दखल क्यों


bhopal, Ignoring the outbreak , dengue is not appropriate

  योगेश कुमार गोयल उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, मध्य प्रदेश तक कई राज्य इस समय वायरल बुखार और डेंगू के कहर से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में तो रहस्यमयी मानी जा रही बीमारी के अधिकांश मामलों में बहुत से मरीजों में अब डेंगू की पुष्टि हुई है। डेंगू और वायरल बुखार से अभीतक विभिन्न राज्यों में सैंकड़ों मरीजों की मौत हो चुकी है। देश में प्रायः मानसून के समय जुलाई से अक्तूबर के दौरान डेंगू के सर्वाधिक मामले सामने आते हैं। दरअसल मानसून के साथ डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने का मौसम भी शुरू होता है, इसीलिए इस बीमारी को लेकर लोगों में व्यापक जागरूकता फैलाने की जरूरत की महसूस की जाती है लेकिन इस मामले में हर साल सरकारी तंत्र का बेहद लचर रवैया सामने आता रहा है, जिस कारण देखते ही देखते डेंगू का प्रकोप एक-एक कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। डेंगू प्रतिवर्ष खासकर बारिश के मौसम में लोगों को निशाना बनाता है और पिछले साल भी इसके कारण सैंकड़ों लोगों की मौत हुई थी। देश के अनेक राज्यों में अब हर साल इसी प्रकार डेंगू का कहर देखा जाने लगा है, हजारों लोग डेंगू से पीड़ित होकर अस्पतालों में भर्ती होते हैं, जिनमें से कई दर्जन लोग मौत के मुंह में भी समा जाते हैं। दरअसल डेंगू आज के समय में ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसके कारण प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। यह घातक बीमारियों में से एक है, जिसका यदि समय से इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकता है। कई राज्यों में डेंगू के बढ़ते मामलों को देखते हुए मौजूदा समय में डेंगू से बचाव को लेकर अत्यधिक सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि कोविड काल में डेंगू सहित अन्य बीमारियों के जोखिम को नजरअंदाज करना काफी खतरनाक हो सकता है। कोरोना के इस कठिन दौर में अगर डेंगू जैसी बीमारी भी खतरनाक रूप धारण करती है तो पहले ही जरूरत से ज्यादा बोझ झेल रहा हमारा स्वास्थ्य ढांचा कोरोना और डेंगू से एकसाथ निबटने में पूरी तरह चरमरा जाएगा। हालांकि डेंगू की दस्तक हर साल सुनाई पड़ती है किन्तु हर तीन-चार वर्ष के अंतराल पर जब यह एक महामारी के रूप में उभरता है, तभी हमारी सरकारें तथा स्थानीय प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागते हैं। डेंगू की दस्तक के बाद डॉक्टरों व प्रशासन द्वारा आम जनता को कुछ हिदायतें दी जाती हैं लेकिन डॉक्टर व प्रशासन इस मामले में खुद कितने लापरवाह रहे हैं, इसका उदाहरण डेंगू फैलने के बाद भी कमोबेश सभी राज्यों में जगह-जगह फैले कचरे और गंदगी के ढेर तथा विभिन्न अस्पतालों में सही तरीके से साफ-सफाई न होने और अस्पतालों में भी मच्छरों का प्रकोप देखकर स्पष्ट मिलता रहा है। प्रशासनिक लापरवाही का आलम यही रहता है कि ऐसी कोई बीमारी फैलने के बाद एक-दूसरे पर दोषारोपण कर जिम्मेदारी से बचने की होड़ दिखाई देती है। डेंगू का प्रकोप अब पहले के मुकाबले और भी भयावह इसलिए होता जा रहा है क्योंकि अब डेंगू के कई ऐसे मरीज भी देखे जाने लगे हैं, जिनमें डेंगू के अलावा मलेरिया या अन्य बीमारियों के भी लक्षण होते हैं और इन बीमारियों के एक साथ धावा बोलने से कुछ मामलों में स्थिति खतरनाक हो जाती है। डेंगू बुखार हमारे घरों के आसपास खड़े पानी में ही पनपने वाले ऐडीस मच्छर के काटने से होने वाला एक वायरल संक्रमण ही है। ऐडीस मच्छर काले रंग का स्पॉटेड मच्छर होता है, जो प्रायः दिन में ही काटता है। डेंगू का वायरस शरीर में प्रविष्ट होने के बाद सीधे शरीर के प्रतिरोधी तंत्र पर हमला करता है। इस मच्छर का सफाया करके ही इस बीमारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है। डेंगू प्रायः दो से पांच दिनों के भीतर गंभीर रूप धारण कर लेता है। ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति को बुखार आना बंद हो सकता है और रोगी समझने लगता है कि वह ठीक हो गया है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है बल्कि यह स्थिति और भी खतरनाक होती है। अतः बेहद जरूरी है कि आपको पता हो कि डेंगू बुखार होने पर शरीर में क्या-क्या प्रमुख लक्षण उभरते हैं। डेंगू के अधिकांश लक्षण मलेरिया से मिलते-जुलते होते हैं लेकिन कुछ लक्षण अलग भी होते हैं। तेज बुखार, गले में खराश, ठंड लगना, बहुत तेज सिरदर्द, थकावट, कमर व आंखों की पुतलियों में दर्द, मसूडों, नाक, गुदा व मूत्र नलिका से खून आना, मितली व उल्टी आना, मांसपेशियों व जोड़ों में असहनीय दर्द, हीमोग्लोबिन के स्तर में वृद्धि, शरीर पर लाल चकते (खासकर छाती पर लाल-लाल दाने उभर आना), रक्त प्लेटलेट (बिम्बाणुओं) की संख्या में भारी गिरावट इत्यादि डेंगू के प्रमुख लक्षण हैं। बीमारी कोई भी हो, उसके उपचार से बेहतर उससे बचाव है और डेंगू के मामले में तो बचाव ही सबसे बड़ा हथियार माना गया है। इसीलिए लोगों को इसके बारे में जागरूक करना बेहद जरूरी है क्योंकि उचित सावधानियां और सतर्कता बरतकर ही इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकता है। घर की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है। आपके घर या आसपास के क्षेत्र में डेंगू का प्रकोप न हो, इसके लिए जरूरी है कि मच्छरों के उन्मूलन का विशेष प्रयास हो। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का पनपना रोकें। कुछ अन्य जरूरी बातों पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है। जैसे, अपने घर में या आसपास पानी जमा न होने दें। जमा पानी के ऐसे स्रोत ही डेंगू मच्छरों की उत्पत्ति के प्रमुख कारक होते हैं। यदि कहीं पानी इकट्ठा हो तो उसमें केरोसीन ऑयल या पेट्रोल डाल दें ताकि वहां मच्छरों का सफाया हो जाए। पानी के बर्तनों, टंकियों इत्यादि को अच्छी प्रकार से ढंककर रखें। कूलर में पानी बदलते रहें। यदि कूलर में कुछ दिनों के लिए पानी का इस्तेमाल न कर रहे हों तो इसका पानी निकालकर कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर कूलर को सुखा दें। खाली बर्तन, खाली डिब्बे, टायर, गमले, मटके, बोतल इत्यादि में पानी एकत्रित न होने दें। बेहतर यही होगा कि ऐसे कबाड़ और इस्तेमाल न होने वाले टायर इत्यादि को नष्ट कर दें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि कहीं भी पानी जमा होकर सड़ न रहा हो। घर के दरवाजों, खिड़कियों तथा रोशनदानों पर जाली लगवाएं ताकि घर में मच्छरों का प्रवेश बाधित किया जा सके। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। हाथ-पैरों को अच्छी तरह ढंककर रखें। मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो रिपेलेंट्स का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करना मच्छरों से बचाव का सस्ता, सरल, प्रभावी और हानिरहित उपाय है। डेंगू के लक्षण उभरने पर तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लें।डेंगू हो जाने पर रोगी को हर हाल में पौष्टिक और संतुलित आहार देते रहना बेहद जरूरी है। तुलसी का उपयोग भी बेहद लाभकारी है। आठ-दस तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10-15 पत्तों को एक गिलास पानी में उबाल लें और जब पानी आधा रह जाए, तब पी लें। नारियल पानी पीएं, जिसमें काफी मात्रा में इलैक्ट्रोलाइट्स होते हैं, साथ ही यह मिनरल्स का भी अच्छा स्रोत है, जो शरीर में ब्लड सेल्स की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं। विटामिन सी शरीर के इम्यून सिस्टम को सही रखने में मददगार होता है। इसलिए आंवला, संतरा, मौसमी जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें। बुखार होने पर पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें और ध्यान रखें कि बुखार किसी भी हालत में ज्यादा न बढ़ने पाए लेकिन ऐसे मरीजों को एस्प्रिन, ब्रूफिन इत्यादि दर्दनाशक दवाएं बिल्कुल न दें क्योंकि इनका विपरीत प्रभाव हो सकता है। हां, उल्टियां होने पर रोगी को नसों द्वारा ग्लूकोज चढ़ाना अनिवार्य है। स्थिति थोड़ी भी बिगड़ती देख तुरंत अपने चिकित्सक से सम्पर्क करें। फिलहाल डेंगू से बचाव के उपाय ही सबसे अहम हैं क्योंकि अभीतक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बनी है।   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)  

Dakhal News

Dakhal News 9 September 2021


bhopal, Ganeshotsav enhances ,social unity

10 सितम्बर गणेश चतुर्थी पर विशेष रमेश सर्राफ धमोरा हिन्दू मान्यता के अनुसार हर अच्छी शुरुआत व हर मांगलिक कार्य का शुभारंभ भगवान गणेश के पूजन से किया जाता है। गणेश शब्द का अर्थ होता है जो समस्त जीव जाति के ईश अर्थात् स्वामी हो। गणेश जी को विनायक भी कहते हैं। विनायक शब्द का अर्थ है विशिष्ट नायक। वैदिक मत में सभी कार्य का आरम्भ जिस देवता का पूजन से होता है वही विनायक है। गणेश चतुर्थी के पर्व का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्त्व है। मान्यता है कि वे विघ्नों के नाश करने और मंगलमय वातावरण बनाने वाले हैं। भारत त्योहारों का देश है और गणेश चतुर्थी उन्हीं त्योहारों में से एक है। गणेशोत्सव को 10 दिनों तक बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार को गणेशोत्सव या विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। पूरे भारत में भगवान गणेश के जन्मदिन के इस उत्सव को उनके भक्त बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। गणेश चतुर्थी का त्योहार महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु सहित पूरे भारत में काफी जोश के साथ मनाया जाता है। किन्तु महाराष्ट्र में विशेष रूप से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी-बड़ी प्रतिमायें स्थापित की जाती है। इन प्रतिमाओं का नौ दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग गणेश प्रतिमाओं का दर्शन करने पहुंचते हैं। नो दिनों बाद गणेश प्रतिमाओं को समुद्र, नदी, तालाब में विसर्जित किया जाता है। गणेश चतुर्थी का त्योहार आने से दो-तीन महीने पहले ही कारीगर भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्तियां बनाना शुरू कर देते हैं। गणेशोत्सव के दौरान बाजारों में भगवान गणेश की अलग-अलग मुद्रा में बेहद ही सुंदर मूर्तियां मिल जाती है। गणेश चतुर्थी वाले दिन लोग इन मूर्तियों को अपने घर लाते हैं। कई जगहों पर 10 दिनों तक पंडाल सजे हुए दिखाई देते हैं जहां गणेश जी की मूर्ति स्थापित होती हैं। प्रत्येक पंडाल में एक पुजारी होता है जो इस दौरान चार विधियों के साथ पूजा करते हैं। सबसे पहले मूर्ति स्थापना करने से पहले प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। उन्हें कई तरह की मिठाइयां प्रसाद में चढ़ाई जाती हैं। गणेश जी को मोदक काफी पंसद है। जिन्हें चावल के आटे, गुड़ और नारियल से बनाया जाता है। इस पूजा में गणपति को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है। इस त्योहार के साथ कई कहानियां भी जुड़ी हुई हैं जिनमें से उनके माता-पिता माता पार्वती और भगवान शिव के साथ जुड़ी कहानी सबसे ज्यादा प्रचलित है। शिवपुराण में रुद्रसंहिता के चतुर्थ खण्ड में वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया था। भगवान शिव ने जब भवन में प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। इससे पार्वती नाराज हो उठीं। भयभीत देवताओं ने देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। भगवान शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्र पूज्य होने का वरदान दिया। देश की आजादी के आंदोलन में गणेश उत्सव ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। 1894 में अंग्रेजों ने भारत में एक कानून बना दिया था जिसे धारा 144 कहते हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद आज भी लागू है। इस कानून में किसी भी स्थान पर 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं हो सकते थे। न ही समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन कर सकते थे। महान क्रांतिकारी बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 में वन्देमातरम नामक एक गीत लिखा था जिसपर भी अंग्रेजों प्रतिबंध लगा कर गीत गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया था। इन दोनों बातों से लोगों में अंग्रेजों के प्रति बहुत नाराजगी व्याप्त हो गयी थी। लोगों में अंग्रेजों के प्रति भय को खत्म करने और इस कानून का विरोध करने के लिए महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की और सबसे पहले पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया। 1894 से पहले लोग अपने अपने घरों मे गणपति उत्सव मनाते थे। लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे। पुणे के शनिवारवडा के गणपति उत्सव मे हजारों लोगो की भीड़ उमड़ी। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएगे अंग्रेज पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके दिखाये। कानून के मुताबिक अंग्रेज पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम में एकत्रित भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी। लेकिन किसी धार्मिक समारोह में उमड़ी भीड़ को नहीं। 20 अक्तूबर 1894 से 30 अक्तूबर 1894 तक पहली बार 10 दिनों तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया। लोकमान्य तिलक वहां भाषण के लिए हर दिन किसी बड़े नेता को आमंत्रित करते। 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित किए गए। उसके अगले साल 31 और अगले साल ये संख्या 100 को पार कर गई। फिर धीरे -धीरे महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो अहमदनगर, मुंबई, नागपुर, थाणे तक गणपति उत्सव फैलता गया। गणपति उत्सव में हर वर्ष हजारो लोग एकत्रित होते और बड़े नेता उसको राष्ट्रीयता का रंग देने का कार्य करते थे। इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया और राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई। 1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना है। आजादी हासिल करना है और अंग्रेजो को भारत से भगाना है। आजादी के बिना गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं रहेगा। तब पहली बार लोगो ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा। आजादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक द्धारा गणेश उत्सव को लोकोत्सव बनाने के पीछे सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य था। लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों की दूरी समाप्त करने के लिए यह पर्व प्रारम्भ किया था जो आगे चलकर एकता की मिसाल बना। जिस उद्देश्य को लेकर लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को प्रारम्भ करवाया था वो उद्देश्य आज कितने सार्थक हो रहे हैं। आज के समय में पूरे देश में पहले से कहीं अधिक धूमधाम के साथ गणेशोत्सव मनाये जाते हैं। मगर आज गणेशोत्सव में दिखावा अधिक नजर आता है। आपसी सद्भाव व भाईचारे का अभाव दिखता है। आज गणेश उत्सव के पण्डाल एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धात्मक हो चले हैं। गणेशोत्सव में प्रेरणाएं कोसों दूर होती जा रही हैं और इनको मनाने वालों में एकता नाम मात्र की रह गयी है। इसबार भी कोरोना महामारी के कारण लगी सरकारी पाबंदियों के चलते सार्वजनिक स्थानों पर गणेशोत्सव का भव्य आयोजन नहीं हो पायेगा। ऐसे में लोगों को अपने घरों में ही मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाकर उसका पूजन करना चाहिये। लागों को गणेश पूजन करते समय विश्व शांति की कामना करनी चाहिये। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिये गणेश पूजन करते समय भी हमें निर्धारित शारीरिक दूरी बनाये रखनी चाहिये। इस बार मन में गणेश पूजा करनी चाहिये। जो पैसा हम गणेशोत्सव मनाने पर हर बार खर्च करते थे उसे इस बार कोरोना से बचाव पर खर्च करें। इस साल के लिये यही सर्वश्रेष्ठ गणेश पूजा होगी।  

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10 सितम्बर गणेश चतुर्थी पर विशेष रमेश सर्राफ धमोरा हिन्दू मान्यता के अनुसार हर अच्छी शुरुआत व हर मांगलिक कार्य का शुभारंभ भगवान गणेश के पूजन से किया जाता है। गणेश शब्द का अर्थ होता है जो समस्त जीव जाति के ईश अर्थात् स्वामी हो। गणेश जी को विनायक भी कहते हैं। विनायक शब्द का अर्थ है विशिष्ट नायक। वैदिक मत में सभी कार्य का आरम्भ जिस देवता का पूजन से होता है वही विनायक है। गणेश चतुर्थी के पर्व का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्त्व है। मान्यता है कि वे विघ्नों के नाश करने और मंगलमय वातावरण बनाने वाले हैं। भारत त्योहारों का देश है और गणेश चतुर्थी उन्हीं त्योहारों में से एक है। गणेशोत्सव को 10 दिनों तक बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार को गणेशोत्सव या विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। पूरे भारत में भगवान गणेश के जन्मदिन के इस उत्सव को उनके भक्त बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। गणेश चतुर्थी का त्योहार महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु सहित पूरे भारत में काफी जोश के साथ मनाया जाता है। किन्तु महाराष्ट्र में विशेष रूप से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी-बड़ी प्रतिमायें स्थापित की जाती है। इन प्रतिमाओं का नौ दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग गणेश प्रतिमाओं का दर्शन करने पहुंचते हैं। नो दिनों बाद गणेश प्रतिमाओं को समुद्र, नदी, तालाब में विसर्जित किया जाता है। गणेश चतुर्थी का त्योहार आने से दो-तीन महीने पहले ही कारीगर भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्तियां बनाना शुरू कर देते हैं। गणेशोत्सव के दौरान बाजारों में भगवान गणेश की अलग-अलग मुद्रा में बेहद ही सुंदर मूर्तियां मिल जाती है। गणेश चतुर्थी वाले दिन लोग इन मूर्तियों को अपने घर लाते हैं। कई जगहों पर 10 दिनों तक पंडाल सजे हुए दिखाई देते हैं जहां गणेश जी की मूर्ति स्थापित होती हैं। प्रत्येक पंडाल में एक पुजारी होता है जो इस दौरान चार विधियों के साथ पूजा करते हैं। सबसे पहले मूर्ति स्थापना करने से पहले प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। उन्हें कई तरह की मिठाइयां प्रसाद में चढ़ाई जाती हैं। गणेश जी को मोदक काफी पंसद है। जिन्हें चावल के आटे, गुड़ और नारियल से बनाया जाता है। इस पूजा में गणपति को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है। इस त्योहार के साथ कई कहानियां भी जुड़ी हुई हैं जिनमें से उनके माता-पिता माता पार्वती और भगवान शिव के साथ जुड़ी कहानी सबसे ज्यादा प्रचलित है। शिवपुराण में रुद्रसंहिता के चतुर्थ खण्ड में वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया था। भगवान शिव ने जब भवन में प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। इससे पार्वती नाराज हो उठीं। भयभीत देवताओं ने देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। भगवान शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्र पूज्य होने का वरदान दिया। देश की आजादी के आंदोलन में गणेश उत्सव ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। 1894 में अंग्रेजों ने भारत में एक कानून बना दिया था जिसे धारा 144 कहते हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद आज भी लागू है। इस कानून में किसी भी स्थान पर 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं हो सकते थे। न ही समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन कर सकते थे। महान क्रांतिकारी बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 में वन्देमातरम नामक एक गीत लिखा था जिसपर भी अंग्रेजों प्रतिबंध लगा कर गीत गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया था। इन दोनों बातों से लोगों में अंग्रेजों के प्रति बहुत नाराजगी व्याप्त हो गयी थी। लोगों में अंग्रेजों के प्रति भय को खत्म करने और इस कानून का विरोध करने के लिए महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की और सबसे पहले पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया। 1894 से पहले लोग अपने अपने घरों मे गणपति उत्सव मनाते थे। लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे। पुणे के शनिवारवडा के गणपति उत्सव मे हजारों लोगो की भीड़ उमड़ी। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएगे अंग्रेज पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके दिखाये। कानून के मुताबिक अंग्रेज पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम में एकत्रित भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी। लेकिन किसी धार्मिक समारोह में उमड़ी भीड़ को नहीं। 20 अक्तूबर 1894 से 30 अक्तूबर 1894 तक पहली बार 10 दिनों तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया। लोकमान्य तिलक वहां भाषण के लिए हर दिन किसी बड़े नेता को आमंत्रित करते। 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित किए गए। उसके अगले साल 31 और अगले साल ये संख्या 100 को पार कर गई। फिर धीरे -धीरे महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो अहमदनगर, मुंबई, नागपुर, थाणे तक गणपति उत्सव फैलता गया। गणपति उत्सव में हर वर्ष हजारो लोग एकत्रित होते और बड़े नेता उसको राष्ट्रीयता का रंग देने का कार्य करते थे। इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया और राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई। 1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना है। आजादी हासिल करना है और अंग्रेजो को भारत से भगाना है। आजादी के बिना गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं रहेगा। तब पहली बार लोगो ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा। आजादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक द्धारा गणेश उत्सव को लोकोत्सव बनाने के पीछे सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य था। लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों की दूरी समाप्त करने के लिए यह पर्व प्रारम्भ किया था जो आगे चलकर एकता की मिसाल बना। जिस उद्देश्य को लेकर लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को प्रारम्भ करवाया था वो उद्देश्य आज कितने सार्थक हो रहे हैं। आज के समय में पूरे देश में पहले से कहीं अधिक धूमधाम के साथ गणेशोत्सव मनाये जाते हैं। मगर आज गणेशोत्सव में दिखावा अधिक नजर आता है। आपसी सद्भाव व भाईचारे का अभाव दिखता है। आज गणेश उत्सव के पण्डाल एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धात्मक हो चले हैं। गणेशोत्सव में प्रेरणाएं कोसों दूर होती जा रही हैं और इनको मनाने वालों में एकता नाम मात्र की रह गयी है। इसबार भी कोरोना महामारी के कारण लगी सरकारी पाबंदियों के चलते सार्वजनिक स्थानों पर गणेशोत्सव का भव्य आयोजन नहीं हो पायेगा। ऐसे में लोगों को अपने घरों में ही मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाकर उसका पूजन करना चाहिये। लागों को गणेश पूजन करते समय विश्व शांति की कामना करनी चाहिये। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिये गणेश पूजन करते समय भी हमें निर्धारित शारीरिक दूरी बनाये रखनी चाहिये। इस बार मन में गणेश पूजा करनी चाहिये। जो पैसा हम गणेशोत्सव मनाने पर हर बार खर्च करते थे उसे इस बार कोरोना से बचाव पर खर्च करें। इस साल के लिये यही सर्वश्रेष्ठ गणेश पूजा होगी।  

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Dakhal News 9 September 2021


bhopal, After Kisan Panchayat, market of speculation, heats up

  सियाराम पांडेय 'शांत' मुजफ्फरनगर में हुई किसान महापंचायत के बाद राजनीतिक अटकलों का बाजार तेज हो गया है। किसान महापंचायत के मंच पर चढ़ने का भले ही विपक्षी दलों को मौका न मिला हो लेकिन उम्मीदों की झाड़ पर तो वे चढ़ ही गए हैं। विपक्ष की प्रतिक्रियाओं से तो यही लगता है कि इस महापंचायत के बाद उनके दिल में खुशी के लड्डू फूट रहे हैं और उन्हें लगने लगा है कि भाजपा तो अब गई। अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के ट्वीट से तो कमोबेश ऐसा ही ध्वनित होता है। बसपा प्रमुख मायावती कह रही हैं कि भाजपा की जमीन दरक रही है और सपा प्रमुख अखिलेश यादव कह रहे हैं कि किसान महापंचायत भाजपा की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जनलहर है। इस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आती रहती हैं लेकिन उनके अपने मतलब होते हैं। यह और बात है कि उनका सधना और न सधना वक्त के गर्भ में होता है। भाकियू नेता राकेश टिकैत को लग रहा था कि सरकार आंदोलन में आनेवालों को रोकेगी लेकिन सरकार के स्तर पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। उन्हें भारी भीड़ तो दिखी लेकिन इस बात का आभास नहीं हुआ कि इससे सरकार की सेहत पर कोई असर भी पड़ा है। उन्होंने देश बचाने के लिए और कई बड़े आंदोलन करने की चेतावनी देकर इस बात का संकेत दे दिया है कि केवल एक महापंचायत से बात बनने वाली नहीं है। किसान महापंचायत के मंच से इस बात की मुनादी भी की गई है कि उसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भाजपा को सत्ता से बाहर करना है। केंद्र में 2024 में नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं बनने देनी है। कहने को तो यह पंचायत अराजनीतिक किसानों की थी लेकिन इसके मंच से जो भी मुद्दे उठाए गए, वे पूरी तरह राजनीतिक थे।उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में इस महापंचायत के आयोजन की प्रासंगिकता पर तो सवाल उठते ही हैं। 27 सितंबर को किसान संगठनों की ओर से भारत बंद का आयोजन किया जा रहा है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इस महापंचायत को लेकर जो कुछ भी कहा है, उसके अपने अपने राजनीतिक निहितार्थ है। प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा है कि किसानों की हुंकार के सामने किसी भी सत्ता का अहंकार नहीं चलता। रणदीप सुरजेवाला तो उससे भी आगे की बात कर रहे हैं किसान का खेत-खलिहान चुराने वाले देशद्रोही हैं। वे शायद यह भूल गए हैं कि हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने ही राबर्ट वाड्रा को किसानों की भूमि औने-पौने दाम में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए दी थी। किसान महापंचायत से विपक्ष को उम्मीद थी कि मंच से उनके लिए कुछ तो इशारा होगा ही लेकिन जिस तरह संसद में अपने लोगों को भेजने का संकल्प जाहिर किया गया, उससे विपक्ष भी परेशान है। वह समझ नहीं पा रहा है कि किसान संगठन दरअसल चाहते क्या हैं ? क्या वे खुद अपने बैनर तले चुनाव में उतरेंगे और यदि ऐसा नहीं करते हैं तो किस राजनीतिक दल के साथ जाना चाहेंगे। किसान संगठन भाजपा के साथ तो नहीं जा रहे हैं, यह बात तो विपक्ष की समझ में आ गई है। भाजपा का जरा-सा भी नुकसान उनके लिए असीम सुख का हेतु बनता रहा है और अब जब किसान आंदोलन से जुड़े नेता हर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को घेरने की बात कर रहे हैं तो विपक्ष की बांछें खिलना स्वाभाविक भी है। वैसे भी अभीतक का तो इतिहास यही रहा है कि मुजफ्फरनगर के जीआईसी मैदान में जिस किसी भी राजनीतिक दल के खिलाफ पंचायत हुई है, वह चुनाव हार गई लेकिन भाजपा के साथ भी ऐसा ही होगा, यह कहना जरा मुश्किल ही है। इसकी वजह यह है कि केंद्र की मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किसानों के हित में जितने भी काम किए हैं, उतना काम अभी तक किसी भी दल नहीं है। उनके किसी भी सरकारी बजट में किसान उपेक्षित नहीं रहा है और जिस समय किसान सम्मेलन हो रहा था, उसी दौरान उत्तर प्रदेश के 18 शहरों में भाजपा का प्रबुद्ध सम्मेलन हो रहा था। भाजपा नेता, उसके एक-एक कार्यकर्ता किसानों को केंद्र और यूपी सरकार द्वारा उनके हित में किए गए कार्यों की जानकारी दे रहे हैं। मतलब भाजपा पहले ही डैमेज कंट्रोल को अहमियत दे रही है। जैसा कि संकेत मिल रहा है कि इसबार किसान नेता पंचायती सरकार बनाने के लिए अपने लोगों को चुनाव मैदान में उतारेंगे तो इससे भाजपा को जहां लाभ होगा, वहीं विपक्ष के पैरों के नीचे की जमीन जरूर सरक जाएगी। इस मंच से पुलिसकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों और बेरोजगार युवाओं को भी भड़काने की कोशिश की गई। यह बताने और जताने की कोशिश की गई कि निजीकरण के खतरे क्या हैं ? बड़े मॉल खुलेंगे तो रेहड़ी-ठेले वाले कहां जाएंगे, जैसे सवाल उठाए गए। इन आंदोलनकारी नेताओं को इतना तो पता है कि देश का 95 प्रतिशत किसान छोटी जोत का है। वह मंडी अपने अनाज नहीं ले जाता। सारा विरोध पांच प्रतिशत से भी कम बड़े किसानों का है। सरकारी योजनाओं का सर्वाधिक लाभ भी यही लेते रहे हैं। सरकार ने छोटे और मंझोले किसानों की दशा-दिशा बदलने को लेकर काम शुरू कर दिया है। वर्षों से लंबित पड़ी सिंचाई योजनाएं पूरी की हैं। कुछ जल्द ही पूरी होने वाली हैं। किसान महापंचायत में पहुंचे नेताओं ने देश और संविधान दोनों को बचाने का संकल्प व्यक्त किया है। सवाल उठता है कि क्या वाकई देश और संविधान को खतरा है। नहीं तो गुमराह करने वाले तत्वों पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है ? सरकार दरअसल, अपने काम से आम जनमानस में जगह बनाना चाहती है, उसे पता है कि लोग खुद-ब-खुद समझ जाएंगे कि उनके हित में क्या उचित है और क्या अनुचित ? लेकिन उसे यह भी समझना होगा कि कि जिस तरह किसी अध्याय को पचास बार पढ़ने पर वह कंठस्थ हो जाता है, उसी तरह एक झूठ अगर कई बार कहा जाए और अलग-अलग व्यक्तियों और उसके समूहों द्वारा कहा जाए तो वह सच जितना ही असरकारी होने लगता है। किसानों की इस महापंचायत, उसमें उठे मुद्दों और भविष्य की रणनीतियों पर सरकार को गौर जरूर करना चाहिए क्योंकि चूहे सत्ता भवन की दीवार कमजोर करने का हरसंभव यत्न करते रहते हैं। किसान पंचायत के मंच पर कुछ विकास विरोधी ताकतों की भी उपस्थिति रही। ऐसे में सरकार को बेहद सावधान रहकर अपनी विकास गतिविधियों को भी आगे बढ़ाना है और सांप्रदायिक सौहार्द के झूठे नारे लगाने व देश-प्रदेश को कमजोर करने वाली ताकतों को मुंहतोड़ जवाब भी देना है। किसान संघों का दावा है कि वे 2024 तक दिल्ली बार्डर पर आंदोलन करते रहेंगे। ऐसे में सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश पर गौर करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि किसान आंदोलन कर सकते हैं लेकिन सड़क नहीं रोक सकते। तीनों कृषि कानूनों पर सरकार अनेक बार अपना पक्ष रख चुकी है लेकिन किसान नेता यह बताने को तैयार नहीं हैं कि उसमें कमी क्या है, इसके बाद भी वे आंदोलन करना चाहें तो करें लेकिन इससे इस देश की जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए, इस बात का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। वैसे भाजपा ने हमेशा किसानों की बात खुले मन से सुनने का प्रयास किया है और एकबार फिर भाजपा सांसद वरुण गांधी किसानों की बात सुनने की बात कह रहे हैं तो उनकी अपील को भी इसी अर्थ में लिया जाना चाहिए कि भाजपा किसान विरोधी नहीं है। किसान नेता पंचायत और बड़े आंदोलनों के जरिए मोदी और योगी सरकार को कितना नुकसान पहुंचा पाएंगे, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन विपक्ष को वह थोड़ी खुशी जरूर दे रहे हैं, इस बात को नकारा नहीं जा सकता।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 7 September 2021


bhopal, Be aware, drive away Kovid in festivals

आर.के. सिन्हा कोविड और त्यौहारों के मौसम का बहुत ही घनिष्ठ और घातक संबंध है। त्यौहारों में लोग घरों से मंदिरों, धार्मिक स्थानों, बाजारों तथा सगे सम्बन्धियों के लिए निकलने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि भीड़भाड़ बढ़ने के कारण कोविड का जिन्न सामने आकर खड़ा हो जाता है। पिछले साल दशहरा और दिवाली के बाद कोविड के रोगियों की बढ़ी हुई संख्या को सारे देश ने देखा था। अब जन्माष्टमी से त्यौहारों का सीजन चालू हो चुका है। सारे देश ने जन्माष्टमी का पर्व वैसे तो बहुत संयम से मनाया। कहीं भी बड़े सार्वजनिक आयोजन नहीं हुए। इसका लाभ भी प्रत्यक्ष दिख ही रहा है। लगभग सारे देश में कोविड के केस घट रहे हैं। वैसे केरल इसका बड़ा अपवाद हो सकता है।अब कोविड महामारी की तीसरी लहर की आशंका के बावजूद कर्नाटक सरकार ने राज्य में गणेश चतुर्थी समारोह की इजाजत दे दी है। समारोह तीन दिनों तक ही सीमित रहेगा। भगवान गणेश की मूर्तियों को स्थापित करने और संबंधित उत्सव आयोजित करने के लिए स्थानीय जिला प्रशासन या बेंगलुरु शहर के क्षेत्रों में बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका से पूर्व अनुमति जरूरी है। कर्नाटक के बाद महाराष्ट्र में भी गणेश चतुर्थी मनाने की अनुमति मिलना अब तय माना जा रहा है। आखिरकार गणेश चर्तुथी का असली आयोजन तो महाराष्ट्र में ही होता है। जिसे 1907 ई. में पुणे से लोकनायक बालगंगाधर तिलक ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनता को संगठित करने के उद्देश्य से किया था। अब अगर इन पर्वों को मनाने की इजाजत राज्य सरकारों द्वारा दी जा रही थी तो यह भी देख लिया जाना जरूरी है कि इनमें कोविड गाइडलाइंस को सख्ती से लागू भी किया जाए। इनके आयोजनों के दौरान किसी भी तरह की अराजकता न हो। अगर यह हुआ तो हमें फिर से कोविड के बढ़े हुए केस देखने को मिल सकते हैं। वह स्थिति तो बहुत भयानक होगी।अब रामलीला का भी वक्त दूर नहीं है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और देश के बाकी हिंदी भाषी भागों में रामलीला का मंचन होगा या नहीं, इस पर जल्दी ही स्थिति साफ हो जानी चाहिये । हालांकि कुछ रामलीला कमेटियां अभी से ही रामलीला मंचन को लेकर दावे भी कर रही हैं। इन सब आयोजनों में जन भागीदारी भी काफी रहती है। लेकिन भीड़ की स्थिति में कोविड गाइडलाइंस का तार-तार होना भी तो तय है। प्रशासन के लाख दावों और कोशिशों के बावजूद अभी भी कुछ लोग मास्क पहनना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। फिर भीड़ में सोशल डिस्टेनसिंग की बातें बेमानी होगी। यह सब गंभीरता से चिंतन योग्य बातें हैं। दशहरा के दौरान ही दुर्गा पूजा भी होती है। उसमें भी पंडाल में खूब लोग जुटते हैं। दशमी के सोलहवें दिन दीवाली और उसके बाद मात्र दो दिन बाद भाईदूज और चित्रगुप्त पूजा और उसके तीन दिनों बाद छठ का महापर्व। हालांकि देश में कोविड पर काबू पाने के लिए टीकाकरण का काम भी तेजी से चल रहा है, एक-एक दिन में एक करोड़ से ज्यादा वैक्सीन भी लगने जा रहे हैं पर फिलहाल जितना हो सके हमें अपने को कोविड गाइडलाइंस के मुताबिक ही सख्ती से चलना होगा। अब भी बहुत से ऐसे लोग मिल जाते हैं जो कहते हैं कि वे कोविड से लड़ने के लिए जरूरी टीका नहीं लगवाएंगे। वे इस बाबत कई बेसिर पैर के तर्क भी देते हैं। पर जो भी कहिए फिलहाल हमारे पास सिर्फ यह टीका ही है कोविड से बचाव के लिए एक कारगार हथियार। अच्छी बात यह है कि कुछ राज्यों में टीकाकरण का काम शानदार तरीके से हुआ है। इस लिहाज से हिमाचल प्रदेश का नाम लेना होगा। वहां कोविड टीकाकरण की पहली खुराक सभी को सफलतापूर्वक लग गई है। इस तरह हिमाचल प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जहां सभी को कोरोना वैक्सीन की पहली डोज दी जा चुकी है। प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी ने सही कहा, '100 वर्ष की सबसे बड़ी महामारी के विरुद्ध लड़ाई में हिमाचल प्रदेश चैंपियन बनकर सामने आया है।’ हिमाचल के बाद सिक्किम और दादरा नगर हवेली ने शत-प्रतिशत पहली डोज का पड़ाव पार कर लिया है और अनेक राज्य इसके बहुत निकट पहुंच गए हैं।देखिए, अभी पूरे देश को सजग रहना ही होगा। इसे जरूरत समझें या मजबूरी। अभी लापरवाही के लिए कोई जगह नहीं है। अगर हम सतर्क और सजग रहे तभी हम कोविड को हरा सकेंगे। इसके लिए यह जरूरी है कि हम त्यौहारों के दिनों में भी घरों से अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। कोविड की वैक्सीन लगवाने में कतई विलंब न करें। भारत आज एक दिन में सवा करोड़ टीके लगाकर रिकॉर्ड बना रहा है। जितने टीके भारत आज एक दिन में लगा रहा है, वो कई देशों की पूरी आबादी से भी ज्यादा है। भारत के टीकाकरण अभियान की सफलता, प्रत्येक भारतवासी के परिश्रम और पराक्रम की पराकाष्ठा का परिणाम है। कोरोना की काट वैक्सीन को लेकर अब घबराने और गलतफहमी के जाल में फंसने का वक्त निकल चुका है। अब इसे फौरन लगवा ही लेना चाहिए। जो लोग वैक्सीन लगवाने से बच रहे हैं उन्हें अपनी सोच बदल लेनी चाहिए। हमने पहले देखा था जब उड़न सिख मिल्खा सिंह कह रहे थे कि उन्होंने कोरोना की वैक्सीन लगवाने के संबंध में सोचा ही नहीं। अफसोस कि कोरोना के कारण ही उनकी जान चली गई। अगर उन्होंने कोरोना वैक्सीन को वक्त रहते लगवा लिया होता तो वे स्वस्थ हो जाते, क्योंकि वैक्सीन कोरोना वायरस के असर को काफी हद तक खत्म कर देती है। मैं एक वर्ष तक कोरोना से बचा रहा, लेकिन हर सतर्कता के बावजूद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कोरोना की चपेट में आ गया, परन्तु मुझे दोनों वैक्सीन समय से लग चुकी थी, पंद्रह दिन घर पर ही आराम करके बिलकुल ठीक हो गया। देखिए कि अब जिंदगी काफी हद तक पटरी पर वापस आ रही है। स्कूल-कॉलेज भी खुलने लगे हैं। बाजार तो खुल ही रहे हैं। पर अभी हम कोविड से पहले के दौर में अभी लौट नहीं सकते क्योंकि इस महामारी का असर तो बरकरार है। अभी इस पर विजय पाने में कुछ और वक्त लग सकता है। बेशक, कोविड ने हम सबकी जिंदगी को काफी हद तक बदल डाला है। पहले किसने कहाँ सुना था “वर्क फ्रॉम होम” के बारे में। पर अब यह व्यवस्था तो अनेकों बड़ी कंपनियों को भी सूट करने लगी है। इससे उन्हें दफ्तर चलाने के भारी-भरकम खर्चों से निजात मिल जाती है। यह तो मानना होगा कि वर्क फ्रॉम होम के कारण अब भी देशभर में लाखों पेशेवर अपने घरों से ही काम कर रहे हैं। यह भी देखा जाए तो कोविड से बचाव का तो यह एक बड़ा और कारगर रास्ता तो है। पर आपको घर से तो निकलना ही होता है। इसलिए बेहतर यही होगा कि बहुत सोच-समझकर ही घर से बाहर जाएं। त्यौहारों में तो खासतौर पर अनावश्यक रूप से ना निकलें। इसी में आपकी और सबकी सुरक्षा है। जीवन रहेगा तो घूमने और तफरीह के बहुत से मौके मिलते रहेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 7 September 2021


bhopal, Internet and TV addiction

डॉ. वेदप्रताप वैदिक जो काम हमारे देश में नेताओं को करना चाहिए, उसका बीड़ा भारत के जैन समाज ने उठा लिया है। सूरत, अहमदाबाद और बेंगलुरु के कुछ जैन सज्जनों ने एक नया अभियान चलाया है, जिसके तहत वे लोगों से निवेदन कर रहे हैं कि वे दिन में कम से कम 3 घंटे अपने इंटरनेट और मोबाइल फोन को बंद रखें। इसे वे ई-फास्टिंग कह रहे हैं। यों तो उपवास का महत्व सभी धर्मों और समाजों में है लेकिन जैन लोग जैसे कठोर उपवास रखते हैं, दुनिया में कोई समुदाय नहीं रखता। जैन-उपवास न केवल शरीर के विकारों को ही नष्ट नहीं करते, वे मन और आत्मा का भी शुद्धिकरण करते हैं। जैन संगठनों ने यह जो ई-उपवास का अभियान चलाया है, यह करोड़ों लोगों के शरीर और चित्त को बड़ा विश्राम और शांति प्रदान करेगा। इस अभियान में शामिल लोगों से कहा गया है कि ई-उपवास के हर एक घंटे के लिए एक रुपया दिया जाएगा याने जो भी व्यक्ति एक घंटे तक ई-उपवास करेगा, उसके नाम से एक रुपए प्रति घंटे के हिसाब से वह संस्था दान कर देगी। क्या कमाल की योजना है! आप सिर्फ अपने इंटरनेट संयम की सूचना-भर दे दीजिए, वह राशि अपने आप दानखाते में चली जाएगी। इस अभियान को शुरू हुए कुछ हफ्ते ही बीते हैं लेकिन हजारों की संख्या में लोग इससे जुड़ते चले जा रहे हैं। यह अभियान सबसे ज्यादा हमारे देश के नौजवानों के लिए लाभदायक है। हमारे बहुत-से नौजवानों को मैंने खुद देखा है कि वे रोज़ाना कई घंटे अपने फोन या कंप्यूटर से चिपके रहते हैं। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं होती कि वे कार चला रहे हैं और उनकी भयंकर टक्कर भी हो सकती है। वे मोबाइल फोन पर बात किए जाते हैं या फिल्में देखे चले जाते हैं। भोजन करते समय भी उनका फोन और इंटरनेट चलता रहता है। खाना चबाने की बजाय उसे वे निगलते रहते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि उन्होंने क्या खाया और क्या नहीं ? और जो खाया, उसका स्वाद कैसा था। इसके अलावा इंटरनेट के निरंकुश दुरुपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय काफी नाराज था। आपत्तिजनक कथनों और अश्लील चित्रों पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। कमोबेश यही हाल हमारे टीवी चैनलों ने पैदा कर दिया है। हमारे नौजवान घर बैठे-बैठे या लेटे-लेटे टीवी देखते रहते हैं। वह शराबखोरी से भी बड़ा नशा बन गया है। इंटरनेट और टीवी के कारण लोगों का चलना-फिरना तो घट ही गया है, घर के लोगों से मिलना-जुलना भी कम हो गया है। इन साधनों ने आदमी का अकेलापन बढ़ा दिया है। उसकी सामाजिकता सीमित कर दी है। इसका अर्थ यह नहीं कि इंटरनेट और टीवी मनुष्य के दुश्मन हैं। वास्तव में इन संचार-साधनों ने मानव-जाति को एक नये युग में प्रवेश करवा दिया है। उनकी उपयोगिता असीम है लेकिन इनका नशा शराबखोरी से भी ज्यादा हानिकारक है। जरूरी यह है कि मनुष्य इनका मालिक बनकर इनका इस्तेमाल करे, न कि इनका गुलाम बन जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 7 September 2021


bhopal, Afghanistan crisis , India

ललित मोहन बंसल, लॉस एंजेल्स से अमेरिका के प्रवासी भारतीय समुदाय में एक स्पष्ट धारणा है कि चीन भू राजनैतिक स्वार्थों के वशिभूत है तो व्लादिमिर पुतिन सर्वकालीन महान बनने की चाह में शीतयुद्ध रणनीति के खेल में व्यस्त हैं। ये दोनों ही देश तालिबान की छत्रछाया में पोषित आतंकी गिरोह के ‘डंक’ से आहत तो हैं, पर मिलकर साझी रणनीति में भागीदार बनने से आँख चुराते हैं। सोमवार को 15 सदस्यीय सं.रा. सुरक्षा परिषद में भारत सहित 13 सदस्यों ने अफगानिस्तान की सरजमीं को आतंकी हमलों से रोके जाने के प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो इन दोनों देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया पर अपने वीटो अधिकार का उपयोग भी नहीं किया। इसमें पुतिन-शी की मंशा झलकती है। वे आतंकवाद के नाम पर सहमत होते हुए भी एकमत नहीं हैं। भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी करनी-कथनी में अंतर नहीं है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘काबुलीवाला’ के कथानक में लाखों ‘पश्तून और ताजिक’ समुदाय भारत के गाँवों में अपनेपन का प्रतिबिंब देखते हैं। एक भरोसे की झलक देखते है, जो अन्यत्र नहीं है। तालिबान को सौदागर मिल जाएँगे, एक सच्चे दोस्त के रूप में भारत की जरूरत बनी रहेगी है, जो देशवासियों के बुझे दिलों को रोशन कर सके। यह बात दोहा में तालिबान के राजनैतिक आफिस में डिप्टी कमांडर शेर मुहम्मद अब्बास सटेंकजाई से अधिक कौन जानता है ? भारत बखूबी परिचित है कि तालिबान-2 के सम्मुख पहले से ज्यादा चुनौतियाँ हैं तो अवसर और संभावनाएँ भी कम नहीं हैं। तालिबान के भू राजनैतिक धरातल पर विकल्प खुले हैं, उनकी सोच में बदलाव आ रहे हैं। वे भले ही तंगदिली से बंधे हैं, न चाहते हुए इस्लाम और शरिया की सोच को बढ़ावा देने के लिए बाध्य दिखाई पड़ रहे हैं। वह पाकिस्तान, सऊदी अरब और यू ए ई से मान्यता लेने के साथ साथ बड़े देशों-चीन, रूस और ईरान सहित इस्लामिक देशों के आगे हाथ फैला रहा है, तो इस्लामिक देशों के अनन्य मित्र और पहले से कहीं सुदृढ़ भारत की महत्ता को अस्वीकार नहीं कर रहा है। उसे ज्ञात है कि अफगानिस्तान के निर्माण में भारत के तीन खरब डॉलर के प्रोजेक्ट कार्यों को नज़रंदाज करना सहज नहीं है, ख़ासतौर पर अफ़ग़ान के नए संसदीय भवन, खुली सड़कें, स्कूली इमारतें, स्वास्थ्य केंद्रों आदि में वास्तु और शिल्पकला की अनूठी छाप दिखाई पड़ती है। ये सब ऐसे यादगार उदाहरण हैं, जो एक सामान्य जन के दिलो दिमाग को झकझोरने के लिए काफी है। अपने देश को आगे ले जाने के लिए तालिबान ने भारत से हाथ बँटाने की इच्छा जताई है।दोहा (कतर) में तालिबान के राजनैतिक आफिस में डिप्टी कमांडर शेर मुहम्मद अब्बास सटेंकजाई ने खुद ब खुद भारतीय दूतावास में राजदूत दीपक मित्तल से भेंट की। भारतीय राजदूत ने बातचीत में अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियों, मानवीय और महिला अधिकारों के प्रति भारत की चिंताएं जताई। जैश ए मुहम्मद और लश्कर ए तैयबा जैसे संगठनों के नापाक इरादों के बारे में स्थिति से अवगत कराया। तालिबानी नेता ने बातचीत में भरोसा दिलाया कि तालिबान सरकार भारत के खिलाफ अपनी सरजमीं किसी आतंकी संगठन को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा। इन्हीं शेर मुहम्मद ने भारत के साथ पूर्व संबंधों को और मधुर बनाने के लिए राजनैतिक, आर्थिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाए जाने और दो देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए एयर कारिडोर सेवाओं के वक्तव्य दिए थे। बता दें, यही शेर मुहम्मद चार दशक पूर्व देहरादून डिफेंस अकादमी में शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कर चुके हैं।फिलहाल, भारत ‘प्रतीक्षा करो और निगाहे गड़ाए रखो’ के मोड में है। भारत ने काबुल स्थित अपने मिशन के सभी सहकर्मियों को स्वदेश बुला लिया है। तालिबान को मान्यता देना, अफगानिस्तान में नए निवेश में भागीदार बनना अथवा अपने आधे अधूरे प्रोजेक्ट में हाथ बँटाए जाने पर चुप है। बेशक, सेंट्रल एशियाई देशों-उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिसतान, तुर्कमेनिस्तान आदि देशों में भारत की तुलना में चीन के साथ कई गुणा ज़्यादा कारोबार के मद्देनजर भारत डिजिटल, तापी गैस पाइपलाइन और पर्यटन संबंधों में नए आयाम स्थापित करने को आतुर है, लेकिन सीमापार आतंकवाद और अपने देश की सुरक्षा एवं अस्मिता उसकी प्राथमिकताएँ बनी रहेंगी। भारत निःसंदेह चहबहार बंदरगाह को एक ट्रांजिट केंद्र और फ़्री ट्रेड जोन बनाने के अपने प्रयास से चूकना नहीं चाहेगा। पिछले दो वर्षों में जम्मू कश्मीर में फिजा बदली है, भारतीय सुरक्षा बलों ने कश्मीर में सीमापार आतंकवाद से निपटने में बहादुरी दिखाई है। इस बात का तालिबान और पाकिस्तान, दोनों को इल्म है। जैश ए मुहम्मद और लश्कर ए तैयबा भले ही काबुल ‘फतह’ पर खुशी जाहिर करे, इन दोनों गुटों को भारत के सुरक्षाकवच का भान है। हिंद प्रशांत महासागर में ट्रेड और सुरक्षा के लिए क्वाड जरूरतें पूरी करता है, तो फिर शंघाई सहयोग परिषद का मौजूदा स्थितियों में उतना औचित्य कहाँ है ? पाकिस्तान खुद कराची, पेशावर और सिंध आदि बड़े शहरों में इस्लामिक स्टेट, टीटीपी सहित अनेक आतंकी गुटों से जूझ रहा है। उसके पास कोई विकल्प नहीं है। (हिन्दुस्थान समाचार)

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Dakhal News 3 September 2021


bhopal, Challenge , making

  शिक्षक दिवस ( 5 सितंबर) पर विशेष प्रो. संजय द्विवेदी शिक्षक मनुष्य का निर्माता है। एक शिक्षक की भूमिका बच्चों को साक्षर करने से ही खत्म नहीं हो जाती बल्कि वह अपने छात्रों में आत्मबल, आदर्श, नैतिक बल, सच्चाई, ईमानदारी, लगन और मेहनत की वह मशाल भी जलाता है जो उसे पूर्ण मनुष्य बनाते हैं।- सर जान एडम्स जब हर रिश्ते को बाजार की नजर लग गयी है, तब गुरू-शिष्य के रिश्तों पर इसका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? नए जमाने के नए मूल्यों ने हर रिश्ते पर बनावट, नकलीपन और स्वार्थों की एक ऐसी चादर डाल दी है, जिसमें असली सूरत नजर नहीं आती। अब शिक्षा बाजार का हिस्सा है, जबकि भारतीय परंपरा में वह गुरु के अधीन थी, समाज के अधीन थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षकों से कुछ विशिष्ठ अपेक्षाएं की हैं और उनके निरंतर प्रशिक्षण और उन्मुखीकरण पर भी जोर दिया है। ऐसे समय में जब भारत अनेक क्षेत्रों में प्रगति की ओर अग्रसर है, हमारे अध्यापकों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है क्योंकि उनके जिम्मे ही श्रेष्ठ, संवेदनशील और देश भक्त युवा पीढ़ी के निर्माण का दायित्व है।पूंजी के शातिर खिलाड़ियों ने जब से शिक्षा के बाजार में अपनी बोलियां लगानी शुरू की हैं तबसे हालात बदलने शुरू हो गए थे। शिक्षा के हर स्तर के बाजार भारत में सजने लगे थे। इसमें कम से कम चार तरह का भारत तैयार हो रहा था। आम छात्र के लिए बेहद साधारण सरकारी स्कूल थे जिनमें पढ़कर वह चौथे दर्जे के काम की योग्यताएं गढ़ सकता था। फिर उससे ऊपर के कुछ निजी स्कूल थे जिनमें वह बाबू बनने की क्षमताएं पा सकता था। फिर अंग्रेजी माध्यमों के मिशनों, शिशु मंदिरों और मंझोले व्यापारियों की शिक्षा थी जो आपको उच्च मध्य वर्ग के करीब ले जा सकती थी। और सबसे ऊपर एक ऐसी शिक्षा थी जिनमें पढ़ने वालों को शासक वर्ग में होने का गुमान, पढ़ते समय ही हो जाता है। इस कुलीन तंत्र की तूती ही आज समाज के सभी क्षेत्रों में बोल रही है। इस पूरे चक्र में कुछ गुदड़ी के लाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसमें दो राय नहीं किंतु हमारी व्यवस्था ने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ही शिक्षा को भी चार खानों में बांट दिया है और चार तरह के भारत बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। जाहिर तौर पर यह हमारी एकता- अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक है। ऐसे कठिन समय में शिक्षक समुदाय की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। क्योंकि वह ही अपने विद्यार्थियों में मूल्य व संस्कृति प्रवाहित करता है। आज नई पीढ़ी में जो भ्रमित जानकारी या कच्चापन दिखता है, उसका कारण शिक्षक ही हैं। क्योंकि अपने सीमित ज्ञान, कमजोर समझ और पक्षपातपूर्ण विचारों के कारण वे बच्चों में सही समझ विकसित नहीं कर पाते। इसके कारण गुरु के प्रति सम्मान भी घट रहा है। आम आदमी जिस तरह शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहा है और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के आगे आ रहा है, वे आकांक्षांए विराट हैं। उनको नजरंदाज करके हम देश का भविष्य नहीं गढ़ सकते। सबसे बड़ा संकट आज यह है कि गुरु-शिष्य के संबंध आज बाजार के मानकों पर तौले जा रहे हैं। युवाओं का भविष्य जिन हाथों में है, उनका बाजार तंत्र किस तरह शोषण कर रहा है इसे समझना जरूरी है। इसके चलते योग्य लोग शिक्षा के क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जीवन को ठीक से जीने के लिए यह व्यवसाय उचित नहीं है।शहरों में पढ़ रही नई पीढ़ी की समझ और सूचना का संसार बहुत व्यापक है। उसके पास ज्ञान और सूचना के अनेक साधन हैं जिसने परंपरागत शिक्षकों और उनके शिक्षण के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। नई पीढ़ी बहुत जल्दी और ज्यादा पाने की होड़ में है। उसके सामने एक अध्यापक की भूमिका बहुत सीमित हो गयी है। नए जमाने ने श्रद्धाभाव भी कम किया है। उसके अनेक नकारात्मक प्रसंग हमें दिखाई और सुनाई देते हैं। गुरु-शिष्य रिश्तों में मर्यादाएं टूट रही हैं, वर्जनाएं टूट रही हैं, अनुशासन भी भंग होता दिखता है। नए जमाने के शिक्षक भी विद्यार्थियों में अपनी लोकप्रियता के लिए कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो उन्हें लांछित ही करते हैं। सीखने की प्रक्रिया का मर्यादित होना भी जरूरी है। परिसरों में संवाद, बहसें और विषयों पर विमर्श की धारा लगभग सूख रही है। परीक्षा को पास करना और एक नौकरी पाना इस दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गयी है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की आकांक्षाओं की पूर्ति करने की है। साथ ही उनमें विषयों की गंभीर समझ पैदा करना भी जरूरी है। शिक्षा के साथ कौशल और मूल्यबोध का समावेश न हो तो वह व्यर्थ हो जाती है। इसलिए स्किल के साथ मूल्यों की शिक्षा बहुत जरूरी है। कारपोरेट के लिए पुरजे और रोबोट तैयार करने के बजाए अगर हम उन्हें मनुष्यता,ईमानदारी और प्रामणिकता की शिक्षा दे पाएं और स्वयं भी खुद को एक रोलमाडल के प्रस्तुत कर पाएं तो यह बड़ी बात होगी। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते है। वह उसका रोल माडल भी हो सकते हैं।आज के समय में युवा और छात्र समुदाय एक गहरे संघर्ष में है। उसके जीवन की चुनौतियों काफी कठिन है। बढ़ती स्पर्धा, निजी क्षेत्रों की कार्यस्थितियां, सामाजिक तनाव और कठिन होती पढ़ाई युवाओं के लिए एक नहीं कई चुनौतियां है। कई तरह की प्राथमिक शिक्षा से गुजर कर आया युवा उच्चशिक्षा में भी भेदभाव का शिकार होता है। भाषा के चलते दूरियां और उपेक्षा है तो स्थानों का भेद भी है। अंग्रेजी के चलते हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के छात्रों की हीनभावना तो चुनौती है ही। आज के युवा के पास तमाम चमकती हुयी चीजें भी हैं, जो जाहिर है सबकी सब सोना नहीं हैं। उसके संकट हमारे-आपसे बड़े और गहरे हैं। उसके पास ठहरकर सोचने का अवकाश और एकांत भी अनुपस्थित है। मोबाइल और मीडिया के हाहाकारी समय ने उसके स्वतंत्र चिंतन की दुनिया भी छीन ली है। वह सूचनाओं से आक्रांत तो है पर काम की सूचनाएं उससे कोसों दूर हैं। ऐसे कठिन समय में वह एक बेरहम समय से मुकाबला कर रहा है। बताइए उसे इन सवालों के हल कौन बताएगा ? जाहिर तौर पर शिक्षा के क्षेत्र को बचाने की जिम्मेदारी आज शिक्षक समुदाय पर है। शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता हैं और इसलिए आज की चुनौतियों से लड़ने तथा अपने विद्यार्थियों को तैयार करने की जिम्मेदारी हमारी ही है। शिक्षक दिवस पर यह संकल्प अध्यापकों व विद्यार्थियों को ही लेना होगा तभी शिक्षा का क्षेत्र नाहक तनावों से बच सकेगा।गुरु-शिष्य परंपरा को समारोहों में याद की जाने वाली वस्तु के बजाए अगर हम उसकी सही तस्वीरें गढ़ सकें तो यह बड़ी बात होगी। किंतु देखा यह जा रहा है गुरु तो गुरूघंटाल बन रहे हैं और छात्र तोल-मोल करने वाले माहिर चालबाज। काम निकालने के लिए रिश्तों का इस्तेमाल करने से लेकर रिश्तों को कलंकित करने की कथाएं भी हमारे सामने हैं, जो शर्मसार भी करती हैं और चेतावनी भी देती है। नए समय में गुरु का मान-स्थान बचाए और बनाए रखा जा सकता है, बशर्ते हम विद्यार्थियों के प्रति एक ईमानदार सोच रखें, मानवीय व संवेदनशील व्यवहार रखें, उन्हें पढ़ने के बजाए समझने की दिशा में प्रेरित करें, उनके मानवीय गुणों को ज्यादा प्रोत्साहित करें। भारत निश्चय ही एक नई करवट ले रहा है, जहां हमारे नौजवान बहुत आशावादी होकर अपने शिक्षकों की तरफ निहार रहे हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो आसमान में रंग भर सकते हैं। हमारे युवा भारत में इस समय दरअसल शिक्षकों का विवेक, रचनाशीलता और कल्पनाशीलता भी कसौटी पर है। क्योंकि देश को बनाने की इस परीक्षा में हमारे छात्र अगर फेल हो रहे हैं तो शिक्षक पास कैसे हो सकते हैं ?   (लेखक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)  

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Dakhal News 3 September 2021


bhopal, Master, just take a look, your back.

  शिक्षक दिवस (5 सितंबर) विशेष आर.के. सिन्हा अध्यापक दिवस पर देश अपने अध्यापकों के प्रति आभार व्यक्त करता है। यह जरूरी भी है। अपने विद्यार्थियों को बेहतर नागरिक बनाने वाले अध्यापकों के योगदान को देश-समाज को सदैव याद रखना ही होगा। पर उन शिक्षकों से भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए जो अपनी क्लास के बजाय ट्यूशन पढ़ाने में ही अधिक रुचि लेते हैं। क्या उन्हें यह करना चाहिए ? अब कोई यह न कहे कि ऐसा नहीं होता। उन अध्यापकों से भी यह सवाल पूछा जाए जो अपनी कक्षा में बिना किसी तैयारी के चले आते हैं। क्या यह एक शैक्षणिक अपराध नहीं है ? शिक्षक के ऊपर देश की भावी पीढ़ी को गढ़ने और तराशने की जिम्मेदारी है। लेकिन, अब भी हमारे देश के हजारों स्कूलों-कॉलेजों के शिक्षक अपनी क्लास लेने से पहले रत्तीभर अध्ययन नहीं करते। क्लासों में भी समय से नहीं आते ! एकबार स्थायी नौकरी मिलने के बाद उन्हें लगता है कि अब उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। उन्हें नौकरी की सुरक्षा तो मिलनी ही चाहिए। उन्हें समय-समय पर प्रोमोशन भी मिले तो किसी को आपत्ति नहीं। लेकिन, क्या उन्हें अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से अंजाम न देने के बदले कोई दंड न दिया जाए ? उत्तर प्रदेश से कुछ समय पहले खबर आई थी कि वहां 10 वीं की हाईस्कूल और 12 वीं की इंटर की परीक्षाओं के हजारों विद्यार्थियों का हिन्दी के पेपर में प्रदर्शन अत्यंत ही निराशाजनक रहा। क्या इन विद्यार्थियों के मास्टर जी जिम्मेदारी लेंगे कि उनके शिष्यों के खराब प्रदर्शन में वे भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं ? देखिए अध्यापक बनना बच्चों का खेल नहीं है। पर हमारे यहां इस क्षेत्र में वे लोग भी आ जाते हैं जिनकी इस पेशे को लेकर कोई निष्ठा नहीं होती। बस उन्हें तो एक स्थायी नौकरी चाहिए। वे यह कभी सोचते तक नहीं कि यह साधना और त्याग से जुड़ा पेशा है। अध्यापन किसी अन्य नौकरी की तरह नहीं है। अध्यापक उसे ही बनना चाहिए जो जीवनभर अध्यापन और अपने विद्यार्थियों के हितों को ही प्राथमिकता देता हो। इस तरह के अध्यापकों का समाज में सम्मान भी होता है। अभी कुछ रोज पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) में इतिहास पढ़ा रहे डॉ. डेविड बेकर के निधन से समूची दिल्ली यूनिवर्सिटी बिरादरी शोक में डूब गई थी। वे एक तरह से इतिहास पुरुष थे। वे 1969 से दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ा रहे थे। उन्होंने जब यहां पढ़ाना शुरू किया तब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन थे। वे अपने विद्यार्थियों को अपनी संतान ही मानते थे। सुबह-शाम नियमित पढ़ते-लिखते-पढ़ाते रहते थे। डेविड बेकर जैसा बनने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। इसी तरह डॉ. नामवर सिंह भी थे। हिन्दी पट्टी का कौन-सा इंसान होगा जिसने उनकी ख्याति नहीं सुनी होगी। वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाते थे। उनकी कक्षाओं को छात्र कभी मिस नहीं करते थे। अध्यापन से पवित्र दूसरा कोई काम नहीं हो सकता। अध्यापक को अपने मेधावी छात्रों की तुलना में कमजोर शिष्यों पर फोकस करना चाहिए। मेधावी विद्यार्थी तो अपना काम निकाल लेगा। पर जो कक्षा में पिछली कतार में बैठा है उसकी तरफ अधिक ध्यान देना होगा। आमतौर पर अध्यापक समझते हैं कि उनके मेधावी विद्यार्थियों को उनकी बात समझ आ गई तो बाकी सबको समझ आ गई। अध्यापक को अपनी कक्षा में उन्नीस रहने वाले बच्चों को बार-बार समझाना होगा। उन्हें धैर्य से काम लेना होगा। उन्हें प्रेरित करते रहना होगा ताकि वे उनसे सवाल पूछें। मारपीट करने से बात नहीं बनेगी। अध्यापकों को अपना आचरण और व्यवहार भी अनुकरणीय रखना होगा। उन्हें स्कूल-कॉलेज में सही वेषभूषा पहनकर ही आना चाहिए। मुझे कोरोना काल से पहले राजधानी के एक स्कूल में जाने का मौका मिला। मुझे वहां आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। मुझे यह देखकर घोर निराशा हुई कि उस स्कूल के बहुत से अध्यापक उस दिन जींस पहनकर आए हुए थे। मुझे लगता है कि अध्यापकों को स्कूल या कॉलेज में जींस पहनने से बचना चाहिए। वे स्कूल के बाहर जींस पहनने के लिए स्वतंत्र हैं। कुछ स्कूलों के अध्यापक अपने शिष्यों को उनकी जाति से भी संबोधित करने से बाज नहीं आते। ये सरासर गलत परम्परा है।आप देखेंगे कि हमारे यहां कई शिखर हस्तियों के अंदर का अध्यापक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने के बाद भी जीवित रहा। जैसे कि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनने के बाद भी राष्ट्रपति भवन के अंदर स्थित विद्यालय में लगातार पढ़ाया करते थे। वे अक्सर 10वीं और 11वीं की कक्षाओं को पढ़ाने पहुंच जाते थे। वे कक्षा में पूरी तरह से शिक्षक बन जाया करते थे। उन्हें बच्चों को हिन्दी और इंग्लिश व्याकरण पढ़ाना पसंद था। एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति बने तो वे भी राष्ट्रपति भवन के स्कूल में निरंतर आने लगे। वे यहां स्वाधीनता दिवस या गणतंत्र दिवस समारोहों के अलावा भी पहुंच जाया करते थे। वे किसी भी क्लास में चले जाते थे। वे वैज्ञानिक थे। उनकी पाठशाला में विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर ही बातें होती थीं। वे बच्चों को प्रेरित थे कि वे अपने अध्यापकों से सवाल पूछें।महात्मा गांधी भी मास्टर जी बने थे। ये तथ्य कम ही लोग जानते हैं। उनकी दिल्ली की वाल्मीकी बस्ती में पाठशाला चलती थी। उनकी कक्षाओं में सिर्फ बच्चे ही नहीं आते थे, उसमें बड़े-बुजुर्ग भी रहते थे। वे वाल्मीकि मंदिर परिसर में 1 अप्रैल 1946 से 10 जून,1947 तक रहे। वे शाम के वाल्मीकी बस्ती में रहने वाले परिवारों के बच्चों को पढ़ाते थे। उनकी पाठशाला में खासी भीड़ हो जाती थी।बापू अपने उन विद्यार्थियों को फटकार भी लगा देते थे, जो कक्षा में साफ-सुथरे होकर नहीं आते थे। वे स्वच्छता पर विशेष ध्यान देते थे। वे मानते थे कि स्वच्छ रहे बिना आप ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते। ये संयोग ही है कि इसी मंदिर से सटी वाल्मीकी बस्ती से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्तूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। वो कक्ष जहां बापू पढ़ाते थे, अब भी पहले की तरह बना हुआ है। यहाँ एक चित्र रखा है, जिसमें कुछ बच्चे उनके पैरों से लिपटे नजर आते हैं।तो अध्यापक दिवस पर देश की समस्त अध्यापक बिरादरी को एकबार पुन: बधाई। उनसे देश इस बात की अपेक्षा रखेगा कि वे शिक्षक धर्म का पूरी तरह से निर्वाह करेंगे और शिक्षण कार्य को मात्र नौकरी की तरह नहीं बल्कि राष्ट्रनिर्माण का महान कार्य समझकर इसका पूरा आनंद लेंगे।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

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Dakhal News 3 September 2021


bhopal, Hitler was also a fan , Major Dhyan Chand

योगेश कुमार गोयल हॉकी के पूर्व कप्तान मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन को भारत में प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष इस दिवस का इसलिए भी विशेष महत्व है, क्योंकि हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के नाम के आगे एक और सम्मान जुड़ गया है। बरसों बाद ओलम्पिक हॉकी में पुरुष और महिला हॉकी टीम के शानदार प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री ने मेजर ध्यानचंद के सम्मान में भारत के सर्वाेच्च खेल पुरस्कार ‘खेल रत्न पुरस्कार’ का नाम बदलकर ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ से ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ कर दिया है। उल्लेखनीय है कि यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल क्षेत्र में सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाडि़यों को दिया जाता है। पहली बार यह सर्वोच्च खेल सम्मान 1991-92 में दिया गया था।उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 29 अगस्त 1905 को जन्मे ध्यानचंद हॉकी के ऐसे खिलाड़ी और देशभक्त थे, कि उनके करिश्माई खेल से प्रभावित होकर जब एक बार जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें अपने देश जर्मनी की ओर से खेलने का न्यौता दिया, तो ध्यानचंद ने उसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। उन्होंने सदा अपने देश के लिए खेलने का प्रण लिया। हालांकि उन्हें बचपन में खेलने का कोई शौक नहीं था और साधारण शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे सोलह साल की आयु में दिल्ली में सेना की प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सिपाही के रूप में भर्ती हो गए थे। सेना में भर्ती होने तक उनके दिल में हॉकी के प्रति कोई लगाव नहीं था। सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया हॉकी खिलाड़ी सूबेदार मेजर तिवारी ने, जिनकी देखरेख में ही ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और बहुत थोड़े समय में ही हॉकी के ऐसे खिलाड़ी बन गए कि उनकी हॉकी स्टिक मैदान में दनादन गोल दागने लगी। उनकी हॉकी स्टिक से गेंद अक्सर इस कदर चिपकी रहती थी कि विरोधी टीम के खिलाडि़यों को लगता था, जैसे ध्यानचंद किसी जादुई हॉकी स्टिक से खेल रहे हैं। इसी शक के आधार पर एक बार हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर भी देखी गई कि कहीं उसमें कोई चुम्बक या गोंद तो नहीं लगा है लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला। उन्हें अपने जमाने का हॉकी का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी माना जाता है, जिसमें गोल करने की कमाल की क्षमता थी। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।1922 में सेना में भर्ती होने के बाद से 1926 तक ध्यानचंद ने केवल आर्मी हॉकी और रेजीमेंट गेम्स खेले। उसके बाद उन्हें भारतीय सेना टीम के लिए चुना गया, जिसे न्यूजीलैंड में जाकर खेलना था। उस दौरान हुए कुल 21 मैचों में से उनकी टीम ने 18 मैच जीते, जबकि दो मैच ड्रा हुए और केवल एक मैच उनकी टीम हारी। मैचों में ध्यानचंद के सराहनीय प्रदर्शन के कारण भारत लौटते ही उन्हें लांस नायक बना दिया गया और उन्हें सेना की हॉकी टीम में स्थायी जगह मिल गई। वर्ष 1928 में एम्सटर्डम में होने वाले ओलम्पिक के लिए भारतीय टीम का चयन करने के लिए भारतीय हॉकी फेडरेशन ने टूर्नामेंट का आयोजन किया , जिसमें कुल पांच टीमों ने हिस्सा लिया। ध्यानचंद को सेना द्वारा यूनाइटेड प्रोविंस की ओर से टूर्नामेंट में खेलने की अनुमति मिल गई और अपने शानदार प्रदर्शन के चलते उन्हें ओलम्पिक में हिस्सा लेने वाली टीम में जगह मिल गई। फिर 1928, 1932 और 1936 के ओलम्पिक खेलों में ध्यानचंद ने न केवल भारत का नेतृत्व किया, बल्कि लगातार तीनों ओलम्पिक में भारत को स्वर्ण पदक भी दिलाए।भारतीय हॉकी टीम की ओर से 17 मई 1928 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपने ओलम्पिक डेब्यू में ध्यानचंद ने तीन गोल करते हुए भारत को 6-0 से जीत दिलाई। एम्सटर्डम में आयोजित उस ओलम्पिक में ध्यानचंद ने सर्वाधिक 14 गोल किए थे। तब वहां के एक स्थानीय अखबार ने उनके शॉट्स से प्रभावित होकर लिखा था कि यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था। ध्यानचंद वास्तव में हॉकी के जादूगर हैं। वर्ष 1932 के लॉस एंजिल्स ओलम्पिक में ध्यानचंद और उनके भाई रूप सिंह ने भारत की ओर से एक मुकाबले में कुल 35 में से 25 गोल किए। उस ओलम्पिक के कुल 37 मैचों में भारत के कुल 330 गोल में से अकेले ध्यानचंद ने ही 133 गोल किए थे। 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में तो उन्होंने इतना बेहतरीन प्रदर्शन किया कि तानाशाह हिटलर ने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ उपाधि दे डाली, जिसके बाद से हर कोई उन्हें इसी नाम से जानने लगा। हालांकि 1936 के ओलम्पिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच के दौरान भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई थी। उस हार से ध्यानचंद इतने व्यथित हुए कि उन्होंने इस बारे में अपनी आत्मकथा ‘गोल’ में लिखा, ‘‘मैं जब तक जीवित रहूंगा, उस हार को कभी नहीं भूलूंगा। उस हार ने हमें इतना हिलाकर रख दिया था कि हम पूरी रात सो नहीं पाए।’’दो बार के ओलम्पिक चैम्पियन केशव दत्त का ध्यानचंद के बारे में कहना है कि वह हॉकी के मैदान को उस ढ़ंग से देख सकते थे, जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है। इसी प्रकार भारतीय ओलम्पिक टीम के कप्तान रहे गुरूबख्श सिंह का कहना है कि 54 साल की उम्र में भी ध्यानचंद से भारतीय टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था। मेजर ध्यानचंद ने 43 वर्ष की उम्र में वर्ष 1948 में अंतरराष्ट्रीय हॉकी को अलविदा कहा। हॉकी में बेमिसाल प्रदर्शन के कारण ही उन्हें सेना में पदोन्नति मिलती गई और वे सूबेदार, लेफ्टिनेंट तथा कैप्टन बनने के बाद मेजर पद तक भी पहुंचे। वे 1956 में 51 वर्ष की आयु में सेना से मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। उसी वर्ष उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया। सेवानिवृत्ति के बाद वे माउंट आबू में हॉकी कोच के रूप में कार्यरत रहे और बाद में कई वर्षों तक पाटियाला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में चीफ हॉकी कोच रहे। तीन दिसम्बर 1979 को उन्होंने दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली। अपने कैरियर में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक हजार से भी ज्यादा गोल दागे। भारत सरकार ने मेजर ध्यानचंद के सम्मान में वर्ष 2002 में नेशनल स्टेडियम का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम कर दिया। ध्यानचंद इतने महान खिलाड़ी थे कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी चार हाथों में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई गई है और उन्हें एक देवता के रूप में दर्शाया गया है। भारत में उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ घोषित किया गया है और इसी दिन विभिन्न खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाडि़यों को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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Dakhal News 27 August 2021


bhopal, Inclusion of knowledge ,wisdom, new education policy

डॉ दिलीप अग्निहोत्री वर्तमान केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार किए हैं। इसके दृष्टिगत गत वर्ष नई शिक्षा नीति लागू की गई थी। विगत एक वर्ष में इस दिशा में प्रभावी प्रगति हुई है,जबकि इस अवधि में कोरोना संकट का प्रकोप रहा। इससे शिक्षण संस्थाओं को बंद करना पड़ा था। फिर भी बड़ी संख्या में शिक्षाविदों एवं अनेक विश्वविद्यालयों ने नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का उल्लेखनीय कार्य किया है। इस क्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा है कि नई शिक्षा नीति इक्कीसवीं सदी की जरूरत को पूरा करने में सहायक होगी। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में बेहतर कार्य के लिए के उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना की। राष्ट्रपति ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी लखनऊ के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। उन्होंने मेधावी छात्र छात्राओं को उपाधि एवं सम्मान प्रदान किया। इसके अलावा विश्वविद्यालय के सावित्रीबाई फूले बालिका छात्रावास का शिलान्यास किया। अटल बिहारी वाजपेई प्रेक्षागृह में राष्ट्रपति ने यहां की अपनी पिछली यात्रा का उल्लेख किया। चार वर्ष पहले भी राष्ट्रपति इस विश्वविद्यालय में आये थे। उन्होंने कहा कि यह पहला संस्थान है,जहां दीक्षांत समारोह में मैं दो बार आया हूं। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय बाबा साहेब अंबेडकर के विचार समावेशी विकास के साथ अनुसूचित जाति- जनजाति छात्रों को बेहतर शिक्षा देने में विशेष योगदान कर रहा है। अनेक प्रयासों से ऐसे छात्रों को शिक्षा के अवसर बढ़े हैं। अपनी पिछली यात्रा के दौरान राष्ट्रपति ने लखनऊ में बाबा साहेब अंबेडकर सांस्कृतिक केंद्र का शिलान्यास किया था। उन्होंने कहा कि शील के बिना शिक्षा अधूरी है। शील के बिना शिक्षा ज्ञान की तलवार अधूरी है। विश्विद्यालय के मूल तत्व में प्रज्ञा, शील और करुणा का प्रतिपादन किया गया है। राष्ट्रपति ने कहा कि कोई शिक्षित व्यक्ति जिसका शील अच्छा है, वह अपने ज्ञान का उपयोग लोगों के कल्याण हेतु करेगा। परन्तु यदि उसका शील ठीक नहीं है,तब वह अपने ज्ञान का उपयोग लोगों के अकल्याण में करेगा। जिन्हें स्वार्थ के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखता है, जिन्हें थोड़ा भी परमार्थ करना नहीं आता है, ऐसे लोग केवल शिक्षित हो गए, तो क्या लाभ होगा। उन्होंने भारत रत्न डॉ भीमराव आंबेडकर स्मारक एवं सांस्कृतिक केन्द्र लखनऊ का इस विश्वविद्यालय के साथ तालमेल बनाने का सुझाव दिया। रामनाथ कोविंद ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारत को एक शिक्षा महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के अभियान का शुभारम्भ किया गया है। यह शिक्षा नीति युवा पीढ़ी को सक्षम बनाने में सहायक सिद्ध होगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप राज्य में शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत उन्नति के लिए शिक्षा ही सबसे प्रभावी माध्यम होती है। सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों से प्रेरणा प्राप्त करनी चाहिए। आधुनिक विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल का प्रयास करना चाहिए। सभी विद्यार्थी एवं शिक्षक पूरी निष्ठा से कार्य करें तो यह राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त करना संभव होगा। राष्ट्रपति ने बालिकाओं की शिक्षा व स्वावलंबन का स्वागत किया। कहा कि बेटियां समाज और देश का गौरव पूरे विश्व में बढ़ा रही हैं। ओलम्पिक खेलों में बेटियों के प्रदर्शन से पूरे देश में गर्व की भावना का संचार हुआ है। दीक्षांत समारोह में भी पदक विजेताओं में बेटियों की संख्या अधिक है। इस परिवर्तन को एक स्वस्थ समाज और उन्नत राष्ट्र की दिशा में बढ़ते हुए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। विद्यार्थियों को सचेत और जागरूक रहते हुए आज के अत्यन्त गतिशील वैश्विक परिदृश्य में अपना स्थान बनाना है। बेहतर समाज और अपने देश के निर्माण में योगदान देना है। राष्ट्रपति ने कहा कि आज भारत में बहुत ही अच्छा स्टार्ट अप ईको सिस्टम है। देश में लगभग सौ यूनिकॉर्न यानी ऐसे स्टार्टअप हैं, जिनमें से प्रत्येक का मूल्यांकन एक बिलियन डॉलर से अधिक है। उनका मार्केट कैपिटलाइजेशन कुल मिलाकर लगभग अठारह लाख करोड़ रुपये है। यूनिकॉर्न्स की कुल संख्या के आधार पर आज भारत का विश्व में तीसरा स्थान है। रामनाथ कोविंद ने अमृत महोत्सव में विद्यार्थियों की भागीदारी का आह्वान किया। कहा कि देश में चल रहे आजादी के अमृत महोत्सव के बारे में वहां उपस्थित विद्यार्थीगण अवगत होंगे। किसी न किसी रूप में भागीदारी भी कर रहे होंगे। इससे उनको राष्ट्रीय आंदोलन की जानकारी मिलेगी। राष्ट्रभाव का जागरण होगा। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, राज्यपाल आनन्दीबेन पटेल तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल लखनऊ के हीरक जयन्ती वर्ष के समापन समारोह में भी शामिल हुए। यहां राष्ट्रपति ने डाॅ. सम्पूर्णानन्द की प्रतिमा का अनावरण,डाॅ सम्पूर्णानन्द प्रेक्षागृह का लोकार्पण,कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल लखनऊ की क्षमता दोगुनी किए जाने की परियोजना एवं बालिका छात्रावास का शिलान्यास तथा डाक टिकट का विमोचन भी किया। कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल, लखनऊ देश का पहला सैनिक स्कूल है। इसका अनुकरण कर रक्षा मंत्रालय की ओर सो देश के विभिन्न स्थानों पर अन्य सैनिक स्कूलों की स्थापना की गई। बालिकाओं को सैनिक स्कूलों में प्रवेश देने के लिए उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल को देश का पहला सैनिक स्कूल होने का गौरव प्राप्त है। इस विद्यालय के भूतपूर्व छात्र कैडेट कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय को देश के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।साठ वर्षों में इस विद्यालय द्वारा अनेक यादगार उपलब्धियां अर्जित की गई हैं। विद्यालय ने अपनी स्थापना से अभी तक लगभग चार हजार छात्र सैनिकों को प्रशिक्षित किया है। जिनमें एक हजार से अधिक छात्र भारतीय सशस्त्र सेनाओं में अधिकारी बनकर देश की सेवा में संलग्न और सेना के उच्च पदों पर सुशोभित हैं। इसके अतिरिक्त यहां के छात्र प्रशासनिक अधिकारी, कुशल चिकित्सक,श्रेष्ठ न्यायविद,उद्योगपति, राजनेता इत्यादि के रूप में विद्यालय का नाम रोशन कर रहे हैं।उत्तर प्रदेश की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल लखनऊ की क्षमता को दोगुना किए जाने के सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्णय लिया है। इससे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के छात्र छात्राओं को सैनिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने का उचित अवसर प्राप्त हो सकेगा। उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल सोसाइटी के अन्तर्गत जनपद गोरखपुर में एक और सैनिक स्कूल की स्थापना की जा रही है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Dakhal News 27 August 2021


bhopal, Why Islamic countries ,avoid giving asylum,Afghans

  आर.के. सिन्हा अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद भयंकर हाहाकार मचा हुआ है। वहां से ज्यादातर स्थानीय अफगानी नागरिक भी अपना देश छोड़कर कहीं और जाकर बसना चाह रहे हैं। उन्हें अफगानिस्तान में अब अपने बीवी बच्चों के साथ एक मिनट भी रहना सही नहीं लग रहा है। अफगानिस्तान में तो निकाह के नाम पर किसी को भी हथियार के नोंक पर उठाया जा रहा है। वहां बहुत सारे हिन्दू-सिख समुदाय के लोग भी भारत आ रहे हैं। उन्हें यहां पर सम्मान के साथ शरण भी मिल रही है। उधर, अफगानिस्तान के मुसलमानों को इस्लामिक देश अपने यहां शरण देने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। सबने इन्हें अपने यहां शरण देने या शरणार्थी के रूप में जगह देने से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से मना कर दिया है। दुनिया के इस्लामिक देशों का अपने को नेता मानने वाले पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरत, तुर्की और बहरीन जैसे देश या तो चुप हो गए हैं या फिर उन्होंने अपनी अफगानितान से लगने वाली सरहदों को ज्यादा मजबूती से घेर लिया है। चौकसी बढ़ा दी है ताकि कोई घुसपैठ न कर सके। ले-देकर सिर्फ शिया ईरान ही इन अफगानियों के लिए आगे आया है। यहाँ पहले से ही लगभग साढ़े तीस लाख सुन्नी अफगानी शरणार्थी रहते हैं। ईरान की तीन तरफ से सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। शिया शासित ईरान का भारी संख्या में सुन्नी शरणार्थियों को शरण देना वाकई काबिल-ए- तारीफ है। अफगानिस्तान संकट में धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान का काला चेहरा खुलकर सामने आ रहा है। उसने अपनी अफगानिस्तान से लगने वाली सरहदों पर सेना को तैनात कर दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहे हैं कि हमारे यहां तो पहले से ही अफगानिस्तान के लाखों शरणार्थी हैं। अफगानिस्तान संकट के बहाने पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को समझना आसान होगा। वह जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के हक के लिए सारी दुनिया के मुसलमानों का आये दिन खुलकर आह्वान करता है। वह संयुक्त राष्ट्र से लेकर तमाम अन्य मंचों पर भारत को घेरने की भी नाकाम कोशिश करता है। पाकिस्तान यह तो बताए कि वह क्यों नहीं अफगानिस्तान के मुसलमानों को अपने यहां शरण देता? क्या कुछ हजार मुसलमान और आने से पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाएंगे? पाकिस्तान तो बांग्लादेश में रहने वाले अपने बेसहारा उर्दू भाषी बिहारी मुसलमान नागरिकों को भी अपने यहां लेने को तैयार नहीं है, जिन्होंने 1971 के बांग्ला देश की आजादी की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दिया था और अभी शरणार्थी कैंपों में अपनी जिंदगी काट रहे हैं। पाकिस्तान को मालूम है कि सिर्फ ढाका में एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान शरणार्थी कैम्पों में नारकीय जिंदगी गुजार रहे हैं। बिहारी मुसलमान 1947 में देश के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चले गए थे। बांग्लादेश बनते ही बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानों को अपना जानी दुश्मन मानने लगे। वजह यह थी कि बिहारी मुसलमान तब पाकिस्तान सेना का खुलकर साथ दे रहे थे, जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों के ऊपर कत्लेआम मचा रही थीं। याद रहे कि बंगाली मुसलमान नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान कभी भी बंटे। इन्होंने 1971 में मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ पाकिस्तान सेना का खुलकर साथ दिया था। तब से ही इन्हें बांग्लादेश के आम लोगों द्वारा नफरत की निगाह से देखा जाता है। वैसे ये बांग्लादेश में अभी भी लाखों की संख्या में हैं और नारकीय यातना सहने को मजबूर हैं। ये पाकिस्तान जाना भी चाहते हैं। पर पाकिस्तान सरकार इन्हें अपने देश में लेने को कत्तई तैयार नहीं है। जरा सोचिए कि कोई जब देश अपने ही देशभक्त नागरिकों को लेने से मना कर दे। यह घटियापन पाकिस्तान ही कर सकता है। चीन में प्रताड़ित किए जा रहे मुसलमानों का दर्द भी तनिक भी सुनाई नहीं देता पाकिस्तान को।जब भारत ने धारा 370 को खत्म किया तो तुर्की और मलेशिया भी पाकिस्तान के साथ सुर में सुर मिलाकर बातें कर रहे थे। वे भारत की निंदा भी कर रहे थे। मलेशिया के तब के राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद कह रहे थे, "मैं यह देखकर दुखी हूँ कि जो भारत अपने को सेक्युलर देश होने का दावा करता है, वो कुछ मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए क़दम उठा रहा है। अगर हम अपने देश में ऐसा करें, तो मुझे पता नहीं है कि क्या होगा? हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री और अस्थिरता होगी और हर कोई प्रभावित होगा।" महातिर एक तरह से अपने देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियों को खुलकर चेतावनी दे रहे थे। ये दोनों देश पाकिस्तान के कहने पर संयुक्त रूप से भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे। पर ये दोनों मुल्क भी अफगानियों को अपने यहां रखने के लिए तैयार नहीं हैं। अब इनके इस्लामिक प्रेम की हवा निकल गई।दुनिया भर में फैले 57 इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के ईरान को छोड़कर शेष सदस्य अपनी तरफ से अफगानिस्तान के शरणार्थियों के हक में मानवीय आधार पर सामने नहीं आ रहे हैं। कुल मिलाकर अफगानितान संकट ने ओआईसी के खोखलेपन को भी उजागर कर दिया है। ये सिर्फ इजराइल या भारत के खिलाफ ही बोलना या बयान देना जानते हैं। अगर आप करीब से इस्लामिक देशों के आपसी संबंधों को देखेंगे तो समझ आ जाएगा कि इन सबकी एकता दिखावे भर के लिए है। याद करें कि रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी बांग्लादेश ने शरण देने से साफ इनकार कर दिया था। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार ने कहा था कि, "ये रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं, हमारे यहां पूर्व में भी कई घटनाएं घट चुकी हैं। यही कारण हैं कि हम उनको लेकर सावधान हैं।" रोहिंग्या मुसलमानों को जानने वाले बताते हैं कि ये रोहिंग्या जल्लाद से कम नहीं हैं। ये म्यामांर में बौद्ध कन्याओं से बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर उनकी अतडिंयों को निकाल फेंकने से भी गुरेज नहीं करते थे। इनके कृत्यों का इनके देश में पता चला तो म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों को खदेड़ा जाने लगा है। इसके बाद से इनके हाथ-पैर फूलने लगे हैं और ये बांग्लादेश और भारत में शरण की भीख मांगने लगे। हालांकि इन्हें कोई इस्लामिक देश तो सिर छिपाने की जगह नहीं देता, पर भारत में इनके हक में तमाम सेक्युलरवादी सामने आते रहते हैं। इसलिए ही ये भारत में कई राज्यों में घुस भी गए हैं। बहरहाल, बात हो रही थी इस्लामिक देशों की अफगान संकट को लेकर नीति की। अब कोई कम से कम यह न कहे कि इस्लामिक देशों में आपस में बहुत प्रेम और सौहार्द है।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)    

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Dakhal News 27 August 2021


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प्रमोद भार्गव राजधानी काबुल पर कब्जे के बाद अफगानिस्तान क्रूर तालिबानी शासकों के हाथ आ गया है। इसके साथ ही इस देश में भारी तबाही, औरतों पर बंदिशें और मामूली अपराधियों को अंग-भंग कर देने का शासन शुरू हो गया। देश की जनता को तालिबान के रहमोकरम पर छोड़कर भागे राष्ट्रपति अशरफ गनी ने यह साबित कर दिया है कि उनकी रुचि केवल मलाई खाने में थी, इसीलिए वे अपनी सरकार और सेना में फैले उस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में नाकाम रहे, जो देश की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहा था। पिछले 20 साल के दौरान अमेरिका ने 6.25 लाख करोड़ और भारत ने 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश अफगानिस्तान में किया था। अलबत्ता रूस से आई खबर को सही मानें तो गनी स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त थे, क्योंकि वे एक हेलिकॉप्टर और चार कारों में अकूत धन-संपदा लेकर ताजिकिस्तान की शरण में चले गए हैं। यहां हैरानी की बात है कि अमेरिकी सेना की मदद से जिन 3.5 लाख अफगानी सैनिकों को प्रशिक्षित किया गया था, उन्होंने 85 हजार तालिबानी लड़ाकों के सामने हथियार डाल दिए। इस समर्पण से ये आतंकी हथियार संपन्न हो गए हैं। इनके पास रूसी हथियार पहले से ही हैं। अब इनके पास अमेरिका द्वारा उपलब्ध कराए लड़ाकू विमान, टैंक, एके-47 राइफल्स, रॉकेट ग्रेनेड लांचर, मोर्टार और अन्य घातक हथियार भी आ गए हैं। क्योंकि अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित ये सैनिक अब तालिबानी सरकार के लिए काम करेंगे। साफ है, ये हथियार भारत समेत अन्य पड़ोसी देशों के लिए संकट बनेंगे। सेना के समर्पण और राष्ट्रपति के भाग जाने से स्पष्ट है कि अंततः ये लोग अफगानिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बना देने के हिमायती थे, वरना कहीं न कहीं तो युद्ध के हालात दिखाई देते ? वैसे तो पूरी दुनिया में धार्मिक, जातीय और नस्लीय कट्टरवाद की जड़ें मजबूत हो रही हैं, लेकिन इस्लामिक चरमपंथ की व्यूहरचना जिस नियोजित व सुदृढ़ ढंग से की जा रही है, वह भयावह है। उसमें दूसरे धर्म और संस्कृतियों को अपनाने की बात तो छोड़िए इस्लाम से ही जुड़े दूसरे समुदायों में वैमनस्य व सत्ता की होड़ इतनी बढ़ गई है कि वे आपस में ही लड़-मर रहे हैं। शिया, सुन्नी, अहमदिया, कुर्द, रोहिंग्या मुस्लिम इसी प्रकृति की लड़ाई के पर्याय बने हुए हैं। इस्लामिक ताकतों में कट्टरपंथ बढ़ने के कारण इस स्थिति का निर्माण हुआ कि चार करोड़ की आबादी वाला एक पूरा देश आतंकी राष्ट्र में तब्दील हो गया और उसे चीन, पाकिस्तान व ईरान ने समर्थन भी दे दिया। जो अमेरिका और रूस एक लंबे समय तक इन कट्टरपंथियों को गोला-बारूद उपलब्ध करा रहे थे, उन्हें आखिरकार पीठ दिखानी पड़ी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बाईडेन द्वारा लिए सेना वापसी के निर्णय पर उन्हें शर्मसार होना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार जैसी संस्थाएं इस परिप्रेक्ष्य में बौनी साबित हुई हैं। जाहिर है, इस स्तर की हस्तक्षेप की शक्तियां अप्रासंगिक हो जाएंगी तो इनका अस्तित्व में बने रहने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा ?एक समय इस्लामिक आंतकवाद को बढ़ावा देने का काम रूस, अमेरिका, पाकिस्तान और यूरोप के कुछ देशों ने किया था। दरअसल एक समय सोवियत संघ और बाद में अमेरिका इस देश पर अपना वजूद कायम कर एशिया में एक-दूसरे को कूटनीतिक मात देने की कोशिश में थे। इस नजरिए से 1980 के आस-पास सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर अपना वर्चस्व सेना के बूते जमाया। इसे नेस्तनाबूद करने के लिए अमेरिका ने तालिबानी जिहादियों को गोला-बारूद देकर रूसी सेना के खिलाफ खड़ा कर दिया। नतीजतन 1989 में रूसी सेना के अफगान की जमीन से पैर उखड़ने लगे और इस धरती पर तालिबानियों का कब्जा हो गया। इन तालिबानी लड़ाकों ने जब पाकिस्तान की शह पर अमेरिका को ही आंखें दिखाना शुरू कर दीं, तो अमेरिका की नींद टूटी और उसने मित्र देशों की मदद से तालिबान को सत्ता से बेदखल करके हामिद करजई को राष्ट्रपति बना दिया। इस कार्यवाही में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी और पूर्व रक्षामंत्री अहमद शाह मसूद ने नॉदर्न एलायंस बनाकर अमेरिका की मदद की थी। इस मौके पर ईरान भी तालिबान के विरोध में खड़ा होकर अमेरिका के साथ आ गया था। दरअसल सत्ता में आते ही तालिबान ने ईरान को पानी देने वाले कजाकी बांध से पानी देना बंद कर दिया। इस कारण ईरान को हमाउं क्षेत्र में बड़ी हानि उठानी पड़ी थी। ईरान ने तालिबान को सबक सिखाने के लिए यह मदद की थी, किंतु 2002 में अमेरिका और ईरान की दोस्ती टूट गई। बावजूद ईरान आज भी तालिबान के पक्ष में नहीं है। ईरान की तरह तुर्की भी अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता के पक्ष में नहीं है। दो दशक पहले भारत ने अहमद शाह के नेतृत्व वाले नॉदर्न एलायंस और फिर तालिबान विरोधी अफगान सरकार का साथ देते हुए 22 हजार करोड़ रुपए का पूंजी निवेश किया। अफगान की नई संसद और कई सड़कें व बांध भारत बना रहा है। भारत का अब यह निवेश बट्टे-खाते में जाता दिख रहा है। भारत की नई परिस्थितियों में अफगान नीति क्या होगी, यह तो अभी साफ नहीं है, लेकिन हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर की ईरान यात्रा अफगान रणनीति से जोड़कर देखी जा रही है। क्योंकि इस वार्ता में तालिबानी प्रतिनिधि भी मौजूद थे। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत इस समय रूस और ईरान के साथ मिलकर अफगान रणनीति पर काम कर रहा है। तुर्की भी इस रणनीति में भारत के साथ आ सकता है। एक समय चीन भी पाकिस्तान पराश्रित आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा था, किंतु जब अक्टूबर 2011 में चीन के सीक्यांग प्रांत में एक के बाद एक हिंसक वारदातों को आतंकियों ने अंजाम तक पहुंचाया तो चीन के कान खड़े हो गए। लिहाजा उसने पाकिस्तान के कान मरोड़ते हुए चेतावनी दी थी कि चीन में उत्पात मचाने वाले उग्रवादी पाकिस्तान से प्रशिक्षित हैं। गोया वह इन पर फौरन लगाम लगाए, अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहे। ये हमले इस्लामिक मूवमेंट ऑफ ईस्टर्न तुर्किस्तान ने किए थे, जिस पर अलकायदा का वरदहस्त था। अलकायदा के करीब 10 हजार लड़ाके तालिबान में शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की ताजा रिपोर्ट ने अफगानिस्तान में तालिबानी लड़ाकों की संख्या 85 हजार बताई है। इनमें 6,500 पाकिस्तानी नागरिक हैं। जबकि अन्य मध्य-एशिया और चेचन्या के है। चीन के सीक्यांग राज्य में उईगुर मुस्लिमों की आबादी 37 प्रतिशत है, जो अपनी धार्मिक कट्टरता के चलते बहुसंख्यक हान समुदाय पर भारी पड़ती है। हान बौद्ध धर्मावलंबी होने के कारण कमोबेश शांतिप्रिय हैं। हालांकि चीन अमेरिका में घटी 9/ 11 की आतंकी घटना के बावजूद आतंक का पनाहगार बना रहा। उसने तालिबान को समर्थन देकर तय किया है कि वह तालिबान का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध करना चाहता है। उसकी इस क्रूर मंशा में पाकिस्तान शामिल है। अमेरिकी सैनिकों की रवानगी के साथ ही चीन की दिलचस्पी अफगानिस्तान में बढ़ गई। उसके विदेश मंत्री वांग यी तालिबानियों का अफगानिस्तान पर कब्जा होने से पहले ही मुल्ला बरादर से बातचीत कर चुके हैं। अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान ने मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को भावी राष्ट्रपति घोषित किया है। बरादर उन चार लोगों में से एक है, जिसने वर्ष 1994 में अफगानिस्तान में तालिबानी अंदोलन की शुरूआत की थी। इसके ओसामा बिन लादेन से लेकर हाफिज सईद तक से नजदीकी संबंध रहे हैं। बरादर पूरी तरह से पाकिस्तानी एजेंसियों के प्रभाव में है। 2001 में अमेरिकी नेतृत्व में जब तालिबानी आतंक ने घुटने टेक दिए, तब बरादर ने आतंकवाद की कमान सभांल ली थी। तभी से अफगानिस्तान में तालिबानियों ने महिलाओं पर अमानवीय अत्याचार व दुराचार किए, उनको घरों में बंद कर दिया और पढ़ने-लिखने व नौकरी करने पर पाबंदी लगा दी थी। देश के ज्यादातर नागरिक तालिबानी अमानवीयता के शिकार हुए हैं। अतीत के भयावह दौर की वापसी से आम अफगानी नागरिक भयग्रस्त है। नतीजतन काबुल व अन्य शहरों में भगदड़ मची हुई है। लोग देश छोड़ने के लिए इतने उतावले हैं कि पांच लोगों को हवाई-जहाज पर लटक कर प्राण गंवाने पड़े। चीन और पाकिस्तान को छोड़ दें ंतो सारी दुनिया और आम अफगानी नागरिक यह मानकर चल रहे हैं कि अब अफगानिस्तान में मध्ययुगीन बर्बरता कायम हो जाएगी, जिससे जल्द मुक्ति मिलना मुश्किल है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 August 2021


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सियाराम पांडेय 'शांत' सत्र चाहे संसद का हो या विधान मंडल का, घेरना और घिरना तो आम बात है। तंज के बिना काम तो वैसे भी नहीं चलता। बहस की स्थिति यह होती है कि न सत्तापक्ष बहस चाहता है और न ही विपक्ष। बहुधा देखने में यह आता है कि सदन में होने वाली बहस में जन सरोकारों से जुड़े मुद्दे गायब हो जाते हैं और अनावश्यक मुद्दों पर हंगामा और शोर-शराबा होता रहता है। ऐसे में सत्र का अधिकांश समय बर्बाद हो जाता है। विरोध करना वैसे भी आसान होता है। इसलिए विधानसभा या विधान परिषद के सदस्यों को समस्या के साथ उसका समाधान जरूर सुझाना चाहिए। सदन में जैसा निर्णय हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन अपनी बात रखने में कैसा संकोच। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन विपक्षी दलों के विधायकों ने विरोध का जबर्दस्त नवोन्मेष किया। कोई बैलगाड़ी से आया तो कोई रिक्शे से। कोई ठेला लिए आया।जाहिर सी बात है कि यह सब डीजल-पेट्रोल की महंगाई के विरोध में हुआ होगा लेकिन माननीय अपने वाहनों के इस्तेमाल पर जरूरत भर रोक लगाकर देश और प्रदेश को एक सकारात्मक संदेश तो दे ही सकते हैं। अपने देश में अच्छी बात यह है कि यहां लोग प्रतीकों से ही काम चला लेते हैं। उन्हें पता है कि प्रतीक का मामला क्षणिक होता है। यथार्थ में अपने विधानसभा क्षेत्र से लखनऊ पहुंचना कष्टसाध्य तो है ही, माननीयों के धैर्य की परीक्षा भी है। मीडिया में फोटो आए, बस काम खत्म। उसके बाद न बैलगाड़ी की कद्र होती है और न ही रिक्शे-ठेले की। सदन से लौटते वक्त भी कभी किसी नेता ने इस तरह का नवोन्मेष किया हो, ऐसा देखने-सुनने में तो नहीं आया। अब्बाजान को लेकर विधान परिषद में जमकर हंगामा हुआ। मुख्यमंत्री ने तो यहां तक पूछ लिया कि क्या 'अब्बाजान' शब्द असंसदीय है। मुस्लिमों के वोट की राजनीति करने वालों को अब्बाजान शब्द से परहेज क्यों हैं? मुख्यमंत्री को भी सोचना होगा कि अब्बाजान शब्द के प्रयोग से नहीं, उसके कहने के तरीके से है। अब्बाजान पूरी तरह संसदीय शब्द है लेकिन वह कहा कैसे और किस परिप्रेक्ष्य में गया, महत्वपूर्ण यह है। जब कोई शब्द व्यंग्य की तरह चुभे तो उसका प्रभाव कुछ ऐसा ही होता है। इंद्रप्रस्थ की सभा में जाते हुए जब जल की जगह थल के भ्रम में दुर्योधन पानी में गिर गया तो द्रौपदी ने एक मजाक किया था। उसने कहा था कि 'अंधे के बेटे भी अंधे ही होते हैं' और इसकी परिणिति महाभारत जैसे युद्ध के रूप में हुई थी। यह सच है कि समाजवादी पार्टी का अनुराग मुस्लिम समाज से कुछ ज्यादा ही रहा है। मुस्लिम-यादव के एमवाई समीकरण के लिए हमेशा उसकी आलोचना होती रही है। साध्वी ऋतंभरा ने तो अयोध्या आंदोलन के दौर में मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम तक कह दिया था। कारसेवकों पर गोली चलवाने के मामले को मुस्लिम वोट की फसल के रूप में तब्दील करने में मुलायम सिंह यादव ने वैसे भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अगर उनके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब्बाजान शब्द का प्रयोग एक टीवी चैनल पर किया है तो इस पर अखिलेश यादव और उनके पार्टीजनों का भड़कना स्वाभाविक भी है। अखिलेश यादव ने तो तत्काल अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर दी थी कि मुख्यमंत्री अपनी वाणी पर संयम रखें, वर्ना मैं भी उनके पिता के बारे में कुछ अप्रिय बोल दूंगा। मुख्यमंत्री पद की अपनी गरिमा होती है। इसलिए शब्दों का चयन करते वक्त मुख्यमंत्री को उस गरिमा का ध्यान रखना चाहिए और मुख्यमंत्री तो संत भी हैं, ऐसे में उन्हें तो बोलते वक्त कबीर की नसीहतों पर अवश्य विचार करना चाहिए- 'हिए तराजू तोल के तब मुख बाहरि आनि।' वैसे भी अब्बाजान का मामला इतना बड़ा नहीं है कि उसके लिए सदन का महत्वपूर्ण समय बर्बाद किया जाए। जनता की बहुतेरी ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर सरकार को घेरा जा सकता है। पहले विधायक अध्ययन करके पूरी तैयारी के साथ सदन में आते थे और जनहित के मुद्दों को उठाया करते थे लेकिन अब वह बात रही। न प्रतिपक्ष के लोग बहस करना चाहते हैं और न ही सत्तापक्ष चाहता है कि बहस हो। इसलिए सत्र से पहले ही ऐसे कुछ बिना सिर-पैर के मुद्दे जान-बूझकर उछाल दिए जाते हैं जिसका कोई फायदा नहीं होता। किसी दल के एक नेता के विचार निजी हो सकते हैं, लेकिन उसे पूरी पार्टी का विचार मान लेना उचित नहीं है। सपा के मुस्लिम सांसद बर्क के बयान पर सपा को तालिबान समर्थक कहना उचित नहीं है। हालांकि बर्क भी अपने बयान से पलट गए हैं और कह रहे हैं कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। इधर अलीगढ़ को हरीगढ़ और देवबंद को देववृंद करने की मांग उठ रही है। नाम तो देश या प्रदेश में किसी भी स्थान का बदला जा सकता है, बदला भी जाता रहा है लेकिन उससे अगर आम जनता को कोई लाभ होता है तो इस तब्दीली का कोई मतलब भी है।मानसून सत्र के पहले दिन देवबंद में पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) का कमांडो सेंटर बनाने, मेरठ, बहराइच और जेवर समेत कई और जगहों पर एटीएस की इकाई स्थापित करने का विचार सराहनीय है लेकिन उसके समय पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि नेपाल से सटे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकी गतिविधियों को देखते हुए ऐसा करना प्रदेश की जरूरत भी है लेकिन ऐसा करने भर से आतंकी गतिविधियां रुक जाएंगी,यह मुमकिन नहीं है। इसके लिए सम्यक निगरानी की जरूरत होगी। किसी भी पक्ष द्वारा इस तरह की बयानबाजी नहीं होनी चाहिए जो दिल दुखाने वाली हो। वैक्सीन किसी व्यक्ति की नहीं होती, देश की होती है। उस पर जनता को गुमराह करने की बजाय जनता को वैक्सीनेशन को लेकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।विपक्ष को अनुपूरक बजट के गुण-दोष पर, विकास कार्य की कमियों और अच्छाइयों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शालीनता के दायरे में संयमित रूप से भी अपनी बात कही जा सकती है। विधायकों और सांसदों का आचरण लोकमानस को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। सारी ऊर्जा अगर वे सड़क पर ही खर्च कर देंगे तो सदन में वे क्या करेंगे, चिंतन तो इस पर भी होना चाहिए। विधानसभा और विधान परिषद के मानसून सत्र के समय का सर्वाधिक समय उपयोग में आए, इस पर विचार कर नेताओं को अपनी रणनीति तय करनी चाहिए। नवोन्मेष करना ही है तो सदन में करें, नए विचारों, नए सुझावों के साथ करें। विरोध-विरोध के लिए नहीं, मुद्दों और सिद्धांतों पर हो, तभी उसकी सार्थकता है।(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 19 August 2021


bhopal, Gehlot

रमेश सर्राफ धमोरा राजस्थान कांग्रेस में सत्ता को लेकर चल रहा संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। इस कारण प्रदेश में बहुप्रतिक्षित मंत्रिमंडल में फेरबदल व विस्तार रुका पड़ा है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट में पिछले सवा साल से आरपार की लड़ाई चल रही है। कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद भी दोनों गुटों के नेता झुकने को तैयार नहीं है। इस कारण राजस्थान में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समक्ष असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दोनों ही गुटों के नेता अपने-अपने समर्थकों को लामबंद करने में लगे हुए हैं। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती हैं कि राजस्थान में सचिन पायलट समर्थकों को भी पर्याप्त सम्मान मिले व उन्हें भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। इसके लिए कांग्रेस आलाकमान द्वारा पूरी कवायद की जा रही है। मगर राजस्थान में मंत्रिमंडल में फेरबदल व राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो पा रही है। अशोक गहलोत चाहते हैं कि मंत्रिमंडल का सिर्फ विस्तार किया जाए। मंत्रिमंडल में रिक्त स्थानों पर नए मंत्रियों की नियुक्ति हो। किसी भी वर्तमान मंत्री को हटाया नहीं जाए। जबकि कांग्रेस आलाकमान के पास राजस्थान सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ लंबी-चौड़ी शिकायतें पहुंच रही हैं। वहीं, सचिन पायलट भी अपने समर्थक छह विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करवाना चाहते हैं। जबकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पायलट समर्थक तीन विधायकों को ही मंत्री बनाने की जिद पर अड़े हैं। पायलट खेमे से मंत्री बनने वाले तीन विधायकों का चयन भी मुख्यमंत्री गहलोत अपनी मर्जी से करना चाहते हैं जो पायलट को मंजूर नहीं है। पिछले महीने दिल्ली से वरिष्ठ नेता लगातार राजस्थान का दौरा कर गहलोत को मनाने का प्रयास करते रहे। मगर बात नहीं बन पाई। कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, राजस्थान के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अजय माकन, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी इसी सिलसिले में राजस्थान का दौरा कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिलकर पायलट गुट को समायोजित करवाने का प्रयास कर चुके हैं। राजस्थान के प्रभारी महासचिव अजय माकन ने तो लगातार तीन दिनों तक कांग्रेस के सभी विधायकों, बसपा से आए छह विधायकों, सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायकों से फीडबैक ले चुके हैं। फीडबैक के दौरान अधिकांश विधायकों ने माकन से सरकार में शामिल कई मंत्रियों की जमकर शिकायतें भी की थी। अपनी तीन दिवसीय यात्रा के बाद दिल्ली रवानगी से पूर्व पत्रकारों से बातचीत में माकन ने तो इतना कह दिया था कि मैं ही दिल्ली हूं। उनका इशारा था कि वह जो निर्णय करेंगे वही कांग्रेस आलाकमान का निर्णय माना जाएगा। मगर मकान द्वारा लिए गए फीडबैक का अभीतक कोई नतीजा नहीं निकला है। वहीं मुख्यमंत्री गहलोत के नजदीकी स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने यहां तक कह दिया था कि राजस्थान में तो कांग्रेस के एकमात्र आलाकमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही हैं। जैसा गहलोत चाहेंगे वैसा ही राजस्थान में होगा। धारीवाल के बयान को माकन के मैं ही दिल्ली हूं वाले बयान का जवाब माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धारीवाल से बयान दिलवाकर गहलोत ने माकन को भी उनकी सीमा में बांध दिया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी राजस्थान का पूरा मामला हैंडल कर रही हैं। सचिन पायलट की बगावत के बाद प्रियंका गांधी के प्रयासों से ही पायलट फिर से पार्टी के साथ आ गए थे। उस समय प्रियंका गांधी ने पायलट से वादा किया था कि उनकी सभी समस्याओं का समाधान करवाया जाएगा और पार्टी में उन्हें सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा। प्रियंका गांधी के प्रयासों से ही गहलोत व पायलट के मध्य उपजे विवादों को दूर करवाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल व अजय माकन की तीन सदस्य समिति बनाई थी। उस समिति को पायलट व गहलोत के मध्य सुलह करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मगर अचानक ही समिति के वरिष्ठ सदस्य अहमद पटेल का कोरोना से निधन हो जाने के कारण आगे की प्रक्रिया रुक गई। लेकिन कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर समिति के दोनों सदस्य केसी वेणुगोपाल व अजय माकन जयपुर आकर वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। उनका प्रयास है कि प्रियंका गांधी द्वारा सचिन पायलट से किए गए वायदे को पूरा किया जाए। इसी कवायद में दिल्ली से वरिष्ठ नेताओं को जयपुर भेजा जा रहा है। मगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि पायलट की बगावत के समय पार्टी का साथ देने वाले विधायकों व मंत्रियों को पहले तरजीह मिलनी चाहिए। चूंकि पायलट ने बगावत कर एक तरह से गहलोत सरकार को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया था। मगर पार्टी विधायकों, मंत्रियों, बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए विधायकों व निर्दलीय विधायकों के समर्थन से पायलट व भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए थे। ऐसे में पायलट समर्थकों को तरजीह मिलने से पार्टी में अनुशासनहीनता की घटनाएं बढ़ेगी और भविष्य में फिर कोई नेता पार्टी से बगावत की हिम्मत करेगा। इसलिए पायलट व उनके समर्थक विधायकों को अपनी गलती के लिए कुछ समय तक सत्ता से दूर रहकर प्रायश्चित करवाना चाहिए। ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो सके। पायलट की बगावत के कारण राजस्थान में कांग्रेस सरकार की आमजन में छवि खराब हुई थी तथा बेवजह एक महीने तक सभी विधायकों, मंत्रियों को होटलों की बाड़ेबंदी में रहना पड़ा था। गहलोत का मानना है कि कम समय में पार्टी ने पायलट को बड़े-बड़े पदों पर बैठाने के बावजूद अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने पार्टी से दगा किया था। जिसकी सजा उनको मिलनी ही चाहिए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोरोना के पहले चरण के प्रारंभ होने के बाद से ही अधिकांश समय अपने सरकारी आवास से ही कार्य कर रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर वह अपने आवास से बाहर भी नहीं निकले हैं। पिछले दो महीनों से तो मुख्यमंत्री गहलोत अपने आवास पर भी किसी से व्यक्तिगत नहीं मिलकर सिर्फ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से ही बात कर रहे थे। दो महीने के बाद 15 अगस्त के दिन पहली बार गहलोत अपने सरकारी आवास से बाहर निकलकर कुछ कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। आगामी नौ सितंबर से विधानसभा का मानसून सत्र आहूत किया जा रहा है। ऐसे में संभावना है कि मंत्रिमंडल का विस्तार भी उसके बाद ही किया जाएगा। मुख्यमंत्री गहलोत ने जितनी सख्ती पायलट को लेकर दिखाई है। वैसा कड़ा रुख उन्होंने उससे पहले कभी नहीं किया। इसलिये लगता है कि राजस्थान की राजनीति में अंततः वही होगा जो अशोक गहलोत चाहेंगे। पायलट कितना भी भागदौड़ कर लें, गहलोत की मर्जी के बिना राजस्थान में कुछ भी नहीं होने वाला है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 19 August 2021


bhopal, Gehlot

रमेश सर्राफ धमोरा राजस्थान कांग्रेस में सत्ता को लेकर चल रहा संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। इस कारण प्रदेश में बहुप्रतिक्षित मंत्रिमंडल में फेरबदल व विस्तार रुका पड़ा है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट में पिछले सवा साल से आरपार की लड़ाई चल रही है। कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद भी दोनों गुटों के नेता झुकने को तैयार नहीं है। इस कारण राजस्थान में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समक्ष असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दोनों ही गुटों के नेता अपने-अपने समर्थकों को लामबंद करने में लगे हुए हैं। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती हैं कि राजस्थान में सचिन पायलट समर्थकों को भी पर्याप्त सम्मान मिले व उन्हें भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। इसके लिए कांग्रेस आलाकमान द्वारा पूरी कवायद की जा रही है। मगर राजस्थान में मंत्रिमंडल में फेरबदल व राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो पा रही है। अशोक गहलोत चाहते हैं कि मंत्रिमंडल का सिर्फ विस्तार किया जाए। मंत्रिमंडल में रिक्त स्थानों पर नए मंत्रियों की नियुक्ति हो। किसी भी वर्तमान मंत्री को हटाया नहीं जाए। जबकि कांग्रेस आलाकमान के पास राजस्थान सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ लंबी-चौड़ी शिकायतें पहुंच रही हैं। वहीं, सचिन पायलट भी अपने समर्थक छह विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करवाना चाहते हैं। जबकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पायलट समर्थक तीन विधायकों को ही मंत्री बनाने की जिद पर अड़े हैं। पायलट खेमे से मंत्री बनने वाले तीन विधायकों का चयन भी मुख्यमंत्री गहलोत अपनी मर्जी से करना चाहते हैं जो पायलट को मंजूर नहीं है। पिछले महीने दिल्ली से वरिष्ठ नेता लगातार राजस्थान का दौरा कर गहलोत को मनाने का प्रयास करते रहे। मगर बात नहीं बन पाई। कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, राजस्थान के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अजय माकन, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी इसी सिलसिले में राजस्थान का दौरा कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिलकर पायलट गुट को समायोजित करवाने का प्रयास कर चुके हैं। राजस्थान के प्रभारी महासचिव अजय माकन ने तो लगातार तीन दिनों तक कांग्रेस के सभी विधायकों, बसपा से आए छह विधायकों, सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायकों से फीडबैक ले चुके हैं। फीडबैक के दौरान अधिकांश विधायकों ने माकन से सरकार में शामिल कई मंत्रियों की जमकर शिकायतें भी की थी। अपनी तीन दिवसीय यात्रा के बाद दिल्ली रवानगी से पूर्व पत्रकारों से बातचीत में माकन ने तो इतना कह दिया था कि मैं ही दिल्ली हूं। उनका इशारा था कि वह जो निर्णय करेंगे वही कांग्रेस आलाकमान का निर्णय माना जाएगा। मगर मकान द्वारा लिए गए फीडबैक का अभीतक कोई नतीजा नहीं निकला है। वहीं मुख्यमंत्री गहलोत के नजदीकी स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने यहां तक कह दिया था कि राजस्थान में तो कांग्रेस के एकमात्र आलाकमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही हैं। जैसा गहलोत चाहेंगे वैसा ही राजस्थान में होगा। धारीवाल के बयान को माकन के मैं ही दिल्ली हूं वाले बयान का जवाब माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धारीवाल से बयान दिलवाकर गहलोत ने माकन को भी उनकी सीमा में बांध दिया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी राजस्थान का पूरा मामला हैंडल कर रही हैं। सचिन पायलट की बगावत के बाद प्रियंका गांधी के प्रयासों से ही पायलट फिर से पार्टी के साथ आ गए थे। उस समय प्रियंका गांधी ने पायलट से वादा किया था कि उनकी सभी समस्याओं का समाधान करवाया जाएगा और पार्टी में उन्हें सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा। प्रियंका गांधी के प्रयासों से ही गहलोत व पायलट के मध्य उपजे विवादों को दूर करवाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल व अजय माकन की तीन सदस्य समिति बनाई थी। उस समिति को पायलट व गहलोत के मध्य सुलह करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मगर अचानक ही समिति के वरिष्ठ सदस्य अहमद पटेल का कोरोना से निधन हो जाने के कारण आगे की प्रक्रिया रुक गई। लेकिन कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर समिति के दोनों सदस्य केसी वेणुगोपाल व अजय माकन जयपुर आकर वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। उनका प्रयास है कि प्रियंका गांधी द्वारा सचिन पायलट से किए गए वायदे को पूरा किया जाए। इसी कवायद में दिल्ली से वरिष्ठ नेताओं को जयपुर भेजा जा रहा है। मगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि पायलट की बगावत के समय पार्टी का साथ देने वाले विधायकों व मंत्रियों को पहले तरजीह मिलनी चाहिए। चूंकि पायलट ने बगावत कर एक तरह से गहलोत सरकार को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया था। मगर पार्टी विधायकों, मंत्रियों, बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए विधायकों व निर्दलीय विधायकों के समर्थन से पायलट व भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए थे। ऐसे में पायलट समर्थकों को तरजीह मिलने से पार्टी में अनुशासनहीनता की घटनाएं बढ़ेगी और भविष्य में फिर कोई नेता पार्टी से बगावत की हिम्मत करेगा। इसलिए पायलट व उनके समर्थक विधायकों को अपनी गलती के लिए कुछ समय तक सत्ता से दूर रहकर प्रायश्चित करवाना चाहिए। ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो सके। पायलट की बगावत के कारण राजस्थान में कांग्रेस सरकार की आमजन में छवि खराब हुई थी तथा बेवजह एक महीने तक सभी विधायकों, मंत्रियों को होटलों की बाड़ेबंदी में रहना पड़ा था। गहलोत का मानना है कि कम समय में पार्टी ने पायलट को बड़े-बड़े पदों पर बैठाने के बावजूद अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने पार्टी से दगा किया था। जिसकी सजा उनको मिलनी ही चाहिए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोरोना के पहले चरण के प्रारंभ होने के बाद से ही अधिकांश समय अपने सरकारी आवास से ही कार्य कर रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर वह अपने आवास से बाहर भी नहीं निकले हैं। पिछले दो महीनों से तो मुख्यमंत्री गहलोत अपने आवास पर भी किसी से व्यक्तिगत नहीं मिलकर सिर्फ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से ही बात कर रहे थे। दो महीने के बाद 15 अगस्त के दिन पहली बार गहलोत अपने सरकारी आवास से बाहर निकलकर कुछ कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। आगामी नौ सितंबर से विधानसभा का मानसून सत्र आहूत किया जा रहा है। ऐसे में संभावना है कि मंत्रिमंडल का विस्तार भी उसके बाद ही किया जाएगा। मुख्यमंत्री गहलोत ने जितनी सख्ती पायलट को लेकर दिखाई है। वैसा कड़ा रुख उन्होंने उससे पहले कभी नहीं किया। इसलिये लगता है कि राजस्थान की राजनीति में अंततः वही होगा जो अशोक गहलोत चाहेंगे। पायलट कितना भी भागदौड़ कर लें, गहलोत की मर्जी के बिना राजस्थान में कुछ भी नहीं होने वाला है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 19 August 2021


bhopal,Natural calamities, Kinnaur result, unplanned development

डॉ. रमेश शर्मा किन्नौर की पहाड़ दरकने की त्रासदी बहुत ही दुखदायी है जिसने सभी की आत्मा को झकझोर दिया है। इस बरसात में ऐसी अनेक घटनाएं अन्य स्थानों पर भी घटी हैं जो हमें सोचने के लिए मजबूर करती हैं। विकास के नये तौर-तरीके और निर्माण के नए उपकरण इस तरह की आपदाओं के मुख्य कारण हैं। मानव ने जीवन की गति को बढ़़ाने के लिए क्या करना है और क्या नहीं करना है, किस चीज की कुर्बानी देनी है और किस की नहीं, इसे समझते हुए भी अनदेखा करना और योजनाओं का स्वरूप अल्पावधि के लिए निर्धारित करने के कारण ही ऐसे परिणाम सामने आ रहे हैं। जल्दी इसे भूल कर अगले संकट का इंतजार करेंगे समाधान नहीं। हमीरपुर से कांगड़ा सड़क, कालका शिमला, किन्नौर लाहौल स्पिति या हिमालय क्षेत्र में कहीं भी विकास की बात हो जलवायु और पर्यावरण की दीर्घकालीन सुरक्षा को हमेशा नजरअंदाज किया जाता रहा है। हजारों पेड़ काटे गए लेकिन नये नहीं लगाए गए। धमाकों से सड़क, सुरंग और बांध बनाए गए तथा निर्लज्जता और क्रूरता के साथ धरती को जगह-जगह छलनी किया गया तो यह उसका स्वाभाविक परिणाम है कि हम विवश होकर परिजनों का शोक मनाते रहेंगे। दुर्भाग्य से सरकारी तंत्र इस तरह की तबाही का मुख्य किरदार है। हिमालय की संरचना के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ केवल इस प्रदेश के लिए ही नहीं बल्कि बहुत बड़े भूभाग के लिए संकट का कारण बनेगी। इस तथ्य से परिचित होते हुए भी हम अनियोजित विकास के मौन समर्थक हैं, यह भयावह स्थिति है। हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक धरोहर की रक्षा मानवता की बहुत बड़ी सेवा होगी। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।)

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Dakhal News 13 August 2021


bhopal, Reservation, One Arrow, Many Targets

प्रमोद भार्गव आजादी के 74 साल के इतिहास में आरक्षण से ज्यादा किसी अन्य मुद्दे ने देश की राजनीति को प्रभावित नहीं किया। आरक्षण का सबसे अधिक लाभ उठाने वाला पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सभी राजनीतिक दलों की आंखों का तारा रहा है। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद अनेक क्षेत्रीय दल इसी के बूते उभरे और प्रदेश की राजनीति में छा गए। अबतक इसका सबसे ज्यादा लाभ यादव, कुर्मी, धाकड़, कुशवाह और जाट जाति के समुदायों ने उठाया है। लेकिन अब संविधान में 127वां संशोधन होने के बाद इसमें सेंध लगने जा रही है। संसद में चल रहे हंगामे के बीच केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 342-ए, 338-बी और 366 में संशोधन विधेयक पेश कर लोकसभा से पारित करा लिया। मजे की बात यह रही कि पेगासस जासूसी और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को नाकों चने चबाने की कोशिश में लगा संपूर्ण विपक्ष इस संशोधन के पक्ष में रहा। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने इसी साल पांच मई को मराठा आरक्षण संबंधी फैसले को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरक्षण के दायरे में जातियों को जोड़ने-घटाने का अधिकार केंद्र के पास है। चूंकि महाराष्ट्र में मराठा आराक्षण का मुद्दा लंबे समय से चला आ रहा है और केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर है, इसलिए उसे महाराष्ट्र में अपनी जड़े फिर से मजबूती के लिए मराठों को खुश करना जरूरी था। लिहाजा केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई थी। बावजूद भाजपा को विपक्षी दलों की आलोचना झेलनी पड़ी थी कि 'केंद्र ने संघवाद का गला घोंटकर आरक्षण पर फैसले लेने का अधिकार राज्यों से छीन लिया है।' दरअसल केंद्र सरकार ने ओबीसी की विभिन्न वंचित जातियों मेंं पैठ बनाने की दृष्टि से केंद्रीय कैबिनेट के जरिए ओबीसी की केंद्रीय सूची के वर्गीकरण के लिए आयोग बनाने के फैसले को मंजूरी दे दी थी। यानी इस वर्ग में भी पिछड़ेपन की सीमा को देखते हुए उन्हें आरक्षण को हक दिया जाएगा। एक तरह से यह कोटे के अंदर नया कोटा प्रबंध कर देने का प्रावधान था। महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट, कर्नाटक में लिंगायत, आंध्र-प्रदेश में कापू के साथ-साथ उत्तर-प्रदेश और बिहार में भी कई जातियां खुद को आर्थिक और शैक्षिक आधार पर कमजोर मानते हुए पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल करने और आरक्षण का लाभ देने की मांग कर रही हैं। गोया, इस पचड़े में पड़ने की बजाय केंद्र ने पिछड़े वर्ग की नई जातियों की पहचान कर सूची में शामिल करने का राज्यों का अधिकार संशोधन विधेयक लाकर बहाल कर दिया। केंद्र को यह फैसला इसलिए भी लेना पड़ा, क्योंकि उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए जातीय गोलबंदी शुरू हो चुकी है। इसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल ने जातीय जनगणना की मांग तेज कर दी। इन सब मांगों के मद्देनजर केंद्र ने इस संशोधन के मार्फत गेंद राज्यों के पाले में डालकर क्षेत्रीय दलों को जातियों के मकड़जाल में उलझाने का काम किया है। ओबीसी के अंदर केंद्रीय सूची में शामिल जातियों को क्या उनकी संख्या के अनुरूप सही अनुपात में राज्य आरक्षण का कितना लाभ दे पाएंगे यह अब उन्हें ही तय करना है। ध्यान रहे कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने तीन वर्गो में वर्गीकरण का सुझाव दिया था। एक वर्ग जो पिछड़ा है। दूसरा वर्ग जो ज्यादा पिछड़ा है और तीसरा जो अति पिछड़ा है। यह फैसला भले ही सामाजिक समानता के मुद्दे से जुड़ा है, लेकिन इसका राजनीतिक फलक काफी बड़ा है। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में जो प्रभावी ओबीसी वर्ग है, वह आरक्षण के 27 फीसद कोटे के अधिकांश हिस्से पर काबिज हैं। ओबीसी में जातियों की उप-वर्ग के लिए आयोग बनाने की सिफारिश राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने साल 2011 में पहली बार की थी। आयोग की सिफारिश थी कि ओबीसी को तीन उप-वर्ग में बांटा जाएं। इससे पहले 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संबंध में व्यवस्था दी थी। साल 2012, 2013 व 2014 में संसदीय समितियों ने भी इसकी सिफारिश की थी। उप-वर्ग बनाने का मकसद ओबीसी में सभी वर्गों को बराबर लाभ का मौका देना है। अक्सर आरोप लगते हैं कि पिछड़ी जातियों में से आर्थिक तौर पर मजबूत कुछ वर्ग ही फायदा उठा रहे हैं। उनके अलावा ज्यादातर पिछड़ी जातियों को फायदा नहीं मिल रहा है। उप-वर्ग बनने पर विशेष जातियों के लिए आरक्षण का बंटवारा हो जाएगा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अतिपिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी बाधा नहीं है। लिहाजा कोई राज्य सरकार ऐसा करना चाहती है तो वह कर सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में ओबीसी आयोग की सिफारिश पर 11 राज्य पहले ही अपनी ओबीसी सूची में उप-वर्ग बना चुके हैं। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलगांना, पुड्डुचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडू और जम्मू-कश्मीर शामिल है। इसे नए संशोधन का महत्वपूर्ण पहलू है कि अब पिछड़ा वर्ग सूची में किसी नई जाति को जोड़ने या हटाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास रहेगा। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने को कहा गया है। इसमें शर्त है कि यह साबित किया जाए कि दूसरों के मुकाबले इन दोनों पैमानों पर पिछड़े हैं, क्योंकि बीते वक्त में उनके साथ अन्याय हुआ है, यह मानते हुए उसकी भरपाई के तौर पर आरक्षण दिया जा सकता है। राज्य का पिछड़ा वर्ग आयोग राज्य में रहने वाले अलग-अलग वर्गो की सामाजिक स्थिति का ब्योरा रखता है। वह इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है। अगर मामला पूरे देश का है तो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी सिफारिशें देता है। देश में कुछ जातियों को किसी राज्य में आरक्षण मिला है तो किसी दूसरे राज्य में नही मिला है। मंडल आयोग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी साफ कर दिया था कि अलग-अलग राज्यों में हालात अलग-अलग हो सकते हैं। वैसे तो आरक्षण की मांग जिन प्रांतों में भी उठी है, उन राज्यों की सरकारों ने खूब सियासी खेल खेला है, लेकिन हरियाणा मे यह खेल कुछ ज्यादा ही खेला गया है। जाट आरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सरकार ने बीसी (पिछड़ा वर्गद्ध सी नाम से एक नई श्रेणी बनाई थी, ताकि पहले से अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहीं जातियां अपने अवसर कम होने की आशंका से खफा न हों। साथ ही बीसी-ए और बीसीबी-श्रेणी में आरक्षण का प्रतिशत भी बढ़ा दिया था। जाटों के साथ जट सिख, बिशनोई, त्यागी, रोड, मुस्लिम जाट व मुल्ला जाट बीसी-सी श्रेणी में मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण से लाभान्वित हो गए थे। इस विधेयक में यह दृष्टि साफ झलक रही थी, कि जाट आंदोलन से झुलसी सरकार ने यह हर संभव कोशिश की है कि राज्य में सामाजिक समीकरण सधे रहें। लेकिन उच्च न्यायालय ने इन प्रावधानों को खारिज कर दिया था। आरक्षण के इस सियासी खेल में अगली कड़ी के रूप में महाराष्ट्र आगे आया। यहां मराठों को 16 फीसदी और मुस्लिमों को 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कर दिया गया था। यहां इस समय कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। सरकार ने सरकारी नौकरियों,शिक्षा और अद्र्ध सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित किया था। महाराष्ट्र में इस कानून के लागू होने के बाद आरक्षण का प्रतिशत 52 से बढ़कर 73 हो गया था। यह व्यवस्था संविधान की उस बुनियादी अवधारणा के विरुद्ध थी,जिसके मुताबिक आरक्षण की सुविधा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। बाद में मुंबई उच्च न्यायलय ने इस आदेश पर स्थगन दिया और फिर 5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद ही केंद्र सरकार ने राज्यों को ओबीसी की सूची में नई जातियां शामिल करने का अधिकार दिया है। इस कड़ी में राजस्थान सरकार ने सभी संवैधानिक प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को दरकिनार करते हुए सरकारी नौकरियों में गुर्जर,बंजारा,गाड़िया लुहार,रेबारियों को 5 प्रतिशत और सवर्णों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 प्रतिशत आरक्षण देने का विधेयक 2015 में पारित किया था। इस प्रावधान पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया था। यदि आरक्षण के इस प्रावधान को लागू कर दिया जाता तो राजस्थान में आरक्षण का आंकड़ा बढ़कर 68 फीसदी हो जाता, जो न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लघंन है। साफ है, राजस्थान उच्च न्यायालय इसी तरह के 2009 और 2013 में वर्तमान कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार द्वारा किए गए ऐसे ही कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक ठहरा चुकी है। लेकिन अब पिछड़ा वर्ग में उप-वर्ग बनाए जाने का मार्ग राज्य ही खोल सकते हैं। उत्तर-प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 127वें संविधान संशोधन के तत्काल बाद राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के बैठक की और जिन 79 जातियों को पिछड़ा वर्ग में जोड़ने की प्रक्रिया चल रही थी, उस सूची में 39 जातियां और जोड़ दीं। उत्तर-प्रदेश में ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण को तीन हिस्सों में विभाजित किया जाएगा। इसके तहत यादव, अहीर, जाट, कुर्मी, सोनार और चैरसिया को पिछड़ा वर्ग में रखा जाएगा। अति पिछड़ा वर्ग में गिरी, गुर्जर, गोसाईं, लोद, कुशवाहा, कुम्हार, माली और लुहार समेत कुछ अन्य जातियों को 11 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा। अत्यंत पिछड़ा वर्ग में गड़रिया, मल्लाह, केवट, निषाद, राई, गद्दी, घोषी राजभर जातियों को शामिल कर 9 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। इस तरकीब से भाजपा का वोट-बैक मजबूत होगा और समाजवादी पार्टी सिर्फ यादवों में सिमटकर रह जाएगी, यानी बड़े स्तर पर वोट की दृष्टि से राजनीतिक लाभ से वंचित हो जाएगी। उत्तर-प्रदेश की कुल आबादी में ओबीसी की जनसंख्या 54 प्रतिशत मानी जाति है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 13 August 2021


bhopal, When will tainted ,politics be spotless?

प्रभुनाथ शुक्ल राजनीति में शुचिता का सवाल सबसे अहम मसला है। बेदाग छवि के राजनेता और चरित्र की राजनीति वर्तमान दौर में हाशिए पर है। टीवी का वह विज्ञापन भारतीय राजनीति पर सटीक बैठता है कि 'दाग अच्छे हैं।' देश में यह मुद्दा चर्चा का विषय रहा है कि राजनीति का अपराधीकरण क्यों हो रहा है। दागदार और आपराधिक वृत्ति के व्यक्तियों को राजनीतिक दल प्रश्रय क्यों दे रहे हैं। वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राजनीति का अपराधीकरण हुआ है या फिर राजनीति ही अपराधियों, बाहुबलियों की हो चली है। जहाँ अब बेदाग चेहरों का कोई मतलब नहीं रहा। क्योंकि एक चरित्रवान व्यक्ति राजनीति की बदबू से खुद को अलग रखना चाहता है। अब पहले जैसी साफ-सुथरी राजनीति की उम्मीद बेमानी है। कल जिन अपराधियों का सहारा लेकर लोग राजनेता बनते थे आज वही अपराधी खुद को सुरक्षित रखने के लिए राजनेता बन गया है। यह बदलती भारतीय राजनीति का नया चेहरा है। लेकिन उम्मीद बाकी है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में दिए गए अपने फैसले के अवमानना मामले में हाल में एक अहम फैसला सुनाया है। जिससे यह उम्मीद जगी है कि राजनीति में थोड़ी शुचिता आ सकती है, लेकिन अभी अदालत को इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहुत कुछ करना है। लोगों की रही-सही उम्मीद बस अदालत पर है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीति कितनी पवित्र होगी यह तो वक्त बताएगा, लेकिन देश और समाज के साथ प्रबुद्ध वर्ग में एक संदेश गया है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बिहार चुनाव से पूर्व एक फैसला आया था जिसमें कहा गया था कि आपराधिक छवि के उम्मीदवारों का ब्यौरा सार्वजनिक होना चाहिए। इसकी सूचना अखबारों आनी चाहिए। जनता को भी यह मालूम होना चाहिए कि जिस व्यक्ति को वह चुनने जा रहे हैं उसकी पृष्ठभूमि क्या है। उसकी सामाजिक छवि क्या रही है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उन्हीं याचिकाओं की अवमानना की सुनवाई करते हुए अदालत ने सख्त रुख अपनाया। इसके लिए भाजपा, कांग्रेस, माकपा, राकांपा समेत आठ दलों पर पांच से एक लाख का जुर्माना लगाया है। इसके अलावा बिहार विधानसभा में चुनकर गए आपराधिक नेताओं की सूची सार्वजनिक करने के साथ राजनीतिक दलों को यह भी बताने को कहा है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी जिसकी वजह से उन्होंने आपराधिक छवि वालों को पार्टी उम्मीदवार बनाया। क्या पूरे बिहार में चरित्रवान यानी बेदाग छवि का उम्मीदवार मिला ही नहीं? निश्चित रूप से सर्वोच्च अदालत का फैसला स्वागत योग्य है। सर्वोच्च अदालत के फैसले पर अगर चुनाव आयोग पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से काम करता है तो देश में एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत होगी। अदालत ने अपराधियों के बारे में खूब प्रचार-प्रसार कर जनता को जागरूक करने को कहा है। इसके लिए मीडिया और अन्य संदेश माध्यमों का भी सहारा लेने की बात कही है। अदालत ने राजनीति के अपराधीकरण पर गहरी चिंता भी जताई है। चिंता जताना लाजमी भी है क्योंकि राजनीति में अब एक सामान्य आदमी चाहकर भी प्रवेश नहीं कर सकता है। क्योंकि उसके पास न बाहुबल है और न धनबल। अब सत्ता और सरकारों को लोकतंत्र की पवित्रता और शुचिता से कोई सरोकार नहीं है। सत्ता और सियासत का अब सिर्फ एक ही मकसद रह गया है कि चुनावों में साम, दाम, दंड, भय और भेद के जरिए अधिक सीट निकाल कर सत्ता हासिल की जाय। जिसकी वजह से राजनीति में अपराधियों का प्रवेश हो रहा है। क्योंकि एक बेदाग छवि का व्यक्ति यह सब नहीं कर सकता है। तभी तो राजनीति को 'दाग अच्छे हैं' वाले व्यक्ति पसंद हैं। भारतीय संसद कि शोभा बढ़ाने वाले चालू सत्र में यानी 2019 में चुनकर आए 43 फीसदी माननीय दागी छवि के हैं। जबकि 2004 में यह 24 फीसदी था। लगातार आपराधिक पृष्ठभूमि से लोग संसद पहुंच रहे हैं। 2009 में यह 30 फीसद हो गया जबकि 2014 में यह संख्या 34 फीसदी तक पहुंच गईं। फिर सोचिए संसद का हाल क्या होगा। इस हालात में हंगामा रहित सत्र की कल्पना कैसे की जा सकती है। बेल में बिल नहीं फाड़े जांएगे, माइक नहीं तोड़ी जाएगी, नारेबाजी नहीं होगी, सभापति पर कागज के गोले नहीं डाले जांएगे तो और क्या होगा। राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू सदस्यों के व्यवहार पर आहत दिखे। नायडू ने कहा मुझे आंसू आ गए जबकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा महत्वपूर्ण सत्र हंगामें की भेंट चढ़ गया। करोड़ों रुपए शोर ने निगल लिया। फिर हम कैसी संसद का निर्माण करना चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कुछ खास बातें कहीं हैं जिसका भारतीय राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने कहा है उम्मीदवारों के चयन के 48 घंटे पूर्व राजनीतिक दलों को आपराधिक ब्यौरा प्रकाशित करना होगा। यह ब्यौरा बेवसाइट पर भी प्रकाशित होगा। आयोग एक मोबाइल ऐप बनाएगा जिसमें सम्बंधित दल टिकट पाने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का सारा ब्यौरा रहेगा। इसके अलावा एक और खास फैसले में कहा है कि अब सरकारें माननीयों पर लदे आपराधिक मुकदमों को बगैर उच्च न्यायालय के आदेश के बिना नहीं हटा सकती। इसकी सूचना उच्च न्यायालय को सर्वोच्च अदालत को भी देनी होगी। इसके साथ ही सांसद, विधायकों के मुकदमों को देख रही विशेष अदालतों के न्यायाधीश भी जो सम्बंधित मुकदमों की सुनवाई कर रहे हैं वे अगले आदेश तक बदले नहीं जाएंगे। अदालत की तरफ से आए सभी फैसले राजनीति की पवित्रता बनाए रखने में 'मील का पत्थर' साबित हो सकते हैं, लेकिन जनता को भी अपने मतों का प्रयोग सोच समझ कर करना होगा। हालांकि अभी बहुत परिवर्तन की उम्मीद नहीं कि जा सकती है, लेकिन एक उम्मीद तो है कि आने वाले दिनों में बहुत कुछ अच्छा होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 August 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक मज़हब के नाम पर कितनी पशुता हो सकती है, इसके प्रमाण हमें अफगानिस्तान और पाकिस्तान, हमारे ये दो पड़ोसी दे रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान ने सरकार के प्रमुख प्रवक्ता दावा खान मेनापाल की हत्या उस वक्त कर दी, जो नमाज का वक्त था और उन्होंने पख्तिया नामक प्रांत के एक गुरुद्वारे के ध्वज को उतार डाला। कुछ माह पहले उन्होंने एक सिख नेता का अपहरण कर लिया था और काबुल में 20 सिखों को मार डाला था। यह सब कुकर्म इस्लाम के नाम पर किया गया जबकि कुरान शरीफ कहती है कि मजहब के मामले में जोर-जबरदस्ती की कोई जगह नहीं है। पाकिस्तान में तो मजहब के नाम पर क्या-क्या नहीं हो रहा है? पंजाब प्रांत के भोंग शरीफ इलाके में एक गणेश मंदिर को लोगों ने तोड़फोड़ कर गिरा दिया। यह मंदिर उन्होंने इसलिए गिराया कि वे एक आठ साल के हिंदू बच्चे की एक हरकत से नाराज हो गए थे। उस बच्चे ने किसी मदरसे के पुस्तकालय के गलीचे पर पेशाब कर दिया था। हिंसाप्रेमी लोगों का कहना है कि उस पुस्तकालय में पवित्र ग्रंथ रखे थे। इस छात्र ने वहाँ पेशाब करके धर्मद्रोह का अपराध किया है। उसे ईश निंदा कानून के तहत गिरफ्तार करवा दिया गया लेकिन उसे अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया। इसी कारण लोगों ने गणेश मंदिर को ढहाकर बदला ले लिया। लोग मंदिर पर घंटों हमला करते रहे और पुलिस खड़े-खड़े देखती रही। यह इस बात का प्रमाण है कि मजहबी उन्माद यदि किसी की मति हर लेता है तो किसी को निकम्मा बना देता है लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और सर्वोच्च न्यायालय ने इन मजहबी उग्रवादियों की कड़ी निंदा की है और उन्हें कठोर सजा दिलवाने का इरादा जाहिर किया है। पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश गुलजार अहमद ने पंजाब प्रांत के सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों को भी न्याय के कठघरे में खड़ा कर दिया है। जज अहमद ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा है कि गणेश मंदिर कांड के कारण सारी दुनिया में पाकिस्तान की बदनामी हुई है। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है, जो मजहब के नाम पर बना है। वहां तो मजहब के नाम पर ऐसे काम होने चाहिए, जिनसे इस्लाम का मस्तक ऊँचा हो सके। लेकिन पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को फैलाना, गैर-मुसलमानों को डराना-धमकाना, करोड़ों लोगों को गरीबी की भट्ठी में झोंके रखना उसकी मजबूरी बन गई है। पता नहीं, वह पाकिस्तान, जो कभी हमारे परिवार का ही हिस्सा था, कभी सभ्य और सुसंस्कृत राष्ट्र की तरह जाना जाएगा या नहीं? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 8 August 2021


bhopal, don

  आर.के. सिन्हा टोक्यो ओलंपिक खेलों के श्रीगणेश से पहले किसी भारतीय ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमें ओलंपिक में ऐसा चमत्कारी प्रदर्शन करेंगी। इन दोनों टीमों ने अपने शानदार खेले से सारी दुनिया का ध्यान खींचा। इस सबके बीच महिला टीम की स्टार फॉरवर्ड खिलाड़ी वंदना कटारिया के हरिद्वार के पास रोशनबाद स्थित घर में कुछ गटर छाप मानसिकता के लोगों ने उनकी जाति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर सारे माहौल को विषाक्त कर दिया। इस विवाद के कारण हॉकी टीमों की कामयाबी को नेपथ्य में धकेलने की कोशिशें भी हुई।भारत में इस शर्मनाक घटना से पहले कभी किसी ने खिलाड़ियों की जाति को लेकर कोई छिछोरी टिप्पणी नहीं की थी । खेलों का संसार तो इस तरह का है जहां जाति, लिंग, धर्म आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। दर्शक और खेलप्रेमी उस खिलाड़ी को ही पसंद करते हैं जो लगातार बेहतर खेलता है। उसके प्रदर्शन से देश का नाम बुलंद होता ही है। क्या किसी हिन्दुस्तानी को दादा ध्यानचंद की जाति की जानकारी है ? यदि हो भी तो कोई चर्चा करता है क्या ? क्यों देश टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस को पसंद करता है ? किसने सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर की जाति जानने की चेष्टा की ? किसी ने भी तो नहीं। फिर इसबार वंदना और कुछ अन्य खिलाड़ियों की जाति को लेकर क्यों विवाद खड़ा किया जा रहा है ? यह बड़ा सवाल है।भारत की हॉकी टीम से कुछ साल पहले वाल्मिकी समाज का युवक युवराज वाल्मिकी खेल रहा था। हॉकी के मैदान में सफल होने के लिए जरूरी लय, ताल और गति उसके पास थी। वह कई सालों तक भारत की टीम का स्थायी सदस्य था। परंतु कभी किसी ने उसकी जाति को लेकर सवाल तो नहीं किए। पाकिस्तान के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर युसुफ योहन्ना, जो बाद में धर्म परिवर्तन करके मोहम्मद युनुस बन गए थे, उनका संबंध भी मूल रूप से एक वाल्मिकी परिवार से ही है। हिन्दू धर्म बदलकर ईसाई बनने के बाद भी उनका परिवार लाहौर में सफाईकर्मी के रूप में ही काम करता रहा। योहन्ना से युसूफ बने इतने बेहतरीन खिलाड़ी को कभी पाकिस्तान टीम का कप्तान इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वे वाल्मिकी परिवार से थे। तो यह हाल रहा जात-पात का इस्लाम को मानने वाले पाकिस्तान में।लेकिन, भारत में कभी किसी को किसी खास जाति से संबंध रखने के कारण कोई पद न मिला हो, यह मुमकिन नहीं है। अगर किसी शख्स में किसी पद को हासिल करने की मेरिट है तो वह पद उसे मिलेगा ही। यहां पर इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा है कि हमारे समाज में जाति का कोढ़ अभी भी जिंदा है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि देश और समाज जाति के आधार पर ही चलता है। तो फिर वही सवाल है कि वंदना कटारिया पर नीच टिप्पणियां करने वालों की मंशा क्या थी। सारे मामले की जांच शुरू हो गई है। अब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। यह सच है कि देश के छोटे शहरों में कथित निचली जाति से संबंध रखने वाले लोगों को कुछ दबंग किस्म के लोग प्रताड़ित करते रहते हैं। हालांकि इस तरह के मामले पहले से बहुत कम भी हुए हैं, पर ऐसी घटनाएँ हो तो रही हैं, यह भी सच है।जाति का असर महानगरों और बड़े शहरों में घट रहा है, यह भी सच है। अगर ऐसा नहीं होता तो युवराज वाल्मिकी या वंदना कटारिया जैसे नौजवानों के लिए भारत हॉकी टीम में जगह बनाना संभव नहीं था।कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दू समाज के सामाजिक पिरामिड में वाल्मिकी समाज सबसे निचले पायदान पर है। अपने घर के आसपास की किसी भी वाल्मिकी बस्ती में जाएं तो आपको मालूम चल जाएगा कि यह समाज कितनी विषम परिस्थितियों में जीने के लिए मजबूर है। ये अब भी प्राय: मैला उठाने से लेकर कचरे की सफाई के काम से ही जुड़े हैं। यह इतना महत्वपूर्ण काम भी मेहनत और तन्मयता से करते हैं, वह देखकर मन में सम्मान के भाव के अतिरिक्त कुछ नहीं आ सकता। अगर आप राजधानी में रह रहे हैं तो अंबेडकर स्टेडियम के पीछे बसी वाल्मिकी बस्ती में जाकर देख लें कि भले ही देश आगे बढ़ रहा हो पर इधर रहने वालों की जिंदगी पहले की तरह संघर्षों भरी है। ये न्यूनतम नागरिक सुविधाओं के अभाव में ही रह रहे हैं। पर दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में इन्हें जाति के कारण अपमानित तो नहीं होना पड़ता है न ? मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से मुम्बई में जाकर बस गए परिवार से संबंध रखने वाले युवराज वाल्मिकी की कहानी उन तमाम वाल्मिकी परिवार के नौजवानों की कहानी से मिलती-जुलती ही है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता दर्ज की।बहरहाल, कभी-कभी मन बहुत उदास हो जाता है कि हमारे यहां कुछ विक्षिप्त तत्व पूर्वोत्तर के नागरिकों से लेकर अफ्रीकी नागरिकों पर भी बेशर्मी से टिप्पणियां करते हैं। इन्हें अपने घटिया आचरण पर शर्म भी नहीं आती। ये लोग पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों को चीनी या जापानी कह देते हैं। जरा सोचें कि जिन्हें चीनी या जापानी कहा जा रहा है, उनके दिल पर क्या गुजरती होगी। इस तरह के तत्वों पर भी कड़ा एक्शन होना चाहिए। जरा यह भी सोचें कि जिनकी जाति को उछाला जाता है, उन्हें कितना मानसिक कष्ट होता होगा। जिस वंदना कटारिया ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ लगातार तीन गोल करके कीर्तिमान बनाया, उसके साथ कितना भयंकर अन्याय हो रहा है। जिन लोगों ने वंदना कटारिया के घर के बाहर जाकर अराजकता की और जातिसूचक टिप्पणियां कीं उन सबके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज किया है। दो आरोपियों विजयपाल और अंकुरपाल को गिरफ्तार भी कर लिया गया है।देखिए, अब इस देश में नस्लीय टिप्पणियों को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। जो भी शख्स इन हरकतों में लिप्त पाया जाएगा उसे कठोर दंड हर हाल में मिलना चाहिए। यह सुखद स्थिति नहीं है कि जब देश कुछ दिनों बाद अपनी आजादी की 75 वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियां कर रहा है तब भी हमारे यहां जाति के कोढ़ का स्याह चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी भी सभ्य समाज में जाति के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

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Dakhal News 8 August 2021


bhopal, don

  आर.के. सिन्हा टोक्यो ओलंपिक खेलों के श्रीगणेश से पहले किसी भारतीय ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमें ओलंपिक में ऐसा चमत्कारी प्रदर्शन करेंगी। इन दोनों टीमों ने अपने शानदार खेले से सारी दुनिया का ध्यान खींचा। इस सबके बीच महिला टीम की स्टार फॉरवर्ड खिलाड़ी वंदना कटारिया के हरिद्वार के पास रोशनबाद स्थित घर में कुछ गटर छाप मानसिकता के लोगों ने उनकी जाति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर सारे माहौल को विषाक्त कर दिया। इस विवाद के कारण हॉकी टीमों की कामयाबी को नेपथ्य में धकेलने की कोशिशें भी हुई।भारत में इस शर्मनाक घटना से पहले कभी किसी ने खिलाड़ियों की जाति को लेकर कोई छिछोरी टिप्पणी नहीं की थी । खेलों का संसार तो इस तरह का है जहां जाति, लिंग, धर्म आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। दर्शक और खेलप्रेमी उस खिलाड़ी को ही पसंद करते हैं जो लगातार बेहतर खेलता है। उसके प्रदर्शन से देश का नाम बुलंद होता ही है। क्या किसी हिन्दुस्तानी को दादा ध्यानचंद की जाति की जानकारी है ? यदि हो भी तो कोई चर्चा करता है क्या ? क्यों देश टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस को पसंद करता है ? किसने सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर की जाति जानने की चेष्टा की ? किसी ने भी तो नहीं। फिर इसबार वंदना और कुछ अन्य खिलाड़ियों की जाति को लेकर क्यों विवाद खड़ा किया जा रहा है ? यह बड़ा सवाल है।भारत की हॉकी टीम से कुछ साल पहले वाल्मिकी समाज का युवक युवराज वाल्मिकी खेल रहा था। हॉकी के मैदान में सफल होने के लिए जरूरी लय, ताल और गति उसके पास थी। वह कई सालों तक भारत की टीम का स्थायी सदस्य था। परंतु कभी किसी ने उसकी जाति को लेकर सवाल तो नहीं किए। पाकिस्तान के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर युसुफ योहन्ना, जो बाद में धर्म परिवर्तन करके मोहम्मद युनुस बन गए थे, उनका संबंध भी मूल रूप से एक वाल्मिकी परिवार से ही है। हिन्दू धर्म बदलकर ईसाई बनने के बाद भी उनका परिवार लाहौर में सफाईकर्मी के रूप में ही काम करता रहा। योहन्ना से युसूफ बने इतने बेहतरीन खिलाड़ी को कभी पाकिस्तान टीम का कप्तान इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वे वाल्मिकी परिवार से थे। तो यह हाल रहा जात-पात का इस्लाम को मानने वाले पाकिस्तान में।लेकिन, भारत में कभी किसी को किसी खास जाति से संबंध रखने के कारण कोई पद न मिला हो, यह मुमकिन नहीं है। अगर किसी शख्स में किसी पद को हासिल करने की मेरिट है तो वह पद उसे मिलेगा ही। यहां पर इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा है कि हमारे समाज में जाति का कोढ़ अभी भी जिंदा है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि देश और समाज जाति के आधार पर ही चलता है। तो फिर वही सवाल है कि वंदना कटारिया पर नीच टिप्पणियां करने वालों की मंशा क्या थी। सारे मामले की जांच शुरू हो गई है। अब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। यह सच है कि देश के छोटे शहरों में कथित निचली जाति से संबंध रखने वाले लोगों को कुछ दबंग किस्म के लोग प्रताड़ित करते रहते हैं। हालांकि इस तरह के मामले पहले से बहुत कम भी हुए हैं, पर ऐसी घटनाएँ हो तो रही हैं, यह भी सच है।जाति का असर महानगरों और बड़े शहरों में घट रहा है, यह भी सच है। अगर ऐसा नहीं होता तो युवराज वाल्मिकी या वंदना कटारिया जैसे नौजवानों के लिए भारत हॉकी टीम में जगह बनाना संभव नहीं था।कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दू समाज के सामाजिक पिरामिड में वाल्मिकी समाज सबसे निचले पायदान पर है। अपने घर के आसपास की किसी भी वाल्मिकी बस्ती में जाएं तो आपको मालूम चल जाएगा कि यह समाज कितनी विषम परिस्थितियों में जीने के लिए मजबूर है। ये अब भी प्राय: मैला उठाने से लेकर कचरे की सफाई के काम से ही जुड़े हैं। यह इतना महत्वपूर्ण काम भी मेहनत और तन्मयता से करते हैं, वह देखकर मन में सम्मान के भाव के अतिरिक्त कुछ नहीं आ सकता। अगर आप राजधानी में रह रहे हैं तो अंबेडकर स्टेडियम के पीछे बसी वाल्मिकी बस्ती में जाकर देख लें कि भले ही देश आगे बढ़ रहा हो पर इधर रहने वालों की जिंदगी पहले की तरह संघर्षों भरी है। ये न्यूनतम नागरिक सुविधाओं के अभाव में ही रह रहे हैं। पर दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में इन्हें जाति के कारण अपमानित तो नहीं होना पड़ता है न ? मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से मुम्बई में जाकर बस गए परिवार से संबंध रखने वाले युवराज वाल्मिकी की कहानी उन तमाम वाल्मिकी परिवार के नौजवानों की कहानी से मिलती-जुलती ही है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता दर्ज की।बहरहाल, कभी-कभी मन बहुत उदास हो जाता है कि हमारे यहां कुछ विक्षिप्त तत्व पूर्वोत्तर के नागरिकों से लेकर अफ्रीकी नागरिकों पर भी बेशर्मी से टिप्पणियां करते हैं। इन्हें अपने घटिया आचरण पर शर्म भी नहीं आती। ये लोग पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों को चीनी या जापानी कह देते हैं। जरा सोचें कि जिन्हें चीनी या जापानी कहा जा रहा है, उनके दिल पर क्या गुजरती होगी। इस तरह के तत्वों पर भी कड़ा एक्शन होना चाहिए। जरा यह भी सोचें कि जिनकी जाति को उछाला जाता है, उन्हें कितना मानसिक कष्ट होता होगा। जिस वंदना कटारिया ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ लगातार तीन गोल करके कीर्तिमान बनाया, उसके साथ कितना भयंकर अन्याय हो रहा है। जिन लोगों ने वंदना कटारिया के घर के बाहर जाकर अराजकता की और जातिसूचक टिप्पणियां कीं उन सबके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज किया है। दो आरोपियों विजयपाल और अंकुरपाल को गिरफ्तार भी कर लिया गया है।देखिए, अब इस देश में नस्लीय टिप्पणियों को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। जो भी शख्स इन हरकतों में लिप्त पाया जाएगा उसे कठोर दंड हर हाल में मिलना चाहिए। यह सुखद स्थिति नहीं है कि जब देश कुछ दिनों बाद अपनी आजादी की 75 वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियां कर रहा है तब भी हमारे यहां जाति के कोढ़ का स्याह चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी भी सभ्य समाज में जाति के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

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Dakhal News 8 August 2021


bhopal, Ban on Chinese manja,very important

रंजना मिश्रा कुछ खास अवसरों जैसे स्वतंत्रता दिवस, मकर संक्रांति, रक्षाबंधन आदि पर पतंगबाजी का शौक लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। हमारे देश में पतंग उड़ाने की परंपरा रही है और यह परंपरा आज भी कायम है, किंतु लोगों का यह शौक तब जानलेवा बन जाता है, जब पतंग के शौकीन एक-दूसरे की पतंग काटने के लिए चाइनीज मांझे का इस्तेमाल करते हैं। चाइनीज मांझा पतंग की वह डोर है जो इतनी खतरनाक होती है कि किसी भी इंसान का गला तक काट सकती है और उस व्यक्ति की दर्दनाक मौत हो जाती है। यह चाइनीज मांझा खंजर से भी ज्यादा तेज धार का होता है। पल भर में लोगों को अपना शिकार बना लेता है, इसीलिए अब इसे मौत की डोर कहा जाने लगा है। जगह-जगह बिकने वाला मौत का यह मांझा जहां पतंगबाजों के लिए खुशी लेकर आता है, वहीं यह राहगीरों का दुश्मन है। ऐसा दुश्मन जो किसी राहगीर को दिखाई तक नहीं देता। खास अवसरों पर पतंगबाजी के लिए इसका खूब प्रयोग किया जाता है। पतंग उड़ाने वाले अक्सर मजबूत धागे वाले मांझे खरीदते हैं ताकि कोई उनकी पतंग को काट न सके। आसमान में तो उनकी पतंग को कोई काट नहीं पाता लेकिन उनकी यह डोर लोगों के गले जरूर काट देती है।चाइनीज मांझा दिल्ली में 10 जनवरी 2017 से बैन है, किंतु कुछ लोगों का शौक और सिस्टम की लापरवाही की पतंग, जब कातिल मांझे के दम पर उड़ान भरती है तो खामियाजा किसी बेगुनाह को उठाना पड़ता है, इसी वजह से हर वर्ष चाइनीज मांझे के कारण कई लोगों को देश में जान गंवानी पड़ती है। केवल चाइनीज मांझा ही नहीं इसके अलावा और भी बहुत से खतरनाक मांझे बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। चाइनीज मांझे के इस्तेमाल, बिक्री और स्टॉक पर प्रतिबंध है, इसके बावजूद इसकी बिक्री और खरीद बंद नहीं हो रही और इससे होने वाले हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे। बैन के बावजूद राजधानी दिल्ली में भी चीनी मांझा धड़ल्ले से बिकता है। कई पतंगबाज लगातार इस प्रतिबंधित मांझे का इस्तेमाल कर लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसकी चपेट में आकर पिछले सालों में कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, हजारों की तादाद में पंछी हर साल जख्मी होते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद अब सड़कों पर चहल-पहल बढ़ गई है, ऐसे में यह कातिल मांझा अगर यूं ही बिकता रहा तो पतंग उड़ाने वाले सीजन में यह कई जानलेवा हादसों को अंजाम दे सकता है।नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जुलाई 2017 में खतरनाक चीनी मांझे की बिक्री पर पूरे देश में बैन लगा दिया था। पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल (पीटा) की अर्जी पर यह आदेश किया गया था। मांझा बनाने वाली कंपनियां सुप्रीम कोर्ट भी गईं, लेकिन उन्हें वहां से राहत नहीं मिली। हौज काजी का लालकुआं, जाफराबाद, सदर, लाहौरी गेट इलाका पतंग मांझा का बड़ा बाजार है, अब मांझा चीन से नहीं बल्कि तेज धार के साथ देश में ही बन रहा है। दिल्ली से सटे नोएडा में इसकी फैक्ट्रियां हैं, जहां यह धड़ल्ले से बन रहा है, इसकी दिल्ली के बाजारों में भी सप्लाई हो रही है।एक तरफ जहां इस मांझे से सड़क चलते लोगों के गाल और गले कट रहे हैं, वहीं ये चाइनीज दुश्मन लखनऊ मेट्रो को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है। लखनऊ में चाइनीज मांझे की बिक्री धड़ल्ले से जारी है। त्योहारों के दौरान पतंगबाजी बढ़ती है और चाइनीज मांझे की बिक्री भी। चाइनीज मांझे से लैस पतंग जब मेट्रो के ओएचई लाइन पर गिरती है तो पूरी लाइन ही ट्रिप कर जाती है, जिससे मेट्रो को घंटों खड़े रहना पड़ता है और मुसाफिर परेशान होते हैं। मेट्रो विकास की पहचान बन रहा है पर पतंग के शौकीनों का चाइनीज मांझे से लगाव समाप्त न हो पाने के कारण, महज कुछ रुपए के मांझे ने हजारों करोड़ की मेट्रो को रोककर नया सरदर्द दे दिया है।साधारण मांझा धागे से बनता है और उस पर कांच की लेयर चढ़ाई जाती है, यह भी काफी खतरनाक होता है लेकिन ये आसानी से टूट जाता है, ऐसे में इसे कम खतरनाक माना जाता है, किंतु चाइनीज मांझे में प्लास्टिक, नायलॉन और लोहे का बुरादा मिला होता है। विभिन्न धातुओं के मिश्रण से तैयार होने से यह पतंग के पेंच लड़ाने में अधिक कारगर होता है इसीलिए अब इसका प्रयोग अधिक किया जाने लगा है। विभिन्न धातुओं के मिश्रण से बने होने के कारण यह बेहद धारदार और विद्युत सुचालक होता है, इसके उपयोग के दौरान दुपहिया वाहन चालकों और पक्षियों के जानमाल का नुकसान होता है। यह मांझा जब बिजली के तारों के संपर्क में आता है तो विद्युत सुचालक होने के कारण यह पतंगबाजी करने वालों के लिए भी जानलेवा साबित होता है और इससे बिजली की सप्लाई में भी बाधा पहुंचती है। कई बार दो तारों के बीच इस धागे के संपर्क से शॉर्ट सर्किट भी हो जाते हैं। इसलिए सरकार ने धातु वाले मांझे और चाइनीज मांझे की थोक और खुदरा बिक्री या इसके उपयोग पर प्रतिबंध का आदेश जारी कर दिया है।यह मांझा मजबूत होने के साथ-साथ सस्ता भी होता है। चाइनीज मांझे पर दुकानदारों को मार्जिन भी ज्यादा है। एक रील सूती मांझे और चाइनीज मांझे में लगभग 500 से 700 रुपए का अंतर है। जब लोग पतंग उड़ाते हैं तो उनका लक्ष्य होता है कि उनकी पतंग कोई काट ना पाए और वो ज्यादा से ज्यादा दूसरों की पतंग काटें, ऐसे में वो इस मांझे को पसंद करते हैं और इससे पतंग उड़ाते हैं, क्योंकि दूसरे पतंग वालों के लिए इस मांझे को काटना थोड़ा मुश्किल होता है, यह आसानी से टूटता नहीं है और लंबे समय तक इससे पतंग उड़ाई जा सकती है।मनोरंजन जब इंसान और बेजुबानों की जान के लिए खतरा बन जाए तो उसे बंद कर देना ही अच्छा होता है। जब से चाइनीज मांझा देश में आया, तब से कितने ही बच्चों, बड़ों और बेजुबान पक्षियों की जान ले चुका तथा कितनों को ही घायल कर चुका है, अतः इस पर अब पूरी तरह से रोक लगना बहुत आवश्यक है। इसके लिए सरकार और प्रशासन को अत्यधिक सचेत होना पड़ेगा और चोरी-छुपे इस मांझे को बनाने, बेचने और खरीदने वालों पर कड़ी कार्रवाई करनी पड़ेगी। जहां-जहां इस मांझे को बनाने की फैक्ट्रियां हैं, वहां छापा मारकर बनाने वालों को पकड़ना चाहिए। उन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए और उन्हें सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति आगे से चोरी छुपे यह काम ना कर सके। जानलेवा होने के बावजूद जो लोग महज अपने थोड़े से मनोरंजन के लिए, इसके प्रयोग को बंद नहीं कर रहे हैं और जो दुकानदार बैन होने के बावजूद इसकी धड़ल्ले से बिक्री कर रहे हैं, उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाने की आवश्यकता है।लोगों को भी जागरूक बनना होगा और उन्हें इसके प्रयोग से बचना होगा। बाजार से चाइनीज मांझे की बजाय सामान्य मांझा ही खरीदना चाहिए। बच्चों और अन्य लोगों को इससे होने वाले नुकसान और खतरे से अवगत कराना चाहिए। बड़ों को इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि बच्चे किस प्रकार के मांझे का प्रयोग कर रहे हैं। पतंग के कहीं उलझने या टकराने पर उसे खींचने का प्रयास नहीं करना चाहिए, इससे संबंधित वस्तु को नुकसान पहुंच सकता है। सुरक्षित स्थान पर खड़े रहकर पतंग उड़ाना चाहिए और इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मांझा किसी को स्पर्श ना कर सके, इससे आसपास के लोग सुरक्षित रहेंगे। बच्चों को बीच सड़क पर पतंग न उड़ाने दें। जहां बिजली के तार और खंभे लगे हों, ऐसी जगह पर भी पतंगबाजी नहीं करनी चाहिए। पतंग उड़ाने के लिए कम चहल-पहल वाली जगह ही चुनें, वरना पतंग उड़ाते समय बार-बार डोर फंसती है और ऐसे में कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। प्रशासन के कड़े निर्देशों के बावजूद जो लोग इसका प्रयोग करते पाए जाएं, उनकी सूचना पुलिस को देनी अनिवार्य है, अन्यथा ये दुर्घटनाएं कभी थमने का नाम नहीं लेंगी।(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 August 2021


bhopal, Ban on Chinese manja,very important

रंजना मिश्रा कुछ खास अवसरों जैसे स्वतंत्रता दिवस, मकर संक्रांति, रक्षाबंधन आदि पर पतंगबाजी का शौक लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। हमारे देश में पतंग उड़ाने की परंपरा रही है और यह परंपरा आज भी कायम है, किंतु लोगों का यह शौक तब जानलेवा बन जाता है, जब पतंग के शौकीन एक-दूसरे की पतंग काटने के लिए चाइनीज मांझे का इस्तेमाल करते हैं। चाइनीज मांझा पतंग की वह डोर है जो इतनी खतरनाक होती है कि किसी भी इंसान का गला तक काट सकती है और उस व्यक्ति की दर्दनाक मौत हो जाती है। यह चाइनीज मांझा खंजर से भी ज्यादा तेज धार का होता है। पल भर में लोगों को अपना शिकार बना लेता है, इसीलिए अब इसे मौत की डोर कहा जाने लगा है। जगह-जगह बिकने वाला मौत का यह मांझा जहां पतंगबाजों के लिए खुशी लेकर आता है, वहीं यह राहगीरों का दुश्मन है। ऐसा दुश्मन जो किसी राहगीर को दिखाई तक नहीं देता। खास अवसरों पर पतंगबाजी के लिए इसका खूब प्रयोग किया जाता है। पतंग उड़ाने वाले अक्सर मजबूत धागे वाले मांझे खरीदते हैं ताकि कोई उनकी पतंग को काट न सके। आसमान में तो उनकी पतंग को कोई काट नहीं पाता लेकिन उनकी यह डोर लोगों के गले जरूर काट देती है।चाइनीज मांझा दिल्ली में 10 जनवरी 2017 से बैन है, किंतु कुछ लोगों का शौक और सिस्टम की लापरवाही की पतंग, जब कातिल मांझे के दम पर उड़ान भरती है तो खामियाजा किसी बेगुनाह को उठाना पड़ता है, इसी वजह से हर वर्ष चाइनीज मांझे के कारण कई लोगों को देश में जान गंवानी पड़ती है। केवल चाइनीज मांझा ही नहीं इसके अलावा और भी बहुत से खतरनाक मांझे बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। चाइनीज मांझे के इस्तेमाल, बिक्री और स्टॉक पर प्रतिबंध है, इसके बावजूद इसकी बिक्री और खरीद बंद नहीं हो रही और इससे होने वाले हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे। बैन के बावजूद राजधानी दिल्ली में भी चीनी मांझा धड़ल्ले से बिकता है। कई पतंगबाज लगातार इस प्रतिबंधित मांझे का इस्तेमाल कर लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसकी चपेट में आकर पिछले सालों में कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, हजारों की तादाद में पंछी हर साल जख्मी होते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद अब सड़कों पर चहल-पहल बढ़ गई है, ऐसे में यह कातिल मांझा अगर यूं ही बिकता रहा तो पतंग उड़ाने वाले सीजन में यह कई जानलेवा हादसों को अंजाम दे सकता है।नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जुलाई 2017 में खतरनाक चीनी मांझे की बिक्री पर पूरे देश में बैन लगा दिया था। पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल (पीटा) की अर्जी पर यह आदेश किया गया था। मांझा बनाने वाली कंपनियां सुप्रीम कोर्ट भी गईं, लेकिन उन्हें वहां से राहत नहीं मिली। हौज काजी का लालकुआं, जाफराबाद, सदर, लाहौरी गेट इलाका पतंग मांझा का बड़ा बाजार है, अब मांझा चीन से नहीं बल्कि तेज धार के साथ देश में ही बन रहा है। दिल्ली से सटे नोएडा में इसकी फैक्ट्रियां हैं, जहां यह धड़ल्ले से बन रहा है, इसकी दिल्ली के बाजारों में भी सप्लाई हो रही है।एक तरफ जहां इस मांझे से सड़क चलते लोगों के गाल और गले कट रहे हैं, वहीं ये चाइनीज दुश्मन लखनऊ मेट्रो को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है। लखनऊ में चाइनीज मांझे की बिक्री धड़ल्ले से जारी है। त्योहारों के दौरान पतंगबाजी बढ़ती है और चाइनीज मांझे की बिक्री भी। चाइनीज मांझे से लैस पतंग जब मेट्रो के ओएचई लाइन पर गिरती है तो पूरी लाइन ही ट्रिप कर जाती है, जिससे मेट्रो को घंटों खड़े रहना पड़ता है और मुसाफिर परेशान होते हैं। मेट्रो विकास की पहचान बन रहा है पर पतंग के शौकीनों का चाइनीज मांझे से लगाव समाप्त न हो पाने के कारण, महज कुछ रुपए के मांझे ने हजारों करोड़ की मेट्रो को रोककर नया सरदर्द दे दिया है।साधारण मांझा धागे से बनता है और उस पर कांच की लेयर चढ़ाई जाती है, यह भी काफी खतरनाक होता है लेकिन ये आसानी से टूट जाता है, ऐसे में इसे कम खतरनाक माना जाता है, किंतु चाइनीज मांझे में प्लास्टिक, नायलॉन और लोहे का बुरादा मिला होता है। विभिन्न धातुओं के मिश्रण से तैयार होने से यह पतंग के पेंच लड़ाने में अधिक कारगर होता है इसीलिए अब इसका प्रयोग अधिक किया जाने लगा है। विभिन्न धातुओं के मिश्रण से बने होने के कारण यह बेहद धारदार और विद्युत सुचालक होता है, इसके उपयोग के दौरान दुपहिया वाहन चालकों और पक्षियों के जानमाल का नुकसान होता है। यह मांझा जब बिजली के तारों के संपर्क में आता है तो विद्युत सुचालक होने के कारण यह पतंगबाजी करने वालों के लिए भी जानलेवा साबित होता है और इससे बिजली की सप्लाई में भी बाधा पहुंचती है। कई बार दो तारों के बीच इस धागे के संपर्क से शॉर्ट सर्किट भी हो जाते हैं। इसलिए सरकार ने धातु वाले मांझे और चाइनीज मांझे की थोक और खुदरा बिक्री या इसके उपयोग पर प्रतिबंध का आदेश जारी कर दिया है।यह मांझा मजबूत होने के साथ-साथ सस्ता भी होता है। चाइनीज मांझे पर दुकानदारों को मार्जिन भी ज्यादा है। एक रील सूती मांझे और चाइनीज मांझे में लगभग 500 से 700 रुपए का अंतर है। जब लोग पतंग उड़ाते हैं तो उनका लक्ष्य होता है कि उनकी पतंग कोई काट ना पाए और वो ज्यादा से ज्यादा दूसरों की पतंग काटें, ऐसे में वो इस मांझे को पसंद करते हैं और इससे पतंग उड़ाते हैं, क्योंकि दूसरे पतंग वालों के लिए इस मांझे को काटना थोड़ा मुश्किल होता है, यह आसानी से टूटता नहीं है और लंबे समय तक इससे पतंग उड़ाई जा सकती है।मनोरंजन जब इंसान और बेजुबानों की जान के लिए खतरा बन जाए तो उसे बंद कर देना ही अच्छा होता है। जब से चाइनीज मांझा देश में आया, तब से कितने ही बच्चों, बड़ों और बेजुबान पक्षियों की जान ले चुका तथा कितनों को ही घायल कर चुका है, अतः इस पर अब पूरी तरह से रोक लगना बहुत आवश्यक है। इसके लिए सरकार और प्रशासन को अत्यधिक सचेत होना पड़ेगा और चोरी-छुपे इस मांझे को बनाने, बेचने और खरीदने वालों पर कड़ी कार्रवाई करनी पड़ेगी। जहां-जहां इस मांझे को बनाने की फैक्ट्रियां हैं, वहां छापा मारकर बनाने वालों को पकड़ना चाहिए। उन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए और उन्हें सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति आगे से चोरी छुपे यह काम ना कर सके। जानलेवा होने के बावजूद जो लोग महज अपने थोड़े से मनोरंजन के लिए, इसके प्रयोग को बंद नहीं कर रहे हैं और जो दुकानदार बैन होने के बावजूद इसकी धड़ल्ले से बिक्री कर रहे हैं, उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाने की आवश्यकता है।लोगों को भी जागरूक बनना होगा और उन्हें इसके प्रयोग से बचना होगा। बाजार से चाइनीज मांझे की बजाय सामान्य मांझा ही खरीदना चाहिए। बच्चों और अन्य लोगों को इससे होने वाले नुकसान और खतरे से अवगत कराना चाहिए। बड़ों को इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि बच्चे किस प्रकार के मांझे का प्रयोग कर रहे हैं। पतंग के कहीं उलझने या टकराने पर उसे खींचने का प्रयास नहीं करना चाहिए, इससे संबंधित वस्तु को नुकसान पहुंच सकता है। सुरक्षित स्थान पर खड़े रहकर पतंग उड़ाना चाहिए और इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मांझा किसी को स्पर्श ना कर सके, इससे आसपास के लोग सुरक्षित रहेंगे। बच्चों को बीच सड़क पर पतंग न उड़ाने दें। जहां बिजली के तार और खंभे लगे हों, ऐसी जगह पर भी पतंगबाजी नहीं करनी चाहिए। पतंग उड़ाने के लिए कम चहल-पहल वाली जगह ही चुनें, वरना पतंग उड़ाते समय बार-बार डोर फंसती है और ऐसे में कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। प्रशासन के कड़े निर्देशों के बावजूद जो लोग इसका प्रयोग करते पाए जाएं, उनकी सूचना पुलिस को देनी अनिवार्य है, अन्यथा ये दुर्घटनाएं कभी थमने का नाम नहीं लेंगी।(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 August 2021


bhopal,Increase in Lok Sabha seats, need of the hour?

डॉ. रमेश ठाकुर संसद भवन को बड़ा आकार क्यों दिया जा रहा है और नए आधुनिक निर्माणाधीन संसद को बनाने में क्यों तेजी दिखाई जा रही है, इसकी सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। बताते हैं कि अगले आम चुनाव से पहले लोकसभा सीटें बढ़ाने का खाका तैयार हो चुका है। वर्तमान की 543 सीटों को बढ़ाकर 1000 तक करने की सुगबुगाहट तेज है। अंदरखाने मसौदा भी तैयार होने की बात कही जा रही है। ये बात पिछले दिनों कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने अपने ट्वीट के जरिए सार्वजनिक भी कर दी। उनका दावा है कि वर्ष 2024 के पहले लोकसभा सीटों की वर्तमान संख्या 543 को बढ़ाकर 1000 या उससे अधिक करने को लेकर मोदी सरकार पूरी तरह से मन बना चुकी है। हालांकि इस मसौदे पर सरकार अभी शांत है। बहरहाल, सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी की वकालत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी कर चुके हैं। उन्होंने बाकायदा पिछले दिनों एक साक्षात्कार में कहा भी था कि भविष्य में सांसदों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। सांसदों की बढ़ोतरी की स्थिति निर्माणाधीन संसद भवन की जरूरत पर मोहर लगाने के लिए काफी है। वैसे, देखा जाए तो कई जिले ऐसे हैं जहां एक सांसद 16 लाख से 20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए संसदीय क्षेत्र को छोटा करना समय की दरकार भी है। सरकार को बढ़ती आबादी के अनुपात के हिसाब से लोकसभा-राज्यसभा की सीटों को बढ़ाना-घटाना चाहिए। शायद इस निर्णय में किसी दल या राजनेता को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए। सवाल उठता है कि अगर सांसदों की संख्या बढ़ती है तो वह बैठेंगे कहां? मौजूदा संसद में इतना स्पेस है नहीं। इसलिए संसद भवन को बड़े आकार में परिवर्तित किया जा रहा है। नए निर्माणाधीन संसद में करीब तेरह सौ सांसदों की बैठने की व्यवस्था होगी। इस वक्त दोनों सदनों लोकसभा-राज्यसभा में 543 और 245 सदस्य हैं यानी कुल 788 सदस्य, जिन्हें भविष्य में 1300 करने का प्लान है। इजाफा वाले सदस्य भी नवीनतम संसद में आसानी से बैठ सकेंगे। सांसदों की संख्या बढ़ाने को लेकर आवाजें पहले भी उठती रही हैं। अटल बिहारी वाजपेयी भी चाहते थे। जनसंख्या की बढ़ोतरी जिस हिसाब से हो रही है उससे यह मांग कुछ व्यवहारिक लगती है। लेकिन फिर भी सांसदों की संख्या में इजाफा वाला मसला बेहद संजीदा है जिस पर सामूहिक तौर पर सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आकर गंभीरता से विमर्श करना होगा। हिंदुस्तान में बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य भी होता जा रहा है। देश में कई संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी आबादी कई लाखों में हो गई। ऐसे विशालकाय क्षेत्रों का विभाजन करना जरूरी है। फिर भी सदस्यों की बढ़ोतरी के संभावित दुष्परिणामों की गंभीरता पर विमर्श करना होगा। इसे लेकर पी. चिदम्बरम ने भी अपनी व्यक्तिगत चिंता जताई है, कहते हैं यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ती है तो इससे संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होगा, जो स्वीकार्य नहीं होगा। हालांकि ऐसा कुछ होगा नहीं, इसमें सबका भला एक जैसा होगा।गौरतलब है कि 'सेंट्रल विस्टा परियोजना' के तहत बनाई जा रही नई संसद अगले साल 15 अगस्त को आजादी की 75 वीं सालगिरह पर बनकर तैयार होने की संभावना है। ऐसा पहली मर्तबा होगा जब इतनी बड़ी परियोजना कम समय में और तय वक्त में तैयार होगी। परियोजना पर प्रधानमंत्री की सीधी नजर है, प्रत्येक सप्ताह वह कार्ययोजना की समीक्षा करते हैं। हर काम उनकी देखरेख में संपन्न हो रहा है। संसद का नया भवन 65 हजार वर्ग मीटर में बन रहा है जिसे गुजरात की एचसीपी डिजाइन, प्लानिंग एंड मैनेजमेंट कंपनी ने डिजाइन किया है। वर्तमान संसद भवन में 788 सदस्य बैठते हैं। लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या अंतिम बार 1977 में तय हुई थी, तब देश की आबादी करीब 55 करोड़ थी। आपातकाल में संविधान संशोधन विधेयक लाकर लोकसभा सदस्य संख्या 543 पर फ्रीज कर दी गई थी। यानी उस वक्त औसतन प्रति 10 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता था तो अब प्रति 25 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी सीटों के पुनर्आवंटन को वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया था। उसके बाद सीटों का परिसीमन तो हुआ, लेकिन सीटों की संख्या वही रखी गई। सीटें बढ़ाने का काम पहले ही हो जाना चाहिए था।बहरहाल, छिटपुट तरीके से समय-समय पर हिंदुस्तान में कई बार लोकसभा-विघानसभाओं का परिसीमन हुआ। जबकि, सभी का परिसीमन एकसाथ किया जाना चाहिए था। नई लोकसभा सीटों का गठन और उनकी सीमाओं का निर्धारण परिसीमन आयोग करता है। देश में अबतक ऐसे चार परिसीमन आयोग गठित हुए हैं। पहला परिसीमन आयोग 1952 में बना था। उसके बाद 1963 व 1973 और अंतिम परिसीमन आयोग 2002 में बना था। इसी आयोग ने 2001 की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों की सीमाओं का पुनर्निधारण और पुनर्संयोजन किया था। मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी है अगर सांसदों का जनसंख्या वार आनुपातिक प्रतिनिधित्व निकाला जाए तो हिंदुस्तान में यह औसतन प्रति 25 लाख पर एक लोकसभा सांसद बैठता है। संविधान के अनुच्छेद 82 में हमारे संविधान निर्माताओं ने वक्त और आबादी के हिसाब से लोकसभा सदस्य संख्या में वृद्धि का प्रावधान किया हुआ है। यकीनन आबादी के अनुपात जनप्रतिनिधियों और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़नी ही चाहिए। लेकिन सीटों की संख्या का निर्धारण बहुत व्यावहारिक, समानुपाती और सर्वसमावेशी होना चाहिए। सीटें बढ़ाने के लिए कानूनी व संवेधानिक सभी बातों का ख्याल रखना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 August 2021


bhopal,Increase in Lok Sabha seats, need of the hour?

डॉ. रमेश ठाकुर संसद भवन को बड़ा आकार क्यों दिया जा रहा है और नए आधुनिक निर्माणाधीन संसद को बनाने में क्यों तेजी दिखाई जा रही है, इसकी सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। बताते हैं कि अगले आम चुनाव से पहले लोकसभा सीटें बढ़ाने का खाका तैयार हो चुका है। वर्तमान की 543 सीटों को बढ़ाकर 1000 तक करने की सुगबुगाहट तेज है। अंदरखाने मसौदा भी तैयार होने की बात कही जा रही है। ये बात पिछले दिनों कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने अपने ट्वीट के जरिए सार्वजनिक भी कर दी। उनका दावा है कि वर्ष 2024 के पहले लोकसभा सीटों की वर्तमान संख्या 543 को बढ़ाकर 1000 या उससे अधिक करने को लेकर मोदी सरकार पूरी तरह से मन बना चुकी है। हालांकि इस मसौदे पर सरकार अभी शांत है। बहरहाल, सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी की वकालत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी कर चुके हैं। उन्होंने बाकायदा पिछले दिनों एक साक्षात्कार में कहा भी था कि भविष्य में सांसदों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। सांसदों की बढ़ोतरी की स्थिति निर्माणाधीन संसद भवन की जरूरत पर मोहर लगाने के लिए काफी है। वैसे, देखा जाए तो कई जिले ऐसे हैं जहां एक सांसद 16 लाख से 20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए संसदीय क्षेत्र को छोटा करना समय की दरकार भी है। सरकार को बढ़ती आबादी के अनुपात के हिसाब से लोकसभा-राज्यसभा की सीटों को बढ़ाना-घटाना चाहिए। शायद इस निर्णय में किसी दल या राजनेता को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए। सवाल उठता है कि अगर सांसदों की संख्या बढ़ती है तो वह बैठेंगे कहां? मौजूदा संसद में इतना स्पेस है नहीं। इसलिए संसद भवन को बड़े आकार में परिवर्तित किया जा रहा है। नए निर्माणाधीन संसद में करीब तेरह सौ सांसदों की बैठने की व्यवस्था होगी। इस वक्त दोनों सदनों लोकसभा-राज्यसभा में 543 और 245 सदस्य हैं यानी कुल 788 सदस्य, जिन्हें भविष्य में 1300 करने का प्लान है। इजाफा वाले सदस्य भी नवीनतम संसद में आसानी से बैठ सकेंगे। सांसदों की संख्या बढ़ाने को लेकर आवाजें पहले भी उठती रही हैं। अटल बिहारी वाजपेयी भी चाहते थे। जनसंख्या की बढ़ोतरी जिस हिसाब से हो रही है उससे यह मांग कुछ व्यवहारिक लगती है। लेकिन फिर भी सांसदों की संख्या में इजाफा वाला मसला बेहद संजीदा है जिस पर सामूहिक तौर पर सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आकर गंभीरता से विमर्श करना होगा। हिंदुस्तान में बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य भी होता जा रहा है। देश में कई संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी आबादी कई लाखों में हो गई। ऐसे विशालकाय क्षेत्रों का विभाजन करना जरूरी है। फिर भी सदस्यों की बढ़ोतरी के संभावित दुष्परिणामों की गंभीरता पर विमर्श करना होगा। इसे लेकर पी. चिदम्बरम ने भी अपनी व्यक्तिगत चिंता जताई है, कहते हैं यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ती है तो इससे संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होगा, जो स्वीकार्य नहीं होगा। हालांकि ऐसा कुछ होगा नहीं, इसमें सबका भला एक जैसा होगा।गौरतलब है कि 'सेंट्रल विस्टा परियोजना' के तहत बनाई जा रही नई संसद अगले साल 15 अगस्त को आजादी की 75 वीं सालगिरह पर बनकर तैयार होने की संभावना है। ऐसा पहली मर्तबा होगा जब इतनी बड़ी परियोजना कम समय में और तय वक्त में तैयार होगी। परियोजना पर प्रधानमंत्री की सीधी नजर है, प्रत्येक सप्ताह वह कार्ययोजना की समीक्षा करते हैं। हर काम उनकी देखरेख में संपन्न हो रहा है। संसद का नया भवन 65 हजार वर्ग मीटर में बन रहा है जिसे गुजरात की एचसीपी डिजाइन, प्लानिंग एंड मैनेजमेंट कंपनी ने डिजाइन किया है। वर्तमान संसद भवन में 788 सदस्य बैठते हैं। लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या अंतिम बार 1977 में तय हुई थी, तब देश की आबादी करीब 55 करोड़ थी। आपातकाल में संविधान संशोधन विधेयक लाकर लोकसभा सदस्य संख्या 543 पर फ्रीज कर दी गई थी। यानी उस वक्त औसतन प्रति 10 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता था तो अब प्रति 25 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी सीटों के पुनर्आवंटन को वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया था। उसके बाद सीटों का परिसीमन तो हुआ, लेकिन सीटों की संख्या वही रखी गई। सीटें बढ़ाने का काम पहले ही हो जाना चाहिए था।बहरहाल, छिटपुट तरीके से समय-समय पर हिंदुस्तान में कई बार लोकसभा-विघानसभाओं का परिसीमन हुआ। जबकि, सभी का परिसीमन एकसाथ किया जाना चाहिए था। नई लोकसभा सीटों का गठन और उनकी सीमाओं का निर्धारण परिसीमन आयोग करता है। देश में अबतक ऐसे चार परिसीमन आयोग गठित हुए हैं। पहला परिसीमन आयोग 1952 में बना था। उसके बाद 1963 व 1973 और अंतिम परिसीमन आयोग 2002 में बना था। इसी आयोग ने 2001 की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों की सीमाओं का पुनर्निधारण और पुनर्संयोजन किया था। मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी है अगर सांसदों का जनसंख्या वार आनुपातिक प्रतिनिधित्व निकाला जाए तो हिंदुस्तान में यह औसतन प्रति 25 लाख पर एक लोकसभा सांसद बैठता है। संविधान के अनुच्छेद 82 में हमारे संविधान निर्माताओं ने वक्त और आबादी के हिसाब से लोकसभा सदस्य संख्या में वृद्धि का प्रावधान किया हुआ है। यकीनन आबादी के अनुपात जनप्रतिनिधियों और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़नी ही चाहिए। लेकिन सीटों की संख्या का निर्धारण बहुत व्यावहारिक, समानुपाती और सर्वसमावेशी होना चाहिए। सीटें बढ़ाने के लिए कानूनी व संवेधानिक सभी बातों का ख्याल रखना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 August 2021


bhopal, Amit Shah, praises development  UP, Yogi Adityanath

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति आगे बढ़ रही है। पिछले दिनों काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ की जमकर प्रशंसा की थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को कम समय में बताना संभव नहीं है। इसके अलावा यह भी लगता है कि किस उपलब्धि का उल्लेख और किसे छोड़ दें। मतलब उपलब्धियां इतनी है जिनको बताने के लिए बहुत समय लग सकता। इसी क्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने भी योगी आदित्यनाथ के कार्यों को प्रशंसनीय बताया। उन्होंने भी प्रदेश सरकार की सभी उपलब्धियों का उल्लेख नहीं किया। उनके सामने भी समय अभाव की समस्या थी। इतना अवश्य कहा कि चवालीस परियोजनाओं में उत्तर प्रदेश नम्बर वन है। साढ़े चार वर्ष की यह उपलब्धियां अभूतपूर्व है। सभी परियोजनाएं गरीबों, वंचितों, किसानों के कल्याण और विकास से संबंधित है। इन सभी क्षेत्रों में योगी सरकार ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं। अमित शाह वर्षों तक उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति से जुड़े रहे हैं। पहले वह उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रभारी थे। इसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। दोनों भूमिका में उत्तर प्रदेश पर उनका विशेष फोकस था। उत्तर प्रदेश का उन्होंने व्यापक दौरा किया था। उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति सपा और बसपा के बीच सिमटी थी। भाजपा दशकों से नम्बर तीन पर ठहरी हुई थी। ऐसे में अमित शाह ने सपा-बसपा सरकारों के कार्यों को भी देखा। विगत साढ़े चार वर्षों से वह योगी सरकार को भी देख रहे हैं। उन्होंने तथ्यों के आधार पर तुलना की है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने विकास के मामले में पिछली सरकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। लखनऊ में अमित शाह ने फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट का शिलान्यास किया। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की। बाल गंगाधर तिलक ने लखनऊ में ही आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, हम इसको लेकर रहेंगे, का नारा दिया था। इस नारे की सौंवी वर्षगांठ पर तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने सपा सरकार को विशेष समारोह के आयोजन की सलाह दी थी। लेकिन उनकी सलाह पर अमल नहीं किया गया। कुछ महीने बाद प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी। इस सरकार ने राम नाईक के अच्छे सुझाव पर अमल किया। बाल गंगाधर तिलक के प्रसिद्ध नारे की एक सौ एकवीं जयंती पर समारोह का आयोजन किया गया। वस्तुतः इस आधार पर भी पिछली सरकारों व योगी सरकार के बीच अंतर को समझा जा सकता है। भाजपा और अन्य पार्टियों में भी यही अंतर है। इसका असर सभी परियोजनाओं में दिख रहा है। प्रदेश के पर्यटन व तीर्थ स्थलों का विकास भी इसी वैचारिक आधार पर हो रहा है। अयोध्या, काशी, मथुरा आदि का विश्व स्तरीय पर्यटन की दृष्टी से विकास किया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ ने कहा भी था कि पिछली सरकारें इन स्थलों का नाम लेने से डरती थी। अब इनका विकास हो रहा है। काशी विश्वनाथ मंदिर का कॉरिडोर निर्माण प्रगति पर है। विंध्याचल धाम कॉरिडोर का शिलान्यास अमित शाह ने किया। इन सभी स्थलों का स्वरूप बदल रहा है। अमित शाह ने कहा कि लंबे समय बाद यहां आकर अच्छा लगा। पहले उत्तर प्रदेश के हर जिले में गया हूं। उत्तर प्रदेश पहले कैसा था मुझे पता है। योगी आदित्यनाथ सरकार उत्तर प्रदेश को आगे ले जा रही है। पहले यहां महिलाएं असुरक्षित थीं। योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था को सुधारा है। पहले उत्तर प्रदेश दंगों की आग में जलता था। अब यह प्रदेश विकास में रास्ते सबसे है। चवालीस योजनाओं में टीम योगी नंबर वन है। अंतिम लाभार्थी को योजनाओं का लाभ पहुंचा है। टीकाकरण में उत्तर प्रदेश नंबर वन है, कोरोना टेस्टिंग में भी यूपी सबसे आगे है। भाजपा सरकारों के शासन में कानून का राज है। क्योंकि भाजपा का शासन किसी एक जाति, परिवार के लिए नहीं है। इस प्रकार अमित शाह ने बिना नाम लिए सपा बसपा पर प्रहार किया। योगी आदित्यनाथ ने कानून का राज कायम किया। माफिया राज को उत्तर प्रदेश से खत्म किया। लोक कल्याण के हर क्षेत्र में विकास हुआ है। जनता ने परिवर्तन के लिए भाजपा को आशीर्वाद दिया था। भाजपा की सरकारें जन आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य कर रही है। पहले किसान कर्ज में था, महिलाओं को शौचालय नहीं मिलता था। पहले यूपी में निवेश नहीं आता था। योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि पहले यूपी दंगों का प्रदेश था। माफियाराज काबिज था। जमीन पर भी माफिया कब्जा कर रहा था। जो एक सौ बयालीस एकड़ भूमि माफिया से बचाई गई, इसी जमीन पर फॉरेंसिक विवि बन रहा है। डेढ़ हजार करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों को जब्त किया गया। राज्य में एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं का निर्माण कार्य पूरी गति से संचालित किया जा रहा है। प्रदेश के सभी एक्सप्रेस-वे पर औद्योगिक क्लस्टर की स्थापना के सम्बन्ध में कार्य योजना तैयार की जा रही है। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे एवं बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस-वे पर औद्योगिक क्लस्टर स्थापना के सम्बन्ध में कार्यवाही को तेजी से चल रही है। चार वर्ष में दोगुने अर्थात आठ एयरपोर्ट क्रियाशील हो गए हैं जिनसे कुल इकहत्तर गंतव्य स्थानों हवाई सेवाएं जुड़े हैं। राज्य सरकार द्वारा चार वर्षों में चार एयरपोर्ट्स का विकास पूर्ण कराया जा चुका है। दस अन्य का विकास कराया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में चार वर्ष पहले बारह मेडिकल कॉलेज थे। अब उनकी संख्या चार गुनी हो गई है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अन्तर्गत प्रदेश के ढाई करोड़ बयालीस लाख किसानों को लाभान्वित किया गया है। इसके लिए राज्य को भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। प्रदेश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में चालीस लाख आवास उपलब्ध कराए गए हैं। करीब ढाई करोड़ से अधिक किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से लाभान्वित किया गया। प्रदेश में फिल्म सिटी के निर्माण की कार्यवाही भी प्रगति पर है। उत्तर प्रदेश में इण्डस्ट्रियल डिफेंस काॅरिडोर का निर्माण युद्धस्तर पर चल रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 2 August 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक संयुक्तराष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ऐसी संस्था है, जो सबसे शक्तिशाली है। इसके पांच सदस्य स्थायी हैं। ये हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन। इन पांचों सदस्यों को वीटो का अधिकार है। अर्थात यदि इन पांचों में से एक भी किसी प्रस्ताव का विरोध कर दे तो वह पारित नहीं हो सकता। इन पांच के अलावा इसके 10 साधारण सदस्य हैं, जो दो साल के लिए चुने जाते हैं। भारत कई बार इस परिषद का साधारण सदस्य रह चुका है लेकिन यह पहली बार हुआ है कि भारत ने इस सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष की तौर पर 1 अगस्त से अपना काम शुरू कर दिया है। वैसे तो संयुक्तराष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ही प्रायः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे लेकिन खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस अवसर को छूटने नहीं देंगे। वे 9 अगस्त को अध्यक्षता करेंगे। यों तो प्रधानमंत्री नरसिंहराव भी सुरक्षा परिषद की बैठक में एकबार शामिल हुए थे लेकिन शामिल होने और अध्यक्षता करने में बड़ा फर्क है। देखना है कि भारतीय अध्यक्षता का वह दिन ठीक से निभ जाए। अपनी अध्यक्षता के कार्यकाल में भारत क्या वही करेगा, जो दूसरे देश करते रहे हैं? अभी जो खबरें सामने आ रही हैं, उनसे पता चलता है कि भारत तीन मुद्दों पर सबसे ज्यादा जोर देगा। एक तो सामुद्रिक सुरक्षा, दूसरा शांति-व्यवस्था और तीसरा आतंकवाद-विरोध! ये तीन मुद्दे महत्वपूर्ण और अच्छे हैं। भारत की अध्यक्षता के दौरान एक साल के लिए अफगानिस्तान में संयुक्तराष्ट्र की शांति सेना को भेजने का सुरक्षा परिषद फैसला कर ले और वहां चुनाव के द्वारा लोकप्रिय सरकार कायम करवा दे तो भारत की अध्यक्षता एतिहासिक और चिर-स्मरणीय हो जाएगी। इसके अलावा भारत की अध्यक्षता में यदि दुनिया को परमाणुशस्त्रविहीन बनाने की कोशिश हो तो संपूर्ण मनुष्य जाति भारत की आभारी होगी। परमाणु-विध्वंस जैसा खतरा उस सूक्ष्म विध्वंस से भी है, जो पर्यावरण के प्रदूषण से हो रहा है। सारी दुनिया में लाखों लोग रोज हताहत हो रहे हैं लेकिन प्रदूषण पर कोई प्रभावी लगाम नहीं है। यदि सुरक्षा परिषद सारी दुनिया में प्रदूषण-मुक्ति का कोई जन-आंदोलन छेड़ सके तो यह विश्व-संस्था विश्व-वंदनीय बन सकती है। भारत चाहे तो वह संयुक्तराष्ट्र संघ के पुनर्गठन की मांग भी रख सकता है कि ताकि भारत, ब्राजील, द. अफ्रीका, जर्मनी जैसे राष्ट्रों को विशेष महत्व मिले। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 2 August 2021


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यह संतोष का विषय है कि लगभग तीन दशकों बाद भारत ने अपने लिए शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल की और देश के लिए उसका एक महत्वाकांक्षी मसौदा तैयार किया। भारतीय शिक्षा के इतिहास में यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसका आयोजन खुले मन से शिक्षा से जुड़े सभी पहलुओं पर गौर करते हुए किया गया और इसे लेकर विचार-विमर्श का पूरा अवसर दिया गया। ऐसा करना इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि शिक्षा जगत की समस्याएँ लगातार इकट्ठी होती रहीं और सरकारी उदासीनता के चलते कुछ नया करने की गुंजाइश नहीं हो सकी। परिणाम यह हुआ कि आकार में विश्व की एक प्रमुख वृहदाकार शिक्षा व्यवस्था तदर्थ (एड हाक) व्यवस्था में चलती रही। हमलोग पुराने ढाँचे में छिटपुट बदलाव और थोड़ी बहुत काट-छाँट यानी कतरब्योंत से काम चलाते रहे। औपनिवेशिक विरासत को ओढ़ते कर उसके विभिन्न पक्षों को संभालते हुए और 'शिक्षा' को छोड़कर एक यांत्रिक नजरिए से 'मानव-संसाधन' पैदा करने की कोशिश में लगे रहे। इस वरीयता के चलते प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के उच्च शिक्षा संस्थान हर तरह का समर्थन प्राप्त करते रहे और अन्य संस्थाएँ भगवान भरोसे छोड़ दी गईं। परिणाम यह हुआ कि कम गुणवत्ता की संस्थाओं का अम्बार लग गया पर उनके समुद्र में श्रेष्ठ संस्थाओं के कुछ टापू नजर आते रहे जिनमें पढ़-लिखकर युवा विदेश जाने को तत्पर रहे। सभी संस्थाओं की अपनी जीवनी होती है और निहित रुचियां या स्वार्थ भी होते हैं जिनके तहत उनका संचालन होता है। नई शिक्षा नीति इनपर भी गौर कर रही है और संरचनात्मक रूप से बदलाव की तैयारी में है। हमारे पाठ्यक्रमों को लेकर यह शिकायत भी बनी रही है कि वे भारतीय समाज, संस्कृति, विरासत और ज्ञान की देशज परम्परा से कटे हुए हैं और कई तरह की मिथ्या धारणाओं को बढ़ावा देते हैं। भारत को भारत में ही हाशिए पर पहुँचाते ये पाठ्यक्रम एक संशयग्रस्त भारतीय मानस को गढ़ने का काम करते रहे हैं। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीयता का आग्रह किसी तरह की अवैज्ञानिकता या कट्टरपंथी दृष्टि की विश्वविजय की अभिलाषा नहीं है क्योंकि भारतीय विचार व्यापक हैं और सबका समावेश करने वाले हैं। उनमें मनुष्य या प्राणी मात्र की चिंता है और वे पूरी सृष्टि के साथ जुड़कर जीने में विश्वास करते हैं। यह बात वेदों, उपनिषदों के काल से चली आ रही है और आज भी अनपढ़ या आम आदमी के आचरण में देखी जा सकती है। इसलिए अनेक भारतीय विचारों और अभ्यासों का वैश्विक महत्व है। योग और आयुर्वेद का ज्ञान और उनकी प्रक्रियाओं का स्वास्थ्य और मानसिक शांति पाने के लिए महत्व जगजाहिर है और उनकी स्वीकृति भी है। अतः जब नई शिक्षा नीति को भारत केंद्रित बनाने का संकल्प किया गया तो वह न केवल शिक्षा में भारत को पुनर्स्थापित करने के लिए था बल्कि मनुष्यता के लिए जरूरी समझकर किया गया। महामारी के दौर में पूरे विश्व ने यह अनुभव किया कि जीवन की रक्षा की चुनौती में योग और प्राणायाम का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। आज जलवायु का जो संकट है वह भी भारतीय दृष्टि की ओर ध्यान दिलाता है जिसमें मनुष्य को सिर्फ उपभोक्ता समझने की सख्त मनाही है। यहाँ त्यागपूर्वक भोग करने पर बल दिया गया है क्योंकि मूलतः कोई मालिक नहीं हो सकता सिर्फ न्यासी या ट्रस्टी ही रह सकता है। सारे संघर्ष, प्रतिद्वंद्विता और हिंसा का मूल जिस अधिकार-भावना में निहित है वह बेमानी है। अतः भारत केंद्रित शिक्षा वस्तुतः मनुष्य और जीवन केंद्रित शिक्षा है। वह उन मूल्यों के प्रति समर्पित है जो सह अस्तित्व, सहकार और परस्पर सहयोग को जीवन शैली में स्थापित करती है। शिक्षित होते हुए मनुष्यत्व के इन चिह्नों को बचाए रखना और संजोना आज पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। अतः पूरी शिक्षा व्यवस्था को इन्ही के संदर्भ में आयोजित किया जाना चाहिए। इनके स्रोत अभी भी जीवन और समाज में मौजूद हैं, उपेक्षा के कारण कुछ कुम्हला जरूर गए हैं पर उन्हें हरा-भरा किया जा सकता है। शिक्षा को नौकरी से जिस तरह जोड़ा गया है और जीवन के अन्य उद्देश्यों से तोड़ दिया गया है वह एक सामाजिक सांस्कृतिक समस्या बन गई है। आज पढ़-लिखकर बेरोजगार जिस संख्या में बढ़ रहे हैं वह चिंताजनक है क्योंकि औपचारिक शिक्षा जीवन के अन्य विकल्पों को बंद करती जा रही है जिसका परिणाम कुंठा और मानसिक अस्वास्थ्य को जन्म दे रहा है। शिक्षा समाज की खास जरूरत होती है क्योंकि समाज अपनी कैसी रचना करना चाहता है इसका विकल्प शिक्षा द्वारा तय होता है। न्याय, समता और स्वतंत्रता जैसे सरोकार स्थापित करने के लिए और नागरिक के दायित्व मन में बैठाने के लिए शिक्षा अवसर दे सकती है बशर्ते उसका आयोजन इन मूल्यों की अभिव्यक्ति करते हुए किया जाय। शिक्षा संस्था में इन मूल्यों को जीने का अवसर मिल सकता है और स्वाधीन भारत की संकल्पना साकार हो सकती है। इसके लिए जिस मानसिकता की आवश्यकता है वह प्रवेश और परीक्षा की चालू अनुष्ठानप्रधान शैली से नहीं निर्मित हो सकती। करोना के दौर में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि हमें मूल्यांकन के नए विकल्प ढूँढने ही होंगे। साथ ही आनलाइन शिक्षा को भी व्यवस्था में शामिल करना होगा। सृजनात्मक होना जितना जरूरी है ठीक उतनी ही शिद्दत से हमारी शिक्षा अनुकरणमूलक व्यवस्था और पुनरुत्पादन के आसरे चलती आ रही है। नई शिक्षा नीति इस समस्या की काट सोचती है और अध्ययन के विषय और पद्धति में लचीलेपन का स्वागत करती है। इसे लागू करने के लिए बहुविषयी संस्थाओं और अवसरों की विविधता का प्रावधान किया गया है। इसी तरह मातृभाषा में शिक्षा मिले इस बात की वकालत करते हुए पद्धति में बदलाव लाने की कोशिश की बात की गई है। शिक्षा को सिर्फ किताबी न बनाकर जीवनोपयोगी बनाने पर जोर दिया गया है। इसी तरह संस्थाओं को स्थानीय समाज और पारिस्थितिकी से सतत जुड़ने का अवसर बनाने के लिए भी कहा गया है। शिक्षक-प्रशिक्षण हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। उल्लेखनीय है कि बढ़ती जनसंख्या के दबाव को झेलने के लिए संस्थाओं की संख्या जरूर बढ़ती गई पर उसी अनुपात में शिक्षा-स्तर में गिरावट भी दर्ज हुई और गुणवत्ता का सवाल गौण होता गया। सरकारी तंत्र से अलग निजी शिक्षा संस्थान भी खड़े होते गए। स्कूली शिक्षा में कॉन्वेंट और मिशनरी स्कूलों का एक अलग दर्जा अंग्रेजों के जमाने में ही बन गया था। उसी की तर्ज पर देसी धनाढ्य वर्ग भी स्कूल चलाने में रुचि लेने लगे और अब उच्च शिक्षा में भी उनकी अच्छी दखल हो चुकी है। इन सबकी आंतरिक व्यवस्था, पाठ्यक्रम और शिक्षा शुल्क में सरकारी संस्थाओं की तुलना में बड़ी विविधता है। अन्तत: इनमें व्यापारिक दृष्टिकोण ही प्रमुखता पाता है और बाजार के हिसाब से इनका आयोजन किया जाता है। इनके विज्ञापन जिस तरह मीडिया में आते हैं उससे इन संस्थाओं में शिक्षा एक जिंस या माल की तरह बेचने की प्रवृत्ति झलकती है। इनके उत्पाद अच्छे-बुरे हर तरह के हैं पर कोई मानक नहीं होने से इन्हें काफी छूट मिल जाती है। शिक्षा जगत में निजी क्षेत्र का विस्तार खूब हुआ है पर कुछ गिनी-चुनी संस्थाओं को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र की उतनी साख नहीं बन सकी है जिसकी अपेक्षा की गई थी। इन परिस्थितियों में शिक्षा को मूल अधिकार बनाने का स्वप्न कमजोर पड़ता है। संसाधनों की कमी और शिक्षा के प्रति सरकारों के अल्पकालिक और चलताऊ रवैए के कारण शिक्षा संस्थानों में अकादमिक संस्कृति प्रदूषित होती जा रही है। शैक्षिक परिसर राजनीतिमुक्त और स्वाधीन होने चाहिए ताकि वे उत्कृष्टता और गुणवत्ता की ओर उन्मुख हो सकें। नई शिक्षा नीति के प्रति वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर प्रतिबद्धता दिखाई है परंतु करोना की अप्रत्याशित उपस्थिति ने उसके क्रियान्वयन में गतिरोध पैदा किया है। नीति को लेकर शिक्षा जगत में वेबिनारों की सहायता से जागृति फैली है, भ्रम दूर हुए हैं और लोगों में आशा का संचार हुआ है। शिक्षा नीति के विभिन्न पक्षों पर मार्ग योजना के लिए विशेषज्ञों के दल कार्यरत हैं। अब आवश्यकता है कि संरचनात्मक सुधारों को लागू किया जाय। पर सबसे जरूरी है कि शिक्षा संस्थाओं में शैक्षिक वातावरण की बहाली की जाय और अकादमिक संस्कृति का क्षरण रोका जाय। शिक्षा की गरिमा की रक्षा के लिए यह ध्यान देना होगा कि गैर शैक्षिक माहौल शिक्षा जगत को न लील सके। साथ ही इसके उपाय भी करने होंगे कि अधकचरे ढंग से नए शिक्षा संस्थान खोलने की अपेक्षा जो संस्थान हैं उन्हें ठीक से चलाया जाय। इसके लिए शिक्षा में अधिक निवेश करना होगा। पिछले कुछ वर्षों से विश्वस्तरीय संस्थान बनाने की चेष्टा हो रही है पर हमें उससे अधिक अपनी जरूरतों पर भी सोचना होगा और शिक्षा को देश के अनुकूल और पूरे समाज को समर्थ बनाने पर भी ध्यान देना होगा। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 29 July 2021


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डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र भयंकर गर्मी से जूझ रही मानवता को निजात दिलाने के लिए वर्षा ऋतु जल की अगाध राशि लेकर आयी है, किंतु हमारा समाज और हमारी सरकारी व्यवस्था इस प्रतिदान को सहेजने समेटने के लिए तैयार नहीं दिखती है। पानी की एक-एक बूंद को तरसने वाला समाज वर्षा जल को सहेजने के लिए तैयार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने शुद्ध पर्यावरण और पानी को मूल अधिकारों के अंतर्गत रखते हुए प्रत्येक व्यक्ति को उन्हें उपलब्ध कराने की बात कही है किंतु व्यवहार में कहीं भी यह परिलक्षित नहीं हो रहा। वर्षा का जल पूर्व की भांति बह कर नदी नालों के माध्यम से समुद्र में पहुंच जा रहा है, जब कि आवश्यकता थी कि उसकी एक एक बूंद को संरक्षित कर आवश्यकतानुसार लोगों को रूप से उपलब्ध कराया जाता। साथ ही जल की पर्याप्त उपलब्धता से ऐसी स्थिति बनती कि प्रकृति के कण-कण को उसकी आवश्यकता अनुसार सुलभ होता। वर्षा जल को भली-भांति न सहेजने के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। संरक्षित न किए जाने के कारण भूगर्भ का जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है। देश के 256 जिलों के 1592 विकास खंडों से भूगर्भ जल लगातार रसातल की ओर जा रहा है । एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक 30 प्रदूषित शहरों की सूची में 21 भारतीय शहर शामिल हैं। शीर्ष 10 की सूची में छह भारतीय शहर हैं ।इस सूची में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद को सर्वाधिक प्रदूषित शहर माना गया है। वर्ष 2019 में पीएम 2.5 की सांद्रता 110.2 थी, जो अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी की तरफ से तय मानक से 9 गुना ज्यादा थी। वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2019 में भारत में 16.7लाख से भी ज्यादा लोग असमय काल के गाल में समा गए। यह देश भर में हुई कुल मौतों का 17.8 प्रतिशत था।इसका मूल कारण भूगर्भ के जल को संरक्षित करने और उसके उन्नयन हेतु किसी भी प्रकार का कोई प्रयास न कर उसका अंधाधुंध दोहन किया जाना है। इससे भूगर्भ के जल स्तर में जहां एक और निरंतर गिरावट होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर जल की कमी से उसमें जीवन के लिए आवश्यक खनिजों के अभाव के साथ-साथ जीवन तथा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ अप्रत्याशित रूप से बढ़कर दूषित पानी के साथ शरीर में पहुंचकर नाना प्रकार की व्याधियों को जन्म देते हुए जीवन के समक्ष प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देते हैं। जल वायु मिट्टी व भूगर्भ जल के प्रदूषित होने का दुष्प्रभाव जहां लोगों की सेहत पर पड़ रहा है वहीं अर्थव्यवस्था की सेहत भी खराब हो रही है। एक एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण की वजह से हुई असमय मौतों और बीमारियों के कारण वर्ष 2019 में भारत को 2.6 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। यह सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 1.4 फ़ीसदी रहा। भारत में पर्यावरण को होने वाले सालाना नुकसान की कीमत 3.75 लाख करोड़ रुपये बैठती है। जल प्रदूषण से स्वास्थ्य लागत करीब 610 अरब अरब रुपये सालाना है। शुद्ध जल साफ सफाई और स्वच्छता के अभाव में हर साल चार लाख लोग मारे जाते हैं। जल जनित बीमारियों के चलते विश्व में पांच साल से कम आयु के करीब 15 लाख बच्चों की मौत होती है और 20 करोड़ काम के दिनों का हर साल नुकसान होता है । जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों की सूची में भारत तीसरा सबसे खराब देश है।। संसद में दी गई सूचना के अनुसार दिल्ली के कुल 11 जिलों में से 7 जिलों के भूगर्भ जल में अत्यधिक मात्रा में फ्लोराइड पाया गया है, 8 जिलों में नाइट्रेट की मात्रा अधिक है तो 2 जिलों में आरसैनिक और शीशा की मात्रा बढ़ी हुई पाई गई है। देश के अन्य हिस्सों की बात करें तो 386 जिलों के भूगर्भ जल में अत्यधिक नाइट्रेट पाया गया है, जबकि 335 जिलों में फ्लोराइड की मात्रा अधिक थी, 301 जिलों में आयरन, 153 जिलों में आरसैनिक, 93 जिलों में शीशा ,30 जिलों में क्रोमियम तथा 24 जिलों में कैडिमम अत्यधिक मात्रा में पाया गया है। देश के लगभग 70% घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं,जिसके चलते लगभग 4 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं तथा लगभग 6 करोड लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए विवश हैं। देश में प्रतिवर्ष लगभग चार हजार अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है किंतु उसका लगभग 8% पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं। शेष पानी नदियों ,नालों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा के जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके चलते स्थान स्थान पर पोखर ,तालाब, बावड़ी, कुआं आदि निर्मित कराए जाते थे , जिनमें वर्षा का जल एकत्र होता था तथा वह वर्ष भर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के लिए भी उपलब्ध होता था। अब वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर इन्हें संरक्षण न दिए जाने के कारण अब तक लगभग चार हजार, 500 नदियां तथा 20 हजार तालाब झील आदि सूख गए हैं तथा वह भू माफिया के अवैध कब्जे का शिकार होकर अपना अस्तित्व गवा बैठे हैं। देश की बड़ी-बड़ी नदियों को जल की आपूर्ति करने वाली उनकी सहायक नदियां वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर अपना अस्तित्व गवा बैठी हैं। जो कुछ थोड़े बहुत जल स्रोत आज उपलब्ध हैं,उनमें से अनेक औद्योगिक क्रांति की भेंट चढ़ चुके हैं। फलस्वरूप उनके पानी में औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी में कचरे के मिल जाने से उन का जल इतना प्रदूषित हो गया है कि उसको पीना तो बहुत दूर, स्नान करने पर भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाने का खतरा विद्यमान है। भारत की कृषि पूर्णतया वर्षा जल पर निर्भर है। वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई के अन्य साधन सुलभ हो जाते हैं किंतु वर्षा न होने पर सभी साधन जवाब दे देते हैं और कृषि सूखे का शिकार हो जाती है। चीनी उत्पादक महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के किसान निरंतर गन्ने की खेती पर बल दे रहे हैं और सरकार भी गन्ना उत्पादन के लिए उन्हें प्रोत्साहित कर रही है ।इसी प्रकार धान की खेती के लिए पंजाब, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश इत्यादि अनेक राज्य धान की फसल का क्षेत्रफल निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं किंतु उसके लिए पानी प्राप्त न होने के कारण वह पानी भूगर्भ से निकाल कर खेतों को सींचा जा रहा है। इससे भूगर्भ में स्थित जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, जिस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा। स्पष्ट है कि जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जो सामूहिक रूप से जल को प्रदूषित करते हैं। शहरीकरण के परिणाम घरेलू सीवेज, अनियंत्रित तथा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप पानी पर अवलंबित खेती एवं औद्योगिक अपशिष्ट तथा कृषि कार्यों में अत्यधिक प्रयोग में लाए गए कीटनाशक ,जल में घुल मिलकर भूगर्भ के जल को अत्यधिक मात्रा में प्रदूषित कर रहे है। इससे निजात पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह घोषणा की थी कि पुनः सत्ता में आने पर खेती को पानी तथा हर घर को सन 2024 तक नल के माध्यम से पीने का पानी उपलब्ध कराया जायेगा। इस बात को दृष्टि में रखते हुए हर खेत को पानी के साथ हर घर को भी नल के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने तथा सूख रही नदियों को पुनर्जीवित करने, नदियों में विद्यमान प्रदूषण को समाप्त करने तथा स्वच्छ जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने ,के उद्देश्य से जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया गया है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जन सहयोग के साथ सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत जल संरक्षण योजना को मूर्त रूप देने का कार्य विचाराधीन है ।संभव है वह निकट भविष्य में मूर्त रूप ले। स्पष्ट है कि विद्यमान जल को प्रदूषण मुक्त कर पीने योग्य बनाये रखने हेतु भूगर्भ के जल स्तर का उन्नयन, उसका संभरण तथा संरक्षण अति आवश्यक है और यह तभी संभव है जब वर्षा जल की एक एक बूंद एकत्रित होकर भूगर्भ में समाहित हो जाए । (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 July 2021


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सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को हमेशा पहले रखने का मंत्र दिया है। भारत जोड़ो आंदोलन चलाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि इसे राजनीतिक आंदोलन मानने की जरूरत नहीं है बल्कि इसे जनता का आंदोलन बनाया जाना चाहिए। उन्होंने इसके लिए महात्मा गांधी के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन का हवाला दिया है। समवेत और नवोन्मेषी विकास से भारत को जोड़ने की नसीहत दी है। प्रधानमंत्री 79 बार रेडियो पर अपने मन की बात कर चुके हैं। भारत के अन्य किसी भी प्रधानमंत्री ने रेडियो पर इतनी बार अपने मन की बात नहीं की है। यह और बात है कि प्रधानमंत्री ने जब भी अपने मन की बात की है, उस पर राजनीति जरूर हुई है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। राजनीतिक दलों का अक्सर यही आरोप होता है कि प्रधानमंत्री अपने मन की बात तो करते हैं लेकिन देश के मन की बात नहीं करते। हर बार ऐसे ही आरोप लगने लगें तो स्पष्टीकरण जरूरी हो जाता है। यह अच्छा तो नहीं कि प्रधानमंत्री से हर बात पर सफाई की अपेक्षा की जाए लेकिन देश की राजनीति में इन दिनों हर बात पर सीधे प्रधानमंत्री से ही जवाब मांगने का चलन विकसित हो गया है। गोया, प्रधानमंत्री न हुआ, जवाब देने की मशीन हो गया। प्रधानमंत्री ने तो इस बार तो यह बताने की भी कोशिश की कि उनकी मन की बात निजी बिल्कुल भी नहीं है। उसमें देश भर के 35 साल से कम आयु-वय के 75 प्रतिशत युवाओं के सुझाव शामिल होते हैं। लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा की कटाक्षपरक प्रतिक्रिया से ऐसा नहीं लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री के इस दिलासे पर भरोसा भी है। राहुल गांधी को लगता है कि प्रधानमंत्री देश के मन की बात नहीं समझते अन्यथा देश में टीकाकरण के ऐसे हालात नहीं होते। जबकि प्रियंका वाड्रा का आरोप है कि प्रधानमंत्री खरबपति मित्रों के चश्मे से देखते और किसानों का अपमान करते हैं। किसी के मन को समझना कठिन है। राहुल और प्रियंका क्या चाहते हैं, क्या सोचते हैं, यह आजतक कांग्रेसी भी नहीं समझ पाए। प्रधानमंत्री को बार-बार राष्ट्रप्रेम, भारत प्रथम या भारत सबसे पहले जैसी भावना के विकास की बात क्यों करनी पड़ रही है। भारत जोड़ो अभियान चलाने की बात क्यों करनी पड़ रही है? जाहिर सी बात है कि आजादी के बाद ही अगर नेहरू-गांधी परिवार ने देश प्रथम की भावना से काम किया होता तो चीन को देश का बहुत बड़ा भूभाग ऊसर- बंजर और बेकार कहकर सौंप न दिया गया होता। हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा न होता। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भौगोलिक स्तर पर तो देश को जोड़ दिया लेकिन जाति-भाषा, धर्म और संस्कृति के स्तर पर यह देश कभी एक हो नहीं पाया। यह काम करेगा तो कोई प्रधानमंत्री ही।सच तो यह है कि अनेकता में एकता की बात करने वाले राजनीतिक दल आजादी के 74 साल बाद भी देश को उसकी एक अदद राष्ट्रभाषा तक नहीं दे पाए। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं अपने ही देश में कामकाज की भाषा नहीं बन पा रही हैं। बड़ी अदालतों में न तो हिंदी या अन्य भारतीय भषाओं में वाद स्वीकृत हो रहे, न उनमें बहस या जिरह हो रही और न ही फैसले आ रहे। फिर देश जुड़ेगा कैसे? यह अपने आप में बड़ा सवाल है। जुड़ने के लिए तो दिल का मिलना, मन का मिलना जरूरी है। मन तो तभी मिलता है, जब यह स्पष्ट हो कि सामने वाला क्या कह रहा है? यह एक राष्ट्र-एक भाषा होने पर ही संभव है। कम से कम देश में एक ऐसी भाषा तो हो जिसे सब समझ सकें। भारत जोड़ो अभियान का मतलब है- देश से खुद को जोड़ो। अपने को देश का समझो। देश को अपना समझो।जो भी काम करो, यह विचार कर करो कि क्या यह देश के व्यापक हित में है? जिस तरह बूंद-बूंद से महासागर बनता है।उसी तरह व्यक्ति-व्यक्ति के मेल से देश बनता है। व्यक्ति को जोड़ने का काम भाषा करती है। हमारे सत्कर्म ही देश को विकासगामी बनाते हैं। देश को आगे ले जाना केवल सरकारों का काम नहीं है, यह हर व्यक्ति का नैतिक दायित्व है। हमने जिस देश का अन्न-जल ग्रहण किया है। यहां से वायु प्राप्त की है। जहां हम पले-बढ़े हैं। जहां से हमने ज्ञान पाया है, जहां के वस्त्र पहने हैं, उस देश के लिए हम क्या कुछ कर रहे हैं, यह तो कभी हम सोचते ही नहीं। प्रधानमंत्री का इशारा है कि हम जो भी काम करते हैं, उसमें नवोन्मेष तलाशें। उसे गुणवत्तापूर्वक पूरी ईमानदारी से करें। कुछ चिंतकों का मानना है कि युवाओं को भाषण की नहीं, काम की जरूरत है। देश में काम की नहीं, काम करने वालों की कमी है। सरकारी विभागों में कार्यरत लोग कितना काम करते हैं और कैसे करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। कुछ राजनीतिक दल जनता को मुफ्त पानी,मुफ्त बिजली,मुफ्त राशन और मुफ्त सुविधाएं देने की वकालत करते हैं, लेकिन हमें सोचना होगा कि मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता। उसकी कीमत हमें चुकानी पड़ती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की राह पर चलने और उनके सपनों का देश बनाने की बात कर रहे हैं। हमें सोचना होगा कि हमारा सपना आजादी के दीवानों के सपनों से कितना मेल खाता है और अगर नहीं तो क्यों? परस्पर स्नेह और सहकार इस देश की ताकत रही है।आज हम इससे वंचित क्यों हैं? प्रधानमंत्री अगर लखीमपुर के केले के बेकार तने के रेशे से फाइबर निर्माण की सराहना करते हैं तो मणिपुर में सेब की खेती की सराहना करना भी नहीं भूलते। उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मेडिकल कॉलेज और हर मंडल में सैनिक स्कूल खोलने की बात हो रही है। ऐसा हर प्रदेश में होना चाहिए। टीकाकरण और ऑक्सीजन पर राजनीति करने वाले दलों ने अगर वाकई चिकित्सा नेटवर्क मजबूत करने की दिशा में काम किया होता तो क्या देश के आज यही हालात होते। प्रधानमंत्री अगर मन की बात भी करते हैं तो सोच-समझकर करते हैं इसलिए उनकी भावनाओं को समझा जाना चाहिए। विरोध करना आसान है लेकिन विरोध भी सोच-समझ कर हो तभी उसकी अहमियत है। होश में रहकर किया काम ही इस देश को आगे ले जा सकता है। होश और जोश दोनों की युति बनें तभी भ्रष्टाचारमुक्त सार्थक विकास हो सकता है। अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम देकर ,सबका साथ,सबका विकास की भावना को महत्व देकर ही हम एक दूसरे के दिलों में जगह बना सकते हैं। प्रधानमंत्री स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की बात कर रहे हैं। अच्छा होता कि राजनीतिक दल मन की बात के निहितार्थ समझ पाते। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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Dakhal News 26 July 2021


bhopal, new chapter , development of Ayodhya

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री तीर्थाटन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का विशेष महत्व रहा है। यहां के अनेक स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध रहे हैं। लेकिन विश्वस्तरीय पर्यटन सुविधाओं की ओर पहले अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। योगी आदित्यनाथ इस कमी को दूर कर रहे हैं। उनका कहना था कि पहले की सरकारें अयोध्या का नाम लेने से बचती थी। इस कारण यहां पर्याप्त विकास नहीं किया गया। इसी प्रकार श्री कृष्ण जन्मस्थली मथुरा वृंदावन व भोलेनाथ की नगरी काशी की भी प्रतिष्ठा है। काशी तो दुनिया की सर्वाधिक प्राचीन नगरी है। योगी सरकार इस सभी स्थलों का गरिमा के अनुकूल विकास कर रही है। मुख्यमंत्री लगभग दो दर्जन बार अयोध्या की यात्रा पर आ चुके हैं। प्रत्येक बार वह यहां के लिए विकास की कोई न कोई योजना भी लाते रहे हैं। इसके अलावा पहले से चल रही योजनाओं की समीक्षा भी करते हैं। ऐसे स्थलों का समग्र विकास किया जा रहा है। जिससे विदेश से आने वाले पर्यटकों को भी सकारात्मक सन्देश मिले। समग्र विकास में दशरथ मेडिकल कॉलेज का निर्माण भी शामिल है। यहां लोगों का इलाज भी हो रहा है। मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई भी शुरू हो गई है। इस मेडिकल कॉलेज को और सुविधासंपन्न बनाने के लिए अनेक निर्माण कार्य चल रहे हैं। कई निर्माण कार्य पूरे होने वाले हैं। जबकि कुछ महत्वपूर्ण निर्माण कार्य चल रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या विकास प्राधिकरण की तरफ से मास्टर प्लान में शामिल बीस हजार करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट की समीक्षा की थी। उस वर्चुअल समीक्षा में योगी आदित्यनाथ व संबंधित अधिकारी शामिल हुए थे। मास्टर प्लान में सभी विकास परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इसमें पुरातत्व महत्व के मंदिरों और परिसरों का जीर्णोद्धार व सुंदरीकरण शामिल है। बीस हजार करोड़ रुपए के इन प्रोजेक्ट में क्रूज पर्यटन परियोजना, रामकी पैड़ी पुनर्जनन परियोजना, रामायण आध्यात्मिक वन, सरयू नदी आइकॉनिक ब्रिज, प्रतिष्ठित संरचना का विकास पर्यटन सर्किट का विकास, ब्रांडिंग अयोध्या, चौरासी कोसी परिक्रमा के भीतर दो सौ आठ विरासत परिसरों का जीर्णोद्धार, सरयू उत्तर किनारे का विकास आदि शामिल हैं। इसके साथ ही अयोध्या को आधुनिक स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित किया जा रहा है। सरकार ने सैकड़ों पर्यटकों के सुझाव के बाद एक विजन डॉक्यूमेंट भी तैयार किया है। अयोध्या के विकास की परिकल्पना एक आध्यात्मिक केंद्र, वैश्विक पर्यटन हब और एक स्थायी स्मार्ट सिटी के रूप में की जा रही है। कनेक्टिविटी में सुधार के प्रयास जारी है। इनमें एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन के विस्तार, बस स्टेशन, सड़कों और राजमार्गों व ढांचा परियोजनाओं का निर्माण शामिल है। ग्रीनफील्ड टाउनशिप भी प्रस्तावित है। इसमें तीर्थयात्रियों के ठहरने की सुविधा, आश्रमों के लिए जगह, मठ, होटल, विभिन्न राज्यों के भवन आदि शामिल हैं। अयोध्या में पर्यटक सुविधा केंद्र व विश्व स्तरीय संग्रहालय भी बनाया जाएगा। सरयू के घाटों के आसपास बुनियादी ढांचा सुविधाओं का विकास होगा। सरयू नदी पर क्रूज संचालन भी शुरू होगा। ग्रीनफील्ड सिटी योजना, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, सरयू तट पट विकास, पैंसठ किमी लंबी रिंग रोड, पर्यटन केंद्र, पंचकोसी परिक्रमा मार्ग विकास आदि से अयोध्या की तस्वीर बदल जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ वर्ष पहले तक अयोध्या उपेक्षित थी। यह विश्वस्तरीय पर्यटन व तीर्थाटन केंद्र रहा है। लेकिन यहां स्थानीय स्तर की भी सुविधाएं नहीं थी। फिर भी आस्था के कारण करोड़ों लोग यहां परेशानी उठाकर भी आते थे। योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या के विकास पर ध्यान दिया। इसको स्मार्ट व विश्व स्तरीय नगर बनाने का कार्य प्रगति पर है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अयोध्या आने वाले समय में वैश्विक मानचित्र में एक नया स्थान बनाने जा रहा है। अयोध्या विश्वस्तरीय पर्यटन केन्द्र के साथ साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का भी एक बड़ा केन्द्र बनाया जाएगा। अयोध्या में इन सुविधाओं के विकास के लिए यहां के जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर केन्द्र व प्रदेश सरकार कार्यक्रमों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तथा हनुमानगढ़ी में दर्शन पूजन किया। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर के निर्माण कार्यों की जानकारी प्राप्त की। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास तथा सुग्रीव किला पीठाधीश्वर जगतगुरू विश्वप्रपन्नाचार्य से भी मिले। राजर्षि दशरथ स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय के विभिन्न वॉर्डों में जाकर योगी आदित्यनाथ ने मरीजों से संवाद किया। उनके स्वास्थ्य व यहां मिल रही सुविधाओं की जानकारी ली। लंबित कार्यों को निर्धारित समय सीमा में पूर्ण करने का अधिकारियों को निर्देश दिया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 26 July 2021


bhopal,Dr. Abdul Kalam, Inspiration , crores of people

  डॉ. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि (27 जुलाई) पर विशेष योगेश कुमार गोयल 'मिसाइल मैन' के नाम से विख्यात डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम) भारतीय इतिहास में एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे हैं, जो वैज्ञानिक रहे हैं। देश के महान वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वे एक अद्भुत इंसान और प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी थे। सादगी, मितव्ययिता और ईमानदारी जैसे विलक्षण गुणों की मिसाल डॉ. कलाम ने अपने इन्हीं गुणों की बदौलत समस्त देशवासियों का दिल जीत लिया था क्योंकि मौजूदा राजनीतिक परिवेश में ऐसे गुणों वाले व्यक्ति का मिलना दुर्लभ है। यही कारण है कि करोड़ों लोग आज भी उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते हुए उनकी कही बातों का अनुसरण करते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने जिस भी व्यक्ति के साथ काम किया, उसी का दिल जीत लिया। देश की युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए वह कहते थे कि भारत के युवा वर्ग में हिम्मत होनी चाहिए कि वह कुछ अलग सोच सके, हिम्मत हो कि वह कुछ खोज सके, ऐसे नए रास्तों पर चलने की हिम्मत हो, जो असंभव हो, उसे खोज सके और मुसीबतों को जीतकर सफलता हासिल कर सके। वह कहते थे कि आसमान की ओर देखें, हम अकेले नहीं हैं, पूरा ब्रह्माण्ड हमारा मित्र है और जो सपना देखते हुए मेहनत कर रहे हैं, उन्हें बेहतरीन फल देने का प्रयास कर रहा है। सपना सच हो, इसके लिए जरूरी है कि आप सपना देखें। 15 अक्तूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में गरीब परिवार में जन्मे अब्दुल कलाम गरीबी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त कर वैज्ञानिक बने, जिनके नेतृत्व में भारत कई उपग्रह तथा स्वदेशी मिसाइलें बनाने में सफल हुआ और परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र भी बना। उन्होंने डीआरडीओ तथा इसरो की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर उन्हें सफल बनाया। अपने जीवनकाल में उन्होंने 'विंग्स ऑफ फायर', 'इग्नाइटेड माइंड', 'इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम' इत्यादि 30 से भी ज्यादा पुस्तकें लिखी। 1999 से 2001 के बीच वे भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार रहे तथा 2002 से 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो उनके साथ सामान के रूप में केवल दो सूटकेस थे, जिनमें से एक में उनके कपड़े तथा दूसरे में उनकी प्रिय पुस्तकें थी। आज जहां नेतागण छुट्टियों पर घूमने जाने के लिए बेताब रहते हैं और संसद की कार्यवाहियों से भी गैरहाजिर रहते हैं, वहीं डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति रहते केवल दो छुट्टियां ली थी- एक अपने पिता के देहांत पर और दूसरी अपनी मां की मृत्यु होने पर।देश के सर्वोच्च पद पर रहते हुए कलाम साहब ने सादगी, मितव्ययिता और ईमानदारी की जो मिसाल पेश की, वह आज और कहीं देखने को नहीं मिलती। ऐसा ही एक वाकया स्मरण आता है, जब एकबार उनका पूरा परिवार (कुल 52 सदस्य) उनसे मिलने दिल्ली आया। स्टेशन से सभी को राष्ट्रपति भवन लाया गया, जहां सभी आठ दिनों तक ठहरे। उन पर खर्च हुई एक-एक पाई कलाम साहब ने अपनी जेब से खर्च की। बताया जाता है कि उन्होंने अपने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि उनके इन अतिथियों के लिए राष्ट्रपति भवन की कारें इस्तेमाल नहीं की जाएंगी और उनके खाने-पीने के सारे खर्च का विवरण भी अलग से रखा गया। आठ दिन बाद सभी के दिल्ली से वापस चले जाने पर कलाम साहब ने अपने निजी बैंक खाते से 3.52 लाख रुपये का चेक काटकर राष्ट्रपति कार्यालय को भेज दिया। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने कभी किसी का कोई उपहार अपने पास नहीं रखा। उनका कहना था कि उनके पिता ने उन्हें यही शिक्षा दी है कि कभी किसी का कोई उपहार स्वीकार मत करो। किसी ने एकबार उन्हें दो पैन उपहारस्वरूप दिए थे लेकिन वे भी उन्होंने राष्ट्रपति पद से विदाई के समय लौटा दिए थे। भारत के बच्चों के भविष्य को लेकर वे चिंतित स्वर में कहते थे कि देश में प्रतिवर्ष दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं, उन सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा और जीवन में उनका क्या लक्ष्य होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़ अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए? डॉ. कलाम का मानना था कि यदि भारत को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मस्तिष्क वालों का देश बनाना है तो इसमें समाज के तीन लोग सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, पिता, माता और गुरु। भारत के भविष्य को लेकर उनके पास एक विजन था, जिस पर 'इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई थी। दरअसल 'टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड एसेसमेंट काउंसिल' नामक एक सरकारी संगठन देश की प्रगति से जुड़ा विजन डॉक्यूमेंट तैयार करता है और 1996 में कलाम साहब इसके अध्यक्ष थे। उन्हीं की अध्यक्षता में 1996-97 में 'विजन 2020' डॉक्यूमेंट तैयार किया गया। उस रिपोर्ट में सरकार को कुछ सुझाव देते हुए बताया गया था कि 2020 तक भारत को क्या कुछ हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। रिपोर्ट के आधार पर कलाम साहब ने सरकार को सलाह दी थी कि देश के विकास के लिए तकनीक, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को क्या करना चाहिए और आम नागरिकों को इसमें क्या भूमिका निभानी चाहिए। उनका मानना था कि भारत 2020 तक युवाओं के योगदान की बदौलत एक विकसित देश बन जाएगा लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर उनके इस विजन को पूरा होने में अभी बहुत लंबा समय लग सकता है।डॉ. कलाम कहा करते थे कि दुनिया हमें तभी याद रखेगी, जब हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और विकसित भारत देंगे, जो आर्थिक सम्पन्नता और सांस्कृतिक विरासत से मिला हो। उनका कहना था कि जो लोग अपने दिल से कार्य नहीं करते, वे जिंदगी में भले ही कुछ भी हासिल कर लें लेकिन वह खोखला होता है, जो उनके दिल में कड़वाहट भरता है। कलाम साहब के अनुसार जिंदगी कठिन है और आप तभी जीत सकते हैं, जब आप मनुष्य होने के अपने जन्मसिद्ध अधिकार के प्रति सजग हों। किसी व्यक्ति के जीवन में कठिनाई नहीं होगी तो उसे सफलता की खुशी का अहसास ही नहीं होगा। यह महान् विभूति 27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में एक कार्यक्रम के दौरान छात्रों को सम्बोधित करते हुए अचानक दिल का दौरा पड़ने पर सदा के लिए चिरनिद्रा में लीन हो गई।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 26 July 2021


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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री अस्थिर वैचारिक स्थिति व्यक्ति को विचलित बनाये रखती है। ऐसे लोग स्वयं विश्वास के संकट से घिर जाते हैं। सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर आज इसी अवस्था में हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। उन्होंने भाजपा के साथ गठबन्धन किया। यह उनके व उनकी पार्टी के लिए सार्थक साबित हुआ। इसके पहले भी वह विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें कभी जीत नसीब नहीं हुई थी। भाजपा के साथ गठबंधन ने उनकी पार्टी को नया मुकाम व नई पहचान दी। वह स्वयं भी विधानसभा पहुंचे। उनकी पार्टी के चार विधायक भी विजयी रहे। भाजपा ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। योगी आदित्यनाथ सरकार में वह कैबिनेट मंत्री बनाये गए। जाहिर है कि यह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था। कैबिनेट मंत्री के रूप में बेहतर कार्य करने का उनके लिए अवसर था। लेकिन उन्होंने इस स्थिति को स्वभाविक रूप में स्वीकार नहीं किया। वह अस्थिर व असंतुष्ट बने रहे। भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसमें मंत्री परिषद सामूहिक दायित्व की भावना से कार्य करती है। यदि एक मंत्री के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव विधानसभा से पारित हो जाये तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है। मंत्री पद के साथ ही गोपनीयता की शपथ भी लेनी पड़ती है। ओमप्रकाश राजभर ने मंत्री रहते हुए संविधान की इस भावना का सम्मान नहीं किया। वह जिस सरकार की कैबिनेट के सदस्य थे, उसी पर हमला बोलते थे। इस स्थिति को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा हाईकमान ने बहुत समय तक बर्दाश्त किया। क्योंकि उनका गठबंधन धर्म के प्रति सम्मान भाव रहा है। यह उम्मीद की गई कि ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन धर्म का सम्मान करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हद पार होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कैबिनेट से हटाने का निर्णय लिया। उसके बाद ओमप्रकाश राजभर दिग्भ्रमित रहे। पांच वर्षों में उन्हें भाजपा के साथ और भाजपा के बाद की स्थिति का भरपूर अनुभव हुआ। पहले उन्होंने एक अन्य पार्टी से भी सम्पर्क किया था लेकिन उन्हें भाजपा में जो सम्मान मिला था, वैसा अनुभव उनको नहीं हुआ। इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद दस पार्टियों के साथ भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाने की कवायद हुई। इसकी शुरुआत ही हास्यास्पद थी। इसमें प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बदलने की सौदेबाजी शामिल की गई। किसी का दूसरे पर विश्वास नहीं था। पहले राजनीतिक कदम के साथ ही इसके बिखरने की अटकलें शुरू हो गई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के साथ सरकार बनाने का दावा करने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का उनसे मोहभंग हो गया है। ओमप्रकाश राजभर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। ये बात अलग है कि उन्होंने इसका कारण अपनी निजी परेशानी को बताया लेकिन बात इतनी सहज नहीं है। वस्तुतः ओवैसी की चाल ने ओमप्रकाश राजभर के राजनीतिक अस्तित्व को ही चुनौती मिल रही थी। ओवैसी के कदम उनके आधार को ही समाप्त करने वाला था। ओवैसी ग़ज़नवी सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी की मजार पर गए थे। उनका सम्मान इस आक्रांता के प्रति था। इस प्रकरण के बाद मुरादाबाद सर्किट हाउस में उत्तर प्रदेश के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात ने सियासी हलचल मचा दी थी। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के भाजपा के साथ सुलह समझौते से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दोनों नेताओं ने इसे व्यक्तिगत मुलाकात बताया। असदुद्दीन ओवैसी के साथ ओपी राजभर को गाजियाबाद में चुनावी यात्रा में शामिल होना होना था। जहां से दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर और संभल के पार्टी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के साथ ही मंच साझा करते हुए मुरादाबाद पहुंचते। वहां दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का साझा मंच वाला कार्यक्रम तय था। लेकिन राजभर ने ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। दूसरी ओर भाजपा ने विजेता भारतीय राजा सुहेलदेव को उचित सम्मान दिया। कुछ वर्ष पहले गाजीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रति जिज्ञासा बढ़ेगी। नई पीढ़ी उनके शौर्य और देशभक्ति से प्रेरणा लेगी। इसके पहले भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बहराइच में राजा सुहेल देव की प्रतिमा का अनावरण किया था। नरेंद्र मोदी ने गौरवशाली रूप में राजा सुहेल देव के प्रति श्रद्धा व्यक्त की थी। कहा था कि उनका नाम विजयी और यशस्वी भारतीय राजाओं में शुमार है। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से उनको गरिमा के अनुकूल प्रतिष्ठा मिल रही है लेकिन उस ऐतिहासिक अवसर पर ओमप्रकाश राजभर शामिल नहीं थे। वोटबैंक की राजनीति करने वालों के बयान राजा सुहेल देव की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं थे। महाराज सुहेलदेव ग्यारहवीं शताब्दी में हुए। उन्होंने बहराइच में गजनवी सेनापति सैयद सालार मसूद गाजी को पराजित कर मार डाला था। सत्रहवीं शताब्दी के फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में उनका उल्लेख है। राजा सुहेलदेव ने विदेशी आक्रांता की सवा लाख सेना के साथ कुटिला नदी के तट पर युद्ध किया। उनको पराजित कर हिन्दू धर्म की रक्षा की। जाहिर है कि यह ओमप्रकाश राजभर के लिए आत्मचिंतन का अवसर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2021


bhopal,UP Opportunity ,introspection ,Omprakash Rajbhar

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री अस्थिर वैचारिक स्थिति व्यक्ति को विचलित बनाये रखती है। ऐसे लोग स्वयं विश्वास के संकट से घिर जाते हैं। सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर आज इसी अवस्था में हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। उन्होंने भाजपा के साथ गठबन्धन किया। यह उनके व उनकी पार्टी के लिए सार्थक साबित हुआ। इसके पहले भी वह विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें कभी जीत नसीब नहीं हुई थी। भाजपा के साथ गठबंधन ने उनकी पार्टी को नया मुकाम व नई पहचान दी। वह स्वयं भी विधानसभा पहुंचे। उनकी पार्टी के चार विधायक भी विजयी रहे। भाजपा ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। योगी आदित्यनाथ सरकार में वह कैबिनेट मंत्री बनाये गए। जाहिर है कि यह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था। कैबिनेट मंत्री के रूप में बेहतर कार्य करने का उनके लिए अवसर था। लेकिन उन्होंने इस स्थिति को स्वभाविक रूप में स्वीकार नहीं किया। वह अस्थिर व असंतुष्ट बने रहे। भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसमें मंत्री परिषद सामूहिक दायित्व की भावना से कार्य करती है। यदि एक मंत्री के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव विधानसभा से पारित हो जाये तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है। मंत्री पद के साथ ही गोपनीयता की शपथ भी लेनी पड़ती है। ओमप्रकाश राजभर ने मंत्री रहते हुए संविधान की इस भावना का सम्मान नहीं किया। वह जिस सरकार की कैबिनेट के सदस्य थे, उसी पर हमला बोलते थे। इस स्थिति को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा हाईकमान ने बहुत समय तक बर्दाश्त किया। क्योंकि उनका गठबंधन धर्म के प्रति सम्मान भाव रहा है। यह उम्मीद की गई कि ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन धर्म का सम्मान करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हद पार होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कैबिनेट से हटाने का निर्णय लिया। उसके बाद ओमप्रकाश राजभर दिग्भ्रमित रहे। पांच वर्षों में उन्हें भाजपा के साथ और भाजपा के बाद की स्थिति का भरपूर अनुभव हुआ। पहले उन्होंने एक अन्य पार्टी से भी सम्पर्क किया था लेकिन उन्हें भाजपा में जो सम्मान मिला था, वैसा अनुभव उनको नहीं हुआ। इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद दस पार्टियों के साथ भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाने की कवायद हुई। इसकी शुरुआत ही हास्यास्पद थी। इसमें प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बदलने की सौदेबाजी शामिल की गई। किसी का दूसरे पर विश्वास नहीं था। पहले राजनीतिक कदम के साथ ही इसके बिखरने की अटकलें शुरू हो गई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के साथ सरकार बनाने का दावा करने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का उनसे मोहभंग हो गया है। ओमप्रकाश राजभर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। ये बात अलग है कि उन्होंने इसका कारण अपनी निजी परेशानी को बताया लेकिन बात इतनी सहज नहीं है। वस्तुतः ओवैसी की चाल ने ओमप्रकाश राजभर के राजनीतिक अस्तित्व को ही चुनौती मिल रही थी। ओवैसी के कदम उनके आधार को ही समाप्त करने वाला था। ओवैसी ग़ज़नवी सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी की मजार पर गए थे। उनका सम्मान इस आक्रांता के प्रति था। इस प्रकरण के बाद मुरादाबाद सर्किट हाउस में उत्तर प्रदेश के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात ने सियासी हलचल मचा दी थी। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के भाजपा के साथ सुलह समझौते से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दोनों नेताओं ने इसे व्यक्तिगत मुलाकात बताया। असदुद्दीन ओवैसी के साथ ओपी राजभर को गाजियाबाद में चुनावी यात्रा में शामिल होना होना था। जहां से दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर और संभल के पार्टी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के साथ ही मंच साझा करते हुए मुरादाबाद पहुंचते। वहां दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का साझा मंच वाला कार्यक्रम तय था। लेकिन राजभर ने ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। दूसरी ओर भाजपा ने विजेता भारतीय राजा सुहेलदेव को उचित सम्मान दिया। कुछ वर्ष पहले गाजीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रति जिज्ञासा बढ़ेगी। नई पीढ़ी उनके शौर्य और देशभक्ति से प्रेरणा लेगी। इसके पहले भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बहराइच में राजा सुहेल देव की प्रतिमा का अनावरण किया था। नरेंद्र मोदी ने गौरवशाली रूप में राजा सुहेल देव के प्रति श्रद्धा व्यक्त की थी। कहा था कि उनका नाम विजयी और यशस्वी भारतीय राजाओं में शुमार है। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से उनको गरिमा के अनुकूल प्रतिष्ठा मिल रही है लेकिन उस ऐतिहासिक अवसर पर ओमप्रकाश राजभर शामिल नहीं थे। वोटबैंक की राजनीति करने वालों के बयान राजा सुहेल देव की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं थे। महाराज सुहेलदेव ग्यारहवीं शताब्दी में हुए। उन्होंने बहराइच में गजनवी सेनापति सैयद सालार मसूद गाजी को पराजित कर मार डाला था। सत्रहवीं शताब्दी के फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में उनका उल्लेख है। राजा सुहेलदेव ने विदेशी आक्रांता की सवा लाख सेना के साथ कुटिला नदी के तट पर युद्ध किया। उनको पराजित कर हिन्दू धर्म की रक्षा की। जाहिर है कि यह ओमप्रकाश राजभर के लिए आत्मचिंतन का अवसर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2021


bhopal,UP Opportunity ,introspection ,Omprakash Rajbhar

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री अस्थिर वैचारिक स्थिति व्यक्ति को विचलित बनाये रखती है। ऐसे लोग स्वयं विश्वास के संकट से घिर जाते हैं। सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर आज इसी अवस्था में हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। उन्होंने भाजपा के साथ गठबन्धन किया। यह उनके व उनकी पार्टी के लिए सार्थक साबित हुआ। इसके पहले भी वह विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें कभी जीत नसीब नहीं हुई थी। भाजपा के साथ गठबंधन ने उनकी पार्टी को नया मुकाम व नई पहचान दी। वह स्वयं भी विधानसभा पहुंचे। उनकी पार्टी के चार विधायक भी विजयी रहे। भाजपा ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। योगी आदित्यनाथ सरकार में वह कैबिनेट मंत्री बनाये गए। जाहिर है कि यह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था। कैबिनेट मंत्री के रूप में बेहतर कार्य करने का उनके लिए अवसर था। लेकिन उन्होंने इस स्थिति को स्वभाविक रूप में स्वीकार नहीं किया। वह अस्थिर व असंतुष्ट बने रहे। भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसमें मंत्री परिषद सामूहिक दायित्व की भावना से कार्य करती है। यदि एक मंत्री के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव विधानसभा से पारित हो जाये तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है। मंत्री पद के साथ ही गोपनीयता की शपथ भी लेनी पड़ती है। ओमप्रकाश राजभर ने मंत्री रहते हुए संविधान की इस भावना का सम्मान नहीं किया। वह जिस सरकार की कैबिनेट के सदस्य थे, उसी पर हमला बोलते थे। इस स्थिति को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा हाईकमान ने बहुत समय तक बर्दाश्त किया। क्योंकि उनका गठबंधन धर्म के प्रति सम्मान भाव रहा है। यह उम्मीद की गई कि ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन धर्म का सम्मान करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हद पार होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कैबिनेट से हटाने का निर्णय लिया। उसके बाद ओमप्रकाश राजभर दिग्भ्रमित रहे। पांच वर्षों में उन्हें भाजपा के साथ और भाजपा के बाद की स्थिति का भरपूर अनुभव हुआ। पहले उन्होंने एक अन्य पार्टी से भी सम्पर्क किया था लेकिन उन्हें भाजपा में जो सम्मान मिला था, वैसा अनुभव उनको नहीं हुआ। इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद दस पार्टियों के साथ भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाने की कवायद हुई। इसकी शुरुआत ही हास्यास्पद थी। इसमें प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बदलने की सौदेबाजी शामिल की गई। किसी का दूसरे पर विश्वास नहीं था। पहले राजनीतिक कदम के साथ ही इसके बिखरने की अटकलें शुरू हो गई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के साथ सरकार बनाने का दावा करने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का उनसे मोहभंग हो गया है। ओमप्रकाश राजभर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। ये बात अलग है कि उन्होंने इसका कारण अपनी निजी परेशानी को बताया लेकिन बात इतनी सहज नहीं है। वस्तुतः ओवैसी की चाल ने ओमप्रकाश राजभर के राजनीतिक अस्तित्व को ही चुनौती मिल रही थी। ओवैसी के कदम उनके आधार को ही समाप्त करने वाला था। ओवैसी ग़ज़नवी सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी की मजार पर गए थे। उनका सम्मान इस आक्रांता के प्रति था। इस प्रकरण के बाद मुरादाबाद सर्किट हाउस में उत्तर प्रदेश के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात ने सियासी हलचल मचा दी थी। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के भाजपा के साथ सुलह समझौते से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दोनों नेताओं ने इसे व्यक्तिगत मुलाकात बताया। असदुद्दीन ओवैसी के साथ ओपी राजभर को गाजियाबाद में चुनावी यात्रा में शामिल होना होना था। जहां से दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर और संभल के पार्टी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के साथ ही मंच साझा करते हुए मुरादाबाद पहुंचते। वहां दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का साझा मंच वाला कार्यक्रम तय था। लेकिन राजभर ने ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। दूसरी ओर भाजपा ने विजेता भारतीय राजा सुहेलदेव को उचित सम्मान दिया। कुछ वर्ष पहले गाजीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रति जिज्ञासा बढ़ेगी। नई पीढ़ी उनके शौर्य और देशभक्ति से प्रेरणा लेगी। इसके पहले भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बहराइच में राजा सुहेल देव की प्रतिमा का अनावरण किया था। नरेंद्र मोदी ने गौरवशाली रूप में राजा सुहेल देव के प्रति श्रद्धा व्यक्त की थी। कहा था कि उनका नाम विजयी और यशस्वी भारतीय राजाओं में शुमार है। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से उनको गरिमा के अनुकूल प्रतिष्ठा मिल रही है लेकिन उस ऐतिहासिक अवसर पर ओमप्रकाश राजभर शामिल नहीं थे। वोटबैंक की राजनीति करने वालों के बयान राजा सुहेल देव की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं थे। महाराज सुहेलदेव ग्यारहवीं शताब्दी में हुए। उन्होंने बहराइच में गजनवी सेनापति सैयद सालार मसूद गाजी को पराजित कर मार डाला था। सत्रहवीं शताब्दी के फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में उनका उल्लेख है। राजा सुहेलदेव ने विदेशी आक्रांता की सवा लाख सेना के साथ कुटिला नदी के तट पर युद्ध किया। उनको पराजित कर हिन्दू धर्म की रक्षा की। जाहिर है कि यह ओमप्रकाश राजभर के लिए आत्मचिंतन का अवसर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री अस्थिर वैचारिक स्थिति व्यक्ति को विचलित बनाये रखती है। ऐसे लोग स्वयं विश्वास के संकट से घिर जाते हैं। सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर आज इसी अवस्था में हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। उन्होंने भाजपा के साथ गठबन्धन किया। यह उनके व उनकी पार्टी के लिए सार्थक साबित हुआ। इसके पहले भी वह विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें कभी जीत नसीब नहीं हुई थी। भाजपा के साथ गठबंधन ने उनकी पार्टी को नया मुकाम व नई पहचान दी। वह स्वयं भी विधानसभा पहुंचे। उनकी पार्टी के चार विधायक भी विजयी रहे। भाजपा ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। योगी आदित्यनाथ सरकार में वह कैबिनेट मंत्री बनाये गए। जाहिर है कि यह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था। कैबिनेट मंत्री के रूप में बेहतर कार्य करने का उनके लिए अवसर था। लेकिन उन्होंने इस स्थिति को स्वभाविक रूप में स्वीकार नहीं किया। वह अस्थिर व असंतुष्ट बने रहे। भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसमें मंत्री परिषद सामूहिक दायित्व की भावना से कार्य करती है। यदि एक मंत्री के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव विधानसभा से पारित हो जाये तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है। मंत्री पद के साथ ही गोपनीयता की शपथ भी लेनी पड़ती है। ओमप्रकाश राजभर ने मंत्री रहते हुए संविधान की इस भावना का सम्मान नहीं किया। वह जिस सरकार की कैबिनेट के सदस्य थे, उसी पर हमला बोलते थे। इस स्थिति को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा हाईकमान ने बहुत समय तक बर्दाश्त किया। क्योंकि उनका गठबंधन धर्म के प्रति सम्मान भाव रहा है। यह उम्मीद की गई कि ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन धर्म का सम्मान करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हद पार होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कैबिनेट से हटाने का निर्णय लिया। उसके बाद ओमप्रकाश राजभर दिग्भ्रमित रहे। पांच वर्षों में उन्हें भाजपा के साथ और भाजपा के बाद की स्थिति का भरपूर अनुभव हुआ। पहले उन्होंने एक अन्य पार्टी से भी सम्पर्क किया था लेकिन उन्हें भाजपा में जो सम्मान मिला था, वैसा अनुभव उनको नहीं हुआ। इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद दस पार्टियों के साथ भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाने की कवायद हुई। इसकी शुरुआत ही हास्यास्पद थी। इसमें प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बदलने की सौदेबाजी शामिल की गई। किसी का दूसरे पर विश्वास नहीं था। पहले राजनीतिक कदम के साथ ही इसके बिखरने की अटकलें शुरू हो गई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के साथ सरकार बनाने का दावा करने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का उनसे मोहभंग हो गया है। ओमप्रकाश राजभर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। ये बात अलग है कि उन्होंने इसका कारण अपनी निजी परेशानी को बताया लेकिन बात इतनी सहज नहीं है। वस्तुतः ओवैसी की चाल ने ओमप्रकाश राजभर के राजनीतिक अस्तित्व को ही चुनौती मिल रही थी। ओवैसी के कदम उनके आधार को ही समाप्त करने वाला था। ओवैसी ग़ज़नवी सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी की मजार पर गए थे। उनका सम्मान इस आक्रांता के प्रति था। इस प्रकरण के बाद मुरादाबाद सर्किट हाउस में उत्तर प्रदेश के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात ने सियासी हलचल मचा दी थी। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के भाजपा के साथ सुलह समझौते से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दोनों नेताओं ने इसे व्यक्तिगत मुलाकात बताया। असदुद्दीन ओवैसी के साथ ओपी राजभर को गाजियाबाद में चुनावी यात्रा में शामिल होना होना था। जहां से दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर और संभल के पार्टी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के साथ ही मंच साझा करते हुए मुरादाबाद पहुंचते। वहां दोनों ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का साझा मंच वाला कार्यक्रम तय था। लेकिन राजभर ने ओवैसी के साथ शुरू हो रही अपनी चुनावी यात्रा से खुद को अलग कर लिया। दूसरी ओर भाजपा ने विजेता भारतीय राजा सुहेलदेव को उचित सम्मान दिया। कुछ वर्ष पहले गाजीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रति जिज्ञासा बढ़ेगी। नई पीढ़ी उनके शौर्य और देशभक्ति से प्रेरणा लेगी। इसके पहले भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बहराइच में राजा सुहेल देव की प्रतिमा का अनावरण किया था। नरेंद्र मोदी ने गौरवशाली रूप में राजा सुहेल देव के प्रति श्रद्धा व्यक्त की थी। कहा था कि उनका नाम विजयी और यशस्वी भारतीय राजाओं में शुमार है। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से उनको गरिमा के अनुकूल प्रतिष्ठा मिल रही है लेकिन उस ऐतिहासिक अवसर पर ओमप्रकाश राजभर शामिल नहीं थे। वोटबैंक की राजनीति करने वालों के बयान राजा सुहेल देव की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं थे। महाराज सुहेलदेव ग्यारहवीं शताब्दी में हुए। उन्होंने बहराइच में गजनवी सेनापति सैयद सालार मसूद गाजी को पराजित कर मार डाला था। सत्रहवीं शताब्दी के फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में उनका उल्लेख है। राजा सुहेलदेव ने विदेशी आक्रांता की सवा लाख सेना के साथ कुटिला नदी के तट पर युद्ध किया। उनको पराजित कर हिन्दू धर्म की रक्षा की। जाहिर है कि यह ओमप्रकाश राजभर के लिए आत्मचिंतन का अवसर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2021


bhopal, Pegasus spy controversy, turns into political battle

प्रमोद भार्गव पेगासस फोन जासूसी विवाद संसद में राजनीति के संग्राम में बदल गया है। संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं, न्यायाधीशों और पत्रकारों समेत प्रमुख हस्तियों के फोन टैप कराए जाने का आरोप लगाते हुए समूचा विपक्ष नरेंद्र मोदी सरकार पर आक्रामक है। विपक्ष इस मुद्दे पर संसद में तत्काल चर्चा के साथ 'संयुक्त संसदीय समीति' से जासूसी प्रकरण की जांच कराने की मांग कर रहा है। वहीं, सरकार इस पूरे मामले को ही निराधार बता रही है। राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सवाल किया कि सरकार सिर्फ इतना स्पष्ट करे कि सरकार ने पेगासस स्पाईवेयर सॉफ्टवेयर की निर्माता कंपनी एनएसओ से कोई सौदा किया है अथवा नहीं ? इस प्रश्न के उत्तर में पूर्व सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि 'देश में आतंकवाद या सुरक्षा के मसले पर यदि जांच एजेंसियां किसी की निगरानी करती है तो इसके लिए पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है।' यह उत्तर कुछ उस तर्ज पर दिया गया है, जिसमें महाभारत युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से पूछा कि अश्वत्थामा की मृत्यु के बारे में सच बताओ ? तब युधिष्ठिर बोले 'अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी।' किंतु हाथी शब्द इतना धीमे स्वर में बोला कि उसे ठीक से सुनने से पहले द्रोणाचार्य अचेत होते चले गए। रविशंकर का बयान भी कुछ ऐसा ही रहस्यमयी है। भारत की स्थिर सरकार को अस्थिर करने के हथकंडे पश्चिमी मीडिया अपनाता रहा है। इसलिए उसने कथित पेगासस प्रोजेक्ट बम ऐसे समय पटका, जब संसद के मानसून सत्र की शुरूआत होनी थी। नतीजतन पिछले सात वर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार से मुंह की खा रहे विपक्ष को हंगामे का नया हथियार मिल गया। डिजिटल सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिए दुनिया की सरकारें अपने नागरिकों, विरोधियों या अन्य संदिग्धों की जासूसी करवाती रही हैं। यह नया कथित खुलासा 16 मीडिया संस्थानों ने मिलकर किया है। इसके नतीजे पश्चिम के प्रमुख अखबार 'द गार्जियन’ और 'वाशिंगटन पोस्ट’ समेत कई मीडिया पोर्टल पर जारी किए गए हैं। इनमें 40 भारतीयों के नाम हैं। प्रमुख लोगों में राहुल गांधी, ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला के साथ पांच भारतीय पत्रकार भी शामिल हैं। 'द वायर’ ने भी यह सूची जारी की है। द वायर भारत सरकार के खिलाफ अजेंडा चलाती रही है। यदि वास्तव में इन हस्तियों के मोबाइल फोन टेप किए जा रहे थे, तो इसकी सच्चाई जानने के लिए इन लागों को अपने फोन फॉरेंसिक जांच के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल को देने होंगे। अबतक अकेले प्रशांत किशोर ने अपना मोबाइल जांच के लिए सौंपा है। यहां सवाल उठता है कि यदि अन्य लोग मोबाइल पर आपत्तिजनक कोई बात नहीं कर रहे थे, तब वे अपने फोन जांच के लिए क्यों नहीं दे रहे ? इस खुलासे से संसद से सड़क तक बेचैनी जरूर है लेकिन इसके परिणाम किसी अंजाम तक पहुंचने वाले नहीं हैं। यह मुखबिरी पेगासस के माध्यम से भारत के लोगों पर ही नहीं 40 देशों के 50 हजार लोगों पर कराई जा रही थी। इस सॉफ्टवेयर की निर्माता कंपनी एनएसओ ने दावा किया है कि इसे वह अपराध और आतंकवाद से लड़ने के लिए केवल सरकारों को ही बेचती है। पूर्व आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद में एनएसओ का पत्र लहराते हुए पूरे मामले को नकार दिया। तय है कि सरकार ने ऐसा कोई अनाधिकृत काम नहीं किया है, जो निंदनीय हो अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करता हो। इसीलिए इस रहस्य का खुलासा करने वाली फ्रांस की कंपनी फारबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ऐसे कोई तथ्य नहीं दिए हैं, जो फोन की बातचीत को प्रमाणित करते हों। गोया बिना साक्ष्यों के कथित खुलासा व्यर्थ है और हंगामा भी संसद में कीमती समय की बर्बादी है। अतएव सत्ताधारी दल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की हत्या जैसे आरोप बेबुनियाद हैं।एक तरफ भारत ही नहीं दुनिया की नीतियां ऐसी बनाई जा रही हैं कि नागरिक डिजिटल तकनीक का उपयोग करने के लिए बाध्य हो या फिर स्वेच्छा से करे। दूसरी तरफ सोशल साइट ऐसे ठिकाने हैं, जिन्हें व्यक्ति निजी जिज्ञासा पूर्ति के लिए उपयोग करता है। इस दौरान की गई बातचीत पेगासस सॉफ्टवेयर ही नहीं, कई ऐसे अन्य सॉफ्टवेयर भी हैं जो व्यक्ति की सभी गतिविधियों का क्लोन तैयार कर लेने में सक्षम हैं। इसकी खासियत है कि इसके प्रोग्राम को किसी स्मार्टफोन में डाल दिया जाए तो यह हैकर का काम करने लगता है। नतीजतन फोन में संग्रहित सामग्री ऑडियो, वीडियो, चित्र, लिखित सामग्री, ईमेल और व्यक्ति के लोकेशन तक की जानकारी पेगासस हासिल कर लेता है। इसकी विलक्षणता यह भी है कि यह एन्क्रिप्टेड संदेशों को भी पढ़ने लायक स्थिति में ला देता है। पेगासस स्पाईवेयर इजराइल की सर्विलांस फर्म एनएसओ ने तैयार किया है। पेगासस नाम का यह एक प्रकार का वायरस इतना खतरनाक व शाक्तिशाली है कि लक्षित व्यक्ति के मोबाइल में मिस्ड कॉल के जरिए प्रवेश कर जाता है। इसके बाद यह मोबाइल में मौजूद सभी डिवाइसों को एक तो सीज कर सकता है, दूसरे जिन हाथों के नियंत्रण में यह वायरस है, उनके मोबाइल स्क्रीन पर लक्षित व्यक्ति की सभी जानकरियां क्रमवार हस्तांरित होने लगती हैं। गोया, लक्षित व्यक्ति की कोई भी जानकारी सुरक्षित व गोपनीय नहीं रह जाती। यह वायरस इतना चालाक है कि निशाना बनाने वाले मोबाइल पर हमले के कोई निशान नहीं छोड़ता। कम से कम बैटरी, मेमौरी और डेटा की खपत करता है। यह महज एक सेल्फ-डिस्ट्रक्ट ऑप्शन (विनाशकारी विकल्प) के रूप में आता है, जिसे किसी भी समय इस्तेमाल किया जा सकता है। वैसे पेगासस या इस जैसे सॉफ्टवेयर पहली बार चर्चा में नहीं हैं। देश के रक्षा संस्थानों की हनीट्रेप के जरिए जासूसी करने के भी अनेक मामले ऐसे ही सॉफ्टवेयरों से अंजाम तक पहुंचाए गए हैं। इजरायली प्रौद्योगिकी से वाट्सऐप में सेंध लगाकर 1400 भारतीय सामाजिक कार्यकताओं व पत्रकारों की बातचीत के डेटा हैक कर जासूसी का मामला भी 2019 में आम चुनाव के ठीक पहले सामने आया था। इसमें देश के 13 लाख क्रेडिट-डेबिट कार्ड का डेटा लीक कर हैकर्स ऑनलाइन बेच रहे थे। साफ है, इन डिजिटल महा-लुटेरों से निपटना आसान नहीं है। बावजूद यह शायद आम चुनाव के ठीक पहले मोदी सरकार की छवि खराब करने की दृष्टि से सामने लाया गया था। दुनियाभर में डेढ़ करोड़ उपभोक्ताओं वाले वाट्सऐप में सेंघ लगाकर पत्रकारों विपक्षी नेताओं, मानवाधिकारों व सामाजिक कार्यकताओं की जासूसी करने के आरोप भी लगे थे लेकिन इसमें भी कोई प्रमाण अबतक सामने नहीं आए हैं। उस समय फेसबुक के स्वामित्व वाली वाट्सऐप ने स्वयं जानकारी दी थी कि इजरायली स्पाइवेयर 'पेगासस' के मार्फत चार महाद्वीपों में करीब 1400 लोगों के फोनों में सेंघ लगाई गई है। इस रहस्योद्घाटन के बाद वाट्सऐप ने अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित संघीय न्यायालय में एनएसओ समूह के विरुद्ध मुकदमा भी दायर किया हुआ है। इस एफआईआर में वाट्सऐप ने कहा है कि '1400 फोन में स्पाइवेयर पेगासस डालकर उपभोक्ताओं की महत्वपूर्ण जानकारी चुराई गई हैं।' हालांकि वाट्सऐप ने कुटिलता बरतते हुए प्रभावितों की संख्या सही नहीं बताई। यह जानकारी तब चुराई गई थी, जब भारत में अप्रैल-मई 2019 में लोकसभा के चुनाव चल रहे थे। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में विपक्ष ने यह आशंका जताई थी कि इस स्पाइवेयर के जरिए विपक्षी नेताओं और केंद्र सरकार के खिलाफ संघर्षरत लोगों की अपराधियों की तरह जासूसी कराई गई।' हालांकि इस मामले में भी अबतक कोई तथ्यपूर्ण सच्चाई सामने नहीं आई है।वैसे आईटी कानून के तहत भारत में कार्यरत कोई भी सोशल साइट या साइबर कंपनी यदि व्यक्ति विशेष या संस्था की कोई गोपनीय जानकारी जुटाना चाहती है तो केंद्र व राज्य सरकार से लिखित अनुमति लेना आवश्यक है। ये नियम इसलिए बनाए गए हैं, जिससे व्यक्ति की निजता का हनन न हो। वैसे सरकारों द्वारा अपने विरोधियों के टेप करने के मामले जब तक सामने आते ही रहते हैं। जो कांग्रेस पेगासस जासूसी कांड पर हंगामा बरपाए हुए है, उसी कांग्रेस ने 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा और रानीतिक लॉबिस्ट नीरा राड़िया की बातचीत का टेप लीक हुआ था। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर यह बड़ा संकट था। अरुण जेटली ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा तक मांग लिया था। बाद में सूचना के अधिकार के अंतर्गत चाही गई जानकारी से खुलासा हुआ कि यूपीए सरकार रोजाना 300 फोन एवं 20 ईमेल टेप करा रही थी। हालांकि भारत में 10 ऐसी सरकारी गुप्तचर जांच एजेंसियां हैं जो आधिकारिक रूप से संदिग्ध व्यक्ति अथवा संस्था की जांच कर सकती हैं। भारत में संचार उपकरण से जुड़ा पहला बड़ा मामला राष्ट्रपति ज्ञानी जैल की जासूसी से जुड़ा है। इस फोन टैपिंग के समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। इस मामले में राष्ट्रपति के पत्रों की जांच करने का आरोप राजीव गांधी सरकार पर लगा था। इसी तरह पूर्व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के सरकारी दफ्तर में भी जासूसी यंत्र 'बग' मिलने की घटना सामने आई थी। इस समय डॉ. मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे। यानी जिस प्रधानमंत्री को कठपुतली प्रधानमंत्री माना जाता था, उन्हीं के कार्यकाल में सबसे ज्यादा जासूसी के गोपनीय मामले सामने आए थे। इन रहस्यों के उजागर होने से इलेक्ट्रोनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग को लेकर लोगों के मन में संदेह स्वाभाविक है। लिहाजा सरकार को अपनी जवाबदेही स्पष्ट करने की जरूरत है। लेकिन हंगामे के बीच सफाई कैसे दी जाए ? शोर थमे तब सरकार का स्पष्टीकरण सामने आए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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bhopal, Seeing no way, Mayawati went , woo Brahmins

उपेन्द्र नाथ राय कभी ‘तिलक, तराजू और तलवार। इनको मारो जूते चार।’ का नारा देने वाली बसपा प्रमुख मायावती को 2007 के बाद फिर ब्राह्मणों की याद आ गयी। 14 अप्रैल 1984 को बसपा के गठन के बाद पहली बार ब्राह्मण मतदाताओं के समर्थन से 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकीं मायावती का यह प्रेम यूं ही नहीं उमड़ा है। 15 वर्षों बाद भी ब्राह्मणों को याद करने वाली मायावती के पास अब कोई रास्ता भी नहीं बचा है। कभी दलित वर्ग के कारण यूपी की राजनीति में चमक-धमक दिखाने वाली मायावती से अब दलितों का भी एक बड़ा तबका उनसे खिसक चुका है। पश्चिम में इसबार भीम आर्मी द्वारा इनके वोटबैंक में अच्छी सेंध लगाने की उम्मीद है। ऐसे में यदि भाजपा को टक्कर देती वे नहीं दिखती हैं तो मुस्लिम वोट बैंक उनकी तरफ नहीं खिसकेगा। वे इसी कोशिश में लगी हैं कि भाजपा का प्रमुख प्रतिद्वदी सपा न होकर बसपा बने। यदि बसपा प्रमुख प्रतिद्वंदी आमजन में दिखने लगती है तो मुस्लिम अपने-आप बसपा की तरफ मुड़ जाएंगे। इसी कारण सतीश मिश्रा को ब्राह्मणों को लुभाने के लिए अभी से लगा दिया गया है। वे ब्राह्मणों का बसपा की तरफ झुकाव लाने के लिए कोशिश करेंगे। उनकी सभा की शुरूआत के लिए भी राम की नगरी अयोध्या को चुना गया है, जहां 23 जुलाई से शुरूआत होगी और पहला फेज 29 तक चलेगा। यदि ब्राह्मण और राजनीति पर नजर दौड़ाएं तो उत्तर प्रदेश में लगभग 11 प्रतिशत ब्राह्मण हैं, जिन्हें लुभाने के लिए विभिन्न पार्टियां अपने-अपने ढंग से दांव चलती रहती हैं। 2007 को अपवाद के रूप में छोड़ दिया जाय तो ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस के बाद भाजपा की तरफ शिफ्ट हो गया। 2007 में मायावती ने ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट देने के साथ ही एक नारा ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ का नारा देकर पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी। यदि बसपा के मुख्य वोट बैंक दलित वर्ग पर नजर दौड़ाएं तो वह भी बहुत हद तक खिसक चुका है। पश्चिमी यूपी में भीम आर्मी द्वारा ठीक-ठाक दलित वोट अपने पक्ष में करने की उम्मीद जताई जा रही है। अब इसबार बसपा की तरफ ब्राह्मण झुकेगा अथवा नहीं यह तो भविष्य की गर्त में है लेकिन इतना सत्य है कि ब्राह्मणों का एक वर्ग भाजपा से नाराज चल रहा है। बसपा इसी का फायदा उठाना चाहती है। बसपा प्रमुख मायावती कह भी चुकी हैं कि भाजपा से नाराज चल रहे ब्राह्मण बसपा की तरफ शिफ्ट हो जाएं। यदि बसपा की वर्तमान स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो प्रदेश में इसकी स्थिति तीसरे नम्बर की दिख रही है। समाजवादी पार्टी ही भाजपा को टक्कर देती दिख रही है। ऐसे में यदि बसपा टक्कर देते नहीं दिखती तो मुस्लिम मतदाता सपा की तरफ शिफ्ट हो जाएगा और बसपा काफी पीछे के पायदान पर खिसक जाएगी। यदि बसपा ब्राह्मणों को अपनी तरफ झुकाने में सफल हो जाती है तो दलित और ब्राह्मण मिलकर उसके वोटबैंक में काफी इजाफा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में मुस्लिम मतदाता बसपा की तरफ झुक जाएंगे। दरअसल मुस्लिम मतदाता उसी को वोट करेगा, जो भाजपा को टक्कर देता दिखेगा। इस कारण मायावती भी समझती हैं कि मुस्लिमों को लुभाने की बहुत जरूरत नहीं है। उन्हें सिर्फ यह दिखाना है कि हम भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंदी हैं। मुख्य प्रतिद्वंदी बनने के बाद मुस्लिम मतदाता की मजबूरी है कि वह बसपा को वोट करे। भाजपा भी यही चाहती है। उसकी भीतरी कोशिश है कि सपा ही मुख्य प्रतिद्वदी के रूप में न दिखे, वरना पूरा मुस्लिम वोट उसकी तरफ खिसक जाने से भाजपा को नुकसान होगा। इस कारण भाजपा हमेशा यह चाहेगी कि बसपा व कांग्रेस भी प्रतिद्वदी के रूप में प्रदेश में उभर कर आये, जिससे मुस्लिम मतदाता कहीं एक पार्टी की तरफ शिफ्ट न करें। पिछले बसपा के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो 2007 में ब्राह्मण-दलित वर्ग के भरोसे विधानसभा चुनाव में परचम लहराने में कामयाब रहीं मायावती को फिर कोई रास्ता नहीं दिखने पर इसे आजमाने का निर्णय लिया है। अपने अधिकांश वरिष्ठ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा चुकी मायावती को सिर्फ सतीश मिश्र के सहारे सत्ता के नजदीक तक यह ब्राह्मण कार्ड कितना पहुंचाएगा, यह तो भविष्य की गर्त में है। 2007 के उप्र विधानसभा चुनाव व सीटों का आंकलन करें तो उससे पहले 2002 में त्रिशंकु विधानसभा थी। तीन मई 2002 को मायावती भाजपा और रालोद के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थी लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया। बसपा के कुछ बागी विधायकों व कांग्रेस के सहयोग से नाटकीय घटनाक्रम में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गये। समाजवादी पार्टी की जब भी सरकार रही अराजकता चरम पर पहुंच जाती है। उसी के बाद 2007 का चुनाव हुआ। मायावती समझ चुकी थीं कि सिर्फ दलित के भरोसे सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सतीश मिश्र को ब्राह्मण-दलित गठजोड़ के लिए मैदान में उतारा। ब्राह्मणों में उस वक्त शासन सत्ता को लेकर बहुत नाराजगी भी थी और भाजपा अथवा कांग्रेस की सरकार बनती नहीं दिख रही थी। बसपा ने इसका फायदा उठाया। मायावती ने वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के अंतर्गत 139 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट प्रदान किया था। तब बसपा ने 114 पिछड़ों व अतिपिछड़ों, 61 मुस्लिम व 89 दलित को टिकट दिया था। सवर्णों में सबसे अधिक 86 ब्राह्मण प्रत्याशी बनाए गए थे और इसके अलावा 36 क्षत्रिय व 15 अन्य सवर्ण उम्मीदवार चुनावी जंग में उतारे थे। इस ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का नतीजा रहा कि 14 अप्रैल 1984 में गठित हुई बसपा को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला और 206 सीट पाकर मायावती ने सरकार बनाई। सपा को 97 सीटें मिली, जबकि 2002 में 88 सीट पाने वाली भाजपा 51 सीट पर सिमट गयी। कांग्रेस 25 से 22 सीट पर आ गयी। बसपा ने वर्ष 2007 से 2012 तक बहुमत की सरकार चलायी। इस बीच वह अपने जनाधार को बचाए न रख सकी। वर्ष 2012 में पांच प्रतिशत वोट कम हो गये। उसे 25.91 वोट मिले और वह सरकार से बाहर हो गयी। हालांकि वर्ष 2012 में बसपा अध्यक्ष ने इस फॉर्मूले को त्याग दिया था। बसपा ने वर्ष 2012 में सोशल इजीनियरिंग में फेरबदल किया। सवर्ण उम्मीदवारों की कटौती करते हुए मुसलमानों को तरजीह दी। बसपा ने 113 पिछड़े-अतिपिछड़े, 85 मुस्लिम, 88 दलित व 117 सवर्ण प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। सवर्णों में 74 ब्राह्मण, 33 क्षत्रिय और 10 अन्य उम्मीदवारों को टिकट दिया गया परन्तु बसपा को करारा झटका लगा था। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत की जनसंख्या वृद्धि को संतुलित करने जिस तरह से उत्तर प्रदेश से प्रारंभ होकर कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों ने कानून सम्मत कदम उठाना शुरू कर दिए हैं, उसके बाद कांग्रेस नेता एवं तमाम विपक्ष यह आरोप लगा रहे हैं कि इसके पीछे की मंशा एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाने की है। खुलकर कहें तो ये सभी कह रहे हैं कि ''मुसलमानों'' को भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश से शुरूआत करते हुए पूरे देश में प्रयोगशाला के रूप में टारगेट करना चाह रही है, प्रयोग के तौर पर उत्तर प्रदेश से इसका आरंभ योगी सरकार से हुआ है। शशि थरूर जिनकी अपनी छवि एक 'बौद्धिक' की है, जब देशहित से परे जाकर इस तरह की बात कहते हैं, तब अवश्य ही दुख होता है कि व्यक्ति राजनीति से ऊपर उठकर इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि उसे इसका लाभ अपने हित में कहीं दिखाई नहीं देता है। किंतु क्या व्यक्तिगत हित, राष्ट्र और राज्य हित के भी ऊपर होना चाहिए? आखिर यह राजनीति किसलिए है? राष्ट्र के लिए या व्यक्ति के अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए? आज ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिन्हें उन सभी से पूछा जा रहा है जो देश में ''जनसंख्या नियंत्रण'' का विरोध कर रहे हैं । यहां पहले बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर की करते हैं, वे आज आरोप लगा रहे हैं कि इस मुद्दे (जिनसंख्या) को उठाने के पीछे की बीजेपी की मंशा राजनीतिक है। इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है। इसलिए भाजपा सुनियोजित मकसद से इस मुद्दे को उठा रही है। थरूर के मुताबिक, 'यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि उत्तर प्रदेश, असम और लक्षद्वीप में आबादी कम करने की बात हो रही है, जहां हर कोई जानता है कि उनका इरादा किस ओर है।' वे कह रहे हैं 'हमारी राजनीतिक व्यवस्था में हिंदुत्व से जुड़े तत्वों ने आबादी के मुद्दे पर अध्ययन नहीं किया है। उनका मकसद विशुद्ध रूप से राजनीतिक और सांप्रदायिक है।' कुल मिलाकर अभी जनसंख्या को लेकर बहस पूरी तरह ठीक नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री थरूर का मानना है कि अगले 20 साल बाद हमारे लिए बढ़ती जनसंख्या नहीं एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम होगी। वस्तुत: आज थरूर की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का एक मसौदा सामने रखा गया है, जिसमें प्रावधान है कि जिनके दो बच्चों से अधिक होंगे उन्हें सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जाएगा और दो बच्चों की नीति का अनुसरण करने वालों को लाभ दिया जाएगा। अव्वल तो यह कि थरूर जिस 20 साल बाद एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम की बात कह रहे हैं, उसका कोई आधार इसलिए नहीं है क्योंकि जनसंख्या पर कोई पूरी तरह से रोक नहीं लगने जा रही है। बच्चे पैदा होते रहेंगे और भारत में हर वर्ष युवाओं की संख्या में भी इजाफा होता रहेगा, हां इतना अवश्य होगा कि जिस तरह से वर्तमान में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, उस पर कुछ लगाम लगेगी। फिर जिस जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर यह कहा जा रहा है कि इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है तो यह कहना भी इसलिए निराधार है क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित संपूर्ण देश में अधिकांश राज्यों की कुल जनसंख्या में हिन्दू आबादी ही अधिक है, स्वभाविक है कि जन्म दर जनसंख्या के अनुपात में उनकी ही अधिक है, ऐसे में जब यह जनसंख्या नियंत्रण का कानून यदि किसी राज्य में व्यवहार में लाया जाता है तो स्वभाविक है कि इसका असर यदि किसी पर अधिक होगा तो वे हिन्दू ही हैं। पिछले साल भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बहुत ही विस्तार से बताया था कि कैसे जनसंख्या का भारत जैसे देश में अनियंत्रित रूप से बढ़ना उसके लिए संकट खड़ा कर रहा है। उन्होंने इस पत्र में कहा था कि देश की राजधानी विश्व के 190 देशों की राजधानियों में सबसे अधिक प्रदूषित हो गई है। उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र से सजा हुआ भारत आज प्रदूषण से कराह रहा है। उन्होंने इस बात पर हैरानी प्रकट की थी कि इस समस्या के असली कारण को नहीं देखा जा रहा। भारत स्वतंत्रता के बाद 35 करोड़ से बढ़ते-बढ़ते आज 141 करोड़ आबादी वाला दुनिया को दूसरा सबसे बड़ा देश बना गया है। आबादी के साथ-साथ सबकुछ बढ़ता है। यही प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। प्रदूषण ही नहीं देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी का कारण भी जनसंख्या विस्फोट है। वे यहां लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले छह सालों में गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के लिए हरसंभव प्रयत्न हुए हैं। उसके बाद भी ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं। बेरोजगारी के कारण युवा पीढ़ी हताश और निराश है और आत्महत्याएं बढ़ रहीं हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सुझाव दिया था कि अतिशीघ्र पहल करें। देश में एक कानून बने और एक ही नारा हो। हम दो हमारे दो। अब यह अलग बात है कि केंद्र के स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जनसंख्या नियंत्रण पर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (एनडीए) में सहमति बनानी है जबकि उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कोई सहमति की आवश्यकता योगी सरकार को नहीं है, इसलिए यह पहल आज उत्तर प्रदेश से सबसे पहले सामने आई है। वस्तुत: होना यह चाहिए था कि देशभर में कांग्रेस एवं अन्य दल भी इस जनसंख्या नियंत्रण के लिए योगी सरकार के प्रयासों का स्वागत करते नजर आते। प्रधानमंत्री मोदी पर भी यह दबाव बनाते कि वे भारत में अतिशीघ्र जनंसख्या नियंत्रण कानून लागू करें। क्योंकि यह किसी समुदाय विशेष से नहीं देश के विकास एवं उत्तरोत्तर उत्थान से जुड़ा फैसला है। यहां देखें, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नियंत्रण की नीति में वर्ष 2026 तक जन्म दर को प्रति हजार आबादी पर 2.1 तथा वर्ष 2030 तक 1.9 लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें बच्चों और किशोरों के सुंदर स्वास्थ्य, उनके शिक्षा के लिए भी कदम हैं। मसलन 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था है। इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा इस नीति में है जो एक सुखद लोक कल्याणकारी राज्य की जरूरतों और कल्पनाओं को साकार रूप देता दिखाई देता है। पूरी नीति में कहीं विभेदीकरण नजर नहीं आता, किंतु दुर्भाग्य है कि जिन्हें आलोचना करनी है, वे इसे धर्म और एक समुदाय विशेष से जोड़कर देख रहे हैं। यहां हम जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों के आधार पर भी वर्तमान स्थिति की तुलना कर सकते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 33.96 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने शादी की और इनसे देश में कुल 91.50 करोड़ बच्चे हैं । मतलब औसतन हर महिला के 2.69 बच्चे हैं। देश की 53.58 फीसदी महिलाओं के दो या दो से कम बच्चे हैं, जबकि 46.42 फीसदी महिलाओं से दो से अधिक बच्चे हैं। जिसमें आज देश की आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सा उत्तर प्रदेश का है। 2011 की जनगणना के अनुसार उप्र में कुल 19.98 करोड़ लोग रहते हैं। आबादी के हिसाब से देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम भी उत्तर प्रदेश में ही रहते हैं। यहां औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। 55.8 फीसदी महिलाओं से दो से ज्यादा बच्चे हैं, जबकि देश का आंकड़ा 46.42 फीसदी है। इन आंकड़ों से भी समझा जा सकता है कि योगी सरकार जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानून क्यों बनाना चाहती है। यहां जिन्हें जनसंख्या के नियंत्रण में धर्म और समुदाय विशेष नजर आते हैं उन्हें इन आंकड़ों पर गौर करना चाहिए कि 2011 की जनगणना के ही अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल आबादी 19.98 करोड़ में 15.93 करोड़ हिन्दू हैं जो कुल जनसंख्या का 79.73 फीसद है। 3.84 करोड़ मुस्लिम रहते हैं, जो कि कुल आबादी का 19.26 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश की औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं। हिन्दू महिलाओं के औसतन 3.06 बच्चे हैं, मुस्लिम महिलाओं के औसतन 3.6 फीसदी बच्चे हैं। कुल मिलाकर जनसंख्या के अनुपात में इसे समग्रता से देखें तो आज जिस तरह से जनसंख्या यहां बढ़ रही है, उसमें हिन्दू और मुसलमानों की जनसंख्या बराबर से बढ़ती रहेगी। ऐसे में न तो कभी उत्तर प्रदेश भविष्य में कभी भी मुस्लिम बहुल्य होने जा रहा है और न ही यहां हिन्दू कभी अल्पसंख्यक होगा। बल्कि इस जनसंख्या के आनेवाले कानून से अधिकांश हिन्दुओं की आबादी ही कम होगी। उसका मूल कारण हिन्दुओं का स्वभाव है, जिसमें बेहतर भविष्य को प्राथमिकता दी जाती है। यह कहने के पीछे का तर्क यह है कि जब साल 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई तो पहली बार भारत के मुस्लिम समाज में पिछड़ेपन को लेकर चर्चा होने लगी, किंतु इसके पीछे के कारणों को गंभीरतापूर्वक देखें तो कौन मुसलमानों को पीछे रखने के लिए जिम्मेदार नजर आता है? निश्चित ही वे स्वयं और उनका नेतृत्व जबकि इसके उलट हिन्दुओं में स्वविवेक अपनी पीढ़ियों को अच्छा माहौल एवं जीवन देने का शुरू से ही देखा जा सकता है। उनका नेतृत्व उनसे कुछ कहे या न कहे परिवारिक व्यवस्था ही ऐसी है कि सबसे पहले सरकारी नौकरियों से लेकर अच्छे व्यापार की ओर ध्यान देकर 'मां लक्ष्मी' को प्रसन्न करने का उपक्रम हिन्दू स्वभावगत रूप से करता है और परिणामस्वरूप मुसलमानों की जनसंख्या के अनुपात में अच्छा जीवन जीता है। इसलिए अभी भी जो जनसंख्या को लेकर योगी सरकार की नीति है, उससे सबसे अधिक हिन्दुओं की जनसंख्या पर ही नकारात्मक असर होनेवाला है, फिर भी अधिकांश हिन्दू इस नीति के समर्थन में नजर आ रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के लिए हर हाल में सुखद भविष्य चाहिए। देखा जाए तो जनसंख्या नियंत्रण केवल कानून का नहीं, सामाजिक जागरूकता का भी विषय है। विरोध का तार्किक आधार हो तो विचार किया जा सकता है लेकिन इसे मुसलमानों को लक्षित नीति कहना निराधार है। शशि थरूर जैसे राजनीतिक विद्वानों के साथ मुसलमानों की राजनीति कर रहे एडवोकेट असदुद्दीन ओवैसी हों या जयराम रमेश जैसे नेता। वस्तुत: जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने का राज्य के स्तर पर या देश में विरोध करनेवालों को समझना होगा कि भारत का भू-भाग नहीं बढ़ाया जा सकता, जितनी अधिक जनसंख्या उतना अधिक भार। सफल जीवन जीने के लिए जरूरी है अधिक आवश्यक संसाधन जुटाना। जनसंख्या नियंत्रण के विरोध में उभरते स्वर, भविष्य में विकसित देश बनने की प्रक्रिया के लिए भी भारत की आवश्यकताओं को समझें। यूरोप के देशों के साथ ही खासकर अमेरिका से सबक लें और जनसंख्या के मामले में योगी से मोदी तक के समर्थन में बिना राजनीतिक नफा-नुकसान देखे व देशहित में आगे आएं। (लेखक फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 19 July 2021


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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत की जनसंख्या वृद्धि को संतुलित करने जिस तरह से उत्तर प्रदेश से प्रारंभ होकर कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों ने कानून सम्मत कदम उठाना शुरू कर दिए हैं, उसके बाद कांग्रेस नेता एवं तमाम विपक्ष यह आरोप लगा रहे हैं कि इसके पीछे की मंशा एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाने की है। खुलकर कहें तो ये सभी कह रहे हैं कि ''मुसलमानों'' को भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश से शुरूआत करते हुए पूरे देश में प्रयोगशाला के रूप में टारगेट करना चाह रही है, प्रयोग के तौर पर उत्तर प्रदेश से इसका आरंभ योगी सरकार से हुआ है। शशि थरूर जिनकी अपनी छवि एक 'बौद्धिक' की है, जब देशहित से परे जाकर इस तरह की बात कहते हैं, तब अवश्य ही दुख होता है कि व्यक्ति राजनीति से ऊपर उठकर इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि उसे इसका लाभ अपने हित में कहीं दिखाई नहीं देता है। किंतु क्या व्यक्तिगत हित, राष्ट्र और राज्य हित के भी ऊपर होना चाहिए? आखिर यह राजनीति किसलिए है? राष्ट्र के लिए या व्यक्ति के अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए? आज ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिन्हें उन सभी से पूछा जा रहा है जो देश में ''जनसंख्या नियंत्रण'' का विरोध कर रहे हैं । यहां पहले बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर की करते हैं, वे आज आरोप लगा रहे हैं कि इस मुद्दे (जिनसंख्या) को उठाने के पीछे की बीजेपी की मंशा राजनीतिक है। इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है। इसलिए भाजपा सुनियोजित मकसद से इस मुद्दे को उठा रही है। थरूर के मुताबिक, 'यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि उत्तर प्रदेश, असम और लक्षद्वीप में आबादी कम करने की बात हो रही है, जहां हर कोई जानता है कि उनका इरादा किस ओर है।' वे कह रहे हैं 'हमारी राजनीतिक व्यवस्था में हिंदुत्व से जुड़े तत्वों ने आबादी के मुद्दे पर अध्ययन नहीं किया है। उनका मकसद विशुद्ध रूप से राजनीतिक और सांप्रदायिक है।' कुल मिलाकर अभी जनसंख्या को लेकर बहस पूरी तरह ठीक नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री थरूर का मानना है कि अगले 20 साल बाद हमारे लिए बढ़ती जनसंख्या नहीं एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम होगी। वस्तुत: आज थरूर की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का एक मसौदा सामने रखा गया है, जिसमें प्रावधान है कि जिनके दो बच्चों से अधिक होंगे उन्हें सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जाएगा और दो बच्चों की नीति का अनुसरण करने वालों को लाभ दिया जाएगा। अव्वल तो यह कि थरूर जिस 20 साल बाद एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम की बात कह रहे हैं, उसका कोई आधार इसलिए नहीं है क्योंकि जनसंख्या पर कोई पूरी तरह से रोक नहीं लगने जा रही है। बच्चे पैदा होते रहेंगे और भारत में हर वर्ष युवाओं की संख्या में भी इजाफा होता रहेगा, हां इतना अवश्य होगा कि जिस तरह से वर्तमान में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, उस पर कुछ लगाम लगेगी। फिर जिस जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर यह कहा जा रहा है कि इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है तो यह कहना भी इसलिए निराधार है क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित संपूर्ण देश में अधिकांश राज्यों की कुल जनसंख्या में हिन्दू आबादी ही अधिक है, स्वभाविक है कि जन्म दर जनसंख्या के अनुपात में उनकी ही अधिक है, ऐसे में जब यह जनसंख्या नियंत्रण का कानून यदि किसी राज्य में व्यवहार में लाया जाता है तो स्वभाविक है कि इसका असर यदि किसी पर अधिक होगा तो वे हिन्दू ही हैं। पिछले साल भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बहुत ही विस्तार से बताया था कि कैसे जनसंख्या का भारत जैसे देश में अनियंत्रित रूप से बढ़ना उसके लिए संकट खड़ा कर रहा है। उन्होंने इस पत्र में कहा था कि देश की राजधानी विश्व के 190 देशों की राजधानियों में सबसे अधिक प्रदूषित हो गई है। उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र से सजा हुआ भारत आज प्रदूषण से कराह रहा है। उन्होंने इस बात पर हैरानी प्रकट की थी कि इस समस्या के असली कारण को नहीं देखा जा रहा। भारत स्वतंत्रता के बाद 35 करोड़ से बढ़ते-बढ़ते आज 141 करोड़ आबादी वाला दुनिया को दूसरा सबसे बड़ा देश बना गया है। आबादी के साथ-साथ सबकुछ बढ़ता है। यही प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। प्रदूषण ही नहीं देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी का कारण भी जनसंख्या विस्फोट है। वे यहां लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले छह सालों में गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के लिए हरसंभव प्रयत्न हुए हैं। उसके बाद भी ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं। बेरोजगारी के कारण युवा पीढ़ी हताश और निराश है और आत्महत्याएं बढ़ रहीं हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सुझाव दिया था कि अतिशीघ्र पहल करें। देश में एक कानून बने और एक ही नारा हो। हम दो हमारे दो। अब यह अलग बात है कि केंद्र के स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जनसंख्या नियंत्रण पर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (एनडीए) में सहमति बनानी है जबकि उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कोई सहमति की आवश्यकता योगी सरकार को नहीं है, इसलिए यह पहल आज उत्तर प्रदेश से सबसे पहले सामने आई है। वस्तुत: होना यह चाहिए था कि देशभर में कांग्रेस एवं अन्य दल भी इस जनसंख्या नियंत्रण के लिए योगी सरकार के प्रयासों का स्वागत करते नजर आते। प्रधानमंत्री मोदी पर भी यह दबाव बनाते कि वे भारत में अतिशीघ्र जनंसख्या नियंत्रण कानून लागू करें। क्योंकि यह किसी समुदाय विशेष से नहीं देश के विकास एवं उत्तरोत्तर उत्थान से जुड़ा फैसला है। यहां देखें, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नियंत्रण की नीति में वर्ष 2026 तक जन्म दर को प्रति हजार आबादी पर 2.1 तथा वर्ष 2030 तक 1.9 लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें बच्चों और किशोरों के सुंदर स्वास्थ्य, उनके शिक्षा के लिए भी कदम हैं। मसलन 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था है। इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा इस नीति में है जो एक सुखद लोक कल्याणकारी राज्य की जरूरतों और कल्पनाओं को साकार रूप देता दिखाई देता है। पूरी नीति में कहीं विभेदीकरण नजर नहीं आता, किंतु दुर्भाग्य है कि जिन्हें आलोचना करनी है, वे इसे धर्म और एक समुदाय विशेष से जोड़कर देख रहे हैं। यहां हम जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों के आधार पर भी वर्तमान स्थिति की तुलना कर सकते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 33.96 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने शादी की और इनसे देश में कुल 91.50 करोड़ बच्चे हैं । मतलब औसतन हर महिला के 2.69 बच्चे हैं। देश की 53.58 फीसदी महिलाओं के दो या दो से कम बच्चे हैं, जबकि 46.42 फीसदी महिलाओं से दो से अधिक बच्चे हैं। जिसमें आज देश की आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सा उत्तर प्रदेश का है। 2011 की जनगणना के अनुसार उप्र में कुल 19.98 करोड़ लोग रहते हैं। आबादी के हिसाब से देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम भी उत्तर प्रदेश में ही रहते हैं। यहां औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। 55.8 फीसदी महिलाओं से दो से ज्यादा बच्चे हैं, जबकि देश का आंकड़ा 46.42 फीसदी है। इन आंकड़ों से भी समझा जा सकता है कि योगी सरकार जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानून क्यों बनाना चाहती है। यहां जिन्हें जनसंख्या के नियंत्रण में धर्म और समुदाय विशेष नजर आते हैं उन्हें इन आंकड़ों पर गौर करना चाहिए कि 2011 की जनगणना के ही अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल आबादी 19.98 करोड़ में 15.93 करोड़ हिन्दू हैं जो कुल जनसंख्या का 79.73 फीसद है। 3.84 करोड़ मुस्लिम रहते हैं, जो कि कुल आबादी का 19.26 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश की औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं। हिन्दू महिलाओं के औसतन 3.06 बच्चे हैं, मुस्लिम महिलाओं के औसतन 3.6 फीसदी बच्चे हैं। कुल मिलाकर जनसंख्या के अनुपात में इसे समग्रता से देखें तो आज जिस तरह से जनसंख्या यहां बढ़ रही है, उसमें हिन्दू और मुसलमानों की जनसंख्या बराबर से बढ़ती रहेगी। ऐसे में न तो कभी उत्तर प्रदेश भविष्य में कभी भी मुस्लिम बहुल्य होने जा रहा है और न ही यहां हिन्दू कभी अल्पसंख्यक होगा। बल्कि इस जनसंख्या के आनेवाले कानून से अधिकांश हिन्दुओं की आबादी ही कम होगी। उसका मूल कारण हिन्दुओं का स्वभाव है, जिसमें बेहतर भविष्य को प्राथमिकता दी जाती है। यह कहने के पीछे का तर्क यह है कि जब साल 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई तो पहली बार भारत के मुस्लिम समाज में पिछड़ेपन को लेकर चर्चा होने लगी, किंतु इसके पीछे के कारणों को गंभीरतापूर्वक देखें तो कौन मुसलमानों को पीछे रखने के लिए जिम्मेदार नजर आता है? निश्चित ही वे स्वयं और उनका नेतृत्व जबकि इसके उलट हिन्दुओं में स्वविवेक अपनी पीढ़ियों को अच्छा माहौल एवं जीवन देने का शुरू से ही देखा जा सकता है। उनका नेतृत्व उनसे कुछ कहे या न कहे परिवारिक व्यवस्था ही ऐसी है कि सबसे पहले सरकारी नौकरियों से लेकर अच्छे व्यापार की ओर ध्यान देकर 'मां लक्ष्मी' को प्रसन्न करने का उपक्रम हिन्दू स्वभावगत रूप से करता है और परिणामस्वरूप मुसलमानों की जनसंख्या के अनुपात में अच्छा जीवन जीता है। इसलिए अभी भी जो जनसंख्या को लेकर योगी सरकार की नीति है, उससे सबसे अधिक हिन्दुओं की जनसंख्या पर ही नकारात्मक असर होनेवाला है, फिर भी अधिकांश हिन्दू इस नीति के समर्थन में नजर आ रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के लिए हर हाल में सुखद भविष्य चाहिए। देखा जाए तो जनसंख्या नियंत्रण केवल कानून का नहीं, सामाजिक जागरूकता का भी विषय है। विरोध का तार्किक आधार हो तो विचार किया जा सकता है लेकिन इसे मुसलमानों को लक्षित नीति कहना निराधार है। शशि थरूर जैसे राजनीतिक विद्वानों के साथ मुसलमानों की राजनीति कर रहे एडवोकेट असदुद्दीन ओवैसी हों या जयराम रमेश जैसे नेता। वस्तुत: जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने का राज्य के स्तर पर या देश में विरोध करनेवालों को समझना होगा कि भारत का भू-भाग नहीं बढ़ाया जा सकता, जितनी अधिक जनसंख्या उतना अधिक भार। सफल जीवन जीने के लिए जरूरी है अधिक आवश्यक संसाधन जुटाना। जनसंख्या नियंत्रण के विरोध में उभरते स्वर, भविष्य में विकसित देश बनने की प्रक्रिया के लिए भी भारत की आवश्यकताओं को समझें। यूरोप के देशों के साथ ही खासकर अमेरिका से सबक लें और जनसंख्या के मामले में योगी से मोदी तक के समर्थन में बिना राजनीतिक नफा-नुकसान देखे व देशहित में आगे आएं। (लेखक फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 19 July 2021


bhopal,Tharoor

डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत की जनसंख्या वृद्धि को संतुलित करने जिस तरह से उत्तर प्रदेश से प्रारंभ होकर कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों ने कानून सम्मत कदम उठाना शुरू कर दिए हैं, उसके बाद कांग्रेस नेता एवं तमाम विपक्ष यह आरोप लगा रहे हैं कि इसके पीछे की मंशा एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाने की है। खुलकर कहें तो ये सभी कह रहे हैं कि ''मुसलमानों'' को भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश से शुरूआत करते हुए पूरे देश में प्रयोगशाला के रूप में टारगेट करना चाह रही है, प्रयोग के तौर पर उत्तर प्रदेश से इसका आरंभ योगी सरकार से हुआ है। शशि थरूर जिनकी अपनी छवि एक 'बौद्धिक' की है, जब देशहित से परे जाकर इस तरह की बात कहते हैं, तब अवश्य ही दुख होता है कि व्यक्ति राजनीति से ऊपर उठकर इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि उसे इसका लाभ अपने हित में कहीं दिखाई नहीं देता है। किंतु क्या व्यक्तिगत हित, राष्ट्र और राज्य हित के भी ऊपर होना चाहिए? आखिर यह राजनीति किसलिए है? राष्ट्र के लिए या व्यक्ति के अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए? आज ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिन्हें उन सभी से पूछा जा रहा है जो देश में ''जनसंख्या नियंत्रण'' का विरोध कर रहे हैं । यहां पहले बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर की करते हैं, वे आज आरोप लगा रहे हैं कि इस मुद्दे (जिनसंख्या) को उठाने के पीछे की बीजेपी की मंशा राजनीतिक है। इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है। इसलिए भाजपा सुनियोजित मकसद से इस मुद्दे को उठा रही है। थरूर के मुताबिक, 'यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि उत्तर प्रदेश, असम और लक्षद्वीप में आबादी कम करने की बात हो रही है, जहां हर कोई जानता है कि उनका इरादा किस ओर है।' वे कह रहे हैं 'हमारी राजनीतिक व्यवस्था में हिंदुत्व से जुड़े तत्वों ने आबादी के मुद्दे पर अध्ययन नहीं किया है। उनका मकसद विशुद्ध रूप से राजनीतिक और सांप्रदायिक है।' कुल मिलाकर अभी जनसंख्या को लेकर बहस पूरी तरह ठीक नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री थरूर का मानना है कि अगले 20 साल बाद हमारे लिए बढ़ती जनसंख्या नहीं एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम होगी। वस्तुत: आज थरूर की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का एक मसौदा सामने रखा गया है, जिसमें प्रावधान है कि जिनके दो बच्चों से अधिक होंगे उन्हें सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जाएगा और दो बच्चों की नीति का अनुसरण करने वालों को लाभ दिया जाएगा। अव्वल तो यह कि थरूर जिस 20 साल बाद एजिंग पॉपुलेशन प्रॉब्लम की बात कह रहे हैं, उसका कोई आधार इसलिए नहीं है क्योंकि जनसंख्या पर कोई पूरी तरह से रोक नहीं लगने जा रही है। बच्चे पैदा होते रहेंगे और भारत में हर वर्ष युवाओं की संख्या में भी इजाफा होता रहेगा, हां इतना अवश्य होगा कि जिस तरह से वर्तमान में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, उस पर कुछ लगाम लगेगी। फिर जिस जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर यह कहा जा रहा है कि इसका कुल मकसद एक 'समुदाय विशेष' को निशाना बनाना है तो यह कहना भी इसलिए निराधार है क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित संपूर्ण देश में अधिकांश राज्यों की कुल जनसंख्या में हिन्दू आबादी ही अधिक है, स्वभाविक है कि जन्म दर जनसंख्या के अनुपात में उनकी ही अधिक है, ऐसे में जब यह जनसंख्या नियंत्रण का कानून यदि किसी राज्य में व्यवहार में लाया जाता है तो स्वभाविक है कि इसका असर यदि किसी पर अधिक होगा तो वे हिन्दू ही हैं। पिछले साल भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बहुत ही विस्तार से बताया था कि कैसे जनसंख्या का भारत जैसे देश में अनियंत्रित रूप से बढ़ना उसके लिए संकट खड़ा कर रहा है। उन्होंने इस पत्र में कहा था कि देश की राजधानी विश्व के 190 देशों की राजधानियों में सबसे अधिक प्रदूषित हो गई है। उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र से सजा हुआ भारत आज प्रदूषण से कराह रहा है। उन्होंने इस बात पर हैरानी प्रकट की थी कि इस समस्या के असली कारण को नहीं देखा जा रहा। भारत स्वतंत्रता के बाद 35 करोड़ से बढ़ते-बढ़ते आज 141 करोड़ आबादी वाला दुनिया को दूसरा सबसे बड़ा देश बना गया है। आबादी के साथ-साथ सबकुछ बढ़ता है। यही प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। प्रदूषण ही नहीं देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी का कारण भी जनसंख्या विस्फोट है। वे यहां लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले छह सालों में गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के लिए हरसंभव प्रयत्न हुए हैं। उसके बाद भी ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं। बेरोजगारी के कारण युवा पीढ़ी हताश और निराश है और आत्महत्याएं बढ़ रहीं हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सुझाव दिया था कि अतिशीघ्र पहल करें। देश में एक कानून बने और एक ही नारा हो। हम दो हमारे दो। अब यह अलग बात है कि केंद्र के स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जनसंख्या नियंत्रण पर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (एनडीए) में सहमति बनानी है जबकि उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कोई सहमति की आवश्यकता योगी सरकार को नहीं है, इसलिए यह पहल आज उत्तर प्रदेश से सबसे पहले सामने आई है। वस्तुत: होना यह चाहिए था कि देशभर में कांग्रेस एवं अन्य दल भी इस जनसंख्या नियंत्रण के लिए योगी सरकार के प्रयासों का स्वागत करते नजर आते। प्रधानमंत्री मोदी पर भी यह दबाव बनाते कि वे भारत में अतिशीघ्र जनंसख्या नियंत्रण कानून लागू करें। क्योंकि यह किसी समुदाय विशेष से नहीं देश के विकास एवं उत्तरोत्तर उत्थान से जुड़ा फैसला है। यहां देखें, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नियंत्रण की नीति में वर्ष 2026 तक जन्म दर को प्रति हजार आबादी पर 2.1 तथा वर्ष 2030 तक 1.9 लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें बच्चों और किशोरों के सुंदर स्वास्थ्य, उनके शिक्षा के लिए भी कदम हैं। मसलन 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था है। इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा इस नीति में है जो एक सुखद लोक कल्याणकारी राज्य की जरूरतों और कल्पनाओं को साकार रूप देता दिखाई देता है। पूरी नीति में कहीं विभेदीकरण नजर नहीं आता, किंतु दुर्भाग्य है कि जिन्हें आलोचना करनी है, वे इसे धर्म और एक समुदाय विशेष से जोड़कर देख रहे हैं। यहां हम जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों के आधार पर भी वर्तमान स्थिति की तुलना कर सकते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 33.96 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने शादी की और इनसे देश में कुल 91.50 करोड़ बच्चे हैं । मतलब औसतन हर महिला के 2.69 बच्चे हैं। देश की 53.58 फीसदी महिलाओं के दो या दो से कम बच्चे हैं, जबकि 46.42 फीसदी महिलाओं से दो से अधिक बच्चे हैं। जिसमें आज देश की आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सा उत्तर प्रदेश का है। 2011 की जनगणना के अनुसार उप्र में कुल 19.98 करोड़ लोग रहते हैं। आबादी के हिसाब से देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम भी उत्तर प्रदेश में ही रहते हैं। यहां औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। 55.8 फीसदी महिलाओं से दो से ज्यादा बच्चे हैं, जबकि देश का आंकड़ा 46.42 फीसदी है। इन आंकड़ों से भी समझा जा सकता है कि योगी सरकार जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानून क्यों बनाना चाहती है। यहां जिन्हें जनसंख्या के नियंत्रण में धर्म और समुदाय विशेष नजर आते हैं उन्हें इन आंकड़ों पर गौर करना चाहिए कि 2011 की जनगणना के ही अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल आबादी 19.98 करोड़ में 15.93 करोड़ हिन्दू हैं जो कुल जनसंख्या का 79.73 फीसद है। 3.84 करोड़ मुस्लिम रहते हैं, जो कि कुल आबादी का 19.26 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश की औसतन हर महिला के 3.15 बच्चे हैं। हिन्दू महिलाओं के औसतन 3.06 बच्चे हैं, मुस्लिम महिलाओं के औसतन 3.6 फीसदी बच्चे हैं। कुल मिलाकर जनसंख्या के अनुपात में इसे समग्रता से देखें तो आज जिस तरह से जनसंख्या यहां बढ़ रही है, उसमें हिन्दू और मुसलमानों की जनसंख्या बराबर से बढ़ती रहेगी। ऐसे में न तो कभी उत्तर प्रदेश भविष्य में कभी भी मुस्लिम बहुल्य होने जा रहा है और न ही यहां हिन्दू कभी अल्पसंख्यक होगा। बल्कि इस जनसंख्या के आनेवाले कानून से अधिकांश हिन्दुओं की आबादी ही कम होगी। उसका मूल कारण हिन्दुओं का स्वभाव है, जिसमें बेहतर भविष्य को प्राथमिकता दी जाती है। यह कहने के पीछे का तर्क यह है कि जब साल 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई तो पहली बार भारत के मुस्लिम समाज में पिछड़ेपन को लेकर चर्चा होने लगी, किंतु इसके पीछे के कारणों को गंभीरतापूर्वक देखें तो कौन मुसलमानों को पीछे रखने के लिए जिम्मेदार नजर आता है? निश्चित ही वे स्वयं और उनका नेतृत्व जबकि इसके उलट हिन्दुओं में स्वविवेक अपनी पीढ़ियों को अच्छा माहौल एवं जीवन देने का शुरू से ही देखा जा सकता है। उनका नेतृत्व उनसे कुछ कहे या न कहे परिवारिक व्यवस्था ही ऐसी है कि सबसे पहले सरकारी नौकरियों से लेकर अच्छे व्यापार की ओर ध्यान देकर 'मां लक्ष्मी' को प्रसन्न करने का उपक्रम हिन्दू स्वभावगत रूप से करता है और परिणामस्वरूप मुसलमानों की जनसंख्या के अनुपात में अच्छा जीवन जीता है। इसलिए अभी भी जो जनसंख्या को लेकर योगी सरकार की नीति है, उससे सबसे अधिक हिन्दुओं की जनसंख्या पर ही नकारात्मक असर होनेवाला है, फिर भी अधिकांश हिन्दू इस नीति के समर्थन में नजर आ रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के लिए हर हाल में सुखद भविष्य चाहिए। देखा जाए तो जनसंख्या नियंत्रण केवल कानून का नहीं, सामाजिक जागरूकता का भी विषय है। विरोध का तार्किक आधार हो तो विचार किया जा सकता है लेकिन इसे मुसलमानों को लक्षित नीति कहना निराधार है। शशि थरूर जैसे राजनीतिक विद्वानों के साथ मुसलमानों की राजनीति कर रहे एडवोकेट असदुद्दीन ओवैसी हों या जयराम रमेश जैसे नेता। वस्तुत: जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने का राज्य के स्तर पर या देश में विरोध करनेवालों को समझना होगा कि भारत का भू-भाग नहीं बढ़ाया जा सकता, जितनी अधिक जनसंख्या उतना अधिक भार। सफल जीवन जीने के लिए जरूरी है अधिक आवश्यक संसाधन जुटाना। जनसंख्या नियंत्रण के विरोध में उभरते स्वर, भविष्य में विकसित देश बनने की प्रक्रिया के लिए भी भारत की आवश्यकताओं को समझें। यूरोप के देशों के साथ ही खासकर अमेरिका से सबक लें और जनसंख्या के मामले में योगी से मोदी तक के समर्थन में बिना राजनीतिक नफा-नुकसान देखे व देशहित में आगे आएं। (लेखक फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 19 July 2021


bhopal, Leadership , well-intentioned strategy

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री काशी में प्रधानमंत्री के संबोधन से भाजपा की चुनावी दिशा का निर्धारण हो गया। यही विचार लखनऊ में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान दिखाई दिया। इसमें योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व व सरकार की उपलब्धियों पर विश्वास व्यक्त हुआ। इसके आधार पर भाजपा विपक्षी दलों को चुनौती देगी। इस रणनीति के अंतर्गत जहां सरकार की उपलब्धियां गिनाई गई, वहीं विपक्ष पर नकारात्मक राजनीति का आरोप लगाया गया। इस चुनावी रणनीति पर भाजपा में किसी प्रकार की दुविधा नहीं है। कुछ समय पहले चलाई गई अफवाहें निर्मूल प्रमाणित हुई। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा का मंसूबा साफ दिखाई दे रहा है। काशी में नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व व उपलब्धियों की जमकर तारीफ की थी। उन्होंने अनेक उपलब्धियों का विशेष तौर पर उल्लेख किया। इनके आधार पर विगत चार वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व प्रगति का अनुमान लगाया जा सकता है। नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा था कि कम समय में सभी उपलब्धियां बताई नहीं जा सकती। यह भी दुविधा रहती है कि किस उपलब्धि बताएं और किसे छोड़ दें। भाजपा की बैठक में भी नेतृत्व व नेकनीयत का सन्देश दिया गया। नेतृत्व व नीति के संबन्ध में स्थिति बिल्कुल साफ है। योगी आदित्यनाथ अपनी ईमानदार व मेहनती छवि के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने साहस के साथ ऐसे अनेक निर्णय लिए, जिनके विषय में पिछली सरकारों के दौरान सोचना भी मुश्किल था। विपक्ष का कार्य सरकार को घेरना होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में विपक्ष अपने कार्यों से स्वयं ही घिर जाता है। सीएए और किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन को समर्थन देने का विपक्ष को कोई लाभ नहीं मिला। इसके विपरीत उसे फजीहत ही उठानी पड़ी। यह सवाल उठा कि सीएए नागरिकता देने का कानून है। ऐसे में नागरिकता छिनने का आरोप लगा कर आंदोलन करना बेमानी था। विपक्ष ऐसे लोगों के साथ था। कृषि कानूनों से किसानों को विकल्प व अधिकार दिए गए। आंदोलन किसानों को यथास्थिति में रखने के लिए चलाया गया। विपक्ष ऐसे लोगों के साथ भी दिखाई दिया। आतंकवादियों की गिरफ्तारी का विरोध भी विपक्ष को भारी पड़ा। सन्देश यह गया कि उनकी सरकार बनी तो ऐसे लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। योगी आदित्यनाथ ने इसके लिए विपक्ष को घेरा। आतंकवादियों के शुभचिंतक विपक्ष की नकारात्मकता से बचना होगा। लव जेहाद के खिलाफ हमने कदम उठाया तो विपक्ष को परेशानी हो रही है। कोरोना संकट के दौरान विपक्ष की निष्क्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं। तब विपक्ष के नेता ट्विटर पर ही सक्रिय थे। इसमें भी उन्होंने नकारात्मक विचार ही व्यक्त किये। इनके बयान जनमानस को भयभीत करने वाले थे। विदेशी मीडिया ने ऐसे नकारात्मक बयानों का खूब प्रचार किया। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोनाकाल में ये चेहरे कहीं नही दिखाई दिए। ये लोग केवल भ्रम की स्थिति पैदा करके नकरात्मक स्थितियां पैदा कर रहे थे। विपक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष ने मर्यादा का पालन नहीं किया। आतंकियों के लिए सहानुभूति व आगरा में लगाए गए नारे राष्ट्रहित के विरुद्ध है। योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। पहले की तरह बिचौलिया व्यवस्था अब नहीं है। किसानों गरीबों व सभी जरूरतमन्दों तक शत-प्रतिशत धनराशि पहुंचाई जा रही है। एक क्लिक पर पैसा गरीब के खाते में जा रहा है। बिना भेदभाव के सबको आवास, सबको समान विद्युत आपूर्ति हो रही है। करीब सवा लाख गांवों तक विद्युतीकरण किया गया। प्रदेश में निवेश के अनुकूल माहौल बनाया गया। मुम्बई से ढाई लाख करोड़ का निवेश लेकर आ गए। उद्योगपति कहते हैं कि पांच साल पहले हम यहां आना नहीं चाहते थे लेकिन अब हम यहां निवेश करना चाहते हैं। हर घर नल का कार्य बुंदेलखंड विंध्य क्षेत्र के हर गांव में जारी है। दिसम्बर तक लक्ष्य है कि इसे लगभग पूरा किया जाए। गन्ना किसानों की समस्याओं का निदान हो रहा है। चीनी मिल सुचारू रूप से जारी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नकलविहीन परीक्षाएं, उच्च शिक्षा में नए विश्विद्यालय खोलने, अभ्युदय कोचिंग योजना सफलता के साथ चल रही है। चार वर्षों में तीस नए मेडिकल कॉलेज का निर्माण हो रहा है। इज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में प्रदेश दूसरे नम्बर पर पहुंचा। प्रदेश को पहले पायदान पर पहुंचाने का प्रयास चल रहा है। अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर निर्माण व प्रदेश का ढांचागत विकास, सड़कों का जाल, अनेक एक्सप्रेस वे निर्माण, हर घर नल-जल, उर्जा के क्षेत्र में सरप्लस पावर वाला स्टेट, कौशल विकास एवं प्रवासी मजदूर, रोजगार सृजन की दिशा में अभूतपूर्व कार्य किया गया। कोरोना संकट के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना लागू की गई। जिसके तहत लगभग अस्सी करोड़ लोगों तक निशुल्क राशन पहुंचाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के लगभग पन्द्रह करोड़ लोगों को भी इसका लाभ मिल रहा है। अन्त्योदय कार्ड धारक परिवारों को पांच किलो ग्राम गेहूं व एक किलो ग्राम दाल राशन मुफ्त दिया जा रहा है। इसका लाभ प्रदेश के तीन करोड़ पचपन लाख कार्ड धारकों को प्राप्त हो रहा है। कोरोना टेस्ट व टीकाकरण अभियान में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। लगभग चार करोड़ लोगों को मुफ्त में टीका लग चुका है। जाहिर है कि नेतृत्व व नेकनीयत के आधार पर वर्तमान सरकार ने अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की है। इसी आधार पर भाजपा अपनी चुनावी रणनीति का निर्धारण करेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 July 2021


bhopal, Surekha Sikri,An example of honesty

योगेश कुमार गोयल लोकप्रिय टीवी शो 'बालिका वधू' सहित कई बड़े टीवी धारावाहिकों तथा बॉलीवुड फिल्मों का अहम हिस्सा रही जानी-मानी अभिनेत्री सुरेखा सीकरी का कार्डियक अरेस्ट से 16 जुलाई को 75 साल की आयु में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रही थी। 2018 में उन्हें पैरालाइटिक स्ट्रोक आया था और 2020 में दूसरी बार ब्रेन स्ट्रोक आया था, तभी से उनकी तबीयत काफी खराब चल रही थी। बॉलीवुड से लेकर छोटे परदे तक अपना सिक्का चलाने वाली यह दिग्गज अभिनेत्री अभिनय की दुनिया में 40 वर्षों से भी ज्यादा समय तक निरन्तर सक्रिय रही और दमदार अभिनय के लिए उन्हें अपने जीवनकाल में तीन बार 'सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री' का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। पहला राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें 1988 में आई फिल्म 'तमस' के लिए, दूसरा 1995 में फिल्म 'मम्मो' के लिए और तीसरा 2018 में आई फिल्म 'बधाई हो' के लिए मिला था। इनके अलावा उन्हें एक फिल्मफेयर अवार्ड, एक स्क्रीन अवार्ड और छह इंडियन टेलीविजन एकेडमी अवार्ड भी प्राप्त हुए। हिन्दी थिएटर में उल्लेखनीय योगदान के चलते उन्हें 1989 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया था। आयुष्मान खुराना अभिनीत सुपरहिट फिल्म 'बधाई हो' में सुरेखा ने दुर्गा देवी कौशिक नामक दादी का यादगार किरदार निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया था, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया और यह पुरस्कार लेने वह व्हील चेयर पर पहुंची थी। पुरस्कार लेने के बाद उन्होंने कहा था कि इनाम मिलते हैं तो किसे खुशी नहीं होती लेकिन तब और ज्यादा खुशी होती, अगर मैं अपने पैरों पर खड़े होकर यह पुरस्कार ले पाती। फिल्म में गजराज राव और नीना गुप्ता ने उनके बेटे और बहू का किरदार निभाया था। इस फिल्म में उन्होंने जीतू (गजराज राव) की मां और नकुल (आयुष्मान खुराना) की दादी का ऐसा रोल निभाया था, जो सदैव अपनी बहू से मनमुटाव रखती थी लेकिन एक ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर वह उसी बहू के पक्ष में उठ खड़ी होती है, जब अधेड़ उम्र की उनकी बहू की नज़दीकी रिश्तेदार इस बात के लिए आलोचना कर रहे होते हैं कि वह इस ढ़लती उम्र में मां बनने जा रही है। सुरेखा ने अपने बहुत लंबे अभिनय कैरियर में थियेटर, फिल्मों तथा टीवी में एक से बढ़कर एक दमदार रोल किए और 1978 में इमरजेंसी पर बनी फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' से डेब्यू किया था लेकिन उन्हें घर-घर में सबसे बड़ी पहचान दिलाई थी टीवी धारावाहिक 'बालिका वधू' ने। जिसमें उन्होंने सख्तमिजाज 'दादी-सा' (कल्याणी देवी) का ऐसा किरदार निभाया था, जिसने उन्हें घर-घर की दादी-सा बना दिया था। यह सीरियल 'कलर्स' टीवी चैनल पर 2008 से 2016 तक ऑनएयर रहा। उनकी चर्चित फिल्मों में 'सरफरोश', 'नसीम', 'नजर', 'सरदारी बेगम', 'दिल्लगी', 'जुबैदा', 'रेनकोट', 'शीर कोरमा', 'घोस्ट स्टोरीज', 'देव डी', 'सलीम लंगड़े पे मत रो', 'तमस', 'मम्मो', 'हरी-भरी', 'मिस्टर एंड मिसेज अय्यर', 'तुमसा नहीं देखा' प्रमुख थी जबकि लोकप्रिय सीरियल्स में 'परदेस में है मेरा दिल', 'महाकुंभ: एक रहस्य, एक कहानी', 'सात फेरे: सलोनी का सफर', 'केसर', 'बनेगी अपनी बात', 'एक था राजा एक थी रानी', 'कभी कभी', 'जस्ट मोहब्बत' इत्यादि शामिल हैं। 'मम्मो' में फय्याजी और 'सलीम लंगडे पे मत रो' में अमीना का उनका निभाया किरदार लोग कभी नहीं भूले। निर्देशक जॉन मैथ्यू मैथन उन्हें अपनी फिल्म 'सरफरोश' के जरिये व्यावसायिक सिनेमा में लेकर आए, जिसमें वह सुल्तान की मां बनी थी। आखिरी बार उन्हें नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई जोया अख्तर की फिल्म 'घोस्ट स्टोरीज' में देखा गया, जिसमें जाह्नवी कपूर ने मुख्य किरदार निभाया था। सुरेखा ने बॉलीवुड फिल्मों के अलावा कुछ मलयालम फिल्मों में भी काम किया। वर्ष 1945 में उत्तर प्रदेश में जन्मी सुरेखा अल्मोड़ा और नैनीताल में पली-बढ़ी। उनके पिता एयरफोर्स में और माता शिक्षिका थी। लीक से हटकर काम करना पसंद करने वाली सुरेखा फिल्मों में आने से पहले लेखक और पत्रकार बनना चाहती थीं लेकिन किस्मत को उनका अभिनेत्री बनना ही मंजूर था। उन्होंने 1971 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से ग्रेजुएशन किया था। वैसे उनके एनएसडी पहुंचने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। वास्तव में सुरेखा की छोटी बहन अभिनेत्री बनना चाहती थी और इसीलिए वह एनएसडी का दाखिला फॉर्म लेकर आई थी लेकिन बहुत जल्द उसके सिर से एक्टिंग का भूत उतर गया तो परिवार के सदस्यों की सलाह पर सुरेखा ने वह फॉर्म भर दिया और उनका दाखिला एनएसडी में हो गया। उसके बाद सुरेखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी शादी हेमंत रेगे से हुई थी, जिनका करीब 12 वर्ष पूर्व 20 अक्तूबर 2009 को हार्ट फेल होने के कारण निधन हो गया। परदे पर अक्सर सख्त मिजाज दिखने वाली सुरेखा असल जिंदगी में बेहद खुशमिजाज थीं। लोग अक्सर उनकी खुद्दारी की मिसाल दिया करते थे। उनके जीवन में कुछ ही समय पहले ऐसा दौर भी आया, जब उनके पास कोई काम नहीं था। तब अफवाह भी उड़ी कि सुरेखा की आर्थिक हालत बहुत खराब है और उन्हें मदद की जरूरत है। ऐसे समय में बॉलीवुड से जुड़े कई लोग उनकी आर्थिक मदद के लिए आगे भी आए लेकिन अपनी खुद्दारी के लिए विख्यात सुरेखा ने आर्थिक मदद लेने से इनकार कर दिया और साफ शब्दों में कहा कि उन्हें पैसे देने के बजाय काम दिया जाए, जिसे वह सम्मानपूर्वक करना चाहती हैं। दरअसल कोरोना के चलते 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों पर लगी पाबंदियों को लेकर वह काफी नाराज थीं और एक अवसर पर उन्होंने कहा भी था कि वह इस तरह घर पर बैठकर अपने परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहती। लोगों के बीच कोई गलत धारणा भी नहीं डालना चाहती कि मैं भीख मांग रही हूं बल्कि मैं काम करने में सक्षम हूं और चाहती हूं कि मुझे काम दिया जाए। सुरेखा का कहना था कि वह अभिनय से कभी रिटायर होना नहीं चाहती और उनकी दिली इच्छा थी कि वह किसी फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ भी काम करें। बहरहाल, अभिनय की दुनिया में महिला सशक्तिकरण का जीता जागता उदाहरण मानी जाती रही सुरेखा सीकरी ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के दिलोदिमाग में ऐसी पहचान बनाने में सफलता हासिल की कि दुनिया से चले जान के बाद भी उन स्मृतियों को कभी मिटाया नहीं जा सकेगा।(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 17 July 2021


bhopal,  lot of British era, what to change

सियाराम पांडेय 'शांत' कोई भी देश संविधान से चलता है। कानून से चलता है। इसलिए कानून को हटाने में नहीं, उसे जनता के हितों के अनुरूप बनाने, उसे संशोधित-परिमार्जित करने के प्रयास होने चाहिए। भारत जैसे विविधतापूर्ण और बड़ी आबादी वाले देश के लिए जितनी जरूरत कड़े कानून निर्माण की है, उतनी ही जरूरत असहमति के अधिकारों की रक्षा की भी है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बने टाडा, पोटा जैसे कानून को सिर्फ इसलिए खत्म करना पड़ा था क्योंकि उनका दुरुपयोग होने लगा था। आज जब देश आए दिन आतंकवादी घटनाओं का सामना कर रहा है, ऐसे में कठोर कानूनों की देश को बड़ी जरूरत है लेकिन जिस तरह मकोका, यूपीपीए और 124 ए को लेकर विवाद हो रहा है, उस पर गहन मंथन की भी जरूरत है। 124 ए ऐसी धारा है जो राजद्रोह और देशद्रोह दोनों पर लगती है। ऐसे में भी इसे परिभाषित किए जाने की महती आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अंग्रेजों के जमाने में बने राजद्रोह कानून पर चिंता जाहिर की है। केंद्र सरकार से यह जानना चाहा है कि वह इसे हटा क्यों नहीं रही है? शीर्ष अदालत को भी लगता है कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी बाधित हो रही है। जाहिर तौर पर यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सेना के एक निवर्तमान अधिकारी की जनहित याचिका पर दिया है। अदालतें किसी याचिका के आलोक में ही अपनी बात कहती हैं। यह बात और है कि केंद्र सरकार ने कहा है कि वह इस कानून को हटाने नहीं जा रही है। शीर्ष अदालत चाहे तो ऐसे निर्देश दे सकती है जिससे इस कानून का दुरुपयोग न हो। लार्ड मैकाले द्वारा 1833 में ड्राफ्ट कानूनों पर अगर वर्ष 2021 में न्यायिक विमर्श की जरूरत पड़ रही है तो इसे क्या कहा जाएगा। जिस राजद्रोह कानून को उसके जन्मस्थल ब्रिटेन में 2009 में ही औचित्यहीन करार देते हुए समाप्त कर दिया गया हो, ऑस्ट्रेलिया और स्कॉटलैंड ने 2010 में, दक्षिण कोरिया ने 1988 में और इंडोनेशिया ने 2007 में ही खत्म कर दिया हो, उसे भारत अभीतक क्यों ढो रहा है, यह विचारणीय तथ्य है। लार्ड मैकाले की आत्मा आखिर कबतक इस देश के कायदे-कानून पर अपना चाबुक चलाती रहेगी। हमें एक औपनिवेशिक राजद्रोह कानून की तो चिंता है लेकिन भारतीय संविधान के जरिए पूरा भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश बनकर रह गया है, इस बात का विचार न तो देश का बुद्धिजीवी करता है, न राजनेता और न ही कोई न्यायविद। इसमें शक नहीं कि इस देश को लूटने और यहां शासन करने की गरज से अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाए थे। देश आजादी के बाद हमें उन कानूनों से पिंड छुड़ा लेना चाहिए था लेकिन उनमें से अधिकांश का अनुपालन भारत में बदस्तूर हो रहा है। इंडियन एजुकेशन एक्ट 1858 को ही हम कहाँ बदल पाए हैं। जिस कानून के चलते 1850 तक देश में चल रहे 7 लाख 32 हजार गुरुकुलों को, यहां तक कि संस्कृत भाषा को भी अवैध घोषित कर दिए गए थे।अंग्रेजी इस देश पर लाद दी गई थी, उस कानून को हम भारतीय आज तक ओढ़े-बिछाए जा रहे हैं। अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने लिए अंग्रजों ने जो तीन विश्वविद्यालय कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बॉम्बे यूनिवर्सिटी और मद्रास यूनिवर्सिटी स्थापित कीं, वे हैं तो आखिर गुलामी की दस्तावेज ही लेकिन आज भी चल रही है। क्या इन्हें बंद करना मौजूदा परिवेश में उचित होगा। कलकत्ता और खासकर विक्टोरिया हाउस को प्रदूषण से बचने के लिए लाया गया द बंगाल स्मोक न्यूसेंस एक्ट 1905 तो आज भी वजूद में है। यूपी प्रोविंशियल एक्ट 1932, इंडियन पुलिस एक्ट, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, भारतीय दंड संहिता सब तो अंग्रेजों के जमाने की है। पुलिस की खाकी वर्दी का चलन सर हैरी बैनेट ने 1847 में किया था। वह खाकी वर्दी आज भी भारतीय पुलिसकर्मियों के बदन पर है। आपत्ति तो किसी भी बिंदु पर हो सकती है। जहां तक अभिव्यक्ति कि आजादी की बात है तो यह भी तय होना चाहिए कि व्यक्ति को वही बोलना चाहिए जो जनहितकारी हो और किसी का दिल न दुखाए। देश के विकास में रोड़ा न अटकाए। विकास कार्य में व्यवधान डालने वालों, देश को टुकड़े-टुकड़े करने का दावा करने वालों, अपने घरों पर पाकिस्तानी झंडा फहराने या देश विरोधी नारे लगाने वालों, आतंकवादियों का साथ देने वालों की अभिव्यक्ति की आजादी को महत्व देना कितना जरूरी है, विचार तो इस पर भी होना है। जो राजनीतिक दल संविधान की हत्या का आरोप लगा रहे हैं, वे क्या इस देश को बताएंगे कि भारतीय संविधान की चादर पर संशोधनों के कितने पैबंद लग चुके हैं। भारतीय संविधान में भारतीय कहने के लिए क्या कुछ अपना है? वह कितना मौलिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सोवियत संघ, जापान और फ्रांस के उधार के कानूनों के आधार पर हम कबतक अपने विधि ज्ञान का बखान करते रहेंगे। भारत के अधिकांश कानून अंग्रेजों के जमाने के बने हैं। ज्यादातर के निर्माण की अवधि 1860 से 1946 के बीच की है। टोडरमल कानून के तहत पुश्तैनी काम का अधिकार का हवाला देते हुए बिहार में एक व्यक्ति ने गंगा नदी पर अपने मालिकाना हक का केस कर दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट में अशोक पांडेय नामक एक वकील ने वकीलों के कोट, गाउन और बैंड की वैधता पर सवाल उठा दिया है और कोर्ट ने इस बाबत केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और हाइकोर्ट प्रशासन से जवाब मांगा है। देश की बड़ी अदालतों में आज भी अंग्रेजों की भाषा का ही वर्चस्व है। हिंदी से न्याय आंदोलन के जनक न्यायविद चंद्रशेखर उपाध्याय लंबे अरसे से संविधान की धारा 348 में संशोधन करने और बड़ी अदालतों में हिंदी और अन्य भारतीयों भाषाओं में कामकाज और निर्णय की मांग कर रहे हैं। अगर हम भारतीयता का सम्मान करते हैं तो जनहित में इतना तो कर ही सकते हैं। कानून कोई भी बुरा नहीं होता। हम उसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग, अहमियत इस बात की है। सत्ता में जो भी दल होता है, वह अपने हिसाब से अपने विरोधियों को राह पर लाने के लिए कानून का डंडा भांजता है। ईमानदारी से कोई भी दल नहीं चाहता कि इस तरह के कानून समाप्त कर दिए जाएं। कानून बदलना या हटाना उतना जरूरी नहीं है जितना यह जरूरी है कि लोग आत्मानुशासित हों। कानून के फंदे में फंसने जैसा कोई काम न करें। अपने काम से काम रखें। दोष निकलना आसान होता है। सुधार कैसे हो, व्यवस्था ने बदलाव कैसे हो, विमर्श तो इस पर होना चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 17 July 2021


bhopal,How to get rid , depressive lifestyle?

अली खान मौजूदा वक्त में मानव जीवन कई दुश्वारियों से गुजर रहा है। आज सबसे बड़ी चुनौती मानसिक संतुलन को बनाए रखने की है। इस प्रगतिशील दौर में मानव की अनन्त चाह ने जीवन को खासा प्रभावित किया है। पिछले कुछ समय से आत्महत्या, अवसाद, तनाव की बातें बहुत ज्यादा देखने-सुनने को मिल रही हैं। इसकी एक ही वजह है मानसिक संतुलन बरकरार नहीं रख पाना। आज कुछ पाने की चाहत में लोग बहुत कुछ गंवा रहे हैं। दुश्चिंताओं में दिनों-दिन तेजी के साथ इजाफा हो रहा है। इसके चलते लोग आत्मविश्वास, सहनशक्ति और स्पष्ट जीवन लक्ष्य एवं संवेगों से नियंत्रण खो रहे हैं। आखिर मानसिक स्वास्थ्य किस स्थिति का नाम है? मनोविज्ञानी कुप्पुस्वामी मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि दैनिक जीवन में इच्छाओं, भावनाओं, आदर्शों तथा महत्त्वाकांक्षाओं में संतुलन स्थापित करने की योग्यता का नाम ही मानसिक स्वास्थ्य है। यह हकीकत है कि आज मानव अपनी इच्छाओं पर से नियंत्रण खोता जा रहा है। अपनी जीवन शैली को इतना दूषित कर रखा है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। यदि मानव जीवन को सुखमयी बनाना है तो आवश्यक शर्त यह है कि अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और विचारों में शुद्धता के साथ-साथ यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाए। इसके अलावा अपने भीतर संतुष्टि की भावना, सहयोग की भावना, पर्यावरण के प्रति सहानुभूति जैसे गुणों को विकसित कर लेता है तो मानव मानसिक रूप से ही नहीं, शारीरिक रूप से भी खुद को बेहतर पाएगा। यदि हम मौजूदा वक्त की बात करें तो सबसे बड़ी चुनौती कोरोना वायरस प्रस्तुत कर रहा है। कोरोना वायरस ने दुनिया के लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था को धराशायी कर दिया है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई प्रयत्न किए जा रहे हैं। इन दिनों महंगाई शिखर छू रही है। कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण लोगों की आमदनी पर बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कोरोना काल ने लोगों को भय और आर्थिक विषमताओं से दो-चार होने को विवश कर दिया है। इसके चलते अवसाद की समस्या में बढ़ोतरी हुई है। इसी चलते 2019 के मुकाबले 2020 में आत्महत्याओं के मामलों में इजाफा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि 2019 की तुलना में 2020 में आत्महत्या के 499 मामले बढ़े हैं। जानकारों की मानें तो आत्महत्या की वजह सामाजिक, आर्थिक व चिकित्सकीय है। सामाजिक कारणों में अफेयर, शादीशुदा जिंदगी से जुड़ी चीजें, परिवार और मित्रों के साथ आने वाली दिक्कतों ने अवसाद और तनाव की स्थिति पैदा की जिसके चलते कई लोगों ने मौत को गले लगाया। आर्थिक कारणों में बिजनेस का डूबना, नौकरी का छूटना, आय का साधन न होना और कर्ज जैसी समस्याओं ने मानसिक स्वास्थ्य को खासा प्रभावित किया है। वहीं चिकित्सकीय कारणों में लाइलाज शारीरिक और मानसिक बीमारी, गहरा डिप्रेशन, बुढ़ापे की परेशानी और अकेलापन शामिल हैं। ऐसी कई दुश्वारियों के चलते अवसाद की परिस्थितियां पनपी और आत्महत्या का रास्ता अपनाया। भारत के लिए समस्या यहीं खत्म नहीं हो जाती, सबसे बड़ी समस्या देश की युवा आबादी के जीवन से होते मोहभंग की है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाली आबादी की उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच की है। ऐसे में यह वाकई बेहद चिंताजनक है। युवा आबादी को अवसाद की स्थिति से बाहर लाने के लिए न केवल सामाजिक बल्कि सरकारी प्रयासों की भी बहुत जरूरत है। युवा आबादी कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि स्कूल बंद होने से युवाओं की शिक्षा, जीवन और मानसिक कल्याण पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि दुनिया भर में महामारी के दौरान 65 फीसद किशोरों की शिक्षा में कमी आई है। इसके साथ ही बहुत बड़ी आबादी के हाथों से रोजगार चला गया है। जरूरत इस बात की है कि सरकार को रोजगार के अवसर सुलभ कराए। इसके अलावा एक हेल्पलाइन सेवा भी शुरू की जानी चाहिए। जहां युवा अपनी मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं के हल प्राप्त कर सके। युवा आबादी की क्षमताओं का लाभ उठाना है तो सामाजिक बुनियादी ढांचे में अच्छा स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में सुधार के लिए निवेश की जरूरत है। इसके साथ योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर मुहैया कराने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 July 2021


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डिज्नीलैंड स्थापना दिवस (17 जुलाई) पर विशेष योगेश कुमार गोयल मूल रूप से अमेरिका के कैलिफोर्निया के एनाहिम स्थित 'डिज्नीलैंड' ऐसा मनोरंजन और थीम पार्क है, जहां दुनियाभर से आने वाले बच्चों के साथ-साथ बड़े भी खूब मस्ती करते हैं। यह ऐसी जगह है, जहां कल्पनाओं से भरी अनूठी दुनिया हर किसी को आनंदित करती है। 'वाल्ट डिज्नी पार्क्स' के स्वामित्व वाले डिज्नीलैंड की स्थापना 17 जुलाई 1955 को हुई थी। उस दिन सजीव टेलीविजन प्रसारण के साथ डिज्नीलैंड का पूर्वावलोकन किया गया था, जिसे आर्ट लिंकलेटर और रोनाल्ड रीगन द्वारा आयोजित किया गया था। उसके अगले दिन 18 जुलाई 1955 को डिज्नीलैंड को आम लोगों के लिए खोल दिया गया था, जहां एक डॉलर मूल्य का इसका सबसे पहला टिकट इसके संस्थापक वाल्ट डिज्नी के भाई ने खरीदा था। अब यहां के एक दिन के टिकट की कीमत सौ डॉलर से भी ज्यादा है। 17 जुलाई को ओपनिंग के दिन हालांकि वाल्ट डिज्नी ने ओपनिंग सेरेमनी में कुछ खास मेहमानों के अलावा कुछ पत्रकारों को ही आमंत्रित किया था किन्तु उस समारोह में करीब 28 हजार लोग पहुंचे गए थे। इनमें से आधे से भी ज्यादा ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें कोई आमंत्रण नहीं दिया गया था। डिज्नीलैंड के उस समारोह का सीधा प्रसारण किया गया था। लोगों की अचानक उमड़ी भीड़ के चलते चारों तरफ अव्यवस्था का आलम बन गया। पीने के पानी की कमी हो गई थी, बेहद गर्मी के चलते कुछ ही समय पहले वहां कुछ जगहों पर जमीन पर डाला गया तारकोल पिघलने से महिलाओं की सैंडिलें उसपर चिपक रही थी। जो कोल्ड ड्रिंक कम्पनी डिज्नीलैंड की उस ओपनिंग सेरेमनी को स्पांसर कर रही थी, उसने पानी की कमी होने पर नलों से पानी आना बंद होने के बाद नलों के पास ही कोल्ड ड्रिंक बेचना शुरू कर दिया था, जिससे लोगों में खासी नाराजगी उत्पन्न हो गई थी। यही वजह रही कि डिज्नीलैंड के 'ओपनिंग डे' को 'ब्लैक संडे' के नाम से भी जाना जाता है। 5 दिसम्बर 1901 को जन्मे वाल्टर एलियास वाल्ड डिज्नी द्वारा बनवाए गए डिज्नीलैंड में प्रतिवर्ष करीब एक करोड़ साठ लाख पर्यटक पहुंचते हैं, जहां अभी तक 50 करोड़ से भी ज्यादा पर्यटक पहुंच चुके हैं। इन पर्यटकों में कई देशों के राष्ट्रपति, राष्ट्राध्यक्ष तथा अनेक शाही लोग भी शामिल हैं। डिज्नीलैंड का नाम इसके संस्थापक वाल्ट डिज्नी के नाम पर ही रखा गया। 'वाल्ट डिज्नी पार्क्स' द्वारा 'डिज्नीलैंड' के अलावा 'डिज्नीलैंड रिसोर्ट कॉम्प्लेक्स' का भी संचालन किया जाता है और डिज्नीलैंड को इस रिसोर्ट कॉम्पलेक्स से भिन्नता प्रदान करने के लिए 1998 में डिज्नीलैंड को 'डिज्नीलैंड पार्क' नाम दिया गया। डिज्नीलैंड की सबसे खास बात यह है कि यहां के हर हिस्से में यहां काम करने वाले कर्मचारी सदैव चेहरे पर मुस्कराहट के साथ ही नजर आएंगे किन्तु यहां की एक जगह ऐसी है, जहां कर्मचारियों को मुस्कराने की इजाजत नहीं है। यह जगह है डिज्नीलैंड का 'हांटेड हाउस', जिसके बारे में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसमें वास्तव में 'भूत' भी हो सकते हैं। कुछ समय पहले तक इस 'हांटेड हाउस' में पर्यटक सेल्फी स्टिक के साथ सेल्फी के लिए भी आते थे किन्तु अब इसमें सेल्फी स्टिक लेकर जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। वाल्ट डिज्नी चाहते थे कि वे एक ऐसे थीम पार्क का निर्माण करें, जहां माता-पिता और बच्चे, दोनों ही एक साथ आनंद ले सकें। डिज्नीलैंड के रूप में उन्होंने अपने इसी विचार को मूर्त रूप दिया। दरअसल वर्ष 1940 के आसपास की बात है, जब एकबार रविवार के दिन वाल्ट डिज्नी अपनी दोनों बेटियों डियान और भोरॉन के साथ ग्रिफिश पार्क में घूमने गए थे। हालांकि वहां दूसरे बच्चे मस्ती कर रहे थे लेकिन उनकी बेटियों को वह पार्क इतना अच्छा नहीं लगा। तब वाल्ट डिज्नी के मन में विचार आया कि क्यों न एक ऐसी जगह विकसित की जाए, जहां बच्चों के साथ-साथ बड़े भी भरपूर मस्ती कर सकें। उसी के बाद वाल्ट डिज्नी थ्रिलर और मस्ती से भरी एक ऐसी ही दुनिया के निर्माण में जुट गए। कहा जाता है कि वाल्ट डिज्नी 'डिज्नीलैंड' की स्थापना करने के मुकाम तक पहुंचने में करीब तीन सौ बार असफल हुए किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और काफी लंबे प्रयासों तथा अथक परिश्रम के बाद 'डिज्नीलैंड' के रूप में उनका सपना साकार हुआ, जो आज दुनियाभर में हर किसी के आकर्षण का केन्द्र बना है। असफलताओं से जूझते-जूझते सफलता के इतने बड़े मुकाम तक पहुंचने की उनकी यह कहानी ऐसे लोगों के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा है, जो एक-दो बार की असफलता के बाद ही हार मानकर अपने जीवन से निराश हो जाते हैं। वाल्ट डिज्नी जब 19 साल के थे, तब उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर एक कमर्शियल आर्टिस्ट कम्पनी की नींव रखी। उस समय वे कई अखबारों और प्रकाशकों के लिए कार्टून बनाया करते थे। 16 अक्तूबर 1923 को उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर 'डिज्नी ब्रदर्स कार्टून स्टूडियो' की नींव रखी। बहुत थोड़े ही समय में डिज्नी के कार्टून्स की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग चिट्ठियां लिख-लिखकर उनके स्टूडियो में आने की इच्छा जताने लगे। उनका स्टूडियो छोटा था, इसलिए उन्होंने ऐसा थीम पार्क बनाने के अपने आइडिया को मूर्त रूप देने का निश्चय किया, जहां लोग दिनभर परिवार के साथ खूब मस्ती कर सकें। हालांकि पहले इस पार्क को स्टूडियो के पास ही तीन एकड़ जगह पर बनाए जाने पर विचार हुआ किन्तु बाद में इसे एनाहिम में 65 एकड़ के विशाल क्षेत्र में बनाया गया। डिज्नीलैंड की स्थापना के बाद वाल्ट डिज्नी दुनियाभर के मनोरंजन पार्कों में घूम-घूमकर देखते रहे कि वहां लोगों की दिलचस्पी किन-किन चीजों में है, उसी के आधार पर डिज्नीलैंड में भी वे उन सभी चीजों का समावेश करते रहे, जो लोगों को ज्यादा आकर्षित करती थी। वैसे तो पूरा डिज्नीलैंड कल्पनाओं, रहस्य और रोमांच से भरा है, फिर भी मिकी माउस, मिनी माउस, प्रिंसेस टियाना, टिंकर बेल, गूफी, पूह जैसे डिज्नी कार्टून कैरेक्टर्स के साथ अलग-अलग थीम पर बने डिज्नीलैंड में पेड़ पर टारजन का घर, इंडियाना जोंस, टेंपल ऑफ द फॉरबिडेन आई, पायरेट्स ऑफ द कैरेबियन, माउंटेड मेंसन, पैसेंजर ट्रेन, रोमांच से भरी जंगल लाइफ, फेरिस व्हील, स्काई राइड इत्यादि हर समय आकर्षण का मुख्य केन्द्र बने रहते हैं। बच्चे टीवी पर जिस मिकी माउस और मिनी माउस को देखकर खुश होते हैं और अपना मनोरंजन करते हैं, वे उन्हें यहां जगह-जगह पर घूमते-फिरते, बातें करते और डांस करते नजर आएंगे। इस खूबसूरत मनोरंजन पार्क में 'मिकी टूनटाउन' में बच्चों के इन पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर्स का घर बनाया गया है। हालांकि 1971 में फ्लोरिडा के ऑरलैंडो में डिज्नी वर्ल्ड, 1983 में टोक्यो में डिज्नीलैंड, 1992 में पेरिस में यूरो डिज्नीलैंड तथा 2005 में हांगकांग डिज्नीलैंड की भी स्थापना हुई है किन्तु अमेरिका के कैलिफोर्निया के एनाहिम में स्थित 'डिज्नीलैंड' सबसे पुराना और सबसे विस्तृत डिज्नीलैंड है, जिसका कुल क्षेत्रफल 73.5 हेक्टेयर है, जिसमें से 30 हेक्टेयर में थीम पार्क है। बताया जाता है कि यह इतना विशाल मनोरंजन पार्क है कि इसके संचालन और देखभाल के लिए यहां 65 हजार से भी ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं। 2017 में मनोरंजन के उद्देश्य से यहां करीब 1.83 करोड़ पर्यटक आए थे। दुनियाभर के किसी भी अन्य मनोरंजन पार्क में एक साल में इतने ज्यादा पर्यटक कभी नहीं पहुंचे। हालांकि कोरोना काल में पिछले डेढ़ वर्षों में डिज्नीलैंड में भी पर्यटकों की संख्या पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 July 2021


bhopal, Meaning of praise ,Yogi

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री कुछ दिन पहले योगी आदित्यनाथ मंत्रिपरिषद को लेकर अफवाहों का बाजार सजाया गया था। सत्ता पक्ष के प्रत्येक नेता की सामान्य यात्राओं को भी परिवर्तन से जोड़कर पेश किया जा रहा था। इस हवाई प्रचार अभियान में शामिल लोग उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं थे। उन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर को भी इसमें शामिल कर लिया था। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के बीच मतभेद की कहानी भी गढ़ ली गई। वैसे जल्दी ही इस अभियान की हवा निकल गई थी। प्रधानमंत्री की काशी यात्रा से यह अभियान पूरी तरह निराधार प्रमाणित हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी अनेक अवसरों पर योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते रहे हैं। काशी यात्रा के दौरान तो उन्होंने जैसे विधानसभा चुनाव का एजेंडा ही निर्धारित कर दिया। इसमें नेतृत्व नीति और कार्यशैली पर विश्वास पर विश्वास का भाव समाहित है। योगी को यशस्वी व कर्मठ मुख्यमंत्री बताया। कहा कि उनकी सभी उपलब्धियों को बताने में बहुत समय लगेगा। विगत साढ़े चार वर्षों की उपलब्धियों से केंद्रीय नेतृत्व संतुष्ट है। योगी आदित्यनाथ नेतृत्व और उपलब्धियों के आधार पर पिछली सरकारों को बहुत पीछे छोड़ चुके है। नरेंद्र मोदी ने पहले उत्तर प्रदेश की जातिवादी और भाई भतीजावाद की राजनीति का उल्लेख किया। योगी आदित्यनाथ ने उस दौर से उत्तर प्रदेश को बाहर निकाला है। उन्होंने व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव किया। इससे प्रदेश में विकास का बेहतर माहौल बना। जनहित की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हुआ। योगी सरकार विकासवाद पर अमल कर रही है। इसमें पहले की तरह भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद नहीं है। आज उत्तर प्रदेश में जनता को योजनाओं का सीधा लाभ मिल रहा है। योगी आदित्यनाथ स्वयं इसपर ध्यान दे रहे हैं। प्रदेश में निवेश के अनुकूल माहौल बनाया गया है। नये-नये उद्योगों का निवेश हो रहा है। उत्तर प्रदेश को पहले बीमारू माना जाता था। अब यहां औद्योगिक विकास हो रहा है। निवेश व मेक इन इंडिया के लिए उत्तर प्रदेश पसंदीदा जगह बन गया है। योगी आदित्यनाथ की सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस एवं औद्योगिक कलस्टर का निर्माण किया। योगी आदित्यनाथ ने कोरोना संकट से मुकाबले की मिसाल कायम की। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसकी प्रशंसा की है। उत्तर प्रदेश की आबादी दुनिया के कई बड़े देशों से भी ज्यादा है। दिमागी बुखार जैसी आपदा पर बड़ी हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कोरोना के सबसे ज्यादा टेस्ट हुए हैं। सबसे अधिक टीके भी उत्तर प्रदेश में ही लगे हैं। उत्तर प्रदेश में चार वर्ष पहले बारह मेडिकल कॉलेज थे। अब उनकी संख्या चार गुनी हो गई है। साढ़े पांच सौ से अधिक ऑक्सीजन प्लांट प्रदेश में लगाए जा रहे हैं। काशी पूर्वांचल का बहुत बड़ा मेडिकल हब बन रही है। अब प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर चौबीस घण्टे, तहसील मुख्यालय में करीब बाइस घण्टे, ग्रामीण क्षेत्र में सोलह से सत्रह घण्टे बिजली आपूर्ति दी जा रही है। आने वाले समय में पूरे प्रदेश में चौबीस घण्टे विद्युत आपूर्ति देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर एवं कनेक्टिविटी से परिवेश बदला है। आज प्रदेश में एयरपोर्ट, हवाई पट्टी विकास, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे, गंगा एक्सप्रेस वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे, बलिया लिंक एक्सप्रेस वे के कार्य हो रहे हैं। राज्य सरकार ने अबतक गन्ना किसानों को सवा लाख करोड़ रुपए के गन्ना मूल्य का भुगतान कराया है। करण्ट ईयर में आधे से अधिक का गन्ना मूल्य का भुगतान कराया जा चुका है। कोरोना काल में भी सभी एक सौ उन्नीस चीनी मिलें संचालित की गईं। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लगभग छत्तीस लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की। छियासठ लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीद की जा चुकी है। किसानों को ग्यारह हजार करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है। राज्य सरकार द्वारा मक्के की खरीद कर किसानों को करीब दो सौ करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि का भुगतान किया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अन्तर्गत प्रदेश के ढाई करोड़ बयालीस लाख किसानों को लाभान्वित किया गया है। इसके लिए राज्य को भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। प्रदेश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में चालीस लाख आवास उपलब्ध कराए गए हैं। करीब ढाई करोड़ से अधिक किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से लाभान्वित किया गया। चौवन लाख कामगार श्रमिक,स्ट्रीट वेण्डर्स आदि को भरण।पोषण भत्ते का लाभ मिला। कामगारों श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा तथा सर्वांगीण विकास के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उत्तर प्रदेश कामगार एवं श्रमिक सेवायोजन एवं रोजगार आयोग का गठन किया गया है। एक करोड़ अड़तीस लाख घरों में निःशुल्क विद्युत कनेक्शन दिए गए हैं। सत्तासी लाख से अधिक लोगों को वृद्धावस्था महिला व दिव्यांगजन पेंशन दी गई है। हर घर नल योजना के तहत तीस हजार ग्राम पंचायतों में शुद्ध पेयजल योजना लागू की गई है। हर जिला मुख्यालय को फोर लेन से तथा तहसील मुख्यालयों और विकास खण्ड मुख्यालयों को दो लेन से जोड़ने की कार्यवाही की जा रही है। प्रदेश में फिल्म सिटी के निर्माण की कार्यवाही भी प्रगति पर है। उत्तर प्रदेश में इण्डस्ट्रियल डिफेंस काॅरिडोर का निर्माण युद्धस्तर पर चल रहा है। एक जनपद, एक उत्पाद योजना के सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। प्रयागराज कुम्भ में तीर्थयात्रियों की संख्या सुरक्षा, स्वच्छता और सुव्यवस्था के नए वैश्विक रिकार्ड बने। इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री में बड़ा निवेश हो रहा है। तीन वर्ष पूर्व प्रदेश में अभूतपूर्व इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन हुआ था। इसके कुछ महीने बाद शिलान्यास समारोह का भी आयोजन हुआ। निवेश का दूसरा आयोजन भी सफल रहा। डिफेंस एक्सपो से भी बढ़ी संख्या में निवेश प्रस्ताव हासिल हुए। योगी आदित्यनाथ ने न्यू यूपी का रोडमैप तैयार किया था। जिसमें एक जिला एक उत्पाद, निवेश, कृषि का विकास, ढांचागत विकास, तीर्थाटन पर्यटन शिक्षा, स्वास्थ्य, अवस्थापना सुविधा आदि अनेक विषय शामिल किये गए थे। इस दिशा में भी कार्य चल रहा है। योगी सरकार से पहले प्रदेश में अठारह प्राइवेट यूनिवर्सिटी थी। इस सरकार में अट्ठाइस निजी यूनिवर्सिटी को एक साथ अनुमति दी गई। इसके अलावा आठ नई राजकीय यूनिवर्सिटी बनेंगी। बेसिक शिक्षा में एक करोड़ अस्सी लाख बच्चों को निःशुल्क पुस्तकें,यूनिफार्म स्वेटर जूते मोजे दिए जा रहे हैं। इस समय में प्रदेश में चार एक्सप्रेस वे निर्माणाधीन हैं। बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस-वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे से जोड़ते हुए विकसित किया जा रहा है। यह एक्सप्रेस-वे बुन्देलखण्ड क्षेत्र के सभी जनपदों को जोड़ते हुए चित्रकूट तक जाएगा। गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे और मेरठ से प्रयागराज तक के छह सौ किमी लम्बाई के गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण की कार्यवाही गतिमान है। इन एक्सप्रेस-वे के निर्माण के साथ ही प्रदेश के सभी जनपदों में औद्योगिक क्लस्टर के विकास पर भी कार्य किया जा रहा है। जाहिर है कि नरेंद्र मोदी ने तथ्यों के आधार पर ही योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा की है। इस प्रकार उन्होंने विधानसभा चुनाव का एजेंडा भी निर्धारित कर दिया। नेतृत्व और उपलब्धियों के साथ भाजपा चुनावी समर में उतरेगी।

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Dakhal News 16 July 2021


bhopal, Why doesn

आर.के. सिन्हा आगामी टोक्यो ओलंपिक खेलों में भाग लेने के लिए भारत के 122 खिलाड़ियों के नामों की घोषणा हो गई है। कोरोना काल ने ओलंपिक खेलों का मजा तो किरकिरा सा कर दिया है, फिर भी सारे भारत की जनता अपने खिलाड़ियों के श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद तो करेगी ही। यह सब बेचारे लगातार पिछले चार साल से कड़ी मेहनत कर रहे थे। अब समय आया है इन्हें अपनी प्रतिभा को दिखाने का। पिछले 2016 के रियो ओलंपिक खेलों में भी देश से 117 खिलाड़ियों ने शिरकत की थी। इसबार भारत के 122 खिलाड़ियों में से सबसे अधिक 30 खिलाड़ी हरियाणा से हैं। इसके बाद पंजाब से 16 खिलाड़ी ओलंपिक में भारत की नुमाइंदगी करेंगे। तीसरे स्थान पर 12 खिलाड़ियों के साथ तमिलनाडु है। उत्तर प्रदेश से 8, दिल्ली से 5, केरल से 8, मणिपुर 5 और महाराष्ट्र 6 खिलाड़ी टीम में शामिल हैं। अफसोस की बात यह है कि देश के सात राज्यों से एक भी खिलाड़ी इस विशालकाय भारतीय दल में नहीं है। इनमें बिहार के अलावा छत्तीसगढ़, गोवा, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा भी शामिल है। सबको पता है कि बिहार देश के ज्ञान की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है। लेकिन बिहार कब खेलेगा? पिछले रियो ओलंपिक खेलों में भी 10 करोड़ की आबादी वाला यह विशाल प्रदेश भारतीय टोली में एक भी खिलाड़ी को नहीं भेज सका था। आखिर क्यों? क्यों बिहारी खेलते नहीं हैं? औसत बिहारी तो क्रिकेट से लेकर टेनिस, फुटबॉल और अन्य सभी खेलों पर लंबी गंभीर बहस कर सकता है। उसे खेलों की दुनिया की हलचल का पता तो रहता है। लेकिन चाणक्य, चन्द्रगुप्त और सम्राट अशोक की संतानें खेलने से बचते क्यों हैं? बिहारी अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के लिए तो बहुत सारी कुर्बानियां देते हैं। पर वे अपने बच्चों को खेल के मैदान में लेकर नहीं जाते। बिहार में कहावत प्रसिद्ध है " पढ़ोगे लिखोगे तो बनोंगे नवाब, खेलोगे- कूदोगे तो हो जाओगे खराब।" शायद इसीलिये बिहारी अभिभावक खेलों में करियर बनाने के लिए अपने बच्चों को प्रोत्साहित नहीं करते। अगर वे भी अपने बच्चों को खेल के मैदान में लेकर जाते तो बिहार भी पी.सिंधू, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा या साक्षी मलिक जैसी अनेकों प्रतिभाओं को निकाल चुका होता। ये प्रतिभाएं तब सामने आती हैं जब उनके परिवार से उन्हें आगे बढ़ने के लिए तमाम सुविधाएं और प्रोत्साहन मिलती हैं। हरियाणा की तरह खेलने वाले बच्चों के लिये गरीब माँ -बाप भी पर्याप्त मात्रा में उनके लिए दूध-दही, मक्खन-घी की व्यवस्था करते हैं। बिहारी समाज को सोचना होगा कि वे खेलों के संसार में किसी मुकाम पर क्यों नहीं पहुंच सके? बात राष्ट्रीय खेल हॉकी से ही शुरू करना चाहेंगे। समूचे बिहार में गिनती के एक-दो एस्ट्रो टर्फ से ज्यादा सुसज्जित हॉकी मैदान भी नहीं होंगे। वहां अनेकों स्तरों पर सरकार से अनेकों बार मांग के बावजूद राज्य में एस्ट्रो टर्फ मैदान या अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण केन्द्र बनाने की किसी सरकार ने सोची भी नहीं होगी। जरा सोचिए कि राष्ट्रीय नायक दादा ध्यानचंद के देश में इस तरह के राज्य भी हैं जहां पर एस्ट्रो टर्फ के मैदान नहीं हैं। जिला केन्द्रों में भी खिलाड़ियों के प्रशिक्षण केंद्र नहीं हैं। आपको समूचे बिहार में एक भी क़ायदे का स्वीमिंग पूल मिल जाए तो गनीमत होगी। सेना और अर्धसैनिक बलों के कुछ स्वीमिंग पूल हैं। पर उनका तो सैन्यकर्मी ही इस्तेमाल करते हैं। इस पृष्ठभूमि में कहां से तैयार होंगे खिलाड़ी बिहार में? कोई एक मसला हो तो कोई बात भी हो। बिहार में खेलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने को लेकर कोई बात भी नहीं होती। जो एकाध गलती से बन भी गये, उनके प्रबंधन और रखरखाव की तो बात ही न करें तो अच्छा है। रियो ओलंपिक खेलों में गई भारतीय टोली में 66 पुरुष और 54 महिलाएं थीं। लेकिन बिहार से एक भी खिलाड़ी नहीं जा पाया। बुरा मत मानिए, यही हरेक ओलंपिक खेलों में होता चला आया है। रियो ओलंपिक खेलों में हरियाणा से 23, उत्तर प्रदेश से 8, राजस्थान से 3, झारखंड से 3, मध्य प्रदेश से 2, उत्तराखंड से 2 और जम्मू-कश्मीर, छतीसगढ़, और दिल्ली से 1-1 खिलाड़ी थे।सच्ची बात यह है कि बिहार में खेलकूद को बढ़ावा देने की कभी कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई। राज्य में खेलों की संस्कृति विकसित न हो पाने के लिए राज्य सरकारें, सभी दलों के राजनेता, नौकरशाह और अभिभावक दोषी माने जाएंगे। वे भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उनका सारा फोकस बच्चों की पढ़ाई और उसके बाद उनके बच्चों का किसी प्रतियोगी परीक्षा को क्रैक करने-कराने तक ही रहता है। रियो खेलों में कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक के पिता दिल्ली परिवहन निगम में मामूली बस कंडक्टर थे। उनकी आर्थिक दृष्टि से कोई हैसियत नहीं थी। फिर भी उन्होंने अपनी पुत्री को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हरेक बिहारी अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा सिविल सेवा की परीक्षा पास कर कहीं का डीएम बन जाए। परन्तु, वह यह सोचता भी नहीं है कि उसके बच्चे के लिए खेलों में भी करियर हो सकता है। यह इसीलिये भी है कि सरकारों की नीतियाँ खिलाड़ियों को जितनी प्रोत्साहन देने वाली होनी चाहिए, उतनी हैं नहीं। इसपर भी पुनर्विचार की जरूरत है। देखिए टोक्यो जा रहे खिलाड़ी सारे देश के हैं। उन्हें बिहार भी शुभकामनाएं दे ही रहा है। हरेक बिहारी भी चाहता है कि भारतीय खिलाड़ी टोक्यो में भारी संख्या में पदक जीतें। पर बिहार और सारा देश तब खुश होगा कि जब भारतीय टोली में सब सूबों के खिलाड़ी भरपूर संख्या में होंगे। यहां पर प्रांतवाद की बात नहीं हो रही है। सीधी-सी बात यह है कि जब देश का समावेशी विकास होगा तब ही देश कायदे से आगे बढ़ेगा। इसलिए बिहार में खेलों की खराब स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है। मैं स्वयं एक स्वाभिमानी बिहारी हूँ अत: मैं इस चिंता को समझ सकता हूँ। मेरे दोनों बच्चे खिलाड़ी और पर्वतारोही रहे हैं। वे ओलम्पिक तो नहीं जा सके, लेकिन मेरा यह मानना है कि आज जो उनका व्यक्तित्व विकसित हुआ है उनमें उनकी अच्छी शिक्षा के साथ खेलकूद में उनकी रुचि और भागीदारी भी रही है। एक बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहूँगा की खेलकूद से पढ़ाई का हरगिज नुकसान नहीं होता। उलटे इससे पढ़ाई में फायदा होता है। खेलों से एकाग्रता और स्मरण शक्ति का अद्भुत विकास होता है। बिहार में खेलों के विकास की दृष्टि से एक बड़ा कदम यह हो सकता है कि राज्य कोरोना काल के नेशनल गेम्स की मेजबानी करे। मैं बिहार के यशस्वी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी से इसके लिए अनुरोध करूंगा। इससे राज्य में कई स्तरीय स्टेडियम बन जाएंगे। अगर बात फुटबॉल की करें तो इस खेल में टेलेंट मणिपुर से आ रहा है। जबकि मुझे याद है कि मेरे बचपन के दिनों में बिहार का शायद ही कोई अभागा गाँव होगा जहाँ फुटबाल की एक अच्छी टीम नहीं होती होगी। यह स्थिति सारे सरकारी स्कूलों की थी। अब मणिपुर भारत के फुटबॉल के गढ़ के रूप में उभर रहा है। पिछले अंडर 17 विश्वकप फुटबॉल चैंपियनशिप में खेली भारतीय टीम में आठ खिलाड़ी मणिपुर से थे। मणिपुर से देश को मेरीकॉम तथा डिंको सिंह जैसे महान मुक्केबाज मिल रहे हैं। क्या मणिपुर बहुत विकसित राज्य है? जब छोटा-सा अविकसित राज्य मणिपुर देश को श्रेष्ठ खिलाड़ी दे सकता है तो बिहार क्यों नहीं। टोक्यो ओलंपिक खेलों में बिहार के अलावा छत्तीसगढ़, गोवा, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा के भी खिलाड़ी नहीं रहेंगे। इन सभी राज्यों को अपने यहां खेलों के विकास पर ध्यान देना होगा। युवाओं को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। बिहार को लेकर चिंता की वजह यह है कि यहां से लगातार दो ओलंपिक खेलों में कोई खिलाड़ी देश की टोली का हिस्सा नहीं बना। क्या देश बिहार से सिर्फ बाढ़, प्राकृतिक आपदा, स्तरविहीन राजनीति और अपराध जैसी तमाम नकारात्मक ही खबरें सुनता रहेगा ?(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 15 July 2021


bhopal,The deteriorating mood , nature, incurable epidemic!

ऋतुपर्ण दवे प्रकृति पर कब किसका जोर रहा है? न प्रकृति के बिगड़े मिजाज को कोई काबू कर सका और न फिलहाल मनुष्य के वश में दिखता है। इतना जरूर है कि अपनी हरकतों से प्रकृति को लगातार नाराज जरूर किया जा रहा है जिसपर प्रकृति का विरोध भी दिख रहा है। बावजूद इसके हम हैं कि मानते नहीं। न पर्यावरण विरोधी गतिविधियों को कम करते हैं और न ही प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को ही रोकते हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। जहां प्रकृति की नेमतों में लगातार कमी आ रही है, वहीं लगता नहीं कि उसका अभिशाप भी खूब रंग दिखा है? नतीजा सामने है, गर्मियों में बरसात, बरसात में गर्मी और ठण्ड में पसीने के अहसास के बावजूद हमारा नहीं चेतना एक बड़ी लापरवाही बल्कि आपदा को खुद न्यौता देने जैसा है। हो भी यही रहा है। सच तो यह है कि प्रकृति की अपनी प्राकृतिक वातानुकूलन प्रणाली है जो बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी है, नतीजन हालिया और बीते कुछ दशकों में मानसून का बिगड़ा मिजाज सामने है। जब जरूरत नहीं थी तब इसी जून में झमाझम बारिश हुई। अब जरूरत के वक्त कई जगह सूखा तो कहीं बाढ़ के विकराल हालात बन चुके हैं। यानी प्रकृति का खुद का संतुलन बुरी तरह से बिगड़ चुका है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार तापमान में वृद्धि के कारण विश्वस्तर पर पानी की कमी और सूखे का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। दोनों ही मानवता को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाने के लिए मुंह बाएं खड़े हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1998 से 2017 के बीच बिगड़ैल मानसून से 124 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो चुका है और करीब डेढ़ अरब लोग भी प्रभावित हुए हैं। एक अन्य ताजा भारतीय शोध से भी पता चलता है कि हिमालय और काकोरम में ग्लोबल वार्मिंग का असर साफ दिखने लगा है। ग्लेशियर पिघलने से बाढ़ और रोजगार दोनों पर ही खतरा सामने है। पहले जून में पिघलने वाले ग्लेशियर अब अप्रैल में ही पिघलने लगे हैं। गर्मी से टूट रहे ग्लेशियरों से लगभग 100 करोड़ लोगों के सामने खतरे जैसे हालात दिखने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का ही पूर्वानुमान है कि ज्यादातर अफ्रीका फिर मध्य और दक्षिण अमेरिका, मध्य एशिया, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी यूरोप, मेक्सिको और शेष अमेरिका में लगातार और गंभीर सूखा पड़ेगा। अभी जो हालात बन रहे हैं वह कुछ यही इशारा कर रहे हैं। भारतीय संदर्भ में देखें तो इसी बीते जून के अंत से जुलाई के दूसरे पखवाड़े में अबतक उमस और नम हवाओं के बीच लू के थपेड़े और भी ज्यादा खतरनाक हो रहे हैं। दरअसल यह वेट बल्ब तापमान वाली जैसी स्थिति होती है जो उमस और गर्मीं दोनों से मिलकर बनती है। इसमें तापमान तो 30 डिग्री के आसपास होता है लेकिन वातावरण में नमी 90 प्रतिशत होने के बावजूद ऐसे मौसम को सह पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। वाकई फिलहाल हालात कुछ ऐसे ही हैं। 2017 का एक अध्ययन बताता है कि दुनिया न सिर्फ गर्म हो रही है बल्कि हवा में नमी का स्तर भी तेजी से बढ़ रहा है जो यदि तापमान 35 डिग्री वैट बल्ब तक पहुंच जाए तो जिन्दगी के लिए जबरदस्त खतरा भी हो सकता है और बमुश्किल 6 घण्टों में ही मौत संभव है। जहां भारत में समय से पहले आए मानसून की आमद और अब जरूरत के वक्त गफलत ने किसानों सहित सबको परेशान कर रखा है। वहीं अमेरिका में भी पारे ने नया रिकॉर्ड बना दिया। कैलीफोर्निया के डेथवैली पार्क में इसी 9 जुलाई को अधिकतम तापमान 54 डिग्री सेल्सयस दर्ज हुआ। इससे पहले 10 जुलाई 1913 को वहां तापमान 56.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ जो दुनिया में सर्वाधिक है। कैलीफोर्निया, ओरेगन और एरिजोना में तमाम जंगल धधक उठे हैं, धुंआ भरे पायरोकम्युलस बादलों का निर्माण कुछ इस तरह हुआ जो अमूमन जंगलों की बड़ी आग या ज्वालामुखी से बनते हैं। अभी जुलाई के 14 दिनों में ही 2,45,472 एकड़ इलाका जलकर खाक हो चुका है। तापमान भी 54 पार कर 57 डिग्री सेल्ससियस पहुंचने पर उतारू है। बिजली गिरने की कई घटनाएं हुई और आग फैलती चली गई। भारत में राजस्थान का चुरू भी देश का सबसे ज्यादा तापमान वाला शहर बन चुका है। दरअसल यह इंसानों की करतूतों से मौसम का बदलाव है। इसपर 70 विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया अध्ययन है जिसमें स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। ऐसे प्रभावों को जानने वाला यह पहला और अब तक का सबसे बड़ा शोध है। यह शोध नेचर क्लाइमेट पत्रिका में प्रकाशित हुआ है जिसके अनुसार गर्मी की वजह से होने वाली सभी मौतों का औसतन 37 प्रतिशत कहीं न कहीं सीधे तौर पर इंसानी करतूतों से हुई जिसके लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है। इस शोध अध्ययन के लिए 43 देशों में 732 स्थानों से आंकड़े जुटाए गए जो पहली बार गर्मी की वजह से मृत्यु के बढ़ते खतरे में इंसानी करतूतों से जलवायु परिवर्तन के वास्तविक योगदान को दिखाता है। साफ है कि जलवायु परिवर्तन से इंसानों पर दिख रहे खतरे अब ज्यादा दूर नहीं है। दुनिया की प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लेंसेंट का एक अध्ययन तो बेहद चौंकाने वाला है जिसमें केवल भारत में ही हर साल असामान्य गर्मी या ठण्ड से करीब 7.40 लाख लोगों की मौत की चर्चा है। अलग-अलग देखने पर पता चलता है कि भारत में जहां असामान्य ठण्ड से हर वर्ष 6,55,400 लोगों की मौत होती है तो असामान्य गर्मी से 83,700 लोग जान गवां बैठते हैं। वहीं मोनाश यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया के रिसर्चर की एक टीम ने असामान्य तापमान की वजह से दुनिया भर में 50 लाख लोगों से अधिक की मौत बताकर चौंका दिया है। यह मौत हाल के कोरोना वायरस से हुई मौतों से काफी अधिक है। यह शोध 2000 से 2019 के दौरान का है जिसमें 0.26 सेल्सियस बढ़ा तापमान और मृत्युदर का अध्ययन है।संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि (आपदा जोखिम न्यूनीकरण) मामी मिजूतोरी भी इस बात को मानती हैं कि बिगड़ते पर्यवारण से पनपा सूखा अगली ऐसी महामारी बनने जा रहा है जिसके लिए न कोई टीका होगा न दवाई। यानी बिगड़ते पर्यावरण से निपटने की तैयारी और कारगर व्यवस्थाएं ही कुछ कर पाएंगी जिसपर गंभीरता से किसी का ध्यान नहीं है। इसके लिए अभी से तैयारी की जरूरत है।

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Dakhal News 15 July 2021


bhopal,Development of Kashi ,cultural heritage

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री विकास की समग्र अवधारणा में सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व ऐतिहासिक नगरों का विशेष महत्व होता है। अनेक देशों ने इस कार्य को प्राथमिकता के आधार पर किया। उन्होंने अपने ऐसे नगरों में विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराई। उनकी अर्थव्यवस्था में पर्यटन व तीर्थाटन का विशेष योगदान रहता है। वहां विश्व स्तरीय सुविधाओं व संसाधनों का विकास किया। इसके कारण अनेक स्थानों को विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा मिली। स्वतंत्रता के बाद भारत के लिए भी ऐसा करने का अवसर था। लेकिन कतिपय मध्यकालीन इमारतों के अलावा अन्य ऐतिहासिक स्थानों के विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। नरेंद्र मोदी ने जब काशी को क्वेटो जैसा विकसित करने की बात कही थी, तब इसका प्रतीकात्मक महत्व था। क्वेटो को विश्वस्तरीय बनाने में वहां की अनेक सरकारों ने प्रयास किया था। जबकि हमारे यहां इस प्रकार के विजन का अभाव रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार ने तीर्थाटन व पर्यटन पर अत्यधिक जोर दिया। इस विषय को प्राथमिकता में शामिल किया। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री अनेक नगरों का पर्यटन की दृष्टि से विकास किया था। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने के बाद वह काशी आये थे। यहां उन्होंने कहा था कि ना मैं आया हूँ, ना किसी ने मुझे भेजा है, मुझे मां गंगा ने बुलाया है। उनका यह कथन काशी की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप था। जिसमें यहां के विकास का भाव भी समाहित था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस दिशा में प्रयास किये। लेकिन विकास को वास्तविक गति योगी आदित्यनाथ सरकार ने दी। नरेंद्र मोदी अक्सर काशी आते रहे हैं। प्रत्येक बार यहां वह विकास संबन्धी अनेक योजनाओं की सौगात देते हैं। इसबार की यात्रा भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही। इसमें जापान और भारत की मैत्री का प्रतीक स्थल भी शामिल है। उन्होंने रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर का लोकार्पण किया। बीएचयू परिसर में सौ बेड के एमसीएच विंग का दौरा किया। पहले तल पर बने पीडियाट्रिक वार्ड के निरीक्षण के बाद डॉक्टरों व अफसरों से संवाद किया। प्रधानमंत्री के समक्ष कोरोना की तीसरी लहर से बचाने के उपायों के बाबत जिला प्रशासन की ओर से प्रजेंटेशन दिया गया। प्रधानमंत्री ने काशी को एक सौ बयालीस परियोजनाओं की सौगात प्रदान की। अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर रुद्राक्ष का लोकार्पण विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। इसके प्रति अनेक देशों की जिज्ञासा रही है। इस दौरान भारत में जापान के राजदूत भी मौजूद थे। जापानी प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा कार्यक्रम से वर्चुअल रूप में सगभागी रहे। नरेंद्र मोदी ने यहां के पार्क में रुद्राक्ष का पौधा लगाएंगे। रुद्राक्ष का निर्माण जापान सरकार ने कराया है। यह भारत और जापान की मित्रता का प्रतीक है। केंद्र व उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकारें सांस्कृतिक नगरों के विकास पर ध्यान दे रही है। इसके दृष्टिगत अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इनसे जुड़े अनेक मार्गों का निर्माण किया जा रहा है। काशी भी इसमें सम्मलित है। यह दुनिया का सबसे प्राचीन नगर है। योगी आदित्यनाथ ने इस क्षेत्र में औपचारिकता के निर्वाह की नीति में बदलाव किया। वह तीर्थाटन व पर्यटन को बढ़ावा देने के अभियान में सक्रियता से शामिल हुए। पर्यटन के मामले में उत्तर प्रदेश बेजोड़ है। काशी, मथुरा, अयोध्या, सारनाथ, कुशीनगर की महिमा व प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में है। स्वतन्त्रता के बाद से ही इन स्थानों को विश्वस्तरीय बनाने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए था। लेकिन पिछली सरकारों में इन्हें लेकर एक संकोच था, जिसके चलते इन पर्यटन केंद्रों की उपेक्षा हुई। धार्मिक पर्यटन से तो लोगों की आस्था जुड़ी होती है। सरकार उचित व्यवस्था न करे, तब भी लोग वहां पहुँचते ही हैं। ऐसे अनेक देवी स्थल हैं, जहाँ नवरात्रि जैसे अवसरों पर लोग बस व ट्रेन से पहुंचते हैं। लेकिन व्यवस्था न होने के कारण उन्हें सड़क किनारे किसी बाग आदि में रात्रि विश्राम को विवश होना पड़ता है। ऐसे दृश्य किसी भी तीर्थ में देखे जा सकते हैं। जो लोग काशी और क्वेटो को लेकर मोदी सरकार पर कटाक्ष करते थे वह अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते। सात दशक पहले आबादी कम थी। उस समय से सुनियोजित और सन्तुलित विकास किया जाता तो आज इतनी समस्या न होती। लेकिन जब प्राथमिकता में ही ये स्थान नहीं थे। ऐसे धार्मिक पर्यटन स्थल का विकास कैसे हो सकता था। वह अपने गांव व निर्वाचन क्षेत्र के लिए बहुत सजग रहते थे। लेकिन धार्मिक पर्यटन स्थलों के प्रति ऐसी उदारता नहीं दिखाई देती थी। केवल कुछ सड़के बना देते से पर्यटन के प्रति सरकारों की जिम्मेदारी पूरी नही होती।इसके लिए भावना का एक स्तर भी होना चाहिए। पहले इसका अभाव था। ऐसा नहीं कि क्वेटो प्राचीन काल से सुविधा संपन्न था। कुछ दशक पहले ही जापान की सरकार ने इस ओर ध्यान दिया। देखते ही देखते उसका सुनियोजित विकास हुआ। विश्व की सबसे प्राचीन नगरी काशी है। अयोध्या में श्रीराम, मथुरा में श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। सारनाथ और कुशीनगर गौतम बुद्ध से जुड़े तीर्थ हैं। बीस से अधिक देशों की आस्था यहां से जुड़ी है। ये देश यहां के विकास से अपने को जोड़ना चाहते हैं। लेकिन हम इसका भी अपेक्षित लाभ नहीं उठा सके। योगी आदित्यनाथ ने धार्मिक पर्यटन की कमियों की ओर गंभीरता से ध्यान दिया है। वह भावनात्मक रूप में भी इन स्थानों से जुड़े हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने अपनी भूमिका को विस्तार दिया है। अयोध्या में दीपावली, मथुरा और गोरखपुर में होली के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पर्यटन के लिए सन्देश देने का भी काम किया है। गढ़मुक्तेश्वर को विश्व स्तरीय आध्यत्मिक नगरी बनाने का निर्णय महत्वपूर्ण है। यह योगी आदित्यनाथ के प्रयासों का ही परिणाम है। इसके लिए मलेशिया की कम्पनी ने पांच हजार करोड़ रुपये का एमओयू किया है। इस प्रयास से महाभारतकालीन गढ़मुक्तेश्वर पर्यटन का अंतराष्ट्रीय केंद्र बनेगा। इसे पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर विकसित किया जाएगा। इसके गंगा किनारे स्थित इलाकों को सँवारा जा रहा है। काशी का विकास भी सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप है।

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Dakhal News 15 July 2021


bhopal, Delimitation process proceeds , Jammu and Kashmir

प्रमोद भार्गव जम्मू-कश्मीर में धारा-370 और 35-ए समाप्त होने के बाद ठिठकी हुई राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होने के बाद परिसीमन आयोग ने भी चार दिन का दौरा करके परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने जम्मू-कश्मीर के 290 प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात करने के बाद कहा कि 'परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर होगा। 1995 में जेके में 12 जिले थे, जबकि अब 20 हैं। तहसीलें भी 58 से बढ़कर 270 हो गई हैं। 12 जिले ऐसे हैं, जिनके विधानसभा क्षेत्रों की सीमा जिले से बाहर हैं। कुछ सीटें ऐसी भी हैं, जिनकी सीमा 1 से ज्यादा तहसीलों में है। इस आधार पर विधानसभा की सात सीटें बढ़ जाएंगी। अगले वर्ष मार्च तक परिसीमन पूरा होने के पश्चात अंतिम प्रारूप रायशुमारी के लिए रखा जाएगा। जेके में पहला पूर्ण परिसीमन आयोग 1981 में बना था।' जम्मू-कश्मीर के विभाजन और विधानसभा सीटों के विभाजन संबंधी पुनर्गठन विधेयक-2019, 31 अक्टूबर 2019 को लागू कर दिया गया था। इसके लागू होने के बाद इस राज्य राज्य की भूमि का ही नहीं राजनीति का भी भूगोल बदलेगा। इसके साथ ही विधानसभा सीटों के परिसीमन के जरिए राजनीतिक भूगोल बदलेगा। नए सिरे से परिसीमन व आबादी के अनुपात में जम्मू-कश्मीर की नई विधानसभा का जो आकार सामने आएगा, उसमें फिलहाल विधानसभा की सात सीटें बढ़ने का संकेत मिल गया है। बंटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित राज्य हो गए हैं। दोनों जगह दिल्ली व चंडीगढ़ की तरह की तरह मजबूत उप राज्यपाल सत्ता-शक्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में अस्तित्व में आ गए हैं। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। आयोग राजनीतिक भूगोल का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। आयोग राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा आबादी और उसका लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का आकलन करेगा। साथ ही राज्य में अनुसूचित व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों को सुरक्षित करने का भी अहम निर्णय लेगा। फिलहाल रंजना देसाई की अध्यक्षता वाले परिसीमन आयोग ने कहा है कि 11 सीटें अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए आरक्षित की जाएंगी। बढ़ी सात सीटें जम्मू क्षेत्र में जाएंगी। साफ है, जम्मू-कश्मीर में भौगोलिक, सांप्रदायिक और जातिगत असमानताएं दूर होंगी। नतीजतन इस पूरे क्षेत्र में नए राष्ट्रवादी उज्जवल चेहरे देखने में आएंगे, जो देश की अखंडताव संप्रभुता को सुरक्षित बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होंगे। जम्मू-कश्मीर का करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र लद्दाख में है। इसी क्षेत्र में लेह आता है, जो अब लद्दाख की राजधानी हैं। यह क्षेत्र पाकिस्तान और चीन की सीमाएं साझा करता है। लगातार 70 साल लद्दाख, कश्मीर के शासकों की बदनीयती का शिकार होता रहा है। अब तक यहां विधानसभा की मात्र चार सीटें थीं, इसलिए राज्य सरकार इस क्षेत्र के विकास को कोई तरजीह नहीं देती थी। लिहाजा आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र के लोगों में केंद्र शासित प्रदेश बनाने की चिंगारी सुलग रही थी। अब इस मांग की पूर्ति हो गई है। इस मांग के लिए 1989 में लद्दाख बुद्धिस्ट एसोशिएशन का गठन हुआ और तभी से यह संस्था कश्मीर से अलग होने का आंदोलन छेड़े हुए थी। 2002 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के अस्तित्व में आने के बाद इस मांग ने राजनीतिक रूप ले लिया था। 2005 में इस फ्रंट ने लेह हिल डवलपमेंट काउंसिल की 26 में से 24 सीटें जीत ली थीं। इस सफलता के बाद इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसी मुद्दे के आधार पर 2004 में थुप्स्तन छिवांग सांसद बने। 2014 में छिवांग भाजपा उम्मीदवार के रूप में लद्दाख से फिर सांसद बने। 2019 में भाजपा ने लद्दाख से जमयांग सेरिंग नामग्याल को उम्मीदवार बनाया और वे जीत भी गए। लेह-लद्दाख क्षेत्र अपनी विषम हिमालयी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण साल में छह माह लगभग बंद रहता है। सड़क मार्गों व पुलों का विकास नहीं होने के कारण यहां के लोग अपने ही क्षेत्र में सिमटकर रह जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार 1995 में परिसीमन हुआ था। राज्य का विलोपित संविधान कहता था कि हर 10 साल में परिसीमन जारी रखते हुए जनसंख्या के घनत्व के आधार पर विधान व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होना चाहिए। परिसीमन का यही समावेशी नजारिया है। जिससे बीते 10 साल में यदि जनसंख्यात्मक घनत्व की दृष्टि से कोई विसंगति उभर आई है, तो वह दूर हो जाए और समरसता पेश आए। इसी आधार पर राज्य में 2005 में परिसीमन होना था, लेकिन 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने राज्य संविधान में संशोधन कर 2026 तक इस पर रोक लगा दी थी। इस हेतु बहाना बनाया कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े आने तक परिसीमन नहीं होगा। फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल 111 सीटें हैं। इनमें से 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) क्षेत्र में आती हैं। इस उम्मीद के चलते ये सीटें खाली रहती हैं कि एक न एक दिन पीओके भारत के कब्जे में आ जाएगा। फिलहाल बाकी 87 सीटों पर चुनाव होता है। इस समय कश्मीर यानी घाटी में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं। 2011 की जनगण्ना के आधार पर राज्य में जम्मू संभाग की जनसंख्या 53 लाख 78 हजार 538 है। यह प्रांत की 42.89 प्रतिशत आबादी है। राज्य का 25.93 फीसदी क्षेत्र जम्मू संभाग में आता है। इस क्षेत्र में विधानसभा की 37 सीटें आती हैं। दूसरी तरफ कश्मीर घाटी की आबादी 68 लाख 88 हजार 475 है। प्रदेश की आबादी का यह 54.93 प्रतिशत भाग है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल का 15.73 प्रतिशत है। यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं। इसके अलावा राज्य के 58.33 प्रतिशत वाले भू-भाग लद्दाख में संभाग में महज 4 विधानसभा सीटें थीं, जो अब लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद विलोपित हो जाएंगी। साफ है, जनसंख्यात्मक घनत्व और संभागवार भौगोलिक अनुपात में बड़ी असमानता है, जनहित में इसे दूर किया जाना, एक जिम्मेवार सरकार की जवाबदेही बनती है। फिलहाल कश्मीर में एक भी सीट पर जातिगत आरक्षण की सुविधा नहीं है, जबकि इस क्षेत्र में 11 प्रतिशत गुर्जर बकरवाल और गद्दी जनजाति समुदायों की बड़ी आबादी निवास करती है। जम्मू क्षेत्र में सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इनमें आजादी से लेकर अब तक क्षेत्र का बदलाव नहीं किया गया है। बहरहाल अब इन केंद्र शासित प्रदेशों में कई ऐसे बदलाव देखने में आएंगे, जो यहां के निवासियों के लिए समावेशी होने के साथ लाभदायी भी साबित होंगे।

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Dakhal News 12 July 2021


bhopal, Afghanistan Crisis, India and Pakistan

डॉ. वेदप्रताप वैदिक परसों तक ऐसा लग रहा था कि अफगानिस्तान में हमारे राजदूतावास और वाणिज्य दूतावासों को कोई खतरा नहीं है लेकिन हमारा कंधार का दूतावास कल खाली हो गया। लगभग 50 कर्मचारियों और कुछ पुलिसवालों को आनन-फानन जहाज में बिठाकर नई दिल्ली ले जाया गया है। वैसे काबुल, ब़ल्ख और मजारे-शरीफ में हमारे कूटनीतिज्ञ अभी तक टिके हुए हैं लेकिन कोई आश्चर्य नहीं कि वे दूतावास भी तालिबान के घेरे में शीघ्र ही चले जाएं। जो ताज़ा खबरें आ रही हैं उनसे तो ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान के उत्तरी और पश्चिमी जिलों में तालिबान का कब्जा बढ़ता जा रहा है। एक खबर यह भी है कि तालिबानी हमले का मुकाबला करने की बजाय लगभग एक हजार अफगान सैनिक ताजिकिस्तान की सीमा में जाकर छिप गए। चीन पहुंचे तालिबान प्रवक्ता ने पेइचिंग में घोषणा की है कि 85 प्रतिशत क्षेत्र पर तालिबान का कब्जा हो चुका है जबकि राष्ट्रपति अशरफ गनी का कहना है कि अफगान फौज और पुलिस तालिबान आतंकवादियों को पीछे खदेड़ती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा है कि अफगानिस्तान के विभिन्न जिलों में रोज लगभग 200 से 600 लोग मारे जा रहे हैं। यह गृहयुद्ध की स्थिति नहीं है तो क्या है ? जो चीन पाकिस्तान का इस्पाती दोस्त है और तालिबान का समर्थक है, वह भी इतना घबराया हुआ है कि उसने अपने लगभग 200 नागरिकों से काबुल खाली करवाया है। चीन इन बुरे हालात का दोष अमेरिका के सिर मढ़ रहा है लेकिन आश्चर्य की बात है कि काबुल में पाकिस्तानी राजदूत मंसूर अहमद खान ने दुनिया के देशों से अपील की है कि वे अफगान फौजों की मदद करें, वरना तालिबानी हमलों के कारण लाखों शरणार्थी दुबारा पाकिस्तान के सीने पर सवार हो जाएंगे। पाकिस्तान के नेता एक तरफ अफगानिस्तान की गनी सरकार को काफी दिलासा दिला रहे हैं और दूसरी तरफ उनका गुप्तचर विभाग और फौज तालिबान के विभिन्न गिरोहों की पीठ थपथपा रहे हैं। तालिबान के इस दावे पर संदेह किया जा सकता है कि 85 प्रतिशत अफगान भूमि पर उनका कब्जा हो गया है लेकिन यह सत्य है कि उन्होंने ईरान की सीमा पर स्थित शहर इस्लाम किला और वाखान क्षेत्र में चीन से जुड़े अफगान इलाकों पर कब्जा कर लिया है। तालिबान नेताओं ने चीनी नेताओं को भरोसा दिलाया है कि वे सिंक्यांग के उइगर मुसलमानों को नहीं भड़काएंगे और उनकी सरकार चीनी आर्थिक सहायता को सहर्ष स्वीकार करेगी। कश्मीर के बारे में वे कह चुके हैं कि वे उसे भारत का आतंरिक मामला मानते हैं। ये बातें सत्ताकामी शक्ति के संयम और संतुलन को बताती हैं लेकिन जिन जिलों पर तालिबान कब्जा कर चुके हैं, उनमें उन्होंने अफगान महिलाओं पर अपने पुराने इस्लामी प्रतिबंध थोप दिए हैं। अफगान गृहयुद्ध का सबसे बुरा असर पाकिस्तान और भारत पर होगा।

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Dakhal News 12 July 2021


bhopal, politics of two children

डॉ. वेदप्रताप वैदिक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए जो विधेयक प्रस्तावित किया है, उसकी आलोचना विपक्षी दल इस आधार पर कर रहे हैं कि यह मुस्लिम-विरोधी है। यदि वह सचमुच मुस्लिम-विरोधी होता तो वह सिर्फ मुसलमानों पर ही लागू होता यानी जिस मुसलमान के दो से ज्यादा बच्चे होते, उसे तरह-तरह के सरकारी फायदों से वंचित रहना पड़ता, जैसा कि मुगल-काल में गैर-मुस्लिमों के साथ कुछ मामलों में हुआ करता था लेकिन इस विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है। यह सबके लिए समान है। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख, क्या ईसाई और क्या यहूदी! यह ठीक है कि मुसलमानों में जनसंख्या के बढ़ने का अनुपात ज्यादा है लेकिन उसका मुख्य कारण उनकी गरीबी और अशिक्षा है। हिंदुओं में भी उन्हीं समुदायों में बच्चे ज्यादा होते हैं, जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं और मेहनतकश हैं। जो शिक्षित और संपन्न मुसलमान हैं, उनके भी परिवार आजकल प्रायः सीमित ही होते हैं लेकिन भारत में जो लोग सांप्रदायिक राजनीति करते हैं, वे अपने-अपने संप्रदाय का संख्या-बल बढ़ाने के लिए लोगों को उकसाते हैं। ऐसे लोगों को हतोत्साहित करने के लिए उत्तर प्रदेश का यह कानून बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है। इस विधेयक में एक धारा यह भी जोड़ी जानी चाहिए कि इस तरह से उकसानेवालों को सख्त सजा दी जाएगी। इस विधेयक में फिलहाल जो प्रावधान किए गए हैं, वे ऐसे हैं जो आम लोगों को छोटा परिवार रखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। जैसे जिसके भी दो बच्चों से ज्यादा होंगे, उसे सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, उसकी सरकारी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी, उसे स्थानीय चुनावों में उम्मीदवारी नहीं मिलेगी। जिसका सिर्फ एक बच्चा है, उसे कई विशेष सुविधाएं मिलेंगी। नसबंदी करानेवाले स्त्री-पुरुषों को एक लाख और 80 हजार रु. तक मिलेंगे। ये सभी प्रावधान ऐसे हैं, जिनका फायदा पढ़े-लिखे, शहरी और मध्यम वर्ग के लोग तो जरूर उठाना चाहेंगे लेकिन जिन लोगों की वजह से जनसंख्या बहुत बढ़ रही है, उन लोगों को न तो सरकारी नौकरियों से कुछ मतलब है और न ही चुनावों से। दो बच्चों की यह राजनीति मंहगी भी पड़ सकती है। लेकिन भाजपा यदि इस मुद्दे पर चतुराई से काम करे तो उत्तर प्रदेश ही नहीं, सारे देश में थोक वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है और लोकसभा में उसकी सीटें अब से भी काफी ज्यादा बढ़ सकती हैं। जनसंख्या-नियंत्रण का बेहतर तरीका तो यह है कि शादी की उम्र बढ़ाई जाए, स्त्री शिक्षा बढ़े, परिवार-नियंत्रण के साधन मुफ्त बांटे जाएं, शारीरिक श्रम की कीमत ऊँची हो, जाति और मजहब के वोटों की राजनीति का खात्मा हो।

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Dakhal News 12 July 2021


bhopal, Population Growth ,Challenges

हृदयनारायण दीक्षित भौतिक संसाधन सीमित हैं। जनसंख्या वृद्धि असीमित। लोगों के आवास के लिए भी भविष्य में जगह कम पड़ सकती है। अजेय और समृद्ध भारत सबकी अभिलाषा है। इस कार्य में भारी जनसंख्या वृद्धि बड़ी बाधा है। इसी कारण नगरों की सीमा बढ़ रही है। सरकारें अस्पताल बनाती हैं, चिकित्सक नियुक्त करती हैं। न्यायपालिका न्यायालय केन्द्र बनाती है। तमाम तरह की जनसुविधाओं के केन्द्र खोले जाते हैं, लेकिन कम पड़ जाते हैं। किसी नगर या महानगर में एक सड़क बनती है। सड़क के किनारे रहने वाले लोग प्रसन्न होते हैं कि अब सड़क बन गयी है। सुविधाएं बढ़ेगीं। लेकिन जनसंख्या वृद्धि से तीन चार साल बाद सड़क बेकार हो जाती है। सरकार दूसरा फैसला लेती है। फ्लाई ओवर बनाती है, फ्लाई ओवर बनता है, तो लगता है कि अब भीड़ नियंत्रित रहेगी। इसी तरह अस्पतालों में भीड़ है। कचहरी में भीड़ है। हम जहां कहीं जा रहे हैं वहां भीड़ है। यह भीड़ बहुत अराजक ढंग से बढ़ रही है। सरकारी संसाधन जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ रहे हैं। बढ़ाये जा भी नहीं सकते। भारत के सामने भारी जनसंख्या के लिए चुनौती है। इस पर चर्चा बहुत होती है लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ठोस कार्रवाई नहीं होती। राजनेताओं का एक वर्ग इसे साम्प्रदायिक तूल देता है। बढ़ती जनसंख्या के परिणामों पर सार्थक चर्चा नहीं होती। उ0प्र0 देश का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए राजनैतिक साहस दिखाया है। आज वे इसकी नीति जारी करेंगे। यह स्वागतयोग्य है। जनसंख्या वृद्धि को रोकना बड़ी चुनौती है। वैसे सभी सरकारों के सामने सामान्य सुविधाएं जुटाने की चुनौती रही है। चिकित्सा की, शिक्षा की, स्वास्थ्य की, समाज जीवन की अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं की चुनौती है। सड़कें बढ़ रही हैं लेकिन भारी जनसंख्या के लिए कम पड़ रही हैं। परिवहन सेवाएं बढ़ रही हैं। बसों की संख्या बढ़ रही है। रेलों की संख्या बढ़ रही है। रेलों में डिब्बों की संख्या बढ़ रही है लेकिन आम जनता के लिए सारी संसाधन शक्ति कम पड़ रही है। आम जनता व्यथित है। जरूरी सुविधाएं कम पड़ रही हैं। हम सब जानते हैं कि इसका मूल कारण जनसंख्या वृद्धि है। जनसंख्या पर नियंत्रण एक राष्ट्रीय चुनौती भी है। इस प्रश्न पर राजनैतिक कार्यकर्ताओं की सजगता भी जरूरी है। वे अपने दल के साथ राजनैतिक दृष्टि से प्रतिबद्ध रहते हुए राष्ट्रजीवन को सुखमय, आनंदमय बनाने का काम कर सकते हैं। हम किसी भी दल में हों, हम कोई भी काम को करते हों जनसंख्या बढ़ेगी तो वह काम गड़बड़ायेगा। राष्ट्रीय विकास में बाधा पड़ेगी। जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम आपत्काल (1975-77) में भी चलाया गया था लेकिन इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में जबर्दस्ती थी। बाजारें बन्द हो गयी थीं। ग्रामीण गाड़ी देखते ही भाग जाते थे कि इस गाड़ी में नसबंदी के लिए पकड़ने वाले तहसीलदार अथवा पुलिस वाले आये होंगे। बच्चों की भी नसबंदी थी। सब तरफ आतंक था। गांव में रातें खाली थीं, विरोध करने वाले लोगों को मारपीट कर जेल भेज दिया जाता था। सन् 1977 में आपातकाल हटा। उस समय अखबारो में इसकी जबर्दस्ती पर बहुत कुछ लिखा जा रहा था। आपातकाल के समय जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम को जोर जबर्दस्ती की नसबंदी से बदनाम किया गया। फिर जनता ने फैसला सुनाया। वह सरकार अस्तित्व में नहीं आयी। उससे वातावरण बिगड़ा। बाद में किसी भी राजनैतिक दल की हिम्मत नहीं हुई कि इस विषय को छेड़ने का काम करे। यह बड़ी गलती थी। उसके कारण जनसंख्या नियंत्रण के वैज्ञानिक उपायों, ठोस उपायों की बदनामी हुई। समाज जीवन में जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा फिर नहीं चली। जनसंख्या नियंत्रण अपरिहार्य आवश्यकता है। इसकी गंभीरता हम सब जानते हैं। इसके कई पहलूओं पर कई तरह के अध्ययन हुए हैं। उनमें से एक अध्ययन यह भी है कि समृद्ध क्षेत्रों में प्रजनन दर कम होती है। जहां शिक्षा है जहां संसाधन है, जहां संरक्षक अपने परिवार को बहुत ठीक से चला रहे हैं। उनके घर में समृद्धि है। पर्याप्त संसाधन है, वहां प्रजनन दर कम होती है। संप्रति जनसंख्या तेज रफ्तार बढ़ रही है। लेकिन उसी तेज रफ्तार से हमारे आर्थिक संसाधन नहीं बढ़ रहे हैं। बढ़ाये नहीं जा सकते। आर्थिक संसाधन बढ़ाये जाने की दिशा में पिछले 6-7 वर्ष से काफी काम हुआ है। आर्थिक के साथ-साथ अन्य साधन भी बढ़ाये जाने पर पूरी सजगता के साथ सरकारें काम करती हैं। नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत में ऐसे कामों का सिलसिला बहुत प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। आर्थिक मोर्चे पर, गरीबी के मोर्चे पर और बिजली के मोर्चे पर ऐतिहासिक काम हुए हैं। अन्य कई मोर्चों पर भी ऐतिहासिक काम हुए हैं। लेकिन घूम फिर कर फिर से चर्चा आ जाती है जनसंख्या वृद्धि की। जनसंख्या वृद्धि की तेज रफ्तार के सामने बढ़ते संसाधन कम पड़ रहे हैं। भारी जनसंख्या के कारण गरीबी है, अभाव है। जीवन की गुणवत्ता घटी है। इस गंभीर विषय पर साकारात्मक लोकमत बनाये जाने की भी आवश्यकता है। जनसंख्या वृद्धि देश के लिए हानिकारक है। इस पर समाजसेवी संस्थाओं को भी आगे आना होगा। सभी राजनैतिक दलों को मतभेद भुलाकर जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक साथ काम करना चाहिए। विपक्ष को भी सोचना चाहिए कि यह राष्ट्रीय मुद्दा है। राष्ट्रीय आवश्यकता और राष्ट्रीय अपरिहार्यता है। राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसे साम्प्रदायिक रंग देना गलत है। विपक्ष को भी समवेत होकर इस दिशा में एक साथ आगे बढ़ना चाहिए। जनसंख्या वृद्धि तेज रफ्तार है। कहा नहीं जा सकता कि जनसंख्या कितनी हो गयी। 2011 के बाद अभी ताजी जनसंख्या के आकड़े नहीं हैं। सन् 2011 के आकड़ों से लेकर अब तक हम बहुत आगे बढ़ गये होंगे। कह सकते हैं कि जितनी देर में यह आलेख लिखा गया उतनी देर में ही जनसंख्या बहुत बढ़ गयी होगी। जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय चुनौती है। इसके लिए हतोत्साहन और प्रोत्साहन दोनों जरूरी हैं। जनसंख्या वृद्धि पर संयम रखने वालों को प्रोत्साहन से लाभ होगा। बात हतोत्साहन के उपायों भी लाभकारी होंगे। मतभिन्नता के बावजूद राष्ट्रीय प्रश्नों पर सब की सहमति अपरिहार्य है। साम्प्रदायिकता की बातें गलत हैं। जनसंख्या वृद्धि का सम्बंध व्यक्ति से है। संप्रदाय से नहीं। इस विषय में व्यक्ति ही इकाई है। जाति वर्ग नहीं। संविधान निर्माताओं ने उद्देशिका को हमारे लिए गीत मंत्र की तरह रचा है। मार्गदर्शी भी बनाया है। वह प्रारम्भ होती है हम भारत के लोग वाक्य से। भारत में लोग हैं। भारत जाति, संप्रदाय, पंथ, रिलीजन का जोड़ नहीं है। राष्ट्र से भिन्न सारी अस्मिताएं छोटी हैं। स्थानीय हैं। ऐसी विभाजनकारी अस्मिताएं विदा हो रही हैं। भारत को हर तरह से संपन्न गरीबीविहीन राष्ट्र बनाने से कोई नहीं रोक सकता है।

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Dakhal News 11 July 2021


bhopal,Ministry of Cooperation, give impetus , Indian economy

मानवेंद्र सिंह मोदी सरकार के विस्तार में लिए गए निर्णय में जिस नए सहकारिता मंत्रालय की रचना की गई है, उसमें अपार संभावनाएं हैं। यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विगत 7 साल में लिए गए सबसे बड़े आधारभूत फैसलों में से एक है। विगत 7 साल में मोदी सरकार 'मेक इन इंडिया' से लेकर नोटबंदी, आत्मनिर्भर भारत और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक फैसले ले चुकी है और वे फैसले सार्थक भी साबित हुए हैं। आज विश्वव्यापी महामारी कोरोना की वजह से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था नकारात्मक दौर से गुजर रही है। फिर भी भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब नए मंत्रालय के गठन का निर्णय लिया तब इस निर्णय से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी आनी स्वाभाविक है। विश्व की नजर एकबार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था पर है। भारतीय अर्थव्यवस्था चार स्तंभों पर आधारित है-सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, संयुक्त क्षेत्र और सहकारी क्षेत्र। अर्थव्यवस्था के विकास में सहकारी योगदान महत्वपूर्ण है।ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में सहकारिता आन्दोलन की बहुत बड़ी भूमिका है और देश के कई राज्यों में इसके माध्यम से वहां के किसानों और आम आदमी के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है।सहकारिता का आन्दोलन विशुद्ध रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा एक अभियान है।सहकारी संस्थाओं की मजबूती और उनका आधार लोकतांत्रिक प्रणाली है वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कार्यभार ग्रहण किए जाने के समय देश में सहकारिता की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और इस क्षेत्र में काफी उथल-पुथल थी। सहकारिता आन्दोलन में स्वार्थी तत्वों की घुसपैठ के कारण यह आन्दोलन दम तोड़ने के कगार पर था, लेकिन आज देश में सहकारिता उससे उभर कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ गया है।सूक्ष्म, लघु एवं मंझोले उद्यम (एमएसएमई) के विस्तार और विकास में सहकारिता आन्दोलन उल्लेखनीय योगदान कर सकता है। यह न केवल इस क्षेत्र को सुदृढ़ बना सकता है, बल्कि उसके माध्यम से रोजगार के सृजन और स्वावलम्बन का एक नवीन मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।आर्थिक विकास के विभिन्न साधनों में सहकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ मिलकर काम करने की भावना ही सहकारिता होती है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में तो सहकारिता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यह बात अलग है कि इस भावना में निरंतर कमी होती जा रही है जिसका कारण यह है कि समाज का ढांचा वैयक्तिकता की ओर बढ़ रहा है। वर्तमान में समूह के स्थान पर व्यक्तिगत भावना का वर्चस्व अधिक है, जिसका प्रभाव सहकारिता पर पड़ रहा है। सहकारी समितियों का महत्व विकास कार्यक्रमों के संचालन में अधिक है। साथ-साथ काम करने से जहां एक ओर काम बंट जाता है, तो इसका प्रभाव उत्पादन एवं उत्पादकता पर भी पड़ता है। सहकारिता एक ऐसा संगठन है जिसके अंतर्गत लोग स्वेच्छा से मिलकर एवं संगठित होकर जनकल्याण के लिए कार्य करते हैं। इसकी सदस्यता स्वैच्छिक होती है। किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध इस संगठन का सदस्य बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सहकारिता समिति का कार्य संचालन जनतांत्रिक आधार पर होता है। इसमें सबको बराबर समझा जाता है। सभी को समान अवसर व समान अधिकार प्राप्त होते हैं।सहकारी समितियां समानता की भावना पर आधारित होती है।पूंजी धर्म, राजनीति, जाति, सामाजिक स्तर आदि किसी भी आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जाता। इन समितियों में संस्था के सदस्य अपने कार्यों का प्रबंध व संचालन स्वयं करते हैं, यहां तक कि संगठन अपने सेवा कार्यों हेतु वित्तीय संसाधनों सहित सभी व्यवस्थाएं स्वयं करता है। आज की व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था में सहकारिता का महत्व अधिक बढ़ गया है। आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने में इसका महत्व विशेष रूप से रहा है। विगत दशकों में सहकारिता ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए जिन प्रमुख संस्थाओं की आवश्यकता महसूस की गई, उसमें सहकारी समिति प्रमुख हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों की स्थापना का मतलब है कि ग्रामीण निर्बल व्यक्ति भी अपना विकास करने में समर्थ हो जाते हैं क्योंकि इन समितियों का सदस्य बनने में धनी व निर्धन के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को समान अवसर, अधिकार व उत्तरदायित्व प्राप्त होते हैं। सहकारी समितियों का समाज में इसीलिए अधिक महत्व है, क्योंकि यह संगठन शोषण रहित सामाजिक आर्थिक व्यवस्था स्थापित करने में सहायक है।ग्रामीण समुदाय में सहकारिता का लाभ विशेष रूप से मिलता है क्योंकि देश का ग्रामीण क्षेत्र विकास की धारा में पीछे रह जाता है। अत: आर्थिक विकास को इन क्षेत्रों में तीव्र करने का यह मुख्य साधन है। लेकिन यदि हम सहकारिता के आर्थिक आंकड़ों को छोड़कर वास्तविक रूप में उसकी समीक्षा करें तो पाएंगे कि देश के कई भागों में आज भी इसका विस्तार नहीं हो पाया है। लगभग 40 से 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अभी भी सहकारी समितियों के क्षेत्र में बाहर हैं।सहकारी समितियों में आपसी वाद-विवाद बढ़ते जा रहे हैं। राजनीतिक प्रभाव इनमें दृष्टिगत हो रहा है। यद्यपि समितियों ने देश के आर्थिक विकास में विशेष रूप से ग्रामीण विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसके बावजूद भी ये अनेक क्षेत्रों में दोषपूर्ण रही है। सहकारी समितियों की असफलता का एक महत्वपूर्ण कारण यह रहा है कि इन समितियों में प्रशिक्षित व कुशल प्रबंध का अभाव रहा है। फलस्वरूप इनकी आय, व्यय, ऋण आदि के हिसाब में अनियमितताएं एवं अन्य अनेक कमियां परिलक्षित होती है। सहकारी समितियों का उद्देश्य आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक व नैतिक विकास करना भी था, लेकिन देखने में यह आया है कि ये सहकारी समितियां मात्र वित्तीय समितियां बनकर रह गई है, इनके द्वारा सामाजिक व नैतिक विकास का लक्ष्य अधूरा रह गया है। सहकारी साख समितियों के पास पर्याप्त संसाधनों की कमी है। कई जगह वित्तीय संसाधनों ग्रामीण किसानों एवं कारीगरों को उपलब्ध कराई गईं, वह अपर्याप्त रूप में रहीं। उसमें कुछ राज्यों में ऋण राशि अधिक रही है, तो अनेक राज्यों में यह बहुत ही कम रही है। सहकारी समितियों की स्थापना भी देश में सभी जगह समान रूप से नहीं हो पाई है। पंजाब, महाराष्ट्र राज्यों की 75 प्रतिशत, जनता के लिए सहकारी समितियां उपलब्ध हो पाई हैं, जबकि उड़ीसा, बिहार तथा असम राज्यों में 25 प्रतिशत ग्रामीण जनता को भी यह सुविधा सुलभ नहीं हो पाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों के पूर्ण सफल न होने के पीछे एक कारण यह भी है कि इनकी नीति व कार्यक्रमों में समन्वय का अभाव रहा है। सहकारी समितियों की पूर्ण सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इन समितियों की नियमित जांच, सर्वेक्षण, पर्यवेक्षण तथा निरीक्षण होना चाहिए। तभी ये ग्रामीण विकास में अपना पूर्ण योगदान दे सकेंगी, वर्तमान सरकार जिस इच्छाशक्ति के साथ नए सहकारी मंत्रालय का रचना किए हैं उसके पुराने निर्णय को देखते हुए यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि सरकार इस योजना को सफल बनाने के लिए नए नियम बनाएगी जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को सफलता का नया आयाम मिल सके और नरेंद्र मोदी सरकार भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त कर सके।

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Dakhal News 11 July 2021


bhopal,Politics of illusion , Indian Muslims

सुरेश हिंदुस्तानी भारत में प्रामाणिक बयानों का अपने हिसाब से अर्थ निकालना एक परिपाटी-सी बन गई है। विसंगति यह है कि जो प्रचार किया जाता है, उसका मूल बयान से कोई सरोकार नहीं होता। इसी को भ्रम फैलाने वाली राजनीति कहा जाता है। अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत के हिन्दू और मुसलमानों का डीएनए एक है। यह प्रामाणिक रूप से धरातलीय सच है। भारत के मुसलमान अगर अपने परिवार का अतीत खोजेंगे तो उन्हें भागवत जी के बयान में सत्यता दिखाई देगी। मीडिया तंत्र इस बात पर मंथन करे कि जब भारत में मुगलों का आक्रमण नहीं हुआ था, उस समय भारत में कोई मुसलमान था ही नहीं। अत: यह स्वाभाविक है कि आज हमारे देश में जो मुसलमान हैं, उनके पूर्वज हिन्दू ही थे। फारुक अब्दुल्ला कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के वंशज हैं। इसी प्रकार अन्य मुसलमान की विरासत हिन्दू अवधारणा वाली ही है। जहां तक हिन्दू अवधारणा का सवाल है तो यही कहना समुचित होगा कि हिन्दू दर्शन किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करता। इसी कारण कई मुसलमान घर वापसी कर रहे हैं। यह बात सही है कि वर्तमान में पाकिस्तान के नाम से पहचाने वाला देश पूर्व में भारत का ही हिस्सा रहा था। इसलिए उसका इतिहास भारत के बिना अधूरा है और इसी कारण भारत के मुसलमानों का इतिहास हिन्दू समाज या भारतीय समाज से अलग हो ही नहीं सकता। सच्चाई को स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान का कई बुद्धिजीवी मुसलमानों ने समर्थन भी किया है, लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति के चलते मुसलमान मुख्यधारा से कट रहा है। उसे हिन्दू के नाम से डराया जा रहा है। जबकि वास्तविकता यही है कि मुसलमानों के त्यौहारों में हिन्दू समाज भी सहयोग करता रहा है। इसके विपरीत तुष्टिकरण की राजनीति के बहकावे में आकर मुसलमान भारत के मूल त्यौहारों से अलग होता जा रहा है। इस प्रकार की राजनीति देश की एकता के लिए बड़ा खतरा है। मंथन इस बात का भी करना होगा कि दुनियाभर में जितने भी मुसलमान निवास करते हैं, उनमें सबसे ज्यादा सुरक्षित भारत में ही हैं। आज कुछ मुसलमान संदेह की दृष्टि से देखे जा रहे हैं, उसके पीछे भी सबसे बड़ा कारण स्वयं मुसलमान ही हैं, जो मुख्यधारा में आना भी चाहते हैं लेकिन राजनीति ऐसा नहीं करने दे रही। उन्हें अपने वोटों की चिंता है।भारत को स्वतंत्रता मिलने से पूर्व भारतीय समाज को तोड़ने का जो कुचक्र अंग्रेजों ने रचा था, भारत के राजनेताओं ने उसी नीति को आत्मसात करते हुए ऐसी राजनीति की कि आज समाज छिन्न-भिन्न हो गया। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस छिन्न-भिन्न समाज को एक करने का प्रयास कर रहा है तो इन राजनेताओं के पेट में दर्द उठना स्वाभाविक है। जहां तक वर्तमान केन्द्र सरकार की बात है तो उसने मुस्लिम समाज की महिलाओं के दर्द को कम करने का साहस दिखाया है। तीन तलाक का डर दिखाकर मुस्लिम महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई जाती रही थी, अब उससे मुक्ति मिल गई है। यह कदम वास्तव में मुस्लिम समाज को आगे लाना वाला ही है। लेकिन कई लोगों को इस कदम में भी मुस्लिम विरोध दिखाई दिया, जो पूरी तरह से गलत है। यह देश का दुर्भाग्य है कि इने-गिने लोग ऐसे हैं, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की एकता-अखंडता को क्षति पहुँचाने में लगे रहते हैं।यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि विदेशी मुस्लिम बादशाहों ने भारत पर कभी लूटपाट के लिए और कभी अपनी सत्ता स्थापित कर इस्लामी झंडा फहराते हुए भारत की धर्म, संस्कृति, परम्परा को क्रूरता से कुचलने की लगातार कोशिश की। इतिहास को कुरेदकर यह समीक्षा करने की प्रासंगिकता नहीं है कि ये क्रूर हमलावर क्यों सफल हुए, भारत की राजशक्ति इस क्रूरता का प्रतिकार क्यों नहीं कर सकी। इस सबकी तह में जाने से यह पता चलता है कि कही न कहीं भारतीय समाज में अपने देश के प्रति निष्ठा कमजोर थी, लेकिन आज एक बात दिखाई देने लगी है कि भारतीय युवा अपने धर्म के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन कर रहा है और ऐसा करने में उसे गौरव का अहसास भी होता है। वर्तमान में भारत की करीब बीस प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है। इनके पूर्वज हमलावरों की क्रूरता के शिकार हुए और अपने परिवार की जीवन रक्षा के लिए इन्होंने मजबूरी में इस्लाम कबूल किया। इसलिए इस सच्चाई को कैसे नकारा जा सकता कि इनके पूर्वज हिन्दू थे। इस प्रकार के सम्प्रदाय और उपासना पद्धति का विकास देश की माटी से होता है, इसलिए भारत का इस्लाम, सऊदी अरब का इस्लाम नहीं हो सकता। भारत की सर्वव्यापी संस्कृति के विचार प्रवाह के साथ ही भारत के मुस्लिमों को चलना होगा। जो इस खून के रिश्ते को तोड़कर भारत के मुस्लिमों को देश की माटी से अलग करना चाहते हैं, वे छद्म देशद्रोही हैं, उनकी कोशिशों को असफल करना, हर देशभक्त का दायित्व है। हालांकि सऊदी अरब और पाकिस्तान की साजिश में शामिल होने से अब भारतीय मुसलमान भी किनारा करने लगे हैं। देश का मुसलमान अब पूरी तरह से विकास की धारा के साथ आना चाहता है, लेकिन हर बार की तरह वह राजनीति का शिकार हो जाता है। मुसलमानों को जितना सम्मान भारत में दिया जाता है, उतना किसी भी गैर इस्लामिक देश में नहीं मिल सकता और न ही मिलने की उम्मीद है। यह सही है कि राजनीतिक दलों ने मुसलमानों को केवल भय दिखाकर वोट के रूप में प्रयोग किया। वर्तमान में देश का मुसलमान इस सत्य को समझ चुका है और वह भी सबका साथ सबका विकास के भाव को अंगीकार करके अपना विकास चाहता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 July 2021


bhopal,The mistake of not understanding ,nature will be heavy

डॉ. वंदना सेन जल के अभाव में वसुंधरा सूख रही है। पेड़ आत्महत्या कर रहे हैं। नदियां समाप्ति की ओर हैं। कुएं, बावड़ी रीत गए हैं। यह एक ऐसा भयानक संकट है, जिसको हम जानते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं। अगर इसी प्रकार से चलता रहा तो आने वाला समय कितना त्रासद होगा, इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है, लेकिन जब यह समय सामने होगा तब हमारे हाथ में कुछ भी नहीं होगा। यह सभी जानते हैं कि प्रकृति ही जीवन है, प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। जब हम प्रकृति कहते हैं तो स्वाभाविक रूप से मानव यही सोचता है कि पेड़-पौधों की बात हो रही है, लेकिन इसका आशय इतना मात्र नहीं, बहुत व्यापक है। प्रकृति में जितने तत्व हैं, वे सभी तत्व हमारे जीवन का आवश्यक अंग हैं। चाहे वह श्वांस हो, जल हो, या फिर खाद्य पदार्थ। सब प्रकृति की ही देन हैं। विचार कीजिए जब यह सब नहीं मिलेगा, तब हमारा जीवन कैसा होगा? अभी बारिश का मौसम आ चुका है। इस मौसम में देश के अनेक हिस्सों से कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा पड़ने के समाचार मिलते हैं। इतना ही नहीं देश में अनेक संस्थाओं द्वारा पौधारोपण के कार्य भी किए जाते हैं। विसंगति यह है कि पौधारोपण करने के बाद उन पौधों का क्या होता है, यह सब देखने का समय हमारे पास नहीं है। पौधों के लिए जल ही जीवन है और पौधा भी एक जीवित वनस्पति है। अगर किसी पौधे का जीवन जन्म के समय ही समाप्ति होने की ओर अग्रसर होता है तो स्वाभाविक रूप से यही कहा जा सकता है कि ऐसा करके हम निश्चित ही एक जीवन की हत्या ही कर रहे हैं। वर्तमान में हम सब पर्यावरण प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। यह सब प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ का ही परिणाम है। हम सभी केवल इस चिंता में व्यस्त हैं कि पेड़-पौधों के नष्ट करने से प्रदूषण बढ़ रहा है, लेकिन क्या हमने कभी इस बात का चिंतन किया है कि हम प्रकृति संरक्षण के लिए क्या कर रहे हैं। क्या हम प्रकृति से जीवन रूपी सांस को ग्रहण नहीं करते? क्या हम शुद्ध वातावरण नहीं चाहते? तो फिर क्यों दूसरों की कमियां देखने में ही व्यस्त हैं। हम स्वयं पहल क्यों नहीं करते? आज प्रकृति कठोर चेतावनी दे रही है। बिगड़ते पर्यावरण के कारण हमारे समक्ष महामारियों की अधिकता होती जा रही हैं। अगर हम इस चेतावनी को समय रहते नहीं समझे तो आने वाला समय कितना विनाश कारी होगा, कल्पना कर सकते हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि हम पर्यावरण को बचाने के लिए बातों से चिंता व्यक्त करते हैं। सवाल यह है कि इस प्रकार की चिंता करने समाज ने अपने जीवनकाल में कितने पौधे लगाए और कितनों का संवर्धन किया। अगर यह नहीं किया तो यह बहुत ही चिंता का विषय इसलिए भी है कि जो व्यक्ति पर्यावरण के प्रभाव और दुष्प्रभावों से भली भांति परिचित है, वही निष्क्रिय है तो फिर सामान्य व्यक्ति के क्या कहने। ऐसे व्यक्ति यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि पर्यावरण और जीवन का अटूट संबंध है। यह संबंध आज टूटते दिखाई दे रहे हैं। प्राण वायु ऑक्सीजन भी दूषित होती जा रही है। वह तो भला हो कि ईश्वर के अंश के रूप में में भारत भूमि पर पैदा हुआ हमारे इस शरीर में ऐसा श्वसन तंत्र विद्यमान है, जो वातावरण से केवल शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है। लेकिन सवाल यह है कि जिस प्रकार से देश में जनसंख्या बढ़ रही है, उसके अनुपात में पेड़-पौधों की संख्या बहुत कम है। इतना ही नहीं लगातार और कम होती जा रही है। जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। आज के समाज की मानसिकता का सबसे बड़ा दोष यही है कि अपनी जिम्मेदारियों को भूल गया है। अपने संस्कारों को भूल गया है। किसी भी प्रकार की विसंगति को दूर करने के लिए समाज की ओर से पहल नहीं की जाती। वह हर समस्या के लिए शासन और प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहराता है। जबकि सच यह है कि शासन के बनाए नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी हमारी है। शासन और प्रशासन में बैठे व्यक्ति भी समाज के हिस्सा ही हैं। इसलिए समाज के नाते पर्यावरण को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। पौधों को पेड़ बनाने की दिशा में हम भी सोच सकते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए हम कपड़े के थैले का उपयोग कर सकते हैं। अभी ज्यादा संकट नहीं आया है, इसलिए क्यों न हम आज से ही एक अच्छे नागरिक होने का प्रमाण प्रस्तुत करें। पिछले एक साल से कोरोना संक्रमण के चलते हमारी जीवन चर्या में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। जिसमें हर व्यक्ति को अपने जीवन के लिए प्रकृति का महत्व भी समझ में आया, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस परिवर्तन के अनुसार हम अपने जीवन को ढाल पाए हैं? यकीनन नहीं। वर्तमान में हमारा स्वभाव बन चुका है कि हम अच्छी बातों को ग्रहण करने के लिए प्रवृत नहीं होते। जीवन की भी अपनी प्रकृति और प्रवृति होती है। इसी कारण कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति प्रकृति के अनुसार जीवन यापन नहीं करता, उसका प्रकृति कभी साथ नहीं देती। हमें घटनाओं के माध्यम से जो संदेश मिलता है, उसे जीवन का अहम हिस्सा बनाना होगा, तभी हम कह सकते हैं कि हमारा जीवन प्राकृतिक है। (लेखिका, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में हिंदी की सहायक प्राध्यापिका हैं।)

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Dakhal News 8 July 2021


bhopal,Shocking expansion , Modi cabinet

सियाराम पांडेय 'शांत' विस्तार और फेरबदल दिखता भी है और देश पर अपना प्रभाव भी छोड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई भी काम ऐसा नहीं करते जो चौंकाने वाला न हो। प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के मंत्रिमंडल विस्तार में भी उनकी यह छवि प्रमुखता से उभरकर सामने आई है। यह विस्तार विस्मयकारी तो रहा ही, कई राजनीतिक कयासों को धता बताने वाला भी रहा है। इसमें सामाजिक, राजनीतिक, जातीयसमीकरणों को संतुलित रखने का प्रयास है। साथ ही क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संतुलन का भी पूरा ध्यान रखा गया है। वरुण गांधी के नाम की चर्चा खूब हुई लेकिन विस्तार प्रक्रिया में उनका चेहरा सिरे से गायब मिला। चिराग पासवान की धमकी के बाद भी रामविलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस केंद्रीय मंत्री बने।वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री समेत 58 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। किसे पता था कि उनके मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार शीर्ष मंत्रियों के लिए भी किसी झटके जैसा ही होगा। प्रकाश जावड़ेकर, रविशंकर प्रसाद, डॉ. हषवर्धन, रमेश पोखरियाल निशंक, सदानंद गौड़ा, संतोष गंगवार, देबोश्री चौधरी, राव साहेब दानवे पाटिल, संजय धोत्रे, बाबुल सुप्रियो, रतनलाल कटारिया और प्रताप सारंगी जैसे कद्दावर मंत्रियों के इस्तीफे यही बताते हैं कि मोदी सरकार सुधार-परिष्कार के धरातल पर कभी समझौते नहीं करती। केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार से एक दिन पूर्व ही आठ राज्यों के राज्यपाल बदले गए हैं। थावरचंद गहलोत जैसे दलित नेता और केंद्रीय मंत्री को कर्नाटक का राज्यपाल बना दिया गया। थावर चंद गहलोत ने मंत्री पद और राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया है। सवाल यह उठता है कि जब राज्यपाल बदले या हटाए जा सकते हैं तो मंत्री क्यों नहीं? मंत्रियों के इस्तीफे की वजह जो भी बताई जाए लेकिन जनता के बीच संदेश यही गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार में काम में कोताही की कोई जगह नहीं है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह देशभर का राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है, वहीं वर्ष 2022 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनका विशेष ध्यान रखा है। उत्तर प्रदेश से सात नए मंत्रियों का चयन इसी ओर इशारा करता है। इसमें प्रधानमंत्री ने ब्राह्मणों, दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को साधने का हरसंभव प्रयास किया है। कांग्रेस सेआए नारायण राणे और ज्योतिरादित्य सिंधिया को केंद्रीय मंत्री बनाकर उन्होंने प्रतिपक्ष को संदेश दिया है कि भाजपा हाथ ही नहीं पकड़ती, संबंध निभाना भी जानती है। असम में हिमंत विस्व सरमा को मुख्यमंत्री बनाकर उसने राज्यों में भी इस बात का संदेश दे भी दिया है। यह सच है कि सर्बानंद सोनोवाल ने असम में भाजपा की जड़ें जमाने का काम किया था, ऐसा करने से उनका मनोबल न गिरे इसलिए उन्हें कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ दिलाकर मोदी सरकार ने बड़ा काम किया है। जिन मंत्रियों ने अपने विभाग में अच्छा काम किया है, उन्हें प्रोन्नत करने का भी काम किया है। जिन 43 लोगों को मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई है, उनमें नारायण तातु राणे, सर्बानंद सोनोवाल,डॉ. वीरेंद्र कुमार, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपी सिंह, अश्विनी वैष्णव,पशुपति कुमार पारस, किरेन रिजीजू, आर के सिंह,हरदीप सिंह पुरी, मनसुख मांडविया,भूपेंद्र यादव, पुरुषोत्तम रूपाला, जी. किशन रेड्डी, अनुराग सिंह ठाकुर, अनुप्रिया पटेल,सत्यपाल सिंह बघेल, राजीव चंद्रशेखर,शोभा कारंदलजे, भानुप्रताप वर्मा, श्रीमती दर्शना विक्रम जरदोश,श्रीमती मीनाक्षी लेखी,श्रीमती अन्नपूर्णा देवी, ए. नारायणस्वामी, कौशलकिशोर, अजय भट्ट, बनवारी लाल वर्मा, अजय कुमार, चौहान देवु सिंह,भगवंथ खुबा,कपिल मोरेश्वर पाटिल , सुश्री प्रतिमा भौमिक,डॉ. सुभाष सरकार,भागवत कृष्ण राव कारद, राजकुमार रंजन सिंह, डॉ. भारती प्रवीन पवार,विशेष्वर ताडु, शंतनु ठाकुर,डॉ. मुंजापरा महेंद्रभाई, जॉन बरला,डॉ. एल. मुरगन और निशीथ प्रमाणिक शामिल हैं। इस विस्तार में उत्तर प्रदेश और बंगाल को विशेष रूप से फोकस किया गया है। कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, पंजाब आदि राज्यों को भी इस मंत्रिमंडल विस्तार में प्रतिनिधित्व साफ नजर आता है। उत्तर प्रदेश में पंजाबी, दलित, पिछड़ों को तो साधने का प्रयास हुआ ही है, मंत्रिमंडल विस्तार में 5 महिलाओं को बतौर मंत्री शपथ दिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार ने आधी आबादी को भी रिझाने की कोशिश की है। 2003 के संविधान संशोधन में यह तय हुआ था कि केंद्र में मंत्रियों को संख्या 15 प्रतिशत यानी 81 के निर्धारित मानक से अधिक नहीं होगी। प्रधानमंत्री ने विस्तार के क्रम में इस बात का पूरा ध्यान रखा है। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो उनके मंत्रिमंडल में केवल महज 45 मंत्री शामिल थे। तब प्रधानमंत्री ने मिनिमम गवर्नमेंट- मैक्जिमम गवर्नेंस का नारा दिया था।यह और बात है कि तीन साल बाद ही उन्हें मंत्रियों की संख्या बढ़ाकर 76 करनी पड़ी थी। गौरतलब है कि 2019 में जब नई सरकार का गठन हुआ तो उस वक्त प्रधानमंत्री समेत कुल 58 मंत्रियों ने शपथ ली थी। अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल, शिवसेना के अरविंद सावंत मंत्री पद छोड़ चुके हैं। दोनों ही पार्टियां अब राजग का अंग नहीं हैं। वहीं, लोजपा के रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी जगह भी कोई मंत्री नहीं बनाया गया। सुरेश अंगड़ी का कोरोना से निधन हो गया था। मंगलवार को कैबिनेट मंत्री थावरचंद गहलोत को राज्यपाल बनाया गया। गहलोत के मंत्री पद छोड़ने के बाद कैबिनेट में कुल 53 मंत्री रह गए थे। 12 और मंत्रियों ने पद छोड़कर विस्तार की राह आसान कर दी और केंद्र सरकार जंबो जेट मंत्रिमंडल के गठन से बच गई। मौजूदा मंत्रिमंडल विस्तार के जरिये सरकार ने देश को कई संदेश देने की कोशिश की है और एक तरह से ऐसा कर उसने विपक्ष की रणनीति को झटका भी दिया है। कुछ बड़े मंत्रियों के इस्तीफे पर विपक्ष मोदी सरकार को घेर भी सकता है लेकिन मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार की मौजूदा कवायद देश की राजनीति को नई दिशा देगी, इस बात को नकारा नहीं जा सकता।

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Dakhal News 8 July 2021


bhopal, Is it okay , have two kids?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होनेवाली है। साल-दो साल में वह चीन को पीछे छोड़ देगा। भारत शीघ्र ही डेढ़ अरब यानी 150 करोड़ के आंकड़े को छू लेगा। हमें शायद गर्व होगा कि हम दुनिया के सबसे बड़े देश हैं। हां, बड़े तो होंगे आबादी के हिसाब से लेकिन हम जितने अभी हैं, उससे भी छोटे होते चले जाएंगे, क्योंकि दुनिया की कुल जमीन का सिर्फ दो प्रतिशत हिस्सा हमारे पास है और दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी उस पर रहती है। इस आबादी को अगर रोटी, कपड़ा, मकान और इलाज वगैरह उचित मात्रा में मिलता रहे तो यह संख्या भी बर्दाश्त की जा सकती है, जैसा कि चीन में चल रहा है। पिछले 40 साल में चीन के प्रति व्यक्ति की आमदनी 80 गुना बढ़ी है जबकि भारत में सिर्फ सात गुना बढ़ी है। आज भी भारत में करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार हैं। भूख से मरनेवालों की खबरें भी हम अक्सर पढ़ते रहते हैं। भूख के हिसाब से दुनिया में भारत का स्थान 102 वां है, यानी जिन देशों का पेट भरा माना जाता है, उनकी कतार लगाई जाए तो भारत एकदम पिछड़े हुए देशों में गिना जाता है। लोगों का पेट कैसे भरेगा, यदि करोड़ों लोग बेरोजगार होते रहेंगे या जो लगातार रोजगार से वंचित रहेंगे। रोजगार ही नहीं, देश में सारी सुविधाएं इसीलिए कम पड़ रही है, क्योंकि हमारे यहां जनसंख्या बहुत ज्यादा है। यह ठीक है कि पिछले 50 साल में जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार भारत में अपने आप आधी हो गई है लेकिन वह किनकी हुई है ? पढ़े-लिखों की, शहरियों की, संपन्नों की और किनकी बढ़ गई है ? अनपढ़ों की, ग्रामीणों की, गरीबों की, मेहनतकशों की ! यह अनुपात का असंतुलन भारत को डुबो मारेगा। इसीलिए मांग की जा रही है कि दो बच्चों का प्रतिबंध हर परिवार पर लगाया जाए। जिनके दो बच्चों से ज्यादा हों, उन्हें कई शासकीय सुविधाओं से वंचित किया जाए? ऐसा करना ठीक नहीं होगा। सार्थक नहीं होगा, क्योंकि जिनके ज्यादा बच्चे होते हैं, वे लोग प्रायः शासन के फायदों से दूर ही रहते हैं। बेहतर तो यह होगा कि शादी की उम्र बढ़ाई जाए, स्त्री-शिक्षा को अधिक आकर्षक बनाया जाए, परिवार-नियंत्रण के साधनों को मुफ्त में वितरित किया जाए, संयम को महिमा-मंडित किया जाए और छोटे परिवारों के लाभों को प्रचारित किया जाए। शारीरिक और बौद्धिक श्रम के फासलों को कम किया जाए। जाति और मजहब के थोक वोट पर आधरित लोकतंत्र को सेवा, योग्यता और तर्क पर आधारित शासन-पद्धति बनाया जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 5 July 2021


bhopal,Shock to Akhilesh ,again in UP, Yogi

सियाराम पांडेय 'शांत'चुनाव में एक पक्ष जीतता है और दूसरा हारता है। विजेता पक्ष के अपने तर्क होते हैं और विजित पक्ष के अपने। दोनों ही पक्षों के तर्क अकाट्य होते हैं। उन्हें हल्के में नहीं लिया जाता है लेकिन राजनीति में सिकंदर वही होता है जो चुनाव जीतता है। विजेता अपनी जीत को महिमामंडित करता है और पराजित व्यक्ति अपनी हार का बचाव। उत्तर प्रदेश में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जहां जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में पौ-बारह हो गई है, वहीं यूपी में सरकार बनाने का स्वप्न देख रहे अखिलेश यादव को जोर का राजनीतिक झटका लगा है।जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव उत्तर प्रदेश में चर्चा के केंद्र में है। जिस चुनाव को सपा अपने पक्ष में मानकर चल रही थी तथा इस बात का दावा कर रही थी कि जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में उसके सर्वाधिक सदस्य जीते हैं। ऐसे में जाहिर-सी बात है कि बाजी उसके अपने हाथ में थी लेकिन बाजी अचानक पलट जाएगी, इसकी तो उसने कल्पना भी नहीं की थी। 75 में से 67 जिलों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों की जीत उसे पच नहीं पा रही है। सपा केवल पांच जिलों में ही जीत हासिल कर सकी। सपा के जिला पंचायत अध्यक्ष सिर्फ पांच जिलों में चुने गए हैं। कन्नौज, मैनपुरी, बदायूं, फर्रुखाबाद, रामपुर,अमरोहा, मुरादाबाद और संभल जैसे अपने मजबूत गढ़ को भी सपा बचा नहीं पाई। कांग्रेस का तो खैर खाता ही नहीं खुला। बड़ी हिम्मत कर उसने रायबरेली और जालौन में अपने उम्मीदवार उतारे भी थे लेकिन दोनों प्रत्याशियों की हार यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का राजनीतिक वनवास अभी खत्म नहीं होने जा रहा है। इसके लिए उसकी नीतियों को भी बहुत हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। रायबरेली और अमेठी में भाजपा प्रत्याशियों की जीत इस बात का संकेत है कि वहां कांग्रेस नेतृत्व की परिवारवादी राजनीति का गढ़ दरक रहा है।जिला पंचायत सदस्य के चुनाव तो बसपा समर्थित उम्मीदवारों ने भी ठीक-ठाक संख्या में जीते थे लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव न लड़ने का ऐन वक्त पर मायावती ने तो निर्णय लिया, उससे भी समाजवादी पार्टी की गोट फेल हो गई। बसपा समर्थित जिला पंचायत सदस्य सपा की ओर तो जा नहीं सकते। लिहाजा उन्होंने सत्ता से नजदीकी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझी। कानपुर में तो बसपा के जिला पंचायत सदस्य भाजपाइयों की बस में ही वोट देने निकले।यह तो राजनीति की पतीली का एक चावल भर है, शेष जिलों में जिला पंचायत पर अपनी कमान बनाए रखने के लिए क्या-क्या हुआ, कहा नहीं जा सकता। सपा हो या भाजपा दोनों ने ही अपने स्तर पर जोड़-तोड़ किए, मतदाताओं को साधने का प्रयास किया। चंदौली में तो सपा के पूर्व सांसद अपने स्वजातीय जिला पंचायत सदस्य को साष्टांग दंडवत भी करते नजर आए लेकिन इसके बाद भी वे अपने भतीजे को जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव नहीं जितवा सके। मतदाता दंडवत से ही खुश नहीं होता। उसका अपना माइंड सेट होता है जिसे समझे बिना जीत की इबारत लिख पाता संभव नहीं होता। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी अपने तईं खूब प्रयास किए। राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि खरीद में घपले के आरोप लगाकर माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात जैसा ही रहा।सपा प्रमुख अखिलेश यादव जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा की रिकॉर्ड जीत पर जहां आरोपों की तलवार भांज रहे हैं, वहीं इस बात का आरोप भी लगा रहे हैं कि सत्ता का दुरुपयोग कर भाजपा ने इस चुनाव में लोकतंत्र का तिरस्कार किया है। कुछ इसी तरह के आरोप भाजपाइयों ने तब सपा पर लगाए थे जब वह 75 में से 63 सीटों पर चुनाव जीती थी। सत्ता के खोंते में विपक्ष के आरोपों के तीर ने घुसे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ विरोध के घेरे में आ गए थे। जिस तरह भाजपा के बागी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीत गए थे और हालात को नियंत्रण में लेकर भाजपा और संघ नेतृत्व को समवेत कसरत करनी पड़ी थी, उसे भी बहुत हल्के में नहीं लिया जा सकता। योगी आदित्यनाथ सरकार ने अनेक जगहों पर भाजपा के बागियों को ही जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी का प्रस्ताव दे दिया था और हारती हुई बाजी को अपने पक्ष में कर लिया था। यही वजह थी कि उत्तर प्रदेश में पूरब से लेकर पश्चिम तक भगवा ध्वज लहरा रहा है।अब भाजपा की नजर ब्लॉक प्रमुखों के चुनाव पर है। भाजपा को पता है कि वर्ष 2022 की विधानसभा की जंग जीतने के लिए ग्राम प्रधानों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का अपने पक्ष में होना कितना मायने रखता है। चुनाव में हार-जीत तो होती रहती है लेकिन उसके संदेश जनता के बीच असर डालते हैं। जीतने और हारने वालों के मनोविज्ञान पर भी उसका अपना असर होता है।यह सच है कि सपा और बसपा अब दो ध्रुव हो चुके हैं। मायावती को पता है कि गठबंधन की स्थिति में उनके परंपरागत मत तो सपा उम्मीदवारों के पक्ष में पड़ते हैं लेकिन सपा के परंपरागत वोट बसपा उम्मीदवार के पक्ष में हस्तांतरित नहीं हो पाते। यही वजह है कि उन्होंने बहुत पहले ही सुस्पष्ट कर दिया है कि बसपा इस बार उत्तर प्रदेश में किसी भी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी लगभग इसी तरह की मुनादी कर चुके हैं कि उनकी पार्टी कांग्रेस और बसपा से गठबंधन नहीं करने जा रही है। यह और बात है कि बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि सपा की नीति और नीयत को देखते हुए आज की तिथि में एक भी दल ऐसा नहीं है जो उससे गठबंधन करे। हालांकि आम आदमी पार्टी के संजय सिंह मायावती की इस टिप्पणी के दूसरे दिन ही अखिलेश से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा जिस तेजी से बढ़ रही है, मजबूत हो रही है, ऐसे में अन्य राजनीतिक दल अकेले दम पर उससे लड़ पाने की स्थिति में नहीं है।भाजपा अगर चुनाव हारेगी तो अपने लोगों की बदौलत। उसे दल की अति महत्वाकांक्षी और बगावती ताकतों को पहचानना भी होगा और नियंत्रित भी करना होगा। जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसे विधानसभा के लिए भी जीत की रणनीति बनानी होगी और इस नीति वाक्य को हमेशा अपने स्मृति केंद्र में रखना होगा कि जिंदगी का सबसे कठिन काम है-खुद को पढ़ना। जो स्वयं को पढ़ नहीं सकता, वह आगे नहीं बढ़ सकता। जिंदगी तब नहीं हारती जब हमें बड़े-बड़े सपने देखते हैं और वह पूरे नहीं होते। जिंदगी तब हारती है जब हम छोटे-छोटे सपने देखते हैं और वह पूरे हो जाते हैं। जीत की अग अपनी खुशी होती है तो अपने दंभात्मक खतरे भी होते हैं।भाजपा को अपनी जीत का सिलसिला अगर बनाए रखना है तो उसे आत्मानुशासन और आत्मानुशीलन तो निरंतर ही करना होगा। पार्टी के हर छोटे-बड़े को साथ लेकर चलना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात में दम है कि भाजपा की शानदार विजय विकास, जनसेवा और कानून के राज्य के लिए जनता-जनार्दन का दिया गया आशीर्वाद है। ऐसे में सोचना यह होगा कि भाजपा सरकार पर जनता का यह आशीर्वाद आगे भी बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकार रूपी विकास के दोनों इंजन पूरी क्षमता के साथ जनहितकारी काम करते रहें।(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 5 July 2021


bhopal,UP, Background of Parcham , Panchayat

डॉ. दिलीप अग्निहोत्रीउत्तर प्रदेश के जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भाजपा का परचम लहराया है। विपक्ष सकते में है। एकबार फिर वह अपनी पराजय का ठीकरा व्यवस्था पर फोड़ रहा है। लेकिन इससे चुनाव का सटीक विश्लेषण नहीं हो सकता। विपक्ष के लिए यह आरोप लगाने का नहीं आत्मचिंतन का अवसर होना है लेकिन इससे बच निकलने का प्रयास चल रहा है। इसके साथ ही विपक्ष को अपनी सरकारों का समय भी याद करना चाहिए। दूसरे पर आरोप लगाने के लिए नैतिक बल व पृष्ठिभूमि का होना आवश्यक होता है।इस समय उत्तर प्रदेश में सत्ता पक्ष को मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक लाभ मिला है। उसका उत्साह बढ़ा है। विपक्ष की स्थिति इसके विपरीत है। वह समीकरण के सही आकलन में विफल रहा। पंचायत सदस्य चुनाव में सपा ने सर्वाधिक सीटें जीतने का दावा किया था। इस दावे को सही मान लें तब भी अध्यक्ष पद की अधिक सीट हासिल करना संभव नहीं था। बड़ी संख्या में निर्दलीय चुनाव जीते थे। इनमें सर्वाधिक संख्या में भाजपा के असंतुष्ट ही थे। सत्ता में होने के कारण सर्वाधिक दावेदार भी इसी पार्टी के थे। ऐसे निर्दलीय अध्यक्ष पद के लिए सपा को समर्थन देने पर सहमत नहीं थे। बसपा ने अध्यक्ष पद चुनाव से किनारा कर लिया था। उसके जो समर्थक सदस्य बने थे, वह भी सपा के साथ जाने को तैयार नहीं थे। बसपा प्रमुख मायावती का बयान भी सपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। चुनाव के ठीक पहले उन्होंने सपा को धोखेबाज बताया था। कांग्रेस तो कहीं लड़ाई में ही नहीं थी। कुछ समय पहले भी मायावती ने कहा था कि वह सपा को रोकने के लिए कुछ भी कर सकती हैं।यह भाजपा के लिए अनुकूल माहौल था। बड़ी संख्या में उसके सदस्य विजयी रहे। इसके साथ उसे समीकरण का भी लाभ मिला। ऐसे में चुनाव परिणाम को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। कोरोना काल के दौरान भाजपा संगठन ने अपनी जमीनी सक्रियता को कायम रखा। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर मंडल अध्यक्ष तक सभी स्तर पर सक्रियता थी। बड़ी संख्या में राहत कार्यों का संचालन किया गया। दूसरी तरफ विपक्ष इस मामले में पिछड़ गया। उसके नेता ट्विटर पर तो अत्यधिक सक्रिय था। प्रत्येक मसले पर प्रतिक्रिया देने को वह हर समय तैयार रहते थे लेकिन जमीनी सक्रियता का अभाव था। अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ संवादहीनता की स्थिति थी। पंचायत चुनाव में इसका असर भी दिखाई दिया। कथित किसान आंदोलन को समर्थन देना भी विपक्ष के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। दिल्ली सीमा पर सात महीने से किसानों के नाम पर आंदोलन चल रहा है। सरकार ने इसके प्रतिनिधियों से बारह बार वार्ता की लेकिन ये लोग तीन कृषि कानूनों की वापसी पर अड़े रहे। विपक्षी नेताओं ने इस बेगाने आंदोलन को समर्थन दिया। इसका भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।उत्तर प्रदेश के किसानों की इस आंदोलन में कोई दिलचस्पी नहीं थी। विकल्प व अधिकार मिलने से किसान नाराज भी नहीं थे। इससे तो केवल बिचौलियों को ही नुकसान होना था। इसको किसानों का नुकसान बता कर प्रचारित किया गया। इससे वास्तविक किसान प्रभावित नहीं हुए। कृषि मंडी व न्यूनतम समर्थन मूल्य की समाप्ति संबधी दलीलों पर भी वास्तविक किसानों ने विश्वास नहीं किया। उल्टे पिछली सरकारों से सवाल होने लगे। पूछा गया कि उनके समय में समर्थन मूल्य कितना बढ़ाया गया। उनके समय में कृषि मंडी से कितने प्रतिशत अनाज की खरीद होती थी। आंदोलन को समर्थन देने वाले नेताओं के लिए यह सवाल शर्मिंदा करने वाले थे। क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में सर्वाधिक वृद्धि वर्तमान सरकार के समय की गई।इसी प्रकार पिछली सरकारों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में कई गुना अधिक अनाज की खरीद की गई। किसानों को बहत्तर घण्टे में शत प्रतिशत भुगतान भी सुनिश्चित किया गया। वर्तमान सरकार की उपलब्धियों से भी पंचायत सदस्य प्रभावित दिखाई दिए। अब प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर चौबीस घण्टे, तहसील मुख्यालय में करीब बाइस घण्टे, ग्रामीण क्षेत्र में सोलह से सत्रह घण्टे बिजली आपूर्ति दी जा रही है। आने वाले समय में पूरे प्रदेश में चौबीस घण्टे विद्युत आपूर्ति देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर एवं कनेक्टिविटी से परिवेश बदला है। आज प्रदेश में एयरपोर्ट, हवाई पट्टी विकास, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे, बलिया लिंक एक्सप्रेसवे के कार्य हो रहे हैं। अयोध्या जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर का निर्मांण,अनुच्छेद तीन सौ सत्तर समाप्ति, तीन तलाक की समाप्ति, नागरिकता संशोधन कानून,कृषि कांनून, आत्मनिर्भर भारत अभियान, कोरोना संकट में प्रभावी आपदा प्रबंधन, किसान सम्मान निधि, अस्सी करोड़ गरीबों को छह माह तक राशन, भरण पोषण भत्ता, निर्धन आवास, शौचालय आदि अनेक अभूतपूर्व उपलब्धियां सत्ता पार्टी को उत्साहित करने वाली है।राज्य सरकार ने अबतक गन्ना किसानों को सवा लाख करोड़ रुपए के गन्ना मूल्य का भुगतान कराया है। करण्ट ईयर आधे से अधिक का गन्ना मूल्य का भुगतान कराया जा चुका है। कोरोना काल में भी सभी एक सौ उन्नीस चीनी मिलें संचालित की गईं। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लगभग छत्तीस लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की। छियासठ लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीद की जा चुकी है। किसानों को ग्यारह हजार करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है।राज्य सरकार द्वारा मक्के की खरीद कर किसानों को करीब दो सौ करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि का भुगतान किया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अन्तर्गत प्रदेश के दो करोड़ बयालीस लाख किसानों को लाभान्वित किया गया है। इसके लिए राज्य को भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। प्रदेश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में चालीस लाख आवास उपलब्ध कराए गए हैं। करीब ढाई करोड़ से अधिक किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से लाभान्वित किया गया। चौवन लाख कामगार श्रमिक,स्ट्रीट वेण्डर्स आदि को भरण पोषण भत्ते का लाभ मिला।कामगारों श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा तथा सर्वांगीण विकास के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उत्तर प्रदेश कामगार एवं श्रमिक सेवायोजन एवं रोजगार आयोग का गठन किया गया है। एक करोड़ अड़तीस लाख घरों में निःशुल्क विद्युत कनेक्शन दिए गए हैं। सत्तासी लाख से अधिक लोगों को वृद्धावस्था,महिला व दिव्यांगजन पेंशन दी गई हैं। हर घर नल योजना के तहत तीस हजार ग्राम पंचायतों में शुद्ध पेयजल योजना लागू की गई है। हर जिला मुख्यालय को फोर लेन से तथा तहसील मुख्यालयों और विकास खण्ड मुख्यालयों को दो लेन से जोड़ने की कार्यवाही की जा रही है।(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 July 2021


bhopal,Nature sick, increasing floods

  ऋतुपर्ण दवे बाढ़ की विभीषिका कब थमेगी, कैसे थमेगी, किसी को नहीं पता। बाढ़ की सर्वाधिक मार झेल रहे बिहार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने 1953 में कहा था कि 15 वर्षों में इस पर काबू पा लिया जाएगा। तब से 68 वर्ष हो रहे हैं। न तो बाढ़ से होने वाली तबाही ही थमीं और न ही देश में इसका बढ़ता दायरा रुका। उल्टा उत्तराखण्ड, असम, जम्मू-कश्मीर, चेन्नई या देश के दूसरे हिस्से बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बनते जा रहे हैं। दुनिया भर में जहां-तहां बाढ़ की विभीषिका दिखने लगी है। विडंबना देखिए, लगभग नौ हजार साल पहले हमारे पूर्वजों ने जब खेती शुरू की. तब उपज बढ़ाने की खातिर कई उपाय किए। सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए नदियों के किनारे-किनारे बसना शुरु किया। तब न जमीन का मोल था और न ही जंगल, पहाड़, नदियों के दोहन की नीयत थी। वहां खेती क्या लहलहाई, बड़ी संख्या में लोग नदियों के किनारे जा बसे। बारिश आज के मुकाबले बहुत ज्यादा होती। तब भी प्रकृति का प्रबंधन इतना मजबूत कि खतरा जैसा कुछ था ही नहीं। धीरे-धीरे विकास बढ़ा। जंगल कटने, पहाड़ के गिट्टियों में बदलने, बड़े-बड़े बांध बनने, नदियों का सीना छलनी होने से तिजोरियां क्या भरने लगीं, देखते ही देखते पुरातन प्राकृतिक व्यवस्थाएं छिन्न-भिन्न होती गईं। नतीजा सामने है। प्रकृति ने अपना नियंत्रण खो दिया। इंसान के हाथों रची विनाशलीला रौद्र रूप में दिखने लगी। बाढ़ से होने वाली मौतों में 20 फीसदी भारत में होती हैं। इससे 2050 तक हमारी आधी आबादी के रहन-सहन और जीवन स्तर में और गिरावट होगी। अब पृथ्वी पर 150 लाख वर्ग किलोमीटर में केवल 10 प्रतिशत हिमखंड बचे हैं, जबकि कभी यह 32 प्रतिशत भूभाग तथा 30 प्रतिशत समुद्री क्षेत्रों में था। वह हिमयुग कहलाता था। सबसे बड़े ग्लेशियर सियाचिन के अलावा गंगोत्री, पिंडारी, जेमु, मिलम, नमीक, काफनी, रोहतांग, व्यास कुंड, चन्द्रा, पंचचुली, सोनापानी, ढ़ाका, भागा, पार्वती, शीरवाली, चीता काठा, कांगतो, नन्दा देवी शृंखला, दरांग, जैका आदि प्रभावित हुए जिनसे गर्मियों में जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, उतराखंड, हिमाचल, अरुणाचल, में सुहाने मौसम का लुत्फ मिलता है। वैसे यहां भी पर्यावरण विरोधी इंसानी हरकतों का जबरदस्त दुष्परिणाम दिखने लगा।वर्षा की अधिकता वाले जंगलों की अंधाधुंध कटाई से परा बैंगनी विकरण को सोखने और छोड़ने का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। प्रतिवर्ष लगभग 73 लाख हेक्टेयर जंगल उजड़ रहे हैं। ज्यादा रासायनिक खाद और अत्याधिक चारा कटने से मिट्टी की सेहत अलग बिगड़ रही है। जंगली और समुद्री जीवों का अंधाधुंध शिकार भी संतुलन बिगाड़ता है। बाकी कसर जनसंख्या विस्फोट ने पूरी कर दी। 20वीं सदी में दुनिया की जनसंख्या लगभग 1.7 अरब थी, अब 6 गुना ज्यादा 7.5 अरब है। जल्द काबू नहीं पाया तो 2050 तक 10 अरब पार कर जाएगी। धरती का क्षेत्रफल तो बढ़ेगा नहीं सो उपलब्ध संसाधनों के लिए होड़ मचेगी, जिससे पर्यावरण की सेहत पर चोट स्वाभाविक है।इसी तरह बांधों के बनने का भी दुष्परिणाम सामने हैं। वर्ष 1971-72 में फरक्का बैराज के बनते ही सूखे दिनों में गंगा का प्रवाह मद्धिम पड़ा, जिससे नदी में मिट्टी भरने लगी। नतीजन कटान से नदी का रुख बदलने लगा। गंगा का पानी कहीं तो जाना था, सो उसने बिहार-उत्तर प्रदेश के तटीय क्षेत्रों को चपेट में लिया। उधर मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सोन नदी पर बाणसागर बांध बना। तयशुदा पनबिजली तो नहीं बनी, अलबत्ता हर औसत बरसात में मप्र, बिहार, उप्र के कई इलाके बाढ़ से जूझने लगे। वहीं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में बाढ़ की वजहें बीते दशकों में ताबड़तोड़ पन बिजली परियोजनाएं, बांधों, सड़कों, होटलों का निर्माण और कटते जंगल हैं। यहां हाल की विभीषिकाएं रोंगटे खड़ी कर देती हैं। अंग्रेजों ने दामोदर नदी को नियंत्रित करने खातिर 1854 में उसके दोनों ओर बांध तो बनवाए लेकिन 1869 में ही तोड़ दिया। वो समझ चुके थे कि प्रकृति से छेड़छाड़ ठीक नहीं, फिर दोबारा कभी बांध नहीं बनवाए। कम ही लोगों को पता होगा, फरक्का बैराज और दामोदर घाटी परियोजना विरोधी एक विलक्षण प्रतिभाशाली इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य थे। करीब 44 वर्ष पहले ही उन्होंने जो प्रभावी और अकाट्य तर्क दिए, उसका खण्डन कोई नहीं कर पाया अलबत्ता उन्हें बर्खास्त जरूर कर दिया गया। अब उनकी बातें हू-ब-हू सच हो रही हैं। उन्होंने चेताया था कि दामोदर परियोजना से, पश्चिम बंगाल के पानी को निकालने वाली हुगली प्रभावित होगी, भयंकर बाढ़ आएगी। कलकत्ता बंदरगाह पर बड़े जलपोत नहीं आ पाएंगे। नदी के मुहाने जमने वाली मिट्टी साफ नहीं हो पाएगी, गाद जमेगी, जहां-तहां टापू बनेंगे। दो-तीन दिन चलने वाली बाढ़ महीनों रहेगी। ‘विश्व बांध आयोग’ की रिपोर्ट कहती है कि भारत में बड़े-बड़े बांधों में आधे से ज्यादा ऐसे हैं, जिनमें विस्थापितों की संख्या अनुमान से दोगुना ज्यादा है। वहीं दक्षता, सहभागिता, निर्णय प्रक्रिया, टिकाऊपन और जवाबदारी जैसे पांच बुनियादी सिध्दान्तों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करने एवं बांध के दूसरे सारे विकल्पों की भली-भांति होने वाली जांचें सवालों में हैं? योजनाओं को बनाने वाले ‘ब्यूरोक्रेट्स’ तो वर्षों वही रहते हैं लेकिन उनको अमलीजामा पहनाने वाले जनतंत्र के ‘डेमोक्रेट्स’ बदल जाते हैं। वैसे भी इन्हें रीति-नीति, सिद्धांतों और बाद के प्रभावों से क्या लेना देना? तभी तो जनप्रतिनिधि आंखें मूंद, बिना अध्ययन या विचार के अफसरों के दिखाए ख्वाब स्वीकार लेते हैं। माना कि प्राकृतिक आपदाओं पर पूरी तरह अंकुश नामुमकिन है। फिर यह भी सही है कि प्रकृति के साथ इंसानी क्रूर हरकतें बेतहाशा बढ़ रही हैं। कभी हर गांव की शान रहे पोखर, तालाब, कुएं, झरने सब सूख रहे हैं। पहले पानी की कोई कमीं थी ही नहीं, अब स्थिति उलट है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े बताते हैं कि 1990 से 2010 के बीच दुनिया की आबादी 30 प्रतिशत यानी 1.6 अरब बढ़ी है। इसमें सबसे आगे भारत ही है, जिसकी आबादी 35 करोड़ बढ़ी जबकि चीन की केवल 19.6 करोड़ ही बढ़ी है। आबादी के इस अनुपात से संसाधनों की कमी डराती है। यह भी सच है कि बढ़ती आबादी रोकना तो दूर, उलटे स्वार्थ पूर्ति की खातिर प्रकृति के साथ अत्याचार कई गुना बढ़ गया। इन्हीं दुष्परिणामों से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा, पृथ्वी की सेहत बिगड़ी, प्रकृति का नाश और मानवीय विकास के मूल के सच का रौद्र रूप दिखने लगा जो कड़वी सच्चाई है। सब जानते हैं कि बाढ़ की विभीषिका और बिगड़ते पर्यवारण के असंतुलन के असल कारण क्या हैं? अब भी इसे कोई समझने को तैयार नहीं और न ही सुधार की गुंजाइश के ईमानदार लक्षण ही दिख रहे हैं। कहीं सब कुछ जानकर भी अनजान होना, पूरी मानवता पर ही न भारी पड़ जाए?     (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.)    

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Dakhal News 3 July 2021


bhopal, Opposition unity , strength of such leaders

आर.के. सिन्हा भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सशक्त विपक्ष का होना अनिवार्य है। लोकतंत्र का मतलब ही वाद-विवाद-संवाद के द्वारा जनता की समस्याओं का समाधान करना है। जिन देशों में जिम्मेदार और जुझारू विपक्ष दल होते हैं, वहां सरकार हमेशा जनता के हक में काम करने के लिये प्रतिबद्ध रहती है। ऐसी सरकार को अच्छी तरह मालूम होता है कि उसकी तरफ से कोई भी लापरवाही हुई तो विपक्ष उसे छोड़ेगा नहीं। पर हमारे यहां विपक्ष तो कई वर्षों से लगभग मृतप्राय हो रहा है। उसी विपक्ष में बूढ़े और असमर्थ नेताओं के जरिये जान फूंकने की कोशिशें हो रही है ताकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरपरस्ती में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक (एनडीए) गठबंधन को साल 2024 में चुनौती दी जा सके। यहां तक सब ठीक है। लेकिन दिक्कत यही है कि एनसीपी नेता शरद पवार, शेख अब्दुल्ला और यशवंत सिन्हा की पहल पर जो तीसरा मोर्चा शक्ल ले रहा है, उसमें थके हुए और चल चुके कारतूस या बुझे हुये दीपक जैसे नेता हैं। कुछ नेता इस तरह के भी हैं, जिन्हें घर से बाहर कोई पहचाने भी नहीं। पवार के साथ भाजपा से टीएमसी का दामन थाम चुके यशवंत सिन्हा, कभी आम आदमी पार्टी (आप) में रहे आशुतोष, आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह तथा भाकपा के डी. राजा वगैरह भी हैं। शरद पवार के घर में हुई बैठक में करण थापर और प्रीतीश नंदी जैसे पत्रकारों और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वाई.सी. कुरैशी को भी बुलाया गया था। इस बैठक में चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी आए थे। वे आजकल कई नेताओं को भावी प्रधानमंत्री बनाने का वादा कर रहे हैं। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि 2024 में जहाँ सर्वथा निरोग और तंदुरुस्त नरेन्द्र मोदी का 74 वां साल चल रहा होगा, जबकि कैंसर के मरीज पवार 84 वर्ष और अस्वस्थ चल रहे यशवंत सिन्हा और फारुख अब्दुल्ला 87 पूरे कर चुके होंगेI अब बताएं कि क्या इन कथित और स्वयंभू नेताओं के सहारे मोदी जी को चुनौती दी जा सकेगी ? शरद पवार के साथ गीतकार 76 वर्षीय जावेद अख्तर भी आ गए हैं। यह वही जावेद अख्तर हैं जिन्होंने हाल ही में गाजियाबाद में एक दाढ़ी वाले शख्स के साथ हुई मारपीट की घटना को सांप्रदायिक रंग देने की चेष्टा की थी। हालांकि बाद में जब पुलिस अनुसन्धान से खुलासा हुआ कि वह सारा मामला आपसी रंजिश का था। उसमें सांप्रदायिकता का कोण लाना या देखना सरासर गलत था। लेकिन जब सारा मामला शीशे की तरफ साफ हुआ तो जावेद अख्तर चुप रहे। शरद पवार के साथ तो सहानुभति जताई जा सकती है। वे देश के प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब गुजरे कई दशकों से पाले हुए हैं। पर अफसोस कि उन्हें हर बार असफलता ही मिलती है। अब उन्होंने अपने साथ प्रशांत किशोर को जोड़ लिया है। यानी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। उनकी जिजिविषा को सलाम करने का मन करता है। शरद पवार के साथ यशवंत सिन्हा का विपक्षी एकता के लिए काम करने का मतलब है कि उन्हें अपनी नेता ममता बनर्जी का समर्थन मिल रहा है। यशवंत सिन्हा पहले भाजपा में थे। इस बीच, ममता बनर्जी को लगता है कि पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उनका अगला लक्ष्य दिल्ली होना चाहिए। यानी उनकी निगाह भी अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। संभावित तीसरे मोर्चे से नेशनल कांफ्रेंस के नेता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला भी जुड़े हैं। याद रख लें कि फारूक अब्दुल्ला के साथ अब उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी नहीं है। जम्मू-कश्मीर के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ से हाल ही में राजधानी में बुलाई गई बैठक में उमर अब्दुल्ला ने यहां तक कहा था कि अब धारा 370 की बहाली मुद्दा नहीं रहा। उन्होंने इस तरफ की टिप्पणी तब की थी जब पीडीपी महबूबा मुफ्ती ने धारा 370 की बहाली की मांग की थी। क्या फारूक अब्दुल्ला धारा 370 की बहाली के लिए बोलेंगे शरद पवार के साथ रहते हुए? याद रख लें कि अब जो भी इस देश में धारा 370 की बहाली की मांग करेगा उसे देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी। उसे देश का अवाम चुनावों में सिरे से खारिज कर देगा। उमर अब्दुल्ला अपने पिता की अपेक्षा राजनीतिक रूप से कहीं अधिक व्यवहारिक और परिपक्व हैं। वे परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार के करीब आने की कोशिश भी कर सकते हैं। वे जानते हैं कि फिलहाल इस देश में मोदी जी का दूर-दूर तक कोई विकल्प नहीं है। वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में 23 जुलाई 2001 से 23 दिसंबर 2002 तक विदेश राज्य मंत्री रहे हैं। साफ है कि वे भाजपा और एनडीए के चरित्र और व्यवहार को जानते हैं। जरा यह भी देखिए कि शरद पवार की सरपरस्ती में हुई राष्ट्र मंच की पहली बैठक से पता नहीं क्यूँ कांग्रेस को दूर रखा गया, पर बैठक के बाद कहा जाने लगा कि कांग्रेस के बिना राष्ट्र मंच नहीं बन सकता। यहां पर कई बातें साफ हो गई। राष्ट्र मंच को समझ आ गया कि उनके तिलों में तेल नहीं है कि वे नरेन्द्र मोदी जैसे दिग्गज लोकप्रिय जन नेता के नेतृत्व में चल रही एनडीए सरकार को चुनौती दे सकें। इसलिए राष्ट्र मंच नेता भी बैठक के बाद कांग्रेस को याद करने लगे। अगर कांग्रेस इस मोर्चे से जुड़ गई तो इसका नेता कौन होगा ? ये आगामी चुनावों में अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार किसे घोषित करेंगे ? पवार को या राहुल गांधी को? क्या कांग्रेस राहुल के दावे को खारिज करेगी ? शरद पवार के लिए या शरद पवार राहुल गांधी को ही देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही राष्ट्र मंच बना रहे हैं? इन सवालों के उत्तर देश की आम जनता को तो अवश्य ही चाहिए। यशवंत सिन्हा कह रहे हैं कि राष्ट्र मंच के सामने मोदी मुद्दा नहीं हैं। राष्ट्र के सामने जो मुद्दे हैं, वे ही मुद्दे हैं। तो बात ये है कि मोदी जी से लड़ने वालों के पास यह बताने के लिए कुछ नहीं है कि वे किन मुद्दों पर मोदी जी से मुकाबला करेंगे। वे देश के सामने उन बिन्दुओं को यदि विस्तार से रखें तो सही,  जिनको लेकर वे 2024 के लोकसभा चुनावों में मोदी जी से दो-दो हाथ करना चाहेंगे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को गिराने का इरादा रखने वाले शरद पवार जरा यह भी बता दें कि महाराष्ट्र की जिस सरकार को बनाने में उनका खास रोल रहा है, वह किस हद तक करप्शन से लड़ रही है ? शरद पवार क्या बताएंगे कि उनकी पार्टी के नेता और महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख के घरों पर हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने छापेमारी क्यों की ? जानकारों का कहना है कि ईडी की जांच से 4 करोड़ रुपए के हेरफेर का पता चला है, जो कथित तौर पर मुंबई में लगभग 10 बार मालिकों ने अनिल देशमुख को दिए थे। शरद पवार जी को तो एनडीए सरकार के खिलाफ किसी भी हद तक जाने का अधिकार है। पर वे जरा अपनी गिरेबान में भी झांक लें। कभी फुर्सत मिले तो वे बताएं कि ईमानदारी और पारदर्शिता जैसे मसलों पर उनकी क्या राय है ? (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 30 June 2021


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गिरीश्वर मिश्र कोविड की महामारी का भारत के सामाजिक जीवन और व्यवस्था पर सबसे गहन और व्यापक प्रभाव देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन को लेकर दिख रहा है जो मानव संसाधन के निर्माण के साथ ही युवा भारत की सामर्थ्य और देश के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। देश ने बड़े दिनों बाद शिक्षा में सुधार का व्यापक संकल्प लिया था और उसकी रूप रेखा बनाई थी, उसके कार्यान्वयन में अतिरिक्त विलम्ब हो रहा है। नई शिक्षा नीति के प्राविधान इक्कीसवीं सदी में भारतीय शिक्षा की उड़ान के लिए पंख सदृश कहे जा सकते हैं परन्तु सब पर (अल्प) विराम लग गया है। कोविड के बाध्यकारी दबाव के परिणाम तात्कालिक रूप से बाधक हैं पर उसके कुछ पहलू तो अनिवार्य रूप से दूरगामी असर डालेंगे। बचाव और स्वास्थ्य की रक्षा की दृष्टि से तात्कालिक कदम के रूप में शैक्षिक संस्थानों को प्रत्यक्ष भौतिक संचालन से मना कर दिया गया और कक्षा की पढ़ाई और परीक्षा जहां भी संभव था आभासी (वर्चुअल) माध्यम से शुरू की गई। जहां ये साधन नहीं थे वहां औपचारिक पढ़ाई लगभग बंद सी हो गई थी। इस व्यवधान के चलते आए बदलाव को हुए अब दो साल के करीब होने को आए।  स्वाभाविक रूप से बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए शिक्षा केंद्र में विद्यार्थी की भौतिक उपस्थिति विविध प्रकार की सीखने के अवसर और चुनौतियां देती रहती है जो उसके समग्र विकास के लिए बेहद जरूरी खुराक होती है। परन्तु इस महामारी के बीच विद्यालय की अवधारणा ही बदल गई। बहुत से विद्यार्थी आनलाइन प्रवेश, आनलाइन शिक्षा और आनलाइन परीक्षा से गुजरने को बाध्य हो गए। शिक्षा-केंद्र विद्यार्थी और शिक्षक से भौतिक रूप से दूर तो हुए ही पर उनके विकल्प में मोबाइल या लैप टाप की स्क्रीन पर लगातार घंटों बैठने से आंखों, कमर और हाथ की उँगलियों आदि में शारीरिक परेशानियां भी होने लगी हैं। शिक्षा पाने का प्रेरणादायी और रोचक अनुभव अब उबाऊ (मोनोटोनस) होने चला है। आभासी माध्यम पर होने वाली आनलाइन कक्षा की प्रकृति में अध्यापक-छात्र के बीच होने वाली अन्तःक्रिया अस्वाभाविक और असहज तो होती ही है उसमें विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी और शिक्षक द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक भी कृत्रिम लगते हैं। विद्यार्थी की प्रतिभा को प्रदर्शित करने के अवसर कम होते जाते हैं। कई विद्यार्थी उसे वर्चुअल खेल ही मानते हैं। साथ ही वास्तविक परिस्थितियों में शिक्षक के समक्ष विद्यार्थी की उपस्थति होने में अनुशासन के लिए जरूरी अभ्यास का अवसर मिलता है। इससे एक सामाजिक परिस्थिति बनती है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नैतिकता का भी पाठ पढ़ाती है। इसके उलट आनलाइन कक्षा में कोताही की गुंजाइश अधिक हो गई है। लैपटाप और मोबाइल के उपयोग की अनिवार्यता ने सभी लोगों के अनुभव जगत को बदल डाला है। इसी बहाने आई सोशल मीडिया की बाढ़ ने, समय-कुसमय का ध्यान दिए बिना, वांछित और अवांछित हर किस्म का हस्तक्षेप शुरू किया है। ऐसे में अपरिपक्व बुद्धि वाले छोटे बच्चों की जिन्दगी में सोशल मीडिया के अबाध प्रवेश पर रोक-छेंक लगाना अब माता-पिता के लिए पहेली बन रहा है। शिक्षा के लिए जरूरी गंभीरता और सजगता में लगातार कमी आ रही है। उपर्युक्त माहौल में शिक्षा की जो भी और जैसी भी परिभाषा, उसका सुपरिचित ढांचा और स्वीकृत प्रक्रिया थी, बदल गई। साथ ही प्राइमरी से उच्च शिक्षा तक की कक्षाओं के लिए नई आनलाइन प्रणाली के लिए हम पहले से तैयार न थे। यह तकनीकी बदलाव सिर्फ डिलीवरी के तरीके से ही नहीं जुड़ा है बल्कि दुनिया और खुद से जुड़ने और अनुभव करने के नजरिये से भी जुड़ा हुआ है। सीखने की प्रक्रिया को कम्यूटर के की बोर्ड को आपरेट करने तक सीमित करना विद्यार्थियों को सीखने और समझने की शैलियों में विविधता की भी अनदेखी करता है। एक बंधा-बंधाया तकनीक-नियंत्रित ढांचा उनके ऊपर थोप दिया जाता है और उसी में बंध कर ही सीखना-पढ़ना होता है। ऐसा करने में कल्पनाशीलता, प्रयोग और सृजन के अवसर कम होते जाते हैं। इन सबके बीच सूचना ही ज्ञान और अनुभव का पर्याय बनती जा रही है। हालांकि ऐसे आशावादी लोग भी हैं जो अब यह विश्वास करने लगे हैं कि भविष्य में सबकुछ आनलाइन व्यवस्था के अधीन हो जायगा। वे ऐसा मानने के लिए बड़े आतुर हैं क्योंकि वे उसे ही एकमात्र विकल्प मान बैठे हैं। पर यह कल्पना दूर की कौड़ी है और इस तरह की सोच शिक्षा को उसके मुख्य प्रयोजन से दूर ले जाने वाली है। दूसरी ओर कुछ यथास्थितिवादी शिक्षाविद भी हैं जो शिक्षा के पारंपरिक ढाँचे को ही ठीक समझते हैं। परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों में अधिकाँश लोग आनलाइन और आफलाइन दोनों तरीकों के मिले-जुले रूप (ब्लेंडेड ) को ही बेहतर मानते हैं। वे लोग बदलते वैश्विक परिदृश्य में नई तकनीकों का लाभ लेते हुए शिक्षा की संवादमूलक मानवीय प्रक्रिया को ही स्वाभाविक और मानवता का हितैषी मानते हैं। आज की आन लाइन शिक्षा शिक्षा से जुड़े लोगों की बदलती आदतें अब तकनीकी व्यवस्था में उलझ रही हैं . नतीजा यह हो रहा है कि अब ध्यान देने , सोचने और आत्मसात करने की जगह डाउनलोड और उपलोड करने, गूगल में सर्च करने, स्क्रीन शेयर करने और पीपीटी तैयार करने जैसे कम्प्यूटरी कौशलों के अभ्यास और प्रबंधन के रुटीन को स्थापित करने में ही ज्यादा से ज्यादा समय बीत रहा है। तकनीकी की यह प्रबलता मानव मस्तिष्क को नए ढंग से काम करने के लिए प्रशिक्षित करने लगी है। कहना न होगा कि इंटरनेट से जुड़ते हुए देश और काल दोनों का अनुभव बदल जाता है। साइबर स्पेस में भ्रमण करना अद्भुत अनुभव होता है। इसमें सूचना प्रवाह का परिमाण और गति दोनों में जिस वेग से बढ़ रहा है वह चौंकाने वाला है और सब जानकारियों के तत्काल बासी होने के भय से भी ग्रस्त करता चल रह है। बुद्धि और विवेक की जगह तकनीकी की बढ़ती प्रतिष्ठा का चरम कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस ) के विभिन्न उपयोगों में प्रतिफलित हो रहा है। यही आज का सबसे ताजा 'क्रेज' बन रहा है। वस्तुत: तकनीक मानव मूल्यों की जगह नहीं ले सकती। ऐसा होना मानवीय इतिहास में दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा यदि हम सब कुछ मशीन के हाथों सुपुर्द कर दें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सारे विश्व को तबाह कर रहे कोरोना विषाणु की पर्त दर पर्त उभरती कथा ज्ञान, तकनीक और संवेदनहीनता के विमानवीय गठबंधन को ही बयान करती जान पड़ रही है जिसका और छोर नहीं दिख रहा है। यह बात भी साफ़ जाहिर है कि कोविड की विपदा की मार समाज के विभिन्न वर्गों पर एक जैसी नहीं पड़ी है। आनलाइन शिक्षा के जरूरी संसाधनों की व्यवस्था के लिए आर्थिक साधन सबके पास न होने से उस तक पहुँच समाज में एक ऐसे डिजिटल डिवाइड को जन्म दे रही है जो संपन्न परिवार से आने वाले विद्यार्थियों और कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों के बीच मौजूद खाई को और ज्यादा बढ़ाने वाली है। मुश्किल यह भी है कि कोरोना की मार से गरीब को ज्यादा चोट पहुंची है, ख़ासतौर पर अनौपचारिक श्रमिकों और दिहाड़ी पर काम करने वालों की हालत ज्यादा खस्ती हुई है। इस तरह वंचित और कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा की समस्या उनकी आर्थिक असुरक्षा से जुड़ी हुई है जिसका प्रभावी नीतिगत समाधान अभीतक नहीं बन सका है। आनलाइन पढ़ाई की उपलब्धता की स्थिति में पूरे देश में बड़ी विविधता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नई शिक्षानीति प्रकट रूप से सामान्य हालत में भी आनलाइन पाठ्यक्रम के उपयोग को बढ़ावा देती है और अपेक्षा करती है कि विद्यार्थी कुछ सीमित संख्या में अपनी रुचि के पाठ्यक्रम दूसरी संस्थाओं से भी आनलाइन पढ़ाई जरूर करे। प्रस्तावित शिक्षा नीति इस अर्थ में लचीली है कि छात्र-छात्राओं को अपनी रुचि, प्रतिभा और सर्जनात्मकता को निखारने का अवसर मिल सकेगा। इस तरह की पढ़ाई से मिलने वाली क्रेडिट स्वीकार्य होगी और डिग्री की पात्रता से जुड़ जायगी। देखना है की नई शिक्षानीति का मसौदा कार्य रूप में किस रूप में व्यावहारिक धरातल पर उतरता है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि शिक्षा की आधार-संरचना में निवेश किया जाय और अध्यापकों की भर्ती और विद्यालयों को जरूरी सुविधाओं से लैस किया जाय। कोरोना के आतंक ने शिक्षा में जो दखल दी है उसने शिक्षा की पूरी प्रक्रिया को हिला दिया है। उसने बोर्ड की परीक्षाओं की पुरानी प्रणाली को भी ध्वस्त कर दिया है और फौरी तौर पर विगत वर्षों में मिले अंकों की सहायता से एक फार्मूला बनाया गया है जो मूल्यांकन का एक काम चलाऊ नुस्खा है। हमारा समाज और हमारी राजनीति अभी भी शिक्षा के महत्त्व को देखने समझने की जरूरत को तरजीह नहीं दे पा रहा है। शिक्षा उसकी वरीयता सूची से अभी भी बाहर ही है। आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी के पुनराविष्कार के लक्ष्य शिक्षा को समुन्नत किये बिना कोई अर्थ नहीं रखते। यदि इन्हें सार्थक बनाना है तो हमें शिक्षा के प्रति उदासीनता के भाव से उबरना होगा। शिक्षा एक अवसर है जिसकी उपेक्षा करना आत्मघाती होगा। (लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 30 June 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत के प्रधानमंत्री रहे पामुलपर्ती वेंकट नरसिंहरावजी का इस 28 जून को सौवां जन्मदिन था। नरसिंहरावजी जब से आंध्र छोड़कर दिल्ली आए, हर 28 जून को हम दोनों का भोजन साथ-साथ होता था। पहले शाहजहां रोडवाले फ्लेट में और फिर 9, मोतीलाल नेहरू मार्गवाले बंगले में। प्रधानमंत्री बनने के पहले वे विदेश मंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और मानव संसाधन मंत्री रह चुके थे। 1991 में जब वे प्रधानमंत्री बने तो हमारे तीन पड़ौसी देशों के प्रधानमंत्रियों ने मुझसे पूछा कि क्या राव साहब इस पद को ठीक से सम्हाल पाएंगे ? उन्होंने अगले पांच साल न केवल अपनी अल्पमत की सरकार को सफलतापूर्वक चलाया बल्कि उनके कामकाज से उनकी गणना देश के चार एतिहासिक प्रधानमंत्रियों- नेहरू, इंदिरा गांधी, नरसिंहराव और अटलजी- के रूप में होती है। राव साहब के जन्म का यह सौवां साल है। कई अन्य प्रधानमंत्रियों का भी सौंवा साल आया और चला गया। उनके सौवें जन्मदिन पर हैदराबाद में उनकी 26 फुट ऊंची प्रतिमा का उदघाटन जरूर हुआ लेकिन वह किसने आयोजित किया ? किसी कांग्रेसी ने नहीं, किसी राष्ट्रवादी भाजपाई ने नहीं, बल्कि तेलंगाना (पूर्व आंध्र) के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने। क्या नरसिंहराव सिर्फ एक प्रांत के नेता थे ? वर्तमान कांग्रेस किस कदर एहसानफरामोश निकली है ? मुझे उससे ज्यादा उम्मीद इसलिए भी नहीं थी कि जिस दिन राव साहब का निधन हुआ (23 दिसंबर 2004), प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहनसिंह ने खुद मुझे फोन किया और कहा कि आप कांग्रेस कार्यालय पर पहुंचिए। वहीं उन्हें लाया जा रहा है। उस समय सुबह के साढ़े दस ग्यारह बजे होंगे। राव साहब का शव बाहर रखा हुआ था और सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी के अलावा मुश्किल से 8-10 कांग्रेसी नेता वहां खड़े हुए थे। किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। सिर्फ मैंने उनके चरण-स्पर्श किए। शेष लोगों ने उन्हें खड़े-खड़े चुपचाप विदाई दे दी। मैंने सोचा कि राजघाट के आसपास अंत्येष्टि के लिए कोई स्थल तैयार कर लिया गया होगा लेकिन उसी समय शव को हवाई अड्डे ले जाया गया। हैदराबाद में हुई उनकी लापरवाह अंत्येष्टि की खबर जो दूसरे दिन अखबारों में पढ़ी तो मन बहुत दुखी हुआ लेकिन 2015 में यह जानकर अच्छा लगा कि राजघाट के पास शांति-स्थल पर भाजपा सरकार ने उनका स्मारक बना दिया है। कांग्रेस के नेता चाहते तो 28 जून को उनकी 100 वीं जन्म-तिथि पर कोई बड़ा आयोजन तो करते। जो आजकल कांग्रेस के नेता बने हुए हैं, यदि प्रधानमंत्री नरसिंहराव की दरियादिली नहीं होती तो वे तब जेल भी जा सकते थे और देश छोड़कर भी भाग सकते थे। राव साहब ने अपने दो वरिष्ठ मंत्रियों को सलाह को दरकिनार करते हुए मेरे सामने ही राजीव गांधी फाउंडेशन को 100 करोड़ रु. देने का निर्णय किया था। उनकी स्मृति में भाजपा कुछ करती तो कांग्रेसी आरोप लगा देते कि बाबरी मस्जिद को गिरवाने में भाजपा और राव साहब की मिलीभगत थी लेकिन 6 दिसंबर 1992 की उस घटना के बारे में ऐसा आरोप लगा देना घनघोर अज्ञान और दुराशय का परिचय देना है। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाएंगे, लोगों को पता चलेगा कि भारत की अर्थ-नीति और विदेश नीति को समयानुकूल नई दिशा देने में नरसिंहरावजी का कैसा अप्रतिम योगदान था। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 30 June 2021


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डॉ. रामकिशोर उपाध्याय हमारे संविधान ने सभी धर्मावलम्बियों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में जिस प्रकार धर्मान्तरण किये जा रहे हैं उससे पुनः इस धारा की व्याख्या करने की आवश्यकता उपस्थित कर दी है। नोएडा डेफ सोसायटी के मूक-बधिर बच्चों के धर्मान्तरण की घटना ने पूरे देश को चौंका दिया है। यद्यपि देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में धर्मान्तरण रोकने के लिए अलग-अलग कानून हैं किन्तु कोई भी राज्य इस बात का विश्वास नहीं दिला सकता कि उसके यहाँ धर्मान्तरण पूर्णतः रुक गया है। अभी इस अपराध में दो वर्ष से लेकर अधिकतम सात वर्ष की सजा का प्रावधान है। जुर्माने की राशि भी जो कुछ राज्यों में पहले पाँच हजार थी उसे भी अलग-अलग राज्यों ने थोड़ी बहुत वृद्धि करके खानापूर्ति कर दी है। एक अनुमान के अनुसार धर्मान्तरण कराने वाले गिरोहों को इस कार्य के लिए हवाला आदि माध्यमों से जो फंड मिलता है. वह करोड़ों में होता है। यह पैसा अरब देशों तक से यहाँ पहुँचाया जाता है। प्रश्न यह है कि जिस कार्य को करने के लिए करोड़ों रुपये मिलते हों और पकड़े जाने पर जुर्माना मात्र कुछ हजार रुपये हो तो भला ऐसा कानून इस कुकृत्य को कैसे रोक पाएगा ? भारत जिसे हिन्दू बहुसंख्यक देश कहा जाता है वहाँ कश्मीर, लद्दाख, मिजोरम, नागालैंड, लक्ष्यद्वीप, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि कई राज्यों में हिन्दू जनसंख्या घटते-घटते अल्प संख्यक हो गई है। देश के नौ राज्यों में हिन्दुओं का अल्पसंख्यक हो जाना निस्संदेह चिन्ता का विषय है। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि हिन्दू आवादी घटने का सबसे बड़ा कारण धर्मान्तरण ही है। आश्चर्य की बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या में धर्मान्तरण के पश्चात् भी देश में इसे रोकने के लिए प्रभावी कानून नहीं बन सका है।  भारत में धर्मान्तरण की विवशता और छल का इतिहास बहुत पुराना है। ब्रिटिश काल में इसाई मिशनरियों ने सहानुभूति और सेवा की आड़ में धर्मान्तरण का जो घिनौना खेल आरंभ किया था वह आज तक अनवरत चल रहा है। मिशनरियाँ सुदूर वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों को अभी भी बहला फुसलाकर ईसाई बना देती हैं। मध्यकाल में इस्लामिक आक्रान्ता गर्दन पर तलवार रखकर या जज़िया कर लगाकर धर्मान्तरण कराते रहे। किन्तु उत्तर प्रदेश में मुफ्ती काजी जहांगीर आलम और मुहम्मद उमर के धर्मान्तरण गैंग ने इन सबसे हटकर जिस क्रूरता और निर्लज्जता से धर्मान्तरण कराने का कुकृत्य किया है वैसे उदहारण कम ही देखने को मिलते हैं। दिव्यांग बच्चों को देख सज्जन नागरिकों के मन में स्वाभाविक रूप से सहानुभूति उमड़ती है। वे बिना किसी भेदभाव के इनकी सेवा और सहयोग करने लगते हैं। किन्तु यह एक ऐसा गिरोह बताया जा रहा है जो उन मासूम हिन्दू बच्चों के खतने कर उन्हें मुसलमान बना देता है जो न बोल सकते हैं न सुन सकते हैं, जिन्हें समाज से अतिरक्त सहानुभूति की आवश्यकता थी। यदि डेफ सोसायटी इन मूक-बधिरों को बिना धर्मान्तरण के ही उनका जीवन सँवार देती तो संभव था कि पूरी दुनिया उनके कार्यों की सराहना करती। भारत के प्रबुद्ध नागरिकों और मानवता वादियों को आशा थी कि लगभग एक हजार हिन्हुओं (जिनमें मूक-बधिर बच्चे और लड़कियाँ भी शामिल हैं) को लोभ-लालच देकर, गुमराह करके जबरन मुसलमान बनाए जाने की इस क्रूर और घृणित घटना का देश के सभी इस्लामिक इदारे/धार्मिक संस्थाएँ एक सुर में निंदा करेंगीं किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ | कुछ लोग बड़ी चतुराई के साथ धार्मिक स्वतंत्रता की दुहाई देने में जुट गए हैं। मैं पूछता हूँ कि यदि यही काम किसी हिन्दू संगठन ने मुसलमान बच्चों के साथ कर दिया होता तो क्या तब भी देश में ऐसी ही शांति और भाईचारा बना रहता ? एक मुसलमान युवक की लड़ाई-झगड़े में हत्या हो जाने पर पूरा देश असहिष्णु हो गया था, यूपी से मुंबई तक तथाकथित प्रगतिशील लोग (इस्लामिस्ट और कम्युनिस्ट लॉबी ) सड़कों पर उतर आई थी। पुरस्कार वापस किये जाने लगे थे और बड़े-बड़े कलाकारों का मन देश छोड़ देने का हो रहा था। किन्तु अब जबकि एक हजार लाचार बच्चों के धर्मान्तरण की घटना सामने आ रही है तब तथाकथित बुद्धिजीवी समूह लीपापोती कर रहा है क्यों ? संसार के सभी देशों में अल्पसंख्यक समूह सरकारों से निवेदन करते हैं कि धर्मान्तरण रोकिए और धर्मान्तरण कराने वालों को कठोर दंड दीजिए किन्तु भारत में उल्टी गंगा बह रही है यहाँ अल्पसंख्यक कह रहे हैं कि धर्मान्तरण पर आँखें मूँद लो और बहुसंख्यक हिन्दू कह रहे हैं कि धर्मातरण को रोकने के लिए कठोर कानून बनाइये। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ तथाकथित अल्पसंख्यक मुसलमान और ईसाई, बहुसंख्यक हिन्दुओं का जबरन धर्मान्तरण करा देते हैं और उन्हें इस काम के लिए सजा के स्थान पर देश विदेश से अपार धन मिलता है। अब समय अगाया है जबकि बलात धर्मान्तरण को रोकने के लिए संविधान में कठोर प्रावधान करने ही होंगें नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब पूरे देश में हिन्दू अल्पसंख्यक बन कर रह जाएँगे। आज समग्र देश में धर्मान्तरण रोकने के लिए एक कठोर कानून की आवश्यकता है।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 June 2021


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सियाराम पांडेय 'शांत' जम्मू एयर फोर्स सेंटर के तकनीकी क्षेत्र में रात के वक्त पांच मिनट के अंतराल पर दो ड्रोन हमले, उससे एक इमारत की छत का क्षतिग्रस्त होना और दो जवानों का घायल होना सामान्य घटना नहीं है, यह शत्रु देश,आतंकवादी संगठनों और अलगाववादी ताकतों की ओर से भारत को प्रकारांतर से दी गई युद्धक चुनौती है। गनीमत है कि इसमें कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ लेकिन यह घटना हमें और अधिक चौकस और सचेत रहने की ओर इशारा तो करती ही है। इस घटना ने हमारी सुरक्षा तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली बात तो यह है कि जब दिल्ली में ड्रोन हमलों के खतरे से निपटने की प्रणाली है तो जम्मू-कश्मीर जैसे आतंकवाद के लिहाज से बेहद संवेदनशील राज्य में ड्रोन से निपटने की तैयारियों क्यों नहीं की गई है। इस घटना के बाद कालूचक मिलिट्री स्टेशन के करीब दो ड्रोन का रात 10 बजे और तड़के 3 बजे देखा जाना बेहद चिंताजनक है। ड्रोन दिखने के तुरंत बाद भारतीय सैनिकों ने उन्हें खदेड़ दिया। क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इन ड्रोन के स्रोत तलाशे जा रहे हैं। संभव है कि एयरफोर्स स्टेशन के बाद मिलिट्री स्टेशन पर हमले की साजिश के तहत उन्हें भेजा गया हो। आतंकवादी जिस तरह जम्मू-कश्मीर में मारे जा रहे हैं, उससे पाकिस्तान अंदर तक विचलित है। सच तो यह है कि यह घटना सेना और पुलिस की सबसे बड़ी चूक है। माना जा रहा है कि हवाई मार्ग से एयरपोर्ट से मकवाल बॉर्डर की दूरी करीब पांच किलोमीटर है। ऐसे में इस ड्रोन को सीमा पार से हैंडल किए जाने का शक जाहिर किया जा रहा है। हालांकि इसको लेकर अभीतक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एनआईए की टीम और एनएसजी कमांडो भी अपने स्तर पर मामले को देख-समझ रहे हैं।  सूत्रों का कहना है कि एयरफोर्स स्टेशन पर हमला करने में इस्तेमाल ड्रोन शहर के बेलीचराना क्षेत्र से ऑपरेट किए गए। इस इलाके में कई जगहों पर दबिश देकर पूछताछ की जा रही है, क्योंकि ड्रोन के बॉर्डर से आने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही। एक तरफ से बॉर्डर 10 और दूसरी तरफ से 16 किलोमीटर दूर है। लिहाजा ड्रोन का इस्तेमाल एयरफोर्स के आसपास से किया गया होगा? एयरफोर्स के पास सबसे संदिग्ध क्षेत्र बेलीचराना ही है, जिसके साथ तवी नदी भी लगती है। जम्मू में वायुसेना के एयरबेस पर ड्रोन से हुए बम हमले को भविष्य के लिए एक बड़े खतरे के रूप में आंकते हुए वायुसेना समेत तमाम सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का नए सिरे से आडिट कराया जाएगा। भारत में वायुसेना स्टेशन पर पहली बार हुए ड्रोन हमले की नई चुनौती को देखते हुए सैन्य प्रतिष्ठानों की फूलप्रूफ सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद अहम हो गया है। ड्रोन हमला सैन्य सुरक्षा के लिए नए तरह का खतरा है। एयरबेस ही नहीं दूसरे तमाम सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन को इंटरसेप्ट करना आसान नहीं है। इसके लिए सैन्य प्रतिष्ठानों के पास तकनीक और उपकरण दोनों की कमी है। सैन्य प्रतिष्ठानों को इस तरह के हमलों से बचाने के लिए यथाशीघ्र उपकरणों व तकनीक से लैस करना जरूरी है। पाकिस्तानी एजेंसियां आतंकी संगठनों को ड्रोन समेत दूसरे आधुनिक उपकरण व तकनीक मुहैया करा रही हैं। सऊदी अरब के सबसे बड़े तेल डिपो पर कुछ अरसा पहले ड्रोन से हुए आतंकी हमले का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। अमेरिकी एजेंसियां भी इस ड्रोन मिसाइल को इंटरसेप्ट नहीं कर पाई थीं। जम्मू एयरपोर्ट के जिस टेक्निकल एरिया में ड्रोन से बम हमला हुआ वह वायुसेना के हेलीकॉप्टर हैंगर के करीब था। वायुसेना के ध्रुव हेलीकाप्टर इस हैंगर में पार्क हैं। राहत की बात यही है कि इस हमले में कोई भारी नुकसान नहीं हुआ। जम्मू की घटना के बाद वायुसेना ने श्रीनगर, अवंतीपुरा, अंबाला और पठानकोट और अवंतीपुरा जैसे सीमावर्ती एयरबेस की सुरक्षा को अलर्ट कर दिया है। ड्रोन हमला कहीं दूर बैठकर किया जा सकता है। बहुत समय से कहा भी जा रहा है कि भावी समय ड्रोन युद्ध का है जिसमें युद्ध लड़ने के लिए सैनिकों की नहीं, तकनीकी की आवश्यकता होगी। चीन तो रोबोट सैनिक तैयार कर रहा है। अब भारत को भी खुद को उसी हिसाब से तैयार करना होगा। आतंकी संगठन ड्रोन का प्रयोग कर सकते हैं और आईएसआईएस ने मोसुल में ड्रोन हमलों के साथ यह बात साबित भी कर दी थी। भारत के अलावा अमेरिका, इजरायल, चीन, ईरान, इटली, पाकिस्‍तान, तुर्की और पोलैंड ने ही साल 2019 तक ऑपरेशनल यूएवी यानी अनमैन्‍ड एरियल व्‍हीकल तैयार कर लिए थे। ड्रोन अटैक में किसी भी यूएवी की मदद से बम को ड्रॉप करना, मिसाइल फायर करना, टारगेट को क्रैश करना और कुछ और कामों को अंजाम दिया जा सकता है। ड्रोन अटैक में यूएवी को किसी और जगह से कंट्रोल किया जाता है। दुनिया के कई देशों में ड्रोन हमले के तहत टारगेटेड किल‍िंग को अंजाम भी दिया जा चुका है। अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस ड्रोन को कमांड करने की भी जरूरत नहीं है। ड्रोन अटैक की जानकारी दुनिया को सबसे पहले अमेरिका ने दी थी। अमेरिका ने अफगानिस्‍तान से लेकर पाकिस्‍तान, सीरिया, इराक, सोमालिया और यमन में हवा से जमीन तक हमला करने में सक्षम मिसाइलों को फायर करने के लिए ड्रोन का प्रयोग किया, लेकिन तुर्की और अजरबैजान ने जमकर ड्रोन युद्ध को अपनाया। वर्ष 2020 में तुर्की के बने यूएवी को विस्‍फोटकों से लादा गया था।इस ड्रोन ने लीबिया में हफ्तार की सेनाओं को निशाना बनाया था। जनवरी 2012 से फरवरी 2013 तक अमेरिका पर ड्रोन का प्रयोग करके मानवाधिकार उल्‍लंघनों के आरोप भी लगे थे। संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ के मुताबिक अमेरिकी स्‍पेशल ऑपरेशंस में 200 लोगों की जान गई है जबकि निशाना बस 35 लोग ही थे। पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिकी सेनाओं ने जमकर ड्रोन हमलों को अंजाम दिया। 2019 में सऊदी अरब की दो बड़ी तेल फैक्ट्रियों पर ड्रोन हमले के बाद ही भारत सरकार ने दुश्मन ड्रोन से निपटने के लिए गाइडलाइंस पर काम करना शुरू कर दिया था। नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के महानिदेशक की अध्यक्षता वाली नागर विमानन महानिदेशालय, इंटेलीजेंस ब्यूरो , रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन , भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की समिति ने ये गाइडलाइंस बनाई थीं।  सवाल यह है कि जब भारत को पता है कि ऐसा हो सकता है फिर भी उसके सैन्य ठिकाने इतने असुरक्षित क्यों हैं? आपदाएं न तो बोल -बताकर आती हैं और न ही रोज आती हैं। इसलिए भी जरूरी है कि सतर्क रहा जाए और अपने सभी सैन्य ठिकानों, सुरक्षा संस्थानों की सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए जाएं। पाकिस्तान पर जम्मू-कश्मीर में ड्रोन हमले का शक इसलिए भी जाता है क्योंकि वह ड्रोन का इस्तेमाल पहले भी करता रहा है। उसने पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा के जरिए ऐसे कई ड्रोन भेजे थे जिनमें से ज्यादातर समय रहते पकड़ लिए गए थे और जब भारत में ड्रोन का इस्तेमाल दवा पहुंचाने, उर्वरक पहुंचाने और वाणिज्यिक सामानों की आपूर्ति में हो रहा है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 28 June 2021


bhopal,Delta Plus variant

प्रभुनाथ शुक्ल कोविड-19 का संक्रमण पूरी मानवता के लिए एक वैश्विक संकट है। अबतक लाखों लोगों की जान जा चुकी है। अभी यह कहना मुश्किल है कि यह लड़ाई कबतक चलेगी। डेल्टा प्लस वैरियंट के रूप में अब तीसरी लहर ने भी डरावनी दस्तक दी है। इस लड़ाई को जीतने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और सरकारें लगी हुई हैं। भारत में तीन लाख 80 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि वैश्विक आंकड़े इसके आठ गुने से भी अधिक हो सकते हैं। अब मानव जीवन को बचाने की बड़ी चुनौती है। भारत में लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने मुफ्त वैक्सीन की घोषणा की है। घोषणा के ही दिन लोगों में अच्छी पहल देखी गयी और तकरीबन 80 लाख लोगों ने वैक्सीनेशन करवाया। हालांकि अभी इस मुहिम को और अधिक गति प्रदान करने की आवश्यकता होगी। सरकार चाहती है कि तीसरी लहर के पूर्व अधिक से अधिक वैक्सीनेशन हो जाए।  स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया है कि देशभर में डेल्टा प्लस वैरियंट के 50 मामले मिले हैं। महाराष्ट्र में 22 जबकि बाकि मध्य प्रदेश और केरल में हैं। अभीतक यह दस देशों में देखा गया है जिसमें भारत के साथ पोलैंड, पुर्तगाल, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन, स्वीटजरलैंड नेपाल जैसे देश शामिल हैं। जबकि डेल्टा विषाणु दुनिया के 80 मुल्कों में पाया गया है जिसमें भारत भी शामिल है। डेल्टा प्लस को अभी खतरनाक श्रेणी में नहीं रखा गया है। अभी यह वैरियंट ऑफ इंटरेस्ट की श्रेणी में हैं जबकि वैरियंट ऑफ कंसर्न की स्थिति खतरनाक होती है।  प्रयोगशालाओं के जरिए जो नतीजे आए हैं उसमें कहा गया है कि डेल्टा प्लस फेफड़ों की कोशिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है। इसके अलावा शरीर में मौजूद मानोक्लोनल प्रतिरक्षा सिस्टम को भी कमजोर करता है। जिसकी वजह से यह बेहद खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिक शोध में बताया गया है कि सबसे पहले यह यूरोप में पाया गया था। माना जा रहा है कि यह वैरियंट भारत में तीसरी लहर का कारण बन सकता है। अगर इस तरह की स्थितियां पैदा हुईं तो हालात बेहद बदतर होंगे। क्योंकि देश अभी तक दूसरी लहर से भी नहीं ऊबर पाया है। वैज्ञानिकों की तरफ से दी गयी तीसरी लहर की चेतावनियों ने देशवासियों की चिंता बढ़ा दी है। कोविड-19 का वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यह वायरस पूरी तरह बहुरुपिया है। वैज्ञानिक शोध और प्रयोगों में यह साबित हो चुका है कि अब तक यह कई स्वरूप बदल चुका है। दुनिया में इसकी उपलब्धता कबतक रहेगी यह कहना मुश्किल है। डब्लूएचओ ने कोरोना का जो नामकरण किया है उसके अनुसार डेल्टा, कप्पा, अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और अब डेल्टा प्लस भी आ गया है। भारत में दूसरी लहर जो चल रही है वह डेल्टा वैरियंट की वजह से ही है। अबतक यह बेहद खतरनाक साबित हुआ है। दूसरी लहर में सबसे अधिक लोगों की मौत हुई। अब उसका विकसित रुप डेल्टा प्लस वैरियंट सामने आ चुका है। अगर इस पर समय से तीनों राज्यों ने नियंत्रण नहीं किया तो स्थिति भयावह हो सकती है।  प्रसिद्ध विशेषज्ञ शाहिद जमील ने भी चिंता और आशंका जाहिर की है कि डेल्टा प्लस वैरियंट वैक्सीन और इम्युनिटी को भी मात दे सकता है यानी मतलब साफ है कि अगर डेल्टा प्लस वैरियंट का संक्रमण जिस व्यक्ति को हुआ उसकी मुश्किल बढ़ सकती है। क्योंकि वैक्सीन लेने और शरीर में बेहतर इम्युनिटी विकसित होने के बाद भी यह विषाणु प्रभावशाली होगा। इससे यह साबित होता है कि यह इम्युन सिस्टम को भी धता बता सकता है। अभीतक लोगों को भरोसा था कि अगर उन्होंने वैक्सीन ली है और शरीर का इम्युन सिस्टम ठीक है तो कोरोना से लड़ना आसान होगा। स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। महाराष्ट्र सरकार ने तो पूरी आशंका जताई है कि कोरोना की तीसरी लहर डेल्टा प्लस वैरियंट से आ सकती है। सरकार और वैज्ञानिक इसपर लगातार शोध कर रहे हैं। लेकिन देश के नागरिक होने के नाते हमारा राष्ट्रीय दायित्व भी बनता है कि हम भीड़-भाड़ से बचें। मास्क, साबुन और सैनिटाइजर का उपयोग करें। परिवार के लोगों को पूरी तरह वैक्सीनेट करवाएं। बाहर निकलना आवश्यक न हो तो सुरक्षित घर में रहें। फिलहाल यह लड़ाई सिर्फ सरकार और वैज्ञानिकों के भरोसे नहीं लड़ी जा सकती। हमें भी एकसाथ आना होगा तभी हम मजबूती से यह जंग जीत सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 28 June 2021


bhopal, Swami Sahajanand Saraswati,Incarnation of Yuga Dharma

सहजानंद सरस्वती की पुण्यतिथि (26 जून) पर विशेष   सुरेन्द्र किशोरी 26 जून 1950 का वह काला दिन किसान आज भी नहीं भूले हैं, जब विरोधियों के बीच दुर्वासा और परशुराम के नाम से चर्चित स्वामी सहजानंद सरस्वती की मुजफ्फरपुर में मौत हो गई थी। मौत की जानकारी मिलते ही एक सन्नाटा खिंच गया था। गरीब किसानों ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके रहनुमा सहजानंद सरस्वती आंदोलन की धधकती आग के बीच इतनी जल्दी छोड़कर सबको छोड़कर हमेशा के लिए आंखें बंद कर लेंगे। खासकर देश के सबसे पहले जमींदारी मुक्त गांव बने रामदिरी और आसपास के किसानों के लिए तो कुछ दिन के लिए ही सही सभी रास्ते ही बंद हो गए थे। हो भी क्यों नहीं, 22 फरवरी 1889 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला स्थित देवा गांव में जुझौटिया ब्राह्मण बेनी राय के घर जब अचानक सोहर गूंजने लगी तो किसी को कहां पता था कि बेनी राय का यह पुत्र ना केवल देश में किसान आंदोलन की शुरुआत करेगा। बल्कि मां भारती को अंग्रेजों की बेड़ी से मुक्त करने में भी अपना अमूल्य योगदान देगा।   नौ साल की उम्र में जलालाबाद मदरसा से अपना विद्यारंभ करने वाले इस छोटे से बालक ने आदि गुरु शंकराचार्य को अपना गुरु बनाया और स्वामी सहजानंद सरस्वती के रूप में अपना नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षर से दर्ज करवा लिया। आदि शंकराचार्य सम्प्रदाय के दसनामी संन्यासी अखाड़ा के दण्डी संन्यासी स्वामी सहजानन्द सरस्वती ना केवल भारत के राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। बल्कि वे भारत में किसान आन्दोलन के जनक, बुद्धिजीवी, लेखक, समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी और इतिहासकार थे। युग-धर्म के अवतार, समय के पदचाप के आकुल पहचान, किसान विस्फोट के प्रतीक और पर्यायवाची तथा किसान आंदोलन के जनक एवं संचालक, राष्ट्रवादी वामपंथ के अग्रणी सिद्धांतकार, सूत्रकार एवं संघर्षकार, सामाजिक न्याय के प्रथम उद्घोषक, वेदांत और मीमांसा के महान पंडित, मार्क्सवाद के ठेठ देसी संस्करण, जिनकी वाणी में आग एवं क्रिया में विद्रोह, उत्पीड़न के खिलाफ दुर्वासा और परशुराम, आजादी के सवाल पर समझौताविहीन संघर्षरत योद्धा स्वामी सहजानंद सरस्वती ने पूरे जीवन में कभी भी असत्य से समझौता नहीं किया।   इसी का प्रतिफल था कि सुभाषचंद्र बोस और योगेंद्र शुक्ला ऐसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी इनके चरण चूमते थे। रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, महाश्वेता देवी, मन्मथनाथ गुप्त, शिवकुमार मिश्र एवं केशव प्रसाद शर्मा जैसे अपने समय के महान कई अन्य साहित्यकारों ने इन्हें अपनी रचना के केंद्र में रखा था। भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है। दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया। स्वामी जी ने नारा दिया था 'जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब जो कानून बनायेगा, ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वही चलायेगा।' गाजीपुर के जर्मन मिशन स्कूल से शास्त्रीय ढ़ंग, स्वाध्याय और स्वयं के जीवन संघर्ष से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अट्ठारह वर्ष की उम्र में संन्यास ले लिया और वेदान्तों के विचारों को दैनिक जीवन में प्रचलित किया था।   उन्होंने गीताधर्म के अंतर्गत मार्क्स, इस्लाम, ईसाई सभी को पर्याप्त जगह दी थी। वेदांतो के अर्थ के अनुसार धर्म, कार्य, मोक्ष में मार्क्स के अर्थ को प्रथम स्थान दिया और इसी कारण उन्होंने राजनीति को आर्थिक कसौटी के रूप में अपनाया, जबकि इसके विपरीत दूसरे लोग राजनीति को आर्थिक नीति के रूप में देखते थे। इसके कारण स्वामी जी ने उग्र अर्थवाद, वर्ग संघर्ष, किसान के हितों के प्रति लड़ने के लिए क्रांति जैसे रास्ते को अपनाया। संन्यासी बन कर ईश्‍वर और सच्चे योगी की खोज में हिमालय, विंध्यांचल, जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं की यात्रा की। काशी और दरभंगा के विशिष्ट विद्वानों के साथ वेदान्त, मीमांसा और न्याय शास्त्र का गहन अध्ययन किया। 1919 में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद राजनीति की ओर अग्रसर हुए और तिलक स्वराज्य फंड के लिए कोष इकट्ठा करना शुरू किया। 1920 में पटना में मजहरुल हक के आवास पर महात्मा गांधी से मिले तथा कांग्रेस में शामिल होने का निश्चय किया।    कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त करवाने के लिए अभियान जारी रखा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन बिहार में गति पकड़ा तो स्वामी सहजानंद उसके केन्द्र में थे। उन्होंने घूम-घूमकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को खड़ा किया। इस दौरान उन्हें अजूबा अनुभव हुआ कि किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर है। जिसे देखकर युवा संन्यासी का मन एक बार फिर नये संघर्ष की ओर उन्मुख हुआ और किसानों को एकजुट करने की मुहिम में लग गए। 1927 में पश्‍चिमी किसान सभा की नींव रखी तथा शोषितों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया और ‘मेरा जीवन संघर्ष’ लिखी। 1928 में बेगूसराय समेत बिहार के अन्य जगहों पर स्वामी सहजानंद सरस्वती और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह समेत अन्य किसान हितेषियों ने किसान सभा का सदस्य बनाने और संगठन खड़ा करने का काम शुरू किया तथा पूरे बिहार में किसानों को एकजुट करना शुरू कर दिया।   1929 में सोनपुर मेला के दौरान बिहार प्रान्तीय किसान सभा की नींव रखी तथा स्वामी सहजानंद सरस्वती सभापति और डॉ श्रीकृष्ण सिंह सचिव बनाए गए। 1934 में जब बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तो स्वामीजी ने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को साथ लेकर राहत और पुनर्वास कार्य में काफी सक्रियता सेे भाग लिया। इसी दौरान पटना में महात्मा गांधी से मुलाकात कर जनता का हाल सुनाया तो गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने की बात कही। इसके साथ ही उन्होंने गांधी जी को चैलेंज करते हुए रास्ता अलग कर लिया। बिहार प्रान्तीय किसान सभा को विस्तारित करते हुए 11 अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय किसान सभा को पुनर्गठित किया तथा कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई, जिसमें स्वामी सहजानंद सरस्वती को पहला अध्यक्ष चुना गया।