दखल क्यों


bhopal, Environmental good days amid Corona crisis in India

डॉ. निवेदिता शर्मा   भारत ही नहीं विश्‍वभर में कोरोना का भय व्‍यप्‍त है, हर कोई अपने जीवन की सुरक्षा में लगा है। सरकारें प्रयत्‍न कर रही हैं लेकिन इंसान पहले से अधिक स्‍वयं के स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति सचेत दिख रहे हैं। हर कोई इसी प्रयास में लगा है कि उसे जुखाम, सिरदर्द या बुखार न हो। यही कारण है कि दुनिया के देशों में अधिकांशत: लोग घरों में सीमित हो गए हैं। वस्‍तुत: इस दृश्य के बाहर की एक और दुनिया है, पशु-पक्षियों की। जहां कलतक सुरीली चहचहाहट सुनाई देना बंद-सी हो गई थी, इंसानी खौफ से जिन पक्षियों ने अपने को कहीं किसी घोंसले में छिपा लिया था और जो पशु किसी गुफा या कंदरा में दुबक गए थे, अब बिना भय के विचरण करते देखे जा सकते हैं। शहरों की वीरानी के बीच इनका यूं बिना भय बाहर आकर विचरना, कहीं न कहीं पर्यावरण की द्ष्टि से सुखद संयोग कहा जा सकता है।   भारत में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या व आर्थिक विकास और शहरीकरण व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार तथा तीव्रीकरण तथा जंगलों का नष्ट होना इत्यादि भारत में पर्यावरण संबंधी समस्याओं के प्रमुख कारण हैं। इसलिए प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में वन और कृषि-भूमिक्षरण, संसाधन रिक्तिकरण (पानी, खनिज, वन, रेत, पत्थर आदि), पर्यावरण क्षरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव विविधता में कमी, पारिस्थितिकी प्रणालियों में लचीलेपन की कमी, गरीबों के लिए आजीविका सुरक्षा को शामिल किया गया है। यह अनुमान है कि देश की जनसंख्या आनेवाले कुछ वर्षों में बढ़कर दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन को भी पीछे छोड़ देगी। आज विश्‍व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% परन्तु विश्व की जनसंख्या का 17.5% धारण कर भारत का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव काफी बढ़ गया है। पानी की कमी, मिट्टी का कटाव और कमी, वनों की कटाई, वायु और जल प्रदूषण के कारण कई क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में सहज समझा जा सकता है कि हमारा पर्यावरण वर्तमान में कितना अधिक मनुष्‍यगत दबाव झेल रहा है।   वस्‍तुत: इन परिस्‍थ‍ितियों में कहना होगा कि यह कोरोना का भय सिर्फ पशु-पक्षियों को ही आराम लेकर नहीं आया, मनुष्यों के स्‍वास्‍थ्‍य के दृष्टिकोण से भविष्‍य के लिए आराम लेकर आया है। क्‍योंकि जिस तरह से पर्यावरण में विषैली गैसों का अंतर घटा है, उससे यह तो साफ हो गया है कि जिन तमाम बीमारियों से लोग अनायास ही काल में चले जाते थे, उनमें बहुत बड़ा कारण अशुद्ध हवा था, लेकिन अब हवा का इंडेक्‍स लगातार सुधर रहा है। कोरोना वायरस के भय ने लोगों की अधिक जाने-आने एवं लम्‍बी यात्राओं पर रोक लगी है। देश भर में लॉकडाउन है। इस कारण वातावरण में तेजी से सुधार हो रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य मानकों के लिए हवा का स्‍तर जैसा होना चाहिए वह कई जगहों पर आ गया है। अनेक स्‍थानों पर यह आने की प्रक्रि‍या में है। भारत सरकार के संचालित सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च इस समय जो कह रहा है, उसपर हम सभी को गंभीरता से विचार करना होगा और इसके लिए हमें कुछ हद तक खुश भी हो लेना चाहिए। वस्‍तुत: देश के 90 से अधिक शहरों में पिछले कुछ दिनों में न्यूनतम वायु प्रदूषण दर्ज किया गया है। कोरोना वायरस प्रकोप के कारण किए गए उपायों से दिल्ली में पीएम 2.5 में 30 फीसद की गिरावट आई है। अहमदाबाद और पुणे में इसमें 15 फीसद की कमी आई है। नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) प्रदूषण का स्तर, जो श्वंसन स्थितियों के जोखिम को बढ़ा सकता है, वह भी कम हो गया है। यहां ध्‍यान देने योग्‍य है कि एनओएक्स प्रदूषण मुख्य रूप से ज्यादा वाहनों के चलने से होता है। एनओएक्स प्रदूषण में पुणे में 43 फीसद, मुंबई में 38 फीसद और अहमदाबाद में 50 फीसद की कमी आई है।    वस्‍तुत: इसीलिए ही आज पर्यावरणविद कह रहे हैं कि पर्यावरण की कीमत पर विकास के जुनून को रोकने होगा। पर्यावरणविद् एन. शिवकुमार की कही बातों को गंभीरता से लेने का भी यह समय है, वह कहते हैं कि एक सप्ताह से भी कम वक्‍त मे ज्यादातर शहरों की हवा शुद्ध हो चुकी है। अगर हम हर महीने 24 घंटे सबकुछ बंद रखें तो कम से कम सभी को साफ हवा मिलेगी। लोगों की लाइफ बढ़ेगी। दवाईयों का खर्च बचेगा और देश के अधिकांश व्‍यक्‍तियों का जीवन सहज-सुखद होगा। इसी तरह से सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों के साथ देश के अन्‍य वैज्ञानिक भी आज यह स्‍वीकार करते हैं कि आमतौर पर मार्च में प्रदूषण मध्यम श्रेणी (एयर क्वालिटी इंडेक्स रेंज : 100-200) में होता है, जबकि वर्तमान में यह संतोषजनक (एक्यूआइ 50-100) या अच्छी (एक्यूआइ 0-50) श्रेणी का है। यह लॉकडाउन का प्रभाव है। उद्योग, निर्माण और यातायात को बंद करने जैसे स्थानीय कारकों ने वायु की गुणवत्ता को सुधारने में योगदान दिया है।    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट यही बता रही है कि प्रतिबंध से पहले यानी 21 मार्च तक दिल्ली के लोगों को शुद्ध हवा नहीं मिल रही थी। आनंद विहार का एयर क्वालिटी इंडेक्स सिर्फ 63 हो गया है जबकि लॉकडाउन से पहले 248 था। यानी यहां की हवा बेहद खराब थी। यहां यह भी ध्‍यान दिया जा सकता है कि पिछले साल आईक्यू एयर विजुअल द्वारा कराए गए विश्व वायु गुणवत्ता 2019 सर्वे के अनुसार दुनिया के 30 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में भारत के 21 शहर शामिल हैं। इनमें एनसीआर के लगभग सभी बड़े शहर आते हैं। इस सूची में शामिल गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, लखनऊ, बुलंदशहर, जींद, भिवाड़ी और हिसार में 20 मार्च को हवा की गुणवत्ता बेहद खराब थी। दिल्ली का पीएम-10 अपने सामान्‍य लेवल 100 माइक्रो ग्राम क्‍यूबिक मीटर से नीचे सिर्फ 58 पर आ गया है, जबकि पीएम 2.5 भी अपने सामान्य स्तर 60 एमजीसीएम से आधा 31 रह गया है। यह अपने आपमें रिकॉर्ड है। इसी तरह से आज यहां पर अन्‍य शहरों में प्रदूषण नहीं है।    वस्‍तुत: इस लॉकडाउन की स्‍थ‍ितियों में अब वक्‍त आ गया है कि हम सभी सबक लें, सिर्फ इंसान को ही अपने हिसाब से जीने का हक नहीं है, प्रकृति में हर पशु-पक्षी का भी पर्यावरण पर उतना ही अधिकार है, जितना कि मनुष्‍यों का है। यह जानकर और मानकर आज हमारे अपने व्‍यवहार में परिवर्तन लाने की जरूरत आ गई है। कोरोना महामारी आज नहीं तो कल चली ही जाएगी लेकिन फिर कोई वायरस महामारी न बने, इसके लिए जरूरी हो गया है कि हम पर्यावरण के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। आगे भी यूं ही पक्षियों की चहचहाहट बनी रहे और पर्यावरण के आए यह अच्‍छे दिन कभी जुदा ना हों, यह देखना अब हम सभी की जिम्‍मेदारी है।     (लेखिका सूक्ष्‍म जीव विज्ञान और जैव विविधता विशेषज्ञ हैं।)

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Dakhal News 31 March 2020


bhopal,  Danavir is encouraging the Corona warriors

सियाराम पांडेय 'शांत' कोरोना जैसी आपदा से निपटने के लिए दुनिया के अधिकांश देश संजीदा हैं। वहां की सरकारें भी अपने स्तर पर कोरोना से निपटने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही हैं। जिस चीन के वुहान शहर से इस महामारी का जन्म हुआ, वहां जनजीवन लगभग पटरी पर आ गया है लेकिन दुनिया के 195 देश कोरोना की मार से त्रााहि-त्राहि कर रहे हैं। चीन में भले ही अब गिने-चुने लोग कोरोना संक्रमित बताए जा रहे होंं लेकिन दुनिया भर में लाखों लोग कोरोना संक्रमित हैं जबकि हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। अकेले भारत में कोरोना पीड़ितों व मृतकों की संख्या में भी लगातार इजाफा देखा जा रहा है। इस स्थिति ने भारत सरकार की पेशानी पर बल ला दिया है। केंद्र सरकार ने इस आपदा से बचाव के लिए देशभर में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा कर रखी है लेकिन जिस तरह औद्योगिक शहरों से मजदूरों का पलायन शुरू हुआ, उसने सरकार की परेशानियां बढ़ा दी हैं। बड़ी तादाद में घरों की ओर पैदल ही लौट रहे लोग दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गए। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियां बन गए। उत्तर प्रदेश सरकार यूं तो कोरोना वायरस के खात्मे के लिहाज से बेहतर प्रयास कर रही थी। एकदिन पूर्व ही उसने सामुदायिक रसोईघर योजना भी आरंभ की थी लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अच्छी सहयोग भावना से भी एक गलत निर्णय ले लिया। बस चलवाकर उन्होंने गरीब मजदूरों की पीड़ा को दूर करने का काम किया। हालांकि एकदिन पूर्व ही वे कई मुख्यमंत्रियों से बात भी कर चुके थे कि वे यूपी के मजदूरों को ठहरने और खाने-पीने का प्रबंध करें। सारे खर्च उत्तर प्रदेश सरकार वहन करेगी लेकिन रात ही में उन्होंने एक हजार बसों की व्यवस्था कर मजदूरों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने का निर्णय ले लिया। मानवीय आधार पर देखा जाए तो किसी भी जनप्रतिनिधि को कुछ इसी तरह का निर्णय लेना चाहिए था लेकिन कोरोना वायरस की भयावहता और उसकी संक्रमण प्रकृति के चलते उनके इस निर्णय की नीतीश कुमार ने आलोचना भी की। केंद्र सरकार ने भी मजदूरों को बुलाने के निर्णय पर ऐतराज जाहिर किया। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर केंद्र सरकार की लॉकडाउन योजना को विफल करने की साजिश रचने के आरोप भी लगे लेकिन इन सबसे अलग हटकर यह बात विचार योग्य है कि मौजूदा समय राजनीतिक बहस-मुबाहिसे में फंसने का नहीं है बल्कि इस समय का सही सदुपयोग करने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल कर्मचारियों को निर्देश दिया कि जो कर्मचारी जहां हैं, वहीं रहें। लेकिन ऐसा निर्णय करने से पहले हजारों लोग उत्तर प्रदेश आ चुके थे। इतने सारे लोगों को आइसोलेशन वार्ड में डालना संभव नहीं है। फिर भी सरकार इस दिशा में काम कर तो रही ही है। राहत और बचाव के मोर्चे पर पहल करते हुए योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश के 27.5 लाख मनरेगा मजदूरों के खाते में डाले 611 करोड़ रुपये की बड़ी राशि डाल भी दी है। कोरोना पीड़ितों और लॉकडाउन के दौरान अपनी नौकरी खो चुके कर्मचारियों की सहायता के लिए दानवीरों ने भी अपने सहयोग के हाथ बढ़ाने आरंभ कर दिए हैं। उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सभी सांसदों से अपनी विकास निधि से एक करोड़ रुपये पीएम केयर फंड में जमा करने का अनुरोध किया है। लोकसभा के 542 और राज्यसभा के 245 सांसद जिसमें राष्ट्रपति द्वारा नामित 12 सांसद भी शामिल हैं, अगर एक करोड़ का भी सहयोग सांसद निधि से करते हैं तो भी इस समस्या से निपटने के लिए 787 करोड़ होंगे। अगर सभी राज्यों के विधायक और विधान पार्षद इसकी आधी राशि भी सहयोग स्वरूप प्रदान करती है तो भारी भरकम राशि एकत्र हो जाएगी जो इस देश की स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने में सहायक ही नहीं, मील का पत्थर भी बनेगी। कोरोना वायरस से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर देशवासी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे तक अपना गुल्लक तोड़ रहे हैं और पीएम केयर फंड में जमा कर रहे हैं। पीएम केयर फंड को चौतरफा समर्थन मिल रहा है। यह इस बात का संकेत है कि भारत अपने बलबूते अपनी समस्याओं को शिकस्त देने में समर्थ है। देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने वाली सेना और रक्षा मंत्रालय के कर्मचारी भी 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा कर चुके हैं। पुलिस, पीएसी के जवान भी अपने तईं ठीक-ठाक आर्थिक सहायता दे रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों ने भी मदद के हाथ बढ़ाए हैं। उद्योग समूहों, फिल्म, खेल और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों ने भी मुक्त हाथों से कोरोना पीड़ितों के लिए दान किया है। टाटा ग्रुप ने 500 करोड़ की आर्थिक सहायता दी है। फिल्म अभिनेता रजनीकांत, प्रभास, अक्षय कुमार, कार्तिक आर्यन आदि ने जमकर कोरोना पीड़ितों की मदद की है। उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ ने 50 लाख, युवा निशानेबाज ईशा ने 30 हजार, शिल्पा शेट्टी और राज कुंद्रा ने 21 लाख, युवा निशानेबाज मनु भाकर ने एक लाख, सचिन तेंदुलकर ने 50 लाख और पूर्व क्रिकेटर सुरेश रैना ने 52 लाख रुपये का योगदान कर यह साबित किया है कि उन्होंने यह धन इसी देश से कमाया है और जब देश ही संकट में है तो देश में कमाए गए धन का सदुपयोग भी देशहित में होना चाहिए। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू, पहलवान बजरंग पूनिया, धाविका हिमा दास और बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली भी कोरोना पीड़ितों के हित में दान कर चुके हैं। भारतीय ओलंपिक संघ ने अगर अपना पूरा सहयोग और योगदान करने का वादा किया है तो उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और कर्मचारी भी अपना तीन दिन का वेतन 'पीएम केयर्स फंड में देने की घोषणा कर चुके हैं। साइकिलिंग महासंघ और भारतीय गोल्फ संघ ने पहले ही वित्तीय मदद का वादा कर दिया है। लार्सन एंड टुब्रो 150 करोड़ और टीवीएस मोटर कंपनी 25 करोड़ रुपये देने की घोषणा कर चुकी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी ग्रुप सहित अन्य कारोबारी समूह अपने समर्थन की घोषणा कर चुके हैं। देश में एक-एक कर भामाशाह आगे आ रहे हैं लेकिन इन सबके बीच श्रमिकों के पलायन का मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी चला गया है। उच्चतम न्यायालय ने कोरोना वायरस के प्रकोप से उत्पन्न दहशत और लॉकडाउन की वजह से बड़ी संख्या में कामगारों के शहरों से अपने पैतृक गांवों की ओर पलायन की स्थिति से निबटने के उपायों पर केन्द्र से रिपोर्ट मांगी है। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की है कि भय की वजह से बहुत संख्या में कामगारों का पलायन कोरोना वायरस से कहीं बड़ी समस्या बन रहा है। वहीं कुछ लोगों द्वारा यह सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि जब देश में 1948 से ही प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष संचालित है तो अलग से पीएम केयर फंड बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? ऐसे लोगों को यह बताना जरूरी है कि पीएम केयर फंड को विशेष रूप से कोरोना वायरस से निपटने के लिए बनाया गया है। इस तरह के कोष कुछ समय के लिए भी चलाए जाते हैं। आवश्यकता पूरी होने पर इन्हे बंद कर दिया जाता है। वहीं प्रधानमंत्री राहत कोष हमेशा संचालित रहते हैं। इसमें कभी भी दान किया जा सकता है। इसमें दान की गई राशि का उपयोग भी देश की समस्याओं से निपटने के लिए ही किया जाता है लेकिन यह किसी विशेष समस्या के लिए नहीं होता है। लॉकडाउन के चलते देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई है। शेयर मार्केट रोज ही दगा दे रहा है। इन सबके बीच भारतीयों के आत्मविश्वास में कहीं कोई कमी नहीं आई है। प्रधानमंत्री की कोशिश कोरोना वायरस को बड़े स्तर पर न फैलने देने की है। लॉकडाउन जैसा बड़ा और कड़ा निर्णय इसीलिए लिया गया है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कल-कारखानों ने जिस तरह कर्मचारियों पर घर जाने का दबाव बनाया, उससे उनकी संवेदनहीनता का पता चलता है। इससे बड़ी तादाद में कर्मचारियों को परेशानी हुई। इसके लिए मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री तक को माफी मांगनी पड़ी लेकिन लॉकडाउन इस देश के हित में है। जनता मोदी सरकार के निर्णयों के साथ है। कुछ लोगों को अपवाद मानें तो देश की अधिसंख्यक आबादी कोरोना के खिलाफ कमरों में कैद है। अब केंद्र और राज्य सरकारों का दायित्व है कि वह कोरोना पीड़ितों को उचित चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि घरों में लॉकडाउन का सम्मान कर रहे लोगों को आवश्यक वस्तुओं की कमी, कालाबाजारी का सामना न करना पड़े। सरकार को चाहिए कि वह घर-घर चेकिंग अभियान चलाए। हालांकि उसके पास इतने संसाधन नहीं हैं तथापि इच्छाशक्ति हो तो इस देश के लिए असंभव कुछ भी नहीं। अफवाहों से इस देश को बचाना भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)      

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Dakhal News 31 March 2020


bhopal, Corona: The need for vigilance-moderation and the cultivation of superstition

सुरेंद्र किशोरी कोरोना वायरस (कोविड-19) मानवता को लीलने को आतुर है। इस विषम परिस्थिति से निबटने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्पूर्ण भारत में लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना जरूरी कदम है। वायरस चेन को ब्रेक करने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प हमारे पास नहीं है। भारत में अगर तीसरे चरण में कोविड-19 का एपिडेमिक ब्लास्ट हो जाता है तो यहां की हालत इटली, अमेरिका, स्पेन आदि देशों से भी काफी भयावह हो जाएगी क्योंकि हमारे पास इन विकसित देशों की तुलना में चिकित्सा सुविधाएं न्यूनतम हैं। डॉ. अभिषेक कुमार कहते हैं कि अभीतक इस महामारी से पीड़ित व्यक्ति के इलाज के लिए तय दवा की खोज करने में डॉक्टर्स, मेडिकल रिसर्चर्स और वैज्ञानिकों की टीम लगातार प्रयास कर रही है। कोविड-19 से पीड़ित मरीजों के ठीक होने का जो मामला सामने आ रहा है वो डॉक्टर्स के लिए बहुत सारी बीमारियों में प्रयुक्त स्पेसिफिक दवाओं के कॉम्बिनेशन्स का परिणाम है। इस कॉम्बिनेशन को क्रिएट करने के लिए डॉक्टर बधाई के पात्र हैं। इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि कोविड-19 का खतरा किसी भी प्रकार से कम हो गया। कोविड-19 का खतरा तबतक हमारे सामने प्रचंड रूप में है, जबतक यह महामारी के रूप में फैल रहा है और इसकी दवा विकसित नहीं हो जाती।इसलिए लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वच्छता, सतर्कता, संयम और जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। लॉकडाउन से समाज के गरीब और मजदूर तबकों के सामने समस्या आयी है। सबसे अधिक प्रभावित वो हुए हैं जो रोज कमाते-खाते थे। आज उनके लिए भोजन की उपलब्धता प्रमुख चुनौती बनकर खड़ी है। इस समस्या से निबटने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें अपने स्तर से प्रयासरत हैं लेकिन सरकारों के प्रयासों की जो सीमा है उसे देखते हुए राहत में कुछ समय लगना अवश्यम्भावी है। इस स्थिति में स्थानीय निकायों और आमलोगों को आगे आकर मानवता का परिचय देते हुए जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। कम्युनिटी किचन आज की जरूरत है। काफी संख्या में भयभीत और बहकावे में आकर लोग महानगरों को छोड़कर पैदल ही अपने घरों को चलने लगे हैं। इनमें से कोई पैदल ही दिल्ली से बिहार तो कोई जयपुर से गुजरात जा रहा है। लॉकडाउन की हालत में जब बिना किसी एहतियात के पैदल चल रहे हैं तो ये लोग अपने आप से, परिवार, समाज व देश से ही नहीं मानवता की दृष्टि से भी ठीक नहीं कर रहे हैं। बिना किसी एहतियात के पैदल चलना इनको कोविड-19 से संक्रमित कर सकता है और ये कोविड-19 का केरियर बनकर अपने परिवार, समाज और देश को संक्रमित कर सकते हैं। ऐसे में जब कुछ लोग आत्मघाती कदम उठा ही चुके हैं तो यह शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे जहां हैं वहीं उन्हें रोके, उनके लिए आइसोलेशन की व्यवस्था और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करे। फिलहाल आमलोगों की हिफाजत के लिए लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग वायरल चेन को ब्रेक करने के लिए अतिआवश्यक है। तमाम भारतीयों को इस लॉकडाउन और सोशल डिस्टेसिंग के नियमों का कड़ाई से पालन करने के साथ स्वास्थ्य संबंधी थोड़ी-सी भी डिस्कॉम्फर्ट फील होते ही तुरंत डॉक्टर्स से परामर्श लेनी चाहिए। आज भारत कोविड-19 जैसे अदृश्य दानवी ताकत के खिलाफ युद्धरत है तो वहीं धार्मिक अंधविश्वास की खेती करने वालों के लिए यह विपरीत समय भी माकूल प्रतीत हो रहा है। तभी तो धार्मिक ग्रंथों के नाम पर कोरोना से मुक्ति का प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है तो कहीं अल्लाह के नाम में कोरोना से मुक्ति का शगूफा छोड़ा जा रहा है। दोनों स्थिति कोरोना वायरस कोविड-19 के खिलाफ युद्ध में भारत को कमजोर करने वाली है। धार्मिक आस्था बुरी बात नहीं है, बुरी बात है तो आस्था के नाम पर अंधविश्वासी हो जाना। अगर पूजा और नमाज से भारत कोरोना मुक्त हो जाता तो आज देश के तमाम मंदिरों और मस्जिदों में ताला लटका नहीं होता। तमाम धर्म और धार्मिक ग्रंथ हमें कर्तव्यनिष्ठ होने की प्रेरणा देते हैं, कर्मच्युत होकर अंधविश्वासी बनने की हरगिज नहीं। इस कोविड-19 के खिलाफ युद्ध में हमारा कर्म है स्वच्छ, संयमित और सतर्क रहना, खुद जागरूक होना और लोगों को जागरूक कर लॉकडाउन तथा सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करना। जब हम कर्तव्यनिष्ठ बनेंगे, तभी मानवता की जीत होगी और कोरोना वायरस कोविड-19 की पराजय। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 29 March 2020


bhopal,  Social Responsibilities of Religious Institutions

सुन्दर सिंह राणा भारतीय समाज में धर्म, दैनिक जनजीवन के इर्द-गिर्द घूमता है। मंदिर आम जीवन में धर्म का प्रमुख प्रतीक है। धर्म के प्राचीनतम प्रतीकों में मंदिर सर्वाधिक महत्व रखता है। भारत में मंदिर हिन्दू-धर्म के अलावा जैन समुदाय की आस्था का भी प्रतीक है। देश में भव्य जैन मंदिर अपनी उपस्थिति सकारात्मक दायित्वों के साथ सदैव से दर्ज कराते रहे हैं। आमजन और मंदिर के बीच गहरा भावनात्मक सम्बन्ध है। समाज तीव्र गति से बदल रहा है। लोगों की व्यस्तताएं बढ़ी है इसलिए जरूरी है, मंदिर को समुदाय के बीच नये आकर्षणों के साथ स्थापित करने की। भागदौड़ भरे व्यस्ततम जीवन में पूजा-पाठ के साथ मंदिर एक सहयोगी संस्था के रूप में मजबूत सामुदायिक केन्द्र बनकर कैसे उभरे, यह हमें जैन मंदिरों की संचालन व्यवस्था से सीखने की आवश्यकता है। जहां मंदिर जन जरूरतों की पूर्ति़ का माध्यम बनकर उभरा है। सुबह-सायं प्रसाद तो पाते ही हैं, वहीं भोजन की भी व्यवस्था नियमित रूप से गुरुद्वारों के लंगर की तरह रहती है। साधारण भोजन मिलता है जो बहुद कम प्रतीकात्मक कीमत में उपलब्ध रहता है। घर में अकेले रह रहे बुजुर्गों हेतु टिफिन सेवा की सप्लाई का प्रबंध है। नियमित रूप से रोगियों के लिए चिकित्सा और दवा की पूरी सुविधा है, जहां बाजार भाव से आधी कीमत पर सभी तरह की दवाइयां उपलब्ध हैं। आपको अपने शरीर की किसी तरह की जांच/परीक्षण कराना है तो ब्लड सैम्पल से लेकर रिपोर्ट तक आपको मंदिर में ही उपलब्ध कराने की पूरी व्यवस्था है। शारीरिक व्यायाम के लिए जिम की सुविधा है। सुबह-शाम व्यायामशाला जारी है। जरूरतमंद लोगों के लिए फिजियोथिरेपी केन्द्र आधुनिक मशीनों और सुविधाओं सहित संचालित हो रहे हैं। जैन मंदिरों में यह सब सेवाएं नियमित रूप से सुबह पांच से प्रारम्भ होकर रात्रि 9 बजे तक सुचारू ढंग से संचालित रहती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र में जाकर आप किसी भी मंदिर में इन नियमित लाभों को ले सकते हैं। साथ ही जरुरतमंद लोगों को मंदिर द्वारा प्रदान इन सेवाओं का लाभ लेने को प्रेरित कर सकते हैं। वास्तव में मंदिरों की असली भूमिका ऐसी मानवीय जरूरतों की पूर्ति करना भी है। जो समाज के जरूरतबंद तबके के जीवन संघर्षों को कुछ कम करने में मददगार बन सके। वहीं समुदाय के उन लोगों को कुछ सुविधाप्रद वातावरण उपलब्ध कराना भी हो जो नियमित रूप से मंदिर से जुड़े हैं। ताकि उस निरन्तरता की कुछ सार्थकता भी साबित हो सके और आस्थावान लोग अपने समय का सदुपयोग कर कुछ जरुरतों को इसी के माध्यम से पूरा कर पाए। सही मायने में मंदिर की सर्वोत्तम उपयोगिता यही है। हमारे देश में बहुत से ऐसे मंदिर हैं जो इस दिशा में अहम् योगदान कर सकते हैं। अपनी सम्पत्ति को सकारात्मक कार्यों में संलग्न कर समाज के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षावाले स्कूल, आधुनिक सुविधाओं वाले हॉस्पिटल्स और समाज के ऐसे तबके को जो किन्हीं वजहों से तिरस्कृत हैं, उनके लिए अनाथ आश्रम और वृद्ध आश्रम स्थापित कर सामाजिक पुर्ननिर्माण में आगे बढ़कर योगदान कर सकते हैं। देश में अभी भी अधिकांश मंदिर किसी भी तरह के सामाजिक सरोकार से नहीं जुड़ पाए हैं, हमारे नेतृत्व को चाहिए कि मंदिरों को अपना सकारात्मक सहयोग करने के लिए प्रेरित करे। हमारे मंदिरों को अपनी परम्पराओं के साथ आधुनिक मूल्यों का मान करना चाहिए। जैसे केरल के सबरीमाला मंदिर के मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप महिलाओं को मंदिर जाने की इजाजत दे रहा है तो इसका सबको स्वागत करना चाहिए। मंदिर आधुनिक समाज में न सिर्फ पूजास्थल तक सीमित रह सकते हैं बल्कि उन्हें एक मजबूत सामुदायिक केन्द्र की भूमिका में स्वयं को पुर्नस्थापित करना होगा। मंदिर धार्मिकता के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण का भी दायित्व निभाएं। समाज के लिए शिक्षण के केन्द्र बनकर उभरे। मंदिर भारतीय समाज में प्राचीनतम् और मजबूत व्यवस्था है। हमें इसके महत्व को पहचानना चाहिए। भारत में 400 ईसा पूर्व से मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। मंदिर सदियों से हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। भारतीय समाज बहुत ही उदार स्वभाव वाला समाज रहा है। यहां हर समुदाय के अपने-अपने मंदिर हैं। शिव में आस्था रखने वाले शैव मंदिर और विष्णु को मानने वाले वैष्णव मंदिर तथा देवी में आस्था वाले शक्ति मंदिर स्थापित करते रहे हैं। भारत में मंदिर सामाजिक-धार्मिक संगम का पवित्र स्थल की भूमिका में रहे हैं। हिन्दू मंदिर अपने आराध्य के दर्शनार्थ एक पवित्र केन्द्र हैं। धार्मिक स्थल की अपनी विशिष्ठ महत्ता होती है। किसी भी धार्मिक स्थल पर उस धर्म के अनुयायी पूजा-पाठ करने आते हैं। यह निरन्तता समाज को जोड़े रखने में महत्पूर्ण भूमिका निभाती है। मंदिर हमारे लिए नियमित धार्मिक अभ्यास का केन्द्र है। धर्म हमारे सामाजिक अभ्यासों के लिए ईंधन प्रदान करता है, जिससे हमारा समाज संचालित होता है। समाज द्वारा धार्मिक उत्सवों, तीज-त्यौहारों और विभिन्न सांस्कृतिक क्रियाकलापों को इसी पृष्ठभूमि में आयोजित और संचालित किया जाता रहा है। आधुनिक समय में समाज में जो बदलाव आए हैं और मानवीय जरूरतें अपनी प्राथमिकता बदल रही है, ऐसे में धर्म को इन बदली स्थितियों/परिस्थियों को ध्यान में रखकर नयी भूमिकाओं को धारण करना होगा और अपने समाज को सशक्त समाज के रूप में स्थापित करना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 March 2020


bhopal,Corona means to cope with the current challenge

हृदयनारायण दीक्षित सुख सबकी कामना है। सामान्यतया अपने वातावरण व समाज की अनुकूलता सुख व प्रतिकूलता दुख कही जाती है लेकिन आयु-विज्ञान के महान ग्रंथ चरक संहिता (हिन्दी अनुवाद, चैखम्भा वाराणसी) में सुख और दुख की विशेष परिभाषा की गई है। चरक के अनुसार “स्वस्थ होना सुख है और रूग्ण (विकार ग्रस्त) होना दुख है।” सुखी रहने के लिए उत्तम स्वास्थ्य जरूरी है। चरक संहिता ने सुखी जीवन के लिए स्वास्थ्य को आवश्यक बताया है। स्वस्थ जीवन के तमाम स्वर्ण सूत्र चरक संहिता के पहले उपनिषदों में कहे गए थे। छान्दोग्य उपनिषद् में अन्न पचने और रक्त अस्थि तक बनने के विवरण हैं। महाभारत (शांति पर्व) में भी शरीर की आंतरिक गतिविधि का वर्णन है। चरक संहिता में स्वास्थ्य के लिए कठोर अनुशासन को जरूरी कहा गया है। बताते हैं “अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को अपनी स्मरण शक्ति बनाए रखते हुए सद्व्रत्तों का पालन करना चाहिए।” सद्व्रत ध्यान देने योग्य है। मनुष्य ने अपने व संपूर्ण समाज के स्वास्थ्य के लिए अनेक नियम बनाए हैं। व्यापक सामाजिक हित में ही ऐसे नियमों का सतत् विकास हुआ है। कोरोना वायरस का संक्रमण विश्वव्यापी है। दुनिया के सभी क्षेत्रों में भय है। यह भय असाधारण प्रकृति का है। यह किसी साधारण रोग के संक्रमण का भय नहीं है। यह मृत्यु भय है। प्रतिष्ठित चिकित्साविज्ञानी भी इसका कारण नहीं जानते। निवारण की बात अभी दिवास्वप्न है। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार परस्पर दूर रहकर ही कोरोना से बचाव संभव है। यही वर्तमान चुनौती से जूझने का सद्व्रत है। मूलभूत प्रश्न कई हैं कि भारत की मनुष्य केन्द्रित चिंतनधारा में व्रत पालन की सुदृढ़ परंपरा के बावजूद हममें से अनेक परस्पर दूर रहने के सामान्य व्रत का भी पालन क्यों नहीं करते? इस व्रत के पालन की प्रार्थना प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर की है तो भी व्रतपालन क्यों नहीं? इस प्रार्थना के पीछे कानून की शक्ति है तो भी नहीं। इस व्रतभंग में मृत्यु की भी खतरा है तो भी व्रतभंग क्यों? इन प्रश्नों का उत्तर खोजना आधुनिक भारतीय चिंतन की बड़ी चुनौती है। महाभारत में यक्ष द्वारा युधिष्ठिर से अनेक जीवनोपयोगी प्रश्न पूछे गए थे। उनमें मृत्यु सम्बंधी प्रश्न भी था। यक्ष ने पूछा “सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है-किम् आश्चर्यम्?” युधिष्ठिर ने कहा “सबकी मृत्यु निश्चित है तो भी लोग यह सत्य नहीं स्वीकार करते, अपनी हठ में बने रहते हैं।” कल्पना करें-महाभारत के इस अंश का कोरोना संदर्भ में नए सिरे से सम्पादन करें तो यह अंश संशोधित होकर कैसा होगा? यक्ष प्रश्न नए रूप में पढ़ते हैं, “भारत के लोकजीवन में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? उत्तर होगा “सब लोग जानते हैं कि कोरोना की दवा नहीं। कोरोना मारक है। सब लोगों को पता है कि सामाजिक दूरी ही एकमात्र उपाय है। लोग मिले तो मरे। मुख खोले खड़ी प्रत्यक्ष मृत्यु के बावजूद लोग जीवन रक्षा का सामान्य उपाय भी नहीं मानते।” क्या यही सबसे बड़ा आश्चर्य नहीं है। यक्ष प्रश्नों जैसी कथाएं लोक प्रबोधन के लिए ही लिखी गई थीं। सरल और सुबोध भाषा में ही लिखी गई थीं। ज्वर साधारण बीमारी है। अथर्ववेद के ऋषि अनेक प्रकार के ज्वरों से परिचित थे। ज्वर अकेला नहीं होता। इसका अपना प्रिय परिवार भी साथ आता है। कहते हैं “ज्वर अपने भाई कफ के साथ आता है। खांसी उसकी बहिन है। वह बहिन के साथ आता है। इसका भतीजा यक्ष्मा (टीबी) है।” (5.22.12) सब आगे पीछे आते हैं। मनुष्य आयुर्विज्ञान के व्रतों का पालन करे तो बच सकता है। रोगी से दूर रहने पर रोग संक्रमण से जीवन का बचाया जा सकता है।प्राण जीवन है। श्वसन तंत्र के रोग प्राणहीन करते हैं। प्राणों की रक्षा के लिए प्राणायाम की शोध हुई थी। प्राणायाम से स्वस्थ्य शरीर में रोग नहीं आते। फिर भी रोगाणुओं को पराजित करने की तमाम कारगर औषधियां खोजी गई थी। अथर्ववेद (19.37.1) में कहते हैं, यक्ष्मा सहित, “उस मनुष्य को कोई रोग पीड़ित नहीं करता, दूसरों के द्वारा दिए गए अभिशाप (संक्रमण) उसे स्पर्श तक नहीं करते, जिसके पास औषधरूप गुग्गुल की श्रेष्ठ सुगंधि संव्याप्त रहती है।” (आचार्य श्रीराम शर्मा का अनुवाद) गुग्गुल साधारण वनस्पति है। आधुनिक आयुर्विज्ञानी इसे रोग निरोधक क्षमता बढ़ाने वाली प्रमुख औषधि बताते हैं। अथर्ववेद में इस औषधि का अनेकशः उल्लेख हुआ है। ऊपर के मंत्र के अनुसार गुग्गुल के प्रयोगकर्ताओं के पास कोई भी रोग नहीं आते। एक अन्य मंत्र (4.37.3) में भी गुग्गुल को अन्य औषधियों पीलु या भल, व जटमांसी को महत्वपूर्ण औषधि बताया गया है। रोग निरोधक शक्ति की चर्चा बहुत होती है लेकिन अथर्ववेद के आयुर्विज्ञान की उपेक्षा होती है। ब्लूमफील्ड जैसे कुछेक विद्वानों ने अथर्ववेद को जादू-टोने वाला वेद बताया। विदेशी विद्वानों को सही मानने वाले भारतवासियों ने भी उन्हीं की राह पर वैदिक शोध की उपेक्षा की। नई पीढ़ी ने वेदों के वैज्ञानिक यथार्थवाद पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने प्राचीन साहित्य को आध्यात्मिक समझा। अथर्ववेद के भरे-पूरे चिकित्सा विज्ञान की उपेक्षा जारी है। अथर्ववेद में वर्णित औषधियां प्रभावशाली हैं। इस वेद के प्रमुख रचनाकार द्रष्टा अथर्वा हैं। ऋषि जानते हैं कि “उसके पहले अथर्वा, कश्यप व अगस्त्य ने इन औषधियों से तमाम रोगाणुओं को नष्ट किया था।” (4.37.1) भारत में अथर्ववेद व इसके पहले भी चिकित्सा विज्ञान की सुदीर्घ परंपरा थी। अथर्ववेद में अनेक रोगों व उनके लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। साथ में तत्सम्बंधी रोगों की तमाम औषधियां भी बताई गई हैं। एक मंत्र (6.127.3) में हृदय रोग का उल्लेख हैं, “जो रोग फैलकर हाथ, पैर, आंख, कान, नाक तक पहुंच जाते हैं, उन्हें और विद्रध नामक व्रण व हृदयरोग-हृदयामयम् को औषधियों द्वारा दूर करता हूं।” ब्लूमफील्ड ने भी हृदयामयम का अनुवाद “पेन इन दि हार्ट” किया है। अथर्ववेद के रचनाकाल में हृदय रोग की जानकारी बड़ी बात है। औषधियां प्राणरक्षक हैं। प्राण से ही औषधियां लहराती हैं। एक सुंदर सूक्त (11.6) में प्राण को सबका स्वामी बताया गया है। कहते हैं, “हे प्राण! औषधियों के समक्ष गर्जन करते हैं, तब औषधियां शक्तिशाली होती हैं, विस्तार को प्राप्त होती हैं। प्राण औषधियों के हित में बादल रूप गर्जन करता है। औषधियों पर जल वर्षा करता है। औषधियां प्रसन्न मन कहती हैं- आपने हमारी आयु बढ़ाई है। सुगंधित बनाया है। (वही 1, 2, 3, 4 व 6) प्राण ही रोग व मृत्यु के कारण हैं। (वही 9 व 11) प्राण की स्तुति करते हैं, “आप वर्षा द्वारा तृप्ति देते हैं। तब अथर्वा द्वारा रोपित, अंगिरावंशजों व मनुष्यों द्वारा निर्मित औषधियां प्रकट होती हैं।” (वही 16) प्राण से औषधियां हैं। औषधियों से प्राण रक्षा है। इनके सदुपयोग का विधान है। संक्रमण से बचने-बचाने का आचार हम सबका व्यवहार होना चाहिए। वैद्य लोकहित में चिकित्सा करते हैं। चरक संहिता में धनलोभी वैद्य की भर्त्सना है। प्राचीन चिकित्सा विज्ञान या आयुर्विज्ञान की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से तुलना बेमतलब है। दोनों वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को एकसाथ मिलाने से लोककल्याण की संभावना ज्यादा है। औषधि विज्ञान के विकास के कई चरण हैं। पहला ऋग्वेद के रचनाकाल से भी पूर्व है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि “देवों पूर्वजों को तीन युग पहले औषधियों की जानकारी थी। ऋग्वैदिक काल दूसरा चरण है। इस काल में चिकित्सा विज्ञान का खासा विकास हो चुका था। अथर्ववेद तीसरा चरण है। इसमें औषधि विज्ञान का समुचित विकास हुआ। चरक संहिता आयुर्वेद का प्रतिष्ठित ग्रंथ है। आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान से भरा-पूरा है लेकिन जोर सदाचार पर है। औषधि प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। फिर सभी रोगों की औषधियां आधुनिक काल में भी नहीं खोजी जा सकी हैं। कोरोना भी ऐसी ही महामारी है। बचाव ही विकल्प है। स्वयं को अलग रखना ही बचाव है, बावजूद इसके अनेक लोग परिपूर्ण बंदी में भी घर से बाहर टहलने के आत्मघात पर आमादा हैं। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 29 March 2020


bhopal,  Ganesh Shankar Vidyarthi, whose government was shaken by the writing

बलिदान दिवस 25 मार्च पर विशेष योगेश कुमार गोयल गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता जगत के ऐसे महान् पुरोधा थे, जिनकी लेखनी से ब्रिटिश सरकार इस कदर भयभीत रहती थी कि क्रांतिकारी लेखन के लिए उन्हें अंग्रेज सरकार द्वारा पांच बार सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा दी गई। उनके लेखों में ऐसी ताकत थी कि उनकी पत्रकारिता ने ब्रिटिश शासन की नींद हराम कर दी थी। जब उनकी कलम चलती थी तो ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिल जाती थी। बेमिसाल क्रांतिकारी पत्रकारिता के कारण ही गणेश शंकर विद्यार्थी और उनका अखबार ‘प्रताप’ आज के दौर में भी पत्रकारिता जगत के लिए आदर्श माने जाते हैं। वह एक निर्भीक पत्रकार, समाजसेवी, महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे स्वयं तो एक उच्च कोटि के पत्रकार थे ही, उन्होंने अनेक युवाओं को लेखक, पत्रकार तथा कवि बनने की प्रेरणा और ट्रेनिंग दी। कांग्रेस के विभिन्न आन्दोलनों में भाग लेने तथा ब्रिटिश सत्ता के अत्याचारों के विरूद्ध ‘प्रताप’ में निर्भीक लेख लिखने के कारण वे पांच बार जेल गए। जब भी उन्हें अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तार किया जाता तो उनकी अनुपस्थिति में ‘प्रताप’ का सम्पादन माखनलाल चतुर्वेदी तथा बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ सरीखे साहित्य के दिग्गज संभाला करते थे। 26 अक्तूबर 1890 को उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में एक स्कूल हेडमास्टर जयनारायण के घर जन्मे विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू तथा अंग्रेजी में हुई। इलाहाबाद में शिक्षण के दौरान ही उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर हुआ। हिन्दी साप्ताहिक ‘कर्मयोगी’ के सम्पादन में वे पंडित सुन्दर लाल की सहायता करने लगे। कानपुर में अध्यापन के दौरान उन्होंने कर्मयोगी सहित कई और अखबारों में लेख लिखे और पत्रकारिता के जरिये स्वाधीनता आन्दोलन से गहरे जुड़ गए। कुछ समय बाद उन्होंने पत्रकारिता, सामाजिक कार्यों तथा स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ाव के चलते ‘विद्यार्थी’ उपनाम अपना लिया और गणेश शंकर से ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’ हो गए। उनकी उत्कृष्ट लेखनशैली से प्रभावित होकर हिन्दी पत्रकारिता जगत के पुरोधा पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1911 में अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में उपसम्पादक के पद पर कार्य करने का ऑफर दिया किन्तु विद्यार्थी जी को ज्वलंत समाचारों, समसामयिक तथा राजनीतिक विषयों में ज्यादा दिलचस्पी थी, इसलिए उन्होंने द्विवेदी जी का प्रस्ताव स्वीकारने के बजाय महामना पं. मदन मोहन मालवीय के हिन्दी साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ में नौकरी ज्वाइन की। 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में कानपुर से स्वयं ‘प्रताप’ नामक पत्रिका निकालना शुरू कर दिया। प्रताप के जरिये विद्यार्थी जी किसानों, मजदूरों और ब्रिटिश अत्याचारों से कराहते गरीबों का दुख-दर्द उजागर करने लगे। ब्रिटिश शासनकाल की उत्पीड़न और अन्याय की क्रूर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना उनकी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण अंग था, जो ब्रिटिश हुकूमत को फूटी आंख न सुहाया और इसीलिए अपनी इसी क्रांतिकारी पत्रकारिता का खामियाजा उन्हें कई मुकद्दमों, भारी जुर्माने और कई बार जेल जाने के रूप में भुगतना पड़ा। 1920 में उन्होंने ‘प्रताप’ का दैनिक संस्करण निकालना शुरू कर दिया, जो मूलतः किसानों, मजदूरों और पीडि़तों का हिमायती समाचार पत्र बना रहा। उन्होंने ‘प्रताप’ के अलावा ‘प्रभा’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका तथा एक राजनीतिक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया। घटना जनवरी 1921 की है, जब रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह ने किसानों पर गोलियां चलावाई थी। ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उस घटनाक्रम का पूरा विवरण अपने अखबार में छापा, जिसके लिए उन्हें तथा ‘प्रताप’ छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकद्दमा दर्ज किया गया और उन्हें जेल हो गई। 16 अक्तूबर 1921 को विद्यार्थी जी ने स्वयं गिरफ्तारी दी और 22 मई 2022 को जेल से रिहा हुए। जेल में रहते हुए उन्होंने एक डायरी लिखी और रिहाई के बाद उन्होंने उसी पर आधारित ‘जेल जीवन की झलक’ नामक एक ऐसी श्रृंखला छापी, जिसे अत्यधिक पसंद किया गया और ‘प्रताप’ के साथ पाठकों का काफिला जुड़ता गया। उसके बाद तो अंग्रेजों ने उन्हें वक्त-बेवक्त लपेटने का कोई अवसर नहीं छोड़ा लेकिन विद्यार्थी अपने क्रांतिकारी विचारों से जरा भी नहीं डिगे। जेल से रिहाई के कुछ ही समय बाद भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा फिर गिरफ्तार कर लिया गया और 1924 में तब रिहा किया गया, जब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था। वे कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागत-समिति के प्रधानमंत्री भी नियुक्त लेकिन 1929 में उन्होंने पार्टी की मांग पर त्यागपत्र दे दिया, जिसके बाद वे 1930 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चुन लिए गए और उन्हें प्रदेशभर में सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व करने की अहम जिम्मेदारी दी गई। उसी दौरान उन्हें फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और गांधी-इरविन पैक्ट के बाद 9 मार्च 1931 को उनकी जेल से रिहाई हुई। स्वाधीनता संग्राम के उस दौर में हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रहे थे लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने दोनों समुदायों की भावनाओं को भड़काने का ऐसा खेल खेला कि जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे भड़कने लगे और देशभर में साम्प्रदायिक हिंसा फैलने लगी। कानपुर शहर भी साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस उठा। गणेश शंकर विद्यार्थी का मन इन दंगों से बड़ा व्यथित हुआ और वे स्वयं इन दंगों को रोकने तथा दोनों समुदायों में भाईचारा कायम करने के लिए लोगों को समझाते हुए घूमने लगे। कई जगहों पर वे लोगों को समझाने में सफल भी रहे और इन दंगों के दौरान उन्होंने हजारों लोगों की जान बचाई भी लेकिन वे स्वयं दंगाइयों की एक ऐसी टुकड़ी में फंस गए. जो उन्हें पहचानते नहीं थे। उसके बाद उनकी बहुत खोज की गई किन्तु वे कहीं नहीं मिले। आखिर में उनका पार्थिव शरीर एक अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला, जो इतना फूल गया था कि लोग उसे पहचान भी नहीं पा रहे थे। हजारों लोगों की जान बचाने के बावजूद गणेश शंकर विद्यार्थी स्वयं धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गए और इस प्रकार 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दिए जाने के दो ही दिन बाद देश ने 25 मार्च 1931 को अपनी कलम की ताकत से ब्रिटिश हुकूमत की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाने वाला निर्भीक, निष्पक्ष, ईमानदार, यशस्वी व क्रांतिकारी पत्रकार भी खो दिया। 29 मार्च 1931 को उनका अंतिम संस्कार किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी जीवन पर्यन्त जिस धार्मिक कट्टरता तथा उन्माद के खिलाफ आवाज उठाते रहे, वही धार्मिक उन्माद उनकी जिंदगी लील गया। 27 अक्तूबर 1924 को विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप’ में ‘धर्म की आड़’ शीर्षक से लेख में लिखा था, ‘‘देश में धर्म की धूम है और इसके नाम पर उत्पात किए जा रहे हैं। लोग धर्म का मर्म जाने बिना ही इसके नाम पर जान लेने या देने के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे लोग कुछ भी समझते-बूझते नहीं हैं। दूसरे लोग इन्हें जिधर जोत देते हैं, ये लोग उधर ही जुत जाते हैं।’’ वह गणेश शंकर विद्यार्थी ही थे, जिन्होंने श्याम लाल गुप्त पार्षद लिखित गीत ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ को जलियांवाला हत्याकांड की बरसी पर 13 अप्रैल 1924 से गाया जाना शुरू करवाया था। ऐसे क्रांतिकारी पत्रकार और महान् स्वाधीनता सेनानी को उनके बलिदान दिवस पर शत-शत नमन। (लेखक पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 25 March 2020


bhopal,  Ganesh Shankar Vidyarthi, whose government was shaken by the writing

बलिदान दिवस 25 मार्च पर विशेष योगेश कुमार गोयल गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता जगत के ऐसे महान् पुरोधा थे, जिनकी लेखनी से ब्रिटिश सरकार इस कदर भयभीत रहती थी कि क्रांतिकारी लेखन के लिए उन्हें अंग्रेज सरकार द्वारा पांच बार सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा दी गई। उनके लेखों में ऐसी ताकत थी कि उनकी पत्रकारिता ने ब्रिटिश शासन की नींद हराम कर दी थी। जब उनकी कलम चलती थी तो ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिल जाती थी। बेमिसाल क्रांतिकारी पत्रकारिता के कारण ही गणेश शंकर विद्यार्थी और उनका अखबार ‘प्रताप’ आज के दौर में भी पत्रकारिता जगत के लिए आदर्श माने जाते हैं। वह एक निर्भीक पत्रकार, समाजसेवी, महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे स्वयं तो एक उच्च कोटि के पत्रकार थे ही, उन्होंने अनेक युवाओं को लेखक, पत्रकार तथा कवि बनने की प्रेरणा और ट्रेनिंग दी। कांग्रेस के विभिन्न आन्दोलनों में भाग लेने तथा ब्रिटिश सत्ता के अत्याचारों के विरूद्ध ‘प्रताप’ में निर्भीक लेख लिखने के कारण वे पांच बार जेल गए। जब भी उन्हें अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तार किया जाता तो उनकी अनुपस्थिति में ‘प्रताप’ का सम्पादन माखनलाल चतुर्वेदी तथा बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ सरीखे साहित्य के दिग्गज संभाला करते थे। 26 अक्तूबर 1890 को उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में एक स्कूल हेडमास्टर जयनारायण के घर जन्मे विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू तथा अंग्रेजी में हुई। इलाहाबाद में शिक्षण के दौरान ही उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर हुआ। हिन्दी साप्ताहिक ‘कर्मयोगी’ के सम्पादन में वे पंडित सुन्दर लाल की सहायता करने लगे। कानपुर में अध्यापन के दौरान उन्होंने कर्मयोगी सहित कई और अखबारों में लेख लिखे और पत्रकारिता के जरिये स्वाधीनता आन्दोलन से गहरे जुड़ गए। कुछ समय बाद उन्होंने पत्रकारिता, सामाजिक कार्यों तथा स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ाव के चलते ‘विद्यार्थी’ उपनाम अपना लिया और गणेश शंकर से ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’ हो गए। उनकी उत्कृष्ट लेखनशैली से प्रभावित होकर हिन्दी पत्रकारिता जगत के पुरोधा पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1911 में अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में उपसम्पादक के पद पर कार्य करने का ऑफर दिया किन्तु विद्यार्थी जी को ज्वलंत समाचारों, समसामयिक तथा राजनीतिक विषयों में ज्यादा दिलचस्पी थी, इसलिए उन्होंने द्विवेदी जी का प्रस्ताव स्वीकारने के बजाय महामना पं. मदन मोहन मालवीय के हिन्दी साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ में नौकरी ज्वाइन की। 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में कानपुर से स्वयं ‘प्रताप’ नामक पत्रिका निकालना शुरू कर दिया। प्रताप के जरिये विद्यार्थी जी किसानों, मजदूरों और ब्रिटिश अत्याचारों से कराहते गरीबों का दुख-दर्द उजागर करने लगे। ब्रिटिश शासनकाल की उत्पीड़न और अन्याय की क्रूर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना उनकी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण अंग था, जो ब्रिटिश हुकूमत को फूटी आंख न सुहाया और इसीलिए अपनी इसी क्रांतिकारी पत्रकारिता का खामियाजा उन्हें कई मुकद्दमों, भारी जुर्माने और कई बार जेल जाने के रूप में भुगतना पड़ा। 1920 में उन्होंने ‘प्रताप’ का दैनिक संस्करण निकालना शुरू कर दिया, जो मूलतः किसानों, मजदूरों और पीडि़तों का हिमायती समाचार पत्र बना रहा। उन्होंने ‘प्रताप’ के अलावा ‘प्रभा’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका तथा एक राजनीतिक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया। घटना जनवरी 1921 की है, जब रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह ने किसानों पर गोलियां चलावाई थी। ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उस घटनाक्रम का पूरा विवरण अपने अखबार में छापा, जिसके लिए उन्हें तथा ‘प्रताप’ छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकद्दमा दर्ज किया गया और उन्हें जेल हो गई। 16 अक्तूबर 1921 को विद्यार्थी जी ने स्वयं गिरफ्तारी दी और 22 मई 2022 को जेल से रिहा हुए। जेल में रहते हुए उन्होंने एक डायरी लिखी और रिहाई के बाद उन्होंने उसी पर आधारित ‘जेल जीवन की झलक’ नामक एक ऐसी श्रृंखला छापी, जिसे अत्यधिक पसंद किया गया और ‘प्रताप’ के साथ पाठकों का काफिला जुड़ता गया। उसके बाद तो अंग्रेजों ने उन्हें वक्त-बेवक्त लपेटने का कोई अवसर नहीं छोड़ा लेकिन विद्यार्थी अपने क्रांतिकारी विचारों से जरा भी नहीं डिगे। जेल से रिहाई के कुछ ही समय बाद भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा फिर गिरफ्तार कर लिया गया और 1924 में तब रिहा किया गया, जब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था। वे कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागत-समिति के प्रधानमंत्री भी नियुक्त लेकिन 1929 में उन्होंने पार्टी की मांग पर त्यागपत्र दे दिया, जिसके बाद वे 1930 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चुन लिए गए और उन्हें प्रदेशभर में सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व करने की अहम जिम्मेदारी दी गई। उसी दौरान उन्हें फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और गांधी-इरविन पैक्ट के बाद 9 मार्च 1931 को उनकी जेल से रिहाई हुई। स्वाधीनता संग्राम के उस दौर में हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रहे थे लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने दोनों समुदायों की भावनाओं को भड़काने का ऐसा खेल खेला कि जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे भड़कने लगे और देशभर में साम्प्रदायिक हिंसा फैलने लगी। कानपुर शहर भी साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस उठा। गणेश शंकर विद्यार्थी का मन इन दंगों से बड़ा व्यथित हुआ और वे स्वयं इन दंगों को रोकने तथा दोनों समुदायों में भाईचारा कायम करने के लिए लोगों को समझाते हुए घूमने लगे। कई जगहों पर वे लोगों को समझाने में सफल भी रहे और इन दंगों के दौरान उन्होंने हजारों लोगों की जान बचाई भी लेकिन वे स्वयं दंगाइयों की एक ऐसी टुकड़ी में फंस गए. जो उन्हें पहचानते नहीं थे। उसके बाद उनकी बहुत खोज की गई किन्तु वे कहीं नहीं मिले। आखिर में उनका पार्थिव शरीर एक अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला, जो इतना फूल गया था कि लोग उसे पहचान भी नहीं पा रहे थे। हजारों लोगों की जान बचाने के बावजूद गणेश शंकर विद्यार्थी स्वयं धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गए और इस प्रकार 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दिए जाने के दो ही दिन बाद देश ने 25 मार्च 1931 को अपनी कलम की ताकत से ब्रिटिश हुकूमत की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाने वाला निर्भीक, निष्पक्ष, ईमानदार, यशस्वी व क्रांतिकारी पत्रकार भी खो दिया। 29 मार्च 1931 को उनका अंतिम संस्कार किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी जीवन पर्यन्त जिस धार्मिक कट्टरता तथा उन्माद के खिलाफ आवाज उठाते रहे, वही धार्मिक उन्माद उनकी जिंदगी लील गया। 27 अक्तूबर 1924 को विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप’ में ‘धर्म की आड़’ शीर्षक से लेख में लिखा था, ‘‘देश में धर्म की धूम है और इसके नाम पर उत्पात किए जा रहे हैं। लोग धर्म का मर्म जाने बिना ही इसके नाम पर जान लेने या देने के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे लोग कुछ भी समझते-बूझते नहीं हैं। दूसरे लोग इन्हें जिधर जोत देते हैं, ये लोग उधर ही जुत जाते हैं।’’ वह गणेश शंकर विद्यार्थी ही थे, जिन्होंने श्याम लाल गुप्त पार्षद लिखित गीत ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ को जलियांवाला हत्याकांड की बरसी पर 13 अप्रैल 1924 से गाया जाना शुरू करवाया था। ऐसे क्रांतिकारी पत्रकार और महान् स्वाधीनता सेनानी को उनके बलिदान दिवस पर शत-शत नमन। (लेखक पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 25 March 2020


bhopal ,  Laughing virus is more dangerous than corona

योगेश कुमार सोनी   कोरोना वॉयरस से पूरी दुनिया त्राहिमाम है, इसी बीच चीन में एक और नए वायरस हंता ने जन्म ले लिया। चीन के सरकारी मीडिया संस्थान ग्लोबल टाइम्स के अनुसार इसका प्रकोप चीन के यूनान प्रांत मे फैला है और इससे एक व्यक्ति की मौत की भी खबर आ चुकी। हालांकि यह वायरस अभी चीन में ही सीमित है। यूएस सेंटर फॉर डिजीस एंड कंट्रोल के अनुसार हंता वायरस चूहे के थूक और मलमूत्र में होता है जो हवा में घुलकर मानव शरीर में प्रवेश करता है। इससे इंसान तब संक्रमित होता है जब चूहे के रहने वाली जगहों के संपर्क में आता है। यह वायरस सांस के जरिए शरीर में जाता है।   कुछ रिसर्च सेंटर और रिपोर्ट्स के अनुसार हंता वायरस से मौत का खतरा कोरोना के मुकाबले करीब चौबीस प्रतिशत ज्यादा आंका गया है। इस वॉयरस से जिस व्यक्ति की मौत हुई है वह बस से शाडोंग प्रांत लौट रहा था। जैसा कि चीन में हर किसी की कहीं भी जाने से पहले जांच हो रही है तो पूरी बस की जांच हुई, जिसमें कुल 32 यात्री थे। किसी को भी कोई समस्या नहीं निकली लेकिन एक व्यक्ति में कुछ अजीब सिम्टम्स देखे गए। पहले तो यह लगा कि शायद यह व्यक्ति कोरोना से पीड़ित होगा लेकिन जब तकनीकी रूप से सभी जांचे हुई तो पता चला इसे हंता वायरस हुआ है। जैसे ही इस वायरस के बारे में पता चला तो पूरे चीन में हड़कंप मच गया और इसके बाद अब पूरी दुनिया में दहशत फैल गई है। चीन के डॉक्टरों के अनुसार हंता वायरस होने के शुरुआती लक्षण शरीर का बहुत ज्यादा थकना, अचानक तेज बुखार, एलर्जी होना, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, चक्कर आना, सर्दी लगना और पेट से संबंधित दिक्कतें होना बताया गया है। इसके अलावा अबतक इस वॉयरस के और अधिक सिम्टम्स के बारे में तो पता नहीं चला लेकिन यह चूहों की वजह से फैलता है, इस बात की पुष्टि हो चुकी। लक्षण दिखने के बाद यदि इस वॉयरस से पीड़ित का इलाज नहीं किया जाता या उसे इलाज न मिले तो उसे किडनी फेल, लो ब्लडप्रेशर की समस्या, आघात, नाड़ियों से रिसाव जैसी बड़ी समस्याएं हो जाती हैं।   बहराहल,अब मुद्दा यह है कि यदि चीन से इस ही तरह वायरस निकलते रहे तो निश्चित तौर पर दुनिया का सर्वनाश तय है। एक सवाल यह भी है कि क्या यह वॉयरस अपने आप उपज रहे हैं या फिर इसमें चीन की कोई चाल हो सकती है? चूंकि एक ही देश में दूसरा इतना खतरनाक वायरस आना बहुत कुछ कह रहा है। इसके अलावा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन में जीव-जन्तुओं को अधिक मात्रा में खाया जाता है, जिस वजह से वहां हर कोई बीमार ही माना जाएगा। वह किसी भी प्रकार के जीव को नहीं छोड़ते, जिस वजह से उनके शरीर में आंतरिक रूप से किसी भी रोग को सहने की शक्ति बहुत कम हो जाती है।   पहले से ही कोरोना वॉयरस की वजह से करीब 17 हजार लोग मर चुके हैं और यह करीब 190 देशों में अपने पैर पसार चुका है। पूरी दुनिया में लगभग चार लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं। भारत में कोविड-19 के पांच सौ से अधिक मामले पाए गए हैं, जिनमें से 10 लोगों की मौत हो चुकी है। जिस वजह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन घोषित कर दिया। जानकारी के मुताबिक हमारे देश के बाइस राज्यों के पचहत्तर जिलों में कोरोना वॉयरस के संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है। जिसमें अधिकतर मामले कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली एनसीआर में पाए गए हैं। विश्व पटल पर चर्चा करें तो बीता सोमवार इटली के लिए सबसे भयावह बीता, जहां एकदिन में छ सौ से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई। इस भयावह स्थिति से पूरा विश्व ग्रस्त है। सभी को आर्थिक नुकसान भी हो रहा है हालांकि इसके लिए सभी देशों की सरकारें ऐसी व्यवस्था करने में लगी हुई है कि किसी को कोई नुकसान न हो। लेकिन यदि अब हंता वायरस भी पैर पसार गया तो पूरी दुनिया को और अधिक चुनौतीपूर्ण तरीके से लड़ना होगा जो बेहद कठिन हो सकता है।   भारत जैसा देश हर परिस्थिति लड़ने को तैयार है। प्रधानमंत्री ने तीन सप्ताह भारत को पूर्ण रूप से बंद करने की अपील है। उन्होने कहा कि यदि आप इक्कीस दिन नहीं माने तो आप 21 वर्ष पीछे आ जाएगे। अपने घर में एक लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी और शपथ लेनी होगी हमें अपने सिवाय अपनों का भी ख्याल रखना होगा। इसलिए हमें बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है। जैसा कि हमारा देश ज्यादा संख्या वाला देश है तो हमें ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है और वो हमें स्वयं ही करनी है। इस वायरस की रफ्तार तोड़ने के लिए हमें शासन-प्रशासन द्वारा बताई गई गाइड लाइन पर चलना होगा।     (लेखक पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 25 March 2020


bhopal,  Corona Social Corporate Responsibility

हर्षित कुमार कंपनियों के कोरोना वायरस से निपटने को लेकर किए जा रहे व्यय को उनके सामाजिक कॉरपोरेट उत्तरदायित्व (सीएसआर) का हिस्सा माना जाएगा। यह निर्णय जहां सरकार की सजगता को दिखाता है, वहीं कई प्रश्न खड़े कर देता है। देशभर में कोरोना वायरस का खतरा बढ़ता जा रहा है। सरकार और सामाजिक संस्थानों का फर्ज बनता है कि वो जनता को जागृत करे और उनकी समस्याओं को निबटारे में सहयोग करे। इससे संक्रमित लोगों का आंकड़ा 500 के पास जा चुका है। इस स्थिति को देखते हुए पूरे देश को लॉकडाउन कर दिया गया है। कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के तहत कंपनियों को एक वित्त वर्ष में अपने तीन साल के वार्षिक शुद्ध लाभ का कम-से-कम दो प्रतिशत कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत खर्च करना होता है। हाल ही में कॉरपोरेट कार्य मामलों के मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर कहा कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए किया जा रहा कंपनियों का खर्च सीएसआर के दायरे में आने योग्य है। मंत्रालय के पास कंपनी अधिनियम को लागू करने की जिम्मेदारी है। कॉरपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि देश में कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने इसे आपदा घोषित करने का निर्णय किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया है इसलिए यह स्पष्ट किया जाता है कि कंपनियों के इसपर किए जाने वाले सीएसआर कोष के खर्च को सीएसआर गतिविधि माना जाएगा। सवाल यह उठता है कि इस वित्तीय वर्ष के अंत में कम्पनी अपने सीएसआर कार्यक्रम में कोरोना को समाहित कैसे करे। क्या सरकार वित्तीय वर्ष की समयसीमा की अवधि भी बढ़ाएगी। अगर देखें तो हाल ही में लोकसभा द्वारा कंपनी संशोधन विधेयक, 2019 पारित किया गया है इसके अनुसार, यदि कोई कंपनी अपने द्वारा निर्धारित कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी फंड की राशि एक निश्चित अवधि में खर्च नहीं करेगी, तो वह राशि स्वत: केंद्र सरकार के एक विशेष खाते (जैसे- क्लीन गगा फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष) में जमा हो जाएगी। क्या सरकार समय सीमा को भी बढ़ाएगी क्योंकि यह कोरोना विश्वव्यापी संकट बनकर खड़ी है। कम्पनियों की जबावदेही तय की जा रही है, लेकिन कम्पनी कोरोना वायरस की इस लड़ाई में जो खर्च करेगी, उसका माध्यम कौन होगा। सवाल यह है कि क्या देश के एनजीओ के साथ मिलकर कंपनियां इस मुहिम में लगेगी। अगर एनजीओ पर कोर्पोरेट घराना आश्रित होगा तो उसकी जवाबदेही कौन सुनिचित करेगा। अभी एनजीओ के काम से सम्बंधित कोई प्रारूप तय नहीं किया गया है। सरकार के इस महामारी के संकट से निकलने के लिए जहां कम्पनियों की सीएसआर सम्बंधित निर्णय तारीफ़ के काबिल है वहीं उसके प्रारूप और उसकी निगरानी सम्बंधित विषय नेपथ्य में दिख रहा है। सरकार को सामाजिक संगठन की विशेषज्ञता और उसके काम पर सीएसआर सम्बंधी विषय के लिए भी प्रारूप सुनिश्चित करनी चाहिए। क्योंकि कम्पनियों का काम एनजीओ के माध्यम से ही सम्भव होता है। वर्तमान में भारत के संदर्भ में देखा जाए तो अधिकांश एनजीओ अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं। भारत में दूसरी सर्वाधिक संख्या में एनजीओ हैं फिर भी जनहित एवं जनकल्याण सुनिश्चित नहीं हो पाता है। एक आकड़े के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 1000 करोड़ रुपए की राशि एनजीओ को दी जाती है लेकिन इनमें से जन हितार्थ कितनी राशि खर्च हुई, कहाँ खर्च हुई एवं उसका क्या परिणाम हुआ, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं दिया जाता है और न ही उपलब्ध है। उदारीकरण के पश्चात भारत में लगभग 33 लाख एनजीओ हैं जिनमें से केवल दस फीसदी ने ही अपने आय-व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। इससे एनजीओ के कार्यों एवं आय-व्यय की पारदर्शिता भी संदेह के घेरे में है। सरकार को सतर्कता के साथ इस कोरोना महामारी में सामाजिक संस्थानों की जबावदेही तय करने का वक्त भी है। वहीं सरकार अपने राहत कोष को भी सीएसआर सम्बंधित कार्यक्रम के लिए खोल सकती है। जनधन योजना के तहत खुले बैंक खातों का उपयोग कर सरकार और कोर्पोरेट तत्काल जनसमान्य को लाभ पहुंचाने में सफल हो सकती है। सरकार को सतर्कता के साथ सीएसआर के पैसे को खर्च करने और उसके परिणाम पर निगरानी रखने की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)    

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Dakhal News 25 March 2020


bhopal, Corona will be controlled by lock down

प्रमोद भार्गव   22 मार्च को जनता कर्फ्यू अभूतपूर्व रहा। हर गली में ताली, थाली, घंटा, मंजीरे, शंख आदि की तीव्र ध्वानियां सुनाई दीं। वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी सुनाई दिया। इन ध्वनि-तरंगों का वास्तव में अपेक्षित प्रभाव शरीर के साथ-साथ वातावरण में भी अनुभव किया गया। इस सामूहिक नाद की पवित्रता में एक तरह से दिव्यता प्रगट थी। लाॅकडाउन के जरिए यह सामाजिक दूरी इसलिए जरूरी थी क्योंकि कोरोना वायरस किसी एक सतह पर 12 घंटे से ज्यादा जीवित या सक्रिय नहीं रह पाता है। ऐसे में जनता कर्फ्यू और लाॅकडाउन के उपायों ने लोगों को एक-दूसरे से अलग-थलग करके इस वायरस से उत्पन्न होने वाले नए संक्रमण को रोकने में रामबाण का काम किया है। ऐसा करने से परस्पर स्पर्श से तो दूरी बनी ही, यदि किसी संक्रमित व्यक्ति का स्पर्श खिड़की, दरवाजों, रुपयों, फाइलों, पर्सलों और वाहनों के स्टेयरिंग या सीटों से हुआ भी है तो अगले कुछ घंटे इन चीजों को नहीं छूने से वायरस मर जाएगा और नया व्यक्ति संक्रमित होने से बच जाएगा। जाहिर है, घरों में बंद की यह प्रक्रिया इस वायरस की कड़ी को तोड़ देगी। इसी के मद्देनजर अंतरराज्यीय बस सेवाएं बंद करते हुए 260 जिलों को 31 मार्च तक के लिए लाॅकडाउन कर दिया गया है। यह पहल कोरोना की कमर तोड़ने का काम करेगी।   वैदिक-दर्शन तो हजारों सालों से मानता रहा है कि ऊर्जा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में वह चेतना है, जो जीवन का निर्माण करती है। इसी में पांच तत्व धरती, आकाश, आग, हवा और पानी अंतरर्निहित हैं। अब विज्ञान भी मानने लगा है कि सृष्टि पदार्थ और ऊर्जा से मिलकर बनी है। इसीलिए भारतीय जीवन-शैली में मंदिरों में सुबह-शाम पूजा के समय विभिन्न वाद्य-यंत्र बजाकर नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के उपाय थे। घरों में हाथ-पैर धोकर ही प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन पाश्चात्य जीवन-शैली के प्रभाव में हमने दिनचर्या में शामिल इन तौर-तरीकों को दकियानूसी व अंधविश्वास कहा और नकारते गए। जबकि इन ध्वानियों के निकलने से जीवाणु, विषाणु व कीटाणु या तो मर जाते थे या फिर निष्क्रिय हो जाते हैं। कोरोना (कोविड-19) विषाणु की विश्वव्यापी दस्तक और हजारों लोगों के प्राण लील लेने से यह साफ हो गया है कि आखिर में हम ऐसी महामारियों से छुटकारा पारंपरिक ज्ञान और वातावरण की अधिकतम शुद्धता से ही पा सकते हैं।   जब हम छोटे थे और गांव में रहते थे, तब बाहर से आने पर घर में हाथ-पैर धोए बिना प्रवेश वर्जित था। लोगों से दूर रहने रहने की सलाह भी माता-पिता देते थे। अब जब कोरोना वायरस ने महामारी का रूप ले लिया, तब हमसे इन्हीं उपायों को अपनाने के लिए कहा जा रहा है। कोरोना प्रभावित देशों ने परस्पर दूरी बनाए रखने के लिए लाॅकडाउन कर लिया है। इस स्थिति में यातायात, कार्यालय, विद्यालय इत्यादि बंद कर दिए जाते हैं। स्वास्थ्य, पेयजल, खाद्य सेवाएं ही जारी रहती हैं। एक तरह की यह आपात स्थिति है। दुनिया की पहली इस तरह की तालाबंदी अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकी हमले के बाद की गई थी। चूंकि कोरोना परस्पर दो व्यक्तियों के संपर्क या उसके द्वारा छू ली गई चीजों से फैलता हैं इसलिए इसकी कड़ी को तोड़ने के लिए सबसे कारगर व सरल उपाय दूरी बनाए रखना है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कोराना पर विषाणु नियंत्रण का अबतक टीका बना लेने में चिकित्सा विज्ञानियों को सफलता नहीं मिली है। यह सावधानी इसलिए और जरूरी हो जाती है क्योंकि चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इटली में ऐसे हालातों के निर्माण के बाद केवल 60 साल की उम्र से नीचे के संक्रमितों का ही इलाज किया जा रहा है। चीन ने इस संक्रमण पर नियंत्रण अपनी अधिकतम आबादी को घरों में कैद करके ही पाया है।   प्रधानमंत्री ने ताली व थाली बजाकर उनलोगों के प्रति कृतज्ञता प्रगट करने को कहा था, जो दिन-रात कोरोना से मुक्ति की लड़ाई में संघर्षरत हैं। इनमें चिकित्सक, नर्सें व स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं। पुलिस और मीडिया के लोग भी दिन-रात सेवाएं दे रहे हैं। इस संकट की घड़ी में हमें पता चल रहा है कि वास्तव में हमारे आदर्श कौन होने चाहिए। अनेक चिकित्साकर्मी लगातार डेढ़ माह से ड्यूटी पर हैं। आईटीबीपी और सेना के जवान क्वारंटाइन केंद्रों में तैनात हैं। जबकि धर्म और संप्रदाय के नाम पर जो स्थल कटुता फैलाते हैं, उनमें आवागमन सीमित हो गया है। अलबत्ता इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में भी जहां एक वर्ग अपने प्राणों की बाजी लगाकर नागरिकों को बचाने में लगा है, वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो ऊंची कीमतों पर मास्क, दवाएं और खाद्य सामग्री बेच रहे हैं। नकली सेनेटाइजर भी बेचे जा रहे हैं। वहीं बाॅलीवुड गायिका कनिका कपूर ने लंदन से लौटने के बाद असलियत छिपाई और लखनऊ में सार्वजनिक कार्यक्रमों में भागीदारी कर सैकड़ों लोगों को संक्रमण के संदेह के घेरे में ला दिया। इस लिहाज से भारत में इस समय सबसे बड़ा संकट ऐसे लोगों की पहचान करना है, जो बीते दो माह के भीतर संक्रमण से प्रभावित देशों से लौटे हैं। राजस्थान सहित अन्य राज्यों में पर्यटकों के माध्यम से भी यह बीमारी फैली है। चीन में जब कोरोना खतरनाक स्थिति में था, यदि हम तभी चेत जाते तो भारत में हालात काबू में रहते। दरअसल चीन से छात्रों और यात्रियों के लौटने के बाद ही भारत में कोरोना का संकट घिर गया था। अब हालात यह हो गया है कि लगभग हर प्रांत से कोरोना के संक्रमितों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। नतीजतन कोविड-19 पीड़ित मरीजों की संख्या 360 के ऊपर पहुंच गई है और पांच लोगों के इस वायरस ने प्राण ले लिए हैं।   बावजूद यह गनीमत है कि सामुदायिक स्तर पर कोरोना फैलने के संकेत नहीं मिले हैं। यदि इस वायरस का कन्युनिटी ट्रांसमिशन आरंभ हो जाता है तो संक्रमित रोगियों की संख्या अचानक बढ़ जाएगी। ऐसा होने पर हमें उपकरणों से लेकर दवाओं और आइसोलेटेड वार्डों तक की कमी का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल देश में प्रति 10 लाख व्यक्तियों पर एक व्यक्ति की जांच करने की जरूरत पड़ रही है। फिलहाल भारत में प्रतिदिन 8000 नमूनों के परीक्षण की क्षमता 150 प्रयोगशालाओं में है, जबकि अभी एकदिन में केवल 100 संदिग्धों की जांच के ही नमूने लिए जा रहे हैं। अलबत्त्ता कम्युनिटी ट्रांसमिशन के हालात यदि निर्मित हो जाते हैं तो कोरोना में एक 'सुपर स्प्रेडर' भी हो सकता है। मसलन उच्च संक्रमकता वाला एक संक्रमित व्यक्ति से ही कुछ समय के भीतर सैंकड़ों लोग संक्रमित हो सकते हैं। प्रसिद्ध अस्थि रोग विषेशज्ञ एवं शिवपुरी के मुख्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी डाॅ. अर्जुन लाल शर्मा का कहना है, 'भारत में फिलहाल माइल्ड अर्थात कम असरदार वायरस का प्रकोप है। लेकिन इस वायरस के साथ संकट यह है कि यह अपनी प्रकृति बदलने में सक्षम है। यदि यह अपनी आक्रामकता के चरम स्वरूप में आ जाता है तो इसपर काबू पाना मुश्किल होगा। इसीलिए भारतीय चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद् इसके स्वरूप पर निरंतर निगरानी रखे हुए है।'   भारत में ही नहीं पूरी दुनिया की जीवनशैली में जिस तरह से बदलाव आए हैं, उसने जहां मनुष्य की प्रतिरोधात्मक क्षमता घटाई है। औद्योगिक, प्रौद्योगिक विकास व बढ़ते शहरीकरण ने वायुमंडल को प्रदूषित कर दिया है। हृदय रोग, लकवा, मधुमेह, रक्तचाप, कैंसर और सांस संबंधी बीमारियां इसी दूषित जीवन शैली की देन हैं। हमारे आसपास जल, वायु व ध्वनि प्रदूषण इतने विस्फोटक हो गए हैं कि उनपर व्यावहारिक रूप में नियंत्रण किए बिना, रोगाणुजनित महामारियों पर नियंत्रण मुश्किल है। भारत जैसे पारंपरिक देश में धर्म से जुड़े जो स्वास्थ्य लाभ के उपाय हैं, उन्हें पंडे व पुजारियों ने अपने तत्कालिक लाभ के लिए धन कमाने व मृत्यु के बाद मोक्ष के उपायों में बदल दिया है। इस कारण ज्यादातर मंदिरों में शंख, घंटे व घड़ियालों का बजाया जाना या तो बंद हो गया है या फिर उनका मशीनीकरण हो गया है। गोया, जनता कर्फ्यू के दौरान ताली, थाली, घंटा, मंजीरों व शंख से जो सामूहिक ध्वनियां उत्सर्जित करने के समय जिस पवित्र व दिव्य प्रर्जा परिवेश में संचरित हुई, यही ऊर्जा व समुदाय का एकांतवास कोरोना से मुक्ति दिलाएगी।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 March 2020


bhopal,TB Day amidst the awe of Corona

डॉ. रमेश ठाकुर   इस समय जिधर देखो, उधर कोरोना का खौफ देता है। इसने समूचे संसार को अपने आगोश में लिया हुआ है। ज्यादातर जगहों पर लाॅकडाउन कर दिया गया है। आज विश्व तपेदिक यानी टीबी दिवस भी है। डब्ल्यूएचओ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि टीबी की बीमारी बीते कुछ वर्षों में कमी के जगह बढ़ेातरी ही हुई है। रोकने के लिए हर वर्ष विश्व तपेदिक दिवस के मौके पर ग्लोबल स्तर पर मंथन होता है। लेकिन, इसबार कोरोना के कारण यह दिवस फीका-सा है। पर, जरूरी यह भी हो जाता है कि अचानक जन्मी समस्याएं चाहें कितनी भी क्यों न बड़ी हो, जिन विकराल समस्याओं पर रूटीन मंथन किया जाता है वह मंथन यथावत रहे। हिंदुस्तान में पोलियो के बाद दूसरी सबसे बड़ी विकराल बीमारी टीबी है। सालाना लाखों की संख्या में मरीज दम तोड़ते हैं। बीते कुछ वर्षों से टीबी बच्चों में ज्यादा फैली है। रिपोर्ट बताती है, हिंदुस्तान में पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चों में टीबी रोग युद्वस्तर पर फैल रहा है। निजी व सरकारी अस्पतालों से लिए आंकड़ों में कुल 1,33,059 बच्चों में टीबी पाई गई है, जो कुल मामलों का करीब सात फीसदी है।   ऐसा भी नहीं कि भारतीय स्वास्थ्य तंत्र टीबी को गंभीरता से नहीं ले रहा हो। टीबी पर काबू पाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘डाॅट्स‘ व अन्य दवाओं का वितरण सरकारी व निजी अस्पतालों में फ्री में देना शुरू किया। प्रचार-प्रसार भी खूब हुआ। फिलहाल विगत कुछ वर्षों से धीमा है। लेकिन, फिर भी जो उम्मीद थी, उसके परिणाम उतने उत्साहजनक नहीं निकले? कमोबेश, स्थिति पहले से भी ज्यादा चिंताजनक हो गई है। सन् 2015 से लेकर 2018 के बीच बढ़े टीबी के मामले चिंता का विषय हैं। पिछले मामलों के मुकाबले इन सालों में बीस फीसद की वृद्वि दर्ज हुई। वहीं, टीबी पर आई डब्ल्यूएचओ की पिछले साल की रिपोर्ट ने भी स्वास्थ्य सिस्टम के तोते उड़ा दिए थे। आंकड़ों में सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश से दर्ज हुए। वहां के दर्ज मामलों में 16 फीसदी वृद्धि हुई। पिछले साल पूरे देश में 21, 55, 894 टीबी के नए केस सामने आए थे। सबसे दुखद पहलू यह है, टीबी संक्रमित की बढ़ी हुई यह वृद्वि पंद्रह से बीस साल के युवाओं में दर्ज की गई।   मौजूदा केंद्र सरकार सन् 2025 तक टीबी को भारत से समाप्त करने के मिशन पर काम कर रही है। टीबी से लड़ने के लिए कई विशेष कार्ययोजनाएं संचालित हैं। नई वैक्सीन आदि की खोज भी हुई है। पर, टीबी के मौजूदा बढ़े केस उनके प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैं। बीते दो दशक पहले की बात करें, तब स्वास्थ्य विभाग ने वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम के लिए डाॅट्स पर निर्भरता दिखाई थी। यूरोप के कुछ मुल्कों में डाॅट्स के परिणाम चमत्कारी रहे थे। उसको देखते हुए भारत सरकार ने इस दवा का वितरण जारी किया। तब, डब्ल्यूएचओ ने भी उम्मीद जताई थी कि डाॅट्स दवा के कोर्स से टीबी का इलाज मुमकिन होगा। पर, सिर्फ भारत में उसके नतीजे वैसे नहीं आए। जबकि, एशिया के दूसरे देशों में रिजल्ट अच्छा आया। यहां तक पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी हमसे बेहतर परिणाम दिखे। टीबी के मामलों में बढ़ोतरी से स्वास्थ्य मंत्रालय भी चिंतित है।   हिंदुस्तान में टीबी तेजी से क्यों फैल रही है इसका एक कारण भी सामने आया है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक पाॅल्युशन टीबी रोग को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। सड़क पर उड़ने वाली धूल-मिट्टी और कंस्ट्रक्शन वर्क से फैलने वाला प्रदूषण इंसान को तेजी से टीबी की तरफ खींच रहा है। निर्माण कार्य के दौरान अगर सावधानी नहीं बरती जाए तो धूल के कण उड़कर व्यक्ति के पेट में चले जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे वह संक्रमण की चपेट में आता है। प्रदूषण इंसानों के फेफड़ों में लगातार जम रहा है। वहीं, बीड़ी, सिगरेट, खैनी व तंबाकू तो टीबी को बढ़ावा देती ही है। ऐसी वैज्ञानिक धारणा शुरू से रही है। बावजूद इसके लोग इन सबका सेवन करने से नहीं चूकते हैं। सिनेमाघरों में फिल्में शुरू होने से पहले एक व्यक्ति का विज्ञापन दिखाया जाता है जो खैनी से अपनी जान गंवा देता है। केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा सिनेमाघरों को उस विज्ञापन को दिखाना इसलिए अनिवार्य किया है ताकि लोग जागरूक हो सकें। पर, उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा।   गौरतलब है, समूचे जगत में बीमारियों से मरने वालों का एक तिहाई आंकड़ा टीबी को बताया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हिंदुस्तान में करीब पांच लाख के आसपास लोगों की मौत टीबी से प्रत्येक वर्ष होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयाभय है? हिंदुस्तान में टीबी की बीमारी दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेती जा रही है। ऐसा भी नहीं है कि रोकने के प्रयास न हो रहे हों, काफी हो रहे है। पर, बेअसर साबित हो रहे हैं। टीबी के बढ़ते मामलों को देखकर एक बात जेहन में आती है कि एक तरफ हम आर्थिक विकास की सेहत को चंगा करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं। वही, दूसरी तरफ देशवासियों के स्वास्थ्य से हम इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ रही है।   हमारे यहां टीबी के संबंध में वही पुरानी उक्ति ‘परहेज इलाज से बेहतर है’ चरित्रार्थ होती है क्योंकि टीबी के संक्रमण का प्रभाव हर आदमी पर नहीं पड़ता यानी जिनका इम्मियून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर हो, वही इनके चपेट में आता है। शायद यही वजह है कि कुपोषण तथा पोषण तत्वों की कमी की वजह से गरीब इससे अधिक प्रभावित होते हैं। टीबी एक संक्रामक रोग है, जो बीमारी घेरने से पहले आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी की बीमारी दूषित खानपान, प्रदूषण और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर फैलती है। यह न केवल फेफड़ों, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्से जैसे किडनी व दिमाग पर भी हमला करती है। इसपर काबू पाने के लिए सरकार को पोलियो जैसा अभियान चलाना होगा। नहीं तो यह बीमारी यूं ही फैलती रहेगी। समाज को भी अपने स्तर पर इस बीमारी से लड़ना होगा। टीबी होने पर वैद्य-हकीमों के पास जाने के बजाय अस्पतालों में उपयुक्त इलाज कराना चाहिए।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 March 2020


bhopal,  New account of achievements and new start day

ऋतुपर्ण दवे   नव-संवत्सर हिन्दू नववर्ष का आरंभ है जो चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को शक्ति-भक्ति की उपासना, नवरात्रि के साथ प्रारंभ से होता है। पंचाग रचना का भी यही दिन माना जाता है। महान गणितज्ञ भाष्कराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना कर पंचाग की रचना की थी। भारत सरकार का पंचांग शक संवत् भी इसी दिन से शुरू होता है। भारत के लगभग सभी प्रान्तों में यह नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थान के अनुसार मार्च-अप्रैल में लगभग इसी समय पड़ते हैं। विभिन्न प्रान्तों में यह पर्व गुड़ी पड़वा, उगाडी, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेहु, चेटीचण्ड, तिरुविजा, चित्रैय आदि के नाम से मनाए जाते हैं।   भारत में नव-संवत्सर पर अलग-अलग प्रान्तों में विशेष तरह की पूजा पाठ का विधान है। पुरानी उपलब्धियों को याद करके नई योजनाओं की रूपरेखा भी तैयार की जाती है। इस दिन अच्छे व्यंजन और पकवान भी बनाए जाते हैं। विभिन्न प्रान्तों की अलग परंपराएं भी इस पर्व में झलकती हैं। कहीं स्नेह, प्रेम और मधुरता के प्रतीक शमी वृक्ष की पत्तियों का आपस में लोग विनिमय कर एक-दूसरे के सुख और सौभाग्य की कामना करते हैं। कहीं काली मिर्च, नीम की पत्ती, गुड़ या मिश्री, आजवायइन, जीरा का चूर्ण बनाकर मिश्रण खाने व बांटने की परंपरा है।   संवत्सर वास्तव में कालगणना की एक पद्धति है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता काफी पुरानी और बेहद विकसित रही है इसलिए यहाँ समय-समय पर स्वीकार्यता की दृष्टि से गणना पद्धति में भी आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी हुए हैं। काल गणना की विभिन्न पद्धतियों में कल्प, मन्वन्तर युग आदि के बाद ही संवत्सर का उल्लेख मिलता है। संवत का प्रयोग लगभग 2000 वर्षों से थोड़ा ही पुराना है जब इसका उल्लेख हिन्दू-सिथियनों द्वारा किए जाने की पुष्टि होती है जब उन्होंने आधुनिक अफगानिस्तान एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में ई.पू. लगभग 100 ई. में शासन किया था। इसके काफी बाद काल गणना की इस पद्धति का भारत में ही नहीं बल्कि मिस्र, बेबीलोन, यूनान एवं रोम में लगातार प्रयोग हुआ।यूं तो नव-संवत्सर से जुड़ी कई बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं। जहां यह भारतीय नववर्ष के प्रारंभ का दिन है, वहीं यह भी माना जाता है कि इसी दिन 1 अरब, 97 करोड़, 39 लाख, 49 हजार, 112 वर्ष पूर्व ब्रम्हाजी ने सृष्टि की शुरुआत की थी। दूसरी ओर वैज्ञानिक भी पृथ्वी की आयु को लगभग 2 अरब वर्ष मानते हैं।   विक्रम संवत् की भी इसी महीने शुरुआती होती है। यह हिन्दू पंचांग में गणना प्रणाली भी जिसे संवत्सर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह उस राजा के नाम पर प्रारंभ होता है, जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो न ही भिखारी हो। उज्जयिनी वर्तमान उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने 2068 पूर्व इसी दिन अपने राज्य की स्थापना की थी। यह भी संयोग ही है कि जहाँ हिन्दू मान्यता के अनुसार यह नववर्ष होता है वहीं कामकाज के लिहाज से मार्च में पड़ने वाले संवत्सर माह में ही दुनिया भर में पुराने कामों को समेटकर नए कार्यों की रूपरेखा तैयार की जाती है। एक अद्भुत संयोग यह भी है कि 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है और इस तारीख को रात-दिन बराबर होते हैं। 12 माह का एक वर्ष, 7 दिन का एक सप्ताह रखने की परंपरा भी विक्रम संवत् से ही शुरू हुई है, जिसमें महीने का हिसाब सूर्य-चंद्रमा की गति के आधार पर किया जाता है। विक्रम कैलेण्डर की इसी पद्धति का आगे चलकर अंग्रेजों और अरबियों ने भी अनुसरण किया। इसके साथ ही भारत के अलग-अलग कई प्रान्तों ने इसी आधार पर अपने-अपने कैलेण्डर तैयार किए।   इस तरह संवत्सर एक तरह से समय को कालखण्ड में विभाजित करने की एक पद्धति भी है अर्थात बारह महीने का एक पूरा कालचक्र का लेखा-जोखा रखने का बही-खाता कह सकते हैं। सबसे विशेष बात यह है कि यह पद्धति सबसे पहले भारत में ही प्रारंभ की गई जो वास्तव में विभिन्न ऋतुओं का वो हिसाब-किताब से तैयार गणनाओं पर निर्धारित होती है जो कि सूर्य और पृथ्वी के अंर्तसंबंधों के कारण ही घटित होता है। संवत्सर को असाधारण माना जाता है क्योंकि यह भी मान्यता है कि ब्रम्हाजी ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण किया था। इस दिन विशेष रूप से ब्रम्हाजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवता, यक्ष-राक्षस, गंधर्वों, ऋषि-मुनियों, नदी-पर्वत, पशु-पक्षियों, मनुष्यों, रोगों, कीटाणुओं और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है। ऋषि याज्ञवल्क्य वाजसनेय द्वारा रचित ग्रन्थ ‘शतपथ ब्राम्हण’ के अनुसार प्रजापति ने अपने शरीर से जो प्रतिमा उत्पन्न की उसको संवत्सर कहते हैं अर्थात संवत्सर की उपासना, प्रजापति की उपासना है।   ब्रम्हाण्ड के पुरातन ग्रन्थों और वेदों में भी नव-संवत्सर का वर्णन है। यजुर्वेद के 27वें और 30वें अध्याय में क्रमशः 45वें और 16वें मंत्र में इसे विस्तार से दिया गया है। इसकी पुष्टि ऋगवेद के ऋत सूक्त से भी होती है जिसमें कहा गया है “समुदादर्णवादाधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्रीणि विद्यत विश्वस्य मिषतो वशी।।” अर्थात प्रजापति ने सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष को रचा और तभी से नव-संवत्सर का आरंभ हुआ। सृष्टि संवत् के प्रारंभ का भी यही समय माना जाता है। इसी से सृष्टि की आयु का भी आकलन किया जाता है। नवसंवत्सर की प्रमाणिकता इसी से सिध्द होती है कि नवंबर 1952 में भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद द्वारा एक पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गई थी। जिसने 1955 में रिपोर्ट सौंपकर शक संवत् को राष्ट्रीय सिविल कैलेण्डर के रूप में भी स्वीकारने की सिफारिश की थी। इसके बाद ही जहाँ सरकार के अनुरोध पर ग्रेगेरियन कैलेण्डर को सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानते हुए भी 22 मार्च 1957 को शक संवत् आधारित पंचांग को राष्ट्रीय कैलेण्डर के रूप स्वीकारा गया जिसमें चैत्र मास भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना होता है।   शक संवत को भले ही भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर माना गया हो लेकिन भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है, जिसका सम्बंध राजा विक्रमादित्य के शासनकाल से है। दोनों भारतीय कैलेंडर हैं जो समय गणना की हिन्दू पंचांग प्राचीन पद्धति है। शक संवत का प्रारंभ कुषाण वंश के शासक कनिष्क ने 78 ई.पू.किया था जबकि विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू.की थी। जहाँ शक संवत की पहली तिथि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से शुरू होती है वहीं विक्रम संवत पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से प्रारंभ होता है। दोनो संवतो के महीनों के नाम एक ही हैं अंतर मात्र तिथियों की शुरुआत में हैं।   विक्रम संवत् का संबंध किसी धर्म विशेष से न होकर संपूर्ण धरा की प्रकृति, खगोल सिध्दांतों और ग्रह-नक्षत्रों से है जो कि वैज्ञानिक आधार और वैश्विक स्वीकार्यता के संभावित कारण तो हैं ही साथ ही भारत की गौरवशाली परंपरा हैं। जहां तक विक्रम संवत् की बात है, भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सबसे लोकप्रिय और प्राचीन संवत् माना जाता है। किसी नवीन संवत् को चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि संवत् चलाने के दिन से पहले उस राज्य की जितनी भी प्रजा हो ऋणी न हो, ऋणी होने पर महाराजा द्वारा इसे चुकाया जाएगा। हालांकि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन होने के प्रमाण नहीं है लेकिन यहां महापुरुषों के संवत् उनके अनुनायियों ने श्रद्धावश ही चलाए हैं जिनमें सर्वमान्य और विक्रम संवत् ही है क्योंकि महाराजा विक्रमादित्य ही वो महाराजा थे जिन्होंने संपूर्ण देश यहां तक कि प्रजा के ऋण को भी चुकाकर इसे चलाया।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 March 2020


bhopal, Where is the corona crisis Indias corporate houses

डॉ. अजय खेमरिया   भारत कोरोना की खतरनाक त्रासदी के मुहाने पर है। पूरा देश लॉकडाउन स्थिति में है तब सवाल यह है कि भारत के धनी-मानी लोग कहां हैं? क्या भारत में कॉरपोरेट घरानों की मानवीय जवाबदेही निर्वहन का यह सबसे निर्णायक समय नहीं है? सरकार के स्तर पर कोरोना संकट से लड़ने के अवसर समावेशी नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सब कुछ न तो सरकारी नियंत्रण में है न ही राज्य की ऐसी क्षमता। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर नागरिकों, कर्मचारियों, पीड़ितों और सामान्य जन के लिए रियायतों, उपचार और वैकल्पिक व्यवस्था का एलान किया है।   भारत के ज्यादातर औद्योगिक घरानों की तरफ से इस लॉकडाउन स्टेज तक कोई बड़ी मदद राष्ट्र के लिए घोषित नहीं हुई है। उल्टे कालाबाजारी, जमाखोरी की हरकतें हमारे राष्ट्रीय चरित्र को शर्मसार कर रही हैं। भारत में परोपकार की समृद्ध परम्परा रही है। हजारों साल से समाज के धनी-मानी लोग न केवल कोरोना जैसी परिस्थितियों बल्कि सामान्य हालातों में भी पीड़ित, गरीब, मजलूम की सहायता परोपकारी भावना से अनुप्राणित होकर करते रहे हैं। "परहित सरस् धर्म नहीं"-जैसे जीवन सन्देश हमारा दिग्दर्शन करते रहे हैं। लेकिन मौजूदा कोरोना संकट में हमारे उद्योगपति, करोबारी कहां हैं? यह सवाल बड़ा है। भारत सरकार और राज्यों की सरकार 31 मार्च तक लॉकडाउन अवधि में कर्मचारियों को वेतन देंगी। दिहाड़ी मजदूरों को अनाज और नकदी की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में सम्पन्न लोगों से बड़ी स्पष्ट अपील की थी कि वे इस संकटकाल में उदारता के साथ आम नागरिकों के साथ खड़े हों।   कम्पनी एक्ट में लाभांश का दो फीसदी सीएसआर (सामाजिक उत्तरदायित्व निधि) पर व्यय का विशिष्ट प्रावधान है। बेहतर होगा इस दायरे में आने वाले सभी कॉरपोरेट संस्थान इस मद की राशि सीधे प्रधानमंत्री राहत कोष या सीधे अपने कार्यबल से व्यय करना सुनिश्चित करें। क्योंकि ऐसे ही समय इस मद की वास्तविक उपयोगिता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी आज कॉरपोरेट का दखल व्यापक है। यूपी के अम्बेडकर नगर के एक निजी नर्सिंग होम्स संचालक डॉ. अतुल पांडे के अलावा किसी निजी अस्पताल ने अपनी तरफ से रियायत या सहयोग की घोषणा नहीं की है। कनक हॉस्पिटल और ट्रॉमा सेंटर के मालिक डॉ. पांडे की पत्नी भी विशेषज्ञ हैं और उन्होंने पूरा अस्पताल सरकार को सौंप दिया है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के देशभर में श्रृंखलाबद्ध अस्पताल हैं लेकिन अंबेडकर नगर जैसा समाचार सामने नहीं आया है।   रिलायंस, अडानी, एचसीएल, गोदरेज, पतंजलि जैसी कम्पनियों में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। बेहतर होता सभी घराने एकसाथ सभी कर्मियों के सवैतनिक अवकाश की घोषणा कर देते। हेल्थ सेक्टर की कम्पनियां मास्क और सेनिटाइजर पर मुनाफ़ा मुक्त आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती हैं इससे कालाबाजारी की स्थिति निर्मित नहीं होगी। निजी हैल्थ सेक्टर के श्रंृखलाबद्ध अस्पताल सरकारी तंत्र से बेहतर है। अच्छा हो कि महानगरों में स्थित सभी बड़े अस्पताल सरकार के लिये सुपुर्द कर दिए जाएं। वस्तुतः लॉक डाउन लंबा भी खिंच सकता है ऐसे में एसोचैम, फिक्की, चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अलावा देश के सभी व्यापारिक संगठनों को सरकार के साथ यथासंभव सहयोग की संभावना खुद निर्धारित करनी चाहिये। क्योंकि आने वाले समय में चुनौतियां और भी खतरनाक होने के आसार हैं। जीवन उपयोगी और खानपान की वस्तुओं का संकट भी खड़ा होगा क्योंकि मुनाफाखोर हर स्तर पर सक्रिय हैं। इनसे निबटने में सरकार सफल नहीं हो सकती है जबतक कि कॉरपोरेट साथ खड़े न हों।   औद्योगिक वर्ग को यह समझना होगा कि जब भारत स्वस्थ्य नहीं होगा तो उनके लिए न उत्पादन संभव है न विपणन। इसलिये यह बेहद जरूरी है कि भारत का निजी क्षेत्र सरकार के साथ समानांतर रूप से इस त्रासदी का सामना करने के लिए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। भारत अफवाह पसन्द देश भी है, यहां झूठी और मनगढ़ंत बातें अक्सर पूरे लोकजीवन को घेर लेती है। अगर सरकार और देश के सभी औद्योगिक घराने इस समय एकजुट होकर देश की जनता के सामने खड़े हों तो भारत मनोवैज्ञानिक रूप से भी इस जंग को जीतने में सफल होगा। क्योंकि कोरोना केवल एक स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है, यह आर्थिक हमला भी है। इसका समेकित शमन केवल सरकार के स्तर पर संभव नहीं है। पूरी दुनिया को भारत ने परोपकार और अपरिग्रह के जीवन मूल्य दिए हैं। भारत का अतीत भी कारोबारियों के सामाजिक योगदान से चमकता हुआ है इसलिए अपेक्षा की जानी चाहिये कि इस वैश्विक महामारी के संकट में भारत के कॉरपोरेट घराने देश के साथ खड़े रहेंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 March 2020


bhopal, Where is the corona crisis India

डॉ. अजय खेमरिया   भारत कोरोना की खतरनाक त्रासदी के मुहाने पर है। पूरा देश लॉकडाउन स्थिति में है तब सवाल यह है कि भारत के धनी-मानी लोग कहां हैं? क्या भारत में कॉरपोरेट घरानों की मानवीय जवाबदेही निर्वहन का यह सबसे निर्णायक समय नहीं है? सरकार के स्तर पर कोरोना संकट से लड़ने के अवसर समावेशी नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सब कुछ न तो सरकारी नियंत्रण में है न ही राज्य की ऐसी क्षमता। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर नागरिकों, कर्मचारियों, पीड़ितों और सामान्य जन के लिए रियायतों, उपचार और वैकल्पिक व्यवस्था का एलान किया है।   भारत के ज्यादातर औद्योगिक घरानों की तरफ से इस लॉकडाउन स्टेज तक कोई बड़ी मदद राष्ट्र के लिए घोषित नहीं हुई है। उल्टे कालाबाजारी, जमाखोरी की हरकतें हमारे राष्ट्रीय चरित्र को शर्मसार कर रही हैं। भारत में परोपकार की समृद्ध परम्परा रही है। हजारों साल से समाज के धनी-मानी लोग न केवल कोरोना जैसी परिस्थितियों बल्कि सामान्य हालातों में भी पीड़ित, गरीब, मजलूम की सहायता परोपकारी भावना से अनुप्राणित होकर करते रहे हैं। "परहित सरस् धर्म नहीं"-जैसे जीवन सन्देश हमारा दिग्दर्शन करते रहे हैं। लेकिन मौजूदा कोरोना संकट में हमारे उद्योगपति, करोबारी कहां हैं? यह सवाल बड़ा है। भारत सरकार और राज्यों की सरकार 31 मार्च तक लॉकडाउन अवधि में कर्मचारियों को वेतन देंगी। दिहाड़ी मजदूरों को अनाज और नकदी की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में सम्पन्न लोगों से बड़ी स्पष्ट अपील की थी कि वे इस संकटकाल में उदारता के साथ आम नागरिकों के साथ खड़े हों।   कम्पनी एक्ट में लाभांश का दो फीसदी सीएसआर (सामाजिक उत्तरदायित्व निधि) पर व्यय का विशिष्ट प्रावधान है। बेहतर होगा इस दायरे में आने वाले सभी कॉरपोरेट संस्थान इस मद की राशि सीधे प्रधानमंत्री राहत कोष या सीधे अपने कार्यबल से व्यय करना सुनिश्चित करें। क्योंकि ऐसे ही समय इस मद की वास्तविक उपयोगिता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी आज कॉरपोरेट का दखल व्यापक है। यूपी के अम्बेडकर नगर के एक निजी नर्सिंग होम्स संचालक डॉ. अतुल पांडे के अलावा किसी निजी अस्पताल ने अपनी तरफ से रियायत या सहयोग की घोषणा नहीं की है। कनक हॉस्पिटल और ट्रॉमा सेंटर के मालिक डॉ. पांडे की पत्नी भी विशेषज्ञ हैं और उन्होंने पूरा अस्पताल सरकार को सौंप दिया है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के देशभर में श्रृंखलाबद्ध अस्पताल हैं लेकिन अंबेडकर नगर जैसा समाचार सामने नहीं आया है।   रिलायंस, अडानी, एचसीएल, गोदरेज, पतंजलि जैसी कम्पनियों में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। बेहतर होता सभी घराने एकसाथ सभी कर्मियों के सवैतनिक अवकाश की घोषणा कर देते। हेल्थ सेक्टर की कम्पनियां मास्क और सेनिटाइजर पर मुनाफ़ा मुक्त आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती हैं इससे कालाबाजारी की स्थिति निर्मित नहीं होगी। निजी हैल्थ सेक्टर के श्रंृखलाबद्ध अस्पताल सरकारी तंत्र से बेहतर है। अच्छा हो कि महानगरों में स्थित सभी बड़े अस्पताल सरकार के लिये सुपुर्द कर दिए जाएं। वस्तुतः लॉक डाउन लंबा भी खिंच सकता है ऐसे में एसोचैम, फिक्की, चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अलावा देश के सभी व्यापारिक संगठनों को सरकार के साथ यथासंभव सहयोग की संभावना खुद निर्धारित करनी चाहिये। क्योंकि आने वाले समय में चुनौतियां और भी खतरनाक होने के आसार हैं। जीवन उपयोगी और खानपान की वस्तुओं का संकट भी खड़ा होगा क्योंकि मुनाफाखोर हर स्तर पर सक्रिय हैं। इनसे निबटने में सरकार सफल नहीं हो सकती है जबतक कि कॉरपोरेट साथ खड़े न हों।   औद्योगिक वर्ग को यह समझना होगा कि जब भारत स्वस्थ्य नहीं होगा तो उनके लिए न उत्पादन संभव है न विपणन। इसलिये यह बेहद जरूरी है कि भारत का निजी क्षेत्र सरकार के साथ समानांतर रूप से इस त्रासदी का सामना करने के लिए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। भारत अफवाह पसन्द देश भी है, यहां झूठी और मनगढ़ंत बातें अक्सर पूरे लोकजीवन को घेर लेती है। अगर सरकार और देश के सभी औद्योगिक घराने इस समय एकजुट होकर देश की जनता के सामने खड़े हों तो भारत मनोवैज्ञानिक रूप से भी इस जंग को जीतने में सफल होगा। क्योंकि कोरोना केवल एक स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है, यह आर्थिक हमला भी है। इसका समेकित शमन केवल सरकार के स्तर पर संभव नहीं है। पूरी दुनिया को भारत ने परोपकार और अपरिग्रह के जीवन मूल्य दिए हैं। भारत का अतीत भी कारोबारियों के सामाजिक योगदान से चमकता हुआ है इसलिए अपेक्षा की जानी चाहिये कि इस वैश्विक महामारी के संकट में भारत के कॉरपोरेट घराने देश के साथ खड़े रहेंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 March 2020


bhopal,  Corona will definitely lose due to Indian awareness

सियाराम पांडेय 'शांत'   कोरोना के जानलेवा वायरस से पूरी दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है। दुनिया के 163 देशों में कोरोना वायरस ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। कहीं कम और कहीं अधिक। हालात यह है कि ढाई लाख से अधिक लोग कोरोना वायरस की चपेट में हैं। 11 हजार से अधिक लोगों की इससे मौत हो चुकी है। हालांकि सभी देश अपने-अपने स्तर पर इसे शिकस्त देने में जुटे हैं लेकिन भारत न केवल खुद जागरूक हुआ बल्कि अन्य देशों की भी मदद की है। उसने दुनिया भर के देशों को न केवल संकट की घड़ी में एकजुट रहना सिखाया है बल्कि इस बात का संदेश भी दिया कि अगर संयम और संकल्प के साथ विवेकपूर्वक सावधानी बरती जाए, समस्या के खिलाफ संघर्ष किया जाए तो उसे शिकस्त देने में वक्त नहीं लगेगा। चीन के वुहान शहर से फंसे अपने लोगों को तो उसने सुरक्षित निकाला ही, बांग्लादेश और नेपाल के नागरिकों को भी इस संकट से उबारा। इतना ही नहीं, उसने चीन को भी 1100 करोड़ की औषधि भेजी।   चीन के वुहान में कोरोना वायरस ने सर्वप्रथम दस्तक दी थी। इसकी वजह क्या रही, इसपर चर्चा से बेहतर यह होगा कि कोरोनाजन्य मौतों के रथ को रोका कैसे जाए? सर्वप्रथम इस वायरस से चीन के 80976 लोग संक्रमित हुए थे, जिसमें 3248 मरीजों की जान चली गई थी। इस रोग से सर्वाधिक 4032 मौतें इटली में हुई हैं, जबकि वहां 47021 लोग कोरोना संक्रमित हैं। भारत में कोरोना प्रभावितों और इससे मरने वालों की तादाद अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है और इसकी वजह यह है कि भारत सरकार पहले ही दिन से कोरोना से बचाव को लेकर सजग है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कोरोना संक्रमित केवल 236 मरीज हैं, जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस संख्या को 223 ही बता रहा है। देश में कोरोना वायरस से संक्रमितों में 32 विदेशी हैं, जिनमें 17 इतालवी, तीन फिलीपीन, दो ब्रिटेन और एक-एक कनाडा, इंडोनेशिया और सिंगापुर का निवासी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वायरस के खतरों के मद्देनजर जनता कर्फ्यू की अपील के साथ स्कूल-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को 2 अप्रैल तक बंद करने की सलाह दी है। इसपर अमल भी हो चुका है। सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों पर रोक लगा दी गई है। धार्मिक संस्थाओं ने भी धार्मिक आयोजनों से दूरी बना ली है। देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों के कपाट बंद कर दिए गए हैं। सिनेमाघरों, मॉल और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी पर्याप्त सावधानियां बरती जा रही हैं। जरा भी खांसी-जुकाम होने पर लोग अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। इंडिगो ने जहां कोरोना वायरस से बचाव के लिए अपनी पचास प्रतिशत से अधिक उड़ानें स्थगित करने और गो एयर ने अपनी सभी उड़ानें स्थगित करने का निर्णय लिया है। इस सकारात्मक ऐहतियात की सराहना की जानी चाहिए।   पिछली महामारियों से हुई जनधन की क्षति बताती है कि तब धार्मिक स्थलों ने अपने कार्यक्रमों पर रोक नहीं लगाई थी लेकिन इसबार भारत में हर कदम फूंक-फूंककर उठाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह वायरस नया है। दुनिया भर में अभी इसका इलाज तलाशा नहीं गया है, ऐसे में सावधानी बरतकर ही हम खुद और अपने संपर्क में आने वाले लोगों को इस वायरस के प्रभाव से बचा सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री की इस अपील का पूरे देश ने न केवल स्वागत किया है, वहीं अपने स्तर पर वे उसपर हरसंभव अमल भी कर रहे हैं लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बेबीडाल सिंगर कनिका कपूर जैसे लोग भी इस समाज में हैं, जो लंदन की यात्रा के बाद भी वायरस की गंभीरता को नहीं समझते। कार्यक्रम करते हैं। उनके कार्यक्रमों में कई सांसद और मंत्री भी उनके संपर्क में आए। उनसे मिलने के बाद एक सांसद तो संसद में भी चले गए। राष्ट्रपति से भी मिल आए। छत्तीसगढ़ में भी विदेश से लौटी एक युवती के संपर्क में आए कई लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं। इस स्थिति से बचा जा सकता है।   कोरोना वायरस से बचने और इस बाबत किसी भी तरह की सहायता या परामर्श प्राप्त करने के लिए टोल फ्री नंबर 1075 का इस्तेमाल करने, किसी भी तरह की अफवाह और भ्रामक सूचना से बचने को कहा गया है। प्रधानमंत्री का मानना है कि एकदिन के सहयोग से संक्रमण की कड़ी को तोड़ने में मदद मिलेगी लेकिन हमें सावधानी तो रोज ही बरतनी होगी। प्रधानमंत्री ने केवल जनता से ही संवाद नहीं किया बल्कि सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी विचार-विमर्श किया है। उन्हें अपने राज्यों में कोरोना वायरस के खतरों के प्रति न केवल आगाह किया है बल्कि उन्हें अपने-अपने राज्यों में व्यापार संघों के साथ वीडियो कांफ्रेंस करने को भी कहा है ताकि कालाबाजारी और अनुचित मूल्यवृद्धि को रोका जा सके। मुख्यमंत्रियों ने जिस तरह कोरोना से निपटने संबंधी अपनी तैयारियां बताई हैं, वह इस बात का द्योतक है कि शीघ्र ही यह देश कोरोना वायरस को मात देने में सफल हो जाएगा। जब जनता और सरकार साथ मिलकर किसी समस्या का समाधान तलाशते हैं तो बड़ी से बड़ी आपदा को घुटना टेकने के लिए बाध्य किया जा सकता है।   स्वास्थ्य सुविधाओं के न्यायपूर्ण उपयोग के महत्व को समझना वक्ती जरूरत भी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है पृथक केंद्गों की संख्या तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करना। स्वास्थ्य कर्मियों के क्षमता निर्माण और स्वास्थ्य ढांचे में विस्तार करना। उसे मजबूती देना। कोरोना वायरस के चलते सर्वाधिक मार देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ी है। हर राज्य को प्रतिदिन हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसलिए भी इस समस्या से यथाशीघ्र निपट लेने में ही भलाई है। और यह सब तभी मुमकिन है जबतक देश में बड़े पैमाने पर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और इस निमित्त सभी परामर्शों का पालन किया जाए। दवा नियामक भारतीय औषधि महानियंत्रक ने स्विट्जरलैंड की एक कंपनी समेत 14 निजी कंपनियों को कोरोना वायरस जांच किट की गुणवत्ता के मूल्यांकन के लिए लाइसेंस दिया है। रोशे डायग्नोस्टिक्स इंडिया के अलावा बाकी 13 कंपनियां भारतीय हैं। इनमें अहमदाबाद के सारा डायग्नोस्टिक्स और चेन्नई की सीपीसी डायग्नोस्टिक्स शामिल हैं। ये सभी कंपनियां जांच किटों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करेंगी और डीसीजीआई को अपना डाटा जमा कराएंगी। कुल मिलाकर जिस तरह से कोरोना से जूझने की तैयारी है, उसे बनाए रखने में ही देश का कल्याण है।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 22 March 2020


bhopal,  Our hearts are filled with the passion to sacrifice

शहादत दिवस 23 मार्च पर विशेष   डाॅ. राकेश राणा   28 सितम्बर, 1907 को पाकिस्तान परिक्षेत्र में पंजाब प्रांत के गांव लायलपुर में जन्मे भगत सिंह के पूरे परिवार में देशभक्ति की राष्ट्रीय धारा बह रही थी। पिता किशन सिंह, चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह की ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के किस्से सुनते बड़े हुए बलवंत सिंह। परिवार के अधिकतर सदस्य ऐसी गतिविधियों के चलते जेलों में रह आए थे। चाचा अजीत सिंह, लाला लाजपत राय के साथ बर्मा की जेल में उन्हीं की कोठरी में साथ थे। उनके दादा क्रांतिकारियों का खुल्लमखुल्ला सहयोग करते रहे थे। बड़े भाई कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह भी कम नहीं थे। स्वयं 18 वर्ष की उम्र से ही बलवंत सिंह नाम से भगत सिंह की विद्रोही क्रांतिकारी गतिविधियां सामने आने लगी थी।   कई सवाल जेहन में उठते हैं। क्या भगत सिंह सिर्फ कोई सिरफिरा नौजवान था? क्या वह अल्हड़ और उग्र स्वभाव वाला क्रांतिकारी था? क्या सिर्फ कोई भावुक नौजवान था? या फिर सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ने वाला वैचारिक मुहिम का माहिर आन्दोलनकारी देशभक्त युवा था। वास्तव में भगत सिंह का जीवन विचित्र विरोधाभासों का अहसास देता है। भगत सिंह की वैचारिकी के सिरों को खोजना और जोड़ना किसी अधकचरे दिमाग में भरी दिवानगी के बस की बात नहीं है। भगत सिंह जोशीले, उग्र और भावुक भर नहीं हैं। भगत सिंह के बम और पिस्तौल को क्रांति समझना ही भ्रांति है। मुकदमे के दौरान भरी अदालत में साथियों संग ’’सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है’’ गाना। ’’इंकलाब-जिन्दाबाद’’ की तरंगों से नौजवानों में आजादी की उमंगें भर देना। ‘सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली’ में बम फेंककर भागने के बजाए गिरफ्तारी को चुनना। जेल में बिताए दिनों को लिखने-पढ़ने और वैचारिक मुहिम को मजबूत करने की योजनाओं में नियोजित करना। अंततः मौत से मुस्कुरा कर मिलना। फांसी के फंदे को गले में डालने से पहने चूमना। यह सब संयोग नहीं है। एक बहुत सुलझे हुए परिपक्कव वैचारिक मस्तिष्क की ही किसी महान मिशन के लिए इतनी ठोस कार्रवाही हो सकती है, जिसे सिर्फ भगत सिंह ही कर सकते हैं। वह भी मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में कर दिखाया। क्या सिर्फ जुनून और भावुकता इतनी निडरता ला सकती है, कभी नहीं। भगत सिंह को एक उग्र क्रांतिकारी मात्र मान लेना उनके कद को कम करना है। भगत सिंह में विचार की धार है, दुनिया को बदलने की बयार है, अपने देश और समाज के प्रति गहरा सरोकार है। वह देश का हीरो और मानवता का योद्धा है। देशभक्ति से सराबोर उस शहंशाह को समझना सरल नहीं है। यही वजह है चलताऊ ढंग की विचारधाराएं भगत सिंह से भागती हैं। उसका वैचारिक फ़लक इतना व्यापक है कि संकीर्णताएं उसमें शमित हो जाती हैं, उलझ जाती है। यही उलझन भगत सिंह की वैचारिकी का असल राज है।   भगत सिंह ऐसा भारत चाहते थे जिसमें ’गोरे अंग्रेजों का स्थान काले-अंग्रेज न लें। अपने एक लेख में लिखते हैं कि “अधिक विश्वास और अधिक अंधविश्वास दोनों खतरनाक है, यह मस्तिष्क को मूर्ख और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी, यदि वो तर्क का प्रहार न सहन कर सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे। तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी कर नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना। इसके बाद सही कार्य शुरू होगा। जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है। असेम्बली बम कांड के सिलसिले में जनवरी 1930 में अपनी अपील के दौरान ऐतिहासिक बयान देते हैं कि ‘’पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते हैं।’’ हम हत्या के पक्षधर नहीं हैं, मानव जीवन की पवित्रता के प्रति हमारी पूर्ण श्रद्धा है। मानव जीवन पवित्र और गरिमापूर्ण है.....हम जब अपना जीवन मानवता की सेवा में समर्पित कर देंगे, तभी किसी को हानि या पीड़ा पहुंचाने की सोच सकते हैं।’’   जब क्रांतिकारियों ने 23 दिसम्बर 1929 को दिल्ली-आगरा ट्रैक पर वायसराय लार्ड इरविन की स्पेशल ट्रेन को बम से उड़ाने वाली कार्रवाई की तो गांधी ने वायसराय की रक्षा के लिए ईश्वर का धन्यवाद किया और अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ में क्रांतिकारियों की इस कार्यवाही की तीखी आलोचना करता अपना लेख ’‘बम की पूजा’’ शीर्ष क से प्रकाशित किया। जिसके जवाब में भगतसिंह ने क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा से बात कर जवाबी लेख लिखा- ’‘बम का दर्शन’’। भगतसिंह की विचारधारा का अजस्र प्रवाह देखिए। वह अपने समय के उन तमाम सवालों को उठाते हैं, जो सामाजिक और राजनीतिक हर लिहाज से बेहद मौजूं है। अपने लेखन और विचारों से समकालीन समस्याओं पर तीखा प्रहार करते हैं। अस्पृश्यता, साम्प्रदायिकता, युवाओं की राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संगठन के निर्माण और घोषणापत्र, अपने परिजनों और प्रियजनों को अपने मिशन के महत्व को समझाने वाले पत्र लिखते हैं। ’क्रन्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ नाम से समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण की पूरी मार्गदर्शिका प्रस्तुत की। कौम के नाम सन्देश और युवाओं के नाम संदेश, धर्म और हमारा स्वाधीनता संग्राम, सम्पादक मॉडर्न रिव्यू के नाम ढ़ेरों पत्र लिखे। भगत सिंह ने जेल में रहते चार गंभीर पुस्तकें लिखी। ‘हिस्ट्री ऑफ दि रेव्युल्यूशनरी मूवमेंट इन इण्डिया’, ‘दि आईडियल सोशलिज़्म’, ‘एट दि डोर ऑफ डेथ’ और अपनी आत्मकथा। वहीं से “लेटर टू यंग पॉलिटिकल वर्कर्स“ जैसा महत्वपूर्ण दस्तावेज दिया। अपने जीवन में कई संगठन बनाए। जन-संघर्ष की एक अलग वैचारिकी विकसित की। भगत सिंह का सपना आज भी अधूरा है। भगत सिंह ऐसा भारत चाहते थे जो गरीबी, शोषण, सांप्रदायिकता और हिंसा से मुक्त हो। वह जीवनभर एक समरस और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की वैचारिक लड़ाई लड़ते रहे।   यहां तक कि जेल में भी जब कैदियों के साथ भेदभाव और शोषण देखा, तो उनके अधिकारों के लिए लम्बी भूख-हड़ताल की। वास्तव में भगत सिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ जन-संघर्ष करने वाले सबसे उज्ज्वल नायक हैं। यही वजह है कि 23 मार्च 1931 की शहादत को लगभग पूरी सदी बीत जाने को है फिर भी सम्पूर्ण राष्ट्र के जेहन में भगत सिंह की याद ताज़ा है। भगत सिंह नायक के रूप में आज भी जन-मन में बसते हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 March 2020


bhopal,  Role of women in water conservation

विश्व जल दिवस 22 मार्च पर विशेष   डाॅ. नाज परवीन   जल संरक्षण एवं प्रबंधन में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता से जल संरक्षण की समस्या काफी हद तक दूर की जा सकती है। इतिहास की ज्यादातर सभ्यताओं ने जल तथा महिलाओं को जीवन का स्रोत माना है। 14 मार्च को नदियों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस के रूप में मनाया गया, जिसकी थीम भी महिला, जल और जलवायु परिवर्तन पर केन्द्रित है। समय आ गया है कि एक बूंद जल की कीमत सोने से भी ज्यादा है, इसे गहराई से समझा जा सके और इसके लिए समाज व सरकार को युद्धस्तर पर काम करने की आवश्यकता है, जिसमें महिलाओं की भूमिका अहम् होगी।   2011 की जनगणना हमें बतलाती है कि देश की आबादी 121.019 करोड़ है, जिसमें महिलाओं की संख्या 58.647 करोड़ यानि लगभग आधी है। महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा खेती की जमीन तैयार करने, बीज छांटने, पौधे रोपने, खाद तैयार करने से लेकर कीटनाशक छिड़काव, कटाई, ओसाई, थ्रेसिंग में पुरुषों से भी अधिक समय देता है। जल, जमीन और जंगल से जुड़ी बुनियादी व्यवस्थाओं के संरक्षण में महिलाओं का अहम रोल है। महिलाओं की जल संरक्षण विधि तकनीकी ज्ञान पर नहीं अपितु सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित है। रियो में 1992 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन में माना गया कि महिलाओं का पर्यावरण क्षरण के साथ गहरा सम्बन्ध है। इस सम्मेलन में कहा गया कि ’पर्यावरण के रखरखाव एवं सतत् विकास में महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। सतत् विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये उनकी सर्वांगीण प्रतिभागिता आवश्यक है।’ संयुक्त राष्ट्र एजेण्डा 2030 के 17 सतत विकास लक्ष्यों में 6वां लक्ष्य ’सभी के लिए स्वच्छता और जल के सतत प्रबन्धन सुनिश्चित करने की बात करता है। 28 जुलाई 2010 को संयुक्त राष्ट्र ने जल को मानवाधिकार घोषित कर दिया था, परन्तु आंकड़े बतलाते हैं कि स्वच्छ जल की अनुपलब्धता और दूषित जल को पीने से दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 2300 लोगों की मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा दुनिया में 86 प्रतिशत से अधिक बीमारियां दूषित और असुरक्षित पानी पीने से ही होती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि 2025 तक दुनिया भर में 5.5 अरब लोग जो दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या होगी, पानी की समस्या से जूझेगी। आज भी जल की गुणवत्ता में कमी और आपूर्ति की मांग के बीच खासा असंतुलन देखा जा सकता है। जिसका सीधा सम्बन्ध मानव के साथ-साथ जानवरों के अस्तित्व पर भी मंडराता संकट है।   महिलाएं रोजमर्रा की जिन्दगी में जल की प्रमुख उपयोग कर्ता हैं। उनके द्वारा खाना पकाने, कपड़े धोने, परिवार की साफ-सफाई एवं स्वच्छता का प्रबन्धन किया जाता है। जिसमें प्रतिदिन पानी का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है, इसलिए महिलाओं को जल-प्रबन्धन एवं स्वच्छता सम्बन्धी परियोजनाओं में शामिल किया जाना आवश्यक है। हालांकि भारत सरकार द्वारा इसकी पहल 2 अक्टूबर 2014 को प्रारम्भ किये गये ’स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत लक्ष्मी नायर नामक छात्रा को स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय अभियान का पहला अंबेसडर बनाकर की गयी है परन्तु अभी भी चुनौतियां कम नहीं हैं जिनका हल महिला सहभागिता से ही निकाला जा सकता है। जल प्रबन्धन, सिंचाई, कृषि, अर्थव्यवस्था और समाजसे जुड़े मुद्दे महिला और पुरुष के परस्पर सहयोग से योजनाओं का क्रियान्वयन करना एवं कानूनी तथा संस्थागत व्यवस्थाओं में नीतिगत बदलाव करना आवश्यक है।   इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि दुनिया की कई सभ्यताओं ने जल और महिला को जीवन का स्रोत माना है। जल ही जीवन है अर्थात जल जीवन की मूलभूत आवश्यकता है, इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक जल रिपोर्ट 2006 में कहा था कि ’हमारी धरती पर हर किसी के लिये पर्याप्त पानी है लेकिन फिर भी जलसंकट बरकरार है। इसका मुख्य कारण कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार, उचित संस्थानों की कमी, नौकरशाही की जड़ता और मानव क्षमता एवं भौतिक बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी है।’ जल संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन और आवंटन से जल संकट से बचा जा सकता है। हाल ही में ’द जर्नल अर्थ फ्यूचर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी लगातार जारी रहती है तो 2100 तक विश्व के लगभग आधे प्राकृतिक ग्लेशियर पिघल जाएंगे। जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिये पेयजल, कृषि आदि क्षेत्रों में भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। मानव जीवन के अस्तित्व के लिए इन ग्लेशियरों का बहुत महत्व है अतः इनको बचाना आज की पीढ़ी की बड़ी जिम्मेदारी है। तभी जल और जीवन को बचाना संभव हो पाएगा। मौजूदा सरकार द्वारा जल से जुडे़ सभी मुद्दों को हल करने के लिए ’जल शक्ति मंत्रालय’ का गठन एक भविष्यदर्शी कदम है।   कहने को तो पृथ्वी चारों ओर से पानी से घिरी हुई है लेकिन केवल 2.5 प्रतिशत पानी ही प्राकृतिक स्रोतों, नदियों, तालाबों, कुओं और बावड़ियों से प्राप्त होता है जबकि आधा प्रतिशत भूजल भण्डारण है। सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय यह है कि भारत जल संकट वाले देशों की कतार में आगे खड़ा है। हालांकि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है, यदि हमारी प्राथमिकता युद्धस्तर पर जल प्रबन्धन और संरक्षण की है जिसमें महिलाओं और पुरुषों का समान प्रतिनिधित्व हो, जल संकट से बचाव संभव है। जल है तो जीवन है। महिलाएं न केवल परिवार, समाज अपितु दैनिक जीवन में भी गंगा पूजन, कुआं, तालाब, नल आदि की पूजा-अर्चना एवं साफ-सफाई के कामों को उत्सव के रूप में मनाती आयी हैं। वे राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण में महती भूमिका का निर्वाह कर सकती हैं, इसीलिए जल, जमीन और जंगल से जुड़ी बुनियादी व्यवस्थाओं के संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी अत्यन्त ही आवश्यक है।     (लेखिका एडवोकेट हैं।)

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Dakhal News 22 March 2020


bhopal , Nirbhayas convicts hanged as a carrier of change

डाॅ. रमेश ठाकुर   जिस फांसी का देशवासियों को बेसब्री से इंतजार था, वह फांसी मुकम्मल हुई। निर्भया को सात वर्ष बीत जाने के बाद आखिरकार इंसाफ मिल गया। निर्भया केस को उसके अंजाम तक पहुंचाने में किसी एक ने नहीं, बल्कि कई वर्गों ने अहम भूमिका निभाई। लेकिन, सबसे बड़ी भूमिका ‘मीडिया‘ ने निभाई, जिसने घटना की तारीख 16 दिसंबर 2012 से लेकर फांसी की मुकर्रर तारीख 20 मार्च 2020 को साढ़े पांच बजे तक केस को टाइम लाइन में रखा। केस को कभी फीका नहीं पड़ने दिया। घटना के एक-एक पहलुओं को हमेशा सुर्खियों में रखा। लोगों का गुस्सा कम नहीं होने दिया। वरना, निर्भयाकांड से लेकर अभीतक 17 हजार हजार से भी ज्यादा बलात्कार के केस रजिस्टर हुए। जो सभी अदालतों के बंद कमरों में न्यायतंत्र से न्याय की भीख मांग रहे हैं। सैकड़ों केस तो ऐसे भी हैं जिनकी पैरवी के लिए और साथ में खड़ा होने वाला भी कोई नहीं?   निर्भया को मिले इंसाफ के बाद एक सवाल सभी के जेहन में कौंधने लगा है। सवाल है कि इन फांसियों के बाद समाज में कुछ बदलाव आएगा या नहीं? बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में कमी आएगी? बलात्कारी फांसी से डरेंगे? क्या अपराधी इस तरह के अपराध को अंजाम देने से पहले डरेगा? इस तरह के तमाम सवाल उठ खड़े हुए हैं। निर्भया के दरिंदों और न्यायतंत्र के मध्य लंबी कानूनी जोर आजमाइश हुई। तीन बार फांसी की मुकर्रर तारीख को भी बदलवाने में सफल हुए। पर, चौथे डेथ वारंट पर लिखी मौत से दरिंदे हार गए। सात साल पुराने केस का पटाक्षेप 20 तारीख को सूरज निकलने से पहले हो गया। दोषियों को उनके किए की सजा मिलने की खबर ने देशवासियों को सुखद एहसास कराया। देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को झकझोर देने वाले जघन्य केस के चारों दोषियों को सूली पर लटकाया गया। सूली पर चढ़ाना जेल अधिकारियों के लिए तो आसान था, पर चढ़ना दोषियों के लिए बड़ा मुस्किल हुआ? फांसी के तख्त को देखकर ही चारों पछाड़ मारकर रोने-बिलखने लगे। अधिकारियों के पैरों में लिपट गए। दोषियों के मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकल रहे थे। ‘बचा लो-बचा लो, छोड़ दो-छोड़ दो‘! फांसी के तख्त पर चढ़ते वक्त दोषियों के मन में एकबार जरूर आया होगा, काश वो गलती नहीं की होती?   खैर, जैसी करनी, वैसी भरनी। हमें न्यायतंत्र पर भरोसा करना ही होगा। देर ही सही, इंसाफ मिलने की संभावनाएं तो रहती ही हैं। निर्भया के परिजनों ने भी लंबा इंतजार किया। वह अलग बात है उनका केस स्पेशल कैटागिरी में रखा गया। फांसी का यह दिन निर्भया के गुनाहगारों के अलावा उन दरिंदों के लिए भी सबब था जो ऐसा कर चुके हैं या करने की सोचेंगे। फांसी के दिन जेलर ने तय वक्त पर फांसी पर लटकाने का आदेश जल्लाद को दिया। देखते ही देखते चारों फांसी पर झूल गए और क्षण भर बाद ही दोषियों की सांसों ने शरीर का साथ छोड़ दिया। दस मिनट में शरीर मृत अवस्था में निढाल होकर रस्सी पर लटक गए। इन दृश्यों को देख या उनके विषय में सुनकर शायद ऐसे कृत्य करने वालों के मन में कुछ भय पैदा हो। जीवन को जीना आसान होता है। पर, उसे खत्म करना बड़ा मुस्किल होता है। निर्भया के गुनाहगारों की तरह शायद ही कोई अपने लिए वैसी मौत मांगे। निर्भया के दोषियों की फांसी समाज को किस तरह से संदेश देगी? ये देखने वाली बात होगी।   एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हिंदुस्तान में रोजाना करीब नब्बे से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं, जबकि इससे कहीं ज्यादा ऐसे मामले होते हैं जो सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं हो पाते। बलात्कार के दर्ज मामलों में अदालतों की सुनवाई की प्रक्रिया बहुत धीमी रहती है। निर्भया केस में गनीमत यही रही कि वह केस जनाक्रोश का हिस्सा रहा और मीडिया में शुरू से सुर्खियों में रहा, नहीं तो वह भी न्याय के लिए लंबे समय तक लंबित रहता। निर्भया गैंगरेप के बाद पूरे देश में आंदोलन हुए और मौजूदा सरकार को महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर होना पड़ा। वर्तमान और निवर्तमान सरकारों का ध्यान केस पर ही रहा। सभी के सामूहिक सहयोग से केस अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचा।   निर्भया घटना के बाद बलात्कार पीड़िताओं को जल्द न्याज दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित हुए। लेकिन जजों की कमी के चलते काम उस गति से आगे नहीं बढ़ा जिसकी उम्मीद थी। पिछले वर्ष भी है केंद्र सरकार ने पूरे देश में एक हजार अतिरिक्त फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करने का निर्णय लिया था, जिससे लंबित पड़े बलात्कार के मामलों को जल्द निपटाने का भरोसा दिया गया था। लेकिन सभी घोषणाएं और वादे ठंडे बस्ते में पडे़ हैं। कोर्ट में बैठने के लिए जजों की भारी कमी है। जज ही नहीं होंगे तो कोर्ट की दीवारें खड़ी करने से क्या फायदा। महिला सुरक्षा के मामले में हवा-हवाई बातें बहुत होती हैं पर जब एनसीआरबी के सालाना आंकड़े पेश होते हैं जिनमें महिलाओं के विरुद्ध होने वाले मामलों में वृद्वि दर्शायी जाती है तो सभी सरकारी दावे धरे रह जाते हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 March 2020


bhopal, Korana crisis and eternal culture

बिपिन सेमवाल   चीन से योजनाबद्ध तरीके से उत्पादित कोविड- 19 संक्रमक है मगर वायु में फैलने वाला माइक्रो वाइरस नहीं। चीन में जानवर, कीट, पतंग, स्तनधारी, सरीसृप सभी प्रजातियों को जिंदा ही बड़े चाव से खाया जाता है। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव इतना इतना स्वार्थी कि यह विस्मृत कर गया कि जल, थल तथा वायु में उत्पन्न समस्त प्राणियों का उतना ही अधिकार इस लोक पर है, जितना मानव का। लेकिन अपनी शक्ति, बुद्धि और बल के दर्प में चूर मानव समय-समय पर डार्विनवाद की परिकल्पना योग्यतम की उत्तरजीविता के अनुरूप कार्य करते हुये अस्तित्वहीन प्राणियों का जघन्य वध करता रहा। इसी वाद में अस्तित्व के लिये संघर्ष का जिक्र भी जरूरी है। अस्तित्व उसी का बरकरार रहेगा, जिसका अपना वजूद होगा।   चीन आर्थिक रूप से मजबूत ही नहीं बल्कि विकास के क्रम में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर आता है। लेकिन प्रदूषण का खतरा यहां उतना ही ज्यादा है। एक खबर के अनुसार चीन के शहर बीजिंग में इतना अधिक प्रदूषण है कि एक व्यक्ति एकदिन में उतना ही प्रदूषित होेता है, जितना एक नशेड़ी एकदिन में 32 सिगरेट पीने से प्रदूषित होता है। एक अपुष्ट खबर के अनुसार चीन ने कई वर्षों पहले इस वायरस की खोज की थी ताकि लगातार बढ़ती जनसंख्या को कम करने के लिये इस वायरस का समय पर उपयोग किया जाये, लेकिन वक्त से पूर्व ही इसका प्रादुर्भाव हो गया। लेकिन थोड़ी सावधानी रखी जाये तो इस वायरस से स्वयं को बचाया जा सकता है। वर्ष 1981में डीन कोन्ट्ज द्वारा प्रकाशित द आईस ऑफ डार्कनेस में बताया गया कि चीन के बुहान शहर में सबसे छुपाकर कोरोना निर्मित किया था।   बहरहाल सनातनी और हिन्दू संस्कृति की वेद ऋचाओं, उपनिषदों तथा शास्त्रों में ऐसे-ऐसे श्लोक या पूजन विधियां वर्णित हैं, जिसको आचरण में लाते ही आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति सक्षम ही नहीं होता है, अपितु अनाम बीमारियों से लड़ने की क्षमता हमारे शरीर में समाविष्ट होती है। कोरोना वाइरस मुख्यतः उन देशों में फैलता है, जहां मांस मुख्य भोजन है। मांस में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के हानिकारक तत्व न केवल पाचक अंगों को क्षतिग्रस्त करते हैं, बल्कि श्वांस नली को भी संक्रमित करते हैं। जिस कारण मानव को कई गंभीर बीमारियां घेर लेती हैं, जिसमें प्रतिश्याय, कास तथा दमा मुख्य है। इस बात की घोषणा हजारों वर्ष पूर्व हमारे शास्त्रों ने कर दी थी। सुश्रुत संहिता सूत्र स्थान मांस वर्ग 127/128 के अनुसार,   अरोचकं प्रतिश्याय गुरू शुष्कं प्रकीत्र्तितम्, विषव्याधि हतं मृत्युं बालं छर्दिच्च कोपयेत्।। कास श्वासकरं वृद्धं त्रिदोषं व्याधिदूषितम्, किन्नमुत्क्लेशजननं कृतं वातप्रकोपणम्।।   अर्थात् मांस भक्षण अरूचिजनक, प्रतिश्यायकर, दर्दनाशक होता है, साथ ही यह अन्य लोगों में भी फैलकर मौसम प्रदूषित करता है। कोविड-19 की घातकता का दर 23 फीसद है। यह 2003 में फैले सार्क घातक दर 10 फीसद तथा 2012 में सामने आये मेर्स घातक दर 35 फीसद से बेहद कम है।    हिन्दू संस्कृति सनातनी संस्कृति कहलाती हैं। हवन, यज्ञ, पंचगव्य को हमारे शास्त्रों में मुख्य पूजा बताई गयी है। जौं, तिल, अगर, जटामासी तथा घी का हवन करने से वायुमंडल में व्याप्त हानिकारक वाइरसों का विनाश ही नहीं होता है, बल्कि मानव का शरीर तथा आंतरिक मांसपेशियां भी संतृप्त रहती हैं। हमारी संस्कृति में खाना खाने, पूजा करने तथा सोने से पूर्व हाथ-पैर धोने का विधान है। पूर्व काल में महिलायें घूंघट रखती थी। योग का इतिहास तो हमारे ऋषि-मुनि तथा मनीषियों का समकालीन है। कपाल भाति की क्रिया श्वास से सम्बन्धित है। बीपी, अनिद्रा, शुगर आदि की समस्या को दूर करने के लिये कपाल भाति की क्रिया को सर्वोपरि माना गया है। योग कहता है कि कपाल भाति करने के दौरान श्वांस रोकने से अंदर घुस रहा हानिकारक वाइरस मर जाता है। हिन्दू संस्कृति में सूर्य नमस्कार का विधान बताया गया है। सूर्य नमस्कार की क्रिया में अर्घ्य देते जल की धार सेे सूर्य को अपलक देखना होता है, पुनः झुककर प्रणाम की मुद्रा में सूर्य को प्रणाम करना होता है, इस क्रिया से सूर्य की प्रातःकालीन किरणों का नंगी आंखों से देखने पर विटामिन डी के साथ-साथ बीपी नियंत्रित होता है। सूर्य के प्रकाश को अपलक निहारने पर चेहरे पर अदृश्य वाइरस मर जाते हैं।   भारत वर्ष में तीन सप्ताहों में 175 से अधिक कोरोना संक्रमण पोजेटिव पाये गये हैं। जबकि भारत की जनसंख्या चीन के बाद दूसरे स्थान पर है और चीन के करीब ही यह देश भी है। लेकिन भारतीय संस्कृति में रचे-बसे हिन्दुओं तथा पुराण शास्त्रों की देव ऋचाओं पर भरोसा करने वाले व्यक्ति की कोरोना को करो ना है। अभी भी वक्त है, हिन्दुओं का अपने बच्चों को इन पुराणों धर्मशास्त्रों के बारे में अवगत कराना चाहिये। गीता के ज्ञान, गायत्री मंत्र के जाप के साथ साथ नवग्रहों के बीज मंत्रों का जाप करने से मानवों की समस्त शाररिक तथा मानसिक समस्या दूर होती है।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 20 March 2020


bhopal , Nirbhaya

डाॅ. रमेश ठाकुर   जिस फांसी का देशवासियों को बेसब्री से इंतजार था, वह फांसी मुकम्मल हुई। निर्भया को सात वर्ष बीत जाने के बाद आखिरकार इंसाफ मिल गया। निर्भया केस को उसके अंजाम तक पहुंचाने में किसी एक ने नहीं, बल्कि कई वर्गों ने अहम भूमिका निभाई। लेकिन, सबसे बड़ी भूमिका ‘मीडिया‘ ने निभाई, जिसने घटना की तारीख 16 दिसंबर 2012 से लेकर फांसी की मुकर्रर तारीख 20 मार्च 2020 को साढ़े पांच बजे तक केस को टाइम लाइन में रखा। केस को कभी फीका नहीं पड़ने दिया। घटना के एक-एक पहलुओं को हमेशा सुर्खियों में रखा। लोगों का गुस्सा कम नहीं होने दिया। वरना, निर्भयाकांड से लेकर अभीतक 17 हजार हजार से भी ज्यादा बलात्कार के केस रजिस्टर हुए। जो सभी अदालतों के बंद कमरों में न्यायतंत्र से न्याय की भीख मांग रहे हैं। सैकड़ों केस तो ऐसे भी हैं जिनकी पैरवी के लिए और साथ में खड़ा होने वाला भी कोई नहीं?   निर्भया को मिले इंसाफ के बाद एक सवाल सभी के जेहन में कौंधने लगा है। सवाल है कि इन फांसियों के बाद समाज में कुछ बदलाव आएगा या नहीं? बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में कमी आएगी? बलात्कारी फांसी से डरेंगे? क्या अपराधी इस तरह के अपराध को अंजाम देने से पहले डरेगा? इस तरह के तमाम सवाल उठ खड़े हुए हैं। निर्भया के दरिंदों और न्यायतंत्र के मध्य लंबी कानूनी जोर आजमाइश हुई। तीन बार फांसी की मुकर्रर तारीख को भी बदलवाने में सफल हुए। पर, चौथे डेथ वारंट पर लिखी मौत से दरिंदे हार गए। सात साल पुराने केस का पटाक्षेप 20 तारीख को सूरज निकलने से पहले हो गया। दोषियों को उनके किए की सजा मिलने की खबर ने देशवासियों को सुखद एहसास कराया। देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को झकझोर देने वाले जघन्य केस के चारों दोषियों को सूली पर लटकाया गया। सूली पर चढ़ाना जेल अधिकारियों के लिए तो आसान था, पर चढ़ना दोषियों के लिए बड़ा मुस्किल हुआ? फांसी के तख्त को देखकर ही चारों पछाड़ मारकर रोने-बिलखने लगे। अधिकारियों के पैरों में लिपट गए। दोषियों के मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकल रहे थे। ‘बचा लो-बचा लो, छोड़ दो-छोड़ दो‘! फांसी के तख्त पर चढ़ते वक्त दोषियों के मन में एकबार जरूर आया होगा, काश वो गलती नहीं की होती?   खैर, जैसी करनी, वैसी भरनी। हमें न्यायतंत्र पर भरोसा करना ही होगा। देर ही सही, इंसाफ मिलने की संभावनाएं तो रहती ही हैं। निर्भया के परिजनों ने भी लंबा इंतजार किया। वह अलग बात है उनका केस स्पेशल कैटागिरी में रखा गया। फांसी का यह दिन निर्भया के गुनाहगारों के अलावा उन दरिंदों के लिए भी सबब था जो ऐसा कर चुके हैं या करने की सोचेंगे। फांसी के दिन जेलर ने तय वक्त पर फांसी पर लटकाने का आदेश जल्लाद को दिया। देखते ही देखते चारों फांसी पर झूल गए और क्षण भर बाद ही दोषियों की सांसों ने शरीर का साथ छोड़ दिया। दस मिनट में शरीर मृत अवस्था में निढाल होकर रस्सी पर लटक गए। इन दृश्यों को देख या उनके विषय में सुनकर शायद ऐसे कृत्य करने वालों के मन में कुछ भय पैदा हो। जीवन को जीना आसान होता है। पर, उसे खत्म करना बड़ा मुस्किल होता है। निर्भया के गुनाहगारों की तरह शायद ही कोई अपने लिए वैसी मौत मांगे। निर्भया के दोषियों की फांसी समाज को किस तरह से संदेश देगी? ये देखने वाली बात होगी।   एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हिंदुस्तान में रोजाना करीब नब्बे से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं, जबकि इससे कहीं ज्यादा ऐसे मामले होते हैं जो सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं हो पाते। बलात्कार के दर्ज मामलों में अदालतों की सुनवाई की प्रक्रिया बहुत धीमी रहती है। निर्भया केस में गनीमत यही रही कि वह केस जनाक्रोश का हिस्सा रहा और मीडिया में शुरू से सुर्खियों में रहा, नहीं तो वह भी न्याय के लिए लंबे समय तक लंबित रहता। निर्भया गैंगरेप के बाद पूरे देश में आंदोलन हुए और मौजूदा सरकार को महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर होना पड़ा। वर्तमान और निवर्तमान सरकारों का ध्यान केस पर ही रहा। सभी के सामूहिक सहयोग से केस अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचा।   निर्भया घटना के बाद बलात्कार पीड़िताओं को जल्द न्याज दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित हुए। लेकिन जजों की कमी के चलते काम उस गति से आगे नहीं बढ़ा जिसकी उम्मीद थी। पिछले वर्ष भी है केंद्र सरकार ने पूरे देश में एक हजार अतिरिक्त फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करने का निर्णय लिया था, जिससे लंबित पड़े बलात्कार के मामलों को जल्द निपटाने का भरोसा दिया गया था। लेकिन सभी घोषणाएं और वादे ठंडे बस्ते में पडे़ हैं। कोर्ट में बैठने के लिए जजों की भारी कमी है। जज ही नहीं होंगे तो कोर्ट की दीवारें खड़ी करने से क्या फायदा। महिला सुरक्षा के मामले में हवा-हवाई बातें बहुत होती हैं पर जब एनसीआरबी के सालाना आंकड़े पेश होते हैं जिनमें महिलाओं के विरुद्ध होने वाले मामलों में वृद्वि दर्शायी जाती है तो सभी सरकारी दावे धरे रह जाते हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 March 2020


bhopal, MP recast history after 53 years

डॉ. अजय खेमरिया   इतिहास के घटनाक्रम अक्सर दोहराए जाते हैं। मप्र की सियासत में फिलहाल यही हुआ। 53 वर्ष पहले नेहरू के सबसे विश्वसनीय और राजनीति के चाणक्य पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के सियासी रुतबे और हनक को सिंधिया राजघराने ने जमींदोज किया था। 1967 पार्ट-2 मानो 2020 में दोहराया गया और इसबार भी नेहरू गांधी खानदान के सबसे चहेते कमलनाथ की कुर्सी चली गई है। कारण फिर से सिंधिया राजघराना ही बना है। बस पीढ़ीगत अंतर है। पचमढ़ी के अधिवेशन में तबके मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने राजमाता सिंधिया को अपमानित करने की कोशिश की थी, राजमाता ने संकल्प लेकर डीपी मिश्रा को सत्ता से बेदखल कर दिया था। राजमाता तब कांग्रेस में ही थीं। कमलनाथ की कुर्सी भी कमोबेश उसी अंदाज में चली गई, माध्यम बने राजमाता सिंधिया के प्रपौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया। संयोग से वे भी कांग्रेस में थे और उन्हें भी डीपी मिश्रा की तर्ज पर कमलनाथ ने सड़क पर उतरने की चुनौती दी थी।   इस सियासी घटनाक्रम को सिंधिया परिवार के इतिहास की उस पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है जो बुनियादी रूप से कांग्रेस वैचारिकी के विरुद्ध रहा है। यह जानना भी आवश्यक है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया ने अपनी राजनीति की शुरुआत जनसंघ के साथ की थी। 1971 में माधवराव सिंधिया जनसंघ के टिकट पर पहली बार गुना से लोकसभा पहुँचे थे। उसके बाद 1977 के आम चुनाव में भी वे जनसंघ की मदद से निर्दलीय जीतकर सांसद बने थे। इससे पहले उनकी मां 1967 में तबके चाणक्य कहे जाने वाले मप्र के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा की सरकार को चुनौती देकर जमींदोज कर चुकी थीं। इसलिये मप्र की सियासत में सिंधिया परिवार और बीजेपी के साथ रिश्ते की केमिस्ट्री पीढ़ीगत कही जा सकती है। यह भी तथ्य है कि बीजेपी ने कभी भी अलग पार्टी रहते हुए भी ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पिता माधवराव सिंधिया को बड़ी चुनावी चुनौती पेश नहीं की। 1996 में नरसिंहराव ने माधवराव सिंधिया को हवाला कांड को आधार बनाकर कांग्रेस का टिकट नहीं दिया था। तब बीजेपी ने विकास कांग्रेस बनाकर ग्वालियर से लड़े माधवराव सिंधिया के विरुद्ध अपना प्रत्याशी ही खड़ा नहीं किया। 1984 में सिंधिया से चुनाव हारने के बावजूद अटल जी ने कभी सिंधिया के प्रति राजनीतिक बैरभाव नहीं रखा। जबकि राजमाता सिंधिया ने बीजेपी और संघ के आधार को खड़ा करने में आर्थिक योगदान भी दिया।   इतिहास साक्षी है कि ग्वालियर राजघराने का आग्रह सदैव कांग्रेस की रीति-नीति से मेल नहीं खाता था। आजादी के बाद पूरे भारत में जब नेहरू और कांग्रेस का डंका बज रहा था तब ग्वालियर रियासत में हिन्दू महासभा की ताकत चरम पर थी। गुना, ग्वालियर, राजगढ़, उज्जैन, इंदौर, मन्दसौर, विदिशा तक हिन्दू महासभा के आगे कांग्रेस खड़ी नहीं हो पा रही थी। कांग्रेस आलाकमान खासकर नेहरू को ग्वालियर रियासत की हिन्दुत्वपरस्ती बहुत खटकती थी। राजमाता सिंधिया की जीवनी के अनुसार आजादी के बाद पंडित नेहरू और सरदार पटेल ग्वालियर आये। नेहरू जब भाषण देकर निबटे तो सभा में गिनती के लोगों ने तालियां बजाई पर जब जीवाजीराव खड़े हुए तो जनता गगनभेदी जिंदाबाद करने लगी। नेहरू इस वाकये से बेहद नाराज हो गए। नेहरू और सिंधिया के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हुए। बेशक नेहरूजी के कहने पर राजमाता सिंधिया ने 1957 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन यह केवल सिंधिया परिवार और नेहरू खानदान के मध्य रिश्तों के सामान्यीकरण का प्रयास भर था। जब इंदिरा गांधी ने राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त किये तो इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाने वालों में माधवराव सिंधिया सबसे आगे थे।   1967 अविभाजित मप्र में डीपी मिश्रा मुख्यमंत्री हुआ करते थे जो अपने अक्खड़ और सख्त मिजाज के लिए बदनाम थे। रजवाड़ों के विरुद्ध उनकी मानसिकता सार्वजनिक थी। तत्कालीन युवक कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन सिंह द्वारा पचमढ़ी में आयोजित युवा कांग्रेस अधिवेशन को मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे, राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी बैठी थीं। मिश्रा ने राजमाता को निशाने पर लेते हुए कहा कि ये राजा-रजवाड़े कभी कांग्रेस और जनता के हितैषी नहीं हो सकते हैं। डीपी मिश्रा बेलौस होकर बोल रहे थे और कुर्सियों पर बैठे दूसरे नेता मुड़-मुड़कर राजमाता सिंधिया को देखते रहे।अपनी आत्मकथा में राजमाता ने इस वाकये को खुद के अपमान की पराकाष्ठा के रूप रेखांकित किया है। इसी पचमढ़ी में डीपी मिश्रा की ताकतवर सरकार को उखाड़ने का संकल्प लेकर राजमाता ने 1967 में देश में पहली संविद सरकार बनाई थी।   53 साल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लगभग वही कहानी मप्र में दोहरा दी। इसबार निशाने पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह हैं। मप्र देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस में गुटबाजी और आत्मघाती प्रतिस्पर्धा रक्तबीज की तरह समाई हुई है। कमलनाथ सरकार का पतन मप्र और यहां की कांग्रेस को समझने वाले जानकारों के लिए कतई चौकाने वाला नहीं है। बस इतिहास और वर्तमान में अंतर इतना भर है कि आज की कांग्रेस आलाकमान विहीन है लेकिन जब आलाकमान शक्तिशाली भी हुआ करता था, तब भी यहां दलीय अनुशासन कभी नहीं रहा है। जितनी रियासतों और प्रदेशों को मिलाकर मप्र बनाया गया था उतनी ही इलाकाई कांग्रेस यहां जिंदा रही है।   सच्चाई यह है कि कमलनाथ सरकार का जाना तो इसके जन्म के साथ ही तय हो गया था। मंत्रिमंडल गठन राजनीतिक चातुर्य की जगह पट्ठावाद को आगे रखकर किया गया। अल्पमत के बावजूद निर्दलीय और सपा-बसपा विधायकों में से किसी को मंत्री नहीं बनाकर प्रदेश अध्यक्ष के पद पर भी कमलनाथ खुद बने रहे। हर रोज पार्टी लाइन से हटकर नेता बयानबाजी करते रहे और पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद कमलनाथ या आलाकमान ने कोई एक्शन नहीं लिया। जाहिर है मप्र में 15 साल बाद आई कांग्रेस सरकार हर रोज एक तमाशे का अहसास करा रही थी। 7 कैबिनेट मंत्रियों के साथ प्रदेश में दौरा करने ज्योतिरादित्य सिंधिया पहले दिन से ही सरकार के लिए चुनौती देते रहे। दीवारों पर लिखी "अबकी बार सिंधिया सरकार" की इबारत उन्हें लगातार चिढ़ाती रहती थी। जिस तरह पीसीसी चीफ के उनके दावे को दरकिनार किया जाता रहा, उन्हें सड़क पर उतरने की चुनौती दी गई उसने सिंधिया को बगावत पर विवश कर दिया। यानी इतिहास ने 53 साल बाद पुनः पलटी खाई और मप्र में कांग्रेस सरकार का पतन हो गया। दोनों घटनाक्रमों में देशकालिक समानताएं भी है। कमलनाथ भी नेहरू परिवार के विश्वसनीय हैं और 1967 में डीपी मिश्रा भी नेहरू के सबसे खास हुआ करते थे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 March 2020


bhopal,Question on the intention of the government and former judge unreasonable?

प्रमोद भार्गव सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत किए जाने पर न्यायापालिका के परिप्रेक्ष्य में नैतिकता के सवाल उठ खड़े हुए हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गोगोई को मनोनीत किया है। राष्ट्रपति को उच्च सदन राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनीत करने का संवैधानिक अधिकार है। इस सदन में कुल 245 सदस्य होते हैं। संविधान निर्माताओं ने उच्च सदन में मनोनयन का प्रबंध इस पवित्र उद्देश्य से किया था कि ऐसे विषयों के विशेषज्ञों को राज्यसभा में भेजा जा सकता है, जो चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से इस सदन में नहीं पहुंच पाते हैं। इस लक्ष्यपूर्ति के लिए कला, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और समाजसेवा के क्षेत्रों से जुड़ी ऐसी प्रतिभाओं को राज्यसभा के मंच पर लाना था, जिनके विचार एवं ज्ञान का उपयोग देशहित में किया जा सके। इस नाते एक समय तक लब्ध-प्रतिष्ठित लेखक एवं विचारकों को सदन में भेजा भी जाता रहा है। रामधारी सिंह दिनकर ऐसे लोगों में रहे हैं लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब शराब माफिया विजय माल्या को भी इस सदन का भागीदार बना दिया गया था। ऐसे लोगों से ही सदन की गरिमा प्रभावित हुई है। न्यायिक क्षेत्र से रंजन गोगोई कोई पहली बार राज्यसभा में मनोनीत किए गए हों, ऐसा नहीं। उनके पहले भी अनेक पूर्व प्रधान न्यायाधीशों को सरकारों द्वारा राज्यसभा व आयोगों में मनोनीत किया जाता रहा है। गोया, उनके मनोनयन पर प्रश्न खड़े करना अनुचित है। गोगोई ने कहा है, ‘संसद में मेरी उपस्थिति राष्ट्र निर्माण के लिए विधायिका एवं न्यायपालिका के बीच बेहतर सामंजस्य बिठाने की पहल करेगी।‘ बहरहाल, वर्तमान में न्यायपालिका और विधायिका के बीच अतिरिक्त हस्तक्षेप व सक्रियता के जो मसले उछलते हैं, उनमें यदि गोगोई तालमेल की किसी प्रकार की अहम् भूमिका का निर्वाह कर पाते हैं तो यह वास्तव में राष्ट्र के लिए लाभदायी होगा।  यह बहस लंबे समय से चल रही है कि न्यायिक पदों से सेवानिवृत्त हुए लोगों की नियुक्ति या मनोनयन किसी लाभदायी पद पर नहीं की जाए? गोगोई ने स्वयं सीजेआई रहते हुए एक मामले में यह टिप्पणी की थी कि ‘सेवानिवृत्ति के बाद किसी पद पर जजों की नियुक्ति अथवा मनोनयन नहीं होना चाहिए। इससे स्वतंत्र न्यायपालिका पर सवाल खड़े होते हैं।‘ लेकिन फिलहाल कथनी और करनी में भेद की कहावत उन्हीं पर चरितार्थ हो रही है। दरअसल उनके इस मनोनयन को राममंदिर, सबरीवाला मंदिर और राफेल सहित कई ऐतिहासिक फैसलों के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। इसलिए इस मनोनयन पर नरेंद्र मोदी सरकार के साथ-साथ गोगोई की आलोचना भी होने लगी है। कांग्रेस सांसद एवं प्रसिद्ध वकील कपिल सिब्बल ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘न्यायमूर्ति गोगोई राज्यसभा जाने की खातिर सरकार के साथ खड़े होने और स्वयं की ईमानदारी के साथ समझौता करने के लिए याद किए जाएंगे।‘ कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अपने ट्विट पर कहा कि ‘अब न्यायापालिका पर जनता का विश्वास कम होता जा रहा है।‘ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नारे ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा‘ की तर्ज पर यहां तक कह दिया कि ‘तुम मेरे हक में वैचारिक फैसला दो, मैं तुम्हें राज्यसभा सीट दूंगा।‘ कांग्रेस के ये नेता अपने ही दल के इतिहास में नहीं झांक रहे हैं। कांग्रेस ने बहरूल इस्लाम, हिदायतुल्लाह, एम फातिमा रंगनाथ मिश्र, केजी बालकृष्णन और पी. सदाशिव जैसे पूर्व न्यायाधीशों को इसी तर्ज पर राज्यसभा में या तो मनोनयन किया या फिर निर्वाचित कराकर भेजा। इसलिए कांग्रेस को अपनी अतंरआत्मा में भी झांकने की जरूरत है। बहरूल इस्लाम जब सुप्रीम कोर्ट में वकालात करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार और दूसरी बार 1968 में कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। दूसरा कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उन्हें असम और नागालैंड उच्च न्यायालय का जज बना दिया गया। इसे ही वर्तमान में गुवाहाटी हाईकोर्ट के नाम से जानते हैं। पदोन्नति के बाद 1983 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्ति मिलते ही कांग्रेस ने फिर राज्यसभा में भेज दिया। उन्होंने ही बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को एक जालसाजी के मामले में बरी किया था। उनके तीसरे मनोनयन को इसी फैसले से जोड़कर देखा गया था। 25 फरवरी 1968 से 16 दिसंबर 1970 तक सीजेआई रहे हिदायतुल्लाह को सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेसी अनुकंपा के चलते उपराष्ट्रपति बना दिया गया था। मालूम हो, संविधान के अनुसार उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। सीजेआई रंगनाथ मिश्रा को 1998 में सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद पूरे देश में सिख विरोधी दंगे पूरे भड़के थे। इन दंगों में करीब 3000 सिख मार दिए गए। यह घटना देश की सबसे बड़ी माॅब लीचिंग थी। इस घटना की जांच के लिए 26 अप्रैल 1985 को राजीव गांधी की सरकार ने न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग बनाया। इस आयोग ने फरवरी 1987 में अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश कर दी थी। चूंकि इन दंगों में दिग्गज कांग्रेसी अपराधियों की भूमिका थी इसलिए रिपोर्ट में इन कांग्रेसियों को एक तरह से दोषमुक्त करने का काम कर दिया था। इसी के प्रतिफल में उन्हें राज्यसभा पद से अलंकृत किया गया था। कांग्रेस ने मुसलमानों को वोटबैंक मानते हुए इनकी आर्थिक व शैक्षिक स्थिति जानने के लिए रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाया था। 2007 में जब यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब इस आयोग की रिपोर्ट आई। रिपोर्ट में आयोग ने सिफारिश की थी कि अल्पसंख्यकों को केंद्र व राज्य सरकार की नौकरियों एवं शैक्षिक संस्थाओं में 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। इसमें भी 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी केवल मुसलमानों की हो। इसी तरह की सिफारिश सच्चर समिति की रिपोर्ट में की गई थी। लेकिन संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं है इसलिए मनमोहन सिंह सरकार इन रिपोर्टों पर अमल नहीं कर पाई। सीजेआई बालकृष्णन जब सेवानिवृत्त हुए थे, तब उन्होंने अपने विदाई समारोह में कहा था कि ‘सेवानिवृत्त के बाद न्यायाधीशों को कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए और राजनीति से दूर रहना चाहिए।‘ लेकिन अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल कर जब वे 2009 में सेवानिवृत्त हुए तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बन गए। हालांकि इस नियुक्ति पर उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘मुझसे इस मामले में संपर्क नहीं किया गया।‘ यदि यह नियुक्ति उनकी मंशा के विरुद्ध थी तो उन्हें पद को स्वीकार करने की जरूरत ही क्या थी? जबकि यह पद एक साल से खाली पड़ा था। हालांकि संविधान में ऐसा प्रावधान है कि भारत के पूर्व न्यायाधीश इस आयोग के अध्यक्ष बन सकते हैं। बालकृष्णन देश के पहले दलित सीजेआई थे। उन्होंने 1968 में केरल में रहते हुए वकालत की और सीजेआई जैसे अहम पद पर पहुंचे। महिला सीजेआई एम फातिमा को तमिलनाडु और 2014 में पी. सदाशिव को केरल का राज्यपाल बनाया गया था। इन सबके बावजूद यह सत्य है कि भारतीय गणतंत्र की उम्र बढ़ने के साथ-साथ लोकतंत्र के सभी पायों में सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है, क्योंकि संविधान में अनुच्छेदों की परिभाषाओं में अलिखित ऐसे सिद्धांत अंतर्निहित हैं, जो व्यक्ति के नैतिक बल से नियंत्रित होते है। इसीलिए स्वयं न्यायपालिका के भीतर से भी सुधार के स्वर उभरते रहते हैं। तो कई न्यायाधीश जजों की कमी दर्शाकर अदालत की कार्य-संस्कृति में मौजूद छिद्रों को ढंकने का उपक्रम करते नजर आते हैं। अलबत्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंगनाथ पाण्डे ने स्वयं प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर एक तो न्यायापालिका में मौजूद कमियों और लोचों की जानकारी दी थी, दूसरे वे स्वयं सार्वजनिक मंच पर आकर इन कमियों को दूर करने के लिए महात्मा गांधी के दांडी सत्याग्रह की तर्ज पर ‘न्याय सत्याग्रह‘ की पहल करके न्यायिक सुधार के लिए जन-दबाव बनाने की कोशिश में लगे हैं। यह काम वे देश का नागरिक होने और देश का अन्न खाने के दायित्व-बोध से प्रेरित होकर कर रहे हैं। इस सत्याग्रह की बड़ी शुरूआत ग्वालियर के आईटीएम विश्वविद्यालय से हुई थी। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपना असंतोष सार्वजनिक किया था। आमतौर से ऐसा देखने में नहीं आया है कि न्यायालय के भीतर हुए किसी पक्षपातपूर्ण व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में कुछ न्यायाधीशों को लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगाते हुए मीडिया को हथियार बनाने की जरूरत आन पड़ी हो? न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने सीधे-सीधे शीर्ष न्यायालय के तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा पर ऊंगली उठाई थी। इस मौके पर जज चेलमेश्वर ने कहा था कि हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो देश का लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा? जबकि स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायापालिका भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन मंशाओं पर सवाल तो बार-बार उठाए जाते रहे हैं, सुधार के लिए आजादी के बाद से अबतक कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Why SAARC countries trust India with Corona

आर.के. सिन्हा कहते ही हैं कि कष्ट और संकट में पड़ोसियों को एक-दूसरे के साथ खड़ा हो जाना चाहिए। संकट की स्थिति में पुराने गिले-शिकवे भुला ही देने चाहिए। दुनिया में आतंक और भय का पर्याय बन चुके “कोरोना वायरस” ने सार्क देशों को भी एकबार फिर साथ खड़ा कर दिया है। चलो, कम से कम इसी कोरोना के बहाने साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन (सार्क) के सदस्य देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव साथ-साथ तो आ गए हैं। कोरोना की चुनौती का मुकाबला करने के लिए अब सभी सार्क देश मिल-जुलकर एक एक्शन प्लान बनाने जा रहे हैं। अच्छी बात यह है कि यह पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही की है। इसका सार्क के सभी देशों ने स्वागत भी किया। वे भारत के साथ इसलिए खड़ा होना चाहते हैं क्योंकि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाकर पूरे विश्व के समक्ष यह सिद्ध कर दिया है कि देश इससे लड़ने को पूरी तरह से तैयार है। हां, सरकार ने जनता को आग्रह जरूर किया है कि सभी प्रकार की एहतियाती सावधानी बरतें और अगर बेहद जरूरी न हो तो कोरोना प्रभावित देशों की यात्रा से सख्त परहेज करें। कोरोना वायरस को लेकर घबराने की कतई जरूरत नहीं है, सावधानी बरतने की जरूरत है I जब चीन में फैले कोरोना वायरस को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ग्लोबल इमरजेंसी घोषित की, उससे पहले ही भारत अलर्ट मोड पर आ गया था। केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर कोरोना वायरस से दिन-रात लड़ रही हैं। हर अस्पताल की चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग की जा रही है। देश के 21 एयरपोर्टों पर 17 जनवरी के बाद से 5,89,438 यात्रियों की स्क्रीनिंग पिछले घंटे हो चुकी थी और यह चौबीसों घंटे जारी है। देश के अंदर करीब 65 छोटे और 12 बड़े बंदरगाह हैं, जहां 15,415 यात्रियों की स्क्रीनिंग भी पिछले शनिवार तक हो चुकी है। जाहिर है कि कोरोना के खतरों से भारत जिस तरह से लड़ रहा है, उसे सार्क देश गौर से देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि वे भारत के नेतृत्व में सुरक्षित हैं। जिस दिन पहला केस नेपाल में सामने आया था, तभी यूपी और उत्तराखंड, बिहार, सिक्किम और नेपाल सीमा से सटी जगहों पर 10 लाख से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। कोरोना वायरस को लेकर ग्राम सभाओं में भी जागरूकता अभियान भारत सरकार ने चलाया है। देश के अंदर 15 बड़े लैब स्थापित किए गए हैं, जिन्हें बढ़ाकर 19 किया जा रहा है। यद्पि पूरी दुनिया के देश अपने पड़ोसियों के साथ परस्पर सहयोग के महत्व को समझ रहे थे, पर इस मोर्चे पर दक्षिण एशियाई देश सुधरते नजर नहीं आ रहे थे। बहरहाल, कोरोना ने इन्हें एकसाथ खड़े होने का अवसर दे दिया है। अभीतक सार्क देशों में यह निराशाजनक स्थिति के लिए अकेला पाकिस्तान मुख्य रूप से दोषी रहा है। पाकिस्तान की आतंकवाद को खाद-पानी देने की नीति के कारण ही उससे भारत, ईरान और अफगानिस्तान नाराज रहते हैं। बहरहाल, पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्ताव पर सराकारात्मक प्रतिक्रिया देकर एक बेहतर संदेश तो दिया ही है। भारत ने इसके लिए एक फण्ड बनाकर दस मिलियन अमरीकी डालर भी अपनी तरफ से दान कर दिया I सभी सार्क देशों ने माना कि घातक कोरोना वायरस के कारण उत्पन्न खतरे को कम करने के लिए समन्वित प्रयासों की जरूरत है। बहरहाल, सार्क देशों को कोरोना से मिलकर लड़ने के क्रम में सबसे पहले देश की जनता को इस बीमारी से बचने के बारे में जागरूक करना होगा क्योंकि अभी तो इससे बचाव में ही भलाई है। अब भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव को अपने यहां सरकारी अस्पतालों के स्तरों में सुधार लेने की दिशा में भी तत्काल अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इन देशों में प्रशिक्षित डॉक्टरों की भी भारी कमी है। नर्सों की भारी कमी है। अस्पतालों की भारी कमी है। इलाज के लिए जरूरी उपकरणों की कमी है। दवाओं की कमी तो नहीं है I लेकिन, दवाएं महंगी इतनी हैं कि आम आबादी की पहुंच से बाहर हैं। क्या यह सच नहीं है कि नवउदारीकरण की आंधी ने हर अन्य सेक्टर की तरह हेल्थ सेक्टर की भी कमर ही तोड़ कर रख दी है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव में कॉर्पोरेट और प्राइवेट अस्पताल हैं I लेकिन, इनमें इलाज इतना महंगा है कि गरीब तो क्या आम मिडिल क्लास आदमी भी इलाज से पहले कई बार सोचता है। फिलहाल तो कोरोना वायरस से लोग घबराए हुए हैं, हल्की खांसी और छींक आने पर भी लोग परेशान नजर आने लगते हैं कि कहीं उन्हें कोरोना वायरस ने तो नहीं घेर लिया। दिक्कत यही है कि नोवल कोरोना वायरस के लिए अभी तक कोई दवाई ही नहीं बनी है। ऐसे में इसका कोई इलाज भी नहीं मिला है। हालांकि भारत इस वायरस को रोकने में आबादी के अनुपात में काफी हद तक सफल हुआ है। इसलिए भारत में यूरोप, चीन, इटली, ईरान, स्पेन और अमेरिका की तुलना में कोरोना पीड़ितों के केस बहुत कम हैं। अतः इससे घबराने की जरूरत नहीं है। अगर आप चीन का ही आकड़ा देखें तो 80 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें कोरोना वायरस इंफेक्शन या हल्का इंफेक्शन होता है, जो आम दवाई लेने से और घर में बंद हो जाने से ठीक हो जाते हैं। इसके साथ यह भी समझने की जरूरत है कि ये इतनी खतरनाक बीमारी नहीं है, पर सतर्क रहने की जरूरत है। अगर हम भारत की बात करें तो यहां कोरोना वायरस के केस बढ़ रहे हैं, पर आहिस्ता- आहिस्ता। लगभग सारे केस विदेश से आये हुए लापरवाह लोगों के कारण ही हुए हैं, जिन्होंने भारत आते ही आपनी जाँच नहीं कराईI इस बीच, सार्क देशों के चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों को यह भी विचार करना होगा कि क्यों कोरोना वायरस को खत्म करने में दिक्कत हो रही है? कैसे इस तरह की महामारियों को रोका जा सकता है? खैर, कोरोना को मात देने के बाद दक्षिण एशिया के देशों को मिलकर गरीबी, निरक्षरता जैसे और अपने अन्य मसलों को हल करना होगा। सार्क देशों को आतंकवाद से भी मिलकर लड़ना होगा। ये तो अबतक अपने देश में आतंकवाद को कुचलने के सवाल पर भी एकसाथ नहीं खड़े हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तथा इसे कुचलने के सवाल पर सार्क बैठकों में रस्मी तौर पर प्रस्ताव तो पारित होते रहे हैं पर कारवाई लगभग शून्य। इसमें कमोबेश यही कहा जाता है कि सभी दक्षेस (सार्क) देश आतंकी गतिविधियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी, उनपर अभियोजन और उनके प्रत्यर्पण में सहयोग करेंगे। इसमें हर तरह के आतंकवाद के सफाए और उससे निपटने के लिए सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि ये मुल्क अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में नहीं होने देंगे। प्रस्ताव में आतंकवाद, हथियारों की तस्करी, जाली नोट, मानव तस्करी आदि चुनौतियों से निपटने में क्षेत्रीय सहयोग की बात कही जाती है। हालांकि कुल मिलाकर बात प्रस्ताव से आगे नहीं बढ़ती। इनमें व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की सख्त जरूरत है। दक्षिण एशिया में आर्थिक वृद्धि में तेजी लाने में व्यापार सबसे महत्वपूर्ण औजार होगा। कुल मिलाकर यह तो कहा ही जा सकता है कि दक्षिण एशिया में कोरोना से लेकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग का नेतृत्व भारत ही करेगा। (लेखक राज्यसभा सांसद हैं।)

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Patil Putappa was ideal during his lifetime

मनोहर यडवट्टि   बेंगलुरु, 18 मार्च (हि.स.)। वयोवृद्ध पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य पुट्टप्पा सिदालिंगप्पा पाटिल (पापु) अपने सभी पाठकों, प्रशंसकों के लिए सभी क्षेत्रों में महान शख्सियत और अद्वितीय व्यक्तित्व के साथ अपने जीवनकाल में आदर्श रहे। वह सार्वजनिक भाषणों और अपने प्रकाशनों में लिखे गए लेखों से संबंधित विषयों पर एक बहुमुखी संचारक होने के लिए अपने विचारों के लिए जाने जाते थे।   वह कन्नड़ वॉचडॉग समिति के पहले अध्यक्ष और सीमा सलाहकार समिति के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। पुट्टप्पा साप्ताहिक 'प्रपंच' के संस्थापक संपादक थे और उन्होंने पहले कन्नड़ दैनिक समाचार पत्र 'नवयुग' का भी संपादन किया। उन्होंने विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में कॉलम भी लिखे। उन्होंने तत्कालीन बॉम्बे से प्रकाशित कई अंग्रेजी पत्रिकाओं में योगदान दिया था। पुट्टप्पा ने कन्नड़ भाषा में कई किताबें लिखी हैं, जिनमें कवि लेखकरु, नीवु नागबेकु, कर्नाटक संगीता कलारतनारु इत्यादि हैं। पाटिल पुटप्पा को कई पुरस्कार मिले हैं। इसमें नाडोज पुरस्कार, वुडे पुरस्कार और नृपतुंगा पुरस्कार शामिल हैं।   अविभाजित धारवाड़ जिले में 14 जनवरी,1921 को हावेरी तालुक के कुराराबोंडा में जन्मे पुट्टप्पा ने अपनी प्राथमिक शिक्षा हलगेरी गांव में पूर्ण की और उच्च शिक्षा ब्याडगी, हावेरी और धारवाड़ में की। उन्होंने अपनी कानून की डिग्री बेलगावी लॉ कॉलेज से पूरी कर बॉम्बे में वकालत शुरू की। हालांकि, पत्रकारिता में उनकी गहरी रुचि को देखते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें पत्रकारिता में बने रहने का सुझाव दिया।   उन्होंने कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण के लिए चल रहे आंदोलन पर लिखकर फ्री प्रेस जर्नल और बॉम्बे क्रॉनिकल में योगदान देना शुरू किया। फिर फ्री प्रेस जर्नल के तत्कालीन सम्पादक के. सदानंद ने उन्हें फ्री प्रेस जर्नल ज्वाइन करने की पेशकश की। हालांकि उन्होंने हुबली से एक नए अखबार में काम करने का फैसला किया। उनकी वर्ष 1930 के दौरान हुई गिरफ्तारी ने उन्हें बदल दिया और फिर तब से वह जीवन भर खादी के कपड़े पहनने वाले व्यक्ति बन गए। वह जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित थे, जिन्होंने बाद में हुबली का दौरा किया था।   वर्ष 1934 में महात्मा गांधी ब्याडगी की यात्रा पर आए और इस युवा स्वयंसेवक पाटिल पुटप्पा की पीठ थपथपाई। संयोग से उन्होंने 1934 में पहले आम चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए भी प्रचार किया। संभवतः वह 1949 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता पाठ्यक्रम को आगे बढ़ाने वाले पहले कन्नडिगा रहे। अपने छात्र दिनों के दौरान उन्होंने विल डुरंट, रॉबर्ट हचिंस, न्यायमूर्ति फेलिक्स फ्रैंकफर्टर, अल्बर्ट आइंस्टीन और कई अन्य लोगों की मेजबानी की। उन्होंने एक ब्रिटिश रूढ़िवादी राजनेता सर एंथनी एडेन का साक्षात्कार लिया था। मार्च 1954 के दौरान घर वापस लौटने पर उन्होंने 'प्रपंच' नामक कन्नड़ साप्ताहिक शुरू किया।    फिर 1956 में उन्होंने पहला कन्नड़ डाइजेस्ट 'संगम' और 1959 में कन्नड़ अखबार विश्ववाणी प्रकाशित करना शुरू किया। 1961 में वह कर्नाटक विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य बने, जबकि उन्हें 1962 में राज्यसभा के लिए चुना गया। वह राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा कन्नडिगों और राज्य के हितों के विपरीत किसी भी कदम के खिलाफ आवाज उठाते थे। किसान आंदोलन के साथ-साथ भाषा आंदोलन आर. गुंडूराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को खत्म करने में एक उत्प्रेरक बना था और इस तरह रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ था। पाटिल पुट्टप्पा कन्नड़ और अंग्रेजी में अपने शानदार लेखन की तरह एक शक्तिशाली वक्ता थे।   1967 में वे धारवाड़ स्थित कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के अध्यक्ष बने। साल 1915 में कन्नड़ साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जो कन्नड़ साहित्य परिषद के अस्तित्व में आने से पहले और अंत तक उसी स्थिति में बनी रही। वह देश की सत्ता की राजनीति में नेहरू और इंदिरा गांधी परिवार की पारिवारिक तानाशाही के खिलाफ मुखर थे।   कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के पूर्व महासचिव शंकर हलगट्टी कहते हैं कि चाहे कोई सहमत हो या असहमत, कन्नड़ और कन्नड़ भूमि के हितों से संबंधित सभी मुद्दों में पाटिल पुट्टप्पा का अपना एक तरीका था। कन्नड़ के कारण उसकी अखंडता और प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के बारे में कोई कभी सोच भी नहीं सकता। हालांकि वह आगे बढ़ने में हमेशा अकेले व्यक्ति बन गए थे।

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Importance of story teaching in nation building

इंटरनेशनल स्टोरी टेलिंग डे 20 मार्च पर विशेष   मुरलीधर गुर्जर   जानवरों की कहानियां हो या फिर परियों की, सभी में मानसिक आनंद तो मिलता ही है, उत्सुकता के साथ-साथ सुनने वाले के मन में एक मानसिक संसार का निर्माण हो रहा होता है। यही कारण है कि कहानियों का महत्व प्राचीनकाल से आजतक कम नहीं हुआ। कहानियां साहित्य का हिस्सा है और साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज में किस-किस तरह की विचारधाराएं, सोच, नजरिया, विश्वास, भेदभाव, संस्कृति व जीवनशैलियां हैं, कहानी पढ़कर इसका आभास किया जा सकता है। साहित्य में लेखक का सृजन अनुभवों पर आधारित कल्पना के रूप में होता है जो लम्बे अनुभवों एवं विश्लेषण के बाद निकलकर आता है। थीम, विषय वस्तु, पात्र, समस्याएं/चुनौतियां आदि मिलकर ही एक कहानी का रूप लेती है। बच्चे जन्मजात भाषिक क्षमता के साथ जन्म लेते हैं पर वह भाषा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संदर्भों में ही सीख पाता है क्योंकि उसकी भाषाई अभिव्यक्ति संदर्भ के हिसाब से ही होती है। इस अभिव्यक्ति में उम्र के हिसाब से क्लिष्टता आती जाती है। पर यह भी सत्य है कि भाषा बिना समाज के नहीं सीख सकते। कहानी बच्चे को यह सभी संदर्भ देकर भाषा के विकास में मदद कर रही होती है। कहानी असली घटना पर आधारित हो या फिर काल्पनिक पर उसे सुनाते वक्त श्रोता का ध्यान आकर्षण पर भी हमारा जोर होता है। श्रोताओं के लिए महत्वपूर्ण चीज कहानी से अपना संबंध जोड़ना है। वह कहानी के पात्रों की कल्पना अपने अनुभवों के अनुसार करता जाता है। कहानी में आयी घटनाओं व पात्रों के कर्मों के औचित्य-अनौचित्य की विवेचना करता है। क्योंकि हर कहानी से अपने ही हिसाब से सीख लेना, बच्चे का मौलिक अधिकार है, आप उसे अपने हिसाब से ही नैतिक मूल्य नहीं सीखा सकते। बालक उसी कहानी को ठीक से समझ पाएगा जो उसके अनुभव संसार से जुड़ रही हो। इसलिए किस उम्र के बच्चों को कौन-सी कहानी सुनाएं या पढ़ने को दें यह सोच-समझकर चुनने का मामला है।   हमारे आसपास बच्चों के लिए कई सारी कहानियों का संग्रह है जैसे पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक, महाभारत, बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, पौराणिक कहानियां, देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों की लोककथाएं, ऐतिहासिक कहानियां, परिवेशीय दंतकथाएं आदि आदि। कहानियों को लेकर कुछ पत्रिकाएं भी काफी वर्षों से काम कर रही हैं जिनमें चंपक, नंदन, बालहंस आदि-आदि हैं। बहुत सारी समाजसेवी संस्थाएं जो बच्चों की शिक्षा पर कार्य कर रही हैं, वे भी बच्चों के स्तर की शिक्षण सामग्री में कहानियों का समावेश कर रही हैं। जिनमें एकलव्य की चकमक, पिटारा पत्रिका है, साईकिल, प्लूटो जैसी पत्रिकाएं भी आ रही हैं। कुछ प्रकाशन भी बच्चों के लिए अच्छी कहानियों का प्रकाशन कर रहे है जिनमें नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इण्डिया, सीबीटी प्रकाशन, एकलव्य प्रकाशन, भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति आदि-आदि है। इन्होंने छोटे बच्चों के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकों का प्रकाशन किया है। बड़ों के लिए कुछ और भी प्रकाशन कार्य कर रहे है। पाठ्य पुस्तकों में भी विशेषकर प्राथमिक कक्षाओं में कहानियों का समावेश लगभग पूरी पुस्तक में 30-40 प्रतिशत हिस्सा कहानियों के पाठकों का ही होता है। सरकार की और से प्रयास किये जा रहे हैं कि प्रत्येक विद्यालय में एक पुस्तकालय होना जहां बच्चे कहानियों की पुस्तकें पढ़ सकें। कई गैर सरकारी संगठनों ने बच्चों के लिए पुस्तकालय चलाने पर काफी कार्य किया है। इन सभी का प्रयास यही है कि बालमन के सामने अधिक से अधिक कहानियां पढ़ने के लिए आ पाएं। बच्चों में अधिक से अधिक सीखने की ललक होती है, कहानियां उनकी इस ललक को बनाये रखते हुए संसार की समझ दे रही होती है।   कहानियों पर किस तरह शिक्षण कार्य करवा सकते हैं, इसे लेकर कई शिक्षाविदों ने योगदान दिया है। उनका मानना था कि कहानी आनंद के लिए ही नहीें यह बालक के सर्वांगीण विकास में काफी मददगार है। जरूरत है अच्छी कहानियों का चुनाव कर, विविध आयामों के साथ कार्य करने की। इसको शिक्षण प्रक्रिया में अहमियत देने की। गिजूभाई बधेका, प्रोफसर कृष्ण कुमार, टाॅल्सटाॅय एवं शिक्षा पर नवाचार करने वाली संस्थाओं ने भी शिक्षण में कहानियों का भरपूर उपयोग किया है। इसमें शक नहीं कि जहां शिक्षण प्रक्रिया में कहानियों का उपयोग करने के अवसर दिये जा रहे हैं, वहां बच्चों की भाषाई क्षमता, तर्क, चिंतन, विश्लेषण एवं सामाजिक मूल्य अंकुरित होते दिखायी देंगे। कहानी सुनाना व पढ़ने के अलावा उसपर चर्चा करना, किसने क्या किया? आप उसकी जगह होते तो क्या करते? साथ ही कहानी पर नाटक किया जा सकता है। नाटक करने की क्षमता हर बच्चे में होती है। नकल करना, किसी बात को बढ़ा-चढ़कर कहना, अपने जीवन के अनुभवों को हावभाव के साथ पुनः प्रस्तुत करना, यह सब वह किसी न किसी रूप में करता ही रहता है। अतः बच्चों को इसके लिए उपयुक्त वातावरण दिया जा सकता है। आरम्भ में साज-सज्जा, पोशाक, एक निश्चित संवाद याद करने की बजाए सामान्य रूप से ही डायलाॅग व बिना पोशाक के यह किया जा सकता है। बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाने के लिए कहानी सृजन का कार्य भी विविध तरीकों से किया जा सकता है। जब ऐसी प्रक्रियाएं बच्चों के साथ चलेंगी तो स्वतः ही उमें पढ़ने की आदत विकसित होगी।   सदियों से कहानियां बच्चों के सामाजिकरण में मदद कर रही होती थी। उनमें संस्कार बना रही होती थी पर आधुनिकीकरण के युग में तीन वर्ष के बच्चे को स्कूलों एवं आंगनबाड़ी में भेजा जाने लगा है। मन बहलाने के लिए उनके सामने मोबाइल व टेलीविजन एवं कम्प्यूटर के खेल आ रहे हैं। परिवार के सदस्य कहानियां सुनने-सुनाने की बजाए मोबाइल, टेलीविजन देखने में व्यस्त होते है। बच्चों से बातें करने का समय कम होता जा रहा है। सरकार, संस्थाओं एवं शिक्षाविदों के प्रयासों के बावजूद शिक्षण संस्थाओं में कहानियां बक्सों में ही बंद नजर आती हैं। हर बच्चे तक कहानियां पहुंच नहीं पा रही है। जिसका हश्र यह हुआ कि बच्चों का कहानी सुनने व पढ़ने का नैसर्गिक व मौलिक अधिकार खत्म होता नजर आता है। अतः बदली हुयी परिस्थितियों में स्कूल व आंगनबाड़ी में कहानी शिक्षण पर बढ़ावा देकर, सामुदायिक भागीदारी से गांव-गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय संचालित कर, पंचायत स्तर पर संचालित गांधी पुस्तकालयों को और व्यवस्थित रूप से चलाकर, बच्चों को ऐसे अवसर और अधिकता से उपलब्ध करवाने की जरूरत है जहां पर उसे पुनः कहानियां पढ़ने व सुनने के अवसर मिले, जिससे उसकी भाषाई क्षमता मजबूत होने के साथ-साथ उसमें वे तमाम तरह के कौशल, समझ व मूल्य विकसित हो पाएं जो एक कहानी से हो रहे होते हैं, ताकि आगे जाकर बालक एक विवेकपूर्ण समझ के साथ जिम्मेदार नागरिक के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ अपनी भूमिका निभाकर राष्ट्र व समाज निर्माण में अहम भूमिका निभा सके।   कहानी का समाज व राष्ट्र निर्माण में महत्व अब दुनिया समझ चुकी है। यह इस बात से भी झलकता है कि संसार में हर वर्ष 20 मार्च को कहानी दिवस के रूप में देखा जाने लगा है। इसकी शुरूआत सबसे पहले स्वीडन में 1991 में की गयी। 1997 में ऑस्ट्रेलिया ने पांचदिवसीय कहानी उत्सव के रूप में मनाया। इस प्रकार 2009 तक आते आते 20 मार्च संसार में कहानी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal,Disaster giving global acceptance to Sanatan lifestyle

मनोज ज्वाला  लगभग सारी दुनिया चीन से निकले ‘कोरोना वायरस’ की चपेट आ चुकी है। लगभग 100 से अधिक देशों में यह संक्रमण फैल चुका है । भारत समेत अनेक देशों ने इसे महामारी घोषित कर दिया है । विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर चुका है। खौफ इस कदर तारी है कि अभिवादन के तौर-तरीकों से ले कर मृत देह केविसर्जन की पद्धति तक में बदलाव के सुझाव दिए जा रहे हैं । जैसे भेंट-मुलाकात के दौरान परस्पर अभिवादन के लिए एक-दूसरे से हाथ नमिलाएं बल्कि भारतीय संस्कृति के अनुसार अपने-अपने हाथ जोड़कर नमस्तेबोलते हुए अभिवादन करें और किसी के मरणोपरांत उसके शव को दफनाने के बजायभारतीय परम्परा के अनुसार उसका ‘अग्निदाह’ करें । बताया जा रहा है कि ऐसानहीं करने से कोरोना और इस तरह के अन्य बीमारीकरक जीवाणुओं-विषाणुओं का संक्रमणहोना सुनिश्चित है । भारतीय संस्कृति-परम्परा का एकमात्र अर्थ है- सनातनवैदिक धर्म से निःसृत हिन्दू जीवनशैली जो व्यष्टि से ले कर समष्टि तक तथासृष्टि से ले कर परमेष्टि तक के समस्त जीवों के प्रति सह अस्तित्व परकायम है । बहरहाल विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह पर अधिकांश  देशों के लोग अब हाथमिलाना और गले मिलना छोड़ कर ‘नमस्ते’ करने लगे हैं ।  कोरोना सेसर्वाधिक पीड़ित चीन की सरकार के सख्त आदेश पर अन्य मजहब के लोग भी सनातन धर्म की रीति के अनुसार शव जलाने को विवश होगए हैं । अन्य देशों और मजहबों में भी अंतिम संस्कार की दफन क्रिया प्रतिबंधितहो सकती है। इन सबके स्थान पर दहन क्रिया स्वीकृत हो सकती है । ऐसा इस कारण क्योंकिसनातनधर्मी जीवनशैली में शव दहन की जो परम्परा है वह पर्यावरण प्रदूषण औरबीमारीकारक अवांछित जीवाणुओं के संक्रमण की दृष्टि से सर्वाधिक सुरक्षितहै । दफन से पर्यावरण प्रदूषण और जिवाणु संक्रमण दोनों बढ़ता है । यहीकारण है कि चीन में ‘शव दाह’ को अनिवार्य करदिया गया है । इस बीच दुनिया भर के औषधि विज्ञानी और चिकित्साविद्  कोरोना पीडितों को उस ‘तुलसी’ के सेवन की सलाह दे रहे हैं जोसनातनधर्मी प्रत्येक हिन्दू के घर-अंगन में पूजित है । कोरोना की दहशत से जर्मनी के चांसलर एंजला मर्केल को उनके मंत्रियों ने हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। कोरोना से अब तक दुनिया भर में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी पश्चिमी तरीके से अभिवादन में हाथ मिलाने और गले मिलने वाले लोग‘नमस्ते’ का अनुकरण करने लगे हैं ।  दुनिया भर में बढ़ती आबादी के साथ फैलते कब्रिस्तानों के भीतर पडे शवों की सड़न के कारण भूमिगत जल के प्रदूषण सेभी भविष्य में कभी न कभी कोई अन्य बीमारीकारक संक्रमण की विपत्ति तो आखिरआएगी ही ।अनुचित खान-पान और अभक्ष्य भक्षण से उत्पन्न जानलेवा बीमारी केइस संक्रमण से बचने के उपाय के तौर पर जिस भारतीय संस्कृति अर्थात सनातनवैदिक हिन्दू जीवन पद्धति के अनुकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है वहसर्वकल्याणकारी है और खान-पान व अभिवादन-आचरण से लेकर जीवन-यापन के तमामक्रिया-कलापों की विज्ञान-सम्मत विशिष्ट शैली पर आधारित है । सनातनधर्म से निःसृत इस जीवनशैली में मांसाहार सर्वथा वर्जित है और वही आचरणस्वीकृत है जो मानवोचित होने के साथ-साथ प्रकृति व पर्यावरण के लिए भीवांछित है। अब वह समय आ गया है अथवा आने वाला है जब सनातन वैदिक भरतीयसंस्कृति की एक-एक क्रियाविधि के वैज्ञानिक आयामों पर व्यापक वैज्ञानिकविमर्श होगा और उसे मजहबी दुनिया स्वेच्छा से नहीं तो विवशता से ही सहीउसे अपनाने की ओर उन्मुख होगी ।  कोरोना से बचाव के लिए इस समय दुनिया में जो भी दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं वो सब सनातन वैदिक भारतीय संस्कृति कीजीवनशैली में लाखों वर्ष पहले से प्रचलन में हैं । भोजन और शौच के पश्चातहाथ-मुंह व मलद्वार को पानी से धोने और यात्रा के पश्चात नहाने व कपड़े धोने और स्वच्छता के अन्य प्रतिमानों की सलाह हिन्दू जीवन पद्धति में पहले से ही प्रचलित है। मगर आधुनिकता के नामपर इन प्रचलनों को दकियानूसी बता कर अभक्ष्य भक्षण करने के साथ-साथमानवेतर जीवों के भी रक्त मांस व रस रसायन को खाने-पीने और उसके बाद‘टिसु पेपर’ से जूठे हाथ-मुंह और गंदे मलद्वार को पोंछ लेने वालेअभारतीय फैशन के पीछे भागने की भेड़चाल ने भारत में भी कोरोना की त्रासदीखड़ी कर दी है। विकराल होती स्थिति के बीच लोग पुनः सनातन मार्ग पर चलने को विवश हुए हैं।किन्तु केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है ।स्वस्थ समुन्नत प्रदूषण मुक्त व आपदा-विपदा से निरापद जीवन के लिए समस्तसनातन वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करना होगा। समष्टि से लेकर परमेष्टितक सृष्टि के समस्त जीव जगत के प्रति सह अस्तित्व की भावना पैदा करनी होगी। यह भावना नकेवल जीवों के प्रति बल्कि वनस्पति-नदी-पर्वत सबके प्रति लानी होगी । प्रकृति केअस्तित्व से ही मानव का अस्तित्व निरापद हो सकता है । सनातन वैदिक भारतीयजीवनशैली में ‘यज्ञ’ व ‘अग्निहोत्र’ का जो प्रावधान है उसका एक-एक विधानप्रकृति के प्रति सह-अस्तित्व के ज्ञान-विज्ञान की शिक्षाओं से भरा है । ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’ सनातन वैदिक भारतीयसंस्कृति की जीवनशैली का महज आदर्श वाक्य ही नहीं है बल्कि ‘हिन्दू-जीवन’का पथ और पाथेय भी है ।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 18 March 2020


bhopal, Rahul Gandhi

सियाराम पांडेय'शांत'  कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने हक की तो बात करते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों को अक्सर भूल जाते हैं। उन्हें तमिलों और तमिल भाषा की तो चिंता है लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं की चिंता नहीं है।  इन भाषाओं को बचाने के लिए कहां क्या हो रहा है, हो भी रहा है या नहीं हो रहा है, यह सब जानने की उन्हें फुर्सत नहीं। उन्हें मलाल इस बात का है कि वे संसद में जो सवाल पूछें, उसका प्रतिपूरक सवाल पूछने का भी उन्हें मौका दिया जाए। उनका आरोप है कि तमिल भाषा को बचाने के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही। उनका तर्क है कि लोकसभा सबके लिए है और यहां चर्चा होनी चाहिए। इसमें नई बात क्या है? राहुल गांधी को लगता है कि भारतीय संसद वन ट्रैफिक है। वह लाउड स्पीकर है। संसद के लिए इस तरह की टिप्पणी शोभनीय नहीं है। उन्होंने तमिल भाषा का सवाल उठाकर देश में विवाद की जमीन तैयार करने की कोशिश की है।  जब वे संसद में यह कहते हैं कि तमिलों को अपनी भाषा बचाने का हक है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन अन्य भाषा भाषियों को अपनी भाषा बचाने का हक है या नहीं, लगे हाथ वे यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा होता। अचानक राहुल गांधी का तमिल प्रेम समझ से परे हैं। लगता है संसद को वह अपनी राजनीति का मोहरा बनाना चाहते हैं। उत्तर भारत में कांग्रेस जनाधार खो चुकी है और अब दक्षिण भारत में भी भाजपा का रथ आगे बढ़ रहा है। सच यह है कि इस बात को राहुल गांधी पचा नहीं पा रहे हैं। द्रमुक नेताओं का हिंदी विरोध जगजाहिर है। एम.करुणानिधि की राजनीतिक उत्पत्ति ही हिंदू विरोध की बुनियाद पर हुई है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में तमिलनाडु का अधिकार छीनने की बात की है। हिंदी भाषा के संदर्भ में द्रमुक सदस्यों को पूरक प्रश्न नहीं पूछने दिया गया। उन्हें लोकसभा अध्यक्ष ने इस बावत अनुमति नहीं दी। यह अनुमति ओम बिड़ला ने क्यों नहीं दी, इसे तो वे ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन इससे तमिलों और तमिल भाषा पर आक्रमण कैसे हो गया? लोकसभा अध्यक्ष ने तमिल भाषा के विरोध में कोई बात तो कही नहीं। उस पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की। फिर तमिलनाडु का अधिकार कैसे छिन गया? द्रमुक सांसदों के लिए तमिल उनका इतिहास है, दिल है, डीएनए है तो अन्य भाषा भाषी सांसदों का दिल क्या होगा, लगे हाथ राहुल गांधी को यह भी बता देना चाहिए। भाषा किसी के दिल में रह सकती है, उस पर राज कर सकती है लेकिन वह दिल और डीएनए नहीं हो सकती। इस बारीक सी बात को राहुल जितनी जल्दी समझ जाएं, उतना ही अच्छा होगा।  देश में वैसे भी 22 भाषाओं को संवैधानिक ढंग से आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है। भारतीय नोट पर भी 17 भाषाएं छपी होती हैं। इनमें तमिल भी शामिल है। न तो नोट से तमिल भाषा को हटाया गया है और न ही आधिकारिक भाषाओं का उसका दर्जा खत्म हुआ है तो फिर अचानक तमिल का अस्तित्व खतरे में कैसे पड़ गया? राहुल गांधी ही नहीं, पूरी कांग्रेस को इस बात का जवाब देना चाहिए कि तमिलनाडु में कौन सी भाषा आगे बढ़ रही है। नई शिक्षा नीति में तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ाने का द्रमुक पहले ही विरोध कर चुकी है।  आम तौर पर भारत में 206 भाषाएं बोली जाती हैं जबकि दुनिया में कुल भाषाओं की संख्या 6809 है। इनमें से 90 फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से भी कम है। लगभग 200 से 150 भाषाएं बोलने वालों की संख्या 10 लाख से अधिक है जबकि लगभग 357 भाषाएं बोलने वालों की संख्या महज 50 है जबकि 46 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या केवल एक है।  प्रख्यात भाषाविद् ग्रियर्सन ने भी माना था कि भारत में 179 भाषाएं और 544 बोलियां हैं। भारत ऐसा देश है जहां कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलने की बात कही गई है। हर भाषा को सम्मान देने वाले देश में किसी भाषा का अधिकार छीनने की बात करना कितना दुस्साहसपूर्ण है, इस पर भी सोचा जाना चाहिए। भारत वसुधैव कुटुंबकम की भावना में यकीन रखता है और यहां की भाषाएं भी परिवार भावना से काम करती हैं। भारोपीय परिवार को सबसे बड़ा भाषा परिवार कहा गया है। दुनिया में इस बोलने वालों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, बंगाली, फारसी, ग्रीक, लैटिन, अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, पुर्तगाली और इतालवी आदि भारोपीय भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं। द्रविड़ भाषा परिवार में तमिल, कन्नड़, तेलुगू आदि शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 43.63 प्रतिशत जनता ने हिंदी को अपनी मातृभाषा घोषित किया था। यह भाषा डेटा 26 जून 2018 को जारी किया गया था। भिली अथवा भिलोदी 1.04 करोड़ वक्ताओं के साथ सबसे ज्यादा बोली जाने वाली गैर अनुसूचित भाषा थी। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 43.63 प्रतिशत लोग हिंदी, 0.02 प्रतिशत लोग अंग्रेजी, 8.3 प्रतिशत लोग बंगाली, 7.09 प्रतिशत लोग मराठी, 6.93 प्रतिशत लोग तेलुगु और 5.89 प्रतिशत लोग तमिल बोला करते थे। कोई भाषा तब संरक्षित होती है जब उसे बोलने और जानने वाले बचें। जब तमिलों पर ही संकट नहीं है तो तमिल भाषा पर संकट का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 18 March 2020


bhopal,Kareena

योगेश कुमार सोनी कोरोना वॉयरस से पूरा विश्व प्रभावित है। हर देश इससे बचने का अथक प्रयास कर रहा है लेकिन हमारे देश में शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों को इससे होने वाले खतरे का कोई डर नहीं है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कोरोना वॉयरस के चलते आदेश जारी कर राज्य में पचास से अधिक लोगों की भीड़ जमा होने पर पाबंदी लगा दी है लेकिन शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों ने इसे मानने से मना कर दिया। देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे वैश्विक संकटकाल में भी लोग गैर जिम्मेदार व्यवहार कर रहे हैं। वक़्त की जरूरत के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारें आपसी समन्वय से जब कोरोना के खतरों से निबटने के लिए जरूरी कदम उठा रही हैं तो जनता को भी ऐसे समय में अपने कर्तव्य को समझना जरूरी है। अबतक के आंकड़ों के अनुसार देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या सवा सौ को पार कर चुकी है। संक्रमण को रोकने संबंधी उपायों के चलते सिनेमाघर, शिक्षण संस्थान के अलावा तमाम भीड़भाड़ वाली जगहों को 31 मार्च तक के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। हिन्दुस्तान की विशाल जनसंख्या को देखते हुए तेजी से फैलते कोरोना के खतरों से बचाव के लिए जाहिर है कि हमें अन्य देशों की अपेक्षा अतिरिक्त एहतियात बरतने की जरूरत है। यदि हम बचाव के उपायों को गंभीरता से लेंगे तो एकजुट होकर ऐसे खतरों से निबटना काफी हद तक संभव है। ऐसा नहीं होने पर चीन जैसी स्थिति उत्पन्न होने का खतरा पैदा हो सकता है। इस वायरस की वजह से हर देश को आर्थिक नुकसान भी हो रहा है लेकिन इस जानलेवा महामारी से निबटने के लिए हर जरूरी प्रबंध करने में कोई भी पीछे नहीं है। दरअसल, हमारे देश में हर मुद्दे पर राजनीति होती है। हम क्यों भूल जाते हैं कि कुछ मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं। क्या जिंदगी से बढ़कर हो सकता है किसी भी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन? हम यह भूल जाते हैं कि इसमें भलाई हमारी ही है और जब कुछ बर्बाद होता है तो आरोप सिस्टम और सरकार पर मढ़ा जाता है। पिछले लगभग तीन महीने से शाहीन बाग का प्रदर्शन पूरे देश में आग की तरह काम कर रहा है। वहां के प्रर्दशनकारियों पर पैसे लेकर बैठने का आरोप भी लगा था। कुछ लोगों का मानना है कि यह कौन लोग हैं जो इतने दिनों से काम पर नहीं जा रहे हैं और इनका घर कैसे चल रहा है।बहराहल, कोरोना वायरस के रूप में हमारे सामने जिंदगी का खतरा उत्पन्न हो गया है तो हमें इसके खिलाफ सामूहिक रूप से लड़ने की सख्त आवश्यकता है। यदि वहां बैठा कोई भी एक प्रदर्शनकारी इसकी चपेट में आ गया तो वहां सबकी जिंदगी दांव पर लग जाएगी। पूरी दिल्ली और देश में इसे फैलते देर नहीं लगेगी। जहां एक ओर शासन-प्रशासन कोरोना वॉयरस को लेकर हर कदम संभलकर रख रहा है वहीं दूसरी ओर हम ऐसा व्यवहार करके खुद का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। इसके अलावा एक अहम बात और कि हमारे देश में ऐसी बीमारियों के इलाज के नाम पर बहुत से लोग सक्रिय हो जाते हैं जो झाड़-फूंक तरह-तरह के नुस्खे बताकर स्थिति को और भी पेचीदा बनाने से बाज नहीं आते। हमें झाड-फूंक से लेकर उतारा करने वाले इस तरह के लोगों के चक्कर में आने से बचना होगा। यदि आपको अपने स्वास्थ को लेकर कुछ भी गड़बडी महसूस हो तो डॉक्टरों पास जाएं। किसी के बहकावे में न आएं। हाल ही में कोरोना संदिग्ध बेटी को बचाने के चक्कर में पिता पर केस दर्ज हुआ है। लड़की को छुपाने और प्रशासन को गुमराह करने के आरोप में आगरा में 123 साल पुराने महामारी कानून के तहत रेलवे अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इस ऐक्ट के तहत यह पहली कार्रवाई है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि शासन-प्रशासन युद्धस्तर पर कार्य कर रहा है लेकिन शाहीन बाग के प्रर्दशनकारी स्थिति की गंभीरता नहीं समझ रहे। यदि वहां समझाया भी जा रहा है तो वह इसे सरकार की साजिश समझते हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। (लेखक पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 17 March 2020


bhopal, Corona: Madhya Pradesh lagging behind rescue measures

प्रमोद भार्गव पूरे देश में जहां जानलेवा कोरोना वायरस का संकट गहराया हुआ है, मध्य-प्रदेश में अस्तित्व के संकट से जूझ रही कमलनाथ सरकार कोरोना से बहुमूल्य जीवन को बचाने के सार्थक उपाय करने में पिछड़ रही है। यह इस बात से पता चलता है कि कोरोना वायरस की आशंका में इंदौर निवासी इटली से आई युवती को एमवाय अस्पताल में भर्ती किया गया। युवती का मित्र कोविड-19 की जांच में पाॅजीटिव पाया गया है। इस जानकारी के बाद युवती स्वयं अस्पताल पहुंची और खून के नमूने दिए। इस लड़की को सावधानी बरतते हुए पृथक वार्ड में रखा गया है। मध्य-प्रदेश के अन्य शहरों में भी चीन, इटली, मलेशिया, ईरान व जापान से कुछ लोग आए हैं। इसके संदिग्ध मरीज उज्जैन और ग्वालियर में भी मिले हैं। शिवपुरी में मलेशिया से लौटे दो युवकों को जांच के दायरे में रखा गया है। चीन में रहकर चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई कर रहे खरगोन का युवक और इंदौर की लड़की वुहान से लौटी है। वुहान वही शहर है, जहां की विषाणु प्रयोगशाला से कोरोना वायरस निकलकर दुनिया के 126 शहरों में फैल गया और इसने पांच हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया है। भारत सरकार ने इस महामारी को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही इसे विश्वव्यापी महामारी घोषित कर चुका है। देश में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिल्ली और कर्नाटक में एक-एक मौत हो चुकी है। अबतक कोरोना के संक्रमण के 7 रोगी दिल्ली, 11 उत्तर-प्रदेश, 6 कर्नाटक, 14 महाराष्ट्र, 19 केरल और तीन लद्दाख में पाए गए हैं। राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडू, जम्मू-कश्मीर, आंध्र-प्रदेश और पंजाब में एक-एक मरीज पाए गए हैं। इन रोगियों में 17 विदेशी नागरिक शामिल हैं। इनमें इटली के 16 और कनाडा का एक पर्यटक है। अबतक देश के अस्पतालों से 10 कोरोना संक्रमित ठीक होकर अपने-अपने घर लौट चुके हैं। इस बात को लेकर संतुष्ट हुआ जा सकता है कि मध्य-प्रदेश में अभीतक एक भी कोरोना संक्रमित व्यक्ति नहीं मिला है। प्रदेश सरकार अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, इसलिए स्वाभाविक है कि वह इस खतरनाक बीमारी के प्रति सर्तक नहीं है। फिर भी स्वास्थ्य मंत्री तरुण भनोत का कहना है कि बैंगलुरु में कांग्रेस के जो 22 विधायक नजरबंद हैं, उनका भोपाल आते ही स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाएगा। क्योंकि बैंगलुरु में कोरोना के छह संक्रमित मरीज मिले हैं, उनमें से एक 76 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो चुकी है। लेकिन विडंबना यह है कि भनोत को स्वास्थ्य मंत्रालय का छह मंत्रियों की बर्खास्तगी के बाद पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट का प्रभार मिला है। ऐसे में वे स्वयं अजमंजस में हैं कि इस वायरस से बचने के क्या उपाय किए जाएं। कौन-सी आपातकालीन सुविधाएं एवं दवाएं जिला अस्पताल से लेकर स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाई जाएं? हालांकि प्रदेश सरकार ने प्राथमिक सावधानियां बरतते हुए प्रदेश के सभी सरकारी व निजी विद्यालय व महाविद्यालय, सिनेमाघर, डे-केयर सेंटर और आंगनवाड़ी केंद्र 31 मार्च तक बंद कर दिए हैं। इस दौरान घरों पर ही पोषण आहार पहुंचाया जाएगा और वहीं वजन व ऊॅचाई नापी जाएगी। जिला अस्पतालों में पृथक वार्ड खोलने के निर्देश दिए हैं। चिकित्सकों, नर्सों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की छुटिट्यां रद्द कर दी गयी है। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा की अधिसूचना जारी करने के बाद राज्य सरकारों को कहा गया है कि इससे निपटने के लिए एसडीआरएफ के तहत आर्थिक मदद की जाएगी। राज्य सरकारें इस सिलसिले में वायरस पर नियंत्रण के लिए प्रभावित लोगों के अस्थाई तौर पर ठहरने, खाना, वस्त्र, दवाएं और आइसोलेशन कैंप के लिए एसडीआरएफ धनराशि का इस्तेमाल कर सकती हैं। इस राशि का उपयोग स्क्रीनिंग टेस्ट और सैंपल लेने के साथ प्रयोगशालाएं बनाने में भी किया जा सकेगा। मध्य-प्रदेश में सरकार जिस उठापटक के दौर से गुजर रही है, उसके चलते कोरोना की रोकथाम के प्रति ज्यादा सचेत नहीं है। हां, मुख्यमंत्री कमलनाथ के चित्र लगे विज्ञापन जरूर अखबारों में रोजाना छापे जा रहे हैं। प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तो छोड़िए जिला चिकित्सालयों तक में मास्क, सेनेटाइजर व डिटाॅल तक नहीं हैं। इसलिए वरिष्ठ नागरिक इन वस्तुओं की मांग जिला कलेक्टरों को ज्ञापन देकर भी करने लगे हैं। इन नागरिकों के संगठनों ने जिला चिकित्सालयों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से ऐसा कक्ष बनाने की मांग की है, जिसमें इस बीमारी से जुड़े लक्षणों बुखार, खांसी, सर्दी-जुकाम, निमोनिया और सांस के विशेषज्ञ चिकित्सक जांच करें और फिर दवा दें। दरअसल वरिष्ठ नागरिकों को बीमारी से पहले उपचार की चिंता इसलिए सता रही है क्योंकि कोरोना का सबसे ज्यादा असर 70 साल के अधिक उम्र के बुजुर्गों और छोटे बच्चों पर देखने में आ रहा है। उम्रदराज लोग ही मौत के मुंह में ज्यादा जा रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस उम्रों में रोग-प्रतिरोधात्मक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है। गर्भवती महिलाएं भी इसकी गिराफ्त में जल्दी आ सकती हैं। जिन लोगों को हृदय, गुर्दा, जिगर और अस्थिरोग है, उन्हें भी कोरोना तेजी से अपनी चपेट में लेता है। बहरहाल, शासन व प्रशासन की शिथिलता से जूझ रहे स्वास्थ्य केंद्रों से ज्यादा उम्मीद लगाए बैठे रहने की बजाय अच्छा है लोग स्वयं सावधानियां बरतें। हाथ मिलाने की बजाय नमस्ते करें। सर्दी-जुकाम से पीड़ित व्यक्ति से 5-6 फीट तक की दूरी तक रहें। क्योंकि इनके छींकने पर जो तरल बूंदें निकलती हैं, उनमें यदि कोरोना वायरस है तो वह इस दूरी के बीच स्वयं मर जाएगा। इसलिए मास्क का प्रयोग करें, साबुन व सेनेटाइजर से हाथ धोएं। सेनेटाइजर नहीं होने पर डिटाॅल में साबुन मिलाकर हाथ धो लें। जबतक प्रदेश में स्थिर सरकार नहीं आ जाती है तबतक वरिष्ठ नागरिक भी सुरक्षा के लिए सरकार के भरोसे बैठे रहने की बजाय अपने स्तर पर भी बचाव के उपाय करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 March 2020


bhopal, Corona bodies should not be treated inhumanely

रमेश ठाकुर क्या कोरोना संक्रमण की चपेट में आकर जान गंवाने वालों को अंतिम संस्कार का हक नहीं? कोरोना से जान गंवाने वाली दिल्ली की बुजुर्ग महिला के अंतिम संस्कार का जो हक छीना गया, दरअसल उसके गुनाहगार हम सब हैं। कोविड-19 के संक्रमण का शिकार हममें से कोई भी हो सकता है। ऐसा हमारे-आपके साथ हो तो क्या हम बर्दाश्त कर पाएंगे? कोरोना के डर से समूची दुनिया इस समय सहम-सी गई है। वायरस का संक्रमण तेज हवा की तरह इंसानी शरीर में प्रवेश कर रहा है। देश-दुनिया में इसकी चपेट में लाखों लोग आ चुके हैं और हजारों मौतें हो चुकी हैं। एकाध सप्ताह से कोरोना ने भारत में भी भूचाल मचाया हुआ है। कई राज्यों ने महामारी घोषित करने के अलावा स्कूल-काॅलेज, सिनेमाघर, माॅल्स, सार्वजनिक स्थानों पर बंदी के आदेश दिए हैं। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। कोरोना के केसों में लगातार वृद्धि होने के अलावा वायरस के कहर से हिंदुस्तान में दो जानें भी गईं हैं। पहली मौत तेलंगाना में तो दूसरी मौत पिछले सप्ताह दिल्ली में हुई। कोरोना का खौफ इस कदर हावी हो चुका है कि लोग अब मृतकों के शरीर से भी अमानवीय व्यवहार करने लगे हैं। दिल्ली में कोरोना संक्रमण से हुई एक बुजुर्ग महिला के शव के साथ बेहद बुरा सुलूक हुआ। मृतक के अंतिम संस्कार में काफी दिक्कतें आई। दिल्ली के निगम बोध घाट प्रशासन ने शव को अपने श्मशान घाट पर अंत्येष्टि करने से मना कर दिया। घाट प्रशासन को इस बात का डर था कहीं कारोना संक्रमण से हुई मौत की अंत्येष्टि से घाट के भीतर संक्रमण न फैल जाए। घाट के कर्मचारियों से काफी देर बहस भी होती रही लेकिन वह अंत्येष्टि को राजी नहीं हुए। शव के साथ जीवित इंसानों ने अमानवीय व्यवहार की सारी हदें पार कर दीं। समय बीतता गया लेकिन फैसला नहीं हो पाया कि शव को अग्नि के हवाले किया जाए। इस कारण शव निगम बोध घाट पर कई घंटे अलग कोने में लावारिस की तरह रखा रहा। शमशान घाट पर शव को अस्पताल के कर्मचारी लेकर पहुंचे। शव के मीटरों दूर तक किसी को भी जाने की इजाजत नहीं दी गई। परिजनों के लिए भी पास जाने की पाबंदी थी। परिवार के तमाम लोग मौजूद थे, सभी मीटरों दूर खड़े होकर रो-बिलख रहे थे। किसी को शव को कंधा तक नहीं देने दिया गया। कोरोना से जान गंवाने वाली बुजुर्ग महिला की दो दिन पहले दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में मौत हो गई थी। शमशाम घाट के लोग कोरोना पीड़ित और मृतकों से संक्रमण फैलने के डर से केंद्र सरकार की गाइडलाइन का हवाला दे रहे थे। दरअसल, कोरोना की शुरुआत में केंद्र सरकार ने विज्ञापन के जरिए लोगों को पीड़ितों से एहतियात बरतने की सलाह दी थी। उसी वक्त से लोगों में डर फैला हुआ है। गौरतलब है कि उसी सतर्कता को देखते हुए शमशान घाट भी एहतियात बरत रहा था। शव को अस्पताल के कर्मचारी ही निगम बोध घाट लेकर पहुंचे थे। उस वक्त परिजन साथ नहीं थे, उनको सीधे घाट पर ही पहुंचने का अस्पताल की ओर से निर्देश दिया गया था। शव जब निगम बोध घाट पहुंचा तो घाट वालों को पता चल गया कि मृतक कोरोना ग्रस्त था। इसके बाद घाट में हड़कंप मच गया। घाट पर रोजाना अनगिनत शवों की अंत्येष्टि होती है। घाट वालों को इस बात की आशंका थी कहीं इससे घाट में संक्रमण न फैल जाए, इसलिए उन्होंने दूसरे घाट पर ले जाने को कह दिया। परिजनों ने दूसरे घाट पर संपर्क किया तो उन्होंने भी मना कर दिया। परिजनों ने दिल्ली के कुछ अधिकारियों और नेताओं से बात की, किसी ने सहयोग नहीं किया। हारकर उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से संपर्क किया। उनके हस्तक्षेप के बाद ही घाट प्रशासन अंत्येष्टि के लिए राजी हुआ। लेकिन अंतिम संस्कार अग्नि से फिर भी नहीं किया, सीएनजी से हुआ। परिजनों को सीएनजी शवदाह गृह के बाहर रोका गया। पार्थिव शरीर ले जाने की इजाजत अस्पतालकर्मी को ही थी। चीन के वुहान में कोरोना संक्रमित जितने लोगों की मौत हुई, उनके शवों को समुद्र के किनारे एकांत में दफनाया गया है। कमोबेश, डर वहां भी कुछ ऐसा ही है कि शवों से भी संक्रमण फैलता है। जबकि, चिकित्सकों ने इसे गलत बताया है कि शवों से संक्रमण फैलता है। खैर, दिल्ली में घटी अमानवीय घटना को देखते हुए सरकार ने नए दिशा निर्देश जारी किए हैं। पूरे देश के शमशान घाटों को निर्देशित किया गया है कि कोरोनो से हुई मौतों की अंत्येष्टि के लिए किसी तरह का कोई भेदभाव न किया जाए। बताया गया है कि कोरोना से हुई मौतों की अंत्येष्टि से संक्रमण नहीं फैलता। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक कोरोना वायरस यानी कोविड-19 अभीतक 123 देशों में अपने पैर पसार चुका है। मामले रूक नहीं रहे बल्कि रोज दुनिया भर में सैकड़ों नए मामले सामने आ रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित चीन, इटली, ईरान और कोरिया हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 March 2020


bhopal,  Why the practice of scavenging does not end

सियाराम पांडेय 'शांत' कांग्रेस सांसद जयकुमार ने लोकसभा में वर्षों से चली आ रही मैला ढोने की प्रथा खत्म किए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह अमानवीय प्रथा साल दर साल भारी-भरकम बजट पेश किए जाने के बाद भी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि संसद में यह मामला पहली बार उठा। इससे पहले भी चर्चा हुई है। कानून तक बने हैं लेकिन अनुपालन स्तर पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला रहा है। भारत में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए पहला कानून 1993 और दूसरा 2013 में बना था, जिसके मुताबिक नाले-नालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध है। इसके बाद भी लोकसभा में इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं तो स्थिति की भयावहता का पता चलता है। न्यायपालिका के स्तर पर भी समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देशित किया जाता रहा है कि सरकार मैला ढोने वालों को चिह्नित कर उनका पुनर्वास सुनिश्चित करे। सुस्पष्ट कानून और अदालती निर्देशों के बाद भी मैला ढोने वालों की संख्या घटने की बजाय बढ़ती जा रही है। वर्ष 2018 में डैलबर्ग एसोसिएट्स के शोध पर गौर करें तो उस समय तक भारत के विभिन्न शहरी इलाकों में 50 लाख सफाईकर्मी काम कर रहे थे। उक्त सफाईकर्मी मानव अवशेष के सीधे संपर्क में आते हैं। इनमें से अधिकांश यह काम बगैर किसी सुरक्षा यंत्र के करते हैं जिसकी वजह से खतरनाक गैस जैसे अमोनिया, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाय आक्साइड के ये सीधे संपर्क में आते हैं, जो कई भयानक बीमारियों का कारण बन जाती है। सीवर सफाई के दौरान दम घुटने से मरने या बेहोश होने वालों की भी बड़ी तादाद है। ज्यादातर सफाईकर्मी या तो ठेके पर रखे जाते हैं या उनकी नौकरी अस्थायी होती है। इस वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी लाभों से वंचित रहना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर पांचवें दिन तीन सफाइकर्मियों की मौत हो रही है। अंतर-मंत्रालयी कार्यबल ने 2018 में जो आंकड़ा जारी किया था, वह दिल दहलाने वाला है। उसके अनुसार, भारत के 12 राज्यों में 53,236 लोग मैला ढोने का कार्य कर रहे थे। वैसे यह आंकड़ा वर्ष 2017 के आंकड़े 13 हजार से चार गुना अधिक था। मौजूदा आंकड़ा क्या है, इसे तो जिम्मेदार तंत्र ही बेहतर बता सकता है। हालांकि यह आंकड़ा देश के 121 जिलों पर ही आधारित है। शेष 479 जिलों से तो आंकड़े प्राप्त ही नहीं किए जा सके। इस आंकड़े के मुताबिक सर्वाधिक मैला ढोने वाले 8016 लोग मध्य प्रदेश में थे। इस लिहाज से राजस्थान दूसरे, महाराष्ट्र तीसरे और उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर था। उत्तर प्रदेश में मैला ढोने वालों की संख्या 28,796 थी। वर्ष 1912 में मनमोहन सरकार के केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस कुप्रथा के खिलाफ मैला मुक्ति यात्रा शुरू की थी जो भोपाल से शुरू होकर दिल्ली में समाप्त हुई थी लेकिन इसके नतीजे सिफर रहे। उस समय जयराम रमेश ने बताया था कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक सिर पर मैला ढोने के काम में तकरीबन आठ लाख लोग लगे हुए हैं, जिनमें सर्वाधिक महिलाएं हैं। इसके उन्मूलन के लिए बनाया गया कानून लोगों को मैला ढोने से मुक्ति दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। लिहाजा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास विधेयक 2011 लोकसभा में पेश किया था। विधेयक में लोगों को सिर पर मैला ढोने, सीवरों और सेप्टिक टैंक की सफाई जैसे खतरनाक कार्यों से मुक्ति दिलाने की सिफारिश की गई थी। विधेयक में स्थानीय प्राधिकरण को अस्वच्छ शौचालयों का सर्वेक्षण कराने और उन्हें ध्वस्त कराने के लिए मालिकों को नोटिस जारी करने का अधिकार दिया गया था। इतना सब करने के बाद भी अगर कांग्रेस के किसी सांसद को इस प्रथा के उन्मूलन की मांग करनी पड़ रही है तो इसका मतलब साफ है कि इस समस्या के समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रयास हुए नहीं। फिल्म अभिनेता आमिर खान भी अपने एक टीवी शो 'सत्यमेव जयते' में इस सामाजिक कुरीति के उन्मूलन की मांग कर चुके हैं। नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन द्वारा 18 राज्यों के 170 जिलों में कराए गए सर्वे में 86,528 लोगों ने खुद को मैला ढोने वाला बताया और रजिस्ट्रेशन करवाया था। यह और बात है कि सरकारी स्तर पर 41,120 लोगों को ही मैला ढोने वाला माना गया था। बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और तेलंगाना जैसे राज्यों ने तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि उनके यहां एक भी मैनुअल स्कैवेंजर है भी। इसके विपरीत अगर नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करें बिहार के 16 जिलों में 4,757 लोगों ने खुद को न केवल मैला ढोने वाला बताया था बल्कि इस रूप में अपना पंजीकरण भी कराया था। हरियाणा के पांच जिलों में 1,221 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। जम्मू-कश्मीर के सात जिलों में 254 और तेलंगाना के दो जिलों में 288 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। जिन 170 जिलों में सर्वे कराया गया उसमें से 82 जिलों ने दावा किया कि उनके यहां एक भी मैला वाहक नहीं है। इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए तथापि यह न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी जड़ें जमाए रही। महात्मा गांधी ने 1917 में कहा था कि साबरमती आश्रम के लोग अपने शौचालय खुद ही साफ करेंगे। महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया और उसने इसे खत्म करने की मांग की थी। ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के लिए सुझाव दिए थे। मैला ढोने के हालातों की जांच के लिए बनी एक अन्य समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था। राष्ट्रीय मजदूर आयोग ने 1968 में सफाईकर्मियों और मैला ढोने वालों’ के काम करने की स्थितियों के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया था। इन सभी समितियों ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और सफाईकर्मियों के पुनर्वास का सुझाव दिया था। इन समितियों के कुछ सुझावों को स्वीकार करने के साथ देश ने मैला ढोने का काम और शुष्क शौचालय निर्माण रोकथाम कानून 1993 कानून बनाया। भारत के ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी)’ की 2003 की रिपोर्ट बताती है कि केवल 16 राज्यों ने ही इस कानून को अपनाया और किसी ने भी इसे लागू तक नहीं किया। श्रम मंत्रालय के ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति कानून’ को केवल 6 राज्यों ने लागू किया है। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) ने 2007 तक मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य तय किया था। बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक भारतीय रेल, जो वास्तव में मैला ढोने के लिए कर्मचारियों को रखता है, उसने 2 लाख 40 हजार करोड़ की अपनी एकीकृत रेलवे आधुनिकीकरण योजना में मैला ढोने के खात्मे के प्रावधान को शामिल नहीं किया है। इधर उसने जैविक शौचालय जरूर बनाने आरंभ किए हैं लेकिन इतना काफी नहीं है। अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। इसमें संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही स्वच्छताकर्मियों की समस्यायों के निदान को लेकर गंभीर है। इस मुदृदे पर सर्वानुमति, सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास हासिल करने की जरूरत है। 1917 से चली आ रही मांग अगर 2020 में भी पूरी न हुई तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 16 March 2020


bhopal, Air pollution and increasing violence

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा बात थोड़ी अजीब लग रही है पर वैज्ञानिकों द्वारा किए गए हालिया शोध से जो परिणाम आए हैं, उनमें एक यह भी है कि वायु प्रदूषण के चलते समाज में हिंसा बढ़ रही है। अबतक माना जाता रहा है कि वायु प्रदूषण के चलते लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और जलवायु परिवर्तन के साथ ही कई प्रजातियां तक विलुप्त होती जा रही हैं। पर अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनसेंटा स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और कोलोरेडो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम इस नतीजे पर पंहुची है कि समाज में हिंसक अपराधों में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ’’हमारे शोध में वायु प्रदूषण और हिंसक अपराधों के बीच संबंध की पहचान हुई है। हमें पता चला है कि प्रदूषक पीएम पार्टिकुलेट में 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर की बढ़ोतरी होने पर हिंसक अपराधों में 1.17 फीसदी की बढ़ोतरी होती है।’’ शोधकर्ताओं के अध्ययन को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसका बड़ा कारण यह है कि शोधकर्ताओं द्वारा बहुत बड़े नेटवर्क पर अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला गया है। अमेरिका में लगातार 13 साल तक 8 करोड़ 60 लाख लोगों के डाटा पर यह अध्ययन किया गया है। मोटे तौर पर इस तरह से समझा जा सकता है कि हवा में उपलब्ध प्रदूषक कण व जहरीली गैसें मस्तिष्क के सामान्य कामकाज को प्रभावित करती हैं। दिमाग का असर सीधे मानव व्यवहार पर पड़ता है। यदि लंदन की ही बात करें तो वहां 20 लाख लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां प्रदूषण का स्तर अधिक है। बीजिंग ही नहीं दिल्ली, बंगलुरु सहित हमारे देश के भी कई शहरों की स्थिति प्रदूषण के मामले में गंभीर है। वैसे भी अपराध खासतौर से हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे तो साफ हो जाएगा कि अधिक भीड़भाड़ वाले और प्रदूषित शहरों में हिंसा का स्तर अन्य स्थानों की तुलना में अधिक है। हालांकि शोधकर्ताओं के अध्ययन का केन्द्र अमेरिका ही रहा है और शोधार्थियों ने अमेरिका के ही 301 शहरों में अपराध का अध्ययन किया है पर यह साफ हो जाना चाहिए कि प्रदूषण सीधे-सीधे दिमाग पर असर डालता है और इससे लोगों की मानसिकता प्रभावित होती है। अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में या भीड़भाड़ वाले स्थानों पर व्यक्तियों की प्रतिक्रिया भिन्न तरह की होने लगती है। चिढ़चिढाहट, अवसाद, कुंठा, अनिद्रा और इसी तरह की प्रतिक्रियाएं होने लगती है। ऐसे में जो अधिक सेंसेटिव होते हैं वे प्रतिक्रिया भी जल्दी ही व्यक्त करते हैं और इसका परिणाम हिंसक प्रवृति हो जाती है। इसमें दो राय नहीं कि आज सारी दुनिया बढ़ते प्रदूषण से चिंतित है। नित नए प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। प्रदूषण स्तर कम करने के लिए दुनिया के देश लगातार कोशिश कर रहे हैं क्योंकि परिणाम सामने हैं। जलवायु परिवर्तन होने लगा है। समुद्री तूफानों का सिलसिला बढ़ गया है। मौसम चक्र में बदलाव आने लगा है। प्रजातियां नष्ट होने लगी हैं। दुनिया के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। सारी दुनिया बढ़ते तापमान से चिंतित है। सुनामी श्रृंखलाबद्ध होने लगी है। इससे प्राकृतिक प्रकोप बढ़ा है। समुद्री किनारों पर बसे शहरों के सामने अस्तित्व का संकट आने लगा है। ऐसे में प्रदूषण को लेकर और अधिक गंभीर होना पड़ेगा। बिना दूरगामी सोच के नई-नई चीजों को अपनाना और जब उसके नकारात्मक परिणाम आने लगते हैं तबतक बहुत देरी हो जाने के कारण समस्याएं होती हैं। एक समय प्लास्टिक को दिल खोलकर बढ़ावा दिया गया। आज प्लास्टिक परेशानी का सबब बनती जा रही है। पेट्रोल और डीजल के प्रदूषण को कम करने के लिए अब इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर जाने लगे हैं। घर को पंचसितारा बनाने वाले उत्पाद प्रदूषण बढ़ाने में सहायक हो रहे हैं। ऐसे में अब देश-दुनिया की सरकारों के साथ ही गैर सरकारी संगठनोें को भी पूरे दमखम के साथ आगे आना होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब प्रदूषण के चलते सामान्य जीवन बिताना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में हिंसक होते समाज को अहिंसा की ओर ले जाने के लिए प्रदूषण को निर्धारित स्तर पर रखने के समग्र प्रयास करने होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 March 2020


bhopal,  Can MP Assembly be suspended?

सतीश एलिया राज्यपाल का अभिभषण होने के बावजूद नहीं होने जैसा रहने तथा राज्यपाल की सरकार और विपक्ष को नसीहत के बीच मध्य प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक लिए स्थगित किए जाने से प्रदेश में सरकार का संकट और गहरा गया लगता है। राज्यपाल लालजी टंडन के मुख्यमंत्री कमलनाथ को लिखे विश्वासमत हासिल करने संबंधी पत्रों को विधानसभा अध्यक्ष ने संज्ञान में ही नहीं लिया। उन्होंने बार-बार इन पत्रों का जिक्र कर सरकार के अल्पमत में आने की बात कह रहे नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान और भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक नरोत्तम मिश्रा की बातों का कोई जवाब नहीं दिया। अध्यक्ष ने कहा आपका पत्राचार राज्यपाल से चल रहा है, मुझसे पत्राचार नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री ने भी राज्यपाल के पत्र की मंशा पर अमल के बारे में विधानसभा अध्यक्ष या सदन में कुछ नहीं कहा। जाहिर है कमलनाथ सरकार के सामने उपस्थित संकट, विधानसभा से बाहर नई रणनीति के रूप में सामने आने के आसार हैं। सूत्रों का कहना है कि अब राज्यपाल विधानसभा को निलंबित करने और मुख्यमंत्री को उनके सामने बहुमत दर्शाने को कह सकते हैं, इस बीच सरकार और कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं। 22 बागी कांग्रेस विधायकाें में से छह के इस्तीफे मंजूर कर चुके विधानसभा अध्यक्ष ने बाकी 16 विधायकों के इस्तीफे एक ही आधार पर होने के बावजूद स्वीकार नहीं किए। सरकार के अल्पमत में आ जाने की बात बार-बार कह रहे विपक्ष ने भी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को नहीं दिया है। ऐसे में सरकार पर उठ रहे सवाल तो बने ही हैं, विपक्ष और राज्यपाल की भूमिका भी चर्चा में है। सवाल यह भी है कि 31 मार्च से पहले बजट पास नहीं किया गया तो प्रदेश में आर्थिक संकट गहरा सकता है। अब 26 मार्च को जब सदन की बैठक होगी तो क्या सरकार बिना चर्चा के ही बजट पारित कराएगी? यह सवाल भी चर्चा में है और यह भी कि क्या राज्यपाल जिस सरकार को अल्पमत में मान रहे हैं, उसके पारित बजट पर वे दस्तखत करेंगे? ऐसे में माना यह जा रहा है कि 26 मार्च से पहले ही राज्यपाल कोई एक्शन ले सकते हैं। इसमें विधानसभा के निलंबन की कार्यवाही भी हाे सकती है। ऐसे में सरकार कामचलाऊ ही रह जाएगी लेकिन निलंबित विधानसभा के सदस्य 26 मार्च को राज्यसभा के निर्वाचन में मतदान कर ही सकेंगे। अगले दस दिन मप्र की सियासत का केंद्र एकबार फिर राजभवन और राज्यपाल बनने वाले हैं, इसमें केंंद्र सरकार की भी भूमिका रहेगी। इस बीच कांग्रेस सरकार बचाने के लिए कोर्ट का रुख करेगी, इसकी तैयारियां अंदरखाने चल रही हैं। आज विधानसभा में ये हुआ मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन अभूतपूर्व घटनाक्रम के बीच राज्यपाल के अभिभाषण की औपचारिकता के बाद सदन की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई। राज्यपाल 36 पेज के अभिभाषण के आखिरी दो पैरे की करीब 10 लाइनें ही पढ़ी। उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष को संविधान पालन की सलाह भी दी। राज्यपाल के जाने के बाद विपक्ष ने सरकार को अल्पमत में बताते हुए फ्लोर टेस्ट की मांग की। अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव से कहा कि विपक्ष राज्यपाल से पत्र व्यवहार कर रहा है, उन्हें अथवा विधानसभा सचिवालय को कोई सूचना नहीं दी है। दोनों पक्षों के बीच नोंकझोंक और हंगामे के बीच अध्यक्ष ने कार्यवाही पहले 10 मिनिट के लिए और फिर राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद का प्रस्ताव पेश हुए बिना 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। दोनों पक्षों के बीच जमकर नारेबाजी होने लगी। भाजपा सदस्य स्थगित सदन में बैठ गये, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्य विधानसभा भवन के सेंट्रल हाल में नारेबाजी करने लगे। इससे पहले सुबह 11 बजे वंदेमातरम गान के साथ सत्र का आरंभ हुआ। भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक डा. नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि यह सरकार अल्पमत में है। अध्यक्ष ने कहा कि आप राज्यपाल से पत्राचार कर रहे हैं। इसके बाद अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष राज्यपाल लालजी टंडन की अगवानी के लिए चले गए। राज्यपाल सवा 11 बजे सदन में आए। उन्होने 36 पेज के लिखित अभिभाषण में से आखिरी दो पैरे भर पढ़े। राज्यपाल ने कहा कि उनकी सरकार ने आवासहीन अधिमान्य पत्रकाराें को 25 लाख तक के आवास ऋण पर पांच प्रतिशत ब्याज अनुदान पांच वर्ष तक देने की योजना के क्रियान्वयन का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने पिछले एक वर्ष में प्रदेश के बहुआयामी विकास की कोशिशें तेज की हैं। सरकार ने अपने वचन पत्र के वचनों की पूर्ति के लिए संकल्पित होकर कार्य किया है। साथ ही सरकार ने विजन टू डिलीवरी-2025 रोडमैप बनाकर अगले पांच वर्षों की अपनी प्राथमिकताएं चिन्हित कर उसपर कार्य भी शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि वचन पत्र और रोडमैप पर अमल कर उनकी सरकार प्रदेश की एक नई प्रोफाइल बनाने में सफल होगी। इसके बाद राज्यपाल ने लिखित अभिभाषण से भिन्न अपने वक्तव्य में पक्ष और विपक्ष से संविधान के प्रावधानों का पालन करने और विधानसभा की नियम प्रक्रिया का पालन करने को कहा। इस दौरान सदन में शोर की वजह से न तो उनकी बात और न ही पक्ष-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप ठीक से सुने जा सके। ऐसा मप्र विधानसभा के इतिहास में पहली बार हुआ। इससे पहले मप्र विधानसभा में ऐसे घटनाक्रम जरूर हो चुके हैं जब राज्यपाल ने हंगामे या अस्वस्थता के चलते शुरू और आखिरी के कुछ पैरे ही पढ़े और पूरा अभिभाषण पढ़ा हुआ मान लिया गया, राज्यपाल ने लिखित अभिभाषण से हटकर कोई बात नहीं की। हालांकि इसके बाद कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्ताव भी पेश हुए और उनपर चर्चा का समय अध्यक्ष ने निर्धारित किया। लेकिन आज राज्यपाल टंडन ने आखरी दो पैरे ही पढ़े और उनके जाने के बाद हंगामे के कारण कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्ताव भी पेश नहीं हुआ। राज्यपाल के सदन से जाते ही उनकी विदाई के बाद अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष सदन में लौटे। इसी दौरान नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव राज्यपाल टंडन का मुख्यमंत्री को लिखा पत्र सदन में पढ़ने लगे, सत्ता पक्ष के सदस्य जमकर नारेबाजी करने लगे। इस बीच अध्यक्ष भी कुछ पढ़ने लगे लेकिन शोरशराबे में कुछ नहीं सुना जा सका। अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी, लेकिन शोर में यह भी नहीं सुना जा सका कि कार्यवाही कितनी देर के लिए स्थगित की गई है। करीब 10 मिनट बाद अध्यक्ष आसंदी पर लौटे और सदन समवेत हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा विधायक शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार अल्पमत में है। इसपर सत्ता पक्ष के सदस्य भाजपा के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। कार्यसूची में राज्यपाल के अभिभाषण के बाद कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्ताव पेश होना था लेकिन शोरशराबे के बीच अध्यक्ष प्रजापति ने सदन की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगति कर दी। स्थगित सदन में भी नारेबाजी होती रही। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 March 2020


bhopal,  Crops destroyed by unseasonal rain

डॉ. रमेश ठाकुर बेमौसम की बारिश से किसानों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। बारिश और ओले ने खड़ी फसलों को भारी क्षति पहुंचाई। तेज ओलावृष्टि ने गेहूं, चना, सरसों जैसे सीजन की फसलों को चौपट कर दिया है। इसी सीजन में उगने वाली सब्जियों को भी बारिश ने बर्बाद कर दिया है। बारिश की मार किसी एक प्रदेश नहीं बल्कि देशभर में पड़ी है। जनवरी से लेकर मार्च तक कई बार देश के अलग-अलग हिस्सों में बेमौसम की बारिश और ओले का यह सिलसिला चल रहा है।  बेमौसम की बारिश ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। नौकरीपेशा और व्यवसायी लोगों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। पर, किसान पूरे छह माह अपने खेतों की तरफ ताकता रहता है। फसलों की निगरानी करता है। अच्छी फसल देखकर खुश होता है। बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह, घर-मकान बनाने आदि के जरूरी काम अच्छी पैदावार होने पर ही किसान कर पाता है। पर, अचानक आई कुदरती मार उनके अरमानों पर पानी फेर कर चली जाती है। किसान सिर्फ ताकता रह जाता है। अन्नदाताओं के समझ नहीं आ रहा, जो नुकसान उन्हें हुआ है उसकी भरपाई कैसे कर पाएंगे। किसान फसल उगाने के लिए बैंकों से कर्ज इसी उद्देश्य से लेता है कि फसल कट जाने के बाद उसकी ब्रिकी करके बैंकों से लिया कर्ज चुकता कर देंगे। पर, शायद इसबार ऐसा न कर पाएं। क्योंकि उनकी फसल तो पानी में तबाह हो चुकी है। किसानों का कर्ज में डूबने का एक बड़ा कारण यह भी है। कर्ज के बोझ में दब जाने के बाद किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर होते हैं।  लगातर बदलते मौसम ने किसानों को जितना चिंतित इस समय किया हुआ है, उतना कभी नहीं हुए। सबसे ज्यादा नुकसान गेहूं की फसल को हुआ है। तेज ओलों के कारण गेहूं की फसल जमींदोज हो गईं। बारिश से हुए नुकसान का फिलहाल अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। पर, मोटे तौर पर अनुमान है ये क्षति करोड़ों में होगी। निश्चित है किसानों के लिए अपनी फसलों से लागत निकाल पाना भी अब मुश्किल है। यही कारण है कि नुकसान की भरपाई के लिए किसान राज्यों व केंद्र सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। कई मायनों में उनकी मांग जायज भी है। उनको मुआवजा मिलना भी चाहिए। क्योंकि अन्नदाताओं का खेती के सिवाए कमाई का दूसरा कोई जरिया भी तो नहीं है। इसलिए ऐसी प्राकृतिक आपदा आने पर हुकूमतों को किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए, पीछे नहीं हटना चाहिए। जरूरत और अनुमान के मुताबिक उनके क्षति की भरपाई के लिए मुआवजा देना चाहिए। बहरहाल, मौसम वैज्ञानिक भी बदलते मौसम को देखकर अचंभित हैं। उनकी माने तो कई दशकों बाद ऐसा देखने को मिला है जब बीते दिसंबर, जनवरी और मार्च माह में इस कदर बारिश और ओलावृष्टि हुई। वैज्ञानिक खुद इस बात को मान रहे हैं कि इस बारिश से सबसे ज्यादा नुकसान गेहूं की फसल को हुआ है क्योंकि गेहूं का पौधा मुलायम और कमजोर होता है, वह तेज ओलावृष्टि नहीं झेल पाता। ओलों की मार से गेहूं के पौधे जमीन पर बिछ जाते हैं। गन्ना, दलहन और अरहर जैसी फसलें कुछ हद तक ओलों का सामना कर लेती हैं। पर, गेहूं, चना, सरसों, सब्जियां आदि ओलों की मार नहीं झेल पाती। यूपी के तराई क्षेत्र मेें गेहूं की फसल ज्यादा उगाई जाती है लेकिन तेज ओलों की बौछार ने फसल को पूरी तरह चौपट कर दिया। कमोबेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड का भी यही हाल है। खड़ी फसलों वाले खेतों में पानी भर गया है। पानी भरने से फसलें एकाध दिनों में ही सड़ जाती हैं। उत्तरी क्षेत्रों के मुकाबले पश्चिमी क्षेत्रों के हालात अभी भी बिगड़े हुए हैं। दो राज्यों उत्तर प्रदेश और हिरयाणा में बारिश के अलावा जमकर ओलावृष्टि हुई है। फसलों को नुकसान बारिश से ज्यादा ओलावृष्टि से हुआ है। मैदानी क्षेत्रों के अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में भी इसबार जो बदलाव हुए वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। पहाड़ों पर अब भी बर्फबारी हो रही है। बर्फबारी के अलावा तेज बारिश और ओले भी पड़ रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों की बर्फबारी से निकलने वाली शीतलहर मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों को अब भी सर्दी का एहसास करा रही है। अमूमन होली के आसपास मौसम सुहावना हो जाता है। न सर्दी होती है, न गर्मी। इस मौसम में बारिश और ओले का सवाल ही नहीं। लेकिन, इसबार सबकुछ हो रहा है। उत्तर भारत में इस समय खेतों में गेहूं, सरसों, चना के अलावा मौसमी सब्जियों की अधकची फसलें खड़ी हैं। गेहूं की फसल तकरीबन पकने को है। होली के तुरंत बाद फसल की कटाई शुरू हो जाती है लेकिन, ओले और बारिश की बौछार ने सब चौपट कर दिया। कुदरती आपदाओं के आगे किसी का वश नहीं चलता। तकाजा इस बात का है कि सरकार को आगे आकर अन्नदाताओं के नुकसान की भरपाई करनी चाहिए।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 15 March 2020


bhopal,  Food in the Vedas

हृदयनारायण दीक्षित भोजन सभी जीवों की प्राथमिक आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शरीर की प्राथमिक या ऊपरी परत को अन्नमय कोष कहा गया है। मनुष्य शरीर का निर्माण अन्न से होता है। उपनिषद् वैदिक साहित्य के दर्शन भाग कहे जाते हैं। उपनिषदों में भी अन्न की महिमा है। आधुनिक समाज ने अन्न से बने तमाम खाद्य पदार्थ विकसित किए हैं। इन्हें फास्ट फूट या तुरंता खाद्य कहते हैं। ये काफी दिन तक बिना सड़े उपयोग योग्य बने रहते हैं लेकिन स्वास्थ्यवर्द्धक नहीं हैं। वैदिक काल से लेकर अबतक भोजन के घटकों में बहुत कुछ जोड़ा-घटाया गया है। वैदिक और उत्तर वैदिक काल में माना जाता था कि शुद्ध, सम्यक और पोषक आहार शारीरिक बल के साथ मन और बुद्धि का भी निर्माता है। ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद के रचनाकाल तक भोजन की आदर्श संहिता का विकास हुआ है। पृथ्वी माता है। उपास्य है। भूमि के प्रति कृतज्ञता के अनेक कारण हैं। एक प्रमुख कारण इसका अन्नदायिनी होना भी है। भूमि सूक्त (12.1.42) में कहते हैं “पंचकृष्टया इस भूमि में जौ चावल आदि अन्न प्रचुर मात्रा में होते हैं- यस्मान्नं ब्रीहि यवौ यस्या इमा पंचकृष्टया। निश्चित समय पर पर्जन्य वर्षा करते हैं, उस भूमि को नमस्कार है - नमो अस्तु।” अथर्ववेद में अनेक अन्नों के नाम का उल्लेख है। संभवतः जौ और चावल का उपयोग ज्यादा होता था। एक मंत्र (3.2.18) में कहते हैं “धान और जौ तुम्हारे लिए कल्याणकारी व बलवर्द्धक हों।” अन्न के साथ दूध का आनंद बढ़ जाता है। कहते हैं “धान्य और दूध खीर रूप में पीते हो। हम उसे विषरहित करते हैं।” (वही 19) यहां भोजन की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया गया है। जौ, चावल, उड़द और तिल खाओ। यह तुम्हारी तृप्ति के लिए प्रस्तुत है।” अन्न का संग्रह भी होता था। कहते हैं “हमने विविध प्रकार के अन्न का संग्रह किया है। अग्नि देवता इस संपदा को सुंदर बनाएं।” (6.71.1) अन्न का उपयोग औषधि रूप में भी था। कहते हैं, “जौ की बाल, तिल सहित तिल की मंजरी व अर्जुन की लकड़ी आनुवंशिक रोग नष्ट करे।” (2.8.3) खाद्यान्न ढेर सारे हैं लेकिन मुख्य भोजन के रूप में जौ और चावल की भूमिका है। जान पड़ता है जौ के बिना अथर्ववेद के समाज की भूख नहीं शांत होती। एक मंत्र (7.50.7) में इन्द्र से कहते हैं “हम दरिद्रता से उत्पन्न दुर्मति को गाय आदि पशुधन से दूर करें। जौ से अपनी क्षुधा शांत करें।” जौ से ‘यवाशिर’ बनता था। यह जौ की लप्सी थी। यहां इन्द्र से स्तुति है कि “वे ऋषि के पास आकर गाय दूध व जौ मिलाकर बने यवाशिर का पान करें।” (20.24.7) इस लप्सी में सोमरस भी मिलाते थे। सोमरस युक्त लप्सी में दही मिलाते थे। दही मिलाने से बनी लप्सी के लिए अथर्ववेद (20.69.3) में ‘दध्याशिर’ शब्द प्रयोग हुआ है। दूध, दही और जौ मिले सोमरस के लिए ऋग्वेद (5.27.5) में न्न्याशिर शब्द आया है। अथर्ववेद (18.4.16) में ‘अपूप’ का उल्लेख है। यह उस समय का मालपुआ है। इसे घी मिलाकर बनाया जाता था। ऋग्वेद (10.45.9) में भी अपूप का विवरण है। आर्यों का सर्वाधिक प्रिय पेय था दूध। अथर्ववेद में दूध से बने खाद्य पदार्थ ‘खीरवान’ कहे गए हैं। दही से बने खाद्य पदार्थ दधिवान, अन्न से बने अन्नवान, रस से बने रसवान, शहद या अन्य मधुपदार्थों से बने मधुमान बताए गए हैं। वैद्यों के अनुसार घी और शहद का समिश्रण अच्छा नहीं कहा जाता लेकिन अथर्ववेद (12.3.44) में घी से मिले मधु को देवों व ऋषियों के लिए श्रेष्ठ बताया गया है “हम आदित्य देवों व अंगिरा ऋशियों के लिए घी मिला हुआ मधु अर्पित करते हैं।”दही मंथन भी होता रहा होगा। अथर्ववेद में एक पेय मंथ है। ‘मंथ’ मक्खन या मट्ठा हो सकता है। एक मंत्र (18.4.42) में कहते हैं “मंथन से प्राप्त मंथ, भात अन्न को हम अर्पित करते हैं। यह मधुर और घी से परिपूर्ण है- मधुमंतो घृतश्चुतः।” दूध भात का भी उल्लेख है। (18.2.30) चावल को घी में भूनकर पुरोडास बनता था। (वही 20.2़3.3) अथर्ववेद रचे जाते समय भोजन में विविधता थी लेकिन मीठे पदार्थों का उपयोग ज्यादा दिखाई पड़ता है। मधु इन ऋषियों का प्रिय पदार्थ है और प्रिय भाव भी है। इन्द्र से कहते हैं, “आपके लिए घी मिश्रित सोम है। इस मधुरस को पीकर आप प्रसन्न हों- भवंतु पीतये मधूनि। (20.76.6) ईख का रस मधु-मधुर होता है। एक सुंदर मंत्र (1.34.5) में कहते हैं “सब तरफ से घिरे हुए मीठी ईख के समान परस्पर मीठे और प्रिय रहने के लिए हम आपको प्राप्त हुए हैं।” मधुमय अभिलाषा इन ऋषियों का केन्द्रीय मनस् तत्व है। वे मीठा खाना पसंद करते हैं, मीठा बोलते हैं। संसार को भी माधुर्य गुण से भरना चाहते हैं। यह प्रत्यक्ष भौतिक कर्मठतावाद ही है। गोमांस भक्षण की बातें भी कुछेक लोगों द्वारा कही गई हैं। ऋग्वेद में गाय अघन्या है। अथर्ववेद में यह मान्यता और भी गहराई से है। गाय की हत्या तो दूर की बात है, तब उन्हें क्षति पहुंचाने की बात भी अपराध थी। अथर्ववेद (4.21.3) में कहते है, “तस्कर उन्हें हानि नहीं पहुंचा सकते- न दमाति तस्करो। अस्त्र गायों को क्षति नहीं पहुंचा सकते। आगे कहते हैं “गायों पर आघात न करें।” (वही 4) समाज के सभी वर्ग गो प्रेमी व गोपालक थे। संभवतः समाज के विद्वानों में गोपालन व आदर की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही थी। अथर्ववेद (5.18) में ब्रह्मगवी सूक्त है। ब्रह्मगवी का अर्थ ब्राह्मण की गाय है। कहते हैं, “गाय तिरस्कार योग्य नहीं होती।” (वही 3) बताते हैं, गाय को पीड़ित करने वाले राष्ट्र का तेज मर जाता है। उस राष्ट्र में वीर नहीं होते- तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा” (5.194) ऐसे गोसंवर्द्धक वातावरण में गोमांस भक्षण की बातें काल्पनिक हैं। खाद्यान्नों की अनुभव सिद्ध सूची थी। फल और दूध से बने पदार्थ थे। भोजन के नियम भी विकसित किए गए थे। ऋषि कवि अथर्वा रचित एक सुंदर आध्यात्मिक भौतिक सूक्त (15.14) पठनीय है। इस सूक्त में व्रात्य श्रेष्ठ व्यक्ति या देवता हैं। स्मृतियों में व्रात्य का अर्थ व्रत न मानने वाला है। लेकिन अथर्ववेद में व्रात्य आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न है। अथर्ववेद का पूरा 15वां काण्ड व्रात्य को समर्पित है। इस सूक्त में ‘व्रात्य’ की गति का वर्णन है। बताते हैं “व्रात्य पूर्व दिशा की ओर चला। वायु के अनुकूल चलते हुए उसने अपने मन को अन्न भक्षण करने वाला बनाया जो इस विषय के जानकार हैं वह पूरे मन से अन्न खाते हैं।” (वही 1 व 2) भोजन में मन की महत्ता है। बेमन भोजन उचित नहीं। आगे कहते हैं, “वह दक्षिण दिशा की ओर चला। उसने बल को अन्नाद बनाया। जो यह बात जानते हैं, वह बल सामर्थ्य से अन्न खाते हैं।” (वही 3-4) भोजन में बल ध्यान जरूरी है। फिर कहते हैं, “वह पश्चिम चला। उसने जल को अन्नाद बनाया। जो यह बात जानते हैं, वे अन्न के साथ उचित मात्रा में जल लेते हैं।” (वही 4-5) भोजन में जल रस जरूरी है। भोजन में मन, बल और जल की भूमिका है। यह आधुनिक काल की संतुलित भोजन धारणा से श्रेष्ठ है। भोजन के पोषक तत्व ही महत्वपूर्ण नहीं है। भोजन के समय इधर-उधर का ध्यान व्यर्थ है। अथर्वा ने सप्त ऋषियों, स्वधा, स्वाहा आदि को भी अन्न भक्षण से जोड़ा है। एक मंत्र (वही 9-10) में पृथ्वी को अन्नमयी बनाने का उल्लेख है, “जो यह बात जानते हैं कि वे विराट पृथ्वी की अनुकम्पा से अन्न सेवन करते हैं।” भोजन के समय उत्साह का महत्व भी है “जो यह बात जानते हें वे उत्साहपूर्वक भोजन करते हैं।” (वही 19-20) इस सूक्त में बार-बार भोजन विषयक ज्ञान की बातें दोहराई गई हैं- “जो यह बात जानते हैं” इस सूक्त के प्रत्येक मंत्र की टेक है। अंतिम मंत्र संपूर्ण ज्ञान पर है, “जो इस तथ्य को जानता है, वह ब्रह्म ज्ञान द्वारा अन्न का सेवन करता है।” (वही 24) अन्न विज्ञान की जानकारी जरूरी है। इसके साथ अन्न सेवन की विधि का ज्ञान और भी आवश्यक है। अन्न सेवन के समय के मनोभाव का ज्ञान स्वस्थ रखता है। अथर्ववेद के ऋषियों ने इस विषय के सभी पहलुओं पर विचार किया था। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 15 March 2020


bhopal,  Protect the rights of privacy

सियाराम पांडे शांत निजता का अधिकार एकबार फिर चर्चा में है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ के जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को निर्देश देते हुए कहा कि वह 16 मार्च तक लखनऊ के विभिन्न चौराहों पर लगे सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के पोस्टर हटाए और इसकी जानकारी रजिस्ट्रार को उपलब्ध कराए। न्यायालय ने इसे प्रदर्शनकारियों के निजता के अधिकार का हनन करार दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इस राय में दम है। वैसे भी जबतक कोई दोष सिद्ध नहीं हो जाता, सरकार को सार्वजनिक स्तर पर उसे बेनकाब नहीं करना चाहिए। बेनकाब तो दोष सिद्ध अभियुक्तों को भी नहीं करना चाहिए क्योंकि हर हाल में न्याय पाने का अधिकार इससे प्रभावित होता है। सवाल यह उठता है कि अगर दंगा-फसाद करने वालों के अधिकार मायने रखते हैं तो जनता के अधिकारों की भी तो चिंता की जानी चाहिए। सुरक्षा में लगे पुलिस के जवानों और अधिकारियों की भी चिंता की जानी चाहिए। अदालतों को किसी संवेदनशील मामले का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। इससे समाज को दिशा मिलती है लेकिन जब सरकार अपना दायित्व निभा रही हो, वह अदालत के आदेश और मंशा के अनुरूप दंगाइयों को सबक सिखा रही हो तब इस तरह की प्रतिक्रिया कर वह किसका साथ दे रही है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर सरकार सुस्पष्ट कर चुकी है कि इससे किसी की नागरिकता नहीं जाती बल्कि नागरिकता मिलती है। इसके बाद भी कुछ लोगों का हिंसक आंदोलन समझ से परे है। लखनऊ में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करने वालों के पोस्टर लगाना सही है या नहीं, इसपर सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ को निर्णय लेना है लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट में इसे जिस तरह प्रदर्शनकारियों की निजता के अधिकार का हनन करार दिया, उसने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को बेहद असहज स्थिति में ला दिया है। इससे विपक्ष ही नहीं, आंदोलनकारियों को भी अपना पक्ष सही नजर आने लगा है। पोस्टर हटाने का न्यायालय का आदेश सरकार मान भी ले लेकिन आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस पर फायरिंग करने वालों का मनोबल बढ़ जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय की अवकाशकालीन पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की चुनौती याचिका पर न केवल सुनवाई की बल्कि सरकार से यह भी जानने की कोशिश की कि उसने पोस्टर लगाने का निर्णय किस कानून के तहत लिया? सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक नहीं लगाई लेकिन इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया। आगजनी, तोड़फोड़ और गोलीबारी के आरोपियों की निजता के अधिकारों की चिंता तो समझ आती है लेकिन आम लोगों के शांति से जीने के अधिकारों और उसकी निजता के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी, विचार तो इसपर किया जाना चाहिए। सड़क पर परिवार के साथ निकले आदमी पर हमला हो जाए, उसके वाहन को आग लगा दी जाए या सरकारी संपत्ति को तहस-नहस कर दिया जाए, यह कहां तक उचित है? पहली बार किसी सरकार ने हिंसा करने वालों को वसूली का नोटिस दिया है। सीसीटीवी कैमरे की मदद से उनकी शिनाख्त और सफेदपोशों को बेनकाब करने की कोशिश की गयी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की इस दलील में दम है कि कि विरोध-प्रदर्शन के दौरान बंदूक चलाने वाला और हिंसा में कथित रूप से शामिल होने वाला, निजता के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अंतत: यह माना कि कोर्ट राज्य की चिंता को समझ सकती है लेकिन कानून में हाईकोर्ट का फैसला वापस लेने को लेकर कोई कानून नहीं है। दंगे के आरोपियों के वकीलों ने सर्वोच्च न्यायाालय में अपना पक्ष रखा और कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय से उनके लिए खतरा बढ़ गया है। कोई भी उनके घर में घुसकर या सड़क पर घेरकर उनपर हमले कर सकता है, उनकी हत्या कर सकता है। इन आरोपियों के तर्कों को भी खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन इन लोगों को इसपर भी विचार करना चाहिए कि उस दिन जाम में फंसे आम आदमी पर क्या बीती होगी? सरकारी संपत्ति के नुकसान की तो नोटिस के जरिए अगर वसूली हुई तो फिर भी भरपाई हो जाएगी लेकिन आम आदमी जिनके घर, वाहन, प्रतिष्ठान इस दंगे की भेंट चढ़े, उनकी भरपाई कैसे होगी? हाईकोर्ट की विशेष खंडपीठ ने नौ मार्च को 14 पेज के फैसले में राज्य सरकार की कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार के विपरीत करार दिया था। अदालत ने कहा था कि मौलिक अधिकारों को छीना नहीं जा सकता है। ऐसा कोई भी कानून नहीं है जो उन आरोपियों की निजी सूचनाओं को पोस्टर-बैनर लगाकर सार्वजनिक करने की अनुमति देता है, जिनसे क्षतिपूर्ति ली जानी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सामान्यतया न्यायपालिका में आने पर ही अदालत को हस्तक्षेप का अधिकार होता है। निजता के अधिकार के हनन पर अदालत का हस्तक्षेप करने का अधिकार है। इस आदेश के बाद प्रदेश सरकार ने उच्चस्तरीय मंथन किया और उसने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। उत्तर प्रदेश के एडवोकेट जनरल राघवेन्द्र प्रताप सिंह भी मानते हैं कि पोस्टर में नाम और फोटो छापने को हाईकोर्ट का निजता के अधिकार का हनन बताया जाना ठीक नहीं है क्योंकि यह मामला निजता के अधिकार के तहत नहीं आता। यहां जो चीजें पहले से सार्वजनिक हैं उन पर निजता का अधिकार नहीं लागू होता। इस मामले में पहले से सारी चीजें सार्वजनिक हैं। दूसरा आधार अपील में मामले को जनहित याचिका बनाए जाने को लेकर है। यह मामला जनहित याचिका का नहीं माना जा सकता क्योंकि जनहित याचिका की अवधारणा उन लोगों के लिए है जो किसी कारणवश कोर्ट नहीं आ सकते। उनकी ओर से जनहित याचिका दाखिल की जा सकती है या फिर जिन मामलों में आबादी का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो रहा हो, उसमें जनहित याचिका हो सकती है लेकिन मौजूदा मामला ऐसा नहीं है। मौजूदा मामले में प्रभावित लोग कोर्ट जा सकते हैं और रिकवरी नोटिस के खिलाफ कुछ लोग कोर्ट गए भी हैं, ऐसे में इस मामले को जनहित याचिका के तहत नहीं सुना जाना चाहिए। दिसंबर 2019 में लखनऊ में सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इसमें कथित रूप से शामिल रहे 57 लोगों के नाम और पते के साथ शहर के सभी प्रमुख चौराहों पर कुल 100 होर्डिंग्स लगाए गए हैं। सभी लोग लखनऊ के हसनगंज, हजरतगंज, कैसरबाग और ठाकुरगंज थाना क्षेत्र के हैं। प्रशासन ने पहले ही 1.55 करोड़ रुपये की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए इन सभी लोगों को वसूली के लिए नोटिस जारी कर रखे हैं। देखना यह होगा कि सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ इसपर क्या निर्णय लेती है? लेकिन उसका निर्णय एक नए युग की शुरुआत जरूर करेगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 14 March 2020


bhopal, Oil becomes cheaper due to corona effect

प्रमोद भार्गव कोरोना वायरस ने जहां पूरी दुनिया में मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है, वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाने लगी है। बाजारों में क्रय-विक्रय थमने से भारत समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों के हाल बेहाल हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर पड़ा है। मोटरकारों के पाहियों में ब्रेक लग जाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की मांग घट गई है। नतीजतन कच्चा तेल घटकर प्रति बैरल 2212 रुपए रह गया है। एक बैरल में 159 लीटर तेल होता है। इस हिसाब से केंद्र और राज्य सरकारों के कर जोड़कर प्रति लीटर 17-18 रुपए प्रति लीटर डीजल-पेट्रोल के भाव बैठते हैं, जो पानी की किसी ब्रांडेड बोतल के भाव से भी कम है। चीन में कोरोना कोविड-19 की दिसंबर-2019 में जब शुरूआत हुई तो अंदाजा लगाया गया था कि इसका असर चीन में ही दिखाई देगा लेकिन इस सूक्ष्म-जीव ने देखते-देखते दुनिया की अर्थव्यवस्था ध्वस्त कर दी। इसी असर के चलते सऊदी अरब ने रूस के साथ कच्चे तेल के उत्पादन संबंधी समझौते को तोड़कर तेल के क्षेत्र में प्राइस-वार शुरू कर दिया है। दरअसल सऊदी अरब पहले कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए उत्पादन कम करना चाहता था परंतु अमेरिका द्वारा चीन को तेल की आपूर्ति की घोषणा के बाद सऊदी अरब ने उत्पादन बढ़ाकर तेल के उत्पादक देशों को चकित कर दिया है। तेल के खेल को नया रंग दे दिए जाने के से ही प्राइस-वार छिड़ने की उम्मीद है। पूरी दुनिया में कच्चा तेल वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की गतिशीलता का कारक माना जाता है। यदि तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है तो इसका प्रत्यक्ष कारण है कि दुनिया में औद्योगिक उत्पादों की मांग घटी है। इस मांग का घटना संकेत है कि विश्व पर मंदी की छाया मंडरा रही है। दुनिया का एक तिहाई तेल उत्पादन करने वाले ओपेक देशों के समूह में खलबली है क्योंकि इन देशों की कमाई घटती जा रही है। इस कारण इन देशों के नागरिक औद्योगिक-प्रौद्योगिकी उत्पाद खरीदने की ताकत खो रहे हैं। भारत 80 प्रतिशत कच्चा तेल अरब देशों से आयात करता है। तेल की कीमतें घटना उपभोक्ता के लिए अच्छी बात तब है जब भारतीय तेल कंपनियां कच्चे तेल की घटी कीमतों के अनुपात में ईंधनों के दाम घटा दें। किंतु कंपनियों का अर्थशास्त्र भारत सरकार की इच्छा के अनुसार चलता है। सरकार कीमतें इसलिए नहीं घटाती क्योंकि इसकी बिक्री से उसे बड़ा लाभ होता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार भी तेल की कीमतों को प्रभावित करता है। कंपनियों को कच्चे तेल को रिफाइनरियों से एक प्रक्रिया से गुजारने के बाद यह तेल उपयोग में लाए जाने वाले डीजल-पेट्रोल और केरोसिन में तब्दील होता है। इस प्रक्रिया में 40 से 45 दिन लगते हैं। इस तैयार तेल के मूल्य और कच्चे तेल की कीमत में जो अंतर होता है, उसे क्रेक कहते हैं। डाॅलर और रुपए के अंतर से भी तेल की कीमतें प्रभावित होती हैं। क्योंकि ईरान को छोड़कर अन्य देशों से भारत जो तेल खरीदता है, उसका मूल्य डाॅलर में चुकाना पड़ता है। कच्चे तेल की गिरती कीमतों के लिए किसी एक कारक या कारण को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। एक वक्त था जब कच्चे तेल की कीमतें मांग और आपूर्ति से निर्धारित होती थीं। इसमें भी अहम भूमिका ओपेक देशों की रहती थी। ओपेक देशों में कतर, लीबिया, सऊदी अरब, अल्जीरिया, ईरान, ईराक, इंडोनेशिया, कुवैत, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात और अंगोला शामिल हैं। दरअसल अमेरिका का तेल आयातक से निर्यातक देश बन जाना, चीन की विकास दर धीमी हो जाना, शैल गैस क्रांति नई तकनीक तेल उत्पादक देशों द्वारा सीमा से ज्यादा उत्पादन, ऊर्जा दक्ष वाहनों का विकास और इन सबसे आगे बैटरी तकनीक से चलने वाले वाहनों का विकास हो जाने से कच्चे तेल की कीमतें तय करने में तेल निर्यातक देशों की भूमिका नगण्य होती जा रही है। भारत जिस तेजी से सौर ऊर्जा और पराली (धान के डंठल) से एथनाॅल बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसके चलते कुछ सालों में हर प्रकार के ईंधन के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर हो जाएगा। इसके लिए राजस्थान के बाड़मेर में 43 हजार करोड़ रुपए की लागत से रिफाइनरी के निर्माण में लगा है। इस आधुनिकतम रिफाइनरी में 90 लाख मैट्रिक टन पेट्रो केमिकल बनाने की क्षमता होगी। इसी के साथ-साथ 12 ऐसे संयंत्र तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें पराली से एथनाॅल बनाया जाएगा। एथनाॅल और बायो फ्यूल के उपयोग को बढ़ावा देकर यह उम्मीद की जा रही है कि भारत में तेल के आयात की मात्रा बहुत कम हो जाएगी। दो-तीन साल के भीतर इन संयंत्रों के तैयार होने की उम्मीद है। इनके शुरू होने के बाद पराली खेतों में जलाए जाने से जो प्रदूषण वायुमंडल में फैलता है, उसमें कमी आएगी। साथ ही, पराली के बिकने का सिलसिला शुरू होगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। इस लिहाज से पराली को ईंधन में बदलने के उपाय देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। तेल के तिलिस्म में कूटनीति भी काम कर रही है। रूस ने तुर्की पर इस्लामिक स्टेट ऑफ सीरिया एंड ईराक के साथ मिलकर तेल का व्यापार करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। हालांकि तुर्की इससे इनकार कर रहा है। तेल की गिरती कीमतों के लिए मंद पड़ी अन्य आर्थिक गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। एक तरफ शैल गैस के उत्पादन से अमेरिका तेल निर्यातक देश बन गया है। वहीं सऊदी अरब और कुछ अन्य खाड़ी देश अपनी जरूरत और वैश्विक मांग के साथ कूटनीति के लिए भी तेल का खेल, खेलते रहते हैं। तेल को इसी कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए सऊदी अरब ने रूस के साथ कच्चे तेल की संधि तोड़ दी है। अमेरिका ने तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की दृष्टि से ही चीन को तेल बेचने की घोषणा कर दी है। अमेरिका इस तेल को सस्ती दरों में चीन को नहीं बेच पाए, इस कूटनीति के चलते ही तेल का उत्पादन बढ़ा दिया है। इन वजहों से ही लग रहा है कि तेल को लेकर प्राइस-वार शुरू होने जा रहा है। दरअसल कच्चे तेल की गोता लगाती कीमतों का एक कारण अमेरिका और रूस के बीच जारी शह-मात का खेल भी है। यूक्रेन मामले में रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध के चलते रूसी अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है। उसकी मुद्रा रूबल लगातार कमजोर हो रही है और यूरोप की अर्थव्यस्था भी संतोषप्रद नहीं है। ब्राजील बीते 100 सालों में अर्थव्यस्था की सबसे गंभीर अवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसीलिए वैश्विक स्तर पर दुनिया के देशों का आर्थिक मूल्याकंन करने वाली संस्थाएं आशंका जता रही हैं कि 2020-2021 में हालात और बदतर होने जा रहे हैं। ऐसे में वह तेल ही है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को कोरोना संकट के बावजूद न केवल स्थिर बनाए हुए है बल्कि विकास दर को भी बढ़ाने का काम कर रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 March 2020


bhopal,  Understand your rights, consumers

योगेश कुमार गोयल उपभोक्ताओं के विभिन्न हितों और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए दुनियाभर में प्रतिवर्ष 15 मार्च को ‘विश्व उपभोक्ता संरक्षण दिवस’ मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उनके हितों के लिए बनाए गए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियमों तथा उनके अंतर्गत आने वाले कानूनों की जानकारी देना है। इस दिवस को मनाए जाने की नींव सही मायनों में 15 मार्च 1962 को उसी दिन पड़ गई थी, जब अमेरिकी कांग्रेस में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने उपभोक्ता अधिकारों को लेकर शानदार भाषण दिया था। वे विश्व के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने भाषण में औपचारिक रूप से उपभोक्ता अधिकारों को रेखांकित किया था। उनके उसी ऐतिहासिक भाषण के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 15 मार्च को ही विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया। ‘विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस’ सबसे पहले 15 मार्च 1983 को मनाया गया था, जिसके बाद से यह एक महत्वपूर्ण अवसर बन गया। यह दिवस उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों की महत्वपूर्ण जानकारी देना और उन्हें जालसाजी या धोखाधड़ी से बचाना है। उपभोक्ताओं को नहीं अधिकार का ज्ञान भारत सहित दुनियाभर में 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। भारत में उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों से परिचित कराने के लिए प्रतिवर्ष 24 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस’ भी मनाया जाता है। दरअसल 24 दिसम्बर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर संसद में उपभोक्ताओं के अधिकारों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य सहित संयुक्त मार्गदर्शी सिद्धांतों के आधार पर ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986’ पारित किया गया था। वैसे विडम्बना यह है कि देश में प्रतिवर्ष 24 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस’ तथा 15 मार्च को ‘विश्व उपभोक्ता दिवस’ मनाए जाने के बावजूद अधिकांश उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है। इसके लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाने की दरकार है। बाजार में उपभोक्ताओं का शोषण होना कोई नई बात नहीं है बल्कि उपभोक्ताओं के शोषण की जड़ें आज बहुत गहरी हो चुकी हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस हो या विश्व उपभोक्ता दिवस, इन दिवसों को मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें। उपभोक्ता अदालतों में लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना आसानी से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यही नहीं, उपभोक्ता अदालतों में किसी प्रकार के अदालती शुल्क की आवश्यकता नहीं पड़ती है और मामलों का निपटारा भी शीघ्र होता है। उपभोक्ता हितों के संरक्षण के लिए इस समय देशभर में 500 से भी अधिक जिला उपभोक्ता फोरम हैं। देशभर में समस्त राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में राज्य उपभोक्ता आयोग हैं, जबकि राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग नई दिल्ली में है। उपभोक्ता व उनके अधिकार सवाल यह है कि उपभोक्ता कौन है? उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट किया गया है कि हर वो व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है। ऐसे में किसी प्रकार के शोषण या उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। आप उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 14 में स्पष्ट किया गया है कि यदि मामले की सुनवाई के दौरान यह साबित हो जाता है कि वस्तु अथवा सेवा किसी भी प्रकार से दोषपूर्ण है तो उपभोक्ता मंच द्वारा विक्रेता, सेवादाता अथवा निर्माता को आदेश दिया जा सकता है कि वह खराब वस्तु को बदले और उसके बदले दूसरी वस्तु दे तथा क्षतिपूर्ति का भी भुगतान करे या फिर ब्याज सहित पूरी कीमत वापस करे। कहां करें शिकायत शिकायत उसी उपभोक्ता अदालत अथवा फोरम में करें, जहां उसका अधिकार क्षेत्र बनता हो। सामान्यतः वस्तु अथवा सेवा की कीमत व हर्जाने सहित 20 लाख रुपये तक के क्षतिपूर्ति मामलों की शिकायत जिला उपभोक्ता फोरम में, 20 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के मामलों की शिकायत राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग में तथा 1 करोड़ से ऊपर के मामलों की शिकायत राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग में की जा सकती है। यदि कोई भी पक्ष जिला उपभोक्ता फोरम के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वह राज्य आयोग में अपील कर सकता है। राज्य आयोग के फैसले से संतुष्ट नहीं होने की स्थिति में राष्ट्रीय आयोग और राष्ट्रीय आयोग के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम व सर्वमान्य होता है। कैसे करें शिकायत उपभोक्ता फोरम, आयोग या उसके अध्यक्ष को सम्बोधित करते हुए कोई भी शिकायत एक सादे कागज पर लिखकर की जा सकती है। शिकायत में आपको यह बताना है कि आपने कब, क्या और कहां से कोई वस्तु अथवा सेवा ली और उक्त वस्तु या सेवा के बदले आपने क्या भुगतान किया तथा विक्रेता या सेवादाता ने वस्तु या सेवा के प्रति आपको क्या विश्वास दिलाया और किस कारण वह आपके विश्वास पर खरी नहीं उतरी, उससे आपको क्या क्षति हुई, क्या खरीदी गई वस्तु गारंटी अथवा वारंटी पीरियड में है? अपनी शिकायत में अपना नाम व पता लिखने के साथ घटना का विवरण तथा उस व्यक्ति अथवा फर्म का नाम व पता भी लिखें, जिसके खिलाफ आप शिकायत दर्ज करा रहे हैं तथा यह भी बताएं कि आप इस मामले में क्या चाहते हैं? अपनी शिकायत के साथ प्रमाण के तौर पर खरीदी गई वस्तु या सेवा के बिल अथवा रसीद की प्रति, गारंटी/वारंटी कार्ड की प्रति, यदि शिकायत की गई है तो उसकी प्रति, यदि किसी कम्पनी के दावे पर उसका वह उत्पाद खरा नहीं उतरा तो कम्पनी के विज्ञापन की प्रति अवश्य संलग्न करें। शिकायत दर्ज कराने पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता। अपनी शिकायत व्यक्तिगत अथवा डाक द्वारा भी उपभोक्ता फोरम को भेज सकते हैं। यही नहीं, एक जैसी शिकायत होने पर एक से अधिक उपभोक्ता सामूहिक शिकायत भी कर सकते हैं और शिकायत में एक से अधिक प्रतिवादी भी बनाए जा सकते हैं। सामान्यतः मामलों का निवारण तीन से पांच माह के भीतर हो जाता है। अधिकांश जिला उपभोक्ता फोरम जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में ही लगते हैं और जिला न्यायाधीश ही अधिकांश जिला फोरम के पदेन अध्यक्ष होते हैं। उपभोक्ता अदालत के निर्देश की अवहेलना करने पर ऐसे व्यक्ति को तीन वर्ष की कैद या 10 हजार रुपये जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं। इस संबंध में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 में प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी उपभोक्ता मंच अथवा आयोग के आदेशों का अनुपालन नहीं करता है तो उसे कम-से-कम एक माह और अधिकतम 3 वर्ष का कारावास तथा कम-से-कम 2 हजार रुपये से लेकर अधिकतम 10 हजार रुपये तक जुर्माने का दंड दिया जा सकता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 14 March 2020


bhopal,Breaking Congress and shattering family

प्रभुनाथ शुक्ल राजनीति में महत्वाकाक्षाएं अहम होती हैं। दलीय प्रतिबद्धता, राजनैतिक शुचिता और नैतिकता का कोई स्थान नहीं होता। समय के साथ जो पाला बदलकर गोट फिट कर ले वही बड़ा खिलाड़ी है। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ से जो पटकथा लिखी गई है, उसके लिए कांग्रेस खुद जिम्मेदार है। मध्य प्रदेश की राजनीति में सिंधिया घराने का अपना प्रभाव है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2018 के चुनाव के दौरान अच्छी मेहनत की, जिससे कांग्रेस राज्य में 15 साल बाद सत्ता में लौट पाई। लेकिन आपसी गुटबाजी की वजह से सिंधिया समेत 22 से अधिक विधायकों के त्यागपत्र के बाद मध्य प्रदेश सरकार अल्पमत में आ गई। कमलनाथ सरकार को अब कोई करिश्मा ही बचा सकता है। भाजपा ने अपने सभी विधायकों को मध्य प्रदेश से बाहर भेज दिया है। इस राजनीतिक उलटफेर के बाद सारा फैसला विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल पर आ टिका है। जिसमें विस अध्यक्ष बड़ी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। विधायकों के त्यागपत्र को नामंजूर भी कर सकते हैं। वह उन्हें बुलाकर सीधे बात कर सकते हैं या फिर पुनः त्यागपत्र मांग सकते हैं। फिलहाल यह तो संवैधानिक संकट है। लेकिन इस घटना से यह साबित हो गया है कि कांग्रेस में 10 जनपथ निर्णायक भूमिका में नहीं रहा। युवा नेताओं पर गांधी परिवार की पकड़ ढीली पड़ गई है। कांग्रेस में अब निर्णायक भूमिका वाले नेतृत्व की आवश्यकता है, जिसमें इंदिरा गांधी जैसी निर्णय क्षमता हो। उनकी राजनैतिक कुशलता और मुखर नेतृत्व पार्टी के आतंरिक विरोधियों और गुटबाजों पर हमेशा भारी पड़ी। लेकिन सोनिया गांधी और बेटे राहुल में यह कार्यशैली नहीं दिखती है। जबकि प्रियंका को सोनिया गांधी जाने क्यों राष्ट्रीय स्तर पर लाना नहीं चाहती हैं। मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार का भविष्य फिलहाल सुरक्षित नहीं है। सिंधिया पूरी राजनैतिक तैयारी और पैंतरेबाजी से बगावत के मैदान में उतरे हैं। जिसकी कीमत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और कमलनाथ सरकार को चुकानी पड़ेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ जिस तरह की साजिश रची उसका खामियाजा पूरी कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा। मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने या फिर त्यागपत्र देने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं है। राज्य का राजनैतिक संकट सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच सकता है। सिंधिया को फिलहाल राज्यसभा भेजकर केंद्रीय मंत्री का तोहफा मिल सकता है। राज्य में बनने वाली नई सरकार में उनके करीबियों को मंत्रीपद का तोहफा भी मिलेगा। निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है। क्योंकि ग्वालियर, गुना, झांसी और दूसरे जिलों में राजघराने की अच्छी पकड़ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया की मेहनत की वजह से मालवा क्षे़त्र से कांग्रेस की कई सींटे निकली। राज्य में कांग्रेस की वापसी में सिंधिया ने अहम भूमिका निभाई थी। कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। पहली कुर्बानी तो उसे सरकार गंवाकर चुकानी पड़ेगी। दूसरा नुकसान पार्टी का विभाजन हुआ है। तीसरी बात मलावा क्षेत्र में कांग्रेस का भारी नुकसान होगा जहां सिंधिया परिवार की चलती है। वहां की जनता राजपरिवार का बेहद सम्मान करती है। मध्य प्रदेश की राजनैतिक इतिहास में होली का दिन विशेष है। क्योंकि कांग्रेस में विभाजन की आधारशिला उस दिन रखी गई जिस दिन माधवराव सिंधिया की 75 वीं जयंती थी। जिससे यह साबित होता है कि राज्य में विभाजन की पटकथा एक सोची समझी रणनीति थी। गांधी परिवार कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र नहीं स्थापित कर सका है। युवा नेताओं पर भरोसा जताने के बजाय बुजुर्ग पीढ़ी पर भरोसा जताया गया। जिसका नतीजा रहा कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री की कमान सौंपने के बजाय सत्ता से दूर रखा गया। जबकि राहुल गांधी युवाओं को नेतृत्व सौंपने की बात करते हैं। लेकिन पार्टी के भीतर खुद युवाओं की उपेक्षा की जाती रही। कांग्रेस में गांधी परिवार की कमान कमजोर पड़ती जा रही है। कांग्रेस में आतंरिक लोकतंत्र खत्म हो चला है। क्या सोनिया गांधी जानबूझकर कांग्रेस की कमान किसी युवा नेतृत्व के हाथ नहीं सौंपना चाहती हैं? ऐसा करने से पार्टी पर गांधी परिवार की पकड़ कमजोर पड़ने का डर सता रहा होगा। यही वजह है कि कांग्रेस एक अदद अध्यक्ष की तलाश नहीं कर पाई है। पार्टी में युवाओं को अहमियत नहीं दी जा रही है। कहा जाता है कि नेताओं को आलाकमान से मिलने का समय नहीं मिलता। निश्चित रूप से कांग्रेस और सोनिया गांधी को ज्योतिरादित्य की नाराजगी दूर करनी चाहिए थी। उन्हें राज्यसभा या प्रदेश अध्यक्ष का पद देेकर इस संकट को टाला जा सकता था। बिखरती पार्टी को संभालने के लिए युवा नेताओं की नाराजगी को दूर करना चाहिये था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 March 2020


bhopal,  Then the old cloud in the field

अमरीक   पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल देश के सबसे अनुभवी और बुजुर्ग सियासतदानों में शुमार हैं। उम्र की जीवन संध्या में हैं, सेहत साथ नहीं दे रही। सालभर से अपने फार्म हाउस की आरामगाह तक सिमटे बादल बहुत जरूरी होने पर ही बाहर निकलते थे। स्वाभाविक है कि 90 साल से ज्यादा की देह अब आराम मांगती है। उनकी सरपरस्ती वाला शिरोमणि अकाली दल 100वें साल में है। सुखबीर सिंह बादल उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने की कवायद के साथ दल के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद हैं। बहू और सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल, केंद्रीय काबीना में मंत्री हैं। इसके बावजूद प्रकाश सिंह बादल को एकबारगी फिर सियासी अखाड़े में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।   बेशक आवाज में पहले सरीखा दमखम नहीं रहा और चाल भी यदा-कदा लड़खड़ाने लगती है लेकिन बादल इन दिनों अपने तईं गरजने-बरसने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। इस सबके पीछे महज राजनीति का शाश्वत नशा नहीं है। परिवार की राजनैतिक विरासत तथा पुत्र का भविष्य बचाने-बनाने की लाचारी भरी कोशिश है। 2011 तक सिखों की सबसे बड़ी राजनीतिक जमात शिरोमणि अकाली दल की मुख्य पहचान प्रकाश सिंह बादल थे। पार्टी में उन्हें सर्वमान्य अभिभावक की हैसियत का मान हासिल था। 2011 के बाद उन्होंने सोची-समझी रणनीति के तहत सुखबीर सिंह बादल को आगे किया। इससे पहले सुखबीर से अधिक परिपक्व एवं अनुभवी माने जाने वाले अपने भतीजे मनप्रीत सिंह बादल को बाकायदा हाशिए पर लाना शुरू किया। इस बात को सिरे से विस्मृत कर दिया कि उन्होंने कभी मनप्रीत को अपना राजनीतिक वारिस घोषित किया था। घाघ राजनीतिज्ञ प्रकाश सिंह बादल ने ऐसे हालात बनाए कि मनप्रीत सिंह बादल खुद-ब-खुद शिरोमणि अकाली दल से अलहदा हो गए। इसी के साथ सुखबीर सिंह बादल और उनकी मंडली मजबूत होती चली गई। इतनी मजबूत कि शिरोमणि अकाली दल को कभी सत्ता दिलाने वाले बड़े बादल के दशकों पुराने संगी-साथी कमजोर हो गए अथवा उपेक्षा की सजा भुगतने लगे। रफ्ता-रफ्ता शिरोमणि अकाली दल प्रकाश सिंह बादल का न रहकर सुखबीर सिंह बादल का हो गया। यहां तक कि कई बार सुखबीर के आगे प्रकाश सिंह बादल की बेबसी भी जाहिर हुई। उनकी स्थिति ठीक वैसी हो चली थी जैसी कभी उनके 'पगड़ी बदल भाई' हरियाणा के देवीलाल की अपने बड़े बेटे ओमप्रकाश चौटाला की मनमर्जियों के चलते हो गई थी।   वैसे, बहुत कम लोग जानते हैं कि सुखबीर सिंह बादल ने राजनीति के बहुत सारे सबक चौटाला परिवार से सीखे हैं। उनकी कामकाजी शैली पर ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला का खासा प्रभाव है। बीते विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी शिरोमणि अकाली दल 'प्रधान' सुखबीर सिंह बादल ने कोई खास सबक नहीं लिया। न उनके तेवर बदले न रवैया। पार्टी के उन खांटी नेताओं को सुखबीर-मजीठिया की जोड़ी के आगे सरेआम अपमानित होना पड़ा, जिन्होंने छोटे बादल को हार के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इस्तीफा मांगा। बड़े बादल खामोश बने रहे। अंततः शिरोमणि अकाली दल में बगावत का शुरू हुआ सिलसिला आजतक जारी है। प्रकाश सिंह बादल के साथ सदैव कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले दिग्गज अकाली नेता राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींडसा और उनके बेटे (विधानसभा में शिरोमणि अकाली दल विधायक दल के नेता) पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा ने भी सुखबीर सिंह बादल का मुखर विरोध करते हुए अपने मातृदल को अलविदा कह दिया। ढींडसा परिवार की बगावत गुल खिलाने लगी और बागियों की तादाद में इजाफे से शिरोमणि अकाली दल साफतौर पर भोथरा होता दिखने लगा।   इससे सुखबीर मंडली पर तो कोई विशेष असर नहीं पड़ा लेकिन लंबा तजुर्बा रखने वाले प्रकाश सिंह बादल को आरामकुर्सी से उठने को मजबूर कर दिया। सो अब वह ढींडसा सरीखे अपने पुराने सिपहसालारों के खिलाफ तूफानी रैलियां कर रहे हैं। यकीनन बड़े बादल बड़ी बगावत के दूरगामी असर से बखूबी वाकिफ हैं। इसके बाद भी यह सिलसिला न थमा तो बादल घराने के सियासी वजूद के लिए बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। प्रकाश सिंह बादल जैसे-तैसे फिर से सक्रिय हो गए हैं लेकिन शिरोमणि अकाली दल में सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ बगावत जारी है। 12 मार्च को बड़े बादल के एक और अति भरोसेमंद लुधियाना के गरचा परिवार ने बगावत की राह अख्तियार करते हुए ढींडसा के टकसाली अकाली दल का दामन थाम लिया। इस ताजा बगावत का ठीकरा भी सुखबीर सिंह बादल के सिर फूटा है। संकेत साफ हैं कि प्रकाश सिंह बादल की ताजा सक्रियता हाल-फिलहाल वैसी कारगर नहीं साबित हो रही, जैसी उन्हें उम्मीद है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 March 2020


bhopal, Jyotiraditya Scindia to leave Congress

वीरेन्द्र सिंह परिहार   मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी आखिरकार कांग्रेस पार्टी छोड़नी पड़ी। वस्तुतः इसके बीज 2018 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ही पड़ गए थे जब युवा सिंधिया को किनारे कर बुजुर्ग कमलनाथ को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। जबकि प्रदेश में सत्ता की दहलीज तक लाने में सिंधिया की भूमिका अहम थी। फिर भी कांग्रेस यह कहकर कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने का बचाव कर सकती है कि कांग्रेस विधायक दल में कमलनाथ का बहुमत था।   गुटों में बंटी कांग्रेस में कमलनाथ और दिग्विजय गुट के एक होने से सिंधिया अकेले रह गए थे। परन्तु सबसे बड़ा सत्य यही है कि कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री का चयन सदैव परिवार ही करता रहा है। मुख्यमंत्री न बनाए जाने के बावजूद सिंधिया ने इसे कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनाया। वह इस बात का इंतजार करते रहे कि उन्हें कम-से-कम प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया जाए लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह बराबर इस बात का प्रयास करते रहे कि सिंधिया को किसी भी कीमत पर प्रदेशाध्यक्ष न बनाया जाए। कमलनाथ जहां इस प्रयास में थे कि कोई उनका समर्थक ही प्रदेश अध्यक्ष बने तो दिग्विजय सिंह की कोशिश यह रही कि कम-से-कम सिंधिया या उनके किसी समर्थक को किसी भी कीमत पर प्रदेशाध्यक्ष न बनाया जाए। यद्यपि सोनिया, राहुल, कमलनाथ से लेकर दिग्विजय सिंह तक को पता था कि सिंधिया की नाराजगी कांग्रेस पार्टी को भारी पड़ सकती है और प्रदेश की कांग्रेस सरकार भी जा सकती है। जैसा कि अक्सर देखने को मिलता है कि कई मामलों में कांग्रेस अनिर्णय की स्थिति में रही, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। असम में हेमंत विश्‍व शर्मा और उत्तराखंड में विजय बहुगुणा ने इसी के चलते कांग्रेस पार्टी छोड़ी।   सिंधिया को प्रदेश में वैसे ही भूमिका मिलनी चाहिए थी जैसे राजस्थान में सचिन पायलट को मिली। कहने का तात्पर्य यह कि राजस्थान में अशोक गहलोत के साथ सचिन पायलट भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे। ऐसी स्थिति में गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने पर पायलट को सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष पद ही नहीं बरकरार रखा गया बल्कि उन्हें उपमुख्यमंत्री भी बनाया गया। पर सिंधिया के साथ मध्य प्रदेश में बिल्कुल अलग किस्म का व्यवहार किया गया। यह बात अलग है कि जैसी खबरें मिल रही है कि पायलट भी संतुष्ट नहीं हैं। हद तो तब हुई जब सिंधिया को राज्यसभा भेजे जाने पर भी तरह-तरह के किन्तु-परन्तु होते रहे। जबकि प्रतिभाशाली और अच्छे वक्ता होने के चलते सिंधिया की संसद में विशेष भूमिका हो सकती थी। आगे का घटनाक्रम यह है कि सिंधिया भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के हाथों भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं। इसी के साथ उनके 22 समर्थक विधायक विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा भेज चुके हैं। दूसरी तरफ भाजपा अपने वायदे के मुताबिक सिंधिया को मध्य प्रदेश से राज्यसभा का उम्मीदवार भी घोषित कर चुकी है। ऐसी खबरें हैं कि उन्हें केन्द्र में कैबिनेट मंत्री भी बनाया जायेगा। घटनाक्रमों के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार की विदाई तय है, समय भले जो लगे। यद्यपि कमलनाथ और कांग्रेस पार्टी अपनी सरकार बचाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। पर वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका कोई खास नतीजा मिलने वाला है नहीं।   लोगों की समझ में एक बात नहीं आई कि समय रहते कांग्रेस पार्टी ने सिंधिया को संतुष्‍ट क्यों नहीं किया? शायद कांग्रेस पार्टी को लगा हो कि सिंधिया समर्थक मंत्री और विधायक इतनी दूर तक सिंधिया के साथ नहीं जाएंगे कि अपना मंत्री और विधायक पद भी दांव पर लगाने को तैयार हो जाएंगे। इससे पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी में दूरगामी सोच और परिस्थितियों के मूल्यांकन की कितनी कमी है।   एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी कि कांग्रेस पार्टी पर आरोप भी लगाया जाता रहा है कि वह अपने ऊर्जावान नेताओं की उपेक्षा करती है। वह नेतृत्व की दूसरी पात नहीं खड़ी होने देती। निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी के इन नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया को पहले स्थान पर रखा जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि ऐसा इसलिए किया जाता है कि ताकि राहुल गांधी को किसी किस्म की चुनौती न मिल सके। इसी का नतीजा है कि कांग्रेस पार्टी के तमाम जगहों पर बूढ़े और थके हुए नेता काबिज हैं।   यह कांग्रेस पार्टी का लम्बे समय से इतिहास रहा है। इंदिरा गांधी भी कांग्रेस पार्टी में उदीयमान और ऊर्जावान ही नहीं, वरन जनाधार युक्त नेताओं को सहन नहीं कर पाती थीं। हद यह थी कि ईमानदार छवि भी उनके लिए समस्या थी। कर्नाटक में देवराज अर्स और उतर प्रदेश से वीपी सिंह मुख्यमंत्री पद से हटाए गए। स्थिति तो यहां तक थी कि कांग्रेस पार्टी में लम्बे समय तक किसी को मुख्यमंत्री एवं महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रहने दिया जाता था। 1985 में दुबारा अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री न बनाकर उन्हें पंजाब का गर्वनर बनाकर भेज दिया गया। इसी मनोवृति के चलते कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार के लिए आरक्षित है।   दूसरी तरफ भाजपा है जिसमें युवा नेतृत्व को महत्व भर नहीं दिया जाता बल्कि उसे उभारा भी जाता है। भाजपा के कई मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष युवा चेहरे हैं। वस्तुतः कैडर आधारित पार्टी की यही विशेषता है कि उसमें नेतृत्व उभारा जाता है, जबकि वंशवाद आधारित पार्टी में नेतृत्व दबाया या किनारे किया जाता है। वस्तुतः ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे का भी यही मायने है कि नेतृत्व क्षमता होते हुए भी उन्हें दबाने की कोशिश की गई। निश्चित रूप से इसका असर दूसरी जगहों पर भी आगे देखने को मिल सकता है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 March 2020


bhopal, Infinite expansion of corona microbe

प्रमोद भार्गव   ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता‘ की तर्ज पर सूक्ष्म-जीव कोरोना का दुनिया में अनंत विस्तार होता जा रहा है। अमेरिका समेत 100 देशों की मानव आबादी में कोरोना विषाणु ने अपना असर छोड़ दिया है। हजारों लोग मर चुके हैं और 1 लाख से भी ज्यादा लोग संक्रमित हैं। चीन में नोबेल कोरोना नाम के जिस वायरस ने हल्ला मचाया है, उसे चीन के महानगर वुहान में स्थित वायरस प्रयोगशाला पी-4 में उत्सर्जित किए जाने की आशंका दुनिया के वैज्ञानिकों ने जताई थी, उनकी पुष्टि उन दो किताबों से भी हो रही है, जिनमें से एक 40 साल पहले तो दूसरी 12 साल पहले छपी थी। 1981 में डीन कोंटोज नामक लेखक ने ‘द आइज ऑफ डार्कनेस‘ पुस्तक लिखी थी, इसमें वुहान-400 नामक एक ऐसे वायरस की चर्चा है, जिसे वुहान शहर से बाहर एक आरडीएनए प्रयोगशाला में बनाया गया है। किताब के अनुसार यह जैविक हथियार 400 लोगों के माइक्रोगैनिज्म को मिलाकर बनाया गया था। 2008 में छपी दूसरी किताब सिल्चिया ब्राउन ने ‘एंड ऑफ डेजः प्रिडिक्शन एंड प्रोफेसीज अबाउट द एंड ऑफ द वर्ल्ड‘ शीर्षक से लिखी थी। इसमें भी कोरोना वायरस की कृत्रिम तरीकों से उत्पत्ति का उल्लेख है।   दरअसल आजकल जीवाणु व विषाणुओं की मूल संरचना में जेनेटिकली परिवर्तन कर खतरनाक जैविक हथियार बनाए जाने लगे हैं। यह आशंका इसलिए जताई गई है क्योंकि चीन ने एक महीने तक इसकी जानकारी किसी को नहीं दी। बीमारी फैलने के बाद चीन करीब डेढ़ महीने तक इसे मामूली बीमारी बताता रहा। जब यह बेकाबू होती गई तब चीन ने इसकी जानकारी विश्व-स्वास्थ्य संगठन के साथ दुनिया के अन्य देशों से भी साझा की। दरअसल वायरस एवं बैक्टीरिया से डर इसलिए लगता है क्योंकि पिछली सदी में प्लेग, हैजा और स्पेनिश फ्लू जैसी महामारियों से करोड़ों लोग मारे गए थे। इसी दौरान वैज्ञानिकों ने एंटीबाॅयोटिक दवाएं और वैक्सीन का आविष्कार कर इन बीमारियों पर नियंत्रण पा लिया था लेकिन 21वीं सदी की शुरूआत के बाद से एक के बाद एक वायरस जन्म लेते जा रहे हैं। कोविड-19, स्वाइन फ्लू, साॅर्स, मर्स ऐसे वायरस रहे हैं, जो वुहान से ही निकले हैं। इसलिए यह आशंका स्वाभाविक है कि इनका कहीं वुुहान की प्रयोगशाला में उत्सर्जन तो नहीं किया जा रहा है।   कहने को तो वैज्ञानिक विषाणु (वायरस) एवं जीवाणु (बैक्टिरिया) को जीव जगत की सबसे सरल रचनाएं मानते हैं। लेकिन इनकी जटिल संरचना को न तो समझना आसान होता है और न ही इनके चित्र लेना है। जीव-जगत की ये शुरूआती संरचनाएं हैं। बावजूद अभीतक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि इन्हें जीव माना जाए या वनस्पति क्योंकि हमारी सृष्टि में जितना भी जीव-जगत उपलब्ध है, उसे दो भाग जीव और वनस्पति में वर्गीकृत किया गया है। घातक कोरोना वायरस नया-नया है इसलिए इसकी संरचना कैसी है, वैज्ञानिक इसकी पड़ताल नहीं कर पाए हैं। हालांकि ‘डेली मेल‘ अखबार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण चीन के शेनजेन में शोधार्थियों ने कोरोना की कोशिका का एक चित्र फ्रोजेन इलेक्ट्राॅन माइक्रोसोप ऐनालिसिस की तकनीक से हासिल कर लिया है। इस तकनीक का प्रयोग कर पहले वायरस को निष्क्रिय किया गया और फिर उसका चित्र लिया गया। इस जैविक नमूने से यह तय किया जाएगा कि जीवित अवस्था में वायरस कैसा था और किस तरह जीवन प्रणाली चलाता था। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक लिउ चुआंग का कहना है कि ‘वायरस की जिस संरचना को हमने देखा है, वह बिल्कुल वैसा ही है, जैसा जीवित अवस्था में होता है। अब इसकी डीएनए संरचना का विश्लेषण कर इसका क्लिनिकल परीक्षण कर इसके जीवन चक्र को समझा जाएगा।   दरअसल जीवाणु एवं विषाणुओं को एक निर्जीव कड़ी के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब ये किसी प्राणी की कोशिका को शिकार बनाने की अनुकूल स्थिति में आ जाते हैं तो जीवित हो उठते हैं। इसलिए इनके जीवन चक्र के इतिहास को समझना मुश्किल है। इनके जीवाश्म भी नहीं होते हैं इसलिए भी इनके डीएनए की संरचना समझना कठिन हो रहा है। जबकि मनुष्य के शरीर में जो डीएनए है, उसके निर्माण में मुख्य भूमिका इसी वायरस की रहती है। बावजूद दुनिया के वैज्ञानिक इनके जीन में परिवर्तन कर खतरनाक वायरसों के निर्माण में लगे हुए हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाॅकिंग ने मानव समुदाय को सुरक्षित बनाए रखने की दृष्टि से जो चेतावनियां दी हैं, उनमें एक चेतावनी जेनेटिकली इंजीनियरिंग अर्थात आनुवांशिक अभियंत्रिकी से खिलवाड़ करना भी है। आजकल खासतौर से चीन और अमेरिकी वैज्ञानिक विषाणु और जीवाणु से प्रयोगशालाओं में छेड़छाड़ कर एक तो नए विषाणु व जीवाणुओं के उत्पादन में लगे हैं, दूसरे उनकी मूल प्रकृति में बदलाव कर उन्हें और ज्यादा सक्षम व खतरनाक बना रहे हैं। इनका उत्पादन मानव स्वास्थ्य के हित के बहाने किया जा रहा है लेकिन ये बेकाबू हो गए तो तमाम मुश्किलों का भी सामना करना पड़ सकता है? कई देश अपनी सुरक्षा के लिए घातक वायरसों का उत्पादन कर खतरनाक जैविक हथियार भी बनाने में लग गए हैं। कोरोना वायरस को भी ऐसी ही आशंकाओं का पर्याय माना जा रहा है।   हम आए दिन नए-नए बैक्टीरिया व वायरसों के उत्पादन के बारे खबरें पढ़ते रहते हैं। हाल ही में त्वचा कैंसर के उपचार के लिए टी-वैक थैरेपी की खोज की गई है। इसके अनुसार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ही विकसित कर कैंसर से लड़ा जाएगा। इस सिलसिले में स्टीफन हाॅकिंग सचेत किया था कि इस तरीके में बहुत जोखिम है। क्योंकि जीन को मोडीफाइड करने के दुष्प्रभावों के बारे में अभीतक वैज्ञानिक खोजें न तो बहुत अधिक विकसित हो पाई हैं और न ही उनके निष्कर्षों का सटीक परीक्षण हुआ है। उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि प्रयोगशालाओं में जीन परिवर्धित करके जो विषाणु-जीवाणु अस्तित्व में लाए जा रहे हैं, हो सकता है, उनके तोड़ के लिए किसी के पास एंटी-बायोटिक एवं एंटी-वायरल ड्रग्स ही न हों?   कुछ समय पहले खबर आई थी कि जेनेटिकली इंजीनियर्ड अभियांत्रिकी से ऐसा जीवाणु तैयार कर लिया है जो 30 गुना ज्यादा रसायनों का उत्पादन करेंगे। जीन में बदलाव कर इस जीवाणु के अस्तित्व को आकार दिया गया है। माना जा रहा है कि यह एक ऐसी खोज है, जिससे दुनिया की रसायन उत्पादन कारखानों में पूरी तरह जेनेटिकली इंजीनियर्ड बैक्टीरिया का ही उपयोग होगा। विस इंस्टीट्यूट फाॅर बाॅयोलाॅजिकली इंस्पायर्ड इंजीनियंरिंग और हावर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं के दल ने यह शोध किया है। अनुवांशिकविद जाॅर्ज चर्च के नेतृत्व में किए गए इस शोध के तहत बैक्टीरिया के जींस को इस तरीके से परिवर्धित किया गया, जिससे वे इच्छित मात्रा में रसायन का उत्पादन करें। बैक्टीरिया अपनी मेंटाबाॅलिक प्रक्रिया के तहत रसायनों का उत्सर्जन करते हैं। यह तकनीक हालांकि नई नहीं है। लेकिन नई खोज से ऐसी तकनीक विकसित की गई है, जिससे वैज्ञानिक किसी भी तरह के बैक्टीरिया का इस्तेमाल करके अनेक प्रकार के रसायन तैयार कर सकेंगे।   इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने ई-काॅली नामक बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया है। इसमें बदलाव के लिए इवोल्यूशनरी मैकेनिज्म को उपयोग में लाया गया। दरअसल जीवाणु एक कोशकीय होते हैं, लेकिन ये स्वयं को निरंतर विभाजित करते हुए अपना समूह विकसित कर लेते हैं। वैज्ञानिक इन जीवाणुओं पर ऐसे एंटीबायोटिक्स का प्रयोग करते हैं, जिससे केवल उत्पादन क्षमता रखने वाली कोशिकाएं ही जीवित रहें। इन कोशिकाओं के जीन में बदलाव करके ऐसे रसायन उत्पादन में सक्षम बनाया जाता है, जो उसे एंटिबायोटिक से बचाने में सहायक होता है। ऐसे में एंटीबायोटिक का सामना करने के लिए बैक्टीरिया को ज्यादा से ज्यादा रसायन का उत्पादन करना पड़ता है। रसायन उत्पादन की यह रफ्तार एक हजार गुना ज्यादा होती है। यह खोज ‘सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट‘ के सिद्धांत पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुरूप यह चक्र निरंतर दोहराए जाने पर सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले चुनिंदा जीवाणुओं की कोशिकाएं ही बची रह जाती हैं। मानव शरीर में उनका उपयोग रसायनों की कमी आने पर किया जा सकेगा, ऐसी संभावना जताई जा रही है। इस खोज से फार्मास्युटिकल बायोफ्यूल और अक्षय रसायन भी तैयार होंगे। लेकिन मानव शरीर में इसके भविष्य में क्या खतरे हो सकते हैं, यह प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित ही है।   इन विषाणु व जीवाणुओं के उत्पादन पर सवाल उठ रहा है कि क्या वैज्ञानिकों को प्रकृति के विरुद्ध विषाणु-जीवाणुओं की मूल प्रकृति में दखलंदाजी करनी चाहिए? प्रयोग के लिए तैयार ऐसे जीवाणु व विषाणु कितनी सुरक्षा में रखे गए हैं? यदि वे जान-बूझकर या दुर्घटनावश बाहर आ जाते हैं तो इनके द्वारा जो नुकसान होगा, उसकी जबावदेही किसपर होगी? ऐसे में वैज्ञानिकों की ईश्वर बनने की महत्वाकांक्षा पर यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर वैज्ञानिकों को अज्ञात के खोज की कितनी अनुमति दी जानी चाहिए? अंततः ज्ञान की सीमा ऐसी अंधेरे में की जा रही अनंत गहराई है, जिसके खतरों की डोर आखिर मनुष्य से ही जुड़ जाती है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 March 2020


bhopal, Coronation of Corona virus

अनिल निगम   अंटार्कटिक महाद्वीप को छोड़कर विश्‍व के सभी महाद्वीपों में कोरोना वायरस फैल चुका है। भारत में दिल्‍ली से लेकर केरल तक जिस तरह इस वायरस से संक्रमित लोग पाए गए हैं उससे भारतीयों के माथे पर चिंता की लकीरें स्‍वाभाविक है। वैश्‍विक मंदी की आहट मात्र से भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली है। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ना शुरू हो गया है। अहम सवाल यह है कि अगर कोरोना वायरस भारत में महामारी का रूप ले लेता है तो क्‍या हम और हमारी सरकार इससे निपटने के तैयार है? क्‍या हमारे देश के अस्‍पतालों में कारोना वायरस की जांच और संक्रमित लोगों को भर्ती कर इलाज करने के पर्याप्‍त संसाधन उपलब्‍ध है।   कोरोना वायरस के प्रति जागरूकता को लेकर केंद्र सरकार ने एडवाइजरी जारी की है। लोगों में लगातार जागरूकता फैलाई जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कोरोना के मामलों पर निगरानी के लिए मंत्रियों के समूह का गठन किया है। विदेशों से भारत आनेवाले लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। संक्रमण की आशंका पर अलग रखकर उनके इलाज की व्‍यवस्‍था की गई है। सरकार ने कोरोना वायरस से जुड़ी शिकायत और सुझाव के लिए कॉल सेंटर शुरू किया है जिसका नंबर 01123978046 है। यह कॉल सेंटर 24 घंटे काम करता है। ट्रैवल एडवाइज़री भी जारी की गई है। देश के 21 हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग की जा रही है। थर्मल स्क्रीनिंग के माध्‍यम से कोरोना जैसे वायरस के संक्रमण की जांच की जाती है।   ग्‍लोबइालजेशन का लाभ जहां विश्‍व के हर देश को मिला और उसके आधार पर देश की आर्थिक और तकनीकी स्‍थिति सुदृढ़ हुई, आज उसी ग्‍लोबलाइजेशन का नुकसान भी विभिन्‍न देशों को उठाना पड़ रहा है। चीन के वुहान शहर से फैले कोरोना वायरस का असर भारत सहित विभिन्‍न देशों में देखने को मिल रहा है। अब भारत में इसका सबसे प्रतिकूल असर हमारी पर्यटन उद्योग पर पड़ना शुरू हो गया है। पर्यटन स्‍थलों पर देश-विदेश के सैलानियों की संख्‍या तेजी से घटना शुरू हो गई है। जयपुरए जैसलमेर, उदयपुर, जोधपुर, रणथंभौर, पुष्कर, बीकानेर, उत्‍तर पूर्व के प्रदेशों, धर्मशाला जैसे पर्यटन स्थलों पर भी वायरस की मार दिख रही है। कोरोना के संकट के कारण ज्यादातर विदेशी पर्यटक अपनी बुकिंग रद्द करा रहे हैं। धर्मशाला में 2 से 4 अप्रैल तक आयोजित होने वाली अंतरराष्ट्रीय तिब्बती संगठनों की ग्लोबल समिट को केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है।   यही नहीं भारत में डाई कारोबार से जुड़े व्‍यवसायी परेशान हैं। दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा के अधिसंख्‍य डाई व्‍यवसायी कच्चा माल चीन से मंगाते हैं। कच्चे माल की आपूर्ति रुकने से इनपर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। अकेले पानीपत में 600 टन डिस्पर्स डाइज की प्रतिमाह खपत होती है। यहां कारोबारियों के पास कच्चे माल का स्टॉक लगभग खत्‍म हो गया है। भारत की स्मार्टफोन इंडस्ट्री भी काफी हद तक चीन पर निर्भर है। इसी तरह भारत के ऑटोमोबाइल निर्यातक काफी भयभीत हैं। कोरोना की आपदा से जल्द निजात नहीं मिली तो इसका साइड इफेक्ट भारत के ऑटोमोबाइल निर्यात पर पड़ना तय है। ऑटोमोबाइल कंपोनेंट की आपूर्ति के लिए भारत बहुत कुछ चीन पर निर्भर है। यह समस्‍या विश्‍वव्‍यापी बन चुकी है। यही कारण है कि विश्‍व बैंक ने महामारी से निपटने के लिए संक्रमण प्रभावित देशों को 12 अरब डॉलर की आर्थिक मदद की घोषणा की है। यह धनराशि ऐसे देशों को दी जाएगी जो गरीब हैं और उनके पास इस संक्रमण से लड़ने के पर्याप्‍त संसाधन नहीं हैं। ध्‍यान रहे कि इससे पहले भी सार्स, इबोला, जीका जैसे वायरस दुनिया की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा चुके हैं।   सवाल यह है कि अगर कोरोना वायरस भारत में महामारी का रूप ले ले तो क्‍या हम उससे निपटने में सक्षम हैं? यह बात सच है कि अगर हम देश की राजधानी दिल्‍ली और कुछ चुनिंदा महानगरों को छोड़ दें तो हमारे यहां सरकारी अस्‍पतालों की स्‍थिति बहुत अच्‍छी नहीं है। चीन जैसा विकसित देश कोरोना महामारी फैलने के बाद लाचार हो गया। हालांकि जिस तरीके से भारत में सरकार और गैर सरकारी संगठनों ने इस संक्रमण को लेकर जागरूकता दिखाई है, उससे लगता है कि हम कोरोना वायरस के हमले से निपटने के लिए तैयार हो रहे हैं। हालांकि स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लोगों में व्यक्तिगत साफ-सफाई की आदतें बेहतर हैं। हाथ धोना या नहाने-धोने की आदतें कोरोना संक्रमण से बचाने में काफी मददगार हो सकती हैं।   निसंदेह कोरोना वायरस अत्‍यंत खतरनाक है। चिंताजनक यह है कि अबतक इसकी कोई वैक्‍सिन विकसित नहीं हो पाई है। इसलिए सरकार और समाज के लोगों को ज्‍यादा सतर्क रहने की जरूरत है। इससे घबराने या इससे जुड़ी अफवाहों पर ध्‍यान देने की जरूरत नहीं है। हां इस संबंध में सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन्‍स का पालन अवश्‍य करें। इससे देश का आर्थिक तौर पर कुछ नुकसान अवश्‍य हो सकता है लेकिन अगर देश का हर नागरिक सजग हो तो जिस तरीके से हम हर हमले को नाकाम कर देते हैं, कोरोना के हमले को भी परास्‍त कर देंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)    

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Dakhal News 12 March 2020


bhopal,Who is responsible for Scindia leaving Congress

सतीश एलिया   अंततः सवा साल से कांग्रेस में ठगा महसूस कर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेसी से भाजपायी हो गये, साथ ही कमलनाथ सरकार की विदाई की पटकथा भी आगे के एपिसोड की तरफ बढ़ गई। राहुल गांधी के नवाचार और खुद राहुल को फेल करने में कामयाब रही काँग्रेस की बुजुर्ग टीम को जोर का झटका जोर से लगा होगा लेकिन वे इससे सबक लेंगे, ऐसा लग नहीं रहा है। लगता है कांग्रेस को अभी ऐसे झटके कुछ और राज्यों में लग सकते हैं। भाजपा की लोकसभा की तरह ही राज्यसभा में भी ताकतवर बनने की मुहिम भी इसका बड़ा हिस्सा है।    अब आगे क्या भाजपा सिंधिया को राज्यसभा भेजकर महत्वपूर्ण मंत्रालय दे सकती है। इसके अलावा मप्र में सिंधिया समर्थक विधायक को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। पौने चार साल बाद विधानसभा चुनाव में सिंधिया भाजपा का सीएम चेहरा हो सकते हैं। जिस ग्वालियर चंबल में भाजपा को 2018 के चुनाव में सर्वाधिक नुकसान हुआ था, वहां कांग्रेस सर्वाधिक कमजोर हो सकती है और भाजपा ताकतवर। इसके अलावा मालवा में अपनी ताकत कम होने की भरपाई भी भाजपा कर सकेगी। विंध्य में भाजपा की ताकत बरकरार है ही।   अस्वीकार्यता या असंतोष का खतरा नहीं ज्योतिरादित्य की दादी विजयाराजे सिंधिया जनसंघ को ताकतवर और भाजपा स्थापित करने वाले शीर्ष नेताओं में हैं। बुआ वसुंधरा राजे राजस्थान में दो दफा सीएम रह चुकी हैं। यशोधरा राजे सिंधिया दो बार मप्र में मंत्री और दो बार सांसद रही हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं में ज्योतिरादित्य की स्वीकार्यता राजमाता के पोते के रूप होगी। उनके पिता माधवराव सिंधिया पहली दफा 1971 में जनसंघ के टिकट पर ही सांसद बने थे। कांग्रेस में तो वे 1980 में आए। उन्होंने 1996 में कांग्रेस छोड़कर मप्र विकास कांग्रेस बनाई थी, जिसके दो सांसद भी थे।   एक तरह से घर वापसी विजयाराजे सिंधिया को कांग्रेस तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के कारण छोड़नी पड़ी थी। मिश्रा के शिष्य अर्जुन सिंह के कारण माधवराव सीएम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बन सके। अर्जुन के पट्ठे दिग्विजय सिंह के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया का वही हश्र हुआ।   महाराष्ट्र और राजस्थान में असर होगा कांग्रेस की महाराष्ट्र और राजस्थान की सियासत पर सिधिया के भाजपा में शामिल होने का असर पड़ेगा। महाराष्ट्र में तो सिंधिया प्रत्याशी चयन की स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख थे। कांग्रेस के सहयोग से चल रही शिवसेना के नेतृत्व वाली उद्धव सरकार पर इसके असर की प्रतीक्षा रहेगी लेकिन मिलिन्द देवड़ा का कांग्रेस से मोहभंग किसी परिणति तक पहुँच सकता है। राजस्थान में कांग्रेस को सिधिया के मित्र सचिन पायलट को सहेजने का जतन करना पड़ेगा।   भाजपा की युवा टीम मजबूत कांग्रेस में यूथ ब्रिगेड कमजोर और भाजपा में मजबूत होने के आसार हैं। भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर युवा नेतृत्व विकसित कर ही रही है, मप्र में 50 साल के विष्णुदत्त शर्मा को हाल ही में अध्यक्ष बनाया गया है। वे एक साल में ही प्रदेश महामंत्री से सांसद और प्रदेश अध्यक्ष बन गए। दूसरी तरफ 75 साल के कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष एक साथ हैं। सिंधिया की बगावत की जड़ कांग्रेस में बुजुर्गों का हावी होना है। इसमें 70 पार वाले दिग्विजय प्रमुख किरदार हैं।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 March 2020


shivpuri, Many Congress, BJP leaders, came under dilemma, due to defections

शिवपुरी। ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामे जाने के बाद ग्वालियर संभाग की राजनीति पर इसका सबसे ज्यादा असर देखा जा रहा है। इस दलबदल से भाजपा और कांग्रेस के नेता दुविधा में आ गए हैं। खासकर कांग्रेस के सिंधिया समर्थक वह नेता सबसे ज्यादा परेशानी में हैं जो कांग्रेस की विचारधारा के साथ-साथ सिंधिया के नेतृत्व में पार्टी का झंडा उठा रहे थे। इनके सामने यह संकट है कि वह भाजपा में अपने आपको कैसे एडजस्ट कर पाएंगे। भाजपा में पहले से ही नेताओं की लंबी कतार है और वहां पर उन नेताओं के साथ कैसे एडजस्ट हुआ जाए जिनसे वह वर्षों से वैचारिक रूप से लड़ रहे हैं। अब अपने नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ यह नेता कांग्रेस तो छोड़ रहे हैं लेकिन अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं। वहीं भाजपा में भी कई नेताओं के बीच असमंजस का माहौल है। भाजपा के वह नेता दुविधा में हैं जो महल के विरोधी हैं और वर्षों से सिंधिया का विरोध करते हुए आ रहे हैं। ऐसे में अब इन नेताओं के बीच संकट है कि यहां पर कैसे इस राजनीति में एडजस्टमेंट किया जाए। इसके अलावा भाजपा के वह नेता जो बीते साल विधानसभा चुनाव हारे वह सिंधिया समर्थक कांग्रेस नेताओं से ही चुनाव हारे हैं अब आगे उनके टिकट का क्या होगा।    महल से जुड़े नेता खुश-  इस अंचल में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में सिंधिया परिवार के समर्थक यानि महल समर्थक नेता इस दलबदल से सबसे ज्यादा खुश हैं। क्योंकि पहले वह भाजपा व कांग्रेस में होते हुए भी महल के इशारे पर यहां पर राजनीतिक रूप से काम करते थे लेकिन अब महल के नेताओं ने ही एक दल में होने का फैसला कर लिया है तो ऐसे में महल के जो समर्थक हैं वह खुश हैं। अब शिवपुरी की ही बात की जाए तो यहां पर यशोधरा समर्थक कई भाजपा नेताओं ने ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में आने का स्वागत किया है क्यों कि अब भाजपा में महल का वर्चस्व और बढ़ गया है। इससे उन्हें फायदा मिलेगा।    कई कांग्रेसियों ने नहीं छोड़ी पार्टी- ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा कांग्रेस छोड़े जाने के बाद इस अंचल के कई कांग्रेस नेता जैसे पिछोर विधायक केपी सिंह, पूर्व विधायक हरिबल्लभ शुक्ला, पूर्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्रीप्रकाश शर्मा, पूर्व जिलाध्यक्ष लक्ष्मीनारायण धाकड़, जिला उपाध्यक्ष बासित अली सहित कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने कांग्रेस नहीं छोड़ी है। इन कांग्रेसियों में दिग्गी समर्थक नेताओं की संख्या ज्यादा है। अभी आने वाले समय में और पता चलेगा कि सिंधिया समर्थक कितने नेता कांग्रेस छोड़ते हैं। आने वाले समय में यहां पर नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे।   

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Dakhal News 11 March 2020


bhopal,Holi, the festival of the burning of demonic powers

प्रमोद भार्गव   होली एक प्राचीन त्योहार है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मुख्य रूप से यह बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। भारत और चीन में इसे, इसी परिप्रेक्ष्य में मनाने की परंपरा है। आज इस पर्व को मूल-अर्थों में मनाना ज्यादा प्रासंगिक है। क्योंकि नैतिकता-अनैतिकता के सभी मानदण्ड खोटे होते जा रहे हैं। समाज में जिसकी लाठी, उसकी भैंस का कानून प्रभावी बढ़ता जा रहा है। साधन और साध्य का अंतर खत्म हो रहा है। गलत साधनों से कमाई संपत्ति और बाहुबल का बोलबाला हर जगह बढ़ रहा है। ऐसी राक्षसी शक्तियों के समक्ष, नियंत्रक मसलन कानूनी ताकतें बौनी साबित हो रही हैं। हिंसा और आतंक से भयभीत वातावरण में हम भयमुक्त होकर नहीं जी पा रहे हैं। दुविधा के इसी संक्रमण काल में होलिका को मिले वरदान आग में न जलने की कथा की अपनी प्रासंगिकता है। अंततः बुराई का जलना और अत्याचारी व दुराचारी ताकतों का ढहना तय है।   सम्राट हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में न जलने का वरदान था अथवा हम कह सकते हैं, उसके पास कोई ऐसी वैज्ञानिक तकनीक थी, जिसे प्रयोग में लाकर वह अग्नि में प्रवेश करने के बावजूद नहीं जलती थी। लेकिन जब वह अपने भतीजे प्रहलाद का अंत करने की क्रूर मानसिकता के साथ उसे गोद में लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हुई तो प्रहलाद तो बच गए किंतु होलिका जलकर मर गई। उसे मिला वरदान काम नहीं आया। क्योंकि वह असत्य और अनाचार की आसुरी शक्ति में बदल गई थी। वह अहंकारी भाई के दुराचार में भागीदार हो गई थी। इस लिहाज से कोई स्त्री नहीं बल्कि दुष्ट और दानवी प्रवृत्तियों का साथ देने वाली एक बुराई जलकर खाक हुई। लेकिन इस बुराई का नाश तब हुआ, जब नैतिक साहस का परिचय देते हुए एक अबोध बालक अन्याय और उत्पीड़न के विरोध में दृढ़ता से खड़ा हुआ।    इसी कथा से मिलती-जुलती चीन में एक कथा प्रचलित है, जो होली पर्व मनाने का कारण बनी है। चीन में भी इस दिन पानी में रंग घोलकर लोगों को बहुरंगों से भिगोया जाता है। चीनी कथा भारतीय कथा से भिन्न जरूर है लेकिन आखिर में वह भी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। चीन में होली का नाम है, ‘फोश्वेई च्ये’ अर्थात् रंग और पानी से सराबोर होने का पर्व। यह त्योहार चीन के युतांन जाति की अल्पसंख्यक ‘ताएं’ नामक जाति का मुख्य त्योहार माना जाता है। इसे वे नए वर्ष की शुरुआत के रूप में भी मनाते हैं।   इस पर्व से जुड़ी कहानी है कि प्राचीन समय में एक दुर्दांत अग्नि-राक्षस ने ‘चिंग हुग’ नाम के गांव की उपजाऊ कृषि भूमि पर कब्जा कर लिया। राक्षस विलासी और भोगी प्रवृत्ति का था। उसकी छह सुंदर पत्नियां थीं। इसके बाद भी उसने चिंग हुग गांव की ही एक खूबसूरत युवती का अपहरण करके उसे सातवीं पत्नी बना लिया। यह लड़की सुंदर होने के साथ वाक् पटु और बुद्धिमान थी। उसने अपने रूप-जाल के मोहपाश में राक्षस को ऐसा बांधा कि उससे उसकी मृत्यु का रहस्य जान लिया। राज यह था कि यदि राक्षस की गर्दन से उसके लंबे-लंबे बाल लपेट दिए जाएं तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। एकदिन अनुकूल अवसर पाकर युवती ने ऐसा ही किया। राक्षस की गर्दन उसी के बालों से सोते में बांध दी। इन्हीं बालों से उसकी गर्दन काटकर धड़ से अलग कर दी। लेकिन वह अग्नि-राक्षस था इसलिए गर्दन कटते ही उसके सिर में आग प्रज्ज्वलित हो उठी और सिर धरती पर लुढ़कने लगा। यह सिर लुढ़कता हुआ जहां-जहां से गुजरता वहां-वहां आग प्रज्ज्वलित हो उठती। इस समय साहसी और बुद्धिमान लड़की ने हिम्मत से काम लिया और ग्रामीणों की मदद लेकर पानी से आग बुझाने में जुट गई। आखिरकार बार-बार प्रज्ज्वलित हो जाने वाली अग्नि का क्षरण हुआ और धरती पर लगने वाली आग भी बुझ गई। इस राक्षसी आतंक के अंत की खुशी में ताएं जाति के लोग आग बुझाने के लिए जिस पानी का उपयोग कर रहे थे, उसे एक-दूसरे पर उड़ेल कर झूमने लगे। फिर हर साल इस दिन होली मनाने का सिलसिला चल निकला।   दोनों प्राचीन कथाएं हमें राक्षसी ताकतों से लड़ने की प्रेरणा देती हैं। हालांकि आज प्रतीक बदल गए हैं। मानदंड बदल गए हैं। पूंजीवादी शोषण का चक्र भूमण्डलीय हो गया है। आज समाज में सत्ता की कमान संभालने वाले संपत्ति और प्राकृतिक संपदा का अमर्यादित केंद्रीयकरण और दोहन करने में लगे हैं। यह पक्षपात केवल राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रह गया है, इसका विस्तार धार्मिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक क्षेत्रों में भी है। नतीजतन हम सरकारी कार्यालय में हों, किसी औद्योगिक कंपनी की चमचमाती बहुमंजिला इमारत में हों अथवा किसी भी धर्म-परिसर में हों, ऐसा आभास जरूर होता है कि हम अंततः लूट-तंत्र के षड्यंत्रों के बीच खड़े हैं। जाहिर है, शासक वर्ग लोकहित के दावे चाहे जितने करे, अंततः उनका सामंती चरित्र ही उभरकर समाज में विस्तारित हो रहा है। आम आदमी पर शोषण का शिकंजा कसता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण न तो समावेशी विकास का आधार बन पाया और न ही अन्याय से मुक्ति का उपाय साबित हुआ। इसके उलट उसे अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद से जोड़कर व्यक्ति को सनातन ज्ञान परंपराओं से काटने का कुचक्र रचा और जो ग्रामीण समाज लघु उद्योगों में स्वयं के उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़ा था, उसे नगरीय व्यवस्था का घरेलू नौकर बना दिया। जाहिर है, शासक दल लोक को हाशिये पर डालकर लोकहित का प्रपंच-गान करने में लगे हैं। लोक का विश्वास तोड़कर लोकवादी या जनवादी कैसे हुआ जा सकता है?   दरअसल बाजारवादी ताकतें शोषण के जिस दुष्चक्र को लेकर आ रही हैं, उससे केवल नैतिक साहस से ही निपटा जा सकता है। इन शक्तियों की मंशा है कि भारतीयों को संजीवनी देने वाली नैतिकता के तकाजे को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाए। इसीलिए निजी नैतिकता को अनैतिकता में बदलने के नीतिगत उपाय हो रहे हैं। जब कि नैतिक मूल्यों का वास्तविक उद्देश्य मानव जीवन को पतन के मार्ग से दूर रखते हुए उसे उदात्त बनाना है। यही कारण रहा है कि जब होलिका सत्य, न्याय और नैतिक बल के प्रतीक प्रहलाद को भस्मीभूत करने के लिए आगे आई तो वह खुद जलकर राख हो गई। उसकी वरदान रूपी तकनीक उसके काम नहीं आई क्योंकि उसने वरदान की पवित्रता को नष्ट किया था। वह शासक दल के शोषण चक्र में साझीदार हो गई थी। चीनी राक्षस का भी यही हश्र युवती के एकांगी साहस ने किया।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 March 2020


bhopal, Question on private medical colleges

डॉ. अजय खेमरिया   देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की क्या भूमिका है? इसके जवाब में केवल कॉरपोरेट पूंजी और उससे उपजी संपन्न चिकित्सकीय बिरादरी ही नजर आती है। हाल में सरकार ने पीपीपी मॉडल से नए मेडिकल कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी लेकिन हमें इस बात पर विचार करना होगा कि प्राइवेट कॉलेजों का अनुभव कैसा रहा है? तथ्य यह है कि इन कॉलेजों में से करीब 100 इस समय बन्द पड़े हैं। इनसे सम्बद्ध अस्पताल कभी आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं रहे। असल में निजी मेडिकल कॉलेज भारत में सुगठित कारोबारी दुनिया है जो न केवल काली कमाई बल्कि सामाजिक असमानता के बीज से खड़ी होती है। आश्चर्य की बात है कि सरकार कॉरपोरेट और अफसरशाही के इस गठबंधन को समझने और तोड़ने की जगह सरंक्षणवादी नीतियों को जन्म दे रही है। इसे मप्र के ताजा उदाहरण से समझा जा सकता है।   मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने जिन निजी कॉलेजों को मानक आधारभूत संरचना के अभाव में बंद कर दिया था, उन्हें मप्र में अफसरों ने सरकारी अस्पतालों के दम पर शुरू कराने की गुपचुप तैयारी कर ली और प्रस्ताव कैबिनेट में प्रस्तुत कर दिया। मेडिकल कॉलेजों से जुड़े इस सुनियोजित घोटाले पर मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ की सजगता से फिलहाल रोक लग गई है। मप्र के बन्द पड़े छह निजी मेडिकल कॉलेजों को पुनः आरम्भ करने के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग के अफसरों ने एक प्रस्ताव कैबिनेट की बैठक में रखा था। इसके तहत सरकारी जिला चिकित्सालयों को इन कॉलेजों से सम्बद्ध (अटैच) किया जाना है।मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए अफसरों से पुनः अध्ययन करने की आवश्यकता पर जोर दिया और एक कमेटी गठन के निर्देश भी दिए।   असल में मप्र में छह निजी मेडिकल कॉलेज इस समय एमसीआई के मानकों को पूरा नहीं कर पाने के चलते बन्द पड़े हैं। अफसरों ने तर्क दिया कि अगर इन कॉलेजों से सरकारी जिला अस्पताल अटैच कर दिए जाएं तो एमसीआई की मान्यता हासिल की जा सकती है। तर्क है कि मप्र के कोटे में मेडिकल की 600 से 1000 नई सीट्स उपलब्ध हो सकेंगी। विभाग के प्रमुख सचिव संजय शुक्ला ने दावा किया कि निजी मेडिकल कॉलेज शुरू होने से इनके अस्पतालों में गरीब आदमी को इलाज का एक और विकल्प मिल सकेगा। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया और सवाल उठाया कि पहले से ही बदनाम इन प्राइवेट कॉलेजों में प्रवेश लेने कौन आएगा? यह भी कैसे कहा जा सकता है कि इसका फायदा मप्र के विद्यार्थियों को प्राप्त होगा। मुख्यमंत्री ने इसे निजी कॉलेजों के लिए फायदे का प्रस्ताव निरूपित करते हुए फिलहाल निरस्त कर दिया है।   असल में मप्र में न केवल निजी बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हो रही हैं। नए मेडिकल कॉलेजों में भर्ती औऱ विनिर्माण से जुड़े कई घोटालों के आरोपों की जांच वर्तमान में चल रही है। निजी कॉलेजों को खोलने के लिए सरकार ने जिस उदारता का परिचय दिया है, उसने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया है। मप्र में जिन छह मेडिकल कॉलेजों को एमसीआई ने बन्द कर दिया है, उनके अध्ययनरत विद्यार्थियों को पहले ही सरकार ने अपने मेडिकल कॉलेजों में बीच पाठ्यक्रम में प्रवेश दिलाया है। फर्जीवाड़ा कर इन कॉलेजों ने पहले तो एमसीआई से मान्यता हासिल कर ली और बाद में मानक सुविधाओं को जुटाने में पूरी तरह नाकाम रहे। लाखों-करोड़ों की फीस हजम करने वाले कॉलेज संचालकों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई और अब सरकार इनके स्टूडेंट्स को अपने संसाधनों से डॉक्टर बना रही है। इस प्रक्रिया ने सरकारी कॉलेजों के छात्र-शिक्षक अनुपात को भी बुरी तरह बिगाड़ दिया है। एमसीआई के निरीक्षण के समय इसी बिगड़े अनुपात के चलते कई बार सरकारी कॉलेजों की मान्यता पर संकट खड़ा होता रहता है। बेहतर होगा सरकार नई यूजी पीजी सीट्स बढ़ने के अफसरी तर्क को बगैर जमीनी उपयोगिता परखे स्वीकार न करे। इस तरह के तर्क मप्र के हित में कतई नहीं है क्योंकि यह सर्वविदित तथ्य है कि 'नीट' के जरिये प्राइवेट कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले छात्र प्रतिभाशाली न होकर धनाढ्य परिवारों के होते हैं। वे चिकित्सा पेशे में अपनी प्रतिभा के बल पर नहीं बल्कि परिवार की आर्थिक क्षमताओं और इच्छा के चलते आते हैं। यह भी सभी को पता है कि निजी कॉलेजों से सम्बद्ध अस्पताल भी गरीब आदमी के उपचार हेतु उपलब्ध नहीं रहते हैं।   जाहिर है मप्र में जिन छह निजी कॉलेजों को सरकारी अस्पतालों से सम्बद्ध कर आरम्भ करने का प्रस्ताव था वह पूंजीपति मालिकों को फायदा दिलाने वाला था। अगर सरकार इन बन्द पड़े कॉलेजों की आधारभूत संरचना का जनता के हित में उपयोग करना चाहती है तो उसे इन कॉलेजों को अधिग्रहित करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए। संचालकों के साथ वार्ता कर एक तय मुनाफे की शर्तें निर्धारित की जाएं और सरकार खुद इन कॉलेजों का संचालन करे। ऐसा करने से जो तर्क अफसरों ने मप्र कोटे की सीट्स बढ़ने का दिया है, वह अधिक न्यायसंगत साबित होगा और नीट के माध्यम से सभी के लिए इन कॉलेजों की उपलब्धता हो सकेगी। चूंकि ये कॉलेज एकबार एमसीआई से मान्यता प्राप्त कर चुके हैं इसलिए इनके पास यूजी पाठ्यक्रम के लिए अनिवार्य आधारभूत सुविधाएं मौजूद ही हैं। दिक्कत यह भी है कि कि ये सभी कॉलेज मानक संचालन तन्त्र निरन्तर नहीं रख पाए हैं। इसीलिए एमसीआई और हाईकोर्ट के निर्देश पर यहां ताले पड़े हैं। अब देखना होगा कि अफसर कैसे मुख्यमंत्री की इच्छा और निजी कॉलेज संचालकों के हितों के बीच समन्वय कर इन कॉलेजों के इन्फ्रास्ट्रक्चर का उपयोग जनता के हित में सुनिश्चित करा पाते हैं।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 March 2020


bhopal,Challenge of population control

सियाराम पांडेय 'शांत'   जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ी समस्या है। जनसंख्या पर काबू पा लिया जाय तो देश की आधी समस्या खुद-ब-खुद समाप्त हो जाए लेकिन इसपर रोक लगेगी कैसे, यह गंभीर सवाल है। बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है? सरकार के स्तर पर जब भी सुधार के प्रयास होते हैं तो उसमें रोड़ा अटकाने की कोशिशें होती हैं। ऐसे में सरकारें कड़े निर्णय न ले तो और क्या करना चाहिए? परिवार नियोजन को धर्म और आस्था से जोड़ने की बजाय परिवार की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्धि पर विचार किया जाना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिवार नियोजन की मुहिम चलाई जरूर थी लेकिन आमजन को विश्वास में नहीं लिया गया।   उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने महिला सशक्तिकरण के मद्देनजर यह संकेत दिए हैं कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर दंपति को पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोक सकती है। सरकार ने इस आशय के संकेत दिए हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हीं दम्पतियों को मिलेगा, जिनके दो या उससे कम बच्चे होंगे। प्रस्तावित जनसंख्या नीति को सरकारी नौकरियों से भी जोड़ने पर विचार चल रहा है। यह नीति भर्ती से लेकर प्रोन्नति के मामलों में भी लागू रहेगी। इस साल होने वाले पंचायत और उसके बाद स्थानीय निकाय चुनाव से पहले ही नई जनसंख्या नीति बन जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि सर्वप्रथम पंचायत चुनाव में इसे लागू किया जा सकता है। सरकार की सोच है कि 2025 तक सकल प्रजनन दर 2.1 तक आ जाए। फिलवक्त शहरी आबादी में तो सकल प्रजनन दर 2.1 है लेकिन ग्रामीण आबादी में यही दर 3 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ऐसे में सरकार का फोकस ग्रामीण आबादी पर ज्यादा रहना स्वाभाविक है। देखा जाए तो उत्तर प्रदेश की आबादी 22 करोड़ से भी अधिक हो गई है।   परिवार कल्याण के महानिदेशक डॉ. बद्री विशाल की मानें तो नई जनसंख्या नीति पर अमल करने से पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार राजस्थान और मध्य प्रदेश की जनसंख्या नीति का अध्ययन कर रही है। हालांकि सरकार अपनी प्रस्तावित जनसंख्या नीति में नसबंदी ऑपरेशन पर जोर नहीं देना चाहती लेकिन दो बच्चे वाले दंपतियों को प्रोत्साहित करने का कोई मौका भी हाथ से जाने नहीं देना चाहती। वह जनसंख्या नीति को सभी सरकारी सेवाओं पर लागू करने पर मंथन कर रही है। सरकार विधानसभा में भी इस बात की जानकारी दे चुकी है कि 3 प्रतिशत से अधिक सकल प्रजनन दर वाले 57 जिलों में 24 अप्रैल 2017 से मिशन परिवार विकास योजना लागू है। उत्तर प्रदेश के संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना की मानें तो सरकार जितने संसाधन बढ़ा ले लेकिन बढ़ती आबादी के आगे सब नाकाफी साबित हो रहे हैं।   गत वर्ष उत्तराखंड सरकार ने पंचायत चुनाव में इस तरह की पाबंदी लगायी थी। उत्तराखंड सरकार ने 25 जुलाई 2019 से पहले से इस कानून को प्रभावी किये जाने का प्रावधान किया था, जिसे नैनीताल हाईकोर्ट ने अंसवैधानिक करार दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया था मगर, 25 जुलाई 2019 के बाद से यह कानून प्रभावी हो गया है। उत्तराखंड के अतिरिक्त राजस्थान, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश व मध्य प्रदेश में पहले से ही दो से अधिक बच्चे वाले दंपतियों के पंचायत व निकाय चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है। यूपी समेत कुछ अन्य राज्य भी अगर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो इसमें गलत क्या है?   असम में सोनोवाल सरकार पहले स्पष्ट कर चुकी है कि एक जनवरी 2021 के बाद दो से अधिक बच्चे वाले व्यक्तियों को कोई सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी। ओडिशा में दो से अधिक बच्चे वालों को अरबन लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ने की इजाजत नहीं है। महाराष्ट्र सिविल सर्विसेस रूल्स ऑफ 2005 के अनुसार तो ऐसे शख्स को राज्य सरकार में कोई पद भी नहीं मिल सकता। ऐसी महिलाओं को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के फायदों से भी बेदखल किया गया है।   आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 1994 में पंचायती राज एक्ट ने एक शख्स पर चुनाव लड़ने से सिर्फ इसीलिए रोक लगा दी क्योंकि उसके दो से अधिक बच्चे थे। राजस्थान पंचायती एक्ट 1994 के अनुसार राजस्थान में अगर किसी के दो से अधिक बच्चे हैं तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जाता है। दो से अधिक बच्चे वाले केवल तभी चुनाव लड़ सकते हैं अगर उनके पहले दो बच्चों में से कोई एक दिव्यांग हो। गुजरात में लोकल अथॉरिटीज एक्ट को 2005 में बदल दिया गया था। दो से अधिक बच्चे वाले शख्स को पंचायतों के चुनाव और नगर पालिका के चुनावों में लड़ने की इजाजत नहीं है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2001 में ही दो बच्चों की नीति के तहत सरकारी नौकरियों और स्थानीय चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। 2005 में दोनों ही राज्यों ने चुनाव से पहले फैसला उलट दिया था क्योंकि लोग नाराज होने लगे थे। हालांकि, सरकारी नौकरियों और न्यायिक सेवाओं में वहां अभी भी टू चाइल्ड पॉलिसी लागू है।   भारत में सर्वप्रथम 1976 में संसद के दोनों सदनों में लंबी चर्चा और विचार विमर्श के बाद 42वां संविधान संशोधन विधेयक पास हुआ और संविधान की सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची में 'जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन' जोड़ा गया था। 42वें संविधान संशोधन ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को 'जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन' के लिए कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 20 फरवरी 2000 को 11 सदस्यीय संविधान समीक्षा आयोग गठित किया। वेंकटचलैया आयोग ने 31 मार्च 2002 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। आयोग के सुझाव पर मनरेगा, राइट टू एजुकेशन, राइट टू इनफार्मेशन और राइट टू फूड जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाये गए थे। इस आयोग ने संविधान में आर्टिकल 47ए जोड़ने और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने का सुझाव भी दिया था लेकिन जनसंख्या नियंत्रण कानून पर संसद में चर्चा भी नहीं हुई और 2004 में एनडीए सरकार चुनाव हार गई।   2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी तो जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग फिर जोर पकड़ने लगी। वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने एक ऑनलाइन पोल करवाया था जिसमें पूछा गया था कि क्या मोदी सरकार को जनसंख्या निंयत्रण पर कोई नीति बनानी चाहिए। 2016 में एक भाजपा सांसद ने लोकसभा में जनसंख्या नियंत्रण पर प्राइवेट बिल पेश किया था लेकिन बिल वोटिंग के स्तर पर ही नहीं पहुंच पाया। राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने जुलाई 2019 में सदन में जनसंख्या नियंत्रण बिल को लेकर प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। उनकी मांग थी कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे हों, उन्हें इस नियम के बनने के बाद एमपी, एमएलए बनने नहीं दिया जाए। सरकारी कर्मचारियों को अंडरटेकिंग देने को बाध्य किया जाए कि वे दो से ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करेंगे।   भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय भी जनसंख्या नियंत्रण क़ानून के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुके हैं। उनका तर्क था कि अबतक 125 बार संविधान संशोधन हो चुका है, कई बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी बदला जा चुका है। सैकड़ों नए कानून बनाये गए लेकिन देश के लिए सबसे जरूरी जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं बनाया गया, जबकि इससे देश की 50 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाएगा। उनका यह भी तर्क था कि सरकार जबतक 2 करोड़ बेघरों को घर देगी तबतक 10 करोड़ बेघर और पैदा हो जाएंगे। जाहिर है कि जनसंख्या नियंत्रण का विचार बुरा नहीं है लेकिन इसे लागू करने से पूर्व सामाजिक और धार्मिक सौहार्द न बिगड़े, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबंद्ध हैं।)

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Dakhal News 9 March 2020


coronavairus madhypradesh

    फूड सेफ्टी एवं स्टैंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया ने शुक्रवार को एडवाइजरी जारी कर कहा है कि खाने-पीने की चीजों से कोरोना फैल सकता है या नहीं इसके लिए कोई प्रमाण नहीं हैं। लिहाजा प्रभावित देशों से आया कच्या या अधपका मीट व अन्य बिना पकी चीजें खाने से बचें। एयरपोर्ट अथारिटी ने राज्य शासन के सहयोग से एयरपोर्ट पर विशेष प्रबंध किए हैं। विदेश से भोपाल आ रहे यात्रियों की स्क्रीनिंग के प्रबंध किए गए हैं। एयरपोर्ट पर एनडीआरएफ ( राष्ट्रीय आपदा मोचन बल) ने कोरोना वायरस से बचाव एवं सावधानी के उद्देश्य से सीआईएसएफ के सहयोग से मॉकड्रिल की साथ ही जवानों को प्रशिक्षित किया गया। सीआईएसएफ के डिप्टी कमांडेंट मानसिंह की मौजूदगी में जवानों को रोग से बचाव के बारे में बताया। स्वास्थ्य आयुक्त ने निर्देश जारी कर प्रदेश के आर्मी अस्पतालों में भी कोरोना वार्ड व क्वारेंटाइन सेंटर (अस्पताल से दूर) बनाने को कहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्तर पर भी एक क्वारेंटाइन बनाया जाएगा। उन्होंने जिले में ऐसे सभी आयोजनों पर रोक लगाने को कहा है, जिनमें ज्यादा भीड़ इकठ्ठा होने की संभावना है। शुक्रवार को सैटेलाइट के माध्यम से भारत सरकार के विशेषज्ञों ने प्रदेश के सभी जिला अस्पताल के डॉक्टर व कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी।  

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Dakhal News 7 March 2020


राम वन पथ गमन

मुख्यमंत्री  कमल नाथ की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में चित्रकूट से लेकर अमरकंटक तक चिन्हांकित किये गये राम वन पथ गमन के निर्माण के लिये न्यास का गठन करने का निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में न्यास का गठन होगा। न्यास में मुख्य सचिव सदस्य होंगे तथा अन्य न्यासी सदस्य भी होंगे।   मंत्रि-परिषद ने महावीर कीर्ति स्तम्भ समिति, भिण्ड को उनके आधिपत्य की भूमि को पूर्व की सभी देयताओं में छूट देते हुए शून्य प्रीमियम एवं मात्र 1 रूपये वार्षिक भू-भाटक पर देने की मंजूरी दी। समिति को भूमि का हस्तांतरण किया जायेगा।  

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Dakhal News 6 March 2020


narottam shivraj

पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का ट्वीट   पूर्वमुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह लगातार ट्वीट कर रहे हैं | उन्होंने ुरे मामले का खुलासा भी किया हैं | दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर लिखा हैं की  भाजपा ने कांग्रेस, बसपा और सपा विधायकों को दिल्ली जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बसपा विधायक रामबाई को क्या भाजपा के पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह चार्टर फ्लाइट में भोपाल से दिल्ली ले गए हैं? शिवराजजी कुछ कहेंगे?  दिग्विजय सिंह ने यह आरोप भी लगाया कि शिवराज सिंह चौहान और नरोत्तम मिश्रा दोनों में यह तय हुआ है कि एक मुख्यमंत्री और दूसरा उप मुख्यमंत्री बनेगा, इसलिए दोनों मिलकर विधायकों की तोड़-फोड़ में जुटे हुए हैं। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।दिग्विजय सिंह का दावा हैं की सरकार पर संकट नहीं हैं  सभी विधायक साथ हैं। भाजपा तोड़ने की कोशिश जरूर कर रही है और उन्होंने दो विमान तैयार रखें हैं, लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज भी शांत नहीं हैं उन्होंने भी दिग्विजय सिंह पर पलटवार किया हैं शिवराज सिंह चौहान ने कहा की दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री कमलनाथ को ब्लैकमेल करने के इरादे से ऐसे आरोप लगा रहे हैं। यह उनकी आदत रही है। उनके कुछ काम नहीं हो रहे होंगे, इसलिए अपना महत्व बताने के लिए वे इस तरह की बातें कर रहे हैं। भाजाप नेता और पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा, दिग्विजय सिंह को कोई गंभीरता से नहीं लेता। लगता है उन्हें अपनी राज्यसभा सीट की चिंता हो रही है। सिंह ने पहले सौ करोड़ रुपये रिश्वत का आरोप लगाया था, अब 25 करोड़ रुपए का आरोप लगा रहे हैं।  

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Dakhal News 4 March 2020

bhopal, Pseudo environmental movement becoming an obstacle

प्रमोद भार्गव विकास संबंधी परियोजनाओं के लिए कथित पर्यावरण संरक्षण संबंधी आंदोलन बाधा बनते रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी हैं। परियोजनाओं का विरोध स्वयंसेवी संगठन करें या पर्यावरणविद् यह तब शुरू होता है, जब जमीन पर इनका क्रियान्वयन शुरू होने लगता है। साफ है, ऐसे विरोधों की मंशा राष्ट्रहित में होने की बजाय उन देश और संस्थाओं के हित में होती है, जो भारत को शक्ति-संपन्न देश बनने देना नहीं चाहते हैं। दिल्ली मेट्रो आधुनिक विकास का ऐसा अनूठा उदाहरण है, जो जनता के लिए सुविधाजनक भी रही और पर्यावरण का संरक्षण भी। करीब 20 साल पहले शुरू हुई इस परियोजना में अबतक 311 किलोमीटर के विस्तार में 274 स्टेशन बन चुके हैं। इस हेतु बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए लेकिन पांच गुना अधिक पेड़ लगाए भी गए। इससे तय होता है कि विकास पर्यावरण का शत्रु नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने कुडनकुलम परमाणु विद्युत परियोजना का विरोध करने वाले लोगों पर आरोप लगाया था कि इन आंदोलनकारियों के पीछे जो एनजीओ हैं, उन्हें अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से आर्थिक मदद मिल रही है और वे इस राशि का उपयोग देशहित में नहीं कर रहे हैं। तमिलनाडू के कुडनकुलम परमाणु विद्युत संयंत्र को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हरी झण्डी मिलने के बाद ही तय हो गया था कि अन्य परमाणु बिजली घर लगाए जाने का सिलसिला तेज हो जाएगा। हालांकि कुडनकुलम परियोजना रूस के सहयोग से लगाई गई है। इसकी खासियत है कि यह परियोजना अमेरिकी कंपनियों की तुलना में सस्ती है। इसी तरह मध्य-प्रदेश में मण्डला और शिवपुरी जिलों में परमाणु विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। शिवपुरी में अभी भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू नहीं हुई है लेकिन मण्डला जिले में लगने वाली चुटका परमाणु परियोजना की कार्रवाई जबरदस्त जन-विरोध के बावजूद प्रदेश सरकार कछुआ गति से आगे बढ़ा रही है। हालांकि चुटका के लोग नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत चार गुना मुआवजा मिलने के लालच में परियोजना के समर्थन में हैं। लेकिन वामपंथी संगठन और एनजीओ इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यहां के बहुसंख्यक गौड़ जनजाति के आदिवासी इस परियोजना के खिलाफ हैं। यदि परमाणु संयंत्र स्थापित होता है तो मण्डला जिले के 54 गांवों की करीब सवा लाख आबादी को विस्थापित होना पड़ेगा। जबकि कुल 165 गांवों के लोग प्रभावित होंगे। यह परियोजना नर्मदा नदी के किनारे लगाई जा रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में मंडला जिले के चुटका में परमाणु बिजलीघर लगाने की मंजूरी प्रदान की थी। 20 हजार करोड़ की इस परियोजना के तहत सात-सात सौ मैगावाट की दो इकाइयां लगनी हैं। इसके लिए चुटका, टाटीघाट, कुंडा और मानेगांव की लगभग 497 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसमें 288 हेक्टेयर जमीन निजी खातेदारों की और 209 हेक्टेयर जमीन राज्य सरकार के वन विभाग और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की है। राज्य सरकार ने जन सुनवाई के जरिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन विरोध के चलते बाधाएं पीछा नहीं छोड़ रही हैं। एनजीओ के विरोध के चलते ही भारत से पास्को, लवासा, वेदांता जैसी कंपनियां अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर लौट गई हैं। इससे जहां अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई वहीं इन परियोजनाओं के तहत जो रोजगार मिलने थे, वे भी नहीं मिल पाए। गाहे-बगाहे मेधा पाटकर और अरुधंती राय जैसे स्वयंसेवी भी इन योजनाओं में बाधा बनकर आड़े आ जाते हैं। नर्मदा सागर परियोजना को भी इन्होंने लंबे समय तक प्रभावित किया था। जबकि आधुनिक अथवा नवीन स्वयंसेवी संगठनों को सरकार की जटिल शासन प्रणाली के ठोस विकल्प के रूप में देखा गया था। उनसे उम्मीद थी कि वे एक उदार और सरल कार्यप्रणाली के रूप में सामने आएंगे। चूंकि सरकार के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि वह हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में विकास संबंधी कार्यक्रमों में आम लोगों की सहभागिता की अपेक्षा की जाने लगी और उनके स्थानीयता से जुड़े महत्व व ज्ञान परंपरा को भी स्वीकारा जाने लगा। वैसे भी सरकार और संगठन दोनों के लक्ष्य मानव के सामुदायिक सरोकारों से जुड़े हैं। समावेशी विकास की अवधारणा भी खासतौर से स्वैच्छिक संगठनों के मूल में अतर्निहित है। बावजूद प्रशासनिक तंत्र की भूमिका कायदे-कानूनों की संहिताओं से बंधी है। लिहाजा उनके लिए मर्यादा का उल्लंघन आसान नहीं होता। जबकि स्वैच्छिक संगठन किसी आचार संहिता के पालन की बाध्यता से स्वतंत्र हैं। इसलिए वे धर्म, सामाजिक कार्याे और विकास परियोनाओं के अलावा समाज के भीतर मथ रहे उन ज्वलंत मुद्दों को भी हवा देने लग जाते हैं, जो उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं और तथाकथित परियोजनाओं के संभावित खतरों से जुड़े होते हैं। कुडनकुलम और चुटका परमाणु परियोजनाओं के विरोध में लगे जिन विदेशी सहायता प्राप्त संगठनों पर सवाल खड़े किये गये थे, वे इस परियोजना के परमाणु विकिरण संबंधी खतरों की नब्ज को सहलाकर ही अमेरिकी हित साधने में लगे थे। जिससे रूस के रिएक्टरों की बजाय अमेरिकी रिएक्टरों की खरीद भारत में हो। ऐसे छद्म संगठनों की पूरी एक श्रृंखला है, जिन्हें समर्थक संस्थाओं के रूप में देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों ने शह दी। चूंकि इन संगठनों की स्थापना के पीछे एक सुनियोजित प्रचछन्न मंशा थी, इसलिए इन्होंने कार्पाेरेट एजेंट की भूमिका निर्वहन में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि आलिखित अनुबंध को मैदान में क्रियान्वित किया। गैर सरकारी संगठनों का जो मौजूदा स्वरूप है, वह देशी अथवा विदेशी सहायता नियमन अधिनियम के चलते राजनीति से जुड़े दल विदेशी आर्थिक मदद नहीं ले सकते हैं। लेकिन स्वैच्छिक संगठनों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं है। इसलिए खासतौर से पश्चिमी देश अपने प्रच्छन्न मंसूबे साधने के लिए उदारता से भारतीय एनजीओ को अनुदान देने में लगे हैं। ब्रिटेन, इटली, नीदरलैण्ड, स्विटजरलैण्ड, कनाड़ा, स्पेन, स्वीडन, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, फिनलैण्ड और नार्वे जैसे देश दान दाताओं में शामिल हैं। आठवें दशक में इन संगठनों को समर्थ व आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का काम काउंसिल फाॅर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन (कपार्ट) ने भी किया। कपार्ट ने ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार, महिला कल्याण, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा साक्षरता, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, एड्स और कन्या भ्रूण हत्या के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए संगठनों को दान में धन देने के द्वार खोल दिए। भूमण्डलीय परिप्रेक्ष्य में नव उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आगमन का सिलसिला परवान चढ़ने के बाद तो जैसे एनजीओ के दोनों हाथों में लड्डू आ गए। खासतौर से दवा कंपनियों ने इन्हें काल्पनिक महामारियों को हवा देने का जरिया बनाया। एड्स, एंथ्रेक्स और वल्र्ड फ्लू की भयवहता का वातावरण रचकर एनजीओ ने ही अरबों-खरबों की दवाएं और इनसे बचाव के नजरिए से ‘निरोध’ (कण्डोम) जैसे उपायों के लिए बाजार और उपभोक्ता तैयार करने में उल्लेखनीय किंतु छद्म भूमिका का निर्वहन किया। चूंकि ये संगठन विदेशी कंपनियों के लिए बाजार तैयार कर रहे थे, इसलिए इनके महत्व को सामाजिक ‘गरिमा’ प्रदान करने की चालाक प्रवृत्ति के चलते संगठनों के मुखियाओं को न केवल विदेश यात्राओं के अवसर देने का सिलसिला शुरू हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता देते हुए इन्हें राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित विश्व सम्मेलनों व परिचर्चाओं में भागीदारी के लिए आमंत्रित भी किया जाने लगा। इन सौगातों के चलते इन संगठनों का अर्थ और भूमिका दोनों बदल गए। जो सामाजिक संगठन लोगों द्वारा अवैतनिक कार्य करने और आर्थिक बदहाली के पर्याय हुआ करते थे, वे वातानुकूलित दफ्तरों और लग्जरी वाहनों के आदी हो गए। इन संगठनों के संचालकों की वैभवपूर्ण जीवन शैली में अवतरण के बाद उच्च शिक्षितों, चिकित्सकों, इंजीनियरों, प्रबंधकों व अन्य पेशेवर लोग इनसे जुड़ने लगे। देखते-देखते दो दशक के भीतर ये संगठन सरकार के समानांतर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हो गए। बल्कि विदेशी धन और संरक्षण मिलने के कारण ये न केवल सरकार के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं, अलबत्ता आंख दिखाने का काम भी कर रहे हैं। भारत में स्वैच्छिक भाव से दीन-हीन मानवों की सेवा सनातन परंपरा रही है। वैसे भी परोपकार और जरूरतमंदों की सहायता भारतीय दर्शन और संस्कृति का अविभाज्य हिस्सा है। पाप और पुण्य के प्रतिफलों को भी इन्हीं सेवा कार्याें से जोड़कर देखा जाता है। किंतु स्वैच्छिक संगठनों को देशी-विदेशी धन के दान ने इनकी आर्थिक निर्भरता को दूषित तो किया ही, इनकी कार्यप्रणाली को भी अपारदर्शी बनाया है। इसलिए ये विकारग्रस्त तो हुए ही अपने बुनियादी उद्देश्यों से भी भटक गए। कुडनकुलम में जिन संगठनों पर कानूनी शिकंजा कसा गया था, उन्हें धन तो विकलांगों की मदद और कुष्ठ रोग उन्मूलन के लिए मिला था, लेकिन इसका दुरूपयोग वे परियोजना के खिलाफ लोगों को उकसाने में कर रहे थे। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के न्यास ने विकलांगों के कल्याण हेतु जो धन भारत सरकार से लिया, उसका मंत्री जैसे दायित्व को संभाले हुए भी ठीक से सदुपयोग नहीं किया। हमारे देश में प्रत्येक 40 लोगों के समूह पर एक स्वयंसेवी संगठन है, इनमें से हर चौथा संगठन धोखाधड़ी के दायरे में हैं। नरेंद्र मोदी सरकार जब केंद्र में आई तो उसने इन एनजीओ के बही-खातों में दर्ज लेखे-जोखे की पड़ताल शुरू कर दी। ज्यादातर एनजीओ के पास दस्तावेजों का उचित संधारण ही नहीं पाया गया। लिहाजा, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन काम करने वाले कपार्ट ने 1500 से ज्यादा एनजीओ की आर्थिक मदद पर प्रतिबंध लगा दिया और 833 संगठनों को काली सूची में डाल दिया है। इनके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक न्याय मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों द्वारा काली सूची में डाले गये एनजीओ अलग से हैं। भू-मण्डलीकरण के पहले 1990 तक हमारे यहां केवल 50 हजार एनजीओ थे जबकि 2012 में इनकी संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो गई। इन संगठनों को देश के साथ विदेशी आर्थिक सहायता भी खूब मिल रही थी। 2009-10 में 14 हजार संगठनों को विदेशी धन दिया गया। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इन छद्म संगठनों पर गंभीर नजर रखी जाए और यदि ये अपने उद्देश्य से भटकते हैं तो इन पर कानूनी शिकंजा कसा जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 February 2020


bhopal, Pathik ji, the first founder of Kisan Revolution

डाॅ. राकेश राणा विजय सिंह पथिक भारतीय राजनैतिक परिदृश्य पर ऐसा नेतृत्व हैं, जिन्होंने समाज के साथ मिलकर सफल सत्याग्रह की शैली ईजाद की। होली के दूसरे दिन दुल्हेंडी 27 फरवरी, 1884 को जन्में भूपसिंह ही विजय सिंह पथिक बने। उनके पिता व माता दोनों के परिवारों की 1857 की क्रांति में सक्रिय भागीदारी थी। पथिक इन्दौर में 1905 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी देशभक्त शचीन्द्र सान्याल के सम्पर्क में आये। उन्होंने पथिक जी को रासबिहारी बोस से मिलाया। क्रांतिकारियों के इस समूह में पथिक जी कई महत्वपूर्ण कार्रवाहियों का हिस्सा रहे। 1912 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाया तो क्रांतिकारियों ने उद्घाटन समारोह में वायसराय के जुलूस पर चांदनी चौक में बम फेंका। इस कर्यवाही में पथिक जी शामिल थे। 1914 में रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल ने सम्पूर्ण भारत में एकसाथ सशस्त्र क्रांति के लिए ’अभिनव भारत समिति’ नाम का संगठन बनाया। पथिक जी को इस काम के लिए राजस्थान का जिम्मा सौंपा गया। अजमेर से प्रमुख समाचार पत्रों का सम्पादन और प्रकाशन प्रारम्भ किया। बिजौलिया का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन, बेगू किसान आन्दोलन, सिरोही का भील आन्दोलन, बरार किसान आन्दोलन ये सब बड़े किसान आन्दोलन पथिक जी के नेतृत्व में खड़े हुए। राजस्थान के स्वतंत्रता आन्दोलन का विस्तार कर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक ले गये। उस दौर के बड़े नेता गांधी और तिलक थे, उनतक राजस्थान के स्वतंत्रता संघर्ष की पूरी योजना और परिणामों को पहुंचाया। ऐनी हडसन के जरिये ब्रिटेन के हाउस ऑफ काॅमन में राजस्थान स्वतंत्रता संघर्ष की आवाज उठायी। रियासतों के दमन और शोषण को समझाने वाली विशाल प्रदर्शनी अधिवेशन स्थलों पर आयोजित की। यह सब पथिक जी की दूरदृष्टि और नेतृत्व शैली को समझने के लिए पर्याप्त है। 1920 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। इसके माध्यम से सत्याग्रह के प्रयोग शुरू किए। बाद में संघ की गतिविधियों का केन्द्र अजमेर बना। देशभक्त युवाओं को खोज-खोजकर आन्दोलन में शामिल किया। माणिक्य लाल वर्मा, राम नारायण चौधरी, हरिभाई किंकर, नैनूराम शर्मा और मदनसिंह करौला जैसे देशभक्त और आजाद भारत के बड़े नेता पथिक जी के राजस्थान सेवा संघ की ही देन हैं।1929 में पथिक जी राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। पथिक जी की कार्यशैली और नेतृत्व शैली दोनों अद्भुत है। दोनों के केन्द्र में सत्याग्रह की पद्धति है। उनके कार्यक्रम और प्रबंधन का जो अनूठापन और परिणाम देने वाला है वह सत्याग्रह ही है। लगान के सम्बन्ध में, ठिकाने के अत्याचारों के सम्बन्ध में, किसानों की बहादुरी के सम्बन्ध में, गीत और भजन के द्वारा किसानों में गांव-गांव आन्दोलन का प्रचार करना, सबकुछ सत्याग्रह को साक्षी मानकर ही किया। पथिक जी ने सम्मिलित हस्ताक्षरों से राज्य को किसानों के अभाव अभियोगों के लिए आवेदन देना बन्द करवा दिया। केवल पंचायत के सरपंच के नाम से ही लिखा-पढ़ी की जाने लगी। चेतावनी दी गई कि अब किसान अनुचित लागतें और बेगारें नहीं देंगे। पंचायत ने यह निश्चय किया है कि यदि ठिकाना इन्हें समाप्त नहीं करेगा तो पंचायत उन्हें अन्य टैक्स भी नहीं देगी। राज्य ने अपने कर्मचारियों और ठिकाने के पक्ष में आदेश दिया कि सरपंच या पंचायत के नाम से किसी अर्जी या आवेदन पर कोई कार्यवाही न हो अर्थात राज्य ने पंचायत के अस्तित्व को मानने से इनकार कर दिया। विजय सिंह पथिक ने किसानों को समझाया कि कोई किसान व्यक्तिगत रूप से या सम्मिलित हस्ताक्षर करके आवेदन न दे। सभी किसानों की ओर से बोलने का अधिकार एकमात्र पंचायत को ही होगा। उनके इस आह्वान से सम्पूर्ण राजस्थान सत्याग्रह की गूंज से जागृत हो उठा। पथिकजी के आह्वान पर बिजोलिया के किसानों ने युद्ध का चन्दा देने से इन्कार कर दिया। प्रेमचन्द भील भजन गा-गाकर किसानों को सत्याग्रह के लिए प्रेरित करते रहे। पथिकजी ने गणेश शंकर विद्यार्थी को पत्र लिखा कि वे बिजोलिया में किसान सत्याग्रह चला रहे हैं, उनके प्रसिद्ध पत्र प्रताप की सहायता की आन्दोलन को अत्यन्त आवश्यकता है। साथ ही बिजोलिया के किसानों की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी को राखी भेजी गई। पत्र मिलते ही गणेश शंकर विद्यार्थी का जवाब आया कि बिजोलिया आन्दोलन के लिए प्रताप के पृष्ठ सदैव खुले हैं। आप अपने सत्याग्रह पथ पर चलते रहिए। यह सत्याग्रह की शैली का ही प्रभाव था कि देखते ही देखते राजस्थान का स्वतंत्रता संघर्ष पूरे देश में पहचाना जाने लगा। विजयसिंह पथिक सत्याग्रह पथ पर अडिग रहे और आजादी के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे। 29 मई, 1954 को जब उनका देहान्त हुआ, तब भी पथिक जी एक समरस, शान्तिपूर्ण और सुन्दर समाज के निर्माण में जुटे थे। एक नया अखबार शुरू करने की योजना बना रहे थे। पथिक जी जीवन भर सामंतवाद, जातिवाद, पूंजीवाद, सम्प्रदायवाद, धर्मांधतता, सामाजिक कुप्रथाओं, शोषण, दमन और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करते रहे। पथिक जी जहां देश, समाज और राष्ट्र के बड़े सवालों को लेकर चिंतनशील थे, वही बेरोजगारी, पर्यावरण विनाश, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे सामाजिक महत्व के मुद्दों पर अपने अखबारों के जरिए बराबर लिख रहे थे। इसीलिए देश का पहला सत्याग्रही विजयसिंह पथिक हैं। सत्याग्रह की शक्ति ने स्वतंत्रता संघर्ष को सामाजिक महत्व के जनान्दोलन में बदलने का बड़ा काम किया। पूरे स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रह एक शक्तिशाली हथियार की तरह उपयोग में आया। वास्तव में भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानी सत्याग्रह की ही कहानी है। आज भी न इसका महत्व कम हुआ है और न ही इसकी प्रासंगिकता कम हुई है। जैसे-जैसे दुनिया में अन्याय, शोषण और अत्याचार बढ़ेगा, सत्याग्रह के लिए आग्रह और तीव्र होंगे। इस जादुई हथियार को समझने के लिए पथिक साहित्य/शोधकार्य/इतिहास सामग्री/संस्मरण और उनके जीवनानुभवों तथा सामाजिक कार्यों को समझना आवश्यक है। उनके द्वारा प्रकाशित छः प्रमुख समाचार-पत्रों में राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, राजस्थान संदेश, नव-संदेश और उपरमाल को डंको है। पथिक जी ने पत्रकारिता को सत्याग्रह का शस्त्र बनाया और समाज व राष्ट्र को संघर्ष सिखाया। एक सफल सत्याग्रह राष्ट्रीय चेतना में कैसे प्रस्फुटित होता है और समाज को बदलाव के लिए खड़ा करता है, यह पथिक के प्रयोगों से ही सीखा जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 February 2020


bhopal,  Trump increased the value of Hindi

प्रभुनाथ शुक्ल   राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली भारत यात्रा पर आए दुनिया के सबसे शक्तिशाली शख्सियत डोनाल्ड ट्रम्प बेहद खुश और गौरवान्वित दिखे। गुजरात से लेकर मोहब्बत की नगरी आगरा तक बेमिसाल ताज का दीदार कर बेहद खुश हुए। दुनिया के सबसे ताकतवर देश और भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के राष्ट्राध्यक्ष ट्रम्प-मोदी इस दोस्ती को नया आयाम देना चाहते हैं। अपने दो दिवसीय यात्रा में ट्रम्प और मोदी एक-दूसरे से क्या खोया और क्या पाया, यह विश्लेषण का विषय होगा। लेकिन एक बात जो खुलकर सामने आई, वह है हिंदी की अहमियत। मोदी और ट्रम्प की जुगलबंदी ने हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाया है। मोटेरा स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम की मूल थीम हिंदी यानी नमस्ते ट्रम्प पर आधारित थी। लेकिन ट्रम्प और मोदी ने लाखों की भीड़ का हिंदी यानी नमस्ते से अभिवादन किया। अपनी भारत यात्रा के दौरान ट्रम्प ने तीन बार हिंदी में ट्वीट किया।   भारत के अभिजात वर्ग में हिंदी और हिंदी भाषियों को हिकारत की नजरों से भले देखा जाता हो, लेकिन ग्लोबल स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने हिंदी की स्वीकार्यता को निश्चित रूप से बढ़ाया है। ट्रम्प ने हिंदी फिल्म शोले और शाहरुख का भी जिक्र किया। जबकि देश में हिंदी भाषा की स्वीकार्यता पर संसद से लेकर सड़क तक खूब राजनीति होती है। पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर क्या स्थिति है, सभी जानते हैं। गुजरात में हिंदी भाषियों पर किस तरह जानलेवा हमले हुए यह कहने की बात नहीं है। लेकिन ट्रम्प ने उसी गुजरात की धरती से हिंदी को बड़ा सम्मान दिया है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा भले मिल गया हो लेकिन राष्ट्रभाषा का सम्मान आजतक नहीं मिल पाया है। सरकारी परीक्षाओं को हिंदी माध्यम से कराने पर भी राजनीति होती है। अंग्रेजी सोच की हिमायती राजनीति हिंदी बोलने में अपना अपमान और शर्म महसूस करती है। अधिकांश राजनेता अपने ट्वीट अंग्रेजी में करते हैं। जबकि अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हिंदुस्तान और हिंदी की अहमियत समझते हुए अपनी भारत यात्रा को हिंदीमय बना दिया।   अंग्रेजी के हिमायती यह कह सकते हैं कि ट्रम्प ने यह सब अमेरिका में होने वाले आम चुनाव के लिए किया क्योंकि अमेरिका में भारतीय मूल के 40 लाख लोग रहते हैं। लेकिन आलोचकों को यह सोचना होगा कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति को हिंदी में ट्वीट की क्या जरुरत थी। वह अपनी बात अंग्रेजी में भी कह सकते थे। निश्चित रूप से हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाने में ट्रम्प और मोदी का अहम योगदान है। पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा- हम भारत आने के लिए तत्पर हैं। हम रास्ते में हैं, कुछ ही घंटों में हम सबसे मिलेंगे। दूसरे और तीसरे ट्वीट में उन्होंने भारत और अमेरिकी संबंधों का जिक्र किया। इसका असर भी अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों पर गहरा होगा। लोग इस ट्वीट के राजनीतिक मायने चाहे जो निकालें, लेकिन सच है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है।   हिंदी में संबोधन किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की कोई नई पहल नहीं है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब 2010 में भारत आए तो उन्होंने भी अपने सत्कार से प्रभावित होकर हिंदी में 'बहुत-बहुत धन्यवाद' बोलकर भारत और भारतीयता के प्रति अभार जताया था। जबकि भाषण का समापन 'जय हिंद' से किया था। विदेशी धरती पर सिर्फ हिंदी नहीं उसकी क्षेत्रीय भाषाओं का भी जलवा कायम रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिकी यात्रा पर गए थे तो तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गुजराती भाषा में 'केम छो मिस्टर मोदी' से स्वागत किया था। जब अमेरिका में आम चुनाव हो रहे थे तो वहां भी 'अबकी बार ट्रम्प सरकार' की गूंज सुनाई दी थी। भारत में गढ़ा इस चुनावी जुमले का इस्तेमाल खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने किया था। भारत में 2014 के आम चुनाव में यह चुनावी नारा खूब गूंजा था अबकी बार मोदी सरकार। हिंदी की अहमियत और ग्लोबल स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं में हिंदी का खुलकर प्रयोग करते रहे हैं। हिंदी को 'ग्लोबल' बनाने में भी खास योगदान रहा है। अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान ट्रम्प से मुलाकात में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था।   इससे पूर्व भारत के कई राजनेता वैश्विक मंच पर हिंदुस्तान और हिंदी का मान बढ़ाते आए हैं। देश की विदेश मंत्री के पद पर रहीं सुषमा स्वराज आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन हिंदी के उत्थान और विकास के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। विदेश मंत्री रहते संयुक्त राष्ट्र संघ में 2017 में उन्होंने हिंदी में भाषण देकर पाकिस्तान को खूब लताड़ लगाई थी। संसद से लेकर वैश्विक मंच पर उन्होंने हिंदी का मान बढ़ाया। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी प्रेम किसी से छुपा नहीं है। अटल जी ने विदेशी दौरों के समय कई मंचों पर हिंदी में अपनी बात रखी। 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ में उन्होंने अपना पहला भाषण हिंदी में दिया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी हिंदी के हिमायती थे। उनकी पहल पर ही 14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को संविधान सभा में अधिकारिक भाषा सम्मान मिला था। सोशल मीडिया में हिंदी का अच्छा प्रयोग हो रहा है। ट्विटर पर भी हिंदी में काफी ट्वीट किए जा रहे हैं। वक्त आ गया है जब हमें हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता को समझते हुए राजनीति को किनारे रख हिंदी को और समृद्ध बनाने के लिए काम करना चाहिए।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,  Jammu and Kashmir: Police will be equipped with hi-tech facilities

योगेश कुमार सोनी   देश के बंटवारे के बाद से ही जम्मू-कश्मीर पुलिस तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करती रही है लेकिन धारा 370 हटने के बाद स्थिति में फर्क आया है। हरकत वाले नेता या जो कुछ लोग थे, उनपर शासन-प्रशासन ने शिकंजा कस रखा है लेकिन पाकिस्तान अभी भी बाज नहीं आ रहा। जैसा कि जम्मू-कश्मीर हमेशा से एक संवेदनशील राज्य रहा है, यहां कभी भी पत्थरबाजी या आतंकी हमले की आशंकाएं बनी रहती हैं। अलगाववादी व हुर्रियत नेताओं की वजह से माहौल इतना खराब रहा है कि पुलिस पर भी हमले होते रहे हैं। हजारों पुलिसकर्मियों ने शहादत दी।   जब से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बना, यहां बदलाव आ रहा है। फिलहाल पुलिस को हाईटैक करने पर काम जारी है। रोबोट, हेलीकॉप्टर, टोटल कॉन्टेनमेंट वेसल और रिमोट से चलने वाले वाहनों के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस पचास हाइटैक यूएवी से लैस होने वाली है। इतने ज्यादा यूएवी की डील पहली बार हो रही है। यूएवी का अर्थ होता है मानव रहित विमान। यह संदिग्ध इलाकों व दुश्मनों के क्षेत्रों पर निगरानी रखने के लिए काम आता है और जरूरत पड़ने पर आक्रमण करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। यह रिमोर्ट से कंट्रोल होता है व इसे ड्रोन विमान भी कहा जाता है। इसे इस्तेमाल का सबसे बड़ा कारण यह है कि निगरानी से कोई भी संदिग्ध जगह बची न रह जाए।   इसबार स्वयं गृह मंत्रालय पुलिस को आधुनिक बनाने में लगा हुआ है। हर छोटी से छोटी बात पर सीधे गृहमंत्री अमित शाह से संपर्क साधते हुए संबंधित अधिकारी किसी भी पहलू को छोड़ते नहीं दिख रहे। जानकारी के मुताबिक 15 मार्च तक सभी उपकरणों के साथ पुलिस लैस नजर आएगी। जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाद सिंह ने स्थिति व व्यवस्था को समझते हुए बताया कि अब बिना टेक्नोलॉजी के पुलिसिया सिस्टम प्रभावित होने लगा है। समय के साथ अपटेड व अपग्रेड होते रहना चाहिए। अब रिकॉर्डिंग सहित ड्रोन कैमरे का प्रयोग होगा। जो लोग घटना को अंजाम देकर सबूत के अभाव में बेकसूर बताकर बच जाते थे वो अब नहीं बचेंगे।   धारा 370 हटने के बाद शांति बनी हुई है। यहां का जनजीवन पटरी पर लौट आया है लेकिन अभी भी कुछ नेता अपनी घटिया हरकतों को अंजाम की योजना बना सकते हैं। जैसा कि अबतक जम्मू-कश्मीर में 22 जिले थे। दो केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में 20 और लद्दाख में 2 जिले घोषित हो चुके। क्षेत्रफल के हिसाब से लेह भारत का सबसे बड़ा जिला माना जाता है इसलिए सतर्कता के हिसाब से चुनौती यहां भी कम नहीं है। जब भी कोई घटना होती है और अपराधी या आतंकवादी पकड़े नहीं जाते तो हमेशा पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठता था हालांकि स्थिति आज भी यही है। लेकिन इसके विपरित हमें यह भी समझना चाहिए कि संवेदनशील जगहों पर पुलिस बेहद कठिनाइयों के साथ काम करती है। भारी ठंड और गर्मी के बीच हर वक्त अपनी सेवाएं देना चुनौतीपूर्ण है। यदि बात जम्मू-कश्मीर जैसे प्रदेश की हो तो यहां दोहरी कठिनाइयां झेलते हुए पुलिसकर्मी देश की सेवा करते हैं। इसलिए आज पुलिस बल को और अधिक बल देने की जरूरत है।   बीते वर्ष के अंत में प्रदेश पुलिस को अंडर-व्हीकल इंस्पेक्शन सिस्टम और डीप सर्च मेटल डिटेक्टर जैसे आधुनिक उपकरण दिए गए थे। यह उपकरण विस्फोटक ले जा रहे वाहनों की पहचान करने और जमीन के कई फीट अंदर तक छुपाए गए विस्फोटक को ढूंढ लेता है। मौजूदा केंद्र सरकार ऐसी चीजों पर काम करके देश को अग्रसरता की ओर लेकर जा रही है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,  Fire of delhi

डाॅ. रमेश ठाकुर   देश की राजधानी दिल्ली बीते दो-तीन दिनों से उपद्रवियों की लगाई आग में झुलस रही है। सियासी जमात और व्यवस्था तमाशबीन बनी हुई है। दिल्ली के हालात बेहद नाजुक बन गए हैं। अमन कमेटियों और पुलिस-प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद उपद्रवी पीछे हटने को राजी नहीं हैं। नफरत के माहौल में लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। शाहीन बाग से निकली लपटें अब दूसरे इलाकों में फैल गई है। बीते दो दिनों के भीतर हालात इस कदर बिगड़ गए हैं, जिसमें एक पुलिसकर्मी समेत पांच अन्य लोग दंगाईयों का निशाना बन गए। पूर्वी दिल्ली के मौजपुर में सीएए के विरोध प्रदर्शन में दंगाईयों ने रतन लाल नाम के कांस्टेबल को घटनास्थल पर ही मार दिया। कांस्टेबल पास के ही गोकुलपुर एसीपी ऑफिस में तैनात था। वह सिर्फ दंगाईयों को रोक रहा था। घटना में स्थानीय डीसीपी और एसीपी भी गंभीर रूप से घायल हुए। दोनों को उपचार के लिए अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।   राजधानी में इस वक्त भयंकर तनाव है। जिन इलाकों में उपद्रव हो रहे हैं, वहां परिवहन सेवाओं पर बुरा असर पड़ा है। हिंसा को देखते हुए जाफराबाद, मौजपुर-बाबरपुर, गोकुलपुरी, जौहरी इनक्लेव और शिव विहार मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया है। उधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के कारण भी राजधानी में कई रास्तों पर ट्रैफिक प्रभावित हुआ है। पूरी दिल्ली में चक्का जाम की स्थिति बनी हुई है। हिंसा वाले इलाकों में आवाजाही एकदम बंद है। मंगलवार को सभी स्कूल बंद रहे, लोगों ने अपने बच्चों को घरों से नहीं निकलने दिया। दुकानें, मकान, कारखाने आदि बंद रहे। पूरे इलाके में धारा-144 लागू कर दी गई है लेकिन वह भी बेअसर दिखाई पड़ती है।   रात में भी लोगों ने नारेबाजी और पत्थरबाजी की। दंगाई खुलेआम जमकर पत्थरबाजी कर रहे हैं। देशविरोधी नारेबाजी कर आजादी की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने कर्दमपूरी के एक पेट्रोल पंप को आग में झोंक दिया है। पेट्रोल पंप जलता देख लोगों में अफरातफरी मच गई। लेकिन, उपद्रवी वहां से नहीं भागे, वहीं डटे रहे। उपद्रवियों ने कई वाहनों के शीशे भी तोड़े, घरों में लगातार पत्थर मार रहे हैं। पुलिस ने चारों ओर से मोर्चा संभाला हुआ है, बावजूद इसके हालात बेकाबू हो गए हैं। पूर्वी दिल्ली के अल्पसंख्यक क्षेत्र जाफराबाद, मौजपुर, कर्दमपूरी, भजनपुरा और सीलमपुर दंगों की आग में झुलस रहे हैं। पुरुष के अलावा महिलाएं भी सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रही हैं। सोमवार दोपहर के समय हालात उस समय ज्यादा खराब हो गए, जब सीएए विरोधियों के खिलाफ सैकड़ों लोग भगवा झंडे लेकर सड़क पर उतरे। उन्हें देखकर उपद्रवी और भड़क गए। उनपर ही पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इस दौरान हिंसक भीड़ ने कई घरों को आग लगा दी और कई दुकानों में तोड़फोड़ की।   जहां हिंसा हो रही है वहां दोनों धर्मों के लोग रहते हैं। प्रदर्शन को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि सीलमपुर को गोकलपुर से जोड़ता रोड नंबर 66 करीब 4 किलोमीटर लंबा है। यहां आमने-सामने अलग-अलग समुदाय की आबादी रहती है। बीच में 50 से ज्यादा गलियां पड़ती हैं। हर गली के कोने पर लोग खड़े हैं। यहां यह समझना, खासकर मौजपुर के आगे के क्षेत्र में मुश्किल हो रही थी कि गली के कोने पर खड़े लोग किस तरफ के हैं। दंगा बड़े ही सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है। सोमवार देर रात से प्रभावित इलाकों में भारी पुलिस बलों की तैनाती की गई है। घटना पर केंद्र सरकार की फिलहाल नजर बनी हुई है लेकिन हिंसा रोकने में नाकाम है। घटना को देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने देर रात तक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर दिल्ली पुलिस आयुक्त व अन्य सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक की। आयुक्त से घटना की तत्कालिक रिपोर्ट भी तलब की। लेकिन सवाल यही है कि बद से बदतर होती जा रही स्थिति पर आख़िरकार कबतक काबू पाया जाएगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,Manure is not only clothing but a medium of thought and employment

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   खादी केवल वस्त्र नहीं अपितु यह विचार, स्वाभिमान और बड़े वर्ग के लिए रोेजगार का माध्यम है। आज खादी से जुड़े उद्यमियों और विशेषज्ञों को तकनीक में बदलाव, बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद तैयार करने और नित नए प्रयोगों की ओर ध्यान देना जरूरी हो गया है। पिछले दिनों जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहल पर दो दिनी ग्लोबल कॉन्फ्रेंस का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस आयोजन से इंग्लैंण्ड, जापान सहित दुनिया के आठ देशों के प्रतिनिधियों, देशभर के जाने-माने गांधीवादी विचारकों और खादी से जुड़े विशेषज्ञों ने खादी के भविष्य को लेकर चिंतन मनन किया।   आजादी के आंदोलन में स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक बनी खादी आज अधिक प्रासंगिक हो गई है तो खादी की ताकत को पहचान कर आज भी ग्राम स्वराज का सपना साकार हो सकता है। इको फ्रैण्डली होने से आज दुनिया के देशों में खादी की मांग बढ़ी है। खादी-मार्केटिंग, एक्सपोर्ट पोंटेंशिएल, लो कॉस्ट और प्रोडक्शन कैपेसिटी पर माना गया कि खादी को फैशन से जोड़ना आज की आवश्यकता है तो खादी में इनोवेशन, डायवर्सिफिकेशन, मार्केट इंटेलिजेेंस पर ध्यान रखना होगा। पर्यावरण प्रदूषण और पानी की कमी से जूझ रही देश-दुनिया के सामने खादी एक सशक्त विकल्प है। इकोफ्रैण्डली होने के साथ ही अधिक लोगों को रोजगार, सभी मौसम में प्रकृति अनुकूल है खादी। खादी क्या और क्यों को चंद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। खादी मतलब ऑनेस्टी, सिंसिएरिटी, स्वदेशी, जीरो कार्बन फूट प्रिन्ट, जल संरक्षण, इकोफैण्डली सहित न जाने कितने ही प्रेरणास्पद बहुआयामी मायने रखती है।   आज खादी जन-जन की पहचान बनती जा रही है। विदेशों में इकोफ्रैण्डली परिधानों की मांग हो रही है। यह अच्छी बात है कि खादी में नवाचार किए जा रहे हैं। आईटीईएन्स के सहयोग से उन्नत चरखे तैयार किए जा रहे हैं, वहीं डिजाइनरों को इससे जोड़ा जा रहा है क्योंकि आज यह उभरकर आ गया है कि पर्यावरण को बचाना है तो खादी को अपनाना ही होगा। लंदन की जो सोल्टर ने गुणवत्ता के साथ ही पारदर्शी सस्टेनेबल सप्लाई चेन विकसित करने की आवश्यकता प्रतिपादित की तो जापान की फुमी कोबायशी ने भारत-खादी और जापान के बीच पिछली दो-तीन सदियों के समन्वय को रेखांकित किया। जापान में एनजीओ व अन्य संस्थाओं के सहयोग से खादी को नया मुकाम दिलाया जा रहा है। खास बात यह कि स्वयं फुमी कोबायशी खादी से बने वस्त्र ही पहने थीं। कम्फरटेबल, इकोलॉजीकली, डिजाइन आदि के अनुसार तैयार होने से खादी वस्त्रों की अच्छी मांग विदेशों में होने लगी है। गुजरात के कच्छ में हस्तकरघा और हस्तकला ने गरीबों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए है। आज खादी वस्त्रों के निर्यात की विपुल संभावनाएं हैं।   यह सब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश में 20 लाख गांठ कपास उत्पादन में से बड़ी मात्रा में कपास का निर्यात बांग्लादेश को होता है, वहां से अपेरल तैयार होकर दुनिया के देशों को निर्यात हो रहे हैं। हमारे पास कच्चा माल होते हुए भी हम सही मायने में वेल्यू एडिशन नहीं कर पा रहे। सम्मेलन में जाने-माने फैशन डिजायनरों रीतू बेरी, हिम्मत सिंह, पूजा जैन, परेश लांबा, पूजा गुप्ता, अदिति जैन, रूमा देवी के साथ ही भारतीय शिल्प कला संस्थान की निदेशक डॉ. तूलिका गुप्ता ने फैशन की दुनिया में हो रहे प्रयोगों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि खादी परिधानों को ग्लोबल फैशन शो में प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है। खादी में रंग संयोजन, नित नए प्रयोग होने से अब खादी आमजन की पसंद बनती जा रही है।   सर्दी हो या गर्मी या बरसात खादी ऐसा वस्त्र है, जिसे सभी मौसम में पहना जा सकता है। एक समय था जब गांवों में घर-घर में चरखा होता था तो बच्चों को स्कूलों में तकली से कताई सिखाई जाती थी। हालांकि आज वस्त्र की दुनिया में तेजी से बदलाव आया है पर इको फ्रैण्डली होने के कारण देश-विदेश में खादी की तेजी से मांग बढ़ती जा रही है। कातिनों और बुनकरों को मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिलने से धीरे-धीरे घरों से चरखे गायब हो गए तो आज की पीढ़ी ने इस काम से मुंह मोड़ लिया। खादी की प्रासंगिकता आज और अधिक होने से तकनीक में सुधार की, बाजार की मांग के अनुसार खादी वस्त्रों को आकार देने की आवश्यकता हो गई है। आजादी के समय खादी केवल वस्त्र न होकर विचार के साथ ही स्वाभिमान का प्रतीक रही है। ऐसे में खादी के वैश्वीकरण के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे सभी लोगों के साथ ही फैशन डिजाइनरों को नई तकनीक और एग्रेसिव मार्केटिंग के साथ आगे आना होगा। विज्ञापन की चकाचौंध में खादी कहीं पिछड़ती जा रही है। सरकार द्वारा हर साल खादी को बढ़ावा देने के लिए खादी मेलों का आयोजन किया जाता रहा है। सामान्यतः गांधीजी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से खादी मेलों का सिलसिला चलता है जो सामान्यतः जनवरी के बाद तक चलता रहता है। राजस्थान सरकार ने खादी उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक छूट दी। परिणाम सामने हैं, जहां अन्य सालों के डेढ़-दो करोड़ की सालाना छूट खादी संस्थाओं को मिल पाती थी, वहीं इस साल 17 करोड़ की बड़ी राशि छूट के रूप में खादी संस्थाओं को प्राप्त हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खादी की ब्राण्डिंग का संदेश दे चुके हैं। देश में खादी की ब्राण्डिंग का ही परिणाम है कि समूचे देश में 2018-19 में 3215 करोड़ का टर्नओवर रहा जो इस साल 5 हजार करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। इससे पहले आठ सौ-सवा आठ सौ करोड़ का ही टर्नओवर रहता था। इस दौरान खादी उत्पादों पर अच्छी-खासी छूट भी दी जाती है।   खादी पर मंथन इसलिए सामयिक हो जाता है कि देश में बुनकरों की माली हालत दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। जबकि केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा बुनकरों के कल्याण की अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। खादी में नवाचार और बाजार मिलने से इन ग्रामोद्योगों से जुड़े लोगों की आय में इजाफा होगा। एक ओर हमें प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए खादी उत्पादों को जनता की मांग के अनुकूल बनाना होगा, फैशनेबल व आकर्षक बनाने का शोध कार्य जारी रखना होगा, वहीं विपणन कला का उपयोग भी करना होगा। उत्पाद की गुणवत्ता तो पहली शर्त है ही। यदि ऐसा होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब खादी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बन जाएगी।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 February 2020


bhopal,  Collector: Need to change mentality, not name

डॉ. अजय खेमरिया   मध्य प्रदेश में सरकार कलेक्टर का नाम बदलने जा रही है। अंग्रेजी हुकूमत के लिए राजस्व वसूलने यानी कलेक्ट करने के लिए ईजाद किये गए कलेक्टर के पद में अभी भी औपनिवेशिक प्रतिध्वनि होती है। हालांकि मप्र के आईएएस अफसर इस नाम को बदलने के लिये राजी नहीं हैं। मप्र आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आईसीपी केसरी की अध्यक्षता में बनाई गई पांच सदस्यीय कमेटी के समक्ष राज्य के आईएएस अफसरों के अलावा राज्य प्रशासनिक सेवा और तहसीलदार संघ ने भी सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध किया है। अब यह कमेटी राज्य के सांसद, विधायक, और अन्य मैदानी जनप्रतिनिधियों से परामर्श कर मुख्यमंत्री कमलनाथ को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। राज्य के सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ. गोविंद सिंह स्पष्ट कर चुके हैं कि कलेक्टर का नाम बदला जाएगा। मप्र सरकार मैदानी प्रशासन तंत्र में भी नीतिगत रूप से बदलाव कर रही है, अब जिलों में जिला सरकार काम करेगी। यानी जिला प्रशासन की जगह अब सरकार लेगी जो प्रशासन की तुलना में सरकार के समावेशी स्वरूप का अहसास कराता है।   कलेक्टर अभी जिले का सबसे बड़ा अफसर होता है और उसकी प्रशासनिक ताकत समय के साथ असीमित रूप से बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि कलेक्टर के आगे विधायक, सांसद जैसे जनता के चुने प्रतिनिधि भी लाचार नजर आते हैं।मप्र में छतरपुर के मौजूदा कलेक्टर तो स्थानीय विधायकों को मिलने के लिये घन्टो इंतजार कराकर सुर्खियों में रह चुके हैं। सरकार के तमाम मंत्री अनदेखी की शिकायत करते रहते हैं।   असल में मौजूदा राजव्यवस्था का स्वरूप स्वतः कलेक्टर के पद को अपरिमित ताकत देता है। लोककल्याणकारी राज के चलते सरकारें लगातार जनजीवन में अपना सकारात्मक दखल बढ़ाती जा रही हैं। प्रशासन का ढांचा विशालकाय हो गया है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक सरकार की भागीदारी सुनिश्चित है। ऐसे में कलेक्टर लोककल्याणकारी योजनाओं से लेकर आधारभूत ढांचा विकास और कानून-व्यवस्था के अंतहीन दायित्व कलेक्टर के पास आ गए हैं। इन परिस्थितियों में कलेक्टर की व्यस्तता तो बढ़ी ही है, समानान्तर ताकत और अधिकारों के साथ आनेवाली बुराइयों ने भी इस पद को कब्जे में ले लिया है। सरकार की समस्त मैदानी प्रयोगशाला आज जिला इकाई है। कलेक्टर एक ऐसे परीक्षक बन गए हैं, जहां से हर समीकरण निर्धारित होता है। कलेक्टर के पद से जुड़ी असीम ताकत ने निर्वाचित तंत्र को आज लाचार-सा बना दिया है। आज भी आम आदमी कलेक्टर को लेकर कतई सहज नहीं है। इसी व्यवस्थागत विवशता को समझते हुए मप्र की कमलनाथ सरकार ने बुनियादी परिवर्तन का मन बना लिया है।   जिला सरकार का प्रयोग वस्तुतः मैदानी प्रशासन तंत्र में जनभागीदारी को प्रधानता देना ही है। इस जिला सरकार में प्रभारी/पालक मंत्री अध्यक्ष होंगे और कलेक्टर सचिव। चार सदस्य जनता की ओर से मनोनीत होंगे। कलेक्टर का पदनाम बदला जाना भी इस अंग्रेजी राज व्यवस्था पर मनोवैज्ञानिक रूप से प्रधानता हासिल करने का प्रतीक है। बेहतर होगा कलेक्टर भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर आम नागरिकों के साथ, उनकी अपेक्षाओं व आकांक्षाओं के साथ समेकन का प्रयास करें। नहीं तो पदनाम बदले जाने का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा। वैसे, देश में कलेक्टर हर राज्य में नहीं हैं। पंजाब में यह डीसी, यूपी में डीएम, बिहार में समाहर्ता के नाम से जाने जाते हैं। जनप्रतिनिधियों को भी चाहिये कि वे भी लोकव्यवहार में पारदर्शिता का आवलंबन करें, तभी औपनिवेशिक राजव्यवस्था से जनता को मुक्ति मिल सकेगी।   अफसरशाही को लेकर आम धारणा है कि वह एक अनावश्यक आवरण खड़ा करके रहती है। लोकसेवक के रूप में उसकी आवश्यकता के साथ आज भी भारत की नौकरशाही न्याय नहीं कर पाई है। त्रासदी यह है कि 70 साल बाद भी मानसिकता के स्तर पर हमारे समाज से निकली जमात ने खुद को आईसीएस के मनोविज्ञान को त्यागा नहीं है। कलेक्टर की व्यवस्था असल में आज भी देशभर में लोगों को सुशासन का अहसास कराने में नाकाम रही है। नाम बदलकर जिला अधिकारी, जिला प्रमुख, जिलाधीश करने से उस बुनियादी लक्ष्य की ओर उन्मुख होना संभव नहीं है, जिसे लेकर कमलनाथ सरकार यह कदम उठा रही है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 February 2020


bhopal,  Need to connect common farmers with innovations of exploratory farmers

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   देश में किसान को समझने के सार्थक प्रयास हुए ही नहीं। आजादी के बाद से ही राजनीतिक दलों के लिए किसान सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का माध्यम बने रहे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्ता की वैतरणी पार करने के लिए किसान प्रमुख माध्यम रहा है। कर्ज माफी ऐसा नारा रहा है जो पिछले पांच दशक से छाया रहा है। किसानों को ब्याजमुक्त ऋण से लेकर ऋण माफी का लंबा सिलसिला चला आ रहा है पर जो ठोस प्रयास होने चाहिए वह प्रयास देश के कोने-कोने में अपने बलबूते पर प्रयास कर रहे अन्नदाता का ही है जो पद्मश्री या कृषि विज्ञानी पुरस्कार पाने के बाद भी उस मुकाम को प्राप्त नहीं कर सके हैं जो हासिल होना चाहिए।   यह सही है कि किसानों की बदहाली और खेती किसानी से होने वाली आय को लेकर आज सभी राजनीतिक दल चिंतित हैं। लगभग सभी दल और किसानों से जुड़े संगठन किसानों की ऋणमाफी की बात तो करते ही हैं तो कोई कृषि उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने, कोई अनुदान बढ़ाने या कोई किसानों को दूसरी रियायतें देने पर जोर दे रहे हैं। मजे की बात यह है कि अब तो ऋणमाफी या एक-दूसरे की घोषणाओं पर तंज कसते हुए अपनी योजनाओं को अधिक किसान हितैषी बताने की जुगत में भी लगे हैं। मजे की बात यह है कि ऋणमाफी या दूसरी इसी तरह की घोषणाएं किसानों की तात्कालिक समस्या को तो हल कर रही है पर दीर्घकालीन कृषि विकास में ऋणमाफी जैसी घोषणाएं कितनी कारगर होगी, यह आज भी सवालों के घेरे में है।   आजादी के बाद देश में कृषि विज्ञानियों ने शोध व अध्ययन के माध्यम से तेजी से कृषि उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम किया। अधिक उपज देने वाली व प्रदेश विशेष की भौगोलिक स्थिति के अनुसार जल्दी तैयार होने वाली किस्मों का विकास हुआ। रोग प्रतिरोधक क्षमता व उर्वरा शक्ति बढ़ाने के नए-नए प्रयोग हुए। खेती किसानी को आसान बनाने के लिए एक से एक कृषि उपकरण बाजार में आए। इस सबके बावजूद हमारी खेती अंधाधुंध प्रयोगों की भेंट चढ़ती गई। आज एक ओर उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित प्रयोग की बात की जा रही है तो दूसरी और ऑरगेनिक खेती व परंपरागत खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता प्रतिपादित की जा रही है। आज तकनीक के अत्यधिक प्रयोग से पशुपालन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। हालांकि अब किसानों की आय को दोगुणा करने के संकल्प के चलते कंपोजिट खेती की बात की जा रही है, जिसमें खेती के साथ ही अतिरिक्त आय के लिए पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और इसी तरह के अन्य कार्यों को साथ-साथ करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।   इन सबके बीच देश के कोने-कोने मेें प्रगतिशील किसानों द्वारा अपने बल पर या कहें कि संकल्पित होकर खेत को ही प्रयोगशाला बनाकर कुछ नया करने में जुटे कृषि विज्ञानियों को सामने लाने की पहल जाने-माने कृषि लेखक डॉ. महेन्द्र मधुप ने की है। डॉ. मधुप ने देश के 13 प्रदेशों के 56 प्रगतिशील किसानों को एक माला में पिरोते हुए उनके नवाचारों को पहचान दिलाने का प्रयास किया है। अन्वेषक किसान के नए अवतार में लाख कठिनाइयों से जूझते हुए खेती के लिए कुछ नया करने के प्रयासों को इस पुस्तक में समाहित किया है। कहने को हमारे यहां जुगाड़ शब्द का आम चलन है पर जुगाड़ ही इनमें से कई किसानों के प्रयासों से खेती आसान हुई है। सबसे अच्छी बात यह कि यह सब अपने बलबूते और कठिन संघर्ष के बाद हासिल हुआ। इन प्रगतिशील किसान विज्ञानियों ने प्रयोगशाला या कागज-पेन के सहारे नहीं, खेत-खलिहान की वास्तविक प्रयोगशाला में प्रयोग किए हैं। यही कारण है कि चाहे महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर हों या राजस्थान के जगदीश पारीक या हरियाणा के धर्मवीर कंबोज या इस पुस्तक में स्थान पानेे वाले अन्य 56 कर्मवीर किसान अपनी मेहनत से मुकाम हासिल कर पाए हैं।   सबसे जरूरी है सरकार अपने बजट का कुछ हिस्सा खेत से सीधे जुड़े इन प्रयोगधर्मी किसानों के खेत को ही योजनाओं के क्रियान्वयन, किसानों के शिक्षण-प्रशिक्षण और विजिट का व्यावहारिक केन्द्र बनाने की दिशा में आगे बढ़े तो इन विज्ञानियों को न केवल प्रोत्साहन मिलेगा अपितु किसानों को धरातलीय अनुभव का लाभ मिलेगा। किसी भी योजना या किसानों के प्रशिक्षण का कुछ प्रावधान रखा जाता है तो यह खेती किसानी को नई दिशा दे सकेगा। इसके लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। आशा की जानी चाहिए कि गुदड़ी के लाल इन अन्वेषी किसानों की पहल को प्रोत्साहित करने के सकारात्मक प्रयास होंगे, तभी डॉ. मधुप की मेहनत रंग लाएगी। सरकार किसानों की आय को दोगुणा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, ऐसे में इन अन्वेषी किसानों के प्रयोगों से किसानों को जोड़ने के प्रयास करने ही होंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 February 2020


bhopal,  Congress should lead new people

रमेश सर्राफ धमोरा   दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस सकते में है। दिल्ली के सिंहासन पर वर्षों एकछत्र राज करने वाली पार्टी कांग्रेस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि दिल्ली में उसे इतनी बदतर स्थिति का सामना करना पड़ेगा। उसके तीन उम्मीदवारों को छोड़ बाकी सभी की जमानत तक जब्त हो जायेगी। पिछली बार की तरह इसबार भी दिल्ली में कांग्रेस अपना खाता खोलने में नाकाम रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत पर भी कांग्रेस नेता खुश नजर आ रहे हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने ट्वीट करते हुए लिखा कि `आप की जीत हुई और धोखेबाज हार गये। दिल्ली के लोग जो कि भारत के सभी हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं उन्होंने भाजपा के ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और खतरनाक एजेंडे को हरा दिया। मैं दिल्ली के लोगों को सेल्यूट करता हूं। जिन्होंने उन राज्यों के लोगों के लिए एक उदाहरण पेश किया है, जहां 2021 और 2022 में चुनाव होने वाले हैं।' पी. चिदंबरम के ट्वीट पर दिल्ली महिला कांग्रेस अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने पी. चिदंबरम पर निशाना साधते हुये दिल्ली में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर नेतृत्व पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने ट्वीट किया-`क्या कांग्रेस ने भाजपा को हराने का काम क्षेत्रीय दलों को आउटसोर्स कर दिया है? यदि ऐसा नहीं है तो हम अपनी करारी हार की चिंता करने के स्थान पर आम आदमी पार्टी की जीत पर खुशी क्यों मना रहे हैं? और अगर इसका जवाब हां में है तो हमें अपनी (प्रदेश कांग्रेस समितियां) दुकान बंद कर देनी चाहिए।' शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा था कि `शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने में देरी और एकजुटता की कमी के कारण यह शिकस्त हुई है। हम दिल्ली में फिर हार गए। आत्ममंथन बहुत हुआ, अब कार्रवाई का समय है। उन्होंने सवाल किया कि अगर भाजपा विभाजनकारी राजनीति कर रही है। केजरीवाल स्मार्ट पॉलिटिक्स कर रहे हैं तो हम क्या कर रहे हैं? क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि हमने घर को व्यवस्थित रखने के लिए पूरा प्रयास किया?' शर्मिष्ठा मुखर्जी के बयान के बाद कांग्रेस में कपिल सिब्बल जैसे बयान वीर नेताओं को मानो सांप सूंघ गया। किसी ने भी मुखर्जी की बात काटने की हिम्मत नहीं दिखायी। उलटे मिलिंद देवड़ा, जयराम रमेश ने मुखर्जी के बयान का समर्थन किया।दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद लगता है कि कांग्रेस के लिए 2020 का साल अच्छा नहीं रहेगा। इसी साल बिहार विधानसभा के भी चुनाव होने हैं, जहां भाजपा जनता दल (यू) का मजबूत गठबंधन सरकार में है। उसके मुकाबले बिहार में कांग्रेस कुछ खास कर पाएगी, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। इसी वर्ष 73 राज्यसभा सीटों के चुनाव भी होने हैं। राज्यसभा सीटों के चुनाव में भी कांग्रेस को लाभ होता नहीं दिख रहा है। राज्यसभा में फिलहाल कांग्रेस के पास 46 सीटें हैं। इस साल राज्यसभा में कांग्रेस की 17 सीटें खाली होंगी उनमें से कांग्रेस 11 सीटें ही जीत पाएगी। इस तरह देखें तो कांग्रेस को राज्यसभा में छह सीटों का नुकसान होने वाला है। हालांकि कांग्रेस को राजस्थान में दो, मध्य प्रदेश में एक, छत्तीसगढ़ में दो व गुजरात में एक सीट का फायदा होगा। लेकिन उसे आंध्र प्रदेश में दो, अरुणाचल प्रदेश में एक, असम में एक, हिमाचल प्रदेश में एक, कर्नाटक में एक, उत्तर प्रदेश में एक, उत्तराखंड में एक, मेघालय में एक, मिजोरम में एक व ओडीशा में एक सीट का घाटा भी होगा। इस वर्ष के राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गोवा, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, ओडीशा, दिल्ली, पुड्डुचेरी सहित 11 प्रदेशों में पूरी तरह साफ हो जाएगी। राज्यसभा में कांग्रेस को मिलने वाली 11 सीटों पर दावेदारों की लंबी कतार लगी हुई है। लोकसभा और विधानसभा में पराजित हुये सभी बड़े नेता राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुंचना चाहते हैं। इसीलिए सभी नेता अपने लिये लॉबिंग करने में जुटे हैं। राज्यसभा से रिटायर हो रहे वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह, राज बब्बर, कुमारी सैलेजा, टी सुब्बारामी रेड्डी, हुसैन दिलवई, मधुसूदन मिस्त्री फिर से अपनी सीट पक्की करना चाहते हैं। हरियाणा में कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में है। जहां से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने पुत्र दीपेंद्र हुड्डा को राज्यसभा में भेजना भेजना चाहते हैं। वही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा की मौजूदा सदस्य कुमारी सैलेजा फिर से टिकट पाने का प्रयास कर रही हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी राज्यसभा में जाकर अपनी सुविधाएं बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस दो सीटें जीतने की स्थिति में है। वहां पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एकबार फिर राज्यसभा में जाना चाहते हैं। इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, मीनाक्षी नटराजन जैसे दर्जनों नेता हैं, जिनकी नजर राज्यसभा टिकट पर लगी हुई है।   कर्नाटक में कांग्रेस अपने दम पर एक सीट जीतने की स्थिति में है। वहां पूर्व केंद्रीय मंत्री मलिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोइली, बीके हरिप्रसाद, सलीम अहमद जैसे नेताओं की लंबी लाइन लगी हुई है। गुजरात की दो सीटों पर मधुसूदन मिस्त्री, दीपक बावरिया, शक्ति सिंह गोहिल, राजीव शुक्ला, राज बब्बर प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा तारिक अनवर, सुबोधकांत सहाय, जितिन प्रसाद, आरएनपी सिंह, हरीश रावत, के.सी. वेणुगोपाल, भंवर जितेंद्र सिंह, गिरीजा व्यास, रुचि डालमिया, अविनाश पांडे, पृथ्वीराज चौहान, मिलिन्द देवड़ा, सुशील कुमार शिंदे, मुकुल वासनिक, हुसैन दिलवई, राजीव सावंत, डॉ. चन्द्रभान, दुरू मियां, अश्क अली टाक, रामेश्वर डूडी सहित काफी संख्या में कांग्रेस के पुराने व वरिष्ठ नेता राज्यसभा टिकट पाने को प्रयासरत हैं।   कांग्रेस को चाहिए कि पूर्व के चुनाव में जनता द्वारा नकारे गए वर्षों से सत्ता व संगठन में काबिज नेताओं के बजाय ऐसे युवा चेहरों को राज्यसभा में मौका देना चाहिए जिनका अपने राज्यों में जमीनी स्तर पर प्रभाव हो और जो पूरी दक्षता से संगठन के कार्य कर रहे हों। कांग्रेस में महासचिवों के अलावा प्रदेशों के प्रभारी, राष्ट्रीय सचिव, राष्ट्रीय संयुक्त सचिव के पदों पर कई उर्जावान नेता काम कर रहे हैं। यदि कांग्रेस उनमें से कुछ लोगों को राज्यसभा में लाकर नया नेतृत्व देती है तो यह कांग्रेस के लिए अच्छी बात होगी। इससे कांग्रेस के प्रति युवाओं का आकर्षक बढ़ेगा। साथ ही संगठन के प्रति समर्पित लोगों को एक संदेश मिलेगा कि जो भी पार्टी पदाधिकारी, कार्यकर्ता पार्टी हित में अच्छा काम करेगा उसे सत्ता में भी भागीदार बनाया जाएगा। नए लोगों के आगे आने से पुरानी हो चुकी कांग्रेस एकबार फिर नए जोश व नई सोच के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करेगी। इससे देश की जनता में भी कांग्रेस एक अच्छा सकारात्मक संदेश देने में कामयाब हो सकेगी।   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal,  How will Kejriwal deal with challenges

योगेश कुमार गोयल दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने अरविंद केजरीवाल की अगले पांच वर्षों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी पर मुहर लगा दी। रामलीला मैदान में लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए जिस प्रकार उन्होंने कहा कि वे दिल्ली के विकास के लिए प्रधानमंत्री का आशीर्वाद चाहते हैं और दिल्ली को आगे बढ़ाने के लिए अब केन्द्र सरकार के साथ मिलकर काम करेंगे, उससे उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं और इरादे जाहिर करने का प्रयास किया है। केजरीवाल मंत्रिमंडल में उनके पिछले सभी छह मंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन, गोपाल राय, कैलाश गहलोत, इमरान हुसैन और राजेंद्र गौतम शामिल किए गए हैं। रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के बाद केजरीवाल सरकार से लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ी हैं। उन्हें अब जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पिछले पांच साल के अधूरे कार्यों को पूरा करना होगा और चुनाव के दौरान किए गए वायदों को अमलीजामा पहनाना होगा, जो आसान नहीं है। नए कार्यकाल में अनेक चुनौतियां उनके समक्ष मुंह बाये खड़ी हैं। केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान 10 चीजों की लिखित गारंटी देते हुए जनता से मुफ्त दी जा रही तमाम योजनाएं अगले कार्यकाल में भी जारी रखने तथा कुछ और नए वर्गों को भी कुछ मुफ्त योजनाओं का लाभ देने का वादा किया था। इसके अलावा उन्होंने प्रदूषण से कराहती दिल्ली में प्रदूषण कम करने का भी बड़ा वादा किया। इन वादों को मूर्त रूप देने में केजरीवाल सरकार की अग्निपरीक्षा होगी। उनके समक्ष बिजली, पानी, बस यात्रा, वाई-फाई सरीखी मुफ्त योजनाओं और मोहल्ला क्लीनिक, परिवहन व्यवस्था में सुधार, यातायात जाम से मुक्ति दिलाना, बसों में मार्शलों की तैनाती, महिला सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरे, अच्छी शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को नए कार्यकाल में किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं, यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसमें गौर करना होगा कि अपनी सरकार के खजाने को घाटे में लाए बगैर जनता को कैसे ये तमाम सुविधाएं देना जारी रखते हैं, साथ ही दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़ा निवेश करने के लिए धन कहां से जुटाते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार दिल्ली सरकार ने पिछले पांच वर्षों में कोई नया कर लगाए बिना और करों में बढ़ोतरी किए बगैर इन लक्ष्यों को हासिल किया, उसे देखते हुए यह कोई ज्यादा बड़ी चुनौती नहीं होगी। दरअसल, देश के करीब तीन फीसदी वित्तीय घाटे के मुकाबले कई मुफ्त योजनाओं के बावजूद दिल्ली का वित्तीय घाटा आधा फीसदी से भी कम बताया जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह माना गया है कि राजस्व संग्रह के मामले में दिल्ली की पूर्ववर्ती सरकारों के मुकाबले केजरीवाल सरकार की स्थिति राष्ट्रीय स्तर के औसत से बेहतर है। केजरीवाल सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती गैस चेंबर में तब्दील होती दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर साफ-सुथरा शहर बनाने की है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार दिल्ली का प्रदूषण स्तर आपातकालीन स्थिति में पहुंच जाता है। इसके पीछे अन्य कारणों के अलावा दिल्ली से लगते हरियाणा, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में जलती पराली से निकलने वाले धुएं का भी अहम योगदान है। देखना होगा कि इस गंभीर समस्या से निपटने और दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए केजरीवाल क्या कदम उठाते हैं। दिल्ली को वर्ल्ड क्लास शहर बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना, दिल्ली सरकार के लिए दुष्कर होगा। जिस प्रकार दिल्ली में झुग्गी-झोंपडि़यों और रेहड़ी-पटरियों की तादाद लगातार बढ़ रही है, दिल्ली कैसे साफ-सुथरी बनेगी और विश्वस्तरीय स्मार्ट सिटी का दर्जा हासिल करेगी, कह पाना मुश्किल है। यमुना की सफाई भी बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि केजरीवाल स्वयं विपक्षी दलों के आरोपों के जवाब में चुनौती दे चुके हैं कि आगामी पांच वर्षों में वे यमुना को इतना साफ कर देंगे कि उसमें डुबकी लगाई जा सकेगी लेकिन पड़ोसी राज्यों के सहयोग के बिना यह लक्ष्य पूरा होना संभव नहीं होगा। चुनाव से कुछ समय पहले दिल्ली में दूषित पेयजल को लेकर काफी राजनीतिक गर्मागर्मी देखी गई थी। जहां केन्द्र सरकार की ओर से विभिन्न रिपोर्टों के हवाले से दिल्ली में अधिकांश जगहों पर दूषित पेयजल की सप्लाई के दावे किए गए थे, वहीं दिल्ली सरकार ने इन दावों को गलत बताते हुए साफ पानी उपलब्ध कराने के दावे किए थे। अपने चुनावी घोषणापत्र में केजरीवाल ने हर परिवार को 20 हजार लीटर मुफ्त पानी की योजना जारी रखने के साथ हर घर 24 घंटे शुद्ध पेयजल की सुविधा देने की बात कही थी। आने वाले समय में दिल्ली में स्वच्छ पानी की सप्लाई के लिए सरकार भले ही बड़े-बड़े जलशोधन संयंत्र लगाकर गंभीर प्रयास करती दिखे लेकिन दिल्ली की जनता को हर समय शुद्ध हवा और शुद्ध पानी निरन्तर मिले, इसके लिए जरूरी है कि पड़ोसी राज्यों का सहयोग दिल्ली सरकार को मिले।  जनलोकपाल बनाने, भ्रष्टाचार रोकने और दिल्ली को ईमानदार सरकार देने का वादा इस कार्यकाल में केजरीवाल कब और कैसे पूरा करेंगे, इसपर भी सभी की नजरें होंगी। दरअसल जनलोकपाल बिल पिछले काफी से केन्द्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। जनलोकपाल के मुद्दे से ही दिल्ली की राजनीति में कदम रखने वाले केजरीवाल पर चुनाव के दौरान निरन्तर आरोप लगते रहे कि वे जनलोकपाल को भूल चुके हैं। हालांकि केजरीवाल कहते रहे कि पिछले चार वर्षों से केन्द्र सरकार ने जनलोकपाल को लंबित रखा है और इसे पास कराने के लिए वे संघर्ष जारी रखेंगे। ऐसे में उनके लिए किसी भी प्रकार दिल्ली में जनलोकपाल को लागू करना बड़ी चुनौती है। केजरीवाल की ईमानदार प्रशासन की मुहिम पर भी काले बादल मंडराते रहे हैं। पांच साल पहले दिल्ली में प्रचण्ड बहुमत के साथ सरकार बनाने के बाद केजरीवाल ने लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने के गुर समझाते हुए कहा था कि वे उनसे रिश्वत मांगने वालों की वीडियो बनाकर पोस्ट करें, जिनपर सरकार कार्रवाई करते हुए भ्रष्ट कर्मचारियों को दंडित करेगी लेकिन पिछले काफी समय से कोई नहीं जानता कि लोगों द्वारा पोस्ट की गई ऐसी वीडियोज पर कितनी कार्रवाई हुई। दिल्ली के सरकारी विभागों का हाल भ्रष्टाचार के मामले में आज भी संतोषजनक नहीं है। लिहाजा, तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन केजरीवाल की जिम्मेदारियां, चुनौतियां और जनता के प्रति जवाबदेही पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। बेहतर यही होगा कि अपने नए कार्यकाल में वे केन्द्र के साथ टकराव का रास्ता छोड़ दिल्ली के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करने का प्रयास करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal, Opponents need excuse

सियाराम पांडेय 'शांत'   कुछ लोगों की बेवजह लड़ने, विरोध अथवा मीन-मेख निकालने की आदत होती है। जहां जरूरत न हो, वहां भी विवाद-फसाद की जमीन तैयार कर लेते हैं। वहीं, कुछ लोग सहजता में ऐसे काम कर जाते हैं जो विपरीत धारा के लोगों को न केवल उद्वेलित और विचलित करते हैं बल्कि उन्हें विरोध करने की आधारभूमि भी मुहैया कराते हैं। अच्छा होता कि नए प्रयोगों को अंजाम देने से पूर्व जनसम्मति ले ली जाती। विरोधियों की भी राय जान ली जाती। विरोधी से समर्थन की अपेक्षा बेमानी है लेकिन सबका दिल जीतने के प्रयास होते ही रहने चाहिए।   देश में महाकाल एक्सप्रेस को भी लेकर राजनीतिक विवाद आरंभ हो गया है। यह विवाद उसे धार्मिकता से जोड़ने को लेकर है। ट्रेन राष्ट्रीय संपत्ति है और इसे धार्मिक स्वरूप दिया जाना चाहिए या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन अकारण विवाद की स्थिति पैदा करना किसी लिहाज से ठीक नहीं। ट्रेन का नाम कुछ भी रखा जा सकता है। पहले भी देवी-देवताओं और महापुरुषों के नाम पर ट्रेनों का संचालन हुआ लेकिन कभी प्रतिवाद नहीं हुआ। काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस लंबे समय से चल रही है लेकिन इसमें बाबा विश्वनाथ के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं की गई। इसमें कोई मंदिर नहीं बनाया गया। कामाख्या एक्सप्रेस में भगवती कामाख्या का एक भी चित्र नहीं लगाया गया। वैद्यनाथ धाम एक्सप्रेस के साथ भी कमोबेश यही स्थिति रही है। अनेक ऐसी ट्रेन हैं जो देवी-देवताओं या तीर्थस्थलों के नाम पर हैं। सवाल उठता है कि जब बाकी ट्रेनों में इस तरह के प्रयोग नहीं हुए तो इसका क्या औचित्य है? कुछ लोग इस बात पर आपत्ति जाहिर कर सकते हैं कि सरकार ट्रेनों का भगवाकरण कर रही है लेकिन इस विचारधारा पर सम्यक चिंतन और मनन की भी आवश्यकता है।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 फरवरी को अपने संसदीय क्षेत्र से महाकाल एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। चूंकि यह ट्रेन महाकाल के नाम से शुरू की गई है, इसलिए रेलवे ने उसे महत्व देने की कोशिश की। इसके लिए उसने नवोन्मेष भी किया है। यह पहली ट्रेन है जिसमें कोच बी-5 में एक सीट भगवान महाकाल के लिए आरक्षित की गई है। अनजाने में कोई उस सीट पर बैठ न जाए, इसलिए सीट पर महाकाल का मंदिर बना दिया गया है। यह पहली ट्रेन है जिसमें इस तरह की व्यवस्था की गई है लेकिन इसपर राजनीति शुरू हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन औवेसी ने तो प्रधानमंत्री कार्यालय को ट्वीट कर ट्रेन की सीट पर शिव मंदिर बनाए जाने को लेकर सवाल उठा दिया है। उन्होंने अपने ट्वीट में संविधान की प्रस्तावना भी साझा की है और यह बताने-जताने की कोशिश की है कि संविधान में सभी धर्मों के लोगों के साथ समानता का व्यवहार करने की बात कही गई है। किसी ट्रेन के चलने और उसमें धार्मिक वातावरण बनाए रखने में किसी को क्या ऐतराज हो सकता है? रही बात महाकाल एक्सप्रेस की तो यह काशी, उज्जैन और ओंकारेश्वर को जोड़ती है। देश के दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच की यात्रा को आसान बनाती है। काशी विश्वनाथ, महाकाल, ओंकारेश्वर और मम्लेश्वर के प्रति शिवभक्तों की अपार आस्था है। उनकी श्रद्धा और विश्वास को यह ट्रेन मजबूती प्रदान करेगी, इतनी उम्मीद की जा सकती है। यात्री जिस स्थल पर जा रहा है, अगर उसके साथ सकारात्मक आध्यात्मिकता का समावेश हो, शुचिता और सद्भाव बना रहे तो इसमें बुराई क्या है? इस ट्रेन में भारत या दुनिया का कोई भी भारत आया पर्यटक भी यात्रा कर सकता है। किसी के लिये भी इस ट्रेन में न बैठने देने जैसा कोई नियम नहीं बनाया गया है, ऐसे में समानता के अधिकारों का हनन कहां होता है?   महाकाल एक्सप्रेस में भक्ति संगीत की व्यवस्था भी की गई है। हर कोच में दो निजी गार्ड होंगे और केवल शाकाहारी भोजन मिलेगा। हर कोच में पांच सुरक्षाकर्मियों की तैनाती होगी मतलब यात्री सुरक्षित और निरापद यात्रा कर सकेंगे, इस बात का विश्वास तो किया ही जा सकता है। जिस तरह महाकाल एक्सप्रेस का इंदौर में भजन गाकर स्वागत किया गया, वह काबिलेतारीफ है। यह स्वागत का सिलसिला रोज नहीं चलेगा, यह सबको पता है लेकिन इससे जनभावना का प्रकटीकरण तो होता ही है। ट्रेन में इंदौर का पोहा, काशी की कचौरी, पूड़ी-भाजी और भोपाल के आलूबड़े का स्वाद यात्री ले सकेंगे, यह क्या कम है? ट्रेन का न्यूनतम किराया भले ही अधिक हो लेकिन प्रति यात्री दस लाख रुपये का बीमा उम्मीद बढ़ाता है।   असदुद्दीन ओवैसी को इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए। वैसे भी ओवैसी ने सही निर्णयों पर भी सवाल उठाए हैं लेकिन उनकी देखादेखी अन्य राजनीतिक दल भी अपनी रोटी सेंक सकते हैं। बेहतर तो यही होगा कि इसे सकारात्मक नजरिये से ही देखा जाए। ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा के साथ उनके स्वस्थ मनोरंजन का भी ध्यान रखा जाए। इस बहाने रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाएं। अच्छा होता कि अन्य धर्मों के लोगों को सम्मान देते हुए और भी इस तरह की नई ट्रेनें चलाई जाएं। इससे देश में सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता का माहौल बनेगा। विरोध का बहाना ढूंढते बहुत दिन हो गए, अब विरोध में भी सकारात्मकता झलकनी चाहिए। विरोध जोश में नहीं, पूरी तरह होश में किया जाना चाहिए। आचार्य रजनीश ने कहा है कि अच्छे काम भी होश में रहकर किया जाना चाहिए और बुरे काम भी। आप अपने में बड़ा परिवर्तन देखेंगे, ऐसा परिवर्तन जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। रेलवे विभाग धार्मिक हो रहा है या अधार्मिक, यह उतना मायने नहीं रखता, जितना यह कि वह यात्रियों के मनोविज्ञान को समझ रहा है और बेहतर व्यावसायिकता को तरजीह दे रहा है। वह यात्रियों की सुरक्षा-संरक्षा, उनके स्वास्थ्य और मनोरंजन का ध्यान रख रहा है, विचार तो इसपर होना चाहिए।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal,  Congress\

डॉ. अजय खेमरिया मप्र के उत्तरी औऱ मालवा इलाके में सोशल मीडिया पर एक नारा ट्रेंड कर रहा है- माफ करो कमलनाथ, हमारे नेता तो महाराज। कमलनाथ के दिल्ली आवास पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ समन्वय बैठक में हुए कथित टकराव के बाद मप्र में सिंधिया समर्थक आगबबूला हैं। खुलेआम मुख्यमंत्री कमलनाथ के विरुद्ध मुखर होकर बयानबाजी हो रही है। दावा किया जा रहा है कि अभी तो सिंधिया समन्वय बैठक से बाहर निकलकर आए हैं, अगर पार्टी से बाहर चले गए तो मप्र में दिल्ली जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। असल में मप्र काँग्रेस की अंदरुनी लड़ाई अब सड़कों पर आ गयी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी खुलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की चुनौती को स्वीकार कर उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए कह दिया है। 15 वर्षो तक सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के लिए मप्र में मुसीबत बीजेपी से कहीं ज्यादा खुद कांग्रेसियों से खड़ी होती रही है। सीएम पद की रेस में रहे सिंधिया लोकसभा का चुनाव हारने के बाद खुद को मप्र में अलग-थलग महसूस करते हैं। सरकार के स्तर पर मामला चाहे राजनीतिक नियुक्तियों का हो या प्रशासन में जो महत्व दिग्विजय सिंह को मिलता है वह सिंधिया को नहीं। इसलिये समानान्तर सत्ता केन्द्र के लिए समर्थकों द्वारा पिछले एक वर्ष से उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाये जाने के लिये आलाकमान पर दबाव बनाया जा रहा है। सिंधिया खुद अक्सर सरकार के विरुद्ध बयान देते रहे हैं, जिससे मुख्यमंत्री के लिये असहज स्थिति पैदा हो जाती है। अतिथि शिक्षकों की मांगों को लेकर सिंधिया ने एकबार फिर कमलनाथ के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर सड़कों पर उतरकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष का एलान कर दिया। किसानों की कर्जमाफी को लेकर भी उन्होंने जिस अतिशय विपक्षी सुर में अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उसने शांत प्रवृत्ति के कमलनाथ को जवाबी हमले के लिये मजबूर कर दिया। बताया जाता है कि दिल्ली में कमलनाथ के बंगले पर हुई बैठक में दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर भिड़ंत हो गई और सिंधिया बैठक से निकलकर चले गए। मुख्यमंत्री जो प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष भी हैं, अब खुलकर कह रहे हैं कि अगर सिंधिया को सड़कों पर उतरना है तो बेशक उतर जाएं। आमतौर पर कमलनाथ इस तरह के सीधे टकराव से अभीतक बचते रहे हैं। यह पहला अवसर है जब कमलनाथ ने सीधे सिंधिया को उनकी हद बताने का प्रयास किया है। वस्तुतः मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है। कमलनाथ ने उनके साथ आरम्भ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है। अक्सर सरकार के ऊपर होने वाले सभी नीतिगत हमलों को दिग्विजय सिंह ही फेस करते हैं। उनके समर्थक विधायक और मंत्री संख्या में सबसे अधिक हैं और कभी भी उनके द्वारा कमलनाथ की सम्प्रभुता को चैलेंज नहीं किया जाता है। दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक मंत्री अक्सर अफसरशाही, वचनपत्र से लेकर प्रदेश अध्यक्ष जैसे विषयों पर कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। मप्र के सियासी समीकरण में सबसे अहम फैक्टर दिग्विजय सिंह हैं। सर्वविदित है कि कमलनाथ को सीएम की कुर्सी दिग्विजय के वीटो से ही मिल सकी है। सिंधिया और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक अदावत दो पीढ़ी पुरानी है। ग्वालियर अंचल में सिंधिया परिवार के दो राजघरानों की सभ्य और संसदीय अदावत में दिग्विजय सिंह सदैव बीस साबित हुए हैं। मप्र की मौजूदा लड़ाई असल में कांग्रेस की जन्मजात गुटीय लड़ाई का ही एक पड़ाव है। कमलनाथ कभी मप्र की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहे हैं, जैसे दिग्विजय या सिंधिया। न ही उनका वैसा कोई जमीनी और कैडर आधारित जनाधार है। राजनीतिक परिस्थितियों के चलते दिग्विजय सिंह कमलनाथ के साथ हैं और इसकी एक वजह सिंधिया को रोकना भी है। असल में सिंधिया जिस शाही आवरण के साथ सियासत करते हैं वह मप्र के दूसरे सियासी क्षत्रपों को रास नहीं आती है। अपने पिता के उलट उनके राजनीतिक विरोधी प्रतिक्रियात्मक धरातल पर उनसे मुकाबले के लिये खड़े हो जाते हैं। गुना लोकसभा सीट पर उनकी अप्रत्याशित पराजय ने उन्हें मप्र में सत्ता विमर्श के केंद्र से बाहर-सा कर दिया है। इसीलिए उनके समर्थक जिन्हें उनकी भी सहमति होती है पार्टी लाइन से परे जाकर प्रदेश अध्यक्ष के लिये लाबिंग करते रहे हैं। मप्र में इसबार कांग्रेस की वापसी में ग्वालियर चंबल की उन 34 सीटों का निर्णायक योगदान है, जिनमें से 26 पर पार्टी को जीत मिली है। सिंधिया इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं और विधानसभा चुनाव की पूरी कैम्पेन 'अबकी बार सिंधिया सरकार' के साथ हुई थी। ऐसे में सिंधिया और उनके समर्थकों को लगता है कि आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है। इस बीच लोकसभा चुनाव में हुई हार ने माहौल को और खराब कर दिया। पिछले 7 महीने से सिंधिया अक्सर सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। किसान कर्जमाफी को लेकर उनके बयान विपक्षियों की भाषा और लहजे की प्रतिध्वनि करते हैं। ताजा विवाद अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण पर है, जिसे लेकर सिंधिया ने सरकार के विरूद्ध सड़कों पर उतरने की धमकी दी है। उन्होंने पार्टी के वचनपत्र को लेकर भी कमलनाथ को कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री ने जिस तल्खी के साथ पहली बार सिंधिया को जवाब दिया है वह बताता है कि पार्टी में अब गुटबाजी नियंत्रण से बाहर हो चली है। प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोविन्द सिंह ने तत्काल सिंधिया को सरकार के खाली खजाने का अवलोकन करने की सलाह दे डाली। इस बयान को दिग्विजय कैम्प का जवाब भी कहा जा रहा है। वहीं, सिंधिया समर्थक मंत्री गोविंद राजपूत ने सागर में एकदिन पहले कर्जमाफी न कर पाने पर सिंधिया की मौजूदगी में अफसोस जताया था। यानी मप्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के साथ भी नहीं चल रही है। दूसरी तरफ दिग्विजय और कमलनाथ की कैमिस्ट्री अभी भी बेहतरीन है। मार्च में प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर भी मतदान होना है। एक सीट पर दिग्विजय सिंह का जाना तय है तो दूसरी पर सिंधिया की दावेदारी रोकने के लिये अब आदिवासी या ओबीसी कार्ड भी चला जा सकता है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सत्ता का समानान्तर केंद्र विकसित किया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  The problem of moral problems and confusion arising from literature

मनोज ज्वाला   आज देश के सामने जितनी भी समस्याएं और चुनैतियां हैं, उनका मूल कारण वस्तुतः बौद्धिक संभ्रम है। यह अज्ञानतावश या अंग्रेजी मैकाले शिक्षा व साहित्य से निर्मित औपनिवेशिक सोच का परिणाम है अथवा वैश्विक महाशक्तियों के भारत विरोधी साम्राज्यवादी षड्यंत्र का दुष्परिणाम। राष्ट्रीय एकता-अखण्डता पर प्रहार करता रहने वाला आतंकवाद, अलगाववाद, क्षेत्रीयतावाद, सम्प्रदायवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद हो या आर्थिक विषमता की खाई चौड़ी करने वाली समस्याओं में शुमार भूख, बेरोजगारी, गरीबी, पलायन, शोषण-दमन हो अथवा सामाजिक जीवन की शुचिता-नैतिकता को निगलने वाला अनाचार, व्याभिचार, भ्रष्टाचार या व्यैक्तिक-पारिवारिक जीवन में घर करती जा रही स्वार्थपरायणता व संकीर्णता, सबका मूल कारण अनर्गल बौद्धिक-शैक्षिक परिपोषण ही है। जबकि किसी भी व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र की बौद्धिकता-शैक्षिकता का सीधा सम्बन्ध साहित्य से है। साहित्य न केवल संस्कृति के संवर्द्धन में सहायक है, अपितु लोकमानस व लोक-प्रवृति के निर्माण में भी साहित्य की कारगर भूमिका होती है।   उल्लेखनीय है कि अपने देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में जबतक राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता रहा, तबतक राष्ट्रीय एकता अखण्डता की भावनायें राजनीतिक दासता से स्वतंत्रता-प्राप्ति तक पुष्ट होती रहीं। किन्तु स्वतंत्र्योत्तर साहित्य में जब वामपंथी धारा के बहाव से जनवाद, दलितवाद, नारीवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद जैसी प्रवत्तियां मुखरित हो उठीं; उनके प्रभाव-दुष्प्रभाव से देश में पृथकतावाद व जातिवाद ही नहीं, आतंकवाद व नक्सलवाद का हिंसक विषवमन भी होने लगा, जो आज राष्ट्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियां बनी हुई है। इन अनुचित-अवांछित ‘वादों’ का किसी न किसी रूप में साहित्य से भी पोषण हो रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। आज जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शीर्षस्थ शिक्षण संस्थानों में भारत-विरोधी नारे मुखरित हो रहे हैं, गोमांस भक्षण के समारोह आयोजित हो रहे हैं; तो समझा जा सकता है कि ऐसी मनःस्थिति व राष्ट्र-विरोधी प्रवृति के निर्माण में साहित्य की खास धारा प्रभावी भूमिका निभा रही है।   इसी तरह से व्यक्ति के नैतिक पतन और लगातार बढ़ रहे पारिवारिक विघटन में भी कहीं-न-कहीं ऐसी प्रवृत्तियों का निर्माण करने वाले साहित्य का ही योगदान है। साहित्य के नाम पर जनमानस को अवांछित-गर्हित विचारों का मानसिक आहार परोसा जाना इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं है। यह साहित्य की एक खास धारा का ही प्रभाव है, जिसकी वजह से परिवार की परिभाषा बदलकर पति-पत्नी व बच्चे तक सिमट गई। ‘प्रेम’ व ‘प्यार’ जैसे पवित्र शब्दों को युवक-युवती या स्त्री-पुरुष के दैहिक आकर्षण एवं मैथुनिक आचरण में परिणत कर देने और इसके परिणामस्वरूप समाज में बढ़ रहे व्याभिचार-बलात्कार की प्रवृत्तियों के लिए साहित्य जिम्मेवार है। स्थिति यह हो गई है कि किसी युवती-स्त्री के प्रति मैथुन-प्रेरित पशुवत आचरण करने वाले निकृष्ट अपराधी को भी उस स्त्री-युवती का प्रेमी कहा जाने लगा है, तो दूसरी ओर भाई-बहन के परस्पर सम्बन्ध के स्वरूप को ‘प्रेम’ या ‘प्यार’ कहे जाने में लोगों को संकोच होने लगा है।   यह साहित्य ही है, जिसके आधार पर समाज में नैतिक पतन व चारित्रिक क्षरण को बढ़ावा देने वाली फिल्मों के निर्माण हो रहे हैं। समाज में व्याभिचार फैलाने वाली फिल्मों के निर्माण व अभिनयन हेतु कच्चे माल के तौर पर फूहड़ गीतों व कहानियों की आपूर्ति साहित्य से ही हो रही है। आज किशोर-किशोरियों, युवक-युवतियों को फिल्मी कथा-कहानियों से प्रेरित होकर अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करने तथा जीवनसाथी स्वयं चयनित करने और उस निर्धारण-चयन में माता-पिता की उपेक्षा करने में साहित्य ही प्रेरक बना हुआ है। पारिवारिक विघटन के लिए और भी तत्व चाहे जितने भी जिम्मेवार हों, किन्तु साहित्य इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेवार है। अपने देश में संयुक्त परिवारों का विघटित सिर्फ सामाजिक चुनौती के रूप में चिन्हित हो रहा है, मगर यह पारिवारिक विघटन प्रकारान्तर से राष्ट्रीय चुनौती भी है; क्योंकि इससे एकता की भावना खण्डित होती है, स्वार्थपरता बढ़ती है और सामूहिक-पारिवारिक विकास अवरुद्ध होता है, जिससे अंततः राष्ट्र कमजोर होता है।   आज देश की राष्ट्रीय अस्मिता एवं पुरातन संस्कृति और भारतीय धर्म-दर्शन, जीवन-दृष्टि तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के प्रति हमारी पीढ़ियों में बढ़ती अरुचि एवं निष्ठाहीनता तथा पश्चिम के प्रति बढ़ती पलायनवादिता के लिए भी कहीं न कहीं वर्तमान साहित्य भी जिम्मेवार है। हालांकि इन सबके प्रति लोगों में बची-खुची थोड़ी-बहुत निष्ठा, रुचि व आकर्षण भी पूर्ववर्ती साहित्य के कारण ही कायम है; इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। आज हमारे देश में जिस तरह की शिक्षा-पद्धति है, उससे हमारी अस्मिता अबतक तो समाप्त हो जानी चाहिए थी; इसके बावजूद अगर हमारे भीतर राष्ट्रीयता अभी जीवित है तो निस्संदेह इसका श्रेय साहित्य को ही है। जिससे यह प्रमाणित होता है कि साहित्य की तत्सम्बन्धी सृजनशीलता से यह और पुष्ट हो सकती है; जबकि यथास्थितिवादिता से हमारी अस्मिता धीरे-धीरे मिट भी सकती है।   देश की समस्याओं व चुनौतियों का कारण राजनीतिक प्रदूषण है और इस राजनीति का अभीष्ट सिर्फ शासनिक सत्ता है। ऐसे में इन चुनौतियों का समाधान साहित्य में ही ढूंढना वांछित है। कहा भी गया है गया है कि राजनीति जब डगमगाती है तो साहित्य उसे गिरने से बचाता है। किन्तु यह तभी सम्भव है जब साहित्य अपने धर्म-पथ पर अडिग रहे। किन्तु देश की वर्तमान स्थिति भिन्न है। साहित्य की एक धारा साहित्य के स्वधर्म के पथ पर नहीं, बल्कि राजनीति के एक पथ-विशेष पर उन्मुख हो उसी की हां में हां मिलाता रहा है। स्वातंत्र्योत्तर भारत का लोकमानस गढ़ने में राजनीति व साहित्य की इसी दुरभिसंधि का योगदान रहा है, जिसके तहत अब राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने पर पुरस्कार-सम्मान वापसी से लेकर सहिष्णुता-असहिष्णुता को मापने तक के प्रहसन किये जा रहे हैं। ऐसे में साहित्य की भूमिका न केवल बढ़ी है बल्कि बदल भी गई है। साहित्य व राजनीति की दुरभिसंधि अगर कायम रही, तो स्थिति और बिगड़ती जाएगी। अतएव साहित्य को अपने स्वधर्म पर लौटना होगा और धर्म के मार्ग पर ही अडिग रहना होगा। तभी बौद्धिक संभ्रम के कारण कायम तमाम नैतिक समस्याओं का समाधान हो पाएगा और स्वस्थ बौद्धिक विमर्श का वातावरण निर्मित होगा।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  Martyrdom on the altar of independence

(असहयोग आंदोलन के पहले शहीद पत्रकार पंडित रामदहिन ओझा के शहादत दिवस 18 फरवरी पर विशेष) विनय के. पाठक देश की आजादी के आंदोलन से पत्रकारिता का विशेष संबंध रहा है। आजादी के आंदोलन में आम लोगों के बीच अलख जगाने में तत्कालीन अखबारों और पत्रकारों की भूमिका, दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों से कम नहीं है। अनेक पत्रकारों ने आजादी के आंदोलन में घर-परिवार छोड़ देश पर सर्वस्व न्योछावर कर दिया। अपनी लेखनी के बल पर उन्होंने अनगिनत लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। इसकी वजह से उन्हें तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, कठोर कारावास तक की सजा भुगतनी पड़ी और कुछ ने तो स्वतंत्रता की वेदी पर बलिदान तक दिया। ऐसे ही आजादी के मतवाले पत्रकारों में एक नाम पंडित रामदहिन ओझा का भी है, जिन्हें गांधीजी के असहयोग आंदोलन के दौरान देश के लिए शहादत देने वाला पहला पत्रकार माना जाता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश का हर कोना अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ समर्पित हो चला था। शायद ही कोई भौगोलिक क्षेत्र, समुदाय अथवा वर्गीय लोग हों, जिन्होंने इस यज्ञ में आहुति न दी हो। पत्रकार और पत्रकारिता तो देश के लिए इस लड़ाई में सबसे आगे रहने वाला हिस्सा था। ऐसे ही पत्रकार सेनानियों में एक थे कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से 1923-24 में प्रकाशित होने वाले हिन्दी साप्ताहिक 'युगांतर' के सम्पादक पंडित रामदहिन ओझा। उत्तर प्रदेश के बलिया जिलान्तर्गत बांसडीह कस्बे के रहने वाले पंडित रामदहिन ओझा अपनी ओजस्वी लेखनी और आजादी के लिए जन आंदोलन में अपने भाषणों के आरोप में कई बार गिरफ्तार किए गये। जिस समय बलिया जेल में उनकी शहादत हुई, उनकी उम्र सिर्फ 30 वर्ष थी। उनके साथी रहे स्वतंत्रता सेनानी हमेशा कहते रहे कि पंडित रामदहिन ओझा के खाने में धीमा जहर दिया जाता रहा और इसी कारण उनकी मृत्यु हुई। ऐसे सेनानी के बारे में संक्षेप में कहें तो मात्र 30 वर्ष के उनके सम्पूर्ण जीवन के बहुआयामी पक्ष हैं। कवि, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनके सारे आयाम देश को समर्पित थे। उस दौर में जब पूर्वी उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अधिकांश क्षेत्र में प्रगति का नामोनिशान तक नहीं था, प्रारम्भिक शिक्षा के बाद रामदहिन ओझा के पिता उन्हें आगे की शिक्षा के लिए कलकत्ता ले गये। क्रांतिकारियों की इस धरती पर उन्हें मातृभूमि के लिए समर्पण की प्रेरणा मिली। बीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते देशभक्त लेखक पत्रकार रामदहिन ओझा की कलकत्ता और बलिया में स्वतंत्रता योद्धाओं और सुधि राष्ट्रसेवियों के बीच पहचान बन चुकी थी। कलकत्ता के 'विश्वमित्र', 'मारवाणी अग्रवाल' आदि पत्र-पत्रिकाओं में कुछ स्पष्ट नाम तो कुछ उपनाम से उनके लेख और कविताएं छपने लगी थीं। उन्होंने कलकत्ता, बलिया और गाजीपुर की भूमि को सामान्य रूप से अपना कार्यक्षेत्र बनाया। आजादी के लिए अनुप्रेरक उनकी लेखनी और ओजस्वी भाषण ही था, जिसके चलते उन्हें पहले बंगाल, बाद में बलिया और गाजीपुर से निष्कासन का आदेश थमा दिया गया। उनकी 'लालाजी की याद में' और 'फिरंगिया' जैसी कविताओं पर प्रतिबंध लगा। वर्ष 1921 में छह अन्य सेनानियों के साथ बलिया में पहली गिरफ्तारी में बांसडीह कस्बे के जिन सात सेनानियों को गिरफ्तार किया गया, पंडित रामदहिन ओझा उनमें सबसे कम उम्र के थे। गांधीजी ने इन सेनानियों को असहयोग आंदोलन का सप्तऋषि कहा था। रामदहिन ओझा 1922 और 1930 में फिर गिरफ्तार किये गये। अंतिम गिरफ्तारी में 18 फरवरी 1931 का वो काला दिन भी आया जब रात के अंधेरे में बलिया जेल और जिला प्रशासन ने मृतप्राय सेनानी को उनके मित्र, प्रसिद्ध वकील ठाकुर राधामोहन सिंह के आवास पहुंचा दिया। उन्हें बचाया नहीं जा सका। बाद में पद्मकांत मालवीय कमेटी ने अपनी जांच में पाया कि पंडित ओझा के खाने में मीठा जहर मिलाया जाता रहा, इसके चलते उनकी मौत हुई। इस तरह एक युवा सेनानी 1931 के प्रारम्भ में ही शहीद हो गया। उनके बलिदान और 1921 तथा 1930-31 में देशसेवा के उल्लेखनीय योगदान ने बलिया के सेनानियों में ऐसी ऊर्जा का संचार किया, जिसका प्रस्फुटन 1942 की जनक्रांति में दिखाई देता है। बंगाल के मेदिनीपुर और महाराष्ट्र के सतारा की तरह बलिया के सेनानियों ने 1942 में ही कुछ दिनों के लिए अपनी आजाद सरकार चलाई थी। निश्चित ही इसकी प्रेरणा पंडित रामदहिन ओझा जैसे सेनानियों से भी मिली होगी। वैसे भी आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश के बलिया का हमेशा ही विशेष उल्लेख किया जाता है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में बलिया के मंगल पांडेय की पहली शहादत हुई थी तो 1942 में बंगाल के मेदिनीपुर और महाराष्ट्र के सतारा की तरह बलिया भी कई दिनों तक स्वाधीन रहा। इसके नायक चित्तू पांडेय थे। इसी तरह माना जाता है कि असहयोग आंदोलन में किसी पत्रकार की पहली शहादत बलिया के ही पंडित रामदहिन ओझा की थी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  Message from mandate of delhi

प्रभुनाथ शुक्ल   दिल्ली का जनादेश राजनीतिक दलों, खासतौर पर भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़ा सबक है। आम आदमी पार्टी की जीत को महज हार-जीत के तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए। आप और केजरीवाल की जीत में दिल्ली के मतदाताओं की मंशा को समझना होगा। दिल्ली में कांग्रेस की जमीन खत्म हो गई है। उसकी बुरी पराजय पार्टी के नीति नियंताओं पर करारा थप्पड़ है। कभी दिल्ली कांग्रेस की अपनी थी। शीला दीक्षित जैसी मुख्यमंत्री ने दिल्ली को बदल दिया था। वहां के जमीनी बदलाव के लिए आज भी शीला दीक्षित को याद किया जाता है। लेकिन उनके जाने के बाद दिल्ली से कांग्रेस का अस्तित्व मिट गया। यह सोनिया और राहुल गांधी के लिए आत्ममंथन का विषय है। दिल्ली की जनता ने तीसरी बार केजरीवाल को केंद्र शासित प्रदेश की सत्ता सौंप साफ कर दिया कि जो सीधे जनता और उसकी समस्याओं से जुटेगा, दिल्ली पर उसी का राज होगा। भावनात्मक मसलों से वोट नहीं हासिल किए जा सकते। भाजपा ने दिल्ली पर भगवा फहराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी लेकिन मतदाताओं के बीच मुख्यमंत्री केजरीवाल की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इस परिणाम ने यह साबित कर दिया है कि सिर्फ मोदी और हिंदुत्व को आगे कर भाजपा हर चुनावी मिशन फतह नहीं कर सकती है। भाजपा 22 साल बाद भी अपना वनवास नहीं खत्म कर पाई।   देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं बचा। वह भाजपा की बुरी पराजय पर सीना भले ठोंक ले लेकिन उसके लिए आत्ममंथन का विषय है। दिल्ली जैसे राज्य में उसका सफाया बेहद चिंता की बात है। पांच सालों के दौरान आखिर दिल्ली में कांग्रेस और सोनिया गांधी गांधी का कुनबा कर क्या रहा था। दिल्ली में अपनी उपलब्धियां बताने के लिए उसके पास बहुत कुछ था, लेकिन कांग्रेस ने उसका भरपूर उपयोग नहीं किया। कांग्रेस की दुर्गति शीर्ष नेतृत्व को भले न हैरान करे लेकिन देश में बचे-खुचे उसके समर्थकों को उसकी पराजय बेहद खली है। बड़बोले राहुल गांधी ने सिर्फ मोदी को कोसने में अपनी सारी उर्जा खत्म कर दी। ट्यूटर हैंडिल की राजनीति से बाहर निकलना होगा। राहुल गांधी अपने नेतृत्व में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। राहुल गांधी खुद की दिल्ली में एक सीट नहीं निकाल पाए। अपनी बयानबाजी से संसद से लेकर सड़क तक सिर्फ मजाक बनते दिखे। प्रियंका गांधी की नजर यूपी पर भले है लेकिन दिल्ली को लावारिस छोड़ना कहां का न्याय है। प्रियंका गांधी हाल ही में वाराणसी में संत रविदास की जयंती पर पहुंच दलित कार्ड खेलने की कोशिश की। इसके पहले भी वह सोनभद्र के उम्भाकांड और दूसरे मसलों पर राज्य की योगी सरकार को घेरती रही हैं लेकिन खुद अपनी नाक नहीं बचा पाई। पूरा गांधी परिवार दिल्ली में है लेकिन एक भी सीट कांग्रेस नहीं निकाल पाई। पूरी की पूरी कांग्रेस सिर्फ गांधी परिवार की परिक्रमा में खड़ी दिखती है। शायद महात्मा गांधी ने सच कहा था कि कांग्रेस को अब खत्म कर देना चाहिए। जबतक कांग्रेस आतंरिक गुटबाजी से बाहर नहीं निकलती है उसकी पुनर्वापसी संभव नहीं है। कांग्रेस को गांधी परिवार की भक्ति से बाहर निकलना होगा। कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए सोनिया गांधी को कड़े फैसले लेने होंगे। युवा चेहरों को आगे लाना होगा। सिर्फ राहुल और प्रियंका गांधी को आगेकर कांग्रेस का कायाकल्प नहीं किया जा सकता।   भाजपा आठ सीट जीतकर भले कहे कि उसने कुछ खोया नहीं बल्कि 2015 के आम चुनाव से इसबार उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है। लेकिन इस तर्क का कोई मतलब नहीं है। भाजपा की पूरी रणनीति फेल हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव की दिशा को शाहीनबाग की तरफ मोड़ने की कोशिश की लेकिन उसका परिणाम उल्टा पड़ गया। चुनाव पूर्व आए सर्वेक्षणों में यह बात साफ हो गई थी कि दिल्ली की जनता की पहली पंसद केजरीवाल हैं। लोगों ने झाडू पर वोट करने का मूड बना लिया था। लेकिन इस बात को भाजपा नहीं समझ पाई। दिल्ली में आप मुखिया केजरीवाल ने दिल्ली वालों को मुफ्त की बिजली-पानी के साथ, मोहल्ला क्लीनिक, बेहतर स्कूल और शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई है। झुग्गी वालों को कॉलोनियों की सुविधा दी है। जिसका परिणाम रहा कि जनता ने उन्हें वोट किया।   दिल्ली भाजपा और उसका केंद्रीय नेतृत्व ने चुनावी दिशा मोड़ उसे हिंदू बनाम मुस्लिम करने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सीएए के खिलाफ शाहीनबाग में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन को मुद्दा बनाया गया और केजरीवाल को आतंकवादी तक कहा गया। भाजपा सोचती थी कि शाहीनबाग को आगे कर चुनाव की दिशा बदली जा सकती है लेकिन धोखा खा गई। मुस्लिम मतों का पूरा ध्रुवीकरण आप की तरफ मुड़ गया, जिसकी वजह से कांग्रेस जैसी पार्टी एक भी सीट नहीं निकाल पाई। भाजपा यह चाहती थी कि दिल्ली के चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल कर दिया जाए लेकिन केजरीवाल ने सीधे हमले के बजाय जनता के बीच सिर्फ अपनी बात रखी। केजरीवाल ने आक्रामक राजनीति को हाशिए पर रखा। प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमलों से बचते रहे। सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव हैं। अगर रणनीति में बदलाव नहीं हुआ तो बिहार और पश्चिम बंगाल की डगर और भी मुश्किल होगी। कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए यह चिंता का विषय है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal,  Delhi\

डॉ. अजय खेमरिया   दिल्ली में मिली चुनावी शिकस्त की इबारत बहुत स्पष्ट है। यह बीजेपी के लिये सामयिक महत्व रखती है। बेहतर होगा नए अध्यक्ष जेपी नड्डा उन बुनियादी विषयों को पकड़ने की पहल सुनिश्चित करें, जिन्हें पकड़कर अमित शाह ने सफलता के प्रतिमान खड़े किए। सत्ता के साथ आई अनिवार्य बुराइयों ने बीजेपी को भी अपने शिकंजे में ले लिया है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि बीजेपी मूल रूप से व्यक्ति आधारित चुनावी दल नहीं है। उसका एक वैचारिक धरातल और वैशिष्ट्य भी है। दिल्ली हो या झारखंड, मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान सभी स्थानों पर वह बड़ी राजनीतिक शक्ति रखती है तथापि पार्टी की सूबों में निरन्तर हार, चिंतन और एक्शन प्लान की मांग करती है। दिल्ली में पार्टी की यह लगातार छठवीं पराजय है। निःसंदेह मोदी-शाह की जोड़ी ने बीजेपी को उस राजनीतिक मुकाम पर स्थापित किया जहां पार्टी केवल कल्पना कर सकती थी। दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना बीजेपी और भारत के संसदीय लोकतंत्र में महज चुनावी जीत नहीं बल्कि एक बड़ी परिघटना है। अमित शाह और मोदी वाकई बीजेपी के अभूतपूर्व उत्कर्ष के शिल्पकार हैं। ये जोड़ी परिश्रम की पराकाष्ठा पर जाकर काम करती है। बावजूद बीजेपी के लिये अब सबकुछ 2014 के बाद जैसा नहीं है। यह समझने वाला पक्ष है कि दीनदयाल उपाध्याय सदैव व्यक्ति के अतिशय अबलंबन के विरुद्ध रहे। उन्होंने परम्परा और नवोन्मेष के युग्म की वकालत की।   सफलता की चकाचौंध अक्सर मौलिक दर्शन को चपेट में ले लिया करती है। बीजेपी के लिए मौजूदा चुनौती यही है जो चुनावी हार-जीत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। दिल्ली, झारखंड, मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान में मिली शिकस्त यही सन्देश देती है कि वक्त के साथ बुनियादी पकड़ कमजोर होने से आपकी दिव्यता टिक नहीं पायेगी। बीजेपी की बुनियाद उसकी वैचारिकी के अलावा उसका कैडर भी है। यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि पार्टी के अश्वमेघी विजय अभियान के कदमताल में उसका मूल कैडर बहुत पीछे छूटता जा रहा है। कभी यही गलती देश की सबसे बड़ी और स्वाभाविक शासक पार्टी कांग्रेस ने भी की थी। राज्यों के मामलों को गहराई से देखा जाए तो मामला कांग्रेस की कार्बन कॉपी प्रतीत होता है। दिल्ली में मनोज तिवारी का चयन हर्षवर्धन, विजय गोयल, मीनाक्षी लेखी जैसे नेताओं के ऊपर किया जाना किस तरफ इशारा करता है? बेशक मोदी और शाह के व्यक्तित्व का फलक व्यापक और ईमानदार है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि करोड़ों लोगों ने बीजेपी को अपना समर्थन वैचारिकी के इतर सिर्फ शासन और रोजमर्रा की कठिनाइयों में समाधान के नवाचारों के लिए भी दिया है। राज्यों में जिस तरह के नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा रहा है वे न मोदी-शाह की तरह परिश्रमी हैं न ही उतने ईमानदार।   मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान, झारखंड की पराजय का विश्लेषण ईमानदारी से किया जाता तो दिल्ली में तस्वीर कुछ और होती। हकीकत यह है कि राज्यों में बीजेपी अपवादस्वरूप ही सुशासन के पैमाने पर खरी उतर पाई है। इन राज्यों में न बीजेपी का कैडर अपनी सरकारों से खुश रहा न जनता को नई सरकारी कार्य संस्कृति का अहसास हो पाया। मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान, झारखंड में नारे लगते थे वहां के मुख्यमंत्रियों की खैर नहीं, मोदी तुमसे वैर नहीं। इसे समझने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई।   यह सही है कि राज्य दर राज्य पराजय के बावजूद बीजेपी का वोट प्रतिशत कम नहीं हुआ है लेकिन लोगों के इस भरोसे को सहेजने की ईमानदारी भी दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी वामपंथी और नेहरूवादी वैचारिकी से लड़ती दिखाई देती है लेकिन इसके मुकाबले के लिये क्या संस्थागत उपाय पार्टी की केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा किये गए हैं? पार्टी ने सदस्यता के लिये ऑनलाइन अभियान चलाया लेकिन उस परम्परा की महत्ता को खारिज कर दिया, जब उसके स्थानीय नेता गांव, खेत तक सदस्यता बुक लेकर 2 रुपए की सदस्यता करते थे और परिवारों को जोड़ते थे। जिन राज्यों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई, वहां आज वे चेहरे नजर नहीं आते जो सरकार के समय हर मंत्री के कहार बने रहते थे। नतीजतन राज्यों में बीजेपी का कैडर ठगा रह जाता है।   जिस परिवारवाद पर प्रधानमंत्री प्रहार करते हैं, वह बीजेपी में हर जिले में हावी है। हर मंडल और जिलास्तर पर चंद चिन्हित चेहरे ही नजर आएंगे जो संगठन, सत्ता, टिकट, कारोबार यानी सब जगह हावी हैं। यह समझने की जरूरत है कि आज का भारत खुली आंखों से सोचता है। वह 370, आतंकवाद, कश्मीर, तुष्टिकरण, पाकिस्तान से निबटने के लिए मोदी में भरोसा करता है तो यह जरूरी नहीं कि मोदी के नाम पर अपने स्थानीय बीजेपी विधायक के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को भी स्वीकार करे। इस नए भारत को मोदी की तरह पार्टी के स्थानीय नेतृत्व को भी समझना होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal, BJP policy not change the intention of its leaders

मनोज ज्वाला   राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद झारखण्ड तक हार चुकी भाजपा दिल्ली भी नहीं जीत सकी। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘सत्ता के केन्द्र’ में विराजमान भाजपा अब देश के ‘केन्द्र’ में नहीं बल्कि सिर्फ ‘देश की सत्ता के शीर्ष’ पर आसीन रहेगी और देश के आन्तरिक सत्ता प्रतिष्ठानों से बेदखल होती रहेगी। पांच राज्यों में हार के बाद भाजपा इसके कारणों की समीक्षा करती रही है। स्वाभाविक है ‘दिल्ली से दूर’ रहने के कारणों की भी पड़ताल करेगी। जिस पार्टी को पिछले साल ही संसदीय चुनाव में देशभर के मतदाताओं ने आशा से अधिक प्रचण्ड बहुमत देकर केन्द्रीय सत्ता के शीर्ष पर दोबारा आसीन किया, उसी दल को विधानसभा चुनाव में उन्हीं मतदाताओं द्वारा नकार दिया जाता है तो यह उस पार्टी के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी गहन चिन्तन-मंथन का विषय अवश्य है। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनाव में एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के लगातार पराभव का कारण उसकी नीतियां ही हैं या और कुछ?   यह बात भी सही है कि संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनावों के मुद्दे एक-दूसरे से भिन्न होते हैं किन्तु यह भी गौरतलब है कि जिन प्रदेशों की सत्ता भाजपा को गंवानी पड़ी, उन प्रदेशों में पहले से कायम उसकी सरकार की प्रादेशिक रीतियां-नीतियां-गतिविधियां अथवा जनकल्याण की उसकी विधियां कहीं से भी गलत नहीं थी। केन्द्र सरकार की तरह उन राज्यों की उसकी सरकारें भी आमतौर पर शुचिता व पारदर्शिता से युक्त एवं भ्रष्टाचार से मुक्त होने के साथ-साथ चुस्त-दुरुस्त व कमोबेश लोकप्रिय भी थीं। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में नक्सली आतंक-अत्याचार पर काबू पाने का श्रेय भाजपा के नाम ही दर्ज है। इसी तरह से राजस्थान व महाराष्ट्र में उसकी सरकार कांग्रेस की तुलना में ज्यादा कल्याणकारी थीं। बावजूद इसके विधानसभा चुनावों में वह सत्ता से बेदखल हो गई। पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उससे उसकी नीति के बजाय उसके नेताओं की नीयत व कार्यपद्धति की ओर संकेत मिलता है। प्रायः इन सभी प्रदेशों में भाजपा की हार ‘भाजपाइयों’ के कारण हुई दिखती है। भाजपा के छुटभैये नेता और उसके जमीनी कार्यकर्ताओं ने ही उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव की बात करें तो दिल्ली प्रदेश में भाजपा सदस्यों की संख्या 62 लाख से भी अधिक है किन्तु उसे प्राप्त हुए कुल मतों की संख्या मात्र 35 लाख है। प्राप्त मतों में आम जनता के मत भी शामिल हैं। मतलब साफ है कि उसके सभी सदस्यों ने भी उसे अपना मत नहीं दिया।   संसदीय चुनाव के दौरान उसके राष्ट्रवाद और मोदी जी के आदर्शवाद से प्रेरित-प्रभावित होकर दिल्ली की सभी सातों लोकसभा क्षेत्रों में जिन लोगों ने उसे भारी बहुमत से विजय प्रदान कर दिया, उसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्हीं लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 निरस्त करने और पाकिस्तानी हिन्दुओं को नागरिकता प्रदान करने सहित राष्ट्रीय महत्व के कई काम करने के बावजूद आखिर ऐसा क्यों हुआ? कम से कम दिल्ली में तो भाजपा को प्राप्त कुल मतों के आंकड़ों से तो साफ हो जाता है कि उसके सदस्यों की कुल संख्या जो 62 लाख है, वह या तो फर्जी हैं या उसके आम सदस्य और आम कार्यकर्ता भी उससे नाराज हैं। इन दोनों ही स्थितियों में उसके नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति के दोष उजागर हो जाते हैं।   इसी तरह मोदी लहर के सहारे सांसद बने बड़े भाजपाई पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और सामान्य सदस्यों से असामान्य दूरी बनाकर अपने ऊपर के नताओं की परिक्रमा में लगे रहे होंगे। भाजपा के भीतर-बाहर यह आम शिकायत है कि उसके नेतागण सत्ता या संगठन में बड़ा पद हासिल कर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेते हैं। फलतः पांच वर्षों तक हैरान-परेशान कार्यकर्ता चुनाव के ऐन मौके पर अपनी भड़ास निकालने के लिए या तो पार्टी के विरोध में चला जाता है या मन मारकर चुपचाप घर बैठ जाता है । बची-खुची कसर दल-बदलुओं को चुनावी टिकट देकर पूरी हो जाती है। झारखण्ड में यही हुआ।   दूसरी ओर भाजपा विरोधी दल और उनके नेता-नियन्ता सत्ता हासिल करते ही अपने कार्यकर्ताओं को शासनतंत्र का हिस्सा बना कर उन्हें न केवल संतुष्ट किये रखते हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी उनकी स्थिति सुदृढ़ बना देते हैं। सत्ता में रहने के दौरान वे अपने कार्यकर्ताओं से नजदीकी बनाए रखने में भी लगे रहते हैं। पांच साल अपने मतदाताओं-समर्थकों के हितों की चिन्ता भी करते हैं। अपना वोटबैंक बनाये रखना उनकी प्राथमिकताओं में होता है। दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल हों या झारखण्ड के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन हों; उनके कार्यकर्ता उनसे कभी नाराज नहीं रहते क्योंकि सत्ता की चाशनी के रस-गंध उन्हें भी मिलते रहते हैं। इसके विपरीत भाजपा के नेतागण अपने केन्द्रीय नेतृत्व, जो पिछले छह वर्षों से मोदी-शाह के नेतृत्व में है उनके भरोसे या ‘संघ’ के सहारे बैठे रहते रहते हैं। ‘संघ’ कोई राजनीतिक संगठन तो है नहीं जो भाजपा के लिए ‘सत्ता-प्रबंधन’ का काम करता रहे, उसकी प्राथमिकताओं में अपने बहुत सारे कार्यक्रम हैं। यह बात दीगर है कि उसकी गतिविधियों का लाभ सीधे-सीधे भाजपा को ही मिलता है। ऐसे में जाहिर है कि भाजपा का यह पराभव ‘भाजपाइयों’ के कारण हुआ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।   मालूम हो कि दिल्ली में लगभग 25-26 ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा उम्मीदवारों की हार महज कुछ सौ या कुछ हजार वोटों से हुई है। अगर भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं एवं सदस्यों में चुनाव के प्रति पर्याप्त उत्साह होता और उन तमाम लोगों ने केवल अपना-अपना मतदान भी किया होता तो भाजपा ‘दिल्ली से दूर’ नहीं रहती। अन्य पांच राज्यों में भाजपा की लगातार हुई हार का यही सबसे बड़ा कारण है। भाजपा को इस पराभव से उबरने के लिए अपनी ‘नीति’ में नहीं, अपने नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति को बदलना होगा। अन्यथा आगे उसे और भी नुकसान हो सकता है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal, The exercise to make Bundelkhand a bowl of lentils again

-सियाराम पांडेय 'शांत'    बुंदेलखंड का कालिंजर किला अपनी ऐतिहासिकता और धार्मिकता के लिए तो मशहूर है ही, लेकिन अब वह अरहर सम्मेलन के लिए भी चर्चा में है। इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी है कि यह विश्व दलहन दिवस (10 फरवरी) के अवसर पर कटरा कालिंजर में हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 नवम्बर, 2015 को इटली में आधिकारिक रूप से वर्ष 2016 को अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की थी। कालिंजर सम्मेलन में अतिथि कृषि वैज्ञानिकों का स्वागत परंपरागत फूलों की जगह चना, अरहर, सरसों और मटर आदि के फूल और पत्तियों से बने पुष्पगुच्छों से किया गया। सवाल उठता है कि दलहन उत्पादन को लेकर सम्मेलन एक ही जिले में क्यों, देश भर में क्यों नहीं होना चाहिए? देखा यह जाता है कि दिवस विशेष पर तो विशेष आयोजन होते हैं लेकिन बाद में सबकुछ भुला दिया जाता है। अगर किसानों के जीवन में बदलाव लाना है तो इस तरह के सम्मेलनों की निरंतरता बनाए रखनी चाहिए।भारत में पिछले कुछ वर्षों में दलहनी फसलों के उत्पादन में जिस तरह कमी आई है और उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं, उसे देखते हुए इस तरह के आयोजन विशेष अहमियत रखते हैं।    इस सम्मेलन में न केवल बुंदेलखंड के किसानों की  घटती आय पर चिंता व्यक्त की गई, बल्कि खेती-किसानी को व्यावसायिक स्वरूप देने पर भी मंथन हुआ। अरहर और अन्य दलहनी फसलों को ब्रांड बनाने पर जोर दिया गया। धान और देसी गेहूं की कई किस्मों के प्रोत्साहन और औषधीय पौधों के संरक्षण पर चर्चा हुई।  सम्मेलन इसलिए भी अहम है कि इसमें कृषि क्षेत्र के पांच पद्मश्री भी मौजूद रहे। सबने इस पर गहन विचार किया कि दलहनी फसलों के क्षेत्र में बुंदेलखंड अपना खोया गौरव कैसे वापस पा सकता है। पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने अरहर और चने की फसल के लिए बुंदेलखंड की माटी को बेहद मुफीद बताया। वह यह कहने से भी नहीं चूके कि इस क्षेत्र में खाद डालने की जरूरत नहीं है। मुजफ्फरपुर की किसान चाची पद्मश्री राजकुमारी देवी ने किसानों को दलहन उत्पाद प्रोडक्ट के रूप में बेचने की सलाह दी। उनकी इस बात में दम है कि दाल सेहत दुरुस्त रखती है। परहेज में डाक्टर तमाम चीजें खाने से रोकते हैं पर दाल को मना नहीं करते। उन्होंने महिला किसानों को स्वयं सहायता समूह बनाने, साइकिल पर भ्रमण करने और अरहर की फसल की ब्रांडिंग करने की सलाह दी।    बाराबंकी से कालिंजर पहुंचे पद्मश्री रामशरण वर्मा और कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के प्रो. मान सिंह भारती ने भी माना कि अगर व्यावसायिक ढंग से दलहन उगाई जाए तो किसाानों के दिन बहुरते देर नहीं लगेगी।बांदा के जिलाधिकारी हीरालाल मानते हैं कि जिले में 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इनकी खुराक में दाल बढ़ाकर सेहत सुधारी जा सकती है। अरहर सम्मेलन के साथ ही नरैनी में स्वयं सहायता समूह की ग्रामीण उद्यमिता परियोजना के तहत दाल प्रसंस्करण इकाई की शुरुआत भी हो गई है।  बांदा जिले में 17,753 हेक्टेयर भूमि में अरहर, 91,110 हेक्टेयर में चना और 24,624 हेक्टेयर में मसूर की खेती की जाती है। जिले में सरसों की खेती भी 2706 हेक्टेयर भूमि में होती है। इस सम्मेलन में का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इसमें चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, निदेशालय रेपसीड-मस्टर्ड रिसर्च, भरतपुर (राजस्थान), इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स, हैदराबाद और बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बांदा की भी समान सहभागिता रही। सम्मेलन में 40 खेती -किसानी बागवानी और बैंकों के स्टॉल लगाए गए। बुंदेलखंडी व्यंजन का स्टॉल भी लगा। लगभग 65 किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया। एक समय कोदों, सांभा फसलें बुंदेलखंड क्षेत्र में बहुत होती थीं, इन फसलों का उत्पादन बढ़ाए जाने पर जोर दिया गया।    योगी सरकार बुंदेलखंड के विकास को लेकर बेहद गंभीर है। इसके मद्देनजर गत वर्ष बांदा जिले में इनोवेशन ऐंड स्टार्टअप समिट का आयोजन किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि बांदा को साइंस पार्क उपलब्ध हुआ। अब अतर्रा कृषि फार्म को एक्सीलेंट सेंटर बनाया जाना है। इस लिहाज से देखें तो यह सम्मेलन विषेष मायने रखता है। कभी बुंदेलखंड को दलहन का कटोरा कहा जाता था । इस सम्मेलन से इस क्षेत्र में उसका खोया गौरव और प्रतिष्ठा लौटेगी, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है। भारत की बड़ी जनसंख्या को देखते हुए हर साल उसे विदेशों से दाल आयात करनी पड़ती है। वित्त वर्ष 2017-18 में दलहनों के रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था फिर भी देश को 56.5 लाख टन दलहन का आयात करना पड़ा था।  भारत में लगभग 220-230 लाख हेक्टयर क्षेत्रफल में दलहन की खेती होती है। इससे हर साल 130-145 लाख टन दलहन की पैदावार होती है। भारत में सर्वाधिक 77 प्रतिशत दाल पैदा होती है। इसमें मध्य प्रदेश का 24 उत्तर प्रदेश का 16, महाराष्ट्र का 14 , राजस्थान का 6,आन्ध्र प्रदेश का 10 और कर्नाटक का 7 प्रतिशत योगदान होता है। जनसंख्या के लिहाज से यह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित किए जाने की जरूररत है। कालिंजर में हुए इस सम्मेलन की एक खासियत यह भी रही कि इसमें बुंदेलखंड के सातों जिलों समेत कानपुर के मिलर्स और उत्पादक भी शामिल रहे। इसमें संदेह नहीं कि नीति निर्धारण में ईमानदारी और इच्छा शक्ति हो तो समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकता है। खेती के नजरिए से उपेक्षित बुंदेलखंड पूरे उत्तर प्रदेश का दाल से पेट भर सकता है। कृषि के विकास व किसानों की भलाई को लेकर बातें बहुत हुईं पर योजनाएं बनाने और अमल में कहीं न कहीं चूक रहीं अन्यथा खाद्यान्न में देश को आत्मनिर्भर बना देने वाले किसान दलहन संकट भी नहीं होने देते। समय से खाद, पानी व उन्नत बीज का प्रबंध होने के साथ उचित मूल्य की व्यवस्था पुख्ता होनी चाहिए।भारत में किसानों का दलहन उत्पादन के प्रति मोह जिस तरह कम हो रहा है, वह खतरे की घंटी है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 12 February 2020


bhopal, Institutional arbitration, judicial process, need of the hour  

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की जरूरत जताई है। देश की राजधानी दिल्ली में फिक्की के समारोह में अदालतों में मुकदमों के अंबार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने यह सुझाव दिया। इसमें कोई दोराय नहीं कि मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैरसरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर हैं। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृत्ति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रह चुके हैं। यह सही है कुछ पीएलआर अपने आपमें मायने रखती हों पर पीएलआर दाखिल करने की सुविधा का दुरुपयोग भी जगजाहिर है और इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय को तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी थी और उसका असर भी देखने को मिल रहा है। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझाइश से मुकदमों को कम करने के प्रयास जारी हैं। लोक अदालतों का आयोजन अब तो नियमित होने लगा है।    इस दिशा में राजस्थान सरकार का मोटर व्हीकल एक्ट से जुड़े करीब दस हजार मुकदमों को लोक अदालत के माध्यम से समाप्त करने का निर्णय भी महत्वपूर्ण है। हालांकि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत विचाराधीन मुकदमों को सरकार द्वारा वापस लेने का संदेश गलत नहीं जाना चाहिए व दोषियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि उन्हें एक सभ्य नागरिक होने का दायित्व उठाते हुए कानून पालन के अपने कर्तव्य का निर्वहन करन चाहिए। देश के न्यायालयों में लंबित मुकदमों के गणित को लोकसभा में पिछले दिनों लिखित उत्तर में प्रस्तुत आंकड़ों से समझा जा सकता है। राष्ट्र्रीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 59 हजार 867 मामले लंबित हैं। आंकड़ों का सबसे बड़ा सच यह है कि देश की अदालतों में करीब एक हजार मामले 50 साल से लंबित हैं तो करीब दो लाख मामले 25 साल से विचाराधीन हैं। 44 लाख 76 हजार से अधिक मामले देश की 24 हाईकोर्ट में लंबित हैं। करीब पौने तीन करोड़ मामले देश की निचली अदालतों में विचाराधीन हैं।  देश के वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की चिंता से पुराने मामलों के निपटारे की कार्ययोजना भी बनी है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने पुराने मामलों के लंबित होने की गंभीरता को समझा। सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बेंच के सामने रखने के निर्देश निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने दिए थे।कुल लंबित तीन करोड़ से अधिक मामलों में से करीब 14 प्रतिशत मामले गत दस सालों से लंबित हैं। जारी रिपोर्ट के अनुसार 10 साल से अधिक लंबित मामलों में सर्वाधिक 9 लाख 43 हजार से अधिक मामले अकेले उत्तर प्रदेश में हैं तो बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र्, गुजरात, ओडिसा आदि प्रदेशों में दस साल से अधिक पुराने मामले लाखों की संख्या में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न बेंचों में अब 34 न्यायमूर्ति मुकदमों का निस्तारण कर रहे हैं।    सर्वोच्च न्यायालय की पहली प्राथमिकता पांच साल से पुराने लंबित मामलों की शीघ्र निस्तारित करने की है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए अत्यंत इमरजेंसी को छोड़कर कार्य दिवस पर छुट्टी न ली जाएं। मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने संस्थागत मध्यस्थता की जो आवश्यकता महसूस की है उसको इस मायने में भी समझा जा सकता है कि हमारी सनातन परंपरा और ग्रामीण व्यवस्था में पंच परमेश्वरों की जो भूमिका थी आज उस भूमिका को पुनर्स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। यातायात नियमों की अवहेलना, मामूली कहासुनी, मामूली विवाद आदि के प्रकरणों को चिह्नित कर इनकी सुनवाई कर तत्काल निर्णय की जरूरत है। ऐसे मामलों में अनावश्यक अपील का प्रावधान भी न हो। ऐसे करके मुकदमों के बोझ को कम किया जा सकता है। राजस्व के मामलों के अंबार को भी पंच परमेश्वरों या अन्य दूसरी तरह के निस्तारण का मैकेनिज्म बनाकर काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हाल ही में राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की जारी रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। इस पर ब्रेक लगाने के लिए भी संस्थागत मध्यस्थता जरूरी है।      (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 February 2020


bhopal, China mentality heavy on humanity

ऋतुपर्ण दवे   कोरोना वायरस आज चीन समेत दुनिया भर में सेहत और जिंदगी के लिए जबरदस्त चुनौती बनकर खड़ा है। पूरी दुनिया में असर दिखने लगा है। दुख इस बात का है चीन जैसे विकसित और दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश ने इस सच्चाई को सभी से क्यों छुपाया? हजारों लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमण के सच को डेढ़ महीने तक छुपाकर उसे क्या मिला? पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ को बता दिया होता तो हालात बेकाबू नहीं होते। मुमकिन था कि दुनिया भर में एकदम से भय और तबाही मचाने को तैयार नया कोरोना वायरस इतना पैर नहीं पसार पाता। पिछले कई मौकों की तरह इसबार भी चीन से ही निकला यह वायरस दुनिया भर में आतंक का पर्याय बन गया।   कोरोना वायरस साल 2020 के लिए नई महामारी बनकर चुनौती जरूर है लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि कुछ साल पहले ही सार्स (सीवियर एक्यूट रेसपेरेटरी सिंड्रोम), बर्ड फ्लू, एच-1 एन-1 जैसी घातक बीमारियां भी चीन से ही निकलीं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्या है जो जबरदस्त संक्रमण से तबाही फैलाने वाली सारी बीमारियां चीन से ही शुरू होती हैं? इसका जवाब बेहद चौंकाने वाला है और वह है चीन का सी फूड मार्केट। पूरे चीन में सब्जी और मांस बाजार हर शहर में जहां-तहां फैले हुए हैं। चीनी लोग समुद्री जीवों के मांस के शौकीन हैं। इंटरनेट पर मौजूद सूची में वहां बिकने वाले मांस में जिन्दा लोमड़ी, मगरमच्छ, भेड़िया, सैलामैंडर, सांप, बिल्ली, चूहे, मोर, साही, ऊंट सहित 112 तरह के मांस का जिक्र है, जिन्हें खाया जाता है। वहां के बाजार ऐसे मांस से पटे होते हैं। घनी आबादी के कारण संक्रमित बीमारियों को फैलते देर नहीं लगती। चीन में पशुधन भी बहुत ज्यादा है, जिससे जानवरों से इंसान के शरीर में पहुंचने वाले वायरस को मनमुताबिक वातावरण मिल जाता है। इसके अलावा चीन का दुनिया के तमाम देशों के साथ जबरदस्त व्यापारिक व राजनीतिक गठजोड़ भी है। इस कारण एयर नेटवर्क भी तगड़ा है, जिससे संक्रमण तेजी से दुनिया के बाकी हिस्सों में पहुंच जाता है।   दुनिया भर में जंगल तेजी से कम हो रहे हैं। इस कारण जानवरों की फार्मिंग का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। जंगली जानवरों के वायरस फार्मिंग वाले जानवरों में आ जाते हैं और से ये इंसान के शरीर तक पहुंच जाते हैं। चीन के मांस बाजार में कई जानवरों के मांस मिलते हैं इसलिए वहां से नए-नए वायरस तेजी से फैलते हैं और संक्रामक होने की वजह से तमाम दुनिया में फैल जाते हैं। मांस बाजार में जानवरों के मांस और खून का इंसानों के शरीर से संपर्क होता रहता है जो वायरस के फैलने की सबसे बड़ी वजह है। साथ ही हाईजीन में थोड़ी भी चूक वायरस फैलाने में मददगार होती है।   तमाम परीक्षणों और रिसर्च से भी यह साबित हुआ है कि कई खतरनाक वायरस जानवरों के मांस से इंसान में आए हैं और फिर इनका संक्रमण तेजी से फैला। हालात यह है कि 30 साल में 30 नई और खतरनाक संक्रामक बीमारियों के बारे में पता चला जिसमें 75 फीसदी के वायरस जानवरों से इंसान में आए हैं। चीन का जो बुहान शहर सबसे ज्यादा प्रभावित है वहां एक करोड़ से ज्यादा आबादी है जो एक प्रमुख परिवहन केंद्र भी है। सार्स के समय भी पाया गया था कि वन्य जीव बाजार में मिलने वाली कस्तूरी बिलाव में पहला सार्स वायरस मिला था। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि चमगादड़ों ने बिल्ली जैसे जीवों को इससे संक्रमित किया और फिर इंसानों द्वारा बिल्लियों को खाने से यह उनमें फैला।   चीन में इस वायरस से संक्रमित मरीजों के मरने की संख्या लगातार विशाल होता जा रहा है। बुहान प्रान्त में इस वायरस का अटैक दिसंबर 2019 में ही हो चुका था लेकिन इसे न केवल छुपाया गया बल्कि साधारण बीमारी बताकर दुनिया को गुमराह किया गया। झूठ की इन्तिहा तो तब हो गई जब कहा गया कि इससे किसी की मौत नहीं हुई लेकिन जर्मनी की लैब जर्मन सेंटर फॉर इंफेक्शन रिसर्च ने इस बारे में जाँच-पड़ताल शुरू की तो पाया नोवोल कोरोना वायरस पहली बार चीन के बुहान में ही उभरा है, जिससे गंभीर निमोनिया होता है लेकिन लेकिन तबतक काफी देर हो चुकी थी। कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति को सबसे पहले सांस लेने में दिक्कत, गले में दर्द, जुकाम, खांसी और बुखार होता जो निमोनिया का रूप ले सकता है। इससे गुर्दे से जुड़ी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। यह वायरस संक्रमित व्‍यक्ति के दूसरे से संपर्क में आने पर तेज फैलता है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका समुद्री भोजन से बचना है। इससे बचाव को लेकर फिलहाल कोई वैक्सीन नहीं है।   तिब्बत को छोड़कर चीन के सभी प्रांतों से कोरोना वायरस के मामले सामने आए हैं। इसके अलावा थाइलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, नेपाल, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका में भी कोरोना वायरस के संदिग्ध मिले हैं। जबकि जर्मनी और कनाडा में पहले ही पुष्टि हो चुकी है। भारत के कई शहरों में संदिग्ध मरीज मिले हैं। कोलकाता में भर्ती थाईलैण्ड की युवती की मौत के बाद भारत में भी दहशत स्वाभाविक है। उप्र, बिहार, राजस्थान, हैदराबाद, कर्नाटक, गोवा समेत कई राज्यों में इसको लेकर अलर्ट है। वायरस के संक्रमण की थर्मल जांच के दायरे में देश के 20 हवाई अड्डों को और शामिल किया गया है फिलहाल नयी दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोच्चि सहित 7 हवाई अड्डे शामिल थे।   डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जानवरों के मांस से फैले वायरस की वजह से ही दुनिया में करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों मौतें होती हैं। यह भी सच है कि संक्रमण की 60 फीसदी बीमारियां जानवरों से फैलती हैं। उससे भी बड़ा सच यह कि सैकड़ों तरह का मांस खाने के मामले में चीन दुनिया में सबसे आगे निकलता जा रहा है, जिसका नतीजा दिख रहा है। ऐसे में संक्रमण और वायरस अटैक स्वाभाविक है लेकिन इतनी बड़ी घटना को पचाने की कोशिश से चीन की नीयत पर पूरी दुनिया को शक होने लगा है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal,  Disgusting game in the name of religion in Pakistan

योगेश कुमार सोनी   वैसे तो पाकिस्तान में धर्म के नाम पर उत्पीड़न की खबरें अब आम हैं। हिन्दू व ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन खुलेआम हो रहा है। लेकिन एक ऐसा मामला सामने आया है कि जो पाकिस्तान की न्याय प्रणाली पर भी गंभीर सवाल बनकर आया है। पाकिस्तान की चौदह वर्षीय ईसाई लड़की को अगवाकर उसका धर्म बदलवाकर अपहरणकर्ता ने उससे शादी कर ली। लड़की के परिजनों ने इस मामले में जब कानून का दरवाजा खटखटाया तो वहां की एक निचली अदालत ने घटिया व बेतुकी दलील देते हुए कहा कि ‘लड़की की उम्र भले कम है लेकिन शरिया कानून के अनुसार उसका पहला मासिक धर्म हो चुका है तो इस हिसाब से शादी वैध मानी जाएगी।’ हालांकि इस फैसले के बाद लड़की के परिजनों ने वहां की सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है। लड़की की मां ने कैथोलिक समाज से जुड़ी वेबसाइटों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले में मदद मांगी है।   लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी को अब्दुल जब्बार नामक शख्स ने पिछले चार महीने से अगवा कर रखा था, जिसके लिए वह लगातार संबंधित पुलिस स्टेशन जा रहे थे लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। किसी माध्यम से लड़की का पता चला तो पुलिस प्रशासन ने तब भी कोई कार्रवाई नहीं की तो लड़की के परिजन कोर्ट गए और न्याय व्यवस्था के ठेकेदारों ने भी घटिया दलील देकर उन्हें निराश किया। इस तरह की कार्यशैली से स्पष्ट है कि वहां का सारा सिस्टम अल्पसंख्यकों की नस्ल मिटाने में लगा है। कानून के मुताबिक इस तरह की शादियों पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2014 में सिंध बाल विवाह एक्ट पारित हुआ था। इसके अंतर्गत 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगाने का जिक्र है। इस कानून को पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों की जबरदस्ती शादी के आधार पर बनाया था लेकिन पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कानूनों का कोई मतलब नहीं है।   ह्यूमन राइट सर्व रिपोर्ट के अनुसार बंटवारे के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी उन्नीस प्रतिशत थी जो अब मात्र दो प्रतिशत भी नहीं रह गई है। यदि हिन्दुओं की बात करें तो उस समय हिन्दू आबादी 15 प्रतिशत थी जो अब 1 प्रतिशत पर सिमट गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले उन्नीस साल में पाकिस्तान में एक भी अल्पसंख्यक नहीं बचेगा। इसका सबसे बड़ा कारण या तो वहां के अल्पसंख्यकों को डराकर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है या फिर उनको जान से मार दिया जाता है। लड़कियों के धर्म परिवर्तन से भी यह आंकड़ा बहुत तेजी से गिर रहा है।   पाकिस्तान की इन हकरतों पर यदि विश्वस्तरीय कार्रवाई नहीं की गयी तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लेकर वहां के हालात और बिगड़ सकते हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘जब से इमरान खान ने पाकिस्तान की कमान संभाली है तब से धर्म के नाम पर अत्याचार बढ़ गया। आयोग के अनुसार तहरीक-ए-इंसाफ सरकार द्वारा भेदभावपूर्ण कानून से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिए कट्टरपंथियों के हौसले बढ़े हैं। दिसंबर 2019 में पेश की गई रिपोर्ट में आयोग ने ईशानिंदा कानून के राजनीतिकरण व शस्त्रीकरण और अहमदिया विरोधी कानूनों को लेकर चिंता जाहिर की थी। जिसका उपयोग इस्लामी समूह न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने बल्कि राजनीतिक आधार भी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। ऐसे मामलों में शासन-प्रशासन पूर्ण रूप से बहुसंख्यक मुसलमानों का सहयोग करता है, जिस वजह से आरोपियों पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती। यही कारण है कि पीड़िता अपने घर वापस नहीं लौट पाती। इसके अलावा ज्यादा विरोध करने पर उसे जान से भी मार दिया जाता है। पाकिस्तान में पूर्ण रूप से जंगलराज स्थापित हो चुका।'   एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में अत्याचार से परेशान होकर करीब 20 हजार अल्पसंख्यक परिवार भारत आ चुके हैं और बीती 3 फरवरी को 187 हिन्दुओं का जत्था स्थायी नागरिकता लेने आया है। मौजूदा समय में पाकिस्तान में अपहरण व धर्म परिवर्तन के आंकड़ों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वहां अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने के लिए संगठित रूप से काम हो रहा है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal,  Constitution: Hindi Word of the Year

डॉ. अजय खेमरिया   ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने `संविधान' शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ दी ईयर 2019 घोषित किया है। भारत में बीते वर्ष यह शब्द संसद, सुप्रीम कोर्ट और सड़क पर सर्वाधिक प्रचलित और प्रतिध्वनित हुआ। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश हर साल इस तरह के भाषीय शब्दों को उस वर्ष का शब्द घोषित करता है। भारतीय संदर्भ में इस शब्द की उपयोगिता महज डिक्शनरी तक सीमित नहीं है। असल में संविधान आज भारत की संसदीय राजनीति और चुनावी गणित का सबसे सरल शब्द भी बन गया है। हजारों लोग संविधान की किताब लेकर सड़कों, विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में आंदोलन करते नजर आ रहे हैं। दिल्ली के शाहीन बाग धरने में संविधान की किताबें सैंकड़ों हाथों में दिखाई दे रही हैं। संविधान जैसा विशुद्ध तकनीकी और मानक शब्द भारत में प्रायः हर सरकार विरोधी व्यक्ति की जुबान पर है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या, तीन तलाक और 370 जैसे मामलों की सुनवाई भी संविधान के आलोक में की इसलिए वहां भी बीते साल यह शब्द तुलनात्मक रूप से अधिक प्रचलन में आया। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने इसी बहु उपयोगिता के आधार पर `संविधान' को 2019 का वार्षिक हिंदी शब्द घोषित किया है।   सवाल यह कि क्या देश के लोकजीवन में संविधान और उसके प्रावधान (जिन्हें मानक शब्दावली में अनुच्छेद, भाग, अनुसूची कहा जाता है) आम प्रचलन में है? 130 करोड़ भारतीय जिस संविधान के अधीन हैं, क्या वे संवैधानिक उपबन्धों से परिचित हैं? हकीकत यह है जिस संविधान शब्द की गूंज संचार माध्यमों में सुनाई दे रही है वह चुनावी राजनीति का शोर है। हमें समझने की आवश्यकता है कि हाथों में संविधान की किताब उठाये भीड़ और उसके नेतृत्वकर्ता असल में संविधान के आधारभूत ढांचे से कितने परिचित हैं? संविधान की पवित्रता की दुहाई देने वाले आंदोलनकारियों ने इसकी मूल भावना को समझा है या वे इतना ही समझते हैं जितना सेक्यूलर ब्रिगेड ने अपने चुनावी गणित के लिहाज से वोटरों में तब्दील हो चुके नागरिकों को बताया है। सच यही है कि आज भारत के लगभग 95 फीसदी लोग अपने संविधान की बुनियादी बातों से परिचित नहीं हैं। क्या एक परिपक्व गणतंत्रीय व्यवस्था में उसके नागरिकों से संवैधानिक समझ की अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये? जिस देश का संविधान लिखित रूप में दुनिया का सबसे विशाल और विस्तृत है, उसके 95 फीसदी शासित उसकी मूलभूत विशेषताओं और प्रावधानों से नावाकिफ रहते हुए आखिर कैसे संविधान की रक्षा की दुहाई दे सकते हैं? हकीकत यही है कि हम भारत के लोग इतना ही संविधान की समझ रखते हैं कि कुछ जन्मजात अधिकार संविधान से मिले हैं। जो घूमने, बोलने, खाने, इबादत, व्यापार करने, सरकार के विरुद्ध खड़े होने, सरकारी योजनाओं में हकदारी का दावा करने की आजादी देता है। संविधान की इस एकपक्षीय समझ ने भारत में पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक आत्मकेंद्रित फौज खड़ा करने का काम किया है। इसी फौज के बीसियों संस्करण आपको देशभर में अलग-अलग रूपों में मिल जायेंगे। जिनका एक ही एजेंडा है, सरकारी खजाने का दोहन और संवैधानिक कर्त्तव्य के नाम पर उसकी तरफ से पीठ करके खड़ा हो जाना।   वस्तुतः भारत संवैधानिक रूप से एक ऐसे नागरिक समाज की रचना पर खड़ा किया गया है, जहां नागरिक जिम्मेदारी के तत्व को कभी प्राथमिकता पर रखा नहीं गया। 1950 में संविधान लागू हुआ और 1976 में 42 वें संशोधन से 10 कर्तव्य जोड़े गए। यानी 26 साल तक इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया कि लोकतंत्र जैसी सभ्य शासन प्रणाली कैसे बगैर जवाबदेही के चलाई जा सकती है? आज भी संविधान की इस अनुगूंज में केवल अधिकारों के बोल हैं। एकपक्षीय प्रलाप जिसके पार्श्व बोल उन नेताओं और बुद्धिजीवियों ने निर्मित किये हैं जो भारत में हिंदुत्व और तालिबानी बर्बरता को एक सा निरूपित करते हैं, एक विकृत सेक्युलर अवधारणा को 65 साल तक भारत के भाल पर जबरिया चिपका रखा है। क्योंकि पेट्रो और वेटिकन डॉलर से इनकी बौद्धिकता का सूर्य सुदीप्त रहता है। यही वर्ग भारत में स्वाभाविक शासकों के थिंक टैंक रहे हैं। यानी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी तक पहुँचा भारत का संविधान शब्द किसी जनोपयोगी, लोक प्रचलन या सामाजिकी में स्थापना के धरातल पर नहीं खड़ा है बल्कि यह एक बदरंगी तस्वीर है भारत के सियासी चरित्र की।   संविधान की आड़ में भारत को चुनावी राजनीति का ऐसा टापू समझने और बनाने की जहां सत्ता खोने या हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिये लोग तैयार हैं। झूठ, अफवाह और मिथ्या प्रचार भारतीय जीवन का स्थाई चरित्र बनता जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सब कुछ संविधान की किताब हाथ में लेकर किया जाता है। एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि "जो सीएए में लिखा है आप उसे मत देखिये, मत पढ़िए, जो इसमें नहीं लिखा है उसे पढ़िए, जो मैं बता रहा हूं उसे मानिये।" इसका मतलब यही कि जिस विहित संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाकर भारत की संसद ने कानून बनाया उसे जनता मूल रूप से नहीं, नेताओं के बताए भाष्य ओर व्याख्यान के अनुरूप माने। यही भारतीय संविधान की बड़ी विडम्बना है। इसी का फायदा एक बड़ा वर्ग हिंदुस्तानी नागरिक बनकर उठाता आ रहा है। इसी बड़े मुफ्तखोर और गैर जवाबदेह नागरिक समाज की भीड़ के शोरशराबे में आपको संविधान शब्द सुनाई देता है। हमारी चुनावी राजनीति ने लोगों को कभी नागरिक बनने का अवसर नहीं दिया। अपने फायदे के लिए वोटर समाज की रचना में जिस पराक्रम और निष्ठा के साथ सियासी लोगों ने काम किया, अगर इसी अनुपात में वे संवैधानिक साक्षरता के लिये काम करते तो भारत की तस्वीर अलग होती।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal, Ram temple: dignity will return to historical heritage

प्रमोद भार्गव   केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पालन में स्वायत्त न्यास के गठन की जिम्मेदारी पूरी कर ली है। 15 सदस्यीय न्यास का नाम ‘श्री रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र‘ होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस न्यास की घोषणा करते हुए कहा कि न्यास में एक सदस्य दलित समाज से होगा। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि राम को ‘भगवान-राम‘ बनाने में मुख्य भूमिका उस समाज की रही थी, जो कमजोर होने के साथ अलग-थलग पड़ा था। यह समाज उस वर्ग से आता था, जो जंगलों में निवास करता था। इसी वनवासी समाज ने राम के नेतृत्व में लंका-नरेश रावण पर विजय प्राप्त की और राम ने इस विजय के बाद एक ऐसे समरसतावादी समाज की परिकल्पना की जो फलीभूत होती हुई ‘रामराज्य‘ कहलाई। गांधी भी भारत की स्वतंत्रता के बाद इसी तरह के रामराज्य की कल्पना करते थे लेकिन वह चरितार्थ नहीं हुई। गोया, दलित को न्यास का सदस्य बनाकर इस सरकार ने जहां छुआछूत पर कुठाराघात किया है, वहीं अयोध्या में जातीय समरसता कायम रहे, इसकी भी नींव राममंदिर के निर्माण से पहले रख दी है।   न्यायालय के फैसले के तीन माह के भीतर न्यास का गठन न्यायालय के निर्देश की समय-सीमा का पालन है। हालांकि मोदी के निंदक इसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में चुनावी लाभ का गणित मानकर चल रहे हैं। जबकि यह कार्यवाही अदालत के साथ-साथ देश की राष्ट्रीय आकांक्षा की पूर्ति है। बहुसंख्यक हिंदू समाज ही नहीं, भारतीय इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझने वाले मुसलमान भी विवादित स्थल को राममंदिर ही मानते हैं। इस कड़ी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक के.के. मोहम्मद पुरातत्वीय साक्ष्यों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि विवादित स्थल पर भव्य मंदिर था। यही नहीं उच्च न्यायालय, इलाहाबाद और शीर्ष न्यायालय की राममंदिर विवाद से जुड़ी पीठों के सदस्य रहे मुस्लिम न्यायमूर्तियों ने भी विवादित स्थल को मंदिर माना है। केवल वामपंथी इतिहास व साहित्यकार ही इस सच्चाई को हमेशा झुठलाते रहे हैं।   अब विवाद-मुक्त हुई भूमि समेत 67.703 एकड़ भूमि भी इस न्यास को सौंप दी जाएगी। याद रहे 1992 में जब विवादित ढांचे को गुस्साए कारसेवकों ने ढहा दिया और विवाद गहराया तो 1993 में अयोध्या में विवादित स्थल सहित इससे जुड़ी करीब 67 एकड़ भूमि का उस समय की पीवी नरसिंह राव सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था। तभी से यह भूमि केंद्र सरकार के पास है। चूंकि अब न्यास अस्तित्व में आ गया है, इसलिए भव्य राममंदिर निर्माण के लिए इस भूमि को न्यास को दिया जाना जरूरी था। गौरतलब है कि 9 नवंबर 2019 को जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में विवादित भूमि पर सर्वसम्मति से रामलला का अधिकार माना था। नतीजतन यह भूमि राममंदिर के लिए दे दी गई। न्यायालय ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भी अयोध्या जिले में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि देने का फैसला दिया था। इस निर्णय का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पांच एकड़ भूमि बोर्ड को आवंटित कर दी है। इन कार्यवाहियों से जल्द मंदिर निर्माण का रास्ता खुलने के साथ यह संदेश भी भारतीय जन-मानस में पहुंचा है कि इस भूखंड पर रहने वाले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी सभी एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं। गोया, हमारी संस्कृति एवं परंपराएं ऐसी विलक्षण है, जो दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम और सर्व भवतु सुखिनः‘ का संदेश देती है।   सरकार ने स्वायत्त न्यास का गठन इसलिए किया है, जिससे न्यास सरकारी हस्तक्षेप से दूर रहे और कामकाज में न्यासियों को संपूर्ण स्वतंत्रता मिले। न्यास को मंदिर निर्माण और उसके संचालन के साथ-साथ आर्थिक लेन-देन की स्वायत्तता भी दी गई है। लेकिन न्यास को कोई भी अचल सम्पत्ति किसी भी स्थिति में बेचने का अधिकार नहीं होगा। न्यास के विधान में यह व्यवस्था भी की गई है कि पदेन व सरकार द्वारा मनोनीत के अलावा जो दस सदस्य रहेंगे, उनमें से किसी सदस्य की मौत होने या त्यागपत्र देने अथवा किसी करणवश हटाए जाने पर, उनके स्थान पर नए सदस्य के चयन का अधिकार न्यासियों को होगा, किंतु नए सदस्य का हिंदू धर्मालंबी होना अनिवार्य है। दलित सदस्य का स्थान खाली होने की स्थिति में दलित को ही चयनित करना जरूरी होगा। पदेन सदस्यों में जिला कलेक्टर भी एक सदस्य हैं। इसमें प्रावधान रखा गया है कि अयोध्या में यदि किसी मुस्लिम कलेक्टर को पदस्थ किया जाता है तो उस स्थिति में जिले के एडीएम पदेन सदस्य होंगे। इन न्यासियों को वेतन व भत्ते नहीं दिए जाएंगे। अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि राममंदिर का शिलान्याय 25 मार्च से शुरू हो रहे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर 2 अप्रैल को राम जन्मदिन या इस बीच संभव है।   इक्ष्वाकु वंश के इस नायक राम की लंका पर विजय ही इस बात का पर्याय है कि सामूहिक जातीय चेतना से प्रगट राष्ट्रीय भावना ने इस महापुरुष का दैवीय मूल्यांकन किया और भगवान विष्णु के अवतार का अंश मान लिया। क्योंकि अवतारवाद जनता-जर्नादन को निर्भय रहने का विश्वास, सुखी व संपन्न होने के अवसर और दुष्ट लोगों से सुरक्षित रहने का भरोसा देता है। अवतारवाद के मूल में यही मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति काम करती है। लेकिन राम वाल्मीकि के रहे हों, चाहे गोस्वामी तुलसीदास के अलौकिक शक्तियों से संपन्न होते हुए भी वे मनुष्य हैं और उनमें मानवोचित गुण व दोष हैं। इसीलिए वे भारतीय जनमानस के सबसे ज्यादा निकट हैं। इसका एक कारण यह भी है कि राम ने उत्तर से दक्षिण की यात्रा करके देश को सांस्कृतिक एकता में पिरोने का सबसे बड़ा काम किया था। इसी काम को कृष्ण ने अपने युग में पूरब से पश्चिम की यात्रा करके देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया था। राम और कृष्ण की शताब्दियों पहले की गई सामाजिक सद्भाव की ये ऐसी अनूठी यात्रा रही हैं, जो सामाजिक संरचना को आज भी मजबूती देने का काम करती है।    दरअसल, राजनीति के दो प्रमुख पक्ष हैं, एक शासन धर्म का पालन और दूसरा युद्ध धर्म का पालन। रामचरितमानस की यह विलक्षणता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांतों और लोक-व्यवहार की भी चिंता की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रामकथा व राम का चरित्र संघर्ष और आस्था का प्रतीक रूप ग्रहण कर लोक कल्याण का रास्ता प्रशस्त करते हैं। महाभारत में भी कहा गया है कि ’राजा रंजयति प्रजा’ यानी राजा वही है, जो प्रजा के सुख-दुख व इच्छाओं की चिंता करते हुए उनका क्रियान्वयन करे। इस परिप्रेक्ष्य में प्रजा की नरेंद्र मोदी सरकार से अपेक्षा थी कि अयोध्या में भव्य एवं दिव्य राममंदिर बने। मोदी इस राष्ट्रीय आकांक्षा पूर्ति के प्रतीक बनकर उभरे हैं। यह ऐसा अनूठा मंदिर हो जो सामाजिक समरसता के रंग में पूरी तरह रंगा हो, क्योंकि इसी भावना में इस रामनगरी का पौराणिक महत्व और ऐतिहासिक-गाथा अंतर्निहित है। साफ है, भारत के लिए राम की प्रासंगिकता, इस राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता व एकता के लिए हमेशा अनिवार्य बनी रहेगी।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 February 2020


bhopal, Relevance of Legislative Councils

रमेश सर्राफ धमोरा   विधान परिषदों की प्रासंगिकता को लेकर एकबार फिर बहस छिड़ी हुई है। गत दिनों आंध्र प्रदेश विधानसभा ने वहां की विधान परिषद् को भंग करने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को संसद से पास करवाने के लिये भेज दिया था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी का कहना है चाहे कितना भी समय लग जाए, वह विधान परिषद् को भंग कराकर ही मानेंगे।   दरअसल, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी राज्य में तीन राजधानियां बनाना चाहते हैं। इस बाबत विधान परिषद् में जब विधेयक लाया गया तो वहां तेलुगू देशम पार्टी का बहुमत होने के कारण विधेयक को सलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया गया। जिससे मुख्यमंत्री की यह महत्वाकांक्षी योजना लटक गई। इससे मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी इतने नाराज हुए कि उन्होंने तुरंत ही विधान परिषद् भंग करने का फैसला कर लिया। आंध्र प्रदेश विधान परिषद् में कुल 58 सदस्य हैं। जिनमें से मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के 9 व मुख्य विरोधी तेलुगू देशम पार्टी के 26 सदस्य हैं। 20 सदस्यों में से नामांकित 8, भाजपा 3, निर्दलीय 3, पीडीएफ के 5 व चार स्थान रिक्त हैं। विधान परिषद् में तेलुगू देशम पार्टी का बहुमत होने के कारण मुख्यमंत्री के महत्वकांक्षी दोनों बिल आंध्र प्रदेश विकेंद्रीकरण और सभी क्षेत्रों के समावेशी विकास विधेयक 2020 और आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजनल डेवलपमेंट अथॉरिटी विधेयक को सिलेक्ट कमिटी को भेजकर एक तरह से लटका दिया गया। अपने दोनों महत्वपूर्ण विधेयक लटक जाने से मुख्यमंत्री खासे नाराज हो गये और उन्होने बाधा बन रही विधान परिषद् को ही भंग करने का फैसला कर आगे का रास्ता साफ कर दिया। आंध्र प्रदेश की तरह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र विधान परिषद् में भी सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की संख्या कम होने से वहां भी अक्सर टकराव की स्थिति देखी जाती है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन एक्ट 2019 के तहत जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा समाप्त होने के साथ वहां की विधान परिषद् का अस्तित्व भी समाप्त हो गया। उसके बाद देश में अब आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश सहित कुल 6 प्रदेशों में विधान परिषद् कार्यरत है। इन छह राज्यों की विधान परिषदों में कुल 426 सदस्य हैं, जिनमें से 367 सदस्यों का विभिन्न तरीकों से चुनाव किया जाता है तथा 59 सदस्यों को वहां के राज्यपालों द्वारा राज्य सरकार की सिफारिश पर मनोनीत किया जाता है।   देश के इन छह राज्यों के अलावा राजस्थान, असम, ओडिशा में भी विधान परिषद् के गठन को संसद ने मंजूरी प्रदान कर दी है। शीघ्र ही इन तीन प्रदेशों में भी विधान परिषदों का गठन किया जाएगा। पूर्व में तमिलनाडु में 1950 से 1986 तक 78 सदस्यीय विधान परिषद् कार्यरत रह चुकी थी। वहीं पश्चिम बंगाल में 1952 से 1969 तक विधान परिषद् थी, जिसके 98 सदस्य थे। आंध्र प्रदेश में भी पूर्व में 1958 से 1985 तक विधान परिषद् थी जिसे एन.टी. रामाराव ने मुख्यमंत्री रहते जगनमोहन की तरह ही समाप्त करवा दिया था। फरवरी 2007 में कांग्रेस शासन के दौरान फिर से आंध्र प्रदेश में विधान परिषद् का गठन हुआ था।विधान परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है तथा प्रत्येक 2 साल पर विधान परिषद् के एक तिहाई सदस्य बदल जाते हैं। विधान परिषद् में 40 से कम व उस राज्य की विधानसभा के एक तिहाई से अधिक सदस्य नहीं हो सकते हैं। विधान परिषद् के सदस्यों को भी वह सभी सुविधाएं मिलती हैं जो एक निर्वाचित विधानसभा के सदस्य को मिलती है। राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को विधान परिषद् से भी पारित करवाना पड़ता है। हालांकि राजस्थान, असम, उड़ीसा की राज्य सरकारें विधान परिषद् का गठन करने जा रही है। वहीं देशभर में विधान परिषद् के औचित्य व उसकी उपयोगिता को लेकर समय-समय पर विरोध के स्वर उठते रहे हैं। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा नकार दिए गये लोगों को विधान परिषद् के रास्ते मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता रहा है। जिससे देश के लोगों में विधान परिषद् को लेकर अच्छी राय नहीं बन रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो विधानसभा का चुनाव लड़ते ही नहीं हैं। विधान परिषद् के सदस्य के तौर पर ही वे मुख्यमंत्री बने हुए हैं। वहां के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी विधान परिषद् के सदस्य हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व डॉ दिनेश शर्मा भी विधान परिषद् के सदस्य हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अभी किसी सदन के सदस्य नहीं है। लेकिन छह माह में उन्हें किसी भी सदन का सदस्य बनना जरूरी होगा इसलिए वह भी शार्टकट रास्ता अपनाते हुये विधान परिषद् के माध्यम से ही विधायक बनेंगे। विधान परिषद् के एक सदस्य पर सालाना करीब 50 लाख रूपये खर्च किए जाते हैं। इस तरह देश में कुल 426 विधान परिषद् सदस्यों पर सालाना 200 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च होती है। इसके अलावा कार्यकाल पूरा करने के बाद उनको आजीवन पेंशन, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, मुफ्त रेल-बस यात्रा सहित अन्य कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं। विधान परिषद् के सदस्य की मृत्यु होने पर उसकी पत्नी को भी पेंशन मिलती है।   चूंकि देश में राज्यसभा ऊपरी सदन है, जिसमें पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोग जाते हैं। राज्यसभा-लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों का अध्ययन कर उनपर बहस कर उन्हें पास करती है। उसके बाद ही वह कानून बन पाता है। लेकिन राज्य में ऐसी स्थिति नहीं है। राज्य में विधानसभा ही कानून बनाने के लिए पर्याप्त है क्योंकि विधानसभा द्वारा बनाया गया कोई भी कानून राज्य स्तर का ही होता है, उसका पूरे देश पर प्रभाव नहीं पड़ता है। लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभा सदस्यों की तरह विधान परिषद् के सदस्यों को राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव में वोट देने का भी अधिकार नहीं होता है। ऐसे में देखा जाए तो राज्य में विधान परिषद् की आवश्यकता नहीं है। यदि ऐसा होता तो देश में संविधान लागू करते वक्त ही सभी प्रदेशों में विधानसभा की तरह विधान परिषदों का भी गठन किया जाता। लेकिन संविधान सभा ने ऐसा कोई जरूरी प्रावधान नहीं किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 February 2020


bhopal, Mahatir\

अनिल बिहारी श्रीवास्तव मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के तेवर ढीले पड़ने लगे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मलेशिया यात्रा के अंत में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में महातिर के मुंह से कश्मीर का 'क' तक नहीं निकला। जारी किए गए संयुक्त बयान में म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों और फिलिस्तीन के साथ कश्मीर का उल्लेख अवश्य था। महातिर के रुख में बदलाव की वजह उनकी भारत विरोधी बयानबाजी के कारण मलेशिया में बढ़ी चिंता को बताया जा रहा है। महातिर की जुबान के कारण दोनों देशों के संबंध खराब होने का खतरा बढ़ा है। मलेशिया में एक बड़ा वर्ग भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से नाराज है। मलेशियाई पाम ऑयल उत्पादक, रिफायनर्स और निर्यातक अधिक चिंतित हैं। महातिर की बयानबाजी से मलेशिया में बढ़ी नाराजगी का प्रमाण महातिर के उत्तराधिकारी अनवर इब्राहिम की टिप्पणी से मिल जाता है। हाल ही में एक इंटरव्यू में इब्राहिम ने कहा, ''यदि आप चिंता व्यक्त करते हो तो कोई देश आपत्ति नहीं करता लेकिन महातिर की भाषा काफी सख्त और तीखी रही है।'' वह आगे कहते हैं, 'गौर करें कि महातिर के लहजे में बदलाव आया है।' 94 वर्षीय महातिर मोहम्मद जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त किए जाने पर अनेक मंचों पर भारत के विरुद्ध टिप्पणी कर चुके हैं। जिसके जवाब में भारत ने मलेशिया को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने की नसीहत दी। जल्द ही महसूस हुआ कि महातिर अपनी बयानबाजी से बाज नहीं आएंगे। इसके तीन कारण बताए गए। पहला, मलेशिया के साथ पाकिस्तान के करीबी संबंध, दूसरे मुस्लिम जगत का नेता बनने की महातिर की महत्वाकांक्षा और तीसरा महातिर की धार्मिक कट्टरता। दिसम्बर 2019 में महातिर ने एकबार फिर मर्यादा तोड़ी। उन्होंने नागरिकता (संशोधन) कानून की आलोचना की और इसे मुसलमानों के विरूद्ध बताया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने मलेशियाई दूतावास के प्रभारी को बुलाकर महातिर की टिप्पणी पर पुन: अपनी आपत्ति दर्ज की लेकिन महातिर ने रवैये नहीं बदला। जनवरी मध्य में प्रेस से बातचीत में वह बोल गए कि 'अपने शब्द वापस नहीं लेंगे और जो बात गलत लगेगी उसपर बोलते रहेंगे।' इसके बाद ही भारत ने रिफाइंड पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अब केवल कच्चा पाम ऑयल और पामोलिन का आयात किया जा सकेगा। सरकार के इस फैसले से स्वदेशी रिफायनर्स को लाभ होगा। मलेशिया विश्व में दूसरा सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक देश है। खास बात यह है कि मलेशियाई रिफाइंड पाम ऑयल का भारत अबतक सबसे बड़ा आयातक रहा है। भारत में खपत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले साल भारत ने मलेशिया से 44 लाख टन रिफाइंड पाम ऑयल आयात किया था। इसके अलावा इंडोनेशिया, नेपाल और सिंगापुर से भी भारत पाम ऑयल आयात करता है। मलेशिया के विरूद्ध कार्रवाई से सबसे ज्यादा फायदा इंडोनेशिया को होगा। इंडोनेशिया कच्चे पाम ऑयल का सबसे बड़ा निर्यातक है। उसने भारत से चीनी और भैंस के मांस का आयात बढ़ाने प्रस्ताव रखा है। आम मलेशियाइयों में चिंता इस बात की है कि भारत जैसा बड़ा बाजार खोकर महातिर क्या हासिल कर लेंगे? क्या उदारता, प्राकृतिक सौंदर्य, तटीय पर्यटन और बहुजातीय पहचान के लिए प्रसिद्ध रहा मलेशिया कट्टरवाद की ओर बढ़ रहा है? भारत से फरार जाकिर नाइक जैसे विवादास्पद व्यक्ति को स्थाई निवासी का दर्जा दिए जाने से पहले ही मलेशिया धर्मनिरपेक्षता के पैमाने की लाल रेखा पर है। मलेशियाई फेडरेशन का धर्म इस्लाम अवश्य है लेकिन वहां का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है। एक तरह से लगभग सवा तीन करोड़ आबादी वाला मलेशिया एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ही है। वहां की आबादी में 61.3 प्रतिशत मुस्लिम, 19.8 प्रतिशत बौद्ध, 9.2 प्रतिशत ईसाई, 6.2 प्रतिशत हिंदू और शेष में अन्य हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के मलेशिया दौरे के समय एक बड़ा मजाक हुआ। मजाक स्वयं इमरान खान ने किया है। उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन करने के लिए महातिर की प्रशंसा करते हुए आश्वासन दे दिया कि भारत द्वारा रिफाइंड पाम ऑयल आयात पर प्रतिबंध लगा दिए जाने से मलेशिया को होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करने का पूरा प्रयास करेंगे। उनके अनुसार पाकिस्तान मलेशिया से रिफाइंड पाम ऑयल का आयात बढ़ाएगा। यह एक तरह से फूहड़ मजाक ही हुआ। भारत की तुलना में पाकिस्तान में रिफाइंड पाम ऑयल की कितनी खपत है? सिर से पैर तक कर्ज में डूबे और विदेशी मदद को तरसते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के आश्वासन पर मलेशिया अपना सिर ठोंके तो आश्चर्य नहीं। माना जा रहा है कि दो वर्ष पूर्व बनी सहमति के चलते 2020 में महातिर पद छोड़ सकते हैं। अनवर इब्राहिम उम्र में महातिर से लगभग 22 साल छोटे हैं लेकिन व्यवहारिकता में वह उनसे कहीं आगे हैं। यही कारण है कि वह भारत से संबंध अच्छे रखने पर जोर दे रहे हैं। महातिर की भारत विरोधी बयानबाजी में लगाम लगवाने में उनकी प्रमुख भूमिका मानी जा रही है। भारत में एक अच्छी बात यह देखी जा रही है कि रिफाइंड पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगाकर मलेशिया को कसने वाले कदम का स्वागत हुआ है। जैसे को तैसा वाली कार्रवाई कर भारत सरकार ने अपनी दृढ़ता प्रकट की है। उधर, भारत से खुन्नस निकालते-निकालते महातिर ने मलेशिया में अपने आलोचक बढ़ा लिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 9 February 2020


PFI is real brother of banned SIMI

-मनोज ज्वाला  नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ लंबे समय दिल्ली केशाहीनबाग में आसमान सिर पर उठाने की मशक्कत कर रही ‘भाड़े की भीड़’ के पीछे काम कर रहे संगठन ‘पीएफआई’ का पूरा नाम पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया है। यह इसका छद्म नाम है। दरअसल यह एक जिहादी संगठन है। यह संगठन पुलिस जांच के घेरे में है। ...और सबसे बड़ा तथ्य यह है कि यह संगठन प्रतिबंधित संगठन 'सिमी' का सगा भाई है। सिमी का पूरा नाम  स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया है। पुलिस मान रही है कि पीएफआई इस्लामी जेहाद का झंडाबरदार है। वह नगरिकता संशोधन अधिनियम की मुखालफत के बहाने देश भर में मुसलमानों को बरगलाने के साथ उन्हें हिंसा की राह पर ले जाने के लिए सक्रिय है। इस बात की चर्चा है कि इसके शाहीनबाग क्षेत्र में पांच दफ्तर हैं।   इस संगठन की भूमिका उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर हुए हिंसक प्रदर्शनों में सामने आई है। उत्तर प्रदेश सरकार पीएफआई को कभी भी प्रतिबंधित कर सकती है। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस संगठन के असली चेहरे से अवगत कराया है। पीएफआई का गठन 2006 में हुआ था। कहने को यह खुद को पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का शुभचिंतक बताता है। हकीकत यह है कि यह चरमपंथी इस्लामिक संगठन है। खुलासा हुआ है कि  पहले इसका नाम ‘नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट