दखल क्यों


bhopal,Convince farmers

डॉ. वेदप्रताप वैदिक किसानों के साथ हुई सरकार की पिछली बात से आशा बंधी थी कि दोनों को बीच का रास्ता मिल गया है। डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों के टलने का अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि यदि दोनों के बीच सहमति नहीं हुई तो ये कानून हमेशा के लिए टल जाएंगे। सरकार इन्हें थोप नहीं पाएगी। सरकार के पास इससे अच्छा उपाय क्या था? लेकिन पिछले दो-तीन माह में सरकार के असली इरादों को लेकर किसानों में इतना शक पैदा हो गया है कि वे इस प्रस्ताव को भी बहुत दूर की कौड़ी मानकर कूड़े में फेंकने को आमादा हो गए हैं। इस बीच किसान नेताओं, मंत्रियों और कृषि-विशेषज्ञों से मेरा संपर्क निरंतर बना हुआ है। यह बात मैं कई बार लिख चुका हूं कि सरकार राज्यों को छूट की घोषणा क्यों नहीं कर देती? कृषि राज्य का विषय है। अतः जो राज्य इन कानूनों को मानना चाहें, वे मानें, जो नहीं मानना चाहें, वे न मानें। पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए ये कानून अपने आप खत्म हो जाएंगे। उनकी मांग पूरी हो जाएगी। रही बात शेष राज्यों की तो भाजपा शासित राज्य इन्हें लागू करना चाहें तो कर दें। दो-तीन साल में ही इनकी असलियत पता चल जाएगी। यदि इन राज्यों के किसानों की समृद्धि बढ़ती है तो पंजाब और हरियाणा भी इनका अनुकरण बिना कहे ही करने लगेंगे और यदि भाजपा राज्यों के किसानों को नुकसान हुआ तो केंद्र सरकार इन्हें जारी नहीं रखेगी। जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सवाल है, उसे कानूनी रूप नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उससे कम दाम पर खरीदनेवाले को सजा होगी तो बेचनेवाले को उससे पहले होगी। बेहतर तो यह हो कि 23 की बजाय 50 चीजों पर, फलों और सब्जियों पर भी सरकारी मूल्य घोषित हों, जैसे कि केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने किया है। सरकार और किसानों की संयुक्त समिति के विचार का मुख्य विषय यह होना चाहिए कि भारत के औसत मेहनतकश किसानों को (सिर्फ बड़े ज़मींदारों को नहीं) सम्पन्न और समर्थ कैसे बनाया जाए और उनकी उपज को दुगुनी-चौगुनी करके भारत को विश्व का अन्नदाता कैसे बनाया जाए? यदि सरकार इस आशय की घोषणा करे तो हो सकता है कि हमारा गणतंत्र दिवस, गनतंत्र दिवस बनने से रुकेगा, वरना मुझे डर है कि 26 जनवरी को अगर बात बिगड़ी तो वह बहुत दूर तलक जाएगी। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 23 January 2021


bhopal,Convince farmers

डॉ. वेदप्रताप वैदिक किसानों के साथ हुई सरकार की पिछली बात से आशा बंधी थी कि दोनों को बीच का रास्ता मिल गया है। डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों के टलने का अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि यदि दोनों के बीच सहमति नहीं हुई तो ये कानून हमेशा के लिए टल जाएंगे। सरकार इन्हें थोप नहीं पाएगी। सरकार के पास इससे अच्छा उपाय क्या था? लेकिन पिछले दो-तीन माह में सरकार के असली इरादों को लेकर किसानों में इतना शक पैदा हो गया है कि वे इस प्रस्ताव को भी बहुत दूर की कौड़ी मानकर कूड़े में फेंकने को आमादा हो गए हैं। इस बीच किसान नेताओं, मंत्रियों और कृषि-विशेषज्ञों से मेरा संपर्क निरंतर बना हुआ है। यह बात मैं कई बार लिख चुका हूं कि सरकार राज्यों को छूट की घोषणा क्यों नहीं कर देती? कृषि राज्य का विषय है। अतः जो राज्य इन कानूनों को मानना चाहें, वे मानें, जो नहीं मानना चाहें, वे न मानें। पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए ये कानून अपने आप खत्म हो जाएंगे। उनकी मांग पूरी हो जाएगी। रही बात शेष राज्यों की तो भाजपा शासित राज्य इन्हें लागू करना चाहें तो कर दें। दो-तीन साल में ही इनकी असलियत पता चल जाएगी। यदि इन राज्यों के किसानों की समृद्धि बढ़ती है तो पंजाब और हरियाणा भी इनका अनुकरण बिना कहे ही करने लगेंगे और यदि भाजपा राज्यों के किसानों को नुकसान हुआ तो केंद्र सरकार इन्हें जारी नहीं रखेगी। जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सवाल है, उसे कानूनी रूप नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उससे कम दाम पर खरीदनेवाले को सजा होगी तो बेचनेवाले को उससे पहले होगी। बेहतर तो यह हो कि 23 की बजाय 50 चीजों पर, फलों और सब्जियों पर भी सरकारी मूल्य घोषित हों, जैसे कि केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने किया है। सरकार और किसानों की संयुक्त समिति के विचार का मुख्य विषय यह होना चाहिए कि भारत के औसत मेहनतकश किसानों को (सिर्फ बड़े ज़मींदारों को नहीं) सम्पन्न और समर्थ कैसे बनाया जाए और उनकी उपज को दुगुनी-चौगुनी करके भारत को विश्व का अन्नदाता कैसे बनाया जाए? यदि सरकार इस आशय की घोषणा करे तो हो सकता है कि हमारा गणतंत्र दिवस, गनतंत्र दिवस बनने से रुकेगा, वरना मुझे डर है कि 26 जनवरी को अगर बात बिगड़ी तो वह बहुत दूर तलक जाएगी। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 23 January 2021


bhopal,Convince farmers

डॉ. वेदप्रताप वैदिक किसानों के साथ हुई सरकार की पिछली बात से आशा बंधी थी कि दोनों को बीच का रास्ता मिल गया है। डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों के टलने का अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि यदि दोनों के बीच सहमति नहीं हुई तो ये कानून हमेशा के लिए टल जाएंगे। सरकार इन्हें थोप नहीं पाएगी। सरकार के पास इससे अच्छा उपाय क्या था? लेकिन पिछले दो-तीन माह में सरकार के असली इरादों को लेकर किसानों में इतना शक पैदा हो गया है कि वे इस प्रस्ताव को भी बहुत दूर की कौड़ी मानकर कूड़े में फेंकने को आमादा हो गए हैं। इस बीच किसान नेताओं, मंत्रियों और कृषि-विशेषज्ञों से मेरा संपर्क निरंतर बना हुआ है। यह बात मैं कई बार लिख चुका हूं कि सरकार राज्यों को छूट की घोषणा क्यों नहीं कर देती? कृषि राज्य का विषय है। अतः जो राज्य इन कानूनों को मानना चाहें, वे मानें, जो नहीं मानना चाहें, वे न मानें। पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए ये कानून अपने आप खत्म हो जाएंगे। उनकी मांग पूरी हो जाएगी। रही बात शेष राज्यों की तो भाजपा शासित राज्य इन्हें लागू करना चाहें तो कर दें। दो-तीन साल में ही इनकी असलियत पता चल जाएगी। यदि इन राज्यों के किसानों की समृद्धि बढ़ती है तो पंजाब और हरियाणा भी इनका अनुकरण बिना कहे ही करने लगेंगे और यदि भाजपा राज्यों के किसानों को नुकसान हुआ तो केंद्र सरकार इन्हें जारी नहीं रखेगी। जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सवाल है, उसे कानूनी रूप नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उससे कम दाम पर खरीदनेवाले को सजा होगी तो बेचनेवाले को उससे पहले होगी। बेहतर तो यह हो कि 23 की बजाय 50 चीजों पर, फलों और सब्जियों पर भी सरकारी मूल्य घोषित हों, जैसे कि केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने किया है। सरकार और किसानों की संयुक्त समिति के विचार का मुख्य विषय यह होना चाहिए कि भारत के औसत मेहनतकश किसानों को (सिर्फ बड़े ज़मींदारों को नहीं) सम्पन्न और समर्थ कैसे बनाया जाए और उनकी उपज को दुगुनी-चौगुनी करके भारत को विश्व का अन्नदाता कैसे बनाया जाए? यदि सरकार इस आशय की घोषणा करे तो हो सकता है कि हमारा गणतंत्र दिवस, गनतंत्र दिवस बनने से रुकेगा, वरना मुझे डर है कि 26 जनवरी को अगर बात बिगड़ी तो वह बहुत दूर तलक जाएगी। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक किसानों के साथ हुई सरकार की पिछली बात से आशा बंधी थी कि दोनों को बीच का रास्ता मिल गया है। डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों के टलने का अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि यदि दोनों के बीच सहमति नहीं हुई तो ये कानून हमेशा के लिए टल जाएंगे। सरकार इन्हें थोप नहीं पाएगी। सरकार के पास इससे अच्छा उपाय क्या था? लेकिन पिछले दो-तीन माह में सरकार के असली इरादों को लेकर किसानों में इतना शक पैदा हो गया है कि वे इस प्रस्ताव को भी बहुत दूर की कौड़ी मानकर कूड़े में फेंकने को आमादा हो गए हैं। इस बीच किसान नेताओं, मंत्रियों और कृषि-विशेषज्ञों से मेरा संपर्क निरंतर बना हुआ है। यह बात मैं कई बार लिख चुका हूं कि सरकार राज्यों को छूट की घोषणा क्यों नहीं कर देती? कृषि राज्य का विषय है। अतः जो राज्य इन कानूनों को मानना चाहें, वे मानें, जो नहीं मानना चाहें, वे न मानें। पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए ये कानून अपने आप खत्म हो जाएंगे। उनकी मांग पूरी हो जाएगी। रही बात शेष राज्यों की तो भाजपा शासित राज्य इन्हें लागू करना चाहें तो कर दें। दो-तीन साल में ही इनकी असलियत पता चल जाएगी। यदि इन राज्यों के किसानों की समृद्धि बढ़ती है तो पंजाब और हरियाणा भी इनका अनुकरण बिना कहे ही करने लगेंगे और यदि भाजपा राज्यों के किसानों को नुकसान हुआ तो केंद्र सरकार इन्हें जारी नहीं रखेगी। जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सवाल है, उसे कानूनी रूप नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उससे कम दाम पर खरीदनेवाले को सजा होगी तो बेचनेवाले को उससे पहले होगी। बेहतर तो यह हो कि 23 की बजाय 50 चीजों पर, फलों और सब्जियों पर भी सरकारी मूल्य घोषित हों, जैसे कि केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने किया है। सरकार और किसानों की संयुक्त समिति के विचार का मुख्य विषय यह होना चाहिए कि भारत के औसत मेहनतकश किसानों को (सिर्फ बड़े ज़मींदारों को नहीं) सम्पन्न और समर्थ कैसे बनाया जाए और उनकी उपज को दुगुनी-चौगुनी करके भारत को विश्व का अन्नदाता कैसे बनाया जाए? यदि सरकार इस आशय की घोषणा करे तो हो सकता है कि हमारा गणतंत्र दिवस, गनतंत्र दिवस बनने से रुकेगा, वरना मुझे डर है कि 26 जनवरी को अगर बात बिगड़ी तो वह बहुत दूर तलक जाएगी। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2021


bhopal,Ideological basis ,good governance

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री भाजपा औरों से अलग दिखने का दावा सदैव करती रही है। पिछले कुछ वर्षों में वह तथ्यों के आधार पर इसको जनता के बीच ले जा रही है। इसमें संदेह नहीं कि इस दौरान ऐसे अनेक मसलों का समाधान हुआ है, जिसकी कल्पना करना भी असंभव था। इसके अलावा करोड़ों गरीब लोगों को अनेक योजनाओं का सीधा लाभ मिलना भी सनिश्चित हुआ है। संगठन संरचना की दृष्टि से भी भाजपा अलग दिखाई देती है। उसका विरोध करने वाली पार्टियां परिवार आधारित थीं। वामपंथी अवश्य परिवार आधारित नहीं थे लेकिन जनभावना को समझने में नाकाम रहे। इसलिए इनकी प्रासंगिकता समाप्त होती जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसी प्रकार के मुद्दे लखनऊ यात्रा के दौरान उठाये। उनकी यात्रा समय व स्थान के हिसाब से सीमित थी। लेकिन इसका सन्देश व्यापक रहा। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के साथ बैठक में सुशासन का सन्देश दिया। नरेंद्र मोदी व योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को सराहनीय बताया। इसके अलावा उनकी यात्रा के राजनीतिक सन्देश भी साफ थे। पार्टी ने सरकार की उपलब्धियों के बल पर विपक्ष के मुकाबले का मंसूबा जताया। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को सीएम नम्बर वन बनने की बधाई दी। कुछ दिन पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित टाइम मैगजीन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की प्रशंसा में तथ्यपरक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इसमें बताया गया था कि योगी आदित्यनाथ ने कोरोना आपदा प्रबंधन में विकसित देशों को बहुत पिछले छोड़ दिया। इसके पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसी प्रकार की रिपोर्ट जारी की थी। उसने विकसित देशों को योगी आदित्यनाथ के मॉडल से प्रेरणा लेने की नसीहत दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनेक अवसरों पर योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा कर चुके हैं। करीब दो दिन पहले ही उन्होंने एक वर्चुअल कार्यक्रम में भी यह कहा था। उनका कहना था कि योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किये हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विकास कार्यों में उत्तर प्रदेश ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इस क्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी योगी आदित्यनाथ को नम्बर वन सीएम बनने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका की तुलना में उत्तर प्रदेश ने बेहतर तरीके से कोरोना पर नियंत्रण पाया। योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मजदूरों की ही चिंता नहीं की बल्कि बाहरी राज्यों के मजदूरों की भी चिंता कर उन्हें उनके घर भेजा। देश के सर्वे में पीएम मोदी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। तो उनके नेतृत्व में मुख्यमंत्री योगी ने भी उनका हाथ बंटाया है। जेपी नड्डा ने नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों को ऐतिहासिक व अभूतपूर्व बताया। पांच सौ वर्षों के बाद अयोध्या में राममंदिर निर्माण का सपना साकार हो रहा है। भूमि पूजन के बाद मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों को छूने का लोगों में साहस नहीं था। नरेंद्र मोदी ने इच्छाशक्ति दिखाई। तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा,अनुच्छेद 370 समाप्त किया गया। इसी प्रकार नागरिकता संशोधन कानून लागू किया गया। जिससे पाकिस्तान, बांग्लादेश अफगानिस्तान के उत्पीड़ित बन्धुओं को नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हुआ। भाजपा की सरकारें सुशासन के प्रति समर्पित रहती हैं क्योंकि यही उनकी विचारधारा है। भाजपा इसी विचारधारा पर आधारित पार्टी है। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को साकार करने का काम भाजपा ने ही किया। उसकी सरकारें अनवरत इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। भाजपा समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के विकास की बात करती है। उनको मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास करती है। इसके लिए अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया है। कांग्रेस के लोग जब रिवोल्यूएशन की बात करते थे भाजपा इवेल्यूएशन की बात करती थी। वामपंथी पेट की भूख को बड़ा बताते हैं। वह मानते हैं कि भूख मिटने से संतुष्टि मिलती है लेकिन जहां शरीर, मन, बुद्धि एकात्म के साथ आगे बढ़ती है वहीं सम्पूर्ण संतुष्टि मिलती है। यही एकात्म मानववाद है। इसी में अंत्योदय विचार समाहित है। इसी के अनुरूप नरेंद्र मोदी सरकार ने चालीस करोड़ लोगों के जनधन खाते खुलवाए। पहले ये लोग बैंकिंग सेवा से वंचित थे। आयुष्मान, उज्ज्वला और निर्धन आवास योजनाएं संचालित की गई। देश खुले में शौच से मुक्त हो गया। भाजपा सरकार ने घर-घर बिजली पहुंचाई। आठ करोड़ गैस कनेक्शन दिए। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कहा था कि योजनाओं के एक रुपये में पन्द्रह पैसा गरीबों तक पहुंचता था। आज पूरा पैसा सीधे लोगों के खातों में पहुंच रहा है। प्रधानमंत्री ने सही समय पर फैसला लिया और आज हम कोरोना से कम प्रभावित हुए। भाजपा अध्यक्ष ने विपक्ष पर जमकर निशाना लगाया। उन्होंने कहा कि कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक हर पार्टी परिवारवाद और जातिवाद की चपेट में है। ऐसी पार्टियों में पिता अपनी गद्दी बेटे को सौंपते हैं लेकिन भाजपा में परिवारवाद नहीं है। भाजपा में साधारण परिवार से आनेवाले लोग प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं। भाजपा परिवार नहीं कार्यकर्ता आधारित पार्टी है। कार्यकर्ताओं की ताकत अमूल्य है। यह परिवर्तन लाने का माध्यम बनती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2021


bhopal,Why insult gods , goddesses under , guise of entertainment

डॉ.रामकिशोर उपाध्याय अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में तीन स्थानों पर कथित वेब सीरीज तांडव के निर्माता, निर्देशक और भारत में अमेजन प्राइम के कंटेंट हेड के विरुद्ध एफआईआर लिखाई गई है। कहा जा रहा है कि इस वेब सीरीज में हिन्दू देवी-देवताओं को अमर्यादित एवं अपमानजनक ढंग से दिखाया गया है। देशभर में इस वेब सीरीज को लेकर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। निर्देशक अब्बास अली जफ़र और अभिनेता सैफ अली खान आदि को गिरफ्तार करने की माँग की जा रही है।  एक समय था जब अंडरवर्ल्ड की सहायता से बॉलीवुड में सक्रिय कट्टरपंथी और वामपंथी एक्टर, डायरेक्टर हिन्दू धर्म, संस्कृति व परम्पराओं का तिरस्कृत एवं अपमानपूर्ण वर्णन करते थे। उद्देश्य था भारतीय जनमानस को अपने मूल धर्म-संस्कृति से दूर ले जाना। तुष्टिकरण की पालक सरकारों ने साहित्य, सिनेमा, इतिहास, संगीत,और शिक्षा के सुधार का दायित्व भी इन्हीं वामपथियों को सौंप दिया। भारत में हिन्दू संस्कृति एवं धर्म का अपमान करना प्रगतिशीलता कहा जाने लगा। कुरीतियाँ सभी धर्मों में प्रवेश कर चुकीं हैं किन्तु एक की कुरीति पवित्र और दूसरे की अपवित्र कैसे हो सकती है? यदि कार्टून बना देने से धार्मिक भावनाएँ आहत हो सकती हैं तो हिन्दू देवी-देवताओं के अमर्यादित दृश्य दिखाने की लालसा आपके मन में क्यों है? क्या भारतीय समाज की मर्यादाओं को तोड़ना ही मनोरंजन है? विडंबना यह है कि हिन्दी फ़िल्म के अधिकांश संवाद उर्दू में होते हैं इसीलिये हम समझ नहीं पाते कि हमें गालियां दी जा रही है या प्रशंसा की जा रही है। सिनेमा को मनोरंजन की आड़ में निजी एजेंडा चलाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?  सिनेमा का उद्देश्य स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ समाज को प्रेरणा देना भी है। कलाकारों को जाति, मजहब, दल और किसी विचारधारा विशेष से ऊपर उठकर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की भावना से कला प्रदर्शन करना चाहिए। कला की साधना ईश्वर की ही आराधना है यदि उसका दुरुपयोग ईश्वर के अपमान के लिए होने लगे तो फिर उसपर संवैधानिक कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 21 January 2021


bhopal, Farmer Movement, Asha Bandhi

डॉ. वेदप्रताप वैदिक कल किसान नेताओं और मंत्रियों के सार्थक संवाद से यह आशा बंधी है कि इसबार का गणतंत्र-दिवस, गनतंत्र दिवस में कदापि नहीं बदलेगा। यों भी हमारे किसानों ने अपने अहिंसक आंदोलन से दुनिया के सामने बेहतरीन मिसाल पेश की है। उन्होंने सरकार से वार्ता के लगभग दर्जन भर दौर चलाकर यह संदेश भी दे दिया है कि वे दुनिया के कूटनीतिज्ञों-जितने समझदार और धैर्यवान हैं। सरकार आखिरकार मान गई है कि वह एक-डेढ़ साल तक इन कृषि-कानूनों को ताक पर रख देगी और एक संयुक्त समिति के तहत इन पर सार्थक विचार-विमर्श करवाएगी। अच्छा हुआ कि सरकार अदालत के भरोसे नहीं रही। अब जो कमेटी बनेगी, वह एकतरफा नहीं होगी। उसमें किसानों की भागीदारी भी बराबरी की होगी। अब संसद भी डटकर बहस करेगी। किसानों को सरकार का यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार लेना चाहिए। यह किसान आंदोलन मोदी सरकार के लिए अपने आप में गंभीर सबक है। फिलहाल, सरकार ने जो बीच का रास्ता निकाला है, वह बहुत ही व्यावहारिक है। यदि किसान इसे रद्द करेंगे तो वे अपने आप को काफी मुसीबत में डाल लेंगे। यों भी पिछले 55-56 दिनों में उन्हें पता चल गया है कि सारे विरोधी दलों ने जोर लगा दिया, इसके बाजवूद यह आंदोलन सिर्फ पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा है। किसानों के साथ पूर्ण सहमति रखनेवाले लोग भी चाहते हैं कि किसान नेता इस मौके को हाथ से फिसलने न दें। पारस्परिक विचार-विमर्श के बाद जो कानून बने, वे ऐसे हों, जो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा खाद्यान्न-सम्राट बना दें और औसत किसानों की आय भारत के मध्यम-वर्गों के बराबर कर दे। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 21 January 2021


bhopal,Pakistan, Sindh

डॉ. रमेश ठाकुर पाकिस्तान का सिंध प्रांत कट्टरपंथियों की दुर्दांत सोच का शिकार सदियों से है। जिस आजादी के हक़दार वह थे, वह नहीं मिली। उनके हिस्से में तरक्की की जगह यातनाएँ और मुसीबतें ही आईं। लेकिन अब वहां के वाशिंदे इनसे छुटकारा चाहते हैं। यही कारण है कि सिंध क्षेत्र के लोगों ने अब खुद को पाकिस्तान से अलग होने का मन बना लिया है। उनकी मांग है, उन्हें पाकिस्तान से अलग कर दिया जाए। इसके लिए बड़ा आंदोलन छेड़ा है, हजारों-लाखों की संख्या में लोग सड़कों, बाजारों, गली-मोहल्लों में प्रदर्शन कर रहे हैं। सभी एक सुर में इमरान खान सरकार को ललकार रहे हैं। विद्रोह की लपटें देखकर ऐसा लगता है क्या पाकिस्तान फिर से दो हिस्सों में बंटेगा? जैसे कभी बंगालियों ने अलग बांग्लादेश की मांग की थी, जो भारत के सहयोग से पूरी भी हुई। ठीक वैसे ही सिंध प्रांत के वासी भी अपने लिए अलग सिंध देश की मांग कर रहे हैं।  गौरतलब है कि अलग सिंध देश की मांग वैसे तो कई वर्षों से उठ रही है लेकिन बीते कुछ दिनों से ज्यादा जोर पकड़ी है। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद से ही सिंध मुल्क की मांग वहां के लोग कर रहे हैं। कई राष्ट्रवादी पार्टियाँ उनका समर्थन कर चुकी हैं। लेकिन हुकूमतों ने कभी गौर नहीं फरमाया। बीते रविवार को पाकिस्तान के राष्ट्रवादी नेता जीएम सईद की जयंती पर सिंधवासियों ने जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की। सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि गया कि उन्हें अलग कर दिया दिया जाए अन्यथा बुरा होगा। क्षेत्रवासी खुलकर सरकार को चुनौती दे रहे हैं। सिंध क्षेत्र में ज्यादातर पंजाबी, ईसाई, हिंदू और बाकी मुस्लिम आबादी रहती है। ये बात सही है, वहां सरकार इन लोगों के साथ वर्षों से ज्यादती करती आई है। अभी हाल में इमरान खान सरकार ने फौज के जरिए इनपर जो जुल्म बरपाया था, उसे न सिर्फ पाकिस्तानियों ने देखा, बल्कि समूचे संसार में थू-थू हुई। सिंध प्रांत में सेना-पुलिस आमने-सामने आकर एक-दूसरे को मारने-काटने पर उतारू हुई थी। पुलिस सिंधियों के पक्ष में थी तो सेना उनके खिलाफ में खड़ी थी। दरअसल, ये इंतिहा की मात्र बानगी थी, ऐसे जुल्म वहां आए दिन लोगों के साथ किए जाते हैं। इन्हीं जुल्मों से लोग मुक्ति चाहते हैं, तभी अलग मुल्क की मांग को लेकर विद्रोह करने पर उतर आए हैं। 18 जनवरी को हजारों लोग सड़कों पर उतरे, कइयों के हाथों में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाली तख्तियां थीं, लोग उनसे मदद की गुहार लगा रहे थे। नारेबाजी हो रही थी, बोल रहे थे कि जैसे कश्मीरियों को 370 से आजादी दिलाई, वैसे हमें भी आजादी दिलवाने में मोदी सहयोग करें। लोगों के हाथों में जब मोदी की तस्वीर वाली तख्तियां सेना ने देखी तो सीधे इमरान खान को सूचित किया गया। इसके बाद मामला दूसरी ही दिशा में चला गया। उनको लगा इस आग के पीछे कहीं भारत का हाथ तो नहीं? विद्रोह की तपिश जब तेज हुई तो इस्लामाबाद से दिल्ली फोन आया लेकिन भारत ने इनकार करके खुद को उनके अंदरूनी मसले से अलग किया। पाकिस्तान में हिंदुओं, ईसाईयों और पंजाबियों के मूल अधिकारों का किस तरह हनन होता है, शायद बताने की जरूरत नहीं? दशकों से लोग पाकिस्तानी हुकूमतों की जुल्म भरी यातनाएँ झेलते आए हैं। इनपर शुरू से इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव बनाया गया। डर के कारण कुछ ने इस्लाम धर्म को अपनाया भी। पाकिस्तान के दूसरों शहरों में इस तरह की हरकतों का होना आम बात है। कराची में बीते दिनों प्राचीन मंदिर को कट्टरपंथियों ने तोड़ डाला, मामला जब तूल पकड़ा तो दिखावे के लिए सरकार ने कुछ लोगों पर कार्रवाई की। हिंदू लड़कियों से वहां जबरन शादी करके उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने को मजबूर किया जाता है, जो किसी से छिपा नहीं। ग्लोबल स्तर पर ये बात समय-समय उठती रहती है। लेकिन थोड़े दिनों बाद सब कुछ शांत हो जाता है। पाकिस्तान के लिए सिंध क्षेत्र क्यों महत्वपूर्ण है, इस थ्योरी को समझना जरूरी है। दरअसल, सिंध का समूचा इलाका संपदाओं से लबरेज है। यह इलाका खेती-बाड़ी, जड़ी-बूटियां, प्राकृतिक औषधियां, ड्राई फ्रूट्स आदि के लिए मशहूर है। ये क्षेत्र पाकिस्तान के दूसरे इलाकों से कहीं ज्यादा संपन्न है। क्षेत्र की आबोहवा हिंदुस्तानी सभ्यता से एकदम मेल खाती है। एक जमाने में सिंध प्रांत वैदिक सभ्यताओं का हब रहा है। इतिहास बहुत ही स्वर्णिम था। लेकिन कट्टरपंथियों ने बर्बाद कर दिया। लोगों का रहना दूभर हो गया। पीछे इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि इस क्षेत्र पर अंग्रेजों का कभी कब्ज़ा हुआ करता था। 1947 में जब भारत आजाद हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। तब जाते-जाते सिंध प्रांत को अंग्रेजों ने पाकिस्तान को सौंप दिया। उनकी उसी गलती को सिंधवी आज भी भुगत रहे हैं। इस्लामाबाद में बैठी पाकिस्तान की हुक़ूमत ने सिंध प्रांत को हमेशा हिकारत की नजरों से देखा। मानविकी पहलुओं, मानव संसाधन, प्रबंधन, मुकम्मल अधिकार सभी पर मानवद्रोही ताकतें हावी रहीं। पिछले एक सप्ताह से सिंध प्रांत के सान क्षेत्र में हजारों लोग अलग मुल्क की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा संसार के दूसरे ताकतवर नेताओं से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। बड़ा मूवमेंट देखकर वहां की सरकार की सांसें भी फूली हुई हैं। क्योंकि घर में लगी चिंगारी की तपिश सरहद पार पहुंच गई है। पाकिस्तान को डर इस बात का भी है, कहीं भारत खुलकर आंदोलकारियों के पक्ष में न आ जाए। अगर ऐसा होता है तो उसका परिणाम क्या होगा? ये बात इमरान खान भी भलीभांति जानते हैं। बलूचिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर और अब सिंध देश की मांग ने उनके तोते उड़ा दिए हैं। पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों ने भी इमरान खान को घेर लिया है। कुल मिलाकर पाकिस्तान सरकार इस वक्त कई अंदरूनी मसलों में घिरी हुई है, इससे उबरना इमरान खान के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 January 2021


bhopal,Now without, subsidies in Parliament

ऋतुपर्ण दवे अब माननीयों और आम लोगों में कम से कम खाने को लेकर जो फर्क था वो खत्म हो जाएगा। फाइव स्टार कल्चर जैसी सहूलियतों के सुविधाभोगी हमारे माननीय सांसदों को संसद भवन में चल रही कोई आधा दर्जन कैण्टीन में लजीज, जायकेदार, चटखारे लगाकर खाए जाने वाली महंगी डिश अबतक 75 फीसदी तक सस्ती मिलती थी। बड़े होटलों में परोसे जाने वाले शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजनों का सांसदों को बाजार दाम के मुकाबले केवल 25 फीसदी दाम चुकाना पड़ता था। सच में ऐसा लगता था कि यह सरासर नाइंसाफी है और जनता के टैक्स से चुकाए पैसों का बेजा इस्तेमाल भी। अब ऐसा नहीं होगा। माननीयों को संसद के गलियारे में बनी शानदार वातानुकूलित कैण्टीन में खाने के लिए पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा जेब ढीली करनी होगी। बीते सत्र तक कितना फर्क था। जनता को बाजार दाम पर मंहगी थाली का इंतजाम करना पड़ता था जबकि उसके द्वारा लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में भेजे गए माननीयों को उसी लजीज थाली पर इतनी सब्सीडी मिलती थी कि सुनकर ही आम लोगों का पेट भर जाता। यदि आरटीआई से आई जानकारी से हो-हल्ला नहीं मचता। सुकून इसी बात यह है कि मंहगाई और सब्सीडी पर मंथन करने वाली संसद के सदस्यों को भी लगने लगा था कि यह गलत है। दो साल पहले भी यह बात उठी थी।लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी को भी लगा कि यह गलत है। सभी दलों के सदस्यों ने इसपर एक राय बनाई और फौरन कैण्टीन के खाने पर मिलने वाली सब्सीडी को खत्म करने पर मुहर लगाई थी। अब इसी 29 जनवरी से सांसदों को संसद के बजट सत्र के दौरान कैंटीन में मिलने वाले लजीज खाने की कीमत उसकी लागत यानी बाजार के हिसाब से चुकानी होगी। जहां आम आदमी मंहगी दाल खाने को मजबूर है, वहीं सांसदों को माली मदद कहें या सरकारी इमदाद जो भी, 13 रुपए 11 पैसे लागत वाली फ्राइड दाल केवल 4 रुपए में मिल चुकी है। सब्जियां वो भी महज 5 रुपए में तो मसाला दोसा 6 रुपए में, फ्राइड फिश और चिप्स 25 रुपए में। मटन कटलेट 18 रुपए में, मटन करी 20 रुपए में और 99.04 रुपए की नॉनवेज थाली सिर्फ 33 रुपए में। एक आरटीआई के जवाब में 2017-18 में जो रेट लिस्ट सामने आई थी उसे देखकर आम आदमी भौंचक्क रह गया। इसमें चिकन करी 50 रुपए में तो शाकाहारी थाली 35 रुपए में परोसी जाती थी। जबकि थ्री कोर्स लंच केवल 106 रुपए में मिलता था। यदि सांसदों की थाली को मिलने वाले सरकारी इमदाद का जोड़-घटाव किया जाए तो माननीयों को मदद का आंकड़ा कम से कम 63 प्रतिशत और अधिकतम 75 प्रतिशत तक जा पहुंचता है। इस सच का दूसरा पहलू भी है। कुछ साल पहले जब आम आदमी की जरूरत की गैस भी कोटा सिस्टम में आ गई। साल भर में केवल 12 गैस सिलेण्डर ही सरकारी इमदाद से एक परिवार को मिलने का दौर शुरू हुआ। तब इन्हीं लाखों आम भारतीयों ने लोकलुभावन विज्ञापन और प्रधानमंत्री के प्रेरक उद्बोधनों से वशीभूत हो सरकारी इमदाद यानी सब्सीडी छोड़ने की होड़ लगा दी थी। यकीनन यही हिन्दुस्तान की खासियत है जो आवाम इतनी भावुक और मेहरबान हुई कि पहली ही अपील के बाद एक झटके में साढ़े 5 लाख लोगों से ज्यादा ने गैस पर सब्सिडी छोड़ दी और इससे सरकार पर 102.3 करोड़ रुपये का बोझ कम हुआ। समय के साथ यह जरूरी भी था और देश के विकास के लिए अहम भी।  सवाल उस वक्त भी उठते रहे कि जब हमारा सबसे बड़ा नुमाइन्दा ही 100 रुपए का खाना 25 रुपए में खाने पर शर्मिन्दा नहीं है वह भी तब जब उसे पगार, दूसरे भत्तों और तमाम सुविधाओं के नाम पर हर महीने डेढ़-दो लाख रुपए से भी ज्यादा की आमदनी या बचत होती है तो गैस का उपयोग करने वाले औसत आय वालों जिनमें दिहाड़ी मजदूर और झोपड़पट्टी में रहने वाले गरीब भी हैं, उनसे सब्सीडी छोड़ने की अपील? आखिर माननीयों को भी यह समझ आई। खुद ही आगे बढ़कर संसद की कैण्टीन के निवाले पर मिलने वाली सरकारी इमदाद को छोड़ने का फैसला जो कर लिया वो बेहद सराहनीय है। संसद की कैण्टीन में सब्सीडी को लेकर मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान एक आरटीआई से खुलासे के बाद 2015 में ही सदन में खूब बहस हुई थी। लेकिन संसद की खाद्य मामलों की समिति के तत्कालीन अध्यक्ष जीतेन्द्र रेड्डी ने सब्सिडी हटाने की संभावना को खारिज कर दिया। उसी दौरान तत्कालीन ससंदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू को भी ये अच्छी बहस का विषय जरूर लगा था। कुछ सांसद तो भलमनसाहत में यह भी कह गए कि हम सब्सिडी छोड़ने को तैयार हैं। यहां यह भी गौर करना होगा कि उसी साल 2 मार्च 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एकाएक संसद की कैण्टीन के कमरा नं. 70 जा पहुँचे। जो तैयार था उसी से उनके लिए शाकाहारी थाली लाई गई जिसमें रोटी, चावल, दाल, सब्जी के रूप में साग, राजमा और रायता था और कीमत कुल 18 रुपये। प्रधानमंत्री ने खाने से पहले सूप भी मंगवाया जिसकी कीमत 8 रुपये और सलाद जिसकी कीमत 3 रुपये थी। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने तब कुल मिलाकर 29 रुपये का बिल चुकाया और संसद की कैण्टीन में पहुँचने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। वहाँ उन्होंने विजिटर बुक में ‘अन्नदाता सुखी भव’ लिखा। हो सकता है कि तभी उनके दिमाग भी यही बात कौंधी हो कि जनता के टैक्स से जुटाए गए पैसों से सांसदों को खाने में सब्सीडी कैसी? इसके बाद यह मामला खूब चर्चाओं में रहा जिसकी आखिरी परिणिति अब सामने है। संसद की कैण्टीनों को साल 2009-10 में 10.46 करोड़, साल 2011-12 में 12.52 करोड़, 2013-14 में 14 करोड़ 9 लाख रुपए की सब्सिडी दी गई। इन कैण्टीनों में सांसदों के अलावा करीब 9000 कर्मचारी भी खाते हैं उनमें भी 85 से 90 फीसदी आयकर दाता हैं। संसद की कैण्टीनों को साल 1952 से सब्सिडी देने का सिलसिला शुरू हुआ है। लेकिन इसपर हाय-तौबा सुभाष अग्रवाल की आरटीआई खुलासे के बाद हुआ और 2 मार्च 2015 में प्रधानमंत्री के वहाँ पहुँचने के बाद से ही यह जब-तब गरमागरम बहस का मुद्दा बनता रहा। अब 19 जनवरी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने इस बात की घोषणा कर ही दी कि संसद की कैण्टीन को मिलने वाली सब्सिडी पूरी तरह से रोक दी गई है। संसद की कैंटीन व्यवस्था उत्तर रेलवे की जगह फाइव स्टार होटल अशोका का संचालन करने वाली सरकारी कंपनी भारतीय पर्यटन विकास निगम लिमिटेड यानी आइटीडीसी को सौंपी जा चुकी है। जिसके खानपान की दर रेलवे की पुरानी कैंटीन से काफी ज्यादा है। इस सब्सिडी के खत्म होने से लोकसभा सचिवालय को हर साल लगभग 8 से 10 करोड़ रुपये की बचत होगी। निश्चित रूप से तमाम सुविधाभोगी और एक ही कार्यकाल में उम्र भर पेंशन की सुविधा के पात्र सांसदों को ऐसी सब्सिडी तब शोभा भी नहीं देती थी जब देश के निजी सेक्टर में न तो पेंशन की सुविधा है न बाद रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारियों की कोई पूछ परख। हालांकि सरकारी क्षेत्र में भी नई और पुरानी पेशन स्कीम को लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं। ऐसे में सांसदों की कैण्टीनों में सब्सिडी रोका जाना सराहनीय कदम है और कह सकते हैं कि देर आयद दुरुस्त आयद। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 January 2021


bhopal,Masks become, crisis for the sea

प्रमोद भार्गव कोरोना विषाणु स्वास्थ्य के साथ-साथ अनेक तरह की समस्याएं खड़ी कर रहा है। हांगकांग की पर्यावरण सरंक्षण संस्था 'ओसियंस एशिया' ने इस सिलसिले में वैश्विक बाजार अनुसंधान के आधार पर एक रिपोर्ट जारी की है, जो पर्यावरण से जुड़े खतरों का बहुस्तरीय खुलासा करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार समुद्री पारस्थितिकी तंत्र सबसे ज्यादा प्रदूषित होगा। उपयोग के बाद लापरवाहीपूर्वक फेंके गए 150 करोड़ मुख-मास्क समुद्र में पहुंच रहे हैं। इस हजारों टन प्लास्टिक से समुद्री जल में फैलने वाले प्रदूषण के कारण समुद्री जीवों को जानलेवा खतरों का भी सामना करना पड़ेगा। कोरोना से बचने के लिए बीते समय में 5200 करोड़ मास्क बने हैं। इनमें से करीब तीन प्रतिशत मास्क समुद्र में पहुंचेंगे। एकबार इस्तेमाल किए ये मास्क मेल्टब्लॉन किस्म के प्लास्टिक से बने होते हैं। इसके संरचनात्मक (कम्पोजिशन) खतरे और संक्रमण की वजह से इसे पुनर्चक्रित करना कठिन है। यह समुद्रों में तब पहुंचता है, जब यह कचरे में फेंक दिया जाता है। प्रत्येक मास्क का वजन तीन से चार ग्राम होता है। ऐसे में एक अनुमान के मुताबिक करीब 6800 टन से ज्यादा प्लास्टिक प्रदूषण समुद्र में उत्पन्न होगा। इसे प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में करीब 450 साल लगेंगे। नए शोधों से पता चला है कि अकेले आर्कटिक सागर में 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। एक और नए ताजा शोध से ज्ञात हुआ है कि दुनियाभर के समुद्रों में 50 प्रतिशत कचरा केवल उन कॉटन बड्स का है, जिनका उपयोग कान की सफाई के लिए किया जाता है। इन अध्ययनों से पता चला है कि 2050 आते-आते समुद्रों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक कहीं ज्यादा होगा। भारत के समुद्रीय क्षेत्रों में तो प्लास्टिक का इतना अधिक मलबा एकत्रित हो गया है कि समुद्री जीव-जंतुओं का जीवन-यापन संकट में आने लगा है। प्लास्टिक जीव जगत के लिए खतरनाक पहलू साबित हो रहा है, बावजूद प्लास्टिक इतना लाभदायी है कि इसके अपशिष्ट का समुचित प्रबंधन हो जाए तो इससे सड़कें और ईंधन तक बनाया जा सकता है। अलबत्ता प्लास्टिक के अवशेष बचते हैं तो इन्हें जीवाणुओं से नष्ट किया जा सकता है।  साइंस एडवांसेज नामक शोध-पत्रिका में छपे एक अध्ययन में बताया है कि आर्कटिक समुद्र के बढ़ते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। वैसे जेआर जाम बैक का दावा है कि समुद्र की तलहटी में 5 खरब प्लास्टिक के टुकड़े जमा हैं। यही वजह है कि समुद्री जल में ही नहीं मछलियों के उदर में भी ये टुकड़े पाए जाने लगे हैं। सबसे ज्यादा प्लास्टिक ग्रीनलैंड के पास स्थित समुद्र में मौजूद है। प्लास्टिक की समुद्र में भयावह उपलब्धि की चौंकाने वाली रिपोर्ट 'यूके नेशनल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल’ ने भी जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक वर्ष दुनिया भर के सागरों में 14 लाख टन प्लास्टिक विलय हो रहा है। सिर्फ इंगलैंड के ही समुद्रों में 50 लाख करोड़ प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं। प्लास्टिक के ये बारीक कण (पार्टीकल) कपास-सलाई (कॉटन-बड्स) जैसे निजी सुरक्षा उत्पादों की देन हैं। ये समुद्री सतह को वजनी बनाकर इसका तापमान बढ़ा रहे हैं। समुद्र में मौजूद इस प्रदूषण के सामाधान की दिशा में पहल करते हुए इंग्लैंड की संसद ने पूरे देश में पर्सनल केयर प्रोडक्ट के प्रयोग पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पारित किया है। इसमें खासतौर से उस कपास-सलाई का जिक्र है, जो कान की सफाई में इस्तेमाल होती है। प्लास्टिक की इस सलाई में दोनों और रूई के फोहे लगे होते हैं। इस्तेमाल के बाद फेंक दी गई यह सलाई सीवेज के जरिए समुद्र में पहुंच जाती हैं। गोया, ताजा अध्ययनों से जो जानकारी सामने आई है, उसमें दावा किया गया है कि दुनिया के समुद्रों में कुल कचरे का 50 फीसदी इन्हीं कपास-सलाईयों का है। इंग्लैंड के अलावा न्यूजीलैंड और इटली में भी कपास-सलाई को प्रतिबंधित करने की तैयारी शुरू हो गई है। दुनिया के 38 देशों के 93 स्वयंसेवी संगठन समुद्र और अन्य जल स्रोतों में घुल रही प्लास्टिक से छुटकारे के लिए प्रयत्नशील हैं। इनके द्वारा लाई गई जागरूकता का ही प्रतिफल है कि दुनिया की 119 कंपनियों ने 448 प्रकार के व्यक्तिगत सुरक्षा उत्पादों में प्लास्टिक का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आठ यूरोपीय देशों में जॉनसन एंड जॉनसन भी कपास-सलाई की बिक्री बंद करने जा रही है। प्रदूषण से जुड़े अध्ययन यह तो अगाह कर रहे हैं कि प्लास्टिक कबाड़ समुद्र द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है। यह हमने पैदा किया है, जो विभिन्न जल-धाराओं में बहता हुआ समुद्र में पहुंचा है। इसलिए अगर समुद्र में प्लास्टिक कम करना है तो हमें धरती पर इसका इस्तेमाल कम करना होगा। समुद्र का प्रदूषण दरअसल हमारी धरती के ही प्रदूषण का विस्तार है, किंतु यह हमारे जीवन के लिए धरती के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। विश्व आर्थिक संगठन के अनुसार दुनियाभर में हर साल 311 टन प्लास्टिक बनाया जा रहा है। इसमें से केवल 14 प्रतिशत प्लास्टिक को पुनर्चक्रित करना संभव हुआ है। भारत के केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय महानगरों में प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्ररण कर बिजली और ईंधन बनाने में लगा है। साथ ही प्लास्टिक के चूर्ण से शहरों और ग्रामों में सड़कें बनाने में सफलता मिल रही है। आधुनिक युग में मानव की तरक्की में प्लास्टिक ने अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए कबाड़ के रूप में जो प्लास्टिक अपशिष्ट बचता है, उसका पुनर्चक्रण जरूरी है। क्योंकि प्लास्टिक के यौगिकों की यह खासियत है कि ये करीब 400 साल तक नष्ट नहीं होते हैं। इनमें भी प्लास्टिक की 'पोली एथलीन टेराप्थलेट' ऐसी किस्म है, जो इससे भी ज्यादा लंबे समय तक जैविक प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद नष्ट नहीं होती है। इसलिए प्लास्टिक का पुर्नचक्रण कर इससे नए उत्पाद बनाने और इसके बाद भी बचे रह जाने वाले अवशेषों को जीवाणुओं के जरिए नष्ट करने की जरूरत है। यदि भारत में कचरा प्रबंधन सुनियोजित और कचरे का पुर्नचक्रण उद्योगों की श्रृंखला खड़ी करके शुरू हो जाए तो इस समस्या का निदान तो संभव होगा ही रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे। भारत में जो प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, उसमें से 40 प्रतिशत का आज भी पुर्नचक्रण नहीं हो पा रहा है। यही नालियों-सीवरों और नदी-नालों से होता हुआ समुद्र में पहुंच जाता है। प्लास्टिक की विलक्षणता यह भी है कि इसे तकनीक के मार्फत पांच बार से भी अधिक मर्तबा पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान इससे वैक्टो ऑयल भी सह उत्पाद के रूप में निकलता है, इसे डीजल वाहनों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत अनेक देश इस कचरे से ईंधन प्राप्त कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई पायलेट रॉसेल ने तो 16 हजार 898 किमी का सफर इसी ईंधन को विमान में डालकर सफर करके विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया है। इस यात्रा के लिए पांच टन बेकार प्लास्टिक को विशेष तकनीक द्वारा गलाकर एक हजार गैलन में तब्दील किया गया। फिर एकल इंजन वाले 172 विमान द्वारा सिडनी से आरंभ हुआ सफर एशिया, मध्य एशिया और यूरोप को नापते हुए छह दिन में लंदन पहुंचकर समाप्त हुआ। प्रतिदिन लगभग 2500 किमी का सफर 185 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से तय किया गया। भारत में भी प्लास्टिक से ईंधन बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है। किंतु अभी प्रारंभिक अवस्था में है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 January 2021


bhopal,Ram temple, Desharatna question, secularism , Dr. Rajendra Prasad

आर.के. सिन्हा दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण का रास्ता साफ कर दिया। अब वहां पर भव्य श्रीराम मंदिर बनेगा। इसी क्रम में राम जन्मभूमि मंदिर न्यास ने मंदिर के निर्माण के लिए सबसे सहयोग राशि मांगी है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी मांगी थी। राष्ट्रपति जी ने मंदिर निर्माण के लिए पहला दान दिया। उन्होंने इसके लिए 5,01,000 (पांच लाख एक) रुपए का दान दिया और इस अभियान की सफलता के लिए अपनी व्यक्तिगत शुभकामनाएं भी दीं। याद रखिए कि वे देश के राष्ट्रपति होने के साथ-साथ एक नागरिक भी हैं। उनकी भी अपनी धार्मिक आस्थाएं और निष्ठाएं हैं। इसलिए अगर उन्होंने राममंदिर निर्माण के लिए राशि दी तो कुछ सेक्युलरवादी जल-भुन क्यों गए। वे कह रहे हैं कि राष्ट्रपति पद पर बैठे इंसान को धार्मिक क्रियाकलापों से अपने को दूर रखना चाहिए। क्यों? क्या ऐसा कहीं संविधान में लिखा है क्या? संविधान में राम-कृष्ण राष्ट्रपति जी पर सवाल खड़े करने वाले जरा ठीक से पता कर लें कि भारत के संविधान की मूल प्रति में राम, कृष्ण और नटराज के चित्र क्यों हैं। यही नहीं, हमारे संविधान की मूल प्रति पर शांति का उपदेश देते हुये भगवान बुद्ध और पूर्व सभ्यता के प्रतीक मोहन जोदड़ो के चित्र भी हैं जो अब कायदे से पाकिस्तान के अंग हैं। हिन्दू धर्म के एक और अहम प्रतीक अष्ट कमल भी संविधान की मूल प्रति पर हर जगह मौजूद है। पूरा मुखपृष्ठ ही कमल दल को संजोकर बनाया हुआ है। संविधान की मूल प्रति में मुगल बादशाह अकबर भी दिख रहे हैं और सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह भी मौजूद हैं। मैसूर के सुल्तान टीपू और 1857 की वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के चित्र भी संविधान की मूल प्रति पर उकेरे गए हैं। तो राष्ट्रपति जी पर सवालिया निशान खड़े करने वाले जान लें कि हमारा संविधान नास्तिक भारत के निर्माण की वकालत कदापि नहीं करता। यह देश की समृद्ध संस्कृति और सभी प्रकार की धार्मिक आस्थाओं का पूरा सम्मान करता है। ये विक्षिप्त मानसिकता के तत्व यह भी कह रहे हैं कि राष्ट्रपति कोविंद ने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का अनुसरण किया, तो यह तो बहुत अच्छा ही किया है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1951 में सोमनाथ मंदिर का पुननिर्माण जब पूरा हुआ तो खुद इसका उद्घाटन करने के लिए गए थे, हालांकि तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह पसंद नहीं आया था और उन्होंने खुले तौर पर विरोध भी किया था। राजेन्द्र बाबू, नेहरू जी और सोमनाथ मंदिर का उदाहरण देने वाले अपने इतिहास का ज्ञान थोड़ा दुरुस्त कर लें। जो नेहरू जी आपत्ति जता रहे थे राजेन्द्र बाबू के सोमनाथ मंदिर जाने पर वे स्वयं दिल्ली में हजरत बख्तियार काकी की दरगाह की मरम्मत के लिए तो कभी पीछे नहीं हटे थे। उस समय नेहरू की धर्मनिरपेक्षता कहां चली गई थी? दरअसल काकी की दरगाह को 1947 में भड़के दंगों में कुछ क्षति पहुंचाई गई थी। उसे देखने के लिए 27 जनवरी 1948 को गांधीजी महरौली स्थित काकी की दरगाह में गए थे। उसे देखने के बाद उन्होंने नेहरू जी को निर्देश दिया कि वे इसकी मरम्मत करवाएं। नेहरू जी ने तुरंत दरगाह की मरम्मत और सौंदर्यीकरण के लिए उन दिनों सरकार के कोष से 50 हजार रुपए आवंटित करवाए। जरा सोचें कि 1948 के 50 हजार रुपए आज की तारीख में कितने होते हैं। फिर वे आगे चलकर वहां जाने भी लगे फूलवालों की सैर कार्यक्रम में भाग लेने के लिए। ये थी नेहरू जी की धर्मनिरपेक्षता। सोमनाथ मंदिर तो मुगल आक्रांताओं द्वारा कई बार तोड़ा गया था। लेकिन, इसके पुनरोद्धार के लिये नेहरू ने तो कभी 50 रुपये भी नहीं दिये थे। कहाँ सोमनाथ और कहाँ एक मामूली शख्स की कब्र! इसी से साबित हो जायेगा कि नेहरू और उनके चेलों की धर्मनिरपेक्षता का चरित्र कैसा है? अपने को धर्मनिरपेक्षता का प्रवक्ता बताने वाले नेहरू जी की पुत्री के भी तमाम उदाहरण देते हैं धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने के लिहाज से। क्या उन्हें मालूम है कि दिल्ली में विगत 50 सालों में बने भव्य मंदिरों में छतरपुर स्थित आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर की स्थापना में उन्हीं इंदिरा जी का आशीर्वाद था। ये मां दुर्गा के कात्यायनी रूप को समर्पित मंदिर है। इसका शिलान्यास सन् 1974 में किया गया था। इसकी स्थापना कर्नाटक के संत बाबा नागपाल जी ने की थी। यह मंदिर 70 एकड़ में फैला है। कहते हैं कि ये संसार के सबसे विशाल मंदिरों में से एक है। अगर इंदिरा जी इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी थीं तो इसमें कोई अपराध तो वह नहीं कर रही थीं। इंदिरा जी अपने पिता की तरह ढोंगी नहीं थी। वे मंदिरों में अक्सर जाया करती थीं और बाबा नागपाल से लेकर कांचीपीठ के शंकराचार्य चन्द्रशेखरानन्द सरस्वती (जयेन्द्र सरस्वती के गुरु) के आशीर्वाद लेती रहती थीं। राष्ट्रपति भवन में मंदिर-मस्जिद और जो राजेन्द्र बाबू के सोमनाथ मंदिर में जाने को बार-बार मुद्दा बनाते हैं, वे जान लें कि उन्हीं की पहल पर राष्ट्रपति भवन परिसर में मंदिर और मस्जिद दोनों का निर्माण हुआ था। चूंकि राष्ट्रपति भवन से सटे ही हैं चर्च और गुरुद्वारा इसलिए इनके निर्माण की जरूरत महसूस नहीं की गई होगी। राजेन्द्र बाबू और उनकी पत्नी श्रीमती राजवंशी देवी प्रसाद दिवाली, ईद, क्रिसमस, बाबा नानक जन्मदिन आदि त्योहार पूरे राष्ट्रपति भवन के सैकड़ों कर्मचारियों के साथ मनाते थे। अगर राजेन्द्र बाबू उन आयोजनों में व्यस्ततावश कुछ देर तक रुकने के बाद चले जाते थे तो भी उनकी अति सरल पत्नी सारे कार्यक्रम में पूरे समय उपस्थित रहती थीं। उन्हें राष्ट्रपति भवन में सब मां ही कहते थे। आप अब भी राष्ट्रपति भवन में रहे पुराने लोगों से पूछे सकते हैं कि राजेन्द्र बाबू रमजान के दौरान खत्म शरीफ के मौके पर राष्ट्रपति भवन की मस्जिद में अवश्य जाते थे। रमजान में सभी मस्जिदों में कुरआन सुनाया जाता है। वो जिस दिन मुकम्मल होता है, उसे खत्म शरीफ कहते हैं। खत्म शरीफ पर राष्ट्रपति मस्जिद में गाजे-बाजे के साथ पहुंचकर इमाम साहब को पगड़ी पहनाते थे। उन्हें उपहार देते थे। उस मौके पर राष्ट्रपति भवन में रहने वाला स्टाफ और उनके परिजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहते थे। इस मस्जिद को राष्ट्रपति भवन मस्जिद ही कहा जाता है। ये रिवायत राजेन्द्र बाबू ने शुरू की थी। बेशक, उनके जैसे पवित्र शख्स को लेकर मिथ्या प्रचार करने वाले घोर पाप कर रहे हैं। चलिए फिर लौटें अपने मूल विषय पर। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए एक लाख रुपए का चेक सौंपा है। अच्छी बात यह कि अयोध्या के मुसलमान भी राममंदिर के निर्माण में आगे आ रहे हैं। सबको पता है कि वे तो पहले भी राममंदिर के निर्माण को लेकर काफी सकारात्मक थे। विवाद फैलाने वाले तो ये तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी ही थे। बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय लेखिका तसलीमा नसरीन ने भी कहा कि राममंदिर के लिए अनेकों मुसलमान दान दे रहे हैं। मुसलमानों को मंदिर के लिए धन जुटाने के लिए आगे आना भी चाहिए। अगर मुस्लिम दान करते हैं, तो इससे हिंदू-मुस्लिम सद्भाव मजबूत होगा और हिंदुओं के साथ उनके संबंध बेहतर होंगे। राममंदिर निर्माण में सबसे बड़ी बाधा तो सेक्युलरवादी और असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुसलमानों के कथित नेता ही थे। पर वे तमाम अवरोध अब हट चुके हैं। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 20 January 2021


bhopal,India-Nepal: meaningful dialogue

डॉ़. वेदप्रताप वैदिक नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली की यह दिल्ली-यात्रा हुई तो इसलिए है कि दोनों राष्ट्रों के संयुक्त आयोग की सालाना बैठक होनी थी लेकिन यह यात्रा बहुत सामयिक और सार्थक रही है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने परस्पर सड़कें बनाने, रेल लाइन डालने, व्यापार बढ़ाने, कुछ नए निर्माण-कार्य करने आदि मसलों पर सहमति दी लेकिन इन निरापद मामलों के अलावा जो सबसे पेंचदार मामला दोनों देशों के बीच आजकल चल रहा है, उस पर भी दोनों विदेश मंत्रियों ने बात की है। नवंबर 2020 में शुरू हुए सीमांत-क्षेत्र के लिपुलेख-कालापानी-लिंपियाधुरा के सीमा-विवाद के कारण दोनों देशों के बीच काफी कहासुनी हो गई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय इस मामले को इस वार्ता के दौरान शायद ज्यादा तूल देना नहीं चाहता था। इसीलिए उसने अपनी विज्ञप्ति में इसपर हुई चर्चा का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन नेपाली विदेश मंत्रालय ने उस चर्चा का साफ़-साफ़ जिक्र किया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि नेपाल की आंतरिक राजनीति का यह बड़ा मुद्दा बन गया है। नेपाल की ओली-सरकार द्वारा संसद में रखे गए नेपाल के नए नक्शे पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई गई है। भारत के पड़ौसी देशों की राजनीति की यह मजबूरी है कि उनके नेता अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए प्रायः भारत-विरोधी तेवर अख्तियार कर लेते हैं। अब क्योंकि सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो टुकड़े हो गए है, संसद भंग कर दी गई है और ओली सरकार इस समय संकटग्रस्त है, इसलिए भारत से भी सहज संबंध दिखाई पड़ें, यह जरूरी है। इस काम को नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने काफी दक्षतापूर्ण ढंग से संपन्न किया है। इस बीच यों भी भारत के सेनापति और विदेश सचिव की काठमांडो-यात्रा ने आपसी तनाव को थोड़ा कम किया है। इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड एफेयर्स में ग्यावली ने कई पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए इतनी सावधानी बरती कि भारत-विरोधी एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकला। कुछ टेढ़े सवालों का जवाब देते समय यदि वे चूक जाते तो उन्हें नेपाल में चीनी दखलंदाजी को स्वीकार करना पड़ता लेकिन उन्होंने कूटनीतिक चतुराई का परिचय देते हुए विशेषज्ञों और पत्रकारों पर यही प्रभाव छोड़ा कि भारत-नेपाल सीमा-विवाद शांतिपूर्वक हल कर लिया जाएगा। उन्होंने 1950 की भारत-नेपाल संधि के नवीकरण की भी चर्चा की। उन्होंने भारत-नेपाल संबंध बराबरी के आधार पर संचालित करने पर जोर दिया और कोरोना-टीके देने के लिए भारत का आभार माना। भारत-नेपाल संबंधों की भावी दिशा क्या होगी, यह जानने के पहले नेपाली राजनीति की आंतरिक पहेली के हल होने का इंतजार हमें करना होगा। तात्कालिक भारत-नेपाल संवाद तो सार्थक ही रहा है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।‎)

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Dakhal News 16 January 2021


bhopal,India-Nepal: meaningful dialogue

डॉ़. वेदप्रताप वैदिक नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली की यह दिल्ली-यात्रा हुई तो इसलिए है कि दोनों राष्ट्रों के संयुक्त आयोग की सालाना बैठक होनी थी लेकिन यह यात्रा बहुत सामयिक और सार्थक रही है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने परस्पर सड़कें बनाने, रेल लाइन डालने, व्यापार बढ़ाने, कुछ नए निर्माण-कार्य करने आदि मसलों पर सहमति दी लेकिन इन निरापद मामलों के अलावा जो सबसे पेंचदार मामला दोनों देशों के बीच आजकल चल रहा है, उस पर भी दोनों विदेश मंत्रियों ने बात की है। नवंबर 2020 में शुरू हुए सीमांत-क्षेत्र के लिपुलेख-कालापानी-लिंपियाधुरा के सीमा-विवाद के कारण दोनों देशों के बीच काफी कहासुनी हो गई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय इस मामले को इस वार्ता के दौरान शायद ज्यादा तूल देना नहीं चाहता था। इसीलिए उसने अपनी विज्ञप्ति में इसपर हुई चर्चा का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन नेपाली विदेश मंत्रालय ने उस चर्चा का साफ़-साफ़ जिक्र किया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि नेपाल की आंतरिक राजनीति का यह बड़ा मुद्दा बन गया है। नेपाल की ओली-सरकार द्वारा संसद में रखे गए नेपाल के नए नक्शे पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई गई है। भारत के पड़ौसी देशों की राजनीति की यह मजबूरी है कि उनके नेता अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए प्रायः भारत-विरोधी तेवर अख्तियार कर लेते हैं। अब क्योंकि सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो टुकड़े हो गए है, संसद भंग कर दी गई है और ओली सरकार इस समय संकटग्रस्त है, इसलिए भारत से भी सहज संबंध दिखाई पड़ें, यह जरूरी है। इस काम को नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने काफी दक्षतापूर्ण ढंग से संपन्न किया है। इस बीच यों भी भारत के सेनापति और विदेश सचिव की काठमांडो-यात्रा ने आपसी तनाव को थोड़ा कम किया है। इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड एफेयर्स में ग्यावली ने कई पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए इतनी सावधानी बरती कि भारत-विरोधी एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकला। कुछ टेढ़े सवालों का जवाब देते समय यदि वे चूक जाते तो उन्हें नेपाल में चीनी दखलंदाजी को स्वीकार करना पड़ता लेकिन उन्होंने कूटनीतिक चतुराई का परिचय देते हुए विशेषज्ञों और पत्रकारों पर यही प्रभाव छोड़ा कि भारत-नेपाल सीमा-विवाद शांतिपूर्वक हल कर लिया जाएगा। उन्होंने 1950 की भारत-नेपाल संधि के नवीकरण की भी चर्चा की। उन्होंने भारत-नेपाल संबंध बराबरी के आधार पर संचालित करने पर जोर दिया और कोरोना-टीके देने के लिए भारत का आभार माना। भारत-नेपाल संबंधों की भावी दिशा क्या होगी, यह जानने के पहले नेपाली राजनीति की आंतरिक पहेली के हल होने का इंतजार हमें करना होगा। तात्कालिक भारत-नेपाल संवाद तो सार्थक ही रहा है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।‎)

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Dakhal News 16 January 2021


bhopal,India-Nepal: meaningful dialogue

डॉ़. वेदप्रताप वैदिक नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली की यह दिल्ली-यात्रा हुई तो इसलिए है कि दोनों राष्ट्रों के संयुक्त आयोग की सालाना बैठक होनी थी लेकिन यह यात्रा बहुत सामयिक और सार्थक रही है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने परस्पर सड़कें बनाने, रेल लाइन डालने, व्यापार बढ़ाने, कुछ नए निर्माण-कार्य करने आदि मसलों पर सहमति दी लेकिन इन निरापद मामलों के अलावा जो सबसे पेंचदार मामला दोनों देशों के बीच आजकल चल रहा है, उस पर भी दोनों विदेश मंत्रियों ने बात की है। नवंबर 2020 में शुरू हुए सीमांत-क्षेत्र के लिपुलेख-कालापानी-लिंपियाधुरा के सीमा-विवाद के कारण दोनों देशों के बीच काफी कहासुनी हो गई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय इस मामले को इस वार्ता के दौरान शायद ज्यादा तूल देना नहीं चाहता था। इसीलिए उसने अपनी विज्ञप्ति में इसपर हुई चर्चा का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन नेपाली विदेश मंत्रालय ने उस चर्चा का साफ़-साफ़ जिक्र किया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि नेपाल की आंतरिक राजनीति का यह बड़ा मुद्दा बन गया है। नेपाल की ओली-सरकार द्वारा संसद में रखे गए नेपाल के नए नक्शे पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई गई है। भारत के पड़ौसी देशों की राजनीति की यह मजबूरी है कि उनके नेता अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए प्रायः भारत-विरोधी तेवर अख्तियार कर लेते हैं। अब क्योंकि सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो टुकड़े हो गए है, संसद भंग कर दी गई है और ओली सरकार इस समय संकटग्रस्त है, इसलिए भारत से भी सहज संबंध दिखाई पड़ें, यह जरूरी है। इस काम को नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने काफी दक्षतापूर्ण ढंग से संपन्न किया है। इस बीच यों भी भारत के सेनापति और विदेश सचिव की काठमांडो-यात्रा ने आपसी तनाव को थोड़ा कम किया है। इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड एफेयर्स में ग्यावली ने कई पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए इतनी सावधानी बरती कि भारत-विरोधी एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकला। कुछ टेढ़े सवालों का जवाब देते समय यदि वे चूक जाते तो उन्हें नेपाल में चीनी दखलंदाजी को स्वीकार करना पड़ता लेकिन उन्होंने कूटनीतिक चतुराई का परिचय देते हुए विशेषज्ञों और पत्रकारों पर यही प्रभाव छोड़ा कि भारत-नेपाल सीमा-विवाद शांतिपूर्वक हल कर लिया जाएगा। उन्होंने 1950 की भारत-नेपाल संधि के नवीकरण की भी चर्चा की। उन्होंने भारत-नेपाल संबंध बराबरी के आधार पर संचालित करने पर जोर दिया और कोरोना-टीके देने के लिए भारत का आभार माना। भारत-नेपाल संबंधों की भावी दिशा क्या होगी, यह जानने के पहले नेपाली राजनीति की आंतरिक पहेली के हल होने का इंतजार हमें करना होगा। तात्कालिक भारत-नेपाल संवाद तो सार्थक ही रहा है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।‎)

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Dakhal News 16 January 2021


bhopal, Consider everything, only then , right to health

सियाराम पांडेय 'शांत' व्यक्ति के जीवन में जिस तरह सोलह संस्कार होते हैं, सोलह श्रृंगार होते हैं, उसी तरह उसकी जिंदगी में सोलह तरह के सुख और सोलह तरह के दुख होते हैं। निरोगी शरीर को जीवन का पहला सुख कहा गया है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आरोग्य को अगर सबका अधिकार बता रहे हैं तो यह उचित ही है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आरोग्यता प्राप्त करना हर किसी का अधिकार है। फर्रूखाबाद जिले के विख्यात बौद्ध पर्यटक तीर्थस्थल संकिसा में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में आयोजित मुख्यमंत्री जन आरोग्य मेले का उद्घाटन करते हुए यह बात कही। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के 3400 स्थानों पर जन आरोग्य मेलों का शुभारंभ किया गया। उत्तर प्रदेश का हर आदमी निरोगी रहे, इसके लिए सरकार यथासंभव प्रयास कर भी रही है। सरकार की अपनी सीमा है लेकिन अगर हर व्यक्ति को जागरूक किया जा सके तो उसे रोगों के प्रभाव से बचाया जा सकता है। स्वास्थ्य विज्ञानी भी मानते हैं कि 80 प्रतिशत बीमारियां मन की होती है। 20 प्रतिशत बीमारी ही तन की होती है। जिनका मनोबल मजबूत होता है, पहली बात तो वे बीमार नहीं होते और कदाचित होते भी हैं तो जल्द ही ठीक भी हो जाते हैं। मुख्यमंत्री ने विश्वास दिलाया है कि प्रदेश के हर नागरिक को कोरोना का टीका लगेगा लेकिन चरणबद्ध ढंग से। कुछ लोग ड्राई रन की राजनीतिक आलोचना कर सकते हैं लेकिन ऐहतियात के नजरिए से यह एक अच्छा प्रयोग है। कोई भी अभियान शुरू करने से पहले व्यवस्था बिगाड़ने वाले हर छिद्र को बंद कर देना चाहिए। साथ ही हर कील-कांटे दुरुस्त कर लेना चाहिए। प्रदेश के लोगों का जीवन आरोग्यमय हो, इसके लिए सर्वप्रथम सरकार द्वारा योगदिवस का आयोजन किया गया था। नसीहत दी गई थी कि योग करें और निरोग रहें। इसके बाद अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के मुकम्मल प्रयास भी हुए। अगर सरकार जन आरोग्य मेलों का आयोजन कर रही है तो इसके मूल में जनहित का भाव ही प्रमुख अभीष्ठ है। मेलों के दौरान चिकित्सक दवाई देंगे, सामान्य बीमारियों की जांच एवं उपचार करेंगे तो इससे दो लाभ होंगे। एक यह कि लोग बड़ी बीमारियों से बचेंगे। दूसरा, सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य योजनाओं से वे अवगत हो सकेंगे। उन्हें आयुष्मान भारत योजना के सम्बन्ध में जानकारी मिलेगी। इसके तहत गोल्डन कार्ड दिए जाएंगे। यह एक अच्छी पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री की मानें तो टीबी के उपचार की व्यवस्था की जाएगी। बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं को लगने वाले टीके की जानकारी दी जाएगी। इसमें शक नहीं कि आरोग्य मेलों से लाखों की संख्या में लाभार्थियों को लाभ प्राप्त हुआ है। प्रदेश में पहले भी पूर्व सरकारों में स्वास्थ्य मेले लगते रहे हैं लेकिन वह किस तरह लगते थे और वहां जांच -उपचार के नाम पर क्या कुछ होता था, यह किसी से भी छिपा नहीं है। योगी सरकार में उत्तर प्रदेश में लगने वाले स्वास्थ्य मेलों से औपचारिकता समाप्त हुई थी और लोगों का उनपर विश्वास भी जमने लगा लेकिन कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य मेलों के आयोजन पर रोक की जमीन तैयार कर दी थी। अब अगर उत्तर प्रदेश में नए सिरे से स्वास्थ्य मेलों का अयोजन शुरू हुआ है तो इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए उसका संतुष्ट होना जरूरी है। इसलिए कारोबार, रोजगार में बढ़ोतरी होते रहना बहुत जरूरी है। शौचालय अगर आरोग्य का आधार है तो नारी गरिमा का प्रतीक भी है। बकौल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दो करोड़ 61 लाख लाभार्थियों को शौचालय का लाभ मिला है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक सामुदायिक शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। स्वयं सहायता समूह की एक महिला को सामुदायिक शौचालय के रखरखाव के साथ जोड़ा जा रहा है। इस कार्य के लिए महिला को 6 हजार रुपए का मानदेय दिया जा रहा है। सुरक्षा का संकट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं रह सकता। न तो व्यापार कामयाब हो सकता है और न व्यक्ति निरापद ढंग से अपने काम कर सकता है। सरकार ने आराजक तत्वों पर नकेल कसकर प्रदेश को मानसिक तौर पर स्वस्थ रखने का काम किया है। भय व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। वह किसी भी बीमारी से बड़ी बीमारी है। माफियाओं के घरों पर चलते बुलडोजर आम जन को सुरक्षा की गारंटी तो देते ही हैं। सरकार जब सबके साथ, सबके विकास और सबके विश्वास की बात करती है तो पता चलता है कि वह यह सब बिना किसी मतभेद के कर रही है। उसका दावा है कि शासन की हर एक योजना का लाभ पात्र लाभार्थी तक पहुंचेगा। 'एक जनपद, एक उत्पाद' योजना के तहत युवाओं और परम्परागत उद्यमियों को जोड़कर,उन्हें स्वरोजगार के लिए बैंक से लोन दिलवाकर, युवाओं को रोजगार देने के लिए रोजगार मेलों का आयोजन कर सरकार घर में माया यानी दूसरे सुख का भी बंदोबस्त कर रही है। कृषि संरचना को सुदृढ़ करने, कोल्ड स्टोरेज और भण्डारण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के पीछे सरकार की योजना किसानों को मजबूती देने और मानसिक,आर्थिक संबल प्रदान करने की है। महिलाएं भी स्वयंसेवी समूह बनाकर कृषि क्षेत्र में योगदान करें, ऐसा सरकार का प्रयास है। जनसहभागिता से कृषि क्षेत्र में सुधार को द्रुतगति प्रदान करने की दिशा में सरकार न केवल सोच रही है बल्कि उस पर अमल भी कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्टार्टअप योजना, मुख्यमंत्री आवास योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना, 'एक जनपद-एक उत्पाद' सहित अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन के जरिए सरकार की मंशा व्यक्ति को मानसिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की है। सरकार की योजना सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक समरसता लाने की है। वह जीवन के हर पहलू पर ध्यान दे रही है लेकिन यह काम अकेले सरकार का ही नहीं है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत 20.48 लाख अयोग्य लाभार्थियों को 1,364 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ है। यह जानकारी केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना के जवाब में दी है। पंजाब, असम, केरल और महाराष्ट्र के ज्यादातर लाभार्थी इस कोटि के हैं जिन्होंने अयोग्य होते हुए भी किसान सम्मान निधि हासिल की है। इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए। इससे जरूररतमंदों का नुकसान होता है।  गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि 'कोउ न काहू सुख-दुख कर दाता। निजकृत कर्म भोग सब ताता।' इसलिए जबतक स्वास्थ्य को लेकर चाहे वह तन का हो, मन का हो या कि धन का हो, जन-जन जागरूक और गंभीर नहीं होगा तबतक अकेले सरकार के प्रयास नाकाफी साबित होंगे। देश सर्वोपरि की भावना से जिस दिन लोग काम करने लगेंगे, बहुत सारी समस्याओं का सहज समाधान हो जाएगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 15 January 2021


bhopal,Economy will run, separate track ,goods trains

अरविन्द मिश्रा देश के विकास को अब भारतीय रेल की मालगाड़ियों से नई रफ्तार मिलने वाली है। अब एक्सप्रेस और मुसाफिर रेलों को मालगाड़ियों की वजह से न तो अपना समय गंवाना पड़ेगा और न ही उनकी रफ्तार कम होगी। पंजाब से हजारों टन अनाज या मध्य प्रदेश के सिंगरौली से कोयला लेकर हर दिन दौड़ने वाली मालगाड़ियों को अब मुसाफिर ट्रेनों की वजह से अपनी रफ्तार कम नहीं करनी पड़ेगी। इसी तरह हरियाणा के महेंद्रगढ़, राजस्थान के जयपुर, अजमेर, सीकर और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, कानपुर जैसे जिलों में लगे उद्योगों को बंदरगाहों तक पहुंचने में मौजूदा वक्त के मुकाबले काफी कम समय और लागत लगानी होगी। मालगाड़ियों के लिए अलग से तैयार किए गए रेलवे ट्रैक परियोजना से यह सब मुमकिन होगा। देश में माल गाड़ियों के लिए अलग रेलवे ट्रैक विकसित करने वाली बहुप्रतीक्षित डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर परियोजना आखिरकार परिचालन के स्तर आ चुकी है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना के एक हिस्से (ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) पर बने न्यू खुर्जा-न्यू भाऊपुर रेलवे ट्रैक का उद्घाटन किया। इस 351 किमी लंबे रेलवे ट्रैक पर पहली मालगाड़ी दौड़ने लगी है। 7 जनवरी को ही इसी परियोजना के दूसरे हिस्से वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर 306 किमी लंबे न्यू रेवाड़ी-न्यू मदार खंड को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। इस माल गलियारे पर न्यू अटेली से न्यू किशनगढ़ के लिए विश्व के पहले डबल स्टैक लांग हाल कंटेनर ट्रेन जो कि लगभग डेढ़ किमी लंबी है, वह भी परिचालन के स्तर पर आ गई है। वेस्टर्न डीएफसी के इस ट्रैक पर तीन जंक्शन न्यू रेवाड़ी, न्यू अटेली, न्यू फूलेरा सहित 9 स्टेशन बनाए गए हैं। इस पूरी परियोजना को सिर्फ रेलवे से जोड़कर देखना उचित नहीं है। यह देश के आर्थिक मोर्चे पर परिवहन तंत्र से लेकर वस्तुओं के आयात-निर्यात, रोजगार सृजन और पर्यावरण सुरक्षा सभी आयामों को गति देगा। इस विशाल परियोजना के वृहद स्वरूप का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि ये दोनों फ्रेट कॉरिडोर 9 राज्यों तथा 60 से अधिक जिलों से होकर गुजरेंगे। यह पूरी परियोजना देश की आर्थिक तरक्की को कैसे पटरी पर लाएगी, इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं। वर्तमान में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बनाए जा रहे हैं। इसमें ईस्टर्न कॉरिडोर की लंबाई 1856 किमी है, जो लुधियाना से पश्चिम बंगाल के डानकुनी तक जाएगा। वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर 1504 किमी लंबा होगा, जो दादरी से जवाहर लाल नेहरू पोर्ट मुंबई तक फैला होगा। दोनों फ्रेट कॉरिडोर डबल ट्रैक के होंगे, यानी आने जाने वाली माल गाड़ियों के लिए अलग-अलग पटरियां होंगी। भारतीय रेल दिल्ली-मुंबई, चेन्नई और हावड़ा चार महानगरों को जोड़ने वाली चतुर्भुज की एक कड़ी के समान है। इसे आमतौर पर स्वर्ण चतुर्भुज के रूप में जाना जाता है। इस रूट की कुल लंबाई 10,122 किमी है। जिससे भारतीय रेल के मालभाड़ा यातायात की 55 प्रतिशत से अधिक राजस्व आय आती है। पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर लाइन देश की सबसे व्यस्त लाइन हैं, जिनकी क्षमता का लगभग 150 फीसदी तक उपयोग किया जा रहा है। उभरती हुई शक्ति को भारी कोयला संचलन, तीव्र मूल-भूत ढांचा निर्माण और बढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कारण डेडिकेटेट फ्रेट कॉरिडोर की अवधारणा ने जन्म लिया है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और उस पर दौड़ने वाली मालगाड़ियों की औसत रफ्तार लगभग 100 किमी प्रति घंटा होगी, जो अभी चल रही मालगाड़ियों की औसत रफ्तार से काफी अधिक होगी। इससे न केवल समय की बचत होगी बल्कि एक साथ ज्यादा माल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा सकेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा सब्जी, फल और दूध जैसे जल्दी खराब होने वाले माल को होगा। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर न केवल तेज रफ्तार माल गाड़ियां समय पर माल ढोएंगी बल्कि ये पूरी तरह से अति आधुनिक सिग्नल, ट्रैक, इंजन और कम्युनिकेशन सुविधाओं से भी जुड़ी होंगी। आने वाले दिनों में ऐसी उम्मीद की जा रही है कि कूरियर और ई-कॉमर्स की तरह से मालगाड़ियों से माल भेजने और मंगवाने की हर पल की जानकारी ट्रैक भी की जा सकेगी। अभी रेलवे की सभी गाड़ियां चाहे वो माल गाड़ियां हों या आम सवारी गाड़ियां हों या मेल एक्सप्रेस और शताब्दी-राजधानी सभी एक ही ट्रैक पर दौड़ती हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय रेलवे ट्रैक अपनी क्षमता से करीब डेढ़ गुना ज्यादा काम कर रहा है। इससे ट्रेनों की औसत रफ्तार भी कम हो गई और आने-जाने में लगने वाला समय भी बढ़ गया, ट्रेनों की लेट-लतीफी के पीछे भी ये एक बड़ा कारण है। डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के पूरी तरह चालू हो जाने के बाद अभी भारतीय रेल के मौजूदा नेटवर्क से 40 प्रतिशत लाइनें मालगाड़ियों से मुक्त हो जाएंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो फ्रेट कॉरिडोर के अस्तित्व में आने से सवारी गाड़ियों के लिए पटरियों पर जगह खाली हो जाएगी, उम्मीद की जा रही है कि अगर रेलवे चाहे तो 25 से 30 फीसदी तक यात्री गाड़ियों की संख्या बढ़ा सकता है। जाहिर है इसका फायदा आम यात्रियों को ही होगा। यहां उल्लेखनीय है कि माल ढुलाई यातायात में रेलवे की घटती हिस्सेदारी के बारे में एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कुल माल ढुलाई में से 57 प्रतिशत की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है, जबकि चीन में 22 प्रतिशत और अमेरिका में 32 प्रतिशत माल की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है। इसके विपरीत भारतीय रेल देश के कुल माल ढुलाई यातायात में से केवल 36 प्रतिशत की ही ढुलाई करता है, जबकि अमेरिका में 48 प्रतिशत और चीन में 47 प्रतिशत ढुलाई रेलवे द्वारा की जाती है। इसके अतिरिक्त डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर वायु प्रदूषण रोकने और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में भी बड़ा योगदान देगा। पिछले दिनों पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन को लेकर हुए पर्यावरण समझौते के मुताबिक भारत को अगले 15 साल में कार्बन उत्सर्जन में लगभग एक फीसदी कटौती का जो वादा किया है, उसमें बड़ा हिस्सा सड़क यातायात से ट्रकों को कम करने से आ सकता है। ये तभी हो सकता है जब ट्रक ट्रांसपोर्ट का कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध हो। यहीं पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सड़कों से ट्रकों का बोझ हटाने में मददगार साबित होगा। माना जा रहा है कि दोनों निर्माणाधीन फ्रेट कॉरिडोर पर हर 10 मिनट में एक मालगाड़ी दौड़ेगी। मालगाड़ियों की लंबाई भी 700 मीटर से दोगुनी होकर 1.5 किमी हो जाएगी। माना जा रहा है कि हर मालगाड़ी में लगभग 300 ट्रकों के बराबर माल ढोया जा सकेगा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे सड़कों का बोझ भी कम होगा। साधारण गणित का इस्तेमाल करें तो अगर हर 10 मिनट में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स पर एक मालगाड़ी के हिसाब से जोड़ें तो दिन में 140 ट्रेनें चलेंगी और अगर एक मालगाड़ी में 300 ट्रकों का माल ढोया जाए तो 43,200 ट्रकों का माल रोजाना इन फ्रेट कॉरिडोर से ढोया जा सकेगा। यही नहीं नई मालगाड़ियों को इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि इन पर माल रखने का प्लेटफार्म आज की मालगाड़ियों से कुछ ज्यादा चौड़ा हो, साथ ही जमीन से इसकी ऊंचाई भी घटाई जा रही है। इससे एक के ऊपर एक दो वैगन या कंटेनर रखे जा सकेंगे, कई मायनों में इस तरह की माल ढुलाई विश्व इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित करेगी।  डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ऑफ इंडिया लिमिटेड के दोनों निर्माणाधीन कार्यान्वयन में इस बात का विशेष ध्यान रख रहा है कि अधिक ऊर्जा दक्षता के साथ इन्हें परिचालित किया जा सके। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के अगले 30 वर्ष के बारे में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक अगर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर न बने तो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 582 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, जबकि दोनों डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के काम शुरू होने के बाद केवल 124.5 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, जो एक चौथाई से भी कम होगा। ख़ास बात यह है कि रेल मंत्रालय की चार और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनाने की योजना है। इनके लिए डीएफसीसीआईएल को प्रारंभिक इंजीनियरिंग और यातायात सर्वेक्षण का काम सौंपा गया है। ये अतिरिक्त कॉरिडोर करीब 2,330 किमी का पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर (कोलकाता-मुंबई), करीब 2,343 किमी. का उत्तर दक्षिण कॉरिडोर (दिल्ली-चेन्नई), 1100 किमी का पूर्व तटीय कॉरिडोर (खड़गपुर-विजयवाड़ा) और लगभग 899 किमी. का दक्षिणी कॉरिडोर (चेन्नई-गोवा) हैं। फ्रेट कॉरिडोर के स्टेशनों के आसपास सरकारी और निजी क्षेत्र के वेयर हाउस निर्माण में तेजी आने से इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होगा। माल गोदामों की संख्या बढ़ने से अनाज सब्जियों की बर्बादी पर लगाम लगेगी। जिन क्षेत्रों से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर गुजरेगा, वहां नई दुकानें, होटल, बाज़ार विकसित होंगे। माल की आवाजाही के लिए ट्रकों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों की संख्या बढ़ेगी। इसके संकेत अभी से आगरा-टूंडला लाइन पर खरेजी के पास डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट आने से मिलने लगे हैं। यहां बरसों से बंजर पड़ी जमीन महंगी हो गई। अच्छा मुआवजा मिलने से नई बस्तियां और बाज़ार विकसित हो रहे हैं। जाहिर है, कोरोना संकट के बीच नए दशक में प्रवेश करते हुए देश की अर्थव्यवस्था रेल पटरियों से न सिर्फ रफ्तार हासिल करेगी बल्कि उसके आकार को 5 खरब डॉलर के स्वर्णिम स्तर पर ले जाने में भी सहायक होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 January 2021


bhopal,Economy will run, separate track ,goods trains

अरविन्द मिश्रा देश के विकास को अब भारतीय रेल की मालगाड़ियों से नई रफ्तार मिलने वाली है। अब एक्सप्रेस और मुसाफिर रेलों को मालगाड़ियों की वजह से न तो अपना समय गंवाना पड़ेगा और न ही उनकी रफ्तार कम होगी। पंजाब से हजारों टन अनाज या मध्य प्रदेश के सिंगरौली से कोयला लेकर हर दिन दौड़ने वाली मालगाड़ियों को अब मुसाफिर ट्रेनों की वजह से अपनी रफ्तार कम नहीं करनी पड़ेगी। इसी तरह हरियाणा के महेंद्रगढ़, राजस्थान के जयपुर, अजमेर, सीकर और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, कानपुर जैसे जिलों में लगे उद्योगों को बंदरगाहों तक पहुंचने में मौजूदा वक्त के मुकाबले काफी कम समय और लागत लगानी होगी। मालगाड़ियों के लिए अलग से तैयार किए गए रेलवे ट्रैक परियोजना से यह सब मुमकिन होगा। देश में माल गाड़ियों के लिए अलग रेलवे ट्रैक विकसित करने वाली बहुप्रतीक्षित डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर परियोजना आखिरकार परिचालन के स्तर आ चुकी है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना के एक हिस्से (ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) पर बने न्यू खुर्जा-न्यू भाऊपुर रेलवे ट्रैक का उद्घाटन किया। इस 351 किमी लंबे रेलवे ट्रैक पर पहली मालगाड़ी दौड़ने लगी है। 7 जनवरी को ही इसी परियोजना के दूसरे हिस्से वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर 306 किमी लंबे न्यू रेवाड़ी-न्यू मदार खंड को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। इस माल गलियारे पर न्यू अटेली से न्यू किशनगढ़ के लिए विश्व के पहले डबल स्टैक लांग हाल कंटेनर ट्रेन जो कि लगभग डेढ़ किमी लंबी है, वह भी परिचालन के स्तर पर आ गई है। वेस्टर्न डीएफसी के इस ट्रैक पर तीन जंक्शन न्यू रेवाड़ी, न्यू अटेली, न्यू फूलेरा सहित 9 स्टेशन बनाए गए हैं। इस पूरी परियोजना को सिर्फ रेलवे से जोड़कर देखना उचित नहीं है। यह देश के आर्थिक मोर्चे पर परिवहन तंत्र से लेकर वस्तुओं के आयात-निर्यात, रोजगार सृजन और पर्यावरण सुरक्षा सभी आयामों को गति देगा। इस विशाल परियोजना के वृहद स्वरूप का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि ये दोनों फ्रेट कॉरिडोर 9 राज्यों तथा 60 से अधिक जिलों से होकर गुजरेंगे। यह पूरी परियोजना देश की आर्थिक तरक्की को कैसे पटरी पर लाएगी, इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं। वर्तमान में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बनाए जा रहे हैं। इसमें ईस्टर्न कॉरिडोर की लंबाई 1856 किमी है, जो लुधियाना से पश्चिम बंगाल के डानकुनी तक जाएगा। वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर 1504 किमी लंबा होगा, जो दादरी से जवाहर लाल नेहरू पोर्ट मुंबई तक फैला होगा। दोनों फ्रेट कॉरिडोर डबल ट्रैक के होंगे, यानी आने जाने वाली माल गाड़ियों के लिए अलग-अलग पटरियां होंगी। भारतीय रेल दिल्ली-मुंबई, चेन्नई और हावड़ा चार महानगरों को जोड़ने वाली चतुर्भुज की एक कड़ी के समान है। इसे आमतौर पर स्वर्ण चतुर्भुज के रूप में जाना जाता है। इस रूट की कुल लंबाई 10,122 किमी है। जिससे भारतीय रेल के मालभाड़ा यातायात की 55 प्रतिशत से अधिक राजस्व आय आती है। पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर लाइन देश की सबसे व्यस्त लाइन हैं, जिनकी क्षमता का लगभग 150 फीसदी तक उपयोग किया जा रहा है। उभरती हुई शक्ति को भारी कोयला संचलन, तीव्र मूल-भूत ढांचा निर्माण और बढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कारण डेडिकेटेट फ्रेट कॉरिडोर की अवधारणा ने जन्म लिया है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और उस पर दौड़ने वाली मालगाड़ियों की औसत रफ्तार लगभग 100 किमी प्रति घंटा होगी, जो अभी चल रही मालगाड़ियों की औसत रफ्तार से काफी अधिक होगी। इससे न केवल समय की बचत होगी बल्कि एक साथ ज्यादा माल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा सकेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा सब्जी, फल और दूध जैसे जल्दी खराब होने वाले माल को होगा। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर न केवल तेज रफ्तार माल गाड़ियां समय पर माल ढोएंगी बल्कि ये पूरी तरह से अति आधुनिक सिग्नल, ट्रैक, इंजन और कम्युनिकेशन सुविधाओं से भी जुड़ी होंगी। आने वाले दिनों में ऐसी उम्मीद की जा रही है कि कूरियर और ई-कॉमर्स की तरह से मालगाड़ियों से माल भेजने और मंगवाने की हर पल की जानकारी ट्रैक भी की जा सकेगी। अभी रेलवे की सभी गाड़ियां चाहे वो माल गाड़ियां हों या आम सवारी गाड़ियां हों या मेल एक्सप्रेस और शताब्दी-राजधानी सभी एक ही ट्रैक पर दौड़ती हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय रेलवे ट्रैक अपनी क्षमता से करीब डेढ़ गुना ज्यादा काम कर रहा है। इससे ट्रेनों की औसत रफ्तार भी कम हो गई और आने-जाने में लगने वाला समय भी बढ़ गया, ट्रेनों की लेट-लतीफी के पीछे भी ये एक बड़ा कारण है। डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के पूरी तरह चालू हो जाने के बाद अभी भारतीय रेल के मौजूदा नेटवर्क से 40 प्रतिशत लाइनें मालगाड़ियों से मुक्त हो जाएंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो फ्रेट कॉरिडोर के अस्तित्व में आने से सवारी गाड़ियों के लिए पटरियों पर जगह खाली हो जाएगी, उम्मीद की जा रही है कि अगर रेलवे चाहे तो 25 से 30 फीसदी तक यात्री गाड़ियों की संख्या बढ़ा सकता है। जाहिर है इसका फायदा आम यात्रियों को ही होगा। यहां उल्लेखनीय है कि माल ढुलाई यातायात में रेलवे की घटती हिस्सेदारी के बारे में एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कुल माल ढुलाई में से 57 प्रतिशत की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है, जबकि चीन में 22 प्रतिशत और अमेरिका में 32 प्रतिशत माल की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है। इसके विपरीत भारतीय रेल देश के कुल माल ढुलाई यातायात में से केवल 36 प्रतिशत की ही ढुलाई करता है, जबकि अमेरिका में 48 प्रतिशत और चीन में 47 प्रतिशत ढुलाई रेलवे द्वारा की जाती है। इसके अतिरिक्त डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर वायु प्रदूषण रोकने और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में भी बड़ा योगदान देगा। पिछले दिनों पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन को लेकर हुए पर्यावरण समझौते के मुताबिक भारत को अगले 15 साल में कार्बन उत्सर्जन में लगभग एक फीसदी कटौती का जो वादा किया है, उसमें बड़ा हिस्सा सड़क यातायात से ट्रकों को कम करने से आ सकता है। ये तभी हो सकता है जब ट्रक ट्रांसपोर्ट का कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध हो। यहीं पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सड़कों से ट्रकों का बोझ हटाने में मददगार साबित होगा। माना जा रहा है कि दोनों निर्माणाधीन फ्रेट कॉरिडोर पर हर 10 मिनट में एक मालगाड़ी दौड़ेगी। मालगाड़ियों की लंबाई भी 700 मीटर से दोगुनी होकर 1.5 किमी हो जाएगी। माना जा रहा है कि हर मालगाड़ी में लगभग 300 ट्रकों के बराबर माल ढोया जा सकेगा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे सड़कों का बोझ भी कम होगा। साधारण गणित का इस्तेमाल करें तो अगर हर 10 मिनट में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स पर एक मालगाड़ी के हिसाब से जोड़ें तो दिन में 140 ट्रेनें चलेंगी और अगर एक मालगाड़ी में 300 ट्रकों का माल ढोया जाए तो 43,200 ट्रकों का माल रोजाना इन फ्रेट कॉरिडोर से ढोया जा सकेगा। यही नहीं नई मालगाड़ियों को इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि इन पर माल रखने का प्लेटफार्म आज की मालगाड़ियों से कुछ ज्यादा चौड़ा हो, साथ ही जमीन से इसकी ऊंचाई भी घटाई जा रही है। इससे एक के ऊपर एक दो वैगन या कंटेनर रखे जा सकेंगे, कई मायनों में इस तरह की माल ढुलाई विश्व इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित करेगी।  डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ऑफ इंडिया लिमिटेड के दोनों निर्माणाधीन कार्यान्वयन में इस बात का विशेष ध्यान रख रहा है कि अधिक ऊर्जा दक्षता के साथ इन्हें परिचालित किया जा सके। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के अगले 30 वर्ष के बारे में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक अगर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर न बने तो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 582 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, जबकि दोनों डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के काम शुरू होने के बाद केवल 124.5 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, जो एक चौथाई से भी कम होगा। ख़ास बात यह है कि रेल मंत्रालय की चार और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनाने की योजना है। इनके लिए डीएफसीसीआईएल को प्रारंभिक इंजीनियरिंग और यातायात सर्वेक्षण का काम सौंपा गया है। ये अतिरिक्त कॉरिडोर करीब 2,330 किमी का पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर (कोलकाता-मुंबई), करीब 2,343 किमी. का उत्तर दक्षिण कॉरिडोर (दिल्ली-चेन्नई), 1100 किमी का पूर्व तटीय कॉरिडोर (खड़गपुर-विजयवाड़ा) और लगभग 899 किमी. का दक्षिणी कॉरिडोर (चेन्नई-गोवा) हैं। फ्रेट कॉरिडोर के स्टेशनों के आसपास सरकारी और निजी क्षेत्र के वेयर हाउस निर्माण में तेजी आने से इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होगा। माल गोदामों की संख्या बढ़ने से अनाज सब्जियों की बर्बादी पर लगाम लगेगी। जिन क्षेत्रों से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर गुजरेगा, वहां नई दुकानें, होटल, बाज़ार विकसित होंगे। माल की आवाजाही के लिए ट्रकों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों की संख्या बढ़ेगी। इसके संकेत अभी से आगरा-टूंडला लाइन पर खरेजी के पास डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट आने से मिलने लगे हैं। यहां बरसों से बंजर पड़ी जमीन महंगी हो गई। अच्छा मुआवजा मिलने से नई बस्तियां और बाज़ार विकसित हो रहे हैं। जाहिर है, कोरोना संकट के बीच नए दशक में प्रवेश करते हुए देश की अर्थव्यवस्था रेल पटरियों से न सिर्फ रफ्तार हासिल करेगी बल्कि उसके आकार को 5 खरब डॉलर के स्वर्णिम स्तर पर ले जाने में भी सहायक होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 January 2021


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सेना दिवस (15 जनवरी) पर विशेष योगेश कुमार गोयल प्रतिवर्ष 15 जनवरी को भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है और हम इस वर्ष 15 जनवरी को 73वां सेना दिवस मनाने जा रहे हैं। सेना दिवस के अवसर पर पूरा देश थलसेना के अदम्य साहस, जांबाज सैनिकों की वीरता, शौर्य और उसकी शहादत को याद करता है। इस विशेष अवसर पर जवानों के दस्ते और अलग-अलग रेजीमेंट की परेड के अलावा झांकियां भी निकाली जाती हैं और उन बहादुर सेनानियों को सलामी दी जाती है, जिन्होंने देश और लोगों की सलामती के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। 15 जनवरी को ही यह दिवस मनाए जाने का विशेष कारण यही है कि आज ही के दिन वर्ष 1949 में लेफ्टिनेंट जनरल केएम करियप्पा भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बने थे। उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान संभाली थी। जनरल फ्रांसिस बुचर भारत के आखिरी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ थे। 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में जन्मे करियप्पा ने 20 वर्ष की आयु में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी शुरू की थी और भारत-पाक आजादी के समय उन्हें दोनों देशों की सेनाओं के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 1947 में उन्होंने भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्मा में जापानियों को शिकस्त देने के लिए उन्हें प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अम्पायर’ दिया गया था। 1953 में वे भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए और 94 वर्ष की आयु में 1993 में उनका निधन हुआ। केएम करियप्पा दूसरे ऐसे सेना अधिकारी थे, जिन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी। उन्हें 28 अप्रैल 1986 को फील्ड मार्शल का रैंक प्रदान किया गया था। फील्ड मार्शल एक पांच सितारा अधिकारी रैंक और भारतीय सेना में सर्वोच्च प्राप्य रैंक है। भारतीय सेना में यह पद सर्वोच्च होता है, जो किसी सैन्य अधिकारी को सम्मान स्वरूप दिया जाता है। देश के इतिहास में अबतक केवल दो अधिकारियों को ही यह रैंक दिया गया है। सबसे पहले जनवरी 1973 में राष्ट्रपति द्वारा सैम मानेकशां को फील्ड मार्शल पद से सम्मानित किया था। उसके बाद 1986 में केएम करियप्पा को फील्ड मार्शल बनाया गया। भारतीय थल सेना का गठन ईस्ट इंडिया कम्पनी की सैन्य टुकड़ी के रूप में कोलकाता में 1776 में हुआ था, जो बाद में ब्रिटिश भारतीय सेना बनी और देश की आजादी के बाद इसे ‘भारतीय थल सेना’ नाम दिया गया। भारतीय सेना की 53 छावनियां और 9 आर्मी बेस हैं और चीन तथा अमेरिका के साथ भारतीय सेना दुनिया की तीन सबसे बड़ी सेनाओं में शामिल है। हमारी सेना संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सबसे बड़ी योगदानकर्ताओं में से एक है। यह दुनिया की कुछेक ऐसी सेनाओं में से एक है, जिसने कभी भी अपनी ओर से युद्ध की शुरुआत नहीं की। भारतीय सेना के ध्वज का बैकग्राउंड लाल रंग का है, ऊपर बायीं ओर तिरंगा झंडा, दायीं ओर भारत का राष्ट्रीय चिह्न और तलवार हैं। सेना दिवस के अवसर पर सेना प्रमुख को सलामी दी जाती रही है लेकिन 2020 में पहली बार सेना प्रमुख के स्थान पर सीडीएस जनरल बिपिन रावत को सलामी दी गई थी। देश की आजादी के बाद भारतीय सेना पांच बड़े युद्ध लड़ चुकी है, जिनमें चार पाकिस्तान के खिलाफ और एक चीन के साथ लड़ा था। देश की आजादी के बाद 1947-48 में हुए भारत-पाक युद्ध को ‘कश्मीर युद्ध’ नाम से भी जाना जाता है, जिसके बाद कश्मीर का भारत में विलय हुआ था। 1962 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा धोखे से थाग-ला-रिज पर भारतीय सेना पर हमला बोल दिया गया था। उस जमाने में भारतीय सेना के पास स्वचालित और आधुनिक हथियार नहीं होते थे, इसलिए चीन को रणनीतिक बढ़त मिली थी। 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी। 13 दिनों तक चले उस युद्ध के बाद ही पाकिस्तान के टुकड़े कर बांग्लादेश का जन्म हुआ और पाकिस्तानी जनरल नियाजी के साथ 90 हजार पाक सैनिकों ने जांबाज भारतीय सेना के समक्ष हथियार डाल दिए थे। मई से जुलाई 1999 तक चले कारगिल युद्ध में तो भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी। सेना दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर चीन द्वारा वर्तमान में लगातार पेश की जा रही चुनौतियों के दौर में भारतीय सेना की निरन्तर बढ़ती ताकत का उल्लेख करना बेहद जरूरी है। भारतीय सैन्यबल में करीब 13.25 लाख सक्रिय सैनिक, 11.55 लाख आरक्षित बल तथा 20 लाख अर्धसैनिक बल हैं। भारतीय थलसेना में 4426 टैंक (2410 टी-72, 1650 टी-90, 248 अर्जुन एमके-1, 118 अर्जुन एमके-2), 5067 तोपें, 290 स्वचालित तोपें, 292 रॉकेट तोपें तथा 8600 बख्तरबंद वाहन शमिल हैं। पूरी दुनिया आज भारतीय सेना का लोहा मानती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय थलसेना हर परिस्थिति में चीनी सेना से बेहतर और अनुभवी है, जिसके पास युद्ध का बड़ा अनुभव है, जो विश्व में शायद ही किसी अन्य देश के पास हो। भले ही चीन के पास भारत से ज्यादा बड़ी सेना और सैन्य साजो-सामान है लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में दुनिया में किसी के लिए भी इस तथ्य को नजरअंदाज करना संभव नहीं कि भारत की सेना को अब दुनिया की सबसे खतरनाक सेना माना जाता है। सेना के विभिन्न अंगों के पास ऐसे-ऐसे खतरनाक हथियार हैं, जो चीनी सेना के पास भी नहीं हैं। धरती पर लड़ी जाने वाली लड़ाईयों के लिए भारतीय सेना की गिनती दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में होती है और कहा जाता है कि अगर किसी सेना में अंग्रेज अधिकारी, अमेरिकी हथियार और भारतीय सैनिक हों तो उस सेना को युद्ध के मैदान में हराना असंभव होगा। जापान के एक आकलन के मुताबिक भारतीय थलसेना चीन के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। इस रिपोर्ट के अनुसार हिन्द महासागर के मध्य में होने के कारण भारत की रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है और दक्षिण एशिया में अब भारत का काफी प्रभाव है। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट सीएनएन की एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि भारत की ताकत पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गई है और युद्ध की स्थिति में भारत का पलड़ा भारी रह सकता है। बोस्टन में हार्वर्ड केनेडी स्कूल के बेलफर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स तथा वाशिंगटन के एक अमेरिकी सुरक्षा केन्द्र के अध्ययन में कहा जा चुका है कि भारतीय सेना उच्च ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ाई के मामले में माहिर है और चीनी सेना इसके आसपास भी नहीं फटकती। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 January 2021


bhopal, 5 years, Prime Minister ,Crop Insurance Scheme

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के 5 साल पूरे हो गए। इस योजना के तहत अबतक देशभर के 29 करोड़ किसानों ने जीवन बीमा कराया। हर साल 5.5 करोड़ इस योजना से आच्छादित हो रहे हैं। यह बताना मुनासिब होगा कि इसमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश के किसानों की है। इस योजना से उत्तर प्रदेश के 6.18 करोड़ किसानों ने पंजीकरण कराया है। केंद्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में योगी सरकार सबसे आगे है। यह कहने में शायद ही किसी को गुरेज हो कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के चार वर्ष किसानों के उत्कर्ष के रहे हैं। इन चार वर्षों में यहां किसानों के हित में कई बड़े निर्णय हुए हैं। चाहे 36 हजार करोड़ रुपए से 86 लाख किसानों का ऋण मोचन रहा हो या फिर उत्तर प्रदेश के 2.20 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री सम्मान निधि से लाभान्वित करना, योगी सरकार अग्रिम मोर्चे पर खड़ी नजर आती है। 1.56 करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटकर, 55 लाख किसानों को द मिलियन फार्मर्स स्कूल में प्रशिक्षण दिलाकर और राज्य में किसान समृद्धि आयोग का गठन कर योगी आदित्यनाथ ने यह साबित करने की कोशिश की है कि प्रदेश में सही मायने में डबल इंजन की सरकार चल रही है और इसमें किसानों का हित सर्वोपरि है। हालांकि प्रधानमंत्री बीमा योजना से देशभर में आच्छादित होने वाले किसानों की यह संख्या अभी भी संतोषजनक नहीं है। देशभर में किसानों को सबसे कम एक समान प्रीमियम पर एक व्यापक जोखिम समाधान प्रदान करने के लिए यह योजना 13 जनवरी 2016 को आरम्भ की गई थी।सरकार को पता है कि बादलों को बांधकर खेती नहीं कि जा सकती। साल-दर-साल आने वाली आपदाओं से किसानों को भारी नुकसान होता रहता है। उनकी फसल नष्ट हो जाती है और वे कर्ज के मकड़जाल में उलझते चले जाते हैं। ऐसे में यह योजना उनके लिए किसी सुरक्षा कवच जैसी है। पिछले 5 साल में 90 हजार करोड़ के फसल नुकसान का भुगतान यह बताता है कि केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर बहुत गंभीर है। जिस समय दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब और हरियाणा के किसान तीनों नए कृषि कानूनों को खत्म करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, ऐसे समय में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पांच साल पूरे होना और प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री द्वारा किसानों को बधाई देना आश्वस्त तो करता ही है कि सरकार और किसानों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघल रही है। मगर धीरे-धीरे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले में समिति गठित कर दी है। यह और बात है कि किसानों को उस समिति पर अभी यकीन नहीं हो पा रहा है। ऐसा नहीं कि इससे पहले इस देश में फसल बीमा योजनाएं नहीं थीं लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि इतनी पारदर्शी नहीं थीं। प्रधानमंत्री फसल बीमा न केवल स्वैच्छिक है बल्कि अत्याधुनिकी प्रौद्योगिकी से भी जुड़ी है। फसल नुकसान के दावों के त्वरित निस्तारण और फसलों के नुकसान के मूल्यांकन के लिए उपग्रहों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में लेटलतीफी की गुंजाइश वैसे भी नहीं रह जाती। किसानों को अधिक से अधिक इस योजना से जुड़ना और लाभान्वित होना चाहिए। योजना में किसानों को अकेले प्रीमियम नहीं भरना है बल्कि केंद्र और राज्य सरकार भी समान रूप से प्रीमियम के भुगतान में किसानों का साथ देती हैं। सरकार ने इस योजना की बीमित राशि 15100 रुपए से बढ़ाकर 40700 रुपए कर दी है। इससे तो किसानों को ही लाभ होगा। कुछ राजनीतिक दलों का तर्क होगा कि किसान प्रीमियम कहाँ से भरेगा। सारी किस्त सरकार को ही भरनी चाहिए। सरकार ऐसा कर भी सकती है लेकिन इससे श्रम के प्रति सम्मान, सहभागिता और स्वाभिमान का भाव तिरोहित हो जाएगा जो किसी भी लिहाज से उचित नहीं। पूर्वोत्तर राज्यों में इस योजना की 90 प्रतिशत प्रीमियम सहायता केंद्र सरकार देती है। देश के खेतिहर वर्ग के लिए एक अदद बीमा योजना की दरकार दशकों से रही है। पहली बार 1972 में सरकार ने एक फसल बीमा योजना लागू की थी, जिसकी गड़बड़ियों को सुधार कर 1985 में दूसरी योजना लागू हुई। इसके 15 साल बाद तीसरी योजना आई और फिर पिछले अनुभवों के आधार पर तमाम सुधार करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने खरीफ 2016 से एक नई स्कीम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की। सरकार की ओर से दावा किया गया कि इस योजना में सभी खामियों को दूर कर दिया गया है। इस योजना के नाम में प्रधानमंत्री जोड़ा जाना कई राज्यों और राजनीतिक दलों को नागवार गुजरा क्योंकि इसमें जो प्रीमियम सरकारों को देना है, उसमें राज्य और केंद्र की हिस्सेदारी आधी-आधी है। इसके कारण शुरू से ही कई राज्यों ने इस योजना का विरोध किया और कइयों ने इसमें शामिल होने से इनकार भी कर दिया था। किसानों द्वारा सभी खरीफ फसलों के लिए केवल 2 प्रतिशत एवं सभी रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत का एक समान प्रीमियम का भुगतान किया जाना है। वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में प्रीमियम केवल 5 प्रतिशत रखा गया है। शेष प्रीमियम जो 90 से 98 प्रतिशत तक है, उसका भुगतान सरकार द्वारा किया जा रहा है। ऐसे में इसपर राजनीति उचित नहीं है। योजना में बुवाई से पूर्व चक्र से लेकर कटाई के बाद तक फसल के पूरे चक्र को शामिल किया गया है, जिसमें रोकी गई बुवाई और फसल के बीच में प्रतिकूल परिस्थितियों से होने वाला नुकसान भी शामिल है। बाढ़, बादल फटने और प्राकृतिक आग जैसे खतरों के कारण होनेवाली स्थानीय आपदाओं और कटाई के बाद होनेवाले व्यक्तिगत खेती के स्तर पर नुकसान को शामिल किया गया है। लगातार सुधार लाने के प्रयास के रूप में, इस योजना को सभी किसानों के लिए स्वैच्छिक बनाया गया था, फरवरी 2020 में इसमें सुधार किया गया। केंद्र सरकार की मानें तो कोविड लॉकडाउन में भी लगभग 70 लाख किसानों को 8741.30 करोड़ रुपये के दावों का भुगतान किया गया। पंजाब में इस योजना के शुरू होने के वक्त जब भाजपा गठबंधन वाली सरकार थी, तब भी और बाद में कांग्रेस के आने के बाद भी, पंजाब ने कभी इस योजना में हिस्सेदारी नहीं की। बिहार ने भी खरीफ 2018 से ही इससे अपना हाथ खींच लिया था। खरीफ 2019 से पश्चिम बंगाल भी इससे अलग हो गया और रबी 2019-20 से आंध्र प्रदेश भी पीएमएफबीवाई का हिस्सा नहीं रहा। मौजूदा खरीफ सीजन में जिन और 4 राज्यों ने इस योजना से अपना हाथ खींच लिया, उनमें तेलंगाना, झारखंड, गुजरात और मध्य प्रदेश हैं। जिन राज्यों में सबसे ज्यादा इन दोनों योजनाओं के तहत सबसे ज्यादा पंजीकरण हुए हैं, उनमें महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तर प्रदेश शीर्ष पर हैं। यदि साल 2019-20 के खरीफ और रबी, दोनों सीजन में चुकाए गए कुल प्रीमियम की रकम देखें, तो यह 27298.87 करोड़ रुपये बैठती है जिसमें से किसानों ने 3786.72 करोड़ रुपये का भुगतान किया, जबकि केंद्र सरकार ने 11275.92 करोड़ रुपये और राज्यों ने 12236.24 करोड़ रुपये का भार वहन किया। केंद्र सरकार अगर किसानों से प्रधानमंत्री योजना से जुड़ने का आग्रह कर रही है तो वह उचित ही है। राज्यों का विरोध इसलिए भी है कि उन्हें अपने हिस्से की राशि देनी पड़ रही है तो वह इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को अपनी परेशानी बात सकती है। किसानों के मुद्दे पर असहयोग की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। अपने अन्य खर्च घटाकर भी किसानों की मदद की जानी चाहिए। यही लोक धर्म भी है। श्रेय-प्रेय में कुछ नहीं रखा, जो भी काम करेगा, श्रेय तो उसे मिल ही जाएगा। वह कुछ न बोले बताए तो भी। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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Dakhal News 14 January 2021


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आर.के. सिन्हा मुंबई में आप पिरोजशा गोदरेज मार्ग देख सकते हैं। वे कोई राजनेता, लेखक, स्वाधीनता सेनानी या कवि नहीं थे। हमारे यहां आमतौर इन्हीं लोगों के नाम पर सड़कों, स्टेडियमों, पार्कों वगैरह के नाम रखे जाते हैं। गोदरेज का संबंध गोदरेज उद्योग घराने से था। वे मूलत: कारोबारी थे और एक कारोबारी के रूप में गोदरेज ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब इस देश में उद्यमियों का उचित सम्मान किया जाता था। वक्त बदला तो समाज में जबरदस्त नकारात्मकता आ गई। कारण राजनीतिक हैं या नहीं, इसकी चर्चा अभी इस लेख में करने का विशेष लाभ नहीं। देख लीजिए कि आजकल देश के दो महत्वपूर्ण औद्योगिक घरानों के पीछे अकारण कुछ विक्षिप्त सोशल मीडिया के नकारात्मक तत्व पड़े रहते हैं। आप समझ रहे होंगे कि मैं रिलायंस और अडानी समूहों की बात कर रहा हूँ। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (आरआईएल) ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल, कपड़ा, प्राकृतिक संसाधन, खुदरा व्यापार और दूरसंचार के क्षेत्र में देशव्यापी बड़ा कारोबार करती है। रिलायंस भारत की सबसे अधिक लाभ कमाने वाली कंपनियों में से एक है। इसका अर्थ यह हुआ कि रिलायंस के लाखों शेयर होल्डर भी उस लाभ के भागीदार हैं जिनमें ज्यादातर मिडिल और लोअर मिडिल क्लास वाले ही हैं। ये बाजार पूंजीकरण के आधार पर भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनी है एवं राजस्व के मामले में भी यह देश की चोटी की कंपनी है। इसमें लाखों पेशेवर काम करते हैं। लगभग सभी की तनख्वाह इतनी अधिक होती है कि सभी टैक्स देते हैं। इसी तरह इसके लाखों शेयरधारक भी हैं। उन्हें आरआईएल से हर साल मोटा लाभांश मिलता है। ये बाजार पूंजीकरण में 150 बिलियन डॉलर से अधिक का कारोबार पार करने वाली पहली भारतीय कंपनी भी है। अब बात कर लें जरा अदानी समूह की। ये मुख्य रूप से कोयला व्यापार, कोयला खनन तथा बिजली निर्माता कम्पनी है। अदानी ग्रुप को स्थापित करने वाले गौतम अदानी नाम के एक उद्यमी हैं। अदानी ग्रुप देश की सबसे बड़ी एक्सपोर्ट कंपनियों में से एक है। यानि बड़े स्तर पर विदेशी मुद्रा कमाने वाली कंपनी गौतम अदानी का जन्म अहमदाबाद के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था और वे कुल सात भाई-बहन थे। पढ़ाई-लिखाई करने से पहले ही रोजी-रोटी का सवाल आ गया। नतीजा यह हुआ कि इंटर की पढ़ाई के बाद उन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी में बीकॉम में एडमिशन तो ले लिया, लेकिन पढ़ाई आगे बढ़ नहीं पाई। 18 वर्ष की उम्र में ही कुछ पैसे कमाने के चक्कर में मुंबई आए और एक डायमंड कंपनी में तीन-चार सौ रुपये की छोटी-सी नौकरी पर लग गए। दो साल वहां काम करने के बाद गौतम अदानी ने झावेरी बाजार में खुद का डायमंड ब्रोकरेज आउटफिट खोला। यहीं से उनकी जिंदगी पलटनी शुरू हो गई। वर्ष 1981 में अदानी के बड़े भाई मनसुखभाई ने प्लाटिक की एक यूनिट अहमदाबाद में लगाई और उन्होंने गौतम को कंपनी चलाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने बड़े भाई की पीवीसी यूनिट संभाली और धीरे-धीरे कारोबार आगे बढ़ाया। 1988 में उन्होंने एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी अदानी इंटरप्राइजेज की स्थापना की। आज अदानी ग्रुप का कारोबार दुनिया भर में फैला हुआ है। रिलायंस को धीरूभाई अंबानी ने शुरू किया और इसे बुलंदी पर पहुंचाया उनके पुत्र मुकेश अंबानी ने। गौतम अदानी तो पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। देश के नौजवानों को इनसे प्रेरित और प्रभावित होना चाहिए। पर इन्हें जबर्दस्ती खलनायक बनाया जा रहा है। यह शर्मनाक स्थिति है। बुरा मत मानिए, ये सब अपने देश में होता रहा है। ये नकारात्मकता बढ़ती जा रही है। यूपीए सरकार के दौर में 2013 में कुमार मंगलम बिड़ला समूह के अध्यक्ष आदित्य बिड़ला पर कोलगेट में एफआईआर ही दर्ज हो गया था। उस मामले से कॉरपोरेट इंडिया सन्न हो गया था। उनका भारत के कॉरपोरेट जगत में टाटा ग्रुप के पुराण पुरुष रतन टाटा, महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के प्रमुख आनंद महिन्द्रा, एचडीएफसी बैंक के चेयरमेन दीपक पारेख के जैसा ही स्थान है। इससे पहले कभी कुमार मंगलम बिड़ला का नाम किसी विवाद में नहीं आया था। इसलिए उनके खिलाफ सीबीआई की तरफ से चार्जशीट दायर करने से हड़कंप मच गया था। अगर हम अपने देश के उजली छवि वाले कॉरपोरेट जगत के दिग्गजों पर मिथ्या आरोप लगाएँगे या फिर उनपर एफआईआर दर्ज करवाएँगे तो समझ लें कि दुनियाभर में भारतीय कारोबारियों की गलत छवि ही जाएगी। ऐसा दुष्प्रचार मैं राष्ट्र विरोधी गतिविधि कहूँ तो अतिशयोक्ति मत समझिएगा। भारत को लेकर निवेशकों के बीच गलत छवि बनेगी। समझ नहीं आता कि आप कैसे जाने-माने उद्योगपतियों के खिलाफ बिना किसी कारण बिना कुछ जाने कैंपन चलाने लगते हैं। कोई यह तो नहीं कह रहा है कि टैक्स चोरों या नियमों और कानून का उल्लंघन करने वाले किसी उद्योगपति या अन्य शख्स को माफ किया जाए। पर आरोप लगाने से पहले साक्ष्य तो देख लो। आदित्य विक्रम बिड़ला ग्रुप की लगभग 40 देशों में मौजूदगी है। हजारों करोड़ टैक्स देता है सरकार को हर साल जो देश के विकास में ही लगता है। आपने भी महसूस किया होगा कि हमारे देश में एक निठल्ला समाज है, जिसे धनी, संपन्न, अपना विकास करने वाले लोगों से बैर है। ये उनकी कमियां ही निकालता रहता है। अब लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा चुनावों से पहले जब उम्मीदवार अपनी संपत्ति का ब्यौरा देते हैं, तब कई तत्व उसकी संपत्ति पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं। जिसकी संपत्ति ठीक-ठाक होती है, उसे शक की नजरों से देखा जाने लगता है। माना जाने लगता है कि उस इंसान ने काले धंधे से पैसा कमाया होगा। क्या ये वाजिब है? जब मैं राज्यसभा में नामांकन के लिये गया और अपनी आय और संपत्ति का सही ब्यौरा दिया तो मुझे सबसे धनी सांसद कहकर संबोधित किया जाने लगा। एकदिन हम सभी सेंट्रल हॉल में बैठकर गप्पें लगा रहे थे। कांग्रेस के एक बड़े नेता जो स्वयं एक राजघराने से आते हैं, उन्होंने वेटर को कहा कि हमारे साथ जितने माननीय सदस्य बैठे हैं, उनका बिल इधर दे देना, यहाँ देश के सबसे धनी सांसद बैठे हैं। मैंने कहा कि राजा साहब, आपका हुक्म सिर आँखों पर लेकिन आज मुझे आपने सबसे धनी सांसद होने का जो सर्टिफिकेट दिया, उससे मुझे बहुत अच्छा लगा। इसलिये भी अच्छा लगा कि मैं किसी राज परिवार में पैदा नहीं हुआ और अपनी पत्रकारिता की नौकरी 230 रुपये महीने पर शुरू की थी। आज मैंने चूँकि मेहनत की कमाई का एक-एक पैसा टैक्स दिया है इस कारण चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में मैं भले सबसे धनी सांसद हो गया हूँ, पर आपमें से किसी के बराबर मेरी हैसियत नहीं है। वैसे यह मत भूलिये कि मैंने अपने पत्रकारिता के कैरियर में, खोजी पत्रकार का काम बखूबी किया है और आप चाहें तो मैं देश के दस बड़े धनी सांसदों की खोज कर सकता हूँ। जिसके पास संपत्ति अधिक महसूस होती है, उसे छद्म नैतिकतावादी घेरने लगते। ये उस बेचारे उम्मीदवार को कुछ इस तरह से पेश करने लगते कि मानो उसने चोरी की हो, घोटाला किया हो या लूटकर ही संपत्ति बनाई हो, उसके पीछे कितनी मेहनत है यह कोई नहीं देखता। देश 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के चलते तेजी के साथ बदला। देश में मध्यवर्ग तेजी के साथ आगे बढ़ा। नए उद्यमी सामने आते रहे। वे लोग भी उद्यमी बनने की ख्वाहिश रखने लगे हैं, जिनके परिवारों में पहले कभी कोई उद्यमी नहीं रहा। इस आलोक में यह बहस कहां तक जायज है कि किसकी संपत्ति कैसे बढ़ी? कुल मिलाकर बात यह है कि क्या हम कभी सफल कारोबारियों का सम्मान करना भी सीखेंगे? उदाहरण के रूप में क्यों इंफोसिस के संस्थापकों में से एक नंदन नीलकेणी संसद में न आ पाये? वे 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़े भी थे पर हार गए। वे और उनकी पत्नी रोहिणी हर साल मोटा धन देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए दान करते हैं। क्या इस तरह के नए भारत के सफल लोगों को संसद और विधानसभाओं में नहीं आना चाहिए? कहीं न कहीं यह लगता है कि हमारे देश में धनी शख्स का सार्वजनिक जीवन में आना ही समाज को पसंद नहीं है। उसे तुरंत शक की नजरों से देखा जाने लगता है। हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि महात्मा गांधी निर्धन परिवार से नहीं थे, पंडित नेहरू भी खासे संपन्न परिवार से थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का संबंध भी धनी परिवार से था। क्या संपन्न परिवार से रिश्ता रखना या ईमानदारी से धन कमाना अपराध है? क्या ऐसा कृत्य राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है? (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

Dakhal News

Dakhal News 13 January 2021


bhopal,Makar Sankranti, Feast of cultural ,gaiety and faith

मकर संक्रांति (14 जनवरी) पर विशेष योगेश कुमार गोयल प्रतिवर्ष 14 को मनाया जाने वाला पर्व ‘मकर संक्रांति’ वैसे तो समस्त भारतवर्ष में सूर्य की पूजा के रूप में ही मनाया जाता है किन्तु विभिन्न राज्यों में इस पर्व को मनाए जाने के तौर-तरीके व परम्पराएं विभिन्नता लिए हुए हैं। कहा जाता है कि इसी दिन से दिन लंबे होने लगते हैं, जिससे खेतों में बोए बीजों को अधिक रोशनी, ऊष्मा व ऊर्जा मिलती है, जिसका परिणाम अच्छी फसल के रूप में सामने आता है, इसलिए यह किसानों के उल्लास का पर्व भी माना गया है। मकर संक्रांति को ‘पतंग पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग देशभर में पतंग उड़ाकर मनोरंजन करते हैं। जगह-जगह पतंग प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इस दिन गंगा स्नान का बड़ा महत्व माना गया है और गरीबों को तिल, गुड़, खिचड़ी इत्यादि दान करने की परम्परा है। देशभर में मकर संक्रांति के विभिन्न रूप हरियाणा में मकर संक्रांति पर्व ‘सकरात’ के नाम से बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। बड़े बुजुर्ग रूठने का नाटक करके घर से निकलकर आस-पड़ोस में किसी के यहां जा बैठते हैं, जिसके बाद परिवार की महिलाएं पड़ोस की महिलाओं के साथ पारम्परिक हरियाणवी गीत गाते हुए उन्हें ढूंढ़ने निकलती हैं और रूठे बुजुर्गों को वस्त्र, मिठाइयां इत्यादि शगुन के तौर पर देकर उन्हें मनाने का नाटक कर उनका मान-सम्मान करती हैं। इस अवसर पर जगह-जगह मेले भी लगते हैं। हरियाणा में खासतौर से पंजाबी समुदाय के लोगों द्वारा और विशेष रूप से पंजाब व हिमाचल में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी के अवसर पर बच्चे दिनभर घर-घर घूमकर लकड़ियां और रेवड़ी, मूंगफली इत्यादि मांगकर इकट्ठा करते हैं। रात को सामूहिक रूप से लकड़ियां जलाकर लोग मूंगफली, रेवड़ी, तिल, गुड़, चावल व मक्का के भुने हुए दानों की, जिन्हें ‘तिलचौली’ कहा जाता है, अग्नि में आहुति देकर अग्नि के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं। उसके बाद मूंगफली, रेवड़ी इत्यादि प्रसाद के रूप में आपस में बांटकर खाते हैं। अग्नि के इर्द-गिर्द रातभर भंगड़ा, गिद्धा इत्यादि पंजाबी नाच-गाने के कार्यक्रम चलते हैं और लोग खुशी मनाते हैं। हिमाचल में लोग प्रातः स्नान करके सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्य की पूजा भी करते हैं और उसके बाद तिल व खिचड़ी का दान करते हैं। इस दिन लोग प्रायः खिचड़ी व तिलों से बनी वस्तुओं का ही भोजन ग्रहण करते हैं। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है। लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और कुछ लोग गंगा अथवा यमुना में भी स्नान करते हैं। स्नान के बाद तिल व तिलों से बनी वस्तुओं व खिचड़ी का दान करते हैं। लखनऊ, इलाहाबाद इत्यादि अनेक स्थानों पर इस अवसर पर दिनभर पतंगबाजी भी की जाती है। पश्चिम बंगाल में यह पर्व गंगासागर मेला के रूप में विख्यात है। यहां यह पर्व ‘वंदमाता’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन गंगासागर में स्नान करना अत्यंत फलदायी एवं पुण्यदायी माना गया है, अतः न केवल प्रदेशभर से बल्कि दूसरे प्रदेशों से भी हजारों लोग इस दिन गंगासागर में पवित्र स्नान करने आते हैं। गंगासागर में स्नान कर लोग पूजा-अर्चना करते हैं और सूर्य को अर्ध्य देने के बाद तिल व खिचड़ी का दान करते हैं। गंगासागर में इस दिन बहुत विशाल मेला लगता है। गंगासागर के स्नान का इतना महत्व है कि धार्मिक प्रवृत्ति के कुछ व्यक्ति तो माह भर पहले ही गंगासागर पहुंचकर यहां झोंपड़ियां बनाकर रहने लगते हैं। वर्षभर में एक यही अवसर होता है, जब गंगासागर में देश के कोने-कोने से तीर्थयात्री पवित्र स्नान के लिए गंगासागर पहुंचते हैं। कहा जाता है कि प्रकृति ने व्यवस्था ही कुछ ऐसी की है कि गंगासागर में वर्षभर में सिर्फ एक बार इसी अवसर पर ही जाया जा सकता है, तभी तो कहा भी गया है, सारे तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार। असम में यह पर्व ‘माघ बिहू’ के नाम से मनाया जाता है, जिसका स्वरूप काफी हद तक पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ‘होलिका दहन’ उत्सव से मिलता है। इस दिन घास-फूस तथा बांस के बनाए जाने वाले ‘मेजि’ को आग लगाने के बाद अग्नि में चावलों की आहूति दी जाती है और पूजा-अर्चना की जाती है। आग ठंडी होने के बाद ‘मेजि’ की राख को इस विश्वास के साथ खेतों में डाला जाता है कि ऐसा करने से खेतों में अच्छी फसल होगी। राजस्थान के कुछ इलाकों में महिलाएं इस दिन तेरह घेवरों की पूजा करके ये घेवर अपनी रिश्तेदार अथवा जान-पहचान वाली सुहागिन महिलाओं को बांट देती हैं। प्रदेश भर में मकर संक्रांति का त्यौहार पंतगोत्सव के रूप में तो दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। जगह-जगह पतंग उड़ाने की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं और दिनभर रंग-बिरंगी पतंगों से ढंका समूचा आकाश बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। मध्य प्रदेश में इस दिन तिल के लड्डू व खिचड़ी बांटने की परम्परा है। कई स्थानों पर इस अवसर पर लोग पतंगबाजी का मजा भी लेते हैं। प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सिंदूर, बिन्दी, चूड़ी इत्यादि सुहाग के सामान की 13 वस्तुएं कटोरी में रखकर आस-पड़ोस की या रिश्तेदार सुहागिन महिलाओं में बांटने की प्रथा भी है। महाराष्ट्र में यह पर्व सुहागिन महिलाओं के ‘मिलन पर्व’ के रूप में जाना जाता है। रंग-बिरंगी साडि़यों से सुसज्जित होकर महिलाएं कुमकुम व हल्दी लेकर एक-दूसरे के यहां जाकर उन्हें निमंत्रित करती हैं। महिलाएं परस्पर कुमकुम, हल्दी, रोली, गुड़ व तिल बांटती हैं। इस दिन लोग एक-दूसरे को तिल व गुड़ भेंट करते हुए कहते हैं, ‘‘तिल गुड़ ध्या आणि गोड गोड बोला’’ अर्थात् तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। माना जाता है कि ऐसा करने से आपस के रिश्तों में मधुरता आती है। मकर संक्रांति के दिन महिलाएं अपने-अपने घरों में रंगोली भी सजाती हैं। नई बहुएं अपने विवाह की पहली मकर संक्रांति पर कुछ सुहागिनों को सुहाग की वस्तुएं व उपहार देती हैं। प्रदेश में इस दिन ‘ताल-गूल’ नामक हलवा बांटने की भी प्रथा है। गुजरात में भी एक-दूसरे को गुड़ व तिल भेंट कर लोग तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो कहकर आपसी संबंधों को मधुर बनाने की पहल करते हैं। यहां गरीब से गरीब परिवार में भी इस दिन रंगोली चित्रित करने की परम्परा है। मकर संक्रांति के दिन लोग उबटन लगाकर विशेष स्नान करते हैं। दक्षिण भारत में मकर संक्रांति का पर्व ‘पोंगल’ के नाम से मनाया जाता है, जो दक्षिण भारत का ‘महापर्व’ माना गया है। इसे दक्षिण भारत की दीवाली भी कहा जाता है। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है। पहला दिन ‘भोगी पोंगल’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा बाहर निकालकर लकड़ी व उपलों के साथ जलाते हैं और लड़कियां जलती हुई आग के इर्द-गिर्द नृत्य करती हैं। यह दिन देवराज इन्द्र को समर्पित होता है। दूसरे दिन महिलाएं प्रातः स्नान करने के बाद दाल, चावल व गुड़ से ‘पोंगल’ नामक एक विशेष प्रकार की खिचड़ी बनाती है। दक्षिण भारत में सूर्य को फसलों का देवता माना गया है। दूसरे दिन सूर्य की उपासना के बाद सूर्य भगवान को भोग लगाने के पश्चात् लोग ‘पोंगल’ मिष्ठान को एक-दूसरे को प्रसाद के रूप में बांटते हैं। तीसरे दिन पशुधन की पूजा होती है। किसान अपने पशुओं को सजाकर जुलूस निकालते हैं। चेन्नई में कंडास्वामी मंदिर से रथयात्रा निकाली जाती है। पोंगल के अवसर पर दक्षिण भारत में मंदिरों में प्रतिमाओं का विशेष रूप से श्रृंगार किया जाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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मकर संक्रांति (14 जनवरी) पर विशेष योगेश कुमार गोयल प्रतिवर्ष 14 को मनाया जाने वाला पर्व ‘मकर संक्रांति’ वैसे तो समस्त भारतवर्ष में सूर्य की पूजा के रूप में ही मनाया जाता है किन्तु विभिन्न राज्यों में इस पर्व को मनाए जाने के तौर-तरीके व परम्पराएं विभिन्नता लिए हुए हैं। कहा जाता है कि इसी दिन से दिन लंबे होने लगते हैं, जिससे खेतों में बोए बीजों को अधिक रोशनी, ऊष्मा व ऊर्जा मिलती है, जिसका परिणाम अच्छी फसल के रूप में सामने आता है, इसलिए यह किसानों के उल्लास का पर्व भी माना गया है। मकर संक्रांति को ‘पतंग पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग देशभर में पतंग उड़ाकर मनोरंजन करते हैं। जगह-जगह पतंग प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इस दिन गंगा स्नान का बड़ा महत्व माना गया है और गरीबों को तिल, गुड़, खिचड़ी इत्यादि दान करने की परम्परा है। देशभर में मकर संक्रांति के विभिन्न रूप हरियाणा में मकर संक्रांति पर्व ‘सकरात’ के नाम से बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। बड़े बुजुर्ग रूठने का नाटक करके घर से निकलकर आस-पड़ोस में किसी के यहां जा बैठते हैं, जिसके बाद परिवार की महिलाएं पड़ोस की महिलाओं के साथ पारम्परिक हरियाणवी गीत गाते हुए उन्हें ढूंढ़ने निकलती हैं और रूठे बुजुर्गों को वस्त्र, मिठाइयां इत्यादि शगुन के तौर पर देकर उन्हें मनाने का नाटक कर उनका मान-सम्मान करती हैं। इस अवसर पर जगह-जगह मेले भी लगते हैं। हरियाणा में खासतौर से पंजाबी समुदाय के लोगों द्वारा और विशेष रूप से पंजाब व हिमाचल में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी के अवसर पर बच्चे दिनभर घर-घर घूमकर लकड़ियां और रेवड़ी, मूंगफली इत्यादि मांगकर इकट्ठा करते हैं। रात को सामूहिक रूप से लकड़ियां जलाकर लोग मूंगफली, रेवड़ी, तिल, गुड़, चावल व मक्का के भुने हुए दानों की, जिन्हें ‘तिलचौली’ कहा जाता है, अग्नि में आहुति देकर अग्नि के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं। उसके बाद मूंगफली, रेवड़ी इत्यादि प्रसाद के रूप में आपस में बांटकर खाते हैं। अग्नि के इर्द-गिर्द रातभर भंगड़ा, गिद्धा इत्यादि पंजाबी नाच-गाने के कार्यक्रम चलते हैं और लोग खुशी मनाते हैं। हिमाचल में लोग प्रातः स्नान करके सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्य की पूजा भी करते हैं और उसके बाद तिल व खिचड़ी का दान करते हैं। इस दिन लोग प्रायः खिचड़ी व तिलों से बनी वस्तुओं का ही भोजन ग्रहण करते हैं। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है। लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और कुछ लोग गंगा अथवा यमुना में भी स्नान करते हैं। स्नान के बाद तिल व तिलों से बनी वस्तुओं व खिचड़ी का दान करते हैं। लखनऊ, इलाहाबाद इत्यादि अनेक स्थानों पर इस अवसर पर दिनभर पतंगबाजी भी की जाती है। पश्चिम बंगाल में यह पर्व गंगासागर मेला के रूप में विख्यात है। यहां यह पर्व ‘वंदमाता’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन गंगासागर में स्नान करना अत्यंत फलदायी एवं पुण्यदायी माना गया है, अतः न केवल प्रदेशभर से बल्कि दूसरे प्रदेशों से भी हजारों लोग इस दिन गंगासागर में पवित्र स्नान करने आते हैं। गंगासागर में स्नान कर लोग पूजा-अर्चना करते हैं और सूर्य को अर्ध्य देने के बाद तिल व खिचड़ी का दान करते हैं। गंगासागर में इस दिन बहुत विशाल मेला लगता है। गंगासागर के स्नान का इतना महत्व है कि धार्मिक प्रवृत्ति के कुछ व्यक्ति तो माह भर पहले ही गंगासागर पहुंचकर यहां झोंपड़ियां बनाकर रहने लगते हैं। वर्षभर में एक यही अवसर होता है, जब गंगासागर में देश के कोने-कोने से तीर्थयात्री पवित्र स्नान के लिए गंगासागर पहुंचते हैं। कहा जाता है कि प्रकृति ने व्यवस्था ही कुछ ऐसी की है कि गंगासागर में वर्षभर में सिर्फ एक बार इसी अवसर पर ही जाया जा सकता है, तभी तो कहा भी गया है, सारे तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार। असम में यह पर्व ‘माघ बिहू’ के नाम से मनाया जाता है, जिसका स्वरूप काफी हद तक पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ‘होलिका दहन’ उत्सव से मिलता है। इस दिन घास-फूस तथा बांस के बनाए जाने वाले ‘मेजि’ को आग लगाने के बाद अग्नि में चावलों की आहूति दी जाती है और पूजा-अर्चना की जाती है। आग ठंडी होने के बाद ‘मेजि’ की राख को इस विश्वास के साथ खेतों में डाला जाता है कि ऐसा करने से खेतों में अच्छी फसल होगी। राजस्थान के कुछ इलाकों में महिलाएं इस दिन तेरह घेवरों की पूजा करके ये घेवर अपनी रिश्तेदार अथवा जान-पहचान वाली सुहागिन महिलाओं को बांट देती हैं। प्रदेश भर में मकर संक्रांति का त्यौहार पंतगोत्सव के रूप में तो दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। जगह-जगह पतंग उड़ाने की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं और दिनभर रंग-बिरंगी पतंगों से ढंका समूचा आकाश बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। मध्य प्रदेश में इस दिन तिल के लड्डू व खिचड़ी बांटने की परम्परा है। कई स्थानों पर इस अवसर पर लोग पतंगबाजी का मजा भी लेते हैं। प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सिंदूर, बिन्दी, चूड़ी इत्यादि सुहाग के सामान की 13 वस्तुएं कटोरी में रखकर आस-पड़ोस की या रिश्तेदार सुहागिन महिलाओं में बांटने की प्रथा भी है। महाराष्ट्र में यह पर्व सुहागिन महिलाओं के ‘मिलन पर्व’ के रूप में जाना जाता है। रंग-बिरंगी साडि़यों से सुसज्जित होकर महिलाएं कुमकुम व हल्दी लेकर एक-दूसरे के यहां जाकर उन्हें निमंत्रित करती हैं। महिलाएं परस्पर कुमकुम, हल्दी, रोली, गुड़ व तिल बांटती हैं। इस दिन लोग एक-दूसरे को तिल व गुड़ भेंट करते हुए कहते हैं, ‘‘तिल गुड़ ध्या आणि गोड गोड बोला’’ अर्थात् तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। माना जाता है कि ऐसा करने से आपस के रिश्तों में मधुरता आती है। मकर संक्रांति के दिन महिलाएं अपने-अपने घरों में रंगोली भी सजाती हैं। नई बहुएं अपने विवाह की पहली मकर संक्रांति पर कुछ सुहागिनों को सुहाग की वस्तुएं व उपहार देती हैं। प्रदेश में इस दिन ‘ताल-गूल’ नामक हलवा बांटने की भी प्रथा है। गुजरात में भी एक-दूसरे को गुड़ व तिल भेंट कर लोग तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो कहकर आपसी संबंधों को मधुर बनाने की पहल करते हैं। यहां गरीब से गरीब परिवार में भी इस दिन रंगोली चित्रित करने की परम्परा है। मकर संक्रांति के दिन लोग उबटन लगाकर विशेष स्नान करते हैं। दक्षिण भारत में मकर संक्रांति का पर्व ‘पोंगल’ के नाम से मनाया जाता है, जो दक्षिण भारत का ‘महापर्व’ माना गया है। इसे दक्षिण भारत की दीवाली भी कहा जाता है। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है। पहला दिन ‘भोगी पोंगल’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा बाहर निकालकर लकड़ी व उपलों के साथ जलाते हैं और लड़कियां जलती हुई आग के इर्द-गिर्द नृत्य करती हैं। यह दिन देवराज इन्द्र को समर्पित होता है। दूसरे दिन महिलाएं प्रातः स्नान करने के बाद दाल, चावल व गुड़ से ‘पोंगल’ नामक एक विशेष प्रकार की खिचड़ी बनाती है। दक्षिण भारत में सूर्य को फसलों का देवता माना गया है। दूसरे दिन सूर्य की उपासना के बाद सूर्य भगवान को भोग लगाने के पश्चात् लोग ‘पोंगल’ मिष्ठान को एक-दूसरे को प्रसाद के रूप में बांटते हैं। तीसरे दिन पशुधन की पूजा होती है। किसान अपने पशुओं को सजाकर जुलूस निकालते हैं। चेन्नई में कंडास्वामी मंदिर से रथयात्रा निकाली जाती है। पोंगल के अवसर पर दक्षिण भारत में मंदिरों में प्रतिमाओं का विशेष रूप से श्रृंगार किया जाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 January 2021


bhopal,Corona, WHO prepares,give clean chit to China

डॉ. मयंक चतुर्वेदी कोरोना की उत्पत्ति कहां से हुई, यह वायरस आखिर कहां से आया? इस बात की जांच करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक एक्सपर्ट टीम एकबार फिर चीन के दौरे पर जा रही है, किंतु बड़ा प्रश्‍न यह है कि इस टीम के वहां जाने से होगा क्‍या? पहले भी बीते जुलाई माह में जो दल गया वह खाली हाथ लौटा था। हम कह सकते हैं कि उस दल में विशेषज्ञों की कमी थी, इसलिए यह दल बहुत गहरे जाकर सच्‍चाई का पता नहीं लगा पाया। आज जब इस काम के लिए बड़ा दल भेजा जा रहा है, तो उसके हाथ कुछ लगेगा, यह सोचना अपने को भ्रम में रखना होगा। वस्‍तुत: चीन जैसा देश जो अपने हितों के लिए किसी भी मानवीय सीमा को पार करने में गुरेज नहीं करता, कम-से-कम उससे मानवीयता की आशा नहीं रखी जा सकती है। आज यह किसी से छिपा नहीं है कि डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस एडहैनम घेब्रयेसिस की नियुक्तिति में चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग का सबसे बड़ा हाथ रहा है। वे चाहकर भी चीन के विरोध में नहीं जा सकते। फिर इस बीच जिस तरह से चीन ने कोरोना काल में अपने आप को ग्रोथ में लाकर इकोनॉमी पॉवर बनने की ओर कदम बढ़ाए हैं, उससे भी साफ अंदेशा पैदा होता है कि कोरोना वायरस को इसलिए लाया जा रहा था कि वह अपनी बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था को न केवल पटरी पर ला सके बल्‍कि लाभ के स्‍तर पर अन्‍य देशों से आगे निकल जाए। कोरोना वायरस को लेकर अमेरिका के दो वैज्ञानिकों ने बीते अगस्‍त माह में चौंकाने वाला खुलासा किया था। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वायरस करीब आठ साल पहले चीन की खदान में पाया गया था। दुनिया आज जिस कोरोना वायरस से प्रभावित है, वो आठ साल पहले चीन में मिले वायरस का ही घातक रूप है। वुहान लैब में जानबूझकर वायरस तैयार किया गया। इन वैज्ञानिकों का बार-बार यही कहना रहा कि उनको मिले साक्ष्‍य दर्शाते हैं कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन के दक्षिण पश्चिम स्थित युन्नान प्रांत की मोजियांग खदान में हुई थी। उन्होंने बताया कि 2012 में कुछ मजदूरों को चमगादड़ का मल साफ करने के लिए खदान में भेजा गया था। इन मजदूरों ने 14 दिन खदान में बिताए थे, बाद में 6 मजदूर बीमार पड़े। इन मरीजों को तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, हाथ-पैर, सिर में दर्द और गले में खराश की शिकायत थी। ये सभी लक्षण आज कोविड-19 के हैं। कथित तौर पर बीमार मरीजों में से तीन की बाद में मौत भी हो गई थी। यह सारी जानकारी चीनी चिकित्सक ली जू की मास्टर्स थीसिस का हिस्सा है। थीसिस का अनुवाद और अध्ययन डॉ. जोनाथन लाथम और डॉ. एलिसन विल्सन द्वारा किया गया है। वस्‍तुत: अमेरिकी वैज्ञानिकों का यह दावा इस महामारी के लिए चीन की भूमिका को सीधे तौर पर कठघरे में खड़ा करता है। जबकि  चीन कहता आया है कि उसे कोरोना के बारे में पूर्व में कोई जानकारी नहीं थी। जैसे ही उसे वायरस का पता चला, उसने दुनिया के साथ जानकारी साझा की। दूसरी ओर इन्‍हीं वैज्ञानिकों का कहना है कि मजदूरों के सैंपल वुहान लैब भेजे गए थे और वहीं से वायरस लीक हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि महामारी बनने से पहले ही कोरोना वायरस चीन के रडार पर आ चुका था। चीन को लेकर अब वैज्ञानिकों की आई इस रिपोर्ट को 5 माह बीत चुके हैं। कहने वाले यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका के ये वैज्ञानिक हैं, इनके दावे झूठे हो सकते हैं क्‍योंकि अमेरिका और चीन की आपस में मित्रता नहीं। लेकिन क्‍या इसे लेकर दुनिया के अन्‍य देशों के वैज्ञानिक जिसमें यूरोप के कई देशों के वैज्ञानिक हैं, वे भी आज झूठ बोल रहे हैं? जिनकी समय-समय पर आईं रिपोर्ट सीधे चीन को कटघरे में खड़ा करती हैं। वस्‍तुत: यह सभी रिपोर्ट्स झूठी नहीं, चीन झूठा है। वह नहीं चाहेगा कि किसी भी सूरत में वुहान से जुड़ी कोरोना वायरस के फैलने की सच्‍चाई दुनिया के सामने आए। फिर अब जब ये कोरोना जांच दल चीन भेजा भी जा रहा है, तो उससे निकलकर क्‍या परिणाम आएगा? उत्‍तर है यदि कोई तो यही कि इसमें चीन का कोई हाथ नहीं, चीन से कोरोना नहीं फैला। यहां यह इसलिए कहा जा रहा है कि देखते ही देखते कोरोना को फैले पूरा एक साल बीत चुका है। क्‍या वहां चीन कोई सबूत छोड़ेगा, जिससे कि उसे यह जांच दल फंसा सके? अबतक पता नहीं कितनी बार वुहान लैब सहित पूरे शहर के अन्‍य प्रमुख स्‍थानों का कयाकल्‍प वह कर चुका होगा। डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस एडहैनम घेब्रयेसिस की नीयत इतनी साफ होती तो वह अपनी विशेषज्ञों की टीम भेजने में इतना वक्‍त नहीं लगाते। न कोरोना वायरस (कोविड-19) को महामारी घोषित करने एवं तुरंत वैश्‍विक हवाई यात्राओं को बंद कराने के लिए निर्देश जारी करने में इतनी देरी करते कि कोरोना चीन से वैश्‍विक महामारी बन सकता। कहने का अर्थ है कि इस पूरे मामले में डब्ल्यूएचओ की भूमिका भी संदिग्‍ध है। सच यही है कि यदि कोरोना वैश्‍विक न होता तो चीन का दवाओं एवं इससे जुड़ा कई हजार अरब का बाजार गर्म नहीं होता। आज जिस तरह से खासकर उसकी दवा व चिकित्‍सकीय उपकरण बनानेवाली कंपनियों की ग्रोथ हुई है और इसका लाभ उसे तकनीकी उपकरण की तेज होती कीमतों के साथ तमाम स्‍तरों पर मिला है, वह कोरोना के वैश्‍विक हुए बगैर आज नहीं मिल सकता था। अब जो साफ दिखाई दे रहा है, वह यही है कि पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की विशेषज्ञ टीम चीन में कोरोना से जुड़े जरूरी आंकड़े और सबूत इकट्ठा करेगी। जिसका कुल निष्‍कर्ष यही निकलेगा कि कोरोना चीन से नहीं फैला है। जबकि आंकड़ों एवं व्‍यवहारिक सच्‍चाई जो बार-बार सामने आती रही है वह यही है कि चीनी शहर वुहान में ही दुनिया का पहला कोरोना वायरस 2019 के अंत में पाया गया था और फिर वह देखते ही देखते विश्‍वव्‍यापी हो गया। वस्‍तुत: इस डब्ल्यूएचओ की विशेषज्ञ टीम से कोई जांच को लेकर उम्‍मीद लगाए कि उसके हाथ कुछ खास लग जाएगा और वह चीन को कोरोना महामारी फैलाने का जिम्‍मेदार मानेगी। यदि कोई ऐसा सोच रहा है तो वास्‍तव में वह अपने से ही छलावा कर रहा है। (लेखक, हिन्‍दुस्‍थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 12 January 2021


bhopal,Dream of social prosperity, through spirituality

12 जनवरी को स्वामी विवकानंद स्मरण गिरीश्वर मिश्र 'संन्यास' को अक्सर दीन-दुनिया से दूर आत्मान्वेषण की गहन और निजी यात्रा से जोड़ कर देखा जाता है। मुक्ति की ऐसी उत्कट अभिलाषा स्वाभाविक रूप से मनुष्य को अंतर्यात्रा की ओर अग्रसर करती है। इस आम धारणा के विरुद्ध उन्नीसवीं सदी के अंत में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था एक अद्भुत चमत्कारी घटना हुई जिसने भारत के प्रसुप्त स्वाभिमान को जगाया और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया। यह घटना थी भारत भूमि पर स्वामी विवेकानंद के रूप में एक ऐसी प्रतिभा का अवतरण जिसने संन्यास के समीकरण को पुनर्परिभाषित किया और आध्यात्म के सामाजिक आयाम को स्थापित किया। गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस के संस्पर्श से स्वामी विवेकानंद ने न केवल धर्म के अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त किया अपितु भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर मानव जाति के लिए एक नए युग का सूत्रपात किया। आध्यात्म को भारत की प्राण-धारा मानते हुए स्वामी जी ने अपना ध्यान मनुष्यता और मातृभूमि की ओर दिया। यह वह समय था जब आत्मविस्मृत भारतीय समाज कुरीतियों से विजड़ित तो था ही पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता के प्रति मुग्ध भी हो रहा था। ऐसे में अँग्रेजी जीवन पद्धति का अनुकरण तेजी से बढ़ रहा था। राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, केशव चंद्र सेन आदि के सुधार की परंपरा को आत्मसात करते हुए और अपेक्षित प्रतिरोध करते हुए स्वामी विवेकानंद ने समस्त भारतीय समाज के जागरण का बीड़ा उठाया। उन्होने अकेले की नहीं अपितु समष्टि की मुक्ति को अपना जीवन-ध्येय बना लिया। मूलतः असंसारी प्रवृत्ति वाले योगी ने अपने परिव्राजक जीवन की दिशा लोक कल्याण की ओर मोड़ दी। मातृ-भूमि की उन्नति का प्रश्न उनके विचार के केंद्र में आ गया। उन्हें भारत की ज्ञान परंपरा का गौरव बोध तो था पर उसमें आने वाली रूढ़ियों और बाधाओं से मुक्ति की चिंता भी थी। हृदय में उठी वेदना उत्पीड़ितों के हित-साधन के लिए संकल्प और कर्म में प्रवृत्त होने के दृढ़ निश्चय के रूप में प्रतिफलित हुई। उनके विचार और कर्म में अतीत एवं वर्तमान तथा पूर्व और पश्चिम के ऊपरी अंतरों को भेद कर एक सम्पूर्ण मनुष्य की परिकल्पना आकार लेने को आतुर थी। उनकी कर्मठ दृढ़ता के आगे कोई भी कठिनाई टिक नहीं सकी । ऊर्जा और सर्जनात्मक मेधा से उन्होने परमार्थ की नई व्याख्या की और लोक और मनुष्य में परम सत्ता को देखा और ईश्वर प्राप्ति को जन कल्याण में देखा। धर्म के उत्थान और मानव कल्याण के लिए गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस की कृपा से सिक्त एक महाशक्ति स्वामी विवेकानंद में घनीभूत हुई थी जिसका परिणाम था कि अल्पायु में ही स्वामी जी ने वह कर दिखाया जो सामान्य व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है। सुदृढ़ कद-काठी और भव्य व्यक्तित्व वाले स्वामी विवेकानन्द तीक्ष्ण बुद्धि और स्मृति के भी धनी थे। उनकी भौतिक उपस्थिति ऐश्वर्यशाली थी। अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित अखिल विश्व धर्म महासभा में 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने 'भाइयों और बहनों' द्वारा उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर सबको मंत्रमुग्ध कर लिया। उनकी वाग्मिता ने सबको प्रभावित किया यहाँ तक कि कुछ लोग आतंकित भी हुए और विरोध भी किया पर वे डिगे नहीं। अपने व्याख्यान में उन्होने पारस्परिक ईर्ष्या और संकीर्णता का परित्याग कर हर एक की धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हए लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने पर बल दिया और विचारों के आदान-प्रदान कि आवश्यकता प्रतिपादित की। अद्वैत की अद्भुत व्याख्या करते हुए एक सत्य की अनेक व्याख्याओं को संगत बताया । इसके आधार रूप में उन्होने वेद वचन 'एकं सत विप्रा: बहुधा वदंति' का गुरु गंभीर उद्घोष किया। आशा, साहस और विश्वास के साथ समस्त मनुष्य जाति के लिए प्रेम भरी उनकी ओजस्वी वाणी श्रोता वर्ग को सहज ही अभिभूत कर लेती थी। उन्होंने प्रतिपादित किया कि शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मा ही मनुष्य का स्वाभाविक स्वरूप है जिसे पाने की चेष्टा की जानी चाहिए। अजन्मा आत्मा अनादि और अनंत है। श्रेष्ठ और उत्तम के लिए अंदर की ओर देखना होता है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य आत्मा है जो शरीर में निवास करता है। अविद्या ही सभी कष्टों की जड़ है। वे एक लोकप्रिय और प्रभावी वक्ता के रूप में शीघ्र ही प्रसिद्ध हो गए। युक्ति और तर्क के साथ स्वामी जी ने वेदान्त के संदेश को अंतर राष्ट्रीय स्तर प्रसारित किया और योग तथा आत्म-ज्ञान जैसे विषयों में लोगों की रुचि बढाई। स्वयं धर्ममय जीवन के एक जीते जागते आदर्श के रूप में स्वामी जी ने अनेक लोगों को आकृष्ट किया और अनेक विद्वानों और विदुषियों ने उनके अनुयायी बनकर नए ढंग से जीना शुरू किया। अमेरिका में हावर्ड के दार्शनिक और मनोविद विलियम जेम्स और इंग्लैंड में संस्कृतिविद मैक्स मुलर, जर्मनी में संस्कृतज्ञ डा. डाययसन के साथ उनका गहरा संवाद हुआ। अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड आदि देशों में स्वामी जी की चार वर्ष की अविराम बौद्धिक यात्रा ने भारत के विषय में पाश्चात्य मानस को एक नई दृष्टि दी। वर्ष 1897 में स्वामी जी भारत भूमि पर वापस पहुंचे। 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' ही उनका मूलमंत्र बन गया। मई 1897 में गुरुदेव के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उनके द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की गई। इसके द्वारा स्वदेशवासियों को कर्मयोग में दीक्षित करने का व्रत ठाना। पूरे भारत का भ्रमण किया और सर्वत्र जन समुदाय को प्रेरित प्रोत्साहित करते रहे। समाज में व्याप्त निश्चेष्ट जड़ता वे कहते थे- उठो जागो और स्वयम जग कर दूसरों को भी जगाओ। समाधान के रूप में वे वेदान्त को कर्म के स्तर पर लाने की सतत चेष्टा करते रहे। उनका लक्ष्य था पारस्परिक सद्भाव और सहिष्णुता को ध्यान में रखते हुए पूर्व और पश्चिम के भेद से ऊपर उठ कर ऐसे सार्वभौमिक धर्म दृष्टि का प्रतिपादन जो समस्त मानवता के लिए उपयोगी हो। यह बड़ा दुखद है कि ज्ञान-विज्ञान के विकसित होने पर भी आज अंध भक्ति और क्षुद्र स्वार्थ को लेकर धर्म के अनेक कुत्सित और छद्म रूप उभर रहे हैं। बड़ी आसानी से बाबा, गुरु और फकीर का बानक धारण कर लोगों को धोखा देकर धन संपत्ति अर्जित करना आज व्यवसाय सा होता जा रहा है। शार्ट-कट के रूप में टोना-टोटका, पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र, झाड़-फूँक की शरण में जाकर अपने मनोरथ को पूरा करने का नुस्खा आजमाना सरल और आकर्षक है। स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में भारत धर्मप्राण देश है। वे उसी के आधार पर राष्ट्रीय एकता को संभव अनुभव करते थे। आपसी विद्वेष को त्याग कर प्रगति की कामना करते थे। उनके लिए आध्यात्मिकता ही भारतीय समाज के आनंदमय और शांत जीवन की धुरी थी। इसका ज्ञान सुलभ कराने के लिए उन्होने सतत प्रयास किया। आज धर्म की ऐसी ही लोकोन्मुख व्याख्या की आवश्यकता है। धर्म तो सत्य और स्वतंत्रता से जुड़ा होता जो सृष्टि में जीवन के आधार हैं जिनको कर्म, भक्ति और ज्ञान का अवलंबन करते हुए अनुभव में लाया जा सकता है। (लेखक, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 12 January 2021


bhopal,India

डॉ. वेदप्रताप वैदिक संयुक्तराष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का भारत पिछले हफ्ते सदस्य बन गया है। वह पिछले 75 साल में सात बार इस सर्वोच्च संस्था का सदस्य रह चुका है। इसबार उसने इसकी सदस्यता 192 में से 184 मतों से जीती है। वह सुरक्षा परिषद के 10 अस्थाई सदस्यों में से एक है। उसे पांच स्थायी सदस्यों की तरह 'वीटो' का अधिकार नहीं है लेकिन एक वजनदार राष्ट्र के नाते अबतक उसने एशिया और अफ्रीका की आवाज को जमकर गुंजाया है। इसबार सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत के लिए यह है कि वह सुरक्षा परिषद की तीन कमेटियों का अध्यक्ष चुना गया है। अध्यक्ष के नाते उसके कई विशेषाधिकार होंगे। पहली कमेटी है, आतंकवाद-नियंत्रण, दूसरी कमेटी है, तालिबान-नियंत्रण और तीसरी कमेटी है, लीब्या-नियंत्रण। इन तीन में से दो कमेटियों का सीधा संबंध भारत से है। भारत की सुरक्षा से है। आतंकवाद-नियंत्रण कमेटी का निर्माण 2001 में न्यूयार्क के विश्व व्यापार केंद्र पर हमले के बाद हुआ था लेकिन यह कमेटी अभीतक तय नहीं कर सकी है कि आतंकवाद क्या है? यदि भारत की अध्यक्षता में आतंकवाद को सुपरिभाषित किया जा सके और उसके विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को पहले से भी सख्त बनाया जा सके तो उसका अध्यक्ष बनना सार्थक सिद्ध होगा। दूसरी कमेटी है, तालिबान को नियंत्रित करने के बारे में। अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने की दृष्टि से उस कमेटी का बड़ा महत्व है। अफगानिस्तान आतंकवाद का गढ़ बन चुका है। अमेरिका में तो उसका हमला एक ही बार हुआ है लेकिन भारत तो उसका शिकार पिछले दो-ढाई दशक से लगातार होता रहा है। मेरे समझ में नहीं आता कि यह कमेटी क्या कर लेगी? वह तालिबान का बाल भी बांका नहीं कर सकती, क्योंकि अमेरिका उससे सीधे संवाद कर रहा है। इस संवाद में भारत की भूमिका एक दर्शक-मात्र की है जबकि अफगानिस्तान में उसकी भूमिका अत्यधिक अर्थवान होनी चाहिए। तीसरी कमेटी है, लीब्या-नियंत्रण कमेटी। इस कमेटी ने लीब्या पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। जैसे हथियार-खरीद पर पाबंदी, उसकी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों और लेन-देन पर प्रतिबंध आदि! पश्चिम एशिया की अस्थिर राजनीति में इस कमेटी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना चाहिए ताकि उसे भी चीन की तरह वीटो का अधिकार मिले और वह अपनी वैश्विक भूमिका को ठीक से निभा सके। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 12 January 2021


bhopal,Bird Flu, One pandemic , another one is scared

रोहित पारीक बीसवीं सदी के तीसरे दशक का आगाज हो चुका है। कोरोना आपदा में बीते साल के कड़वे अनुभवों को भुलाते हुए लोगों को उम्मीद है कि वर्ष 2021 वाकई इक्कीस अर्थात पिछले सालों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ साबित होगा। हालांकि 2021 के उगते सूरज के साथ ही एक महामारी अलविदा कहने को तैयार हुई तो बर्ड फ्लू नामक दूसरी महामारी पैर पसारने को बेताब हो गई। अब तो सरकार भी इंसानों को चेता रही है कि परिन्दों से सावधानी बरतें, वरना बर्ड फ्लू का वायरस इंसानों में प्रवेश कर सकता है। वर्ष 2020 अलविदा कहता, उससे पहले ही राजस्थान समेत कई अन्य प्रदेशों में पक्षियों में फैली महामारी बर्ड फ्लू ने अपने आगमन के संकेत दे दिए। राजस्थान में बर्ड फ्लू के संक्रमण का दायरा अब तेरह जिलों तक फैल गया है। इन जिलों में अबतक 2950 परिन्दे असामयिक मौत का शिकार बन चुके हैं। प्रदेश के 24 जिलों में परिन्दों की लगातार मौतें हो रही है। राज्य के झालावाड़ जिले से सर्वप्रथम कौओं की मौतों से शुरू हुआ परिन्दों की मौतों का सिलसिला अबतक जारी है। प्रदेश में बर्ड फ्लू के लिहाज से राजधानी जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, हनुमानगढ़, जैसलमेर, पाली, सिरोही, कोटा, बारां, झालावाड़, बांसवाड़ा, चित्तौडगढ़ व प्रतापगढ़ को पॉजिटिव माना गया है। राजस्थान समेत देश के कई प्रदेश अब इस नई आफत से घबरा रहे हैं। राजस्थान समेत देश के कई राज्य इस खतरे की जद में आ चुके हैं। बर्ड फ्लू यानी एवियन इंफ्लूएंजा जंगली पक्षियों में होता है, जो शहरी पक्षियों में उनसे फैल जाता है। जंगली पक्षियों के नाक, मुंह, कान से निकले द्रव और उनके मल से ये फैलता है। देश में वर्ष 2006, वर्ष 2012, वर्ष 2015 के बाद अब 2021 में बर्ड फ्लू ने हमला किया है। नेशनल हेल्थ प्रोग्राम की मानें तो बर्ड फ्लू की वजह से भारत में अभीतक किसी इंसान की मौत नहीं हुई है। वर्ष 2003 से 2019 के बीच दुनिया के 1500 लोग बर्ड फ्लू के संक्रमण में आए थे जिनमें से 600 लोग इस संक्रमण के चलते अपनी जान गंवा बैठे थे। जानकार चिकित्सक बताते हैं कि मनुष्य में इन्फेक्शन, मरे या जिंदा संक्रमित पक्षियों से होता है। उसकी आंख, मुंह, नाक से जो द्रव निकलता है या उनके मल के संपर्क में मनुष्य आता है तो उसमें भी ये संक्रमण आ सकता है। अगर किसी सतह पर या किसी संक्रमित पक्षी को छूने के बाद यदि कोई मनुष्य अपनी आंख, नाक या मुंह को हाथ लगाता है तो उसे संक्रमण का खतरा हो सकता है। जंगली पक्षी उड़ते समय मल निष्कासित करते हैं तो उसके संपर्क में आने से ये बीमारी शहरी पक्षियों में फैल जाती है। हालांकि कोरोना के संक्रमण से मुक्त हुए लोगों को इससे कोई सीधा खतरा नहीं है, लेकिन जानकार चिकित्सकों का कहना है कि जो लोग कोरोना के संक्रमण से ठीक हो रहे हैं वो लोग जरूर किसी अन्य संक्रमण के रिस्क पर रहते हैं। उनके दूसरी बीमारी के चपेट में आने की संभावना ज्यादा रहती है, क्योंकि जब भी आप एक बीमारी से ठीक होते हैं उस समय शरीर में उतनी शक्ति नहीं होती है, इम्युन सिस्टम भी कमजोर रहता है। ऐसे में किसी भी अन्य बीमारी की चपेट में आसानी से आ सकते हैं। इसलिए जो लोग कोरोना के संक्रमण से ठीक हुए हैं उन्हें काफी सावधान रहने की जरूरत है। देश में बर्ड फ्लू का यह चौथा हमला है। देश में अभी तक बर्ड फ्लू के एच5एन1 वायरस ने ही हमला किया है, जबकि इसका एक और खतरनाक वायरस है जिसे एच7एन9 कहते हैं। वर्ष 2013 में एच7एन9 की वजह से चीन में 722 इंसान संक्रमित हुए थे। इनमें से 286 लोगों की मौत हो गई थी। पशुपालन और डेयरी विभाग के अनुसार 2006 से लेकर 2015 तक 15 राज्यों में 25 बार मुर्गियों में बर्ड फ्लू का वायरस यानी एवियन इंफ्लूएंजा वायरस मिला है। ये पहला मौका है जब राजस्थान में बर्ड फ्लू के वायरस की पुष्टि हुई हैं। राजस्थान के 11 जिलों में गुजरे दिनों मृत पाए गए कौओं समेत अन्य परिन्दों की जांच रिपोर्ट में बर्ड फ्लू के वायरस की पुष्टि हुई है। सरकार कह रही है कि बर्ड फ्लू को लेकर सावधानी बरतें, लेकिन घबराए नहीं। नेशनल हेल्थ प्रोग्राम की साइट के अनुसार भारत में अभी तक इंसानों में ये बर्ड फ्लू का संक्रमण देखने को नहीं मिला है। दिल्ली स्थित नेशनल सेंटर फॉर डिजीस कंट्रोल के तहत चल रहे इंटीग्रेटेड डिजीस सर्विलांस प्रोग्राम के तहत देश भर में बर्ड फ्लू समेत कई बीमारियों पर नजर रखी जाती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 11 January 2021


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डॉ. मोक्षराज विश्व के सबसे अधिक युवा भारत में बसते हैं। भारत श्रेष्ठ युवाओं को पैदा करने वाली एक ऐसी भूमि है जहाँ परिवार, कुटुम्ब एवं सांस्कृतिक मूल्यों के साथ-साथ महान पूर्वजों की श्रेष्ठ विरासत भी उनके सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। भारत की परिवार व्यवस्था बच्चों के विकास की सबसे उत्तम पाठशाला है, जहाँ न केवल संस्कार दिए जाते हैं, बल्कि संगठन शक्ति का विकास तथा तनाव से बचे रहने का स्वाभाविक बोध भी कराया जाता है। स्वाभिमानी बनें युवा अपनी भाषा, संस्कृति व स्वदेशी तकनीक के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए कटिबद्ध हों। “मेक इन इंडिया” का सपना भारत की आत्मनिर्भरता तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी पैठ जमाने के लिए एक अमोघ अस्त्र है। भारत की संस्कृति के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए विश्व झटपटा रहा है, क्योंकि भारतीय जीवन मूल्यों में ही वह शक्ति छिपी है जो व्यक्ति को सुख-शांति और आनंद का सुंदर परिवेश दे सकते हैं। हमें अपने युवाओं पर गर्व है वर्तमान में भी वैश्विक स्तर पर जो विश्वसनीयता भारत के युवाओं की है वैसी कदाचित् किसी भी देश की नहीं है। नशा तथा दिखावे की संस्कृति से बचकर हमारे युवा यदि स्वास्थ्य तथा चरित्र की पूँजी को बनाए रखें तो भारत को पुनः विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकता। सारा विश्व भारत के कदमों में होगा। दुनिया में भारत के युवाओं ने सूचना तकनीकी, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, विज्ञान, तथा साहित्य के क्षेत्र में अपनी योग्यता को प्रमाणित कर भारत का भाल उन्नत किया है। राष्ट्रहित सर्वोपरि अपने राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए हम अपने पूर्वजों की संस्कृति पर अभिमान करना सीखें। हम विदेशी मीडिया की चाल व राष्ट्र विरोधी ताकतों के षड्यंत्रों को समझें। अधिकांश विदेशी मीडिया वाले भारत की छवि बिगाड़ने के लिए वर्षों से जुटे हुए हैं। युवा बहकें नहीं जातिवाद, नशा, बेमेल विवाह तथा सांप्रदायिक द्वेष को मिटाने की दिशा में भी निरंतर काम करने व सच्चे ज्ञान का अर्जन करने की सदैव आवश्यक है। एवेंजर्स जैसी फ़िल्में भारत की छवि बिगाड़ने का एक छोटा-सा नमूना मात्र है, जबकि इस प्रकार के हजारों षड्यंत्र, युवा पीढ़ी को भ्रमित करने के लिए ऑनलाईन प्रोग्राम्स के माध्यम से परोसे जा रहे हैं। श्रेष्ठ युवा बनें हमें अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान कर निरंतर आगे बढ़ना होगा। विदेशी लेखकों व मीडिया द्वारा छलपूर्वक जो दृश्य दिखाए जाते हैं उन्हें झूठा साबित करना हमारी जिम्मेदारी है। युवा का अर्थ है जो अपने राष्ट्र और समाज की बुराइयों को तोड़ने तथा अच्छाइयों को जोड़ने की क्षमता रखता है। हमें सही मायने में अच्छा युवा, सच्चा युवा, राष्ट्रभक्त युवा बनना होगा। हम सदैव सजग रहते हुए सबसे अग्रणी हों। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता: -यजुर्वेद (लेखक, वॉशिंगटन डीसी में भारत के प्रथम सांस्कृतिक राजनयिक रहे हैं।)

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Dakhal News 11 January 2021


bhopal, Whom did Pranab da , Bill Gates stop speaking

आर.के. सिन्हा देश के मृतप्राय से हो चुके विपक्ष और उनके समर्थकों को पिछले दिनों एक के बाद दो करारे झटके लगे। ये झटके वैसे पूरे विश्व के लिये अप्रत्याशित थे। इसलिए इन झटकों से विपक्ष अचानक पक्षाघात पीड़ित मरीज की तरह परेशान है। ये झटके दिए दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब कुमार मुखर्जी की किताब के कुछ अंशों ने और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को लेकर व्यक्त किये गये बेबाक विचारों के कारण। "द प्रेसिडेंशियल इयर्स 2012-2017" नामक पुस्तक में प्रणब दा ने तो नरेंद्र मोदी और डॉ. मनमोहन सिंह की तुलना ही कर डाली। वह लिखते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह मूल रूप से एक अर्थशास्त्री हैं जबकि मोदी के बारे में वह कहते हैं कि मोदी मूल रूप से एक जमीनी राजनीतिज्ञ हैं। प्रणब दा आगे लिखते हैं, " मोदी जी जब गुजरात के सीएम थे तभी उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि बनाई जो आम जनता के दिल में भा गई। उन्होंने प्रधानमंत्री पद को अपनी मेहनत और लोकप्रियता से अर्जित किया है। जबकि, डॉ. मनमोहन सिंह को यह पद एक तरह से उपहार स्वरुप मिला।" वे एक जगह ये भी लिखते हैं कि "जब मुझे मोदी के विस्तृत इलेक्शन शेड्यूल (लोकसभा चुनाव 2014) के बारे में बताया गया तो वह न केवल भीषण था बल्कि बहुत ही कठिन और श्रमसाध्य भी था।" विपक्ष के हाथ-पैर फूले प्रणब दा तो जीवन भर कांग्रेस से जुड़े रहे। कांग्रेस ने ही उन्हें राष्ट्रपति भी बनाया। इस तरह के शख्स का घनघोर संघी मोदी जी के लिए सकारात्मक लिखने से विपक्ष के तो हाथ-पैर ही फूल गए हैं। सोनिया जी जिन्हें प्रधानमंत्री पद इसलिये नहीं मिल सका क्योंकि राष्ट्रपति अबुल कलाम ने उन्हें बता दिया था कि चूँकि वे देश की स्वाभाविक नागरिक नहीं हैं, किसी भी समय उनको भारतीय नागरिकता प्रदान करने का आदेश न्यायालय में चैलेन्ज हो सकता है। तब उन्होंने मनमोहन सिंह को मनोनीत किया था। फिलहाल जो मोदी और उनकी सरकार की अकारण कमियां निकालने का कोई अवसर नहीं छोड़ते, उनके लिए तो अब अपना चेहरा छिपाने की जगह तक नहीं मिल रही। प्रणब दा 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों पर लिखते हैं कि भारतीय मतदाता समूह जो गठबंधन सरकारों की अनिश्चितताओं से थक से गए थे उन्हें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा एक बेहतर विकल्प लगी और उन्हें महसूस हुआ कि मोदी जी की सरकार उनकी जरूरतों को पूरा कर सकती है। प्रणब दा ही पर्याप्त नहीं थे, मोदी और भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों के जख्म पर नमक छिड़कने का काम बिल गेट्स ने यह कहकर पूरा कर दिया कि कोविड से लड़ाई में भारत की रिसर्च और मैन्यूफैक्चरिंग की विश्व के अन्य महान देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा अहम भूमिका है। बिल गेट्स ने कोरोना वायरस के खिलाफ जारी लड़ाई में भारत के श्रेष्ठ और अहम योगदान की बात कही है। बिल गेट्स ने कहा कि भारत की रिसर्च और मैन्यूफैक्चरिंग की क्षमता कोरोना से लड़ाई के खिलाफ काफी अहम है। बिल गेट्स ने यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ग्रैंड चैलेंजेज एनुअल मीटिंग 2020 में संबोधन को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद कही। एक बात समझ ली जाए कि सारी दुनिया बिल गेट्स का मात्र इसलिए सम्मान नहीं करती कि वे संसार के सबसे बड़े दानी इंसान हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि गेट्स लगातार विश्व कल्याण के संबंध में सोचते रहते हैं। वे संसार को निरोगी बनाने और निरक्षरता के अंधकार से बाहर निकालने के लिए हर साल अरबों डॉलर का निवेश करते रहते हैं। यदि वे कोरोना के खिलाफ जंग में मोदी जी के पक्ष में कोई बात रख रहे हैं तो उसका तो निश्चित रूप से बड़ा मतलब होता है। गेट्स जैसे कई शख्स सदियों बाद पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। धन कुबेर तो हर काल में रहे हैं और नए-नए बनते भी रहेंगे। पर गेट्स जैसे धन-कुबेर और मानवता के सेवक का संयोग विरले होते हैं। गेट्स अब अपनी कंपनी के कार्यों से सामान्यतः अपने को दूर रखते हैं। उनकी चाहत है कि वे अपने शेष जीवन में स्वास्थ्य, विकास और शिक्षा जैसे सामाजिक और परोपकारी कार्यों पर ही अधिक ध्यान दें। बताइये हाल के दौर में कितने उद्यमी या राजा-महाराजा गेट्स की तरह समाज सेवा में पूरी तरह से जुट गए हों? दुनिया के किस देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बिल गेट्स से मिलना नहीं चाहता? वे अब पूरी तरह विश्व नागरिक बन चुके हैं। वही गेट्स मोदी जी के नेतृत्व वाले भारत को उम्मीद की नजरों से देख रहे हैं। महामानव बिल गेट्स गेट्स जैसा महामानव मोदी जी की कोराना जैसी भयंकर वैश्विक आपदा के समय प्रशंसा करे तो इसपर सारे देश को गर्व करना चाहिए। पर अफसोस कि विपक्ष ने एकबार भी मोदी सरकार की तारीफ नहीं की कि उनके नेतृत्व में भारत इस संकटकाल में किस तरह से अपने दायित्वों का मुकाबला कर रहा है। उलटे भारत निर्मित कोरोना वैक्सीन पर तरह-तरह के उटपटांग सवाल उठा रहे हैं। फिर बात करते हैं प्रणब दा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ राष्ट्रपति रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने उनसे अपने संबंधों को लेकर लिखा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद आधुनिक भारत में यह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सबसे सहज रिश्तों में से एक था। प्रणब मुखर्जी की छवि एक कुशल राजनेता और विद्वान नेता की थी। वे जीवन भर सीधी और साफ बात कहने के लिए विख्यात रहे। किसे लगे दोहरे आघात प्रणब दा और बिल गेट्स से मिले डबल आघातों से वे सब अनावश्यक दुखी हैं जो मोदी और उनकी सरकार के कामकाज पर बिना किसी कारण हल्ला बोलते रहते हैं। ये विपक्षी नेता प्रजातंत्र के धर्म का निर्वाह करने में सिरे से नाकाम रहे हैं। लोकतंत्र में वाद-विवाद-संवाद की प्रक्रिया तो निरंतर जारी रहना ही चाहिए। लोकतंत्र में स्वस्थ बहस और आलोचना के लिए हमेशा जगह भी रहनी चाहिए। पर मौजूदा विपक्ष का एकमात्र काम सरकार के पीछे पड़े रहना है। इन्होने भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी से कुछ भी नहीं सीखा। देश के मौजूदा विपक्ष के कथित तौर पर बड़े नेता बने राहुल गांधी ने राफेल सौदे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अनर्गल आरोपों की झड़ी लगा दी थी। वे राफेल सौदे में प्रधानमंत्री मोदी पर इस तरह से आरोप लगा रहे थे जैसे उनके पास पुख्ता प्रमाण हों। वे बार-बार मोदी जी को 15 मिनट तक बहस करने की चुनौती दे रहे थे। बेवजह राफेल-राफेल कर रहे थे। हालांकि उनके वे सारे आरोप सदा की भांति गलत साबित हुए। यही विपक्ष सरकार से सुबूत मांग रहा था जब भारत ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर हमला करके उस धूर्त देश को उसकी औकात बताई थी। भारत ने एक तरह से पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी कड़ा संदेश दे दिया था कि अगर भारत की तरफ तिरछी नजर से देखा तो गर्दन में अंगूठा डाल दिया जाएगा। पर हमारा विपक्ष सरकार से ही सवाल पूछे जा रहा था। मोदी के सामने सब बौने फिलहाल देश में तो क्या पूरे विश्व भर में मोदी के सामने कोई अन्य नेता बराबरी में खड़ा तक नहीं होता है। उनके सामने तो सबके सब बौने हैं। उनकी समूचे देश में ही नहीं विश्व भर में स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शख्सियत को और भी प्रकाशित कर दिया है, प्रणब दा और बिल गेट्स ने। स्वाभाविक है कि इससे मोदी जी की निंदा करने वाले जो बैकफुट पर आ गए हैं अब अपनी औकात समझ जायेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 11 January 2021


bhopal, Hindi becomes, language of the United Nations

डॉ. वेदप्रताप वैदिक संयुक्त राष्ट्र संघ में अगर अब भी हिन्दी नहीं आएगी तो कब आएगी? हिन्दी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के से धक्के की जरूरत है। भारत सरकार को कोई लंबा-चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिन्दी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं। उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिन्दी का नाम जुड़वाना होगा। इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं। सूरिनाम में संपन्न हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में मैंने इस प्रस्ताव पर जब हस्ताक्षर करवाए तो सभी दलों के सांसद मित्रों ने सहर्ष उपकृत कर दिया। कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा। जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिन्दी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपत्ति है, वे भी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 22 भारतीय भाषाएं भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व मंच पर भारत गूंगा बनकर बैठा रहे। उनका उत्कट राष्ट्र प्रेम उन्हें प्रेरित करेगा कि हिन्दी विश्व मंच पर भारत की पहचान बनकर उभरे। उन्हें भारत की बढ़ती हुई शक्ति और संपन्नता पर उतना ही गर्व है, जितना किसी भी हिन्दी भाषी को है। वे जानते हैं कि जिस राष्ट्र के मुंह में अपनी जुबान नहीं, वह महाशक्ति कैसे बन सकता है? उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता कैसे मिल सकती है? स्थायी सदस्यता तो बहुत बाद की बात है। पहले कम-से-कम सदस्यता के द्वार पर भारत दस्तक तो दे। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी ही यह दस्तक है। अगर हमने संयुक्त राष्ट्र संघ में पहले हिन्दी बिठा दी तो हमें सुरक्षा परिषद में बैठना अधिक आसान हो जाएगा। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं केवल चार थीं। अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी। सिर्फ ये चार ही क्यों? सिर्फ ये चार इसलिए कि ये चारों भाषाएं पांच विजेता महाशक्तियों की भाषा थी। अमेरिकी और ब्रिटेन, दोनों की अंग्रेजी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी! इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन, जापानी आदि भाषाएं किसी तरह कमतर नहीं थी लेकिन विजित राष्ट्रों की भाषाएं थीं। याने जिस भाषा के हाथ में तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही सिंहासन पर जा बैठी। क्या अब 65 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा? जो ढांचा द्वितीय महायुद्ध के बाद बना था, उसका लोकतांत्रीकरण हो या नहीं? यदि होगा तो संयुक्त राष्ट्र के सिंहासन पर विराजमान होने का सबसे पहला हक हिन्दी का होगा। यदि 1965 में भारत आजाद होता तो उसकी भाषा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में अपने आप ही मान्यता मिल जाती। 1965 में जो चार भाषाएं संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएं बनीं, उनमें 1973 में दो भाषाएं और जुड़ी। हिस्पानी और अरबी ! इन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लगभग दो-दो दर्जन राष्ट्र में से एक भी ऐसा नहीं था, जिसे महाशक्ति कह सकें। या विकसित राष्ट्र मान लें। ये राष्ट्र आपस में मिलकर किसी महाशक्ति मंडल की छवि प्रस्तुत नहीं करते। कई राष्ट्र एक ही भाषा जरूर बोलते हैं लेकिन वे गरीब है, पिछड़े हैं, छोटे हैं, पर-निर्भर हैं और अगर वे सशक्त और बड़े हैं तो आपस में झगड़ते हैं, संयुक्त राष्ट्र में एक-दूसरे के विरोध में मतदान करते हैं। दूसरे शब्दों में उनकी भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में शक्तिबल के कारण नहीं, संख्या बल के कारण मान्यता मिली। हिन्दी को तो पता ही नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए। सबसे पहला कारण तो यह है कि हिन्दी को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा। उसके लोकतन्त्रीकरण की प्रतिक्रिया का यह शुभारंभ माना जाएगा। विजेता और विजित के खांचे में फंसी हुई संयुक्त राष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा। दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और दुनिया के चौथे सबसे मालदार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़ाएगा। तीसरा, हिन्दी को मान्यता देने का अर्थ है तीसरी दुनिया और गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना। भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता है। चौथा, हिन्दी विश्व की सबसे अधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्त राष्ट्र की पांच भाषाओं से हिन्दी की तुलना करना बेकार है। वह उनसे कहीं आगे है। हां, चीनी से तुलना हो सकती है। चीन की अधिकृत भाषा `मेंडारिन' है। इस भाषा को बोलने-समझने वालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्वकोशों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है। उसे सौ करोड़ भी बताया जा सकता है। लेकिन असलियत क्या है? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं। चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएं हैं। उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते। मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूं। एक-एक माह वहां रहा हूं। मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़े थे। एक तो जो हिन्दी से चीनी का अनुवाद करे और दूसरा, जो चीनी से स्थानीय भाषा में करे। अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषाओं की संख्या एक अरब है तो भी इससे हिन्दी पिछड़ नहीं जाती। आज हिन्दी भाषियों की संख्या एक अरब से भी ज्यादा है। सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिन्दी समझ लेते हैं और जरूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं। अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिन्दी के व्यवहार में अब भी कठिनाई है तो उसकी भरपाई दक्षेस के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं। उनमें से ज्यादातर हिन्दी समझते हैं। उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिन्दी का प्रयोग सगर्व करते हैं। अत: संख्या बल के कोण से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को प्रतिष्टित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है। पांचवां, हिन्दी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएं नहीं बोली-समझी जाती है। याद रहे बहुसंख्यक जनता द्वारा ! यह ठीक है कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है। लेकिन ये भाषाएं उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा आज भी नहीं बोलते जबकि हिन्दी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, ट्रिनिडाड, सूरिनाम, फीजी, गयाना, बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियां टीवी पर सुनाई देंगी तो कल्पना कीजिए कि कितने लोगों और राष्ट्रों का संयुक्त राष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता चला जाएगा। छठा, यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी तो दुनिया की अन्य सैकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया खजाना खुल पड़ेगा। हिन्दी संस्कृत की बेटी है। संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं। एशियाई और अफ्रीकी ही नहीं, यूरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है। अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज नये शब्दों की जरूरत पड़ती है। इस कमी को हिन्दी पूरा करेगी। सातवां, इसके अलावा हिन्दी के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को भी लिबास मिलेगा। वे निर्वसन हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज्बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि अनेक भाषाएं हैं, जो विदेशी लिपियों में लिखी जाती है। मजबूरी है। हिन्दी इस मजबूरी को विश्व स्तर पर दूर करेगी। वह रोमन, रूसी और चीनी आदि लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी। उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है। जो बोलो सो लिखो और लिखो, सो बोलो। संयुक्त राष्ट्र में बैठी हिन्दी विश्व के भाषाई मानचित्र को बदल देगी। यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में दनदनाने लगी तो उसके चार ठोस परिणाम एकदम सामने आएंगे। पहला, भारतीय नौकरशाही और नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी। भारत के राज-काज में हिन्दी को उचित स्थान मिलेगा। दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्धि होगी। तीसरा, दक्षेस राष्ट्रों में `संगच्छध्वं संवदध्वं' का भाव फैलेगा। जनता से जुड़ाव बढ़ेगा। तीसरा, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अंग्रेजी का सशक्त विकल्प तैयार होगा। चौथा, स्वभाषाओं के जरिये होने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की गति तीव्र होगी। उसके कारण भारत दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति करेगा। सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरु बनेगा। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)  

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bhopal, Hindi becomes, language of the United Nations

डॉ. वेदप्रताप वैदिक संयुक्त राष्ट्र संघ में अगर अब भी हिन्दी नहीं आएगी तो कब आएगी? हिन्दी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के से धक्के की जरूरत है। भारत सरकार को कोई लंबा-चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिन्दी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं। उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिन्दी का नाम जुड़वाना होगा। इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं। सूरिनाम में संपन्न हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में मैंने इस प्रस्ताव पर जब हस्ताक्षर करवाए तो सभी दलों के सांसद मित्रों ने सहर्ष उपकृत कर दिया। कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा। जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिन्दी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपत्ति है, वे भी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 22 भारतीय भाषाएं भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व मंच पर भारत गूंगा बनकर बैठा रहे। उनका उत्कट राष्ट्र प्रेम उन्हें प्रेरित करेगा कि हिन्दी विश्व मंच पर भारत की पहचान बनकर उभरे। उन्हें भारत की बढ़ती हुई शक्ति और संपन्नता पर उतना ही गर्व है, जितना किसी भी हिन्दी भाषी को है। वे जानते हैं कि जिस राष्ट्र के मुंह में अपनी जुबान नहीं, वह महाशक्ति कैसे बन सकता है? उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता कैसे मिल सकती है? स्थायी सदस्यता तो बहुत बाद की बात है। पहले कम-से-कम सदस्यता के द्वार पर भारत दस्तक तो दे। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी ही यह दस्तक है। अगर हमने संयुक्त राष्ट्र संघ में पहले हिन्दी बिठा दी तो हमें सुरक्षा परिषद में बैठना अधिक आसान हो जाएगा। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं केवल चार थीं। अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी। सिर्फ ये चार ही क्यों? सिर्फ ये चार इसलिए कि ये चारों भाषाएं पांच विजेता महाशक्तियों की भाषा थी। अमेरिकी और ब्रिटेन, दोनों की अंग्रेजी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी! इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन, जापानी आदि भाषाएं किसी तरह कमतर नहीं थी लेकिन विजित राष्ट्रों की भाषाएं थीं। याने जिस भाषा के हाथ में तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही सिंहासन पर जा बैठी। क्या अब 65 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा? जो ढांचा द्वितीय महायुद्ध के बाद बना था, उसका लोकतांत्रीकरण हो या नहीं? यदि होगा तो संयुक्त राष्ट्र के सिंहासन पर विराजमान होने का सबसे पहला हक हिन्दी का होगा। यदि 1965 में भारत आजाद होता तो उसकी भाषा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में अपने आप ही मान्यता मिल जाती। 1965 में जो चार भाषाएं संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएं बनीं, उनमें 1973 में दो भाषाएं और जुड़ी। हिस्पानी और अरबी ! इन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लगभग दो-दो दर्जन राष्ट्र में से एक भी ऐसा नहीं था, जिसे महाशक्ति कह सकें। या विकसित राष्ट्र मान लें। ये राष्ट्र आपस में मिलकर किसी महाशक्ति मंडल की छवि प्रस्तुत नहीं करते। कई राष्ट्र एक ही भाषा जरूर बोलते हैं लेकिन वे गरीब है, पिछड़े हैं, छोटे हैं, पर-निर्भर हैं और अगर वे सशक्त और बड़े हैं तो आपस में झगड़ते हैं, संयुक्त राष्ट्र में एक-दूसरे के विरोध में मतदान करते हैं। दूसरे शब्दों में उनकी भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में शक्तिबल के कारण नहीं, संख्या बल के कारण मान्यता मिली। हिन्दी को तो पता ही नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए। सबसे पहला कारण तो यह है कि हिन्दी को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा। उसके लोकतन्त्रीकरण की प्रतिक्रिया का यह शुभारंभ माना जाएगा। विजेता और विजित के खांचे में फंसी हुई संयुक्त राष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा। दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और दुनिया के चौथे सबसे मालदार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़ाएगा। तीसरा, हिन्दी को मान्यता देने का अर्थ है तीसरी दुनिया और गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना। भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता है। चौथा, हिन्दी विश्व की सबसे अधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्त राष्ट्र की पांच भाषाओं से हिन्दी की तुलना करना बेकार है। वह उनसे कहीं आगे है। हां, चीनी से तुलना हो सकती है। चीन की अधिकृत भाषा `मेंडारिन' है। इस भाषा को बोलने-समझने वालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्वकोशों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है। उसे सौ करोड़ भी बताया जा सकता है। लेकिन असलियत क्या है? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं। चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएं हैं। उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते। मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूं। एक-एक माह वहां रहा हूं। मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़े थे। एक तो जो हिन्दी से चीनी का अनुवाद करे और दूसरा, जो चीनी से स्थानीय भाषा में करे। अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषाओं की संख्या एक अरब है तो भी इससे हिन्दी पिछड़ नहीं जाती। आज हिन्दी भाषियों की संख्या एक अरब से भी ज्यादा है। सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिन्दी समझ लेते हैं और जरूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं। अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिन्दी के व्यवहार में अब भी कठिनाई है तो उसकी भरपाई दक्षेस के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं। उनमें से ज्यादातर हिन्दी समझते हैं। उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिन्दी का प्रयोग सगर्व करते हैं। अत: संख्या बल के कोण से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को प्रतिष्टित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है। पांचवां, हिन्दी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएं नहीं बोली-समझी जाती है। याद रहे बहुसंख्यक जनता द्वारा ! यह ठीक है कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है। लेकिन ये भाषाएं उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा आज भी नहीं बोलते जबकि हिन्दी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, ट्रिनिडाड, सूरिनाम, फीजी, गयाना, बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियां टीवी पर सुनाई देंगी तो कल्पना कीजिए कि कितने लोगों और राष्ट्रों का संयुक्त राष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता चला जाएगा। छठा, यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी तो दुनिया की अन्य सैकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया खजाना खुल पड़ेगा। हिन्दी संस्कृत की बेटी है। संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं। एशियाई और अफ्रीकी ही नहीं, यूरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है। अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज नये शब्दों की जरूरत पड़ती है। इस कमी को हिन्दी पूरा करेगी। सातवां, इसके अलावा हिन्दी के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को भी लिबास मिलेगा। वे निर्वसन हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज्बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि अनेक भाषाएं हैं, जो विदेशी लिपियों में लिखी जाती है। मजबूरी है। हिन्दी इस मजबूरी को विश्व स्तर पर दूर करेगी। वह रोमन, रूसी और चीनी आदि लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी। उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है। जो बोलो सो लिखो और लिखो, सो बोलो। संयुक्त राष्ट्र में बैठी हिन्दी विश्व के भाषाई मानचित्र को बदल देगी। यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में दनदनाने लगी तो उसके चार ठोस परिणाम एकदम सामने आएंगे। पहला, भारतीय नौकरशाही और नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी। भारत के राज-काज में हिन्दी को उचित स्थान मिलेगा। दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्धि होगी। तीसरा, दक्षेस राष्ट्रों में `संगच्छध्वं संवदध्वं' का भाव फैलेगा। जनता से जुड़ाव बढ़ेगा। तीसरा, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अंग्रेजी का सशक्त विकल्प तैयार होगा। चौथा, स्वभाषाओं के जरिये होने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की गति तीव्र होगी। उसके कारण भारत दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति करेगा। सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरु बनेगा। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)  

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Dakhal News 9 January 2021


bhopal, Growing power of hindi

विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष योगेश कुमार गोयल आधुनिकता की ओर तेजी से अग्रसर कुछ भारतीय आज अंग्रेजी बोलने में अपनी आन, बान और शान समझते हों किन्तु सच यही है कि हिन्दी ऐसी भाषा है, जो प्रत्येक भारतवासी को वैश्विक स्तर पर मान-सम्मान दिलाती है। सही मायने में विश्व की प्राचीन, समृद्ध एवं सरल भाषा है भारत की राजभाषा हिन्दी, जो न केवल भारत में बल्कि अब दुनिया के अनेक देशों में बोली जाती है। वैश्विक स्तर पर हिन्दी की बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यही है कि आज विश्वभर में करोड़ों लोग हिन्दी बोलते हैं और दुनियाभर के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। दुनियाभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वातावरण निर्मित करने तथा हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से पिछले कई वर्षों से दस जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम है। पहली बार नागपुर में 10 जनवरी 1975 को विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। तत्पश्चात् भारत के बाहर मॉरीशस, यूनाइटेड किंगडम, त्रिनिदाद, अमेरिका इत्यादि देशों में भी विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया। विश्वभर की भाषाओं का इतिहास रखने वाली संस्था ‘एथ्नोलॉग’ द्वारा जब हिन्दी को दुनियाभर में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी भाषा बताया जाता है तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। अगर हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या की बात की जाए तो विश्वभर में 75 करोड़ से भी ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं। इंटरनेट पर भी हिन्दी का चलन दिनों-दिन तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल द्वारा कुछ वर्षों पूर्व तक जहां अंग्रेजी सामग्री को ही महत्व दिया जाता था, वहीं अब गूगल द्वारा भारत में हिन्दी तथा कुछ क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि देश में इस वर्ष हिन्दी में इंटरनेट उपयोग करने वालों की संख्या अंग्रेजी में इसका उपयोग करने वालों से ज्यादा हो जाएगी। करीब चार साल पहले डिजिटल माध्यम में हिन्दी समाचार पढ़ने वालों की संख्या करीब साढ़े पांच करोड़ थी, जो इस साल बढ़कर चौदह करोड़ से भी ज्यादा हो जाने का अनुमान है। इंटरनेट पर हिन्दी का जो दायरा कुछ समय पहले तक कुछ ब्लॉगों और हिन्दी की चंद वेबसाइटों तक सीमित था, अब हिन्दी अखबारों की वेबसाइटों ने करोड़ों नए हिन्दी पाठकों को अपने साथ जोड़कर हिन्दी को और समृद्ध तथा जन-जन की भाषा बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तकनीकी रूप से हिन्दी को और ज्यादा उन्नत, समृद्ध तथा आसान बनाने के लिए अब कई सॉफ्टवेयर भी हिन्दी के लिए बन रहे हैं। यह हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की ताकत ही कही जाएगी कि इसके इतने ज्यादा उपयोगकर्ताओं के कारण ही अब भारत में बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हिन्दी का भी उपयोग करने लगी हैं। हिन्दी की बढ़ती ताकत को महसूस करते हुए भारत में ई-कॉमर्स साइटें भी ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए हिन्दी में ही अपनी ‘एप’ लेकर आ रही हैं। हिन्दी इस समय देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है। अगर 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें तो 2001 से 2011 के बीच हिन्दी बोलने वालों की संख्या में हमारे देश में करीब 10 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2001 में जहां 41.03 फीसदी लोगों ने हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताया था, वहीं 2011 में ऐसे लोगों की संख्या करीब 42 करोड़ के साथ 43.63 फीसदी दर्ज की गई और जिस प्रकार हिन्दी का चलन लगातार बढ़ रहा है, माना जाना चाहिए कि 2011 की जनगणना के बाद के इन 10 वर्षों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में कई करोड़ लोगों की और बढ़ोतरी अवश्य हुई होगी। भारत लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा और उस दौरान हमारे यहां की भाषाओं पर भी अंग्रेजी दासता का बुरा प्रभाव पड़ा। इसी कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी को ‘जनमानस की भाषा’ बताते हुए वर्ष 1918 में आयोजित ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ में इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। सही मायने में तभी से हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास शुरू हो गए थे और गर्व का विषय यह है कि अब सैंकड़ों देशों में हिन्दी का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अगर भारतीय परिवेश में हिन्दी के प्रचलन को लेकर बात की जाए तो यह चिंता की बात है कि भारतीय समाज में बहुत से लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि हिन्दी बोलने वालों को वे पिछड़ा और अंग्रेजी में अपनी बात कहने वालों को आधुनिक का दर्जा देते हैं। हिन्दी का करीब 1.2 लाख शब्दों का समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद अधिकांश लोग हिन्दी लिखते और बोलते समय अंग्रेजी भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर लोगों को हिन्दी भाषा के विकास, हिन्दी के उपयोग के लाभ तथा उपयोग न करने पर हानि के बारे में समझाया जाना बेहद जरूरी है। लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि हिन्दी उनकी राजभाषा है, जिसका सम्मान और प्रचार-प्रसार करना उनका कर्त्तव्य है और जबतक सभी लोग इसका उपयोग नहीं करेंगे, इस भाषा का विकास नहीं होगा। उन्हें यह अहसास कराए जाने का भी प्रयास किया जाना चाहिए कि भले ही दुनिया में अंग्रेजी भाषा का सिक्का चलता हो लेकिन हिन्दी अब अंग्रेजी भाषा से ज्यादा पीछे नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 January 2021


bhopal, Online education, Corona era,a new mandatory tradition

डॉ. रमेश चंद शर्मा कोरोना संकट काल ने मानव चेतना को बुरी तरह से झकझोर दिया है। घर से काम करना हो या घर बैठे ऑनलाइन पढ़ाई अथवा अन्य जीवन शैली की नई शुरुआत हो, ऐसा स्पष्ट हो गया है कि कोरोना के बाद भी इनमें से अधिकांश तौर-तरीके आने वाले वक्त में हमारे जीवन का स्थायी भाग बनकर रहने वाले हैं। इनमें शिक्षा का क्षेत्र हमेशा के लिए ऐसी परिस्थिति में आगे बढ़ने के लिए तैयार भी होगा तथा आदी भी बनेगा। अनेक देशों में ऐसी विधि का प्रचलन रहा है। दूरवर्ती या पत्राचार से शिक्षा तो लगभग सभी देशों में रहा है लेकिन संचार माध्यमों के प्रचार-प्रसार ने इसे व्यापक आधार उपस्थित किया है, जिसे कोरोना ने अलग रूप में प्रचलित किया है। डाटा और डिजिटल युग में चाहते न चाहते भी इसे अपनाना मजबूरी बन गई है। शायद इससे बेहतर विकल्प भी नहीं था। संकटकाल में व्यवस्था को गतिशील रखने का इससे बेहतर तरीका और हो भी क्या सकता था। छात्र के पास स्मार्टफोन हो या न हो। उस क्षेत्र में सिग्नल हो या न हो। जिस फोन से बच्चों को दूर रखने के भाषण दिये जाते थे। जिस के दुष्परिणामों की दुहाई दी जाती थी उसे ही संकटमोचक के रूप में स्वीकार करने की विवशता इस युग की विडंबना सिद्ध हुई है। इससे भी अगला कदम ऑनलाइन शिक्षा के सदैव उपयोग होने की बुनियाद बनती जा रही है। तकनीकी और गैर तकनीकी शिक्षा का निश्चित प्रतिशत आरक्षित करने के प्रावधान आरंभ हो गए हैं। सफलता या असफलता का आकलन तो भविष्य के इतिहासकार करेंगे लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है। अध्यापक की भूमिका बदले स्वरूप में होगी। यदाकदा साक्षात्कार होगा, अधिकतर शिक्षक के स्थान पर यंत्र होगा। अन्य व्यवसाय करते हुए भी डिग्री ली जा सकेगी। ऐसे वातावरण में अनेक प्रकार के शिक्षित लोग और विषय के विशेषज्ञ रहेंगे, चाहे कला का क्षेत्र हो या इंजीनियरिंग हो अथवा अन्यान्य कोर्स हों। ऐसे परिवेश में अपनी प्रतिभा और दक्षता को सही मंच पर उजागर करने की चुनौती भी सदा बनी रहेगी। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्वास्थ्य की समस्या तो है ही उसके साथ गरीब और जरूरतमंदों की सहायता जिससे वे फोन आदि खरीद सकें ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए। जबतक कोरोना है तबतक तो सबकुछ ऑनलाइन है, इसके बाद भी समाज को समय और परिस्थिति के अनुरूप ढालना ही पड़ेगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 8 January 2021


bhopal,Child crime rising trend

प्रभुनाथ शुक्ल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक छात्र की हरकत ने समाज को स्तब्ध कर दिया। 14 साल के स्कूली छात्र ने अपने ही सहपाठी को इसलिए गोली मार दी कि स्कूल में बैठने को लेकर उसका अपने सहपाठी के साथ झगड़ा हुआ था। इसका बदला लेने के लिए घटना के दूसरे दिन स्कूल बैग में चाचा की लाइसेंसी पिस्तौल लेकर आए छात्र ने सहपाठी को गोली मार दी। हालाँकि बाद में स्कूल स्टाफ की तत्परता से उसकी गिरफ्तारी हो गई। लेकिन समाज में बढ़ते बाल अपराध के मनोविज्ञान ने हमें चौका दिया है। सामाजिक बदलाव और तकनीकी विकास का मानव जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा है। सीखने और समझने की क्षमता भी अधिक बढ़ी है। जिसका नतीजा है अपराध का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है। भारत में बाल अपराध के आंकड़ों की गति भी हाल के सालों में कई गुना बढ़ी है। निर्भया कांड में भी एक बाल अपराधी की भूमिका अहम रही थी। बाद में जुवेनाइल अदालत से वह छूट गया। संयुक्तराष्ट्र 18 साल के कम उम्र के किशोरों को नाबालिग मानता है। जबकि भारत समेत दुनिया भर में बढ़ते बाल अपराध की घटनाओं ने सोचने पर मजबूर किया है। जिसकी वजह है कि दुनिया के कई देशों ने नाबालिग की उम्र को घटा दिया है। कई देशों में बाल अपराध की सजा बड़ों जैसी है। भारतवर्ष में किसी बच्चे को बाल अपराधी घोषित करने की उम्र 14 वर्ष तथा अधिकतम 18 वर्ष है। इसी तरह मिस्र में 7 वर्ष से 15 वर्ष, ब्रिटेन में 11 से 16 वर्ष तथा ईरान में 11 से 18 वर्ष है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार हाल के सालों में बाल अपराध की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। समाज में इस तरह की घटनाएँ हमारे लिए चिंता का विषय हैं। इसे हम नजरंदाज नहीं कर सकते। अमेरिका जैसे देश में इस तरह की अनगिनत घटनाएँ हैं, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह बड़ी बात है। यह घटना साफतौर पर इंगित करती है कि हम किस सामजिक बदलाव की तरफ बढ़ रहे हैं। आने वाली पीढ़ी में संवाद, संयम और सहनशीलता, धैर्य, क्षमा का अभाव दिखने लगा है। 14 साल की उम्र भारतीय समाज में विशेष रूप से सीखने की होती है उस उम्र के किशोर प्रयोगवादी कहाँ से हो गए हैं। हम समाज और आनेवाली पीढ़ी को कौन-सा महौल देना चाहते हैं। 14 साल की उम्र का नाबालिग पिस्तौल में गोली भरना और ट्रिगर दबाना कैसे सीख गया? यह सब तकनीकी विकास और पारिवारिक महौल पर बहुत कुछ निर्भर करता है। संवेदनशील आग्नेयास्त्र बच्चों की पहुँच तक घर में कैसे सुलभ हो गए। इस तरह के शस्त्र क्या बच्चों की पहुँच से छुपाकर रखने की वस्तु नहीं है। फिर इस शस्त्र को घर में इतनी गैर जिम्मेदारी से क्यों रखा गया था। नाबालिग किशोर उस आग्नेयास्त्र तक कैसे पहुँच गया। छात्र के बैग में टिफिन रखते वक्त क्या माँ ने उसका स्कूल बैग चेक नहीं किया। जिस चाचा की पिस्तौल लेकर वह किशोर स्कूल गया था वह सेना में कार्यरत बताया गया है। अवकाश पर घर आया था, फिर क्या यह उनकी खुद की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि इस तरह के शस्त्रों को बच्चों की पहुँच से दूर रखा जाय। निश्चित रूप से हम समाज में जिस माहौल को पैदा कर रहे हैं वह हमारे लिए बेहद दुखदायी है। इंसान ने खुद को टाइम मशीन बना लिया है। वह बच्चों, परिवार, समाज और समूह पर अपना ध्यान ही केंद्रित नहीं कर पा रहा है। अगर थोड़ी-सी सतर्कता बरती जाती तो सम्भवतः इस तरह के हादसे को टाला जा सकता था। अगर उस शस्त्र को बच्चों की पहुँच से सुरक्षित स्थान पर किसी लॉकर में रखा जाता तो इस तरह की घटना नहीं होती। इस घटना से सबक लेते हुए स्कूल प्रबंधन को भी चाहिए कि स्कूल गेट पर हर छात्र की तलाशी ली जाय, क्योंकि अपराध किसी चेहरे पर नहीं लिखा है। स्कूलों में मेटल डिटेक्टर भी लगाए जाने चाहिए। हमने मासूम बच्चों पर स्कूली किताबों का बोझ अधिक लाद दिया है। पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा की होड़ में किशोरवय की अल्हड़ता को छीन लिया है। आधुनिक जीवन शैली ने सामाजिक परिवेश को जरूरत से अधिक बदल दिया है। हमने प्रतिस्पर्धी जीवन में बच्चों और परिवार पर समय देना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से बच्चों में एकाकीपन बढ़ रहा है। बच्चों में चिड़चिड़ापन आता है। परिवार नाम की संस्था और नैतिक मूल्य की उनमें समझ नहीं पैदा होती। उन्हें समाज, परिवार जैसे संस्कार ही नहीं मिल पाते। शहरों में माँ- बाप के कामकाजी होने से यह समस्या और बड़ी और गहरी बन जाती है। क्योंकि इस तरह के परिवार में बच्चों के लिए समय ही नहीं बचता है। स्कूल से आने के बाद बच्चों पर ट्यूशन और होमवर्क का बोझ बढ़ रहा है। माँ-बाप बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। दादा-दादी का तो वक्त ख़त्म हो चला है, नहीं तो कम से कम शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से बच्चों का मार्गदर्शन होता था। मनोचिकित्सक डॉ. मनोज तिवारी मानते हैं कि किशोरों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति के पीछे अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। बच्चों पर वे उचित ध्यान नहीं दे पाते हैं। दूसरी वजह कई परिवारों में माता-पिता में आपसी संबंध सही नहीं होने से बच्चों को समुचित समय नहीं मिल पाता है। किशोरों द्वारा हिंसक वीडियो गेम खेलने से भी उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिसकी वजह से उनमें हिंसक प्रवृति बढ़ती है। किशोरों में सांवेगिक नियंत्रण की कमी होती है और वे फैसले अपने संवेग के आधार पर लेते हैं। डॉ. तिवारी के अनुसार किशोरवय के साथ हम क्रोध के बजाय मित्रवत व्यवहार करें। उनके साथ-साथ खेलें और बातचीत करें। उन्हें अधिक समय तक मोबाइल एवं टेलीविजन के साथ अकेले न छोड़ें। बच्चों को अकेले बहुत अधिक समय व्यतीत न करने दें। बच्चे के व्यवहार में किसी भी तरह के असामान्य परिवर्तन होने पर उसके कारणों को जानने का प्रयास करें और संभव हो तो मनोवैज्ञानिक परामर्श लें। हालाँकि कोरोना काल में स्थितियां बदली हैं। वर्क फ्रॉम होम और स्कूली की तालाबंदी होने से अभिभावकों ने बच्चों को काफी वक्त दिया है। कोविड- 19 से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका भले लगा हो, लेकिन परिवार नाम की संस्था का मतलब लोगों के समझ में आ गया है। इसके पूर्व शहरी जीवन में बच्चों को बड़ी मुश्किल से रविवार उपलब्ध हो पाता था। जिसमें माँ- बाप बच्चों के लिए समय निकाल पाते थे, लेकिन कोरोना ने एक तरह से परिवार नामक संस्था को मजबूत किया है। बुलंदशहर की घटना हमारे लिए बड़ा सबक है। हमें बच्चों के लिए समय निकालना होगा। किताबी ज्ञान के इतर हमें पारिवारिक और सामाजिक शिक्षा भी बच्चों देनी होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 January 2021


bhopal,Child crime rising trend

प्रभुनाथ शुक्ल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक छात्र की हरकत ने समाज को स्तब्ध कर दिया। 14 साल के स्कूली छात्र ने अपने ही सहपाठी को इसलिए गोली मार दी कि स्कूल में बैठने को लेकर उसका अपने सहपाठी के साथ झगड़ा हुआ था। इसका बदला लेने के लिए घटना के दूसरे दिन स्कूल बैग में चाचा की लाइसेंसी पिस्तौल लेकर आए छात्र ने सहपाठी को गोली मार दी। हालाँकि बाद में स्कूल स्टाफ की तत्परता से उसकी गिरफ्तारी हो गई। लेकिन समाज में बढ़ते बाल अपराध के मनोविज्ञान ने हमें चौका दिया है। सामाजिक बदलाव और तकनीकी विकास का मानव जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा है। सीखने और समझने की क्षमता भी अधिक बढ़ी है। जिसका नतीजा है अपराध का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है। भारत में बाल अपराध के आंकड़ों की गति भी हाल के सालों में कई गुना बढ़ी है। निर्भया कांड में भी एक बाल अपराधी की भूमिका अहम रही थी। बाद में जुवेनाइल अदालत से वह छूट गया। संयुक्तराष्ट्र 18 साल के कम उम्र के किशोरों को नाबालिग मानता है। जबकि भारत समेत दुनिया भर में बढ़ते बाल अपराध की घटनाओं ने सोचने पर मजबूर किया है। जिसकी वजह है कि दुनिया के कई देशों ने नाबालिग की उम्र को घटा दिया है। कई देशों में बाल अपराध की सजा बड़ों जैसी है। भारतवर्ष में किसी बच्चे को बाल अपराधी घोषित करने की उम्र 14 वर्ष तथा अधिकतम 18 वर्ष है। इसी तरह मिस्र में 7 वर्ष से 15 वर्ष, ब्रिटेन में 11 से 16 वर्ष तथा ईरान में 11 से 18 वर्ष है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार हाल के सालों में बाल अपराध की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। समाज में इस तरह की घटनाएँ हमारे लिए चिंता का विषय हैं। इसे हम नजरंदाज नहीं कर सकते। अमेरिका जैसे देश में इस तरह की अनगिनत घटनाएँ हैं, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह बड़ी बात है। यह घटना साफतौर पर इंगित करती है कि हम किस सामजिक बदलाव की तरफ बढ़ रहे हैं। आने वाली पीढ़ी में संवाद, संयम और सहनशीलता, धैर्य, क्षमा का अभाव दिखने लगा है। 14 साल की उम्र भारतीय समाज में विशेष रूप से सीखने की होती है उस उम्र के किशोर प्रयोगवादी कहाँ से हो गए हैं। हम समाज और आनेवाली पीढ़ी को कौन-सा महौल देना चाहते हैं। 14 साल की उम्र का नाबालिग पिस्तौल में गोली भरना और ट्रिगर दबाना कैसे सीख गया? यह सब तकनीकी विकास और पारिवारिक महौल पर बहुत कुछ निर्भर करता है। संवेदनशील आग्नेयास्त्र बच्चों की पहुँच तक घर में कैसे सुलभ हो गए। इस तरह के शस्त्र क्या बच्चों की पहुँच से छुपाकर रखने की वस्तु नहीं है। फिर इस शस्त्र को घर में इतनी गैर जिम्मेदारी से क्यों रखा गया था। नाबालिग किशोर उस आग्नेयास्त्र तक कैसे पहुँच गया। छात्र के बैग में टिफिन रखते वक्त क्या माँ ने उसका स्कूल बैग चेक नहीं किया। जिस चाचा की पिस्तौल लेकर वह किशोर स्कूल गया था वह सेना में कार्यरत बताया गया है। अवकाश पर घर आया था, फिर क्या यह उनकी खुद की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि इस तरह के शस्त्रों को बच्चों की पहुँच से दूर रखा जाय। निश्चित रूप से हम समाज में जिस माहौल को पैदा कर रहे हैं वह हमारे लिए बेहद दुखदायी है। इंसान ने खुद को टाइम मशीन बना लिया है। वह बच्चों, परिवार, समाज और समूह पर अपना ध्यान ही केंद्रित नहीं कर पा रहा है। अगर थोड़ी-सी सतर्कता बरती जाती तो सम्भवतः इस तरह के हादसे को टाला जा सकता था। अगर उस शस्त्र को बच्चों की पहुँच से सुरक्षित स्थान पर किसी लॉकर में रखा जाता तो इस तरह की घटना नहीं होती। इस घटना से सबक लेते हुए स्कूल प्रबंधन को भी चाहिए कि स्कूल गेट पर हर छात्र की तलाशी ली जाय, क्योंकि अपराध किसी चेहरे पर नहीं लिखा है। स्कूलों में मेटल डिटेक्टर भी लगाए जाने चाहिए। हमने मासूम बच्चों पर स्कूली किताबों का बोझ अधिक लाद दिया है। पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा की होड़ में किशोरवय की अल्हड़ता को छीन लिया है। आधुनिक जीवन शैली ने सामाजिक परिवेश को जरूरत से अधिक बदल दिया है। हमने प्रतिस्पर्धी जीवन में बच्चों और परिवार पर समय देना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से बच्चों में एकाकीपन बढ़ रहा है। बच्चों में चिड़चिड़ापन आता है। परिवार नाम की संस्था और नैतिक मूल्य की उनमें समझ नहीं पैदा होती। उन्हें समाज, परिवार जैसे संस्कार ही नहीं मिल पाते। शहरों में माँ- बाप के कामकाजी होने से यह समस्या और बड़ी और गहरी बन जाती है। क्योंकि इस तरह के परिवार में बच्चों के लिए समय ही नहीं बचता है। स्कूल से आने के बाद बच्चों पर ट्यूशन और होमवर्क का बोझ बढ़ रहा है। माँ-बाप बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। दादा-दादी का तो वक्त ख़त्म हो चला है, नहीं तो कम से कम शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से बच्चों का मार्गदर्शन होता था। मनोचिकित्सक डॉ. मनोज तिवारी मानते हैं कि किशोरों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति के पीछे अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। बच्चों पर वे उचित ध्यान नहीं दे पाते हैं। दूसरी वजह कई परिवारों में माता-पिता में आपसी संबंध सही नहीं होने से बच्चों को समुचित समय नहीं मिल पाता है। किशोरों द्वारा हिंसक वीडियो गेम खेलने से भी उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिसकी वजह से उनमें हिंसक प्रवृति बढ़ती है। किशोरों में सांवेगिक नियंत्रण की कमी होती है और वे फैसले अपने संवेग के आधार पर लेते हैं। डॉ. तिवारी के अनुसार किशोरवय के साथ हम क्रोध के बजाय मित्रवत व्यवहार करें। उनके साथ-साथ खेलें और बातचीत करें। उन्हें अधिक समय तक मोबाइल एवं टेलीविजन के साथ अकेले न छोड़ें। बच्चों को अकेले बहुत अधिक समय व्यतीत न करने दें। बच्चे के व्यवहार में किसी भी तरह के असामान्य परिवर्तन होने पर उसके कारणों को जानने का प्रयास करें और संभव हो तो मनोवैज्ञानिक परामर्श लें। हालाँकि कोरोना काल में स्थितियां बदली हैं। वर्क फ्रॉम होम और स्कूली की तालाबंदी होने से अभिभावकों ने बच्चों को काफी वक्त दिया है। कोविड- 19 से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका भले लगा हो, लेकिन परिवार नाम की संस्था का मतलब लोगों के समझ में आ गया है। इसके पूर्व शहरी जीवन में बच्चों को बड़ी मुश्किल से रविवार उपलब्ध हो पाता था। जिसमें माँ- बाप बच्चों के लिए समय निकाल पाते थे, लेकिन कोरोना ने एक तरह से परिवार नामक संस्था को मजबूत किया है। बुलंदशहर की घटना हमारे लिए बड़ा सबक है। हमें बच्चों के लिए समय निकालना होगा। किताबी ज्ञान के इतर हमें पारिवारिक और सामाजिक शिक्षा भी बच्चों देनी होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 January 2021


bhopal, Now fear of bird flu  Community-verified icon

सियाराम पांडेय 'शांत' कोरोना के भयावह दौर के बीच अब बर्ड फ्लू का डर लोगों को सताने लगा है। क्या पशु-पक्षी भी कोरोना वायरस की चपेट में आ रहे हैं या यह केवल पक्षियों में होने वाला साधारण या असामान्य बुखार है। वैसे बर्ड फ्लू प्रभावित पक्षियों में जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, वे कोरोना से लगभग मिलते-जुलते हैं और यह स्थिति मनुष्यों की सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत खतरनाक है। कफ, डायरिया, बुखार, सांस से जुड़ी दिक्कत, सिर दर्द, पेशियों में दर्द, गले में खराश, नाक बहना और बेचैनी जैसी समस्याएं इस रोग का लक्षण हैं। चिंताजनक बात यह है कि बर्ड फ्लू मृत या जिंदा पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। पशु-पक्षियों और मनुष्य का रिश्ता काफी पुराना है। पशु-पक्षियों के विकार मनुष्यों को भी प्रभावित करते हैं। कोरोना वायरस भी चीन में चमगादड़ से फैला था और इसके बाद उसने अधिकांश देशों को अपनी खौफनाक गिरफ्त में ले लिया। अब अचानक देश में कौओं, बतखों, मुर्गों-मुर्गियों और अन्य पक्षियों के मरने का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उसने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की परेशानी बढ़ा दी है। इसे प्रकृति के संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रकृति का खुला संदेश यही है कि मानव जाति मांसाहार का परित्याग कर शाकाहारी जीवनचर्या अपनाए, यही उसके अपने व्यापक हित में है। कोरोना वायरस का खतरा अभी टला नहीं है। इसकी रोकथाम के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन कितनी कारगर होगी, यह समय के साथ पता चलेगा। इस रोग के जितने वैज्ञानिक और चिकित्सकीय अध्ययन सामने आए हैं। जितने रूप और प्रतिरूप सामने आए हैं, उससे आम आदमी भयभीत और भ्रमित ही हुआ है। इससे दुनिया के अधिकांश देश परेशान हैं। इससे संक्रमित होने वालों और मरने वालों का आंकड़ा भी काफी बड़ा है। ऐसे में जिस तरह बर्ड फ्लू ने भारत समेत कई देशों में दस्तक देना आरंभ कर किया है, उससे हर आम और खास का चिंतित होना स्वाभाविक है। कोविड-19 की तरह बर्ड फ्लू का वायरस भी 1996 में चीन से फैला था। चीन के सेंट्रल हुनान प्रांत से खबर आई है कि वहां अत्यंत घातक बर्ड फ्लू की वजह से फरवरी 2020 में 1800 मुर्गियों को मार दिया गया था। चीन ने एक सरकारी बयान में स्वीकार किया था कि श्याओयांग शहर के एक पोल्ट्री फार्म में बर्ड फ्लू के लक्षणों के संदेह में 4,500 से अधिक मुर्गियों को मार दिया गया है। यह वायरस भी नाक, मुंह या आंखों के जरिए ही फैलता है। 2003-2004 में फ्लू की वजह से लाखों मुर्गों और जलपक्षियों की मौत हो गई। वर्ष 2008 में जनवरी से मई तक बर्ड फ्लू का सबसे बड़ा प्रकोप पश्चिम बंगाल में हुआ था जिसमें 42 लाख 62 हजार पक्षियों को मारा गया था इसके लिए 1229 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया था। असम में वर्ष 2008 के नवम्बर-दिसम्बर में यह बीमारी 18 जगहों पर फैली थी जिसमें पांच लाख नौ हजार पक्षियों को मारा गया था और इसके लिए 1.7 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति दी गई थी। देश में अबतक 49 बार अलग-अलग राज्यों में 225 जगहों पर यह रोग अपना असर दिखा चुका है। मौजूदा बर्ड फ्लू की भयावहता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि अबतक हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और केरल में 84775 पक्षियों की मौत हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन उन देशों पर भी नजर गड़ाए हुए है जहां भारत से पहले बर्ड फ्लू ने अपना असर दिखाया था। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और केरल में तो पक्षियों में बुखार की पुष्टि भी हो चुकी है। हरियाणा और गुजरात में मरे पक्षियों के नमूनों की रिपोर्ट अभी आई नहीं है लेकिन पक्षियों के बुखार ने आम आदमी की पेशानियों पर बल ला दिया है। मध्य प्रदेश के इंदौर, मंदसौर, आगर, खरगोन,उज्जैन, देवास,नीमच और सीहोर में कौए मृत मिले हैं। इंदौर और मंदसौर की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। सरकार ने सभी जिलों को बर्ड फ्लू को लेकर अलर्ट कर दिया है। हिमाचल प्रदेश के पौंग डैम वेटलैंड में 2 हजार से अधिक पक्षियों की मौत बेहद चिंताजनक है। राजस्थान के 6 जिलों में अबतक 522 पक्षियों की मौत हुई है जिसमें 471 कौवे हैं। केरल में बर्ड फ्लू से 12 हजार पक्षियों की मौत हो चुकी है। अलप्पुझा और कोट्टायम जिलों में बर्ड फ्लू के मामलों की पुष्टि के बाद 50 हजार बतखों को मारने का आदेश दिया गया है। उक्त राज्यों में पक्षियों को मारे जाने का सिलसिला तेज हो गया है। हरियाणा के पंचकूला के बरवाला के रायपुर रानी क्षेत्र में पिछले दो दिन में दो फार्म में ही 70 हजार से ज्यादा मुर्गियों की मौत हुई है। फार्मों से लिए गए मृत मुर्गियों के सैंपल की जांच रिपोर्ट अबतक नहीं आई है। गुजरात के जूनागढ़ जिले के बांटवा गांव में 2 जनवरी को बतख-टिटहरी-बगुला समेत 53 पक्षी मृत पाए गए। इनकी जांच की जा रही है। 25 दिसंबर काे झालावाड़ में काैओं की माैत के बाद भाेपाल लैब की रिपाेर्ट में बर्ड फ्लू पाॅजिटिव हाेने के बाद अबतक 10 दिनाें में 250 से अधिक काैओं, कबूतरों, काेयलों, किंग फिशर और मेगपाई पक्षियाें की माैत हाे चुकी है। गौरतलब है कि भारत में वर्ष 2006 से 2015 तक 28 बार बर्ड फ्लू अपनी दहशत का साम्राज्य कायम कर चुका है। इससे देश के अलग-अलग राज्याें में 74.30 लाख पक्षियाें काे माैत हाे चुकी है। देशभर के चिड़ियाघर बर्ड फ्लू को देखते हुए सावधानी की मुद्रा में आ गए हैं। पिंजराें में दवा का छिड़काव किया जा रहा है। विजिटर्स ट्रैक पर लाल दवा का छिड़काव करवाया जा रहा है। इससे पूर्व कई चिड़ियाघर बंद कर दिए गए थे। दिल्ली का चिड़ियाघर तो वर्ष 2017 में 85 दिन तक बंद रहा था, इससे चिड़ियाघर को करोड़ों का नुकसान हुआ था। इसबार भी अगर देश में बर्ड फ्लू का प्रसार बढ़ता है तो चिड़ियाधारों की बंद करने की जरूरत होगी ताकि चिड़ियाघर के अन्य जानवर और पक्षी ही नहीं, वहां पहुंचने वाले लोगों को बर्ड फ्लू के संक्रमण से बचाया जा सके। परिंदे बार-बार बर्ड फ्लू की चपेट में क्यों आ रहे हैं, इसका व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कर इससे बचाव के उपाय किए जाने चाहिए। परिंदों को मार डालना ही समस्या का समाधान नहीं है। अगर बड़ी तादाद में परिंदे मार दिए जाएंगे तो संसार में जीव-जगत का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए पशु-पक्षियों को कैसे बचाएं, उनमें संक्रमण कैसे रोकें, चिंता इस बात की होनी चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 6 January 2021


bhopal, Now fear of bird flu  Community-verified icon

सियाराम पांडेय 'शांत' कोरोना के भयावह दौर के बीच अब बर्ड फ्लू का डर लोगों को सताने लगा है। क्या पशु-पक्षी भी कोरोना वायरस की चपेट में आ रहे हैं या यह केवल पक्षियों में होने वाला साधारण या असामान्य बुखार है। वैसे बर्ड फ्लू प्रभावित पक्षियों में जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, वे कोरोना से लगभग मिलते-जुलते हैं और यह स्थिति मनुष्यों की सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत खतरनाक है। कफ, डायरिया, बुखार, सांस से जुड़ी दिक्कत, सिर दर्द, पेशियों में दर्द, गले में खराश, नाक बहना और बेचैनी जैसी समस्याएं इस रोग का लक्षण हैं। चिंताजनक बात यह है कि बर्ड फ्लू मृत या जिंदा पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। पशु-पक्षियों और मनुष्य का रिश्ता काफी पुराना है। पशु-पक्षियों के विकार मनुष्यों को भी प्रभावित करते हैं। कोरोना वायरस भी चीन में चमगादड़ से फैला था और इसके बाद उसने अधिकांश देशों को अपनी खौफनाक गिरफ्त में ले लिया। अब अचानक देश में कौओं, बतखों, मुर्गों-मुर्गियों और अन्य पक्षियों के मरने का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उसने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की परेशानी बढ़ा दी है। इसे प्रकृति के संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रकृति का खुला संदेश यही है कि मानव जाति मांसाहार का परित्याग कर शाकाहारी जीवनचर्या अपनाए, यही उसके अपने व्यापक हित में है। कोरोना वायरस का खतरा अभी टला नहीं है। इसकी रोकथाम के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन कितनी कारगर होगी, यह समय के साथ पता चलेगा। इस रोग के जितने वैज्ञानिक और चिकित्सकीय अध्ययन सामने आए हैं। जितने रूप और प्रतिरूप सामने आए हैं, उससे आम आदमी भयभीत और भ्रमित ही हुआ है। इससे दुनिया के अधिकांश देश परेशान हैं। इससे संक्रमित होने वालों और मरने वालों का आंकड़ा भी काफी बड़ा है। ऐसे में जिस तरह बर्ड फ्लू ने भारत समेत कई देशों में दस्तक देना आरंभ कर किया है, उससे हर आम और खास का चिंतित होना स्वाभाविक है। कोविड-19 की तरह बर्ड फ्लू का वायरस भी 1996 में चीन से फैला था। चीन के सेंट्रल हुनान प्रांत से खबर आई है कि वहां अत्यंत घातक बर्ड फ्लू की वजह से फरवरी 2020 में 1800 मुर्गियों को मार दिया गया था। चीन ने एक सरकारी बयान में स्वीकार किया था कि श्याओयांग शहर के एक पोल्ट्री फार्म में बर्ड फ्लू के लक्षणों के संदेह में 4,500 से अधिक मुर्गियों को मार दिया गया है। यह वायरस भी नाक, मुंह या आंखों के जरिए ही फैलता है। 2003-2004 में फ्लू की वजह से लाखों मुर्गों और जलपक्षियों की मौत हो गई। वर्ष 2008 में जनवरी से मई तक बर्ड फ्लू का सबसे बड़ा प्रकोप पश्चिम बंगाल में हुआ था जिसमें 42 लाख 62 हजार पक्षियों को मारा गया था इसके लिए 1229 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया था। असम में वर्ष 2008 के नवम्बर-दिसम्बर में यह बीमारी 18 जगहों पर फैली थी जिसमें पांच लाख नौ हजार पक्षियों को मारा गया था और इसके लिए 1.7 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति दी गई थी। देश में अबतक 49 बार अलग-अलग राज्यों में 225 जगहों पर यह रोग अपना असर दिखा चुका है। मौजूदा बर्ड फ्लू की भयावहता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि अबतक हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और केरल में 84775 पक्षियों की मौत हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन उन देशों पर भी नजर गड़ाए हुए है जहां भारत से पहले बर्ड फ्लू ने अपना असर दिखाया था। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और केरल में तो पक्षियों में बुखार की पुष्टि भी हो चुकी है। हरियाणा और गुजरात में मरे पक्षियों के नमूनों की रिपोर्ट अभी आई नहीं है लेकिन पक्षियों के बुखार ने आम आदमी की पेशानियों पर बल ला दिया है। मध्य प्रदेश के इंदौर, मंदसौर, आगर, खरगोन,उज्जैन, देवास,नीमच और सीहोर में कौए मृत मिले हैं। इंदौर और मंदसौर की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। सरकार ने सभी जिलों को बर्ड फ्लू को लेकर अलर्ट कर दिया है। हिमाचल प्रदेश के पौंग डैम वेटलैंड में 2 हजार से अधिक पक्षियों की मौत बेहद चिंताजनक है। राजस्थान के 6 जिलों में अबतक 522 पक्षियों की मौत हुई है जिसमें 471 कौवे हैं। केरल में बर्ड फ्लू से 12 हजार पक्षियों की मौत हो चुकी है। अलप्पुझा और कोट्टायम जिलों में बर्ड फ्लू के मामलों की पुष्टि के बाद 50 हजार बतखों को मारने का आदेश दिया गया है। उक्त राज्यों में पक्षियों को मारे जाने का सिलसिला तेज हो गया है। हरियाणा के पंचकूला के बरवाला के रायपुर रानी क्षेत्र में पिछले दो दिन में दो फार्म में ही 70 हजार से ज्यादा मुर्गियों की मौत हुई है। फार्मों से लिए गए मृत मुर्गियों के सैंपल की जांच रिपोर्ट अबतक नहीं आई है। गुजरात के जूनागढ़ जिले के बांटवा गांव में 2 जनवरी को बतख-टिटहरी-बगुला समेत 53 पक्षी मृत पाए गए। इनकी जांच की जा रही है। 25 दिसंबर काे झालावाड़ में काैओं की माैत के बाद भाेपाल लैब की रिपाेर्ट में बर्ड फ्लू पाॅजिटिव हाेने के बाद अबतक 10 दिनाें में 250 से अधिक काैओं, कबूतरों, काेयलों, किंग फिशर और मेगपाई पक्षियाें की माैत हाे चुकी है। गौरतलब है कि भारत में वर्ष 2006 से 2015 तक 28 बार बर्ड फ्लू अपनी दहशत का साम्राज्य कायम कर चुका है। इससे देश के अलग-अलग राज्याें में 74.30 लाख पक्षियाें काे माैत हाे चुकी है। देशभर के चिड़ियाघर बर्ड फ्लू को देखते हुए सावधानी की मुद्रा में आ गए हैं। पिंजराें में दवा का छिड़काव किया जा रहा है। विजिटर्स ट्रैक पर लाल दवा का छिड़काव करवाया जा रहा है। इससे पूर्व कई चिड़ियाघर बंद कर दिए गए थे। दिल्ली का चिड़ियाघर तो वर्ष 2017 में 85 दिन तक बंद रहा था, इससे चिड़ियाघर को करोड़ों का नुकसान हुआ था। इसबार भी अगर देश में बर्ड फ्लू का प्रसार बढ़ता है तो चिड़ियाधारों की बंद करने की जरूरत होगी ताकि चिड़ियाघर के अन्य जानवर और पक्षी ही नहीं, वहां पहुंचने वाले लोगों को बर्ड फ्लू के संक्रमण से बचाया जा सके। परिंदे बार-बार बर्ड फ्लू की चपेट में क्यों आ रहे हैं, इसका व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कर इससे बचाव के उपाय किए जाने चाहिए। परिंदों को मार डालना ही समस्या का समाधान नहीं है। अगर बड़ी तादाद में परिंदे मार दिए जाएंगे तो संसार में जीव-जगत का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए पशु-पक्षियों को कैसे बचाएं, उनमें संक्रमण कैसे रोकें, चिंता इस बात की होनी चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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सियाराम पांडेय 'शांत' कोरोना के भयावह दौर के बीच अब बर्ड फ्लू का डर लोगों को सताने लगा है। क्या पशु-पक्षी भी कोरोना वायरस की चपेट में आ रहे हैं या यह केवल पक्षियों में होने वाला साधारण या असामान्य बुखार है। वैसे बर्ड फ्लू प्रभावित पक्षियों में जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, वे कोरोना से लगभग मिलते-जुलते हैं और यह स्थिति मनुष्यों की सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत खतरनाक है। कफ, डायरिया, बुखार, सांस से जुड़ी दिक्कत, सिर दर्द, पेशियों में दर्द, गले में खराश, नाक बहना और बेचैनी जैसी समस्याएं इस रोग का लक्षण हैं। चिंताजनक बात यह है कि बर्ड फ्लू मृत या जिंदा पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। पशु-पक्षियों और मनुष्य का रिश्ता काफी पुराना है। पशु-पक्षियों के विकार मनुष्यों को भी प्रभावित करते हैं। कोरोना वायरस भी चीन में चमगादड़ से फैला था और इसके बाद उसने अधिकांश देशों को अपनी खौफनाक गिरफ्त में ले लिया। अब अचानक देश में कौओं, बतखों, मुर्गों-मुर्गियों और अन्य पक्षियों के मरने का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उसने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की परेशानी बढ़ा दी है। इसे प्रकृति के संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रकृति का खुला संदेश यही है कि मानव जाति मांसाहार का परित्याग कर शाकाहारी जीवनचर्या अपनाए, यही उसके अपने व्यापक हित में है। कोरोना वायरस का खतरा अभी टला नहीं है। इसकी रोकथाम के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन कितनी कारगर होगी, यह समय के साथ पता चलेगा। इस रोग के जितने वैज्ञानिक और चिकित्सकीय अध्ययन सामने आए हैं। जितने रूप और प्रतिरूप सामने आए हैं, उससे आम आदमी भयभीत और भ्रमित ही हुआ है। इससे दुनिया के अधिकांश देश परेशान हैं। इससे संक्रमित होने वालों और मरने वालों का आंकड़ा भी काफी बड़ा है। ऐसे में जिस तरह बर्ड फ्लू ने भारत समेत कई देशों में दस्तक देना आरंभ कर किया है, उससे हर आम और खास का चिंतित होना स्वाभाविक है। कोविड-19 की तरह बर्ड फ्लू का वायरस भी 1996 में चीन से फैला था। चीन के सेंट्रल हुनान प्रांत से खबर आई है कि वहां अत्यंत घातक बर्ड फ्लू की वजह से फरवरी 2020 में 1800 मुर्गियों को मार दिया गया था। चीन ने एक सरकारी बयान में स्वीकार किया था कि श्याओयांग शहर के एक पोल्ट्री फार्म में बर्ड फ्लू के लक्षणों के संदेह में 4,500 से अधिक मुर्गियों को मार दिया गया है। यह वायरस भी नाक, मुंह या आंखों के जरिए ही फैलता है। 2003-2004 में फ्लू की वजह से लाखों मुर्गों और जलपक्षियों की मौत हो गई। वर्ष 2008 में जनवरी से मई तक बर्ड फ्लू का सबसे बड़ा प्रकोप पश्चिम बंगाल में हुआ था जिसमें 42 लाख 62 हजार पक्षियों को मारा गया था इसके लिए 1229 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया था। असम में वर्ष 2008 के नवम्बर-दिसम्बर में यह बीमारी 18 जगहों पर फैली थी जिसमें पांच लाख नौ हजार पक्षियों को मारा गया था और इसके लिए 1.7 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति दी गई थी। देश में अबतक 49 बार अलग-अलग राज्यों में 225 जगहों पर यह रोग अपना असर दिखा चुका है। मौजूदा बर्ड फ्लू की भयावहता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि अबतक हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और केरल में 84775 पक्षियों की मौत हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन उन देशों पर भी नजर गड़ाए हुए है जहां भारत से पहले बर्ड फ्लू ने अपना असर दिखाया था। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और केरल में तो पक्षियों में बुखार की पुष्टि भी हो चुकी है। हरियाणा और गुजरात में मरे पक्षियों के नमूनों की रिपोर्ट अभी आई नहीं है लेकिन पक्षियों के बुखार ने आम आदमी की पेशानियों पर बल ला दिया है। मध्य प्रदेश के इंदौर, मंदसौर, आगर, खरगोन,उज्जैन, देवास,नीमच और सीहोर में कौए मृत मिले हैं। इंदौर और मंदसौर की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। सरकार ने सभी जिलों को बर्ड फ्लू को लेकर अलर्ट कर दिया है। हिमाचल प्रदेश के पौंग डैम वेटलैंड में 2 हजार से अधिक पक्षियों की मौत बेहद चिंताजनक है। राजस्थान के 6 जिलों में अबतक 522 पक्षियों की मौत हुई है जिसमें 471 कौवे हैं। केरल में बर्ड फ्लू से 12 हजार पक्षियों की मौत हो चुकी है। अलप्पुझा और कोट्टायम जिलों में बर्ड फ्लू के मामलों की पुष्टि के बाद 50 हजार बतखों को मारने का आदेश दिया गया है। उक्त राज्यों में पक्षियों को मारे जाने का सिलसिला तेज हो गया है। हरियाणा के पंचकूला के बरवाला के रायपुर रानी क्षेत्र में पिछले दो दिन में दो फार्म में ही 70 हजार से ज्यादा मुर्गियों की मौत हुई है। फार्मों से लिए गए मृत मुर्गियों के सैंपल की जांच रिपोर्ट अबतक नहीं आई है। गुजरात के जूनागढ़ जिले के बांटवा गांव में 2 जनवरी को बतख-टिटहरी-बगुला समेत 53 पक्षी मृत पाए गए। इनकी जांच की जा रही है। 25 दिसंबर काे झालावाड़ में काैओं की माैत के बाद भाेपाल लैब की रिपाेर्ट में बर्ड फ्लू पाॅजिटिव हाेने के बाद अबतक 10 दिनाें में 250 से अधिक काैओं, कबूतरों, काेयलों, किंग फिशर और मेगपाई पक्षियाें की माैत हाे चुकी है। गौरतलब है कि भारत में वर्ष 2006 से 2015 तक 28 बार बर्ड फ्लू अपनी दहशत का साम्राज्य कायम कर चुका है। इससे देश के अलग-अलग राज्याें में 74.30 लाख पक्षियाें काे माैत हाे चुकी है। देशभर के चिड़ियाघर बर्ड फ्लू को देखते हुए सावधानी की मुद्रा में आ गए हैं। पिंजराें में दवा का छिड़काव किया जा रहा है। विजिटर्स ट्रैक पर लाल दवा का छिड़काव करवाया जा रहा है। इससे पूर्व कई चिड़ियाघर बंद कर दिए गए थे। दिल्ली का चिड़ियाघर तो वर्ष 2017 में 85 दिन तक बंद रहा था, इससे चिड़ियाघर को करोड़ों का नुकसान हुआ था। इसबार भी अगर देश में बर्ड फ्लू का प्रसार बढ़ता है तो चिड़ियाधारों की बंद करने की जरूरत होगी ताकि चिड़ियाघर के अन्य जानवर और पक्षी ही नहीं, वहां पहुंचने वाले लोगों को बर्ड फ्लू के संक्रमण से बचाया जा सके। परिंदे बार-बार बर्ड फ्लू की चपेट में क्यों आ रहे हैं, इसका व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कर इससे बचाव के उपाय किए जाने चाहिए। परिंदों को मार डालना ही समस्या का समाधान नहीं है। अगर बड़ी तादाद में परिंदे मार दिए जाएंगे तो संसार में जीव-जगत का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए पशु-पक्षियों को कैसे बचाएं, उनमें संक्रमण कैसे रोकें, चिंता इस बात की होनी चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 6 January 2021


bhopal, Corruption in the crematorium

ऋतुपर्ण दवे श्मशान में भी बेशर्म भ्रष्टाचार! सुनने में थोड़ा अजीब लगता है लेकिन हकीकत यही है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे जब श्मशान में मृतक की अंत्येष्टि के दौरान लोग धूप-पानी से बचने की खातिर बनी नई-नई गैलरी में खड़े हों, ठीक उसी समय भ्रष्टाचारियों की करतूत यमदूत बनकर आए और श्मशान में ही लोगों को मौत की नींद सुला जाए। ऐसा सिर्फ हमारे देश में भ्रष्टाचारियों पर सरपरस्ती के चलते ही हो सकता है और हुआ। देश में न जाने कितनी इससे मिलती-जुलती घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन गाजियाबाद के मुरादनगर के उखलारसी गाँव की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। लोग आए तो थे मृतक का अंतिम संस्कार करने लेकिन भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढ़कर एक-दो नहीं पूरे 27 लोगों ने जिस छत के नीचे बारिश से बचने का ठौर बना रखा था, वही भारी-भरकम छत मौत बन उनपर भरभरा कर गिर गयी। श्मशान में ही मौत का ताण्डव मच गया। हैरानी इस बात को लेकर और भी ज्यादा होती है कि ऐसी घटना उस महानगर में घटी जहाँ गगनचुंबी इमारतों की भरमार है। बड़े-बड़े निर्माण कार्यों में दक्षता की कमी नहीं है। उसी कंक्रीट के शहर में महज 20 फुट ऊंची तथा 70-80 फुट लंबी कंक्रीट की गैलरी बिना किसी आहट, सुगबुगाहट या संकेत के एकदम से भरभरा कर बैठ जाए और चारों तरफ चीख-पुकार, खून ही खून फैल जाए और बेसुध-बेजान लोगों के ढेर लग जाए। सच में उखलारसी गाँव के श्मशान में ऐसा ही हुआ। जानते है क्यों? क्योंकि यह एक सरकारी काम था जो ठेके पर बना था और ठेकेदार को भी क्वालिटी की परवाह नहीं थी, वजह साफ है भरपूर कमीशनबाजी का खेल था। लेकिन श्मशान में भी ऐसा खेल खेला जाएगा यह किसी को नहीं पता था! भ्रष्टाचार के अनगिनत किस्से-कहानियों में श्मशान में ऐसा पहली बार दिखा। पूरे देश में हर किसी की रुह काँप गई। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री भी द्रवित और दुखी हो गए। वाकई मुरादनगर की 3 जनवरी की घटना शायद देश के इतिहास की अबतक पहली अकेली घटना बन गयी जिसने बेईमानी की सारी सीमाओं को पार कर लोगों को हिलाकर रख दिया। यह नहीं पता था कि भ्रष्टाचार के सौदागर जलती चिता के सामने भी अपनी काली करतूतों को अंजाम देने से नहीं हिचकेंगे। ऐसा नहीं होता तो मुरादनगर की यह घटना कभी नहीं होती। उससे भी बढ़कर यह कि श्मशान में इस ठेके लिए भी राजनीतिक सिफारिशें हुईं, होड़ भी हुई अपनों को फायदा पहुँचाने का खेल भी हुआ। नतीजतन मौत का वो नंगा नाच हुआ कि एकबार यमराज भी थरथरा जाए। 60 साल पहले इन्दौर में एक पदयात्रा के दौरान सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे के मुँह से निकले शब्द आज भी न केवल प्रासंगिक हैं बल्कि गूँजते हुए से लगते हैं जिसमें उन्होंने पीड़ा भरे लहजे में कहा था आजकल भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। यकीनन उस महान संत का दर्द कहें या पीड़ा, 21 वीं सदी में भी भ्रष्टाचारी ही फलफूल रहे हैं। ऐसा ही कुछ 21 दिसम्बर 1963 को भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे पर संसद में हुई बहस में डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी कहा था कि सिंहासन और व्यापार के बीच का संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है। शायद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी भी ऐसा ही कुछ कहना चाहते थे। दिल्ली से चले एक रुपए में गरीब तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं, कहना उनकी बेबसी थी या गुस्सा पता नहीं। सच तो यह है कि देशभर में ऐसे कितने उदाहरण मिल जाएंगे जहाँ कागजों में तालाब बन जाते हैं, विभिन्न योजनाओं में कुएं खुद जाते हैं। उद्घाटन से पहले पुल ढह जाते हैं। बनते ही सड़कें नेस्तनाबूद हो जाती हैं। हो-हल्ला होने पर जाँच की घोषणा हो जाती है लेकिन रिपोर्ट कब और क्या आती है, किसी को कानोंकान खबर नहीं होती। भ्रष्टाचार के आरोपी फलते-फूलते रहते हैं। भ्रष्टाचार रुके कैसे? एक ओर तेजी से डिजिटलाइजेशन, वहीं दूसरी ओर बढ़ता भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और दलाली की प्रवृत्ति। वह भी जब सीधे खातों में योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा हो। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर-एशिया सर्वे 2020 यही कुछ कह रहा है। इसमें भारत को एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बताया गया, जहाँ रिश्वतखोरी जमकर होती है। रिपोर्ट कहती है कि 39 प्रतिशत लोगों को उनके हक की और स्वीकृत सुविधाओं को पाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। जिसका चलन डिजिटल दौर में बजाए घटने के बढ़ता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इससे बुरी बात और क्या हो सकती है? कहीं न कहीं यह हमारे सिस्टम की नाकामी है। दोष किसका है किसका नहीं, यह लंबी और तर्क-कुतर्क भरी बहस का विषय है। यूँ तो देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कई तरह के कानून और एजेंसियाँ हैं। लंबा-चौड़ा अमला भी है। एक से एक आदर्श वाक्य और सूत्र भी हैं। लेकिन सच यह है कि भ्रष्टाचार सुरसा-सा मुँह फाड़े चला जा रहा है। देश में चाहे निर्माण सेक्टर हो या औद्योगिक गतिविधियाँ, टैक्स चोरी रोकना हो या उत्खनन, चिकित्सा, शिक्षा, बैंकिंग, परिवहन या फिल्म उद्योग यानी देश में हर कहीं हर सरकारी दफ्तर में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरे तक पैठ जमा चुकी हैं। ठेका हो या कोई अनुमति, निर्माण हो या जल, जंगल, जमीन का मसला हर कहीं भ्रष्टाचार का बेशर्म चेहरा दिख जाता है। जेब गरम होते ही सारे रुके काम आसानी से हो जाते हैं, भले ही रास्ता डिजिटल मोड में क्यों न हो। ऐसे में सवाल यही कि कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार? निश्चित रूप से देश को दुनिया के मुकाबले शीर्ष पर ले जाने का सपना संजोए हमारे प्रधानमंत्री भी इसपर बेहद गंभीर होंगे लेकिन रास्ता कैसा होगा, तय नहीं हो पा रहा होगा। काश वन नेशन वन राशनकार्ड की तर्ज पर एक ऐसा वन नेशन वन इंफर्मेशन पोर्टल बने जिसमें तमाम देश यानी केन्द्र और प्रदेशों के हर कार्यों जैसा ठेका, इजाजत, स्थानान्तरण, सरकारी गतिविधियों संबंधी सूचना की एक-एक जानकारी की फीडिंग तो की जा सके लेकिन इस पोर्टल की सारी जानकारियाँ केवल प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री ही देख सकें। उनकी बेहद विश्वस्त लोगों की एक टीम हो जो अचानक किसी भी काम की जाँच के लिए न केवल स्वतंत्र हो बल्कि एनएसए जैसे सख्त कानूनों से लैस हो। दोषी होने पर जल्द जमानत या सुनवाई का प्रावधान भी न हो और सीधे जेल की काल कोठरी का रास्ता हो। शायद यही डर और गतिविधि से पंचायत से लेकर महापालिकाओं और सरपंच के दफ्तर से लेकर कमिश्नरी और सचिवालय तक में भ्रष्टाचार को लेकर भय का माहौल बनेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 6 January 2021


bhopal,Roof collapses and respect too  Community-verified icon

डॉ. वेदप्रताप वैदिक गाजियाबाद के मुरादनगर श्मशान घाट में छत गिरने से 25 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई और लगभग सौ लोग बुरी तरह से घायल हो गए। यह छत कोई 100-150 साल पुरानी नहीं थी। यह अंग्रेजों की बनाई हुई नहीं थी। इसे बने हुए अभी सिर्फ दो महीने हुए थे। यह नई छत थी, कोई पुराना पुल नहीं, जिस पर बहुत भारी टैंक चले हों और जिनके कारण वह बैठ गई हो। इतने लोगों का मरना, एक साथ मरना और श्मशान घाट में मरना मेरी याद में यह ऐसी पहली दुर्घटना है। सारी दुनिया में शवों को श्मशान या कब्रिस्तान ले जाया जाता है लेकिन मुरादनगर के श्मशान से ये शव घर लाए गए। सारी दुर्घटना कितनी रोंगटे खड़े करनेवाली थी, इसका अंदाज हमारे टीवी चैनलों और अखबारों से लगाया जा सकता है। जिस व्यक्ति की अंत्येष्टि के लिए लोग श्मशान में जुटे थे, उसका पुत्र भी दब गया। उसके कई रिश्तेदार और मित्र, जो उसके अंतिम संस्कार के लिए वहां गए थे, उन्हें क्या पता था कि उनके भी अंतिम संस्कार की तैयारी हो गई है। जो लोग दिवंगत नहीं हुए, उनके सिर फूट गए, हाथ-पांव टूट गए और यों कहें तो ठीक रहेगा कि वे अब जीते जी भी मरते ही रहेंगे। मृतकों को उत्तर प्रदेश की सरकार ने दो-दो लाख रु. की राशि दी है। किसी परिवार का कमाऊ मुखिया चला जाए तो क्या उसका गुजारा एक हजार रु. महीने में हो जाएगा? दो लाख रु. का ब्याज उस परिवार को कितना मिलेगा? सरकार को चाहिए कि हर परिवार को कम से कम एक-एक करोड़ रु. दे। श्मशान-घाट की वह छत मुरादनगर की नगर निगम ने बनवाई थी। सरकारी पैसे से बनी 55 लाख रु. की यह छत दो माह में ही ढह गई। इस छत के साथ-साथ हमारे नेताओं और अफसरों की इज्जत भी क्या पैंदे में नहीं बैठ गई? छत बनानेवाले ठेकेदार, इंजीनियर तथा जिम्मेदार नेता को कम से कम दस-दस साल की सजा हो, उनकी निजी संपत्तियां जब्त की जाएं, उनसे इस्तीफे लिए जाएं, उनकी भविष्य निधि और पेंशन रोक ली जाए। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 4 January 2021


bhopal,Announcement , free vaccination ,means attention, everyone

सियाराम पांडेय 'शांत' केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि भारत के सभी नागरिकों को कोविड-19 का टीका मुफ्त लगाया जाएगा। कोरोना के चलते लोगों को लंबे समय तक लॉकडाउन में रहना पड़ा। इस नाते अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई। लोग परेशान थे कि कोरोना का टीका न जाने कितना महंगा होगा। घर के हर सदस्य को टीका लगवाना सबके लिए मुमकिन भी नहीं था। ऐसे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की इस घोषणा से लोगों को बहुत राहत मिली है। कोरोना का टीका कब से लगेगा, यह तय नहीं हुआ है लेकिन भारत के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में कोविड-19 के टीकाकरण का पूर्वाभ्यास हो रहा है।  इसके लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया है। वैक्सीन को निर्धारित तापमान में रखने के लिए देशभर में कोल्ड चेन की व्यवस्था की गई है। एक भी कोरोना वैक्सीन खराब न हो, इसका ध्यान दिया जा रहा है। इन तैयारियों से पता चलता है कि केंद्र सरकार इस भयानक बीमारी से निपटने को लेकर कितनी गंभीर है? देश में लॉकडाउन लगाने से लेकर लोगों को जागरूक करने तक के उपक्रम में सरकार के नुमाइंदों और यहां तक कि भाजपा के हर कार्यकर्ता को मैदान में उतार दिया गया है। कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार गिरावट, कोरोना से स्वस्थ होने वाले लोगों की लगातार बढ़ती संख्या और कोरोना के सक्रिय मामलों में आई उल्लेखनीय कमी एक स्वस्थ संकेत है लेकिन इसपर बहुत उत्साहित होने की नहीं, बल्कि संक्रमण को समाप्त करने को लेकर बेहद गंभीर होने की जरूरत है। इसमें शक नहीं कि भारत का निर्यात पिछले तीन माह में काफी घटा है और उसकी अर्थव्यवस्था में भी काफी गिरावट आई। इसके बाद भी सरकार अगर कोरोना का टीका सबको मुफ्त लगाने की बात कर रही है और वह भी तब जब अपने देश के लोगों की सुरक्षा के लिहाज से वह रूस और अमेरिका से वैक्सीन खरीद रही है, तो यह केंद्र सरकार की संवेदनशीलता नहीं तो और क्या है? सरकार को लगता है कि देश स्वस्थ रहेगा तो अर्थव्यवस्था अपने आप ठीक हो जाएगी। नीतिकारों ने तो यहां तक कहा है कि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। सरकार इस धन को अगर बचा रही है तो इसे सबसे बड़ी नेमत माना जाना चाहिए। विपक्ष सरकार की इस भावना की तारीफ करने की बजाय उसपर निशाना साधने को ही अपना धर्म समझ रहा है। उसे सोचना होगा कि सरकार किसी को कोरोना से डरा नहीं रही बल्कि जन-जन को संक्रमण से बचने के प्रति सचेत कर रही है। इस देश में पहले भी ढेर सारे टीकाकरण अभियान चल चुके हैं। शुरुआती दौर में उसे लेकर तमाम भ्रांतियां भी फैलाई गईं लेकिन जनता ने देर-सबेर उसे अपनाया। इसका लाभ हमारे सामने हैं। देश चेचक, पोलियो जैसी बीमारियों के प्रभाव से लगभग मुक्त हो चुका है। इसमें संदेह नहीं कि कोरोना को लेकर पूरा देश परेशान है। पूरी दुनिया परेशान है। दुनिया के 191 देशों में 8.39 करोड़ लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 18.27 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। कौन कब इस संघातक बीमारी की चपेट में आ जाए, कहा नहीं जा सकता। हर आदमी डरा-सहमा सा है और इसका असर रिश्तों पर भी पड़ा है। सामाजिक दूरी बनाते-बनाते इंसान कब और कितना अपनों से दूर हो गया है, यह बता पाना उसके लिए भी मुमकिन नहीं है। कोरोना के भय से लोग अभिवादन पर उतर आए हैं। पाश्चात्य देशों में भी लोग हाथ जोड़कर अभिवादन करने को सुरक्षा के लिहाज से मुफीद समझते हैं। कोविड-19 से निपटने के लिए दुनिया भर में टीकाकरण की तैयारियां तेज हो गई हैं। कई देशों में तो टीकाकरण अभियान का आगाज भी हो चुका है। वैक्सीन के फॉर्मूले चुराने से लेकर उसकी कालाबाजारी की मंशा पाले लोग भी सक्रिय हो गए हैं। पहले चरण में एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मी और दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर्स को कोविड-19 का टीका लगाया जाना है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राई रन शुरू करना एक बड़ा अभियान है। इससे पहले देश के चार राज्यों के दो-दो जिलों में वैक्सीनेशन टीकाकरण की तैयारियों का जायजा लेने के लिए पूर्वाभ्यास किया गया था। पूर्वाभ्यास के दौरान यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि टीकाकरण के लिए लोगों का ऑनलाइन पंजीकरण, डाटा एंट्री,लोगों के मोबाइल पर मैसेज भेजने और टीका लगने के बाद इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र जारी करने में कोई परेशानी तो नहीं आ रही है। जो लोग धार्मिक आधार पर कोविड-19 के टीके के विरोध कर रहे हैं। अपने धर्मगुरुओं की अपील को भी नजरंदाज कर रहे हैं, उन्हें सोचना होगा कि जीवित व्यक्ति का ही धर्म होता है। जिंदा रहने के लिए स्वस्थ रहना जरूरी है। यह बात जबतक समझी नहीं जाएगी तबतक वास्तविकता को जान पाना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। अपने को सर्वशक्तिमान समझने वाले अमेरिका में कोरोना से सर्वाधिक 2.01 करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं जिसमें 3,47,787 लोग कालकवलित हो गए हैं। कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा वहां निरंतर बढ़ ही रहा है। अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में सर्वाधिक 23 लाख लोग संक्रमित हुए हैं जबकि टेक्सास में 17.7 लाख, फ्लोरिडा में 13.2 लाख, न्यूयाॅर्क में 979,000 और इलिनॉयस में 963,000 लोग संक्रमित हुए हैं। ब्रिटेन में कोरोना का नया स्ट्रेन मिलने के बाद दुनिया के तमाम देशों ने वहां अपने विमानों की आवाजाही रोक दिए हैं। ब्राजील में कोरोना संक्रमितों की संख्या 77 लाख से ज्यादा हो गयी है जबकि इस महामारी से वहां 1,95,411 मरीजों की मौत हो चुकी है। रूस में 31.54 लोग कोरोना संक्रमित हैं, वहां इस बीमारी से 56,798 लोगों की मौत हुई है। फ्रांस में 26.97 लाख से ज्यादा लोग इस वायरस से प्रभावित हुए हैं और 64,892 मरीजों की मौत हाे चुकी है। ब्रिटेन में 25.49 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं और 74,237 लोगों की मौत हुई है। तुर्की में 21,093, इटली में 74,621,स्पेन में 50,837 ,जर्मनी में 33,885,कोलंबिया में 43,495 लोगों ने कोरोना से अपनी जान गंवाई है। अर्जेंटीना में 43,319,मेक्सिको में 1,26,507, पोलैंड में 28,956,ईरान में 55,337, यूक्रेन में 19,437,दक्षिण अफ्रीका में 28,887,पेरू में 37,680, नीदरलैंड में 11,624 ,इंडोनेशिया में 22,329 लोगों की जान कोरोना ने ली है। इतना सब जानने के बाद भी अगर हम भारतवासी कोरोना को सामान्य बीमारी मानने की भूल करें, केंद्र सरकार पर अपनी कमियों को छिपाने का बहाना बनाने के आरोप लगाएं तो इससे अधिक विडंबना और क्या हो सकती है? यह समय आरोप और संशय से परे जाकर कोरोना से लड़ने का है। यह समय देश के चिकित्सकों की सलाह मानने और खुद को सुरक्षित रखने का है, अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का है। बेहतर होता कि इस देश का हर इंसान जाति-धर्म से ऊपर उठकर खुद को कोरोना से मकड़जाल से बचाने का प्रयास करता। खुद टीके लगवाता और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करता। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 4 January 2021


bhopal,Being healthy is also a lifetime

हृदयनारायण दीक्षित चिकित्सा विज्ञान ने विस्मयकारी उन्नति की है। हृदय, गुर्दा जैसे संवेदनशील अंगों की शल्यक्रिया आश्चर्यजनक है। सामान्य बीमारियों के साथ ही गंभीर बीमारियों के उपचार भी आसान हो गए हैं। लेकिन अभी रोग रहित मानवता का स्वप्न दूर है। रोगों की दवाएं हैं। प्रश्न है कि क्या कभी रोगों का होना ही रोका जा सकता है। पूर्वज अमृत की कल्पना करते रहे हैं। रोगों के आगमन पर ताला डालने की इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकट की है। उपाय अनेक हैं। उन्होंने स्वच्छता को शीर्ष महत्व दिया। अभियान चले। योग निरोग बनाने का मार्ग है। प्रधानमंत्री ने योग को लोकप्रिय बनाया। अब फिट इण्डिया अभियान की बारी है। इस अभियान का सर्वत्र स्वागत हो रहा है। स्वास्थ्य सहज अभिलाषा है। सभी प्राणी स्वस्थ रहना चाहते हैं। इस संसार के सभी सुख और आनंद सुंदर स्वास्थ्य द्वारा ही उपलब्ध होते हैं। रोगी को जीवन के सुखों में हिस्सा नहीं मिलता है। स्वस्थ होना भी जीवनमूल्य है। भारतीय चिंतन में स्वस्थ शरीर की चिंता प्राथमिकता रही है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में सुंदर स्वास्थ्य की जीवन शैली है। यहां पूरी दिनचर्या स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। ऋग्वेद में अनेक मंत्रों में स्वस्थ और दीर्घ जीवन की अभिलाषा है। ऋषि कवि सौ बरस का जीवन चाहते हैं, लेकिन प्रार्थना करते हैं कि वह सौ साल तक शरीर से भी स्वस्थ्य रहें। 100 साल तक सूर्य दर्शन करें। सतत् कर्म करें। सभी दायित्वों का निर्वहन करें और इसके लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय राष्ट्र जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। शरीर को धर्मसाधना का उपकरण बताया गया है। अर्थ की प्राप्ति भी रुग्ण शरीर द्वारा संभव नहीं है। किसी भी कामना की पूर्ति के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए। मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति के लिए भी इसी संसार में कर्म, तप किए जाते हैं। कर्म व तप स्वस्थ शरीर से ही संभव हैं। भक्ति, योग, तप और जप स्वस्थ शरीर के बिना नहीं हो सकते है। कठोपनिषद् में स्पष्ट रूप में कहा गया है कि “बलहीन को आत्मज्ञान नहीं मिलता है। आत्मज्ञान के लिए भी स्वस्थ्य शरीर की आवश्यकता होती है।” आत्मज्ञान ही नहीं सामान्य संसारी ज्ञान की प्राप्ति भी स्वस्थ शरीर से ही होती है। स्वस्थ व्यक्ति जल्दी सिखाता है, जल्दी सीखता है। वस्तुतः रोग मुक्ति स्वास्थ्य नहीं है। रोगों का न होना और स्वस्थ होना अलग-अलग बाते हैं। स्वस्थ का अर्थ है स्वयं में होना। जैसे गृहस्थ का अर्थ है घर से सम्बन्धित होना। संन्यस्थ का अर्थ है संन्यास से जुड़े होना। वैसे ही स्वस्थ का अर्थ है स्वयं से सम्बन्धित होना। स्वास्थ्य प्रकृति है। रोग विकृति है। स्वस्थ होना प्रकृति के अनंतसंगीत में होना है। हमारे पूर्वजों ने प्राचीनकाल से ही स्वस्थ रहने के विषय पर गंभीर चिंतन किया था। अथर्ववेद में भरापूरा स्वास्थ्य विज्ञान है। सहस्त्रों औषधियों के उल्लेख के साथ योग के भी संकेत हैं। योग भारत का प्राचीन विज्ञान है। पतंजलि ने ईशा के लगभग दो सौ वर्ष पहले योग सूत्रों की रचना की थी। योग प्रत्येक तरह से स्वस्थ रहने का विज्ञान है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में योग को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है। योग विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है। यह केवल शारीरिक रोग ही नहीं दूर करता। मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अंतःकरण को भी स्वस्थ रखता है। विश्व मानवता का आकर्षण योग की तरफ लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने भी योग को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। योग के लाभ सर्वविदित व सर्वपरिचित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण भी स्वास्थ्य का आधार है। वायु और जल प्रदूषण से तमाम बीमारियाँ बढ़ी हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान में इन बीमारियों की भी चर्चा है। चरकसंहिता में कहा गया है कि जब रोग बढ़ने लगे तो समाज चेता, विद्वानों ने बैठक की और गहन चिंतन जारी रहा। इसके साथ ही आयुर्विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्वेद आयु का ही वेद है। सम्प्रति भारत सरकार व राज्यों के राजकोष से बीमारियों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च होता है। भारतीय आयुर्विज्ञान में रोग न होने देने के तमाम उपाय हैं। आज रोग निरोधक शक्ति की भी बहुत चर्चा है। यह शक्ति मनुष्य के शरीर में होती ही है। जीवनचर्या के अव्यवस्थित होने से रोग निरोधक शक्ति घटती है। आयुर्वेद में अनेक औषधियाँ हैं। ये रोग निरोधक शक्ति बढ़ाती हैं। स्वस्थ शरीर में वैसे भी प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता होती है। भारतीय दिनचर्या प्राचीनकाल से स्वास्थ्य का स्वभाविक संधान रही है। प्रातः उठना, स्नान करना, कुछ खाना, काम करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। इसी दिनचर्या में स्वस्थ जीवन के स्वर्ण सूत्र हैं। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति और अन्य प्रभावों के कारण दिनचर्या और सभ्यता में परिवर्तन आए हैं। सभ्यता के परिवर्तन के कारण दिनचर्या उलट-पलट गयी है। इससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ा है। प्राचीन ऋषि सजग थे। केनोपनिषद् के शांति पाठ में प्रार्थना करते हैं कि ‘‘मेरे सभी अंग वाणी, प्राण और आँख, कान स्वस्थ रहें। इन्द्रियाँ स्वस्थ रहें और शरीर में बल भी रहे।‘‘ इसी प्रकार ऋग्वेद के मंत्र में कहते हैं कि हमारे कान ठीक से सुनें, हमारी आँख ठीक से देखें। हमारे शरीर के सभी अंग सुदृढ़ व मजबूत रहें। हमारी आयु दीर्घ हो। स्वस्थ रहें। प्रधानमंत्री ने फिट इण्डिया का नारा दिया है। सबके स्वास्थ्य से भारत शक्तिशाली होगा। स्वस्थ भारत ही आत्मनिर्भर भारत होगा। स्वस्थ भारत अजेय भारत होगा। स्वास्थ्य प्राप्ति के अनेक उपाय हैं। व्यायाम और खेलकूद भी स्वस्थ भारत के विकास में सहायक है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य के लिए भी चिंतित रहना चाहिए। हम सब अन्य कामों की चिंता ज्यादा करते हैं। स्वस्थ्य रहना स्वयं की चिंता है। स्वयं की चिंता से राष्ट्रीय स्वास्थ्य का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 3 January 2021


bhopal,Being healthy is also a lifetime

हृदयनारायण दीक्षित चिकित्सा विज्ञान ने विस्मयकारी उन्नति की है। हृदय, गुर्दा जैसे संवेदनशील अंगों की शल्यक्रिया आश्चर्यजनक है। सामान्य बीमारियों के साथ ही गंभीर बीमारियों के उपचार भी आसान हो गए हैं। लेकिन अभी रोग रहित मानवता का स्वप्न दूर है। रोगों की दवाएं हैं। प्रश्न है कि क्या कभी रोगों का होना ही रोका जा सकता है। पूर्वज अमृत की कल्पना करते रहे हैं। रोगों के आगमन पर ताला डालने की इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकट की है। उपाय अनेक हैं। उन्होंने स्वच्छता को शीर्ष महत्व दिया। अभियान चले। योग निरोग बनाने का मार्ग है। प्रधानमंत्री ने योग को लोकप्रिय बनाया। अब फिट इण्डिया अभियान की बारी है। इस अभियान का सर्वत्र स्वागत हो रहा है। स्वास्थ्य सहज अभिलाषा है। सभी प्राणी स्वस्थ रहना चाहते हैं। इस संसार के सभी सुख और आनंद सुंदर स्वास्थ्य द्वारा ही उपलब्ध होते हैं। रोगी को जीवन के सुखों में हिस्सा नहीं मिलता है। स्वस्थ होना भी जीवनमूल्य है। भारतीय चिंतन में स्वस्थ शरीर की चिंता प्राथमिकता रही है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में सुंदर स्वास्थ्य की जीवन शैली है। यहां पूरी दिनचर्या स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। ऋग्वेद में अनेक मंत्रों में स्वस्थ और दीर्घ जीवन की अभिलाषा है। ऋषि कवि सौ बरस का जीवन चाहते हैं, लेकिन प्रार्थना करते हैं कि वह सौ साल तक शरीर से भी स्वस्थ्य रहें। 100 साल तक सूर्य दर्शन करें। सतत् कर्म करें। सभी दायित्वों का निर्वहन करें और इसके लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय राष्ट्र जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। शरीर को धर्मसाधना का उपकरण बताया गया है। अर्थ की प्राप्ति भी रुग्ण शरीर द्वारा संभव नहीं है। किसी भी कामना की पूर्ति के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए। मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति के लिए भी इसी संसार में कर्म, तप किए जाते हैं। कर्म व तप स्वस्थ शरीर से ही संभव हैं। भक्ति, योग, तप और जप स्वस्थ शरीर के बिना नहीं हो सकते है। कठोपनिषद् में स्पष्ट रूप में कहा गया है कि “बलहीन को आत्मज्ञान नहीं मिलता है। आत्मज्ञान के लिए भी स्वस्थ्य शरीर की आवश्यकता होती है।” आत्मज्ञान ही नहीं सामान्य संसारी ज्ञान की प्राप्ति भी स्वस्थ शरीर से ही होती है। स्वस्थ व्यक्ति जल्दी सिखाता है, जल्दी सीखता है। वस्तुतः रोग मुक्ति स्वास्थ्य नहीं है। रोगों का न होना और स्वस्थ होना अलग-अलग बाते हैं। स्वस्थ का अर्थ है स्वयं में होना। जैसे गृहस्थ का अर्थ है घर से सम्बन्धित होना। संन्यस्थ का अर्थ है संन्यास से जुड़े होना। वैसे ही स्वस्थ का अर्थ है स्वयं से सम्बन्धित होना। स्वास्थ्य प्रकृति है। रोग विकृति है। स्वस्थ होना प्रकृति के अनंतसंगीत में होना है। हमारे पूर्वजों ने प्राचीनकाल से ही स्वस्थ रहने के विषय पर गंभीर चिंतन किया था। अथर्ववेद में भरापूरा स्वास्थ्य विज्ञान है। सहस्त्रों औषधियों के उल्लेख के साथ योग के भी संकेत हैं। योग भारत का प्राचीन विज्ञान है। पतंजलि ने ईशा के लगभग दो सौ वर्ष पहले योग सूत्रों की रचना की थी। योग प्रत्येक तरह से स्वस्थ रहने का विज्ञान है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में योग को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है। योग विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है। यह केवल शारीरिक रोग ही नहीं दूर करता। मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अंतःकरण को भी स्वस्थ रखता है। विश्व मानवता का आकर्षण योग की तरफ लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने भी योग को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। योग के लाभ सर्वविदित व सर्वपरिचित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण भी स्वास्थ्य का आधार है। वायु और जल प्रदूषण से तमाम बीमारियाँ बढ़ी हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान में इन बीमारियों की भी चर्चा है। चरकसंहिता में कहा गया है कि जब रोग बढ़ने लगे तो समाज चेता, विद्वानों ने बैठक की और गहन चिंतन जारी रहा। इसके साथ ही आयुर्विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्वेद आयु का ही वेद है। सम्प्रति भारत सरकार व राज्यों के राजकोष से बीमारियों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च होता है। भारतीय आयुर्विज्ञान में रोग न होने देने के तमाम उपाय हैं। आज रोग निरोधक शक्ति की भी बहुत चर्चा है। यह शक्ति मनुष्य के शरीर में होती ही है। जीवनचर्या के अव्यवस्थित होने से रोग निरोधक शक्ति घटती है। आयुर्वेद में अनेक औषधियाँ हैं। ये रोग निरोधक शक्ति बढ़ाती हैं। स्वस्थ शरीर में वैसे भी प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता होती है। भारतीय दिनचर्या प्राचीनकाल से स्वास्थ्य का स्वभाविक संधान रही है। प्रातः उठना, स्नान करना, कुछ खाना, काम करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। इसी दिनचर्या में स्वस्थ जीवन के स्वर्ण सूत्र हैं। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति और अन्य प्रभावों के कारण दिनचर्या और सभ्यता में परिवर्तन आए हैं। सभ्यता के परिवर्तन के कारण दिनचर्या उलट-पलट गयी है। इससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ा है। प्राचीन ऋषि सजग थे। केनोपनिषद् के शांति पाठ में प्रार्थना करते हैं कि ‘‘मेरे सभी अंग वाणी, प्राण और आँख, कान स्वस्थ रहें। इन्द्रियाँ स्वस्थ रहें और शरीर में बल भी रहे।‘‘ इसी प्रकार ऋग्वेद के मंत्र में कहते हैं कि हमारे कान ठीक से सुनें, हमारी आँख ठीक से देखें। हमारे शरीर के सभी अंग सुदृढ़ व मजबूत रहें। हमारी आयु दीर्घ हो। स्वस्थ रहें। प्रधानमंत्री ने फिट इण्डिया का नारा दिया है। सबके स्वास्थ्य से भारत शक्तिशाली होगा। स्वस्थ भारत ही आत्मनिर्भर भारत होगा। स्वस्थ भारत अजेय भारत होगा। स्वास्थ्य प्राप्ति के अनेक उपाय हैं। व्यायाम और खेलकूद भी स्वस्थ भारत के विकास में सहायक है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य के लिए भी चिंतित रहना चाहिए। हम सब अन्य कामों की चिंता ज्यादा करते हैं। स्वस्थ्य रहना स्वयं की चिंता है। स्वयं की चिंता से राष्ट्रीय स्वास्थ्य का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 3 January 2021


bhopal,Being healthy is also a lifetime

हृदयनारायण दीक्षित चिकित्सा विज्ञान ने विस्मयकारी उन्नति की है। हृदय, गुर्दा जैसे संवेदनशील अंगों की शल्यक्रिया आश्चर्यजनक है। सामान्य बीमारियों के साथ ही गंभीर बीमारियों के उपचार भी आसान हो गए हैं। लेकिन अभी रोग रहित मानवता का स्वप्न दूर है। रोगों की दवाएं हैं। प्रश्न है कि क्या कभी रोगों का होना ही रोका जा सकता है। पूर्वज अमृत की कल्पना करते रहे हैं। रोगों के आगमन पर ताला डालने की इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकट की है। उपाय अनेक हैं। उन्होंने स्वच्छता को शीर्ष महत्व दिया। अभियान चले। योग निरोग बनाने का मार्ग है। प्रधानमंत्री ने योग को लोकप्रिय बनाया। अब फिट इण्डिया अभियान की बारी है। इस अभियान का सर्वत्र स्वागत हो रहा है। स्वास्थ्य सहज अभिलाषा है। सभी प्राणी स्वस्थ रहना चाहते हैं। इस संसार के सभी सुख और आनंद सुंदर स्वास्थ्य द्वारा ही उपलब्ध होते हैं। रोगी को जीवन के सुखों में हिस्सा नहीं मिलता है। स्वस्थ होना भी जीवनमूल्य है। भारतीय चिंतन में स्वस्थ शरीर की चिंता प्राथमिकता रही है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में सुंदर स्वास्थ्य की जीवन शैली है। यहां पूरी दिनचर्या स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। ऋग्वेद में अनेक मंत्रों में स्वस्थ और दीर्घ जीवन की अभिलाषा है। ऋषि कवि सौ बरस का जीवन चाहते हैं, लेकिन प्रार्थना करते हैं कि वह सौ साल तक शरीर से भी स्वस्थ्य रहें। 100 साल तक सूर्य दर्शन करें। सतत् कर्म करें। सभी दायित्वों का निर्वहन करें और इसके लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय राष्ट्र जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। शरीर को धर्मसाधना का उपकरण बताया गया है। अर्थ की प्राप्ति भी रुग्ण शरीर द्वारा संभव नहीं है। किसी भी कामना की पूर्ति के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए। मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति के लिए भी इसी संसार में कर्म, तप किए जाते हैं। कर्म व तप स्वस्थ शरीर से ही संभव हैं। भक्ति, योग, तप और जप स्वस्थ शरीर के बिना नहीं हो सकते है। कठोपनिषद् में स्पष्ट रूप में कहा गया है कि “बलहीन को आत्मज्ञान नहीं मिलता है। आत्मज्ञान के लिए भी स्वस्थ्य शरीर की आवश्यकता होती है।” आत्मज्ञान ही नहीं सामान्य संसारी ज्ञान की प्राप्ति भी स्वस्थ शरीर से ही होती है। स्वस्थ व्यक्ति जल्दी सिखाता है, जल्दी सीखता है। वस्तुतः रोग मुक्ति स्वास्थ्य नहीं है। रोगों का न होना और स्वस्थ होना अलग-अलग बाते हैं। स्वस्थ का अर्थ है स्वयं में होना। जैसे गृहस्थ का अर्थ है घर से सम्बन्धित होना। संन्यस्थ का अर्थ है संन्यास से जुड़े होना। वैसे ही स्वस्थ का अर्थ है स्वयं से सम्बन्धित होना। स्वास्थ्य प्रकृति है। रोग विकृति है। स्वस्थ होना प्रकृति के अनंतसंगीत में होना है। हमारे पूर्वजों ने प्राचीनकाल से ही स्वस्थ रहने के विषय पर गंभीर चिंतन किया था। अथर्ववेद में भरापूरा स्वास्थ्य विज्ञान है। सहस्त्रों औषधियों के उल्लेख के साथ योग के भी संकेत हैं। योग भारत का प्राचीन विज्ञान है। पतंजलि ने ईशा के लगभग दो सौ वर्ष पहले योग सूत्रों की रचना की थी। योग प्रत्येक तरह से स्वस्थ रहने का विज्ञान है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में योग को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है। योग विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है। यह केवल शारीरिक रोग ही नहीं दूर करता। मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अंतःकरण को भी स्वस्थ रखता है। विश्व मानवता का आकर्षण योग की तरफ लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने भी योग को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। योग के लाभ सर्वविदित व सर्वपरिचित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण भी स्वास्थ्य का आधार है। वायु और जल प्रदूषण से तमाम बीमारियाँ बढ़ी हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान में इन बीमारियों की भी चर्चा है। चरकसंहिता में कहा गया है कि जब रोग बढ़ने लगे तो समाज चेता, विद्वानों ने बैठक की और गहन चिंतन जारी रहा। इसके साथ ही आयुर्विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्वेद आयु का ही वेद है। सम्प्रति भारत सरकार व राज्यों के राजकोष से बीमारियों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च होता है। भारतीय आयुर्विज्ञान में रोग न होने देने के तमाम उपाय हैं। आज रोग निरोधक शक्ति की भी बहुत चर्चा है। यह शक्ति मनुष्य के शरीर में होती ही है। जीवनचर्या के अव्यवस्थित होने से रोग निरोधक शक्ति घटती है। आयुर्वेद में अनेक औषधियाँ हैं। ये रोग निरोधक शक्ति बढ़ाती हैं। स्वस्थ शरीर में वैसे भी प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता होती है। भारतीय दिनचर्या प्राचीनकाल से स्वास्थ्य का स्वभाविक संधान रही है। प्रातः उठना, स्नान करना, कुछ खाना, काम करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। इसी दिनचर्या में स्वस्थ जीवन के स्वर्ण सूत्र हैं। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति और अन्य प्रभावों के कारण दिनचर्या और सभ्यता में परिवर्तन आए हैं। सभ्यता के परिवर्तन के कारण दिनचर्या उलट-पलट गयी है। इससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ा है। प्राचीन ऋषि सजग थे। केनोपनिषद् के शांति पाठ में प्रार्थना करते हैं कि ‘‘मेरे सभी अंग वाणी, प्राण और आँख, कान स्वस्थ रहें। इन्द्रियाँ स्वस्थ रहें और शरीर में बल भी रहे।‘‘ इसी प्रकार ऋग्वेद के मंत्र में कहते हैं कि हमारे कान ठीक से सुनें, हमारी आँख ठीक से देखें। हमारे शरीर के सभी अंग सुदृढ़ व मजबूत रहें। हमारी आयु दीर्घ हो। स्वस्थ रहें। प्रधानमंत्री ने फिट इण्डिया का नारा दिया है। सबके स्वास्थ्य से भारत शक्तिशाली होगा। स्वस्थ भारत ही आत्मनिर्भर भारत होगा। स्वस्थ भारत अजेय भारत होगा। स्वास्थ्य प्राप्ति के अनेक उपाय हैं। व्यायाम और खेलकूद भी स्वस्थ भारत के विकास में सहायक है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य के लिए भी चिंतित रहना चाहिए। हम सब अन्य कामों की चिंता ज्यादा करते हैं। स्वस्थ्य रहना स्वयं की चिंता है। स्वयं की चिंता से राष्ट्रीय स्वास्थ्य का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 3 January 2021


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हृदयनारायण दीक्षित चिकित्सा विज्ञान ने विस्मयकारी उन्नति की है। हृदय, गुर्दा जैसे संवेदनशील अंगों की शल्यक्रिया आश्चर्यजनक है। सामान्य बीमारियों के साथ ही गंभीर बीमारियों के उपचार भी आसान हो गए हैं। लेकिन अभी रोग रहित मानवता का स्वप्न दूर है। रोगों की दवाएं हैं। प्रश्न है कि क्या कभी रोगों का होना ही रोका जा सकता है। पूर्वज अमृत की कल्पना करते रहे हैं। रोगों के आगमन पर ताला डालने की इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकट की है। उपाय अनेक हैं। उन्होंने स्वच्छता को शीर्ष महत्व दिया। अभियान चले। योग निरोग बनाने का मार्ग है। प्रधानमंत्री ने योग को लोकप्रिय बनाया। अब फिट इण्डिया अभियान की बारी है। इस अभियान का सर्वत्र स्वागत हो रहा है। स्वास्थ्य सहज अभिलाषा है। सभी प्राणी स्वस्थ रहना चाहते हैं। इस संसार के सभी सुख और आनंद सुंदर स्वास्थ्य द्वारा ही उपलब्ध होते हैं। रोगी को जीवन के सुखों में हिस्सा नहीं मिलता है। स्वस्थ होना भी जीवनमूल्य है। भारतीय चिंतन में स्वस्थ शरीर की चिंता प्राथमिकता रही है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में सुंदर स्वास्थ्य की जीवन शैली है। यहां पूरी दिनचर्या स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। ऋग्वेद में अनेक मंत्रों में स्वस्थ और दीर्घ जीवन की अभिलाषा है। ऋषि कवि सौ बरस का जीवन चाहते हैं, लेकिन प्रार्थना करते हैं कि वह सौ साल तक शरीर से भी स्वस्थ्य रहें। 100 साल तक सूर्य दर्शन करें। सतत् कर्म करें। सभी दायित्वों का निर्वहन करें और इसके लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय राष्ट्र जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। शरीर को धर्मसाधना का उपकरण बताया गया है। अर्थ की प्राप्ति भी रुग्ण शरीर द्वारा संभव नहीं है। किसी भी कामना की पूर्ति के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए। मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति के लिए भी इसी संसार में कर्म, तप किए जाते हैं। कर्म व तप स्वस्थ शरीर से ही संभव हैं। भक्ति, योग, तप और जप स्वस्थ शरीर के बिना नहीं हो सकते है। कठोपनिषद् में स्पष्ट रूप में कहा गया है कि “बलहीन को आत्मज्ञान नहीं मिलता है। आत्मज्ञान के लिए भी स्वस्थ्य शरीर की आवश्यकता होती है।” आत्मज्ञान ही नहीं सामान्य संसारी ज्ञान की प्राप्ति भी स्वस्थ शरीर से ही होती है। स्वस्थ व्यक्ति जल्दी सिखाता है, जल्दी सीखता है। वस्तुतः रोग मुक्ति स्वास्थ्य नहीं है। रोगों का न होना और स्वस्थ होना अलग-अलग बाते हैं। स्वस्थ का अर्थ है स्वयं में होना। जैसे गृहस्थ का अर्थ है घर से सम्बन्धित होना। संन्यस्थ का अर्थ है संन्यास से जुड़े होना। वैसे ही स्वस्थ का अर्थ है स्वयं से सम्बन्धित होना। स्वास्थ्य प्रकृति है। रोग विकृति है। स्वस्थ होना प्रकृति के अनंतसंगीत में होना है। हमारे पूर्वजों ने प्राचीनकाल से ही स्वस्थ रहने के विषय पर गंभीर चिंतन किया था। अथर्ववेद में भरापूरा स्वास्थ्य विज्ञान है। सहस्त्रों औषधियों के उल्लेख के साथ योग के भी संकेत हैं। योग भारत का प्राचीन विज्ञान है। पतंजलि ने ईशा के लगभग दो सौ वर्ष पहले योग सूत्रों की रचना की थी। योग प्रत्येक तरह से स्वस्थ रहने का विज्ञान है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में योग को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है। योग विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है। यह केवल शारीरिक रोग ही नहीं दूर करता। मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अंतःकरण को भी स्वस्थ रखता है। विश्व मानवता का आकर्षण योग की तरफ लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने भी योग को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। योग के लाभ सर्वविदित व सर्वपरिचित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण भी स्वास्थ्य का आधार है। वायु और जल प्रदूषण से तमाम बीमारियाँ बढ़ी हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान में इन बीमारियों की भी चर्चा है। चरकसंहिता में कहा गया है कि जब रोग बढ़ने लगे तो समाज चेता, विद्वानों ने बैठक की और गहन चिंतन जारी रहा। इसके साथ ही आयुर्विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्वेद आयु का ही वेद है। सम्प्रति भारत सरकार व राज्यों के राजकोष से बीमारियों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च होता है। भारतीय आयुर्विज्ञान में रोग न होने देने के तमाम उपाय हैं। आज रोग निरोधक शक्ति की भी बहुत चर्चा है। यह शक्ति मनुष्य के शरीर में होती ही है। जीवनचर्या के अव्यवस्थित होने से रोग निरोधक शक्ति घटती है। आयुर्वेद में अनेक औषधियाँ हैं। ये रोग निरोधक शक्ति बढ़ाती हैं। स्वस्थ शरीर में वैसे भी प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की क्षमता होती है। भारतीय दिनचर्या प्राचीनकाल से स्वास्थ्य का स्वभाविक संधान रही है। प्रातः उठना, स्नान करना, कुछ खाना, काम करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। इसी दिनचर्या में स्वस्थ जीवन के स्वर्ण सूत्र हैं। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति और अन्य प्रभावों के कारण दिनचर्या और सभ्यता में परिवर्तन आए हैं। सभ्यता के परिवर्तन के कारण दिनचर्या उलट-पलट गयी है। इससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ा है। प्राचीन ऋषि सजग थे। केनोपनिषद् के शांति पाठ में प्रार्थना करते हैं कि ‘‘मेरे सभी अंग वाणी, प्राण और आँख, कान स्वस्थ रहें। इन्द्रियाँ स्वस्थ रहें और शरीर में बल भी रहे।‘‘ इसी प्रकार ऋग्वेद के मंत्र में कहते हैं कि हमारे कान ठीक से सुनें, हमारी आँख ठीक से देखें। हमारे शरीर के सभी अंग सुदृढ़ व मजबूत रहें। हमारी आयु दीर्घ हो। स्वस्थ रहें। प्रधानमंत्री ने फिट इण्डिया का नारा दिया है। सबके स्वास्थ्य से भारत शक्तिशाली होगा। स्वस्थ भारत ही आत्मनिर्भर भारत होगा। स्वस्थ भारत अजेय भारत होगा। स्वास्थ्य प्राप्ति के अनेक उपाय हैं। व्यायाम और खेलकूद भी स्वस्थ भारत के विकास में सहायक है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य के लिए भी चिंतित रहना चाहिए। हम सब अन्य कामों की चिंता ज्यादा करते हैं। स्वस्थ्य रहना स्वयं की चिंता है। स्वयं की चिंता से राष्ट्रीय स्वास्थ्य का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 3 January 2021


bhopal,After all, how long, can we celebrate , new year of slavery

सियाराम पांडेय 'शांत' वर्ष 1752 से ही भारत 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष मनाता चला आ रहा है। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तब तो बात समझ में आती है कि हमारी अपनी विवशता थी लेकिन अब हम परतंत्र नहीं हैं। हमारी आजादी को 73 साल हो गए लेकिन देश के एक भी नेता ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस देश का नववर्ष अपना हो। ऐसा नववर्ष जिससे गुलामी की गंध न आए। यहां की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुकूल हो। आजादी के 73 साल बाद भी अगर हम गुलामी के बोझ को ढो रहे हैं तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? भारत में एक नहीं, कई-कई नववर्ष मनाए जाते हैं लेकिन इसपर भी हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने कभी विचार नहीं किया। नववर्ष के लिए एक जनवरी को ही मान्यता देना कितना उचित है? सकारात्मक सोच रखना और बात है लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को महत्व देना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई देश आज भी एक जनवरी को अपना नववर्ष नहीं मानते तो भारत की ऐसी क्या विवशता है कि अपने नववर्ष की तिथि बदलने पर चिंतन न करे। भारत में आज भी गुलामी को यादों को ढोया जा रहा है। वह भी तब जब यहां अलग-अलग प्रांतों में अपनी मान्यता और परंपरा के अनुसार अलग-अलग नववर्ष मनाए जाते हैं। जिन राज्यों में ईसाई समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है, वहां भी अलग से नववर्ष मनाया जाता है। दुनिया में पहली बार जूलियस सीजर के ग्रिगोरियन कैलेंडर के तहत 01 जनवरी को नया साल 15 अक्टूबर 1582 को मनाया गया था। यूरोप और दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 500 साल पहले तक ईसाई बहुल देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता था। भारत की बात करें तो पारसी धर्म का नया साल नवरोज उत्सव के रूप में अमूमन 19 अगस्त को मनाया जाता है। यह सिलसिला तीन हजार साल से चला आ रहा है। शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी, तब से पारसी समाज के लोग नवरोज मनाते चले आ रहे हैं। पारसी धर्म के भगवान प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्म 24 अगस्त को हुआ था। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारसियों की जिंदगी में तीन दिन बेहद खास होते हैं। एक खौरदाद साल, प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। इराक से आए पारसी धर्मावलंबी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। पंजाब में नया साल वैशाखी के रूप में मनाया जाता है, जो अप्रैल में पड़ती है। सिख नानकशाही कैलेंडर की मानें तो सिखों का नया साल होली के दूसरे दिन से आरंभ होता है। भारत में हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि का सृजन आरंभ किया था। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृण्वंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है जबकि दीपावली के अगले दिन से जैन नववर्ष आरंभ होता है। इसे वीर निर्वाण संवत के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से जैन धर्मावलंबी अपना नया साल मनाते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तेलगू नववर्ष हिन्दी के चैत्र माह के प्रथम दिन और अंग्रेजी के मार्च या अप्रैल में मनाया जाता है। मराठी और कोंकणी लोग चैत्र माह में नया साल मनाते हैं। इस दिन वे गुड़ी को अपने दरवाजों पर लगाते हैं। अप्रैल के मध्य में तमिल नववर्ष का आयोजन होता है। बोहाग बिहू को असम का नववर्ष माना जाता है। बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में पड़ती है। बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है। वहां इसे पोहला बोईशाख यानी वैशाख माह का पहला दिन कहा जाता है। त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पोहला बोईशाख को ही अपने नए साल के तौर पर मनाते हैं। गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष के नाम से जाना जाता है। गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। विषु केरल में नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को पड़ता है। केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। नवरेह को कश्मीर का नव चंद्रवर्ष कहा जाता है। वनरेह का अर्थ होता है चैत्र नवरात्र का पहला दिन। मदुरै में चित्रैय यानी चैत्र महीने में चित्रैय तिरूविजा को नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है जबकि गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है, लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। जैन ग्रथों के अनुसार महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को चर्तुदशी के प्रत्यूष काल में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। चर्तुदशी का अन्तिम पहर होता है इसलिए जैन लोग दीपावली अमावस्या को मनाते हैं। संध्या काल में तीर्थंकर महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस्लामिक नववर्ष भी मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है जो इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से अपने लोगों का नेतृत्व करते हुए मदीना प्रवास किया था। 01 जनवरी को नववर्ष के रूप में मान्यता देकर ईसाई समुदाय के ही लोग खुश हों, ऐसा नहीं है। उनकी हमेशा यही चाहत रही है कि 25 मार्च या 25 दिसंबर से नया साल मनाया जाए। ईसाई समाज मानता है कि 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था। लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में कुछ कमी थी। सेंट बीड नाम के एक ग्रेगोरियन कैलेंडर को इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था, जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700, ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया। सन 1752 में भारत ब्रिटेन के अधीन था इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। इथोपिया आज भी सितंबर में अपना नया साल मनाता है। चीन अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सारे दिन, सारी तिथियां और समय उन्हीं के बनाए हुए हैं। जहां तक नववर्ष का सवाल है तो वह किसी भी दिन आरंभ किया जा सकता है। भारत ने एक जनवरी को नववर्ष मनाने का निर्णय बहुत मजबूरी में लिया था। अब उसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही अपने नववर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देनी चाहिए क्योंकि इस तिथि पर देश के अनेक प्रांतों और समाजों के लोग आज भी नववर्ष मना रहे हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 31 December 2020


bhopal,After all, how long, can we celebrate , new year of slavery

सियाराम पांडेय 'शांत' वर्ष 1752 से ही भारत 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष मनाता चला आ रहा है। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तब तो बात समझ में आती है कि हमारी अपनी विवशता थी लेकिन अब हम परतंत्र नहीं हैं। हमारी आजादी को 73 साल हो गए लेकिन देश के एक भी नेता ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस देश का नववर्ष अपना हो। ऐसा नववर्ष जिससे गुलामी की गंध न आए। यहां की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुकूल हो। आजादी के 73 साल बाद भी अगर हम गुलामी के बोझ को ढो रहे हैं तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? भारत में एक नहीं, कई-कई नववर्ष मनाए जाते हैं लेकिन इसपर भी हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने कभी विचार नहीं किया। नववर्ष के लिए एक जनवरी को ही मान्यता देना कितना उचित है? सकारात्मक सोच रखना और बात है लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को महत्व देना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई देश आज भी एक जनवरी को अपना नववर्ष नहीं मानते तो भारत की ऐसी क्या विवशता है कि अपने नववर्ष की तिथि बदलने पर चिंतन न करे। भारत में आज भी गुलामी को यादों को ढोया जा रहा है। वह भी तब जब यहां अलग-अलग प्रांतों में अपनी मान्यता और परंपरा के अनुसार अलग-अलग नववर्ष मनाए जाते हैं। जिन राज्यों में ईसाई समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है, वहां भी अलग से नववर्ष मनाया जाता है। दुनिया में पहली बार जूलियस सीजर के ग्रिगोरियन कैलेंडर के तहत 01 जनवरी को नया साल 15 अक्टूबर 1582 को मनाया गया था। यूरोप और दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 500 साल पहले तक ईसाई बहुल देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता था। भारत की बात करें तो पारसी धर्म का नया साल नवरोज उत्सव के रूप में अमूमन 19 अगस्त को मनाया जाता है। यह सिलसिला तीन हजार साल से चला आ रहा है। शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी, तब से पारसी समाज के लोग नवरोज मनाते चले आ रहे हैं। पारसी धर्म के भगवान प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्म 24 अगस्त को हुआ था। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारसियों की जिंदगी में तीन दिन बेहद खास होते हैं। एक खौरदाद साल, प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। इराक से आए पारसी धर्मावलंबी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। पंजाब में नया साल वैशाखी के रूप में मनाया जाता है, जो अप्रैल में पड़ती है। सिख नानकशाही कैलेंडर की मानें तो सिखों का नया साल होली के दूसरे दिन से आरंभ होता है। भारत में हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि का सृजन आरंभ किया था। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृण्वंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है जबकि दीपावली के अगले दिन से जैन नववर्ष आरंभ होता है। इसे वीर निर्वाण संवत के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से जैन धर्मावलंबी अपना नया साल मनाते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तेलगू नववर्ष हिन्दी के चैत्र माह के प्रथम दिन और अंग्रेजी के मार्च या अप्रैल में मनाया जाता है। मराठी और कोंकणी लोग चैत्र माह में नया साल मनाते हैं। इस दिन वे गुड़ी को अपने दरवाजों पर लगाते हैं। अप्रैल के मध्य में तमिल नववर्ष का आयोजन होता है। बोहाग बिहू को असम का नववर्ष माना जाता है। बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में पड़ती है। बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है। वहां इसे पोहला बोईशाख यानी वैशाख माह का पहला दिन कहा जाता है। त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पोहला बोईशाख को ही अपने नए साल के तौर पर मनाते हैं। गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष के नाम से जाना जाता है। गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। विषु केरल में नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को पड़ता है। केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। नवरेह को कश्मीर का नव चंद्रवर्ष कहा जाता है। वनरेह का अर्थ होता है चैत्र नवरात्र का पहला दिन। मदुरै में चित्रैय यानी चैत्र महीने में चित्रैय तिरूविजा को नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है जबकि गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है, लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। जैन ग्रथों के अनुसार महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को चर्तुदशी के प्रत्यूष काल में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। चर्तुदशी का अन्तिम पहर होता है इसलिए जैन लोग दीपावली अमावस्या को मनाते हैं। संध्या काल में तीर्थंकर महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस्लामिक नववर्ष भी मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है जो इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से अपने लोगों का नेतृत्व करते हुए मदीना प्रवास किया था। 01 जनवरी को नववर्ष के रूप में मान्यता देकर ईसाई समुदाय के ही लोग खुश हों, ऐसा नहीं है। उनकी हमेशा यही चाहत रही है कि 25 मार्च या 25 दिसंबर से नया साल मनाया जाए। ईसाई समाज मानता है कि 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था। लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में कुछ कमी थी। सेंट बीड नाम के एक ग्रेगोरियन कैलेंडर को इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था, जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700, ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया। सन 1752 में भारत ब्रिटेन के अधीन था इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। इथोपिया आज भी सितंबर में अपना नया साल मनाता है। चीन अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सारे दिन, सारी तिथियां और समय उन्हीं के बनाए हुए हैं। जहां तक नववर्ष का सवाल है तो वह किसी भी दिन आरंभ किया जा सकता है। भारत ने एक जनवरी को नववर्ष मनाने का निर्णय बहुत मजबूरी में लिया था। अब उसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही अपने नववर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देनी चाहिए क्योंकि इस तिथि पर देश के अनेक प्रांतों और समाजों के लोग आज भी नववर्ष मना रहे हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 31 December 2020


bhopal,After all, how long, can we celebrate , new year of slavery

सियाराम पांडेय 'शांत' वर्ष 1752 से ही भारत 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष मनाता चला आ रहा है। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तब तो बात समझ में आती है कि हमारी अपनी विवशता थी लेकिन अब हम परतंत्र नहीं हैं। हमारी आजादी को 73 साल हो गए लेकिन देश के एक भी नेता ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस देश का नववर्ष अपना हो। ऐसा नववर्ष जिससे गुलामी की गंध न आए। यहां की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुकूल हो। आजादी के 73 साल बाद भी अगर हम गुलामी के बोझ को ढो रहे हैं तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? भारत में एक नहीं, कई-कई नववर्ष मनाए जाते हैं लेकिन इसपर भी हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने कभी विचार नहीं किया। नववर्ष के लिए एक जनवरी को ही मान्यता देना कितना उचित है? सकारात्मक सोच रखना और बात है लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को महत्व देना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई देश आज भी एक जनवरी को अपना नववर्ष नहीं मानते तो भारत की ऐसी क्या विवशता है कि अपने नववर्ष की तिथि बदलने पर चिंतन न करे। भारत में आज भी गुलामी को यादों को ढोया जा रहा है। वह भी तब जब यहां अलग-अलग प्रांतों में अपनी मान्यता और परंपरा के अनुसार अलग-अलग नववर्ष मनाए जाते हैं। जिन राज्यों में ईसाई समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है, वहां भी अलग से नववर्ष मनाया जाता है। दुनिया में पहली बार जूलियस सीजर के ग्रिगोरियन कैलेंडर के तहत 01 जनवरी को नया साल 15 अक्टूबर 1582 को मनाया गया था। यूरोप और दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 500 साल पहले तक ईसाई बहुल देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता था। भारत की बात करें तो पारसी धर्म का नया साल नवरोज उत्सव के रूप में अमूमन 19 अगस्त को मनाया जाता है। यह सिलसिला तीन हजार साल से चला आ रहा है। शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी, तब से पारसी समाज के लोग नवरोज मनाते चले आ रहे हैं। पारसी धर्म के भगवान प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्म 24 अगस्त को हुआ था। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारसियों की जिंदगी में तीन दिन बेहद खास होते हैं। एक खौरदाद साल, प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। इराक से आए पारसी धर्मावलंबी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। पंजाब में नया साल वैशाखी के रूप में मनाया जाता है, जो अप्रैल में पड़ती है। सिख नानकशाही कैलेंडर की मानें तो सिखों का नया साल होली के दूसरे दिन से आरंभ होता है। भारत में हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि का सृजन आरंभ किया था। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृण्वंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है जबकि दीपावली के अगले दिन से जैन नववर्ष आरंभ होता है। इसे वीर निर्वाण संवत के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से जैन धर्मावलंबी अपना नया साल मनाते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तेलगू नववर्ष हिन्दी के चैत्र माह के प्रथम दिन और अंग्रेजी के मार्च या अप्रैल में मनाया जाता है। मराठी और कोंकणी लोग चैत्र माह में नया साल मनाते हैं। इस दिन वे गुड़ी को अपने दरवाजों पर लगाते हैं। अप्रैल के मध्य में तमिल नववर्ष का आयोजन होता है। बोहाग बिहू को असम का नववर्ष माना जाता है। बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में पड़ती है। बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है। वहां इसे पोहला बोईशाख यानी वैशाख माह का पहला दिन कहा जाता है। त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पोहला बोईशाख को ही अपने नए साल के तौर पर मनाते हैं। गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष के नाम से जाना जाता है। गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। विषु केरल में नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को पड़ता है। केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। नवरेह को कश्मीर का नव चंद्रवर्ष कहा जाता है। वनरेह का अर्थ होता है चैत्र नवरात्र का पहला दिन। मदुरै में चित्रैय यानी चैत्र महीने में चित्रैय तिरूविजा को नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है जबकि गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है, लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। जैन ग्रथों के अनुसार महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को चर्तुदशी के प्रत्यूष काल में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। चर्तुदशी का अन्तिम पहर होता है इसलिए जैन लोग दीपावली अमावस्या को मनाते हैं। संध्या काल में तीर्थंकर महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस्लामिक नववर्ष भी मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है जो इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से अपने लोगों का नेतृत्व करते हुए मदीना प्रवास किया था। 01 जनवरी को नववर्ष के रूप में मान्यता देकर ईसाई समुदाय के ही लोग खुश हों, ऐसा नहीं है। उनकी हमेशा यही चाहत रही है कि 25 मार्च या 25 दिसंबर से नया साल मनाया जाए। ईसाई समाज मानता है कि 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था। लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में कुछ कमी थी। सेंट बीड नाम के एक ग्रेगोरियन कैलेंडर को इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था, जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700, ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया। सन 1752 में भारत ब्रिटेन के अधीन था इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। इथोपिया आज भी सितंबर में अपना नया साल मनाता है। चीन अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सारे दिन, सारी तिथियां और समय उन्हीं के बनाए हुए हैं। जहां तक नववर्ष का सवाल है तो वह किसी भी दिन आरंभ किया जा सकता है। भारत ने एक जनवरी को नववर्ष मनाने का निर्णय बहुत मजबूरी में लिया था। अब उसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही अपने नववर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देनी चाहिए क्योंकि इस तिथि पर देश के अनेक प्रांतों और समाजों के लोग आज भी नववर्ष मना रहे हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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bhopal,After all, how long, can we celebrate , new year of slavery

सियाराम पांडेय 'शांत' वर्ष 1752 से ही भारत 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष मनाता चला आ रहा है। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तब तो बात समझ में आती है कि हमारी अपनी विवशता थी लेकिन अब हम परतंत्र नहीं हैं। हमारी आजादी को 73 साल हो गए लेकिन देश के एक भी नेता ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस देश का नववर्ष अपना हो। ऐसा नववर्ष जिससे गुलामी की गंध न आए। यहां की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुकूल हो। आजादी के 73 साल बाद भी अगर हम गुलामी के बोझ को ढो रहे हैं तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? भारत में एक नहीं, कई-कई नववर्ष मनाए जाते हैं लेकिन इसपर भी हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने कभी विचार नहीं किया। नववर्ष के लिए एक जनवरी को ही मान्यता देना कितना उचित है? सकारात्मक सोच रखना और बात है लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को महत्व देना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई देश आज भी एक जनवरी को अपना नववर्ष नहीं मानते तो भारत की ऐसी क्या विवशता है कि अपने नववर्ष की तिथि बदलने पर चिंतन न करे। भारत में आज भी गुलामी को यादों को ढोया जा रहा है। वह भी तब जब यहां अलग-अलग प्रांतों में अपनी मान्यता और परंपरा के अनुसार अलग-अलग नववर्ष मनाए जाते हैं। जिन राज्यों में ईसाई समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है, वहां भी अलग से नववर्ष मनाया जाता है। दुनिया में पहली बार जूलियस सीजर के ग्रिगोरियन कैलेंडर के तहत 01 जनवरी को नया साल 15 अक्टूबर 1582 को मनाया गया था। यूरोप और दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 500 साल पहले तक ईसाई बहुल देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता था। भारत की बात करें तो पारसी धर्म का नया साल नवरोज उत्सव के रूप में अमूमन 19 अगस्त को मनाया जाता है। यह सिलसिला तीन हजार साल से चला आ रहा है। शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी, तब से पारसी समाज के लोग नवरोज मनाते चले आ रहे हैं। पारसी धर्म के भगवान प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्म 24 अगस्त को हुआ था। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारसियों की जिंदगी में तीन दिन बेहद खास होते हैं। एक खौरदाद साल, प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। इराक से आए पारसी धर्मावलंबी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। पंजाब में नया साल वैशाखी के रूप में मनाया जाता है, जो अप्रैल में पड़ती है। सिख नानकशाही कैलेंडर की मानें तो सिखों का नया साल होली के दूसरे दिन से आरंभ होता है। भारत में हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि का सृजन आरंभ किया था। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृण्वंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है जबकि दीपावली के अगले दिन से जैन नववर्ष आरंभ होता है। इसे वीर निर्वाण संवत के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से जैन धर्मावलंबी अपना नया साल मनाते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तेलगू नववर्ष हिन्दी के चैत्र माह के प्रथम दिन और अंग्रेजी के मार्च या अप्रैल में मनाया जाता है। मराठी और कोंकणी लोग चैत्र माह में नया साल मनाते हैं। इस दिन वे गुड़ी को अपने दरवाजों पर लगाते हैं। अप्रैल के मध्य में तमिल नववर्ष का आयोजन होता है। बोहाग बिहू को असम का नववर्ष माना जाता है। बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में पड़ती है। बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है। वहां इसे पोहला बोईशाख यानी वैशाख माह का पहला दिन कहा जाता है। त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पोहला बोईशाख को ही अपने नए साल के तौर पर मनाते हैं। गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष के नाम से जाना जाता है। गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। विषु केरल में नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को पड़ता है। केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। नवरेह को कश्मीर का नव चंद्रवर्ष कहा जाता है। वनरेह का अर्थ होता है चैत्र नवरात्र का पहला दिन। मदुरै में चित्रैय यानी चैत्र महीने में चित्रैय तिरूविजा को नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है जबकि गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है, लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। जैन ग्रथों के अनुसार महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को चर्तुदशी के प्रत्यूष काल में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। चर्तुदशी का अन्तिम पहर होता है इसलिए जैन लोग दीपावली अमावस्या को मनाते हैं। संध्या काल में तीर्थंकर महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस्लामिक नववर्ष भी मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है जो इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से अपने लोगों का नेतृत्व करते हुए मदीना प्रवास किया था। 01 जनवरी को नववर्ष के रूप में मान्यता देकर ईसाई समुदाय के ही लोग खुश हों, ऐसा नहीं है। उनकी हमेशा यही चाहत रही है कि 25 मार्च या 25 दिसंबर से नया साल मनाया जाए। ईसाई समाज मानता है कि 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था। लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में कुछ कमी थी। सेंट बीड नाम के एक ग्रेगोरियन कैलेंडर को इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था, जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700, ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया। सन 1752 में भारत ब्रिटेन के अधीन था इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। इथोपिया आज भी सितंबर में अपना नया साल मनाता है। चीन अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सारे दिन, सारी तिथियां और समय उन्हीं के बनाए हुए हैं। जहां तक नववर्ष का सवाल है तो वह किसी भी दिन आरंभ किया जा सकता है। भारत ने एक जनवरी को नववर्ष मनाने का निर्णय बहुत मजबूरी में लिया था। अब उसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही अपने नववर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देनी चाहिए क्योंकि इस तिथि पर देश के अनेक प्रांतों और समाजों के लोग आज भी नववर्ष मना रहे हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 31 December 2020


bhopal,After all, how long, can we celebrate , new year of slavery

सियाराम पांडेय 'शांत' वर्ष 1752 से ही भारत 01 जनवरी को आंग्ल नववर्ष मनाता चला आ रहा है। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तब तो बात समझ में आती है कि हमारी अपनी विवशता थी लेकिन अब हम परतंत्र नहीं हैं। हमारी आजादी को 73 साल हो गए लेकिन देश के एक भी नेता ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस देश का नववर्ष अपना हो। ऐसा नववर्ष जिससे गुलामी की गंध न आए। यहां की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुकूल हो। आजादी के 73 साल बाद भी अगर हम गुलामी के बोझ को ढो रहे हैं तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? भारत में एक नहीं, कई-कई नववर्ष मनाए जाते हैं लेकिन इसपर भी हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने कभी विचार नहीं किया। नववर्ष के लिए एक जनवरी को ही मान्यता देना कितना उचित है? सकारात्मक सोच रखना और बात है लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को महत्व देना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई देश आज भी एक जनवरी को अपना नववर्ष नहीं मानते तो भारत की ऐसी क्या विवशता है कि अपने नववर्ष की तिथि बदलने पर चिंतन न करे। भारत में आज भी गुलामी को यादों को ढोया जा रहा है। वह भी तब जब यहां अलग-अलग प्रांतों में अपनी मान्यता और परंपरा के अनुसार अलग-अलग नववर्ष मनाए जाते हैं। जिन राज्यों में ईसाई समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है, वहां भी अलग से नववर्ष मनाया जाता है। दुनिया में पहली बार जूलियस सीजर के ग्रिगोरियन कैलेंडर के तहत 01 जनवरी को नया साल 15 अक्टूबर 1582 को मनाया गया था। यूरोप और दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 500 साल पहले तक ईसाई बहुल देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता था। भारत की बात करें तो पारसी धर्म का नया साल नवरोज उत्सव के रूप में अमूमन 19 अगस्त को मनाया जाता है। यह सिलसिला तीन हजार साल से चला आ रहा है। शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी, तब से पारसी समाज के लोग नवरोज मनाते चले आ रहे हैं। पारसी धर्म के भगवान प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्म 24 अगस्त को हुआ था। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारसियों की जिंदगी में तीन दिन बेहद खास होते हैं। एक खौरदाद साल, प्रोफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। इराक से आए पारसी धर्मावलंबी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। पंजाब में नया साल वैशाखी के रूप में मनाया जाता है, जो अप्रैल में पड़ती है। सिख नानकशाही कैलेंडर की मानें तो सिखों का नया साल होली के दूसरे दिन से आरंभ होता है। भारत में हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि का सृजन आरंभ किया था। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृण्वंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है जबकि दीपावली के अगले दिन से जैन नववर्ष आरंभ होता है। इसे वीर निर्वाण संवत के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से जैन धर्मावलंबी अपना नया साल मनाते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तेलगू नववर्ष हिन्दी के चैत्र माह के प्रथम दिन और अंग्रेजी के मार्च या अप्रैल में मनाया जाता है। मराठी और कोंकणी लोग चैत्र माह में नया साल मनाते हैं। इस दिन वे गुड़ी को अपने दरवाजों पर लगाते हैं। अप्रैल के मध्य में तमिल नववर्ष का आयोजन होता है। बोहाग बिहू को असम का नववर्ष माना जाता है। बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में पड़ती है। बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है। वहां इसे पोहला बोईशाख यानी वैशाख माह का पहला दिन कहा जाता है। त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पोहला बोईशाख को ही अपने नए साल के तौर पर मनाते हैं। गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष के नाम से जाना जाता है। गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। विषु केरल में नववर्ष का दिन है। यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को पड़ता है। केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है। नवरेह को कश्मीर का नव चंद्रवर्ष कहा जाता है। वनरेह का अर्थ होता है चैत्र नवरात्र का पहला दिन। मदुरै में चित्रैय यानी चैत्र महीने में चित्रैय तिरूविजा को नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है जबकि गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है, लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। जैन ग्रथों के अनुसार महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को चर्तुदशी के प्रत्यूष काल में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। चर्तुदशी का अन्तिम पहर होता है इसलिए जैन लोग दीपावली अमावस्या को मनाते हैं। संध्या काल में तीर्थंकर महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस्लामिक नववर्ष भी मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है जो इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से अपने लोगों का नेतृत्व करते हुए मदीना प्रवास किया था। 01 जनवरी को नववर्ष के रूप में मान्यता देकर ईसाई समुदाय के ही लोग खुश हों, ऐसा नहीं है। उनकी हमेशा यही चाहत रही है कि 25 मार्च या 25 दिसंबर से नया साल मनाया जाए। ईसाई समाज मानता है कि 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था। लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में कुछ कमी थी। सेंट बीड नाम के एक ग्रेगोरियन कैलेंडर को इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था, जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700, ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया। सन 1752 में भारत ब्रिटेन के अधीन था इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। इथोपिया आज भी सितंबर में अपना नया साल मनाता है। चीन अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सारे दिन, सारी तिथियां और समय उन्हीं के बनाए हुए हैं। जहां तक नववर्ष का सवाल है तो वह किसी भी दिन आरंभ किया जा सकता है। भारत ने एक जनवरी को नववर्ष मनाने का निर्णय बहुत मजबूरी में लिया था। अब उसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही अपने नववर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देनी चाहिए क्योंकि इस तिथि पर देश के अनेक प्रांतों और समाजों के लोग आज भी नववर्ष मना रहे हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 31 December 2020


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पवन कुमार अरविंद नेपाल पर अपनी पकड़ ढीली होती देख वहां की घरेलू राजनीति में इन दिनों चीन की सक्रियता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। चीन की यह सक्रियता स्पष्ट रूप से दिख भी रही है। 20 दिसम्बर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन की अपेक्षाओं से परे जाकर आनन-फानन में नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा को भंग करने की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से सिफारिश कर दी। ओली की सिफारिश के दो घंटे के अंदर राष्ट्रपति ने नेपाली संसद को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। अधिसूचना में कहा गया है, "राष्ट्रपति ने देश के संविधान के अनुच्छेद 76 और अनुच्छेद 85 के सेक्शन 1 एवं 7 के अनुसार संघीय संसद भंग किया है।" इसी के साथ राष्ट्रपति ने नए जनादेश के लिए 30 अप्रैल और 10 मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाने की घोषणा की। अधिसूचना के दो दिन बाद यानी 22 दिसम्बर को काठमांडू में चीन की राजदूत हाओ यांकी ने नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से मुलाकात की। करीब घंटाभर चली इस मुलाकात में क्या बातचीत हुई, दोनों पक्षों की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। हालांकि काठमांडू पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों के बीच मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति से मुलाकात के दो दिन बाद यानी 24 दिसम्बर को हाओ यांकी ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात की थी। वैसे, किसी भी देश में पदस्थ राजदूत आमतौर पर उस देश की आंतरिक राजनीति से दूर रहते हैं, लेकिन चीनी राजदूत यांकी अपनी तैनाती के बाद से ही नेपाल के नेताओं के साथ मेल-मुलाकात करती रही हैं। शायद वो अपने आका चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सौंपे कार्य को ही पूरा कर रही हैं। वहीं, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ एक उच्चस्तरीय टीम के साथ 27 दिसम्बर को काठमांडू पहुंचे और नेपाल की राष्ट्रपति भंडारी और कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से अलग-अलग मुलाकात की। येजोऊ ने 28 दिसम्बर को प्रचंड, माधव कुमार नेपाल एवं झालानाथ खनल (सभी पूर्व प्रधानमंत्री) से मुलाकात की। उसके बाद उन्होंने जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई से भी मुलाकात की। गुओ येजोऊ ने 29 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री एवं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा से उनके आवास पर मुलाकात की। येजोऊ ने देउबा को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होने पर अगले साल आयोजित होने वाले समारोह में आमंत्रित भी किया है। हालांकि देउबा को बुलाने की कोई योजना नहीं थी, लेकिन मुलाकात के दौरान येजोऊ ने उनको आमंत्रित करने का अचानक फैसला लिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की चार सदस्यीय यह टीम नेपाल में विभिन्न दलों के नेताओं का मन टटोल रही है। इसके साथ ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों को अपने गिले-शिकवे भुलाकर फिर से एक होने के लिए प्रयासरत है। दरअसल नेपाल में बरसों के राजनीतिक उथल-पुथल और संघर्षों के बाद 20 सितम्बर, 2015 को नया संविधान अंगीकृत किया गया। नए संविधान के अनुसार नेपाल में नवम्बर-दिसम्बर, 2017 में प्रथम संसदीय चुनाव हुए। यह चुनाव केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' की पार्टी सीपीएन-एमसी ने गठबंधन कर लड़ा था। नेपाली संसद के निचले सदन 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सीपीएन-यूएमएल को 121 और सीपीएन-एमसी को 53 सीटें प्राप्त हुईं। नेपाली कांग्रेस को 63, राष्ट्रीय जनता पार्टी (नेपाल) को 17 और अन्य को 21 सीटें मिली थीं। चुनाव परिणाम के बाद सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी के मिलन से नई पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई। दोनों दलों के विलय में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस नई पार्टी, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो अध्यक्ष बने। 66 वर्षीय प्रचंड को कार्यकारी अध्यक्ष और 68 वर्षीय ओली को अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2018 के पार्टी संविधान के अनुसार प्रचंड और ओली दोनों की पार्टी में बराबर की हैसियत थी। पार्टी की बैठकों की अध्यक्षता रोस्टर के अनुसार क्रमशः प्रचंड और ओली करते थे। चुनाव में अधिक सीटें जीतने के कारण ओली को प्रधानमंत्री का पद मिला। ओली ने 15 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुओ येज़ोऊ समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ओली सरकार ने 11 मार्च, 2018 को सदन में विश्वास मत हासिल किया। उनको 208 सांसदों का समर्थन मिला। सरकार गठन के बाद अपने-अपने लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कराने को लेकर ओली और प्रचंड के बीच खींचतान शुरू हो गई। सत्ता संघर्ष ज्यादा बढ़ जाने पर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर चीनी राजदूत होऊ यांकी स्थिति को संभालती रहीं। कई बार ऐसा भी हुआ जब ओली और प्रचंड के बीच बातचीत तक बंद हो गई तो होऊ यांकी ने दोनों नेताओं की बातचीत भी कराई थी। पिछले तीन-चार महीनों में भारत के साथ सीमा विवाद और सरकार में कुछ नियुक्तियों समेत अन्य मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों में सत्ता संघर्ष इस कदर बढ़ा कि यह किसी के संभालने से भी नहीं संभला। ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाकर प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश कर दी।  ओली के फैसले के बाद नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी फिर दो खेमों में बंट गई है। एक का नेतृत्व ओली कर रहे हैं और दूसरे का प्रचंड। ओली और प्रचंड दोनों; नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं। दोनों खेमे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न सूर्य को लेकर भी अपना दावा कर रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहे हैं। दोनों धड़ों ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी पर नियंत्रण रखने के लिए बहुमत होने का दावा किया है, लेकिन अभीतक किसी को नहीं पता है कि किस धड़े के नेतृत्व वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को मान्यता मिलेगी। इस बीच 24 दिसम्बर को निवर्तमान गृहमंत्री राम बहादुर थापा पाला बदलते हुए ओली खेमे में चले गए। राजशाही के खिलाफ संघर्ष में माओवादी नेता थापा, प्रचंड के अहम सहयोगी रहे हैं। थापा का कहना है कि फिर से चुनाव कराने का फैसला क्रांतिकारी कदम है। थापा के ओली खेमे में जाने से प्रचंड को बड़ा झटका लगा है। वहीं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल प्रचंड के साथ बने हुए हैं। कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली का कहना है कि उनके पास प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल की विकृत गतिविधियों के कारण यह स्थिति बनी है। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल कम्युनिस्ट आंदोलन को नष्ट करने पर तुले हैं। बहरहाल, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का इस तरह बंटना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को रास नहीं आया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दोनों खेमों को एक करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। चीनी नेताओं के काठमांडू दौरे पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपाध्यक्ष एवं प्रचंड के समर्थक राम कार्की का कहना है कि हमलोगों के बीच भाईचारे का रिश्ता न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से है बल्कि भारत और बांग्लादेश की कम्युनिस्ट पार्टियों से भी है। यह एक रूटीन दौरा है। चीनी नेताओं का यहां आना-जाना लगा रहता है। कार्की का कहना है कि ओली ने संसद भंग करने की सिफारिश कर गलत कदम उठाया है। ओली; कम्युनिस्ट एजेंडा चलाने के बजाय नव उदारवाद की राह पर बढ़ रहे हैं। चीन के प्रति नरम रुख रखने वाले ओली ने 20 दिसम्बर को अचानक पैंतरा बदलकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओली के रुख में यह परिवर्तन ऐसे ही नहीं आया, बल्कि इसका प्रमुख कारण 21अक्टूबर से 27 नवम्बर के बीच भारत के तीन शीर्ष अधिकारियों का नेपाल का दौरा है। पहले, भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख सामंत कुमार गोयल, फिर सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे और उसके बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे से ओली को एक संबल मिला और उन्होंने चीन के दबाव से अपने को मुक्त किया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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पवन कुमार अरविंद नेपाल पर अपनी पकड़ ढीली होती देख वहां की घरेलू राजनीति में इन दिनों चीन की सक्रियता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। चीन की यह सक्रियता स्पष्ट रूप से दिख भी रही है। 20 दिसम्बर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन की अपेक्षाओं से परे जाकर आनन-फानन में नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा को भंग करने की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से सिफारिश कर दी। ओली की सिफारिश के दो घंटे के अंदर राष्ट्रपति ने नेपाली संसद को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। अधिसूचना में कहा गया है, "राष्ट्रपति ने देश के संविधान के अनुच्छेद 76 और अनुच्छेद 85 के सेक्शन 1 एवं 7 के अनुसार संघीय संसद भंग किया है।" इसी के साथ राष्ट्रपति ने नए जनादेश के लिए 30 अप्रैल और 10 मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाने की घोषणा की। अधिसूचना के दो दिन बाद यानी 22 दिसम्बर को काठमांडू में चीन की राजदूत हाओ यांकी ने नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से मुलाकात की। करीब घंटाभर चली इस मुलाकात में क्या बातचीत हुई, दोनों पक्षों की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। हालांकि काठमांडू पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों के बीच मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति से मुलाकात के दो दिन बाद यानी 24 दिसम्बर को हाओ यांकी ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात की थी। वैसे, किसी भी देश में पदस्थ राजदूत आमतौर पर उस देश की आंतरिक राजनीति से दूर रहते हैं, लेकिन चीनी राजदूत यांकी अपनी तैनाती के बाद से ही नेपाल के नेताओं के साथ मेल-मुलाकात करती रही हैं। शायद वो अपने आका चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सौंपे कार्य को ही पूरा कर रही हैं। वहीं, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ एक उच्चस्तरीय टीम के साथ 27 दिसम्बर को काठमांडू पहुंचे और नेपाल की राष्ट्रपति भंडारी और कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से अलग-अलग मुलाकात की। येजोऊ ने 28 दिसम्बर को प्रचंड, माधव कुमार नेपाल एवं झालानाथ खनल (सभी पूर्व प्रधानमंत्री) से मुलाकात की। उसके बाद उन्होंने जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई से भी मुलाकात की। गुओ येजोऊ ने 29 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री एवं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा से उनके आवास पर मुलाकात की। येजोऊ ने देउबा को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होने पर अगले साल आयोजित होने वाले समारोह में आमंत्रित भी किया है। हालांकि देउबा को बुलाने की कोई योजना नहीं थी, लेकिन मुलाकात के दौरान येजोऊ ने उनको आमंत्रित करने का अचानक फैसला लिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की चार सदस्यीय यह टीम नेपाल में विभिन्न दलों के नेताओं का मन टटोल रही है। इसके साथ ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों को अपने गिले-शिकवे भुलाकर फिर से एक होने के लिए प्रयासरत है। दरअसल नेपाल में बरसों के राजनीतिक उथल-पुथल और संघर्षों के बाद 20 सितम्बर, 2015 को नया संविधान अंगीकृत किया गया। नए संविधान के अनुसार नेपाल में नवम्बर-दिसम्बर, 2017 में प्रथम संसदीय चुनाव हुए। यह चुनाव केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' की पार्टी सीपीएन-एमसी ने गठबंधन कर लड़ा था। नेपाली संसद के निचले सदन 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सीपीएन-यूएमएल को 121 और सीपीएन-एमसी को 53 सीटें प्राप्त हुईं। नेपाली कांग्रेस को 63, राष्ट्रीय जनता पार्टी (नेपाल) को 17 और अन्य को 21 सीटें मिली थीं। चुनाव परिणाम के बाद सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी के मिलन से नई पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई। दोनों दलों के विलय में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस नई पार्टी, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो अध्यक्ष बने। 66 वर्षीय प्रचंड को कार्यकारी अध्यक्ष और 68 वर्षीय ओली को अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2018 के पार्टी संविधान के अनुसार प्रचंड और ओली दोनों की पार्टी में बराबर की हैसियत थी। पार्टी की बैठकों की अध्यक्षता रोस्टर के अनुसार क्रमशः प्रचंड और ओली करते थे। चुनाव में अधिक सीटें जीतने के कारण ओली को प्रधानमंत्री का पद मिला। ओली ने 15 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुओ येज़ोऊ समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ओली सरकार ने 11 मार्च, 2018 को सदन में विश्वास मत हासिल किया। उनको 208 सांसदों का समर्थन मिला। सरकार गठन के बाद अपने-अपने लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कराने को लेकर ओली और प्रचंड के बीच खींचतान शुरू हो गई। सत्ता संघर्ष ज्यादा बढ़ जाने पर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर चीनी राजदूत होऊ यांकी स्थिति को संभालती रहीं। कई बार ऐसा भी हुआ जब ओली और प्रचंड के बीच बातचीत तक बंद हो गई तो होऊ यांकी ने दोनों नेताओं की बातचीत भी कराई थी। पिछले तीन-चार महीनों में भारत के साथ सीमा विवाद और सरकार में कुछ नियुक्तियों समेत अन्य मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों में सत्ता संघर्ष इस कदर बढ़ा कि यह किसी के संभालने से भी नहीं संभला। ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाकर प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश कर दी।  ओली के फैसले के बाद नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी फिर दो खेमों में बंट गई है। एक का नेतृत्व ओली कर रहे हैं और दूसरे का प्रचंड। ओली और प्रचंड दोनों; नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं। दोनों खेमे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न सूर्य को लेकर भी अपना दावा कर रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहे हैं। दोनों धड़ों ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी पर नियंत्रण रखने के लिए बहुमत होने का दावा किया है, लेकिन अभीतक किसी को नहीं पता है कि किस धड़े के नेतृत्व वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को मान्यता मिलेगी। इस बीच 24 दिसम्बर को निवर्तमान गृहमंत्री राम बहादुर थापा पाला बदलते हुए ओली खेमे में चले गए। राजशाही के खिलाफ संघर्ष में माओवादी नेता थापा, प्रचंड के अहम सहयोगी रहे हैं। थापा का कहना है कि फिर से चुनाव कराने का फैसला क्रांतिकारी कदम है। थापा के ओली खेमे में जाने से प्रचंड को बड़ा झटका लगा है। वहीं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल प्रचंड के साथ बने हुए हैं। कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली का कहना है कि उनके पास प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल की विकृत गतिविधियों के कारण यह स्थिति बनी है। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल कम्युनिस्ट आंदोलन को नष्ट करने पर तुले हैं। बहरहाल, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का इस तरह बंटना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को रास नहीं आया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दोनों खेमों को एक करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। चीनी नेताओं के काठमांडू दौरे पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपाध्यक्ष एवं प्रचंड के समर्थक राम कार्की का कहना है कि हमलोगों के बीच भाईचारे का रिश्ता न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से है बल्कि भारत और बांग्लादेश की कम्युनिस्ट पार्टियों से भी है। यह एक रूटीन दौरा है। चीनी नेताओं का यहां आना-जाना लगा रहता है। कार्की का कहना है कि ओली ने संसद भंग करने की सिफारिश कर गलत कदम उठाया है। ओली; कम्युनिस्ट एजेंडा चलाने के बजाय नव उदारवाद की राह पर बढ़ रहे हैं। चीन के प्रति नरम रुख रखने वाले ओली ने 20 दिसम्बर को अचानक पैंतरा बदलकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओली के रुख में यह परिवर्तन ऐसे ही नहीं आया, बल्कि इसका प्रमुख कारण 21अक्टूबर से 27 नवम्बर के बीच भारत के तीन शीर्ष अधिकारियों का नेपाल का दौरा है। पहले, भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख सामंत कुमार गोयल, फिर सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे और उसके बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे से ओली को एक संबल मिला और उन्होंने चीन के दबाव से अपने को मुक्त किया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 31 December 2020


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पवन कुमार अरविंद नेपाल पर अपनी पकड़ ढीली होती देख वहां की घरेलू राजनीति में इन दिनों चीन की सक्रियता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। चीन की यह सक्रियता स्पष्ट रूप से दिख भी रही है। 20 दिसम्बर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन की अपेक्षाओं से परे जाकर आनन-फानन में नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा को भंग करने की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से सिफारिश कर दी। ओली की सिफारिश के दो घंटे के अंदर राष्ट्रपति ने नेपाली संसद को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। अधिसूचना में कहा गया है, "राष्ट्रपति ने देश के संविधान के अनुच्छेद 76 और अनुच्छेद 85 के सेक्शन 1 एवं 7 के अनुसार संघीय संसद भंग किया है।" इसी के साथ राष्ट्रपति ने नए जनादेश के लिए 30 अप्रैल और 10 मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाने की घोषणा की। अधिसूचना के दो दिन बाद यानी 22 दिसम्बर को काठमांडू में चीन की राजदूत हाओ यांकी ने नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से मुलाकात की। करीब घंटाभर चली इस मुलाकात में क्या बातचीत हुई, दोनों पक्षों की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। हालांकि काठमांडू पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों के बीच मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति से मुलाकात के दो दिन बाद यानी 24 दिसम्बर को हाओ यांकी ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात की थी। वैसे, किसी भी देश में पदस्थ राजदूत आमतौर पर उस देश की आंतरिक राजनीति से दूर रहते हैं, लेकिन चीनी राजदूत यांकी अपनी तैनाती के बाद से ही नेपाल के नेताओं के साथ मेल-मुलाकात करती रही हैं। शायद वो अपने आका चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सौंपे कार्य को ही पूरा कर रही हैं। वहीं, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ एक उच्चस्तरीय टीम के साथ 27 दिसम्बर को काठमांडू पहुंचे और नेपाल की राष्ट्रपति भंडारी और कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से अलग-अलग मुलाकात की। येजोऊ ने 28 दिसम्बर को प्रचंड, माधव कुमार नेपाल एवं झालानाथ खनल (सभी पूर्व प्रधानमंत्री) से मुलाकात की। उसके बाद उन्होंने जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई से भी मुलाकात की। गुओ येजोऊ ने 29 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री एवं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा से उनके आवास पर मुलाकात की। येजोऊ ने देउबा को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होने पर अगले साल आयोजित होने वाले समारोह में आमंत्रित भी किया है। हालांकि देउबा को बुलाने की कोई योजना नहीं थी, लेकिन मुलाकात के दौरान येजोऊ ने उनको आमंत्रित करने का अचानक फैसला लिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की चार सदस्यीय यह टीम नेपाल में विभिन्न दलों के नेताओं का मन टटोल रही है। इसके साथ ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों को अपने गिले-शिकवे भुलाकर फिर से एक होने के लिए प्रयासरत है। दरअसल नेपाल में बरसों के राजनीतिक उथल-पुथल और संघर्षों के बाद 20 सितम्बर, 2015 को नया संविधान अंगीकृत किया गया। नए संविधान के अनुसार नेपाल में नवम्बर-दिसम्बर, 2017 में प्रथम संसदीय चुनाव हुए। यह चुनाव केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' की पार्टी सीपीएन-एमसी ने गठबंधन कर लड़ा था। नेपाली संसद के निचले सदन 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सीपीएन-यूएमएल को 121 और सीपीएन-एमसी को 53 सीटें प्राप्त हुईं। नेपाली कांग्रेस को 63, राष्ट्रीय जनता पार्टी (नेपाल) को 17 और अन्य को 21 सीटें मिली थीं। चुनाव परिणाम के बाद सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी के मिलन से नई पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई। दोनों दलों के विलय में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-मंत्री गुओ येज़ोऊ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस नई पार्टी, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दो अध्यक्ष बने। 66 वर्षीय प्रचंड को कार्यकारी अध्यक्ष और 68 वर्षीय ओली को अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2018 के पार्टी संविधान के अनुसार प्रचंड और ओली दोनों की पार्टी में बराबर की हैसियत थी। पार्टी की बैठकों की अध्यक्षता रोस्टर के अनुसार क्रमशः प्रचंड और ओली करते थे। चुनाव में अधिक सीटें जीतने के कारण ओली को प्रधानमंत्री का पद मिला। ओली ने 15 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुओ येज़ोऊ समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ओली सरकार ने 11 मार्च, 2018 को सदन में विश्वास मत हासिल किया। उनको 208 सांसदों का समर्थन मिला। सरकार गठन के बाद अपने-अपने लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कराने को लेकर ओली और प्रचंड के बीच खींचतान शुरू हो गई। सत्ता संघर्ष ज्यादा बढ़ जाने पर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर चीनी राजदूत होऊ यांकी स्थिति को संभालती रहीं। कई बार ऐसा भी हुआ जब ओली और प्रचंड के बीच बातचीत तक बंद हो गई तो होऊ यांकी ने दोनों नेताओं की बातचीत भी कराई थी। पिछले तीन-चार महीनों में भारत के साथ सीमा विवाद और सरकार में कुछ नियुक्तियों समेत अन्य मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों में सत्ता संघर्ष इस कदर बढ़ा कि यह किसी के संभालने से भी नहीं संभला। ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाकर प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश कर दी।  ओली के फैसले के बाद नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी फिर दो खेमों में बंट गई है। एक का नेतृत्व ओली कर रहे हैं और दूसरे का प्रचंड। ओली और प्रचंड दोनों; नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं। दोनों खेमे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न सूर्य को लेकर भी अपना दावा कर रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहे हैं। दोनों धड़ों ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी पर नियंत्रण रखने के लिए बहुमत होने का दावा किया है, लेकिन अभीतक किसी को नहीं पता है कि किस धड़े के नेतृत्व वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को मान्यता मिलेगी। इस बीच 24 दिसम्बर को निवर्तमान गृहमंत्री राम बहादुर थापा पाला बदलते हुए ओली खेमे में चले गए। राजशाही के खिलाफ संघर्ष में माओवादी नेता थापा, प्रचंड के अहम सहयोगी रहे हैं। थापा का कहना है कि फिर से चुनाव कराने का फैसला क्रांतिकारी कदम है। थापा के ओली खेमे में जाने से प्रचंड को बड़ा झटका लगा है। वहीं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल प्रचंड के साथ बने हुए हैं। कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली का कहना है कि उनके पास प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल की विकृत गतिविधियों के कारण यह स्थिति बनी है। प्रचंड और माधव कुमार नेपाल कम्युनिस्ट आंदोलन को नष्ट करने पर तुले हैं। बहरहाल, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का इस तरह बंटना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को रास नहीं आया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दोनों खेमों को एक करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। चीनी नेताओं के काठमांडू दौरे पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपाध्यक्ष एवं प्रचंड के समर्थक राम कार्की का कहना है कि हमलोगों के बीच भाईचारे का रिश्ता न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से है बल्कि भारत और बांग्लादेश की कम्युनिस्ट पार्टियों से भी है। यह एक रूटीन दौरा है। चीनी नेताओं का यहां आना-जाना लगा रहता है। कार्की का कहना है कि ओली ने संसद भंग करने की सिफारिश कर गलत कदम उठाया है। ओली; कम्युनिस्ट एजेंडा चलाने के बजाय नव उदारवाद की राह पर बढ़ रहे हैं। चीन के प्रति नरम रुख रखने वाले ओली ने 20 दिसम्बर को अचानक पैंतरा बदलकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओली के रुख में यह परिवर्तन ऐसे ही नहीं आया, बल्कि इसका प्रमुख कारण 21अक्टूबर से 27 नवम्बर के बीच भारत के तीन शीर्ष अधिकारियों का नेपाल का दौरा है। पहले, भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख सामंत कुमार गोयल, फिर सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे और उसके बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे से ओली को एक संबल मिला और उन्होंने चीन के दबाव से अपने को मुक्त किया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 31 December 2020


bhopal,Another symbol , development , rail service sector

सियाराम पांडेय 'शांत' रेल भारत को जोड़ने और एक करने का काम करती है। रेल को भारत की लाइफलाइन और संस्कृतियों व सभ्यताओं की वाहक कहा जाए तो कदाचित गलत नहीं होगा। रेल के विकास में बढ़ाया गया एक कदम भी इस देश को आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक और सांस्कृतिक मजबूती देता है। इसमें संदेह नहीं कि भारत निरंतर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। कोरोना जैसी संघातक बीमारी से देश अभी भी जूझ रहा है। कोरोनाजन्य लॉकडाउन के दौर में निर्विवाद रूप से इस देश का कारोबार और अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। भारतीय रेल भी इसका अपवाद नहीं है लेकिन ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के जरिए केंद्र सरकार ने विकास की जो नई इबारत लिखी है, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। लॉकडाउन हटने के बाद देश की औद्योगिक गतिविधियां ज्यों शुरू हुईं, किसानों का आंदोलन आरंभ हो गया। एक माह से अधिक समय से आंदोलित किसानों से केंद्र सरकार की 30 दिसंबर को वार्ता होनी है। वार्ता क्या रूप लेगी, सफल होगी या विफल, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन केंद्र सरकार ने किसानों के लिए चलाई गई 100 ट्रेनों की क्षमता बढ़ाने, उनकी गति बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है। यह किसानों को राहत देने वाली बात है। इस योजना के जरिए सरकार किसानों को फिर यह जताने की कोशिश कर रही है कि किसान भले आंदोलन के जरिए सरकार और जनता की परेशानी बढ़ाएं लेकिन सरकार उनका हित ही चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के वर्चुअली उद्घाटन को कमोवेश इसी रूप में देखा जा सकता है। अगर वह यह कह रहे हैं कि इस कॉरिडोर के रूट पर जब पहली मालगाड़ी की दौड़ में नए आत्‍मनिर्भर भारत की गूंज और गर्जना स्‍पष्‍ट सुनी जा सकती है तो वह गलत भी नहीं है। प्रधानमंत्री के शब्दों में आज का दिन न केवल खास है बल्कि भारतीय रेल के गौरवशाली इतिहास को 21वीं सदी की नई पहचान देने वाला है। यह दिन भारत व भारतीय रेल की सामर्थ्‍य बढ़ाने वाला है। 351 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर पर 5,750 करोड़ रुपये का खर्च आया है। कोरोना महामारी और किसानों, मजदूरों को आर्थिक सहयोग देते हुए सरकार ने अगर आम आदमी की परेशानियों को दूर करने वाला कोई कॉरिडोर बनाया है तो इससे उसकी सबका साथ-सबका विकास की भावना ही परिलक्षित होती है। इस कॉरिडोर के निर्माण के बाद जाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश को लाभ होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश का 75 प्रतिशत हिस्सा इस कॉरिडोर मार्ग से जुड़ता है। इसके निर्माण से मौजूदा कानपुर-दिल्‍ली मुख्‍य लाइन पर भीड़ का दबाव कम होगा और इससे भारतीय रेलों की गति भी बढ़ेगी। इसकी वजह यह है कि इस मार्ग पर केवल मालवाहक रेलगाड़ियां ही चलेंगी, इससे व्यापारियों को भी लाभ होगा और रेलयात्रियों की भी सुविधा बढ़ेगी। उन्हें अनावश्यक विलंब का सामना नहीं करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने प्रयागराज में स्थित परिचालन नियंत्रण केंद्र का भी उद्घाटन करते हुए कहा है कि देश में यात्री ट्रेन और मालगाड़ियां दोनों एक ही पटरी पर चलती हैं। मालगाड़ी की गति धीमी होती है, ऐसे में इन गाड़ियों को रास्‍ता देने के लिए यात्री ट्रेनों को रोका जाता है। इससे दोनों ट्रेनें विलंब से चलती हैं। उन्होंने बताया है कि इस कॉरिडोर में प्रबंधन और डेटा से जुड़ी नयी तकनीक का विकास देश के युवाओं ने ही किया है। उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की है कि मालगाड़ियां तीन गुना अधिक रफ्तार के साथ पटरी पर दौड़ सकेंगी। लगे हाथ उन्होंने राजनीतिक दलों को देश के संरचनात्मक और ढांचागत विकास पर राजनीति न करने की सलाह भी दी है। उन्होंने बेहद पते की बात कही है कि देश का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर किसी दल की विचारधारा का नहीं, देश के विकास का मार्ग होता है। यह आने वाली अनेक पीढ़ियों को लाभ देने का मिशन है। उन्होंने राजनीतिक दलों से इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की गुणवत्ता, गति और मानक को लेकर स्‍पर्धा करने का आग्रह किया है। विपक्ष का काम होता है सरकार का विरोध करना और वह ऐसा कर भी रहा है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे विकास कार्यों को निरंतर अंजाम देती रहें। लोकतंत्र की यही मांग भी है। विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनने के लिए भारत के लिए प्राथमिक जरूरत यह है कि उसके पास बेहतरीन संपर्क मार्ग हों। बेहतरीन क्षमता हो। जल, थल, नभ मार्ग से वह आसानी से कहीं भी आने-जाने में सक्षम हो। प्रधानमंत्री के इस दावे में दम है कि ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के बनने से औद्योगिक रूप से पिछड़े पूर्वी भारत को नई ऊर्जा मिलेगी। इस कॉरिडोर का करीब 60 प्रतिशत हिस्‍सा उत्‍तर प्रदेश में पड़ता है और इसका लाभ प्रदेश के हर छोटे-बड़े उद्योगों को मिलना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री ने प्रयागराज स्थित परिचालन नियंत्रण केंद्र को नये भारत के नये सामर्थ्‍य का प्रतीक और दुनिया के बेहतरीन आधुनिक नियंत्रण केंद्रों में से एक बताया है। प्रबंधन और डेटा से जुड़ी जो तकनीक है वह भारत में ही भारतीय युवाओं ने तैयार की है। इस रूट पर डबल डेकर मालगाड़ियों को भी चलाने की योजना है। जाहिर है, इससे इस कॉरिडोर के रूट पर मालगाड़ियां पहले से अधिक माल ढो सकेंगी। सच तो यह है कि इस नए फ्रेट कॉरिडोर में किसान रेल और तेजी से अपने गंतव्‍य पर पहुंचेगी। उत्‍तर प्रदेश में कई रेलवे स्‍टेशन और उसके आसपास के किसान न केवल इस रेलसेवा से जुड़ेंगे। कुछ जुड़ गए हैं। कुछ जुड़ रहे हैं। जिस तरह रेलवे स्‍टेशनों पर भंडारण क्षमता बढ़ाई जा रही है, उससे भी किसानों और व्यापारियों को लाभ होगा। भारत में आधुनिक रेलों का निर्माण और निर्यात दोनों हो रहा है। रायबरेली में अबतक पांच हजार से ज्‍यादा रेल कोच बन चुके हैं और विदेशों को भी निर्यात किये जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहां रेलवे का ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर का जंक्शन भी है। जाहिर है कि इसका लाभ यहां के कारोबारियों को होगा। इससे उत्तर प्रदेश में अधिकतम रोजगार सृजन की संभावनाएं भी बनेंगी। उत्तर प्रदेश में एक जिला-एक उत्पाद योजना प्रमुखता से चलाई जा रही है। ये फ्रेट कॉरिडोर हर जिले में बनने वाले उत्पादों को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने में भी सहायक होंगे। गौरतलब है कि यह योजना 11 साल पहले आरंभ हुई थी लेकिन तत्कालीन सरकार की उपेक्षा के चलते यह उस तेजी से आगे नहीं बढ़ पाई जितनी कि छह साल के मोदी राज में बढ़ी। इसका लाभ उत्तर प्रदेश के कानपुर, कन्नौज, कानपुर देहात, औरैया, फतेहपुर, इटावा, फिरोजाबाद, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़ और आसपास लगे उद्योग जगत के लिए ही लाभप्रद होगा, ऐसी बात नहीं है। 351 किलोमीटर लंबा यह ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर न्यू भाउपुर-न्यू खुर्जा सेक्शन तक है। इसकी कुल लंबाई 1856 किलोमीटर तक विस्तृत होनी है। पंजाब के लुधियाना से शुरू होकर हरियाणा, यूपी, बिहार और झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल के दानकुनी तक इसका विस्तार होना है। जाहिर है कि उक्त राज्य भी इस कॉरिडोर के लाभ से वंचित नहीं रहेंगे। यह सच है कि उत्तर प्रदेश में वंदे भारत व तेजस जैसी द्रुतगति वाली ट्रेनों का भी संचालन हो रहा है। 6 हजार से अधिक नई लाइन बनी हैं। अमान परिवर्तन हुआ है। रेल लाइनों के दोहरीकरण की परियोजनाओं पर काम चल रहा है कि आने वाले समय में भारत में ट्रेनें तेज गति से भी चलेंगी और नागरिकों को आधुनिक सुविधाओं से भी जोड़ेंगी। केंद्र सरकार 1504 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न कॉरिडोर का भी निर्माण करवा रही है। ये ग्रेटर नोएडा के दादरी से शुरू होकर मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक बन रहा है। केंद्र सरकार ने पूरे देश में मालवाहक ट्रेनों के लिए अलग से पटरियां बिछाने का जो फैसला लिया है, उसके दूरगामी प्रभावों और औद्योगिक विस्तार की संभावनाओं को नजरंदाज नहीं जा सकता।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 30 December 2020


bhopal,Understand city requirements

अरविन्द मिश्रा कुछ दिन पहले ही मध्य प्रदेश के रीवा में शहर नियोजन के क्षेत्र में एक ऐसा कदम बढ़ाया गया, जो यह बताने के लिए काफी है कि हमारे शहरों के विकास की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। दरअसल यहां स्थापित किए जा रहे कचरा संग्रहण केंद्र में 6 मेगावाट बिजली उत्पादन संयंत्र का शिलान्यास किया गया है। बताया जा रहा है कि इस कचरा संग्रहण प्लांट में संभाग के 28 नगरी निकायों का कचरा शोधित (रिसाइकिल) किया जाएगा। विशेष बात यह है कि अबतक ऐसे संयंत्रों से जहां खाद ही बनाई जाती थी, वहीं रीवा में स्थापित इस प्लांट से खाद के साथ ही बिजली भी तैयार होगी। एक अन्य उदाहरण उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से है, जहां शहर को प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए शहर में प्रदूषण नियंत्रण वाहन दौड़ता नजर आता है। यह प्रदूषण नियंत्रण वाहन एसटीपी से एकत्रित (गंदे पानी को शोधित कर) जल का छिड़काव करने के साथ सड़क किनारे पौधों को पानी देने समेत कई बहुउद्देशीय कार्य करता है। इसी प्रकार स्वच्छता की पोटली नामक अभिनव प्रयोग में नागरिकों की सहभागिता बढ़ी है। देखने में इन योजनाओं व प्रयासों का आकार भले ही छोटा नजर आए, लेकिन शहरी नियोजन के नजरिए से ये कुछ इस तरह के प्रयास हैं, जिससे हमारे शहर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनेंगे बल्कि यहां के बुनियादी ढांचे की उर्वरता भी बढ़ेगी। हां, शहरों को आत्मनिर्भर बनाने की इस यात्रा में नीति निर्धारकों, उसके क्रियान्वयन में जुटे प्रशासकों के साथ स्थानीय जनमानस को भी संजीदगी दिखानी होगी। इसी क्रम में एक नए दशक में प्रवेश करते हुए आइए हम कुछ ऐसे मुद्दों को टटोलने का प्रयास करते हैं, जो हमारे और आपके शहर के भविष्य को संवारने के लिए बेहद जरूरी हैं। दीर्घकालिक योजनाएं बनाएं : शहर के विकास से जुड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाते समय अक्सर स्थानीय निकाय तात्कालिक समस्याओं अथवा आगामी चार-छह वर्षों का ही आकलन करते हैं। बुनियादी अधोसंरचनाओं के विकास को मूर्त रूप देते समय यदि दो-चार दशक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए तो वह नियोजन कहीं अधिक टिकाऊ होगा। योजनाएं जब दीर्घकालिक नहीं होती हैं, तो वह किस तरह जनजीवन को प्रभावित करती है, उसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हमारे और आपके शहर की मुख्य सड़क, चौक-चौराहे पर हर दिन होने वाला पुनर्निर्माण कार्य है। शायद ही कोई दिन और महीना हो जब हमारे आसपास की सड़कों, जल निकासी व्यवस्थाओं, अंडर ग्राउंड केबल को ठीक करने के लिए व्यापक निर्माण कार्य न चलता हो। बेचारी जनता हर बार यही सोचकर स्थानीय निकायों की लापरवाही से धूल-धुसरित होती है कि आखिर उसके भविष्य की बेहतरी के लिए ही यह कार्य हो रहा है। सवाल है कि हर दिन उन्हीं बुनियादी अधोसंरचनाओं के पुन:र्निर्माण की आवश्यकता क्यों पड़ती है। कहीं ये स्थानीय निकाय, प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा शहर नियोजन के बुनियादी सिद्धातों की अनदेखी का परिणाम तो नहीं। भू-माफिया से शहर को बचाएं: देश में शायद ही ऐसा कोई शहर हो जहां भू-माफिया शहर की जमीन को अतिक्रमण के जरिए निगल न रहे हों। शहर वासियों को उम्मीद होती है, नेताजी इनसे जनता की रक्षा करेंगे, जबकि अंदरखाने पता चलता है कि नेता और नौकरशाह खुद भू-माफिया के राजनीतिक संरक्षणकर्ता होते हैं। शहरों में अवैध कॉलोनियों में घर कुछ इस तरह बने हैं, जैसे जंगल में खरपतवार। यदि राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो तो भू-माफिया से न सिर्फ शहर आजाद होंगे बल्कि सड़क, जल निकासी और यायायात की व्यवस्थाएं भी दुरुस्त हो सकेंगी। ई-कचरे का निस्तारण : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता को जिस प्रकार सामाजिक आह्वान बनाया है, उसका असर जमीन पर दिख रहा है, लेकिन अब कचरा एकत्र करने के साथ उसके निस्तारण की व्यवस्था करनी होगी। शहर से दूर कचरे की रिसाइकिल की व्यवस्था के साथ डंपिंग ग्राउंड का नेटवर्क होना चाहिए। विशेष रूप से ई-कचरा अब नए तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहा है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, मध्य प्रदेश के इंदौर, छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जैसे नगर निगमों ने कम संसाधनों में प्रदूषण से निजात पाने और कचरा निस्तारण की बेहतरीन व्यवस्था खड़ी की है। इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। देश के कुछ हिस्सों में हुए गार्बेज क्लीनिक के सफल प्रयोग को अपनाया जा सकता है। सीजीडी की तैयारी : शहरों में जीवन स्तर को गुणवत्ता प्रदान करने में ऊर्जा संसाधन और ईंधन की उपलब्धता प्रमुख कारक होती है। महानगरों की तर्ज पर अब छोटे शहरों में भी शहरी गैस वितरण प्रणाली (सीजीडी) का विस्तार किया जा रहा है। देश के 400 से अधिक शहरों में पाइपालइन के जरिए घरों तक एलपीजी की आपूर्ति की व्यवस्था खड़ी की जा रही है। लेकिन ईंधन आपूर्ति की इस व्यवस्था के लिए हमारे शहरों की कॉलोनियां कितनी तैयार हैं, इसकी समीक्षा होनी चाहिए। जिन छोटे शहरों में शहरी गैस वितरण प्रणाली का विस्तार होना है वहां अवैध आवासीय कॉलोनियों इस अधोसंरचना के विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। फिट इंडिया : जिस मोहल्ले या कॉलोनी में आप रहते हैं, वहां कितने व्यवस्थित पार्क और सामुदायिक भवन हैं। यह बुनियादी सुविधाएं कैसे हासिल की जा सकती हैं, इसपर विचार करें। फिट इंडिया के मंत्र को साकार करना है तो हर मोहल्ले और कॉलोनी में ओपन एयर जिम और पार्क आदि होने चाहिए। आखिर ऐसा क्यों है कि बड़े महानगरों में जहां भूमि की उपलब्धता कम है और जनसंख्या अधिक है, वहां पार्क और सामुदायिक भवन की संख्या पर्याप्त है, जबकि हमारे छोटे शहरों में इनकी संख्या नगण्य होती है। म्यूनिसिपल बांड का दौर : विकास की कोई भी योजना आर्थिक संसाधनों के बिना सफल नहीं हो सकती है। हाल ही में देश के 9 बड़े नगर निगमों ने म्यूनिसिपल बांड जारी करने की दिशा में सराहनीय कदम बढ़ाया है। ऐसे उपायों की तैयारी मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों को भी करनी चाहिए। इससे नगरीय निकाय आर्थिक रूप से स्वावलंबी तो होंगे ही योजनाओं की आर्थिक चुनौतियों का भी संधान होगा। स्वास्थ्य संकट से बचने की तैयारी : किसी जमाने में कॉलेरा और प्लेग जैसी महामारियों से बचने के लिए शहरों ने स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूती दी थी। अब कोरोना जैसे अदृश्य विषाणु एवं जैविक खतरों की चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम व्यवस्था खड़ी करने का वक्त आ गया है। वर्तमान में सरकार जीडीपी का 1.6 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं में खर्च करती है। 2024 तक सरकार जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं में समर्पित करेगी। इसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी नगरीय निकायों की होगी। स्थापित हो क्लीन स्ट्रीट फूड जोन : हमारे शहरों में पिछले कुछ वर्षों के भीतर चौपाटी विकसित की गई हैं। इन चौपाटियों को एफएसएसएआई के ईट राइट मूवमेंट से जोड़ना होगा। इससे क्लीन स्ट्रीट फूड जोन (हब) स्थापित करने में मदद मिलेगी, जिसका सीधा फायदा रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा देने के रूप में मिलेगा। रोबोटिक्स और एआई का दौर : हमारे स्थानीय निकायों को अब तकनीक उन्मुख होना पड़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन रहे हैं। अमेरिका और यूरोप होते हुए तकनीकी क्रांति धीरे-धीरे भारत में दस्तक दे रही है। कॉर्पोरेट जगत से सीख लेते हुए स्थानीय निकायों को अब टैक्स कलेक्शन, बिल पेमेंट, सिक्यूरिटी सर्विलांस, रेस्कूय मिशन, फेसियल रिकॉग्निशन, स्कैनिंग, मैपिंग, डिजास्टर और ट्रैफिक मैनेजमेंट समेत अनेक नागरिक सुविधाओं के लिए नवाचार का अनुप्रयोग बढ़ाना होगा। महानगरों से अधिक प्रदूषण : कभी प्रदूषण के समाचार सिर्फ दिल्ली और बड़े महानगरों से जुड़े होते थे। लेकिन अब आए दिन हमारे अपने शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स दिल्ली को भी पीछे छोड़ता नजर आता है। ये बात सच है कि इसकी बड़ी वजह शहर में चलने वाली विनिर्माण गतिविधियां हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में भी पराली (पियरा) जलाने का चलन बढ़ा है। इसका समाधान शीघ्र निकालना होगा। ये हमारे और आपके शहर से जुड़े कुछ ऐसे बुनियादी मुद्दे हैं, जिनपर हर जनप्रतिनिधि को संजीदा होना होगा। यह तभी मुमकिन है जब शहर को संवारने को लेकर शहर से जुड़ा हर नागरिक न सिर्फ मुखर हो बल्कि बल्कि स्थानीय प्रशासन के साथ जन हित के मुद्दों पर सहयोग और संवाद के क्रम को भी बढ़ाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 December 2020


bhopal,Understand city requirements

अरविन्द मिश्रा कुछ दिन पहले ही मध्य प्रदेश के रीवा में शहर नियोजन के क्षेत्र में एक ऐसा कदम बढ़ाया गया, जो यह बताने के लिए काफी है कि हमारे शहरों के विकास की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। दरअसल यहां स्थापित किए जा रहे कचरा संग्रहण केंद्र में 6 मेगावाट बिजली उत्पादन संयंत्र का शिलान्यास किया गया है। बताया जा रहा है कि इस कचरा संग्रहण प्लांट में संभाग के 28 नगरी निकायों का कचरा शोधित (रिसाइकिल) किया जाएगा। विशेष बात यह है कि अबतक ऐसे संयंत्रों से जहां खाद ही बनाई जाती थी, वहीं रीवा में स्थापित इस प्लांट से खाद के साथ ही बिजली भी तैयार होगी। एक अन्य उदाहरण उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से है, जहां शहर को प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए शहर में प्रदूषण नियंत्रण वाहन दौड़ता नजर आता है। यह प्रदूषण नियंत्रण वाहन एसटीपी से एकत्रित (गंदे पानी को शोधित कर) जल का छिड़काव करने के साथ सड़क किनारे पौधों को पानी देने समेत कई बहुउद्देशीय कार्य करता है। इसी प्रकार स्वच्छता की पोटली नामक अभिनव प्रयोग में नागरिकों की सहभागिता बढ़ी है। देखने में इन योजनाओं व प्रयासों का आकार भले ही छोटा नजर आए, लेकिन शहरी नियोजन के नजरिए से ये कुछ इस तरह के प्रयास हैं, जिससे हमारे शहर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनेंगे बल्कि यहां के बुनियादी ढांचे की उर्वरता भी बढ़ेगी। हां, शहरों को आत्मनिर्भर बनाने की इस यात्रा में नीति निर्धारकों, उसके क्रियान्वयन में जुटे प्रशासकों के साथ स्थानीय जनमानस को भी संजीदगी दिखानी होगी। इसी क्रम में एक नए दशक में प्रवेश करते हुए आइए हम कुछ ऐसे मुद्दों को टटोलने का प्रयास करते हैं, जो हमारे और आपके शहर के भविष्य को संवारने के लिए बेहद जरूरी हैं। दीर्घकालिक योजनाएं बनाएं : शहर के विकास से जुड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाते समय अक्सर स्थानीय निकाय तात्कालिक समस्याओं अथवा आगामी चार-छह वर्षों का ही आकलन करते हैं। बुनियादी अधोसंरचनाओं के विकास को मूर्त रूप देते समय यदि दो-चार दशक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए तो वह नियोजन कहीं अधिक टिकाऊ होगा। योजनाएं जब दीर्घकालिक नहीं होती हैं, तो वह किस तरह जनजीवन को प्रभावित करती है, उसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हमारे और आपके शहर की मुख्य सड़क, चौक-चौराहे पर हर दिन होने वाला पुनर्निर्माण कार्य है। शायद ही कोई दिन और महीना हो जब हमारे आसपास की सड़कों, जल निकासी व्यवस्थाओं, अंडर ग्राउंड केबल को ठीक करने के लिए व्यापक निर्माण कार्य न चलता हो। बेचारी जनता हर बार यही सोचकर स्थानीय निकायों की लापरवाही से धूल-धुसरित होती है कि आखिर उसके भविष्य की बेहतरी के लिए ही यह कार्य हो रहा है। सवाल है कि हर दिन उन्हीं बुनियादी अधोसंरचनाओं के पुन:र्निर्माण की आवश्यकता क्यों पड़ती है। कहीं ये स्थानीय निकाय, प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा शहर नियोजन के बुनियादी सिद्धातों की अनदेखी का परिणाम तो नहीं। भू-माफिया से शहर को बचाएं: देश में शायद ही ऐसा कोई शहर हो जहां भू-माफिया शहर की जमीन को अतिक्रमण के जरिए निगल न रहे हों। शहर वासियों को उम्मीद होती है, नेताजी इनसे जनता की रक्षा करेंगे, जबकि अंदरखाने पता चलता है कि नेता और नौकरशाह खुद भू-माफिया के राजनीतिक संरक्षणकर्ता होते हैं। शहरों में अवैध कॉलोनियों में घर कुछ इस तरह बने हैं, जैसे जंगल में खरपतवार। यदि राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो तो भू-माफिया से न सिर्फ शहर आजाद होंगे बल्कि सड़क, जल निकासी और यायायात की व्यवस्थाएं भी दुरुस्त हो सकेंगी। ई-कचरे का निस्तारण : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता को जिस प्रकार सामाजिक आह्वान बनाया है, उसका असर जमीन पर दिख रहा है, लेकिन अब कचरा एकत्र करने के साथ उसके निस्तारण की व्यवस्था करनी होगी। शहर से दूर कचरे की रिसाइकिल की व्यवस्था के साथ डंपिंग ग्राउंड का नेटवर्क होना चाहिए। विशेष रूप से ई-कचरा अब नए तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहा है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, मध्य प्रदेश के इंदौर, छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जैसे नगर निगमों ने कम संसाधनों में प्रदूषण से निजात पाने और कचरा निस्तारण की बेहतरीन व्यवस्था खड़ी की है। इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। देश के कुछ हिस्सों में हुए गार्बेज क्लीनिक के सफल प्रयोग को अपनाया जा सकता है। सीजीडी की तैयारी : शहरों में जीवन स्तर को गुणवत्ता प्रदान करने में ऊर्जा संसाधन और ईंधन की उपलब्धता प्रमुख कारक होती है। महानगरों की तर्ज पर अब छोटे शहरों में भी शहरी गैस वितरण प्रणाली (सीजीडी) का विस्तार किया जा रहा है। देश के 400 से अधिक शहरों में पाइपालइन के जरिए घरों तक एलपीजी की आपूर्ति की व्यवस्था खड़ी की जा रही है। लेकिन ईंधन आपूर्ति की इस व्यवस्था के लिए हमारे शहरों की कॉलोनियां कितनी तैयार हैं, इसकी समीक्षा होनी चाहिए। जिन छोटे शहरों में शहरी गैस वितरण प्रणाली का विस्तार होना है वहां अवैध आवासीय कॉलोनियों इस अधोसंरचना के विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। फिट इंडिया : जिस मोहल्ले या कॉलोनी में आप रहते हैं, वहां कितने व्यवस्थित पार्क और सामुदायिक भवन हैं। यह बुनियादी सुविधाएं कैसे हासिल की जा सकती हैं, इसपर विचार करें। फिट इंडिया के मंत्र को साकार करना है तो हर मोहल्ले और कॉलोनी में ओपन एयर जिम और पार्क आदि होने चाहिए। आखिर ऐसा क्यों है कि बड़े महानगरों में जहां भूमि की उपलब्धता कम है और जनसंख्या अधिक है, वहां पार्क और सामुदायिक भवन की संख्या पर्याप्त है, जबकि हमारे छोटे शहरों में इनकी संख्या नगण्य होती है। म्यूनिसिपल बांड का दौर : विकास की कोई भी योजना आर्थिक संसाधनों के बिना सफल नहीं हो सकती है। हाल ही में देश के 9 बड़े नगर निगमों ने म्यूनिसिपल बांड जारी करने की दिशा में सराहनीय कदम बढ़ाया है। ऐसे उपायों की तैयारी मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों को भी करनी चाहिए। इससे नगरीय निकाय आर्थिक रूप से स्वावलंबी तो होंगे ही योजनाओं की आर्थिक चुनौतियों का भी संधान होगा। स्वास्थ्य संकट से बचने की तैयारी : किसी जमाने में कॉलेरा और प्लेग जैसी महामारियों से बचने के लिए शहरों ने स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूती दी थी। अब कोरोना जैसे अदृश्य विषाणु एवं जैविक खतरों की चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम व्यवस्था खड़ी करने का वक्त आ गया है। वर्तमान में सरकार जीडीपी का 1.6 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं में खर्च करती है। 2024 तक सरकार जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं में समर्पित करेगी। इसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी नगरीय निकायों की होगी। स्थापित हो क्लीन स्ट्रीट फूड जोन : हमारे शहरों में पिछले कुछ वर्षों के भीतर चौपाटी विकसित की गई हैं। इन चौपाटियों को एफएसएसएआई के ईट राइट मूवमेंट से जोड़ना होगा। इससे क्लीन स्ट्रीट फूड जोन (हब) स्थापित करने में मदद मिलेगी, जिसका सीधा फायदा रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा देने के रूप में मिलेगा। रोबोटिक्स और एआई का दौर : हमारे स्थानीय निकायों को अब तकनीक उन्मुख होना पड़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन रहे हैं। अमेरिका और यूरोप होते हुए तकनीकी क्रांति धीरे-धीरे भारत में दस्तक दे रही है। कॉर्पोरेट जगत से सीख लेते हुए स्थानीय निकायों को अब टैक्स कलेक्शन, बिल पेमेंट, सिक्यूरिटी सर्विलांस, रेस्कूय मिशन, फेसियल रिकॉग्निशन, स्कैनिंग, मैपिंग, डिजास्टर और ट्रैफिक मैनेजमेंट समेत अनेक नागरिक सुविधाओं के लिए नवाचार का अनुप्रयोग बढ़ाना होगा। महानगरों से अधिक प्रदूषण : कभी प्रदूषण के समाचार सिर्फ दिल्ली और बड़े महानगरों से जुड़े होते थे। लेकिन अब आए दिन हमारे अपने शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स दिल्ली को भी पीछे छोड़ता नजर आता है। ये बात सच है कि इसकी बड़ी वजह शहर में चलने वाली विनिर्माण गतिविधियां हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में भी पराली (पियरा) जलाने का चलन बढ़ा है। इसका समाधान शीघ्र निकालना होगा। ये हमारे और आपके शहर से जुड़े कुछ ऐसे बुनियादी मुद्दे हैं, जिनपर हर जनप्रतिनिधि को संजीदा होना होगा। यह तभी मुमकिन है जब शहर को संवारने को लेकर शहर से जुड़ा हर नागरिक न सिर्फ मुखर हो बल्कि बल्कि स्थानीय प्रशासन के साथ जन हित के मुद्दों पर सहयोग और संवाद के क्रम को भी बढ़ाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 December 2020


bhopal, New year will be full of hope

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा कोविड-19 के त्रासद अनुभव के बीच हम 2021 का फीका-फीका स्वागत करने जा रहे हैं। फीका इसलिए कि कोरोना के साये में बीता 2020 जाते-जाते भी स्ट्रेन का भयावह चेहरा दिखाते हुए विदा ले रहा है। भले लोग इसे सदी का भयावह साल मानें पर सही मायने में देखा जाए तो मानव इतिहास के सबसे भयावह सालों में से 2020 का साल रहा है। हालांकि 2020 के साल की भयावहता का आभास तो 2019 की अंतिम तिमाही में ही होने लगा था जब चीन के बुहान में कोरोना के मामले सामने आने लगे। हमारे देश में इसकी भयावहता मार्च के पहले पखवाड़े के खत्म होते-होते सामने आने लगी थी। कोविड-19 ने जीवन के हर क्षेत्र में अपना असर छोड़ा है। देखा जाए तो कोरोना सही मायने में कार्ल मार्क्स के साम्यवाद का प्रत्यक्ष अवतार माना जा सकता है, जिसने शक्तिशाली, अति विकसित से लेकर कमजोर व अविकसित देशों तक किसी को नहीं छोड़ा तो अमीर से लेकर गरीब तक समान रूप से इसके कुप्रभाव से बच नहीं सके। कोरोना के असर को लेकर उसपर कोई भी देश और कोई भी नागरिक पक्षपात का आरोप नहीं लगा सकता। इसका असर किसी एक देश पर नहीं पड़कर समूची दुनिया के देशों में देखने को मिला है। एक ओर जहां लंबे लॉकडाउन के चलते बिना किसी भेदभाव के घर में कैद होने का अनुभव कराया तो दूसरी और शुरुआती दौर में सभी गतिविधियों और अब भी बहुत-सी गतिविधियों पर लगभग विराम ही लगा दिया। शुरुआती दौर में कोरोना के नाम से इस तरह भय का अनुभव भी रहा जब सारी मानवीय संवेदनाओं को ताक में रखे देखा। दूसरी ओर समाज का एक उजला पक्ष भी सामने आया जब धरती के साक्षात भगवान यानी चिकित्सकों और उनसे जुड़े चिकित्सा कर्मियों के सेवाभाव के साक्षात दर्शन किए। डरते-डरते भी लोग एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आए। अन्नदाता की मेहनत का असर भी देखने को मिला कि देश-दुनिया में घर की चारदीवारी में कैद होने के बावजूद कोई भूखा नहीं रहा। इस महामारी ने आपदा प्रबंधन का भी नया अनुभव कराया। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, को चरितार्थ करते हुए इनोवेशन और नवाचारों की देन इस दौरान साफ तौर से देखी जा सकती है। 2020 इसलिए भी याद किया जाएगा जब संभवतः मानव इतिहास में इतने नए शब्दों से समूची दुनिया को साक्षात होना पड़ा। जिस तरह का लॉकडाउन 2020 में देखने को मिला, मानव इतिहास में इस तरह का लॉकडाउन का भी पहला ही अनुभव होगा। सोचिए लॉकडाउन से लेकर सोशल डिस्टेसिंग तक के शब्दों और उनका प्रत्यक्ष उपयोग इसी साल देखने को मिला है। लॉकडाउन, क्वारंटाइन, सुपर स्प्रेडर, कंटोनमेंट जोन, आइसोलेशन, जूम, कांटेक्ट ट्रेसिंग, रेमडेसिविर, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, पीपीई किट, सोशल डिस्टेसिंग, हेल्थ एडवाइजरी, डेडिकेटेड कोविड सेंटर, वेबिनार, वर्चुअल मीटिंग्स, वर्चुअल सुनवाई, वर्क फ्राम होम आदि से लगभग प्रतिदिन साक्षात होना पड़ा। मास्क केवल डाक्टरों के लिए वो भी ऑपरेशन थिएटर के लिए जाना जाता था, वह हर व्यक्ति की अनिवार्य जरूरत बन गया तो कोरोना वैक्सिन को लेकर वैज्ञानिकों के प्रयास काफी हद तक सफल रहे। लगभग थम चुकी आर्थिक गतिविधियां साल की तीसरी तिमाही तक पटरी पर आने लगी तो आर्थिक क्षेत्र में थोड़ा आशा का संचार दिखाई देने लगा है। 2020 की आखिरी तिमाही में जो आशा का संचार होने लगा था वह साल के अंत तक इंग्लैण्ड में पाए गए कोरोना के नए अवतार स्ट्रेन से हिलाकर रख दिया है। इसे रोकने के लिए इंग्लैण्ड के साथ ही दुनिया के कई देश ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, दक्षिणी अफ्रिका जैसे देश नए साल में लॉकडाउन लगाने की तैयारी में हैं तो भारत सहित दुनिया के लगभग सभी देशों ने नए साल के जश्न मनाने पर रोक लगा दी है। ऐसे में नए साल के जश्न की बात तो दूर की बात है पर कोरोना वैक्सिन से लोगों में आशा का संचार अवश्य होने लगा है। देश में डेडिकेटेड कोविड सेंटरों और केन्द्र व राज्य की सरकारों ने जिस संवेदनशीलता से कोरोना आपदा का प्रबंधन किया है वह नई आशा का संचार लेकर आया है। इसी तरह से देश में जिस तरह से पीपीई किट जिनके लिए विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था आज हम निर्यात करने लगे है। मॉस्क और सेनेटाइजर का कुटीर उद्योग सामने आया है तो वेंटिलेटरों का देश की मांग के अनुसार निर्माण होने लगा है। उद्योग धंधे भी लगभग पटरी पर आने लगे हैं तो अर्थव्यवस्था में सुधार की आशा भी तेजी से बंधी है। रोजगार के अवसर बढ़ाने के समग्र प्रयास जारी है। किसान आंदोलन को अलग रख दिया जाए तो देश के आर्थिक हालात तेजी से पटरी पर आने लगे हैं। फिर भी इससे नकारा नहीं जा सकता कि 2021 के शुरुआती छह माहों से कोई खास आशा नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि कोरोना के नए रूप का असर और कोरोना वैक्सिन की उपलब्धता के चलते छह माह तो चुनौती भरे ही रहने वाले हैं। फिर भी निराश इस कारण नहीं होना चाहिए कि नया आता है वह अपने आप में अनेक संभावनाओं को लेकर आता है। वैक्सिन की उपलब्धता से आशा का संचार हुआ है तो आर्थिक गतिविधियां संचालित होने से अर्थव्यवस्था में सुधार की चहुंओर आशा व्यक्त की जा रही है। सबसे बड़ी बात कि लोगों में आत्मविश्वास जगा है और इसे शुभ संकेत माना जा सकता है। मानव इतिहास में ऐसे अवसर आते रहते हैं और जाते रहते हैं। इन सब हालातों के बीच आशाओं भरा 2021 आरंभ हो रहा है आशा की जानी चाहिए कि 2021 हालातों को सामान्य बनाने में सहायक सिद्ध होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 December 2020


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योगेश कुमार सोनी दुनिया को संकट में डालने वाले कोरोना वायरस से अभी निकले नहीं कि एक और नए वायरस ने दस्तक दे दी। बीते शनिवार अफ्रीका के कांगो में एक महिला में अजीब से लक्षण दिखे जिसे डॉक्टर ने साधारण बीमारी न मानते हुए किसी वायरस का शिकार समझा। लक्षण दिखने के बाद मरीज को आइसोलेट किया और उसके बाद इबोला टेस्ट के लिए सेंपल भेजे और रिपोर्ट नेगेटिव आई। इसके बाद पूरे देश में हलचल मच गई व दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों व शोधकर्ताओं के अनुसार यह वायरस दुनिया में बहुत तेजी से फैल सकता है। अज्ञात बीमारी होने के कारण अभीतक इस वायरस को डिजीज-एक्स का नाम दिया है। कांगो की मीडिया के अनुसार जो डॉक्टर इस वायरस से पीड़ित महिला का इलाज कर रहे हैं उनका कहना है कि यह बीमारी कोई काल्पनिक नहीं है। जिस तरह कोरोना व इबोला जैसे घातक वायरस के बारे किसी को जानकारी व यकीन नहीं हुआ था, उसी तरह इसपर भी लोग जल्द भरोसा नहीं कर पा रहे हैं लेकिन यह भी बहुत खतरनाक वायरस के रूप में फैल सकता है। इस वायरस को पहचानने व समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सबूत जुटाने शुरू कर दिए व स्पष्ट शब्दों में कहा है कि हमें इस वायरस से भी डरने व बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। ज्ञात हो कि 1976 में प्रोफेसर टैम्फम ने इबोला वायरस की पहचान करके पूरी दुनिया को इस घातक वायरस से अवगत कराया था। अब इस नए वायरस की खोज पर भी काम कर रहे हैं। अस्सी के दशक में कांगो के यम्बुकु मिशन अस्पताल में पहली बार खतरनाक वायरस की पुष्टि हुई थी जिसे इबोला का नाम दिया था। उस समय अस्पताल में काम कर रहे 90 प्रतिशत स्टॉफ व मरीजों की मौत हो गई थी। इसके बाद स्थिति को नियंत्रित करना किसी चुनौती से कम नहीं था, हर रोज कई जानें जाती रही थी।लगभग एक वर्ष बाद स्थिति काबू में आई थी। इससे पहले व बाद में भी कई तरह के नए वायरस आए लेकिन जल्द ही उनको नियंत्रित कर लिया लेकिन 2020 में आए कोरोना ने पूरी दुनिया को इस कदर हिला रखा है कि लाखों लोगों की जानें लेने के बाद भी यह वायरस काबू में नहीं आ रहा है। ऐसी स्थिति में यदि डिजीज-एक्स ने भी पैर पसार लिए तो दुनिया तबाही की ओर जा सकती है। चूंकि कोरोना में अपने आप को दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति कहने वाले देशों की पोल खुलती दिखी। अमेरिका व रूस समेत जिन देशों का यह कहना था कि वह किसी भी बड़ी से बड़ी व खतरनाक स्थितियों पर नियंत्रण पा सकते हैं, वे भी पूर्ण रूप से विफल होते नजर आए। तमाम विकासशील देश अबतक वैक्सीन नहीं बना पाए जिससे यह तो तय हो गया कि वायरस के रूप में अज्ञात व अदृश्य शत्रु से लड़ना और उसपर विजय पाना मुश्किल है। अब ऐसे वायरसों से डरना जरूरी हो गया। चूंकि अबतक कोरोना को लेकर यह भी पता नहीं लगा कि यह प्राकृतिक वायरस है या अप्राकृतिक?  तीन दिनों पूर्व ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक ने कहा कि साउथ अफ्रीका से आए दो यात्रियों में पहले से ज्यादा संक्रामक वायरस मिला है। जिससे बड़े स्तर पर इन्फेक्शन फैल सकता है। इसके अलावा इससे पहले स्ट्रेन मिला था जो ब्रिटेन के साउथ-वेस्ट, मिडलैंड और नॉर्थ इंग्लैंड में भी पहुंच गया है। इस वजह से अबतक चालीस देश ब्रिटेन में ट्रैवल बैन लगा चुके हैं। यदि वायरसों की वजह के इस तरह बैन लगते रहे तो पूरे विश्व की इकोनॉमी बड़े स्तर पर प्रभावित होगी। दुनिया में ज्यादा देश रोजमर्रा वाली तर्ज पर जिंदगी जीते हैं। यदि हमारे देश के परिवेश में बात की जाए तो कोरोना के प्रभाव से अभीतक पूर्ण रूप से नही उबर पाए हैं। हर रोज नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। सरकारों का अपने स्तर पर इस भयावह संकट से निकालना जारी है लेकिन व्यापार या नौकरी एक-दूसरे का पूरक होकर संचालित होती है। आसान भाषा में समझने के लिए गाड़ी के चारों पहिए जब चलते हैं तभी गाड़ी चलती है। इसी प्रकार सभी देश एक-दूसरे से व्यापार करके अपनी गति को बढ़ावा देते हैं जिससे सालाना करोड़ों-अरबों का व्यापार होता है। यदि इस तरह वायरसों की वजह से प्रतिबंध लगता रहा तो दुनिया का भविष्य अच्छा नहीं होगा। प्रतिबंध से अस्थिरता आ रही है, जिस वजह से व्यापारी माल का लेने-देन करने में संकोच महसूस कर रहे हैं। बहरहाल इसी तरह नए-नए वायरस यदि आते रहे तो दुनिया भारी असमंजस में फंस जाएगी। इन वायरसों पर नियंत्रण नहीं हो पाया गया तो मानव जीवन के सामने संकट पैदा हो जाएगा। इसलिए सफाई व सोशल डिस्टेंसिंग के अलावा शासन-प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन और एहतियात बरतने की जरूरत है, जिससे सभी सुरक्षित रहें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 December 2020


bhopal,Corona: there should be no laxity

ऋतुपर्ण दवे इस सदी की वैश्विक महामारी कोरोना यानी कोविड-19 को दुनिया में दस्तक दिए पूरा एक साल बीत चुका है। कोरोना को लेकर पहली बार नया और दुनिया भर में चर्चित सच सामने आया कि यह इंसान के दिमाग का फितूर है जो चीन की प्रयोगशाला की करतूत है। कोरोना से हुई मौतों और दुनिया की मौजूदा आबादी के अनुपात को देखें तो थोड़ी राहत की बात यह है कि यह सजगता थी जो महामारी को बिना दवाई के काफी हद तक फैलने से रोका। लेकिन मेडिकल साइंस के लिए कोरोना अभी चुनौती बना हुआ है। जल्द इससे पूरी तरह छुटकारा मिल पाने की सोचना बेमानी होगी। साल भर में ही कोरोना के नए-नए रूप सामने आने लगे हैं। लोगों के सामने कोविड के असर, नए आकार-प्रकार और प्रभाव को लेकर निश्चित रूप से हर रोज नई-नई और चौंकाने वाली जानकारियाँ सामने आएंगी। स्वाभाविक है कि कई तरह के भ्रम भी होंगे लेकिन सबसे अहम यह कि दुष्प्रभावों और सावधानी का जो असर दिखा उसे ही दवा मानकर बहुरूपिया कोरोना को अबतक मात दी गई। चिन्ता की बात बस यही है कि लोग जानते हुए भी सतर्कता नहीं बरत रहे हैं, जो सबसे जरूरी है। यह तो मानना होगा कि कोरोना पूरी दुनिया के जीवन का फिलहाल तो हिस्सा बना ही हुआ है। आगे कबतक बना रहेगा नहीं पता। पता है तो बस यही कि कोरोना जल्द जाने वाला नहीं। सबको यही समझना होगा और कोरोना के साथ रहकर ही जीना होगा। इससे जीतने के लिए दवाई के साथ ही पूरी सावधानी, दक्षता और बदलते तौर-तरीकों को सीखना होगा।  कबतक लॉकडाउन, नाइट कर्फ्यू रहे? कबतक हवाई, रेल और सड़क यातायात को रोका जाए? जाहिर है देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था की यही तो धुरी हैं। अगर यही बार-बार थमेंगी तो व्यापार-व्यवसाय पर भी बुरा असर पड़ेगा जिसका खामियाजा आम और खास सभी को भुगतना होगा। हाँ, यह इक्कीसवीं सदी है, बड़ी से बड़ी चुनौती यहाँ तक कि चाँद और मंगल को भी छू लेने की सफलता का सेहरा बांधे दुनिया अब इस संक्रामक महामारी पर भी जीत हासिल करने की राह पर निकल पड़ी है। यह भी सच है कि किसी बड़े लक्ष्य या चुनौती से निपटने के लिए तैयारियाँ भी काफी पहले और बेहद लंबी-चौड़ी करनी पड़ती है। लेकिन यह तो एकाएक आई आपदा है, जिससे निपटने में वक्त तो लगेगा। बस इसी दौर को होशियारी से काटना होगा। देश में संभावित टीके को जनवरी में बाजार में उतारने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारतीय औषधि नियामक की नजर ब्रिटेन पर है जो ऑक्सफोर्ड निर्मित कोविड-19 के टीके को इसी हफ्ते मंजूरी दे सकता है। यदि ऐसा हुआ तो केन्द्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ में कोविड-19 विशेषज्ञ समिति की बैठक होगी जिसमें देश-विदेश में क्लिनिकल ट्रायल से प्राप्त सुरक्षा एवं प्रतिरक्षा क्षमता के आंकड़ों की गहराई से समीक्षा होगी, उसके बाद ही भारत में टीके के आपात इस्तेमाल संबंधी मंजूरी मिल सकेगी। हालाकि वायरस के नए प्रकार के सामने आने से संभावित एवं विकसित होते टीकों पर किसी तरह के प्रभाव की संभावना से वैज्ञानिक फिलहाल इनकार कर रहे हैं। लेकिन सारा कुछ टीके के आने व उपयोग में लाने के बाद ही साफ हो पाएगा। फिलहाल दवा में सुअर की चर्बी के उपयोग की चर्चा के बीच नया विवाद भी उफान पर है। कुछ उपयोग के खिलाफ तो कुछ परिस्थितियों के देखते हुए उपयोग के पक्ष में। वहीं इतिहास बताता है कि कोई भी महामारी इतनी जल्दी कभी खत्म नहीं हुई है। हाँ फैलाव सतर्कता से ही रोका गया। बस कोविड-19 के साथ भी ऐसा ही जरूरी है। वैक्सीन आने के बाद सब तक पहुँचने और किसे पहले किसे बाद की प्राथमिकताओं के चलते लंबा वक्त लगना सुनिश्चित है। साथ ही कई बदलाव, प्रभाव और दुष्प्रभावों का भी दौर चलेगा। कोरोना के नित नए रूप, वैक्सीन और उसके उपयोग की ऊहापोह बीच बिना किसी साइड इफेक्ट के कोरोना से निपटने का कारगर मंत्र दो गज की दूरी, मास्क जरूरी- ये तो सबको पता है। बस यही समझना और इसे समझकर जंग जीतना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 December 2020


bhopal,new year ,will not be auspicious , beating the plate

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष के अंत में अपने मन की आखिरी बात की। उनकी मन की बात का दिल्ली सीमा पर आंदोलित किसानों ने थाली बजाकर विरोध किया। तर्क दिया कि मोदी जी ने कहा था कि ताली और थाली बजाने से कोरोना भाग जाएगा। हम थाली इसलिए बजा रहे हैं कि कृषि कानून भाग जाए और हमारा नववर्ष मंगलमय हो जाए। सवाल उठता है कि किसानों को कानून चाहिए या नहीं। अपनी बात मनवाने के लिए वे पूरे एक माह से आंदोलन कर रहे हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है। किसान कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री अपने मन की बात कहकर चले जाते हैं लेकिन हमारी बात नहीं सुनते। उनके समर्थक नेता भी कुछ इसी तरह की बात करते हैं कि उनके मन की बात सुनी जाए। लोग अपने तरीके से अपने मन की बात करते भी हैं। इस देश का हर व्यक्ति कुछ न कुछ बोलता हो लेकिन उसके सुने जाने की अपनी सीमा होती है। बात सब सुनें, इसके लिए पात्रता तो जरूरी होती ही है, बात में दम भी होना चाहिए। इस बात को कदाचित कोई समझना नहीं चाहता। तिस पर शिकायत यह कि कोई उसकी बात नहीं सुन रहा है। तर्क और तथ्य के आईने में कही गई बात ही संसार गौर करता है। प्रधानमंत्री होने के नाते नरेंद्र मोदी को सबके मन की बात सुननी चाहिए। यह उनका धर्म भी है और दायित्व भी। अगर वे हर माह अपने मन की बात कहकर इस देश की जनता का मनोबल बढ़ाते हैं, उन्हें कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। कुछ नवोन्मेष करने की बात करते हैं। कौशल प्रशिक्षण और अपने में काबिलियत पैदा करने की सलाह देते हैं तो इसमें गलत क्या है? भारतीय संस्कृति में ताली तब बजाई जाती है जब किसी का अभिवादन करना हो, किसी को शाबासी देनी हो। थाली तब बजाई जाती है जब परिवार में कोई मंगल अवसर उपस्थित हुआ हो लेकिन यहां विरोध की थाली बज रही है, यह बात समझ से परे है। जो लोग अपने हित के लिए देश के हितों को ताक पर रख रहे हैं। टोल नाका फ्री कराए बैठे हैं, वे देश का कितना नुकसान कर रहे हैं, शायद इसकी उन्हें कल्पना नहीं। रही बात कानून की तो वह व्यक्ति के काम करने और रहन-सहन की सीमा निर्धारित करता है। उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित, यह तय करता है। कानून कुछ नहीं, व्यक्ति की जीवनशैली का नियमन है। व्यक्ति खुद नियंत्रित हो जाए तो उसे पुलिस और अदालत की वैसे भी कोई जरूरत नहीं होती लेकिन जब देश का हर आदमी ऐसा करेगा तभी इसकी अहमियत है। वर्ना जो कुछ भी होगा, वह किसी बुरे सपने और भयावह मंजर से कम नहीं होगा। कानून के साथ एक सच यह भी है कि वह किसी व्यक्ति को स्वच्छंद नहीं रहने देता। संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो बंदिशों को पसंद करता हो। सबकी एक ही कोशिश होती है कि उसपर किसी का नियंत्रण न रहे। 'परम स्वतंत्र न सिर पर कोई' वाली भावभूमि ही सबको अच्छी लगती है लेकिन अगर कानून न हो, संविधान न हो, जीवन जीने की कोई आचार संहिता न हो तो क्या होगा? बेहद अराजक माहौल सृजित हो जाएगा। सब अपने-अपने हित पर आमादा हो जाएंगे और संसार से शांति का नामोनिशान मिट जाएगा। सबको केवल 'अपना कहा, अपना किया' ही अच्छा लगेगा। लोग एक-दूसरे के हितों पर भारी पड़ने लगेंगे। मन की बात तो सभी कहना चाहते हैं लेकिन कह कितने लोग पाते हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं है। मन की बात को कहना बहुत आसान नहीं है। मन हमेशा सुख की ही अनुभूति करे, ऐसा मुमकिन तो नहीं। सुख-दुख दोनों भाई हैं। दोनों के स्वभाव और प्रभाव अलग-अलग हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यूं समझें कि एक पेट है और दूसरा पीठ है। पेट-पीठ को जैसे एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही सुख-दुख को भी व्यक्ति के जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। अधिकांश लोग कहते हैं कि लोकतंत्र खतरे में है। संविधान खतरे में है लेकिन किसके चलते तो सबका एक ही जवाब होगा कि सरकार के चलते। सरकार किसने बनाई, इस तरफ कोई सोचता नहीं। सरकार जब आपने बनाई है तो सरकार के काम के लिए उत्तरदायी कौन है, इसका जवाब कौन देगा? जनता को सरकार से परेशानी है तो सरकार नाम की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। संविधान से परेशानी है तो संविधान खत्म कर दिया जाए। पुलिस-प्रशासन से परेशानी है तो पुलिस प्रशासन की व्यवस्था खत्म कर दी जाए। ऐसे में बचेगा क्या? जनता और उसकी स्वच्छंदता। जनता का मतलब व्यक्ति और उसकी गतिविधियां। जब कोई काम का मूल्यांकन करने वाला ही नहीं होगा तो कौन किसकी बात मानेगा? यह अपने आप में बड़ा किंतु जटिल सवाल है और इसका जवाब आम जनमानस की ओर से आना ही चाहिए। प्रधानमंत्री देशवासियों से अपील कर रहे हैं कि वे देश में बनाए सामानों का ही इस्तेमाल करें जिससे देश के कारीगरों को,उत्पादकों को लाभ हो। कुछ लोगों का तर्क है कि वे सरकार से बात भी करेंगे और मानेंगे भी नहीं। यह तो वही बात हुई कि 'पंचों की राय सिर माथे लेकिन खूंटा नहीं उखड़ेगा।' ऐसी वार्ता का कोई मतलब नहीं है। सरकार को लगता है कि उसने अच्छा कानून बनाया है और देश के अधिकांश किसानों, बुद्धिजीवियों को लगता है कि पहली बार किसानों के लिए कुछ विशेष हुआ है, लेकिन मुट्ठी भर किसान ऐसे हैं जो इस बहाने सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इसमें कुछ राजनीतिक दल भी नीम पर करेले की तरह चढ़ गए हैं। वे दरअसल बात बनने नहीं दे रहे हैं। किसान नेता यह तो चाहते हैं कि उनका नववर्ष मंगलमय हो लेकिन वे नए कृषि कानूनों को हटवाकर ही दम लेना चाहते हैं। सरकार की समस्या यह है कि वह एकबार झुकी तो राजनीतिक दल उसे सही ढंग से काम नहीं करने देंगे। छोटी-छोटी समस्या लेकर लोग सड़कों पर उतरने लगेंगे। इन कानूनों को खत्म करने का मतलब है, बड़े आढ़तियों और बड़े व्यापारियों की दुरभिसंधि का सफल होना। इससे देश मजबूत नहीं होगा, वरन कमजोर ही होगा। थाली और ताली पीटने से नहीं, अपने और देश के बारे में सोचने और तदनुरूप काम करने से ही किसानों का नववर्ष मंगलमय होगा। उनका भी और देश का भी। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 28 December 2020


bhopal,new year ,will not be auspicious , beating the plate

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष के अंत में अपने मन की आखिरी बात की। उनकी मन की बात का दिल्ली सीमा पर आंदोलित किसानों ने थाली बजाकर विरोध किया। तर्क दिया कि मोदी जी ने कहा था कि ताली और थाली बजाने से कोरोना भाग जाएगा। हम थाली इसलिए बजा रहे हैं कि कृषि कानून भाग जाए और हमारा नववर्ष मंगलमय हो जाए। सवाल उठता है कि किसानों को कानून चाहिए या नहीं। अपनी बात मनवाने के लिए वे पूरे एक माह से आंदोलन कर रहे हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है। किसान कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री अपने मन की बात कहकर चले जाते हैं लेकिन हमारी बात नहीं सुनते। उनके समर्थक नेता भी कुछ इसी तरह की बात करते हैं कि उनके मन की बात सुनी जाए। लोग अपने तरीके से अपने मन की बात करते भी हैं। इस देश का हर व्यक्ति कुछ न कुछ बोलता हो लेकिन उसके सुने जाने की अपनी सीमा होती है। बात सब सुनें, इसके लिए पात्रता तो जरूरी होती ही है, बात में दम भी होना चाहिए। इस बात को कदाचित कोई समझना नहीं चाहता। तिस पर शिकायत यह कि कोई उसकी बात नहीं सुन रहा है। तर्क और तथ्य के आईने में कही गई बात ही संसार गौर करता है। प्रधानमंत्री होने के नाते नरेंद्र मोदी को सबके मन की बात सुननी चाहिए। यह उनका धर्म भी है और दायित्व भी। अगर वे हर माह अपने मन की बात कहकर इस देश की जनता का मनोबल बढ़ाते हैं, उन्हें कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। कुछ नवोन्मेष करने की बात करते हैं। कौशल प्रशिक्षण और अपने में काबिलियत पैदा करने की सलाह देते हैं तो इसमें गलत क्या है? भारतीय संस्कृति में ताली तब बजाई जाती है जब किसी का अभिवादन करना हो, किसी को शाबासी देनी हो। थाली तब बजाई जाती है जब परिवार में कोई मंगल अवसर उपस्थित हुआ हो लेकिन यहां विरोध की थाली बज रही है, यह बात समझ से परे है। जो लोग अपने हित के लिए देश के हितों को ताक पर रख रहे हैं। टोल नाका फ्री कराए बैठे हैं, वे देश का कितना नुकसान कर रहे हैं, शायद इसकी उन्हें कल्पना नहीं। रही बात कानून की तो वह व्यक्ति के काम करने और रहन-सहन की सीमा निर्धारित करता है। उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित, यह तय करता है। कानून कुछ नहीं, व्यक्ति की जीवनशैली का नियमन है। व्यक्ति खुद नियंत्रित हो जाए तो उसे पुलिस और अदालत की वैसे भी कोई जरूरत नहीं होती लेकिन जब देश का हर आदमी ऐसा करेगा तभी इसकी अहमियत है। वर्ना जो कुछ भी होगा, वह किसी बुरे सपने और भयावह मंजर से कम नहीं होगा। कानून के साथ एक सच यह भी है कि वह किसी व्यक्ति को स्वच्छंद नहीं रहने देता। संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो बंदिशों को पसंद करता हो। सबकी एक ही कोशिश होती है कि उसपर किसी का नियंत्रण न रहे। 'परम स्वतंत्र न सिर पर कोई' वाली भावभूमि ही सबको अच्छी लगती है लेकिन अगर कानून न हो, संविधान न हो, जीवन जीने की कोई आचार संहिता न हो तो क्या होगा? बेहद अराजक माहौल सृजित हो जाएगा। सब अपने-अपने हित पर आमादा हो जाएंगे और संसार से शांति का नामोनिशान मिट जाएगा। सबको केवल 'अपना कहा, अपना किया' ही अच्छा लगेगा। लोग एक-दूसरे के हितों पर भारी पड़ने लगेंगे। मन की बात तो सभी कहना चाहते हैं लेकिन कह कितने लोग पाते हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं है। मन की बात को कहना बहुत आसान नहीं है। मन हमेशा सुख की ही अनुभूति करे, ऐसा मुमकिन तो नहीं। सुख-दुख दोनों भाई हैं। दोनों के स्वभाव और प्रभाव अलग-अलग हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यूं समझें कि एक पेट है और दूसरा पीठ है। पेट-पीठ को जैसे एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही सुख-दुख को भी व्यक्ति के जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। अधिकांश लोग कहते हैं कि लोकतंत्र खतरे में है। संविधान खतरे में है लेकिन किसके चलते तो सबका एक ही जवाब होगा कि सरकार के चलते। सरकार किसने बनाई, इस तरफ कोई सोचता नहीं। सरकार जब आपने बनाई है तो सरकार के काम के लिए उत्तरदायी कौन है, इसका जवाब कौन देगा? जनता को सरकार से परेशानी है तो सरकार नाम की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। संविधान से परेशानी है तो संविधान खत्म कर दिया जाए। पुलिस-प्रशासन से परेशानी है तो पुलिस प्रशासन की व्यवस्था खत्म कर दी जाए। ऐसे में बचेगा क्या? जनता और उसकी स्वच्छंदता। जनता का मतलब व्यक्ति और उसकी गतिविधियां। जब कोई काम का मूल्यांकन करने वाला ही नहीं होगा तो कौन किसकी बात मानेगा? यह अपने आप में बड़ा किंतु जटिल सवाल है और इसका जवाब आम जनमानस की ओर से आना ही चाहिए। प्रधानमंत्री देशवासियों से अपील कर रहे हैं कि वे देश में बनाए सामानों का ही इस्तेमाल करें जिससे देश के कारीगरों को,उत्पादकों को लाभ हो। कुछ लोगों का तर्क है कि वे सरकार से बात भी करेंगे और मानेंगे भी नहीं। यह तो वही बात हुई कि 'पंचों की राय सिर माथे लेकिन खूंटा नहीं उखड़ेगा।' ऐसी वार्ता का कोई मतलब नहीं है। सरकार को लगता है कि उसने अच्छा कानून बनाया है और देश के अधिकांश किसानों, बुद्धिजीवियों को लगता है कि पहली बार किसानों के लिए कुछ विशेष हुआ है, लेकिन मुट्ठी भर किसान ऐसे हैं जो इस बहाने सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इसमें कुछ राजनीतिक दल भी नीम पर करेले की तरह चढ़ गए हैं। वे दरअसल बात बनने नहीं दे रहे हैं। किसान नेता यह तो चाहते हैं कि उनका नववर्ष मंगलमय हो लेकिन वे नए कृषि कानूनों को हटवाकर ही दम लेना चाहते हैं। सरकार की समस्या यह है कि वह एकबार झुकी तो राजनीतिक दल उसे सही ढंग से काम नहीं करने देंगे। छोटी-छोटी समस्या लेकर लोग सड़कों पर उतरने लगेंगे। इन कानूनों को खत्म करने का मतलब है, बड़े आढ़तियों और बड़े व्यापारियों की दुरभिसंधि का सफल होना। इससे देश मजबूत नहीं होगा, वरन कमजोर ही होगा। थाली और ताली पीटने से नहीं, अपने और देश के बारे में सोचने और तदनुरूप काम करने से ही किसानों का नववर्ष मंगलमय होगा। उनका भी और देश का भी। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 28 December 2020


bhopal,Tremors of earthquake, shook Delhi

योगेश कुमार गोयल देश की राजधानी दिल्ली में अप्रैल माह के बाद से बार-बार भूकम्प के झटके महसूस किए जा रहे हैं। 17 दिसम्बर को देर रात इस क्षेत्र में 4.2 तीव्रता का भूकम्प आया था, हालांकि उससे जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ। अब एक सप्ताह के भीतर 25 दिसम्बर की सुबह करीब पांच बजे दिल्ली में रिक्टर पैमाने पर 2.3 तीव्रता के भूकम्प से दिल्ली फिर कांपी। दिसम्बर की शुरुआत में भी 2 दिसम्बर की सुबह दिल्ली-एनसीआर में 2.7 तीव्रता के भूकम्प के झटके महसूस किए गए थे। पिछले छह महीने में उत्तर भारत में कई हल्के भूकम्प आए हैं, जो हिमालय क्षेत्र में किसी बड़े भूकम्प की आशंका को बढ़ा रहे हैं। दरअसल वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे कई छोटे भूकम्प बड़ी तबाही का संकेत होते हैं। यही कारण है कि अप्रैल के बाद से दिल्ली-एनसीआर में भूकम्प के बार-बार लग रहे झटके चिंता का सबब बने हैं। इस अंतराल में इस क्षेत्र में भूकम्प के करीब डेढ़ दर्जन झटके लग चुके हैं। बार-बार लग रहे भूकम्प के झटकों के मद्देनजर दिल्ली-एनसीआर इलाके में आने वाले दिनों में किसी बड़े भूकम्प का अनुमान लगाया जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में दिल्ली-एनसीआर की आबादी काफी बढ़ी है और ऐसे में 6 तीव्रता का भूकम्प भी यहां भारी तबाही मचा सकता है। कुछ समय पहले भी वैज्ञानिक हिमालय में बड़े भूकम्प की आशंका जताते हुए कह चुके हैं कि हिमालय पर्वत श्रृंखला में सिलसिलेवार भूकम्पों के साथ कभी भी बड़ा भूकम्प आ सकता है, जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर आठ या उससे भी अधिक हो सकती है। इससे हिमालय के आसपास घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भारी तबाही मच सकती है और दिल्ली भी इसकी जद में होगी। नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी (एनसीएस) के पूर्व प्रमुख डॉ. ए.के. शुक्ला के अनुसार दिल्ली को हिमालयी बेल्ट से काफी खतरा है, जहां 8 की तीव्रता वाले भूकम्प आने की भी क्षमता है। दिल्ली से करीब दो सौ किलोमीटर दूर हिमालय क्षेत्र में अगर सात या इससे अधिक तीव्रता का भूकम्प आता है तो दिल्ली के लिए बड़ा खतरा है। हालांकि ऐसा भीषण भूकम्प कब आएगा, इस बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका कोई सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं है। दरअसल भूकम्प के पूर्वानुमान का न तो कोई उपकरण है और न ही कोई मैकेनिज्म। दिल्ली में बड़े भूकम्प के खतरे को देखते हुए भारतीय मौसम विभाग के भूकम्प रिस्क असेसमेंट सेंटर द्वारा कुछ माह पूर्व ही दिल्ली-एनसीआर में इमारतों के मानक में शीघ्रातिशीघ्र बदलाव किए जाने का परामर्श दिया जा चुका है। राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के वैज्ञानिकों के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में आ रहे भूकम्पों को लेकर अध्ययन चल रहा है। उनका कहना है कि इसके कारणों में भू-जल का गिरता स्तर भी एक प्रमुख वजह सामने आ रही है, इसके अलावा अन्य कारण भी तलाशे जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिल्ली की ऊंची-ऊंची आलीशान इमारतें और अपार्टमेंट किसी बड़े भूकम्प को झेलने की स्थिति में हैं? विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली में बार-बार आ रहे भूकम्प के झटकों से पता चलता है कि दिल्ली-एनसीआर के फॉल्ट इस समय सक्रिय हैं और इन फॉल्ट में बड़े भूकम्प की तीव्रता 6.5 तक रह सकती है। इसीलिए विशेषज्ञ कह रहे हैं कि बार-बार लग रहे भूकम्प इन झटकों को बड़े खतरे की आहट मानते हुए दिल्ली को नुकसान से बचने की तैयारियां कर लेनी चाहिए। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में निरन्तर लग रहे झटकों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट भी कड़ा रुख अपना चुका है। हाईकोर्ट ने कुछ माह पूर्व दिल्ली सरकार, डीडीए, एमसीडी, दिल्ली छावनी परिषद, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद को नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि तेज भूकम्प आने पर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? अदालत द्वारा चिंता जताते हुए कहा गया था कि सरकार और अन्य निकाय हमेशा की भांति भूकम्प के झटकों को हल्के में ले रहे हैं जबकि उन्हें इस दिशा में गंभीरता दिखाने की जरूरत है। अदालत का कहना था कि भूकम्प जैसी विपदा से निपटने के लिए ठोस योजना बनाने की जरूरत है क्योंकि भूकम्प से लाखों लोगों की जान जा सकती है। कुछ दिनों बाद मुख्य न्यायमूर्ति डीएन पटेल तथा न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने भी दिल्ली में भूकम्प के झटकों से इमारतों को सुरक्षित रखने के संबंध में बनाई गई योजना को लागू करने में असफल होने पर दिल्ली सरकार को लताड़ लगाई थी। दिल्ली सरकार तथा एमसीडी द्वारा दाखिल किए गए जवाब पर सख्त टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा था कि भूकम्प से शहर को सुरक्षित रखने को लेकर उठाए गए कदम या प्रस्ताव केवल कागजी शेर हैं और ऐसा नहीं दिख रहा कि एजेंसियों ने भूकम्प के संबंध में अदालत द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश का अनुपालन किया हो। अदालत को ऐसी टिप्पणियां करने को इसलिए विवश होना पड़ रहा है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर भूकम्प के लिहाज से काफी संवेदनशील है, जो दूसरे नंबर के सबसे खतरनाक सिस्मिक जोन-4 में आता है। इसीलिए अदालत को कहना पड़ा है कि केवल कागजी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार द्वारा जमीनी स्तर पर ठोस काम करने की जरूरत है। दरअसल वास्तविकता यही है कि पिछले कई वर्षों में भूकम्प से निपटने की तैयारियों के नाम पर केवल खानापूर्ति ही हुई है। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में मुख्य याचिका दायर करते हुए कहा था कि भूकम्प के लिहाज से दिल्ली की इमारतें ठीक नहीं हैं और तीव्र गति वाला भूकम्प आने पर दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है। हाईकोर्ट में यह याचिका अभीतक लंबित है और अदालत समय-समय पर दिल्ली सरकार और नगर निकायों को कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश देती रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कागजों पर निश्चित तौर पर बेहतर दिशा-निर्देश और अधिसूचना बनाई गई है लेकिन जमीन पर ये लागू होती दिखाई नहीं देती। हाईकोर्ट की पीठ ने प्राधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि दिल्ली सरकार तथा नगर निगम की कोई कार्ययोजना है तो वह इसके संबंध में आम जनमानस को बताएं ताकि वे इस गंभीर समस्या के लिए खुद को तैयार कर सकें। दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ महीनों में आए भूकम्प के झटके भले ही रिक्टर पैमाने पर कम तीव्रता वाले रहे हों किन्तु भूकम्प पर शोध करने वाले इन झटकों को बड़े खतरे की आहट मान रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक संभव है कि दिल्ली एनसीआर में आ रहे हल्के भूकम्प किसी दूरस्थ इलाके में आने वाले बड़े भूकम्प का संकेत दे रहे हों। राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केन्द्र के निदेशक (ऑपरेशन) जे.एल. गौतम के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में जमीन के नीचे दिल्ली-मुरादाबाद फाल्ट लाइन, मथुरा फाल्ट लाइन तथा सोहना फाल्ट लाइन मौजूद है और जहां फाल्ट लाइन होती है, भूकम्प का अधिकेन्द्र वहीं बनता है। उनका कहना है कि बड़े भूकम्प फाल्ट लाइन के किनारे ही आते हैं और केवल दिल्ली ही नहीं, पूरी हिमालयन बेल्ट को भूकम्प से ज्यादा खतरा है। अधिकांश भूकम्प विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली एनसीआर की इमारतों को भूकम्प के लिए तैयार करना शुरू कर देना चाहिए ताकि बड़े भूकम्प के नुकसान को कम किया जा सके। एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में करीब नब्बे फीसदी मकान क्रंकीट और सरिये से बने हैं, जिनमें से 90 फीसदी इमारतें रिक्टर स्केल पर छह तीव्रता से तेज भूकम्प को झेलने में समर्थ नहीं हैं। एनसीएस के अध्ययन के अनुसार दिल्ली का करीब तीस फीसदी हिस्सा जोन-5 में आता है, जो भूकम्प की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि दिल्ली में बनी नई इमारतें 6 से 6.6 तीव्रता के भूकम्प को झेल सकती हैं जबकि पुरानी इमारतें 5 से 5.5 तीव्रता का भूकम्प ही सह सकती हैं। विशेषज्ञ बड़ा भूकम्प आने पर दिल्ली में जान-माल का ज्यादा नुकसान होने का अनुमान इसलिए भी लगा रहे हैं क्योंकि करीब 1.9 करोड़ आबादी वाली दिल्ली में प्रतिवर्ग किलोमीटर दस हजार लोग रहते हैं। कोई बड़ा भूकम्प 300-400 किलोमीटर की रेंज तक असर दिखाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 December 2020


bhopal,Art takes birth ,through the thirst ,for pleasure

हृदयनारायण दीक्षित विश्व मानवता का सतत् विकास हुआ है। मनुष्य ने सुख स्वस्ति और आनन्द के लिए लगातार प्रयत्न किये हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच अंगांगी सम्बन्ध हैं, लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। प्रकृति सत्य है, हम मनुष्य प्रकृति सत्य के मध्य जीवनयापन करते हैं। लेकिन मनुष्य ने शिव और सुन्दर की भी अभिलाषा की है। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का काम किया है। उसने संस्कृति गढ़ी। कलाएं संस्कृति का अंग हैं। सभी कलायें मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का विकास है। मनुष्य को प्रकृति के रूप सुन्दर लगते हैं। कुछ रूप ज्यादा सुन्दर लगते हैं, कुछ रूप कम। लेकिन सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है। कलाओं का जन्म सौन्दर्य की बीज चेतना से हुआ है। मनुष्य लगातार जिज्ञासा करता रहा है।  सत्य सहज है। सरल है। प्रत्यक्ष है। अनुभूत है। विराट जगत में एक ही सत्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। सत्य हमेशा सुखदायी ही नहीं होता। सत्य कभी दुखी करता है तो कभी सुखी। सत्य शिव और सुन्दर भी होता है। जान पड़ता है कि पहले कभी प्रत्यक्ष सत्य को सुन्दर बनाने की भी आवश्यकता अनुभव की गयी होगी और इसी में से अनेक कलाओं का जन्म हुआ। वैसे मनुष्य के सामान्य जीवन में भी कला का विकास होता रहता है। आदिम मनुष्य ने कभी पत्थर की खोहों से निकल कर घास-फूस के घर बनाये। उसने इन्हें सुन्दर बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये। छोटे-छोटे घरेलू उत्सवों में घर को फूलों से सजाना कला चेतना का ही विस्तार है। घर की बैठकी या ड्राइंगरूम में रंग-बिरंगे कपड़े या अन्य वस्तुओं को सजाना भी मनुष्य की कला अभिलाषा का परिणाम है। विवाह के समय दूल्हे की कार या कन्या को सजाना भी कला चेतना का अंग है। कला की चेतना आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक प्रवाहमान है। हम सबके मस्तिष्क में शब्द हैं। शब्दों के अर्थ हैं। अर्थ के अनुसार शब्दों को स्थापित करने और उनमें अन्तर्निहित लोकमंगल के भाव को व्यक्त करने की कला ही साहित्य है। कला संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। विद्वानों का एक वर्ग भारत में सौन्दर्यबोध की शास्त्रीय परम्परा नहीं देखता। ऐसे लोग ऋग्वेद के कवियों ने सौन्दर्यबोध नहीं देखते। वह वाल्मीकी, कम्बन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और निराला के साहित्य से सौन्दर्यबोध की सघन उपस्थिति नहीं देखते। यह प्रकृति सृष्टि भी अति सुन्दर कला है। मनमोहिनी है। इस कला के रचनाकार के सम्बन्ध में अनेक विचार हैं। प्रकृति की रचना करने वाले कलाकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। कुछ लोगों के मतानुसार प्रकृति ने ही प्रकृति को बनाया है। प्रकृति स्वयंभू है। सदा से है। प्रकृति सर्वांग सुन्दरी है। भारतीय चिन्तन में प्रकृति सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा, विश्वकर्मा या ईश्वर माने गये हैं। उपनिषदों में यह बात भी बड़े कलात्मक ढंग से कही गयी है। कहा गया है कि परमात्मा एकाकी था। एकाकी होने के कारण उसे आनन्द नहीं आया। सो उसने लोक बनाये, परलोक बनाये, धरती गढ़ी। प्राणी बनाये सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र बनाये। ऋग्वेद में विश्वकर्मा भी जगत बनाने वाले देवता कहे जाते हैं। प्रकृति अति सुन्दर जटिल और विशिष्ट कलाकृति है। समझ में नहीं आता कि किसने करोड़ों वर्ष तक प्रकाश देने वाले सूर्य को रचा। इसके भीतर अनंत काल तक ताप देने वाला ईंधन किसने रखा? किसने आकाश बनाये, किसने नक्षत्रों की तारावली या आकाश गंगा बनाई? किसने दिन-रात बनाये? किसने भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव बनाये? किसने वनस्पतियाॅं बनायी। किसने अंतरिक्ष में चन्द्रमा को स्थापित किया और मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि को। प्रश्न उठता है कि क्या एक ही देव या कलाकार ने प्रकृति जैसी सुन्दर कलाकृति को गढ़ा है या कई कलाकारों देवों ने सृष्टि का सृजन किया है। यह सृजन अद्वतीय है। एकबार बन जाने या बना देने के बाद यह अपने आप अपने भीतर से नयी सृष्टि गढ़ती जाती है। पुराना अपने आप विदा होता है। नया अपने आप उगता जाता है। यह कला विस्मय पैदा करती है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में लिखा है ’’केशव कहि न जाय का कहिये/ देखत यह रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये।’’ प्रकृति को सुन्दरतम कलाकृति बनाने का मानवीय प्रयास सहस्त्रों वर्षों से जारी है। कला मनुष्य को सुख से भरती है। अच्छा साहित्यकार या कलाकार दुख के चित्रण में भी सुख सृजित करता है। कला और साहित्य से जुड़े सजग रचनाधर्मी उदात्तभाव का सृजन करते हैं। कलायें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं के प्रभाव में संस्कृति के उदात्त तत्व मजबूत होते हैं। मनुष्य काव्य और कलाओं के माध्यम से अपने वातावरण को सुखमय व आनन्दपूर्ण बनाना चाहता है। कलाओं के लिए भी माध्यमों का उपयोग होता है। सामाजिक विकास के क्रम में धीरे-धीरे नये माध्यम जुड़ते गये। साहित्य के लिए पहला माध्यम भाषा है। भाषायें लगातार विकासशील रही हैं। बिना किसी माध्यम के स्वयं को माध्यम बनाकर बोलना या गीत गाना धीरे-धीरे विकसित हुआ है। नृत्य कला भी बिना माध्यम के संभव है। स्वयं नाचने के लिए अपनी ही इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। दूसरा माध्यम जरूरी नहीं होता। घर जरूरी रहा है, वह कच्चे मिट्टी की दीवारों पर भी चित्र बनाता रहा है। मनुष्य अपनी संवेदनशीलता और जानने की इच्छा से तमाम अनुभव एकत्रित करते हैं। वे कलाओं में इस अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानान्तरित होता रहता है।  मनुष्य का सौन्दर्यबोध चित्त की स्पन्दन शक्ति का परिणाम है। उसकी रुचि और विशेष रूपों पर सौन्दर्य अनुभव करने की प्रवृत्ति सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ कलाओं का भी विकास होता रहता है। भारतीय स्थापत्य कला भी उच्चकोटि की थी। वैदिककाल के भवन या उनके खण्डहर पुरातत्वज्ञों को नहीं मिले, लेकिन कुरुक्षेत्र के आसपास 2020 में अनेक घर पुरातत्वज्ञों ने उत्खनन से प्राप्त किये हैं। इसी क्षेत्र में रथ भी मिले हैं। ऋग्वेद में सुंदर स्थापत्य का उल्लेख है। ऋग्वेद में एक राजा वरुण हैं, उनका घर सैकड़ों खम्भों वाला है। ऋग्वेद की एक नदी का नाम सुवास्तु है। सिन्धु घाटी के उत्खनन से प्राप्त सामग्री भी प्राचीन भारत के कलात्मक मन को दर्शाती है। कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है। आनन्द आपूरित व्यक्ति सृजन किये बिना नहीं रह सकता। आनन्द से जन्मी कला समाज को भीतर व बाहर से आनन्द आच्छादित करती है। यह मनुष्य की सृजनशीलता का परिणाम है। भारत के मन्दिर और उनके स्थापत्य दर्शनीय हैं। ये मनुष्य की सृजनशीलता के स्मारक हैं। इसी तरह गीत और संगीत की कलायें भी आनन्द बढ़ाती हैं। भिन्न-भिन्न कलाओं के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है। आनन्द बढ़ता है और कोई भी आनन्दित व्यक्ति विध्वंस नहीं कर सकता है। आनन्द से भरा-पूरा व्यक्ति सृजनशील ही होता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)  

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Dakhal News 27 December 2020


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हृदयनारायण दीक्षित विश्व मानवता का सतत् विकास हुआ है। मनुष्य ने सुख स्वस्ति और आनन्द के लिए लगातार प्रयत्न किये हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच अंगांगी सम्बन्ध हैं, लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। प्रकृति सत्य है, हम मनुष्य प्रकृति सत्य के मध्य जीवनयापन करते हैं। लेकिन मनुष्य ने शिव और सुन्दर की भी अभिलाषा की है। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का काम किया है। उसने संस्कृति गढ़ी। कलाएं संस्कृति का अंग हैं। सभी कलायें मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का विकास है। मनुष्य को प्रकृति के रूप सुन्दर लगते हैं। कुछ रूप ज्यादा सुन्दर लगते हैं, कुछ रूप कम। लेकिन सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है। कलाओं का जन्म सौन्दर्य की बीज चेतना से हुआ है। मनुष्य लगातार जिज्ञासा करता रहा है।  सत्य सहज है। सरल है। प्रत्यक्ष है। अनुभूत है। विराट जगत में एक ही सत्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। सत्य हमेशा सुखदायी ही नहीं होता। सत्य कभी दुखी करता है तो कभी सुखी। सत्य शिव और सुन्दर भी होता है। जान पड़ता है कि पहले कभी प्रत्यक्ष सत्य को सुन्दर बनाने की भी आवश्यकता अनुभव की गयी होगी और इसी में से अनेक कलाओं का जन्म हुआ। वैसे मनुष्य के सामान्य जीवन में भी कला का विकास होता रहता है। आदिम मनुष्य ने कभी पत्थर की खोहों से निकल कर घास-फूस के घर बनाये। उसने इन्हें सुन्दर बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये। छोटे-छोटे घरेलू उत्सवों में घर को फूलों से सजाना कला चेतना का ही विस्तार है। घर की बैठकी या ड्राइंगरूम में रंग-बिरंगे कपड़े या अन्य वस्तुओं को सजाना भी मनुष्य की कला अभिलाषा का परिणाम है। विवाह के समय दूल्हे की कार या कन्या को सजाना भी कला चेतना का अंग है। कला की चेतना आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक प्रवाहमान है। हम सबके मस्तिष्क में शब्द हैं। शब्दों के अर्थ हैं। अर्थ के अनुसार शब्दों को स्थापित करने और उनमें अन्तर्निहित लोकमंगल के भाव को व्यक्त करने की कला ही साहित्य है। कला संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। विद्वानों का एक वर्ग भारत में सौन्दर्यबोध की शास्त्रीय परम्परा नहीं देखता। ऐसे लोग ऋग्वेद के कवियों ने सौन्दर्यबोध नहीं देखते। वह वाल्मीकी, कम्बन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और निराला के साहित्य से सौन्दर्यबोध की सघन उपस्थिति नहीं देखते। यह प्रकृति सृष्टि भी अति सुन्दर कला है। मनमोहिनी है। इस कला के रचनाकार के सम्बन्ध में अनेक विचार हैं। प्रकृति की रचना करने वाले कलाकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। कुछ लोगों के मतानुसार प्रकृति ने ही प्रकृति को बनाया है। प्रकृति स्वयंभू है। सदा से है। प्रकृति सर्वांग सुन्दरी है। भारतीय चिन्तन में प्रकृति सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा, विश्वकर्मा या ईश्वर माने गये हैं। उपनिषदों में यह बात भी बड़े कलात्मक ढंग से कही गयी है। कहा गया है कि परमात्मा एकाकी था। एकाकी होने के कारण उसे आनन्द नहीं आया। सो उसने लोक बनाये, परलोक बनाये, धरती गढ़ी। प्राणी बनाये सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र बनाये। ऋग्वेद में विश्वकर्मा भी जगत बनाने वाले देवता कहे जाते हैं। प्रकृति अति सुन्दर जटिल और विशिष्ट कलाकृति है। समझ में नहीं आता कि किसने करोड़ों वर्ष तक प्रकाश देने वाले सूर्य को रचा। इसके भीतर अनंत काल तक ताप देने वाला ईंधन किसने रखा? किसने आकाश बनाये, किसने नक्षत्रों की तारावली या आकाश गंगा बनाई? किसने दिन-रात बनाये? किसने भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव बनाये? किसने वनस्पतियाॅं बनायी। किसने अंतरिक्ष में चन्द्रमा को स्थापित किया और मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि को। प्रश्न उठता है कि क्या एक ही देव या कलाकार ने प्रकृति जैसी सुन्दर कलाकृति को गढ़ा है या कई कलाकारों देवों ने सृष्टि का सृजन किया है। यह सृजन अद्वतीय है। एकबार बन जाने या बना देने के बाद यह अपने आप अपने भीतर से नयी सृष्टि गढ़ती जाती है। पुराना अपने आप विदा होता है। नया अपने आप उगता जाता है। यह कला विस्मय पैदा करती है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में लिखा है ’’केशव कहि न जाय का कहिये/ देखत यह रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये।’’ प्रकृति को सुन्दरतम कलाकृति बनाने का मानवीय प्रयास सहस्त्रों वर्षों से जारी है। कला मनुष्य को सुख से भरती है। अच्छा साहित्यकार या कलाकार दुख के चित्रण में भी सुख सृजित करता है। कला और साहित्य से जुड़े सजग रचनाधर्मी उदात्तभाव का सृजन करते हैं। कलायें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं के प्रभाव में संस्कृति के उदात्त तत्व मजबूत होते हैं। मनुष्य काव्य और कलाओं के माध्यम से अपने वातावरण को सुखमय व आनन्दपूर्ण बनाना चाहता है। कलाओं के लिए भी माध्यमों का उपयोग होता है। सामाजिक विकास के क्रम में धीरे-धीरे नये माध्यम जुड़ते गये। साहित्य के लिए पहला माध्यम भाषा है। भाषायें लगातार विकासशील रही हैं। बिना किसी माध्यम के स्वयं को माध्यम बनाकर बोलना या गीत गाना धीरे-धीरे विकसित हुआ है। नृत्य कला भी बिना माध्यम के संभव है। स्वयं नाचने के लिए अपनी ही इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। दूसरा माध्यम जरूरी नहीं होता। घर जरूरी रहा है, वह कच्चे मिट्टी की दीवारों पर भी चित्र बनाता रहा है। मनुष्य अपनी संवेदनशीलता और जानने की इच्छा से तमाम अनुभव एकत्रित करते हैं। वे कलाओं में इस अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानान्तरित होता रहता है।  मनुष्य का सौन्दर्यबोध चित्त की स्पन्दन शक्ति का परिणाम है। उसकी रुचि और विशेष रूपों पर सौन्दर्य अनुभव करने की प्रवृत्ति सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ कलाओं का भी विकास होता रहता है। भारतीय स्थापत्य कला भी उच्चकोटि की थी। वैदिककाल के भवन या उनके खण्डहर पुरातत्वज्ञों को नहीं मिले, लेकिन कुरुक्षेत्र के आसपास 2020 में अनेक घर पुरातत्वज्ञों ने उत्खनन से प्राप्त किये हैं। इसी क्षेत्र में रथ भी मिले हैं। ऋग्वेद में सुंदर स्थापत्य का उल्लेख है। ऋग्वेद में एक राजा वरुण हैं, उनका घर सैकड़ों खम्भों वाला है। ऋग्वेद की एक नदी का नाम सुवास्तु है। सिन्धु घाटी के उत्खनन से प्राप्त सामग्री भी प्राचीन भारत के कलात्मक मन को दर्शाती है। कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है। आनन्द आपूरित व्यक्ति सृजन किये बिना नहीं रह सकता। आनन्द से जन्मी कला समाज को भीतर व बाहर से आनन्द आच्छादित करती है। यह मनुष्य की सृजनशीलता का परिणाम है। भारत के मन्दिर और उनके स्थापत्य दर्शनीय हैं। ये मनुष्य की सृजनशीलता के स्मारक हैं। इसी तरह गीत और संगीत की कलायें भी आनन्द बढ़ाती हैं। भिन्न-भिन्न कलाओं के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है। आनन्द बढ़ता है और कोई भी आनन्दित व्यक्ति विध्वंस नहीं कर सकता है। आनन्द से भरा-पूरा व्यक्ति सृजनशील ही होता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)  

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Dakhal News 27 December 2020


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हृदयनारायण दीक्षित विश्व मानवता का सतत् विकास हुआ है। मनुष्य ने सुख स्वस्ति और आनन्द के लिए लगातार प्रयत्न किये हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच अंगांगी सम्बन्ध हैं, लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। प्रकृति सत्य है, हम मनुष्य प्रकृति सत्य के मध्य जीवनयापन करते हैं। लेकिन मनुष्य ने शिव और सुन्दर की भी अभिलाषा की है। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का काम किया है। उसने संस्कृति गढ़ी। कलाएं संस्कृति का अंग हैं। सभी कलायें मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का विकास है। मनुष्य को प्रकृति के रूप सुन्दर लगते हैं। कुछ रूप ज्यादा सुन्दर लगते हैं, कुछ रूप कम। लेकिन सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है। कलाओं का जन्म सौन्दर्य की बीज चेतना से हुआ है। मनुष्य लगातार जिज्ञासा करता रहा है।  सत्य सहज है। सरल है। प्रत्यक्ष है। अनुभूत है। विराट जगत में एक ही सत्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। सत्य हमेशा सुखदायी ही नहीं होता। सत्य कभी दुखी करता है तो कभी सुखी। सत्य शिव और सुन्दर भी होता है। जान पड़ता है कि पहले कभी प्रत्यक्ष सत्य को सुन्दर बनाने की भी आवश्यकता अनुभव की गयी होगी और इसी में से अनेक कलाओं का जन्म हुआ। वैसे मनुष्य के सामान्य जीवन में भी कला का विकास होता रहता है। आदिम मनुष्य ने कभी पत्थर की खोहों से निकल कर घास-फूस के घर बनाये। उसने इन्हें सुन्दर बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये। छोटे-छोटे घरेलू उत्सवों में घर को फूलों से सजाना कला चेतना का ही विस्तार है। घर की बैठकी या ड्राइंगरूम में रंग-बिरंगे कपड़े या अन्य वस्तुओं को सजाना भी मनुष्य की कला अभिलाषा का परिणाम है। विवाह के समय दूल्हे की कार या कन्या को सजाना भी कला चेतना का अंग है। कला की चेतना आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक प्रवाहमान है। हम सबके मस्तिष्क में शब्द हैं। शब्दों के अर्थ हैं। अर्थ के अनुसार शब्दों को स्थापित करने और उनमें अन्तर्निहित लोकमंगल के भाव को व्यक्त करने की कला ही साहित्य है। कला संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। विद्वानों का एक वर्ग भारत में सौन्दर्यबोध की शास्त्रीय परम्परा नहीं देखता। ऐसे लोग ऋग्वेद के कवियों ने सौन्दर्यबोध नहीं देखते। वह वाल्मीकी, कम्बन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और निराला के साहित्य से सौन्दर्यबोध की सघन उपस्थिति नहीं देखते। यह प्रकृति सृष्टि भी अति सुन्दर कला है। मनमोहिनी है। इस कला के रचनाकार के सम्बन्ध में अनेक विचार हैं। प्रकृति की रचना करने वाले कलाकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। कुछ लोगों के मतानुसार प्रकृति ने ही प्रकृति को बनाया है। प्रकृति स्वयंभू है। सदा से है। प्रकृति सर्वांग सुन्दरी है। भारतीय चिन्तन में प्रकृति सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा, विश्वकर्मा या ईश्वर माने गये हैं। उपनिषदों में यह बात भी बड़े कलात्मक ढंग से कही गयी है। कहा गया है कि परमात्मा एकाकी था। एकाकी होने के कारण उसे आनन्द नहीं आया। सो उसने लोक बनाये, परलोक बनाये, धरती गढ़ी। प्राणी बनाये सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र बनाये। ऋग्वेद में विश्वकर्मा भी जगत बनाने वाले देवता कहे जाते हैं। प्रकृति अति सुन्दर जटिल और विशिष्ट कलाकृति है। समझ में नहीं आता कि किसने करोड़ों वर्ष तक प्रकाश देने वाले सूर्य को रचा। इसके भीतर अनंत काल तक ताप देने वाला ईंधन किसने रखा? किसने आकाश बनाये, किसने नक्षत्रों की तारावली या आकाश गंगा बनाई? किसने दिन-रात बनाये? किसने भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव बनाये? किसने वनस्पतियाॅं बनायी। किसने अंतरिक्ष में चन्द्रमा को स्थापित किया और मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि को। प्रश्न उठता है कि क्या एक ही देव या कलाकार ने प्रकृति जैसी सुन्दर कलाकृति को गढ़ा है या कई कलाकारों देवों ने सृष्टि का सृजन किया है। यह सृजन अद्वतीय है। एकबार बन जाने या बना देने के बाद यह अपने आप अपने भीतर से नयी सृष्टि गढ़ती जाती है। पुराना अपने आप विदा होता है। नया अपने आप उगता जाता है। यह कला विस्मय पैदा करती है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में लिखा है ’’केशव कहि न जाय का कहिये/ देखत यह रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये।’’ प्रकृति को सुन्दरतम कलाकृति बनाने का मानवीय प्रयास सहस्त्रों वर्षों से जारी है। कला मनुष्य को सुख से भरती है। अच्छा साहित्यकार या कलाकार दुख के चित्रण में भी सुख सृजित करता है। कला और साहित्य से जुड़े सजग रचनाधर्मी उदात्तभाव का सृजन करते हैं। कलायें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं के प्रभाव में संस्कृति के उदात्त तत्व मजबूत होते हैं। मनुष्य काव्य और कलाओं के माध्यम से अपने वातावरण को सुखमय व आनन्दपूर्ण बनाना चाहता है। कलाओं के लिए भी माध्यमों का उपयोग होता है। सामाजिक विकास के क्रम में धीरे-धीरे नये माध्यम जुड़ते गये। साहित्य के लिए पहला माध्यम भाषा है। भाषायें लगातार विकासशील रही हैं। बिना किसी माध्यम के स्वयं को माध्यम बनाकर बोलना या गीत गाना धीरे-धीरे विकसित हुआ है। नृत्य कला भी बिना माध्यम के संभव है। स्वयं नाचने के लिए अपनी ही इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। दूसरा माध्यम जरूरी नहीं होता। घर जरूरी रहा है, वह कच्चे मिट्टी की दीवारों पर भी चित्र बनाता रहा है। मनुष्य अपनी संवेदनशीलता और जानने की इच्छा से तमाम अनुभव एकत्रित करते हैं। वे कलाओं में इस अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानान्तरित होता रहता है।  मनुष्य का सौन्दर्यबोध चित्त की स्पन्दन शक्ति का परिणाम है। उसकी रुचि और विशेष रूपों पर सौन्दर्य अनुभव करने की प्रवृत्ति सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ कलाओं का भी विकास होता रहता है। भारतीय स्थापत्य कला भी उच्चकोटि की थी। वैदिककाल के भवन या उनके खण्डहर पुरातत्वज्ञों को नहीं मिले, लेकिन कुरुक्षेत्र के आसपास 2020 में अनेक घर पुरातत्वज्ञों ने उत्खनन से प्राप्त किये हैं। इसी क्षेत्र में रथ भी मिले हैं। ऋग्वेद में सुंदर स्थापत्य का उल्लेख है। ऋग्वेद में एक राजा वरुण हैं, उनका घर सैकड़ों खम्भों वाला है। ऋग्वेद की एक नदी का नाम सुवास्तु है। सिन्धु घाटी के उत्खनन से प्राप्त सामग्री भी प्राचीन भारत के कलात्मक मन को दर्शाती है। कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है। आनन्द आपूरित व्यक्ति सृजन किये बिना नहीं रह सकता। आनन्द से जन्मी कला समाज को भीतर व बाहर से आनन्द आच्छादित करती है। यह मनुष्य की सृजनशीलता का परिणाम है। भारत के मन्दिर और उनके स्थापत्य दर्शनीय हैं। ये मनुष्य की सृजनशीलता के स्मारक हैं। इसी तरह गीत और संगीत की कलायें भी आनन्द बढ़ाती हैं। भिन्न-भिन्न कलाओं के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है। आनन्द बढ़ता है और कोई भी आनन्दित व्यक्ति विध्वंस नहीं कर सकता है। आनन्द से भरा-पूरा व्यक्ति सृजनशील ही होता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)  

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bhopal,Art takes birth ,through the thirst ,for pleasure

हृदयनारायण दीक्षित विश्व मानवता का सतत् विकास हुआ है। मनुष्य ने सुख स्वस्ति और आनन्द के लिए लगातार प्रयत्न किये हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच अंगांगी सम्बन्ध हैं, लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। प्रकृति सत्य है, हम मनुष्य प्रकृति सत्य के मध्य जीवनयापन करते हैं। लेकिन मनुष्य ने शिव और सुन्दर की भी अभिलाषा की है। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का काम किया है। उसने संस्कृति गढ़ी। कलाएं संस्कृति का अंग हैं। सभी कलायें मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का विकास है। मनुष्य को प्रकृति के रूप सुन्दर लगते हैं। कुछ रूप ज्यादा सुन्दर लगते हैं, कुछ रूप कम। लेकिन सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है। कलाओं का जन्म सौन्दर्य की बीज चेतना से हुआ है। मनुष्य लगातार जिज्ञासा करता रहा है।  सत्य सहज है। सरल है। प्रत्यक्ष है। अनुभूत है। विराट जगत में एक ही सत्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। सत्य हमेशा सुखदायी ही नहीं होता। सत्य कभी दुखी करता है तो कभी सुखी। सत्य शिव और सुन्दर भी होता है। जान पड़ता है कि पहले कभी प्रत्यक्ष सत्य को सुन्दर बनाने की भी आवश्यकता अनुभव की गयी होगी और इसी में से अनेक कलाओं का जन्म हुआ। वैसे मनुष्य के सामान्य जीवन में भी कला का विकास होता रहता है। आदिम मनुष्य ने कभी पत्थर की खोहों से निकल कर घास-फूस के घर बनाये। उसने इन्हें सुन्दर बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये। छोटे-छोटे घरेलू उत्सवों में घर को फूलों से सजाना कला चेतना का ही विस्तार है। घर की बैठकी या ड्राइंगरूम में रंग-बिरंगे कपड़े या अन्य वस्तुओं को सजाना भी मनुष्य की कला अभिलाषा का परिणाम है। विवाह के समय दूल्हे की कार या कन्या को सजाना भी कला चेतना का अंग है। कला की चेतना आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक प्रवाहमान है। हम सबके मस्तिष्क में शब्द हैं। शब्दों के अर्थ हैं। अर्थ के अनुसार शब्दों को स्थापित करने और उनमें अन्तर्निहित लोकमंगल के भाव को व्यक्त करने की कला ही साहित्य है। कला संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। विद्वानों का एक वर्ग भारत में सौन्दर्यबोध की शास्त्रीय परम्परा नहीं देखता। ऐसे लोग ऋग्वेद के कवियों ने सौन्दर्यबोध नहीं देखते। वह वाल्मीकी, कम्बन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और निराला के साहित्य से सौन्दर्यबोध की सघन उपस्थिति नहीं देखते। यह प्रकृति सृष्टि भी अति सुन्दर कला है। मनमोहिनी है। इस कला के रचनाकार के सम्बन्ध में अनेक विचार हैं। प्रकृति की रचना करने वाले कलाकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। कुछ लोगों के मतानुसार प्रकृति ने ही प्रकृति को बनाया है। प्रकृति स्वयंभू है। सदा से है। प्रकृति सर्वांग सुन्दरी है। भारतीय चिन्तन में प्रकृति सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा, विश्वकर्मा या ईश्वर माने गये हैं। उपनिषदों में यह बात भी बड़े कलात्मक ढंग से कही गयी है। कहा गया है कि परमात्मा एकाकी था। एकाकी होने के कारण उसे आनन्द नहीं आया। सो उसने लोक बनाये, परलोक बनाये, धरती गढ़ी। प्राणी बनाये सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र बनाये। ऋग्वेद में विश्वकर्मा भी जगत बनाने वाले देवता कहे जाते हैं। प्रकृति अति सुन्दर जटिल और विशिष्ट कलाकृति है। समझ में नहीं आता कि किसने करोड़ों वर्ष तक प्रकाश देने वाले सूर्य को रचा। इसके भीतर अनंत काल तक ताप देने वाला ईंधन किसने रखा? किसने आकाश बनाये, किसने नक्षत्रों की तारावली या आकाश गंगा बनाई? किसने दिन-रात बनाये? किसने भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव बनाये? किसने वनस्पतियाॅं बनायी। किसने अंतरिक्ष में चन्द्रमा को स्थापित किया और मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि को। प्रश्न उठता है कि क्या एक ही देव या कलाकार ने प्रकृति जैसी सुन्दर कलाकृति को गढ़ा है या कई कलाकारों देवों ने सृष्टि का सृजन किया है। यह सृजन अद्वतीय है। एकबार बन जाने या बना देने के बाद यह अपने आप अपने भीतर से नयी सृष्टि गढ़ती जाती है। पुराना अपने आप विदा होता है। नया अपने आप उगता जाता है। यह कला विस्मय पैदा करती है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में लिखा है ’’केशव कहि न जाय का कहिये/ देखत यह रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये।’’ प्रकृति को सुन्दरतम कलाकृति बनाने का मानवीय प्रयास सहस्त्रों वर्षों से जारी है। कला मनुष्य को सुख से भरती है। अच्छा साहित्यकार या कलाकार दुख के चित्रण में भी सुख सृजित करता है। कला और साहित्य से जुड़े सजग रचनाधर्मी उदात्तभाव का सृजन करते हैं। कलायें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं के प्रभाव में संस्कृति के उदात्त तत्व मजबूत होते हैं। मनुष्य काव्य और कलाओं के माध्यम से अपने वातावरण को सुखमय व आनन्दपूर्ण बनाना चाहता है। कलाओं के लिए भी माध्यमों का उपयोग होता है। सामाजिक विकास के क्रम में धीरे-धीरे नये माध्यम जुड़ते गये। साहित्य के लिए पहला माध्यम भाषा है। भाषायें लगातार विकासशील रही हैं। बिना किसी माध्यम के स्वयं को माध्यम बनाकर बोलना या गीत गाना धीरे-धीरे विकसित हुआ है। नृत्य कला भी बिना माध्यम के संभव है। स्वयं नाचने के लिए अपनी ही इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। दूसरा माध्यम जरूरी नहीं होता। घर जरूरी रहा है, वह कच्चे मिट्टी की दीवारों पर भी चित्र बनाता रहा है। मनुष्य अपनी संवेदनशीलता और जानने की इच्छा से तमाम अनुभव एकत्रित करते हैं। वे कलाओं में इस अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानान्तरित होता रहता है।  मनुष्य का सौन्दर्यबोध चित्त की स्पन्दन शक्ति का परिणाम है। उसकी रुचि और विशेष रूपों पर सौन्दर्य अनुभव करने की प्रवृत्ति सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ कलाओं का भी विकास होता रहता है। भारतीय स्थापत्य कला भी उच्चकोटि की थी। वैदिककाल के भवन या उनके खण्डहर पुरातत्वज्ञों को नहीं मिले, लेकिन कुरुक्षेत्र के आसपास 2020 में अनेक घर पुरातत्वज्ञों ने उत्खनन से प्राप्त किये हैं। इसी क्षेत्र में रथ भी मिले हैं। ऋग्वेद में सुंदर स्थापत्य का उल्लेख है। ऋग्वेद में एक राजा वरुण हैं, उनका घर सैकड़ों खम्भों वाला है। ऋग्वेद की एक नदी का नाम सुवास्तु है। सिन्धु घाटी के उत्खनन से प्राप्त सामग्री भी प्राचीन भारत के कलात्मक मन को दर्शाती है। कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है। आनन्द आपूरित व्यक्ति सृजन किये बिना नहीं रह सकता। आनन्द से जन्मी कला समाज को भीतर व बाहर से आनन्द आच्छादित करती है। यह मनुष्य की सृजनशीलता का परिणाम है। भारत के मन्दिर और उनके स्थापत्य दर्शनीय हैं। ये मनुष्य की सृजनशीलता के स्मारक हैं। इसी तरह गीत और संगीत की कलायें भी आनन्द बढ़ाती हैं। भिन्न-भिन्न कलाओं के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है। आनन्द बढ़ता है और कोई भी आनन्दित व्यक्ति विध्वंस नहीं कर सकता है। आनन्द से भरा-पूरा व्यक्ति सृजनशील ही होता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)  

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Dakhal News 27 December 2020


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गीता जयंती 25 दिसंबर पर विशेष प्रमोद भार्गव दुनिया के अनेक देशों में राष्ट्रीय झंडा, चिन्ह, पक्षी और पशु की तरह राष्ट्रीय ग्रंथ भी हैं। अलबत्ता हमारे यहां 'धर्मनिरपेक्ष’ एक ऐसा विचित्र शब्द है, जो राष्ट्र-बोध की भावना पैदा करने में अक्सर रोड़ा अटकाने का काम करता है। गोया गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बना देने की घोषणाएं जरूर होती रही हैं लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद उन मुद्दों का हल होना शुरू हो गया है, जो भाजपा और संघ के मूल अजेंडे में शामिल रहे हैं। इनमें धारा 370 एवं 35-ए, तीन तलाक, राममंदिर और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अमल हो गया है, लेकिन समान नागरिक संहिता, समान शिक्षा, राष्ट्रभाषा और संस्कृत पढ़ाए जाने के मुद्दे अभी हल नहीं हो पाए हैं। उम्मीद है कि इन मुद्दों के समाधान भी हो जाएंगे। गीता जीवन जीने का तरीका सिखाती है, बावजूद संविधान में दर्ज 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द ऐसा आडंबर है, जो गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने और इसे शालेय शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने में सबसे बड़ी बाधा है। गीता को जब भी राष्ट्रीय महत्व देने की बात उठती है तो तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी सेक्युलरिज्म की ओट में गीता का विरोध करने लगते हैं, क्योंकि यह बहुसंख्यक किंतु उदारवादी हिंदू धर्मवलंबियों का ग्रंथ है। दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थान में कुरान की आयतें, बाईबिल के संदेश अथवा अन्य मध्ययुगीन मजहबी किताबें पढ़ाई जाती रहें, तो मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों और तथाकथित सेक्युलर राजनीतिज्ञों को कोई आपत्ति नहीं होती? जबकि श्रीमद्भगवत गीता दुनिया का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी रचना महाभारत युद्ध के दौरान एक विशेष कालखंड में राष्ट्रीयता, नैतिकता और मानवता के चरम तत्वों की प्राप्ति के लिए हुई थी। गोया यह मानव संघर्ष के बीच रचा गया संघर्ष का शास्त्र है। आज दुनिया आतंकवाद के संक्रमण काल से गुजर रही है, ऐसे में गीता का संदेश कर्म और उदात्त तत्वों को ग्रहण करने का एक श्रेष्ठ माध्यम बन सकता है। प्रत्यक्षतः दुनिया शांति और स्थिरता की बात करती है। लेकिन शासकों के पूर्वाग्रह, अंतर्द्वंद्व आधुनिक विकास और सत्ता की प्रतिस्पर्धा ऐसी महत्वाकांक्षाएं जगाते हैं कि दुनिया कहीं ठहर न जाए? इसलिए भीतर ही भीतर धर्म, संप्रदाय, जाति और नस्ल के भेद के आधार पर दुनिया को सुलगाए रखने का काम भी यही शासक करते हैं। परिणामस्वरूप दुनिया में संघर्ष और टकराव उभरते रहे हैं। टकराव के एक ऐसे ही कालखंड में कर्मयोगी श्रीकृष्ण के मुख से अर्जुन को कर्तव्यपालन के प्रति आगाह करने के लिए गीता का सृजन हुआ। इसीलिए इसे संघर्ष-शास्त्र भी कहा गया है। गीता का संदेश है, उठो और चुनौतियों के विरुद्ध लड़ो। क्योंकि अर्जुन अपने परिजनों, गुरुजनों और मित्रों का संहार नहीं करना चाहते थे। वे युद्ध से विमुख हो रहे थे। यदि इस मानव-संघर्ष में अर्जुन धनुष-बाण धरा पर धर देते तो सत्ताधारी कौरव जिस अनैतिकता व अराजकता के चरम पर थे, वह जड़ता टूटती नहीं। यथास्थिति बनी रहती है। परंपरा में चले आ रहे तमाम ऐसे तत्व शामिल होते हैं, जो वाकई अप्रासंगिक हो चुके होते हैं। मूल्य-परिवर्तनशील शाश्वत बने रहें, इसलिए परंपरा में परिवर्तन जरूरी है। गीता में बदलाव के आवश्यक कर्म की ही व्याख्या की गई है। इसीलिए यह युगांतरकारी ग्रंथ है। दुनिया के प्रमुख ग्रंथों में गीता ही एक ऐसा ग्रंथ है, जिसका अध्ययन व्यक्ति में सकारात्मक सोच के विस्तार के साथ उसका बौद्धिक दायरा भी बढ़ाती है। इसीलिए गीता के अबतक विभिन्न लोग एक सौ से भी ज्यादा भाष्य लिख चुके हैं। अन्य धर्मग्रंथों की तो व्याख्या ही निषेध है। हालांकि कोई धर्मग्रंथ चाहे वह किसी भी धार्मिक समुदाय का हो, दुनिया के सभी देशों के बीच उनका सम्मान करने की एक अघोषित सहमति होती है। गीता विलक्षण इसलिए है, क्योंकि यह सनातन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक ग्रंथ होने के साथ दार्शनिक ग्रंथ भी है। इसमें मानवीय प्रबंधन के साथ समस्त जीव-जगत व जड़-चेतन को एक कुटुंब के रूप में देखा गया है और उनकी सुरक्षा की पैरवी की गई है। इसीलिए भारतीय प्रबंधकीय शिक्षा में भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश और गीता के सार को स्वीकार किया गया है। जब प्रबंधन की शिक्षा गीता के अध्ययन से दिलाई जा सकती है तो शिक्षा में गीता का पाठ क्यों शामिल नहीं किया जा सकता? जबकि ईसाई मिशनरियों और इस्लामी मदरसों में धर्म के पाठ, धार्मिक प्रतीक चिन्हों के साथ खूब पढ़ाए जाते हैं। गीता ज्ञान की जिज्ञासा जगाने वाला ग्रंथ है। इसीलिए प्राचीन दर्शन परंपरा के विकास में इसकी अहम् भूमिका रही है। आदि शंकराचार्य से लेकर संत ज्ञानेश्वर, महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, विनोवा भावे, डॉ. राधाकृष्णन, ओशो और प्रभुपाद जैसे अनेक मनीषी-चिंतकों ने गीता की युगानुरूप मीमांसा करते हुए, नई चिंतन परंपराओं के बीच नए तत्वों की खोजें की हैं। यही नहीं मुगल बादशाह दारा शिकोह और महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन तक को एकेश्वरवाद पर आधारित इस ग्रंथ ने भीतर तक प्रभावित किया है। दारा शिकोह ने गीता का फारसी भाषा में अनुवाद भी किया था। तय है, व्यक्ति और समाज की रचनात्मकता में गीता का अतुलनीय योगदान रहा है। कालजयी नायकों में गीता के स्वाध्याय से उदात्त गुणों की स्थापना हुई है। इसीलिए ये महापुरुष कर्म की श्रेष्ठता को प्राप्त हुए। हमारे यहां विडंबना बौद्धिक दयनीयता व विपन्नता की है। जब भी प्राचीन भारतीय साहित्य, ज्ञान परंपरा या रामायण, महाभारत, उपनिषद व पुराणों में दर्ज शाश्वत मूल्यों को राष्ट्रीयता से जोड़ने की बात आती है तो कथित बौद्धिकों की एक जमात इन जीवन-मूल्यों को आधारहीन व अवैज्ञानिक ठहराने में जुट जाती है। ग्रंथों में चित्रित पात्र और घटनाओं को मिथक कहकर अस्वीकारने लगते हैं। जबकि भारतीय ज्ञान परंपराएं स्थानीयता से जुड़ी होने के कारण व्यावहारिक हैं। हां, बदलते समय के अनुसार थोड़ा उन्हें परिष्कृत करके युगानुरूप ढालने की जरूरत है। गीता तो वैसे भी वेद, वेदांत से भी आगे के विकास की कड़ी है। क्योंकि वह यथास्थिति यानी जड़ता को तोड़ने का संदेश देती है। गीता के उपदेश में बदलाव के महत्व की समझ है। उसमें परिस्थितियों से जुड़ने का संदेश है, जो चरित्र में कर्म की प्रधानता निरूपित करती है। गीता युद्ध- ग्रंथ है, इसलिए उसमें कर्मकाण्ड कहीं नहीं है। कालांतर में सनातन धर्म में कर्मकांड की उपस्थिति ने व्यक्ति को धर्मभीरू बनाने का काम किया और धर्मभीरूता व कर्मकाण्डी पाखंड के विस्तार ने ही हिंदुओं के पराजय का मार्ग खोला। नतीजतन विदेशी हमलावरों की तो छोड़िए अंग्रेज व्यापारियों ने भी हिंदुओं को सरलता से गुलाम बना लिया। भारतीय समाज की धर्मभीरूता दूर करने में गीता अहम् भूमिका का निर्वाह कर सकती है। क्योंकि धर्मनिरपेक्षता तो एक छद्म विवादित व विरोधाभासी सिद्धांत है, जो चरित्र में मूल्यों का सृजन करने की बजाय, धर्म समुदायों को सांप्रदायिक आधार पर कट्टर बनाकर दूरियां बढ़ाने का काम कर रहा है। ऐसे में देश को राष्ट्रबोध और स्वाभिमानी बनाने के लिए गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ की श्रेणी में लाना जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 December 2020


bhopal, AMU repay, debt of Darbhanga Maharaj

आर.के. सिन्हा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के शताब्दी समारोह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित करके बेहद सकारात्मक संदेश दिया है। उन्होंने एक तरह से देश के मुसलमानों का आह्वान किया कि वे देश की मुख्यधारा से अपने को जोड़ें। इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों के बीच शिक्षा के महत्व के प्रसार-प्रचार में एएमयू ने बेहतरीन योगदान दिया है। यह विश्वविद्यालय भारत की अमूल्य धरोहर है। मोदी जी ने कहा कि यहां से तालीम लेकर निकले तमाम लोग दुनिया के सैकड़ों देशों में छाए हुए हैं। विदेश यात्रा में अक्सर ही मिलते हैं। कोरोना संक्रमण के समय एएमयू ने जो मदद की है, वह अमूल्य है। पुराने विवादों को भूलने का वक्त अब यह चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए कि मोहम्मद अली जिन्ना की एएमयू में अब भी फोटो क्यों लगी है? इस मसले पर बहुत अनावश्यक बवाल हो चुका है। इस बात का भी कोई मतलब नहीं है कि पाकिस्तान के निर्माण में एमएमयू के छात्रों का अहम रोल रहा था। पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ने का वक्त है। एएमयू में एक मिनी भारत नजर आया है। यहां एक ओर उर्दू तो दूसरी ओर हिंदी भी पढ़ाई जाती है। फारसी है तो संस्कृत भी है। कुरान के साथ गीता भी पढ़ाई जाती है। यही इस महान देश की शाश्वत शक्ति भी है। इसे हम कमजोर नहीं होने देंगे। निश्चित रूप से सर सैयद अहमद खान ने एएमयू की नींव रखकर सौ बरस पहले देश और खासकर मुसलमानों के ऊपर बड़ा उपकार किया। पर यह भी सोचने वाली बात है कि मुसलमानों को फिर सर सैयद जैसी शख्सियतें क्यों नहीं मिली। यह भी गौरतलब है कि सर सैयद अहमद के अलावा किसी ने अपनी कौम की शिक्षा के महत्व को क्यों नहीं समझा? इन सवालों के जवाब गहराई से तलाशने होंगे ताकि देश के मुसलमान भी कठमुल्लों के चक्कर से मुक्त होकर जिम्मेदार नागरिक की तरह राष्ट्र निर्माण में और ठोस भूमिका निभा सकें। यह याद रखा जाना चाहिए कि एएमयू को खड़ा करने में बहुत-सी महत्वपूर्ण हस्तियों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा था। उनमें बिहार के दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह जी भी थे। उन्होंने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो ओरियेंटल कॉलेज के लिए योगदान किया था। वहाँ उन्होंने एक व्याख्यान भी दिया था, जिसके बारे में कम ही लोगों को पता होगा। एएमयू के प्रोफ़ेसर पंकज पराशर बताते हैं कि दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह जब 9 जून, 1912 को 'एंग्लो मोहम्मडन ओरियेंटल कॉलेज' (अब के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) आए थे, तो इस विश्वविद्यालय के 'स्ट्रैची हॉल' में उन्होंने अंग्रेजी में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रभावी भाषण दिया था और उसी अवसर पर उन्होंने 'एंग्लो मोहम्मडन ओरियेंटल कॉलेज' को बीस हजार रुपये का दान दिया था। तब हिंदुस्तान में 18 रुपये, 93 पैसे में एक तोला सोना मिलता था। इस हिसाब से उन्होंने करीब 1053 तोले सोने की कीमत के बराबर रुपये अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को दान दिया था। 1053 ग्राम सोने की क़ीमत आज तकरीबन 52,650,300 (पाँच करोड़, छब्बीस लाख, पचास हजार, तीन सौ रुपये) है। दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा दिया गया यह दान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को किसी ग़ैर मुस्लिम द्वारा दिये गये दानों में सबसे बड़ा और सर्वोच्च स्थान रखता है। दरभंगा महाराज के इतने बड़े योगदान के बाद अभीतक एएमयू में उनके नाम पर कोई हॉल या लाइब्रेरी तक का नाम नहीं रखा गया है। एएमयू प्रशासन को इस तरफ भी अविलंब विचार करना होगा। पंडित मदन मोहन मालवीय और अलीगढ़ के राजपूत राजा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा था, जिसे कालांतर में भुला देने की कोशिश की गईI सारे देश के नौजवान आएं अभी एएमयू के साथ एक गड़बड़ यह भी हो रही है कि यहां मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश तथा बिहार के ही नौजवान आते हैं। किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लिए यह सुखद स्थिति नहीं मानी जा सकती। एएमयू प्रशासन को कोशिश करनी चाहिए कि इसमें सारे देश के नौजवानों को दाखिला मिले। ए.एम.यू. के शताब्दी समारोह के अवसर पर अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी जी ने सही कहा कि समाज में वैचारिक मतभेद होते हैं, लेकिन जब बात राष्ट्र के लक्ष्य की प्राप्ति की हो तो सभी मतभेद किनारे रख देने चाहिए। देश में कोई किसी भी जाति या मजहब का हो, उसे हर हाल में और किसी भी कीमत पर अपने देश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर योगदान देना चाहिए। बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सच पुनः दुहराया कि जो देश में जन्मा है, वह हर देशवासी इस देश का बराबर का जिम्मेदार है। मतलब यह कि इस देश के संसाधनों पर मुसलमानों का भी पूरा हक है। इससे साफ बात कोई प्रधानमंत्री क्या करेगा? हालांकि कई मुसलमान नेता अपनी कौम को गुमराह करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। खांटी दिल्ली वाले थे सर सैयद एएमयू बिरादरी को राजधानी के दरियागंज इलाके में सर सैयद अहमद के जन्म स्थान के बाहर कम-से-कम एक पत्थर अवश्य लगवा देना चाहिए। हालत यह है कि अब किसी अनजान शख्स के लिए सर सैयद अहमद के पुश्तैनी घर को खोजना भी लगभग असंभव है। बमुश्किल ही कोई मिल पाता है, जिसे मालूम होता है उनका घर। यह लगभग एक हजार गज में है। इसी घर में सर सैयद अहमद का 17 अक्तूबर 1817 को जन्म हुआ था। उनके परिवार की दिल्ली में खासी प्रतिष्ठा थी। इसी में उनके बचपन के शुरुआती साल बीते। अब उनके घर के अवशेष भी नहीं बचे हैं। लंबे समय तक लगभग उजाड़ रहा यह घर। इधर गायें-भैंसें बंधी रहती थीं। बीते कुछ समय के दौरान सर सैयद अहमद के घर को जमींदोज करके सुंदर फ्लैट बन गए हैं। सर सैयद अहमद खान खांटी दिल्ली वाले थे। उन्होंने दिल्ली के महत्वपूर्ण स्मारकों पर 'असरारुस्नादीद' (इतिहास के अवशेष) नाम से महत्वपूर्ण किताब भी लिखी। 'असरारुस्नादीद' दो खंडों में छपी थी। इसका प्रकाशन 1842 में हुआ था। इसमें दिल्ली की 232 ऐतिहासिक इमारतों पर विस्तार से लिखा गया है। असरारुस्नादीद में जिन स्मारकों का जिक्र किया है, उनमें से कइयों को गोरों ने सन 1857 की क्रांति के बाद नेस्तनाबूत कर दिया था। फिर सन 1912 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद भी कई स्मारक तोड़ दिए गए। बहरहाल, देश यह उम्मीद करेगा कि एएमयू भारत को एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक, डॉक्टर, खिलाड़ी, कवि, लेखक आदि भी देती रहेगी।  (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 24 December 2020


bhopal,Congress turning from reality

पवन कुमार अरविंद सत्ता के वैभव में एक ऐसा आलोक होता है जिसके प्रचंड तेज में अनेक प्रतिभावान व्यक्ति विलुप्त हो गए। इस प्रचंड तेज का असर देश पर सर्वाधिक शासन करने वाली कांग्रेस एवं कांग्रेसजनों पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सर्वाधिक समय तक सत्ता में रहने के कारण कांग्रेसजनों के लिए सत्ता ‘एक आदत-सी’ हो गयी है। उनमें न धैर्य है और न संघर्ष की क्षमता दिखती है। वैसे तो, पार्टी में एक से बढ़कर एक प्रतिभावान नेता मौजूद हैं, लेकिन जल्द सत्तारूढ़ होने की अधीरता उनकी प्रतिभा को लील रही है और वे अपने को रीढ़विहीन मान बैठे हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की इससे ज्यादा दुर्दशा और क्या हो सकती है कि वह पिछले करीब 18 महीने से अंतरिम अध्यक्ष के भरोसे चल रही है और जब नये अध्यक्ष की चर्चा होती है तो हर बार बात राहुल गांधी के नाम पर आकर अटक जाती है।  पिछले साढ़े 6 वर्षों से केंद्र की सत्ता से दूर कांग्रेस और उसके नेताओं में संगठन को दुरुस्त किए बिना सत्ता पाने की छटपटाहट स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। पर, यह भी अपने में विचित्र ही है कि जिस नेता में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने की अपनी कोई दृष्टि ही नहीं है, पार्टी के अधिकतर नेता उसी की जय-जयकार करने में व्यस्त हैं। पार्टी नेताओं का यह रवैया वास्तविकता से मुख मोड़ने जैसा ही है। राजनीति कोई मौज-मस्ती या सैर-सपाटे का स्थान नहीं है। यह देश निर्माण का ऐसा महायज्ञ है जिसके लिए शुद्ध-सात्विक मन से सतत संघर्ष जरूरी है। राजनेता का प्रमुख धर्म जनता से कटे रहकर नहीं बल्कि जनता के बीच डटे रहकर और उसकी समस्याओं से रूबरू होकर; देश एवं समाज के हित में राजकाज की नीतियों के निर्माण में सहयोग देना है। पर, राहुल गांधी में ऐसा कोई गुण नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि राजनीति उनके लिए एक ‘पार्ट टाइम जॉब’ की तरह है। इसलिए देश की जनता के दुख-दर्द को लेकर उनकी संवेदना का स्तर भी आंशिक ही है। वर्ष 2004 से लगातार चौथी बार सांसद राहुल गांधी कांग्रेस के 64 महीने तक राष्ट्रीय महासचिव, 59 महीने तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और 20 महीने तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं इसलिए उनकी कार्यप्रणाली और उनके चिंतन से देश की जनता भंलीभांति परिचित है। वह कितने क्षमतावान हैं, यह भी सर्वविदित है। इसके बावजूद राहुल के ही नाम की रट कांग्रेस का कितना उद्धार करेगी? कांग्रेस नेतृत्व को चिट्ठी लिखने वाले उन 23 नेताओं का भी तो यही कहना है। समूह-23 के एक प्रमुख नेता गुलाम नबी आजाद ने तो यही सवाल उठाए थे कि बिना संघर्ष किए कांग्रेस सत्तारूढ़ होना चाहती है। उनका कहना है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए संगठन को पहले ब्लॉक स्तर पर मजबूत करना पड़ेगा। ईमानदारी से सांगठनिक चुनाव पर ध्यान देना होगा। फाइव स्टार कल्चर को विराम देना होगा। 'लेटरहेड' और 'विजिटिंग कार्ड' वाली राजनीतिक संस्कृति को त्यागकर नेताओं के परिक्रमा के बजाय उनके पराक्रम पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पर, सवाल यह है कि इन 23 नेताओं को सुनने वाला कौन है? मौजूदा नेतृत्व से मुक्ति पाकर नया और योग्य नेतृत्व पाने की छटपटाहट जरूर है, लेकिन वह छटपटाहट दूर कौन करेगा? सवाल यहीं पर आकर अटकता है। जाहिर है कि कांग्रेस के उत्थान के लिए आज एक पूर्णकालिक, निष्ठावान और समर्पित अध्यक्ष की जरूरत है। एक ऐसा अध्यक्ष जिसकी अपनी एक सोच हो, एक व्यावहारिक चिंतन हो और वह उचित-अनुचित का विचार कर समयानुकूल फैसले ले सके। ऐसा जिस दिन हो गया तो कांग्रेस के उद्धार का रास्ता भी उसी दिन खुल जाएगा। अध्यक्ष पद पर 45 साल रहा नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा वर्ष 1885 में कांग्रेस के गठन से लेकर अबतक नेहरू-गांधी परिवार का पार्टी के अध्यक्ष पद पर 45 वर्ष से अधिक समय तक कब्जा रहा है। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी, सभी मिलाकर कुल 45 वर्ष से अधिक समय तक अध्यक्ष रहे हैं। इसमें सोनिया गांधी के नाम सर्वाधिक समय तक अध्यक्ष रहने का रिकॉर्ड है जबकि गांधी परिवार के सदस्य के रूप में राहुल गांधी सबसे कम समय तक अध्यक्ष पद पर रहे हैं। सोनिया गांधी 1998 से 2017 तक लगातार 19 साल तक अध्यक्ष रही हैं और अब पिछले डेढ़ साल से अंतरिम अध्यक्ष हैं। जबकि राहुल गांधी सिर्फ 20 महीने अध्यक्ष रहे हैं। कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष थे अबुल कलाम आज़ाद 41 साल की अवस्था में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने राजीव गांधी लगातार 6 साल तक इस पद पर रहे। वहीं राहुल गांधी जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उनकी उम्र 47 वर्ष थी। अबुल कलाम आजाद को कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष के रूप में जाना जाता है। वह पहली बार जब वर्ष 1923 में अध्यक्ष बने तो उनकी उम्र सिर्फ 35 वर्ष थी। वे कुल 7 वर्षों तक इस पद पर रहे। सरोजिनी नायडू थीं कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष आजादी के पहले तीन महिलाएं कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। वर्ष 1917 में आयरलैंड की रहनेवालीं एनी बेसेंट अध्यक्ष बनीं। वर्ष 1925 में सरोजिनी नायडू और 1933 में नेल्ली सेनगुप्ता कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। एनी बेसेंट को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष के रूप में जाना जाता है, जबकि सरोजिनी नायडू को कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष के रूप में जाना जाता है। देखें तो कांग्रेस का अतीत स्वर्णिम रहा है। यह पार्टी रातों-रात अचानक नहीं खड़ी हो गयी, बल्कि इसको खड़ा करने में एक से बढ़कर एक मनीषी सदृश्य नेताओं का योगदान रहा है। सवाल उठता है कि ऐसी पार्टी को किसी परिवार विशेष या व्यक्ति विशेष के सहारे क्यों छोड़ना? वास्तविकता को स्वीकारते हुए मौजूदा ज़रूरत के अनुसार कड़े और बड़े फैसले लेने होंगे तभी कांग्रेस का उद्धार हो सकेगा। कांग्रेस का मजबूत होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी आवश्यक है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 23 December 2020


bhopal,Meaning of Jammu and Kashmir election

डॉ. वेदप्रताप वैदिक जम्मू-कश्मीर के जिला विकास परिषद के चुनाव-परिणामों का क्या अर्थ निकाला जाए? उसकी 280 सीटों में से गुपकार गठबंधन को 144 सीटें, भाजपा को 72, कांग्रेस को 26 और निर्दलीयों को बाकी सीटें मिली हैं। असली टक्कर गुपकार मोर्चे और भाजपा में है। दोनों दावा कर रहे हैं कि उनकी विजय हुई है। कांग्रेस ने अपने चिन्ह पर चुनाव लड़ा है लेकिन वह गुपकार के साथ है। निर्दलीयों का पता नहीं कि कौन किसके खेमे में जाएगा। गुपकार मोर्चे के नेता डाॅ. फारुक अब्दुल्ला का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने धारा 370 और 35 ए को खत्म करने के केंद्र सरकार के कदम को रद्द कर दिया है। अंदाज लगाया जा रहा है कि अब 20 जिला परिषदों में से 13 गुपकार के कब्जे में होंगी। गुपकार-पार्टियों ने गत वर्ष हुए दो स्थानीय चुनावों का बहिष्कार किया था लेकिन इन जिला-चुनावों में उसने भाग लेकर दर्शाया है कि वह लोकतांत्रिक पद्धति में विश्वास करती है। इसके बावजूद उसे जो प्रचंड बहुमत मिलने की आशा थी, वह इसलिए भी नहीं मिला हो सकता है कि एक तो उसके नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के तीखे आरोप लगे, उनमें से कुछ ने पाकिस्तान और कुछ ने चीन के पक्ष में अटपटे बयान दे दिए। इन पार्टियों के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने अपने पद भी त्याग दिए। इतना ही नहीं, पहली बार ऐसा हुआ है कि कश्मीर की घाटी में भाजपा के तीन उम्मीदवार जीते हैं। पार्टी के तौर पर इस चुनाव में भाजपा ने अकेले ही सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं लेकिन जम्मू-क्षेत्र में 70 से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद उसकी सीटें कम हुई हैं। अब यदि ये जिला-परिषदें ठीक से काम करेंगी और उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा उनसे संतुष्ट होंगे तो कोई आश्चर्य नहीं कि नए साल में जम्मू-कश्मीर फिर से पूर्ण राज्य बन जाएगा। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 December 2020


bhopal, After Shastri ji, Modi made the nation aware

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर चर्चा थी कि वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करेंगे। कुछ लोगों को असमंजस भी रहा होगा कि संबोधन करेंगे या नहीं। एक सवाल और था कि अगर वे वहां बोलेंगे तो क्या बोलेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमाम शंकाओं का एक झटके में समाधान कर दिया। लाल बहादुर शास्त्री के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को संबोधित करने वाले वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री हैं। वह भी उस दल के प्रधानमंत्री जिसपर विरोधी दल हिंदू और मुस्लिमों को बांटने का आरोप लगाते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के गुपकार नेता फारुख अब्दुल्ला ने तो आज ही कहा है कि वे भाजपा को अपना दुश्मन मानते हैं क्योंकि वह धर्म के आधार पर लोगों को बांटती है। राजनीति के जानकारों को पता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन नहीं किया। उन्होंने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास की बात कही है। आज वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए किए गए संबोधन में भी उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका लब्बोलुआब भी यही है। अगर यह कहें कि शास्त्री जी के बाद नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में काम की बात कही है तो कदाचित गलत नहीं होगा। 55 साल तक किसी विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री का संबोधन न हो तो इसे किस तरह देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा है कि विकास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीति इंतजार कर सकती है लेकिन विकास इंतजार नहीं कर सकता। भारतीय चिंतक भी यही बात कहते रहे हैं कि 'काल करै सो आज करै। आज करै सो अब, पल में परलय होयगी बहुरि करौगे कब।' मतलब किसी काम को टाला नहीं जाना चाहिए। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री को इस तरह की बात क्यों कहनी पड़ रही है, भारतीय राजनीतिक दलों पर इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि देश में विकास की गति के लंबे समय तक मंद रहने की वजह भी टालमटोल की कार्य संस्कृति और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा है। मतभेद हमेशा दुख देते हैं, कार्यावरोध पैदा करते हैं। विकास की गति को बाधित करते हैं। मतभेद के चलते पहले ही यह देश बहुत कुछ गंवा चुका है। इस बात को प्रधानमंत्री भी समझते पर हैं और राजनीतिक दल भी। हम सत्तापक्ष में हैं या विपक्ष में हैं, यह बात उतनी मायने नहीं रखती जितनी यह कि हम भारतीय है। हर व्यक्ति केवल अपने हिस्से की जिम्मेदारी ही ढंग से निभा दे तो यह देश फिर सोने की चिड़िया बन जाए। प्रधानमंत्री ने सभी से आग्रह किया है कि मतभेदों को भुलाकर एक लक्ष्य के साथ मिलकर नया भारत, आत्मनिर्भर भारत बनाएं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह के जरिए देश को बताने और समझाने की कोशिश की है कि राजनीति समाज का अहम अंग तो है लेकिन सबकुछ नहीं। राजनीति के अलावा समाज में भी बहुत कुछ इतना अहम है जिसे किए जाने की जरूरत है। देश और समाज राजनीति और सत्ता की सोच से बहुत ऊपर की चीज है। उन्होंने सलाह दी है कि राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हर तरह के मतभेद को दरकिनार कर देना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र और समाज के विकास को सियासी ऐनक से न देखने की बात कही है। यह भी कहा है कि हर समाज में कुछ स्वार्थी तत्व होते हैं जो अपने मुनाफे के लिए राष्ट्र एवं समाज के विकास में रोड़ा अटकाते रहते हैं। सकारात्मकता को भी नकारात्मकता में परिवर्तित करने की कोशिशें करते रहते हैं। प्रधानमंत्री का यह बयान तब आया है जब दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर किसान तीन कृषि कानूनों को रद्द किए जाने की मांग को लेकर कुछ सप्ताह से आंदोलनरत हैं। प्रधानमंत्री की इस बात में दम है कि आज पूरी दुनिया की नजर भारत पर है। मौजूदा सदी को भारत की बताया जा रहा है। उस लक्ष्य की तरफ भारत कैसे आगे बढ़ेगा, इसे देखने और जानने की अभिलाषा सभी को है। प्रधानमंत्री ने युवाओं में उम्मीद जगाने की कोशिश की है। उनसे आग्रह किया है तो हर युवा पहले भारतीय हैं की भावना से अगर आगे बढ़ेगा तो हम हर मंजिल हासिल कर सकते हैं। उन्होंने देशवासियों को यह समझाने की भी कोशिश की है कि हम किस मजहब में पले-बढ़े हैं, इससे बड़ी बात यह है कि कैसे हम देश की आकांक्षाओं से जुड़ें। शिक्षा को सभी तक बराबरी से पहुंचाने, नारी शिक्षा को प्रोत्साहित करने, खासकर मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा के प्रति आई जागृति का तो उन्होंने उल्लेख किया है, साथ ही यह भी बताने की कोशिश की है कि उनके कार्यकाल में चली एक भी विकास योजना और जनसुविधाओं से जुड़ी योजना ऐसी नहीं है जिसमें जाति और मजहब के साथ किसी से भेदभाव किया गया हो। उन्होंने यह भी बताया है कि 2014 में 16 आईआईटी थे जो अब 23 हो गए हैं। 2014 में 13 आईआईएमएस थे जो अब बढ़कर आज 20 हो गए हैं। 6 साल पहले तक देश में सिर्फ 7 एम्स हुआ करते थे, आज 22 हैं। उनकी सरकार सभी तक शिक्षा को पहुंचाने का काम कर रही है। उन्होंने युवाओं से ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है जिनके बारे में अब कोई नहीं जानता या ज्यादा नहीं जानता। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भी उन्होंने मजबूत आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए सुझाव मांगा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की तारीफ तो उन्होंने की ही, विश्वविद्यालय में अनेक भाषाओं में शिक्षा देने की तारीफ कर उन्होंने समाज के एक बड़े तबके का दिल जीत लिया है। यह भी कहा कि उर्दू, अरबी और फारसी भाषा में यहां होने वाली रिसर्च भारतीय संस्कृति को नई ऊर्जा देती है। सर सैयद ने कहा था कि देश की चिंता करने वाले का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वह लोगों के लिए काम करे, भले ही उनका मजहब, जाति कुछ भी हो। जिस तरह मानव जीवन के लिए हर अंग का स्वस्थ रहना जरूरी है, उसी तरह समाज का हर स्तर पर विकास जरूरी है। कोई मजहब की वजह से विकास की दौड़ में पीछे न रह जाए। जाहिर तौर पर प्रधानमंत्री ने अपने ओजस्वी विचारों से देश को दिशा दी है। अब यह शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि छात्रों को वह ज्ञान दें जो उन्हें अपना दीपक खुद बनने और पूरी दुनिया का भला करने की ताकत और प्रेरणा दे। यही मौजूदा समय की मांग भी है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 23 December 2020


bhopal, After Shastri ji, Modi made the nation aware

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर चर्चा थी कि वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करेंगे। कुछ लोगों को असमंजस भी रहा होगा कि संबोधन करेंगे या नहीं। एक सवाल और था कि अगर वे वहां बोलेंगे तो क्या बोलेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमाम शंकाओं का एक झटके में समाधान कर दिया। लाल बहादुर शास्त्री के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को संबोधित करने वाले वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री हैं। वह भी उस दल के प्रधानमंत्री जिसपर विरोधी दल हिंदू और मुस्लिमों को बांटने का आरोप लगाते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के गुपकार नेता फारुख अब्दुल्ला ने तो आज ही कहा है कि वे भाजपा को अपना दुश्मन मानते हैं क्योंकि वह धर्म के आधार पर लोगों को बांटती है। राजनीति के जानकारों को पता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन नहीं किया। उन्होंने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास की बात कही है। आज वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए किए गए संबोधन में भी उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका लब्बोलुआब भी यही है। अगर यह कहें कि शास्त्री जी के बाद नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में काम की बात कही है तो कदाचित गलत नहीं होगा। 55 साल तक किसी विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री का संबोधन न हो तो इसे किस तरह देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा है कि विकास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीति इंतजार कर सकती है लेकिन विकास इंतजार नहीं कर सकता। भारतीय चिंतक भी यही बात कहते रहे हैं कि 'काल करै सो आज करै। आज करै सो अब, पल में परलय होयगी बहुरि करौगे कब।' मतलब किसी काम को टाला नहीं जाना चाहिए। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री को इस तरह की बात क्यों कहनी पड़ रही है, भारतीय राजनीतिक दलों पर इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि देश में विकास की गति के लंबे समय तक मंद रहने की वजह भी टालमटोल की कार्य संस्कृति और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा है। मतभेद हमेशा दुख देते हैं, कार्यावरोध पैदा करते हैं। विकास की गति को बाधित करते हैं। मतभेद के चलते पहले ही यह देश बहुत कुछ गंवा चुका है। इस बात को प्रधानमंत्री भी समझते पर हैं और राजनीतिक दल भी। हम सत्तापक्ष में हैं या विपक्ष में हैं, यह बात उतनी मायने नहीं रखती जितनी यह कि हम भारतीय है। हर व्यक्ति केवल अपने हिस्से की जिम्मेदारी ही ढंग से निभा दे तो यह देश फिर सोने की चिड़िया बन जाए। प्रधानमंत्री ने सभी से आग्रह किया है कि मतभेदों को भुलाकर एक लक्ष्य के साथ मिलकर नया भारत, आत्मनिर्भर भारत बनाएं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह के जरिए देश को बताने और समझाने की कोशिश की है कि राजनीति समाज का अहम अंग तो है लेकिन सबकुछ नहीं। राजनीति के अलावा समाज में भी बहुत कुछ इतना अहम है जिसे किए जाने की जरूरत है। देश और समाज राजनीति और सत्ता की सोच से बहुत ऊपर की चीज है। उन्होंने सलाह दी है कि राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हर तरह के मतभेद को दरकिनार कर देना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र और समाज के विकास को सियासी ऐनक से न देखने की बात कही है। यह भी कहा है कि हर समाज में कुछ स्वार्थी तत्व होते हैं जो अपने मुनाफे के लिए राष्ट्र एवं समाज के विकास में रोड़ा अटकाते रहते हैं। सकारात्मकता को भी नकारात्मकता में परिवर्तित करने की कोशिशें करते रहते हैं। प्रधानमंत्री का यह बयान तब आया है जब दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर किसान तीन कृषि कानूनों को रद्द किए जाने की मांग को लेकर कुछ सप्ताह से आंदोलनरत हैं। प्रधानमंत्री की इस बात में दम है कि आज पूरी दुनिया की नजर भारत पर है। मौजूदा सदी को भारत की बताया जा रहा है। उस लक्ष्य की तरफ भारत कैसे आगे बढ़ेगा, इसे देखने और जानने की अभिलाषा सभी को है। प्रधानमंत्री ने युवाओं में उम्मीद जगाने की कोशिश की है। उनसे आग्रह किया है तो हर युवा पहले भारतीय हैं की भावना से अगर आगे बढ़ेगा तो हम हर मंजिल हासिल कर सकते हैं। उन्होंने देशवासियों को यह समझाने की भी कोशिश की है कि हम किस मजहब में पले-बढ़े हैं, इससे बड़ी बात यह है कि कैसे हम देश की आकांक्षाओं से जुड़ें। शिक्षा को सभी तक बराबरी से पहुंचाने, नारी शिक्षा को प्रोत्साहित करने, खासकर मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा के प्रति आई जागृति का तो उन्होंने उल्लेख किया है, साथ ही यह भी बताने की कोशिश की है कि उनके कार्यकाल में चली एक भी विकास योजना और जनसुविधाओं से जुड़ी योजना ऐसी नहीं है जिसमें जाति और मजहब के साथ किसी से भेदभाव किया गया हो। उन्होंने यह भी बताया है कि 2014 में 16 आईआईटी थे जो अब 23 हो गए हैं। 2014 में 13 आईआईएमएस थे जो अब बढ़कर आज 20 हो गए हैं। 6 साल पहले तक देश में सिर्फ 7 एम्स हुआ करते थे, आज 22 हैं। उनकी सरकार सभी तक शिक्षा को पहुंचाने का काम कर रही है। उन्होंने युवाओं से ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है जिनके बारे में अब कोई नहीं जानता या ज्यादा नहीं जानता। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भी उन्होंने मजबूत आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए सुझाव मांगा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की तारीफ तो उन्होंने की ही, विश्वविद्यालय में अनेक भाषाओं में शिक्षा देने की तारीफ कर उन्होंने समाज के एक बड़े तबके का दिल जीत लिया है। यह भी कहा कि उर्दू, अरबी और फारसी भाषा में यहां होने वाली रिसर्च भारतीय संस्कृति को नई ऊर्जा देती है। सर सैयद ने कहा था कि देश की चिंता करने वाले का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वह लोगों के लिए काम करे, भले ही उनका मजहब, जाति कुछ भी हो। जिस तरह मानव जीवन के लिए हर अंग का स्वस्थ रहना जरूरी है, उसी तरह समाज का हर स्तर पर विकास जरूरी है। कोई मजहब की वजह से विकास की दौड़ में पीछे न रह जाए। जाहिर तौर पर प्रधानमंत्री ने अपने ओजस्वी विचारों से देश को दिशा दी है। अब यह शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि छात्रों को वह ज्ञान दें जो उन्हें अपना दीपक खुद बनने और पूरी दुनिया का भला करने की ताकत और प्रेरणा दे। यही मौजूदा समय की मांग भी है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 23 December 2020


bhopal, Why was the Nepali Parliament dissolved?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक नेपाल की संसद को प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद ओली ने भंग करवा दिया है। अब वहां अप्रैल और मई में चुनाव होंगे। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हो गई हैं। उनमें कहा गया है कि नेपाल के संविधान में संसद को बीच में ही भंग करने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कि अदालत इस फैसले को उलटने का साहस करेगी। यह निर्णय ओली ने क्यों लिया? इसीलिए कि सत्तारूढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों खेमों में लगातार मुठभेड़ चल रही थी। एक खेमे के नेता पुष्पकमल दहल प्रचंड हैं और दूसरे खेमे के ओली। ओली को इसी समझ के आधार पर प्रधानमंत्री बनाया गया था कि आधी अवधि वे राज करेंगे और आधी में प्रचंड, बिल्कुल वैसे ही जैसे उप्र में मायावती और मुलायम सिंह के बीच समझौता हुआ था। अब ओली अपनी गद्दी से हिलने को तैयार नहीं हुए तो प्रचंड खेमे ने उस गद्दी को ही हिलाना शुरू कर दिया। पहले उन्होंने ओली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। खुलेआम चिट्ठियां लिखी गईं, जिनमें सड़क-निर्माण की 50 करोड़ रु. की अमेरिकी योजना में पैसे खाने की बात कही गई। लिपूलेख-विवाद के बारे में भारत के विरुद्ध चुप्पी साधने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा सरकारी निर्णयों में मनमानी करने और पार्टी संगठनों की उपेक्षा करने की शिकायतें भी होती रहीं। ओली ने भी कम दांव नहीं चले। उन्होंने लिपुलेख-विवाद के मामले में भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सुगौली की संधि का उल्लंघन करके भारतीय क्षेत्रों को नेपाली सीमा में दिखा दिया। ओली के इस 'राष्ट्रवादी पैंतरे' को संसद में सर्वदलीय समर्थन मिला। चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी दोनों धड़ों के बीच सरपंच की भूमिका निभाती रही। अपनी भारत-विरोधी छवि चमकाने के लिए ओली ने नेपाली संसद में हिंदी में बोलने और धोती-कुर्ता पहनने पर रोक लगाने की पहल भी कर दी। इसकी अनुमति अब से लगभग 30 साल पहले मैंने संसद अध्यक्ष दमनाथ ढुंगाना और गजेंद्र बाबू से कहकर दिलवाई थी। नेपालियों से शादी करनेवाले भारतीयों को नेपाली नागरिकता लेने में अब सात साल लगेंगे, ऐसे कानून बनाकर ओली ने अपनी राष्ट्रवादी छवि जरूर चमकाई लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने भारत के भी नजदीक आने के संकेत दिए। किंतु सत्तारूढ़ संसदीय दल में उनकी दाल पतली देखकर उन्होंने संसद भंग कर दी। यह संसद प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने भी भंग की थी लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि वे जीत पाएंगे या नहीं? (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 21 December 2020


bhopal, Why was the Nepali Parliament dissolved?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक नेपाल की संसद को प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद ओली ने भंग करवा दिया है। अब वहां अप्रैल और मई में चुनाव होंगे। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हो गई हैं। उनमें कहा गया है कि नेपाल के संविधान में संसद को बीच में ही भंग करने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कि अदालत इस फैसले को उलटने का साहस करेगी। यह निर्णय ओली ने क्यों लिया? इसीलिए कि सत्तारूढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों खेमों में लगातार मुठभेड़ चल रही थी। एक खेमे के नेता पुष्पकमल दहल प्रचंड हैं और दूसरे खेमे के ओली। ओली को इसी समझ के आधार पर प्रधानमंत्री बनाया गया था कि आधी अवधि वे राज करेंगे और आधी में प्रचंड, बिल्कुल वैसे ही जैसे उप्र में मायावती और मुलायम सिंह के बीच समझौता हुआ था। अब ओली अपनी गद्दी से हिलने को तैयार नहीं हुए तो प्रचंड खेमे ने उस गद्दी को ही हिलाना शुरू कर दिया। पहले उन्होंने ओली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। खुलेआम चिट्ठियां लिखी गईं, जिनमें सड़क-निर्माण की 50 करोड़ रु. की अमेरिकी योजना में पैसे खाने की बात कही गई। लिपूलेख-विवाद के बारे में भारत के विरुद्ध चुप्पी साधने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा सरकारी निर्णयों में मनमानी करने और पार्टी संगठनों की उपेक्षा करने की शिकायतें भी होती रहीं। ओली ने भी कम दांव नहीं चले। उन्होंने लिपुलेख-विवाद के मामले में भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सुगौली की संधि का उल्लंघन करके भारतीय क्षेत्रों को नेपाली सीमा में दिखा दिया। ओली के इस 'राष्ट्रवादी पैंतरे' को संसद में सर्वदलीय समर्थन मिला। चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी दोनों धड़ों के बीच सरपंच की भूमिका निभाती रही। अपनी भारत-विरोधी छवि चमकाने के लिए ओली ने नेपाली संसद में हिंदी में बोलने और धोती-कुर्ता पहनने पर रोक लगाने की पहल भी कर दी। इसकी अनुमति अब से लगभग 30 साल पहले मैंने संसद अध्यक्ष दमनाथ ढुंगाना और गजेंद्र बाबू से कहकर दिलवाई थी। नेपालियों से शादी करनेवाले भारतीयों को नेपाली नागरिकता लेने में अब सात साल लगेंगे, ऐसे कानून बनाकर ओली ने अपनी राष्ट्रवादी छवि जरूर चमकाई लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने भारत के भी नजदीक आने के संकेत दिए। किंतु सत्तारूढ़ संसदीय दल में उनकी दाल पतली देखकर उन्होंने संसद भंग कर दी। यह संसद प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने भी भंग की थी लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि वे जीत पाएंगे या नहीं? (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 21 December 2020


bhopal,Ramanujan: Mathematicians of Mathematicians

राष्ट्रीय गणित दिवस (22 दिसम्बर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल भारत में ऐसे कई महान गणितज्ञ हुए, जिन्होंने न केवल भारतीय गणित के चेहरे को बदलने में अनमोल योगदान दिया बल्कि विश्वभर में अत्यधिक लोकप्रियता भी हासिल की। ऐसे ही गणितज्ञों में ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट तथा श्रीनिवास रामानुजन जैसे विश्वविख्यात गणितज्ञों को कौन नहीं जानता, जिन्होंने भारत में गणित के विभिन्न सूत्रों, प्रमेयों और सिद्धांतों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पिछले कुछ वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ मनाया जाता है, जो इन्हीं महान् गणितज्ञों में से एक श्रीनिवास रामानुजन को सम्मान देने के उद्देश्य से उनकी स्मृति में उनके जन्मदिवस पर मनाया जाता है। रामानुजन ने गणितीय विश्लेषण, अनंत श्रृंखला, संख्या सिद्धांत तथा निरंतर भिन्न अंशों के लिए आश्चर्यजनक योगदान दिया और अनेक समीकरण व सूत्र भी पेश किए। वे ऐसे विश्वविख्यात गणितज्ञ थे, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और विषय गणित की शाखाओं में अविस्मरणीय योगदान दिया और जिनके प्रयासों तथा योगदान ने गणित को एक नया अर्थ दिया। उनके द्वारा की गई खोज ‘रामानुजन थीटा’ तथा ‘रामानुजन प्राइम’ ने इस विषय पर आगे के शोध और विकास के लिए दुनियाभर के शोधकर्ताओं को प्रेरित किया। 26 दिसम्बर 2011 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में आयोजित श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर देश में योग्य गणितज्ञों की संख्या कम होने पर चिंता जताते हुए कहा था कि श्रीनिवास रामानुजन की असाधारण प्रतिभा ने पिछली सदी के दूसरे दशक में गणित की दुनिया को एक नया आयाम दिया। गणित में रामानुजन के अविस्मरणीय योगदान को याद रखने और सम्मान देने के लिए रामानुजन के जन्मदिन पर प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ मनाए जाने का निर्णय लिया गया, साथ ही वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष भी घोषित किया गया था। 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से करीब चार सौ किमी दूर तमिलनाडु के ईरोड शहर में जन्मे श्रीनिवास अयंगर रामानुजन का बचपन कठिनाइयों और निर्धनता के दौर में बीता था। तीन वर्ष की आयु तक वह बोलना भी नहीं सीख पाए थे और तब परिवार के लोगों को चिंता होने लगी थी कि कहीं वह गूंगे न हों लेकिन कौन जानता था कि यही बालक गणित के क्षेत्र में इतना महान कार्य करेगा कि सदियों तक दुनिया उन्हें आदर-सम्मान के साथ याद रखेगी। उनका बचपन इतने अभावों में बीता कि वे स्कूल में किताबें अक्सर अपने मित्रों से मांगकर पढ़ा करते थे। उन्हें गणित में इतनी दिलचस्पी थी कि गणित में उन्हें प्रायः सौ फीसदी अंक मिलते थे लेकिन बाकी विषयों में बामुश्किल ही परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते थे क्योंकि गणित के अलावा उनका मन दूसरे विषयों में नहीं लगता था। 10 वर्ष की आयु में प्राइमरी की परीक्षा में उन्होंने पूरे जिले में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे। उन्हें गणित का इतना शौक था कि 12 वर्ष की आयु में ही उन्होंने त्रिकोणमिति में महारत हासिल कर ली थी और बगैर किसी की मदद के अपने दिमाग से कई प्रमेय विकसित किए। उन्होंने कभी गणित में किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं लिया था। स्कूली दिनों में उन्हें उनकी प्रतिभा के लिए अनेक योग्यता प्रमाणपत्र तथा अकादमिक पुरस्कार प्राप्त हुए। गणित में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1904 में के. रंगनाथ राव पुरस्कार भी दिया गया था। कुंभकोणम के गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज में अध्ययन करने के लिए उन्हें छात्रवृत्ति से सम्मानित किया गया था किन्तु उनका गणित प्रेम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने दूसरे विषयों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया था। दूसरे विषयों की कक्षाओं में भी वे गणित के ही प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि 11वीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए और इस कारण उन्हें मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद हो गई। परिवार की आर्थिक हालत पहले ही ठीक नहीं थी। आखिरकार परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने गणितज्ञ रामास्वामी अय्यर के सहयोग से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी करनी शुरू की। नौकरी के दौरान भी वे समय मिलते ही खाली पन्नों पर गणित के प्रश्नों को हल करने लग जाया करते थे। गणित के क्षेत्र में सफलता उन्हें उसी दौर में मिली। 1913 में उन्होंने गणित के प्रति अपने ज्ञान एवं रुचि को आगे बढ़ाने के लिए यूरोपीय गणितज्ञों से सम्पर्क साधा। एकदिन एक ब्रिटिश नागरिक की नजर उनके द्वारा हल किए गए गणित के प्रश्नों पर पड़ी तो वह उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुआ। उसी अंग्रेज के माध्यम से रामानुजन का सम्पर्क जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी एच हार्डी से हुआ। उसी के बाद उनका हार्डी के साथ पत्रों का आदान-प्रदान करना शुरू हुआ। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को भांपकर 1914 में उन्हें अपनी प्रतिभा को साकार करने के लिए लंदन बुला लिया और उनके लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की, जिसके बाद उनकी ख्याति दुनियाभर में फैल गई। जी. एस. हार्डी ने रामानुजन को यूलर, गोस, आर्किमिडीज, आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों के समकक्ष श्रेणी में रखा था। 1917 में उन्हें ‘लंदन मैथेमेटिकल सोसायटी’ का सदस्य चुना गया और अगले ही वर्ष 1918 में इंग्लैंड की प्रतिष्ठित संस्था ‘रॉयल सोसायटी’ ने उन्हें अपना फैलो बनाकर सम्मान दिया। वह उपलब्धि हासिल करने वाले रामानुजन सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। रामानुजन ने करीब पांच साल कैम्ब्रिज में बिताए और उस दौरान गणित से संबंधित कई शोधपत्र लिखे। इंग्लैण्ड में उन पांच वर्षों के दौरान उन्होंने मुख्यतः संख्या सिद्धांत के क्षेत्र में कार्य किया। प्रोफेसर जी एच हार्डी के साथ मिलकर रामानुजन ने कई शोधपत्र प्रकाशित किए और उन्हीं में से एक विशेष शोध के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने रामानुजन को बी.ए. की उपाधि भी प्रदान दी। महान गणितज्ञ रामानुजन की गणना आधुनिक भारत के उन व्यक्तित्वों में की जाती है, जिन्होंने विश्व में नए ज्ञान को पाने और खोजने की पहल की। रामानुजन को ‘गणितज्ञों का गणितज्ञ’ और संख्या सिद्धांत पर अद्भुत कार्य के लिए ‘संख्याओं का जादूगर’ भी कहा जाता है, जिन्होंने खुद से गणित सीखा और जीवनभर में गणित के 3884 प्रमेयों (थ्योरम्स) का संकलन किया, जिनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किए जा चुके हैं। गणित पर उनके लिखे लेख उस समय की सर्वोत्तम विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ करते थे। गणित में की गई उनकी अद्भुत खोजें आज के आधुनिक गणित तथा विज्ञान की आधारशिला बनी। लंदन की जलवायु और रहन-सहन की शैली रामानुजन के अनुकूल नहीं थी, जिससे धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा। खराब खाने की आदतों के साथ वे अथक परिश्रम भी कर रहे थे, जिसके चलते उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। जांच के दौरान पता चला उन्हें टीबी की बीमारी हो गई है। उसके बाद वहां के डॉक्टरों की सलाह पर वे भारत लौट आए लेकिन यहां आने पर भी उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और दिन-ब-दिन उनकी हालत बिगड़ती गई। अंततः 26 अप्रैल 1920 को महज 32 वर्ष की अल्पायु में इस विलक्षण प्रतिभा ने कुंभकोणम में अंतिम सांस लेते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के पश्चात् उनकी 5000 से अधिक प्रमेयों को छपवाया गया, जिनमें से अधिकांश को कई दशकों बाद तक सुलझाया नहीं जा सका था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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राष्ट्रीय गणित दिवस (22 दिसम्बर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल भारत में ऐसे कई महान गणितज्ञ हुए, जिन्होंने न केवल भारतीय गणित के चेहरे को बदलने में अनमोल योगदान दिया बल्कि विश्वभर में अत्यधिक लोकप्रियता भी हासिल की। ऐसे ही गणितज्ञों में ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट तथा श्रीनिव