से भी गलबहियां कर ले लेकिन भारत को अपनी विदेश नीति अपने हित-संपादन के लिए चलानी है, किसी अन्य महाशक्ति की तोप का गोला बनने के लिए नहीं। इसीलिए चाहे चीन हो या तालिबान, भारत को अपने व्यावहारिक मध्यम मार्ग पर ही टिके रहना चाहिए।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 22 May 2020


bhopal, Hurricane Amfan caused havoc

प्रमोद भार्गव बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवाती तूफान अम्फान ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कहर ढा दिया है। इस तूफान ने 15 मई को विशाखापट्नम से 900 किमी दूर दक्षिण पूर्व की ओर दक्षिण बंगाल की खाड़ी में कम दबाव और फिर गहरे निम्न दबाव का क्षेत्र बनाना शुरू किया था। 17 मई को जब यह दीघा से 1200 किमी दूर था, तब यह तूफान में तब्दील हुआ और उत्तर-पश्चिम दिशा में तेज हवाओं के साथ आगे बढ़ा। 18 मई को इन हवाओं की रफ्तार 200 से 240 किमी प्रतिघंटा हो गई, नतीजतन इसने महातूफान का विध्वंसकारी रूप धारण कर लिया। 20 मई को इसने बंगाल और ओडिशा में प्रवेश कर तबाही का मंजर रच दिया। इस दौरान समुद्री लहरों ने 4 से 5 मीटर ऊपर उठकर कोलकाता और दीघा के हजारों घरों में पानी भर दिया। कोलकाता का हवाई अड्डा पानी में डूब गया। 5500 घर ध्वस्त हो गए और हजारों पेड़ व बिजली के खंभे धराशायी हो गए। बंगाल में 15 और ओडिशा में 2 लोगों की मृत्यु की खबर है। यही हाल उस हटिया द्वीप का हुआ, जो बंगाल से लेकर बंग्लादेश के हटिया द्वीप तक फैला है। इसी क्षेत्र में सुंदर वन का वह वन्यप्राणी राष्ट्रीय उद्यान है, जो बाघ, गेंडा और नाचने वाले संघाई हिरणों के लिए दुनिया में जाना जाता है। मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के बावजूद तूफान अम्फान अपना असर दिखाकर आगे बढ़ गया। इसके पहले इन दोनों राज्यों के इसी इलाके में बुलबुल और फैनी चक्रवातों ने 2019 में तबाही मचाई थी। मौसम विभाग की चेतावनी के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल (एनडीआरएफ) ने तत्परता बरतते हुए ओडिशा के 12 लाख और बंगाल के तीन लाख लोगों को तटीय क्षेत्रों से हटाकर सुक्षित स्थानों पर पहले ही भेज दिया था। इसके लिए एनडीआरएफ की 41 टीमें तैनात थीं। 24 टीमें आपात स्थिति से निपटने के लिए आरक्षित रखी गई थीं। प्रत्येक टीम में 45 लोग होते हैं। इस तूफान का असर पश्चिम बंगाल के 10 और ओडिशा के 12 जिलों में देखा गया। साथ ही सिक्किम, मेघालय, असम केरल और कर्नाटक में भी इस चक्रवाती प्रभाव में भारी बारिश होने के साथ तेज हवाएं भी चलीं। बिहार में भी हवा के साथ बारिश हुई। भारतीय मौसम विभाग के अनुमान अक्सर सही साबित नहीं होते, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। किंतु अब समझ आ रहा है कि मौसम विभाग आपदा का सटीक अनुमान लगाकर समाज और प्रशासन को आपदा से जूझने की पूर्व तैयारियों में लगाने में समर्थ हो गया है। अन्यथा 20 मई को आए तूफान अम्फान से ओडिशा और पश्चिम बंगाल को निपटना मुश्किल होता। किंतु इसबार चेतावनी मिलने के साथ ही शासन-प्रशासन और समाज ने जागरुकता व संवेदनशीलता बरतते हुए जान-माल की ज्यादा हानि नहीं होने दी। फेलिन, हुदहुद, तितली, बुलबुल और फैनी चक्रवात से जुड़ी भविष्यवाणी भी सटीक बैठी थीं। दरअसल जलवायु परिवर्तन और आधुनिक विकास के कारण देश ही नहीं दुनिया आपदाओं की आशंकाओं से घिरी हुई है। ऐसे में आपदा प्रबंधन की क्षमताओं और संसाधनों को हमेशा सचेत रहने की जरूरत है। उत्तरी हिंद महासागर में आने वाले तूफानों के लिए 64 नाम पहले ही निश्चित कर लिए गए हैं। इनमें से 63 नामों को तूफानों के नाम पहले ही दे दिए गए हैं। इस 64वें तूफान का नाम अम्फान रखा गया है। अम्फान नाम थाइलैंड ने दिया था। इसका अर्थ थाई भाषा में आसमान होता है। हमारे मौसम विज्ञानी सुपर कंप्युटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे हैं। तूफान की तीव्रता, हवा की गति और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए। इन अनुमानों को और कारगर बनाने की जरूरत है, जिससे बाढ़, सूखे, भूकंप, आंधी और बवंडरों की पूर्व सूचनाएं मिल सकें और इनसे सामना किया जा सके। साथ ही मौसम विभाग को ऐसी निगरानी प्रणालियां भी विकसित करने की जरूरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेवार भविष्यवाणियां की जा सकें। यदि ऐसा मुमकिन हो पाता है तो कृषि का बेहतर नियोजन संभव हो सकेगा। साथ ही अतिवृष्टि या अनावृष्टि के संभावित परिणामों से कारगर ढंग से निपटा जा सकेगा। किसान भी बारिश के अनुपात में फसलें बोने लग जाएंगे। लिहाजा कम या ज्यादा बारिश का नुकसान उठाने से किसान मुक्त हो जाएंगे। मौसम संबंधी उपकरणों के गुणवत्त्ता व दूरंदेशी होने की इसलिए भी जरूरत है, क्योंकि जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से समुद्रतटीय इलाकों में आबादी भी ज्यादा है और वे आजीविका के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। लिहाजा समुद्री तूफानों का सबसे ज्यादा संकट इसी आबादी को झेलना पड़ता है। इस चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी करने में निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट कमोबेश नाकाम रही है। 1999 में जब ओडिशा में नीलम तूफान आया था तो हजारों लोग सटीक भविष्यवाणी न होने और आपदा प्रबंधन की कमी के चलते मारे गए थे। 12 अक्टूबर 2013 को उष्णकटिबंधीय चक्रवात फैलिन ने ओडिशा तट पर दस्तक दी थी। अंडमान सागर में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में उत्पन्न हुए नीलम ने 9 अक्टूबर को उत्तरी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पार करते ही एक चक्रवाती तूफान का रूप ले लिया था। इसने सबसे ज्यादा नुकसान ओडिशा और आंध्र प्रदेश में किया था। इस चक्रवात की भीषणता को देखते हुए 6 लाख लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए गए थे। तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफानी हवाएं 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरी थीं। 2004 में आए सुनामी तूफान का असर सबसे ज्यादा इन्हीं इलाकों में देखा गया था। हालांकि हिंद महासागर से उठे इस तूफान से 14 देश प्रभावित हुए थे। तमिलनाडू में भी इसका असर देखने में आया था। इससे मरने वालों की संख्या करीब 2 लाख 30 हजार थी। भारत के इतिहास में इसे एक बड़ी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाता है। 8 और 12 अक्टूबर 2014 में आंध्र एवं ओडिशा में हुदहुद तूफान में भी भयंकर कहर बरपाया था। इसकी दस्तक से इन दोनों राज्यों के लोग सहम गए थे। भारतीय नौसेना एनडीआरएफ ने करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित क्षेत्रों में पहुंचाकर उनके प्राणों की रक्षा की थी। इसलिए इसकी चपेट आने से केवल छह लोगों की मौंतें हुई थीं। हालांकि आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही 1839 में आए कोरिंगा तूफान ने मचाई थी। गोदावरी जिले के कोरिंगा घाट पर समुद्र की 40 फीट ऊंची उठी लहरों ने करीब 3 लाख लोगों को निगल लिया था। समुद्र में खड़े 20,000 जहाज कहां विलीन हुए पता ही नहीं चला। 1789 में कोरिंगा से एक और समुद्री तूफान टकराया था, जिसमें लगभग 20,000 लोग मारे गए थे। कुदरत के रहस्यों की ज्यादातर जानकारी अभी अधूरी है। जाहिर है, चक्रवात जैसी आपदाओं को हम रोक नहीं सकते लेकिन उनका सामना या उनके असर कम करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। भारत के तमाम इलाके बाढ़, सूखा, भूकंप और तूफानों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित होते जा रहे पर्यावरण के कारण ये खतरे और इनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कहा भी जा रहा है कि फेलिन, ठाणे, आइला, आईरिन, नीलम और सैंडी जैसी आपदाएं प्रकृति की बजाय आधुनिक मनुष्य और उसकी प्रकृति विरोधी विकास नीति का पर्याय हैं। इस बाबत गौरतलब है कि 2005 में कैटरीना तूफान के समय अमेरिकी मौसम विभाग ने इस प्रकार के प्रलयंकारी समुद्री तूफान 2080 तक आने की आशंका जताई थी लेकिन वह सैंडी और नीलम तूफानों के रूप में 2012 में ही आ धमके। 18 साल पहले ओड़िशा में सुनामी से फूटी तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने यह तथ्य रेखांकित किया था कि अगर मैग्रोंव वन बचे रहते तो तबाही कम होती। ओड़िशा के तटवर्ती शहर जगतसिंहपुर में एक औद्योगिक परियोजना खड़ी करने के लिए एक लाख 70 हजार से भी ज्यादा मैंग्रोव वृक्ष काट डाले गए थे। दरअसल, जंगल एवं पहाड़ प्राणी जगत के लिए सुरक्षा कवच हैं, इनके विनाश को यदि नीतियों में बदलाव करके नहीं रोका गया तो तय है कि आपदाओं के सिलसिलों को भी रोक पाना मुश्किल होगा। लिहाजा नदियों के किनारे आवासीय बस्तियों पर रोक और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगलों का संरक्षण जरूरी है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 May 2020


bhopal,Taliban India opens its window

डॉ. वेदप्रताप वैदिक अफगानिस्तान के तालिबान संगठन ने भारत के प्रति अपने रवैए में एकदम परिवर्तन कर दिया है। पाकिस्तान के लिए तो यह एक बड़ा धक्का है लेकिन यह रवैया हमारे विदेश मंत्रालय के सामने भी बड़ी दुविधा खड़ी कर देगा। अब से पहले तालिबान जब भी जिहाद का आह्वान करते थे, वे कश्मीर का उल्लेख ऐसे करते थे, जैसे कि वह भारत का अंग ही नहीं है। वे कश्मीर को हिंसा और आतंकवाद के जरिए भारत से अलग करने की भी वकालत किया करते थे। लेकिन अब तालिबान के दोहा स्थित केंद्रीय कार्यालय के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने बाकायदा एक बयान जारी करके कहा है कि कश्मीर भारत का आतंरिक मामला है और हमारी नीति यह है कि हम अन्य देशों के मामले में कोई दखल नहीं देते हैं। तालिबान के उप-नेता शेर मुहम्मद अब्बास स्थानकजई ने शिकायत की थी कि अफगानिस्तान में भारत अब भी निषेधात्मक भूमिका निभा रहा है। वह तालिबान के साथ सहयोग करने की बजाय अशरफ गनी और अब्दुल्ला की कठपुतली सरकार के साथ सहयोग कर रहा है। तालिबान नेताओं को आश्चर्य है कि जब अमेरिका उनसे सीधे संपर्क में है तो भारत सरकार ने उनका बहिष्कार क्यों कर रखा है? यह सवाल अभी से नहीं, जब 20-25 साल पहले तालिबान सक्रिय हुए थे, तभी से उठ रहा था। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में जब तालिबान काबुल में सत्तारुढ़ हुए तो उन्होंने मुझसे सीधा संपर्क करके उनकी सरकार को भारत से मान्यता दिलवाने का आग्रह किया था। तालिबान सरकार के प्रतिनिधि मुझसे न्यूयार्क, लंदन, काबुल और पेशावर में गुपचुप मिलते रहते भी थे। लेकिन उन दिनों तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते इतने अधिक घनिष्ट थे कि भारत द्वारा उनको मान्यता देना भारत के हित में नहीं होता। लेकिन इस समय स्थिति बदली हुई है। सबसे पहले मेरी अपनी मान्यता है कि तालिबान संगठन गिलज़ई पठानों का है। ये स्वभाव से स्वतंत्र और सार्वभौम होते हैं। पाकिस्तान तो क्या, अंग्रेज भी इन पर अपना रुतबा कायम नहीं कर सके। अब ये दोहा (कतर) से अपना दफ्तर चला रहे हैं, पेशावर से नहीं। और अमेरिका इनसे काबुल सरकार की बराबरी का व्यवहार कर रहा है। आधे अफगानिस्तान पर उनका कब्जा है। यह ठीक है कि अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार से भारत के संबंध अति उत्तम है (राष्ट्रपति अशरफ गनी और डाॅ. अब्दुल्ला मेरे व्यक्तिगत मित्र भी हैं), इसके बावजूद मेरी राय है कि तालिबान के लिए अपनी खिड़की खुली रखना भारत के लिए जरूरी है। अमेरिकी वापसी के बाद काबुल में जिसकी भी सत्ता कायम होगी, उसके साथ भारत के संबंध अच्छे होने चाहिए। यह कितने दुख और आश्चर्य की बात है कि अफगानिस्तान भारत का पड़ोसी है और उसके भविष्य के निर्णय करने का काम अमेरिका कर रहा है? भारत की कोई राजनीतिक भूमिका ही नहीं है।   (डॉ. वैदिक अफगान मामलों के विशेषज्ञ हैं और सभी अफगान खेमों के नेताओं से उनका सीधा संपर्क है।)

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Dakhal News 21 May 2020


bhopal, Will Corona vaccine be invented in India

आर.के. सिन्हा   कोरोना वायरस ने दुनिया के हरेक इंसान की आंखों से आंसू निकलवा दिए हैं। सारी दुनिया की अधिकांश आबादी इस जानलेवा वायरस से बचने के लिए घरों के अंदर छिपी हुई है। अब पृथ्वी पर मौजूद हरेक धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि से संबंधित मानव समाज की यही ईश्वर से प्रार्थना है कि कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन जल्द से जल्द ईजाद हो जाए, ताकि दुनिया फिर से अपनी गति से चलने लगे। दफ्तर खुल जाएं, कारोबार चालू हो, स्कूल-कॉलेजों में छात्र-छात्राएं आने लगे, बाजार खरीददारों से गुलजार हो आ जाएं और पूरी दुनिया कोरोना से पूर्व की जिंदगी में लौटे।   चूंकि कोरोना के कारण मौतें बढ़ती ही जा रही हैं, इसलिए सारी दुनिया में इसकी औषधि की तलाश तेज हो चुकी है। बीते दिनों खबर आई थी कि चड़ीगढ़ के पीजीआई में कोरोना की वैक्सीन एमडल्यू वैक्सीन पर काम पूरा हो चुका है। इसके ट्रायल चल रहे हैं। कुल 40 लोगों पर इसका ट्रायल होना है। अगर भारत में कोरोना वायरस की कोई दवा मिल जाती है, तो यह भारत के वैज्ञानिकों लिए बड़ी उपलब्धि होगी। पर अभी इस दिशा में ठोस जानकारी मिलने का इंतजार है। पर यह कहना सही होगा कि प्रतिभाशाली इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भरे भारत में कभी भी कुछ सर्जनात्मक करने की संकल्प शक्ति भी है। हमने साइंस और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलताएं अर्जित तो नहीं की हैं। परन्तु यह देश के लिए कोई गर्व की बात नहीं है कि भारत में बहुत कम औषधि अन्वेषण प्रयोगशालाएं नई औषधियों के लिए शोध कर रही हैं। भारत सरकार द्वारा स्थापित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के तमाम वैज्ञानिक दशकों से क्या खोज रहे हैं यह भी समझ से बाहर है।केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान देश में स्थापित सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं में से एक है। यह संस्थान भारतीय विज्ञान एवं उद्योग अनुसंधान परिषद् (सी.एस.आई.आर.) के संरक्षण में काम करने वाली 39 प्रयोगशालाओं में से एक है। इसका औपचारिक उद्घाटन 1951 में हुआ था। क्या इस प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों से कभी किसी ने पूछा कि यहां से कितनी अहम औषधियों को ईजाद किया गया?   हमारे पास अवसर तो है। किन्तु, हमारी फार्मा कंपनियों ने अमेरिका और यूरोप से मुनाफाखोरी और सुविधाभोगी होना भर सीखा है। उन्होंने कभी कोई बड़ी व्याधि की औषधि खोजी हो तो बताएं। चीन कोरोना से अब बाहर आ चुका है, ऐसा बताते हैं। लेकिन हम अभीतक जूझ रहे हैं। आपको यह जानकार भी हैरानी होगी कि भारत में किसी भी उल्लेखनीय एलोपैथिक दवा को ईजाद नहीं किया गया है।   बहरहाल, आज के दिन दुनिया में दर्जनों जगहों पर कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहा है। पिछली एक सदी के दौरान दुनिया में जब कोई संकट आया तो अमेरिकी वैज्ञानिक ही सबसे आगे खड़े मिले। यानी वह संकट का मुकाबला करने वालों में अहम रोल निभा रहा था। अब अमेरिका समेत दर्जनों देशों में कोविड-19 की वैक्सीन खोजने के लिए दिन-रात काम चल रहा है। जानकारों का कहना है कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोरोना की वैक्सीन का सफल ह्यूमन ट्रायल भी कर लिया है। अब कहीं न कहीं से जल्द ही दवा आने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि दवा जल्दी ही इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाएगी। अभी क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है। क्लीनिकल ट्रायल को ऑस्ट्रेलिया में अंजाम दिये जाने की तैयारी भी चल रही है।   विश्व स्वास्थ्य संगठन को लगता है कि कोरोना वैक्सीन के व्यावसायिक उत्पादन आने में अभी डेढ़ साल तक का लग सकता है। लेकिन, वह यह दावा किस आधार पर कर रहा है, इसकी जानकारी उसकी तरफ से नहीं मिली है। इस बीच, एक अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना के बारे में कहा जा रहा है कि अगर उसके तीसरे चरण के परीक्षण सफल रहे तो दुनिया कोरोना को मात दे देगी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मॉडर्ना में हो रहे काम के आधार पर कह रहे हैं कि इस साल के अंत तक कोरोना की वैक्सीन मिल सकती है। यूरोप की भी कई प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक कोरोना के खिलाफ काम करने वाली वैक्सीन को तलाश रहे हैं। खबरें मिल रही हैं कि यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं में वैक्सीन तैयार करने के स्तर पर कुछ ठोस उपलब्धियां भी दर्ज की हैं। इन्होंने इंसानों पर ट्रायल चालू कर दिया है और उसके अबतक की नतीजे भी अच्छे आए हैं। तो कमोबेश यही लग रहा है कि कोरोना के खिलाफ वैक्सीन जल्दी ही आने वाली है। पर वह अमेरिका या यूरोप की किस लैब से आएगी? हालांकि, अगर वह भारत में ईजाद हो तो बहुत ही सुखद होगा। वैसे अभीतक हमारे देश के रिकॉर्ड को देखकर इस तरह की संभावनाएं व्यक्त करना जल्दीबाजी होगी।   इस बीच, कुछ जानकार यह मानते हैं कि भारतीय मीडिया ने 'कोरोना का कहर' और 'कोरोना का कोहराम' जैसे जुमले गढ़कर देशवासियों को डरा दिया है। अब अगर लॉकडाउन हट भी जाए, तब भी इसका डर बना ही रहेगा। अजीब स्थिति है कि किसी अस्पताल में कोरोना का एक रोगी मिलने पर भी पूरा अस्पताल सील कर दिया जाता है। अस्पतालों को सील करने से क्या होगा? अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मन में तो कोई अस्पताल कोरोना रोगी मिलने के कारण बंद नहीं किया जाता। बेशक, वहां भी कर दिया जाता, अगर वहां भी भारत की तरह के सरकारी बाबू मौजूद होते। राजधानी के हृदय-रोग-विशेषज्ञ दीपक नटराजन का सवाल वाजिब है कि क्या अस्पताल में जाने वाले लोगों को डराना सही है? यदि ऐसा हुआ तो अगले दो-चार सालों में हार्ट अटैक, कैंसर और स्ट्रोक से होने वाली मौतें कोरोना से कई गुना ज़्यादा होंगी।   एक बात तो समझनी होगी कि जबतक कोरोना की वैक्सीन नहीं आती तब तक हमें घर से बाहर निकलते हुए मुंह में मास्क और हाथों पर दस्ताने पहनने ही होंगे। सोशल डिस्टेनसिंग का हर सूरत में पालन करना ही होगा। दुर्भाग्यवश अब भी शहरों तक में तमाम पढ़े-लिखे लोग इन छोटी-छोटी बातों पर गौर नहीं कर रहे हैं। मुझे दिल्ली पुलिस का एक आला अफसर बता रहा था कि लॉकडाउन के दौर में भी कुछ लोग बाजारों में बिना मास्क पहने सब्जी खरीद रहे होते हैं। अब आप इन लोगों के बारे में क्या कहेंगे? इनका तो भगवान ही मालिक है। भारत में कोरोना के फैलाव को बढ़ाने में तबलीगियों से लेकर प्रवासी मजदूरों के मसलों ने बहुत गड़बड़ की। सरकार की भी अपनी सीमाएं हैं। अब तो देश को कोरोना की वैक्सीन का ही सहारा है। आशा है कि यह जल्दी बाजार में आ जाएगी।     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 21 May 2020


bhopal, How should India be self-sufficient

के.पी. सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो नये स्लोगन देश के नाम हालिया संबोधन के दौरान सामने आये हैं- आत्मनिर्भर भारत और लोकल-वोकल। उनमें भीड़ को तरंगित कर देने का कौशल है। इसलिए यह स्लोगन भी उनके पिछले नारों की तरह लोगों के दिल-दिमाग और जुबान पर चढ़ रहे हैं लेकिन जब नारे किसी गहरे चिंतन की उपज हों तो वे कालातीत सूक्त वाक्य बन जाते हैं। जैसे लोहिया जी का नारा- जिंदा कौमें पांच साल का इंतजार नहीं करतीं अन्यथा नारा मनोरंजन करके लोगों की स्मृति से विदा हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि आत्मनिर्भर भारत और लोकल-वोकल में कोई दम न हो। लेकिन कोई आह्वान हो तो उसे साकार रूप देने के लिए उद्घोषकर्ता के मन में सुचिंतित रूपरेखा होनी चाहिए। इसके अभाव के कारण ही मेक इंडिया का आह्वान अपनी सार्थकता नहीं ढूंढ़ पाया। प्रधानमंत्री के नये नारे भी ऐसे ही खिलवाड़ का शिकार न हो जायें।   आत्मनिर्भर भारत के मामले में सबसे बड़ी रुकावट क्या है- सदियों की गुलामी के कारण हमारे अंदर रची-बसी हीन भावना। आज स्थिति बदल गई है। दुनिया के सारे बड़े देशों में भारतीय नंबर एक हैं क्योंकि हर व्यवस्था में उनका प्रभुत्व है। चाहे बड़ी कंपनियों के सीईओ के मामले में हो या विकसित देशों की सरकारों के मामले में। फिर भी भारतीयों में अभी वह आत्मविश्वास नहीं आ पाया है, जिसकी जरूरत है। वह कोई पहल नहीं कर पा रहे जिसके पीछे सारी दुनिया चलने में गौरव महसूस करे। इससे तो गुलामी के दौर की स्थितियां बेहतर थीं। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत ने जन्म लिया। अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए दुनिया के किसी हिस्से में आज के समय कोई आंदोलन खड़ा होता है तो लोगों को महात्मा गांधी और उनका अहिंसक सत्याग्रह याद आता है। विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार किसी भी क्षेत्र मे मौलिक सृजन में भारतीय अपना नाम सामने नहीं ला पा रहे। अनुकरणवाद भारतीयों की पहचान बन गया है। पर निर्भरता इसकी अनिवार्य परिणति है। इससे उबरने के लिए कोई शुरुआत सोची जाये तो वह शिक्षा से होनी चाहिए। क्या इसपर ध्यान दिया जा रहा। आजादी की लड़ाई ने राष्ट्र नायकों में आत्म गौरव की भावना पैदा की थी क्योंकि अनुकरणवाद को झटके बिना अपने लक्ष्य के लिए उनमें मजबूत इच्छा शक्ति बन ही नहीं सकती थी। इसलिए अंग्रेजी में इंगलैंड के विद्वानों तक के कान काटने वाले राष्ट्र नायकों ने अपने कार्य व्यवहार के लिए राष्ट्रभाषा को अपनाया। जबकि इनमें से महात्मा गांधी सहित कई राष्ट्र नायक तो ऐसे थे जो राष्ट्रभाषा में अटकते रहते थे। आजादी की लड़ाई के बाद भी स्वप्न दृष्टा राजनीतिज्ञ देसी भाषाओं को पढ़ाई का माध्यम बनाने के लिए जोर देते रहे। अंग्रेजी के प्रोफेसर होकर भी राजेंद्र माथुर ने पत्रकारिता के लिए इसी के तहत हिंदी को चुना। आज जब यह सिलसिला मंजिल तक पहुंचना चाहिए था, शिक्षा नीति में विदेशी भाषा के सामने पूर्ण समर्पण किया जा चुका है। विज्ञान, प्राद्यौगिकी, व्यापार, विधि आदि में तरक्की के लिए अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा की मजबूरी जताकर यह किया गया लेकिन यह सारे तर्क कपटपूर्ण हैं।    गुलामी में हीनता के साथ-साथ कई और कुंठाऐं पनपती हैं जो मानसिकता को बीमार बना देती हैं। भारतीय समाज ऐसी तमाम कुंठाओं का शिकार है। एक कुंठा है जलन की ग्रन्थि में अटके रहने की। जैसे कि उसे विदेशी विद्वता से जलन है। एक क्षण में वह बिना किसी तर्कसंगत मैरिट के उस दर्शन को खारिज कर देता है जिसको किसी विदेशी विद्वान ने प्रतिपादित किया हो इसके बावजूद कि भारतीय संस्कृति मूल रूप से वसुधैव कुटुंबकम की हिमायती है। वह चाहता है कि दुनिया के बड़े देश उसे मान-सम्मान से बसने का अवसर दें लेकिन अपने यहां वह इस नौबत पर विदेशी मूल के प्रति घृणा की इंतहा से नहीं चूकता। चुनाव में सिर्फ इस आधार पर किसी दल का मुरीद बन जाता है कि वह वंचितों को दिये गये विशेष अवसर को खत्म करने का चकमा देने और धर्मद्रोहियों को सबक सिखाने का भरोसा दिलाने मे सफल है। वह अपने से निचले पायदान पर खड़े लोगों पर अपना दबदबा खत्म नहीं करना चाहता। इसे पूरा करने के लिए उसे अपने ऊपर दोबारा विदेशी प्रभुत्व तक स्वीकार है। विदेशी भाषा की प्रभुता का समर्थन करने के पीछे यही कारक है। भद्र लोक प्रभुता की अपनी विरासत कायम रखने के लिए विदेशी भाषा की शरण में हैं। इसीलिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का पैटर्न अब ऐसा बनाया गया है जिससे देसी भाषा का कोई अभ्यर्थी देश के सर्वोच्च प्रशासनिक सत्ता लोक में प्रवेश न कर पाये।   अब केवल भाषा की बात नहीं रह गई। भाजपा के सत्ता में आने से जो लोग कान्वेंट स्कूलों के दिन लदने के सपने देख रहे थे वे हतप्रभ हैं। इन कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा नहीं दी जाती बल्कि कल्चर सिखाया जाता है। यह कल्चर यहां की जमीनी जरूरतों से जुड़ा कल्चर नहीं है। यह साहबी का आयातित कल्चर है। भाजपा वाले उद्धरण तो पौराणिक कहानियों के देते हैं जिनमें बताया जाता है कि चक्रवर्ती सम्राट तक अपने बच्चों को महल में गुरुओं को बुलाने की बजाय उनके गुरुकुलों में अपनी संतानों को पढ़ने भेजते थे। जहां कोई सांसारिक सुख की सुविधा नहीं होती थीं और राजा-रंक यानि कृष्ण और सुदामा एक साथ पढ़ते थे। क्या आयातित संस्कृति का गुलाम बनकर नई पीढ़ी आत्मनिर्भरता के लिए मुखातिब हो सकेगी।   अनुकरणवाद की शिकार नस्लें हर कहीं अपनी जड़ें उखाड़ कर चलती हैं। उन परंपराओं को इन मनी प्लांटों ने अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है जो इन पर ब्रेनवॉश के तहत लादी गई हैं। सर्दियों में आइस्क्रीम के काउंटर की डिमांड इस देश में अटपटी लगती है। जंक फूड तमाम नुकसान के बावजूद बच्चों के लिए अनिवार्य हो गये हैं। बुंदेलखंड जैसे इलाके में लोग सत्तू का स्वाद भूल चुके हैं। लोग विज्ञापनों और टीवी चैनलों से गाइड होते हैं। ऐसे शौकीन नकलचियों में चाइनीज सामान खूब खपता है तो आश्चर्य क्या है। स्वास्थ्य का जोखिम उठाकर भी फैशन की आदतें पोसी जा रही हैं। आत्मनिर्भर भारत तब बन सकता है जब हीन भावना से सभी कुंठाओं से भारतीय समाज को मुक्त किया जा सके। आत्मसम्मान को आत्माभिमान के स्तर तक ऊंचा उठाने की जरूरत है। स्वदेशी की कट्टरता भरने का समय है।   हाल के दशकों में गांवों से जो पलायन हुआ वह लोगों के लिए वरदान बन गया था। परंपरागत जीविका से लोग गांव में परिवार का पेट तक नहीं भर पा रहे थे। लड़के-लड़कियों की अच्छी पढ़ाई और शादी ब्याह की बात तो दूर है। महानगरों में पहुंचे तो वे दरिद्रता से मुक्त हुए और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा। इसलिए मजदूरों की घर वापसी को लेकर भाव प्रधान होकर सोचना अर्थ का अनर्थ करना है। यह सुनहरे संसार की वापसी की रूमानी कल्पना न होकर आनेवाली जटिल चुनौतियों की दस्तक है। जिनका भान करके यथार्थपरक मानसिकता का परिचय दिया जाना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत की प्रासंगिकता इस दौर में ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसकी कवायद को पैर लगने से इन चुनौतियों से निपटने में आसानी होगी।   घर लौटे प्रवासियों की महिलाएं परंपरागत खानपान की सामग्री तैयार करने में माहिर हैं। अगर खानपान के संबंध में स्वदेशी का महत्व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से लोगों की समझ में आ गया तो इनका व्यापार चल पड़ेगा। यही बात पहरावे, फर्नीचर, सजावट आदि जीवन की विभिन्न गतिविधियों के संबंध में है। व्यापार भी एक कला है लेकिन अंग्रेजों के समय जब भारतीय शिल्पकला को सुनियोजित ढंग से बर्बाद किया गया, हम इस मंत्र को भूल गये। गांवों के लोग अपने उत्पाद और अपनी सेवा में प्रचुर गुणवत्ता के बावजूद इसलिए कच्चे पड़ जाते हैं कि उन्हें पैकेजिंग, फिनिशिंग आदि का ज्ञान नहीं है। वे महानगरों में रहकर आये हैं, वहां उन्होंने व्यापार की कलाओं (सेंस) को आत्मसात किया होगा। अब जब परीक्षा का दौर है तो देखना है कि वे कितना खरा उतरते हैं। कुल मिलाकर आत्मनिर्भरता और लोकल-वोकल को लेकर सुगठित समग्र दृष्टि होनी चाहिए। बेहतर होगा कि संघ के अनुसांगिक संगठनों से भी सरकार इस मामले में विचार विमर्श करे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Sports world will be affected by Afridi

योगेश कुमार सोनी पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर धार्मिक भेदभाव करने के आरोप लगाते हुए गलत शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इस वीडियो पर चैनलों में डिबेट होने के बाद अफरीदी के बयान की चौतरफा निंदा हो रही है। आम से लेकर खास तक अफरीदी पर गुस्से का इजहार कर रहा है। देश के सभी दलों के नेता के अलावा अफरीदी के करीबी माने जाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी हरभजन सिंह और युवराज सिंह ने भी कड़े स्वर में एतराज करते हुए कह दिया कि अफरीदी दोस्ती के लायक नहीं।   कुछ दिनों पहले मित्रता के आधार पर हरभजन सिंह और युवराज सिंह ने अफरीदी की एनजीओ के लिए मदद करने की अपील भी की थी लेकिन दोनों क्रिकेटरों को यह समझ में आ गया कि अफरीदी द्वारा की गई इस घटिया हरकत के बाद ऐसे लोगों की सहायता करना गलत था। हरभजन ने कहा कि ‘हमारा इरादा दोस्ती के आधार पर अच्छे व सामाजिक कार्यों को करने के लिए था लेकिन अफरीदी ने अपनी औकात दिखाई और अब अफरीदी से दोस्ती का कोई मतलब नहीं।‘ वहीं युवराज ने भी कहा कि ‘अफरीदी द्वारा हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के बारे में कहे शब्दों से बहुत निराशा हुई। मैनें मानवता के आधार पर मदद के लिए अपील की थी लेकिन अब कभी किसी प्रकार की सहायता नहीं करूंगा।‘   यदि अफरीदी के वीडियो पर गौर किया जाए तो ऐसा लग रहा था वो पहले से ही सोचकर आया था कि उसे यह सब बोलना है। कोरोना से जंग या उसके सुझाव पर तो वह बामुश्किल तीस सेंकड भी नहीं बोल पाया और मोदी के खिलाफ आग उगलनी शुरू कर दी। हालांकि अधितकर लोगों ने अफरीदी के बयान को गंभीरता से न लेते हुए उसे जोकर तक करार दे दिया। कुछ लोगों का मानना तो यह है कि आजकल जिसको भी हीरो बनना है वो बस मोदी के खिलाफ बोल दे, उसके बाद पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो जाएगा। इस घटना का एक नजरिया यह भी समझा जा रहा है कि अफरीदी को इमरान खान का खास चेला बताया जाता है इसलिए ऐसा बोलकर शायद अपने आका को खुश करना चाह रहा हो। बहरहाल,अफरीदी की मंशा कुछ भी रही हो लेकिन उसके बयान का असर क्रिकटरों के रिश्तों पर देखने को मिल सकता है। जैसा मौजूदा वक्त में मोदी सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे हैं और उनकी लोकप्रियता देश ही नहीं पूरी दुनिया में देखने को मिल रही है, यह बात पाकिस्तान को बहुत चुभती है। इस बात को पाकिस्तान के पत्रकार व अन्य क्षेत्रों के दिग्गजों को रोजाना पाकिस्तानी चैनलों पर कहते सुना जा सकता है। पाकिस्तान की आवाम से लेकर तमाम लोगों ने यह माना है कि मौजूदा वक्त में मोदी ने भारत के सम्मान को शिखर तक पहुंचा दिया, इसके विपरीत जब से इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं तब से पाकिस्तान में हर तरह का संकट गहराता जा रहा है। आर्थिक चुनौतियां तो हर रोज बढ़ ही रही हैं, साथ में सम्मान भी नहीं बच रहा।   वैसे तो भारत-पाकिस्तान को जोड़ने के लिए अब कुछ नहीं है लेकिन मात्र क्रिकेट ही बचा था जिसके आधार पर थोड़ी बहुत दोस्ती का आधार बना हुआ था लेकिन शाहिद अफरीदी ने अब वो भी दांव पर लगा दिया। पाकिस्तान के तमाम पूर्व क्रिकेटर भारत के कई शो में आते रहते हैं और वो इसलिए किया जाता है कि दोनों देशों में आपसी प्रेम बढ़े। कपिल शर्मा शो के अलावा अन्य कॉमेडी, सिंगिंग व डांसिंग शो में पाकिस्तानी क्रिकेटर आते रहते हैं लेकिन शायद अब ऐसा संभव न हो।   दरअलस कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि नफरत फैलाकर हीरो बन सकते हैं लेकिन यह मात्र उनकी भूल है। बहरहाल, किसी भी खिलाड़ी सेलिब्रिटी को जबतक वो किसी पार्टी का चोला न पहन ले तबतक राजनीतिक बयान देकर अपनी छवि धूमिल नहीं करनी चाहिए, चूंकि उसकी लोकप्रियता पर ही इसका खराब प्रभाव पड़ता है। यदि वो ऐसा करेंगे तो उनके प्रशसंक भी वैसी ही प्रतिक्रिया देंगे जिससे नुकसान के अलावा कुछ नहीं होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Stomach too empty and pocket too empty

डॉ. वेदप्रताप वैदिक तालाबंदी का चौथा दौर शुरू हो चुका है। केंद्र सरकार ने अच्छा किया कि राज्य सरकारों को यह तय करने का अधिकार दे दिया कि वे अपने यहां कहां-कहां और कितना-कितना ताला लगाए रखें और अन्य राज्यों के साथ भी उनके आवागमन के संबंध कैसे रहें। कोरोना के हताहतों की संख्या गर्मी के बावजूद बढ़ती जा रही है। इसका एक संकेत यह भी है कि भारत को अभी अगले दो-तीन महीने तक अधिक सावधान रहना होगा। इस बीच वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ रु. की राहत की घोषणा पांच किस्तों में की। विरोधी दलों ने उसे कोरा छलावा और दिखावा कहा लेकिन वास्तव में यदि उनकी घोषणाओं को अमली जामा पहनाया जा सका तो देश के कृषि, छोटे उद्योग और शस्त्र-निर्माण के क्षेत्रों को कुछ न कुछ फायदा जरूर होगा। कई अर्थशास्त्रियों की यह राय रही कि 20 लाख करोड़ रु. की राहत की बजाय यह तीन-चार लाख करोड़ से ज्यादा की राहत नहीं है। ज्यादातर राहतें तो सालाना बजट से ही उठाकर इस कोरोना राहत में जोड़ दी गई हैं। याने यह कोरा शब्दजाल है। यदि इसे हम अतिरंजित आलोचना मान लें तो भी मुख्य प्रश्न यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था, जो पिछले दो माह में बिल्कुल लंगड़ा गई है, उसे गति कैसे मिलेगी? विश्व-प्रसिद्ध संस्था गोल्डमैन साक्स के अनुसार तीन माह में भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग 45 प्रतिशत सिकुड़ जाएगी और भारत के समग्र उत्पाद (जीडीपी) में 5 प्रतिशत पतन हो जाएगा। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, बाजारों में मांग का होना और लोगों के हाथ में पैसा होना। आपने लघु-उद्योगों को 3 लाख करोड़ रु. के कर्ज देने की घोषणा तो कर दी लेकिन क्या यह भी सोचा कि जब खरीदारों की जेब में पैसा ही नहीं है तो कारखानों में बना माल बिकेगा कैसे? कारखानेदार फिजूल कर्ज के नीचे क्यों दबना चाहेंगे? प्रवासी मजदूरों के लिए 'मनरेगा' की मजदूरी और कुल राशि बढ़ाने के लिए बधाई लेकिन यह बताइए कि जब उन्हें गांवों में बैठे हुए 202 रु. रोज और मुफ्त अनाज मिलेगा तो वे शहरों में वापिस क्यों लौटेंगे? यदि उनको लौटाना है, कारखानों को चलवाना है और बाजारों में रौनक लाना है तो अमेरिका, केनाडा, इंग्लैंड और जर्मनी की तरह करोड़ों किसानों और मजदूरों को कम से कम दो-तीन माह तक जीवन-भत्ता या गुजारा-भत्ता दीजिए। खाली पेट और खाली जेब को भरे बिना अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना मुश्किल है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal,Why not stop the loudspeaker from mosques

आर.के. सिन्हा अगर मस्जिदों से लाउडस्पीकरों पर अजान न दी जाए तो क्या इस्लाम खतरे में आ जाएगा? क्या अजान इस्लाम का अभिन्न अंग है। इन सवालों के अलग-अलग उत्तर हैं। पहले सवाल का जवाब तो यह है कि 1400 साल पुराने इस्लाम धर्म को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि लाउडस्पीकर से अजान न भी दी जाए। इस्लाम में मस्जिदें भी बाद में ही बनी और उन दिनों लाउडस्पीकर जैसा उपकरण था भी नहीं तो अजान एक मोइज्जिन ही तो देता था। आज भी वही देता है लेकिन भारत में अब लाउडस्पीकर लगाकर। दूसरे सवाल का जवाब है कि अजान बेशक इस्लाम का इसके प्रारंभिक दिनों से ही अभिन्न अंग है। इस्लाम, अजान और लाउडस्पीकर के संबंधों पर विगत दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मील का पत्थर फैसला सुनाया है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग कतई नहीं है। हां, यह जरूर है कि अजान देना इस्लाम की धार्मिक परम्परा है। इसलिए मस्जिदों से मोइज्जिन बिना लाउडस्पीकर अजान दे सकते हैं। इस फैसले का चौतरफा स्वागत होना चाहिए। मुस्लिम संगठनों को भी कोर्ट के इस फैसले को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए था। पर फिलहाल कोई पहल होती दिखाई नहीं दे रही।   यह संयोग माना जाएगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के उपर्युक्त फैसले से कुछ दिन पहले 9 मई को बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर अपने ट्वीट में लाउडस्पीकर पर अजान को परेशान करने वाला बताया था। जावेद अख्तर ने अपने ट्वीट में लिखा "भारत में लगभग 50 साल तक लाउडस्पीकर पर अजान देना हराम रहा लेकिन अब जब हलाल हुई है तो खत्म ही नहीं हो रही। लेकिन इसे खत्म करना चाहिए। उम्मीद है कि दूसरों को हो रही परेशानी को समझते हुए लाउडस्पीकर पर अजान देना खुद ही बंद कर देना चाहिए।" जावेद अख्तर ने इस तरह लाउडस्पीकर पर अजान देने को लेकर अपनी राय पेश की है। उस समय तो उन्हें पता भी नहीं था कि कोर्ट क्या फैसला देगी। एक बात सबको पता होनी चाहिए कि अब भी भारत में कई मस्जिदों में लाउडस्पीकरों का इस्तेमान किए बगैर ही अजान दी जाती है। अगर किसी को यकीन न हो तो वह दिल्ली की एतिहासिक शिया जामा मस्जिद में जाकर इस तथ्य की पुष्टि कर सकता है। इसके इमाम मौलाना मोहम्मद मोहसिन तकी गर्व से बताते हैं कि हमारी मस्जिद में लाउडस्पीकर पर अजान नहीं दी जाती। शिया जामा मस्जिद में लाउडस्पीकर पर अजान नहीं दी जाती तो क्या यहाँ नमाज पढ़ने आने वाले सच्चे मुसलमान नहीं है? क्या जावेद ने लाउडस्पीकर पर अजान देने को गलत बताकर कोई पाप कर दिया?   कुछ समय पहले प्लेबैक सिंगर सोनू निगम ने भी लाउडस्पीकर पर अजान देने की प्रथा रोकने की मांग की थी। तब उनके खिलाफ तमाम मुस्लिम संगठन और कथित प्रगतिशील तत्व हाथ धोकर पीछे पड़ गए थे। उनका तो इतना भर कहना था कि फिल्मी जगत के लोग देर रात तक काम करके जब घर लौटते हैं और सोने की कोशिश में लगे होते हैं, उस समय सुबह की अजान शुरू हो जाती है जिसका शोर कष्टप्रद होता है। आपको याद होगा कि तब पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक परिषद् के उपाध्यक्ष सैयद शाह कादिरी ने सोनू निगम के खि‍लाफ फतवा जारी करते हुए कहा था कि जो कोई भी सोनू निगम को गंजा करेगा और पुराने जूते की माला पहनाएगा, उसे 10 लाख रुपये का इनाम दिया जाएगा। पर उस शख्स पर तो किसी ने क़ानूनी कार्रवाई तक करने की मांग नहीं की थी। हालांकि सोनू निगम ने अपने हिन्दू धर्म में फैली कुरीतियों पर कसकर हल्ला बोला था। कहा था- रास्ते में जो उत्सव होते हैं," वो लोग दादागीरी करते हैं, नाचते हैं। ऐसा करने से पुलिस की तकलीफ हो जाती है।" सोनू निगम ने यह भी कहा था कि लोग धर्म के नाम पर शराब पीते हैं, फिल्मी गाने बजाते हैं।" कहने की जरूरत नहीं कि उनके संकेत किसकी तरफ थे।   क्या जो सोनू निगम की जान के पीछे पड़ गए थे वे अब भी कोर्ट के फैसले का भी विरोध करेंगे? वे जो भी करें यह तो उनकी मर्जी है पर कोर्ट ने गलत कुछ भी नहीं कहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण मुक्त नींद का अधिकार व्यक्ति के जीवन के मूल अधिकारों का हिस्सा है। किसी को भी अपने मूल अधिकारों के लिए दूसरे के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार तो नहीं है न?   अब इस सारे मामले की तह में चलते हैं। दरअसल वैश्विक महामारी कोरोना से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन घोषित किया गया है। इसके चलते उत्तर प्रदेश में भी सभी प्रकार के आयोजनों व एक स्थान पर भीड़ एकत्र होने पर रोक लगी। इसके लिए लाउडस्पीकर बजाने पर भी रोक है। लाउडस्पीकर से अजान पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ गाजीपुर से बहुजन समाज पार्टी के बाहुबली सांसद अफजाल अंसारी कोर्ट में चले गए। उन्होंने रमजान के महीने में लाउडस्पीकर से मस्जिद से अजान की अनुमति न देने को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी।   बहरहाल, इसबार कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के चलते रमजाने के महीने में भी मस्जिदों से अजान नहीं सुनी गई। ऐसा नहीं कि अजान न हुई होगी। ऐसा तो हो ही नहीं सकता। मोइज्जिन साहब की अजान के बगैर नमाज अदा नहीं हो सकती। लिहाजा अजान भी हुई होगी और मस्जिद के इमाम, मोइज्जिन और मुतवल्ली ने शारीरिक दूरी के साथ नमाज भी अदा की ही होगी लेकिन लाउडस्पीकर का भोंपू अजान के साथ नहीं जोड़ा गया। समझ में नहीं आता कि मस्जिदों-मंदिरों-गुरुद्वारों को लाउडस्पीकर की जरूरत क्यों पड़ती है? नमाज और पूजा का काम शांति से भी तो हो सकता है। दरअसल कुछ विसंगतियों के चलते ही ऐसा होता है। कुछ इसी तरह की विसंगतियों का असर है कि रमजान को अब कुछ लोग रमादान और खुदा हाफिज को अल्ला हाफिज भी कहने लगे हैं। यह परिवर्तन इस्लाम की वजह से नहीं कट्टरपंथियों की वजह से हुआ है। कट्टरपंथ किसी भी धर्म के लिये अच्छा नहीं होता। आज इसी कट्टरपंथ ने कई उदार और उद्दात्त हिन्दुत्व को भी संकीर्ण बना दिया है। तुलनात्मक चीजें हैं तो तुलना तो होगी ही। किसी भी क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक प्रकृति का नियम है। किसी भी धार्मिक स्थान से तेज आवाज में शोर होना गलत है। धर्म कभी यह नहीं कहता है कि दूसरों को किसी तरह की तकलीफ दी जाए। आप अपने धर्म का पालन जरूर करिए। परंतु, ये भी आपकी जिम्मेदारी बनती है कि उससे किसी को तकलीफ न हो। यह तर्क ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दिया है। जब इस्लाम का उदय हुआ तो उस समय लाउडस्पीकर नहीं थे। सतयुग, त्रेता, द्वापर युग में भी लाउडस्पीकर नहीं थे। जो लोग अपने अनुसार धर्म की परिभाषा गढ़ रहे हैं, वह बहुत ही गलत और अक्षम हैं।     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 18 May 2020


bhopal, There are two Hindustan in India

डॉ. वेदप्रताप वैदिक कोरोना के इन 55 दिनों में मुझे दो हिंदुस्तान साफ-साफ दिख रहे हैं। एक हिंदुस्तान वह है, जो सचमुच कोरोना का दंश भुगत रहा है और दूसरा हिंदुस्तान वह है, जो कोरोना को घर में छिपकर टीवी के पर्दे पर देख रहा है। क्या आपने कभी सुना कि आपके किसी रिश्तेदार या किसी निकट मित्र का कोरोना से निधन हो गया है? मैंने तो अभीतक नहीं सुना। क्या आपने सुना कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री की तरह हमारा कोई नेता, मंत्री, सांसद या विधायक कोरोना का शिकार हुआ है? हमारे सारे नेता अपने-अपने घरों में दुबके हुए हैं। देश के लगभग हर प्रांत में मेरे सैकड़ों-हजारों मित्र और परिचित हैं लेकिन सिर्फ एक संपन्न परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनके यहां तीन लोग कोरोना से पीड़ित हो गए हैं। मैंने पूछा कि यह कैसे हुआ? उनका अंदाज था कि यह उनके घरेलू नौकर, ड्राइवर या चौकीदार से उनतक पहुंचा होगा। यानि कोरोना का असली शिकार कौन है? वही दूसरावाला हिंदुस्तान! इस दूसरे हिंदुस्तान में कौन रहता है? किसान, मजदूर, गरीब, ग्रामीण, कमजोर और नंगे-भूखे लोग! वे चीन या ब्रिटेन या अमेरिका जाकर कोरोना कैसे ला सकते थे? उनके पास तो दिल्ली या मुंबई से अपने गांव जाने तक के लिए पैसे नहीं होते। यह कोरोना भारत में जो लोग जाने-अनजाने लाए हैं, वे उस पहले हिंदुस्तान के वासी हैं। वह है, इंडिया ! वे हैं, देश के 10 प्रतिशत खाए-पीए-धाए हुए लोग और जो हजारों की संख्या में बीमार पड़ रहे हैं, सैकड़ों मर रहे हैं, वे लोग कौन हैं? वे दूसरे हिंदुस्तान के वासी हैं। वे 'इंडिया' के नहीं, 'भारत' के वासी हैं। इन भारतवासियों में से 70-80 करोड़ ऐसे हैं, जो रोज कुआंं खोदते हैं और रोज़ पानी पीते हैं। उनके पास महीने भर की दाल-रोटी का भी बंदोबस्त नहीं होता। इन्हीं लोगों को हम ट्रकों में ढोरों की तरह लदे हुए, भयंकर गर्मी में नंगे पांव सैकड़ों मील सफर करते हुए, थककर रेल की पटरी पर हमेशा के लिए सो जाने के लिए और सड़कों पर दम तोड़ते हुए रोज देख रहे हैं। सरकारें उनके लिए भरसक मदद की कोशिशें कर रही हैं लेकिन उनसे भी ज्यादा भारत की महान जनता कर रही है। आजतक एक भी आदमी के भूख से मरने की खबर नहीं आई है। यदि सरकारें, जैसा कि मैंने 25 मार्च को ही लिखा था, प्रवासी मजदूरों को घर-वापसी की सुविधा दे देतीं तो हमें आज पत्थरों को पिघलाने वाले ये दृश्य नहीं देखने पड़ते। आज भी 'भारत' के हर वासी के लिए सरकार अपने अनाज के भंडार खोल दे और कर्जे देने की बजाय दो-तीन माह के लिए दो सौ या ढाई सौ रुपए रोज का जीवन-भत्ता दे दे तो हमारे 'इंडिया' की सेवा के लिए यह भारत फिर उठ खड़ा होगा।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 18 May 2020


bhopal,Questions arising on online education

ऋतुपर्ण दवे कोरोना महामारी से भयभीत तमाम शिक्षा संचालकों और शिक्षा के ठेकेदारों ने खासकर बच्चों की पढ़ाई के लिए तोड़ निकाल ऑनलाइन शिक्षा देने की जो कोशिशे की हैं, वो बहुत जल्द बेहद घातक लगने लगीं। लगता है कि जानकारों ने जानते हुए भी जो पहल की उसके तमाम बुरे नतीजों ने इसे कटघरे में ला खड़ा किया। जहाँ पहले से ही बच्चों में मोबाइल फोन के दुष्परिणाम और खतरनाक नतीजों ने माँ-बाप और अभिभावकों की परेशानी बढ़ा रखी थी, वहीं एकाएक मोबाइल के जरिए शिक्षा परोस देना कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया के लिए अभिशाप से कम नहीं है।   बच्चों को अव्वल बनाने की होड़ में पहले जहाँ अभिभावक चुप रहे, वहीं अब सरकारी महकमों पर भी सवाल उठने लगे कि ब्यूरोक्रेट्स सब कुछ जानते हुए भी न केवल गूंगे बने रहे बल्कि जनप्रतिनिधियों तक ने चुप्पी साध ली। हालांकि बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा पर सवाल पहले दिन से ही उठ रहे हैं लेकिन हैरानी की बात है कि खुद केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई और तमाम राज्यों के बोर्ड ने भी बिना देरी किए न केवल ऑनलाइन शिक्षा शुरू करवाई बल्कि खूब प्रचार-प्रसार भी किया। अभिभावकों के सामने दूसरे बच्चों से पिछड़ने का भय भी पैदा हुआ या किया गया। स्कूलों द्वारा ऑनलाइन शिक्षा की थाली सजाकर वाट्सएप ग्रुप के रूप में परोसी जाने लगी।   निश्चित रूप से यह माँ-बाप और अभिभावकों के लिए दुविधा वाली स्थिति बनी। न तो हाँ कह सकते और न ही ना। लॉकडाउन लगते ही बिना देरी किए सीबीएसई ने ही 25 मार्च को बच्चों की पढ़ाई को लेकर बड़ा फैसला कर मंशा जताई कि किसी भी कीमत पर बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित नहीं होने देना है। देश भर के स्कूलों के लिए गाइडलाइन जारी किया कि पढ़ाई प्रभावित न हो इसलिए सारे स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था शुरू करें वरना कठोर कार्रवाई होगी और मान्यता रद्द की जा सकती है। देखा-सीखी कई राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने भी यही किया। शुरू में तो यूँ लगा कि जैसे शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया भर में क्रान्ति आ गई है। स्कूलों में बैठकर पढ़ने के दिन लद गए। अब तो सारा कुछ ऑनलाइन लेकिन चन्द हफ्तों में ही दुष्परिणाम दिखने लगे जो बेहद परेशान करने वाले रहे। बच्चों के सुरक्षित जीवन जिसकी अभी वो शुरुआत ही कर रहे हैं, उनके लिए मोबाइल पर शिक्षा किसी गंभीर खतरे से कम नहीं रही। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी बड़े बदलाव के खिलाफ आगाह करते हुए चेताया कि इससे सामाजिक-आर्थिक असामनता और इसका वर्चुअल प्लेटफॉर्म बच्चों को अनायास ही यौन शोषण और तमाम विकृतियों की तरफ ले जा सकता है। यूएनओ की एजुकेशन शाखा यूनेस्को ने शिक्षा के लिए कुछ सिफारिशें की, जिसमें कहा कि यह सोचना भ्रम है कि ऑनलाइन सीखना सभी के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है। जबकि एजुकेशन कमीशन ने कहा कि दूरस्थ इलाकों में ऑनलाइन शिक्षा न केवल गरीब बल्कि अमीर देशों में भी गैर बराबरी बढ़ाएगी। लेकिन भारत में इसकी अनसुनी हुई, नतीजतन अब तमाम तरह की चर्चाओं का दौर जरूर शुरू हो गया।   अब ऑनलाइन कक्षाओं के फायदे कम, नुकसान ज्यादा दिखने लगे हैं। शुरुआत में बच्चे जरूर खुश थे लेकिन अब तमाम कठिनाइयां आ रही हैं। अभिभावक अलग परेशान हैं। इण्टरनेट पैक के खर्चे बढ़े जिसने लॉकडाउन के बीच पाई-पाई को तरस रहे लोगों की मुसीबतें बढ़ा दीं। हालांकि इससे बच्चे व्यस्त जरूर हो गए लेकिन हासिल कुछ हो नहीं रहा। डाउट्स भी क्लियर नहीं होने से उनमें स्ट्रेस बहुत बढ़ रहा है। वहीं आँखों की परेशानी, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, एंग्जायटी और घुटन तक की थोक में शिकायतें आनी शुरू हो गई। अब तो कई चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट भी मानते हैं कि यह बिल्कुल ठीक नहीं है तथा छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखना चाहिए क्योंकि उनकी नन्हीं आंखों की मांसपेशियां बहुत कमजोर होती हैं तथा लगातार मोबाइल देखने से बच्चों की आंखों को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है।   बहरहाल अहम यह है कि ऑनलाइन शिक्षा की जरूरतों के बीच तमाम वैज्ञानि‍क अध्ययनों और नि‍ष्कर्षों की अनदेखी भी न हो जिसमें मोबाइल फोन तथा अन्य कॉर्डलेस टेलीफोन के इस्तेमाल से मस्तिष्क पर पड़ने वाले जैविक प्रभाव संबंधी शोध किए जा रहे हैं। स्वीडन के ओरेब्रो यूनिवर्सिटी द्वारा बच्चों तथा किशोरों में वायरलेस टेलीफोन के दुष्प्रभावों का अध्ययन कर जांच की गई कि बच्चों और किशारों में इसके इस्तेमाल से किस तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्या आती है। चिकित्सा शोधकर्ता फ्रेडरिक साडरक्विस्ट ने युवाओं और बड़ों के खून की भी जांच की जिससे पता चला कि बड़ों की तुलना में बच्चे वायरलेस फोन की तरंगों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं, जिससे खून में प्रोटीन ट्रांसथायरेटिन की मात्रा भी बढ़ती जो उनके दिमाग पर असर डालती है। यही संवेदनशीलता मोबाइल फोन से रेडि‍एशन, मेमोरी लॉस और एल्जॉइमर्स जैसी बीमारि‍यों की संभावना बढ़ाती है जिसपर अक्सर काफी सुनने, पढ़ने को मिलता है।   प्राइमरी के बच्चों से लेकर सीनियर सेकेण्डरी तक के बच्चों की मोबाइल को लेकर दीवानगी किसी से छुपी नहीं है। इण्टरनेट पर पहले ही खतनाक खेलों की भरमार है, जिसमें ब्लू व्हेल, पबजी के चलते न जाने कितनी मौते हुई। वहीं अनेकों ऐसे हिंसक खेलों की कमी नहीं है जिसमें गाली-गलौज, मारपीट, गोली चलाने जैसी घटनाएँ दिखाई जाती हैं। पहले ही डॉक्टरों की ओपीडी में इण्टरनेट की लत के शिकार नई पीढ़ी जिसमें बच्चे और किशोर हैं उनकी भरमार है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा के जरिए घण्टों बच्चों को मोबाइल के साथ छोड़ना बहुत बड़े जोखिम से कम नहीं। वहीं ऑनलाइन शिक्षा के दौरान बच्चों के वाट्सएप ग्रुप में पोर्न सामग्रियाँ भेजे जाने की कुछ शर्मनाक घटनाओं ने अलग चिन्ता बढ़ा दी है।   इधर यूनिसेफ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जहाँ लॉकडाउन के बाद विश्व के 191 देशों में डेढ़ सौ करोड़ से ज्यादा छात्र और लगभग साढ़े 6 करोड़ प्राइमरी व सेकेंडरी शिक्षक प्रभावित हैं। जब कि भारत में लगभग 32 करोड़ छात्रों पर असर पड़ा है जो नर्सरी, प्री-प्राइमरी से लेकर ग्रेजुएशन व पोस्टग्रेजुएशन के हैं। वहीं दुनिया में बड़ी जनसंख्या के सामने अब भी बड़ी समस्या इंटरनेट और आनलाइन पढ़ाई के लिए बुनियादी जरूरतों की है। सन् 2018 में जारी सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में महज 38 फीसदी लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन हैं, उसमें भी 84 फीसदी शहरी तथा 16 फीसदी ग्रामीण हैं। यानी शहरी के मुकाबले ग्रामीण इंटरनेट से कोसों दूर हैं। जबकि दूसरी बड़ी बात यह भी कि जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है वो कनेक्टिविटी को लेकर परेशान रहते हैं। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों सहित केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में अभीतक इंटरनेट की 2 जी सेवा ही पहुंची है। ऐसी स्थिति में ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता स्वतः समझ आ जाती है।   मान भी लिया जाए कि ऑनलाइन शिक्षा वक्त की जरूरत है तब भी यह सबकी पहुँच से बाहर ही है। यानी गरीब और अमीर के फर्क के अलावा पहुँच और गैर पहुँच के बीच का नया फर्क पैदा होगा जिससे भारत में इण्टरनेट कनेक्टिविटी के सच और दावों के बीच एक नई जंग शुरू होगी। अहम सवाल यही कि क्या ऑनलाइन शिक्षा से बिना गुरू के सामने रहे वाकई बच्चे शिक्षित हो पाएंगे और वही सीखेंगे जो सीखने की मंशा हुक्मरान और माँ-बाप की है या फिर अनजाने ही किसी गलत और खतरनाक रास्ते पर निकल पड़ेंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 18 May 2020


bhopal,Government

डॉ. वेदप्रताप वैदिक वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी दूसरी पत्रकार परिषद में ऐसी अनेक घोषणाएं की हैं, जिनसे आशा बंधती है कि कोरोना से उत्पन्न आर्थिक संकटों पर काबू पाया जा सकता है। जहां तक 20 लाख करोड़ रु. की राहत देने की बात थी, वह विवाद का विषय है। उसे एक तरफ रख दें तो भी मानना पड़ेगा कि केंद्रीय सरकार अब सही दिशा में सोचने लगी है। उसने प्रवासी मजदूरों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। उसने यह बात अच्छी तरह समझ ली है कि आप उद्योग-धंधों पर करोड़ों-अरबों रु. खपा दें और कारखानों में मजदूर न हों तो आप क्या कर लेंगे? सिर्फ पूंजी और मशीनों से उद्योगों को जिंदा नहीं रखा जा सकता। हमारे प्रवासी मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर अपने घर लौट रहे हैं। उनकी संख्या करोड़ों में है। यदि वे नहीं लौटे तो क्या होगा? वे अपना पेट कैसे भरेंगे? वित्त मंत्री ने कहा है कि मनरेगा में उनकी मजदूरी 180 रु. से बढ़ाकर 202 रु. कर दी गई हैं। मैं कहता हूं कि इसे 250 रु. क्यों नहीं कर दिया जाता और 100 दिन के बजाय 200 दिन क्यों नहीं उन्हें काम दिया जाता? उन्हें शहरों में लौटाना है तो यहां भी उनकी मजदूरी बढ़ाइए। उन्हें दो महीने तक मुफ्त राशन देने का फैसला अच्छा है लेकिन उन्हें बेरोजगारी भत्ता भी क्यों नहीं दिया जाता? अमेरिका, केनाडा और ब्रिटेन में दिया जा रहा है। यह अच्छा है कि अब सरकार उनके लिए सस्ते किराए के मकान शहरों में बनाएगी और उनकी चिकित्सा मुफ्त होगी। उनका वही एक राशन कार्ड अब सारे भारत में चलेगा। जिनके पास राशन-कार्ड नहीं हैं, उन्हें भी मुफ्त राशन और बेकारी भत्ता दिया जाए तो बेहतर होगा। प्रवासी मजदूर देर-सबेर लौटेंगे जरूर लेकिन उनके किसान रिश्तेदारों को भी आत्म-निर्भर बनाना बहुत जरूरी है। उन्हें कर्ज देने में सरकार ने उदारता जरूर बरती है लेकिन उनकी फसलों के उचित दाम उन्हें आज भी नहीं मिलते। सरकार चाहे तो खेती को इतना प्रोत्साहित कर सकती है कि वह हमारे विदेशी मुद्रा के भंडारों को लबालब कर दे।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, Corona thorns in the path of war

अनिल निगम भारत में कोराना का कहर बढ़ता जा रहा है। कोराना वायरस से संक्रमित होने और मरने वालों का आंकड़ा भी सरपट दौड़ रहा है। केंद्र सरकार ने संपूर्ण देश में 25 मार्च से ही लॉकडाउन कर रखा है। लोगों को घरों में सुरक्षित रहने, बाहर निकलने पर अनिवार्य रूप से मास्‍क पहनने, सोशल डिस्‍टैंसिंग का पालन करने और हाथ धोने अथवा सैनेटाइज करने की एडवाईजरी लगातार जारी की जा रही है। लेकिन समाज के विभिन्‍न वर्गों द्वारा इसको गंभीरता से न लेने के चलते सरकार और समाज के जिम्‍मेदार लोगों के किए गए प्रयासों पर पानी फिर रहा है। प्रवासी मजदूरों की रेल की पटरियों और सड़क मार्ग से यात्रा के बाद बिना जांच-पड़ताल के गांवों में प्रवेश और शराब की दुकानों में मारामारी ने चिंता बढ़ा दी है। सब्‍जी, फल, किराना और दूध विक्रेता कोरोना वायरस की चपेट में बहुत तेजी से आ रहे हैं। एक ओर समाज में अनेक ऐसे प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष योद्धा हैं जो न सिर्फ वायरस के खिलाफ जंग को प्रभावी बनाने में लगे हैं, बल्कि अपना जीवन दांव पर लगाकर लोगों की सेवा कर रहे हैं। दूसरी ओर सब्‍जी मंडी, किराना दुकानों, सड़क-गलियों और अन्‍य सार्वजनिक स्‍थानों में सैकड़ों लोग बिना मास्‍क के घूम रहे हैं। अगर समाज का कोई जागरूक नागरिक उनको समझाने की कोशिश भी करता है तो ऐसे लोगों को दी जानी वाली सीख बेहद बुरी लगती है। चीन यानी जिस देश के वुहान प्रांत से कोराना वायरस फैला, उसने कोरोना से लड़ने के लिए लॉकडाउन जैसा सख्त कदम 30 लोगों के मारे जाने के बाद उठाया, इटली में लॉकडाउन का कदम उस समय उठाया गया जब मरने वालों की संख्या 800 हो गई। इन देशों के मुकाबले भारत ने यह कदम तब उठाया जब कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 10 भी पार नहीं किया था। इस कठिन फैसले की तारीफ वैश्विक स्‍तर पर की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को संपूर्ण देश में सुबह सात बजे से रात में नौ बजे तक जनता कर्फ्यू का ऐलान किया। लोगों ने उसका ईमानदारी से पालन किया। उसके बाद 25 मार्च से 21 दिन का लॉकडाउन, पार्ट दो में 3 मई और पार्ट तीन में 17 मई तक लॉकडाउन की घोषणा कर की। अब बदले हुए रंग-रूप में लॉकडाउन का चौथा चरण 18 मई से शुरू होगा। कोरोना योद्धाओं के सम्‍मान में थाली, ताली पीटने और दीप जलाने के प्रधानमंत्री के आह्वान का लोगों ने जमकर समर्थन भी किया। हालांकि सरकार द्वारा घोषित लॉकडाउन से सबसे अधिक परेशानी देश के प्रवासी मजदूरों को हुई। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में 45 करोड़ से ज्यादा लोग प्रवासी हैं। यह आंकड़ा भारत की कुल जनसंख्या का 37 फीसदी है। मजदूरों को रोजी-रोटी की तलाश में अपना घरबार छोड़कर अन्‍य शहरों अथवा दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ता है। उल्‍लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश और बिहार से पलायन करने वाले लोगों की संख्या देश के अन्‍य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कुल संख्या का 50 फीसदी पलायन देश के हिंदी भाषी प्रदेशों-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान से हुआ है। देश के दो बड़े महानगरों दिल्ली और मुंबई की ओर पलायन करने वालों की कुल संख्या लगभग एक करोड़ है जो वहां की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। रोजी-रोटी के साधन, उद्योग-धंधों के बंद होने और काम न होने के चलते प्रवासी मजदूरों में असुरक्षा की भावना पैदा होने लगी। वे अपने गांव लौटने को उतावले हो गए। हालांकि सरकार ने उनके लिए राहत पैकेज की घोषणा की और उनके खातों में पैसे भी ट्रांसफर किए। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, सेवा भारती, विश्‍व हिंदू परिषद सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने ऐसे परेशान लोगों को राशन और भोजन भी उपलब्‍ध करा रहे हैं। लेकिन लॉकडाउन पार्ट तीन में कोरोना के बढ़ते कहर और बढ़ती चुनौतियों से मजदूरों में बेचैनी बढ़ गई और उनके सब्र का बांध टूट गया। उन्‍होंने प्रदेश और केंद्र सरकारों से घर वापसी की गुहार लगाई। सरकारों ने बसों और ट्रेनों के माध्‍यम से उनकी मांग पूरी करनी भी शुरू कर दी। लेकिन राज्‍यों के हजारों प्रवासी मजदूर अपने-अपने गांवों के लिए सड़क और रेल पटरियों से पैदल जाना शुरू कर दिया। यह सिलसिला फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा। हालांकि बहुत से मजदूरों को स्‍थानीय प्रशासन और पुलिस ने क्‍वारंटीन किया लेकिन सैकड़ों मजदूर ऐसे भी हैं जो बिना क्‍वारंटीन हुए अपने गांवों में पहुंच चुके हैं। सरकार ने तीसरे चरण का लॉकडाउन कुछ छूट के साथ बढ़ाया। इसमें 4 मई से शराब की दुकानें खोलने की छूट भी दे दी गई। छूट मिलते ही राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली सहित देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में शराब की दुकानों के सामने कई किलोमीटर तक ख़रीददारों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं। यहां मास्‍क न पहनने के मामले बढ़ गए और सोशल डिस्‍टैंसिंग की जमकर धज्जियां उड़ीं। कई स्‍थानों पर भगदड़ मचने की वजह से पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और शराब की दुकानें तक बंद करनी पड़ीं। दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल को यहां तक कहना पड़ा कि अगर लोग नियमों का पालन सब्र के साथ नहीं करेंगे तो दी गई छूट वापस ले जी जाएगी। इसके अलावा दिल्ली सरकार ने शराब के दाम बढ़ा दिए। दिल्‍ली सरकार के इस निर्णय के बाद अनेक राज्‍यों ने 15 से 30 फीसदी तक अपने प्रदेश में भी शराब के रेट बढ़ा दिए हैं। दुर्भाग्‍यपूर्ण बात यह है कि विपक्षी दल समस्‍या का समाधान निकालने की जगह अपनी सियासी रोटी सेंकने में जुट गए हैं। विपन्‍न हालात में जीवन-यापन कर रहे मजदूरों की परेशानी स्‍वाभाविक है। उनकी समस्‍या को सुनियोजित तरीके से हल किया जा सकता है। लेकिन इसमें समाज के पढ़े-लिखे लोगों को महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी का निर्वहन करना होगा। उनको नागरिकों को जागरूक करना चाहिए कि वे भी सरकार द्वारा जारी गाइडलाइंस के हिसाब से मास्‍क पहनें, सोशल डिस्‍टैंसिंग और सैनेटाइजेशन का पालन करें और दूसरों से भी कराएं। हर नागरिक के अंदर जिम्‍मेदारी का भाव पैदाकर ही कोरोना जैसी महामारी को शिकस्‍त दी जा सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal,The message of Swadeshi hidden in local vocal and global

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों के नाम अपने संबोधन में 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा के साथ ही लोकल, वोकल और ग्लोबल का संदेश दिया। दरअसल अब अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। कोरोना ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। देखा जाए तो आर्थिक उदारीकरण के बाद ग्लोबलाइजेशन और आईटी क्रांति के बाद कारोबार का जो नया ट्रेंड ऑन लाईन चला था वह तहस-नहस होकर रह गया। यह साफ हो गया कि महामारी के इस दौर में जो कुछ आपके और आपके आसपास है, वही आपका सहारा है। हालांकि यह भी हमारी अर्थव्यवस्था की खूबसूरती ही मानी जानी चाहिए कि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे कुटीर उद्योग चल रहे थे या औद्योगीकरण के दौर में स्थानीय स्तर पर जो औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए वे स्थानीय जरूरतों खासतौर से खाद्य सामग्री की आपूर्ति में पूरी तरह सफल रहे और यही कारण है कि इतना सबकुछ थम जाने के बावजूद देश में कही खाद्य सामग्री की सप्लाई चेन नहीं टूटी। दुनिया के देशों के लिए दवा की आपूर्ति करने में सफल रहे। यह अपने आप में बड़ी बात है।   प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में स्थानीय उत्पादों को अपनाने का संदेश देने के साथ ही उसकी आवाज बनने यानी उसके प्रचार-प्रसार में सहभागी बनने का संदेश दिया है। इसी तरह से अब स्थानीय उत्पाद को वैश्विक मंच पर पहुंचाने पर जोर देकर यह साफ कर दिया है कि बदलते दौर में स्वदेशी, समस्याओं के समाधान का बड़ा माध्यम है। इससे निश्चित रूप से विदेशी का मोह भी कम होगा। प्रधानमंत्री मोदी अपने संबोधन में यह बताना नहीं भूले कि पहले कार्यकाल के दौरान जिस तरह से उन्होंने खादी को ब्रॉण्ड बनाने और अपनाने का आग्रह किया तो परिणाम सकारात्मक आए। खादी ब्राण्ड बनकर उभरी और खादी को लोग अपनाने लगे।   एक बात साफ है और यह हमारे देश की संस्कृति में रचा-बसा है कि जब कोई बड़ा आदमी खासतौर से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जनता से आग्रह करता है तो बिना किसी अगर-मगर के देशवासी उसे अपनाने में देरी नहीं करते। इसके एक नहीं अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। आज भी पुरानी पीढ़ी को याद है कि किस तरह लाल बहादुर शास्त्री के एक आह्वान पर देश की उस पीढ़ी के नागरिकों ने सोमवार का व्रत रखना आरंभ किया। उस समय की पीढ़ी के लोगों को आज भी सोमवार का उपवास रखते हुए देखा जा सकता है। इस तरह के बहुत से उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने पहले कार्यकाल में सरस दूध को अपनाने के लिए एक गिलास दूध का संदेश दिया और सरस चल निकला। इसी तरह राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का खादी को अपनाने के ताजातरीन संदेश का उदाहरण देखा जा सकता है जिसकी बदौलत राजस्थान में खादी की बिक्री में बढ़ोतरी हुई। पिछले कुछ समय से चीन के उत्पादों के प्रति लोगों का रुझान घटा है और गई दीपावली पर चीनी उत्पादों के आयात को कई कारोबारियों ने नकारा यह अपने आप में बड़ा उदाहरण है।   इस मिट्टी की यह खासियत रही है कि संकट के दौर या किसी नेता के आह्वान पर सब एकजुट हो जाते हैं। उदाहरण सामने है आज खाद्यान्नों के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हैं। मौजूदा लॉकडाउन दौर को ही देखा जाए तो अधिकांश देशवासी सितारा हॉस्पिटलों में आईसीयू में किसी से मिलने जाते थे तो मास्क, कैप व अस्पताल की चप्पल को जानते थे जो अंदर रोगी से मिल कर आते ही वार्ड के बाहर बने स्थान पर खोल कर रख दिए जाते थे या फिर किसी स्वजन का ऑपरेशन होता था तो ऑपरेशन थिएटर के बाहर रोगी का नाम पुकारते रेजिडेंट या अन्य चिकित्साकर्मी को हरे रंग की केप व मास्क लगाए देखते थे। संभवतः एन 95 मास्क के तो इस कोरोना वायरस ने ही हममें से अधिकांश को दर्शन कराए होंगे। ऐसे में इस आपात स्थिति में 2 लाख पीपीई या 2 लाख एन 95 मास्क बनाना अपने आप में बड़ी बात है। निश्चित रूप से देश की इस ताकत को समझना होगा। मजे की बात है कि मास्क की आवश्यकता होते ही देश के हर कोने में मास्क तैयार होने लगे और लोगों को बड़ी मात्रा में निःशुल्क मास्क उपलब्ध कराए गए।   इसके साथ ही बदलते हालातों में देश के सामने नए अवसर आए हैं। आज एकबार फिर स्थानीय उत्पादों को अपनाने और उनकी ग्लोबल पहचान बनाने की आवश्यकता है। नई परिस्थितियों में दुनिया के देशों का चीन से लगभग मोहभंग हो गया है। यह देश और देश की अर्थव्यवस्था के लिए नया अवसर है। ऐसे में स्वदेशी तकनीक के आधार पर औद्योगीकरण को नई दिशा देनी होगी। निश्चित रूप से इससे आर्थिक क्षेत्र में दूसरे देशों पर निर्भरता कम होने के साथ आत्मनिर्भरता आएगी और दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने का सपना पूरा होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, Indo-Nepal new tension

डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत और नेपाल के बीच सीमांत की एक सड़क को लेकर नया तनाव पैदा हो गया है। यह सड़क लिपुलेख के कालापानी क्षेत्र से होती हुई जाती है। यदि इस रास्ते से जाएं तो कैलाश-मानसरोवर जल्दी पहुंचा जा सकता है। इस नई सड़क का उद्घाटन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले हफ्ते ज्यों ही किया, काठमांडो में हलचल मच गई। कई भारत-विरोधी प्रदर्शन हो गए। नेपाली विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत को बुलाकर एक कूटनीतिक पत्र देकर पूछा है कि इस नेपाली जमीन पर भारत ने अपनी सड़क कैसे बना ली है? नेपाल की सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष पुष्पकमल दहल प्रचंड ने अपने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली से कहा है कि भारत कूटनीतिक तरीके से नहीं माननेवाला है। उसके लिए नेपाल को कुछ आक्रामक तेवर अपनाना पड़ेगा। असलियत तो यह है कि कालापानी क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच भ्रांति काफी लंबे समय से बनी हुई है। यह क्षेत्र भारत के उत्तराखंड, नेपाल और तिब्बत के सीमांत पर स्थित है। यह तिब्बत के तक्लाकोट नामक शहर के पास है। इसके साथ बने कच्चे रास्ते से दोनों-तीनों देशों के लोग व्यापार और यात्रा आदि भी सैकड़ों वर्षों से करते रहे हैं लेकिन 1816 में भारत की ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाली सरकार के बीच सुगौली संधि हुई, जिसके अनुसार भारत ने अपनी सीमा कालापानी नदी के झरनों तक मानी और नेपाल ने उसे कालापानी नदी के सिर्फ किनारे तक मानी है। भारत में नेपाल के राजदूत रहे और मेरे सहपाठी रहे प्रो. लोकराज बराल का कहना है कि यह विभ्रम इसलिए फैला है कि उस क्षेत्र में काली नदी नाम की दो नदियां हैं और 200 साल पहले नेपाल के पास नक्शे बनाने के साधन नहीं थे। इसीलिए ब्रिटिश नक्शे की मनमानी व्याख्या होती रही है। लगभग 35 किमी की इस कच्ची सड़क पर नेपाल ने 1962 में अपना दावा ठोका था लेकिन इस पर व्यावहारिक रूप में भारत का ही अधिकार रहा है। 2015 में जब भारत और चीन ने लिपुलेख के जरिए आपसी व्यापार का समझौता किया तो नेपाल ने इस पर आपत्ति की थी। इस मसले पर नेपाल ने दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठक का प्रस्ताव भी पांच-छह साल पहले रखा था। कोई आश्चर्य नहीं कि नेपाल के कुछ भारत-विरोधी तत्व इस मसले को वैसा ही तूल देने की कोशिश करें, जैसा कि 2015 में भारत-नेपाल घेराबंदी के समय देखा गया था। जरूरी यह है कि इस मामले को आपसी विचार-विमर्श और पारस्परिक उदारता से सुलझाया जाए।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 13 May 2020


bhopal, Corona: Side effects on farmers and laborers

मनोज कुमार झा कोविड-19 की महामारी संपूर्ण विश्व ग्रसित है। गत 24 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय लॉकडाउन की जो घोषणा की, तत्कालीन संक्रमण के दुष्परिणाम के विरुद्ध सराहनीय निर्णय साबित हुआ। लेकिन इस लॉकडाउन का प्रभाव देश के विभिन्न क्षेत्रों पर अलग-अलग पड़ा। जिसका यथार्थ जानने जरूरत है। खासतौर पर, कृषि क्षेत्र एवं उनसे जुड़े मजदूर, किसान, श्रमिक और रोजमर्रा की मजदूरी करने वाले वैसे लोग, जो दिनभर मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैंl   वर्ष 2017-18 के एक आंकड़े के मुताबिक कुल मजदूरों की संख्या 465 मिलियन है, जिनमें 422 मिलियन श्रमिक अर्थात 91% गैर नियमित वर्ग के मजदूर हैं। लॉकडाउन के दौरान जिनके प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर जो अपने जीवन-यापन हेतु विभिन्न राज्यों से प्रवास पर निकले, भविष्य में काम न मिलने तथा मजदूरी न मिलने के कारण ऐसे मजदूर अपने घरों को लौटने को विवश हैं। आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण ( 2017-18) के अनुसार स्वयंरोजगार, नियमित वेतनधारी एवं अनियमित श्रमिकों का प्रतिशत क्रमशः 52.2%, 22.8% एवं 24.9% है। स्वयंरोजगार में से लगभग 45- 46% ऐसे स्वयंरोजगार श्रमिक हैं, जिनकी स्थिति अनियमित मजदूरी वाले श्रमिकों से भी बदतर है। अतः अनियमित मजदूरों के साथ-साथ इनके ऊपर भी कोविड-19 का प्रभाव बुरा पड़ने की संभावना प्रबल है।   ऐसा देखा गया है कि प्रवासी मजदूरों की संख्या उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्य में सर्वाधिक है। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट आफ पॉपुलेशन साइंसेज की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार राज्य के अधिकतर प्रवासी भूमिहीन हैं। जिनकी आयु लगभग 32 वर्ष है, अर्थात युवा वर्ग है। इन प्रवासियों में से 80% भूमिहीन है अथवा उनके पास 1 एकड़ से भी कम भूमि है। 90% मजदूर निजी संस्थानों, कारखानों एवं विभिन्न उद्योगों में काम करते हैं। एक आकलन के मुताबिक बड़ी संख्या में प्रवासियों का पलायन कृषि में अदृश्य बेरोजगारी की दर को बढ़ाएगा। वैसे भी ऐसी परिस्थिति पहले से ही कृषि क्षेत्र में विद्यमान है l कहना गलत नहीं होगा कि एक तरफ बेरोजगारी की बढ़ती हुई ऐसी भयावह स्थिति तथा दूसरी तरफ कृषि का गिरता हुआ उत्पादन स्तर, वर्तमान कृषि के लिए चिंताजनक है। जिन किसानों के पास खेती है, श्रमिकों के अभाव में समय से कटाई न होने के कारण फसलों का भारी नुकसान हुआ है। फलस्वरूप कृषि के उत्पादन दर में कमी दर्ज होना स्वाभाविक है। साथ ही जो भी उत्पादन हुआ है, समुचित बाजार के अभाव एवं अनियमितता के कारण इसकी बिक्री में भी कमी आई है। फलत: किसानों की आय प्रभावित हुई है। अप्रैल माह में गेहूं, चना एवं सरसों की फसल की कटनी (कटाई) प्रारंभ होती है। परंतु लॉकडाउन हो जाने के कारण ज्यादातर किसानों के खेतों में कटाई भी देरी से प्रारंभ हुई और कटाई हो जाने के उपरांत फसल से दाना को अलग करने की प्रक्रिया (दौनी, मिजाई) भी नहीं हो पाई। जिससे फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ाl   अर्थशास्त्रियों की मानें तो कृषि की दयनीय स्थिति एवं उत्पादन में कमी भविष्य में मुद्रास्फीति को प्रोत्साहित करेगा। जिसके फलस्वरूप अमीरों और गरीबों के बीच असमानता में वृद्धि होगी l इसके अलावा तेज बारिश एवं मौसम की विपरीत परिस्थितियों के कारण भी फसलों का अत्यधिक नुकसान हुआl लॉकडाउन की वजह से छोटे किसान जो फल एवं सब्जियों को उगाते हैं, समुचित बाजार न होने के कारण बिक्री नहीं हो पा रही है और किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। इन सब कारणों से किसानों की आय में उत्तरोत्तर गिरावट हो रही है।   जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1.7 ट्रिलियन रुपए आर्थिक मदद के रूप में अत्यधिक पिछड़े एवं किसानों को प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत सहायता प्रदान करने की घोषणा की l सरकार ने नरेगा के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी में भी वृद्धि कीl रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने ऋण के बोझ से दबे किसानों को 3% रियायती दर पर फसल-ऋण उपलब्ध कराने की घोषणा की। अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका डॉ. रीना कुमारी की मानें तो सरकार द्वारा किए गए कार्य अत्यंत ही सराहनीय हैं लेकिन किसानों की स्थिति सुधारने तथा कृषि क्षेत्र के विकास के लिए सरकार को अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। सरकार खाद्यान्नों पर ज्यादा से ज्यादा सब्सिडी प्रदान करें। खाद, उर्वरक एवं अन्य कृषि निर्गतों पर अधिकतम मात्रा में सब्सिडी प्रदान करे। ताकि श्रमिकों, किसानों एवं मजदूरों को राहत मिल सके।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 13 May 2020


bhopal, Dispute over Ken-Betwa River Link Project?

प्रमोद भार्गव   कृत्रिम रूप से जीवनदायी नर्मदा और मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदियों को जोड़ने के बाद केन और बेतवा नदियों को जोड़ने की मुहिम में पिछली शिवराज सिंह चैहान सरकार ने तेजी दिखाई थी। किंतु अब इन नदियों के जल-बंटवारे को लेकर मध्य-प्रदेश और उत्तर-प्रदेश के बीच विवाद गहराता दिख रहा है। जल संसाधन विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रस्तावित केन-बेतवा परियोजना में मध्य-प्रदेश के ज्यादा गांव और हजारों हेक्टेयर जंगल व कृषि योग्य भूमि डूबेंगे इसीलिए उत्तर-प्रदेश सरकार की अधिक मात्रा में जल की मांग व्यावहारिक नहीं है। यह मांग तब की जा रही है, जब दोनों राज्यों के बीच एमओयू की सभी शर्तें तय हो चुकी हैं। लेकिन अब उप्र रबी फसल के सीजन में 900 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की मांग कर रहा है, जबकि शर्त के मुताबिक 700 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी देने का निर्णय हुआ था। यह पानी भी तब दिया जाना तय हुआ है, जब मप्र अपने हिस्से के पानी का उपयोग कर चुका होगा। हालांकि विवाद के बावजूद 5500 अरब रुपए की इस परियोजना को पूरी कर लेने की उम्मीद चौहान ने जताई है। यदि ये नदियां सफलतापूर्वक जुड़ जाती हैं तो भविष्य में 30 अन्य नदियों के जुड़ने की मुहिम शुरू हो सकती है।   फिलहाल यह परियोजना जल-बंटवारे के अलावा अनेक आशंकाओं से घिरी दिख रही है। परियोजना में वन्य जीव समिति बड़ी बाधा के रूप में पेश तो आएगी ही, नहरों एवं बांधों के लिए जिस उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा, वह जलभराव क्षेत्र में आ जाने के कारण नष्ट हो जाएगी। इस भूमि पर फिलहाल जौ, बाजरा, दलहन, तिलहन, गेहूं, मूंगफली, चना जैसी फसलें पैदा होती हैं। इन फसलों में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि ये नदियां जुड़ती हैं, तो इस पूरे इलाके में धान और गन्ने की फसलें पैदा करने की उम्मीद जताई जा रही है। इन दोनों ही फसलों में पानी अत्याधिक लगता है। पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में 4000 से भी ज्यादा तालाब हैं, यदि इन सभी तालाबों को संवार लिया जाए तो नदियों को जोड़ने की जरूरत रह ही नहीं जाएगी, कई हजार करोड़ रुपए परियोजना पर खर्च होने से बच जाएंगे। परियोजना पूरा करने का समय 9 साल बताया जा रहा है लेकिन हमारे यहां भूमि अधिग्रहण और वन भूमि की स्वीकृति में जो अड़चनें आती हैं, उनके चलते परियोजना 20-25 साल में भी पूरी हो जाए तो मुश्किल है?   दोनों प्रदेशों की सरकारें दावा कर रही हैं कि यदि ये नदियां परस्पर जुड़ जाती हैं तो मध्य-प्रदेश और उत्तर-प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखण्ड क्षेत्र में रहने वाली 70 लाख आबादी खुशहाल हो जाएगी। यही नहीं नदियों को जोड़ने का यह महाप्रयोग सफल हो जाता है तो अन्य 30 नदियों को जोड़ने का सिलसिला शुरू हो सकता है। इस परियोजना के तहत उत्तर-प्रदेश के हिस्से में आने वाली पर्यावरण संबंधी बाधाओं को दूर कर लिया गया है। मध्य-प्रदेश में जरूर अभी भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाधा बना हुआ है और जरूरी नहीं कि जल्दी यहां से मंजूरी मिल जाए? वन्य जीव समिति परियोजना को इसलिए मंजूरी नहीं दे रही है, क्योंकि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाघों के प्रजनन, आहार एवं आवास का अहम् वन क्षेत्र है। इसमें करीब 28 बाघ बताए जाते हैं। अन्य प्रजातियों के प्राणी भी बड़ी संख्या में हैं। हालांकि मध्य प्रदेश और केंद्र में एक ही दल भाजपा की सरकारें हैं, लिहाजा उम्मीद की जा सकती है कि बाधाएं जल्दी दूर हो जाएं।   केन नदी जबलपुर के पास कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर 427 किमी उत्तर की और बहने के बाद बांदा जिले में यमुना नदी में जाकर गिरती है। वहीं बेतवा नदी मध्य-प्रदेश के रायसेन जिले से निकलकर 576 किमी बहने के बाद उत्तर-प्रदेश के हमीरपुर में यमुना में मिलती है। केन-बेतवा नदी जोड़ो योजना की राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण; एनडब्ल्यूडीएद्ध की रिपोर्ट के अनुसार डोढ़न गांव के निकट 9000 हेक्टेयर क्षेत्र में एक बांध बनाया जाएगा। इसके डूब क्षेत्र में छतरपुर जिले के बारह गांव आएंगे। इनमें पांच गांव आंशिक रूप से और सात गांव पूर्ण रूप से डूब में आएंगे। कुल 7000 लोग प्रभावित होंगे इन्हें विस्थापित करने में इसलिए समस्या नहीं आएगी, क्योंकि ये ग्राम जिन क्षेत्रों में आबाद हैं, वह पहले से ही वन-सरंक्षण अधिनियम के तहत अधिसूचित हैं। इस कारण रहवासियों को भूमि-स्वामी होने के बावजूद जमीन पर खेती से लेकर खरीद-बिक्री में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए ग्रामीण यह इलाका मुआवजा लेकर आसानी से छोड़ने को तैयार हैं। ऐसा दावा प्राधिकरण की रिपोर्ट में किया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि इन ग्रामों में कमजोर आय वर्ग और अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के लोग रहते हैं। इन लाचारों को समर्थों की अपेक्षा विस्थापित करना आसान होता है।   परियोजना के बहुआयामी होने के दावे किए जा रहे हैं। बांध के नीचे दो जल-विद्युत संयंत्र लगाए जाएंगे। 231 किलोमीटर लंबी नहरों का जाल बिछाया जाएगा। ये नहरें छतरपुर, टीकमगढ़ और उत्तरप्रदेश के महोबा एवं झांसी जिले से गुजरेंगी। जिनसे 60,000 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होगी। विस्थापन और पुनर्वास के लिए 213.11 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ेेगी, जिसके मिलने की उम्मीद केंद्र सरकार से की जा रही है। चुनांचे हम जानते हैं कि धन भले ही कोई सरकार दे, विस्थापितों का पुनर्वास और मुआवजा किसी भी परियोजना में संतोषजनक नहीं रहा। नर्मदा बांध की डूब में आने वाले हरसूद के लोग आज भी मुआवजे और उचित पुनर्वास के लिए भटक रहे हैं। कमोबेश यही अन्याय मध्य-प्रदेश के ही कूनो-पालपुर अभ्यारण्य के विस्थापितों का है।   डीपीआर के मुताबिक उत्तर-प्रदेश को केन नदी का अतिरिक्त पानी देने के बाद मध्य-प्रदेश करीब इतना ही पानी बेतवा की ऊपरी धारा से निकाल लेगा। परियोजना के दूसरे चरण में मध्य-प्रदेश चार बांध बनाकर रायसेन और विदिशा जिलों में नहरें बिछाकर सिंचाई के इंतजाम करेगा। ऐसा कहा जा रहा है कि इन प्रबंधनों से केन में अक्सर आने वाली बाढ़ से बर्बाद होने वाला पानी बेतवा में पहुंचकर हजारों एकड़ खेतों में फसलों को लहलहाएगा। मध्य-प्रदेश का यही वह मालवा क्षेत्र है, जहां की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण सोना उगलती है। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि खेत साल में 2 से लेकर 3 फसलें तक देने लग जाएंगे लेकिन मालवा की जो बहुफसली भूमि, बांध और नहरों के निर्माण में नष्ट होगी, उससे होने वाले नुकसान का आकलन प्राधिकरण के पास नहीं है।   देश की विभिन्न नदियों को जोड़ने का सपना स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद देखा गया था। इसे डाॅ. मोक्षगुडंम विश्वेश्वरैया, डाॅ. राममनोहर लोहिया और डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों का समर्थन मिलता रहा है। हालांकि परतंत्र भारत में नदियों को जोड़ने की पहली पहल ऑर्थर काॅटन ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में की थी। लेकिन इस माध्यम से फिरंगी हुकूमत का मकसद देश में गुलामी के शिकंजे को और मजबूत करने के साथ, बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा का दोहन था। क्योंकि उस समय भारत में सड़कों और रेल-मार्गों की संरचना पहले चरण में थी, इसलिए अंग्रेज नदियों को जोड़कर जल-मार्ग विकसित करना चाहते थे। हालांकि आजादी के बाद 1971-72 में तत्कालीन केंद्रीय जल एवं ऊर्जा मंत्री तथा अभियंता डाॅ. कनूरी लक्ष्मण राव ने गंगा-कावेरी को जोड़ने का प्रस्ताव भी बनाया था। राव खुद जवाहरलाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकारों में जल संसाधन मंत्री भी रहे थे। लेकिन जिन सरकारों में राव मंत्री रहे, उन सरकारों ने इस महत्वाकांक्षी प्रस्ताव को कभी गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि ये प्रधानमंत्री जानते थे कि नदियों को जोड़ना आसान तो है ही नहीं, यदि ये परियोजनाएं अमल में लाई जाती हैं, तो नदियों की अविरलता खत्म होने की आशंका भी इन दूरदृष्टाओं को थी।   करीब 13500 किमी लंबी ये नदियां भारत के संपूर्ण मैदानी क्षेत्रों में अठखेलियां करती हुईं मनुष्य और जीव-जगत के लिए प्रकृति का अनूठा और बहूमूल्य वरदान बनी हुई हैं। 2528 लाख हेक्टेयर भू-खण्डों और वन प्रांतरों में प्रवाहित इन नदियों में प्रति व्यक्ति 690 घनमीटर जल है। कृषि योग्य कुल 1411 लाख हेक्टेयर भूमि में से 546 लाख हेक्टेयर भूमि इन्हीं नदियों की बदौलत प्रति वर्ष सिंचित की जाकर फसलों को लहलहाती हैं। यदि नदियां जोड़ो अभियान के तहत केन-बेतवा जुड़ जाती हैं तो इनकी अविरल बहने वाली धाराएं टूट सकती हैं। उत्तराखण्ड में गंगा नदी पर टिहरी बांध बनने के बाद एक तरफ तो गंगा की अविरलता प्रभावित हुई है, वहीं दूसरी तरफ पूरे उत्तराखण्ड में बादल फटने और भूस्खलन की आपदाएं बढ़ गई हैं। गोया, नदियों को जोड़ने से पहले टिहरी बांध के गंगा पर पड़ रहे प्रभाव और उत्तराखण्ड में बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं का भी आकलन करना जरूरी है? इससे अच्छा है बुंदेलखण्ड में जो 4000 तालाब हैं, उन्हें और उनमें मिलने वाली जलधाराओं को संवारा जाए? इस काम में धन भी कम खर्च होगा और एक-एक कर तालाबों को संवारने में समय भी कम लगेगा। इनके संवरते ही पेयजल व सिंचाई की सुविधाएं भी तत्काल बुंदेलखण्डवासियों को मिलने लग जाएंगी क्योंकि ज्यादातर तालाब नहरों से पहले से ही जुड़े हुए हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 May 2020


bhopal, For whom Punjab was the des

अमरीक   दुष्यंत कुमार का एक शेर है- 'न हो कमीज तो पांवों से पेट ढंक लेंगे/ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए..।' पंजाब से हिजरत कर अपने मूल राज्यों की ओर लौटने या लौटने की कोशिश करने वाले प्रवासी श्रमिकों पर बरसों पहले लिखीं-कहीं गईं ये पंक्तियां बखूबी सार्थक साबित हो रही हैं। कोरोना वायरस है। लॉकडाउन है। कर्फ्यू है। इससे बेपरवाह पुरबिया प्रवासी मजदूर पंजाब के महानगरों और नगरों की सड़कों पर कतारबद्ध होकर खामोशी से चलते मिलेंगे। सबके सिरों पर गठरियां। बगल में पोटलियां। हाथों में बच्चों की नन्हीं हथेलियां। किसी-किसी के सिर पर कंकाल-से नजर आने वाले बूढ़े-बूढ़ियां। पूछिए कहां जाना है तो एक ही जवाब हर जगह मिलेगा- 'रेलवे स्टेशन!'   इससे आगे का सवाल आप क्या पूछ सकते हैं। जाहिरन घर वापसी के लिए। बल्कि कहना चाहिए कि मजबूरी की घर वापसी। विडंबना यह कि न इसे सरकार रोक पा रही है, न दशकों से उन्हें रोजगार देने वाले किसान तथा सरमाएदार और न वे खुद। तीनों पक्ष हालात के हर पहलू से वाकिफ होते हुए भी आश्वासनों की कच्ची नींव भविष्य का ताना-बाना बना रहे हैं, जिसकी बाबत यकीनन कोई भी आश्वस्त नहीं। रोकने वाले रोक रहे हैं लेकिन जाने वाले जा रहे हैं। जो जाने का सामर्थ्य नहीं पैदा कर पाए वे इसके लिए कवायद कर रहे हैं। उनका नाम जाने वालों की सूची में शुमार हो जाए, इसके लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। कोई दलालों के हत्थे चढ़ रहा है तो किसी को ठेकेदार बरगला रहे हैं। एक ने 9 मई की रात लुधियाना में इसलिए खुदकुशी की राह अख्तियार की कि घर वापसी मुश्किल-दर-मुश्किल हो रही थी और नौबत भुखमरी की। मौत ने आधी रात के बाद उत्तर प्रदेश के इस 38 साल के जेहन का दरवाजा खटखटाया। गोया अजीत राय ही नहीं बल्कि पूरा परिवार हालात की बुनी जानलेवा फांसी से लटक गया। जाने वाले की पत्नी खुद कहती हैं कि वह और उनकेे बेसहारा बच्चे अब न जिंदा में हैं न मरे हुओं में।   अजीत राय का यह दुखदाई मामला पुलिस-प्रशासनिक बेशर्मी के बावजूद वजूद में आ गया लेकिन न जाने कितने अजीत कोरोना काल में इस मानिंद खुदकुशी की राह खामोशी से चले गए होंगे। खैर, पंजाब से 12 लाख में से आठ लाख प्रवासी श्रमिकों ने घर वापसी के लिए बनाए गए सरकारी नियम-कायदों के तहत आवेदन किया है और क्रमवार आवेदन स्वीकृत करके रेलगाड़ियों के जरिए उन्हें बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश रवाना किया जा रहा है। जिन्हें प्रतीक्षा-सूची मोबाइल के जरिए भेजे जाने वाले संदेश (एसएमएस) पढ़नी नहीं आती, वे रोज रेलवे स्टेशनों की ओर जाते हैं और पुलिस की फजीहत सहकर तथा लुट-पिटकर वापस लौट आते हैं। मायूसी के साए में। घर वापसी की ख्वाहिश और इन गाढ़े दिनों में बेचने लायक पास जो कुछ भी था, वह बिक लिया है। यहां तक कि मोबाइल फोन भी। ज्यादातर पुरबिया प्रवासियों के पास मोबाइल फोन सबसे 'महंगी वस्तु' है और पंजाब में इन दिनों वे इसे कौड़ियों के दाम बेचने को मजबूर हैं।   वैसे भी मजबूरी का एक नाम पलायन है! पंजाब इनके लिए कभी अपना 'दूसरा देस' होता था। कइयों ने तो अपना मूल 'देस' सदा के लिए त्यागकर इसे पूरी तरह अपना लिया था। यहां रोजगार 'था', बेहतर रोजी-रोटी थी और सपनों की जिंदा उम्मीद। कोरोना, 'काल' बना और एकाएक सबकुछ बदल गया। यह देस अब बेगाना है। लौटकर नहीं आना है। त्रासदी के दु:स्वप्न यह कुछ भी देते हैं! बरहाल, दुष्यंत कुमार ही कह गए हैं- 'हम कहीं के नहीं रहे, घाट औ' घर करीब हैं।/आपने लौ छुई नहीं, आप कैसे अदीब हैं।/उफ़ नहीं कि उजड़ गए, लोग सचमुच ग़रीब हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, Now is the time to lift the lockout

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   प्रधानमंत्री और देश के सभी मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत अभी चल रही है, यदि हमारे टीवी चैनल उसका जीवंत प्रसारण करते तो उसमें कोई बुराई नहीं होती। देश की जनता को कोरोना से निपटने के सभी पैंतरों का पता चलता। वह अपनी स्वतंत्र राय बना सकती थी। इसी तरह क्या ही अच्छा होता कि हमारे सभी टीवी चैनल यह बहस चलाते कि 17 मई को तालाबंदी खत्म की जाए या नहीं और यदि खत्म की जाए तो क्या-क्या सावधानियां रखी जाएं। ऐसी बहसों में देश के विभिन्न तबकों के विचारशील लोगों से राय ली जाती तो उससे सरकार को भी मार्गदर्शन मिलता और आम जनता भी प्रेरित होती लेकिन अभी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के संवाद से जो भी सर्वसम्मति उभरेगी या जो भी राय केंद्र सरकार प्रकट करेगी, उसकी आतुरता से प्रतीक्षा सभी को है।   लेकिन पिछले 48 दिनों की तालाबंदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि कोरोना जितना खतरनाक है, उससे भी ज्यादा खतरनाक हमारी तालाबंदी हो सकती है। यह मैं पहले भी आंकड़ों के आधार पर सिद्ध कर चुका हूं कि अन्य देशों की तुलना में कोरोना का कोप भारत में बहुत कम है लेकिन हमने खुद को जरूरत से ज्यादा डरा लिया है। इस डर के मारे कृषि-मंडियां, कारखाने, दुकानें और दफ्तर बंद हो गए हैं। बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ गई है। सैकड़ों लोग घर-वापसी में मर रहे हैं। देश की अर्थ-व्यवस्था लंगड़ा गई है। इसलिए जरूरी यह है कि तालाबंदी को तुरंत उठा लिया जाए लेकिन कोरोना के विरुद्ध जितनी भी सावधानियां जरूरी हैं, उन्हें लागू किया जाए। इसका नतीजा यह भी हो सकता है कि कोरोना का जबर्दस्त हमला हो जाए। उस हमले से मुकाबले की तैयारी पहले से की जाए। लाखों लोगों के इलाज का इंतजाम, गांवों और शहरों में, पहले से हो। भारत उसी तरह खुल सकता है, जैसे वियतनाम, द. कोरिया और स्वीडन खुले हुए हैं। भारत सरकार इस तर्क को समझ रही है। इसीलिए रेलें चलाने की घोषणा हो गई है। तालाबंदी को उठा लेना एक खतरनाक जुआ भी सिद्ध हो सकता है लेकिन उसका चलाए रखना तो आर्थिक प्रलय को आमंत्रण देना है। तालाबंदी उठाने के बाद यदि हताहतों की संख्या इटली या अमेरिका की तरह आसमान छूने लगे तो केंद्र सरकार फिर तालाबंदी का छाता तान सकती है। उसे कौन रोक सकता है? लेकिन यह साहसिक कदम उठाने के पहले केंद्र को राज्यों की सहमति जरूर लेनी चाहिए और उन्हें फैसलों की पूरी छूट देनी चाहिए।   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal,Florence Nightingale Respect for Mercy and Service

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की 200वीं जयंती (12 मई) पर विशेष योगेश कुमार गोयल पूरी दुनिया पिछले कुछ महीनों से कोरोना संक्रमण से जूझ रही है। अभीतक करीब तीन लाख लोगों की मौत हो चुकी है जबकि लगभग 14 लाख लोगों के प्राण बचाने में भी सफलता मिली है। इन लाखों लोगों की जान बचाने में सबसे बड़ा योगदान रहा है नर्सों का, जो खुद के संक्रमित होने के खतरे के बावजूद अपनी जान की परवाह किए बिना ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाने में जुटी हैं। 12 मई को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस पर इन तमाम नर्सों के इसी योगदान को नमन करना बेहद जरूरी है। इसीलिए वर्ष 2020 को ‘अंतर्राष्ट्रीय नर्स वर्ष’ के रूप में मनाया जा रहा है। स्मरण रहे कि 29 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में सेवाभाव के लिए याद की जाने वाली नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल का स्मरण करते हुए कहा था कि यह समय दुनियाभर के नर्सिंग समुदाय के लिए परीक्षा की घड़ी है। उन्हें विश्वास है कि सभी इस परीक्षा में सफल होंगी और लोगों की जानें बचाएंगी। दया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग की जन्मदाता माना जाता है, जिनकी हम 200वीं जयंती मनाने जा रहे हैं। ‘लेडी विद द लैंप’ (दीपक वाली महिला) के नाम से विख्यात नाइटिंगेल का जन्म आज से ठीक 200 वर्ष पहले 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस शहर में हुआ था। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1973 में नर्सों द्वारा किए गए अनुकरणीय कार्यों को सम्मानित करने के लिए उन्हीं के नाम से ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार’ की स्थापना की गई थी, जो प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर प्रदान किए जाते हैं। फ्लोरेंस कहती थी कि रोगी की बुद्धिमत्ता और मानवीय प्रबंधन ही संक्रमण के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म इटली में रह रहे एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ लेकिन वह इंग्लैंड में पली-बढ़ीं। वह एक बेहद खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और समझदार युवती थी। उन्होंने अंग्रेजी, इटेलियन, लैटिन, जर्मनी, फ्रैंच, इतिहास और दर्शन शास्त्र सीखा था तथा उन्होंने अपनी बहन व माता-पिता के साथ कई देशों की यात्रा की थी। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही उन्हें अहसास हो गया था कि उनका जन्म सेवाकार्यों के लिए ही हुआ है। 1837 में नाइटिंगेल परिवार अपनी बेटियों को यूरोप के सफर पर लेकर गया, जो उस समय बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए जरूरी माना जाता था। उसी सफर के दौरान फ्लोरेंस ने माता-पिता से कहा था कि ईश्वर ने उसे मानवता की सेवा का आदेश दिया है लेकिन यह नहीं बताया कि सेवा किस तरह से करनी है। यह सुनकर उनके माता-पिता बेहद परेशान हो गए थे। फ्लोरेंस ने अपने माता-पिता को बताया कि वह एक ऐसी नर्स बनना चाहती है, जो अपने मरीजों की अच्छी तरह सेवा और देखभाल कर सके। इसपर उनके माता-पिता बेहद नाराज हुए थे क्योंकि विक्टोरिया काल में ब्रिटेन में अमीर घरानों की महिलाएं कोई काम नहीं करती थीं। उस दौर में नर्सिंग को एक सम्मानित व्यवसाय भी नहीं माना जाता था, इसलिए भी माता-पिता का मानना था कि धनी परिवार की लड़कियों के लिए यह पेशा सही नहीं है। वह ऐसा समय था, जब अस्पताल बेहद गंदी जगह पर होते थे और वहां बीमार लोगों की मौत के बाद काफी भयावह माहौल हो जाता था। परिवार के पुरजोर विरोध और गुस्से के बाद भी फ्लोरेंस अपनी जिद पर अड़ गईं और वर्ष 1845 में अभावग्रस्त लोगों की सेवा का प्रण लिया। वर्ष 1849 में उन्होंने शादी का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया और परिजनों से दृढ़तापूर्वक कहा था कि वह ईश्वर के आदेश का पालन करेंगी तथा एक नर्स ही बनेंगी। वर्ष 1850 में उन्होंने जर्मनी में प्रोटेस्टेंट डेकोनेसिस संस्थान में दो सप्ताह की अवधि में एक नर्स के रूप में अपना प्रारम्भिक प्रशिक्षण पूरा किया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति उनके सेवाभाव को देखते हुए आखिरकार उनके माता-पिता द्वारा वर्ष 1851 में उन्हें नर्सिंग की आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति दे दी गयी, जिसके बाद उन्होंने जर्मनी में महिलाओं के लिए एक क्रिश्चियन स्कूल में नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के तरीकों और अस्पतालों को साफ रखने के महत्व के बारे में जाना। वर्ष 1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं के लिए एक अस्पताल ‘इंस्टीच्यूट फॉर द केयर ऑफ सिंक जेंटलवुमेन’ खोला, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के लिए बहुत सारी बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध कराई और नर्सों के लिए कार्य करने की स्थिति में भी सुधार किया। नर्सिंग के क्षेत्र में पहली बार उनका अहम योगदान वर्ष 1854 में क्रीमिया युद्ध के दौरान देखा गया। उस समय ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की की रूस से लड़ाई चल रही थी। सैनिकों को रूस के क्रीमिया में लड़ने के लिए भेजा गया था। युद्ध के दौरान सैनिकों के जख्मी होने, ठंड, भूख तथा बीमारी से मरने की खबरें आई। युद्ध के समय वहां उनकी देखभाल के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार द्वारा फ्लोरेंस के नेतृत्व में अक्तूबर 1854 में 38 नर्सों का एक दल घायल सैनिकों की सेवा के लिए तुर्की भेजा गया। फ्लोरेंस ने वहां पहुंचकर देखा कि किस प्रकार वहां अस्पताल घायल सैनिकों से खचाखच भरे हुए थे। जहां गंदगी, दुर्गंध, दवाओं तथा उपकरणों की कमी, दूषित पेयजल इत्यादि के कारण असुविधाओं के बीच संक्रमण से सैनिकों की बड़ी संख्या में मौतें हो रही थीं। फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के अलावा घायल और बीमार सैनिकों की देखभाल में दिन-रात एक कर दिया, जिससे सैनिकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ। उनकी अथक मेहनत के परिणामस्वरूप ही अस्पताल में सैनिकों की मृत्यु दर में बहुत ज्यादा कमी आई। उस समय किए गए उनके सेवाकार्यों के लिए सभी सैनिक उन्हें आदर और प्यार से ‘लेडी विद द लैंप’ कहने लगे थे। दरअसल जब चिकित्सक अपनी ड्यूटी पूरी करके चले जाते, तब भी वह रात के गहन अंधेरे में हाथ में लालटेन लेकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित रहती थीं। रात में अस्पताल में जब घायल सैनिक सो रहे होते, तब वह स्वयं उनके पास जाकर देखती थी कि किसी को कोई तकलीफ तो नहीं है। जो सैनिक खुद नहीं लिख पाते, वह उनकी ओर से उनके परिवार वालों को चिट्ठियां लिखकर भेजती थीं। जब वह वर्ष 1856 में युद्ध की समाप्ति के बाद वापस लौटी, तब नायिका के तौर पर उभरी फ्लोरेंस के बारे में अखबारों में बहुत कुछ छपा और उसके बाद उनका नाम ‘लेडी विद द लैंप’ काफी प्रसिद्ध हो गया। स्वयं महारानी विक्टोरिया ने पत्र लिखकर उनका धन्यवाद किया था। सितम्बर 1856 में रानी विक्टोरिया से उनकी मुलाकात हुई, जिसके बाद उनके सुझावों के आधार पर ही वहां सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार संभव हुआ और वर्ष 1858 में रॉयल कमीशन की स्थापना हुई। उसके बाद ही अस्पतालों की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना, सैनिकों को बेहतर खाना, कपड़े और देखभाल की सुविधा मुहैया कराना तथा सेना द्वारा डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने जैसे कार्यों की शुरुआत हुई। वर्ष 1859 में उन्होंने परिवार के बीमार सदस्यों की सही देखरेख सिखाने के लिए ‘नोट्स ऑन नर्सिंग’ नामक एक पुस्तक लिखी। फ्लोरेंस के प्रयासों से वर्ष 1860 में लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल में ‘नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल फॉर नर्सेज’ खोला गया, जहां नर्सों को बेहतर प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था। 1862 में किंग्स कॉलेज हॉस्पीटल में मिडवाइव्ज के लिए स्कूल की स्थापना की गई। उन्होंने अपने जीवन का बाकी समय नर्सिंग के कार्य को आगे बढ़ाने तथा इसे आधुनिक रूप देने में बिता दिया। 1880 के दशक में उन्होंने भारत में बेहतर चिकित्सा तथा सार्वजनिक सेवाओं के लिए भी अभियान चलाए। सेवाभाव से किए गए उनके कार्यों ने नर्सिंग व्यवसाय का चेहरा ही बदल दिया था, जिसके लिए उन्हें रेडक्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति द्वारा सम्मानित किया गया। यही समिति फ्लोरेंस नाइटिंगेल के नाम से नर्सिंग में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पुरस्कार देती है। वर्ष 1869 में उन्हें महारानी विक्टोरिया ने ‘रॉयल रेडक्रॉस’ से सम्मानित किया। उन्होंने नर्सिंग पेशे का आधुनिकीकरण करते हुए मरीजों की देखभाल और स्वच्छता के मानकों को लागू किया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति फ्लोरेंस की सेवा भावना को देखते हुए नर्सिंग को उसके बाद महिलाओं के लिए सम्मानजनक पेशा माना जाने लगा और नर्सिंग क्षेत्र में महिलाओं को आने की प्रेरणा मिली। फ्लोरेंस के अथक प्रयासों के कारण ही रोगियों की देखभाल तथा अस्पताल में स्वच्छता मानकों में अपेक्षित सुधार हुआ। नर्सिंग में अति विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 1907 में ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ सम्मान प्राप्त हुआ और यह सम्मान प्राप्त करने वाली वे विश्व की पहली महिला थीं। 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का निधन हो गया, जिनकी कब्र सेंट मार्गरेट गिरजाघर के प्रांगण में है। उनके सम्मान में उनके जन्मदिवस 12 मई को ‘अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस’ के रूप में मनाए जाने की शुरुआत की गई। स्वच्छता तथा स्वास्थ्य सेवा को लेकर फ्लोरेंस के विचार सही मायने में आधुनिक चिकित्सा जगत में भी 19वीं सदी जितने ही प्रासंगिक हैं। कोरोना संकट के वर्तमान दौर में दुनियाभर में नर्सें जिस सेवाभाव से मरीजों की जान बचाने में जुटी हैं, ऐसे में उनके योगदान को नमन करना और उन्हें प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, Who is the real hero of the country?

आर.के.सिन्हा अभी हाल ही में देश के दो रीयल और रील लाइफ के नायकों के संसार से विदा होने पर जिस तरह की प्रतिक्रिया देश में देखने को मिलीं वह सबको हैरान करने वाली थी। पहले सशक्त अभिनेता और पीकू, लंच बॉक्स, पान सिंह तोमर जैसी बेहतरीन फिल्मों में अपने यादगार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले इरफान खान और उसके बाद राज कपूर के छोटे बेटे ऋषि कपूर की मृत्यु पर देश में जिस तरह की शोक की लहर उमड़ी वह निश्चित रूप से अभूतपूर्व और अप्रत्याशित मानी जाएगी। ऋषि कपूर ने लगभग आधी सदी लंबे अपने फिल्मी सफर में बॉबी, मुल्क, लैला-मजनूं जैसी दर्जनों उम्दा फिल्मों में नायक का रोल निभाया। हालांकि वे बीच-बीच में अपने कुछ विवादास्पद बयानों के कारण खबरों में भी आ जाते थे। तो भी यह मानना होगा कि वे एक लोकप्रिय सितारे थे। इन दोनों के दिवंगत होने के फौरन बाद कश्मीर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए सेना और अर्धसैनिक बलों के कई अधिकारी और जवान भी शहीद हो गए। उत्तरी कश्मीर में हंदवाड़ा क्षेत्र के एक गांव में 1 मई को हुई मुठभेड़ में वहां आतंकवादियों के साथ एक कर्नल और एक मेजर समेत पांच सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। शहीद सुरक्षाकर्मियों में सेना अधिकारी कर्नल आशुतोष शर्मा और मेजर अनुज और जम्मू-कश्मीर पुलिस के उपनिरीक्षक शकील काजी भी शामिल थे। पर जरा गौर करें कि देश के खिलाफ जंग कर रहे आतंकवादियों से लड़ने वाले जब शहीद हुए तो देश में हल्की-फुल्की औपचारिक प्रतिक्रियायें ही हुई। कुछ लोगों ने इन जवानों के शहीद होने की खबरें अपनी फेसबुक वॉल पर डालीं। तब आभासी दुनिया 'नमन' और 'जय हिन्द' करके आगे बढ़ गई। इससे अधिक कुछ नहीं हुआ। तो क्या मिला देश के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने वालों को सिला? क्या ये शहीद सिर्फ "जय हिन्द" और "नमन" की औपचारिकता के ही लायक थे? देश को सोचना होगा और अपनी गिरेबान में झांकना होगा। जो बेखौफ नौजवान बेहद कठिन परिस्थितियों में कश्मीर में लड़ रहे हैं, उनके बलिदान को हम कितना कम करके आंकते हैं। मैं इरफान खान और ऋषि कपूर की सेना के योद्धाओं से तुलना नहीं कर रहा हूँ। पर इतना तो कहने का मन कर ही रहा है कि असली तथा आभासी दुनिया के नायकों को पहचानना हमने अभी तक नहीं सीखा है। यह एक शर्मनाक स्थिति है। हालांकि इस बात का कुछ संतोष है कि सुरक्षा बलों ने अपने जांबाज साथियों कर्नल आशुतोष शर्मा और मेजर अनुज सूद समेत पांच सैन्यकर्मियों के बलिदान का बदला लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। सुरक्षा बलों ने दो मुठभेड़ों में कुख्यात दहशतगर्दों को धूल में मिला दिया। हिजबुल मुजाहिदीन के बड़े कमांडर रियाज नाइकू को भी ढेर कर दिया गया। नाइकू को पुलवामा में उसके घर के पास ही मारा गया। नाइकू को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर 12 लाख का इनाम था। रील लाइफ के नायकों पर लंबी-लंबी बहसें कर रहे कितने लोगों को पता है कि नाइकू को बचाने के लिए देश के कुछ दुश्मन जवानों पर पथराव भी कर रहे थे? इरफान खान और ऋषि कपूर की तमाम फिल्मों पर लिखने-बोलने वाले क्यों नहीं लिखते उन देश के दुश्मनों पर भी, जो सेना के जवानों पर पथराव कर रहे थे? चलिए जरा और पीछे मुड़कर देख लेते हैं। क्या देश की जनता ने 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों को कभी याद किया? क्या कभी उनके परिवारों की सुध ली? सच्चाई तो यह है कि पुलवामा हमले के शहीदों के परिवारों को अबतक सरकार या समाज से अपेक्षित मदद नहीं मिली। वे लोग सरकारी मदद का अब भी इंतजार कर रहे हैं। हां, जब वह घटना हुई थी तब आंसू बहाने वालों की कोई कमी नहीं थी। सबने पीड़ित परिवारों को भरपूर मदद का भरोसा दिलाया था। पर अफसोस कि उनमें से कुछ वादे कागजों में ही सिमट कर रह गए हैं। बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जाएगी। अब भी देश को 2008 में मुंबई हमले की याद है। उस हमले के सबसे बड़े गुनाहगार अजमल आमिर कसाब को असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तुकाराम ने जिंदा पकड़ा था। कसाब ने तुकाराम ओम्बले को गोली मार दी थी ताकि वह अपने आपको छुड़ा ले। पर उस वीर तुकाराम ने कसाब को नहीं छोड़ा। वीरता तथा कर्तव्यपरायणता की इस तरह की अनूठी मिसाल मिलना कठिन है। ओम्बले को मरणोपरांत अशोक चक्र देकर भुला दिया गया। क्या उस शूरवीर को भुला दिया जाना चाहिए था? चूंकि बात शुरू हुई है तो बात से बात निकलेगी ही। हम तो अपनी हाल के समय में हुई जंगों के नायकों की स्मृति का भी घोर अनादर करते हैं। कारगिल की जंग के नायकों में नोएडा के विजयंत थापर भी थे। उस जंग में विजय के बाद उनके नाम पर नोएडा की एक मुख्य सड़क का नामकरण भी हुआ। उस सड़क पर जिधर शहीद विजयंत थापर का नाम लिखा है, उस पर लोग पोस्टर लगाने से भी बाज नहीं आते। उनके पिता और भारतीय सेना के पूर्व कर्नल थापर कह रहे थे,' भारत में युद्ध के बाद शहीदों की कुर्बानी अक्सर भुला दी जाती है। सिर्फ करीबी रिश्तेदार और दोस्त ही उन्हें याद करते हैं। यह मानसिकता बदलने की जरूरत है।" देश को अपने सच्चे नायकों को तलाशते हुए अपने आसपास के समाज को देख लेना होगा। मौजूदा कोरोना काल में तमाम कोरोना योद्धाओं को हम देख ही रहे हैं। इनमें डाक्टर, नर्स, पुलिस वाले, सुरक्षाकर्मी, सफाई कर्मीं, बैंक मुलाजिम, जल और बिजली विभाग के कर्मी आदि शामिल हैं। क्या हम सफाई कर्मियों को भूल सकते हैं? ये अपनी जान की परवाह किए बगैर मोर्चे पर तैनात हैं। ये कोरोना को मात देने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में शहीद भगत सिंह सेवा दल नाम के समाजसेवी संगठन के जुझारू कार्यकर्ता दिन-रात जरूरतमंदों को मास्क और भोजन बांट रहे हैं। शहीद भगत सिंह सेवा दल के प्रमुख जितेन्द्र शंटी एक फरिश्ते का ही काम कर रहे हैं। वह हजारों अनाथों का अपने हाथों से अंतिम संस्कार भी करवा चुके हैं। इस तरह से कई अन्य समाजसेवी संस्थाएं और उनसे जुड़े लोग सक्रिय हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और देशभर के विभिन्न गुरुद्वारों द्वारा देशभर में चलाये जा रहे सेवाकार्य उल्लेखनीय और सराहनीय हैं। इन्हें क्यों समाज नायक नहीं मानता? क्या निःस्वार्थ भाव से संकटकाल में किसी के साथ खड़ा होना कोई सामान्य बात मानी जाए। पर हमारे यहां तो सिने जगत के सितारों को ही भगवान मान लिया जाता है। इस तरह की सोच तो बदलनी ही होगी। फिल्म सितारों का भी सम्मान होना चाहिए लेकिन देश को अपने असली नायकों की पहचान तो करनी ही होगी। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Strong future technology

वर्ल्ड टेक्नोलॉजी डे 11 मई पर विशेष डॉ. राकेश राणा टेक्नोलॉजी को आधुनिक समाज की धुरी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है। जैसे परम्परागत समाजों की संचालक शक्ति संस्कृति रही, वैसे ही आधुनिक समाज तकनीकी को अपनी संचालक शक्ति के रूप में प्रयुक्त कर रहा है। यह गंभीर सवाल समाज-विज्ञान के दयरे में अभी उतनी हलचल पैदा करता नहीं दिख रहा है। जितनी इसने समाज में घुसपैठ बना ली है। क्या भविष्य तकनीकी से संस्कृति का स्थानापन्न देखेगा? यह कहना संस्कृति के बल को कम आंकना और निराशापूर्ण लगे तो भी इतना तय है कि संस्कृति के भौतिक पक्ष का वर्चस्व अभौतिक पक्ष को सिर्फ जीने लायक सांस देने के समझौते समाज से लगभग कर चुका है। उसी के तहत तकनीक तरक्की कर सभ्यता के साम्राज्य विस्तार में दिन-रात एक किए हुए है। जो निकट भविष्य में बहुत विकट और व्यापक बदलावों के साथ 21वीं सदी के पैराडाइम-शिफ्ट का मजबूत आधार कारक बनेगी। प्रोद्यौगिकी सामाजिक संबंधों को विस्तार देने वाली व्यापक और उन्हें रिसेफ करने वाली तथा बहुत हद तक बदलने वाली सिद्ध हुई है। सामाजिक संबंधों पर व्यापक प्रभाव सामाजिक बदलावों के रुप में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक संघर्षों को आयोजित करते दिख रहे हैं। आधुनिकता की शक्ति टेक्नोलॉजी समाज को सहज, सुगम और सुविधायुक्त बनाकर उसके अभावों और कमजोरियों का उन्मूलन करने के साथ समाज का समर्थन और साथ पाने में सफल हुई है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी समाज के बेहतर भविष्य का भरोसा दिलाते हुए व्यापक स्तर पर सामाजिक समर्थन जुटाने में भी सफल रहे। एक बेहतर भविष्य के निर्माण और वर्तमान की समस्याओं को हल करने के लिए तकनीक को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा गया। इसमें कोई शक नहीं है कि विज्ञान और तकनीकी ने दुनिया को बदलकर रख दिया है। जिसका अगला चरण कोरोना संक्रमण के बाद और भी अधिक प्रभावशाली और परिवर्तकारी होने जा रहा है। टेक्नोलॉजी का बढ़ता प्रभाव ही है कि नयी दुनिया एक डिजिटल संसार में तब्दील होती दिख रही है। सामाजिक संरचना डिजिटल सामाजिक संरचना की ओर बढ़ रही है। टेक्नोलॉजी की दुनिया में रोज कुछ न कुछ नया जमा हो रहा है। हालांकि विज्ञान में न वह तेवर दिखते हैं ना वैसी तेजी ही। टेक्नोलॉजी ने विज्ञान को भी जैसे ठग लिया है क्योंकि विज्ञान के सहारे तकनीक अपना साम्राज्य बढ़ा रही है। मूलतः वैज्ञानिक सिद्धांतों पर ही तकनीक विकसित होती है। नित नए उत्पाद बनाकर टेक्नोलॉजी अपना जनाधार बढ़ा चुकी है और अपनी सत्ता भी स्थापित कर बैठी है। उसकी विस्तारवादी सोच सब कब्जाती जा रही है। जबकि विज्ञान पर यह बड़ा सवालिया निशान है कि अगर विज्ञान ने विकास किया है, समाज में अपना बेहतर योगदान दिया है तो फिर क्यों वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास समाज में नहीं हो रहा? क्यों अंधविश्वास और रुढ़ियां पहले से भी ज्यादा बढ़ी? क्यों समाज अंधानुकरण और करिश्माई क्रियाकलापों में मगशूल है? धर्म के बजाय धर्मांधता क्यों मजबूत हुई है। समाज में बढ़ता अंधानुकरण और तार्किकता का अभाव इन सवालों को विज्ञान-तकनीकी के युग में अगर खड़ा कर रहा है तो यह दोनों के चरित्र को संदिग्ध बनाता ही है। जहां जीवन के हर पक्ष को साइंस-टेक्नोलॉजी ने परिवर्तित, परिमार्जित और सवंर्द्धित करने का दावा किया है। तीव्र होते सामाजिक तनावों की बयार इन खतरनाक सवालों की धार को पैना बना रही है। टेक्नोलॉजी का समाज पर प्रभाव इस कदर है कि मनुष्य के सामाजिक व्यवहार से लेकर उसके आचार-विचार, संबंध और जीवन दृष्टिकोण तक सब बदल रहे हैं। तकनीक सामाजिक संबंधों को पुर्नःव्यवस्थित करने के दबाव बना रही है। टेक्नोलॉजी ने राजनीतिक-आर्थिकी और मनो-सामाजिकी के सभी पक्षों को पुर्नपरिभाषित करने के दबाव बढ़ाए हैं। ऐसे तमाम गंभीर सवाल तकनीकी को लेकर आज अकादमिक दायरों में चिंता और चिंतन के नए बिन्दु उभार रहे हैं। क्योंकि किसी भी समाज के लिए अपने सन्दर्भ में तकनीकी के प्रभावों और परिणामों को मुक्कमल ढंग से समझना मुश्किल तो है ही। टेक्नोलॉजी ही सामाजिक संरचना को सबसे पहले और सीधे प्रभावित करती है। तकनीक ही समाज में आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों तथा नए विमर्शों को आगे बढ़ाने का काम करती है। नयी तकनीक के अनुकूलन और अपनाने की दर भी किसी समाज की सामाजिक संरचना पर ही बहुत हद तक निर्भर करती है। इसका सीधा संबंध हमारे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक विचार-विमर्शों से ही है। आधुनिकता की इन तमाम जरूरतों और जिदों के बावजूद यह सवाल भी जरूरी हो जाता है कि विज्ञान और तकनीकी की जरूरत समाज के लिए आखिर कितनी है और क्यों है? कहां जाकर रुकना है? मनुष्य ने अपने जीवनानुभवों से हजारों साल की संचित संस्कृति और जिस साभ्यतिक पहचान को स्थापित किया है, क्या वह उसे खो रहा है? टेक्नोलॉजी मानव सभ्यता और संस्कृति पर हावी हो रही है? इस निष्कर्ष पर अंतिम रूप से कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन जिस जरह मानवीय जीवन पर तकनीक का नियंत्रण बढ़ रहा है। उसी मात्रा में यह भय भी एक खतरे के रूप में मनुष्य की आजादी से लेकर अस्तित्व तक मंडरा रहा है। जिस रफ्तार से इनफॉरमेशन-टेक्नोलॉजी और बायो-टेक्नोलॉजी बढ़ रही है, डाटा का अंबार लगाने की होड़ दुनिया में मची हुई है, वह आसन्न खतरों की सुगबुगाहट तो है ही। विज्ञान और तकनीक का विकास, विस्तार और रोल किसी भी देश के राष्ट्रीय और सामाजिक चरित्र की दिशा में ही निर्धारित होता है। भविष्य का विश्व-समाज निर्माण और विध्वंस में से जिस ओर झुकेगा, साइंस और टेक्नोलॉजी भी वैसे ही कारनामों में हमारे-आपके सामने होंगे। अभी जिस ढंग से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानवीय श्रम के साथ-साथ समझ को भी चुनौती देती दिख रही है। वह हमें खुल-जा सिम-सिम वाले डरावने आदिम-युग में भी, ले जाकर पटक सकती है। बेशक तकनीकी का प्रभाव खास से आम लोगों तक नजर आ रहा है। समाज सक्षम और समर्थ भी बना है। उतना ही सच यह भी है कि तकनीक आत्मघाती और आत्मकेंद्रित भी होती जा रही है। वह एक आभासी दुनिया रच रही है। हमने जिस संस्कृति के निर्माण में जीवन अनुभवों को संजोकर किया है। आज तकनीकी उन पर वर्चस्व बना बैठी है। टेक्नोलॉजी अभिशाप न सिद्ध हो बल्कि मनुष्य की सहायक बने। इसके लिए नयी सामूहिकताएं और नयी नैतिकताएं ही सामने आकर मोर्चा संभाले। जिसके लिए जरूरी है ज्ञान, विज्ञान, समाज विज्ञान और तकनीकी एक-दूसरे की पूरक बने और सहचर बनकर मानव कल्याण और समाज विकास की दिशा में सकारात्मक भूमिका के दायित्व का निर्वहन करे। (लेखक समाजशास्त्री हैं।)

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Teenagers reading pornography lessons on the Internet

प्रमोद भार्गव   अभी हम देहरादून में घटी शर्मनाक घटना भूले भी नहीं हैं कि दूसरी भयावह घटना सामने आ गई। देहरादून में अकेली पाकर एक भाई ने अपने चार दोस्तों के साथ अपनी आठ साल की बहन के साथ दुराचार कर दिया था। दुष्कर्म करने वाले इन पांच बच्चों की उम्र 9 से 14 वर्ष के बीच थी। पुलिस जांच से पता चला कि इस वीभत्स घटना को अंजाम देने से पहले इन किशोरों ने मोबाइल पर चाइल्ड पोर्न फिल्म देखी थी। अब दिल्ली में घटी एक घटना में 27 किशोर दोस्त सोशल मीडिया के इंस्टाग्राम पर एक समूह बनाकर अपने साथ पढ़ने वाली छात्राओं के साथ सामूहिक बलात्कार की षड्यंत्रकारी योजना बना रहे थे। सहपाठिनों के अश्लील फोटो साझा करने वाले एक नाबालिग लड़के को पुलिस ने दबोचा है। दक्षिण दिल्ली के एक नामी विद्यालय में पढ़ने वाले इस लड़के का मोबाइल फोन भी जब्त किया है। पूछताछ से पता चला है कि समूह में एडमिन समेत 27 बालक सदस्य हैं। इनमें से 10 की पहचान कर ली गयी है। इनके मोबाइल और अन्य डिवाइस भी जब्त किए हैं। ये सभी दक्षिण दिल्ली के चार-पांच महंगे विद्यालयों में पढ़ते हैं और 11वीं व 12वीं के छात्र होने के साथ अति धनाढ्य परिवारों से हैं। ये छात्र अपने ही विद्यालय की छात्राओं के चित्र बिना उनकी जानकारी के इंस्टाग्राम पर बनाए समूह में साझा करते थे और उनसे बलात्कार करने के तरीकों व कमेंट लिख रहे थे। ‘बाॅयज लाॅकर रूम‘ नामक इस समूह का खुलासा तब हुआ, जब एक छात्रा ने समूह के स्क्रीन शाॅट्स सोशल मीडिया पर डाले।   स्मार्टफोन की उपलब्धता और इंटरनेट की आसान पहुंच ने पोर्न फिल्मों की पहुंच को आसान बनाया ही, वे इस साइबर तकनीक में मर्मज्ञ होकर लड़कियों की तस्वीरें न्यूड मोर्फ करके सोशल साइट्स पर वायरल भी करने लगे हैं। बाॅयज लाॅकर रूम नाम से इंस्टाग्राम पर खोला गया खाता इसी वजह से चर्चा में है। बिगड़ैल लाडलों की ये अश्लील चैट सोशल साइट्स पर टाॅप ट्रेंड में है। इन लड़कों ने शिकायत होने के साथ ही इस ग्रुप को तो डिलीट कर दिया था लेकिन तत्काल ‘लाॅकर रूम 2.0‘ नाम से नया समूह बना लिया। इस समूह को बनाने के साथ ही इन लड़कों की हरकत का खुलासा करने वाली लड़की को धमकी दी गई कि उसकी नग्न तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाल देंगे। हालांकि पुलिस दबिश के चलते इंस्टाग्राम ने नाबालिग छात्राओं की अश्लीलता परोसने वाली सभी तस्वीरें डिलीट कर दी हैं। दरअसल इंस्टाग्राम हो या फेसबुक या फिर गूगल ये सब विदेशी कंपनियां अकूत धन कमाने की तृष्णा में सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से भारतीय बच्चों, किशोरों व युवकों को पोर्नोग्राफी के जाल में फंसाकर उनका न केवल भविष्य बर्बाद कर रही हैं, बल्कि साइबर अपराधी बनाकर उनके पूरे जीवन पर ही कालिख पोतने का काम कर रही हैं। ये सब कपनियां ऑनलाइन चाइल्ड सेक्स ट्रेफिकिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि किशोरों को अश्लील फिल्में दिखाकर बच्चे और नाबालिग सगे-संबंधी ही इनकी करतूतों का शिकार हो रहे हैं।   आज सूचना तकनीक की जरूरत इस हद तक बढ़ गई है कि समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है। इस तालाबंदी के दौर में बच्चों को डिजिटल माध्यम से पढ़ने का जो बहाना मिला है, उसमें इंटरनेट पर डेटा की खपत से पता चला है कि चाइल्ड पोर्नाग्राफी की बीमारी भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। आज दुनिया में करीब 4.5 अरब लोगों की इंटरनेट तक पहुंच हो गई है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएमएआई) के सर्वे के अनुसार 2019 में भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या करीब 45.1 करोड़ है। यह संख्या देश की आबादी की 36 फीसदी है। इनमें से 38.5 करोड़ उपभोक्ता 12 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और 6.6 करोड़ 11 वर्ष या इससे कम आयु समूह के हैं। इनमें से ज्यादातर अपने परिजनों की डिवाइस पर इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। 16-20 वर्ष के आयु समूह के युवा सबसे ज्यादा इंटरनेट का उपयोग करते हैं। देश में 25.8 करोड़ पुरुष और शेष महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं।   भारत में इंटरनेट डेटा की खपत इसके सस्ते होने की वजह से भी बढ़ रही है। पिछले चार साल में डेटा की खपत 56 गुना बढ़ी है, वहीं दरों में कमी 99 प्रतिशत हुई है। इकोनाॅमिक सर्वेक्षण के अनुसार 2016 में डेटा की दरें 200 रुपए प्रति जीबी थी, जो 2019 में घटकर 12 रुपए प्रति जीबी तक आ गई है। दुनिया में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली एक पोर्न वेबसाइट ने बताया है कि भारत में 2018 में औसतन 8.23 मिनट पोर्न वीडियो देखे गए, वहीं 2019 में यह अवधि बढ़कर 9.51 मिनट हो गई। यह आंकड़ा सिर्फ एक वेबसाइट का है, जबकि दुनिया में पोर्न संबंधी 150 करोड़ वेब पेज सक्रिय हैं। इनमें 28 करोड़ वीडियो लिंक हैं। ये पोर्न वेबसाइट जिन 20 देशों में सबसे ज्यादा देखी गई, उनमें भारत का स्थान तीसरा है। दरअसल इसी साल ‘नेशनल सेंटर फाॅर मिसिंग एंड, एक्सप्लाॅयटेड चिल्डफ्ेन‘ नाम के संगठन ने बालयौन शोषण से जुड़ी जानकारियां चाहीं थी। संगठन को कुल 1.68 करोड़ सूचनाएं मिलीं। इनमें 19.87 लाख भारत से, 11.5 लाख पाकिस्तान और 5.5 लाख सूचनाएं बांग्लादेश से मिली थीं।   बच्चों के संदर्भ में मिली यह जानकारी अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि ये वे आंकड़े हैं जिनकी सूचना उपलब्ध हो गई है। परंतु इनमें वे आंकड़े नहीं हैं, जिनकी सूचना नहीं मिल पाई है। साफ है, बेटियों से दरिंदगी की एक बड़ी वजह पोर्न साइट्स की बिना किसी बाधा के उपलब्धता है। ऐसे में जो विद्यार्थी इंटरनेट पर पढ़ाई के बहाने पोर्न देखने में लग जाते हैं, उनके पालक सामान्य तौर से ऐसा कैसे सोच सकते हैं कि वे जिनके भविष्य के सपने बुन रहे हैं, वे स्वयं किस मानसिक अवस्था से गुजर रहे हैं और किस गलत दिशा का रुख कर रहे हैं। ऐसे में उन अभिभावकों के बच्चों को ज्यादा भटकने का अवसर मिल रहा है, जिनके माता-पिता दोनों ही नौकरी में हैं। क्योंकि ऐसे में यह निगरानी रखनी मुश्किल होती है कि आखिर बच्चे मोबाइल पर देख क्या रहे हैं?   कोरोना- काल में यह बात मीडिया में तेजी से उठ रही है कि शैक्षिक संस्थान लंबे समय तक बंद रहने की स्थिति में पढ़ाई-लिखाई के लिए ऑनलाइन विकल्पों को स्थाई बना दिया जाए? लेकिन यह प्रश्न नहीं उठाया जा रहा है कि पढ़ाई-लिखाई के दौरान बच्चे मोबाइल पर कौन-सा पाठ पढ़ रहे हैं ? इसकी निगरानी कैसे संभव है? क्योंकि इस अकेलेपन में दिमाग में विकृतियां पनपने की आशंकाएं कहीं ज्यादा हैं। प्रारंभ में यह आकर्षण थ्रिल या रोमांच की तरह लगता है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता विकार रूप में बदलने लगता है। सोशल मीडिया पर निर्बाध पहुंच और बच्चों की जरूरतों के प्रति अभिभावकों की निश्चिंतता एवं लापरवाही दिल्ली या फिर देहरादून जैसी घटनाओं के लिए ज्यादा जिम्मेवार है। ये घटनाएं इसलिए और बढ़ रही है क्योंकि हमारी परिवारिक और कौटुंबिक जो सरंचना थी, उसे सुनियोजित ढंग से तोड़ा जा रहा है। ऐसे में बच्चों को नैतिक मूल्यों से जुड़े पाठ, पाठ्यक्रम से तो गायब कर ही दिए हैं, घरों में भी दादा-दादी या नाना-नानी इन पाठों को किस्सों-कहानियों के जरिए पढ़ाने के लिए उपलब्ध नहीं रह गए हैं। यदि नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने की बात कोई शिक्षाशास्त्री करता भी है तो उसे पुरातनपंथी कहकर नकार दिया जाता है।   सर्वोच्च न्यायालय ने भी सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए केंद्र सरकार को दिशा-निर्देश निर्धारित करने को कहा है। सरकार ने इस उद्देश्य के लिए एक संसदीय समिति भी बनाई है, वह कोई दिशा-निर्देश निर्धारित करती, इसके पहले कोरोना की क्रूर छाया पड़ गई। यह समस्या इसलिए विकट होती जा रही है, क्योंकि इंटरनेट और सोशल प्लेटफोर्म प्रदाता कंपनियां इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कारगर पहल करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि इंस्टाग्राम नामक जिस साइट पर किशोरों का समूह अपनी कुंठाएं अभिव्यक्त कर रहा था, उस कंपनी ने यह कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है कि वह ऐसी किसी आपत्तिजनक तस्वीर या सामग्री के उपयोग की अनुमति नहीं देती है। जो आपत्तिजनक सामग्री अपलोड की गई थी, वह उसने हटा दी है। लेकिन कंपनी के ऐसे दावे भरोसे के लायक नहीं होते हैं क्योंकि ऐसी सामग्री की पुनरावृत्ति होती रहती है। यदि ज्यादा जोर डाला जाता है तो सोशल साइट के उपभोक्ता सुनियोजित ढंग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होने का शोर मचाने लगते हैं और इंटरनेट पर दुरुपयोग के दूर करने के उपायों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि सोशल मीडिया पर नियमन, स्व-नियमन या सरकारी नियंत्रण की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है। हकीकत तो यह है कि दिल्ली की इस ताजा घटना और देहरादून की घटना के परिप्रेक्ष्य में नियंत्रण की जरूरत कहीं अधिक बढ़ गई है। इसका आधार यही है कि सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लील करतूतें अब नैतिक मर्यादा के उल्लंघन और सभ्य समाज की संरचना के लिए गंभीर चुनौती के रूप में पेश आने लगी हैं, इसलिए इनपर अंकुश जरूरी है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, How long will work from home

आर.के. सिन्हा अब यह कमोबेश सबको समझ आ गया होगा कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के साथ हमें रहना सीखना ही होगा। इस बात को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जब तक इस भयानक महामारी की कोई वैक्सीन ईजाद नहीं होती तब तक बचाव के अलावा कोई दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए जरूरी है कि फैक्ट्रियां, दफ्तर आदि भी खुलें। देश में विगत मार्च महीने के तीसरे हफ्ते से ही लॉकडाउन के हालात बने हुए हैं। ये अनिश्चितकाल के लिए तो नहीं रहेंगे। केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और लघु उद्योग मंत्री नितिन गडकरी ने भी यह कहा कि सरकार सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करते हुए सार्वजनिक परिवहनों के संचालन के लिए दिशा-निर्देश तैयार कर रही है। उन्होंने कहा, 'पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी जल्द ही शुरू हो सकता है।' गडकरी जी ने जो कहा उसके संकेतों से साफ है कि सरकार अब जिंदगी दुबारा पहले की तरह बहाल करने की तरफ बढ़ रही है। वह ऑरेंज और ग्रीन जोन में शर्तों के साथ ज्यादातर कारोबारी गतिविधियों की छूट देने की योजना बना रही है। ग्रीन जोन के अंदर बसें भी चलाई जा रही हैं। 4 मई से ग्रीन और ऑरेंज जोन में टैक्सी और कैब को भी संचालन की अनुमति दे दी गई है। इसमें ड्राइवर के अलावा एक ही यात्री बैठ सकते हैं। मतलब ये है कि अब दफ्तर और लंबे समय तक बंद नहीं किए जा सकते हैं। ये तो खुलेंगे ही और खुलने भी लगे हैं। राजधानी दिल्ली तथा मुंबई में कई रीयल एस्टेट कंपनियों, चार्टर्ड एकाउँटेंट फार्मों, प्रकाशन समूहों वगैरह के दफ्तर खुलने लगे हैं। दिल्ली के दरियागंज में किताबों और स्टेशनरी की दुकानें खुल गईं। हालांकि अभी ग्राहक कम ही आ रहे हैं। नई सड़क में तो थोक में स्टेशनरी का सामान मिलता है। यहीं से पड़ोसी राज्यों के दुकानदार भी माल खरीदते हैं। इस बीच, सबको पता है कि लॉकडाउन काल में भी अनेक सरकारी महकमें सामान्य तरीके से काम करते रहे थे। जिनमें अस्पताल, बिजली, पानी, बैंक आदि के विभाग शामिल थे। इनमें रोज की तरह काम होता रहा था। पहले से कुछ ज्यादा ही। हां, अगर बात बैंकों की करें तो उनमें सोशल डिस्टैंसिंग के नियमों का सख्ती से पालन हो रहा है। चूंकि बैंकों में रोज बड़ी संख्या में ग्राहक आते हैं, इसलिए बैंक चार-पांच लोगों से ज्यादा को बैंक के अंदर आने नहीं देते। इसके साथ ही सारे बैंक कर्मी काम के वक्त मास्क और दस्ताने भी पहनते हैं। बहरहाल अब कमोबेश सभी दफ्तर धीरे-धीरे खुलने लगेंगे। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए यह जरूरी भी है कि दफ्तर और फैक्ट्रियां चलें। इसलिए इनके ताले खुलेंगे। हां, अभी इनमें कोविड-19 के फैलने से पहले के हालात देखने को हरगिज नहीं मिलेंगे। जब तक कोविड-19 महामारी की कोई वैक्सीन ईजाद नहीं हो जाती तब तक सावधानी तो बरतनी ही होगी। यह काम संभव है और जरूरी भी। फिलहाल जो दफ्तर खुल चुके हैं या आने वाले दिनों में खुलने जा रहे हैं, उनके बीमार कर्मियों से कहा जायेगा कि वे घर में ही रहें। जिन मुलाजिमों को बुखार, खांसी और सांस लेने में तकलीफ है, वे भी अपने दफ्तर को तुरंत सूचित करें। जो कर्मी स्वस्थ हैं, पर जिनके परिवार का कोई भी सदस्य कोविड-19 की चपेट में है, वह भी दफ्तर आने से बचें। वे किसी भी सूरत में दफ्तर ना आएं। इसके साथ ही गंभीर रोगों से जूझ रहे कर्मी भी फिलहाल दफ्तर से दूर ही रहें। यह सावधानी बरती जाएगी तभी हम खतरों से बच सकते हैं। जो दफ्तर खुल रहे हैं वे भी देखें कि उनके यहां काम करने वाले कर्मचारी कम से कम एक मीटर की दूरी बनाकर ही बैठे। अगर दफ्तर में कोई बाहरी व्यक्ति आता है तो उससे भी संबंधित व्यक्ति तय फासले पर रहकर ही मिलें या बात करें। कहने की जरूरत नहीं कि दफ्तर खुलेंगे तो वहां बैठकों के दौर शुरू हो ही जाएँगे। हर दफ्तर में दिन की और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठकें होती ही रहती हैं। उन बैठकों के बाद ही रणनीति बनती है। इसलिए कोशिश की जाए कि ये बैठकें उन जगहों पर हों जहां सब लोग कम से कम एक-एक मीटर की दूरी बैठे हों। सबने मास्क पहना हुआ हो। अबतक हरेक दफ्तर में सेनिटाइजर रख ही दिया गया है ताकि सभी कर्मी सेनिटाइजर लेकर 20-25 सेकेंड तक हाथ कायदे से धो सकें। देश के चोटी के उद्योगपति और महिन्द्रा ग्रुप के चेयरमेन आनंद महिन्द्रा ने कहा है कि बदलते हालातों में वर्क फ्रॉम होम का कल्चर तो बढ़ेगा ही। इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। पूरे विश्व और भारत में भी एक नई कार्य-संस्कृति का जन्म हो रहा है, और उपाय भी नहीं है। पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि परम्परगत दफ्तर पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। वे भी चलेंगे। सबको पता है कि आनंद महिन्द्रा जब किसी मसले पर अपनी बात रखते हैं, तो उसे आमतौर पर नजरअंदाज नहीं किया जाता है। सरकार भी उनकी राय सुनती है। वे कुछ समय पहले फैक्ट्रियों को खोलने की भी मांग कर चुके हैं। यानी दफ्तर और फैक्ट्रियां और अधिक बंद नहीं रह सकतीं। हां, वर्क फ्रॉम होम तो अब भी रहेगा। आईटी, मीडिया और दूसरे बहुत से सेक्टरों में वर्क फ्रॉम होम चलेगा। वह तो पहले भी चल ही रहा था। कोविड-19 से बचाव करते हुए किस तरह से दफ्तर और औद्योगिक इकाइयां खोली जाएं, इस विषय पर प्रोजेक्ट बैकलिंक्स के गौरव मेहरोत्रा ने एक गहन रिपोर्ट तैयार की है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, "जो कंपनियां नई और विषम परिस्थितियों में फिर से खुलेंगी उन्हें अपने कैफेटेरिया और जिम को तो फिलहाल बंद ही रखना चाहिए। अभी पिछले कुछ वर्षों से अधिकतर दफ्तरों में लंबे-चौड़े कैफेटेरिया चालू हो गए हैं। वे दिन-रात चलते हैं। उनमें पेशेवर आते-जाते रहते हैं। इन्हें बंद रखने का यह लाभ होगा कि सोशल डिस्टैंसिंग के नियमों का पालन होता रहेगा।" कैफेटिरिया खुले रहने पर कर्मी इधर पहले की तरह आकर बैठना भी शुरू कर सकते हैं। इसी तरह जिम भी फिलहाल नहीं खोले जाने चाहिए। लॉकडाउन के दौर में लोगों ने घरों में रहकर ही व्यायाम करना तो सीख ही लिया है। बेशक, यदि सोशल डिस्टैंसिंग के नियमों का पालन करते हुए दफ्तर, फैक्ट्रियां और बाजार खुलें तो कुछ हद तक पहले की तरह ही व्यापारिक गतिविधियां चलने लगेगी। यह सबके हित में है। इससे एक तो देश में आर्थिक गतिविधियां चालू होने लगेंगी, दूसरा लोगों को फिर से काम-धंधा भी मिलने लगेगा। कोई माने या न माने, घर में रहकर काम तो सिर्फ अनुभवी पेशेवर ही कर सकते हैं। उन्हें ही यह सुविधा भी मिल सकती है। सब लोग उनकी तरह भाग्यशाली नहीं होते। बाकी लोगों को तो घर से निकलना ही होगा रोटी-रोजी कमाने के लिए। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 8 May 2020


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हर्षित कुमार बीते दो सालों के लगभग समय से गौर करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। यह टीवी सीरियल को पीछे छोड़ने के कगार पर है। सोशल मीडिया एक्सपर्ट की मानें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज धमाल मचाए हुए है। इसकी एक वजह ये है कि कहानियों के साथ बिना रोक-टोक के प्रसारण। एक तरफ जहां यह विकल्प दे रहा है, वहीं सृजनात्मकता के नाम पर कुछ भी परोस दे रहा है। जिससे आज के युवा आसानी से इसके आदी हो रहे हैं। नए कंटेट के नाम पर एडल्ट सामग्री का आसान विकल्प मिल रहा है। टीवी में सेंसर के कारण घिसा-पिटा ड्रामा देखने को मिलता है, वहीं लंबे-लंबे ब्रेक। हालांकि अभी भी दर्शकों का एक बड़ा वर्ग वेब सिरीज से अछूता था परन्तु इंटरनेट की सुलभता ने इसे भी आसान बना दिया है। ऐसे में यह लाजमी है कि इसके उपयोग सम्बंधी विषय वस्तुओं पर ध्यान दिया जाए। वेब सीरीज क्या है? फिल्मों और टीवी सीरियल में जहां अधिक एपिसोड होते हैं, वहीं वेब सीरीज में इससे अलग 8-10 एपिसोड होते हैं। यह सीरीज अलग-अलग विषय वस्तुओं पर आधारित होती हैं लेकिन अभीतक देखें तो फूहड़ विषय वस्तुओं का अम्बार है। एक एपिसोड औसतन 25 से 45 मिनट तक का होता है। ये वेब सीरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई बार एक साथ लॉन्च कर दिए जाते हैं, जिससे एक दिन में ही दर्शक इसको देख लेते हैं। कई बार इसकी उपयोगिता बढ़ाने के उद्देश्य से हर हफ्ते एक एपिसोड लॉन्च किए जाते हैं। एडल्ट सामग्री भारतीय टीवी चैनलों की बात करें या फिल्मों की कहानी की तो अक्सर सामाजिक विषय वस्तु की प्रधानता होती है। सामान्य रूप से सीरियल और कुछ फिल्मों को छोड़कर परिवार के लोगों के साथ बैठकर इसे देखा जा सकता है। जबकि वेब सीरीज में कंटेट सबसे बड़ा हथियार है, यहाँ युवाओं के लिए ही खास प्रकार का कंटेट तय किया जा रहा है। यहां प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को बोल्ड कंटेट को लेकर किसी समस्या का सामना नहीं करना होता है। किसी ऐसे मुद्दों पर सिरीज बनाने की छूट है, जिन्हें फिल्मों या सीरियल्स में आमतौर पर नहीं दिखाया जाता। क्योंकि फिल्म और सीरियल में सेंसर के कारण ऐसे किसी भी प्रकार के कंटेंट परोसना कठिन है। युवा फिल्मों में नाच-गाने का मनोरंजन और पारिवारिक ड्रामे से अलग कहानियां देखना चाहते हैं। हमारा सेंसर बोर्ड इसको लेकर अनभिज्ञ। सेंसर की कैंची का डर नहीं फिल्मों में जब भी बोल्ड या एडल्ट कंटेट होता है तो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को सेंसर बोर्ड के सामने जाना पड़ता है। जबकि अभीतक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सेंसर जैसा कुछ नहीं है। इसका फायदा उठाकर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर कोई भी विषय वस्तु जनता के सामने लाने में सफल हो रहे हैं। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की वेब सिरीज सीक्रेट गेम्स बहुत चर्चा में रही। अनुराग कश्यप ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब भी कोई फिल्म बनती है उसके बाद प्रोड्यूसर और डायरेक्टर एक महीने तक सेंसर बोर्ड के चक्कर लगाते रहते हैं, जबकि वेब सीरीज रिलीज करने में ऐसी समस्या नहीं है। करोना काल में हर दिन प्रभावित फ्री समय और कंपनियों के सस्ते इंटरनेट सुविधा की वजह से दर्शकों के लिए ये वेब सीरीज देखना आसान हो गया है। आज के दौर में युवाओं के पास समय की कमी नहीं है,  ऐसे में वो फोन में इसे कभी भी देख रहा है। बॉलीवुड सेलिब्रिटीज का भी लगाव बढ़ने के कारण आसानी से लोगों तक वेब सिरीज लोकप्रिय हो रहा है। समय रहते लगाया जाए सेंसर युवाओं वाले भारत देश में अगर विषय वस्तुओं के प्रसारण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आगे चलकर हम विषय वस्तुओं को कंट्रोल करने में असफल रहेंगे। जिस प्रकार सीरियल और फिल्म के लिए सेंसर आवश्यक है, उसी प्रकार वेब सिरीज के लिए भी सेंसर अनिवार्य किया जाए। अगर समय रहते वेब सिरीज पर सेंसर नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में युवाओं की भटकी पीढी का निर्माण करेंगे। नकारात्मक विषय हमारी पीढ़ी में घर कर जाएगी, जिसे सम्हालना नामुमकिन है। सचेत रहें अभिभावक आसानी से उपलब्ध एडल्ट विषय वस्तु आप के बच्चे को कहीं प्रभावित तो नहीं कर रहा, यह ध्यान रखना आवश्यक है। अपने बच्चों का हर समय ख्याल रखें। आप का बच्चा क्या देख रहा है और क्या सुन रहा है, जो वो देख रहा है उसपर उसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है। इस समय अनिवार्य रूप में यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 May 2020


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प्रमोद भार्गव विकास संबंधी परियोजनाओं में पर्यावरण संरक्षण के बहाने बाधा बनने वाले स्वयंसेवी संगठन कोरोना-काल में गायब हैं। जबकि ये कोरोना से सतर्क रहने व जनता को भयमुक्त बनाए रखने के लिए जागरुकता अभियान चला सकते थे, वैसे भी स्वास्थ्य संबंधी जागरुकता के लिए देश में सबसे ज्यादा पंजीकृत एनजीओ करोड़ों रुपए के बारे-न्यारे करने में लगे हैं। पूरे देश में करीब 32 लाख एनजीओ हैं। इनमें से केवल 4 लाख संगठन ही ऐसे हैं, जो अपने बही-खाते दुरुस्त रखते हैं। हालांकि अब जानकारी नहीं देने वाले संगठनों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा रही है। अकेले मध्य-प्रदेश में डेढ़ लाख से ज्यादा एनजीओ पंजीकृत हैं, किंतु केवल 1000 एनजीओ कोविड-19 से लड़ाई में मदद कर रहे हैं। ये केंद्र और राज्य सरकारों से करीब एक हजार करोड़ की आर्थिक मदद लेते हैं। कोरोना संकंट काल में यह साफ हो गया है कि ज्यादातर एनजीओ के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। स्वास्थ्य, पुलिस और राजस्व विभाग के लोग तो अपने जीवन को खतरे में डालकर पिछले दो माह से इस लड़ाई में निरंतर जुटे हैं, लेकिन एनजीओ नदारद हैं। हालांकि मध्य-प्रदेश में निजी स्तर पर 33980 स्वयंसेवक बाकायदा अपना नाम पंजीकृत कराकर इस महामारी से बचाव के लिए किसी न किसी रूप में सरकार की मदद कर रहे हैं। ये लोगों को जागरूक करने के साथ गरीबों और राहगीरों को भोजन, मास्क, सैनेटाइजर आदि की मदद कर रहे हैं। मध्य-प्रदेश के हाॅटस्पाॅट बने इंदौर, भोपाल और उज्जैन में ही 9376 एनजीओ हैं, लेकिन कोरोना से लड़ाई में ज्यादातर की भूमिका नदारद है। देश में स्वयंसेवी संगठनों को सरकार की जटिल शासन प्रणाली के ठोस विकल्प के रूप में देखा गया था। उनसे उम्मीद थी कि वे एक उदार और सरल कार्यप्रणाली के रूप में सामने आएंगे। चूंकि सरकार के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि वह हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में विकास संबंधी कार्यक्रमों में आम लोगों की सहभागिता की अपेक्षा की जाने लगी और उनके स्थानीयता से जुड़े महत्व व ज्ञान परंपरा को भी स्वीकारा जाने लगा। वैसे भी सरकार और संगठन दोनों के लक्ष्य मानव के सामुदायिक सरोकारों से जुड़े हैं। समावेशी विकास की अवधारणा भी खासतौर से स्वैच्छिक संगठनों के मूल में अतर्निहित है। जबकि प्रशासनिक तंत्र की भूमिका कायदे-कानूनों की संहिताओं से बंधी है। लिहाजा उनके लिए मर्यादा का उल्लंघन आसान नहीं होता। जबकि स्वैच्छिक संगठन किसी आचार संहिता के पालन की बाध्यता से स्वतंत्र हैं। इसलिए वे धर्म, सामाजिक कार्याे और विकास परियोनाओं के अलावा समाज के भीतर मथ रहे उन ज्वलंत मुद्दों को भी हवा देने लग जाते हैं, जो उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं और परियोजनाओं के संभावित खतरों से जुड़े होते हैं। लेकिन समाज को मथ रही इस महामारी के समय एनजीओ लुप्त हैं। इन संगठनों की स्थापना के पीछे एक सुनियोजित प्रचछन्न मंशा थी, इसलिए इन्होंने कार्पाेरेट एजेंट की भूमिका निर्वहन में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि आलिखित अनुबंध को मैदान में क्रियान्वित किया। गैर सरकारी संगठनों का जो मौजूदा स्वरूप है, वह देशी अथवा विदेशी सहायता नियमन अधिनियम के चलते राजनीति से जुड़े दल विदेशी आर्थिक मदद नहीं ले सकते हैं। लेकिन स्वैच्छिक संगठनों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं है। इसलिए खासतौर से पश्चिमी देश अपने प्रच्छन्न मंसूबे साधने के लिए उदारता से भारतीय एनजीओ को अनुदान देने में लगे रहते हैं। ब्रिटेन, इटली, नीदरलैण्ड, स्विटजरलैण्ड, कनाड़ा, स्पेन, स्वीडन, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, आॅस्ट्रिया, फिनलैण्ड और नार्वे जैसे देश दान दाताओं में शामिल हैं। आठवें दशक में इन संगठनों को समर्थ व आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का काम काउंसिल फाॅर एडवांसमेंट आॅफ पीपुल्स एक्शन,यानि कपार्ट ने भी किया। कपार्ट ने ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार, महिला कल्याण, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, एड्स और कन्या भ्रूण हत्या के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए संगठनों को दान में धन देने के द्वार खोल दिए। पर्यावरण संरक्षण एवं वन विकास के क्षेत्रों में भी इन संगठनों की भूमिका रेखांकित हुई। भूमण्डलीय परिप्रेक्ष्य में नव उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आगमन का सिलसिला परवान चढ़ने के बाद तो जैसे एनजीओ के दोनों हाथों में लड्डू आ गए। खासतौर से दवा कंपनियों ने इन्हें काल्पनिक महामारियों को हवा देने का जरिया बनाया। एड्स, एंथ्रेक्स और वर्ल्डफ्लू की भयवहता का वातावरण रचकर एनजीओ ने ही अरबों-खरबों की दवाएं और इनसे बचाव के नजरिए से निरोध,कण्डोम जैसे उपायों के लिए बाजार और उपभोक्ता तैयार करने में उल्लेखनीय किंतु छद्म भूमिका निभाई। चूंकि ये संगठन विदेशी कंपनियों के लिए बाजार तैयार कर रहे थे, इसलिए इनके महत्व को सामाजिक गरिमा प्रदान करने की चालाक प्रवृत्ति के चलते संगठनों के मुखियाओं को न केवल विदेश यात्राओं के अवसर देने का सिलसिला शुरू हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता देते हुए इन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित विश्व सम्मेलनों व परिचर्चाओं में भागीदारी के लिए आमंत्रित भी किया जाने लगा। इन सौगातों के चलते इन संगठनों का अर्थ और भूमिका दोनों बदल गए। जो सामाजिक संगठन लोगों द्वारा अवैतनिक कार्य करने और आर्थिक बदहाली के पर्याय हुआ करते थे, वे वातानुकूलित दफ्तरों और लग्जरी वाहनों के आदी हो गए। इन संगठनों के संचालकों की वैभवपूर्ण जीवन शैली में अवतरण के बाद उच्च शिक्षितों, चिकित्सकों, इंजीनियरों, प्रबंधकों व अन्य पेशेवर लोग इनसे जुड़ने लगे। जिन आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की पत्नियां सरकारी नौकरियों में नहीं थीं, वे भी एनजीओ रजिस्टर्ड करवाकर उसकी संचालक बन गईं। इन वजहों से इन्हें सरकारी विकास एजेंसियों की तुलना में अधिक बेहतर और उपयोगी माना जाने लगा। देखते-देखते दो दशक के भीतर ये संगठन सरकार के समानांतर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हो गए। बल्कि विदेशी धन और संरक्षण मिलने के कारण ये न केवल सरकार के लिए चुनौती साबित हुए, अलबत्ता आंख दिखाने का काम भी करने लगे। भारत में स्वैच्छिक भाव से दीन-हीन मानवों की सेवा एक सनातन परंपरा रही है। वैसे भी परोपकार और जरूरतमंदों की सहायता भारतीय दर्शन और संस्कृति का अविभाज्य हिस्सा है। पाप और पुण्य के प्रतिफलों को भी इन्हीं सेवा कार्याें से जोड़कर देखा जाता है। किंतु स्वैच्छिक संगठनों को देशी-विदेशी धन के दान ने इनकी आर्थिक निर्भरता को दूषित तो किया ही, इनकी कार्यप्रणाली को भी अपारदर्शी बनाया है। इसलिए ये विकारग्रस्त तो हुए ही, अपने बुनियादी उद्देश्यों से भी भटक गए। कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना में जिन संगठनों पर कानूनी शिकंजा कुछ माह पहले कसा गया है, उन्हें धन तो विकलांगों की मदद और कुष्ठ रोग उन्मूलन के लिए मिला था, लेकिन इसका दुरुपयोग वे परियोजना के खिलाफ लोगों को उकसाने में कर रहे थे। हमारे देश में प्रत्येक 40 लोगों के समूह पर एक स्वयंसेवी संगठन है, इनमें से हर चौथा संगठन धोखाधड़ी के दायरे में है। नरेंद्र मोदी सरकार जब केंद्र में आई तो उसने इन एनजीओ के बही-खातों में दर्ज लेखे-जोखे की पड़ताल की। ज्यादातर एनजीओ के पास दस्तावेजों का उचित संधारण ही नहीं पाया गया। लिहाजा, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन काम करने वाले कपार्ट ने 1500 से ज्यादा एनजीओ की आर्थिक मदद पर प्रतिबंध लगा दिया और 833 संगठनों को काली सूची में डाल दिया है। इनके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक न्याय मंत्रालय एवं राज्य सरकारों द्वारा काली सूची में डाले गये एनजीओ अलग से हैं। भू-मण्डलीकरण के पहले 1990 तक हमारे यहां केवल 50 हजार एनजीओ थे जबकि 2012 में इनकी संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो गई थी। इन संगठनों को देश के साथ विदेशी आर्थिक सहायता भी खूब मिलती है। इसलिए इनके उद्देश्यों पर नजर रखना जरूरी है। कोरोना काल में इनकी प्रभावी भूमिका सामने नहीं आने से पता चलता है कि ये संगठन केवल अनुकूल स्थितियों में ही समाज सेवा करने के आदी हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 May 2020


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अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के लिए संघर्षरत अखबार कर्मियों की यूनियन न्‍यूजपेपर इम्‍प्‍लाइज यूनियन आफ इंडिया (न्‍यूइंडिया) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अखबार मालिकों की संस्‍था आईएनएस की राहत पैकेज की मांग का विरोध करते हुए मजीठिया वेजबोर्ड लागू करवाने की लड़ाई में नौकरियां गवा चुके हजारों अखबारकर्मियों को सीधे तौर पर आर्थिक मदद की मांग की है। ज्ञात रहे कि ऐसे हजारों अखबार कर्मी नाैकरी छीन जाने के कारण रोजी रोटी को मोहताज हैं। इस संबंध में न्‍यूइंडिया द्वारा लिखा पत्र इस प्रकार से है: अखबार कर्मचारियों के लिए 11 नवंबर 2011 को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा संवैधानिक घोषित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू ना करके देश के संविधान और संसद का मखौल उड़ाने वाले अखबार मालिकों के संगठन आईएनएस की हजारों करोड़ के राहत पैकेज की मांग का हम देश भर के पत्रकार और अखबार कर्मचारी कड़ा विरोध करते हैं। आईएनएस एक ऐसी संस्‍था है जो खुद को देश के संविधान, सर्वोच्‍च न्‍यायालय और संसद से बड़ा समझती है। इसका जीता जागता उदाहरण अखबारों में कार्यारत पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा वैध और उचित घोषित किए गए मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू ना करना और वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छीन लेना है। महोदय, देश के लगभग सभी समाचारपत्रों की पिछली बैलेंसशीटें हर साल होने वाले करोड़ों रुपये के मुनाफे को दर्शाती हैं। वहीं देश भर के श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड की रिकवरी और उत्‍पीड़न के हजारों लंबित मामले साफ दर्शाते हैं कि किस तरह से अखबार प्रबंधन अपने कर्मचारियों का हक मार कर बैठे हैं और पत्रकारों, पत्रकारिता और रोजगार के नाम पर अपनी तिजोरियां ही भरते आए हैं। लिहाजा कोराना संकट में हजारों करोड़ के घाटे की बात करके आईएनएस राहत पैकेज की जो बात कर रहा है, यह सिर्फ अखबार मालिकों की तिजोरियां भरने का ही प्रपंच है। इससे अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं होने वाला। यहां गौरतलब है कि लॉकडाउन में भी अखबारों की प्रिंटिंग का काम नहीं रोका गया है और अखबारों के प्रसार में मामूली फर्क पड़ा है। महंगाई के दौर में जहां हर वस्‍तु के दाम उसकी लागत के अनुसार वसूले जाते हैं तो वहीं बड़े बड़े अखबार घराने अखबार का दाम इसलिए नहीं बढ़ाते ताकि छोटे अखबार आगे ना बढ़ पाएं। उनकी इस चालाकी को घाटे का नाम नहीं दिया जा सकता है। यहां एक समाचारपत्र द हिंदू का उदाहरण सबके सामने है, जिसकी कीमत 10 रुपये हैं जबकि बाकी अखबार अभी भी इससे आधी से कम कीमत में बेचे जा रहे हैं, इसका खामियाजा देश की जनता की खून पसीने की कमाई को लूटा कर नहीं भरा जा सकता। महोदय, यहां यह बात भी आपके ध्‍यान में लाना जरूरी है कि आईएनएस से जुड़े अधिकतर अखबारों ने केंद्र सरकार की उस अपील का भी सम्‍मान नहीं किया है जिसके तहत कर्मचारियों का वेतन ना काटने को कहा गया था। करीब सभी अखबारों ने जानबूझ कर अपने कर्मचारियों से पूरा काम लेने के बावजूद उनका आधे के करीब वेतन काट लिया है ताकि सरकार को घाटे का यकीन दिलाकर राहत पैकेज का ड्रामा रचा जा सके। वेतन काटे जाने को लेकर कुछ यूनियनें माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दखिल कर चुकी हैं। महोदय, असल में राहत के हकदार तो वे अखबार कर्मचारी हैं, जो पिछले पांच से छह सालों से मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके चलते अपनी नौकरियां तक गंवा चुके हैं। इनके परिवारों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना मुश्किल हो रहा है। केंद्र सरकार से मांग की जाती है कि राज्‍यों के माध्‍यम से श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड और अवैध तौर पर तबादले और अन्‍य कारणों से नौकरी से निकाले जाने की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मचारियों की पहचान करके उन्‍हें आर्थिक तौर पर सहायता मुहैया करवाई जाए।   साथ ही कोरोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को आर्थिक मदद जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से इस आशय का शपथपत्र देते हैं कि उन्‍होंने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड या इसके कारण कर्मचारी को नौकरी से निकालने का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की यूनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को राहत दी जाए।

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Bizarre questions on the government

सियाराम पांडेय 'शांत'   राजनीतिक गलियारों में एक सवाल उठा है कि सरकार किसके लिए धन जुटा रही है। सवाल यह है कि सरकार क्या है? सरकार जनता का निर्णायक प्रतिनिधित्व है। जो कुछ भी टैक्स आदि के जरिये अर्जित होता है, वह जनता द्वारा वसूला गया होता है और जनता के लिए होता है। सवाल उठता है कि जनता क्या है? सरकार के पास जो धन है, वह जनता का है लेकिन उसे कैसे खर्च करना है, इसके लिए जनता ने सरकार बनाई है। मौजूदा सरकार किसानों, महिलाओं और श्रमिकों के खाते में यथासंभव रुपये डाल भी रही है। जनता केवल मजदूर नहीं है। केवल किसान नहीं है। केवल व्यापारी नहीं है। देश की समूची आबादी ही जनता है। सबको एक साथ संतुष्ट नहीं किया जा सकता। सबको घर-घर जाकर पैसा नहीं दिया जा सकता। पूर्व की सरकारों की नकद कैश देने की व्यवस्था थी तो उसका हस्र यह होता था कि एक रुपये में महज 15 पैसे ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाते थे और वह भी सब तक नहीं। सरकार के पास अर्जित धन सबका है। लॉकडाउन में सभी दुखी हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि जनता का धन यूं ही लुटा दिया जाए। सरकार को यह देखना होता है कि किसकी जरूरत ज्यादा है। सरकार इस धन को देश के संरचनात्मक विकास पर खर्च करती है।   इसमें संदेह नहीं कि वैश्विक महामारी घोषित कोरोना ने भारत ही नहीं, दुनिया भर की अर्थव्यवस्था का डांवाडोल किया है। अमेरिका जैसा सर्वशक्तिमान देश अगर ऋण लेने पर विचार कर रहा है तो इससे स्थिति की गंभीरता का पता चलता है। लोगों की सेहत के लिए लॉकडाउन जरूरी है लेकिन इसके बाद भी सीने पर पत्थर रखकर सरकार ने कुछ क्षेत्रों में रियायत दी है तो इसके अपने मतलब हैं। अमेरिका समेत तमाम देश लॉकडाउन खोलने पर विचार कर रहे हैं। उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को और डांवाडोल होते क्यों देखना चाहिए। लॉकडाउन का अभी खोला जाना वैसे भी खतरे से खाली नहीं है। कोरोना वायरस की चेन तोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उस प्रयास पर पानी फिर सकता है। 42 दिन लॉकडाउन झेलने के बाद भी अगर कोरोना संक्रमण की मार झेलनी पड़े तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? जीवन जरूरी है लेकिन जीवन के सुचारू संचालन के लिए धन का होना भी उतना ही जरूरी है।   सवाल उठ रहे हैं कि शराब जरूरी है या स्वास्थ्य। निश्चित रूप से स्वास्थ्य जरूरी है। शराब से दैहिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। मानसिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ होता है, व्यक्ति का आर्थिक स्वास्थ्य भी बिगड़ता है लेकिन इससे सरकार का आर्थिक स्वास्थ्य तो सुधरता ही है। सरकार भी इस बात को जानती है। इसलिए वह दो विभाग समानांतर चलाती है। एक विभाग मद्य निषेध का है और दूसरी आबकारी का। एक विभाग शराब छोड़ने के तौर-तरीके बताता है। शराब के आदती लोगों का माइंडवाश करता है। उन्हें शराब के नुकसान बताता है। उनका इलाज कराता है और दूसरा विभाग शराब की बिक्री करवाता और उससे सरकार के लिए आबकारी टैक्स जुटाता है। सरकार के स्वभाव का यह विरोधाभास केवल भाजपा शासित राज्यों में हो, ऐसा भी नहीं है। जहां गैर भाजपा शासित सरकारें हैं, वहां भी धड़ल्ले से शराब बेची जा रही है। लॉकडाउन में शराब बिक्री के लिए मदिरालय खोलने की सर्वप्रथम मांग कांग्रेस नीत पंजाब सरकार ने ही की थी।   शराब की दुकानों को खोलने की इजाजत देकर सरकारों ने ठीक किया है या गलत, यह मंथन का विषय हो सकता है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लॉकडाउन खुलते ही जिस तरह शराब की दुकानों पर सामाजिक दूरी के सिद्धांत को पलीता लगा लगा है, उसे बहुत उचित नहीं कहा जा सकता। बड़ी मुश्किल से 42 दिन की महाबंदी और आर्थिक झटकों को झेलते हुए भारत ने कोरोना की चेन को कमजोर करने की कोशिश की थी लेकिन उसके इन प्रयासों को शराब के शैकीनों ने धता बता दिया है। यह सच है कि पहले दिन ही अनेक राज्यों में शराब की अरबों में बिक्री हुई है। उत्तर प्रदेश भी उससे अछूता नहीं है। दिल्ली ने तो शराब बिक्री पर 70 प्रतिशत कोरोना टैक्स तक लगा दिया है। आंधप्रदेश में शराब की कीमतें 75 प्रतिशत तक बढ़ा दी है लेकिन इसके बाद भी मदिरालयों पर शराबियों की कतारें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। भले ही इस दामवृद्धि को शराब बिक्री पर अंकुश लगाने की मंशा करार दिया जा रहा है लेकिन सच तो यही है कि पैसा किसे काटता है? वह तो सबकी पसंद है। उत्तर प्रदेश सरकार भी शराब बिक्री पर 40 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैक्स यानी कोरोना कर लगाने पर विचार कर रही है। देखादेखी अगर अन्य सरकारें भी ऐसा करें तो कदाचित गलत नहीं होगा। जनहित की चिंता और अर्थलाभ के लक्ष्य एक साथ पूरे हों तो ऐसी युक्ति का कौन सम्मान नहीं करना चाहेगा?   पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क भी केंद्र और कई प्रांतों की सरकारों ने बढ़ा दिए हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने पेट्रोल एवं डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाए जाने को लेकर सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि जब किसानों और मजदूरों की मदद नहीं हो रही है तो फिर किसके लिए पैसा इकट्ठा किया जा रहा है? कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट का फायदा जनता को मिलना चाहिए। लेकिन भाजपा सरकार बार-बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर जनता को मिलने वाला सारा फायदा अपने सूटकेस में भर लेती है। कांग्रेस के एक नेता ने यहां तक पूछ लिया है कि क्या जनता को लूटकर जेबें भरना "राजधर्म" है? कराधान पर सवाल तो फिर भी ठीक है। उसके युक्तायुक्त होने पर मंथन जरूरी है लेकिन सरकार की कमाई पर सवाल उठाना वाजिब नहीं है।   केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 10 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपए प्रति लीटर बढ़ा दिया है। कोरोना वायरस संक्रमण के चलते मांग नहीं होने के कारण पिछले माह ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 18.10 डॉलर के निम्न स्तर पर पहुंच गई थी। यह 1999 के बाद से सबसे कम कीमत थी। हालांकि इसके बाद कीमतों में थोड़ी वृद्धि हुई और यह 28 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई लेकिन फिर भी यह इतनी नहीं है कि डीजल और पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाना पड़े। माना कि लॉकडाउन के चलते केंद्र सरकार का नकदी संकट बढ़ा है। यह वृद्धि सरकार के सुचारु संचालन में उसे मदद देगी लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लॉकडाउन में आम आदमी की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई है। निजी क्षेत्र की अधिकांश कंपनियोें ने दो माह से वेतन ही नहीं दिया है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल के बढ़े दाम मध्यमवर्ग को परेशानी में डालने वाले साबित हो सकते हैं।   माना कि नकदी संकट से जूझ रही केंद्र सरकार को पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी से चालू वित्त वर्ष में 1.6 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। लेकिन सरकार को यह भी सोचना होगा कि इससे लोक कल्याणकारी सरकार की संवैधानिक अवधारणा का क्या होगा? इससे पहले सरकार ने 14 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर तीन-तीन रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ाया था। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने 16 मार्च से पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा है। आरोप लगाना आसान है लेकिन हमें सोचना होगा कि सरकार के पास जो भी पैसा या अनाज है, वह इसी देश का है और इसी देश के कम आना है। कोरोना अंतिम आपदा नहीं है। ऐसी आपदाएं देश के समक्ष आती ही रहती है। इसलिए सरकार को धन जुटाना भी पड़ता है और उसे बचाना भी पड़ता है। आपदा काल में जनता को सरकार का ही सहारा होता है। सरकार अगर पूरा धन खर्च कर दे तो अगली आपदा से वह कैसे निपटेगी, राजनीतिक दलों को इस बात का भी विचार करना होगा।   पंजाब के एक मंत्री ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह देश की पूरी आबादी को भोजन कराने में सक्षम हैं। यह अच्छी बात है लेकिन कितने दिन तक, लगे हाथ मंत्री जी, यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा रहता। सवाल उठता है कि इस लॉकडाउन में जब लोगों को अपना घर चलाना मुश्किल हो रहा है तब इन मंत्री महोदय के पास इतना धन, इतना राशन कहां से आ गया कि वे एक करोड़ 38 करोड़ की आबादी को रोज भोजन कराने का दावा कर रहे हैं। उनकी आय का स्रोत क्या है, यह भी बताया जाना चाहिए। खैर, जरूरतमंदों की मदद होनी चाहिए। उसमें किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। मदद के इच्छुक लोगों को जरूरत पड़ने का इंतजार नहीं करना चाहिए। इससे बड़ी जरूरत देश को भला और क्या हो सकती है? जब से मदद आरंभ कर दें, तभी से अच्छा।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Homecoming of Indians from abroad

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   विदेशों में काम करनेवाले लाखों भारतीयों को भारत लाने का बीड़ा अब भारत सरकार ने उठाया है। यह स्वागत योग्य कदम है। भारतीयों की यह घर वापसी शायद इतिहास की बेजोड़ घटना होगी। 1990 में जब सद्दाम हुसैन के एराक के खिलाफ अमेरिका ने प्रक्षेप्रास्त्र बरसाए थे, तब भी खाड़ी देशों से लगभग पौने दो लाख लोग भारत लौटे थे। लेकिन इस बार लाखों लोग लौटने की कतार में खड़े हैं। मुझे याद है कि इन देशों में कार्यरत मेरे दर्जनों मित्र अपनी कारें, कीमती फर्नीचर और मकान भी छोड़कर भाग खड़े हुए थे। चंद्रशेखरजी की सरकार के राजदूतों ने अपने लोगों की दिल खोलकर मदद की थी लेकिन अब 30 साल बाद हमारे प्रवासियों के लिए उस युद्ध से भी बड़ा खतरा उनके दिल में बैठ गया है। वे समझ रहे हैं कि कोरोना उन्हें तो वहां मार ही सकता है, भारत में भी उनके परिजनों को ले बैठ सकता है। इसीलिए चाहे जो हो, वे कहते हैं कि हमें तो हमारे परिवार के पास पहुंचना ही है। इसके अलावा हजारों-लोग बेरोजगार हो गए हैं। कुछ काफी बीमार हैं, कुछ दो-चार दिन के लिए वहां गए थे लेकिन 40 दिन से वहीं अटके पड़े हैं और कुछ लोगों के परिजन भारत में बहुत बेहाल हैं। सरकार ने इन सब कारणों को ध्यान में रखकर अभी एक सप्ताह में लगभग 15 हजार लोगों को 13 देशों से वापस लाने की घोषणा की है। इन यात्रियों को अपना किराया देना होगा, दूरी के हिसाब से। वह एक लाख रु. से 12 हजार रु. तक होगा। यह आपत्तिजनक नहीं है, क्योंकि विदेशों में काम कर रहे भारतीय पर्याप्त कमाते हैं लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे अपनी कमाई में से हर साल 83 अरब डाॅलर भारत भेजते हैं। अब इस राशि में सेंध लगेगी लेकिन देखना यह है कि ये लोग, जिनकी संख्या लाखों में हैं, वापस उन देशों में जाएंगे या नहीं? यदि वे नहीं जाएंगे तो उन्हें भारत में रोजगार कैसे मिलेगा? क्या वे कम वेतन पर काम करना चाहेंगे? इनमें जो मजदूर हैं, वे तो शायद भारतीय कारखानों में खप जाएंगे लेकिन ऊंचे वेतनवाले लोग बड़ा सिरदर्द खड़ा कर सकते हैं। अभी तक 4-5 लाख लोगों ने ही भारत लौटने की अर्जी भेजी है। यह संख्या कई गुना बढ़ सकती है। यदि अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों में कोरोना का प्रकोप शांत नहीं हुआ तो मानकर चलिए कि सारी दुनिया में फैले डेढ़-दो करोड़ प्रवासी भारतीय वापस लौटने की इच्छा रखेंगे। अभी तक तो घर-वापसी का यह अभियान आपात स्थिति में फंसे लोगों के लिए ही है लेकिन कोई आश्चर्य नहीं कि जब लाखों लोगों को विदेश से लाना होगा तो सरकार कैसे-क्या करेगी? एक डर यह भी है कि इन लोगों की वापसी के बाद कहीं कोरोना भारत में ही उसी तरह न फैल जाए, जैसे कि वह उन देशों में फैला हुआ है। सरकार को इस मामले में भी बड़ा सावधान रहना होगा।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Alcohol is a big source of revenue, why suffer losses?

डाॅ. रमेश ठाकुर   शराब ब्रिकी के इतिहास में पहली दफा ऐसा हुआ है जब मात्र एक दिन में शराब ब्रिकी की कमाई से सरकारी खजानों में करोड़ों रुपये का राजस्व जुड़ा। दूसरे चरण के लाॅकडाउन की अवधि जैसे ही तीन मई को खत्म हुई और तीसरे लाॅकडाउन की सुबह यानी चार मई की शुरुआत हुई, शराब की ब्रिकी ने पूर्व के सभी रिकाॅर्ड तोड़ डाले। इतनी शराब आज से पहले कभी नहीं बिकी। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही तीन सौ करोड़ की शराब बिकी, राजधानी दिल्ली जैसे छोटे केंद्र शासित राज्य में सवा करोड़ रुपए की शराब बिक गई। अन्य राज्यों में भी यही हाल रहा। दिल्ली की डीएसआईसी और अन्य प्रदेशों की आबकारी विभाग ने जो आंकड़े पेश किए हैं, उससे अनुमान लगा सकते हैं कि लाॅकडाउन के दौरान दारू के शौकीन कितने उकता गए थे। शराब के बिना उनका बमुश्किल वक्त कट रहा था। तभी चार मई को सुबह शराब की दुकानें खुलने से पहले ही लोग कतारों में खड़े हो गए थे। दारू की खरीददारी मेें लोग लाॅकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग आदि नियम तक भूल गए, लागू सभी नियमों की धज्जियां उड़ गई। पुलिस पहरेदारी के बावजूद शौकीनों ने धक्का-मुक्की की, दुकानों पर गिद्ध की भांति टूट पड़े।   शराब सरकारों की जरूरत है या लोगों की? इसकी थ्योरी को जग समझ चुका है। सरकारें शराब बेचे तब भी दिक्कत, न बेचे तब और ज्यादा दिक्कत। शराब अब दोनों की समान जरूरत बन गई है। वैसे, केंद्र सरकार हो या राज्य की हुकूमतें शराब ब्रिकी उनके लिए राजस्व अर्जित करने का बड़ा स्रोत हमेशा से रही है। जाहिर है, शराब बंद करके सरकारें नुकसान नहीं झेलेंगी। फिर इस बात की परवाह भी कतई नहीं की जा सकती कि कोरोना काल में समूचे देश में जनमानस की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लगाए गए लाॅकडाउन का परिणाम अच्छा आए या बुरा? राजस्व की भरपाई अगर शराब बेचने से होती है तो शराब से पाबंदी हटाना ही बेहतर? सरकारों की कमाई के दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें वह रिस्क नहीं ले सकतीं। अव्वल, शराब की ब्रिकी, दूसरा पेट्रो पदार्थों से होने वाली आमदनी। पेट्रोल के प्रति लीटर पर निर्धारति कीमत की आधी रकम सरकारी खाते में वैट के रूप में जाती है। इसलिए बड़ा असंभव लगता है इतना बड़ा नुकसान झेलना?   बहरहाल, नुकसान का एक पूर्ववर्ती उदाहरण सरकारों के पास है। सन् 1996 में हरियाणा में बंसीलाल सरकार ने पूरे प्रदेश में शराबबंदी की थी, जिसका हश्र क्या हुआ, शायद बताने की जरूरत नहीं? फैसले के बाद उनको अपनी सरकार बचानी तक भारी पड़ गई। हंगामा इस कदर कटा जिससे बंदी के आदेश कुछ माह के भीतर ही वापस लेने पड़े। इसी दरमियान सरकार का राजस्व घाटे में चला गया है। वैसे देखा जाए तो बंदिशों के बाद भी शराब की तस्करी होती है। कुल मिलाकर शराबतंत्र का जाल बड़े स्तर पर फैल चुका है। कितनी भी बंदी क्यों न हो, शराब के तलबगार अपना रास्ता खोज ही लेते हैं। शराब की ब्रिकी सरकारों के लिए कितनी अहम है ये सभी जानते हैं। पर, शराब आमजन के लिए अहम और महत्वपूर्ण है, इसकी तस्वीर चार मई को समूचे हिंदुस्तान ने उस वक्त देखी जब सरकार ने शराब की दुकानों को खोलने के आदेश दिए। कोरोना संकट में केंद्र सरकार द्वारा फ्री का राशन भी बांटा जा रहा है उसमें लोग ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। लेकिन दारू के लिए तपती दोपहरी में लंबी-लंबी लाइनों में खुशी-खुशी खडे़ देखे गए। इन लाइनों में वह लोग भी थे जो नोटबंदी में बैंकों की लाइनों में खड़ा होने को लज्जित महसूस करते थे, लेकिन गले को तर करने वाली अमृतरूपी दारू के लिए सीना चौड़े कर कतारों में खड़े थे। दरअसल, इसमें दोष किसे दिया जाए, समझ में नहीं आता। मुल्क की बड़ी तादाद सरकार से शराब की दुकानों को खोलने की डिमांड करती है। चालीस दिन के बाद जब शराब की दुकानें खुली तो देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि हिंदुस्तान में दूध पीने वालों से कहीं ज्यादा तो पियक्कड़ हैं।   दिल्ली में शराब की कीमतों में सत्तर फीसदी इजाफा किया गया है। शराब के शौकीनों को किसी भी कीमत पर शराब क्यों न मिले, उसे खरीदेंगे। शराब के तलबगार इसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को आतुर होंगे। हालांकि दिल्ली सरकार ने अभी ये स्पष्ट नहीं है कि यह वृद्धि पूर्णकालिक है या आंशिक। अगर बढ़े रेट हमेशा के लिए हैं तो सरकार के रेवेन्यू में बड़ी वृद्वि होगी। शराबबंदी पर पहले भी कुछ राज्यों ने फैसले लिए थे जो अधिकतर असफल हुए। हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, व मिजोरम में शराबबंदी के प्रयास विफल हुए थे। हालांकि अभी गुजरात, बिहार, मणिपुर, नागालैंड व लक्षद्वीप में शराबबंदी लागू है। दरअसल शराबबंदी के बाद एक समानांतर तंत्र ऐसा विकसित हो जाता है जो शराब की आपूर्ति पर कब्जा कर लेता है। इससे शराबबंदी का सामाजिक लक्ष्य भी पूरा नहीं होता और सरकार को आय भी नहीं मिलती। इससे तो बेहतर है सरकार ही अधिकृत रूप से शराब बेचे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal,Politics on the workers

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   भारत सरकार ने यह फैसला देर से किया लेकिन अच्छा किया कि प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के लिए रेलें चला दीं। यदि बसों की तरह रेलें भी गैर-सरकारी लोगों के हाथ में होतीं या राज्य सरकारों के हाथ में होतीं वे उन्हें कब की चला देते। करोड़ों मजदूरों की घर-वापसी हो जाती और अबतक काम पर लौटने की उनकी इच्छा भी बलवती हो जाती लेकिन अब जबकि रेलें चल रही हैं, बहुत ही शर्मनाक और दर्दनाक नजारा देखने को मिल रहा है। जिन मजदूरों की जेबें खाली हैं, उनसे रेल-किराया मांगा जा रहा है और एक वक्त के खाने के 50 रु. ऊपर से उन्हें भरने पड़ रहे हैं। इसके विपरीत विदेशों से जिन लोगों को लाया गया है, उनको मुफ्त की हवाई-यात्रा, मुफ्त का खाना और भारत पहुंचने पर मुफ्त में रहने की सुविधाएं भी दी गई हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। यह अच्छी बात है लेकिन ये लोग कौन हैं? ये वे प्रवासी भारतीय हैं, जो विदेशों में काम करके पर्याप्त पैसा कमाते हैं लेकिन इनके मुकाबले हमारे नंगे-भूखे मजदूरों से सरकार रेल-किराया वसूल कर रही है। क्या यह शर्म की बात नहीं है? खास तौर से तब जबकि ''प्रधानमंत्री परवाह करते हैं'' (पीएम केयर्स फंड) में सैकड़ों करोड़ रु. जमा हो रहे हैं। प्रधानमंत्री किसकी परवाह कर रहे हैं? अपने जैसे लोगों की? खाए, पीए, धाए लोगों की? जो भूखे-प्यासे गरीब लोग हैं, उनकी परवाह कौन करेगा? यदि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इन वंचितों के लिए आवाज उठाई तो इसमें उन्होंने गलत क्या किया? यदि इसे आप राजनीतिक पैंतरेबाजी कहते हैं तो मैं इस पैंतरेबाजी का स्वागत करता हूं। हालांकि सबको पता है कि कांग्रेस पार्टी के हाल खस्ता हैं। वह सोनिया के इस दावे पर अमल कैसे करेगी कि सारे मजदूरों का यात्रा-खर्च कांग्रेस पार्टी उठाएगी। यह कोरी धमकी थी लेकिन इसका असर अच्छा हुआ है। कई कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी राज्यों ने अपने-अपने यात्रियों का खर्च खुद करने की घोषणा कर दी है। रेल मंत्रालय को अब यही देखना है कि वह इन करोड़ों मजदूरों की यात्रा को सुरक्षित ढंग से संपन्न करवा दे। यदि यात्रा की इस भगदड़ और गहमागहमी में कोरोना फैल गया तो देश के सामने मुसीबतों का नया पहाड़ उठ खड़ा होगा।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,Epidemic Ordinance: A Positive Initiative

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   कोरोना महामारी ने जहां समूची दुनिया को हिलाकर रख दिया है, वहीं महामारियों से निपटने के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अध्यादेश लाकर सकारात्मक पहल की है। कोरोना महामारी ने सारी दुनिया में लाखों लोगों को आगोश में ले लिया है। चीन से चला यह वायरस सारी दुनिया को चपेट में ले चुका है। दुनिया के अधिकांश देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहे हैं। देश में लॉकडाउन का तीसरा चरण चार मई से आरंभ हो चुका है। देश के सभी जिलों को तीन जोन ग्रीन, ओरेंज और रेड में बांटकर तीसरे चरण के लॉकडाउन को लागू किया जा रहा है।   हमारे यहां ही नहीं दुनिया के सभी देशों के सामने दोहरी समस्या है। एक तरफ कोरोना के प्रवाह को सीमित करने यानी लोगों को कोरोना संक्रमित होने से रोका जाए, जो संक्रमित हैं, उनके जीवन की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास किए जाए। तीसरी और महत्वपूर्ण कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर कैसे लाया जाए। लॉकडाउन के कारण सभी नागरिक घरों की चारदीवारी में कैद हैं। उद्योग-धंधे ही नहीं सबकुछ थम कर रह गया है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जनजीवन को सामान्य बनाया जाए। इससे भी ज्यादा जरूरी हो जाता है कि कोरोना से लोग प्रभावित ना हों। लोगों का जीवन बचाना सबसे महत्वपूर्ण हो गया है।   आज देश-दुनिया के सामने चुनौती आने वाले समय की है। जब सबकुछ सामान्य होने लगेगा तब यानी की लॉकडाउन हटते ही व्यवस्था अव्यवस्था का रूप ना ले ले और कहीं इतने दिनों की तपस्या निष्फल ना हो जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान महामारी अध्यादेश लाया गया है। दरअसल कोरोना से बचाव के लिए जो सावधानियां आज बरती जा रही है, वह लंबें समय तक बरती जानी जरूरी है। सोशल डिस्टेंस, मास्क का उपयोग, बाजार में खरीदारी के समय आवश्यक सावधानियां बरतने और सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक या इसी तरह के आयोजनों को एक प्रोटोकाल के तहत आयोजित करने की आवश्यकता होगी। कोरोना के जो अब नए मामले आ रहे हैं वह किराना की दुकानों से खरीदारी, ठेलों से सब्जियां खरीदने या अन्य किसी तरह से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के आ रहे हैं। इन सबके लिए सख्ती और सख्त कानूनी प्रावधान इसलिए जरूरी हो जाते हैं कि अभी देश-दुनिया को पटरी पर लाने में लंबा समय लगना है। यही कारण है कि राजस्थान सरकार ने नए अध्यादेश के माध्यम से सजा के प्रावधानों को भी बढ़ाया है। अब कानून तोड़ने वालोें का 10 हजार तक का जुर्माना व दो साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है। पहले छह माह की सजा और केवल एक हजार का जुर्माना था। वैसे भी कोरोना ने परिस्थियां बदल कर रख दी हैं। नए अध्यादेश में खासतौर से सुरक्षा प्रोटोकाल की पालना पर ही जोर है। इसमें मास्क नहीं पहनने, व्यापारियों द्वारा बिना मास्क के ग्राहकों से व्यवहार करने, खुले में पान, गुटखा, तंबाकू आदि थूकने, सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने आदि के साथ यहां तक कि सार्वजनिक स्थान पर छह फीट की दूरी नहीं रखने पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। बिना अनुमति के विवाह आदि सामाजिक समारोह या अन्य भीड़ वाले कार्यक्रम आयोजित करने पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। सवाल सजा के कम अधिक होने का नहीं है अपितु कोरोना के संक्रमण से लोगों को बचाने का है।   असलियत में कोरोना महाशय की खास बात यह है कि वे अति मिलनसार है। जरा से संपर्क से सामने वाले को अपने आगोश में ले सकते हैं। ऐसे मेें सोशल डिस्टेंस सबसे ज्यादा जरूरी हो जाता है। वाहनों की रेलमपेल, सार्वजनिक स्थानों पर मनमानी और दिखावे के आयोजन ना जाने कितनों को अपने लपेटे में ले सकते हैं। इस मायने से राजस्थान सरकार द्वारा अध्यादेश लाकर लोगों के स्वास्थ्य के प्रति अपनी गंभीरता प्रकट कर दी है। पुराने कानूनोें में पुलिस को नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के साथ ही दूसरे एक्टों का सहारा भी लेना पड़ता था। अब इस अध्यादेश से अनुशासन कायम करना अधिक आसान हो जाएगा। पुराने कानून राजस्थान संक्रामक रोग अधिनियम 1957 में कोविड जैसी महामारी से निबटने के उपाय ही नहीं थे। कोरोना महामारी से स्टे होम स्टे सेफ का कंस्पेट काम कर रहा है। ऐसे में नए कानून की आवश्यकता हो जाती है। नया कानून बनाने का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि सरकार दण्डात्मकता में विश्वास रखती है अपितु इससे संदेश यही है कि हमें प्रोटोकाल की पालना करनी चाहिए। एक जरा-सी चूक दावानल का रूप ले सकती है। यह आज सारी दुनिया प्रत्यक्ष देख रही है। इसलिए देश के अन्य प्रदेशों को भी इस तरह के अध्यादेश लाने की पहल करनी चाहिए क्योंकि यह समस्या केवल राजस्थान की नहीं सभी प्रदेशों और समूचे विश्व की है।   दरअसल कोरोना ने सार्वजनिकता को तहस-नहस कर निजता का संदेश दिया है। हाथ मिलाना तो दूर, एक दूरी बनाए रखना आवश्यक हो गया है। सेनेटाइजर और हैण्डवास आज घर की पहली जरूरत हो गई है तो कुछ दशकों पहले की तरह अब लोग घरेलू उपयोग का सामान कम से कम दो तीन माह का संग्रहित करने में विश्वास करेंगे। पार्टी-सार्टी तो दूर की बात हो गई है। कोरोना का अनुभव और भयावहता को देखते हुए इस तरह के कानून जरूरी हो जाता है। राजस्थान सरकार की इस पहल की सराहना की जानी चाहिए और अन्य प्रदेशों को भी नियामक कानून बनाने की अविलंब पहल करनी चाहिए।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,Turn Eastern State into an Opportunity Challenge

आर.के. सिन्हा कोरोना वायरस के बहाने देश दीन-हीन प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक हालत से रूबरू हो गया है। कोराना वायरस की चेन को ध्वस्त करने के लिए शुरू किए गए देशव्यापी लॉकडाउन के बाद पैदा हुए हालातों से समझ आ गया कि हमारे यहां बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और असम आदि राज्यों के मजदूरों को लेकर कई राज्य सरकारों और नौकरशाही का रवैया कितना निर्ममतापूर्ण रहा है। गुजरात में भूखे-प्यासे प्रवासी मजदूरों पर लाठियां बरसाई जाती है। पंजाब, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी इन्हें इंसान तक नहीं समझा गया। अब कहीं जाकर इन्हें घर भेजने की व्यवस्था शुरू हुई है। यह पहले भी हो सकती थी। इसके कार्यान्वयन में देरी ने सशक्त मजदूरों का दयनीय और मजबूर दृश्य देश के सामने प्रस्तुत किया है, जिससे बचा जा एकता था। इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की लचर आपदा प्रबंधन, लापरवाह कार्य योजना से मोदी सरकार की नेक छवि बदनाम हुई है। ये मजबूर मजदूर लंबे समय तक अपने घरों से हजारों मील दूर दर-दर की ठोकरें खाते रहे थे। मेरे फेसबुक पर हजारों प्रवासी मजदूरों ने गुहार लगाई। इनसे वाहियत किस्म की अपेक्षाएं की जा रही हैं। जरा सोचिए कि जो अधिकांश प्रवासी मज़दूर हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपना नाम नहीं लिख सकते उन्हें स्मार्टफ़ोन पर घर जाने के लिये फ़ॉर्म भरने के लिए कहा गया। वह भी अंग्रेज़ी में। किसी भी राज्य का हेल्पलाइन नंबर और नोडल अधिकारियों का नंबर तो बस खानापूरी के लिये ही था। खुद कोशिश करके फार्म डाउनलोड करके भरकर देख लीजिए। आपको जन्नत की हकीकत समझ आ जाएगी। कोई व्यवस्था इतनी अमानवीय कैसे हो सकती है? क्या ये नौकरशाह एक गरीब अर्ध शिक्षित मजदूर की क्षमता या मनोदशा का आकलन करने में असमर्थ थे । यह ठीक है कि अब ज्यादातर मजदूर स्मार्टफोन भी रखते हैं । वाट्सअप भी करते हैं, यूट्यूब पर फ़िल्में भी देखते हैं । लेकिन, एक करोड़ मजदूरों में लाख दो लाख को छोड़कर वे इन्टरनेट और डाटा का काम तो नहीं जानते न? यदि वे इतना ही जानते होते तो मजदूरी करने को मजबूर क्यों होते? नौकरशाहों ने मजदूरों के कल्याण की जो कागजी योजना बनाई वह मजदूरों को पागल करने वाला है। पंजाब के लुधियाना, अमृतसर तथा जालंधर वगैरह शहरों में लाखों बिहार तथा झारखंड के मजदूर फंसे रहे। वे दाने-दाने को मोहताज थे। पर राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को तो राज्य में शराब की दुकानें खोलने की जल्दी पड़ी थी। वे पंजाबी टीवी चैनलों को दिए इंटरव्यू में शराब के ठेके खोलने पर पूरा ज्ञान बांट रहे थे। पंजाब को खेती में अभूतपूर्व सफलता बिहारी मजदूरों की खून-पसीने की वजह से ही मिली है। पर मजाल है कि अमरिंदर सिंह या उनके किसी मंत्री ने इन मेहनतकशों के लिए कभी दो शब्द बोले भी हों। ये प्रवासी मजदूर राशन तथा दवा की भारी किल्लत का सामना करते रहे। पर इनके हक में वहां पर कोई नहीं खड़ा हुआ। पंजाब सरकार यह न भूले कि कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भीषण आपदाकाल में वंचित वर्ग की मदद करने का दायित्व स्थानीय सरकार का ही होता है। यह कोई अहसान नहीं होता। पर महलों में रहने वालों को मजदूर की चिंता कब होती है। अमरिंदर सिंह जी तो राजपरिवार में जन्मे हैं । दिनभर मेहनत करके रात की रोटी का इंतजाम करने वालों की चिंता इन्हें कैसे होगी। गुजरात में तो सच में हद ही हो गई। वहां मजदूरों को पीटा गया। सूरत में लॉकडाउन के दौरान झोंपड़ियों में बंद मज़दूर भूख से बेहाल होकर जब रोटी के जुगाड़ के लिए बाहर निकले तो पुलिस ने उनपर लाठियाँ बरसानी शुरू कर दीं। इतना अमानवीय व्यवहार अपने ही देश में मजदूरों के साथ हुआ। पुलिसिया एक्शन के बाद मजदूरों ने कई राजमार्गों पर उग्र विरोध किया। किसने सोचा था कि इन मेहनतकशों को यह दिन भी देखना पड़ेगा। बेशक भूख मनुष्य को बहुत साहसी बना देती है। अपने भूखे बच्चे का पेट भरने के लिए मज़दूर भी जान पर खेल गए। गुजरात पुलिस की यह कार्यशैली बड़ी निर्ममतापूर्ण रही है। उनसे यह अपेक्षा तो नहीं की थी जबकि, वहां के पुलिस महानिदेशक स्वयं बिहार के मिथिलांचल के उन्हीं गावों से आते हैं जो पूरे देश को लाखों की संख्या में मजदूर भेजता है। अगर प्रवासी मजदूर यह ठान लें कि जिन राज्यों में इनके साथ दुर्व्यवहार हुआ है, वे उन राज्यों में वापस नहीं जायेंगे तो क्या होगा। सारे देश ने देखा कि प्रवासी मजदूर किन भारी किल्लतों को झेलने को मजबूर हुए। कितने अपने घरों की तरफ पैदल जाने के दौरान सड़कों पर गिरकर मर भी गए। खैर, मोदी सरकार ने अंततः मजदूर स्पेशल ट्रेनों को चलाने का फैसला किया है यह स्वागत योग्य है। यानी अब प्रवासी मजदूर अपने-अपने घरों को वापस चले जाएँगे। अब दूरदराज इलाके में फंसे ज्यादातर प्रवासी मजदूरों की वतन वापसी हो जाएगी। इसके बाद उन आंसू भरी दस्तानों में शायद कुछ कमी आए जो बीच रास्तों में खौफनाक मौतों से जुड़ी होती है। सचमुच जब यह जानने को मिलता है कि महाराष्ट्र से दस युवा मजदूर साइकिलों से अपने गांव के लिए निकले थे। वे करीब 350 किलोमीटर चल चुके थे। मध्य प्रदेश की सीमा में पहुंचे। तेज धूप और थकावट के चलते उनका एक साथी निढाल हुआ तो सब रुके। इलाज मिलने के पहले ही वो चल बसा। इसी तरह पंजाब से अलीगढ़ पैदल जाता एक मजदूर ग्रेटर नॉएडा में भूख और थकान से चल बसा। मुंबई से कितने ही असहाय मजदूर साइकिलों पर उड़ीसा तक चल गए। जरा सोचिए कि इतने कठिन सफर के दौरान उन्हें कितने अवरोध और दिक्कतें आई होंगी। कितने ही स्थानों पर पुलिस ने लाठियां बरसाई होंगी । यह भी ठीक है कि रास्ते में ही कुछ लोगों ने इन गरीबों को भोजन और विश्राम का इंतजाम भी किया होगा। जहां प्रवासी मजदूरों को लेकर अधिकतर राज्यों का रुख पत्थर दिल रहा, वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साबित किया कि अब भी कुछ राज्यों की सरकारों का जमीर मरा नहीं है। योगी ने प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित अपने घरों तक पहुंचाने के लिए सबसे पहले 10 हजार बसों की व्यवस्था करने का फैसला किया है। अन्य राज्यों से आने वाले मजदूरों की मेडिकल स्क्रीनिंग के लिए 50 हजार से अधिक मेडिकल टीमें लगाई जा रही हैं । रेल द्वारा मजदूरों की वापसी के लिए पहली पहल झारखण्ड के युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की जो प्रशंसनीय है। इस बीच, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक से ट्रेनें प्रवासी मजदूरों को लेकर उत्तर प्रदेश पहुंच रही हैं। इनमें आए लोगों को जिलों में बनाए गए क्वारनटीन सेंटर में भर्ती कराया जाएगा। फिर उनका मेडिकल टेस्ट होगा। उसके बाद ये घर जा सकेंगे। खैर इस संक्रमण काल में मानवीयता की तमाम मिसालें भी सामने आ रही हैं। इनसे कुछ तो सुकून मिलता है कि समाज ने गरीब प्रवासी मजदूरों की मदद की। उन्हें सहारा दिया जब सरकारें अपनी जिम्मेदारी से भाग रही थीं। अब चूंकि देशभर में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी हो रही है तो सरकारों को उनके लिये तत्काल रोजगार के बारे में सोचना होगा। एक करोड़ से ज्यादा प्रवासी मजदूर पूरब लौट रहे हैं। इनके रोजगार का बड़ा संकट उत्पन्न होगा। इससे निपटने की चुनौती भी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो देश को भरोसा दिलाया है कि देश आर्थिक मोर्चे पर ठीक है। उनके दावे-वादे पर भरोसा करना होगा। लेकिन धूर्त, लापरवाह और भ्रष्ट नौकरशाहों पर भी शिकंजा कसना होगा। अब स्थानीय सरकारों को मजदूरों को उनके घरों के आसपास ही रोजगार के विकल्प देने होंगे। इस लिहाज से इन्हें कुटीर उद्योगों या कृषि से सम्बंधित छोटे उद्योगों से जोड़ा जा सकता है। बेशक ये काम तुरंत तो नहीं हो सकता। पर इस तरफ गंभीरता से तत्काल शुरू की जाने लायक योजनायें बनानी होंगी। इन मजदूरों के बच्चों की शिक्षा की तरफ भी सोचना होगा। इनके बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलवाने की पहल भी सरकारें करेंगी ही ऐसी आशा की जाती है। यही मौका है जब योगी जी अपनी एक जनपद-एक उद्योग की योजना को मूर्त रूप दे सकते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा वापस लौटे मजदूरों से उनके स्किल की जानकारी प्राप्त कर उसका डाटाबेस तैयार कर लिया जाये तो इन राज्यों में सम्बंधित उद्योग स्थापित करने के लिए इच्छुक उद्योगपतियों की लम्बी कतारें इन पूर्वी राज्यों में लग सकती हैं क्योंकि उद्योगों को सबसे भारी समस्या कुशल कामगारों की कमी ही तो होती है । इस तरह, ये मजबूर मजदूर अपने प्रदेशों के लिए निवेश खींचने वाली एक मजबूत शक्ति बनकर उभर सकते हैं। एक बात जान लें कि अब ये प्रवासी मजदूर उन स्थानों पर वापस जाने में जरूर हिचकेंगे जहां पर इनके साथ जानवरों की तरह का व्यवहार हुआ है। गरीब इंसान भी स्वाभिमानी तो होता है। उसे याद रहता है कि किसने उसके साथ कब और कैसा व्यवहार किया। अगर वे वापस नहीं आएंगे तो महानगरों में बनने वाली इमारतों को खड़ा करने के लिए मजदूर नहीं मिलेंगे। ये ही गरीब तो खड़ी करते हैं गगनचुंबी इमारतें और बड़े-बड़े हाइवे और ओवरसीज़। अब दूसरे राज्यों में जाकर फसलों को उगाने के लिए भी मजदूर नहीं मिलेंगे। यह बात पंजाब और हरियाणा भी याद रख ले। एक तरह से अब इन समूह राज्यों के लिए भी चुनौती भरा अवसर आया है कि वे अपने राज्य के युवकों को कुशल कामगार बनायें।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal, Havan: a boon to the universe

डॉ. मोक्षराज   मनुष्य की उत्पत्ति का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही पुराना यज्ञ का इतिहास भी है। भारतीय वैदिक ज्योतिष के आधार पर मनुष्य की उत्पत्ति को 196 करोड़ वर्ष हो चुके हैं तथा भारतीय परंपरागत साहित्य के आधार पर मनुष्य की प्रथम पीढ़ी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रातःकाल पहली बार जब अपने नेत्र खोले और ऋग्वेद के पहले मंत्र- “अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्” से अग्नि (ईश्वर) की यज्ञ द्वारा स्तुति करने की प्रेरणा पाई तथा ऋत्विज, पुरोहित, होता का दायित्व समझा, सामवेद की पहली ऋचा ने “....गृणानो हव्यदातये” गाकर हवि का उल्लेख किया। यजुर्वेद के पहले मंत्र ने “...पशून् पाहि” कहकर गौ आदि पशुओं की रक्षा के लिए प्रार्थना की, ताकि उनसे हवन के लिए दुग्ध (पय) आदि प्राप्त किया जा सके। अर्थात् वेदों ने 1. अग्नि 2. ऋत्विज 3. यजमान 4. हवि व उसका आधार 5. पशु का वर्णन कर सर्वप्रथम यज्ञ के विषय को उद्घाटित कर उसका महत्व प्रतिपादित किया। क्योंकि उक्त तत्त्व ही यज्ञ के प्रमुख आधार भी हैं। यज्ञ द्वारा ही 21 तत्वों अर्थात् संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संतुलित रखा जा सकता है। इस बात का उल्लेख अथर्ववेद के पहले मंत्र ने “ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा“ कहकर व्यक्त किया है। चारों वेदों में यज्ञ व उसके प्रभाव का सर्वप्रथम उल्लेख मिलना इस बात की ओर भी संकेत करता है कि मनुष्य का जीवन यज्ञमय होना चाहिए। संपूर्ण भूमंडल पर वेद से प्राचीन कोई ग्रंथ नहीं है, अत: यज्ञ का इतिहास भी 196 करोड़ वर्ष पुराना ही है । कालांतर में श्रौतयज्ञों की विधि व विज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए कल्प, ब्राह्मण ग्रन्थ, पूर्व-मीमांसा, धर्मशास्त्र, स्मृतियों व रामायण और महाभारत आदि ग्रंथों ने इसे जीवन के विभिन्न पहलुओं से जोड़कर रखा।   यज्ञ में हिंसा का विधान नहीं वैदिक सिद्धान्तों के निश्चय के लिए वेदों को स्वत: प्रमाण एवं परम प्रमाण माना जाता है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रथम सूक्त के चौथे मंत्र “...यज्ञमध्वरम् “ कहकर स्पष्ट कर दिया है कि यज्ञ वही कहलाता है, जिसमें किसी प्रकार की हिंसा न हो। ध्यातव्य है कि वेदों में परस्पर विरोधी सिद्धान्त नहीं होते हैं। जो लोग यज्ञ में हिंसा की बात करते हैं या यज्ञ की हिंसा को हिंसा नहीं मानते वे भ्रमित हैं, अज्ञानी हैं, हृदयविहीन हैं या भारत की संस्कृति को कलंकित करने वाले किसी विदेशी षड्यंत्र के शिकार हैं। उन्हें यह जानना आवश्यक है कि कर्मकांड के लिए सर्वोच्च प्रमाण यजुर्वेद है। यज्ञ में हिंसा की गुत्थी को सुलझाने के लिए, ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा देने वाले महान समाज सुधारक व धर्म संशोधक महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा सर्वप्रथम इसी वेद का यौगिक एवं योगरूढ़ भाष्य किया गया व यजुर्वेद में यज्ञीय हिंसा का उल्लेख नहीं मिला। वेद को भलीभाँति जाने बिना ‘यज्ञ में हिंसा’ के मिथ्या आरोप लगाए जाते रहे हैं व उन भ्रांतियों के कारण कुछ संप्रदाय वेद व यज्ञ के विरोधी भी हो गए थे, जिनके कारण भारत के क्षात्रबल व ब्रह्मबल को अत्यधिक क्षति पहुँची। परिणामस्वरूप आर्यावर्त्त सदियों तक लूट का शिकार होता रहा।    4000 वर्ष पूर्व सम्पूर्ण विश्व में यज्ञ होते थे दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में पेरू देश स्थित एंडीज की पर्वतमालाओं में 5 हज़ार वर्ष पुरानी यज्ञवेदियों का मिलना, अफ़्रीका के मस्नार में कण्व ऋषि द्वारा यज्ञ संचालित रखना तथा वहीं हज़ारों वर्ष पूर्व भरत राजा द्वारा यज्ञ के उपरांत हाथियों को सोने के मुकुट पहनाकर दान करना, आस्ट्रेलिया में 8.69 लाख वर्ष पूर्व पुलस्त्य ऋषि द्वारा यज्ञ कराना, यव (जावा) एवं बाली द्वीप में 535 वर्ष पहले तक यज्ञ की परंपरा का अनवरत संचालित रहना, हरिवर्ष (यूरोप) ईरान, गान्धार, साइबेरिया, चीन व अरब देशों में 1700 वर्ष पहले तक तथा नेपाल, भूटान, ब्रह्मा (बर्मा) आदि में आज भी यज्ञीय चिह्नों का मिलना यज्ञ की उपयोगिता एवं व्यापकता को प्रदर्शित करता है। परवर्ती सांस्कृतिक हमलों ने कहीं-कहीं हवन को अग्यारी, दीपक, धूपबत्ती, अगरबत्ती, लोबान, कैंडल जलाने तक में सीमित कर दिया।   अमेरिका में हवन सन् 1875 के बाद अर्थात् 19वीं सदी के अंत तथा 20वीं सदी के आरंभ में त्रिनिदाद, मॉरिशस, यूगांडा, गयाना, फीजी व दक्षिण अफ़्रीका के साथ-साथ विश्व के प्रमुख धर्मनिरपेक्ष देशों में आर्यसमाज द्वारा पुन: यज्ञ का प्रचार किया गया। आज भी आर्य प्रतिनिधि सभा अमेरिका के साथ जुड़ी हुई व विभिन्न स्वायत्त आर्य संस्थाओं, जैसे ह्यूस्टन, न्यूजर्सी, शिकागो, न्यूयार्क व अटलांटा स्थित ओम् टेम्पल, वैदिक मंदिर व वैदिक संस्कृति स्कूलों द्वारा हवन का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। यहाँ आयोजित रविवारीय हवन कार्यक्रमों में किसी भी संप्रदाय, जाति, नस्ल व देश के नागरिक शामिल हो सकते हैं। इसी प्रकार मैरीलैंड, वर्जीनिया एवं वाशिंगटन मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में पिछले 40 वर्षों से वैदिक हवन सभा परिवारों में जाकर हवन करा रही है तथा हाल ही में आर्यसमाज डीसी की स्थापना भी हो चुकी है। दक्षिण भारतीय समाज के लिए विशेष आस्था का केन्द्र, मैरीलैंड स्थित श्री शिवा विष्णु टेम्पल में नित्य हवन किया जाता है। हिंदू टेम्पल, मंगल मंदिर तथा भक्त आंजनेय मंदिर में नैमित्तिक यज्ञ होते हैं। इसी प्रकार वर्जीनिया स्थित दुर्गा मंदिर, राजधानी मंदिर, स्वामीनारायण मंदिर, लोटस टेम्पल आदि अनेक धार्मिक स्थलों में भी नैमित्तिक यज्ञ होते रहते हैं।   सुख चाहो तो यज्ञ करो 16 संस्कारों व पाखंडमुक्त कर्मकाण्ड के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती रचित संस्कारविधि एक अद्वितीय ग्रंथ है तथा उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष को भी उद्घाटित किया है। उन्होंने कहा कि यज्ञ मनुष्य के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपाय है। करोड़ों वर्ष तक यज्ञ का प्रचलित रहना भी उसके महत्व को सिद्ध करता है। यज्ञ के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए जिन्होंने अपनी शिखा व सूत्र देने के बदले अपने सिर कटा दिए, जिन्होंने विभिन्न षड्यंत्रों के उपरांत भी यज्ञ की परम्परा को मरने नहीं दिया, उन सभी पुण्यात्मा-द्विजों को मैं नमन करता हूँ। भारतीय संस्कृति से ईर्ष्या व विरोध रखने वालों को संतुष्ट करने के लिए या इसका विशेष लाभ लेने के लिए जब-जब यज्ञ पर अनुसंधान होंगे तब-तब हम अनेक रोचक तथ्यों से भी परिचित होते जाएँगे। पर्यावरण व स्वयं की रक्षा के लिए विश्व, यज्ञ की ओर पुन: लौटेगा तथा शतपथ ब्राह्मण व जैमिनीय ब्राह्मण द्वारा कहा- “स्वर्ग कामो यजेत्” अर्थात सुख (स्वर्ग) चाहें तो यज्ञ करें का वचन सिद्ध होगा।     (लेखक वाशिंगटन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)

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Dakhal News 3 May 2020


bhopal, Global boycott only treats China

आर. के. सिन्हा   आज पूरी दुनिया में सब तरफ उदासी और खामोशी पसरी हुई है। संसार के लगभग 175 देशों में कोरोना वायरस की जानलेवा चेन को तोड़ने के लिए लॉकडाउन चल रहा है और तब चीन में जिंदगी पटरी पर लौट रही है। चीन के शहर वुहान में जहाँ कोरोना विषाणु का जन्म हुआ, वहां दफ्तर और फैक्ट्रियों में धीरे-धीरे कामकाज अब रफ्तार पकड़ रहा है। मेट्रो रेल भी चलने लगी है। इसी शहर में कोरोना वायरस के कारण हजारों मौतें हुई थीं। वुहान ने भयंकर और सख्त लॉकडाउन देखा है। चीन के शेष भागों में तो कभी भी एकसाथ लॉकडाउन की स्थितियां नहीं रही। इसलिए अब यह शंका यकीन में बदल रही है कि चीन ने ही दुनिया को वुहान की लैब में मानव निर्मित कोरोना वायरस दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब तो खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि उनके पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि चीन की वजह से ही दुनियाभर में कोरोना वायरस ने पैर पसारे। अमेरिका-चीन के बीच की तानातनी इस हद तक तक पहुंच गई है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प साफ-साफ कह रहे हैं कि चीन ने ही कोरोना वायरस को फैलाया। वे तो यहां तक कह रहे हैं कि उनके पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं जो तस्दीक करते हैं कि चीन की वजह से दुनियाभर में कोरोना वायरस फैला है। इस वायरस को वुहान इंस्टीटयूट ऑफ बायोलॉजी की लैब में तैयार किया गया।   दरअसल विगत एक मई को एक प्रेसवार्ता के दौरान ट्रम्प से वायरस के वुहान कनेक्शन को लेकर प्रश्न पूछा गया था। तब उन्होंने चीन पर सीधे आरोप लगाए। कहना न होगा कि ट्रम्प के पास इस तरह के कोई ठोस साक्ष्य अवश्य ही होंगे जिनके आधार पर उन्होंने चीन पर कोरोना वायरस को फैलाने के आरोप लगाए। वे अकारण तो किसी भी सूरत में चीन पर इतना गंभीर आरोप नहीं लगा सकते।   एक अहम् सवाल जो राष्ट्रपति ट्रम्प ने उठाया उसका जवाब चीन दे ही नहीं सकता। ट्रम्प ने पूछा कि जब कोरोना वुहान में आया तब चीनी नववर्ष मनाने की तैयारियां धूमधाम से चल रही थीं। सभी चीनी नागरिक घूमने-फिरने के लिये वुहान से बाहर जाना चाहते थे। चीन की सरकार ने उन्हें वुहान से विदेश भी जाने की इजाजत तो दे दी पर चीन के अन्दर कहीं भी नहीं। यह पूरे विश्व में कोरोना फ़ैलाने की चीन की साजिश नहीं तो और क्या थी?   कितना निर्दयी मुल्क चीन   इसी परिप्रेक्ष्य में यह भी समझना होगा कि आखिर चीन ने कमोबेश कोरोना पर विजय कैसे पा ली, जब सारी दुनिया इसके कारण घुटनों पर आ गई है? इन सवालों के जवाब तो चीन को देने ही होंगे। चीन बेहद धूर्त और जालिम मुल्क रहा है। आप उससे किसी भी तरह के जुल्मो-सितम की उम्मीद कर सकते हैं। चीन की सरकार को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम उसके थियानमेन चौक पर किए भयावह नरसंहार के कुकृत्य को ही याद कर लें। हो सकता है कि मौजूदा पीढ़ी को मालूम न हो कि चीनी सेना ने जून, 1989 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर टैंक चला दिए थे। उस एक्शन में हजारों चीनी नौजवानों को घेरकर मार दिया गया था । चीन में ब्रिटेन के तत्कालीन एंबेसेडर एलन डोनाल्ड ने यह सार्वजानिक दावा किया था कि सैन्य कार्रवाई में कम से कम दस हजार लोग तो मारे ही गए थे। जिस चीन ने दुनिया को कोरोना वायरस के जाल में फंसा कर रख दिया है, उस देश की कम्युनिस्ट सरकार सैन्य कार्रवाई पर किसी भी तरह की चर्चा की इजाजत तक नहीं देती। अब एक बार फिर चीन का स्याह चेहरा पूरी दुनिया के सामने है।   ट्रंप के कहने से पहले ही दुनिया कहने लगी थी कि कोरोना वायरस को चीन ने दुनिया भर को दिया है। हालांकि यह अभी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि चीन कोरोना के जरिए दुनिया को बर्बादी की तरफ आखिरकार लेकर क्यों गया? पूरी दुनिया में उसका वर्चस्व तो लगभग कोरोना वायरस के फैलने से पहले ही स्थापित हो चुका था। समूचे अफ्रीका में चीन ने इतना निवेश कर दिया है कि अनेक देश अब उसके दास से बन गए हैं। भारत के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का चीन ने लगभग भट्टा बैठा दिया है। हमारी अधिकतर मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट चीन से कच्चा माल खरीदकर यहां अपनी ब्रांडिंग के साथ बेचने लगी हैं। हमारे उद्योगपतियों ने तो एक तरह से उसके समक्ष समर्पण कर दिया है।   आगाह किया था जॉर्ज फर्नांडिस ने कोरोना वायरस फैलने के बारे में जब किसी ने सोचा तक नहीं था तब समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस कहा करते थे कि हमारा पहला दुश्मन चीन है। अब तो यह सोचना पड़ता है कि हम चीन से क्या नहीं आयात करते। भारत को चीनी माल के मोह से अब बचना होगा। याद रखिए कि चीन पाकिस्तान को आगे रखकर भारत को कमजोर करने का कोई मौका कभी भी नहीं छोड़ता। हाफिज सईद जैसे आतंकवादी को जब संयुक्त राष्ट्र संघ की आतंकवादियों की सूची में डालने की बात आती है तो चीन ही इसे सफल नहीं होने देता।   चीन ने हड़पी हमारी जमीन अगर बात कोरोना से जरा हटकर करें तो भारत के साथ चीन का रुख सदैव शत्रुओं वाला ही रहा है। उसने 1962 की जंग के समय भारत की 37,244 वर्ग किलोमीटर जमीन को हड़प लिया था। आज भी हड़पा हुआ है। आज उस जंग को हुए 58 साल हो गए हैं फिर भी चीन ने भारत के अक्सईचिन पर अपना कब्जा किया हुआ है। अब सारी दुनिया की तरह भारत भी चीन के कारण कोराना वायरस के जंजाल में फंसा हुआ है। भारत में भी इसके रोगियों की तादाद बढ़ती ही जा रही है।   हालांकि चीन सगा तो किसी का भी नहीं है। कोरोना के कारण पाकिस्तान भी तो बर्बाद ही हो रहा है। वहां भी कोरोना वायरस के कारण मौतों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। अब चीन उसके साथ नहीं है। वर्ना तो हर संकट के मौके पर पाकिस्तान के हुक्मरान चीन के पास भागे-भागे चले जाते हैं। अब पाकिस्तान की भी आंखें खुल जानी चाहिए। खैर, कोरोना वायरस का इलाज करने के लिए जरूरी वैक्सीन तैयार करने के लिए सारी दुनिया में वैज्ञानिक दिन-रात कोशिशें कर रहे हैं। इस बाबत दुनियाभर में प्रयोग हो रहे हैं।   जब कोरोना ने भारत में दस्तक दी उस वक्त हम तैयार नहीं थे। न हमारे पास मास्क थे, न पीपीई किट, न टेस्टिंग की सुविधा, न ही वेंटिलेटर। यह तो मोदी जी के नेतृत्व और दृढ़-संकल्प का ही कमाल कहिये कि आज हम लगभग सभी चीजों में न केवल आत्मनिर्भर हो गये हैं, बल्कि दूसरे देशों को भी निर्यात करने में सक्षम हो गये हैं। इसलिए उम्मीद है कि कोरोना वायरस पर भारत में तो जल्दी ही विजय पा ली जाएगी। खबरें आ रही हैं कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक कोरोना की वैक्सीन अब कभी भी तैयार कर व्यापारिक उत्पादन के लिये लांच करने वाले हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का परीक्षण अपने अंतिम चरण में हैं। अगर सबकुछ ठीक रहा तो जून तक वैक्सीन आ जाएगी। एकबार कोराना पर विजय पाने के बाद दुनिया को चीन को मिलकर सबक सिखाना ही होगा। उसे उचित दंड देना होगा। दंड का अर्थ ये नहीं है कि उसके खिलाफ दुनिया जंग छेड़ दे। पर विश्व बिरादरी उससे सभी तरह के आर्थिक संबंध तोड़ ले। तब ही उसे समझ आएगा कि उसने दुनिया को कितना कष्ट दिया है। यही नहीं, जो भी देश चीन से संबंध बनाकर रखे, उनसे भी दुनिया संबंध तोड़ ले। वैश्विक बहिष्कार ही चीन का स्थायी इलाज है।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 3 May 2020


bhopal, Big gimmicks in corona

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   तालाबंदी में सरकार ने ढील दे दी है और अधर में अटके हुए मजदूरों और छात्रों की घर-वापसी के लिए रेलें चला दी हैं, इससे लोगों को काफी राहत मिलेगी लेकिन इसके साथ जुड़ी दो समस्याओं पर सरकार को अभी से रणनीति बनानी होगी। एक तो जो मजदूर अपने गांव पहुंचे हैं, उनमें से बहुत-से लौटना बिल्कुल भी नहीं चाहते। आज ऐसे दर्जनों मजदूरों के बारे में अखबार रंगे हुए हैं। उनका कहना है कि 5-6 हजार रु. महीने के लिए अब हम अपने परिवार से बिछुड़कर नहीं रह सकते। गांव में रहेंगे, चाहे कम कमाएंगे लेकिन मस्त रहेंगे। यदि यह प्रवृत्ति बड़े पैमाने पर चल पड़ी तो शहरों में चल रहे कल-कारखानों का क्या होगा ? इसके विपरीत ये 5-7 करोड़ मजदूर यदि अपने गांवों से वापस काम पर लौटना चाहेंगे तो क्या होगा? वे कैसे आएंगे, कब आएंगे और क्या तब तक उनकी नौकरियां कायम रहेंगी? या वे कारखाने भी तब तक कायम रह पाएंगे या नहीं? गांव पहुंचे हुए लोगों में यदि कोरोना फैल गया तो सरकार क्या करेगी? सरकार की जुबान घरेलू नुस्खों और भेषज-होम (हवन-धूम्र) के बारे में अभी लड़खड़ा रही है। इसमें हमारे नेताओं का ज्यादा दोष नहीं है। वे क्या करें? वे बेचारे अपने नौकरशाहों के इशारों पर नाचते हैं। नौकरशाहों की शिक्षा-दीक्षा और अनुभव अपने नेताओं से कहीं ज्यादा है। अपने नौकरशाह अंग्रेजों के बनाए हुए दिमागी गुलामी की सांचों में ढले हुए हैं। उन्होंने कोरोना से प्रभावित देश के जिलों को 'रेड', 'आरेंज' और 'ग्रीन' झोन में बांटा है। उनके दिमाग में इनके लिए हिंदी या उर्दू या अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द क्यों नहीं आए? देश के लगभग 100 करोड़ लोगों को इन शब्दों का अर्थ ही पता नहीं है। इसी प्रकार का नकलचीपन बड़े स्तरों पर भी हो रहा है। देश कोरोना के संकट में फंसा है और आप लोगों से थालियां और तालियां बजवा रहे हैं। एक तरफ राहत कार्यों के लिए आप लोगों से दान मांग रहे हैं और दूसरी तरफ फौजी नौटंकियां में करोड़ों रु. बर्बाद करने पर उतारु हैं। चारों फौजी सेनापति पत्रकार-परिषद करेंगे, यह मुनादी टीवी चैनलों पर सुनकर मैंने सोचा कि सरकार शायद कोरोना-युद्ध में हमारी फौज को भी सक्रिय करने की बड़ी घोषणा करेगी लेकिन खोदा पहाड़ तो निकली चुहिया। हमारी फौज अब कश्मीर से कन्याकुमारी और कटक से भुज तक फूल बरसाएगी, उड़ानें भरेगी और विराट नौटंकी रचाएगी, कोरोना-योद्धाओं के सम्मान में। इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? क्या फौज का यही काम है? यह हमारे नेता इसलिए करवा रहे हैं क्योंकि बिल्कुल यही काम डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में करवा रहे हैं।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैंं।)

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Dakhal News 3 May 2020


bhopal, Corona

डॉ. वेदप्रताप वैदिक केंद्र सरकार ने यह बुद्धिमानी का काम किया कि दूसरी तालाबंदी खुलने के पहले करोड़ों मजदूरों, पर्यटकों, छात्रों और यात्रियों की घर वापसी की घोषणा कर दी। यदि यह घोषणा अभी तीन-चार दिन पहले नहीं होती तो इसके परिणाम अत्यंत भयंकर हो सकते थे। चार मई की सुबह ही लाखों मजदूर और छात्र सड़कों पर उतर आते और बगावत का झंडा गाड़ देते। इस तीन-चार दिन की यात्रा की सुविधा देने की बात मैं तालाबंदी के पहले दिन से ही कह रहा हूं। अब करोड़ों लोग अपने घर वापस जाएंगे। उनकी यात्रा और जांच आदि की अपनी समस्याएं होंगी, जिनका हल राज्य सरकारें निकाल लेंगी लेकिन उससे भी बड़ी समस्या पर मेरा ध्यान जा रहा है। वह है, इन करोड़ों लोगों को कोरोना से कैसे बचाना? यदि घर पहुंचकर इनमें कोरोना के लक्षण दिखाई पड़े तो क्या होगा? जाहिर है कि अभीतक सरकार के पास कोई पक्का टीका, गोली या घोल नहीं है, जो कोरोना का इलाज कर सके। तो क्या किया जाए? शारीरिक दूरी, हाथ धोते रहना, घर में टिके रहना आदि निर्देश तो लोग पालन कर ही रहे हैं लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि हमारी केंद्र सरकार जीवाणु और विषाणु की रोकथाम के परखे हुए पारंपरिक नुस्खों का प्रचार करने से क्यों घबरा रही है? इन नुस्खों को गांव के लोग भी बड़े आराम से प्रयोग कर सकते हैं। सुश्रुत संहिता में रोग (संक्रमण) फैलने के आठ तरीके बताए गए हैं। पिछले ढाई हजार साल से इन संक्रामक तरीकों को काबू करने के नुस्खे हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित हैं। इसका पहला नुस्खा तो यह है कि भेषज-धूपन करें। हवन करें। हवन-सामग्री में गुग्गलु, अगर, वचा, नीम के पत्ते, विंडग, सरसों, गिलोय, दालचीनी, सौंठ, कुटकी, लौंग, काली मिर्च, चिरायता, नागरमोथा, राल आदि जोड़ लें। इनके धुंआ से जयपुर के स्वामी कृष्णानंद ने बहुत सफल प्रयोग किए हैं। इनके प्रयोगों को 'इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च' ने भी मान्यता दी है। औषधियों का यह हवन हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी कर सकते हैं। आहुति डालते समय मंत्र पढ़ना जरूरी नहीं है। आप चाहें तो कुरान की आयत और बाइबिल व जिन्दावस्ता के पद भी पढ़ सकते हैं। आयुष मंत्रालय के पूर्व सलाहकार प्रसिद्ध वैद्य डाॅ. सुरेंद्र शर्मा ने 1994 में इन्हीं औषधियों के काढ़े और हवन-सामग्री सूरत के प्लेग के वक्त बंटवाने में बड़ी पहल की थी। औषधियों का धुंआ रोगी को तो संक्रमण से मुक्त करता ही है, सारे वातावरण को भी प्रदूषण-मुक्त करता है। इसी प्रकार उक्त औषधियों का क्वाथ (काढ़ा) भी रोगी को जल्दी ही लाभ पहुंचाता है। देशभर में लगभग 5-6 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। इनकी घर-वापसी के बाद यदि इन्हें कुछ हो गया तो इनको सरकारी डाॅक्टर और अस्पताल कैसे संभालेंगे? यदि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें मप्र सरकार की तरह इनके घर पहुंचने से पहले ही इन्हें भेषज-चूर्ण के पूड़े पकड़ा दें तो एक बड़े संकट की आशंका से हम मुक्त हो सकेंगे।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, Workers battling, stomach , period of corona infection

मजदूर दिवस 01 मई पर विशेष   मुरली मनोहर श्रीवास्तव   मजदूर और उनके दर्द को समझ पाना हर किसी के वश की बात नहीं। कोरोना वायरस फैलने के बाद देश और दुनिया में मजदूरों के समक्ष भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो गई है। अपनी मेहनत के बूते अपनों का पेट भरने वाला मजदूर आज खुद ही अपना पेट पालने के लिए सरकार पर आश्रित है। इनके जीवन की नाव बीच मंझधार में फंस गई है। भले ही इनके लिए इंतजाम करने के दावे किए जाते हों मगर उन दरों-दीवार की दहलीज के अंदर का पुरसाहाल किसे पता जहां एक रोटी में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। मां का कलेजा उस वक्त दर्द से फट जाता है जब उसके मासूम को दूध तक नसीब नहीं हो पाता है। पर, करे भी तो क्या उसकी तकदीर में शायद यही लिखा है, इसे अपना नसीब मानकर जिंदगी के बचे दिन खुद और अपने परिवार वालों को जिंदा रखने की जद्दोजहद में काट रहे हैं।   गए थे अपने परिवार के गुजर-बसर के लिए परदेस कमाने मगर उन्हें क्या पता था कि चीन की गलती का खामियाजा उन्हें अपने देश में भुखमरी के रूप में भुगतना पड़ेगा। मगर ऐसा ही हुआ, सबकुछ बदल गया, देशवासियों को बचाने के लिए सरकार ने फैसला लिया लॉकडाउन का और देश का नजारा बदल गया। बंद हो गई फैक्ट्रियां, बंद हो गई दुकानें, बंद हो गई मजदूरी, फिर क्या दो-चार दिन तो किसी तरह कट गए मगर उसके बाद रोज कमाने खाने वालों के सामने बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। परदेस में अपने घर की तरफ जाने का कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही हजार किमी चल पड़े। कई राहों में जिंदगी को आखिरी सलाम कर गए तो बहुत बड़े पैमाने पर लोग अपने घऱों तक सही सलामत पैदल ही पहुंच गए।   कल तक इन मजदूरों की कोई कीमत नहीं थी। लेकिन आज जब खेतों में अनाज सड़ने लगे, दुनिया का बोझ उठाने की जरूरत पड़ी तो इनकी अहमियत सभी को समझ आने लगी। जो पैसे के लिए हाय-हाय किए रहते थे, वो आज खुद को भी हाशिए पर पा रहे हैं। कहते हैं कि जिंदगी रहेगी तभी तो यह पैसा काम आएगा। काश! वक्त रहते इसको समझ पाते लोग लेकिन इसको कहां तक लोग समझ पाएंगे, कब समझ पाएंगे यह तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद जिंदगी के सलामती के बाद ही पता चल पाएगा। भारतीय शहरों में हमेशा से बाहरी मजदूर रहे हैं। मजदूर शहरों की कई जरूरतों को पूरा करने के लिए रहते हैं। मजदूर कितनी बुरी परिस्थितियों में प्रमुख शहरों में रहते हैं इसका हाल सभी जानते हैं मगर कोई इनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। इनके उत्थान के लिए सरकारें वादा तो करती हैं मगर इन तक कितनी सुविधाएं पहुंचती हैं ये किसी से छुपी नहीं है।   1 मई, 1886 को मजदूरों के सम्मान में एक दिन की छुट्टी का ऐलान हुआ, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसको अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस, श्रम दिवस या मई दिवस भी कहते हैं। इस दिवस को मनाने के पीछे उन मजदूर यूनियनों की हड़ताल है जो कि आठ घंटे से ज्यादा काम न कराने के लिए की गई थी। मजदूर हमारे समाज का वह हिस्सा है जिसपर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी है। वर्तमान समय के मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं हुई है।   श्रम बेचकर मजदूर अपनी न्यूनतम मजदूरी कमाता है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ को बढ़ावा देने के लिये मजदूर दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा। पारंपरिक तौर पर इसको यूरोप में गर्मी के अवकाश के रूप में घोषित किया गया था, इसीलिए पूरे विश्व में 1 मई को “अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस” मनाया जाता है। वैसे तो इस मौके पर दुनिया के 80 देशों में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। इस दिवस का मूल उद्देश्य "सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए श्रमिकों को एकजुट करना" है।   आठ घंटे के कार्यदिवस की जरूरत को बढ़ावा देने के अलावा मजदूरों और मालिकों के बीच संघर्ष को खत्म करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। पहले मजदूरों के काम करने की स्थिति बहुत कष्टदायक और असुरक्षित थी। 10 से 16 घंटों तक काम करना पड़ता था। अमेरिकन संघ के द्वारा 1884 में श़िकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के लिये काम के लिए वैधानिक समय के रूप में आठ घंटे निर्धारित किया गया। हालांकि भारत में 1 मई 1923 को श्रमिकों द्वारा “मद्रास दिवस” मनाया गया था। किसान मज़दूर पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने इसकी शुरुआत की थी और मद्रास हाईकोर्ट के सामने इस दिन को पूरे भारत में “मजदूर दिवस” के रूप में मनाने का संकल्प लिया और छुट्टी का ऐलान किया था।   कोरोना संक्रमण से जंग जीतने के बाद लॉकडाउन खुलेगा। उसके बाद की दुनिया बदलेगी, लोगों का जीवन फिर से पटरी पर लौटेगा। इस विषम परिस्थिति में सभी अपने तरीके से दर्द बांटने की कोशिश कर रहे हैं। मगर सोचने और विचारने का विषय यह है कि क्या इस भयावह दौर के गुजर जाने के बाद मजदूरों की जिंदगी बदलेगी? क्या इनकी उम्मीदों पर दुनिया खरी उतरेगी? या फिर इनके जीवन में मजदूरी का वही दर्द पिरोया मिलेगा। यह तो वक्त गुजरने के साथ खुद ही पता चल जाएगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, Corona period became troublesome

वीरेन्द्र सेंगर   कोरोना काल का लॉकडाउन अभी जारी है। यूं तो इसकी अवधि अगले चार दिनों बाद पूरी होने वाली है लेकिन कोरोना के खतरे को देखते हुए बंदिशें बनी रहेंगी। केंद्र ने राज्य सरकारों पर ही जिम्मेदारी डाल दी है कि वे ही सलाह दें और तय करें। यही कि लॉकडाउन में कहां और कितनी छूट देनी है? जाहिर है इसके बाद राज्यों की, विशेष तौर पर गैर भाजपा सरकार वाले राज्यों की यह शिकायत खत्म हो जाएगी कि बार-बार लॉकडाउन का फैसला केंद्र से थोप दिया जाता है। इसी के साथ इन राज्यों की जिम्मेदारी और बढ़ जाएगी। कोरोना के प्रकोप का खतरा कहीं से कम नहीं हुआ। मार्च में पीएम ने लॉकडाउन का ऐलान किया था। केवल चार घंटे का समय दिया गया था। वही नोटबंदी के स्टाइल में।   लंबे लॉकडाउन से करीब पंद्रह करोड़ अति गरीब आबादी भुखमरी की स्थिति में पहुंची है। लाखों प्रवासी मजदूर जगह-जगह फंसे हैं। ये अपने गांव लौटना चाहते थे लेकिन इजाजत नहीं मिली। हजारों की संख्या में मजदूर परिवारों के साथ सैकड़ों मील दूर पैदल निकले। कुछ किसी तरह पंहुचने मेंं सफल भी रहे लेकिन कई बीच में ही चल बसे। कोई भूख से तड़पता रहा तो किसी की जान थकावट और प्यास ने ले ली। बारह साल की एक बच्ची पांच सौ किलोमीटर का रास्ता परिवार के साथ चल चुकी थी। बिहार के अपने गांव पहुंचने की मजबूरी थी। उसके मजदूर पिता बेटी को झूठ दिलासा देते रहे कि जल्दी गांव आने वाला है जबकि गांव तो दो सौ किलोमीटर दूर था। आखिर बच्ची के कदम लड़खड़ा गये। वह गिरी तो फिर न खड़ी हो पायी। यह दारुण कथा सोशल मीडिया के जरिये सामने आयी थी। फोटो भी थी। यह जानकर बहुत पीड़ा हुई। ऐसी तमाम खौफनाक दर्द भरी कहानियां लगातार आ रही हैं। कोरोना काल बहुत तकलीफदेह बन चुका है।   ठेठ सच्चाई यह है कि इसी तरह का लॉकडाउन एक पखवाड़ा और चल गया तो कुछ राज्यों में हालात बेकाबू हो सकते हैं। क्योंकि भुखमरी में गरीबों को ज्यादा मजबूर नहीं किया जा सकता। सरकारों ने गरीबों की कुछ मदद की है लेकिन करोड़ों लोग इससे वंचित रहे हैं। ये भी कड़वी सच्चाई है। सरकारी मदद इतनी नहीं है कि पूरा परिवार इतने लंबे तक पेट भर सके। स्थिति विकट है। मोदी जी ने जान बचाने के साथ जहान बचाने की भी बात की थी।उनकी चिंता वाजिब है लेकिन चुनौती यह है कि इसकी शुरूआत कैसे हो? राज्य सरकारें केंद्र से आर्थिक पैकेज की गुहार कर रही हैं। केंद्र पर बकाया देय को देने की भी गुहार है। शुरुआती दौर में 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये की मदद का एलान हुआ था। उम्मीद की जा रही थी कि केंद्र और बड़े पैकेज का ऐलान करेगा। एक महीना हो गया। केंद्र ने चुप्पी साध ली है। जो पैकेज दिया गया है वो जीडीपी के एक प्रतिशत से भी कम का है। जबकि कोरोना महामारी से लड़ने वाले विकसित मुल्क जीडीपी का आठ से दस प्रतिशत का पैकेज दे चुके हैं।   कोरोना जैसी महामारी सदियों में आती है। इसी दौर में तय होता है कि देश की सरकार का चेहरा कितना मानवीय है? ऐसे आफतकाल में भी हमारे यहां सांप्रदायिक राजनीति के हथकंडे आजमाए जा रहे हैं। समाज में धर्म के नाम पर जहर फैलाया गया। पीएम को भी इस खतरे का भान है। इसीलिए उनका बयान आया कि कोरोना रंग, धर्म, भाषा किसी का भेद नहीं करता। सब मिलकर महामारी का मुकाबला करें।   ये एकतरफा मामला नहीं है। दूसरे छोर पर भी कठमुल्ला कम नहीं हैं। कोरोना के मामले में जमातियों की कारगुजारी आपराधिक रही है। गैरवैज्ञानिक सोच को धर्म के ठेकेदार बढ़ाते हैं। इसी सोच के चलते जमातियों ने शर्मनाक लापरवाही की। इससे दूसरे छोर के पाखंडियों को पूरी कौम को बदनाम करने का मौका मिला। हमने साबित कर दिया है कि संकट कितना ही गहरा हो, हम अपनी संकीर्णता की जंजीरों से बाहर नहीं आते। इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है?   मुझे लगता है कि मोदीजी के पास ऐतिहासिक मौका है कि वे वाकई में सबका विकास और सबका विश्वास के अपने ही नारे को जमीन पर उतारें। ये हो सकता है। आज तो ये केवल आप ही ये करने की स्थिति में है। इतिहास सत्ता की अवधि से तय नहीं होता। कुछ अलग अच्छा करने से होता है। सत्ता है तो जाएगी भी। जीवन का सत्य यही है। विषयांतर हो रहा है।   अपनी मूल बात पर लौटता हूं। जब लॉकडाउन किया था, तब कोरोना पाजटिव की संख्या करीब पांच सौ थी, लॉकडाउन के बाद अब मरीजों की संख्या 32 हजार के ऊपर चली गयी है। मरने वालों की तादाद एक हजार के ऊपर पहुंच गयी है। जहान बचाना है तो काम-धंधे भी शुरू करने होंगे। कोई नहीं जानता कि इसके परिणाम क्या होंगे? ये घोर संक्रमण काल है। ऐसे में सलाह करके केंद्र ही फैसलों की धुरी मेंं रहे। राज्य अपने बल पर सारी जिम्मेदारी संभालने की स्थिति में नहीं हैं। कहीं खींचतान में लॉकडाउन की तमाम तपस्या भंग न हो जाए! इसपर भी सावधान रहने का समय है। यह सही है कि यूरोप और अमेरिका के मुकाबले हमारी स्थिति बहुत बेहतर है। लेकिन यह समय खुद की पीठ ठोंकने का नहीं है।   इस समय जरूरत है कि सावधानी के साथ लॉकडाउन में छूट की व्यवस्था हो। लेकिन ध्यान रहे कि गरीब की रोटी का इंतजाम राज को करना ही होगा।इसकी और अनदेखी दुखद नतीजे ही देगी? पीर पर्वत-सी हुई कोई राह तो निकलनी ही चाहिए! केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इजाजत दे दी है कि राज्य अपने प्रवासी मजदूरों को बसों से ला सकते हैं। यह मुश्किल काम है। यह तो पहले ही हो जाना चाहिए था। चलिए देर से ही अच्छी पहल हुई लेकिन गांव में इनके खाने का मुफ्त इंतजाम करना होगा। इन्हें नये सिरे से रोजगार दिलाना आगे की महा चुनौती होगी। ये कोरोना काल देश और सरकार की तमाम अग्नि परीक्षाएंं एक साथ लेने आ धमका है क्या!     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, The reality of village swaraj in Modi

प्रभुनाथ शुक्ल   ग्राम स्वराज की संकल्पना आधुनिक भारत में आज भी एक सपना है। गांवों में ढांचागत विकास को लेकर सराकरों को नीतियां रही हैं लेकिन इसे आजादी के सालों बाद भी धरातलीय स्वरूप नहीं मिल पाया। मनरेगा जैसी आधारभूत योजनाएं भी बहुत करने के बाद भी कुछ नहीं कर पायीं। ग्रामीण विकास को जो गति मिलनी चाहिए थी वह एक सोच बनकर रह गई। किसानों के हालात नहीं बदले। गांव से शहरों की तरफ पलायन नहीं थमा। गांवों में बेहतर चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिल पायीं। किसानों को उनके फसलों का उचित मूल्य नहीं मिला पाया। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता ही सही ग्रामीण जीवन और विकास में आमूलचूल परिवर्तन दिखने लगा है। उज्ज्वला, किसान पेंशन और प्रधानमंत्री आवास योजनाओं ने गांवों की दशा और दिशा बदलने का काम किया है। महात्मा गांधी ने भी स्वराज और सुशासन के जरिए गांवों को आत्मनिर्भर एवं समृद्धशाली बनाने का सपना देखा था। निश्चित रूप से गांवों को आत्मनिर्भर बनाने से आर्थिक संपन्नता आएगी। देश के विकास में गांव अहम कड़ी होंगे।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत राज दिवस पर गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का जो संकल्प लिया है यह अपने आप में बड़ा संदेश है। बदलते दौर में यह वक्त की मांग है। अगर हम गांवों में स्वरोजगार जैसी सुविधा उपलब्ध कराते हैं तो गांवों से पलायन थम जाएगा। रोजगार की सुविधाएं गांवों में उपलब्ध हो जाएंगी। फिर पलायन और प्रवासी मजदूरों जैसी समस्याएं हमारे सामने नहीं आएंगी। कोराना संक्रमण ने हमारे सामने भूतो न भविष्यति वाली कई चुनौतियां पैदा की हैं। उन समस्याओं से हमें सबक लेना होगा। महानगरों से प्रवासी मजदूरों का पलायन बड़े सवाल के रूप में उभरा है। भूख और प्यास से कई मौंतों ने हमें चौंकाया और डराया है। यह वह जमीनी सच्चाई है जिससे हमें मुंह मोड़ने के बजाय लड़ना होगा। इसलिए सरकार को बड़ा नियोजन करना पड़ेगा। सिर्फ डिजीटिलीकरण के जरिए हम पंचायतों में फैले भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा सकते हैं। क्योंकि पंचायतों में आर्थिक घपलेबाजी रोकने के लिए अबतक के सारे तकनीकी विकास अनुपयोगी साबित हुए हैं। इसलिए सरकार को एक बड़ी रणनीति के साथ उतरना होगा।   प्रधानमंत्री मोदी की ई-गांव संकल्पना एक बड़ी उम्मीद है। इस तकनीकी विकास से हम निश्चित रूप से पंचायतों में आर्थिक घपलेबाजी पर विराम लगा दूसरी समस्याओं से निपट सकते हैं। हालांकि देश में ऐसे हजारों पंचायत मुखिया हैं जिनकी अच्छी सोच और कार्य की बदौलत ग्रामीण विकास से लंबा सफर तय किया है। तमाम पंचायत प्रमुखों ने उम्मीद की नई किरण पैदा की है। लेकिन यह सफलता के लिए एक उम्मीद है परिणाम नहीं। ई-गांव की संकल्पना गांव के विकास में एक क्रांति लेकर आएगी। ई-ग्राम स्वराज ऐप से स्थितियों में बदलाव आएगा। लोगों में जागरुकता का प्रभाव बढ़ेगा। ई-प्लेटफॉर्म पर सारी योजनाएं खुले रूप से मौजूद होंगी। इस डिजिटिल प्लेटफॉर्म पर गांव का कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी थोड़ी जानकारी हासिल कर गांव के विकास और आर्थिक उपयोग संबंधी जानकारी हासिल कर सकता है। सबसे बड़ी बात है कि डोनमैपिंग की वजह से गांव की एक-एक संपत्ति का रिकॉर्ड मौजूद होगा। देश में अभी ऐसी कई ग्राम पंचायतें हैं जहां राजस्व रिकॉर्ड में जमीनें खाली दिखाई पड़ती हैं लेकिन वहां सैकड़ों साल से बस्तियां आबाद हैं। चारागाहों और खेत-खलिहान के साथ खेल के मैदान अतिक्रमित हैं। तालाबों पर दबंग लोगों ने अपना एकाधिकार बना लिया है। गांव की कई-कई एकड़ जमीन पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा है जबकि आम गरीब के पास इंच भर जमीन उपलब्ध नहीं है।   प्रधानमंत्री मोदी ने गांवों के डिजिटलीकरण की जो आधारशिला रखी है वह भविष्य में मील का पत्थर साबित होगी। आधुनिक भारत में यह दौर संचार क्रांति है। 31 लाख पंचायतों में निश्चित रूप से 80 फीसदी आबादी के पास आधुनिक स्मार्टफोन की सुविधा उपलब्ध है। सवा लाख गांवों तक ब्रांडबैंक की सुविधा उपलब्ध है। तीन लाख गांवों में कॉमन सुविधा केंद्र संचालित हैं। गांव वालों को संपत्ति का स्वामित्व प्रमाणपत्र मिलने से सारे फसाद खत्म हो जाएंगे। लोगों में संपत्ति को लेकर जो डर है वह समाप्त होगा। हर व्यक्ति के पास उसकी संपत्ति का स्वामित्व होगा। गांव की एक-एक इंच जमीन का रिकॉर्ड होगा। ई-गांव होने से पारदर्शीता बढ़ेगी। बैंकों से आसानी से किसान और आम आदमी कर्ज ले सकता है। उस कर्ज का उपयोग उन्नतिशील खेती में कर सकते हैं। अच्छे अनाज, फल, सब्जी का उत्पादन कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। पशुपालन, डेयरी और दूसरी उद्योग लगा सकते हैं। जिसकी वजह से उनके जीवन में बदलाव आ सकता है।   प्रधानमंत्री ने गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की बड़ी बात कही है। निश्चित रूप से कोरोना संकट में देश और समाज के सामने कई चुनौतियां पैदा की है। उससे प्रेरणा लेकर हम भविष्य के संकट को दूर कर सकते हैं। समस्याएं हमें चुनौती के साथ समाधान भी देती हैं। समय से अगर हम सीख नहीं लेते तो यह हमारी बड़ी मूर्खता होगी। निश्चत रूप से प्रधानमंत्री ने पंचायत राज दिवास पर बड़ी बात कहा है। हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। गांव का जब एक-एक परिवार आत्मनिर्भर बनेगा तो उससे गांव मजबूत होगा। गांव से जिला आत्मनिर्भर होगा। फिर राज्य और देश आगे बढ़ेगा। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता का बड़ा मंत्र दिया है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना होगा। कोरोना की चुनौतियों को हमें समझना होगा।   प्रधानमंत्री ने कश्मीर के पंचायत प्रमुख मोहम्मद इकबाल से बात कर उनसे सारी जानकारी हासिल की। इकबाल बारामूला के बारवां गांव के मुखिया हैं। इसके अलावा यूपी के बस्ती, महाराष्ट्र के करवाड़ी गांव की मुखिया प्रियंका से बातचीत की। कर्नाटक समेत दूसरे राज्यों के पंचायतों से बात कर विकास योजनाओं के बारे में जानकारी ली। देश भर में कोरोना से निपटने के लिए पंचायतों की भूमिका क्या है, इसके बारे में भी गांव की व्यवस्था से रूबरू हुए। पंचायतराज दिवस पर ई-गांव की संकल्पना वास्तव में ग्रामीण विकास में दूरगामी प्रभाव लाएगी। पूरे देशवासियों के साथ मिलकर हमें गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का सामुदायिक प्रयास करना चाहिए। फिर आइए हमसब मिलकर इस संकल्प को मूर्त रूप दें और ग्रामीण विकास के साथ राष्ट्रीय विकास में अपनी भूमिका निभाएं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal,Why are the friendly bureaucrats,Muslims silent, killing of sadhus

आर.के. सिन्हा अब लग रहा है कि तब्लीगी जमात की मानवता और देश विरोधी हरकतों पर काबू पाने के लिए विभिन्न राज्यों की पुलिस ने जिस तत्परता से कार्रवाई की वह गलत थी। उन्हें तो उन्हीं के आकाओं की नसीहत के अनुरूप मस्जिदों और तंग गलियों में मरने और दूसरों को मारने के लिए छोड़ देना उचित था। सरकारी कार्रवाई की प्रशंसा करने के बजाय देश के गुजरे जमाने के 101 पूर्व आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों ने परोक्ष रूप से मीनमेख निकाल कर सरकार की आलोचना शुरू कर दी है। अब ये खुलकर कहने लगे हैं कि तब्लीगी जमात पर एक्शन लेने के बाद देश में मुसलमानों के खिलाफ वातावरण विषाक्त हुआ है। दरअसल मोटी पेंशन पा रहे इन पूर्व अफसरों ने देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उप राज्यपालों को पत्र लिखकर कहा है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव के मामले बढ़े हैं। तो जरा इनसे कोई पूछे कि कानून का उल्लंघन करने वाले क्या तब्लीगी जमात पर एक्शन नहीं लिया जाना चाहिए था? क्या तब्लीगी जमात का मुखिया मौलाना मोहम्मद साद दिल्ली के निजामउद्दीन इलाके में अपने हजारों चेलों के साथ कोरोना महामारी फैलने के बाद सरकारी आदेशों की अनदेखी कर कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुये सम्मेलन करके सही कर रहा था? इन नौकरशाहों को महामारी कानून के उल्लंघन में क्या सलूक किया जाना चाहिये, यह पता नहीं है क्या ? लानत है ऐसे नासमझ नौकरशाहों पर। जिन अफसरों के पत्र में हस्ताक्षर हैं उनमें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष वजाहत हबीबउल्ला, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, मोदी सरकार की निंदा करने का कोई भी मौका नहीं गंवाने वाले हर्ष मंदर, महाराष्ट्र और पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक जूलियस रिबेरो, पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, पुरस्कार वापसी गैंग के प्रमुख सदस्य डॉ. अशोक वाजपेयी, अमिताभ पांडे और प्रसार भारती के पूर्व चेयरमैन और मार्क्सिस्ट विचारों पर प्रसार भारती को ले जाने के लिए कुख्यात जवाहर सरकार शामिल हैं। पर जरा गौर करें कि इन बाबुओं ने अपनी चिंता रखते हुए साद की इस बात के लिए तनिक भी आलोचना नहीं की कि वह तब्लीगियों को सरकार से सहयोग नहीं करते हुए मस्जिद में मरने की प्रेरणा देकर अब भी फरार है। क्यों? क्या उसे अपने को पुलिस के सामने तत्काल आत्मसमर्पण नहीं कर देना चाहिए ? क्या वह लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर बहुत महान कार्य कर रहा था? क्या शिखर पर मौज कर चुके सरकारी बाबू रहे इन महानुभावों को पता नहीं है कि साद और उनके चेलों की हरकतों के कारण ही देश में कोरोना वायरस ने अपने पैर फैलाए? क्या उन्हें पता नहीं है कि देश में कोरोना संक्रमित लोगों में एक तिहाई तब्लीगी ही हैं? क्या ये सब इस तथ्य से भी अनभिज्ञ हैं कि तब्लीगी जमात के दर्जनों सदस्य मरकज में ही कोरोना वायरस से संक्रमित थे और साद के गुमराह करने के कारण ही वे संसार से कूच कर गए। इसकी चिंता क्यों नहीं की बाबुओं ने? आज जब देश में हजारों-लाखों सरकारी डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी, सुरक्षाकर्मी, बैंकों के मुलाजिम, बिजली-जल विभागों के कर्मी वगैरह दिन-रात अपनी जान हथेली पर रखकर अपने बाल-बच्चों, पत्नी, माता-पिता की चिंता किये बिना कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं, तब उनके पूर्ववर्ती कुछ पूर्वाग्रह से ग्रसित ये चंद पेंशन भोगी रिटायर्ड अफसर कहने से बाज नहीं आ रहे हैं कि देश के मुसलमानों के साथ कोरोना काल में भेदभाव हो रहा है। इन्होंने अपने जूनियर साथियों की कठिन हालातों में दिन-रात सेवा करने के जज्बे की कभी प्रशंसा तक नहीं की। इन्होंने अपने पत्र में पीतल नगरी मुरादाबाद और मध्य प्रदेश के इंदौर, बिहार के मोतिहारी और औरंगाबाद की उन शर्मनाक घटनाओं का क्यों नहीं उल्लेख किया जहां कुछ मुसलमानों ने मेडिकल और पुलिस टीम पर पथराव किए थे? मेडिकल टीम ने यह खता की थी कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज के लिए ही उनके घरों में गई थी। उनका स्वागत करने की बजाय उनपर पथराव किया गया। पथराव करने वालों में औरतें भी थीं। उस भयानक घटना में बुरी तरफ से घायल डाक्टरों के खून से लथपथ चेहरे को सारे देश ने देखा था। पर लगता है कि उस दिल दहलाने वाली तस्वीर को मुख्यमंत्रियों और उप राज्यपालों को पत्र लिखने वालों ने न देखा हो। वैसे इन शातिर लोगों का उद्देश्य सिर्फ इतना भर है कि किस तरह मोदी सरकार को मुसलमान विरोधी साबित किया जाय। उन्होंने उस तस्वीर को इसलिए देखने से परहेज किया होगा क्योंकि ये एक खास एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं। जिस समूह में हर्ष मंदर जैसा इंसान होगा तो सबको समझ आ ही जाएगा कि कुछ ऊँचा खेल खेला जा रहा है। ये मंदर साहब शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कह रहे थे "हमें सुप्रीम कोर्ट या संसद से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है। हमें अब सड़क पर उतरना होगा।" मंदर के जहरीले भाषण को सैकड़ों लोगों ने सुना था। टीवी चैनलों ने प्रसारित भी किया था। जब उन्हें न तो संसद पर भरोसा रहा है और न ही सुप्रीम कोर्ट पर कोई भरोसा रहा है तो वे मुख्यमंत्रियों को पत्र ही क्यों लिख रहे हैं। क्या उन्हें भारत की न्याय व्यवस्था और सरकार पर अब भरोसा पैदा हो गया है? अब अशोक वाजपेयी की भी बात कर लें। वे पुरस्कार वापसी गैंग के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। उनसे कुछ सवाल पूछने का मना कर रहा है। क्या उनकी लेखनी से कोई आम पाठक भी वाकिफ है? कतई नहीं। और यही इनकी सबसे बड़ी असफलता है। ये और इनके जैसे तमाम कथित लेखक और कवि एक भी रचना दे पाने में असफल रहे हैं, जो जन-मानस को इनसे जोड़ सके। अब अशोक वाजपेयी जी इस बात से दुबले हो रहे हैं कि देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है। साधुओं की हत्या पर चुप रहने वाले ये सब महाराष्ट्र में साधुओं की नृशंस हत्या से तो कतई मर्माहत नहीं हुए। इन्होंने तब महाराष्ट्र सरकार से कोई सवाल नहीं पूछा। सवाल जूलियस रिबेरो ने भी नहीं पूछा। आखिर उन्हीं के राज्य में दो साधुओं को भीड़ पीट-पीटकर कर नृशंसतापूर्वक मार देती है। पर मजाल है कि रिबेरो या कोई अन्य अफसर बोला भी हो। अपने को मानवाधिकारवादी कहने वाले हर्ष मंदर की भी जुबान सिली रही। वे भी साधुओं के कत्ल पर एक शब्द नहीं बोले। अमिताभ पांडे या जवाहर सरकार के संबंध में टिप्पणी करने का कोई मतलब ही नहीं है। ये अपनी फेसबुक वॉल पर मोदी सरकार की बार-बार निंदा करते ही रहते हैं। यहां सवाल निंदा या प्रशंसा का नहीं है। सवाल तो ये है कि क्या आप सच के साथ खड़े हैं? क्या आप देश के साथ खड़े हैं? अगर ये बात होती तो इन बाबुओं के पत्र पर किसी को एतराज क्यों होता। इनके पत्र पर एतराज का कारण यही है कि ये सरकार को तब भी बदनाम करने की चेष्टा कर रहे हैं जब पूरी दुनिया वैश्विक महामारी से लड़ रही है। संकट गहरा रहा है। अभीतक कोरोना वायरस से लड़ाई जीतने की कोई उम्मीद भी सामने नहीं आ रही है। सारी दुनिया में कोरोना के कारण मौतें थमने का नाम ही नहीं ले रही हैं। यदि उपर्युक्त सरकारी बाबुओं को सरकार के कदमों और फैसलों से इतनी ही शिकायत है तो ये सरकारी पेंशन विरोध में लेना छोड़ क्यों नहीं देते। इस तरह का कोई भी कदम उठाकर ये एक उदाहरण पेश करेंगे और अपनी धूल में मिली हुई साख को कुछ हदतक बचा भी लेंगे। सरकार को भी चाहिए कि महामारी में भ्रामक प्रचार करने के लिए और राष्ट्रद्रोही हरकत के लिये इनपर सख्त कानूनी कारवाई की जाय। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Implications of Union chief

डॉ. अजय खेमरिया   मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष जब कोरोना संकट पर तुष्टीकरण के सुगठित प्रलाप में लगी है तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहनराव भागवत ने 135 करोड़ भारतीयों को एकजुटता और सद्भाव का सन्देश देकर वन्दनीय कार्य किया है। संघ मुख्यालय नागपुर से प्रसारित अपने ऑनलाइन सन्देश में डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि इस भारत भूमि पर रहने वाले सभी नागरिक माँ भारती के सहोदर हैं। उन्होंने संघ के सभी स्वयंसेवकों से कहा है कि वे पीड़ित मानवता की सेवा का ध्येय हृदय में धारण करते हुए काम करें। कथित तौर पर इस्लामोफोबिया का प्रायोजित वातावरण बनाने वाले लोगों को आईना दिखाते हुए सरसंघचालक ने दो टूक सन्देश दिया कि कुछ लोग समाज को भय और क्रोध के दलदल में धकेलने की सुनियोजित कोशिश कर रहे हैं लेकिन हमें इन साजिशों से सजग और सावधान रहकर इस संकट पर विजय पानी है। उन्होंने जो महत्वपूर्ण बात कही वह यह कि किसी सम्प्रदाय विशेष के कुछ लोगों की नापाक हरकतों को हम सम्पूर्ण वर्ग पर लागू नहीं कर सकते हैं। डॉ. भागवत का इशारा तब्लीगी जमात की ओर ही था इसीलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि 130 करोड़ लोग हमारे बन्धु हैं और स्वयंसेवक पीड़ित की मदद करते समय केवल पीड़ा देखें। यह बहुत ही महत्वपूर्ण सन्देश है संघ प्रमुख का, जिसे अल्पसंख्यकवाद की सियासत करने वाले राजनीतिक और एकेडेमिक्स शायद पचा नहीं पायेंगे।   संघ की मैदानी गतिविधियों को स्थगित किये जाने का तार्किक पक्ष रखते हुए संघ प्रमुख ने एक और महत्वपूर्ण सन्देश यह दिया है कि कवारन्टीन कोई प्रतिबंध नहीं है इसलिए समाज के हर व्यक्ति, संस्था को इसका उदारमना होकर निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिये। इस मुद्दे पर भड़कने और क़ानून तोड़ने के किसी भी औचित्य को उन्होंने करीने से खारिज किया है। सेवा प्रकल्पों को लेकर भी उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि 130 करोड़ लोगों के मध्य हम अहंकार मुक्त होकर सेवा कार्य करें। खुद के यशोगान या कीर्ति की अपेक्षा से दूर रहने की उनकी नसीहत बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि कोरोना संकट में लोगों की सहायता को उन्होंने संघ कार्य के समान निरूपित कर दिया है। उन्होंने सेवा कार्य को उपकार नहीं दायित्व के साथ संयुक्त कर स्वयंसेवकों को निरन्तर कार्य का आदेश भी दिया है।   इस महामारी के साथ आ रहे नए जीवन अनुभवों को नए भारत के जीवन मानक के रूप में आत्मसात करने का संघ प्रमुख का आह्वान बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्वावलंबन और स्वदेशी का आग्रह वाकई इस संकट की सबसे बड़ी सीख है। लॉकडाउन ने हमारी सीमित आवश्यकता और शोषण की जगह दोहन केंद्रित जीवनशैली को प्रमाणित किया है। संघ प्रमुख ने इसे बेहद ही सुबोध ढंग से रेखांकित कर लोकजीवन में इस भारतीय दृष्टि की पुनर्स्थापना पर ही जोर दिया है। आधुनिक, तकनीकी, विज्ञान और स्वदेशी के युक्तिसंगत युग्म को डॉ. भागवत ने इस संकट का सबसे निर्णायक पाठ बताकर समाज को नई दिशा पकड़ने का भी आह्वान किया है।   नागरिक अनुशासन को देशभक्ति का प्रमाणिक पैमाना बताकर संघ प्रमुख ने सरकार की एडवाइजरी की पालना की बेहतरीन जमीन भी निर्मित की। इसके लिए उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर और भगनि निवेदिता को उद्धृत किया। इसके पीछे उनका मूल मन्तव्य लॉकडाउन के बाद नागरिक जवाबदेही बरकरार रखना ही है। असल में सरकारी एडवाइजर की पालना में ही इस महामारी से बचने के सूत्र हैं और भारत की लड़ाई इसी एहतियात पर निर्भर है। संघ प्रमुख ने इसीलिए इस बात पर विशेष जोर दिया है कि न केवल स्वयंसेवक बल्कि सभी अन्य लोग बचाव के लिए विहित चिकित्सकीय प्रावधानों की पालना हर कीमत पर सुनिश्चित करें। अगर नागरिक अनुशासन के पैमाने पर हम परम्परागत रूप से ही शिथिलता दिखाते रहे तो यह संभव है कि कोरोना की जंग में भारत उलझकर रह जाये इसलिए एक दूरदर्शी नजरिये से ही संघ प्रमुख इसे देशभक्ति का प्रमुख आधार निरूपित कर रहे हैं।असल में यह आज भारत की सर्वाधिक ज्वलंत आवश्यकता भी है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के अलावा पहली बार किसी गैर सरकारी गैर राजनीतिक शख्स ने अपने वृहत प्रभाव क्षेत्र में ऐसी अपील की है।   संघ पहले से ही अपने सभी अनुषांगिक संगठनों के जरिये कोरोना संकट में जरूरतमंद लोगों के मध्य काम कर रहा है, ऐसे में संघ प्रमुख का सेवाकार्यों के लिए भी एक तरह की एडवाइजर जारी करना संघ की राष्ट्रीय निष्ठाओं को स्वयंसिद्ध करता है। बगैर यश और नाम की आकांक्षा के बीच निरन्तरता के साथ बिना थके सेवा का लक्ष्य सौंपने का कार्य संघ प्रमुख ही सुपुर्द कर सकते थे। ऐसा ही उन्होंने किया। खासबात यह है कि 130 करोड़ भारतीयों की बात संघ के चिर दुश्मनों का जायका जरूर खराब करेगी। लेकिन संघ अपने राष्ट्रीय दायित्व में सदैव की तरह जुटा है और कोरोना पर भारत की विजय समाज के सहयोग से सुनिश्चित करके ही दम लेगा। क्योंकि भारत की विजय दुनिया में मानवता के लिए अक्षय जीवन शैली का पुनः अनुकरणीय प्रमाण भी होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Modi

आशीष सूद   कोरोना महामारी से उत्पन्न वैश्विक संकट की घड़ी में विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनिया के अनेक प्रमुख राष्ट्राध्यक्षों के बाद अब माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाये गये कारगर कदमों की सराहना की है। इससे विश्व पटल पर एक मजबूत इच्छाशक्ति वाले नेता एवं कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रधानमंत्री मोदी की छवि और अधिक मजबूत हुई है। इस समय कोरोना संकट से कुशलता से निपटने वाले प्रमुख राष्ट्राध्यक्षों की सूची में वे शिखर पर हैं। इससे पहले भी मोदी जी के लंबे सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में ऐसे कई उदाहरण सामने आये, जो संकट की घड़ी में उनकी दूरदर्शिता के साथ-साथ नेतृत्व एवं निर्णय क्षमता के प्रमाण देते हैं।   भारत में कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए मोदी सरकार ने सही समय पर कारगर फैसले लिये और उन्हें कुशलता के साथ लागू भी कराया। हालांकि, दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज में जुटी तब्लीगी जमात की भीड़ ने इन प्रयासों को कमजोर किया और पूरे देश में संक्रमण फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई। मोदी सरकार ने इसका भी समाधान तलाशा। जमात के कार्यक्रम के दौरान उस क्षेत्र में मौजूद लोगों के डाटा मोबाइल कंपनियों से मंगवा कर उनतक पहुंचने के प्रयास शुरू किये गये। जिन लोगों से संपर्क हो पाया है, उन्हें क्वारंटीन कर सरकार संक्रमण फैलने से रोक रही है। यह काम दिल्ली से लेकर दमन और अंडमान जैसे दूरदराज क्षेत्रों तक में हो रहा है। गृह मंत्रालय द्वारा देशभर में इतने सूक्ष्म स्तर पर की जा रही कार्यवाही प्रधानमंत्री मोदी की असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण मुमकिन हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने आपदा प्रबंधन के मामले में दूरदर्शिता का परिचय वर्षों पहले तब दिया था, जब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में मोरबी (गुजरात) में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राहत कार्य का नेतृत्व किया था। बाद में चाहे भुज में आये भूकंप के बाद पुनर्वास की जिम्मेदारी रही हो या 2013 में केदार घाटी में फंसे गुजरात के लोगों की मदद, मोदी हमेशा उदाहरण बनकर उभरे। प्रधानमंत्री बनने पर सितंबर 2014 में जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ को उन्होंने जिस कुशलता से संभाला, वह अपने आप में नजीर है। इसी तरह 2015 में चेन्नई में आई भीषण बाढ़ की उन्होंने स्वयं निगरानी की और आईएनएस ऐरावत को चेन्नई बंदरगाह पर स्वास्थ्य उपकरणों, दवाओं तथा डॉक्टरों के साथ तैनात कर दिया क्योंकि सड़क मार्ग बाधित थे। अगस्त 2018 में केरल में आई भीषण बाढ़ के दौरान भी प्रधानमंत्री ने हरसंभव मदद की और प्रदेश को इस आपदा से जल्द निपटने के लिए तैयार किया। केवल भारत के भीतर ही नहीं, पड़ोसी देशों में आई आपदा के दौरान भी उन्होंने सबसे पहले मदद पहुंचाई। 2015 में नेपाल और पाकिस्तान में भूकंप से हुई तबाही के बाद भारत ने सबसे पहले और हरसंभव मदद की।   कोरोना से निपटने के प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी में हुई कैबिनेट बैठक में अपने सहयोगियों को कोरोना महामारी के बारे में जानकारी दी। फिर अपने अनुभवों का लाभ उठाते हुए, 11 मार्च को सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 की धारा 2 को लागू करने के निर्देश दे दिये। इसके साथ ही कोरोना से निपटने के लिए मंत्रियों के एक समूह के गठन का निर्णय भी ले लिया गया। गत 4 मार्च तक भारत में कोरोना संक्रमण के सिर्फ 29 पॉजिटिव मामले सामने आये थे, तभी सरकार ने इटली, ईरान समेत कई देशों में जारी सभी प्रकार के वीजा पर रोक लगा दी। जापान और दक्षिण कोरिया के नागरिकों को तुरंत दिया जाने वाला वीजा भी निरस्त कर दिया गया। चीनी नागरिकों को 5 फरवरी से पहले जारी वीजा को निरस्त कर दिया गया। विदेश से भारत आने वाले सभी लोगों को अपनी सभी यात्राओं की जानकारी सरकार को उपलब्ध करने की हिदायत दी गई। भारत ने पड़ोसी देशों के साथ लगती जमीनी सीमा को भी समय रहते पूरी तरह सील कर दिया।   फिर सरकार ने विज्ञान एवं तकनीकी अधिकार प्राप्त एक समूह का गठन किया, जिसकी पहली बैठक 21 मार्च को नीति आयोग के सदस्‍य डॉ. विनोद पॉल और भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन की अध्यक्षता में हुई। इन पैनल का गठन कोरोना वायरस के संक्रमण का समाधान खोजने के लिए चल रहे वैज्ञानिक प्रयासों में समन्‍वय बिठाने के लिए किया गया है। इसके बाद सरकार ने और 11 अधिकार प्राप्त समूहों का गठन डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत किया, जो कोई भी योजना बनाने और इसे समयबद्ध तरीके से लागू कराने के लिए स्वतंत्र है। ये समूह सीधे कैबिनेट सचिव से संपर्क कर सकते हैं। हर समूह में पीएमओ और कैबिनेट सेक्रेटरी के वरिष्ठ अधिकारी सदस्य होंगे, जिससे तालमेल में परेशानी न हो।   'लॉकडाउन' लागू कराना आसान न था कोरोना का प्रकोप बढ़ने के बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कई प्रमुख यूरोपीय देशों के नेता उहापोह में थे कि लॉकडाउन कैसे किया जाये, मोदी ने वह कर दिखाया। प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान कर इसमें जान भागीदारी सुनिश्चित की, जिसे जनता ने अभूतपूर्व ढंग से सफल बनाया। इसी दिन उन्होंने कोरोना वारियर्स के सम्मान में शंख और थाली बजाने का आह्वान कर उन्हें प्रोत्साहित भी किया। जनता कर्फ्यू की व्यापक सफलता के बाद प्रधानमंत्री ने देशभर में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा इस अनुरोध के साथ की कि यदि हम इसका पालन नहीं करेंगे तो 21 साल पीछे हो जाएंगे। अनुरोध का असर हुआ, लॉकडाउन को भी पुरजोर समर्थन मिला, कुछेक घटनाओं को छोड़ कर। उन्होंने लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा हाथ जोड़कर की और इसे जरूरी बताते हुए गरीब जनता को हो रही मुश्किलों के लिए माफी मांगी। हालांकि, गरीबों की मदद के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत 1.70 लाख करोड़ रुपये का राहत अनुदान भी जारी कर दिया है, जिससे देश की लगभग 80 करोड़ गरीब जनता को लाभ होना है। अब सरकार इसी तरह के एक और पैकेज पर विचार कर रही है।   देश-विदेश से निरंतर संपर्क प्रधानमंत्री मोदी ने रूस, सऊदी अरब, अबूधाबी, कतर सहित प्रमुख यूरोपीय और जी-20 देशों के नेताओं के साथ इस विपदा से निपटने के उपायों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये चर्चा की। अमेरिका, इंग्लैंड, इजराइल और जर्मनी के नेताओं के साथ वे लगातार संपर्क में हैं। सार्क देशों के नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर और सार्क के मंच के जरिये भी संपर्क बनाये हुए हैं। कोरोना से निपटने के लिए उन्होंने सार्क देशों के लिए एक आपदा कोष बनाने की पहल की और इसके लिए 10 मिलियन डॉलर (लगभग 76 करोड़ रुपये) देने की बात कही। भारत ने सार्क के अलावा कई अन्य देशों की मदद के लिए भी कदम उठाये हैं, जिसने वैश्विक संकट की इस घड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगे बढ़कर काम करने की दक्षता और नेतृत्व क्षमता को विश्व पटल पर अधिक सुदृढ़ किया है।   प्रधानमंत्री देश के अंदर भी रोज करीब 200 लोगों को फोन कर विचार-विमर्श कर रहे हैं, जिनमें प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, स्वास्थ्य मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ चिकित्सक एवं अन्य गणमान्य लोग भी शामिल हैं। देश की 130 करोड़ जनता को कोरोना से बचाने के लिए उन्हें अपने-अपने घरों में रखने के निर्णय को सफलतापूर्वक लागू कराना प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्व क्षमता से ही संभव था। निःसंदेह मोदी अपनी असाधारण नेतृत्व क्षमता के साथ न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व समुदाय के लिए वरदान साबित हो रहे हैं।     (लेखक दिल्ली भाजपा के पूर्व महामंत्री हैं।)

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Dakhal News 25 April 2020


bhopal, Mathematician Ramanujan was a magician of numbers

गणितज्ञ रामानुजन की सौवीं पुण्यतिथि 26 अप्रैल पर विशेष योगेश कुमार गोयल भारत में ऐसे कई महान् गणितज्ञ हुए, जिन्होंने न केवल भारतीय गणित के चेहरे को बदलने में अपना अनमोल योगदान दिया बल्कि विश्वभर में अत्यधिक लोकप्रियता हासिल की। ऐसे ही भारतीय गणितज्ञों में शुमार श्रीनिवास अयंगर रामानुजन जैसे विश्वविख्यात गणितज्ञ को भला कौन नहीं जानता होगा, जिन्होंने भारत में गणित के विभिन्न सूत्रों, प्रमेयों और सिद्धांतों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहे पूरे 100 वर्ष हो गए हैं। रामानुजन ने गणितीय विश्लेषण, अनंत श्रृंखला, संख्या सिद्धांत तथा निरंतर भिन्न अंशों के लिए आश्चर्यजनक योगदान दिया और अनेक समीकरण व सूत्र पेश किए। वे ऐसे विश्वविख्यात गणितज्ञ थे, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और विषय गणित की शाखाओं में अविस्मरणीय योगदान दिया और जिनके प्रयासों व योगदान ने गणित को नया अर्थ दिया। उनके द्वारा की गई खोज ‘रामानुजन थीटा’ तथा ‘रामानुजन प्राइम’ ने इस विषय पर आगे के शोध और विकास के लिए दुनियाभर के शोधकर्ताओं को प्रेरित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में 26 दिसम्बर 2011 को आयोजित श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर देश में योग्य गणितज्ञों की संख्या कम होने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि श्रीनिवास रामानुजन की असाधारण प्रतिभा ने पिछली सदी के दूसरे दशक में गणित की दुनिया को नया आयाम दिया। ऐसे प्रतिभावान तथा गूढ़ ज्ञान वालों का जन्म कभी-कभार ही होता है। गणित में रामानुजन के अविस्मरणीय योगदान को याद रखने और सम्मान देने के लिए उनके जन्मदिन को प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से करीब चार सौ किलोमीटर दूर तमिलनाडु के ईरोड शहर में जन्मे श्रीनिवास अयंगर रामानुजन का बचपन कठिनाइयों और निर्धनता के दौर में बीता था। तीन वर्ष की आयु तक वह बोलना भी नहीं सीख पाए थे और तब परिवार के लोगों को चिंता होने लगी थी कि कहीं वह गूंगे न हों। कौन जानता था कि यही बालक गणित के क्षेत्र में इतना महान् कार्य करेगा कि सदियों तक दुनिया उन्हें आदर-सम्मान के साथ याद रखेगी। उनका बचपन इतने अभावों में बीता कि वे स्कूल में किताबें अक्सर अपने मित्रों से मांगकर पढ़ा करते थे। उन्हें गणित में इतनी दिलचस्पी थी कि उन्हें इसमें प्रायः सौ फीसदी अंक ही मिलते थे लेकिन बाकी विषयों में बामुश्किल ही परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते थे क्योंकि गणित के अलावा उनका मन दूसरे विषयों में लगता ही नहीं था। स्कूल में वे अध्यापकों से अक्सर काफी अटपटे से सवाल पूछा करते थे। जैसे, धरती और बादलों के बीच की दूरी कितनी है? विश्व में पहला पुरुष कौन था? 10 वर्ष की आयु में प्राथमिक परीक्षा में उन्होंने पूरे जिले में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर साबित कर दिया था कि गणित उनकी रग-रग में किस कदर रचा-बसा है। रामानुजन को गणित का इतना शौक था कि 12 वर्ष की आयु में ही उन्होंने लोनी द्वारा लिखित ‘त्रिकोणमिति’ की प्रसिद्ध पुस्तक बगैर किसी भी मदद के हल कर त्रिकोणमिति में महारत हासिल कर ली और उसके बाद किसी की मदद के बिना अपने ही दिमाग से कई प्रमेय भी विकसित किए। उन्होंने गणित में किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं लिया था। स्कूली दिनों में उन्हें उनकी प्रतिभा के लिए अनेक योग्यता प्रमाणपत्र तथा अकादमिक पुरस्कार प्राप्त हुए। गणित में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1904 में के. रंगनाथ राव पुरस्कार भी दिया गया था। कुंभकोणम के गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज में अध्ययन करने के लिए उन्हें छात्रवृत्ति से सम्मानित किया गया था किन्तु उनका गणित प्रेम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने दूसरे विषयों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया था। दूसरे विषयों की कक्षाओं में भी वे गणित के ही प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि 11वीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए और इस कारण उन्हें मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद हो गई। उसके बाद निराश होकर वर्ष 1905 में वे घर छोड़कर भाग गए। परिवार के सदस्य उन्हें जगह-जगह खोजकर जब बेहद परेशान हो गए तो उन्होंने चेन्नई के एक अंग्रेजी समाचारपत्र में सितम्बर 1905 में रामानुजन की गुमशुदगी के संबंध में सम्पादक के नाम एक पत्र लिखा, जिसे अखबार में छाप दिया गया। आखिरकार रामानुजन किसी तरह घर वापस लौट आए। करीब चार वर्ष बाद उन्हें चेन्नई के एक कॉलेज में दाखिला तो मिल गया लेकिन यहां भी वे गणित को छोड़कर बाकी सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए। अंततः उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। 22 वर्ष की आयु में उनका विवाह वर्ष 1909 में मात्र 10 वर्षीया जानकी से हुआ। परिवार की आर्थिक हालत पहले से ही ठीक नहीं थी। इसलिए विवाहोपरांत परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके लिए नौकरी करना आवश्यक हो गया। इंडियन मैथेमेटिकल सोसायटी के उपाध्यक्ष गणितज्ञ रामास्वामी अय्यर की सिफारिश पर वे नैलोर के कलेक्टर आर रामचंद्र राव से मिले। कलेक्टर राव उनके लिए नौकरी की तो कोई व्यवस्था नहीं कर सके लेकिन उनको कुछ आर्थिक मदद अवश्य करने लगे। स्वाभिमानी रामानुजन को यह स्वीकार नहीं था बल्कि वे सम्मान से जीवन-यापन के लिए एक स्थायी नौकरी चाहते थे। इसलिए उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में गणित के प्रोफेसर ई डब्ल्यू मिडलमास्ट के एक सिफारिशी पत्र के साथ मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी के लिए आवेदन किया। आखिरकार उन्हें 30 रुपये मासिक वेतन पर वहां नौकरी मिल ही गई। नौकरी के दौरान भी वे समय मिलते ही खाली पन्नों पर गणित के प्रश्नों को हल करने लग जाया करते थे। गणित के क्षेत्र में सफलता उन्हें वास्तव में उसी दौर में मिली। वर्ष 1913 में रामानुजन ने गणित के प्रति अपने ज्ञान एवं रुचि को आगे बढ़ाने के लिए यूरोपीय गणितज्ञों से सम्पर्क साधा। एकदिन एक ब्रिटिश की नजर उनके द्वारा हल किए गए गणित के प्रश्नों पर पड़ी तो वह उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुआ। उसी अंग्रेज के माध्यम से रामानुजन का सम्पर्क जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एच. हार्डी से हुआ। उसी के बाद उनका हार्डी के साथ पत्रों का आदान-प्रदान शुरू हुआ। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को भांपकर 1914 में उन्हें अपनी प्रतिभा को साकार करने के लिए लंदन बुला लिया। समुद्री जहाज से करीब एक माह लंबी यात्रा करके रामानुजन आखिरकार अप्रैल 1914 में इंग्लैंड पहुंच गए। वहां उनके लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की गई, जिसके बाद देखते ही देखते उनकी ख्याति दुनियाभर में फैल गई। जी.एच. हार्डी ने रामानुजन को यूलर, गोस, आर्किमिडीज, आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों के समकक्ष श्रेणी में रखा था। 1917 में उन्हें ‘लंदन मैथेमेटिकल सोसायटी’ का सदस्य चुना गया और अगले ही वर्ष 1918 में इंग्लैंड की प्रतिष्ठित संस्था ‘रॉयल सोसायटी’ ने उन्हें अपना फैलो बनाकर सम्मान दिया। वह उपलब्धि हासिल करने वाले रामानुजन सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। रामानुजन ने करीब पांच साल कैम्ब्रिज में बिताए और उस दौरान गणित से संबंधित कई शोधपत्र लिखे। इंग्लैंड में उन पांच वर्षों के दौरान उन्होंने मुख्यतः संख्या सिद्धांत के क्षेत्र में कार्य किया। प्रोफेसर जी.एच. हार्डी के साथ मिलकर रामानुजन ने कई शोधपत्र प्रकाशित किए और उन्हीं में से एक विशेष शोध के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने रामानुजन को बी.एस.सी. की उपाधि भी प्रदान की। महान् गणितज्ञ रामानुजन की गणना आधुनिक भारत के उन व्यक्तित्वों में की जाती है, जिन्होंने विश्व में नए ज्ञान को पाने और खोजने की पहल की। रामानुजन को ‘गणितज्ञों का गणितज्ञ’ और संख्या सिद्धांत पर अद्भुत कार्य के लिए ‘संख्याओं का जादूगर’ भी कहा जाता है, जिन्होंने खुद से गणित सीखा और जीवनभर में गणित के 3884 प्रमेयों (थ्योरम्स) का संकलन किया, जिनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किए जा चुके हैं। उनके कई प्रमेय और सूत्र ऐसे हैं, जिन्हें आजतक कोई हल नहीं कर सका है। गणित पर उनके लिखे लेख उस समय की सर्वोत्तम विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ करते थे। गणित में की गई उनकी अद्भुत खोजें आज के आधुनिक गणित तथा विज्ञान की आधारशिला बनी। लंदन की जलवायु और रहन-सहन की शैली रामानुजन के अनुकूल नहीं थी, जिससे धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा। खराब खाने की आदतों के साथ वे अथक परिश्रम भी कर रहे थे, जिसके चलते उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और जांच के दौरान पता चला कि उन्हें टी.बी. की बीमारी हो गई है। उसके बाद वहां के डॉक्टरों की सलाह पर वे 13 मार्च 1919 को भारत लौट आए लेकिन यहां आने पर भी उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ बल्कि उनकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। अंततः 26 अप्रैल 1920 को महज 32 वर्ष की अल्पायु में इस विलक्षण प्रतिभा ने कुंभकोणम में अंतिम सांस लेते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया। रामानुजन की पत्नी जानकी का निधन 94 वर्ष की आयु में 13 अप्रैल 1994 को हुआ था। भारत सहित विदेशों में भी रामानुजन के जीवन और व्यक्तित्व पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष 1991 में रॉबर्ट काइनिजेल ने ‘द मैन हू न्यू इनफिनिटी’ नामक उनकी जीवनी लिखी और ब्रिटेन में वर्ष 2016 में इसी जीवनी पर आधारित एक फिल्म भी इसी नाम से बनाई गई। वर्ष 2007 में रामानुजन के महान् व्यक्तित्व पर एक उपन्यास ‘द इंडियन क्लर्क’ भी अमेरिका में प्रकाशित हुआ। वर्ष 2017 में भारतीय मूल के प्रोफेसर वी एस वरदराजन तथा उनकी पत्नी ने लॉस एंजिल्स की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी को दस लाख डॉलर दान देकर रामानुजन के सम्मान में ‘रामानुजन विजिटिंग प्रोफेसरशिप’ की स्थापना की। रामानुजन के निधन के पश्चात् उनकी 5000 से अधिक प्रमेयों को छपवाया गया, जिनमें से अधिकांश को कई दशकों बाद तक सुलझाया नहीं जा सका था। मद्रास विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उनकी हस्तलिखित पाण्डुलिपि आज भी तीन खण्डों में सुरक्षित रखी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 25 April 2020


bhopal, Corona crisis, India too on the way to postpone elections?

सतीश एलिया   विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 वायरस यानी कोरोना संकट के चलते समूची दुनिया के मुल्क न केवल लोगों की जान बचाने के लिए जूझ रहे हैं बल्कि पहले से परस्पर विवादों में उलझे अमेरिका और चीन जैसी आर्थिक शक्तियां कोराना को लेकर भी झगड़े को आतुर हैं। फिलहाल कोराना की वैक्सीन की खोज में विश्व का चिकित्सकीय और वैज्ञानिक समुदाय लगा हुआ है लेकिन इस संकट का भविष्य में और क्या असर पड़ने वाला है, कोई भी यकीन के साथ नहीं कह सकता। अमेरिका में तो इसी साल नवंबर में होने वाले प्रेसिडेंशियल इलेक्शन यानी राष्ट्रपति पद के लिए होनेवाले चुनाव पर संकट के बाद छा गए हैं। वहां करीब डेढ़ दर्जन राज्यों में प्राथमिक चुनाव स्थगित कर दिये गए हैं। बाकी राज्य क्या करेंगे और मतदाता, मतदान केंद्र और मतदान को लेकर कोरोना के परिप्रेक्ष्य में क्या होगा? इन प्रश्नों पर अमेरिकी नेता से जनता तक सब पसोपेश में हैं। अगर यह महामारी आगे भी जारी रही तो अमेरिका का सामना संवैधानिक संकट से भी होने वाला है। इधर, भारत में भी राज्यसभा चुनाव टाल दिए जाने के बाद विधान परिषदों के उप चुनाव भी टल गए हैं। सवाल यह है कि कई राज्यों में उपचुनाव होने हैं, क्या वे भी टलेंगे? और यह भी कि क्या बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के आगामी समय में आने वाले चुनाव भी टल तो नहीं जाएंगे?   अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 फरवरी को कोरोना काल में भारत यात्रा पर आए थे और जिस केम छो ट्रंप को नमस्ते ट्रंप में बदल दिए गए कार्यक्रम में वे भारत की तारीफें कर रहे थे, उसके पीछे उनका एजेंडा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अपनी दूसरी पारी के लिए भारतीय अमेरिकियों के सपोर्ट को बरकरार रखना ही था। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के सिस्टम में पहले प्राथमिक चुनाव राज्य स्तर पर होते हैं। यह जून तक होने थे लेकिन महामारी कोराना के चलते 15 राज्य इन्हें टाल चुके हैं और लगता है कि बाकी राज्य भी एक-एक कर इसी निर्णय की तरफ जाने वाले हैं। लेकिन राज्यों को यह चुनाव टालने के लिए अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी है। यानी चुनाव टालना इतना आसान भी नहीं है। इस चुनाव का अंतिम चरण इसी साल नवंबर में होना है और डोनाल्ड ट्रंप जनवरी 2021 में अपना पहला कार्यकाल पूरा करेंगे। अगर जून में प्राथमिक चुनाव नहीं हो रहे हैं तो फिर नवंबर में अंतिम चुनाव होना फिलहाल कठिन लगता है। ऐसे में अमेरिका के सामने संवैधानिक संकट उपस्थति हो सकता है। अमेरिका में प्रत्यक्ष मतदान ही होता है यानी मतदाता को मतदान केंद्र जाकर मताधिकार का प्रयोग करना होता है। वह पोस्टर बैलेट यानी डाक मतपत्र का उपयोग भी कर सकता है लेकिन उसे इसका वाजिब कारण बताकर पहले अनुमति लेनी होती है। इस तरह के मतदान की संभावना में भी सभी मतदाताओं को यह सुविधा मिल पाने और उसका इंतजाम हो पाने के आसार फिलहाल नहीं लग रहे हैं।   भारत में राज्यसभा चुनाव स्थगन के बाद किस चुनाव की बारी? भारत में भी कोरोना संकट के चलते राज्यसभा के चुनाव स्थगित करने पड़े। मप्र, महाराष्ट्र, उप्र समेत कई राज्यों में राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए मार्च-अप्रैल में चुनाव की प्रक्रिया अंतिम चरण में स्थगित की गई। मप्र में तो कोरोना संकट काल में भी सत्ता पलट की सियासत के चलते 22 विधानसभा सीटें रिक्त हुई हैं। इनमें से दो पूर्व विधायक अब मंत्री भी बना दिए गए हैं। इन सीटों पर सितंबर तक चुनाव होना चाहिए।   उधर महाराष्ट्र में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मुख्यमंत्री बने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को 29 मई तक विधानसभा या विधान परिषद् का सदस्य चुना जाना आवश्यक है, वे इस तारीख को बतौर मुख्यमंत्री छह महीने पूरे करेंगे। अगर सदस्य नहीं बन सके तो मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा या यों कहें कि स्वयमेव ही वे मुख्यमंत्री नहीं रह जाएंगे। विधान परिषद् का चुनाव भी स्थगित हो जाने से अब उद्धव विधान परिषद् मेंं मनोनीत सदस्य बनकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखने की कोशिश में हैं जरूर लेकिन मनोनयन का अधिकार राज्यपाल को है। मनोनयन को राज्यपाल की मंजूरी मिलने या न मिलने के पेंच से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या मनोनीत सदस्य मुख्यमंत्री हो सकता है? किसी भी तरह के सदन में किसी भी तरह के मनोनीत सदस्यों को मताधिकार नहीं होता तो मताधिकार विहीन कोई सदस्य सदन का नेता मुख्यमंत्री या मंत्री भी कैसे हो सकता है?   बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भी सुगबुगाहट भारतीय राजनीति में वर्तमान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिहार और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होना है। पहले बिहार और फिर बंगाल में। सवाल यह है कि कोरोना संकट अगर जल्द नहीं टला तो क्या इन राज्यों के विधानसभा आम चुनाव पर भी असर पड़ेगा? गैर भाजपा दलों की सियासत के लिहाज से यह सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है और उन दलों में अब इसपर सुगबुगाहट शुरू भी हो गई है। राज्यसभा चुनाव टलने और इसके बाद कोरोना संकट गहराने ने इन दलों को चौकन्ना कर दिया है। लोकसभा की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की कोरोना संकट पर केंद्र सरकार की घेराबंदी के पीछे एक कारण भविष्य की राजनीति भी है। मप्र में पहले ही टले नगरीय निकाय व पंचायती राज चुनाव में पेंच मध्य प्रदेश में बीते साल कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने नगरीय निकायों के चुनाव नवंबर में नहीं कराए। सरकार महापौर और नपाध्यक्षों के सीधे चुनाव के बजाय चुने हुए पार्षदों में से ही चुनने की ढाई दशक पुरानी पद्धति को फिर लागू करना चाहती थी। इसके पीछे निकायों में भाजपा के जारी वर्चस्व को तोड़ने की मंशा थी लेकिन तत्कालीन विपक्ष भाजपा ने पुरजोर विरोध किया और राज्यपाल लालजी टंडन ने सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। सरकार ने निकायों की चुनी हुई परिषदों और महापौर, अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा होते ही प्रशासक नियुक्त कर निकाय पूरी तरह अफसरों को सौंप दिए। लेकिन इस साल के तीसरे महीने यानी प्रशासक व्यवस्था के करीब पांच माह पूरे होने तक सत्तापलट हो जाने के बाद अब भाजपा की शिवराज सरकार ने यह प्रशासक व्यवस्था खत्म कर पांच साल का कार्यकाल पूरा कर चुके महापौरों और अध्यक्षों को ही प्रशासक की जगह बैठाने का फैसला कर लिया है।   कोरोना संकट के चलते इसी तरह का फैसला त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के लिए किया गया। यानी सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों की जगह प्रशासनिक अधिकारियों को दिए गए अधिकारों को अब कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों को कमान दी गई है। यह अभूतपूर्व हालात हैं। सवाल यह है कि क्या इन फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जाएगी?     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 April 2020


bhopal, One month of unprecedented lockdown completed

आर. के. सिन्हा   पूरे देश में लॉकडाउन का एक माह पूरा हो चुका है। लॉकडाउन अभूतपूर्व रहा । कुछ छुटपुट घटनाओं को छोड़कर पूरा देश मोदी जी के साथ खड़ा दिखा। अब यह मान भी लें कि यदि दिन में देशभर में 10 घटनाएं भी हुई तो 30 दिनों में लगभग 300 घटनाएं ही हुई। अब 130 करोड़ के देश में जहां 130 करोड़ (तेरह सौ लाख) लोग रहते हैं, वहां एक महीने में 300 घटनाओं का कोई महत्व है क्या? वैसे भी ज्यादा घटनाएँ नासमझ और गुमराह तब्लीगी जमात की वजह से ही हुईं। हमें यह देखना चाहिए कि जन समर्थन कैसा रहा? जन समर्थन तो ऐसा था कि जब मोदी जी ने थाली और ताली बजाने को कहा तो सारा देश ही थाली, ताली और शंख बजाने पर उतर आया। जब प्रधानमंत्री ने दिये जलाने को कहा तो सबलोग अपने घरों की बालकॉनी में दिया जलाने उतर आये। प्रधानमंत्री जी जो कहते हैं उसके पीछे की मंशा और नेकनियती को लोग समझते हैं कि प्रधानमंत्री सबके हित और सुरक्षा की ही बात कर रहे हैं।   अब आप बताइये जहां चीन को छोड़कर सारे संक्रमित देश जनसंख्या और प्रति वर्ग किमी आबादी के मामले में भारत से कहीं ज्यादा छोटे हैं, चाहे अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, ईटली, फ्रांस, जापान, ईरान, इराक या स्पेन हो। सबके सब भारत से छोटे हैं पर इन देशों में हजारों की संख्या में लोग मर रहे हैं। भारत में मृतकों की संख्या आजतक लगभग साढ़े छह सौ ज्यादा और संक्रमित लोगों की संख्या भी फिलहाल तक़रीबन 21 हजार है, जिसमें आधा संक्रमण तो तब्लीगियों ने ही फैलाया। जबकि अमेरिका में 800965 लोग संक्रमित हो चुके हैं और 44,625 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि, अमेरिका आबादी और उसके घनत्व में भारत का एक तिहाई भर ही है।   देशभर के आधे से ज्यादा जिलों में अबतक एक भी संक्रमण नहीं है। यह क्या सकारात्मक बात नहीं है। यही है लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का कमाल। अब एक गिलास लगभग भरा हुआ है और थोड़ी-सी जगह खाली भी है। आप लगभग भरा हुआ नहीं देंखेगे और जो एक सेंटीमीटर खाली है, उसी को देखेंगे, दुनिया को दिखायेंगे और पूरे विश्व में प्रकाशित करेंगे। यह तो नकारात्मक सोच है। इससे परहेज करने की जरूरत है । हम देखें कि कैसे पूरे विश्व में कोरोना के खिलाफ युद्ध हुआ। यह वायरस चीन से उत्पन्न हुआ और पूरे यूरोप और अमेरिका में फैल गया। यूरोप और अमेरिका के सभी देशों में चिकित्सा की सुविधायें, आम जनता में शिक्षा का स्तर, समझदारी का स्तर यह सब तो भारत से कई गुना बेहतर था। लेकिन, वहां नुकसान ज्यादा हुआ और सीमित मेडिकल संसाधनों के साथ एक बड़े वर्ग के अशिक्षित या अर्द्ध-शिक्षित आबादी रहने के बावजूद और तब्लीगी जमात जैसे नासमझ लोगों की बेवकूफी से उत्पन्न समस्या के बावजूद हमने काफी हद तक कोरोना को विश्व भर में सबसे बेहतर नियंत्रित किया है। आशा है कि अगले कुछ दिनों में अपने देश में इसमें गिरावट का ट्रेंड भी देख लेंगे।   जब कभी किसी के जीवन में किसी भी प्रकार की चुनौती सामने आती है तो चुनौती के दो पहलू होते हैं। एक तो खतरा होता है और दूसरा अवसर होता है। उदाहरण स्वरूप मान लीजिए कि आपका मोबाइल फोन है। इस अनुसंधान में एक अवसर उत्पन्न किया है कि आप कहीं से और किसी से भी बात कर सकते हैं। वीडियो कॉल कर सकते हैं। फोटो भेज सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक खतरा भी जुड़ा हुआ है। इस मोबाइल फोन का कोई दुरुपयोग भी कर सकता है। आपके बैंक खाते में कोई हेरफेर भी तो कर सकता है। आपके नाम से गलत सन्देश भी दुनियाभर में भेजा जा सकता है। इसीलिये किसी भी ऐसी चुनौती को हमें स्वीकार जरूर करना चाहिए और उसके द्वारा उपलब्ध कराये अवसरों का पूरा उपयोग भी जरूर करना चाहिए। किन्तु खतरों से जरूर सावधान रहना चाहिए। आज कोरोना ने एक बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न किया है समाज के लिए। लेकिन जरा सोचिए-कितना बड़ा अवसर भी तो प्रदान किया है कोरोना ने।   आज लॉकडाउन में हम सभी घर पर हैं। आप भी घर पर हैं। मैं भी घर पर ही हूँ। क्योंकि कोरोना से निबटने का एक ही तो उपाय है, सोशल डिस्टेंसिंग। अभी 9 अप्रैल तक मैं सांसद था। 2014 अप्रैल से अभीतक जब मैं संसद जाता था तो सुबह उठने के साथ संसद के कागजातों में उलझा रहता था। किसी तरह नहा-धोकर अपने नोएडा आवास से तैयार होकर रास्ते में गाड़ी ही में जलपान करता हुआ संसद किस तरह समय से पहुंचू, इसकी जल्दी में लगा रहता था। फिर दिन में संसद और अपने सरकारी आवास का दिनभर चक्कर लगा ही रहता था। रात में आठ बजे, कभी 10 बजे तथा कभी-कभी 12 बजे जब अपने नोएडा निवास स्थान पर लौटकर आता था तो सिवाय श्रीमती जी से मिलने के और किसी से भेंट भी नहीं होती थी। बेटा, बहू, पोता, मेरी पोतियां इनके तो दर्शन कभी होते नहीं थे। कभी-कभी स्कूल जाने के पहले यदि मैं संसद के लिए निकल नहीं गया होता था तो हमारे पास बच्चे आकर सिर्फ एक मिनट के लिए गुड मार्निंग करने आते थे।   अब, देखिए कैसा परिवर्तन आया है। मैं आपको बताता हूँ मेरी शादी के 45 वर्ष हो गये। आजतक मैंने अपनी श्रीमती जी के साथ पूरा एक महीना कभी भी नहीं बिताया है। बच्चों के साथ तो कोई सवाल ही नहीं है। अब मेरे इस आनन्द की अनुभूति कीजिए। लॉकडाउन के शुरू होने के बाद शुरू के दो-चार रोज तो ऐसा लगा कि काम कैसे होगा। फिर मैंने अपने जीवन का ढांचा बदला या दिनचर्या खुद बदल गई। सुबह पहले की तरह से नहा-धोकर तैयार होता हूँ । पूजा-पाठ करके, जलपान करके अपने घर में ही मेरा जो कार्यालय का कमरा है, उसमें आकर बैठ जाता हूँ। फिर इंटरनेट खोलकर मेल चेक करके, ई-मेल करके पूरे पत्राचार, फोन कॉल वीडियो कॉल से बातें करता रहता हूँ। प्रतिदिन एक लेख लिखता हूँ। लॉकडाउन है, अतः उनको डिक्टेशन भी रिकॉर्ड करके भेजता हूँ और जब वे ड्राफ्ट मेल करते हैं तो उसमें संशोधन कर लेख समाचार पत्रों को भेजा जाता है, जिसे आप दूसरे दिन सुबह उठते ही पढ़ लेते हैं। पूरा एक महीना कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। काम में कोई अवरोध हुआ ही नहीं। स्वास्थ्य भी कहें तो पहले से बेहतर ही है। सारा खान-पान भी शुद्ध रूप से घर का ही है। समय से मिल जाता है उसका आनन्द अलग है। बच्चों के साथ समय बिताने का आनन्द और उसकी अनुभूति का कहना ही क्या?   अब दुनिया का हाल देखिए। सड़कों पर गाड़ियां नहीं चल रही है। प्रदूषण का स्तर नीचे जा रहा है। नदियां भी साफ हो रही हैं। नीलगाय और हिरण सड़कों पर स्वछन्द घूम रहे हैं। सुबह-शाम पक्षियों की चहचकाहट कानों में गूंजती रहती है। नीला आसमान देखने को मिलता है। सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का अलग ही आनन्द है। पहले कभी-कभी सूर्योदय तो देख भी लेता था, सूर्यास्त तो संसद में ही बीत जाता था। लेकिन, अब अपनी बालकॉनी में खड़ा होकर उसका आनन्द लेता रहता हूँ । कभी -कभी श्रीमती जी और बच्चे भी प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने चले आते हैं । आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि जो आंकड़े अस्पतालों से प्राप्त हो रहे हैं उसके हिसाब से सांसों से सम्बंधित और हृदयघात की बीमारियों के जो केस अस्पतालों में आते थे या भर्ती होते थे, उनमें 40 प्रतिशत की कमी हो गयी है। यह मैं नहीं कह रहा हूँ । ये एम्स के डॉक्टर कह रहे हैं। जब गाड़ियां सड़क पर नहीं चल रही हैं तो लगभग देश में प्रति मिनट जो एक व्यक्ति की मौत होती थी दुर्घटना से, वह लगभग बंद हो गयी है। बच्चे बहुत आराम से और समय से घर पर ही ऑनलाइन क्लासेज कर रहे हैं। उनको इसमें आनन्द भी आ रहा है। मम्मियां भी साथ क्लास कर लेती हैं तो होमवर्क पूरा करवाने में आसानी हो रही है । बच्चों ने इसके पहले कभी दादा-दादी का प्यार समझा ही नहीं था। अब वे उधम भी मचा रहे हैं, कहानियां भी सुना रहे हैं और सुन भी रहे हैं। शायद धरती माता ऐसे ही परिवर्तन का इंतजार कर रही थी। यह ठीक है कि बहुत से होटलों में, रेस्तरां के कामों में कमी आयी है। मानता हूँ कि चाट-पकौड़ों के ठेले नहीं है। वह अब घर में ही बनता है । मेरी दोनों पोतियों में स्पर्धा इसी बात की रहती है कि कौन बेहतर व्यंजन बनाकर दादा-दादी को खिलाये । लेकिन, जो दफ्तरों में जाने की भागदौड़ मची रहती थी और जगह-जगह जाम लगा रहता था दफ्तर जाने के वक्त या दफ्तर छूटने के वक्त, वह तो समाप्त हो गया है। लगभग सभी दफ्तरों में जो कुल हजारों लाखों टन क्षमता वाले एयर कंडीशनर लगी हुई थी और उससे जो वातावरण में गर्म हवा निकल कर जा रही थी और उससे जो प्रदूषण फैल रहा था, उसमें तो कमी आ ही गयी है। इन सारे परिवर्तनों को भी देखने की जरूरत है।   मैं एक मीडिया संस्थान का अध्यक्ष भी हूँ। मेरी न्यूज़ एजेंसी हजारों समाचार पत्रों में समाचार भेजने के अतिरिक्त देश भर के आकाशवाणी केन्द्रों और दूरदर्शन केन्द्रों की बुलेटिन के लिए भी समय से समाचार पहुँचाने का काम करती है। जब यह लॉकडाउन हुआ तो हमने सोचा कि किस प्रकार हम अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा कर पायेंगे ? क्योंकि, प्रत्येक भाषा में कम से कम 100 समाचार प्रतिदिन होने ही चाहिए और सुबह से देर रात तक हर बुलेटिन के लिये खबरें चाहिये। खैर हमलोगों ने लॉकडाउन के बाद आपस में वीडियो कांफ्रेंसिंग की। विमर्श किया और योजना बनाई। आपको बताते हुए हर्ष होता है कि लॉकडाउन की अवधि में हमारे सारे पत्रकार सहकर्मी पहले से बढ़िया काम कर रहे हैं और समाचारों की संख्या का टारगेट अच्छी तरह प्रतिदिन पूरा भी कर रहे हैं। समाचारों की गुणवत्ता भी बढ़ी है। इसका अर्थ यह है कि आप यदि सतर्क हैं, सजग हैं, समझदार हैं और जानकार हैं, तो घर से काम करने में कोई दिक्कत है ही नहीं। हां काम समझदारी से करना होगा और बेडरूम में सोकर नहीं करना होगा। अलग कमरा न हो तो किसी कमरे में एक अलग डेस्क तो होना ही चाहिए जहां से यह काम औपचारिक रूप से हो सके। जब व्यक्ति डेस्क पर बैठ जाये तो उसे और उसके परिवार के सभी सदस्यों को महसूस होना चाहिए कि अब ऑफिस का काम हो रहा है। इतना ही तो करना है।   अब मैं बात करता हूँ कोरोना से उत्पन्न इस महान अवसर की। जो कार्य-संस्कृति के बदलाव के रूप में दिखने लगा है। एक नयी कार्य संस्कृति ने जन्म ले लिया है इस कोरोना काल में। मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि पिछले सप्ताह हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी सोशल मीडिया साईट लींकडेन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए यह कहा था कि कोरोना काल को एक अवसर मानकर नयी कार्य संस्कृति अपनाने में कोई हठ नहीं होना चाहिये। प्रधानमंत्री ने इस नई कार्य संस्कृति को एक नई परिभाषा भी दी है। उन्होंने कहा है "एईआईओयू" के रूप में इसका नामकरण भी किया है। "ए" से एडाटीबिलिटी यानि अनुकूलता। "ई" एफिसिएन्सी यानि कार्यदक्षता। "आई" से इन्क्लूसिविटी यानि कि समावेशीकरण। "ओ" से ओपेरच्यूनिटी यानि अवसर और "यू" से यूनिवर्सिलिज्म जिसको सार्वभौमिकता कह सकते हैं। यह अपनी पुरानी भारतीय संस्कृति में है कि पूरा विश्व ही एक वृहद् परिवार है। यही मान सकते हैं। देखिए कितनी अच्छी बात है। आप घर से काम करें और इस नये अवसर को अपनायें या ग्रहण करें। अपने को इस नई कार्य संस्कृति के अनुकूल बनायें और दक्षतापूर्वक तथा सफलतापूर्वक काम करें। काम करने में बेईमानी बिलकुल नहीं करनी है। आठ घंटे जिस प्रकार आप दफ्तर में बैठकर काम करते हैं उसी प्रकार कम से कम आठ घंटे अपने घर में बैठ कर काम करें और समावेशी काम करें। आप इस बात को पूरा ध्यान में रखें कि आपके कार्य करने से सबको फायदा हो रहा है कि नहीं। सिर्फ अपने फायदे के लिए मत सोचें। अवसर का पूरा उपयोग करें। सार्वभौमिकता को ध्यान में रखकर काम करें। आपको यह बता दें कि आजतक जितनी लड़ाईयां लड़ी गयी हैं उसमें एक देश ने दूसरे देश के विरुद्ध ही लड़ाईं लड़ी है या कुछ देशों ने मिलकर कुछ अन्य देशों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी है।   प्राचीन ऐतिहासिक काल से लेकर आप महाभारत को ले लें । शक, हूण, कुशान, मुगल, अंग्रेज और प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध तक चले जायें। सबों में एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ाई दिखती है। लेकिन, यह पहली लड़ाई है जिसमें पूरा विश्व लड़ाई लड़ रहा है और सभी साथ मिलकर लड़ रहे हैं । सबका दुश्मन एक ही है कोरोना। सब एक-दूसरे की मदद से अवसर का उपयोग भी कर रहे हैं। कार्य दक्षता भी बढ़ा रहे हैं और कोरोना को हराने के लिए हरसंभव उपाय कर रहे हैं।क्या हम इस नये प्रौद्योगिकी के युग में एक नई कार्य संस्कृति का जन्म नहीं दे सकते । हमारे नौजवान वैज्ञानिकों को इसपर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। मैं यह नहीं कहता हूँ कि सातों दिन आप घर से ही काम करें। लेकिन, यदि देश के सभी कार्यालय सोमवार से लेकर रविवार तक किसी नियम के तहत यह बांट लें कि किसका कार्यालय सोमवार को खुलेगा, किसका बुधवार को या किसका रविवार को । वे उसी दिन कार्यालय जायें सिर्फ हफ्ते भर का रिपोर्ट देने के लिए और अगले हफ्ते भर का काम समझने के लिए। यदि ऐसा होगा तो कार्यालय भी छोटा ही रखने की जरूरत पड़ेगी। एक बड़ा कांफ्रेंस रूम, एक या दो छोटे मीटिंग रूम। यही कार्यालयों का स्वरूप हो जायेगा। क्या जरूरत है 100 से 200 डेस्क और कम्प्यूटरों को रखने की। दो सौ एयर कंडिशनर की भी कोई जरूरत नहीं होगी । सारे कार्यालय सात दिन यदि बांटकर कर काम करेंगे तो यातायात का बोझ भी 14 प्रतिशत ही रह जायेगा। सड़के साफ-सुथरी भी रहेंगी। प्रदूषण भी कम फैलेगा। दुर्घटनाएं भी बहुत ही कम होगी। फैक्ट्रियों में भी हम जहां एक शिफ्ट में काम कर रहे हैं अगर उसी को तीनों शिफ्टों में बांटकर काम करें तो क्या हमारा कार्यभार कम नहीं होगा? क्या इससे उत्पादन नहीं बढ़ेगा। कार्यदक्षता नहीं आयेगी। ऐसा अवश्य होगा। हमें बस आवश्यकता एक ही चीज कि है कि इस प्रौद्योगिकी के बदलाव का असर गरीबों के जिंदगी पर न पड़ने दें। यह जरूर देंखे कि उनका जीवन यापन भी सही ढंग से चलता रहे। आज चाहे अमीर हो या गरीब सभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। सभी यू-टयूव देख रहे हैं। वाट्सअप कर रहे हैं। थोड़ा-सा और उन्हें प्रशिक्षित कर दीजिए तो वे भी प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल आसानी से सीख ही जायेंगे। एक नया अवसर आया है कोरोना के रूप में । इस अवसर को मजबूती से पकड़ लीजिये, यह ध्यान रहे कि कोरोना आपको न पकड़े और एक नये युग की ओर एक नयी दिशा में मजबूती के साथ नई ऊर्जा और उमंगों के साथ आगे बढ़िये। भारत का भविष्य उज्ज्वल है।     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 23 April 2020


bhopal,Anchor in the corona era

अमरीक   समूची दुनिया इस वक्त कोरोना वायरस की जद में है। महासंकट तथा महामारी की इस विपदा के दौरान हर देश में अल्पसंख्यक माने जानेवाला सिख समुदाय बेहद मुफीद अलहदा भूमिका निभा रहा है। एकबारगी फिर शिद्दत के साथ साबित कर रहा है कि नि:स्वार्थ सेवा भावना और मानवता के लिए संपूर्ण समर्पण सिखी के बुनियादी बड़े सिद्धांतों में हैं। भारत से लेकर अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, इटली, कनाडा, जर्मन तथा तमाम यूरोपियन देशों से लेकर दुबई तक-गोया जहां भी गुरुद्वारे और सिख हैं, वहां दिन-रात लंगर सेवा हो रही है। यहां तक कि उस अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी जहां गाहे-बगाहे कट्टरपंथी, सिखों और हिंदुओं को बेरहमी के साथ निशाना बनाते रहते हैं।   'लंगर' सिखी की महान प्राथमिक परंपरा है। प्रथम गुरु श्री गुरुनानक देव जी के समय काल से इसका निर्वाह हो रहा है और आज तक विस्तार जारी है। प्रथम गुरु ने इस पावन परंपरा को इस संदेश के साथ शुरू किया था कि पृथ्वी का कोई जीव भूखा नहीं रहना चाहिए और लंगर-सेवा में मजहब, वर्ग तथा जात-पात कतई आड़े नहीं आनी चाहिए। कटु अपवादों को छोड़ दें तो लंगर की यह रवायत बदस्तूर कायम रही है। हिंदुस्तान का कोई राज्य हो, प्राकृतिक आपदा या अतीत में हुए युद्धों के दौरान जरूरतमंदों तक लंगर पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। विभाजन के वक्त हिजरत करने वालों से लदी रेलगाड़ियों और अन्य वाहनों को हिंदुस्तान प्रवेश करते ही लंगर दिया जाता था तथा आगे के सफर के लिए साथ भी बांध दिया जाता था। पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को, जबतक उनकी रोजी-रोटी का स्थाई इंतजाम नहीं हुआ, लगातार लंगर खिलाया जाता रहा। तब का यह मंजर आज भी लोगों को याद है और बंटवारे पर लिखे गए बेशुमार उपन्यासों तथा कहानियों में दर्ज है।   ‌आजादी के बाद हुए युद्धों में भी फौजियों के लिए चौबीसों घंटे की लंगर सेवा की जाती रही है। फौज के जरनैलों तक ने खुले दिल से इसकी सराहना की है। खैर, फिलवक्त मनुष्यता कोरोना वायरस के खिलाफ बाकायदा जंग लड़ रही है और सिखों की लंगर परंपरा इसमें बेहद अहम भूमिका अदा कर रही है। अमेरिकी प्रशासन ने विधिवत अपने नागरिकों से कहा कि जरूरतमंद लोग खाने तथा अन्य सेवाओं के लिए मान्यता प्राप्त सिख संस्थाओं का सहयोग लें। कनाडा और ब्रिटेन में खुद प्रधानमंत्रियों ने लंगर सेवा के लिए बार-बार सिखों का धन्यवाद किया। इटली और ऑस्ट्रेलिया में भी शासन प्रमुखों ने भी सिख सेवादारों की जमकर तारीफ की। इन तमाम देशों के रेडियो स्टेशन, टेलीविजन और अन्य मीडिया सिखों की लंगर परंपरा और अन्य सेवा पर कई विशेष प्रस्तुतियां दे चुका है। बीबीसी ने भी रिपोर्ट किया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सविस्तार बताया जा चुका है कि अमेरिका और कनाडा में पंजाबी ट्रांसपोर्टरों ने किस तरह सेवा के लिए अपने वाहन लगा दिए। कनाडा में तो रातों-रात लंगर के लिए ट्रक-ट्रालों में पंजाबियों ने अपने खर्चे पर, लंगर पैकेजिंग करने और महफूज रखने के लिए अत्याधुनिक मशीनरी के साथ विशेष फ्रीजर तक फिट कर दिए। सीएनएन के मुताबिक कई अन्य यूरोपियन देशों में भी ऐसा किया गया। यह बेमिसाल है।   कोरोना वायरस के पंजाब और शेष भारत में पैर पसारते ही सर्वोच्च सिख धार्मिक संस्था श्री अकाल तख्त साहिब से हुकमनामा जारी हो गया कि गुरु घर की गोलकों के मुंह गरीबों के लिए खोल दिए जाएं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने तमाम गुरुद्वारों के लिए त्वरित आदेश जारी किए कि जरूरत के हिसाब से लंगर लगाए और पहुंचाए जाएं। सूखे राशन के वितरण का भी प्रबंध किया गया। कोरोना संकट में लाखों लोगों को बतौर लंगर देकर राहत पहुंचाई जा रही है। पंजाब में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में। किसी एक समुदाय द्वारा अपनी मानवतावादी व पावन धार्मिक परंपराओं का इतनी शिद्दत तथा प्रतिबद्धता के साथ पालन का यह विलक्षण उदाहरण है। भविष्य में जब कभी कोरोना की काल कथा लिखी जाएगी (जो यकीनन बेहिसाब अवधि और तादाद में लिखी जाएगी), सिखों की लंगर प्रथा का जिक्र भी पूरे ऐहतराम के साथ प्रमुखता के साथ आएगा। प्रसंगवश, सिखधारा से निकली कतिपय अन्य संस्थाएं (डेरे) भी मौजूदा वक्त में अति उल्लेखनीय लंगर सेवा कर रही हैं। उन्हें भी सलाम...!     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 April 2020


bhopal, Ramdhari Singh Dinkar, the brightest poet  progressive consciousness

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि 24 अप्रैल पर विशेष   सुरेंद्र किशोरी   24 अप्रैल 1974 की शाम गंगा की गोद में उत्पन्न दिनकर के अस्ताचल जाने की शाम थी। वह रात भारतीय साहित्य के इतिहास में काली स्याही से दर्ज हो गयी, जब हिंदी साहित्य के सूर्य रामधारी सिंह दिनकर सदा के लिए इस नश्वर शरीर को त्याग बैकुंठ लोक चले गए। उस समय संचार के इतने साधन तो थे नहीं, धीरे-धीरे जब लोगों को पता चला कि तिरुपति बालाजी के दर्शन के बाद दिनकर जी ने इस शरीर को हमेशा के लिए त्याग दिया, दिनकर अब नहीं रहे। इस ख़बर पर सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ कि ओजस्वी वाणी और भव्य स्वरूप का सम्मिश्रण भारतीय हिंदी साहित्य के तेजपुंज अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन यह यह सत्य था, देश ही नहीं विदेशों के भी साहित्य जगत में शोक की लहर फैल गई। मद्रास से लेकर दिल्ली तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के साहित्यजगत और हिन्दी पट्टी में शोक की लहर फैल गई। उनके पैतृक गांव बेगूसराय के सिमरिया का हर घर रो उठा, तो इंदिरा गांधी भी सदमे में आ गईं।   प्रत्येक कवि, लेखक, चित्रकार के जीवन के अंतिम दिन अत्यंत ही आश्चर्यजनक और लोमहर्षक होते हैं। ऐसा ही दिनकर जी के साथ भी हुआ था, तिरुपति बालाजी के दर्शन करने गए दिनकर जी को जब वहीं दिल का दौरा पड़ा तो वहां से मद्रास तक रास्ते में हे राम-मेरे राम को याद करते रहे। बालाजी के सामने उन्होंने प्रार्थना की थी- हे भगवान, तुमसे तो उऋण हो गया अब मेरी उम्र आप जयप्रकाश को दे दो। अपनी मृत्यु के दिन ही दिनकर जी ने हरिवंश राय बच्चन को एक पत्र लिखा था। जिसमें दिनकर जी ने कहा था कि प्रिय भाई देखें पिता श्री रामचंद्र कहीं स्थापित करेंगे या यूं ही घूमते रहेंगे। 'लॉजिक गलत, पुरुषार्थ झूठा, केवल राम की इच्छा ठीक।'   बिहार के तत्कालीन मुंगेर (अब बेगूसराय) जिला के सुरसरि गंगा के तटवर्तिनी सिमरिया के एक सामान्य किसान के घर में 23 सितंबर 1908 को जब मनरूप देवी एवं रवि सिंह के यहां जब द्वितीय पुत्र जन्म हुआ था तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि एकदिन यह राष्ट्रीय फलक पर ध्रुवतारा-सा चमकेगा। लेकिन निधन के बाद जब देश में शोक की लहर दौड़ी तब पता चला यह ध्रुवतारा नहीं सूर्य थे। गांव में पैदा हुए दिनकर सदा जमीन से जुड़े रहे और संघर्ष करते हुए राष्ट्र की भावना को निरंतर सशक्त भाषा में अभिव्यक्त कर अपनी अद्वितीय रचनाओं के कारण साहित्य के इतिहास में अमर हो गए। सभी मानते हैं कि हमारे देश का हर युग, युवा पीढ़ी राष्ट्रकवि दिनकर को सदा श्रद्धा एवं सम्मान सहित याद करती रहेगी। प्रारंभिक शिक्षा गांव तथा बारो स्कूल से लेकर दिनकर जी को पढ़ाई के लिए दस किलोमीटर पैदल चलकर गंगा के पार मोकामा उच्च विद्यालय जाना पड़ा। कभी तैरकर तो कभी नाव से स्कूल आते-जाते रहे और 1928 में मोकामा उच्च विद्यालय से पास करने बाद नामांकन पटना कॉलेज पटना में हो गया। 1932 में वहां से प्रतिष्ठा की डिग्री लेकर आगे पढ़ने की इच्छा थी लेकिन घर की परिस्थिति से मजबूर होकर पढ़ाई छोड़ दी और 1933 में एच.ई. उच्च विद्यालय बरबीघा में शिक्षक बन गए। अगले ही साल निबंधन विभाग के अवर निबंधक के रूप में नियुक्त कर दिया गया। इस दौरान कविता का शौक जोर पकड़ चुका था, दिनकर उपनाम को 'हिमालय' और 'नई दिल्ली' ख्याति भी मिलने लगी। लेकिन इस ख्याति का पुरस्कार मिला कि पांच साल की नौकरी में 22 बार तबादला हुआ।   दिनकर ब्रिटिश शासन काल में सरकारी नौकर थे लेकिन नौकरी उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति में कभी बाधक नहीं बनी। वह उस समय भी अन्याय के विरुद्ध बोलने की शक्ति रखते थे और बाद में स्वाधीनता के समय भी सरकारी नौकरी करते समय हमेशा अनुचित बातों का डटकर विरोध करते रहे। 1943 से 1945 तक संगीत प्रचार अधिकारी तथा 1947 से 1950 तक बिहार सरकार के जनसंपर्क विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत रहे। 1952 में जब राज्यसभा का गठन हुआ तो तेजस्वी वाणी एवं राष्ट्र प्रेरक कविता की धारणा के कारण जवाहरलाल नेहरू ने दिनकर जी को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर अपने पाले में लेने की कोशिश की। 1962 का लोकसभा का चुनाव हारने के बाद ललित नारायण मिश्रा ने जब अपने लिए उनसे इस्तीफा देने का अनुरोध किया था तो बगैर कुछ सोचे और समय गंवाए राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा देे दिया था। 1963 में भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने। लेकिन 1965 में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और कहा था सीनेट और सिंडिकेट में जबतक वाकयुद्ध होता रहा तो उसे सहता रहा लेकिन जब अंगस्पर्श की नौबत आ गई तो पद का परित्याग कर देना आवश्यक था। इसके बाद दिनकर जी को 1965 से 1972 तक भारत सरकार के हिंदी विभाग में सलाहकार का दायित्व निर्वहन करना पड़ा।   राष्ट्र प्रेमियों को प्रेरणा देकर, उनके दिल और दिमाग को उद्वेलित कर झंकृत करने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 26 जनवरी 1950 को जब लाल किले के प्राचीर से 'सदियों की ठण्डी बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, दो राह समय के रथ का घघर्र नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' कहा तो पूरे परिदृश्य में एक सन्नाटा खिंच गया था। अपनी कविता के माध्यम से समाज के सभी वर्ग के लोगों को ललकार कर उन्होंने कर्तव्य बोध जगाने का काम किया, ताकि लोग अपनी जिम्मेदारी समझें और पूरी निष्ठा से उसका निर्वहन करें। तभी तो उन्होंने लिखा था 'समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध्र, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' बाल्मीकि, कालिदास, कबीर, इकबाल और नजरुल इस्लाम की गहरी प्रेरणा से राष्ट्रभक्त कवि बने दिनकर को सभी ने राष्ट्रीयता का उद्घोषक और क्रांति का नेता माना। रेणुका, हुंकार, सामधेनी आदि कविता स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ था। दिनकर जी ने राष्ट्रप्रेम एवं राष्ट्रीय भावना का ज्वलंत स्वरूप परशुराम की प्रतीक्षा में युद्ध और शांति का द्वंद कुरुक्षेत्र में व्यक्त किया है। संस्कृति के चार अध्याय में भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम दर्शाया और 1959 में संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1959 में ही राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से पद्मभूषण प्राप्त किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ. जाकिर हुसैन (बाद में भारत के राष्ट्रपति बने) से साहित्य के डॉक्टर का सम्मान मिला। गुरुकुल महाविद्यालय द्वारा विद्याशास्त्री से अभिषेक मिला। आठ नवंबर 1968 को उन्हें साहित्य-चूड़मानी के रूप में राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर में सम्मानित किया गया। 1972 में उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह में उन्होंने कहा था 'मैं जीवन भर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूं। इसलिए उजाले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का है और निश्चित रूप से वह बनने वाला रंग केसरिया है।' द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित प्रबन्ध काव्य 'कुरुक्षेत्र' को विश्व के एक सौ सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वां स्थान मिला है।   प्रतिरोध की आग मद्धिम नहीं हो, इसके लिए रश्मिरथी में कर्ण और परशुराम प्रतीक्षा को दिनकर ने प्रतीकात्मक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है। दोनों ने सामंती व्यवस्था का प्रतिकार किया है, दोनों ने व्यक्तिगत जीवन को सेवा और त्याग से जोड़ कर रखा तथा नई मानवता को उन्हें समर्पित कर दिया। क्रोपोटकिन एवं गांधी वर्तमान में इसके प्रतीक हैं। गांधी की आग को जिस तरह दिनकर जी ने प्रस्तुत किया, उस तरह और कवि ने नहीं किया। प्रतिरोध का कवि जनता की सत्ता चाहता है और उसका स्वयं सजग प्रहरी बनकर रहना चाहता है, उसका आत्मसंघर्ष यहीं आकर सार्थक होता है। कर्ण और परशुराम उसके आत्म संघर्ष को वाणी प्रदान करते हैं। निराला में प्रतिरोध की गहराई है और मुक्तिबोध में उसकी वैचारिक भूमि मिलती है। लेकिन आग और प्रज्वलन जो प्रतिरोध की सुंदरता है, धर्म है, वह दिनकर की कविताओं में है। कुरुक्षेत्र में दिनकर के युद्ध दर्शन पर मार्क्सवादी चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ा, उनकी मान्यता है कि जबतक समाज में सम स्थापित नहीं होगा युद्ध रोकना असंभव है। 'जबतक मानव-मानव का सुख भाग नहीं सम होगा, शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा।' इस तरह आर्थिक गुलामी से भी मुक्ति की गहरी आकांक्षा दिनकर के काव्य की मूल प्रेरणा है। भारतीयता के बिम्ब के रूप में हुए महाराणा प्रताप, शिवाजी, चंद्रगुप्त, अशोक, राम, कृष्ण और शंकर का नाम लेते हैं तो दूसरी ओर टीपू सुल्तान, अशफाक, उस्मान और भगत सिंह का भी। भगत सिंह और उनके किशोर क्रांतिकारी साथियों की शहादत के बाद 'हिमालय' में गांधीवादी विचारधारा के प्रतीक युधिष्ठिर की जगह गांडीवधारी अर्जुन और गदाधारी भीम के शौर्य का अभिनंदन करते हुए उन्होंने कहा था 'रे रोक युधिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्गधीर, पर फिरा हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर।'   चीन आक्रमण के समय 'परशुराम की प्रतीक्षा' में शांतिवादियों की आलोचना करते हुए भगत सिंह जैसे क्रांतिवीरों के इतिहास का स्मरण किया है कि 'खोजो टीपू सुल्तान कहां सोए हैं, अशफाक और उस्मान कहां सोए हैं, बम वाले वीर जवान कहां सोए हैं, वे भगत सिंह बलवान कहां सोए हैं।' शांति की रक्षा के लिए वीरता और शौर्य की आवश्यकता महसूस करते हुए उन्होंने कहा था 'देशवासी जागो, जागो गांधी की रक्षा करने को गांधी से भागो।' छायावादी संस्कारों से कविता लेखन प्रारंभ करने वाले दिनकर जी की आरंभिक कीर्ति रेणुका की कुछ कविताओं, हिमालय के प्रति हिमालय, कविता की पुकार में प्रगतिशीलता का उन्मेष दिखाई पड़ता है। किसान जीवन की विडम्बनाओं से कविता की पुकार में रूबरू कराते हुए उन्होंने लिखा था 'ऋण शोधन के लिए दूध घी बेच-बेच धन जोड़ेंगे, बूंद-बूंद बेचेंगे अपने लिए नहीं कुछ छोड़ेंगे।' गरीब मजदूरों की आर्थिक और असहायता से शुद्ध होकर स्वर्ग लूटने को आतुर दिनकर जी 'हाहाकार' में कहते हैं 'हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम जाते हैं, दूध-दूध ओ वत्स तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं।'  कहा जाता है कि दिनकर की 'उर्वशी' हिंदी साहित्य का गौरव ग्रंथ है। परशुराम की प्रतीक्षा कहती है 'दोस्ती ही है देख के डरो नहीं, कम्युनिस्ट कहते हैं चीन से लड़ो नहीं, चिंतन में सोशलिस्ट गर्क है, कम्युनिस्ट और कांग्रेस में क्या फर्क है, दीनदयाल के जनसंघी शुद्ध हैं, इसलिए आज भगवान महावीर बड़े क्रुद्ध हैं।' उन्होंने कहा था अगर एकता को आलस्य और सावधानता में आकर हमने खिड़की की राह से जाने दिया तो हमारी स्वाधीनता सदर दरवाजा खोल कर निकल जाएगी। अपने कथन में अपूर्व सरल भंगिमा और सहज तर्कों का समावेश करते हुए दिनकर कहते थे 'रोजगार इसलिए कम हैं क्योंकि धंधे देश में काफी नहीं हैं। धंधे इसलिए नहीं बढ़ते कि धन देश में कम है, धन की कमी इसलिए है कि उत्पादन थोड़ा है और उत्पादन इसलिए थोड़ा है कि लोग काम नहीं करते।'   अपने जीवन के अंतिम दिनों में राष्ट्रकवि दिनकर इंदिरा गांधी के शासन से ऊब गए थे। उन्होंने इंदिरा राज के खिलाफ खुलेआम बोलना शुरू कर दिया था। कहा था 'मैं अंदर ही अंदर घुट रहा हूं, अब विस्फोट होने वाला है, जानते हो मेरे कान में क्या चल रहा है, अगर जयप्रकाश को छुआ गया तो मैं अपनी आहुति दूंगा। अपने देश में जो डेमोक्रेसी लटर-पटर चल रही है, इसका कारण है कि जो देश के मालिक हैं, वह प्रचंड मूर्ख हैं। स्थिति बन गई है कि वोट का अधिकार मिल गया है भैंस को, मजे हैं चरवाहों के।'   आज कविवर दिनकर हमारे बीच नहीं हैं- 'तुम जीवित थे तो सुनने को जी करता था, तुम चले गए तो गुनने को जी करता है।' दिनकर को पैदा करने वाली बेगूसराय की क्रांतिकारी धरती उनकी 'हुंकार, कुरुक्षेत्र, रसवंती, रश्मिरथी, उर्वशी, नील कुसुम, बापू, परशुराम की प्रतीक्षा और संस्कृति के चार अध्याय के रूप में आज भी समस्त जागृत ज्वलंत समस्याओं के समाधान की प्रेरणा से पुलकित हैं। दिनकर जी के साहित्य का प्रकाश अमिट है। राष्ट्रीय स्वाभिमान के नायक, राष्ट्र के सजग प्रहरी, व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि और सात्विक मूल्यों के आग्रही, समाज को तराशने वाले शिल्पकार राष्ट्रकवि दिनकर में पूरा युग प्रतिबिंबित है, अतीत के स्वर्णिम पृष्ठ हैं, वर्तमान जीवंत है तथा भविष्य निर्देशित हैं।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 23 April 2020


bhopal, Time to get serious about earth protection

विश्व पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष डॉ. रमेश ठाकुर   पृथ्वी को बचाने के लिए सभी को सामूहिक रूप से गंभीर होना होगा। विश्व पृथ्वी दिवस पर जनमानस के लिए संदेश मात्र इतना होता है कि ‘हम पृथ्वी से हैं, पृथ्वी हमसे नहीं! पर, शायद ये बात हम भूल चुके हैं। क्योंकि हम जब चाहें तब बिना किसी भय के धरती को नुकसान पहुंचाने पर आतुर हो जाते हैं। खैर, उसका खामियाजा भी अब भुगतने लगे हैं। इस वक्त कुदरत के कहर ने समूचे संसार को पटखनी दी हुई है, भविष्य में और क्या हो सकता है उसकी भी संभावित खतरे की तस्वीर दिखा दी है। प्रकृति ने इस वक्त पूरी दुनिया को झकझोरा हुआ है। समूचे जगत में सन्नाटा पसरा है। इंसानों के अलावा पशु-पक्षी भी अपने ठिकानों में दुबके हैं। एक बात जरूर है इससे किसी को फायदा हो या नहीं पर धरती को जरूर सुकून मिला है। संसारबंदी के बाद कम-से-कम धरा का दोहन कुछ दिनों के लिए जरूर रुका है। आसमान में बहती हुई हवाएं बदली महसूस होने लगी है, एकदम साफ-साफ आकाश नीला-नीला दिखता है। नदी, तालाब, समुद्र व पोखरों में बहने वाला पानी जो अमूमन मटमैला और गंदा दिखता था, अब साफ दिख रहा है। प्रदूषण का कहीं नामोनिशान नहीं। दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि धरती से छेड़छाड़ करने वाले इस वक्त कुदरती मार से बेहाल हैं, घरों में कैद हैं। धरती को सकून से सांस लेने का मौका हाथ लगा है।   पृथ्वी दिवस कोई सांस्कृतिक जलसा नहीं है बल्कि एक संकल्प है। वह संकल्प जिसे हम सभी को धरती सहेजने के लिए प्रत्यज्ञ और कृत्यज्ञ होना चाहिए। सभी को पता है कि धरती नहीं बचेगी तो कोई नहीं बचेगा। जग वीरान हो जाएगा। बावजूद इसके पृथ्वी से खिलवाड़ किया जा रहा है। खिलवाड़ करने का ही नतीजा है कि पृथ्वी में नित नए बदलाव होने लगे हैं। तराई क्षेत्र में तरी कम हो रही है। बुंदेलखंड में मटीले पहाड़ जमींदोज हो रहे हैं, रेगिस्तान में रेत गायब होती जा रही है। इसके अलावा सबसे चिंता का विषय एक और है। पृथ्वी का भू-भाग कुछ दशकों से काफी नीचे खिसक चुका है। वैज्ञानिकों की भू-भाग पर की गई कुछ वर्ष पूर्व की खोज-पड़ताल समीक्षा हमें चेताते हुए सख्त चेतावनी देती है कि सुधर जाओ, संभल जाओ, नहीं तो अंजाम बुरा होगा? लेकिन फिर भी इंसानों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकारें भी इस दिशा में ज्यादा गंभीर नहीं दिखाई पड़तीं। पूरी दुनिया एक ही युक्ति को अपनाकर चल रही है कि ‘जब होगा तब देखा जाएगा?   धरती पर वास करने वाला संपूर्ण मानव जीवन इस वक्त कोरोना वायरस यानी कोविड-19 महामारी के ग्रस्त में समाया हुआ है। कायदे से गौर करें तो कोरोना संकट भी मानवीय हिमाकत के चलते ही उत्पन्न हुआ है। इंसानी हरकतों ने पृथ्वी से प्राकृतिक वस्तुओं, संपदाओं, जनऔषधियों आदि को नष्ट कर दिया है। एक जमाना था जब किसी भी तरह के वायरस, हारी-बीमारी के लिए जमीन पर उगने वाली जड़ी-बूटियों के शरीर से स्पर्श मात्र से ही निवारण हो जाता था। पर, अब ये वस्तुएं ढूंढे से भी नहीं मिलती, सबको उजाड़ दिया है। अपने स्वार्थ और फायदे के लिए इंसान धड़ल्ले से जंगलों को तबाह कर रहे हैं। पहाड़ों को आधुनिक मशीनों से ढहाकर वहां कारखाने स्थापित किए जा रहे हैं। जमीन का खनन हर जगह खुलेआम हो रहा है। कोई रोकने वाला नहीं? हुकूमतों के पास दिखावे और कागजी कानूनों की कोई कमी नहीं लेकिन कार्रवाई सिर्फ रामभरोसे? पृथ्वी को खंडहर में तब्दील करने में इंसान कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा।   इंसानी हरकतें लगातार पृथ्वी का दोहन कर उनपर प्रभाव जमाने की गलती करती जा रही हैं। धरती का सीना चीरकर उसकी कोख से भी पानी खींच रहे हैं। पर्यावरण की परवाह किए बिना अंधाधुंध धरा का सीना फाड़कर गगनचुंबी ईमारतों का निर्माण हो रहा है। इस कृत्य में कोई एक नहीं, सभी बराबर शामिल हैं सिस्टम, सरकारें और मानवीय व्यवस्थाएं। पर्यावरण को दूषित नहीं होने पर सरकारों द्वारा जो प्रयास किए जाते हैं वह नाकाफी ही होते हैं क्योंकि वह सभी कागजों तक सीमित होते हैं। लंबी-लंबी ईमारतों के निर्माणों के लिए बिल्डरों को बकायदा हुकूमतों का संरक्षण प्राप्त होता है। कार्रवाई के नाम पर मात्र दिखावा होता है। हुकूमतों और पृथ्वी के दुश्मनों के बीच सांठगांठ से ही तेल रिसाव संयत्र, प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियां, ऊर्जा सायंत्रों से होने वाले प्रदूषण, मलजल प्रदूषण, विषैले कचरे, कीटनाशक व जंगलों का नाश हो रहा है। इससे हजारों वन्य जीवों का अभी तक विलुप्तिकरण हो गया है अब बारी इंसानों की है। जानलेवा वायरस धरा से छेड़छाड़ का नतीजा ही माना जाए, जिसने अबतक लाखों लोगों की सांसें रोक दी हैं और कई कतार में हैं। दरअसल, अजन्मे और कुदरत रूपी वायरस हमें आने वाले खतरों का संकेत देते हैं। वक्त पृथ्वी को सहेजने, साफ-सुधरा रखने की नसीहत देते हैं। पर, हम माने तब ना? विश्व पृथ्वी दिवस किसी एक मुल्क के लिए नहीं बल्कि समूची दुनिया को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के प्रति सचेत करता है। आज से पूरे पचास वर्ष पहले अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने इस दिवस की स्थापना की थी। जो सदैव पर्यावरण के प्रति चिंतित रहते थे और जनमानस को जागरुकता करते थे। तभी से दो सौ के करीब देश प्रति वर्ष पृथ्वी दिवस को मनाते आए हैं। लेकिन, अब धीरे-धीरे इस दिवस की प्रासंगिकता और भी ज्यादा बढ़ती जा रही है। बढ़ इसलिए रही है अगर समय रहते पृथ्वी को बचाने के प्रति गंभीर नहीं हुए तो अंजाम इंसानी जीवन के लिए बहुत बुरा होने वाला है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 April 2020


bhopal,Union intent service

संजीव उनियाल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी में जिस संवेदनशीलता, दूरदर्शिता तथा बहादुरी का परिचय दिया है वह स्वागत योग्य है। आज डब्लूएचओ, यूएन, यूएसए, यूके, फ्रांस, जर्मनी, इसराइल, साउदी अरब, कुवैत, नेपाल आदि सारे देश मोदी की भूरी-भूरी प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं। इस महामारी में कारगर दवा hydroxychloroquine का 70% उत्पादन भारत में ही होता है, तब मोदी जी ने पूरे संसार को यह दवा उपलब्ध कराई। आज 55 देशों को भारत यह दवा भेज रहा है पर इसका ध्यान रखते हुए कि भारत में इसकी कोई कमी न हो। इस संकट की घड़ी में मानवता को बचाने के लिए यह अति उत्तम व वंदनीय कदम है। वसुधैव कुटुम्बकम- पूरा विश्व हमारा परिवार है, मोदी जी के इस क़दम को ये श्लोक शाश्वत करता है। भारतीय संस्कृति का दर्शन है, सर्वे भवन्तु सुखिना– सब सुखी हों, इसका बड़ा उदाहरण और कहाँ मिलेगा। साथ ही रहीम जी का ये दोहा भी आज के परिपेक्ष्य में चरितार्थ होता है-साईं इतना दीजिये जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी जी पूर्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं। मानव सेवा का व्रत उन्होंने वर्षों पहले संघ की शाखाओं में घुट्टी की तरह पी लिया था। समाज का एक ऐसा अंग भी है जो ऐसे समय में हमेशा ही चुपचाप रहते हुए एक जागृत समाजसेवी की तरह सेवा कार्यों में लग जाता है। वस्तुत: जब लोग सोचना शुरू करते हैं तबतक संघ के स्वयंसेवक गली-कूचे तक पहुँचकर सेवाकार्यों में जुट जाते हैं। हम सबने पहले भी देखा है कि संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र पर आयी किसी भी तरह की आपदा में समय-समय पर हमेशा समाज के साथ खड़े दिखायी पड़ते हैं। विभिन्न सेवा कार्यों से भारत राष्ट्र को, पुनः उन्नत करने के लिए हमेशा अग्रसर रहते हैं। संघ विपरीत परिस्थितियों में अपने आप को लचीलेपन के साथ ढाल लेता है। यह कला संघ को डॉ. हेडगेवार ने आरम्भ से ही, जब संघ के दूध के दाँत आ रहे थे उस समय संघ के स्वयंसेवकों के स्वभाव में डाल दी थी। इसका जीता जागता उदाहरण पूरे संसार ने तब देखा जब संघ पर प्रथम प्रतिबंध 1948 में लगा, फिर 1975 में दूसरे प्रतिबंध में भी समय की नज़ाकत को देखते हुए संघ के सभी कार्यों को पूरा करते हुए उस समय को शालीनता व गम्भीरता से निकाला। इसके अलावा प्रतिदिन जेल में ही शाखा लगाना लगाना, मुखपत्रों का सम्पादन तथा संघ समाज में अपने राष्ट्रवादी विचारों का प्रखरता से प्रचार करते रहना भी जारी रखा। संघ पर तीसरा प्रतिबंध 1992 में बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने पर लगा, जिसको संघ ने बिना विचलित हुए संवैधानिक तरीके से बढ़ते हुए सफलता से पार किया। झारखंड की बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि स्वयंसेवकों का चरित्र ही संघ के एंबेसडर के रूप में काम करता है। आपकी छवि को समाज के लोग जिस रूप में देखते हैं, उसी के अनुसार संघ के बारे में भी धारणा बना लेते हैं। इसलिए अपने चरित्र पर विशेष ध्यान दें। फिर हम ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करें जो विषम परिस्थितियों में भी समाज के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहें। संघ गीत की इन पंक्तियों में स्वयंसेवक का ये स्वभाव परिलक्षित होता है-प्यार नहीं व्यापार हमारा, पुरस्कार की चाह नहीं, उपहारों का मोह नहीं, जयहारों की परवाह नहीं, स्वयं प्ररेणा से माता की सेवा का व्रत धरा है, सत्य स्वयंसेवक बनने का सतत् प्रयत्न हमारा है। सामाजिक व प्राकृतिक विपदाओं में हम सबने पढ़ा है कि संघ के स्वयंसेवक कैसे अपनी कमर कसते हैं। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा इस वैश्विक महामारी में अभूतपूर्व कार्य देखकर सभी हतप्रभ हैं। अगर संघ को समझना है तो इस महामारी में संघ के कुछ कार्यों का उल्लेख अवश्य होना चाहिए। पहले दिन से ही संघ ने योजनाबद्ध तरीके से सेवा भारती के माध्यम से ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। ‘कोई भी भारत वर्ष में भूखा न सोए’-यह संघ व उसके सहयोगी संगठनों का ध्येय वाक्य है। दो लाख से ज़्यादा स्वयंसेवक सेवाकार्यों में लगे हुए हैं, इसमें 2000 डॉक्टर और मेडिकल स्टूडेंट भी हैं। आरएसएस के डॉक्टर और मेडिकल स्टूडेंट जो संघ की प्रेरणा से एनएमओ (नेशनल मेडिकोज़ ऑर्गेनाइजेशन) के बैनर तले पूरे भारत में 110 स्थानों पर सेवा कार्यों में लगे हुए हैं। लगभग 500 डॉक्टर 18 प्रदेशों में विभिन्न सेवा कार्यों में संलग्न हैं। इसके अलावा फूड पैकेट्स, राशन, कम्युनिटी किचन, ब्लड डोनेशन, स्टूडेंट हेल्पलाइन, दिव्यांग हेल्पलाइन, ट्रांसपोर्ट सेवा, गौसेवा, सेक्स वर्क्स को भोजन, ट्रांसजेंडर को भोजन, पशु-पक्षियों के लिए आहार की व्यवस्था, घुमंतु जातियों के लिए व्यवस्था, वनवासी बंधुओं को मदद सहित कई अन्य क्षेत्रो में संघ के स्वयंसेवक लगभग 25 राज्यों में कार्य कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सेवा पहुंचे इसके लिए प्रदेशों को जोन वार बांटा गया है। स्वयंसेवक और सेवा कार्यों के अलावा फेस मास्क, सेनेटाइजर, अस्पताल में सफाई, आइसोलेशन वार्ड की सफाई आदि कार्यों में भी लगे हुए हैं। कार्यकर्ताओं को सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में लोगों को जागरूक करने को कहा गया है। वे लोग जो एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में काम व मजदूरी करने के लिए आये हैं, रोज़ कमाकर खाने वाला वह तबका जो अपने परिवार के साथ इन प्रदेशों में लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हो गया है, उनको कच्चे व पक्के भोजन के पैकेट बांटने का काम भी संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं। संघ के कार्यकर्ता इन खाने के पैकेटों को पुलिस कर्मियों, सफ़ाईकर्मियों व ऐसे कई अन्य फ्रंटलाइन में समाज की सेवा में लगे कर्मियों को भी बांट रहे हैं। संघ का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है दैनिक शाखा, पर इस वैश्विक महामारी के शुरू होने के बाद संघ ने अपनी 60,000 दैनिक शाखाओ को रद्द किया परंतु ऑनलाइन शाखाओं को लगाकर अपने कार्य को सुचारू रूप से चलाया भी। इतनी गहरी सोच केवल निःस्वार्थ भाव से ही आ सकती है। हर प्रांत में ये कार्य कैसे हो रहे हैं इसको समझने के लिए दिल्ली का उदाहरण लेते हैं। दिल्ली प्रांत की बात करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक दृष्टि से 8 विभाग हैं जिसमें 30 ज़िले हैं, उसके नीचे हर जिले में 9 नगर हैं तथा हर नगर में 3-4 मंडल हैं। हर मंडल में 4-5 तक शाखायें हैं तो संघ ने बहुत ही तत्परता से इस आपदा से निपटने के लिए इसी संगठनात्मक रचना का प्रयोग किया ताकि सब तक राहत कार्य पहुँच सके और कोई दोहराव ना हो। इसके साथ ही एक सेंट्रल हेल्पलाइन भी शुरू की है। एकदिन में 12000 तक कॉल संघ के 150 टेलिकॉलर्स अटेंड करते हैं तथा सम्बंधित जिले में उसको फॉरवर्ड कर देते हैं, जहाँ से जिला सम्पर्क प्रमुख अपने-अपने जिले के नगर कार्यवाह उस मंडल या शाखा के कार्यकर्ताओं को कॉल की डिटेल देते हैं, जैसे कॉल करने वाले व्यक्ति की डिटेल्स, किस चीज़ की आवश्यकता है आदि। स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्रों में आवश्यकतानुसार आटा, चावल, दाल, मसाले, तेल आदि उनको पहुँचा देते हैं। इसके अतिरिक्त मास्क,  दवाइयों का भी इंतजाम कर रहे हैं। यह सेवा संघ के स्वयंसेवकों द्वारा निःशुल्क की जाती है। इसलिए ये पौराणिक कथन सत्य प्रतीत होता है कि ’संघे शक्ति कलयुगे।’ इसके अतिरिक्त पशुओं की भी चिंता संघ के स्वयंसेवकों ने की। इसी के तहत गायों के लिए केवल दिल्ली की बात करें तो 75000 किलो चारा 15 अप्रैल तक संघ के स्वयंसेवकों ने दिया। स्वयंसेवकों ने स्ट्रीट डॉग्स के लिए दूध व पानी का भी प्रबंध किया। घुमंतु जातियों के 2700 परिवारों को राशन किट का वितरण भी संघ कार्यकर्ताओं ने किया। बच्चों के लिए नियमित रूप से दूध की व्यवस्था भी संघ के स्वयंसेवकों ने की। सिख समाज ने भी आगे बढ़कर समाज की यथासंभव सेवा की है। वहींं दूसरी ओर यह भी देखने में आया है कि छोटे-बड़े लाखों एनजीओ भारत में हैं पर लगता है वे केवल टैक्स माफी या विदेशी चंदा इकट्ठा करने के लिए हैं। आज समय आ गया है कि समाज अपनी आँखों से देखे कि विपत्ति के समय कौन समाज की सेवा के लिए तन, मन, धन से खड़ा है। रहीम के इस दोहे को संघ के स्वयंसेवक जीवंत करते से प्रतीत होते हैं– कहि ‘रहीम’ संपति सगे, बनत बहुत बहुरीत। बिपति-कसौटी जे कसे, तेही सांचे मीत॥ अर्थात धन सम्पत्ति हो, सुख के दिन होते हैं तो अनेक लोग सगे-संबंधी बन जाते हैं। पर सच्चे मित्र व अपने तो वे ही हैं, जो विपत्ति की कसौटी पर कसे जाने पर खरे उतरते हैं। सोना सच्चा है या खोटा, इसकी परख कसौटी पर घिसने से होती है। इसी प्रकार विपत्ति में जो हर तरह से साथ देता है, वही सच्चा मित्र है। इन सभी कार्यों को करते हुए सभी कार्यकर्ताओं ने पूरे सुरक्षा मानकों, सोशल डिस्टेंस और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन किया, साथ ही सरकार से जारी अधिकृत कर्फ्यू पास के साथ ही सभी सेवा कार्य करने का काम किया। बिना किसी सरकारी मदद के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी सेवा कार्यों को कर रहा है। (लेखक उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हैं।)

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Dakhal News 21 April 2020


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आर.के. सिन्हा   क्या इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात कोई हो सकती है कि कोरोना जैसी जालिम महामारी से भी भारत एकसाथ मिलकर लड़ नहीं पा रहा है। सरकार दिन-रात लड़ाई लड़ रही है। प्रधानमंत्री और ज्यादातर मुख्यमंत्री जी-जान की बाजी लगाये हुये हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संकट की इस घड़ी में अपने पिता की अंत्येष्टि तक में नहीं जा रहे हैं। लेकिन अब भी कुछ नीच शक्तियां बाज नहीं आ रही हैं। जरा देखिए कि महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर को भीड़ पीट-पीटकर मार देती है। उधर, भारत के खिलाफ अपनी नफरत को फिर से जाहिर करते हुए कथित लेखिका अरुंधति राय जर्मनी की एक समाचार एजेंसी से कहती हैं कि सरकार कोरोना संकट का इस्तेमाल मुसलमानों के नरसंहार की रणनीति बनाने में कर रही है। वैसे वे भारत के पक्ष में न कभी कोई लेख लिखती हैं और न ही बयान देती हैं। वे एक ऐसी भारतीय हैं जो भारतीय नारी का कलंक हैं। वे वर्षों से भारत विरोधी ताकतों की गोद में खेल रही हैं। शायद देश विरोधी आचरण में ही उन्हें आनन्द की अनुभूति होती है और यह तो आम चर्चा है और सर्वविदित है कि मैडम के पास विदेशों से मोटा पैसा आता है, जिससे वे अपना ऐश-मौज करती हैं और देश के विरुद्ध गालियां और देशद्रोहियों की खुलेआम प्रशंसा करती हैं।   अगर बात महाराष्ट्र में साधुओं के कत्ल की करें तो यह वास्तव में दिल दहलाने वाली घटना है। आसान नहीं है यह सोचना भी कि कोई इतना क्रूर, निर्दयी और हिंसक कैसे हो सकता है? कौन थी वो भीड़ जिसने जूना अखाड़े के दो निरपराध साधुओं और उनके ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या कर दी? भीड़ को न पुलिस का डर था न ही मारने वाले लोगों में इंसानों के प्रति कोई दया भावना। बूढ़े घायल साधुओं को जिस तरह से लोग लाठियों से पीट-पीटकर हत्या कर रहे थे, वह इंसानों के वहशी बना दिये जाने की कहानी है। साधुओं को पुलिस के सामने ही मारा जा रहा था। पुलिस अपनी जान बचाने के लिए पतली गली से निकल गई। लेकिन जो कुछ घटा है वह सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। साधुओं की हत्या के मामले में लगभग 100 लोग पकड़े गए हैं। भीड़ के दंगे के तमाम मामलों में जब-जब भीड़ पकड़ी जाती है तो एकसाथ छूट भी जाती है। बेहतर होगा कि राज्य प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि गुनहगारों को ऐसी कड़ी सजा मिले कि दोबारा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इस घटना की न्यायिक जांच होनी चाहिए। भीड़ द्वारा किये जाने वाले अन्याय को समर्थन देने से देश की न्याय व्यवस्था खत्म हो जाएगी। सोचने की बात है कि कुछ लोग चोर होने के शक पर किसी भी इंसान की हत्या कर देते हैं और चंद लोग इसे भीड़ प्रवृत्ति के तौर पर आंकने की कोशिश करके लीपा-पोती का प्रयास करते हैं? भीड़ भी तो कुछ इंसानों से ही निर्मित होती है। सच में अगर चोर था तो पकड़कर पुलिस को सौंपा जा सकता था।   मुझे मेरे मुम्बई के पत्रकार मित्रों ने बताया कि यह पिछले दस दिनों में तीसरी घटना है। पहले शिवसेना से जुड़े दो डॉक्टर साहब को पीटा गया। उन्हें काफी देर तक बांधकर रखा था। बाद में कासा पुलिस थाना ने तीन घंटे की हुज्जत के बाद उन्हें छुड़ाया। फिर एक पुलिस पार्टी पर भी पिछले हफ्ते पथराव हुआ। तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या का मामला इतना सरल नहीं है जैसा कहा जा रहा है, चोरों और फसल काटकर ले जाने वालों के आने का अफवाह था। अब बताइये कि मराठी भाषी डॉक्टर या पुलिस की पेट्रोलिंग पार्टी या सत्तर साल के गेरुआ वस्त्रधारी महात्मा चोर किस प्रकार से दिख रहे थे?   क्या साधुओं की हत्या मॉब लिंचिंग नहीं मानी जाएगी? क्या अब पुरस्कार वापसी गिरोह सरकार से वैसे ही सवाल करेगा जिस तरह उसने अखलाक या पहलू खान के मारे जाने पर किए थे? अखलाक की दिल्ली से सटे नोएडा में हत्या के बाद तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष गैंग के सदस्य मृतक अखलाक के घर पहुंचने लगे थे। ये संवेदना कम और सियासत ज्यादा करते नजर आ रहे थे। उनमें राहुल गांधी भी थे। क्या अब वे साधुओं की हत्या के लिए अपनी कांग्रेस के समर्थन से बनी महाराष्ट्र सरकार को कसेंगे? महाराष्ट्र में आजकल शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार है। क्या इस घटना के बाद कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी महाराष्ट्र सरकार से समर्थन वापस लेंगी? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी, माकपा की वृंदा करात और तमाम अन्य नेता भी अखलाक के घर गए थे। तब के केन्द्रीय मंत्री और नोएडा से सांसद महेश शर्मा ने अखलाक की हत्या पर कहा था "यह हमारी संस्कृति पर धब्बा है और सभ्य समाज में इस तरह की घटनाओं का कोई स्थान नहीं है। अगर कोई कहता है कि यह पूर्व नियोजित था तो मैं इससे सहमत नहीं हूं।" क्या अब महाराष्ट्र के सत्तासीन गठबंधन का कोई नेता मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से सवाल पूछेगा कि उनकी पुलिस के सामने साधु कैसे मार दिए गए? क्या कोई साहित्यकार साधुओं के कत्ल पर पुरस्कार वापस करेगा?   यकीन मानिए इन तमाम सवालों के जवाब 'ना' में हैं। क्योंकि साधू हिन्दू थे इसलिए उनके प्रति कोई संवेदना नहीं व्यक्त करेगा? यहाँ गहरे षड्यंत्र की बू आ रही है। पता चला है पालघर जिले के जंगलों में बसे गांवों में आदिवासियों को ईसाई बनाने का धंधा जोरों से चल रहा है। एक व्यक्ति के क्रास पहनने की रिश्वत बीस से पचीस हजार है। करना कुछ नहीं है। क्रास पहनकर टाइटिल में कोई ईसाई नाम लगा लो और हर रविवार को चर्च में हाजिरी बना दो। बस। इस प्रकार एक गरीब परिवार को सवा-डेढ़ लाख मिल जाते हैं तो वे उनकी बात (अफवाह नहीं आदेश) क्यों न माने। अब दो साधुओं की लिंचिंग की भारी कीमत मिलनी तय है। जिस इलाके में यह घटना हुई उस कासा थाना क्षेत्र के थानाध्यक्ष और उप-थानाध्यक्ष को निलम्बित करने की खानापूरी कर ली गई है। जिस विधानसभा क्षेत्र में यह घटना हुई वह क्षेत्र है डहाणू और वहां से विधायक हैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी की श्रीमान् बिनोद भिवा निकोले। इनकी गतिविधियों और घटना में संलिप्तता की जाँच होनी भी जरूरी है।अभी से ही कई प्रगतिशील सेक्युलरवादी कहने लगे हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोषियों को पकड़ लिया है। यानि इतने रोंगटे खड़े कर देने वाले कांड की लीपापोती भी शुरू हो गई है। कोरोना काल में मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोग, पुलिस, प्रशासन और अन्य जरूरी सेवाओं से जुड़े लोग सेवा में लगे हैं, उससे लग रहा है कि ये वक्त भी गुजर ही जाएगा। पर न जाने कितनी कीमत वसूल कर ले जाएगा? इसके साथ ही लिख लीजिए कि जो अरुंधति राय आरोप लगा रही हैं कि भारत सरकार कोरोना के नाम पर मुसलमानों पर जुल्मो-सितम कर रही है वह भी साधुओं के मारे जाने पर एक शब्द नहीं बोलेंगी। ऐसे छद्म धर्म निरपेक्षवादियों के एजेंडे को समझने की जरूरत है। वैसे कहने को तो अरुंधति राय अपने को मानवाधिकारवादी कहती हैं पर उन्हें कश्मीर में पंडितों का कत्लेआम दिखाई नहीं दिया था। हो सकता है कि वह उस कत्लेआम को सेक्युलर कत्लेआम मानती हों। इसलिए जो लोग अरुंधति राय से साधुओं के मारे जाने पर किसी संवेदना की उम्मीद कर रहे होंगे, वे गुस्ताखी माफ मुगालते में ही जी रहे हैं। देश में कई कोरोना योद्धा और दो पुलिस अधिकारी भी शहीद हो चुके हैं। पर राय ने उनके लिए एक शब्द भी संवेदना में नहीं बोला। वे सब हम सबको कोरोना से बचाने के लिए दिन-रात सड़कों पर हैं लेकिन अरुंंधती को तो जमातियों को पकड़ने में जद्दोजहद करती पुलिस मुसलमानों पर अत्याचार करती दिखती है।   हैरानी की बात तो यह है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना को किसी जाति, समुदाय, धर्म या सीमा से जोड़ने के खिलाफ ट्वीट कर रहे हैं, तब अरुंधति राय भारत पर आरोपों की बौछार लगा रही है। एक बात जान लें कि अरुंधति राय हर दौर में मोदी सरकार का विरोध ही करती रही हैं। वह सिर्फ मौजूदा सरकार से ही नाराज नहीं हैं। उन्हें देश का हर नेता जनता का दुश्मन नजर आता है। भारत का शत्रु पाकिस्तान उन्हें संसार की महानतम हस्ती मानता है। क्योंकि वे भारत को जलील करने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। कुछ साल पहले अरुंधति राय ने मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा शुरू किए अखबार 'दि डान' को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके पूर्ववर्ती डॉक्टर मनमोहन सिंह को भी पानी पी-पीकर कोसा था।   तो देश अब यह देख रहा है कि इन कठिन हालतों में भी कुछ नकारात्मकता से ग्रसित तत्व शर्मनाक कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं। इनकी निंदा भर कर देना भी शायद रेत में मुंह छिपा लेना होगा। एकबार कोरोना से ल़ड़ाई जीतने के बाद मोदी सरकार को उन शक्तियों से लड़ना होगा जो देश को दीमक की तरह से चाट रही हैं। किसी भी कीमत पर राष्ट्रद्रोहियों का समूल नाश होना ही चाहिये।   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 21 April 2020


bhopal, What is the purpose of Tablighi Jamaat?

आर.के. सिन्हा   देश को कमबख्त कोरोना वायरस के जाल में फंसाकर भारी नुकसान पहुंचाने की कथित रूप से साजिश रचने वाला तब्लीगी जमात का नेता मौलाना साद कांधलवी का सारा गंदा खेल अब दुनिया के सामने रोज खुलकर आ रहा है। अपने को इस्लाम का विद्वान बताने वाला मौलाना साद भ्रष्टाचार और देश विरोधी हरकतों में आकंठ डूबा हुआ साबित हो रहा है। वह धर्म प्रचार और इस्लामिक कट्टरवाद फ़ैलाने के नाम पर बड़े पैमाने पर विदेशों से हवाला के जरिये पैसा जुटाता था। अब उसकी औकात पता चल गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने निजामुद्दीन मरकज के तब्लीगी जमात के नेता मौलाना साद कांधलवी और प्रबंधन कमेटी पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। उसपर आरोप है कि उसे जो धन हवाला के जरिए मिलता था उसके एक भाग का इस्तेमाल निजामुद्दीन इलाके में नई मस्जिदों के बनाने और उन्हें भव्य करने पर होता था, शेष धन से वह और उसके करीबी चेले अय्याशी करते थे। अब तो उसके सारे काले चिट्ठे खुलकर रहेंगे।   सबसे गौर करने लायक बात यह है कि अगर वह सच में दूध का धुला होता तो पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देता। पर वह तो फरार है। क्या किसी धार्मिक नेता से इस तरह की अपराधियों वाली हरकत की उम्मीद की जानी चाहिए? पर वह तमाम गंदे खेल खेलने के बाद भी मुसलमानों की आंखों में धूल झोंककर तब्लीगी मरकज का एकछत्र नेता बना हुआ था। मौलाना साद जैसे लोग मुस्लिम समाज के सबसे हानिकारक तत्व हैं। क्योंकि इनकी दीक्षा समाज को पीछे ले जाने वाली है। इस्लाम की मूलभूत शिक्षा के विपरीत है, ऐसा इस्लाम के जानकर विद्वान बताते हैं। निजामुद्दीन जमात के दौरान इन जैसे मौलानाओं की तमाम पाखंडी तकरीरों की कुछ वीडियो यू-ट्यूब पर सामने आये हैं। आशंका के मुताबिक़ ही साद कोरोना से बचाव के लिए सरकार का सहयोग करना तो दूर, तमाम अंधविश्वास फैलाता रहा। जिसके कारण तमाम जमातियों को कोविड-19 का संक्रमण हो गया है। उसकी इस अक्षम्य हरकत से इस महामारी से लड़ने की पूरी मुहिम को बड़ा आघात पहुंचा है। मौलाना साद में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि सामने आकर देश से अपनी चूक और मूर्खता के लिए माफी मांगे। दरअसल वह तो देश का शत्रु नंबर वन बनकर उभरा है। उसी की देखरेख में निजामुद्दीन मरकज में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो भारत में कोरोना का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बना। इसमें देश और दुनिया के हजारों जमाती आए। कोई कहता है, बारह हजार तो कोई सात हजार। उनमें से सैकड़ों की संख्या में कोरोना संक्रमित पाए गए। उनमें से दर्जनों कोरोना वायरस के कारण संसार से कूच भी कर गए लेकिन मौलाना साद तो खुलेआम कहता रहा कि कोरोना से मरना ही है तो मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। यह उसकी मूर्खता थी या देशभर में कोरोना फ़ैलाने की सोची समझी योजना? यह तो अनुसन्धान से ही पता चल सकेगा।   बहरहाल, साद पर मनी लॉन्ड्रिंग के केस दर्ज होने से पहले गैर इरादतन हत्या का मामला और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किया जा चुका है। तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल लोगों में से कईयों की कोरोना वायरस से मौत के बाद पुलिस ने यह कदम उठाया था। साद इतना नीच किस्म का इंसान है कि कोरोना वायरस पर काबू करने के लिए सामाजिक दूरी संबंधी सरकार के दिशा-निर्देशों की अनदेखी करते हुए उसने निज़ामुद्दीन मरकज़ में अपने चेलों को संक्रमण के परवान चढ़ने के बाद पूरे देश और विदेशों से भी बुलाया।   मुझे यहां कहने दें कि जब धूर्त साद अपना कोरोना संक्रमण वृद्धि कार्यक्रम चला रहा था, तब तक दिल्ली की कश्मीरी गेट स्थित शिया जामा मस्जिद को नमाजियों के लिए बंद कर दिया गया था। इसके इमाम मौलाना मोहम्मद मोहसिन तकी कहते हैं कि हमने केन्द्र सरकार के निर्देशों का पालन करते सबसे पहले कोरोना वायरस से बचाव के लिए इस मस्जिद में नमाजियों के आने पर रोक लगा दी थी ताकि सोशल डिस्टेंसिंग की जा सके। फिलहाल इस मस्जिद में सिर्फ इमाम और मुइज्जिन ही नमाज पढ़ रहे हैं। इधर मुइज्जिन लाउडस्पीकर पर अजान तक नहीं देते। क्या ये मुसलमान नहीं है? शिया जामा मस्जिद की तरह दिल्ली की एतिहासिक जामा मस्जिद को भी सोशल डिस्टेनसिंग के नियम का पालन करते हुए नमाजियों के लिए बंद कर दिया गया था। तब से इधर पांचों वक्त की नमाज सिर्फ इमाम साहब और मस्जिद के मुइज्जिन वगैरह ही पढ़ते हैं। यहाँ तो 25 जुलाई, सन 1657 से लगातार दिल्ली वाले नमाज पढ़ रहे थे। उस दिन दिल्ली ईद उल जुहा मना रही थी। उस पवित्र दिन जामा मस्जिद में पहली बार नमाज़ पढ़ी गई थी। पर साद के इरादे इन दोनों तारीखी मस्जिदों की तरह नेक कहां थे? वह तो भारत को कब्रिस्तान में बदलना चाह रह था। जिस धरती में उसका जन्म हुआ उसे ही वह क्षति पहुंचा रहा था।   एक बात मान लीजिए कि अब ईडी की कार्रवाई के बाद मौलाना साद पर कायदे से शिकंजा कस गया है। अब उसे कोई बचा नहीं सकता। वह देशहित और देश के बीस करोड़ मुसलमानों के हित में बचना भी नहीं चाहिए। इस तरह के पापियों को कठोर सजा मिले तो ही अच्छा होगा। इस देश में साद जैसे इंसान की जगह सिर्फ जेल ही हो सकती है। वह अपने चेलों को अंधकार के घने बियावान में धकेलता जा रहा था। उसने कभी भी यह कोशिश नहीं की कि तब्लीगी मरकज से जुड़े लोग आधुनिक शिक्षा से रूबरू हों या रोशन ख्याल बनें। साद का तो एक ही लक्ष्य था, अपने चेलों को अंधेरे में रखना। उसमें वह सफल भी हो रहा था। अफसोस होता कि कि इतने बदबूदार इंसान के लिए भी कई कथित ज्ञानी लोग सामने आने लगते हैं। मोम्मट्टी ब्रिगेड भी इस राष्ट्रद्रोही के विरुद्ध चुप्पी साधे हुए है। धिक्कार है उनकी शर्मनाक हरकतों पर। इनमें अनेकों बड़े राजनेता भी शामिल हैं।   अफसोस इस बात का भी कम नहीं है कि जिस तब्लीगी जमात पर अलकायदा जैसे खूंखार आतंकी संगठन से संबंधों के भी आरोप लगते रहे हैं, वह भारत में बिना किसी रोक-टोक पैर पसारे जा रहा था। अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमले में शामिल अलकायदा के कुछ आतंकियों के भी तब्लीगी जमात से संबंध मिले थे। विगत में तब्लीगी जमात के कई सदस्य आतंकवादी गतिविधियों में पाए जाते रहे हैं। लन्दन के मेट्रो ब्लास्ट के आतंकवादियों में भी जमाती शामिल थे। वैसे जानने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की तब्लीगी जमातें भारत में जिहाद फैलाने की कोशिश करती रही हैं। यह भी कहा जाता है कि हरकत-उल-मुजाहिदीन के भी तार तब्लीगी जमात से जुड़े रहे हैं। भारत भूला नहीं है कि हरकत-उल-मुजाहिदीन ने ही 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण किया था। साद के बारे में पता चल रहा है कि उसकी तब्लीगी जमात से अच्छी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान भी जुड़े हुए हैं। निजामुद्दीन मरकज में अनेकों रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठिये शामिल हुए थे, जिनकी तलाश हो रही है। यानी कोरोना वायरस फैलाने के क्रम में शातिर साद अब फंस गया है। अब उसकी जगह जिन्दगी भर जेल ही होनी चाहिए।     (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 19 April 2020


bhopal,Challenges , cabinet formation, CM Shivraj , Corona period

सतीश एलिया   देश जिस अभूतपूर्व वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के चलते तालाबंदी में कैद है, इसके इलाज के उपायों और बचाव के दिन-रात प्रयासों के बावजूद वायरस संक्रमितों और मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में इस वायरस से होने वाली मौतों की तादाद रोजाना बढ़ रही है और इसमें चिकित्सकों से लेकर पुलिसकर्मी तक शामिल हैं। इस बीच कोरोना संकटकाल में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के तख्तापलट से जन्मी भाजपा की शिवराज सरकार ने एक नया रिकार्ड बना लिया है। चौथी दफा मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान मप्र के इतिहास में अबतक के सर्वाधिक अवधि वाले मुख्यमंत्री इस चौथी पारी की शुरूआत में ही बन चुके हैं। इसके अलावा वे सर्वाधिक दिन तक बिना मंत्रिमंडल के मुख्यमंत्री रहने के मामले में भी नया कीर्तिमान बना चुके हैं। उनसे पहले यह रिकार्ड कर्नाटक के वर्तमान मुख्यमंत्री वीएस येदियुरप्पा के नाम था, वे 24 दिन बिना मंत्रियों के रहे थे और शिवराज 27 दिन से अकेले ही मप्र सरकार चला रहे हैं। इसमें यह भी है कि येदियुरप्पा के सामने कोरोना महामारी से निपटने जैसा अभूतपूर्व संकट नहीं था।   इसलिए नहीं बन पा रहा मंत्रिमंडल जिन हालात में कमलनाथ सरकार का पतन हुआ और शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, वे सियासी लिहाज से भी अभूतपूर्व थे। कांग्रेस के 22 विधायकों की पार्टी से बगावत और उससे पहले उनके नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ भाजपा प्रवेश के घटनाक्रम में इन बागी विधायकों के इस्तीफे मंजूर किए जाने और विधानसभा में बहुमत साबित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक के कई एपिसोड शामिल हैँ। भाजपा ने 13 साल मुख्यमंत्री रह चुके चौहान को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करके इस पद को लेकर भाजपा में ही चल रही अंदरूनी खींचतान को तो थाम लिया लेकिन मंत्री बनाने को लेकर भाजपा से ज्यादा कांग्रेस से भाजपा में आए सिंधिया समर्थक पूर्व मंत्रियों की महात्वाकांक्षा को रोक पाना मुश्किल था। कोरोना संकट के लिहाज में मंत्रिमंडल गठन टाल दिया गया। लेकिन कोरोना संकट से निपटने में अकेले जूझते मुख्यमंत्री शिवराज और इंदौर-भोपाल में कोरोना के हालात बिगड़ने पर पूर्व सीएम कमलनाथ से लेकर समूची कांग्रेस ने मंत्रिमंडल गठन को लेकर सियासत शुरू कर दी, मकसद था पूर्व मंत्रियों की नई बगावत की सुगबुगाहट पैदा करना। भाजपा कांग्रेस की इस चाल में कोरोना संकटकाल में उलझना नहीं चाहती थी। इस वजह से करीब साढ़े तीन हफ्ते बीत गए लेकिन अब भाजपा की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण किरदार निभाने वाले भाजपा के वरिष्ठ विधायकों और सिंधिया के साथ बगावती झंडा लेकर कांग्रेस से भाजपा में आए पूर्व मंत्रियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ये अब विधायक भी नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने इन नवागत भाजपाइयों में से कुछ को मंत्रिमंडल में शामिल करने और अपने पूर्व के विश्वस्त साथियों को भी समाहित करने की चुनौती है।   20 अप्रैल के इंतजार के पीछे ये है वजह 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश को संबोधन में लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ाने और इसमें 20 अप्रैल को कुछ रियायतें देने की घोषणा के मद्देनजर एकबार फिर भाजपा में मंत्रिमंडल गठन की कवायद तेज हुई। इसी बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया की केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात ने इस अवश्यंभावी मंत्रिमंडल गठन में सिंधिया गुट की बेसब्री को रेखांकित किया। इधर हर शुभ कार्य में पचांग देखने के इतिहास वाली भाजपा में पंचक समाप्त होने का इंतजार किया जा रहा है। लॉकडाउन में रियायत काल शुरू होते ही पंचक भी समाप्त होने वाले हैं। संभावना है कि सोमवार से शुरू हो रहे हफ्ते में मंत्रिमंडल गठन हो सकता है।   क्या उप मुख्यमंत्री बनाएंगे शिवराज कांग्रेस की तरह जाहिर तौर पर चिन्हित गुटबाजी न होते हुए भी भाजपा में हमेशा दो गुट बने रहने का मप्र में इतिहास है। कभी पटवा-सारंग गुट हुआ करता तो उमा भारती-कैलाश जोशी गुट भी हाेता था। मप्र में जनता सरकार में मुख्यमंत्री रहे वीरेंद्र कुमार सखलेचा का राजनीतिक पराभव और वर्तमान में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पूर्व मंत्री विक्रम वर्मा का सियासी पराभव भी भाजपा की गुटबाजी का ही परिणाम रहा है। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं फिर भी भाजपा में गुटबाजी उतनी मुखर और प्रभावी नहीं रही जितनी कांग्रेस में रहती आई है। लेकिन सियासत में मूलत: कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने और उनके साथ 22 विधायकों का भी विधायकी त्यागकर भाजपा मेंं आना, जिनमें आधा दर्जन पूर्व मंत्री भी शामिल हैं, जो दशकों से कांग्रेस में थे, भाजपा में वर्तमान में स्पष्ट रूप से सिंधिया गुट के रूप में सामने है। माना यह जा रहा है कि सिंधिया कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद जिस बात पर अड़े थे और जिसकी पूर्ति नहीं होने पर अंतत: 14 महीने बाद कमलनाथ सरकार का पतन हो गया, वे भाजपा में भी वही मांग पूरी करवाने के लिए जिद कर रहे हैं।   कमलनाथ खुद सिंधिया को तो उपमुख्यमंत्री बनाने पर राजी थे लेकिन वे उनके किसी समर्थक विधायक को डिप्टी सीएम बनाने पर तैयार नहीं हुए और कांग्रेस ने कमलनाथ की मान ली थी, सिंधिया डिप्टी सीएम बनने राजी नहीं हुए तो उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया। इसे उन्होंने अपमान की तरह लिया और करीब सवा साल बर्दाश्त भी किया। तो क्या भाजपा सिंधिया के किसी समर्थक पूर्व मंत्री को शिवराज का डिप्टी सीएम बनाने पर राजी होगी? यही वो सवाल है जिसके जवाब में मंत्रिमंडल का गठन अटका हुआ है। अगर शिवराज को यह मानने के लिए राजी होना पड़ा तो भाजपा एक और डिप्टी सीएम बनाने पर विचार कर सकती है लेकिन क्या शिवराज इस पर राजी होंगे? अगर हो भी गए थे तो वह कौन होगा? इसे लेकर भी पार्टी के अंत:पुर से लेकर कोरोना संकट से सन्नाटे में डूबे सियासी गलियारों में राजनीतिक प्रेक्षक कयासबाजी के कंकड़ फेंककर हलचल पैदा कर रहे हैं। कमलनाथ सरकार के वक्त नेता प्रतिपक्ष रहे भाजपा के वरिष्ठतम विधायक पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव, शिवराज सरकार में हमेशा संकटमोचक की भूमिका में रहे और भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक, कमलनाथ सरकार के तख्ता पलट के प्रमुख सूत्रधार नरोत्तम मिश्रा के नाम इस दूसरे डिप्टी सीएम की संभावना में लिए जा रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो शिवराज के दो संभावित डिप्टी में यह दूसरा नाम ही पहली पायदान पर होगा। सिंधिया गुट से चर्चा में वही नाम है जो कमलनाथ को रास नहीं आया था, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तुलसीराम सिलावट। सिलावट सिंधिया के खास सिपहसालार तो हैं ही भाजपा के अखंड 15 साल के दौरान भी विधायक रहे और महज सवा साल मंत्री रह सके।   देखना यह है कि मंत्रिमंडल के गठन में क्या फॉर्मूला काम करता है, सिंधिया के समर्थक छह पूर्व मंत्री जो अब विधायक तक नहीं हैं, उनमें से कितने मंत्री शामिल होंगे? डिप्टी सीएम पद मिला तो कितने? नहीं मिला तो कितने? अधिकतम तीस मंत्री बनने की गुंजाइश के बावजूद कोरोना काल में फिलहाल कितने मंत्री होंगे और बाद में विस्तार की कितनी गुंजाइश रखी जाएगी। अबतक की शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली और संतुलन की उनकी कोशिश से ऐसा लगता है कि वे अपने लिए सुविधाजनक फैसला करवाने में सफल होंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 April 2020


bhopal, Corona vs Untouchability

डॉ. मोक्षराज   जीवन में शुद्धि व स्वच्छता अत्यंत आवश्यक है, यह सिद्धांत सर्वमान्य है। संसार के सभी महापुरुष एवं विभिन्न पवित्र ग्रंथ भी स्थान, शरीर, वाणी एवं मन की शुद्धि के लिए प्रेरणा देते रहे हैं। स्थान व शरीर की अपेक्षा वाणी एवं मन की पवित्रता को भी भारतीय साहित्य ने पर्याप्त महत्व दिया है, वेदों में ‘यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत:।’ कहकर स्पष्ट कर दिया है कि समस्त प्राणियों में अपनी आत्मा के समान देखें एवं मोह व शोक से परे होकर एकत्व भाव में जीएँ। यही विचार युगों-युगों तक चलता रहा है।   यथायोग्य व्यवहार की थी वैदिक परंपरा ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण के रचनाकार महर्षि महिदास इतरा नाम की शूद्रा के पुत्र थे, जिनके नाम पर ऐतरेय ब्राह्मण प्रसिद्ध हुआ। इसी ब्राह्मणग्रंथ में जहाँ सृष्टि विद्या एवं सूर्यविद्या का विवेचन किया है, वहीं इसके एक आख्यान में उल्लिखित है कि- महर्षि विश्वामित्र ने स्वयं की सौ संतान होते हुए भी दूसरे कुल में उत्पन्न हुए निर्धन शुन:शेप को श्रेष्ठ संतान के रूप में स्वीकार कर विशेष प्रतिष्ठा दिलायी। रामायण में निषादराज गुह्य, केवट रघु, शबरी, वन में रहने से वानर कहलाने वाले महाबली सुग्रीव- हनुमान, गृद्धकूट के महामानव जटायु, तपस्वी साधक संपाति, आर्यपुत्र श्रीराम-लक्ष्मण, राक्षस कुल के विभीषण व त्रिजटा, मुनि वशिष्ठ, विश्वामित्र एवं भारद्वाज आदि अलग-अलग शारीरिक बौद्धिक और भावनात्मक क्षमता वाले सभी नर-नारियों के मैत्रीपूर्ण वर्णन हैं। महाभारत में देवकन्या मेनका, धीवर की पुत्री सत्यवती, नागकन्या उलोपी, असुर पुत्री हिडिंबा तथा प्रतिष्ठित राज्यों की राजकुमारियाँ रुक्मिणी, द्रौपदी, उत्तरा आदि भरतवंश की वधू हुईं तथा परिश्रमी दासी के पुत्र महात्मा विदुर एक महान नीतिज्ञ हुए।   मुगलों व अंग्रेजों ने भारत में घृणा का विष घोला व्यापक स्तर पर शस्त्र त्याग, अशास्त्रीय अहिंसा तथा दुष्टों को क्षमादान देने जैसे निरर्थक अभियान ने भारत के वीर भावों को न केवल अत्यधिक क्षति पहुँचाई बल्कि वे भारतवर्ष के लिए अदूरदर्शितापूर्ण सिद्ध हुए, परिणामस्वरूप भारत में विभिन्न आक्रांताओं के सामाजिक दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगे। मुगलों के काल में उत्पन्न छुआछूत की नई बीमारी व भेदभाव के दूषित भाव को रोकने के लिए तत्कालीन संत कबीरदास, समर्थ गुरु रामदास, रविदास, रैदास, बिहारी एवं भास्कर कवि ने समाज के तानेबाने को छिन्न- भिन्न होने से रोक कर रखा किंतु अंग्रेजों ने छल-कपट, वैमनस्य, भेदभाव अर्थात् फूटनीति व कूटनीति से निर्ममतापूर्वक भारत पर शासन करते हुए छुआछूत की बीमारी को सुनियोजित ढंग से बढ़ाया। अंग्रेज एवं मुगलों के आने से पहले भारत में भावनात्मक रूप से कोई भेदभाव नहीं था। यदि किसी साहित्य में भेदभाव की कोई भी घटना बताई भी जाती है तो वह षड्यंत्रपूर्वक जोड़ी हुई घटना मात्र है। वैसे भी समाज के अच्छे भविष्य के निर्माण हेतु इतिहास की अच्छाइयों को ही अपनाना उचित है, किसी शत्रु देश या विघटनकारियों की कठपुतली बनकर वर्तमान को बिगाड़ने से किसी का भला नहीं होगा ।    आर्यसमाज ने चलाया था मुगलों व अंग्रेजों के षड्यंत्रों को विफल करने का अभियान 1875 में स्थापित हुए आर्यसमाज ने छुआछूत की बीमारी को दूर हटाने के लिए भी व्यापक स्तर पर अभियान चलाया। यह अभियान भारत सहित दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद, मॉरीशस, बर्मा, नेपाल, यूगांडा, फीजी तक फैला था। आज भी भारत में लाखों लोग ऐसे हैं जो चाहे किसी दलित परिवार के माने जाते रहे हों या किसी अन्य के, उन्हें आर्यसमाज ने ब्राह्मण बनाकर यज्ञ का ब्रह्मा व उपदेशक तक बनाया है। तथाकथित महापुरुष केवल अपनी ही जाति विशेष की भलाई में लगे रहे हों किंतु महर्षि दयानंद सरस्वती ब्राह्मण कुल में जन्मने के उपरांत भी लाखों पिछड़ों/दलितों को ब्राह्मण व सच्चा आर्य बना गए थे। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त तथा उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा के माननीय सदस्य बड़ौदा के राजा गायकवाड़ ने भीमराव की प्रतिभा को देखकर उन्हें छात्रवृत्ति देकर विलायत भेजा तथा मध्य प्रदेश स्थित महू के महादेव अंबेडकर नाम के एक महान ब्राह्मण गुरू ने अपना सरनेम अंबेडकर प्रदान कर जो सम्मान दिया वह ब्राह्मण बनाम दलित की विघटनकारी राजनीति करने वालों पर भी बड़ा तमाचा है। आधुनिक युग में ऐतरेय ब्राह्मण के समान अपना गोत्र तक देने के अन्य उदाहरण भरतपुर जैसी अनेक रियासतों में भी विद्यमान हैं। भरतपुर के महाराज बच्चूसिंह ने देश के विभाजन के बाद लाखों लोगों को न केवल स्वयं का फौजदार गोत्र प्रदान किया बल्कि उन्हें विशेष संरक्षण भी दिया, इस कार्य के पीछे भी आर्यसमाज की प्रेरणा थी। शुद्धि आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी श्रद्धानंद ने अपने जीवन के एक भाग को मुगलों व अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई अस्पृश्यता की दुर्गंध को मिटाने में आहूत कर दिया था। जबकि इक्कीसवीं सदी में विकसित कहलाने वाले कुछ आत्ममुग्ध व स्वयंभू देशों में आज भी श्वेत व्यक्ति अश्वेतों पर घृणा से थूक देता है। उन्हें शासकीय सेवा में वो स्थान नहीं मिलता, जो किसी चमड़ी विशेष या धर्म विशेष के लोगों को मिलता है।   अस्पृश्यता घृणा नहीं आज कोरोना की संक्रामक महामारी में डॉक्टर व पुलिस वाले अपने घर के बाहर छह फ़ीट की दूरी पर हैं किन्तु न तो यह छुआछूत है और न ही नफ़रत। स्वच्छता व पवित्रता भारतीयों की जीवनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारतीय घरों में आज भी श्मशान से लौटकर स्नान करना, अमावस्या पर देवताओं को दिए जाने वाले भोग (हवन) से पूर्व लिपे हुए चौके से बाहर या रसोई से बहुत दूर ही अपनी पादुकाएँ उतारना, कुष्ठ, क्षय, अस्थमा जैसी संक्रामक बीमारियों में अपने निकटतम संबंधी से भी विशेष दूरी बनाकर रखना और उत्तम स्वास्थ्य की अवस्था में एक ही तौलिया व साबुन से आठ-दस भाइयों व मित्रों का नहा लेना आदि ऐसे दृश्य हैं जो मन की दूरी को नहीं बल्कि संक्रमण की भयावहता की स्पष्ट समझ को प्रदर्शित करते हैं। उल्लेखनीय है कि स्वच्छता व पवित्रता की इस परम्परा को बनाए रखने में किसी भी परिवार की स्त्रियों का सर्वाधिक योगदान रहा है।     (लेखक वॉशिंग्टन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)

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Dakhal News 19 April 2020


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प्रमोद भार्गव इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस, कोविड-19 की वजह से महामारी का संकट झेल रही है। करीब एक लाख तीस हजार लोग मर चुके हैं और 21 लाख कोरोना के रोगी हैं। इस महामारी के शिकार यूरोपीय देशों के लोग ज्यादा हो रहे हैं। जबकि उनकी जीवनशैली, खानपान और स्वच्छता की दृष्टि से उत्तम मानी जाती है। इलाज के भी यहां श्रेष्ठ गुणवत्ता के संसाधन हैं। किंतु ज्ञान-विज्ञान की सारी शक्तियां अपने पास होने का दावा करने वाले ये देश एक अदृश्य सूक्ष्म जीव, यानी विषाणु के समक्ष लाचार दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका जैसे महाशक्तिशाली देश को भारत ने हाइड्राॅक्सीक्लोरोक्वीन दवा देकर बड़ी मदद की है। इस वायरस के बारे में कहा जा रहा है कि चीन में यह चमगादड़ की विष्ठा (मल) खाने से पेंगोलियन में आया और फिर इसे खाने से मनुष्य में पहुंचा। यह बात इसलिए सत्य लगती है क्योंकि चीन में चमगादड़ का मांस नहीं खाया जाता बल्कि उसका सूप पिया जाता है। यदि सूप 70 डिग्री सेल्सियस गर्म पानी में उबाल दिया जाए तो कोई भी वायरस या वैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाता है। सूप लगभग इसी तापमान पर तैयार होता है। जाहिर है, सूप के जरिए मनुष्य के पेट में यह वायरस नहीं पहुंचा। किंतु पेंगोलियन को चीन में अधपका या कच्चा ही खा लिया जाता है। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि चमगादड़ के मल से यह वायरस पेंगोलियन में पहुंचा और फिर मनुष्य में स्थानांतरित हो गया, जो आज वैश्विक महामारी का सबब बन गया है। महामारी एवं विषाणु विषेशज्ञ डाॅ. सैथ बर्कले ने बताया है कि 30 हजार से भी ज्यादा ऐसे वायरस जंगली प्राणियों में मौजूद हैं, जो कोरोना जैसी महामारी फैला सकते हैं। जो पेंगोलियन आज महामारी का पर्याय बना हुआ है, वह भारत में भी पाया जाता है। किंतु भारत में इस दुर्लभ प्राणी को खाने से कोई बीमार हुआ हो, यह कभी देखने व सुनने में नहीं आया। भारत की जनजातियां इसे आहार बनाती है। इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय में एक मृत पेंगोलियन भूसा भरकर रखा है। इस पेंगोलियन की पीठ में एक तीर भी चुभा है। सिंधु घाटी की सभ्यता के लोग इसे खूब जानते थे। मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिले पुरा-अवषेशों में भी पेगोंलियन के चित्र अंकित हैं। साफ है कि भारतीय पेंगोलियन को पांच हजार साल से भी ज्यादा समय से जानते हैं। पेंगोलियन को हिंदी में सल्लू सांप एवं चींटीखोर कहा जाता है। इसका सांप की प्रजाति से दूर का भी वास्ता नहीं है। हां, सांप की तरह इसकी लंबी जीभ जरूर होती है। सम्भवतः सांप से मिलती-जुलती जीभ के कारण ही इसे सल्लू सांप कहा जाने लगा होगा। चींटीखोर नाम इसीलिए दिया होगा क्योंकि यह चींटी खाता है। पूरी दुनिया में सल्लू की सात प्रजातियां उपलब्ध हैं। इनमें से केवल दो प्रजातियां ही भारत में पाई जाती हैं, भारतीय सल्लू और चीनी सल्लू। चीनी सल्लू केवल भारत में ही पाया जाता है। सल्लू की अन्य पांच प्रजातियां चीन समेत एशिया के अन्य भागों व अफ्रीेका में पाई जाती हैं। सल्लू सांप का पूरा शरीर कठोर शल्कों से ढंका होता है। वज्र के समान ये शल्क ही इसके रक्षा कवच होते हैं। सिर से लेकर पूंछ तक इसका पूरा शरीर इन शल्कों से ढंका रहता है। शल्क बेहद कड़े और ढालू होते हैं। ये एक-दूसरे के ऊपर इस तरह चढ़े होते हैं, जिस तरह घरों पर कवेलू या खपरे चढ़े होते हैं। शल्कों के बीच में कड़े बाल भी होते हैं। भारतीय सल्लू के शरीर पर शल्कों की 11 से 13 रेखाएं होती हैं, जबकि चीनी सल्लू के शरीर पर 15 से 18 रेखाएं होती हैं। भारतीय सल्लू की लंबाई 105 सेंटीमीटर से 120 सेंटीमीटर और चीनी सल्लू की 81 सेंटीमीटर से 96 सेंटीमीटर होती है। सल्लू की ऊंचाई 30 से 40 सेंटीमीटर होती है। सल्लू सांप के पैर और मुंह भी शल्कों से ढंके होते हैं। इसके बाहरी अंगों के यही मजबूत रक्षाकवच हैं। चार पैरों वाले इस अद्भुत जंतु के मुंह में दांत नहीं होते। स्तनधारी प्राणियों में बिना दांतों का यह जंतु एक अपवाद है। सल्लू प्रायः अपने द्वारा बनाए बिलों में ही रहते हैं। खुदाई के लिए इनके पैरों में खुरपीनुमा मजबूत नाखून होते हैं। इन नाखूनों से ये मिट्टी खोदते भी है और फिर उसे गड्डे में से बाहर फेंकते भी हैं। सल्लू अगले पैरों से मिट्टी खोदता है और पिछले पैरों से उसे बाहर फेंकता है।सल्लू की चाल बहुत धीमी होती है। ये पांच किलोमीटर प्रति घंटे की गति से ही चल पाते हैं। चलते वक्त इसका शरीर धरती से ऊपर उठा होता है और पीठ धनुषाकार रहती है। चलते वक्त यह दुश्मन से बेहद सतर्क रहता है। इसीलिए यह बीच-बीच में पिछले पैरों के बल सीधा खड़ा हो जाता है और फिर गर्दन घुमाकर दुश्मन को देखने की कोशिश करता है।इस दौरान यदि इसे खतरे का आभास होता है तो यह दुश्मन से बचने के लिए तत्परता से गेंद की तरह लिपट जाता है। उस समय इसके शल्क ही ऊपर दिखाई देते हैं। इस वक्त यह ऐसा दिखाई देता है, जैसे कोई आसन हो। इसे आसानी से खोला भी नहीं जा सकता। नतीजतन इसके दुश्मन इसे जड़वस्तु समझकर आगे बढ़ जाते हैं। जानवरों से अपने प्राण बचाने के लिए सल्लू यही तरीका अपनाते हैं। जंगल में इन्हें कभी भी आमने-सामने अथवा आरपार की लड़ाई लड़ते नहीं देखा गया है। भारत में पाए जाने वाले सल्लू पेड़ों के खोलों और चट्टानों की दरारों में भी पाए जाते हैं। ये दिन में अपने घरों में पड़े सोए रहते हैं और रात में ही भोजन की तलाश में निकलते हैं। इसीलिए इन्हें जंगलों में देख पाना मुश्किल होता है। सल्लू मिट्टी में खोदे हुए जिन बिलों में अपना घर बनाता है, उनके मुहाने पर सोते वक्त ऊपर से मिट्टी डाल लेता है। इससे ऊपर से जमीन समतल हो जाती है और सल्लू को वन्य जीवों का कोई खतरा नहीं रह जाता। लेकिन पेशेवर शिकारी इन बिलों को इसके पैरों के पंजों के निशानों से पहचान जाते हैं।सल्लू का मुख्य आहार चीटिंया और दीमक हैं। इनके अलावा यह नरम घोंघे, भिण्डोले और कीड़े-मकोड़े भी चट कर जाता है। सल्लू के भोजन का तरीका भी विचित्र है। यह अपनी जीभ मुंह से बाहर निकालकर चुपचाप लेट जाता है। इसकी जीभ से चिपचिपा-लिसलिसा गाढ़ा-सा द्रव्य पदार्थ रिसता रहता है। चींटी और दीमक इस पदार्थ को चूसने के लालच में जीभ पर चढ़कर चिपक जाते हैं। जब ढेर सारी चिंटियां अथवा दीमक इसकी जीभ से चिपक जाते हैं, तो यह अपनी जीभ को मुंह के भीतर लेकर उन सबको चट कर जाता है।सल्लू चिंटियों और दीमकों की तलाश में पेड़ों पर भी चढ़ जाता है। पेंड़ों पर चढ़ने का इसका तरीका भी खासा विचित्र है। पेड़ों पर यह उल्टा चढ़ता है। पेड़ों पर चढ़ने का यह तरीका भालू भी अपनाता है। पेढ़ पर चढ़ते वक्त सल्लू अपनी पूंछ के जरिए पेड़ को पकड़ता है। फिर पेड़ पर यह चींटियों और दीमकों को खा जाता है। उनके अंडे, बच्चों को चट कर जाता है। लाल चींटे इसके प्रिय भोजन हैं। सल्लू जीभ के सहारे ही पानी पीते हैं। बिना पानी के भी ये कई दिन गुजार सकते है। अपनी इसी क्षमता के कारण ये कम पानी वाले रेगिस्तानी इलाकों में भी रह लेते हैं। आहार-संबंधी इनकी इस विचित्रता के कारण सल्लुओं को चिड़ियाघरों में पालना बड़ा मुश्किल काम होता है। इसलिए इनके द्वारा अपना जोड़ा बनाए जाने के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। देश के कुछ चिड़ियाघरों में विभिन्न महीनों में जन्मे बच्चों से यह अंदाजा लगाया गया है कि ये पूरे साल बच्चे जनते हैं। आमतौर पर मादा एकबार में एक ही बच्चा जनती है। अपवादस्वरूप ही एक साथ दो बच्चे जन्मती है। नवजात बच्चे के शल्क मुलायम होते हैं। मादा सल्लू बच्चे को अपनी पूंछ पर बिठाकर उछलकूद करती है। खतरे का अहसास होने पर यह ऐसा गुंजलक बनाती है कि बच्चा मादा के शरीर में एकदम छिप जाता है और खतरा टलने तक वे दोनों 'निष्क्रिय अवस्था' में पड़े रहते हैं। शिशु की देखभाल में नर भी मादा का सहयोग करता है लेकिन बिल के भीतर तो मां-बेटे ही रहते हैं। भारत में सल्लू एक दुर्लभ संरक्षित प्राणी है। 1972 के 'अनुसूचित प्राणी कानून' के तहत इसे मारना या इसका शिकार करना कानूनी अपराध है। इसके बावजूद सल्लू का खूब शिकार हो रहा है। मजमा लगाकर दवा बेचने वाले दवाफरोश इसे विभिन्न दवाएं बनाने के लिए मारते हैं। गठिया, वाय और बवासीर के रोगियों को इसके तेल का उपयोग करने से लाभ मिलता है। इसके शल्कों से बनाई गई अंगूठियां लोग भंगदर और बवासीर जैसी बीमारियां दूर करने के लिए पहनते हैं। आदिवासियों की अनेक प्रजातियां और कबिलाई लोग मांस खाने के लिए इसे मारते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 April 2020


bhopal, Corona big or me

आर.के. सिन्हा   आज पूरे विश्वभर में, घर-घर में, गली में, गाँव में, शहरों में चर्चा का एक ही विषय है कि कोरोना जैसी महामारी से निपटा कैसे जाये। कोरोना वायरस यानि कोविड-19, एक इतना छोटा-सा जन्तु जो नंगी आंखों से तो छोड़ दीजिए, सामान्य माइक्रोस्कोप से भी दिख नहीं सकता। इसको देखने के लिए भी इलेक्ट्रोन माइक्रोस्कोप की जरूरत होती है। अब इस छोटे-से पिद्दीनुमा वायरस ने पूरे विश्व को तबाह करके रख दिया है। किसी भी मनुष्य के ही नहीं समस्त जीव-जन्तु के शरीर में हजारों लाखों की संख्या में बैक्टीरियानुमा जीव-जन्तु विद्यमान रहते हैं। इन्हीं कारणों से समस्त प्राणियों में जीवन की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहती है। इनमें कुछ ऐसे अर्ध विकसित जीव होते हैं, जिन्हें वायरस कहते हैं जो हानिकारक प्रभाव पैदा करते हैं। इन हानिकर प्रभावों को रोकने के लिए और ऐसे वायरस को शरीर से खत्म करने के लिए चिकित्सा विज्ञान ने बहुत सारी एन्टिबायोटिक दवाइयां भी इजाद कर ली है, जिनके प्रयोग से ये वायरस समाप्त भी हो जाते हैं। चूँकि वायरस अर्ध-विकसित जन्तु होते हैं, ये अपने आप अपना विकास नहीं कर सकते तो इन्हें अपने विकास के लिये कोई माध्यम चाहिये- मनुष्य, जानवर या पशु-पक्षी का शरीर। लेकिन, यह वायरस कहां से आया और कैसे आया यह तो बाद में पता चलेगा। कहा जाता है कि चीन के बुहान शहर की एक मेडिकल प्रयोगशाला से यह कोविड-19 निकला। जिस प्रयोगशाला से यह निकला उसे वित्तीय सहायता तो अमेरिका ही कर रहा था। किन्तु, जब कोरोना की महामारी फैली तो विश्व की बड़ी-बड़ी शक्तियों ने मॅुंह बिचकाकर कहा "हुंह, ऐसे बहुत से वायरस देख चुके हैं, इसे भी आने दो।" जिन लोगों ने मॅुंह बिचकाया, ऐसे तमाम लोगों का नतीजा अब पूरी दुनिया के सामने है।   पूरे विश्व के जनमानस के सामने आज का मौलिक प्रश्न यह है कि वायरस बड़ा या "मैं"। प्रकृति बड़ी या वैज्ञानिक उपलब्धियां। यह प्राकृतिक आपदा पहली बार नहीं आ रही है। पहले भी स्पेनिश फ्लू के प्रकोप से 1918-20 के बीच पचास मिलियन यानि पांच करोड़ से ज्यादा लोग मारे गये थे। कुछ अनुमान तो दस करोड़ का भी है। जब विश्व की जनसंख्या आज की जनसंख्या के मुकाबले एक चौथाई भी नहीं थी। आवागमन के साधन भी नहीं थे। हवाई यात्राएं भी नहीं होती थी। सड़कें भी नहीं थी। ट्रेंने भी नहीं थी। आवागमन का एकमात्र मार्ग समुद्री जहाज था। तब तो इतना बड़ा नुकसान हुआ। सिर्फ भारत में स्पैनिश फ्लू से लगभग दो करोड़ भारतीयों की मृत्यु हुई थी। प्रथम विश्वयुद्ध के भारतीय सैनिकों को जो स्पैनिश फ्लू से ग्रस्त थे, मुंबई के बंदरगाह पर वापस लाकर छोड़ दिया गया। वे अपने राज्यों में गये और उनसे यह महामारी फैली। 1815 में गुजरात में प्लेग आया और लगभग सौ वर्षों तक भारत में रहा। प्लेग की महामारी में कितने लाख लोग मारे गये, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा भी नहीं है। लेकिन, महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि जब वे प्लेग के दौरान कलकत्ता से उन्नाव अपनी ससुराल गये तो ससुराल के सारे लोग तबतक प्लेग से मर गये थे और गंगा में उनके शवों को विसर्जन करने के लिए जब मुश्किल से कुछ लोग गंगा किनारे पहुंचे, तब गंगा उफन रही थी। निराला ने यहां स्पष्ट किया है कि गंगा का यह उफनना बाढ़ के कारण नहीं था। गंगा का यह उफनना, गंगा में फेंके गये शवों की इतनी ज्यादा संख्या के कारण था, जिसके कारण शायद गंगा का जल दूषित भी हो रहा था और क्रोधित भी।   अब लगभग सौ-सवा सौ साल के बाद यह कोरोना का कहर आया है। कोरोना का कहर शुरू तो चीन के बुहान शहर से हुआ। वैसे कहा तो यह जाता है कि इस प्रकार के वायरस पर चीन के बुहान शहर की एक प्रयोगशाला में रिसर्च भी चल रहा था। यह भी कहा जाता है कि इस रिसर्च में अमेरिका की सहायता भी मिल रही थी। यह भी जानकारी आई है कि हाल ही में अमेरिका ने उस प्रयोगशाला को अठाईस करोड़ की सहायता भी भेजी थी। इसके कई प्रमाण अखबारों में भी आये थे। अतः कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं कि यह आविष्कार जैविक हथियार बनाने के लिये हो रहा था। खैर इन बातों पर अन्वेषण करने का समय नहीं है। सभी जानते हैं कि चीन के बुहान शहर में कोरोना का यह वायरस फैला। फिर चीन से इटली, इटली से ईरान, वहां से बेल्जियम, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, स्पेन, अमेरिका से घूम-फिर कर भारत में भी आ गया। क्योंकि, भारत के हजारों व्यापारी खासकर चमड़ा व्यापारी इटली और कम्प्यूटर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक के व्यापारी कच्चे माल के लिए चीन से बहुत करीबी का संबंध बनाकर रखते हैं और आते-जाते रहते हैं। अब मैं मूल प्रश्न पर फिर वापस आता हूँ कि कोरोना का प्रकृति आपदा के रूप में क्या संबंध है। यह तो सबों ने माना ही है कि कोरोना एक प्राकृतिक आपदा है। लेकिन, यह एक आध्यात्मिक प्रश्न है कि प्राकृतिक आपदाएं आती ही क्यों हैं, प्रकृति ने ही तो हमें सबकुछ दिया है। हवा, पानी, अग्नि, आकाश, उर्वरा भूमि सारा कुछ तो प्रकृति का ही प्रदान किया हुआ है। लेकिन, प्राकृतिक आपदाएं आती तब हैं, जब हम प्रकृति को चुनौती देने लगते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन-शोषण करने लगते है? जब हमें ऐसा लगने लगता है कि यह प्रकृति क्या है? इससे तो कहीं बड़े हम हैं। सारे प्राकृतिक संसाधनों पर हम बुद्धिमान मनुष्यों का ही तो एकाधिकार है। हम तो अंतरिक्ष पर चले गये। हमने तो चाँद और मंगल ग्रह तक पर अपनी पैठ पहुंचा दी। हमने बड़े-बड़े वैज्ञानिक शोध कर डाले तो प्रकृति तो कुछ है ही नहीं। सब कुछ मनुष्य का ही है। यह सारी प्रकृति मनुष्य और मनुष्य के दिमाग की गुलाम है- ज्यादा चतुर इंसान ऐसा मानते हैं और जिन्होंने ऐसा माना, इसका परिणाम उन्होंने भी अच्छी तरह भोगा और सारी दुनिया को भोगने पर मजबूर किया। प्रकृति में करोड़ों तरह के अरबों-खरबों वृक्ष हैं। ये सभी जीव हैं हमारी ही तरह। करोड़ों तरह के जीव-जन्तु हैं। ये भी जीव हैं जैसा कि हम सब मनुष्य हैं। उन करोड़ों जानवरों में एक यदि मनुष्य यह सोचने लगे कि मैं प्रकृति से बड़ा हो गया तो इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है? कुछ भौतिकवादी वैज्ञानिक और अपने को प्रगतिशील या वामपंथी कहे जाने वाले लोग यह समझते हैं कि मनुष्य ही सबसे बड़ा है विश्व में। और मनुष्य के कारण ही, और मनुष्य के लिए ही, मनुष्य के द्वारा ही सारे विश्व का संचालन होता है। यहीं हम भूल कर बैठते हैं। इसी भूल का नतीजा हम भुगत रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर मनुष्य का जितना अधिकार है उतना ही बाघ, हाथी, गाय, कुत्ते, बिल्ली और चींटी का है।   जरा सोचिए, एक इतना पिद्दी-सा कोरोना का छोटा-सा वायरस। इस पिद्दी कोरोना ने दुनिया को हिला कर रख दिया है। इसने आख़िरकार क्या सिद्ध किया? इसने तो यही सिद्ध किया है न कि रे, मूर्ख मनुष्य ! तू प्रकृति से बड़ा नहीं है। प्रकृति का मात्र एक छोटा-सा अंश है और जबतक प्राकृतिक संपदा का सम्मान करेगा तभी तक तेरा अस्तित्व सुरक्षित रह पायेगा। भारतीय उपनिषदों में पहला उपनिषद है, ईशा वास्योपनिषद । ईशा वस्योपनिषद का पहला श्लोक है-  ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥   इसका अर्थ यह है कि जिस ईश्वर ने इस प्रकृति की संरचना की है, वह प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण है। लेकिन, इन प्राकृतिक संपदाओं का उपयोग किस प्रकार होना चाहिए? "तेन त्यक्तेन भुंजीथा" यानि त्यागपूर्वक होना चाहिए। त्यागपूर्वक कहने का क्या अर्थ है जितनी आवश्यकता हो उससे थोड़ा कम उपयोग होना चाहिए। आवश्यकता भी पूर्ण करने के चक्कर में नहीं रहना चाहिए। बिना जरूरत के कुछ भी उपयोग हो ही नहीं। अगर चार रोटी से पेट भरता हो तो तीन रोटी से ही काम चला लेना चाहिए। तब लोग यह कहना शुरू करेंगे कि इतनी फसलें हम क्यों उगा रहे हैं" उसका क्या होगा। अरे, भाई! इन फसलों में जो कुछ उगा रहे हो यह सिर्फ तुम्हारे लिए ही थोड़े है। यहां पर "कमाने वाला खायेगा", वाली बात नहीं है। यहां तो कमाने वाला खिलायेगा और पूरी दुनिया खायेगी, वाली बात व्यावहारिक और युक्ति संगत है। उत्पादन तो होना ही चाहिए। उत्पादन ज्यादा से ज्यादा हो। मनुष्य को अपने लिए करना चाहिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन और जो नहीं कमा रहे हैं ऐसे तमाम लोगों के लिए भी करना चाहिए। जो अपंग हैं, अपाहिज हैं, उनके लिए क्या नहीं करना चाहिए। जीव-जन्तु,पशु-पक्षी, वृक्ष प्रकृति ने ही तो हमें दिये हैं, जो स्वयं उत्पादन नहीं कर सकते। लेकिन, उनके भी पेट भरने की तो जरूरत होती है। उनके लिए भी तो उत्पादन करना हो होगा न? यही हम भूलते जा रहे हैं।   यदि इसको विस्तृत रूप से जानना चाहते हैं तो हमारे यहां एक ग्रंथ है, जिसका नाम है, "अन्न पुराण।" सिर्फ अन्न के बारे में ही इसमें चर्चा की गयी है। उसे पढ़ लें, तो हमारे मनीषियों, ऋषियों, दार्शनिकों की जो विचारधारा है, जो चिंतन है, जो भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है, वह सब स्पष्ट हो जायेगा। समझ में आ जायेगा कि मनुष्य को बुद्धि दी गई है और मनुष्य को एकमात्र ऐसा प्राणी बनाया गया है, प्रकृति के द्वारा जो कि स्वयं सबकुछ उत्पादन कर भी सकता है। उसका उद्देश्य है कि वह सबके लिए उत्पादन करे और प्रकृति के संरक्षण के भी उपाय करें। न कि सिर्फ अपने बारे में सोचे और प्रकृति के विनाश का उपाय करे। जब-जब हमने प्रकृति के सामने चुनौती भरे लहजे में यह कहने की कोशिश की है कि "मैं", मैं सबसे बड़ा, या मैं ही आपका सबसे बड़ा दुश्मन हूँ। और जब-जब हमने बात की है कि मैं नहीं सारा विश्व, सारी सृष्टि, सबके सुख की कल्पना की है। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्। जब-जब हमने अपना भी कल्याण किया है और प्रकृति के संरक्षण की भी बात की है।   अब मैं अपनी बातों को समाप्त करूँ, इसके पहले यह बताना चाहता हूँ कि प्रकृति के साथ चुनौती भरे लहजे में पेश आना और खुद को तीसमार खां समझने का परिणाम क्या हो सकता है? जब जॉन हॉपकिंग्स विश्वविद्यालय ने विश्व के तीस बड़े देशों से आंकड़ा इकट्ठा किया, यह जानने के लिए कि किस देश में उस देश के प्रति लाख आबादी के मुकाबले कितने प्रतिशत व्यक्तियों की मौत हुई? यह आंकड़ा बहुत ही आश्चर्यजनक और आँखें खोलने वाली है। सबसे ज्यादा मौतें स्पेन में हुईं, वहां संक्रमित कुल मरीजों की संख्या की 10.4 प्रतिशत थी और स्पेन की प्रति लाख आबादी पर 38 मौतें हुई। इसी से मिलता-जुलता आकड़ा इटली का भी था। इटली में 20465 मौंतें हुई जो कि पॉजिटिव मरीजों की संख्या के मुकाबले 12.8 प्रतिशत थी और प्रति लाख आबादी पर 33.86 मौंतें हुई। इसके बाद का नम्बर आता है बेल्जियम का। यहां भी पुष्ट मरीजों की संख्या के मुकाबले 12.8 प्रतिशत मौतें हुई, जो कि आबादी के हिसाब से प्रति लाख आबादी पर 34.17 मौतें हुईं। इसी प्रकार नीदरलैंड में मरीजों के पुष्ट मामलों के मुकाबले 10.6 प्रतिशत मौंते हुई जो कि प्रति लाख आबादी पर 16.44 मौतें थी। स्वीट्जरलैंड में भी 4.4 प्रतिशत मरीजों की मौतें हुई जो कि आबादी के मुकाबले प्रति लाख आबादी पर 13.6 मौतें थी। स्वीडन में भी मरीजों के पुष्ट मामलों के मुकाबले 8.4 प्रतिशत मौतें हुई जो प्रति लाख आबादी पर 9.02 मौतें थीं। अमेरिका भी पीछे नहीं है। जहाँ 682619 पुष्ट मामलों के मुकाबले 23529 मौंते हुई जो कि अबतक विश्व में किसी भी देश में सबसे ज्यादा है और पुष्ट मरीजों का 3.4 प्रतिशत है, जो कि प्रति लाख आबादी पर 7.19 मृत्यु प्रतिशत है। अब जरा अपने भारत की ओर भी देखें। भारत में अभीतक 10453 पुष्ट मामले सामने आये हैं, जिसमें 358 लोगों की मौतें हुई। यानि पुष्ट मरीजों की संख्या के मुकाबले 3.4 प्रतिशत मौतें हुई। लेकिन, प्रति लाख आबादी पर जनसंख्या के मुकाबले यह तो नगण्य है। मात्र 0.03 प्रतिशत। यानि लगभग साढ़े तीन लाख आबादी पर एक मौत मान सकते हैं। यह सारा कुछ इसलिए हुआ कि हमने प्रकृति से उतना ज्यादा संघर्ष नहीं किया।   यह सारा कुछ इसलिए हुआ कि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने, जो वैसे भी एक राजनीतिक नेता होने के साथ-साथ उच्च कोटि के आध्यात्मिक पुरुष भी हैं और उनका कुशल व व्यावहारिक नेतृत्व। उन्होंने प्रकृति के सामने घुटने टेके। हाथ जोड़कर नमस्कार किया। कोरोना की शक्ति को पहचाना और उसे पिद्दी-सा जीव न मानकर प्रकृति के द्वारा सृजित एक जीव के रूप में ससम्मान दिया, उसकी संक्रमण शक्ति को पहचाना और सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के जरिये इस आपदा से संघर्ष करने की ठान ली। हमारे प्रधानमंत्री ने जब इस देश में एक भी कोरोना का पॉजिटिव मरीज नहीं था, तब से विदेशों से आने वाले लोगों को हवाई अड्डे पर ही स्क्रीनिंग करके कोरेंन्टाइन कराने का काम शुरू कर दिया। लेकिन, दुर्भाग्य है कि उससे पहले ही सैकड़ों विदेशी संक्रमित तब्लीगी जमात के मरकज में पहुँच चुके थे। अब इस षड्यंत्र का तो पुख्ता इलाज होना ही चाहिए। जब मरीजों की संख्या भारत में 500 से ऊपर पहुंची तो दो हफ्ते का लॉकडाउन कर दिया। अब दो हफ्ते की लॉकडाउन में जितनी सफलता मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली, यह बात अलग है। इसका मुख्य कारण यह रहा कि कुछ नासमझ लोगों ने इसे समझने की कोशिश ही नहीं की और सिर्फ उन बातों को ही समझा जो उनके धर्मगुरुओं ने सिखाया था। इसके कारण भारी नुकसान तो हुआ ही । लेकिन, इतने नुकसान के बावजूद लॉकडाउन के पहले संक्रमित मरीजों की संख्या जो मात्र चार दिनों में दुगुनी हो रही थी अब तीन सप्ताह के बाद वह अब लॉकडाउन के बाद छह दिनों में दुगुनी हो रही है और अभी भी दर्जनों ऐसे जिले हैं जहां एक भी मरीज नहीं है। यह क्या कम बड़ी सफलता मानते हैं।   अतः यदि हमें इस प्राकृतिक आपदा से सफलतापूर्वक निपटना है और कम से कम क्षति हो इसका इंतजाम करना है तो इसका एक ही उपाय करिये कि प्रकृति के सामने घुटने टेकिये। प्रकृति के सामने बहादुर बनने की कोशिश हरगिज मत कीजिए। एक पुरानी कहावत है कि "जो डर गया वह मर गया।" लेकिन इस महामारी के संकट की घड़ी में कहावत उल्टी हो गयी है- "जो डरेगा वही बचेगा। जो नहीं डरेगा वह जरूर मरेगा। अतः आज का दिन सबके लिये आत्मचिंतन का है और यदि भविष्य की पीढ़ियों की हमें जरा भी चिंता है तो उचित यही होगा कि हम इस महायुद्ध में अपने सुप्रीम कमांडर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करें। उनके कहे अनुसार पूर्णतः लॉकडाउन के मार्ग पर चलें। लाखों-करोड़ रुपयों के पैकेज गरीबों के लिए उन्होंने दिये हैं। छोटे उद्योगों, कृषि और रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों के लिए भी अन्य पैकेजों की घोषणा जल्दी होने वाली है। प्रधानमंत्री ने जो किसी को भूख से नहीं मरने देने का प्रण लिया गया है, उसे पूरा किया जायेगा। लेकिन लोग सड़कों पर न आयें। जो घटनाएं मुम्बई और ठाणे में कल देखी गयी, आज जमुना किनारे दिल्ली में और दूसरी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में हुई वह दूर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पूर्णावृत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो उनके साथ भी सरकार को वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा आतंकवादियों के साथ किया जाता है।   (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 16 April 2020


bhopal,We are Indians first and last: Dr. Bhimrao Ambedkar

धर्मपाल सिंह   डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का मूल नाम भीमराव था। उनके पिताश्री रामजी वल्द मालोजी सकपाल महू में मेजर सूबेदार के पद पर एक सैनिक अधिकारी थे। अपनी सेवा के अंतिम वर्ष उन्‍होंने और उनकी धर्मपत्नी भीमाबाई ने काली पलटन स्थित जन्मस्थली स्मारक की जगह पर विद्यमान एक बैरक में गुजारे। सन् 1891 में 14 अप्रैल के दिन जब रामजी सूबेदार अपनी ड्यूटी पर थे, 12 बजे यहीं भीमराव का जन्म हुआ।    बालक भीमराव की प्राथमिक शिक्षा दापोली और सतारा में हुई। बंबई के एलफिन्स्टन स्कूल से 1907 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। इस अवसर पर एक अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया और उसमें भेंट स्वरूप उनके शिक्षक श्री कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने स्वलिखित पुस्तक 'बुद्ध चरित्र' उन्हें प्रदान की। बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड की फेलोशिप पाकर भीमराव ने 1912 में मुबई विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। एम.ए. के अध्ययन हेतु बड़ौदा नरेश सयाजी गायकवाड़ की पुनः फेलोशिप पाकर वह अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में दाखिल हुये। सन 1915 में उन्होंने स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की। इस हेतु उन्होंने अपना शोध 'प्राचीन भारत का वाणिज्य' लिखा था। उसके बाद 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय अमेरिका से ही उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की, उनके पीएच.डी. शोध का विषय था 'ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकेन्द्रीकरण'। फेलोशिप समाप्त होने पर उन्हें भारत लौटना था अतः वे ब्रिटेन होते हुये लौट रहे थे। उन्होंने वहां लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एण्ड पोलिटिकल सांइस में एम.एससी. और डी. एस सी. और विधि संस्थान में बार-एट-लॉ की उपाधि हेतु स्वयं को पंजीकृत किया और भारत लौटे। सबसे पहले छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार बड़ौदा नरेश के दरबार में सैनिक अधिकारी तथा वित्तीय सलाहकार का दायित्व स्वीकार किया। पूरे शहर में उनको किराये पर रखने को कोई तैयार नहीं होने की गंभीर समस्या से वह कुछ समय के बाद ही मुंबई वापस आये। वहां परेल में डबक चाल और श्रमिक कॉलोनी में रहकर अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरी करने हेतु पार्ट टाइम अध्यापकी और वकालत कर अपनी धर्मपत्नी रमाबाई के साथ जीवन निर्वाह किया। उन्‍होंने मूक और अशिक्षित और निर्धन लोगों को जागरूक बनाने के लिये मूकनायक और बहिष्कृत भारत साप्ताहिक पत्रिकायें संपादित कीं और अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिये वह लंदन और जर्मनी जाकर वहां से एम.एस.सी., डी. एस सी. और बैरिस्टर की उपाधियाँ प्राप्त की। उनके एम.एस सी. का शोध विषय साम्राज्यीय वित्त के प्राप्तीय विकेन्द्रीकरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन और उनके डी.एससी उपाधि का विषय रुपये की समस्या उसका उद्भव और उपाय और भारतीय चलन और बैकिंग का इतिहास था।    बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एल.एलडी और उस्मानिया विश्वविद्यालय ने डी. लिट्. की मानद उपाधियों से सम्मानित किया था। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर वैश्विक युवाओं के लिये प्रेरणा बन गये क्योंकि उनके नाम के साथ बीए, एमए, एमएससी, पीएचडी, बैरिस्टर, डीएससी, डी.लिट्. आदि कुल 26 उपाधियां जुड़ी है। विभिन्न क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन् 1945 में उन्होंने अपनी पीपुल्‍स एजुकेशन सोसायटी के जरिए मुम्बई में सिद्धार्थ महाविद्यालय तथा औरंगाबाद में मिलिन्द महाविद्यालय की स्थापना की। भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखित शोध ग्रंथ रुपये की समस्या-उसका उद्भव तथा उपाय और भारतीय चलन व बैकिंग का इतिहास, ग्रन्थों और हिल्टन यंग कमीशन के समक्ष उनके साक्ष्य के आधार पर 1935 से हुई।   उनके दूसरे शोध ग्रंथ 'ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकास' के आधार पर देश में वित्त आयोग की स्थापना हुई। औद्योगिक विकास, जलसंचय, सिंचाई, श्रमिक और कृषक की उत्पादकता और आय बढ़ाना, सामूहिक तथा सहकारिता से प्रगत खेती करना, जमीन के राज्य स्वामित्व तथा राष्ट्रीयकरण से सर्वप्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी गणराज्य की स्थापना करना था। सन 1945 में उन्होंने महानदी का प्रबंधन की बहुउददे्शीय उपयुक्तता को परख कर देश के लिये जलनीति तथा औद्योगिकरण की बहुउद्देशीय आर्थिक नीतियां जैसे नदी एवं नालों को जोड़ना, हीराकुण्ड बांध, दामोदर घाटी बांध, सोन नदी घाटी परियोजना, राष्ट्रीय जलमार्ग, केन्द्रीय जल एवं विद्युत प्राधिकरण बनाने के मार्ग प्रशस्त किये।सन 1944 में प्रस्तावित केन्द्रीय जल मार्ग तथा सिंचाई आयोग के प्रस्ताव को 4 अप्रैल 1945 को वाइसराय द्वारा अनुमोदित किया गया तथा बड़े बांधोंवाली तकनीकों को भारत में लागू करने हेतु प्रस्तावित किया।   उन्‍होंने समता, समानता, बन्धुता एवं मानवता आधारित भारतीय संविधान को 02 वर्ष 11 महीने और 17 दिन के कठिन परिश्रम से तैयार कर 26 नवंबर 1949 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंपकर देश के समस्त नागरिकों को राष्ट्रीय एकता, अखंडता और व्यक्ति की गरिमा की जीवन पध्दति से भारतीय संस्कृति को अभिभूत किया। वर्ष 1951 में महिला सशक्तिकरण का हिन्दू संहिता विधेयक पारित करवाने में प्रयास किया और पारित न होने पर स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दिया। वर्ष 1955 में अपना ग्रंथ- भाषाई राज्यों पर विचार प्रकाशित कर आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र को छोटे-छोटे और प्रबंधन योग्य राज्यों में पुनर्गठित करने का प्रस्ताव दिया था, जो उसके 45 वर्षों बाद कुछ प्रदशों में साकार हुआ।   कांग्रेस के नेता आज दलितों पिछड़ों की बात करते हैं लेकिन उनको विचार करना चाहिए देश की पहली अंतरिम सरकार में अम्बेडकर जी कानून मंत्री थे लेकिन कांग्रेस से मतभेद के चलते 27 सितंबर, 1951 को उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। आंबेडकर नेहरू सरकार में अनुसूचित जातियों की उपेक्षा से नाराज थे। लेकिन आज़ादी के बाद भारत का दुर्भाग्य रहा कि राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोगों ने अपनी राजनीति करने के लिए अम्बेडकर जी एक जाति का नेता बनाकर छोड़ दिया। जबकि अम्बेडकर एक जाति के नेता न होकर उन सभी शोषित, वंचित, पिछड़ों के नेता थे फिर चाहे वो किसी भी जाति से हो। आज भी उनके द्वारा लिखित पुस्तकों को पढ़ने की जरूरत है क्योंकि उन्होंने बताया है कैसे लोकतांत्रिक रूप से हम अपने अधिकारों की लड़ाई लोकतांत्रिक मर्यादा में रहकर लड़ सकते हैं। सन् 1945 में उन्होंने अपनी पीपुल्‍स एजुकेशन सोसायटी के जरिए मुम्बई में सिद्धार्थ महाविद्यालय तथा औरंगाबाद में मिलिन्द महाविद्यालय की स्थापना की।    उन्होंने बौद्धिक, वैज्ञानिक, प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृति वाले बौद्ध धर्म की 14 अक्टूबर 1956 को 5 लाख लोगों के साथ नागपुर में दीक्षा ली तथा भारत में बौद्ध धर्म को पुनर्स्‍थापित कर अपने अंतिम ग्रंथ ''द बुद्धा एण्ड हिज धम्मा'' के द्वारा निरंतर वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन आज कुछ लोग 'भीम और मीम' का नारा देते हैं लेकिन उन्हें इन धर्मों पर बाबा साहेब के शब्द याद नहीं हैं क्योंकि अम्बेडकर जी ने बौद्ध धर्म ग्रहण करते वक़्त यह भी बताया कि निजाम हैदराबाद ने पत्र लिखकर उन्हें प्रचुर धन सम्पदा का प्रलोभन तथा मुसलमान बनने वालों की शैक्षिक व आर्थिक आवश्यकताओं की यथासंभव पूर्ति की बात कही, तो ईसाइयों ने भी ऐसे ही आश्वासन दिये; पर डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट विचार था कि इस्लाम और ईसाई विदेशी मजहब हैं। इस कारण बाबा साहब इन मजहबों में जाने के विरुद्ध थे। बाबा साहेब की बातें उस वक़्त भी सटीक, सार्थक थी व आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।     (लेखक झारखंड प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री हैं।)

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Dakhal News 14 April 2020


bhopal. New Virus of Words

तारण प्रकाश स‍िन्‍हा   चीन ने सख्त ऐतराज जताया है कि कोविड-19 को चाइनीज या वुहान वायरस क्यों कहा जा रहा है ! बावजूद इसके कि दुनिया का सबसे पहला मामला वुहान में ही सामने आया। चीन का तर्क है कि जब अब तक इस नये वायरस के जन्म को लेकर चल रहे अनुसंधानों के समाधानकारक नतीजे ही सामने नहीं आ पाए हैं, तब अवधारणाओं पर आधारित ऐसे शब्दों को प्रचलित क्यों किया जा रहा है, जो खास तरह का नरेटिव  सेट करते हों। चीन शब्दों की शक्ति को पहचानता है। किसी समाज के लिए प्रयुक्त होने वाले विशेषणों के असर को जानता है। इसीलिए वह अपनी छवि को लेकर इतना सतर्क है।   जाने-अनजाने में हम हर रोज विभिन्न समाजों, समुदायों, संप्रदायों अथवा व्यक्तियों के लिए इसी तरह के अनेक विशेषणों का प्रयोग करते रहते हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। हमारे द्वारा गढ़े जा रहे विशेषण कब रूढ़‍ियों का रूप ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता। किसी घटना विशेष अथवा परिस्थितियों में उपजा कोई दूषित विचार कब धारणा बन जाता है और कब वह धारणा सदा के लिए रूढ़ हो जाती है, पता ही नहीं चलता। और कब हम पूर्वाग्रही होकर इन संक्रामक आग्रहों के वाहक बन जाते हैं, यह भी नहीं। यह भी नहीं कि कब नयी तरह की  प्रथाएं-कुप्रथाएं जन्म लेने लगती हैं। अस्पर्श्यता का विचार पता नहीं कब, कैसे और किसे पहली बार आया। पता नहीं कब वह संक्रामक होकर रूढ़ हो गया। कब कुप्रथा में बदल गया और कब इन कुप्रथाओं ने सामाजिक- अपराध का रूप धर लिया। उदाहरण और भी हैं।जब यह कोरोना-काल बीत चुका होगा, तब हमारी यह दुनिया बदल चुकी होगी। इन नये अनुभवों से हमारे विचार बदल चुके होंगे। नयी सांस्कृतिक परंपराएं जन्म ले चुकी होंगी। तरह-तरह के सामाजिक परिवर्तनों का सिलसिला शुरू हो चुका होगा। इस समय हम एक नयी दुनिया के प्रवेश द्वार से गुजर रहे हैं। ठीक यही वह समय है, जबकि हमें सोचना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसी दुनिया देना चाहते हैं। क्या अवैज्ञानिक विचारों, धारणाओं, पूर्वाग्रहों, कुप्रथाओं से गढ़ी गई दुनिया ? बेशक नहीं। तो फिर हम इस ओर भी सतर्क क्यों नहीं हैं ! कोरोना से चल रहे युद्ध के समानांतर नयी दुनिया रचने की तैयारी क्यों नहीं कर रहे हैं ? हम अपने विचारों को अफवाहों, दुराग्रहों, कुचक्रों से बचाए रखने का जतन क्यों नहीं कर रहे ? हम अपने शब्द-संस्कारों को लेकर सचेत क्यों नहीं है ? महामारी के इस दौर में हमारा सामना नयी तरह की शब्दावलियों से हो रहा है। ये नये शब्द भविष्य के लिए किस तरह के विचार गढ़ रहे हैं, क्या हमने सोचा है? क्वारंटिन, आइसोलेशन, सोशल डिस्टेंसिंग, लक्ष्मण रेखा...परिस्थितिवश उपजे ये सारे शब्द चिकित्सकीय-शब्दावलियों तक ही सीमित रहने चाहिए। सतर्क रहना होगा कि सामाजिक शब्दावलियों में ये रूढ़ न हो जाएं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल जब सोशल डिस्टेंसिंग के स्थान पर फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द के प्रचलन पर जोर देते हैं, तब वे इसी तरह के नये और छुपे हुए खतरों को लेकर आगाह भी कर रहे होते हैं।   (लेखक छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क आयुक्त हैं)  

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Dakhal News 14 April 2020


bhopal, What was Tablighi doing in Haridwar Kashi Mathura Ayodhya Ujjain

आर.के. सिन्हा   एक बात समझ नहीं आ रही है कि हिन्दुओं के अति महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों क्रमश: हरिद्वार और बनारस में तब्लीगी जमात के कार्यकर्ता निजामुद्दीन मरकज से क्यों पहुंच गए? इसके पीछे उनका इरादा क्या था? यह हरिद्वार और काशी तक ही सीमित नहीं रहा। लगभग सभी महत्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक स्थानों पर पहुँच गये जो वहां के निवासी नहीं थे। आखिर हफ़्तों मरकज के जलसे के बाद इन्हें अपने घरों की याद क्यों नहीं आई? वे किनके निर्देश पर वहां गये।   पहले बात हरिद्वार की। कोरोना वायरस की जांच से कथित तौर पर बचने का प्रयास कर रहे तब्लीगी जमात के 5 सदस्यों के खिलाफ स्थानीय पुलिस ने हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया है। तब्लीगी जमात के ये सदस्य राजस्थान के अलवर के रहने वाले हैं और दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज से लौटे थे। वे जांच से बचने के लिए जानबूझकर छिपे हुए थे। इनके एक साथी में कोविड-19 संक्रमण की पुष्टि भी हुई है। प्रशासन की बार-बार की अपील और चेतावनी के बावजूद ये जांच कराने से बचने के लिए छिप रहे थे, क्यों? इस कारण उन्होंने अपना और दूसरों का जीवन भी खतरे में डाल दिया। इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की मदद से उनका पता लगाकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आखिर इन्हें जांच से पहरेज क्यों था? इन सवाल का जवाब तो इन्हें देना होगा। अब बनारस की ओर चलते हैं। वहां पर तब्लीगी जमात के दो सदस्यों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इनमें से एक तो दशाश्वमेध थाना क्षेत्र में रहता है। सबको पता है कि दशाश्वमेध घाट गंगातट का सुप्रसिद्ध स्थान है। इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। काशीखंड के अनुसार शिवप्रेषित ब्रह्मा ने काशी में आकर यहीं दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। यहाँ प्रयागेश्वर का मंदिर है। हिन्दुओं के इतने महत्वपूर्ण स्थान पर वह तब्लीगी क्या कर रहा था? किसे नहीं मालूम कि तब्लीगी जमात का मूल मकसद गैर-मुसलमानों को इस्लाम से जोड़ना है। क्या ये दोनों तब्लीगी बनारस में यह सब कर रहे थे? यह बिल्कुल मुमकिन लगता है कि ये बेशर्मी से नवरात्रों में संक्रमण फ़ैलाने के उद्देश्य से आये थे।   इस बीच, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से आई खबरों के अनुसार, वहां इंडोनेशिया के तब्लीगी जमात के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पकड़ा है। बड़ा सवाल यह है कि वे दिल्ली में अपने कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सहारनपुर में क्या झक मार रहे थे? देखिए सहारनपुर बहुत दूर नहीं है हरिद्वार के। ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब हरिद्वार हिस्सा भी हुआ करता था सहारनपुर जिले का। क्या ये सब तब्लीगी जमात के सदस्य, देश को कोरोना वायरस के जाल में फंसाने के इरादे से घूम रहे थे? इन्हें यह तो पता ही था कि ऋषिकेश-हरिद्वार में लाखों की संख्या में भक्त गंगा स्नान के लिये आयेंगे। क्या इनके निशाने पर हिन्दुओं के खास धार्मिक स्थल थे? जाहिर है, इन सवालों के जवाब इन धूर्त लोगों की सघन जांच के बाद ही मिल सकेंगे।   इन सबके हरिद्वार और बनारस में पाए जाने से ये संकेत भी लग रहे है कि ये एक तरह से आत्मघाती संक्रामक मानवबम का काम कर रहे थे। क्या ये हिन्दुओं की बड़ी आबादी को कोरोना वायरस के जाल में फंसा रहे थे। अकेले उत्तर प्रदेश में ही 287 विदेशी नागरिक पकड़े गए हैं। इनमें से 211 के पासपोर्ट भी सीज कर दिए गए हैं। लखनऊ में कई विदेशी नागरिकों को पकड़ा गया था, जिन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। अब इन्हें 14 दिन क्वोंरनटाइन करवाकर अब जेल भेज दिया गया है। इसी तरह दो संक्रमित तब्लीगी तो महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन में ही छिपे हुये थे। अब ये आइसोलेशन में रखे गये हैं। यही हाल तमिलनाडु और तेलंगाना के धार्मिक शहरों का भी है।    अब ये बात पूरी दुनिया को पता चल चुकी है कि कोरोना से संक्रमित व्यक्ति बहुत सारे लोगों को इस भयानक वायरस का शिकार बना देता है। बेशक, इन पकड़े गए तब्लीगी जमात के सदस्यों ने न मालूम कितने मासूस लोगों को कोरोना वायरस का शिकार बनाकर मौत के मुंह में धकेल दिया है। दिल्ली में अपने सम्मेलन को खत्म करने के बाद तब्लीगी जमात के सारे देश में गए। जहां भी गए वे कोरोना वायरस का संक्रमण लेकर ही गए। ताजा जानकारी पर यकीन करें तो इन्होंने देश के 17 राज्यों में कोरोना वायरस को पहुंचाया। अभीतक देश में कोरोना के कुल रोगियों में इनके द्वारा संक्रमित होने वालों का आंकड़ा तीस फीसद तक जाता है। सिर्फ तमिलनाडू के एक हजार संक्रमित लोगों में से 900 से ज्यादा संक्रमण का इतिहास दिल्ली से लौटे तब्लीगी जमातियों से जुड़ा है। यह केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रलाय का आंकड़ा है। अब जरा सोच लें कि इन्होंने देश को कितने बड़े संकट में डाल दिया है। ये तो भला हो उन दिन-रात मेहनत कर रहे डॉक्टरों, नर्सों, पुलिस, सफाई योद्धाओं वगैरह का जो इन तब्लीगियों का जमीन पर मुकाबला कर रहे हैं। वर्ना तो मानवता के ये दुश्मन अपने मकसद में सफल हो ही जाते।   एक बात साफतौर पर लग रही है कि तब्लीगी जमात के लोग उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को कोरोना के माध्यम से बड़ा नुकसान पहुंचाने की फिराक में थे। इसलिए ही इन राज्यों में और तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू में इतने सारे देसी-विदेशी तब्लीगी कार्यकर्ता घूम रहे थे। कहना न होगा कि अपने को सच्चा मुसलमान कहने वालों के कारण ही इस्लाम की भी बदनामी हुई है। ये कुछ हजार लोग देश के बीस करोड़ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व तो कदापि नहीं करते। इन्होंने गाजियाबाद के एमएमजी जिला अस्पताल की महिला नर्सों पर थूका भी। लानत है इन पर। अच्छी बात यह है कि इन टुच्चे तब्लीगी जमात के लोगों पर योगी सरकार की पुलिस सख्ती कर रही है। मुख्यमंत्री योगी ने सभी ऐसे आरोपियों पर रासुका (एनएसए) के तहत कार्रवाई का निर्देश देकर एक नजीर रखी है, जिन्होंने पुलिस की अपील की परवाह नहीं की और जिन्हें बाद में पुलिस को खोजकर पकड़ना पड़ा। बेशक, देश के अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी जमातियों पर सख्ती दिखानी चाहिए। यह तो साबित हो गया कि ये देश के कानून को नहीं मानते हैं। ये मानवता के दुश्मन हैं। इन्होंने देश-समाज के साथ जघन्य अपराध किया है। इनका यह कृत्य राष्ट्रद्रोह नहीं तो और क्या है?   देखिए, कोरोना संकट ने देश को एक बड़ा अवसर भी दिया है कि वह अपने को बदल ले। यहां पर लुंज-पुंज तरीके से शासन ना चले। जो भी कानून का उल्लंघन करे उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। अब देखिए कि लॉकडाउन के समय पुलिसकर्मियों पर हमलों के समाचार भी लगातार ही मिल रहे हैं। पंजाब में एक पुलिस अधिकारी का हाथ काट देने के मामले से देश सन्न है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के अपने पैतृक शहर पटियाला में बिना पास के सब्जी मंडी के अंदर जाने से रोकने पर निहंग सिखों ने पुलिसकर्मियों पर तलवारों से हमला कर दिया। इस हमले में एक पुलिसकर्मी का हाथ ही काटकर अलग कर दिया गया। निहंगों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया। ये निहंग हमला करने के बाद एक गुरुद्वारे में छिप गए। गुरुद्वारे से आरोपियों ने कथित तौर पर फायरिंग भी की और पुलिसवालों को वहां से चले जाने के लिए कहा। खैर, उन हमलावर निहंगों को पकड़ लिया गया है। तो बात यह है कि चाहें वे निहंग हों या तब्लीगी जमात के लोग या फिर कोई और। किसी को भी कानून के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत ना दी जाए। इसमें धर्म और आस्था का सवाल नहीं है। जरा सोचिए कि इन तब्लीग जमात के गुंडों और निहंगों में कानून के खिलाफ चलने की हिम्मत कैसे आई। इस तरह से तो देश नहीं चल सकता। देश तो कानून और संविधान के रास्ते पर ही चलेगा। इस बात को सबको समझ लेना चाहिए।     (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

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Dakhal News 14 April 2020


bhopal, Improved environmental health amid Corona crisis

ऋतुपर्ण दवे   विश्व के सामने मौजूद सबसे बड़ा अभिशाप कोरोना, मानवता की पालनहारी प्रकृति और पर्यावरण के लिए वरदान साबित हो रहा है। पूरी दुनिया जिस पर्यावरण की रक्षा और चिन्ता के लिए बड़ी-बड़ी बैठकें और कार्य योजनाएं बनती रही, वैश्विक चिन्तन होता रहा, बड़े-बड़े धनकोष बनाए गए, पानी की तरह पैसा बहाने पर भी नतीजा नहीं निकला, यह काम एक अदृश्य वायरस कोरोना ने कर दिखाया। मानवता पर भारी कोरोना ने बड़ी सीख और ज्ञान भी दिया। अब भी वक्त है चेतने और जाग उठने का वरना देर हुई और प्रकृति ने कहीं और भी तेवर दिखाए तो क्या गत होगी, यह सूक्ष्म से कोरोना ने जता दिया है।   लॉकडाउन के बाद से आसमान के ऊपर पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है। वैज्ञानिक इससे भौंचक्के हैं। मानने को मजबूर हैं कि विश्वव्यापी लॉकडाउन से ही यह संभव हुआ है। प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा घटने से जहाँ ओजोन की छलनी परत, जिसका पता 1985 में लगा था, ठीक होती दिख रही है। वहीं, दक्षिणी गोलार्ध में हवा का बदलता रुख वैज्ञानिकों को अचंभित और प्रभावित कर रहा है। उन्हें अंदाजा तक नहीं हो पा रहा है कि अंटार्कटिका के ऊपर स्थिति सुधरने के बाद दक्षिणी हिस्से में हवा क्या असर दिखाएगी! रात-दिन सैटेलाइटों से इन गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। यह बहुत ही अच्छा संकेत है क्योंकि बारिश का नियम बदल जाने से ऑस्ट्रेलिया में अकाल की नौबत आई जो दक्षिणी गोलार्ध की तेज हवाओं से बारिश की दिशा बदलने से बनी थी, वही हवा ठीक उल्टी बह रही है। माना जा रहा है कि यह सब भी चीन के औद्योगिक प्रदूषण की देन है, इसी से बारिश का क्रम बदला। जगजाहिर है प्रदूषण संबंधी सबसे ज्यादा उल्लंघन चीन ही करता है। मौजूदा स्थिति सीधे-सीधे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और ओजोन परत के ठीक होने के बीच का संघर्ष है और इसे समझना ही होगा। इटली के समुद्र तटों पर डॉल्फिन तैर रहे हैं, दुनिया के तमाम हवाई अड्डों के बंद होने पर वहां दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों का मजमा लगा है। मुंबई की सड़कों पर मोर नाच रहे हैं तो कई शहरों की सड़कों पर शेर, हाथी, हिरण, भालू और दूसरे जंगली पशु विचरण कर रहे हैं। गरम इलाके के लोगों को हवा से जलन भी नहीं हो रही है। जिस कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में लॉकडाउन के हालात पैदा कर दिए, एकदम से दुनिया की रफ्तार थम गई और इंसान को घरों में कैद करके रख दिया, उसी ने प्रकृति को उसका खोया हुआ स्वरूप लौटाना शुरू कर दिया। वह कर दिखाया जिसको लेकर दशकों बल्कि कहें अर्ध शताब्दी या उससे भी ज्यादा समय से खूब माथापच्ची होने पर भी नतीजा कुछ खास निकला नहीं। कोरोना ने पन्द्रह दिन में ही वो कर दिखाया जिसने जानकार होने व हर समस्या का हल ढ़ूढ़ने की इंसानी गलतफहमी को चुटकियों में रौंद दिया।   नदियाँ बुरी तरह गंदी हो गईं और आलम ऐसा कि बिना प्यूरीफाई किए इनका पानी जीवन के लिए घातक साबित हो रहा था। वातवरण में मौजूद हवा एक-एक साँस पर भारी पड़ रही थी। बच्चे, बड़े, बूढ़े यहाँ तक कि पशु, पक्षी, कीट, पतंगे सभी में एक अलग-सी बेचैनी और अनकही छटपटाहट दिख रही थी, ऊपर आसमान में अजीब-सी धुंध का दिखना रोजमर्रा में शामिल हो चुका था। दुनिया के तमाम शहरों में तारों का टिमटिमाना किताबों में कैद लकीरें बनकर रह गईं थी, कभी नंगी आँखों से कोसों दूर मौजूद पहाड़ दिखना बीती बातें बन गईं। अप्रैल के दूसरे हफ्ते में आबादी वाले घने क्षेत्रों में जहाँ-तहाँ बहने वाली ठण्डी व सुकून देती हवा का झोंका सपना हो गया था। आसमान का रौद्र रूप तो भूगर्भ से चुकता पानी समूचे जीवन के लिए चुनौती और विनाश की दस्तक लग रही थी। तभी खतरनाक वायरस ने वो सब कर दिखाया जो इस दौर में असंभव था और तरक्की दर तरक्की की इबारत लिखने वाले, जमीन से आसमान और मंगल तक को मुट्ठी में भींचने की योजनाएँ बनाने वाले धरती के सबसे सभ्य जीव मनुष्य का दंभ तोड़कर उसकी आँखें खोल दी!   बात हवा की करें, स्पेन हो या फ्रांस या फिर इंग्लैंड, अमेरिका, चीन यानी दुनिया में कहीं भी कल तक जो हवा खुद बीमार थी आज साफ हो गई। तमाम तरह के प्रदूषण से युक्त हवा सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंच कई असाध्य और दूसरे रोगों को बढ़ा रही थी। इससे उपजी अनगिनत और अनजान बीमारियाँ शरीर को तोड़ रही थी। यह सब सड़कों पर दौड़ते असंख्य वाहनों, पटरियों पर दौड़ती रेल, आसमान में उड़ते बड़े-बड़े हवाई जहाज और पानी में तैरते शिप में जलकर खपत होने वाले ईंधन जो जहरीली हवा में तब्दील हो जाते हैं, उसकी देन थी। अपने देश को देखें तो फिलहाल दिल्ली की वायु गुणवत्ता 21 वीं सदी में सबसे न्यूनतम स्तर पर आ टिकी है। एयर क्वालिटी इण्डेक्स जो ठण्ड में कई बार खतरनाक स्तर 475 से 500 तक पहुंचता है और मार्च में 100 से 150 के बीच होता है अब अधिकतम 65 और न्यूनतम 25 पर आ गया है। अमूमन 0 से 50 अच्छा, 51 से 100 संतोषजनक, 101 से 200 मध्यम, 201 से 300 खराब, 301 से 400 बहुत खराब और 401 से 500 या ऊपर गंभीर श्रेणी मानी जाती है। जाहिर है वायु प्रदूषण तेजी से घटा है जो पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा सुकून है। कमोबेश बिल्कुल यही हालत पूरे देश में है जो नमूने के तौर 90 शहरों में प्रदूषण की माप से पता चली। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े भी फिलहाल दिल्ली में हवा की अच्छी गुणवत्ता की तस्दीक करते हैं। जबकि कानपुर जो ज्यादा प्रदूषित रहता था अब ठीक है। वहीं 39 शहरों में अच्छी व 51 शहरों में संतोषजनक स्थिति है, जिसमें मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, नोएडा, चंडीगढ़, कानपुर, कोच्चि, उदयपुर जैसे शहर शामिल भी हैं। वहीं वाराणसी और ग्रेटर नोएडा सहित 14 शहरों में वायु गुणवत्ता सामान्य श्रेणी में पहुंच गई है। इसी तरह केंद्रीय वायु एवं मौसम अनुमान और अनुसंधान संस्थान यानी एसएएफएआर की रिपोर्ट बताती है लॉकडाउन के बाद दिल्ली में फाइन पार्टिकुलेट पॉल्युटैन्ट में 30 प्रतिशत और अहमदाबाद एवं पुणे में 15 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं सांस को प्रभावित करने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड के प्रदूषण के स्तर में भी भारी कमी आई जो मुख्य रूप से भारी और मंझोले मोटर वाहनों के परिवहन से होता है। इसमें भी मुंबई में 38, पुणे में 43 और अहमदाबाद में 50 प्रतिशत की कमी आई है।   दुनिया में जहाँ-जहाँ भी कभी चन्द्रमा की झिलमिलाहट नहीं दिखती थी दिखने लगी है। कोरोना के जनक चीन सहित अमेरिका और दुनिया भर का आसमान साफ हो गया है। हमारे यहाँ बिना दूरबीन के ही सप्तऋषि मण्डल, बुध, बृहस्पति, शनि, वरुण की झिलमिलाहट नई पीढ़ी ने पहली बार देखी होगी। अब तो ध्रुव तारा भी साफ पहचान में आने लगा है। बीते आठ साल में इसी 3 अप्रैल को एक और संयोग बना जो बहुतों ने देखा, कृतिका नक्षत्र के बेहद चमकीले हो गए शुक्र के पास होने से गजब का मनमोहक दृश्य दिखा। भारत की तमाम नदियों का पानी साफ हो गया। कल-कारखाने बन्द होने से नदियों में मिलने वाला दूषित रसायन और गन्दे पानी का मिलना रुक गया। लॉकडाउन से पहले काले पानी से लबालब यमुना, गंगा, सोन और दूसरी तमाम नदियों का स्वच्छ, शांत और निर्मल भाव से बहने वाला पानी जहाँ आनन्दित करता है वहीं तमाम नदियों के घाटों पर पक्षियों का कलरव एक अलग ही छटा प्रस्तुत कर रहा है। नर्मदा और सोन सहित कितनी ही नदियों के तटों में जारी रेत का अवैध उत्खनन लॉकडाउन के चलते थमने से उनकी एक अलग ही छटा दिख रही है।   कोरोना संक्रमण के इस दौर में विशेषज्ञ नदियों की अपने स्तर पर की जाने वाली साफ-सफाई को एक भावी मॉडल के रूप में देख रहे हैं ताकि भविष्य में सभी नदियों को पुनर्जीवित करने का रास्ता बन सके। यदि केंद्र व राज्य सरकारों ने लॉकडाउन के दौरान नदी की खुद को स्वच्छ करने के इस नैसर्गिक मॉडल को समझ लिया तो मानो प्रकृति के साथ चलने का तरीका भी सीख लिया। जाहिर है भारत ही नहीं दुनिया भर में इससे पानी की कमी की समस्या दूर होगी। उधर, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और दिल्ली जल बोर्ड इस तरह के बदलावों का अध्ययन करने की योजना तैयार कर रहा है। सीपीसीबी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि बोर्ड जल्द ही नदी से सैंपल लेगा। लॉकडाउन यकीनन हमें खुद को फिर से फॉर्मेट करने का मौका है ताकि हम जिन्दगी की नए व पर्यावरण संरक्षक प्रोग्रामिंग कर लें। यही वक्त है जब दुनिया आपाधापी से दूर घरों में कैद है और सलीके से सोच-विचार कर अमल कर सकती है ताकि भावी चुनौतियों पर भी आँखें खुलें और हम सतर्क हो जाएं।      (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)      

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Dakhal News 12 April 2020


bhopal, Brahm Gyan increases confidence even during disasters

हृदयनारायण दीक्षित   आपातकाल का प्रभाव दोधारी तलवार जैसा होता है। आपदाएं असहाय होने का भाव जगाती हैं। निराश करती हैं। निराशा मन की विशेष चित्त दशा है। निराश मन का प्रभाव स्वस्थ तन पर भी पड़ता है। निराश मन से शरीर की रोग निरोधक शक्ति कम होती है। स्वयं और संपूर्ण अस्तित्व पर विश्वास करने वाले लोग विपरीत परिस्थिति में भी निराश नहीं होते। वे निर्धारित कर्म करते हैं। कर्तव्य का पालन करते हैं। अस्तित्व की नियति व पुरुषार्थ पर विश्वास रखते हैं। सोचने-देखने की दो दृष्टियां संभव हैं। पहली है अपने कर्म व पुरुषार्थ पर विश्वास। यह अच्छी जीवनदृष्टि है लेकिन अस्तित्व के करोड़ों प्रपंचों का प्रभाव ब्रह्माण्डव्यापी है। पुरुषार्थ और अस्तित्व का साझा परिणाम ही यह विश्व है। प्रार्थना और आस्तिकता अज्ञात संभावना के प्रति विश्वास हैं। ब्रह्म वैयक्तिक सत्ता नहीं है। भारतीय चिंतन में संपूर्ण अस्तित्व का नाम ब्रह्म है। इसके निर्वचन का ग्रंथ ब्रह्मसूत्र है। ब्रह्मज्ञान आपदाओं के समय भी आत्मविश्वास बढ़ाता है। कोरोना ऐसी ही आपदा है।   ब्रह्म सूत्र अथर्ववेद व उपनिषद् दर्शन का सार है। यह असाधारण दार्शनिक रचना है। इसमें वेदों से लेकर उपनिषद् काल तक विकसित सभी विचारों पर एकात्मवादी टिप्पणियां हैं। ब्रह्मसूत्र के रचनाकार ने संक्षिप्त सूत्रों में बड़ी-बड़ी बातें की हैं। ब्रह्म सूत्र में बड़ी बात के लिए भी अतिअल्प शब्द विन्यास हुआ है। पहला सूत्र ध्यान देने योग्य है- अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। अब ब्रह्म की जिज्ञासा है। दूसरे सूत्र में दो शब्द ही हैं, “जन्माद्यस्य यतः। अनुवाद है - यहां जिससे जन्म आदि होते हैं।” अनुवाद से अर्थ पूरा नहीं निकलता इसलिए अनुभूति की सहायता से कहते हैं- वही ब्रह्म है। अब अर्थ पूरा हुआ “जिससे जन्म आदि होते है वह ब्रह्म है। ‘जन्म आदि’ का अर्थ भी बड़ा है- जन्म, युवा, बुढ़ापा, मृत्यु, सृष्टि, स्थिति, विकास और प्रलय। तीसरा सूत्र मात्र एक शब्द का ही है, “शास्त्रयोनित्वात्-शास्त्र में वही कारण है। पूरा अर्थ है वह ब्रह्म ही वेदों शास्त्रों में जगत् का कारण कहा गया है। ब्रह्मसूत्रों में सृष्टि जगत के रहस्य हैं, उपनिषदों में वर्णित दार्शनिक सूत्रों की व्याख्या है। गीता सभी दर्शनों का अभूतपूर्व मिलन दर्शन है। इसीलिए उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता को ‘प्रस्थानत्रयी’ की संज्ञा मिली। प्रस्थानत्रयी के बीज विचार अथर्ववेद में हैं।   ब्रह्मसूत्र चार अध्यायों व 16 छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित है। सूत्रों में वेद उपनिषद् में आए तमाम शब्दों, प्रत्ययों, विचारों का विवेचन है। अथर्ववेद व उपनिषदों में प्राण शब्द आया है। यहां प्राण को ब्रह्म कहा गया है। (1.1.28-31) छान्दोग्य उपनिषद् में सम्पूर्णता के लिए ‘भूमा’ शब्द आया है। यहां भूमा को ब्रह्म बताया गया है। (1.3.8-9) सत्य तत्व इन्द्रियों की क्षमता से परे है। उसे प्रत्यक्ष नहीं देख सकते। अनुमान भी कठिन है। सत्य तत्व की व्याख्या वैसे भी कठिन है। श्वेताश्वतर (3.20), कठोपनिषद (2.20) और तैत्तिरीय आरण्यक में एक साथ एक प्यारा सा मंत्र/श्लोक आया है “अणोरणीयान महतो महीयान - अणु से लघुतम अणु और महान से महत्तर (वह है)”। श्वेताश्वतर (6.19) में इसी बात को और विस्तार देते है “वह निरवयव है, निश्चल है, शांत, निर्दोष और निर्लिप्त है।” यह ब्रह्मा है। ब्रह्मसूत्र अति संक्षिप्त संरचना है।   ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म का निर्वचन है। यहां सांख्य दर्शन के कारणवाद का खण्डन है। (अध्याय 2.2.1-10) इसी तरह कणाद के परमाणुवाद से उठे भौतिकवादी प्रश्नों का भी परम ब्रह्म में निरूपण है। (वही: 11-17) संपूर्ण प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष ब्रह्म में है। (ब्रह्मसूत्र: गीता प्रेस पृष्ठ 148-177) मधु विद्या अमूल्य है। अथर्ववेद में मधुविद्या की प्रतिष्ठा है। लेकिन जैमिनि ने पूर्व मीमांसा में इसे देवताओं के योग्य नहीं बताया क्योंकि देवताओं को यह विद्या सहज प्राप्य है। वे ज्योतिर्मय लोकों में रहते हैं। (पृष्ठ 77 श्लोक 1.3.31-32) इसके बाद के सूत्र में लिखा है कि ‘वादरायण को यह मतमान्य नहीं है।   विद्या प्राप्ति मानव जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है। ब्रह्मसूत्र में विद्या का प्रकरण सबसे दिलचस्प है। तीसरे अध्याय के चैथे पाद के प्रथम सूत्र में विद्या के सम्बंध में कहते हैं, “पुरुषार्थ की सिद्धि इसी से (ज्ञान) होती है। शब्द (वेद) यही बताते हैं।” अगले सूत्र में कहते हैं कि पूर्व मीमांसा के द्रष्टा आचार्य जैमिनि यह बात नहीं मानते। उनका मत है कि “ज्ञान को पुरुषार्थ बताना अर्थवाद है। पुरुषार्थ प्राप्त किए जाने योग्य है। इसका साधन कर्म हैं। श्रेष्ठजनों के आचरण से यही सिद्ध होता है। छान्दोग्य उपनिषद् में भी कर्म को ही पुरुषार्थ का साधन कहा गया है। कर्म कर्तव्य है।” (वही 2-7) 6 सूत्रों में जैमिनी के तर्क बताकर फिर वादरायण का मत है “श्रुति में कर्म की अपेक्षा विद्या की महत्ता है।” यहां बड़ी मजेदार लेकिन उचित धारणा है कि विद्या कर्म का भाग नहीं है। अध्ययन कर्म भाग है - अध्ययन मात्रवतः।” (वही 3.4.12) बताते हैं कि “विद्या से कर्मों का (कर्मफल) पूरा नाश हो जाता है।” (3.4.16) अथर्ववेद में भी विद्या की महत्ता है। विद्या प्राप्ति के लिए आचार्य का मार्गदर्शन व अध्ययन जरूरी है। विद्या मुक्त करती है।   वैदिक दर्शन में ‘अक्षर’ शब्द बहुत आया है। अक्षर अ-क्षर अर्थात अनाशवान है। यह शब्द का भी मूल घटक है। वृहदारण्यक उपनिषद् (3.8.7) में ‘अक्षर’ की विवेचना है। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से पूछा “जो द्युलोक से ऊपर है, पृथ्वी से भी नीचे है। इन दोनों के बीच में भी है। जिसे भूत भविष्य और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमें ओतप्रोत है?” याज्ञवल्क्य ने कहा- आकाश में। गार्गी ने पूछा, “वह आकाश किसमें ओतप्रोत है? याज्ञवल्क्य ने कहा “उसे ब्रह्मवेत्ता ‘अक्षर’ कहते हैं, यह न सूक्ष्म है, न लघु, न बड़ा, न लाल, न पीला।” अक्षर समूची सृष्टि में विद्यमान है। दर्शन में रहस्यपूर्ण है। उसे ब्रह्मज्ञानी ही जानते हैं। ब्रह्मसूत्र (1.3.100) में अक्षर भी ब्रह्म है। सूत्र है “अक्षरम्बरान्त धृते-अक्षर आकाश पर्यन्त सबको धारण करता है।” छान्दोग्य उपनिषद् में आकाश के बारे में कहा गया “निश्चय ही सभी प्राणी आकाश से ही उत्पन्न होते हैं।”   ब्रह्मसूत्र में आकाश भी ब्रह्म है। अथर्ववेद में भी आकाश की विस्तीर्णता ब्रह्म है। सृष्टि सृजन के सम्बन्ध में उपनिषदों में अनेक विचार हैं। उपनिषद् काल में पूर्ण विचार स्वातंन्न्य था। छान्दोग्य उपनिषद् में तेज, जल और अन्न का क्रमिक विकास है। माना गया कि आकाश सदा से है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ब्रह्म से आकाश की उत्पत्ति है। फिर आकाश से वायु और वायु से तेज। लेकिन वृहदारण्यक उपनिषद् में आकाश अमृत है। अमृत का जन्म नहीं होता, मरण भी नहीं होता। अथर्ववेद का ज्येष्ठ ब्रह्म यही है। वादरायण ने ब्रह्मसूत्रों की अनुभूति व रचना में ऋग्वेद व उपनिषदों के मंत्रों शब्दों के साथ अथर्ववेद से भी प्रेरक सामग्री ली हो तो आश्चर्य क्या है? ब्रह्म सूत्र में सारी शंकाओं, मतों का विवेचन है। फिर ब्रह्म को ही जगत् का कारण बताया गया है।     (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 12 April 2020


bhopal, How ready is the army to beat Corona

आर.के. सिन्हा   देश की सीमाओं की चौकसी करनी हो या कोई प्राकृतिक आपदा की स्थिति हो, भारतीय सेना कभी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटतीI यह देश बार-बार देख चुका है। हालांकि इसबार कोरोना वायरस का संकट बहुत ही बड़ा और काफी खतरनाक है, फिर भी सेना ने देश को भरोसा दिलाया है कि वह सरकार के किसी भी आदेश के तुरंत बाद कोरोना से लड़ने के लिए प्रस्तुत रहेगी। मौजूदा संकट में सेना कोई भी कदम उठाने को तैयार हैI इसके अलावा सेना मेडिकल फील्ड में मदद के लिए भी तैयार है। सेना का मेडिकल कोर भी अत्यंत सक्षम मेडिकल सेवा है। कोरोना से मुकाबला करने में निश्चित रूप से सेना के साढ़े 8 हजार से अधिक डॉक्टर और हजारों नर्सें और पारा मेडिकल स्टाफ देशभर में जुट सकते हैं। ये सभी पूरी तरह से ट्रेंड डॉक्टर हैं। इनके अलावा सेना के हजारों रिटायर डाक्टरों की भी सेवाएं ली जा सकती है। वे भी इन आपातकालीन हालातों में दिन-रात एक करने के लिए कमर कसकर बैठे हुए हैं। ये सभी कोरोना से लड़ने के लिए तैयार हैं।   महत्वपूर्ण है कि कोरोना जैसी महामारी के हालात में आपातकालीन आन्तरिक अनुशासन और नागरिक सहभागिता अपरिहार्य है। सेना के सभी कर्मी इसमें प्रशिक्षित हैं। इनके अभाव में युद्ध जीता ही नहीं जा सकता है। एक बात और कि सेना के देश के सभी प्रमुख शहरों में अत्याधुनिक अस्पताल हैं। वहां पर कोरोना वायरस की चपेट में आए रोगियों का सही इलाज किया जा सकता है। मतलब साफ है कि देश पर आए कोरोना वायरस के भयानक संकट के वक्त डॉक्टर, नर्स, पुलिस, सरकारी बाबू, सफाई योद्धा आदि को सेना का भी सहयोग मिल सकता है। याद रखें कि इन कठिन हालातों में सेना, सरकारी मशीनरी और नागरिकों का मनोबल गिराने वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिए। ऐसा कोई भी कदम आत्मघाती होगा। ऐसे समय में गलतियां या मीनमेख निकालना ठीक नहीं।   हालांकि सेना को अभीतक औपचारिक रूप से सरकार ने कोरोना के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए नहीं कहा है। पर वह अपने स्तर पर तैयार भी है और सक्रिय भी। सेना कोरोना से निपटने के लिए क्वारंटीन सुविधाओं को सभी कैंटों और अस्पतालों में तैयार कर रही है। उसने इस बाबत अपने अस्पतालों के लगभग 9 हजार बेड पहले से तैयार रखे हैं। जरूरत पड़ने पर उसे दो-तीन गुना बढ़ाने में सेना सक्षम है। इसके अलावा कई क्वारंटीन सुविधाएं देश के कई हिस्सों में काम कर रही हैं। डिफेंस पब्लिक सेक्टर यूनिट जरूरी मेडिकल उपकरणों का उत्पादन भी कर रही है और उत्पादन करने में आर्म्ड कोर की फैक्ट्रियां तुरंत तैयार की जा सकती हैं।   उधर, एयरफोर्स जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, मणिपुर और नगालैंड में मेडिकल सप्लाई तो पहुंचा ही रही है। सेनाध्यक्ष एम. एम. नरवणे का कहना है कि सेना के पास एक '6 घंटे' का प्लान तैयार है, जिसके तहत तुरंत ही आइसोलेशन सेंटरों और आईसीयू की श्रृखंला को तैयार किया जा सकता है। एनसीसी के 25 हजार कैडेट्स सिविल प्रशासन की मदद के लिए तैयार हैं। मेडिकल कर्मचारियों को एक-जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के साथ-साथ एयरफोर्स मेडिकल सप्लाई जैसे पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट, हैंड सेनेटाइजर्स, सर्जिकल गलव्स, थर्मल स्कैनर की भी सप्लाई कर रही है।   कुल मिलाकर देश में कोरोना का खतरा बढ़ने के बाद अब भारतीय सेनाएं पूरी तरह इस महायुद्ध में कूदने को तैयार हैं। कोरोना से जंग की सबसे नाजुक स्थिति करीब आने पर चिकित्सा से जुड़े साजो-सामान लाने-ले जाने के लिए वायुसेना के ट्रांसपोर्ट विमान तो सदैव तैयार हैं ही। युद्धपोत भी किसी भी स्थिति में तैनाती के लिए अलर्ट पर हैं। इस बीच, ये याद रखना चाहिए कि इस वक्त सभी को एक साझे उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार के निर्देशन में कार्य करना है। इस संकट की घड़ी में सरकार और महामारी नियंत्रण में लगे अधिकारियों तथा पुलिस द्वारा आरोपित प्रतिबंधों और आदेशों का पालन करना है। कोई भी अफरातफरी की खरीदारी और भण्डारण से बचें । किसी सामग्री की कोई कमी नहीं है और आपूर्ति का समुचित प्रबंध किया गया है।   अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो हमें याद आता है कि सेना ने समस्त आपदाओं के समय बचाव कार्यों के वक्त बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया है। कुछ साल पहले उत्तराखंड में आई भयानक बाढ़ और भूस्खलन के बाद सेना ने युद्धस्तर पर राहत और बचाव कार्य चलाया था। तब सेना ने अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर दुर्गम इलाकों में फंसे हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था। देवभूमि उत्तराखंड में बाढ़ के दौरान राहत और बचाव कार्य में भारतीय वायुसेना के साहसी जवानों की जबरदस्त जांबाजी देखने को मिली थी। अपनी जान जोखिम में डालकर भी ये जांबाज़ अपने कर्तव्य को बखूबी अंजाम दे रहे थे। भारी बारिश के बावजूद, भारतीय सेना की टुकड़ियां अस्थायी फुटब्रिजों, बांधों और वैकल्पिक मार्गों की तैयारी करके दूरदराज के गांवों से सम्पर्क बहाल करने के लिए दिन-रात काम करती रही थी। यही तत्परता सेना ने नेपाल के भूकंप और कश्मीर घाटी की बाढ़ों में राहत कार्य के दौरान दिखाई थीI बीती आपातकालीन स्थितियों की तरह सेना ने अपने को पूरी तरह से तैयार कर लिया है। भारतीय सेना के जवानों को कोरोना वायरस के संबंध में विस्तार से बताया जा चुका है। इसलिए सेना कोरोना से लड़ने के लिए तैयार है। वह अपने स्तर पर नागरिक प्रशासन की अभी भी जरूरत पड़ने पर मदद कर रही है। गुजरात में भूकंप और कश्मीर, उत्तराखड़ तथा केरल में बाढ़ के बाद सेना बचाव और राहत अभियान जी-जान से जुटी थी।   कश्मीर में सेना ने लगातार पत्थर खाने के बाद भी अपने धर्म का निर्वाह किया था। लानत है, कन्हैया कुमार और शेहला रशीद जैसों पर जो सेना के उन जवानों पर तुच्छ आरोप लगाते रहे हैं। शेहला रशीद के आरोपों में रत्तीभर भी सच्चाई होती तो देश आज उनके साथ खड़ा होता। पर उन्होंने मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए सेना पर आरोप लगाए। शेहला ने विगत 18 अगस्त को कई ट्वीट किए थे, जिसमें सेना पर कश्मीरियों के साथ अत्याचार करने का आरोप लगाया था। इन आरोपों को सेना ने झूठा बताया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने शेहला के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। आज जब देश और धरती पर संकट है तो कन्हैया कुमार, हर्ष मंदर और शेहला रशीद जैसे सिरफिरे लोग गायब हैं। ये क्यों नहीं नागरिक प्रशासन की मदद के लिए मैदान में उतरते? हर मसले पर सरकार को कोसने वाले ये कथित प्रगतिशीलों से क्या देश इतनी भी उम्मीद ना करे? खैर अभी देश में करोड़ों हिन्दुस्तानी और सेना किसी भी विपरीत हालात का मुकाबला करने के लिए तैयार हैं। एक बात से देश संतोष कर सकता है कि कोरोना वायरस पर जल्दी ही विजय पा ली जाएगी।     (लेखक वरिष्ठ संपादक एवं स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 12 April 2020


bhopal,So that every needy can be fed

योगेश कुमार सोनी   लॉकडाउन के चलते शासन-प्रशासन व एनजीओ के साथ तमाम सामाजिक संस्थाएं जरूरतमंदों का पेट भरने का काम कर रही हैं। इस तरह के कर्तव्य का पालन करके हम संकट की घड़ी को मिलजुल निकाल रहे हैं लेकिन ऐसे में कुछ खबरें ऐसी आ जाती हैं जिनको सुनकर बेहद तकलीफ होती है। कुछ लोग राशन अपनी जरूरत से ज्यादा इक्कठा कर दुकानदारों को कम दाम में बेच रहे हैं जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। दरअसल मामला यह है कि प्रधानमंत्री की अपील पर देशवासी अपने-अपने स्तर पर गरीबों की भरपूर मदद के लिए आगे आ रहे हैं, जिससे कुछ लोग कच्चा राशन अपनी जरूरत से अधिक एकत्रित कर रहे हैं और शायद ऐसे समय पर हर किसी के मन में इस तरह का लालच आना स्वाभाविक भी है लेकिन अति हर चीज की बुरी होती है। सामाजिक संस्थाओं से एकत्रित कर रोज-रोज कुछ लोग राशन वालों की दुकान पर राशन लाकर बेचते देखे गए। ऐसे लोग राशन की एवज में पैसा मांग रहे थे तो कुछ लोग अन्य चीजें। एक दुकानदार ने घटना की वीडियो बना ली। इसके अलावा सरकार द्वारा वितरित पके भोजन को भी कुछ लोगों ने एकत्रित किया, जितना खाया वहां तक तो ठीक लेकिन उसके बाद वे रेलवे ट्रैक व अन्य कुछ जगहों पर फेंकते देखे गए।   हालांकि कुछ संस्थाओं ने ऐसी घटनाओं के बाद सीख ली कि जांच के बाद ही अब राशन व भोजन वितरित किया जा रहा है। इस संकट के समय पूरा देश एकजुट होकर जिस तरह काम कर रहा है वो वाकई प्रशंसनीय है। लेकिन चंद लोगों द्वारा की गई इस तरह की हरकतों से मानवता पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता है। दिल्ली में कार्यरत ‘सेवा एक अनोखा परिवार’ नाम की सामाजिक संस्था अपने हर सदस्य से पचास रोटी एकत्रित करने के लिए कहती है, फिर वो सदस्य दस-दस रोटी पांच घरों से एकत्रित करता है। अगले दिन वे लोग जो रोटी दे चुके होते हैं वे अपने पांच परिचितों से रोटियां लेते हैं। इस तरह यह सिस्टम एक मजबूत चेन की तरह काम कर रहा है। इस ट्रैक पर काम करते हुए यह संस्था पूरी दिल्ली में रोजाना लगभग एक लाख रोटी बांटने का काम कर रही है, जिससे कोई भी भूखा न सोए। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल व उत्तरी पूर्वी दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने इस संस्था की प्रशंसा करते हुए बाकी संस्थाओं को इस तर्ज पर काम करने को कहा है। दोनों नेताओं ने यह भी कहा कि इस मॉडल को हर राज्य में लागू किया जाना चाहिए। संस्था का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को दस रोटी देने में संकोच नहीं होता। इसके अलावा यह संस्था खाद्य पदार्थ की कोई भी चीज लेती है लेकिन धन नहीं लेती।   मौजूदा वक्त में पक्ष-विपक्ष मिलकर काम कर रहा है। सरकारों के साथ कदम से कदम मिलाकर ऐसी संस्थाएं बेहद शानदार तरीके से अपना किरदार निभा रही हैं और शायद हमारे देश के संस्कारों व संस्कृति को दर्शाने का यही सबसे बेहतर समय है। प्रधानमंत्री की अपील पर प्रधानमंत्री राहत कोष में सेलिब्रिटी के अलावा आम जनता भी जमकर धनराशि डाल रही है। जिसकी जितनी क्षमता है वो उतना सहयोग कर रहा है। देश की जनता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हर अपील बेहद गंभीरता से ले रही है। हर देशवासी प्रधानमंत्री पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहा है। कोरोना वायरस से पूरी दुनिया की हालात क्या है यह सभी को पता है लेकिन हम आज भी सबसे बेहतर स्थिति में हैं। भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश को संचालित करने का अर्थ माना जाता है मानो पचास देश एक साथ संभाल लिए हों।   इसमें कोई दो राय नहीं कि समय बेहद कठिन है लेकिन सरकार ने जरूरतमंदों तक खाद्य पदार्थों की पूर्ति बरकरार रखी है। किसी भी खाद्य सामग्री को महंगा या उसकी कालाबाजारी नहीं होने दी। इसलिए जो लोग अपनी जरूरत से अधिक राशन एकत्रित करके गलत काम कर रहे हैं वो ऐसा न करें क्योंकि हर किसी का पेट भरना आवश्यक है। कोई छह महीने का राशन भर ले और किसी के लिए एक समय की भी रोटी की व्यवस्था न हो, यह गलत है। यदि हम सबकी भलाई सोचकर चलेंगे तो निश्चित तौर पर सबका भला होगा। अबतक सरकार ने किसी भी राज्य में खाने-पीने की समस्या नहीं होने दी है। कुछ विपक्षी दल या नेता जनता को अभी भी भ्रमित करने का काम कर रहे हैं इसलिए किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें और शासन-प्रशासन पर भरोसा रखें। इसके अलावा अपने आसपास पालतू जानवरों को भी कुछ खाने को देने का प्रयास करें। उन परिवारों को यह सलाह है कि जो लोग जरूरतमंदो की मदद नहीं कर पा रहे या यूं कहें कि उन्हें ऐसे लोग नहीं मिल रहे तो कम-से-कम ऐसा करें कि बचे हुए खाने को फेंकने की बजाए किसी जानवर को खिला दें।   (लेखक पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Politics of opposition even in disaster

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन इसका नीति आधारित होना अपरिहार्य होता है। इसके अभाव में यह प्रभावी नहीं होता। कई बार तो इस प्रकार के विरोध से विपक्ष का अपना ही नुकसान होता है। उंसकी छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जबकि वह जिसका विरोध करते हैं, वह अपरोक्ष रूप से लाभान्वित हो जाता है। मात्र दो हफ्ते के बीच ऐसे दो उदाहरण देखे गए। विपक्ष ने प्रधानमंत्री के आह्वान पर हमला बोला। नरेंद्र मोदी ने पहले पांच मिनट तक ताली-थाली बजाकर कोरोना सेवकों का आभार व्यक्त करने की अपील की थी। इसके बाद उन्होंने नौ मिनट तक राष्ट्रीय एकजुटता के प्रदर्शन हेतु दीप आदि प्रज्ज्वलित करने का आह्वान किया। इन दोनों अपीलों पर विपक्ष के दिग्गजों ने खूब तंज बाण चलाये। इन नेताओं को अपने इस विरोध पर आत्मचिंतन करना चाहिए। इसलिए नहीं कि सत्तापक्ष के नेताओं ने क्या जवाब दिया। इन सबको मात्र राजनीति समझकर नजरअंदाज किया जा सकता है लेकिन यहां विषय जनमानस का है।   दोनों ही अवसरों पर जबरदस्त जन उत्साह का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ। विपक्षी नेताओं को इसी पर विचार करना चाहिए। क्या वह इस जनभावना को समझने में विफल रहे, क्या उनकी राजनीति में इस स्तर तक विचार करने का माद्दा नहीं है, क्या वह वह नरेंद्र मोदी के प्रत्येक कदम की निंदा करने का संकल्प ले चुके हैं, क्या राष्ट्रीय सहमति के विषय भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखते। कोरोना से मुकाबले में सरकार के कार्यों की आलोचना हो सकती थी, सरकार ने जो आर्थिक पैकेज दिया, उसको कम बताकर बढ़ाने की मांग हो सकती थी, कई अन्य मुद्दों पर भी आलोचना हो सकती थी। लेकिन पांच मिनट ताली-थाली बजाने में भी विपक्ष को आपत्ति थी। क्या विपक्ष को इसके पीछे छिपी भावना को नहीं समझना चाहिए था। इसके माध्यम से उन कर्मवीरों के प्रति आभार व्यक्त करना था। नरेंद्र मोदी की इस बात को विश्व के कई देशों का समर्थन मिला। उन्होंने अपने यहां भी आभार व्यक्त करने का यह तरीका अपनाया। जो बात विश्व समझ गया, उससे भारत के विपक्षी नेता उदासीन बने रहे। विपक्ष के नेता केवल एकबार अपने को डॉक्टर, नर्स, सुरक्षा कर्मियों की जगह रखकर सोचते तो वह भी मोदी के आग्रह पर अमल करते। इस तथ्य को भारतीय जनमानस समझ गया। लेकिन विपक्ष के नेता जनभावना से विमुख बने रहे। वह ताली-थाली पर जन उत्साह को देखकर सबक ले सकते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी से पूर्वाग्रह का क्या करते। इसी प्रकार दीया, मोमबत्ती आदि को एक समय प्रज्ज्वलित करने के पीछे भी बड़ा विचार था। कोरोना का मुकाबला सम्मलित प्रयास से ही हो सकता है। इसमें सबका योगदान होना चाहिए। भारत का जनसामान्य इसे समझ गया। उसने इसमें पूरा उत्साह दिखाया। विश्व के कई देशों ने मोदी के इस आग्रह पर अमल किया। लेकिन भारत का विपक्ष इस जन उत्साह से विमुख बना रहा। इतना ही नहीं, कई नेता ऐलान कर रहे थे कि वह दीपक-मोमबत्ती आदि कुछ नहीं जलाएंगे।   ऐसा भी नहीं कि यह चर्चा पहली बार हो रही है। लोकसभा चुनाव के बाद जयराम रमेश जैसे कुछ नेताओं ने कांग्रेस हाईकमान को पत्र लिखा था। इसमें कहा गया था कि सकारात्मक विरोध तो उचित है लेकिन नरेंद्र मोदी पर निजी या नकारात्मक हमलों का कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। यही कारण है कि कांग्रेस उनका मुकाबला नहीं कर सकी। जयराम रमेश की भांति दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी कुछ वर्ष पहले सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विरोध के लिए परिपक्व होना आवश्यक है। अन्यथा विपक्ष अपने अपने दायित्वों को उचित निर्वाह नहीं कर सकता।   चुनाव में हार-जीत लगी रहती है लेकिन नेतृत्व का परिपक्व होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका भी कम नहीं होती, भले ही उसकी संख्या कम हो। ऐसा होने पर जनहित के मुद्दों पर वह सत्तापक्ष की नाक में दम कर सकता है लेकिन इसके लिए पूर्वाग्रह से मुक्त होना आवश्यक है। यहां तो विपक्ष का नरेन्द्र मोदी से पूर्वाग्रह अधिक प्रकट होता है।   विपक्ष के दिग्गजों को इस पर आत्मचिन्तन करना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सभी देशवासी एकजुट होकर कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे है। मोदी सरकार ने देश के गाँव, गरीब, किसान एवं महिलाओं के कल्याण के लिए कई कदम उठाते हुए उन्हें राहत देने का काम किया है। देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार ने कई निर्णय लिए हैं लेकिन कांग्रेस को यह दिखाई नहीं देता। विपक्षी दलों द्वारा जनता के हौसलों पर हाहाकार मचाना उनके वैचारिक दिवालियापन को दिखाता है। आपदा की घड़ी में भी इस प्रकार की अनर्गल बातें करना देश को बांटने की उनकी साजिश को ही दर्शाता है। कुछ विपक्षी दल गैर जिम्मेदाराना बयान देकर कोरोना को हराने के हमारे संकल्प को कमजोर करने में लगे हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 April 2020


bhopal, American villagers are returning to villages

ललित बंसल   दुनिया के सर्वशक्तिशाली देश अमेरिका कोविड-19 को लेकर उपहास का केंद्र बनता जा रहा है। एक विकसित देश के रूप में अपनी सारी शक्तियों के उपयोग के बावजूद अमेरिका में बुधवार सायं तक इस अदृश्य संक्रमण से तेरह हज़ार स