दखल क्यों


bhopal, Rama in Ayodhya: Call of folk collection!

  गिरीश्वर मिश्र सरयू नदी के पावन तट पर स्थित अवधपुरी, कोसलपुर या अयोध्या नाम से प्रसिद्ध नगरी का नाम भारत की मोक्षदायिनी सात नगरियों में सबसे पहले आता है-अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका, पुरी द्वारावती चैव सप्तैते मोक्षदायिका। मोक्ष का अर्थ है मोह का क्षय और क्लेशों का निवारण। तभी जीवन मुक्त यानी जीवन जीते हुए मुक्त रहना सम्भव होता है। अनुश्रुति, रामायण की साखी और जनमानस के अगाध विश्वास में भगवान श्रीराम को अत्यंत प्रिय यह स्थल युगों-युगों से सभी के लिये एक किस्म की उदार और पवित्र प्रेरणा का आश्रय बना हुआ है।   गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' अयोध्या में ही रचा था। उन्होंने मानस में अयोध्या का मनोरम चित्र खींचा है। साधु-संतों और धर्मप्राण जनता को अयोध्या सदैव आकर्षित करती रही है। यहां स्नान, ध्यान, परिक्रमा और भजन- कीर्तन का क्रम सतत चलता रहता है। इतिहास की कहें तो इसकी जड़ें इक्ष्वाकु वंश के राजाओं से जुड़ती हैं पर अयोध्या और उसके रघुकुल नायक भगवान श्रीराम इतिहास से परे सतत जीवन में बसे हैं, लोगों की सांसों में और समाज की स्मृति के अटूट हिस्से हैं। 'राम' इस शब्द और ध्वनि का रिश्ता सबसे है। सभी प्राणी श्रीराम से जुड़कर आनन्द का अनुभव करते हैं। भारत का आमजन आज भी सुख, दुख, जन्म, मरण, हानि, लाभ, नियम, कानून, मर्यादा, भक्ति, शक्ति, प्रेम, विरह, अनुग्रह सभी भावों और अनुभवों से राम को जोड़ता चलता है। सांस्कृतिक जीवन का अभ्यास ऐसा हो गया है कि अस्तित्व के सभी पक्षों से जुड़ा यह नाम आसरा और भरोसा पाने के लिये खुद ब खुद जुबान पर आ जाता है।   राम का पूरा चरित ही दूसरों के लिए समर्पित चरित है। मानव रूप में ईश्वर की राममयी भूमिका का अभिप्राय सिर्फ और सिर्फ लोकहित का साधन करना है। बिना रुके, ठहरे या किसी तरह के विश्राम के सभी जीव-जन्तुओं का अहर्निश कल्याण करना ही रामत्व की चरितार्थता है। राम का अपना कुछ नहीं है, जो है उसका भी अतिक्रमण करते रहना है। बाल्यावस्था से जो शुरुआत होती है तो पूरे जीवन भर राम एक के बाद एक परीक्षा ही देते दिखते हैं और परीक्षाओं का क्रम जटिल से जटिलतर होता जाता है। उनके जीवन की कथा सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती है। उनके जीवन में आकस्मिक रूप से होनी वाली घटनाओं का क्रम नित्य घटता रहता है पर राज तिलक न हो कर वन -गमन के आदेश होने पर कोई विषाद नहीं होता और उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती है। उनको हर तरह के लोभ, मोह, ममता, प्रीति, स्नेह को कसौटी पर चढ़ाया जाता है और वे खरे उतरते हैं। शायद राम होने का अर्थ नि:स्व होना और तदाकार होना (तत्वमसि !) ही है।   ऐसे राम के भव्य मन्दिर के आरंभ को लेकर सभी आनंदित हैं। बड़ी प्रतीक्षा के बाद इस चिर अभिलषित का आकार लेना स्वप्न के सत्य में रूपांतरित होने जैसा है। अनेक विघ्न बाधाओं के बीच राम मन्दिर के निर्माण का अवसर उपस्थित हो सका है। राम पंचायतन सत्य, धर्म, शौर्य, धैर्य, उत्साह, मैत्री और करुणा के बल को रूपायित करता है। यह मन्दिर इन्हीं सात्विक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। यह हमें जीवन संघर्ष में अपनी भूमिका सहजता के साथ निभाने के लिये उत्साह का कार्य करता है।   सामाजिक-राजनीतिक जीवन में 'रामराज्य' हर तरह के ताप अर्थात कष्ट से मुक्ति को रेखांकित करता है। इस रामराज्य की शर्त है स्वधर्म का पालन करना। अपने को निमित्त मान कर दी गई भूमिकाओं का नि:स्वार्थ भाव से पालन करने से ही रामराज्य आ सकेगा। ऐसा करने के लिये पर हित और परोपकार की भावना करनी होगी क्योंकि वही सबसे बड़ा धर्म है- पर हित सरिस धर्म नहि भाई। यही मनुष्यता का लक्षण है क्योंकि अपना हित और स्वार्थ तो पशु भी साधते हैं। अत: राम की प्रीतिलोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। वाल्मिकी ने तो राम को धर्म की साक्षात साकार मूर्ति घोषित किया है (रामो विग्रहवान धर्म:)। इसलिए रामभक्त होने से यह बंधन भी स्वत: आ जाता है कि हम धर्मानूकूल आचरण करें। हमारी कामना है कि राम मन्दिर निर्माण के शुभ कार्य से देश के जीवन में व्याप्त हो रही विषमताओं, मिथ्याचारों, हिंसात्मक प्रवृत्तियों और भेदभाव की वृत्तियों का भी शमन होगा और समता, समानता और न्याय के मार्ग पर चलने की शक्ति मिकेगी।     (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 5 August 2020


bhopal, Corona and Dr. Tedros

  डॉ. प्रभात ओझा देश में कोरोना की वैक्सीन का परीक्षण अंतिम चरण में है। सम्भव है कि अगले वर्ष के प्रारम्भ में ही इसे आम लोगों के लिए सुलभ कराया जा सके। रूस ने तो इसी साल अक्टूबर से ही कोरोना के टीकाकरण का अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। यह अलग बात है कि दुनिया भर में रूस की वैक्सीन को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कई देशों ने कोरोना की वैक्सीन बनाने की रूस की प्रक्रिया पर शक जाहिर किया है। उसपर वैक्सीन के सूत्र चुराने के भी आरोप हैं। बहरहाल, यह सब होता रहता है। बहस का नया मुद्दा यह हो चला है कि दुनिया से कोरोना की समाप्ति हो भी पायेगी अथवा नहीं। कारण खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख डॉ. टेड्रोस एडोनोम गेब्रिएसस ने यह तो उम्मीद जाहिर की है कि कोविड-19 की वैक्सीन मिल सकती है। साथ ही यह भी कहा है कि अभी इसकी कोई अचूक दवा नहीं है। गेब्रिएसस यह भी जोड़ते हैं कि शायद इसकी अचूक दवा कभी न मिल सके। डॉ. टेड्रोस एडोनोम गेब्रिएसस पहले भी कई बार इस तरह का शक जाहिर कर चुके हैं। उनके तर्ज पर दुनिया के कई देश और भारत में भी यह कहा जाता है कि मुमकिन है कि लोगों को कोरोना के साथ ही जीना पड़े। हालांकि इसका जो सकारात्मक अर्थ लिया जाता है, वह ये है कि कोरोना भी दूसरे रोगों के साथ सामान्य ढंग से लिया जायेगा और इसका इलाज होता रहेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष का कथन इसी अर्थ में है, तो ठीक है। वैसे वे तो कुछ और ही कहना चाहते हैं। वह कहते हैं कि कोरोना दूसरे वायरस से बिल्कुल अलग है। वह खुद को बदलता रहता है। मौसम बदलने से भी कोरोना पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। यह दिख भी रहा है कि विश्व भर में अलग-अलग तापमान के बावजूद कोरोना किसी भी असर से प्रभावित नहीं हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष के ताजा बयान के आलोक में देखें तो जुलाई की अंतिम तिथि तक दुनिया भर में एक करोड़ 81 लाख से अधिक लोग कोरोना वायरस से प्रभावित हो चुके हैं। दुखद यह है कि इस तिथि तक 6 लाख, 90 हज़ार से अधिक मरीज अपने प्राण गंवा चुके हैं। संक्रमण के दूसरे और तीसरे चरण में यह रोग और अधिक सक्रिय हो चुका है। इन जगहों में हमारा देश भारत भी शामिल है। हमारे यहां इससे पड़े प्रभाव से निपटने के लिए आम जन को तरह-तरह की सहायता दी जा रही है। दुनिया में सबसे अधिक प्रभावित अमेरिका ने तो कोरोना वायरस के अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव को कम करने के लिए इस तिमाही में 947 अरब डॉलर कर्ज लेने की योजना तक बना ली है। कहने का सबब यह है कि हर देश कोरोना से संघर्ष के लिए उपाय खोज रहे हैं। कोरोना से निजात पाने का उपाय इसका इलाज ही है। आर्थिक उपाय तो तात्कालिक ही हैं। इसीलिए हर देश अपने नागरिकों का स्वास्थ्य परीक्षण और मरीजों की चिकित्सा पर जोर दे रहा है। संयुक्त अरब अमीरात के स्वास्थ्य मंत्री की मानें तो उनके यहां 50 लाख लोगों का कोरोना टेस्ट किया जा चुका है। वहां इस रोग से ठीक होने की दर 90 प्रतिशत है। यूएई का दावा सच है तो भी देखना होगा कि उसकी आबादी सिर्फ 96 लाख है। बड़ी आबादी के देशों में जांच भी एक बड़ा काम है। फिर मुख्य बिंदु वही कि हर देश का अपना प्राकृतिक वातावरण भी है। शायद इसलिए इस रोग का प्रसार और लोगों के ठीक होने की अलग-अलग दर भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अपने बयानों के लिए पहले भी कई देशों के निशाने पर आ चुका है। प्रारम्भ में उसपर चीन के पक्ष में रोग को छिपाने का भी आरोप लगा। इस कारण अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन को दिया जाने वाला अपना अंशदान भी बंद कर चुका है। बहरहाल, संगठन के ताजा बयान की सिर्फ इस कारण अनदेखी की जाय, ठीक नहीं होगा। हम कामना करें कि अलग-अलग जगहों पर खोजा जा रहा वैक्सीन, प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल कारगर साबित हो। तब तक तो कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए आपस में भौतिक दूरी, हाथों को ठीक तरह से धोने और मास्क पहनने को जीवन का हिस्सा बना ही लेना चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पत्रिका `यथावत' के समन्वय सम्पादक हैं।)

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Dakhal News 5 August 2020


bhopal, Ayodhya: Foundation of new chapter

  ऋतुपर्ण दवे जिस शुभ घड़ी का इंतजार था, आखिर वह आ ही गई। राममंदिर के लिए देश ने जो सपना देखा था, वह पूरा हो रहा है। देखने वाले राममंदिर को भले ही धार्मिक नजरिए से देखें लेकिन वह इससे कहीं अलग भारत की सद्भावना और शान का मुद्दा बनता गया और अंततः एक पहचान भी। राम अपने जन्मस्थान में रहेंगे, यही तो सब चाहते थे। यहां तक कि वो पक्षकार भी जिनका इससे सीधा सरोकार था। राममंदिर को लेकर देशभर में चाहे जैसे मुद्दे बनते रहे हों और वक्त की चाशनी के साथ राजनीति अलग-अलग पर्तों में जमती रही, पर सच यह है कि जन्मभूमि के मूल निवासी यही चाहते थे कि मंदिर अयोध्या में ही बने और रामलला जहां थे वहीं विराजें। अब तो राममंदिर देश की आस्था और अस्मिता से भी जुड़ गया। तभी तो 130 करोड़ की आबादी में 150 लोगों को भेजा गया निमंत्रण पूरे देश को भेजे निमंत्रण जैसा लग रहा है। इसमें सबसे खास निमंत्रण जो पूरे देश को सच में अच्छा लगा वह है बाबरी मंदिर के पक्षकार हाजी महबूब इकबाल अंसारी को बुलाया जाना। उनकी खुशी और भावना इसी से समझी जा सकती है कि वह प्रधानमंत्री को रामचरित मानस और रामनामी गमछा भेंट करेंगे। सैकड़ों वर्षों के विवादित घटनाक्रम में इससे सुन्दर दूसरा पल शायद और कभी हो भी नहीं हो सकता। यही तो भारत की खासियत है। यूं तो इस पूरे विवाद में हाजी इकबाल से पहले उनके पिता हाशिम अंसारी राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे पुराने पक्षकार थे, जिनके 2016 में निधन के बाद इकबाल अंसारी बने लेकिन इस पूरे मामले में देश में जहां-तहां भले ही कई बार तनाव की स्थितियां बनीं परन्तु बाबरी मस्जिद के दोनों पक्षकारों की मित्रता हमेशा चर्चाओं में रही। सभी ने देखा कि कई मौकों पर इस विवाद के दोनों पक्षकारों की करीबी मित्रता हैरान करती रही। परस्पर विरोधी पक्षकार होकर भी दोनों अभिन्न मित्र अंत तक बने रहे। मंदिर हर भारतीय का है, यह बात इससे भी साबित होती है कि डेढ़ सौ आमंत्रितों में एक दूसरे मुस्लिम भी हैं जिन्हें लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए पद्मश्री भी मिल चुका है, वह हैं पद्मश्री मोहम्मद शरीफ। यही तो भारत की रवायत है। वाकई मंदिर सबका है। कुछ भी हो जो सर्वमान्य हल सर्वोच्च न्यायालय ने दिया, निश्चित रूप से एक नजीर भी है और समाधान भी। 5 अगस्त बुधवार को उसी नजीर पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राममंदिर की आधारशिला रख लंबे समय से विवादित मुद्दे के समाधान की बुनियाद पर नई इमारत की आधारशिला रख, स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक नई इबारत लिखेंगे। राम सबके हैं, देश राम का है। यही भावना इस कार्यक्रम में भी साफ झलक रही है। महज 150 आमंत्रितों को इतने बड़े देश से चुनना बेहद मुश्किल भरा काम था जिसे आयोजकों ने बखूबी निभाया। इन चुनिंदा लोगों को भेजे गए आमंत्रण भी अपने आप में देश का एक ऐतिहासिक दस्तावेज होने जा रहा है। जो भारत का एक यादगार व हमेशा संजोकर रखा जाने वाला आमंत्रण होगा जिसको देखने के लिए भी लोग उमड़ेंगे। यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या, सरयू के तट पर स्थित देश के सुन्दर नगरों में शुमार है। जिसकी भव्यता पहले भी कम न थी और अब देखते ही बनेगी। वैसे भी अयोध्या का इतिहास बेहद संपन्न रहा है। यह देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए भी एक मिसाल जैसा है क्योंकि जहां बौध्द धर्मावलंबी इस जगह को साकेत कहते हैं, वहीं सिख और जैन भी अपने-अपने रिश्ते बताते हैं। जबकि साढ़े 400 सालों से ज्यादा वक्त तक बाबरी मस्जिद भी यहीं रही। कुल मिलाकर अयोध्या भारत की सर्वधर्म समभाव की पावन स्थली बन चुकी है और कहा जा सकता है कि भगवान राम की ही महिमा थी जो सभी धर्मों की आस्था यहां जुड़ती चली गई और अंत में वापस भगवान अपने धाम में भव्यता से विराजमान होकर अलग संदेश देकर देश के लिए एक नए युग का सूत्रपात करेंगे। समय के चक्र के साथ अयोध्या में रामलला विराजमान ने भी कई दौर देखे। अंततः 9 नवंबर 2019 को देश के इतिहास में आए पहले बहुप्रतीक्षित महा ऐतिहासिक फैसले ने जैसे बड़ी सहजता से सबकुछ हल कर दिया और रामजन्म भूमि विवाद का पटाक्षेप कुछ यूं हुआ कि कई दिनों तक लगा कि जैसे कोई सपना तो नहीं? कोरोना के चलते आयोजन की भव्यता में तो कोई कमी नहीं आई लेकिन साक्षात उपस्थिति पर जरूर विराम लग गया। बावजूद कोशिश यह दिखी कि वे लोग जरूर शामिल हों जो सीधे तौर पर पूरे मामले से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। तभी तो अयोध्या में रहने वाले उन परिवार के सदस्यों को भी बुलाया गया, जिनके परिवार के लोग उस दौरान गोलियों से मार दिए गए थे। सिख, बौद्ध, आर्यसमाजी, जैन, वैष्णव सभी परंपरा के लोग भूमि पूजन में आ रहे हैं। उम्रदराज लोगों को जरूर स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्हें बताकर दूर रखा गया है। इस कार्यक्रम में देश के लगभग 2000 पावन तीर्थस्थलों की पवित्र मिट्टी और लगभग 100 पवित्र नदियों का जल पहले ही भूमिपूजन के लिए जन्मस्थल पर पहुंच चुका है। राममंदिर का भूमिपूजन देश की आस्था, विश्वास और पहचान का प्रतीक चुका है। तभी तो पक्ष तो ठीक, पक्षकार और विपक्ष का भी खुला समर्थन मिलने लगा है। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अयोध्या में भव्य राममंदिर बनाए जाने की शुरुआत का स्वागत करते हुए खुद को रामभक्त बताते हुए अपने घर पर राम दरबार सजाने और हनुमान चालीसा का पाठ किए जाने का आह्वान कर अच्छा संदेश दिया है। भारत में 5 अगस्त 2020 की नई सुबह उस कसम या संकल्प को पूरा होते देखने वाला ऐतिहासिक दिन होगा जो देश ही नहीं दुनिया के इतिहास का अजर, अमिट व रत्नजड़ित पन्नों पर स्थाई रूप से दर्ज दिन होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 August 2020


bhopal, Ayodhya: a symbol of cultural splendor

  डॉ. रामकिशोर उपाध्याय अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होने जा रहा है। पांच अगस्त का दिन भारत के लिए सांस्कृतिक महत्व का दिन है। यह शिलान्यास केवल राममंदिर का ही नहीं अपितु उस प्राचीन संस्कृति के पुनर्निर्माण का भी है जिसने प्राणियों में सद्भावना-हो और विश्व का कल्याण-हो कहकर लोकमंगल की कामना की है। शरणागत को आश्रय देने वाली और वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाली सभ्यता के पथ को फिर से बुहारे जाने का यह क्षण ऐतिहासिक होने जा रहा है। भारत के प्रधानमंत्री स्वयं वहाँ उपस्थित रहेंगे और रहना भी चाहिये, हमारे सविधान की मूल प्रति में राम जी सांस्कृतिक वैभव के रूप में सचित्र विराजमान हैं। अपनी संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य भी है। विडंबना यह है कि वोटबैंक के लिए राम को भी पार्टी और विचारधारा से जोड़कर विवाद खड़े किये जाते रहे हैं। इस बात पर प्रत्येक भारतवासी को गर्व होना चाहिए कि केवल हमीं ऐसे देश हैं जिसके पास अपने पूर्वजों की हजारों वर्ष पुरानी गौरवमयी वंशावली सुरक्षति है। रामायण काल के भूगोल पर भी अनेक अनुसंधान हुए हैं। कनिंघम की एन्शेन्टिक डिक्शनरी से लेकर पंडित गिरीशचंद्र (लन्दन के एशियाटिक सोसाइटी जनरल) तक लेखों की एक लम्बी श्रृंखला है। मध्यकाल में आक्रान्ताओं ने पुस्तकालयों में आग लगा दी, भगवान् राम-कृष्ण, महावीर, बुद्ध आदि देवों के मंदिर तोड़ डाले, भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान मिटाने का हरसंभव प्रयास किया गया। उसके बाद पूरे भारत में हिन्दुओं (सिक्खों और मराठों) का शासन पुनः स्थापित होता कि उसी समय अंग्रेजों का आक्रमण हुआ। उन्होंने ऐसे भ्रामक सिद्धांत गढ़े और पाठ्यक्रमों में पढ़ाये कि भारत का जनसमूह आत्मविस्मृति को प्राप्त होने लगा। अंग्रेजों ने सिखाया भारत निर्धन और असभ्यों का देश है, इनपर विदेशी लोग सदियों से शासन करते आये हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत के नीति निर्माताओं ने भी धर्म के स्थान पर संस्कृति को ही अधिक महत्व दिया। समस्या तब उत्पन्न हुई जब कुछ लोगों ने इसे धर्म के साथ-साथ संस्कृति निरपेक्ष भी बनाना प्रारम्भ कर दिया। संस्कृति किसी भी देश का प्राण होती है, वह हजारों-लाखों वर्षों की संचित पूँजी होती है। कहा जाता है कि यदि किसी देश का अस्तित्व समाप्त करना हो तो उसकी भाषा और संस्कृति को समाप्त कर दो। प्रत्येक देश के पूर्वजों के साथ उस देश का इतिहास और संस्कृति भी जुड़ी होती है। राम भारत की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के प्रतीक हैं। भारत की पहचान राम से है, बुद्ध, कृष्ण, महावीर आदि अवतारी पुरुषों से है। यदि इन देवतुल्य महापुरुषों/ भगवानों को जनमानस की स्मृति से मिटा दिया जाये तो शेष भारत के पास अपनी पहचान के नाम पर बचेगा क्या? महर्षि वाल्मीकि भारत के ही नहीं मानव इतिहास में आदि कवि हैं और रामायण प्राचीन ग्रंथों में से एक है। रामायण (24 हजार श्लोक, पांच सौ सर्ग और सात कांड) के बारे में कहा जाता है “काव्यबीजं सनातनम” अर्थात रामायण समस्त काव्यों का बीज है। विमर्श इस बात पर होना चाहिए कि महर्षि वाल्मीकि जी के समय सम्पूर्ण संसार में और कौन-कौन ऐसे कवि हुए हैं। भगवान राम के समय संसार के अन्य देशों में भी कोई ऐसा प्रतापी राजा हुआ है, यदि नहीं तो राम जी को संसार का पहला महान राजा माना जाना चाहिये। जिन्होंने सर्वप्रथम मानव जाति के लिए उच्च मूल्यों की स्थापना की। लंका विजय के पश्चात् न राज्य छीना, न नगर लूटा और न वहाँ की धरोहरें नष्ट कीं अपितु राज्य रावण के भाई को ही दे दिया। बाली का वध किया, राज्य सुग्रीव को दे दिया और अंगद को युवराज बना दिया। समाज के वंचित वर्ग और निर्धन वनवासी तक को अपने परिवार का अंग माना। माता शबरी हों (जनजाति) हो या मित्र निषाद राज न कोई भेद न कोई अहंकार। राम की अयोध्या में कोई निर्धन नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई प्रताड़ित नहीं, असत्य और अन्याय का कोई स्थान नहीं। क्या संसार के किसी भी देश या जनसमूह के पास ऐसे उच्च आदर्श वाले चरित्र, राज्य और नगर हैं? यदि हैं तो उनके सद्गुणों का भी उद्घाटन किया जाना चाहिए। यूरोप अफ्रीका आदि देशों में उस युग में लोग क्या करते थे, उनके जीवन मूल्य और जीवन स्तर क्या था? दशरथ जी के दरबार में आठ मंत्री थे, अयोध्या बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। उसके राजमार्ग पर पुष्प बिखेरे जाते थे और नित्य जल छिड़का जाता था (मुक्तपुष्पावकीर्णेन जल सिक्तेन नित्यशः)। वहाँ व्यवस्थित बाजार हैं, सभी कलाओं के शिल्पी हैं, नगर के चारों ओर गहरी खाई खुदी हुई है और सैकड़ों शतघ्नी (तोपें) भी लगी हुई हैं। वाल्मीकि जी ने अयोध्या का जो वर्णन किया है वह एक अति उन्नत, समृद्ध अन्तरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र भी है। कालान्तर में यह केंद्र दुर्बल होता गया, मुग़लकाल में इसे पूर्णतः ध्वस्त कर दिया गया। आज उसी सांस्कृतिक केंद्र का पुनर्निर्माण होने जा रहा है। यह क्षण केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक भारतवासी के लिए गौरवपूर्ण है, क्योकि अपने पूर्वजों का यशगान तो सभी को प्रिय होता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 August 2020


bhopal, New India , Nehruvian ideology

  डॉ. अजय खेमरिया अयोध्या में राममंदिर भूमिपूजन को लेकर जो रुदन बुद्धिजीवियों, रामद्रोही सियासी चेहरों द्वारा किया जा रहा है उसके निहितार्थ बहुत ही गहरे हैं। यह भूमिपूजन भारत के लिए केवल एक मंदिर भर का महत्व नहीं रखता है बल्कि 100 साल के आत्मगौरव से अलगाव और वाम आवरण से मुक्ति का महापर्व भी है। लगभग 500 साल तक चले एक अनथक संघर्ष की लोकतांत्रिक विजय का स्वर्णिम पर्व भी है अयोध्या में भव्य राममंदिर का भमिपूजन।   कुतर्क खड़े किए जा रहे हैं कि मंदिर के भूमिपूजन में पीएम क्यों आ रहे हैं? कोरोनो संक्रमण में इस आयोजन का औचित्य क्या?संघ परिवार इस मंदिर निर्माण का श्रेय क्यों ले रहा है? मंदिर तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर बनाया जा रहा है? कभी दलित, पिछड़े प्रतिनिधित्व को लेकर मंदिर ट्रस्ट पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हाईकोर्ट में बकायदा याचिका दाखिल कर इस कार्यक्रम को रुकवाने के प्रयास किये गए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता की तरह लोक संभाषण करने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी ने 5 अगस्त के मुहूर्त पर भी सवाल खड़े कर इस आयोजन को विवादित करने के पुरजोर प्रयास किये।   असल में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भमिपूजन के साथ सेक्यूलर राजनीति को उत्पन्न सियासी खतरे को भी समझने की जरूरत है। यह निर्विवाद तथ्य है कि राममंदिर आंदोलन को बीजेपी ने अपने एजेंडे में शामिल कर एक देशव्यापी स्वीकार्यता प्रदान की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समारोह में आने पर सवाल विपक्षी असुरक्षा का भान भी कराता है। सवाल कभी यह नहीं उठाया गया कि नेहरू ने सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में भाग क्यों नहीं लिया? क्यों राजेन्द्र बाबू, केएम मुंशी, सरदार पटेल पर नेहरू ने हिन्दू पुनरुत्थानवाद के आरोप लगाये? तब जबकि सरदार पटेल ने सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा की अनुमति महात्मा गांधी से प्राप्त की थी। गांधी जी ने सरकारी धन के स्थान पर जनसहयोग से इस काम को करने का आदेश दिया था, कमोबेश राममंदिर निर्माण के लिए भी मंदिर ट्रस्ट ने गांधी जी के इसी परामर्श को अपनाया है।   असल में अयोध्या प्रकरण हिन्दू पुनरुत्थानवाद का नहीं भारत के स्वत्व का प्रकटीकरण है और यही "भारत" विचार के दुश्मनों की बुनियादी समस्या है। आज के भारत में सामाजिक जीवन का हर पक्ष इस 'स्वत्व' से खुद को आलोकित महसूस कर रहा है। इसके चलते वह बड़ा वर्ग अलग-थलग पड़ गया है जिसने प्राचीन भारत को आजादी के बाद लोकमानस से विलोपित कर केवल मध्यकालीन मुगलिया इतिहास को प्रतिष्ठित किया है। हमारे सनातन मान बिन्दुओं का एक सुनियोजित राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए मानमर्दन किया। वैसे भी मार्क्स का स्पष्ट मत रहा है कि मार्क्सवादी केवल इतिहास की व्याख्या नहीं करते हैं बल्कि उसे बदलने के लिए बने हैं। जैसा कि बिपिन चन्द्र कहते हैं- "मार्क्सवादियों के काम को विचारक और राजनीतिक काम के संगठनकर्ताओं के रूप में अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। वर्तमान समाज और सँस्कृति को उखाड़कर भारत में क्रांति लाना ही हमारा लक्ष्य है।"   1962 बिपिन चन्द्र जब यह घोषणा कर रहे थे तब वे नेहरू के मानस पुत्र बनकर ही बोल रहे थे। जाहिर है इन 70 सालों में वामपंथ और कांग्रेस में सक्रिय इन चेहरों ने नेहरू के एजेंडे को, शिक्षक, इतिहासकार या दार्शनिक के तौर पर नहीं बल्कि सियासी कार्यकर्ता बनकर आगे बढ़ाया है। आज की पूरी कांग्रेस इसी नेहरूवादी मार्क्सवादी परम्पराओं का बिंब है। अयोध्या और राम के सवाल इन संगठित उदारवादियों और बहुलतावादी ब्रिगेड के लिए शूल की तरह चुभते रहे हैं। यही कारण है कि भारत की सरकार अपने अधिकृत हलफनामे में राम के अस्तित्व को नकार देती है। "राम" और "अयोध्या" के सवाल असल में सेक्युलरिज्म के उस विद्रूप चेहरे से उपजे विवाद हैं जिसने धर्म को रिलीजियन बनाकर भारत की हजारों साल की सनातन जीवन पद्धति को स्थानापन्न करने में लंबे समय तक सफलता हांसिल की। नेहरू इस पाप के अधिष्ठाता थे और गांधी, सरदार पटेल, राजेंद्र बाबू, केएम मुंशी, तिलक, अरविन्द जैसे राष्ट्रवादी लोगों के अवसान के बाद साम्यवादी रंग में रंगे नेहरू ने भारत के सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विमर्श में "राष्ट्र" की अवधारणा के तत्व को ही तिरोहित करा दिया। भारत के जिस स्वत्व यानी आत्मगौरव को पीढ़ीगत रूप से प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए था उसके स्थान पर सेक्युलरिज्म के नकली और आत्म विलग तत्व को राजकीय सरंक्षण में सुस्थापित करने के लिए नेहरूवाद को आगे किया गया। वामपंथी लिबरल गैंग ने 70 साल तक बेताज बादशाह की तरह इस क्षेत्र में काम किया। जेएनयू, एएमयू, जामिया, जाधवपुर से लेकर लगभग सभी सरकारी शिक्षण संस्थानों में इस वर्ग का एकाधिकार रहा।   यह सर्वविदित तथ्य है कि इतिहास और संस्कृति की मौलिकता को राजकीय संरक्षण में जमींदोज करने के सुगठित प्रयास एक समय के बाद खुद बेमानी और प्रभावहीन हो जाते हैं। सेक्युलरिज्म की नेहरू वैचारकी भी आज इसी दौर से गुजर रही है। वैसे भारत ने भी रूसी मॉडल के उलट 1991 में ही उदारीकरण की राह पकड़कर सैद्धान्तिक रूप से साम्यवादी समाजवाद को छोड़ दिया था। लेकिन राजव्यवस्था के सभी स्तरों खासकर न्यायपालिका, साहित्य, कला, इतिहास, सँस्कृति, समाजकर्म, विश्विद्यालय, अभिनय और पत्रकारिता के क्षेत्रों में साम्यवादी जमात की पकड़ बनी रही है।   राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से वामपंथ के उखड़ने का असल सिलसिला 2014 में नरेंद्र मोदी के उद्भव के साथ आरम्भ हुआ है। 2014 से 2020 का सफर भारत के स्वत्व के लोकतांत्रिक प्रकटीकरण का दौर भी है लेकिन उलटबांसी यह है कि देश में संवैधानिक प्रक्रिया से दो बार चुनकर आए एक प्रधानमंत्री को उनके विरोधी अपनी अधिमान्यता देना नहीं चाहते हैं। वे आज के भारत को एक खतरे के रूप में प्रचारित कर रहे हैं जो अपने आत्मगौरव पर सीना चौड़ा कर रहा है। मुगलिया और औपनिवेशिक इतिहास के स्थान पर नया भारत राम को अपनी पहचान के साथ संयुक्त करना चाहता है। सेक्युलरिज्म की कोख से निकली अल्पसंख्यकवाद की राजनीति भी अब 2014 के बाद मुँह के बल गिर गई है। यूपी के चुनावी नतीजे इसकी बानगी है।   बुनियादी रूप से अगर देखा जाए तो राममंदिर का विवाद मूलतः सेक्युलरिज्म का खड़ा किया संकट ही था। 1989 तक आते-आते यह आंदोलन दो पक्षों के बीच था और वे आपसी सुलह से भी इसे निराकृत करने के करीब आ सकते थे। लेकिन राम और भारतीय संस्कृति के दुश्मन वामपंथी वर्ग ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से अल्पसंख्यकवाद के हथियार के रूप में लिया। अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने और मुस्लिम वर्ग को सद्भभाव से अलग करते हुए कट्टरता की आग में झोंक दिया। पूरी दुनिया में किसी विश्वविद्यालय का ऐसा कलुषित इतिहास नहीं है जैसा जेएनयू का इस मामले में प्रमाणित है। 1989 में रोमिला थापर, हरबंस मुखिया, विपिन चंद जैसे 25 इतिहासकार और शिक्षकों ने जेएनयू के "सेन्टर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज" से बकायदा एक पत्रिका प्रकाशित की। "द पॉलिटिकल एब्यूज ऑफ हिस्ट्री" नामक इस प्रकाशन में उस समय के तथाकथित बड़े बुद्धिजीवियों ने अयोध्या प्रकरण को फर्जी और साम्प्रदायिक बताकर राम एवं अयोध्या के अस्तित्व को ही खारिज कर दिया। यूपीए सरकार में राम को काल्पनिक बताने वाला हलफनामा इसी प्रकाशन का हिस्सा था।   इस घटनाक्रम से मुस्लिमों को बल मिला और उन्हें लगा कि भारत के प्रमुख नीति निर्धारक लोग उनके साथ हैं। जबकि जेएनयू का यह कृत्य बगैर ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित केवल उसी नेहरुवादी मानसिकता का प्रलाप था जो भारत की मौलिक सांस्कृतिक निधि से दुश्मनी पर अबलंबित रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रिटायर्ड निदेशक के मोहम्मद ने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट लिखा है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों और कुछ अंग्रेजी अखबारों ने राममंदिर को लेकर मुस्लिम समाज में झूठ और मनगढ़ंत धारणाओं को स्थापित किया, नहीं तो 1989 से 1991 के दौरान ही इस विवाद का पटाक्षेप हो गया होता। उनका दावा है कि मुस्लिम समाज शांतिपूर्ण तरीके से ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अयोध्या से अपना दावा छोड़ने को राजी हो सकता था। लेकिन जेएनयू के इस तरह सामने आने से मामला बिगड़ गया। जिन 25 इतिहासकारों ने इस कुचक्र को रचा उनमें सव्यसाची भट्टाचार्य, सुबीरा जायसवाल, के एन पन्निककर, सतीश अग्रवाल, के मीनाक्षी, मुजफ्फर अलीबाग, केके त्रिवेदी, हिमांशु रे जैसे लोग भी शामिल थे जो सरकारी सिस्टम का हिस्सा रहे हैं। अयोध्या को लेकर इन बुद्धिजीवियों ने दावा किया कि अयोध्या राम की जन्मभूमि है ही नहीं। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि राम अयोध्या में हुए। अयोध्या का कोई ऐतिहासिक उल्लेख नहीं है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि अयोध्या में मीर बांकी ने किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद खड़ी की। बाबर बहुत ही सहिष्णु था और वह अन्य धर्मों का बहुत आदर करता था। ऐतिहासिक अध्ययन से यह भी कभी साबित नहीं हुआ है कि मुगल शासकों ने कभी हिन्दू मंदिर तोड़े। ऐसे ही तमाम दावे इस प्रकाशन में किये गए। खास बात यह कि इन दावों के पीछे कोई तथ्य पेश नहीं किये गए। उल्टे देश की राजनीति को संबोधित करते हुए सीधा कहा गया कि "हम कम्यूनल राजनीति को देश में सफल नहीं होने देंगे।"   अब जबकि देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस वाम थ्योरी को नकारकर राम और अयोध्या दोनों के ऐतिहासिक अस्तित्व को स्वीकृति दे दी है तब इस लिबरल गैंग को अदालत पर भी भरोसा नहीं रहा। रोजाना सुनवाई के कोर्ट के निर्णय पर सवाल खड़े किए गए, जस्टिस मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग तक की पहल की गई, फिर जब निर्णय राम के पक्ष में आया तो चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की निष्पक्षता को भी नहीं बख्शा गया। निर्णय के बाद मोदी सरकार ने जिस सख्ती से देश की कानून व्यवस्था को संभाला उसने भी नए सशक्त भारत का अहसास कराने का काम किया।   वस्तुतः अयोध्या में भव्य राममंदिर का भूमिपूजन भारत के उस नए और मौलिक स्वरूप का उद्भव भी है जो पूरी दुनिया में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर रहा है। नए भारत में अब लोग अपनी संस्कृति पर हीनता नहीं बल्कि गर्व महसूस कर रहे हैं, वे नेहरुयुगीन संसदीय राजनीति के बोझ को नहीं ढोना चाहते।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 August 2020


bhopal,Importance of technology in Indian agriculture

  कैलाश चौधरी भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। उसी प्रकार भारतीय कृषि भी उतनी ही प्राचीन है। प्राचीन भारतीय किसान बहुत अमीर थे क्योंकि उस वक्त कृषि अपने आप में सबसे उन्नत एवं सम्मानित व्यवसाय था। आज भी आबादी का पच्चास प्रतिशत हिस्सा कृषि एवं संबंधित व्यवसायों पर ही निर्भर है। विदेशी आक्रमणकारियों एवं शासकों के कारण भारतीय परंपरायें, रीति-रिवाज, धार्मिक प्रथायें और इनके साथ-साथ कृषि भी प्रतिकूल तरीके से प्रभावित हुई और हमारी उन्नत कृषि अन्य देशों की तुलना में पिछड़ गयी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पिछली सदी में हमारा देश हमारे किसानों और कृषि क्षेत्र से संबंद्ध कार्यशक्ति के कारण खाद्यान्न, कपास, चीनी, दूध, मांस और पॉल्ट्री उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर बन गया है। आज भारत अनाज, दूध, चीनी, फल-सब्जियां, मसालों, अंडे आदि का प्रमुख उत्पादक बन गया है। चावल, मांस और समुद्री उत्पादों का कुल निर्यात में 52 प्रतिशत हिस्सा है। यद्यपि भारत के पास दुनिया की भूमि का सिर्फ 2.4 प्रतिशत हिस्सा ही है लेकिन हमारे पास दुनिया में अनुपातिक रूप से अधिक कृषि योग्य भूमि है जो देशवासियों की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है। साथ ही हम अपने निर्यात के माध्यम से दुनिया भर में खाद्य उत्पादों की आपूर्ति भी कर सकते हैं।  मोदी सरकार ने 2022 तक निर्यात मूल्य को दोगुना करने के लिये नई निर्यात नीति का शुभारंभ किया है। सरकार यूएसडी के निर्यात मूल्य को तीस बिलियन से बढ़ाकर 60 बिलियन अमेरीकी डॉलर करने की योजना बना रही है। कृषि से संबंधित मुद्दों को ध्यान रखने के लिये एक व्यापक कृषि नीति का आगाज किया गया है और इसी के तहत कई भारतीय दूतावासों में एग्री सेल बनाये गये हैं। सरकार ने कृषि संबंधित उत्पादों की माल ढुलाई एवं कोरियर सेवाओं के क्षेत्र में नवाचारों के माध्यम से इनका विकास करने का निश्चय किया है। वर्तमान सरकार के प्रयासों के कारण कृषि और कृषित्तर उत्पादों का निर्यात बढ़कर 2.73 लाख करोड़ हो गया है। आज भारत के पास दुनिया को खाद्य आपूर्ति करने की क्षमता है। भारत का अनुकूल जलवायु क्षेत्र, विशाल कृषि योग्य भूमि, हमारे मेहनती कृषक आदि ऐसे कारक हैं जो निश्चित ही हमारे कृषि निर्यात को बढ़ावा देंगे। भारतीय किसानों को अन्य देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा हेतु बेहतर रूप से तैयार करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों के सहयोग से नई और उन्नत तकनीकों को अपनाने के अवसर प्रदान किये जा रहे हैं और इस क्षेत्र में अधिक विकास की आवश्यकता है। अधिक उत्पादन करने वाली विभिन्न किस्मों के विकास के लिये अनुसंधान को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है। हमारा औसत राष्ट्रीय उत्पाद अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है और इसे बढ़ाने के लिये हमें निश्चित ही प्रौद्योगिकी का सहारा लेना पड़ेगा। दुनिया की उन्नत कृषि तकनीकों का उपयोग कर उत्पादन के मामले में दुनिया के साथ कदमताल मिलाने के लिये हमारे किसान भाइयों को उन्नत तकनीकी कौशलों का प्रयोग करना आवश्यक है। निजी निवेशकों को भी निर्यातोन्मुखी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। आधारभूत ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण कार्य करने होंगे। गोदाम, शीत भंडारगृह, मार्केट यार्ड आदि जैसे ढांचागत विकास कार्यों से खाद्य पदार्थां की क्षति में कमी जा सकेगी। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देकर हम मूल्य संवर्धित सेवाओं को प्रोत्साहन दे सकते हैं। हमारे उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाकर हम अन्य देशों को हमारे खाद्य पदार्थ आयात करने के लिये आकर्षित कर सकते हैं। इस प्रकार के विभिन्न उपायों से ‘ब्रांड इंडिया’ को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी। निर्यात बाधाओं में चुनौतियों का सामना करने के लिये राज्य और केन्द्र के समवेत प्रयासों की आवश्यकता है। केन्द्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में नये वित्तीय पैकेज की भी व्यवस्था की गई है ताकि किसानों को हरसंभव मदद मिल सके और उनकी आय दोगुनी करने का सरकार का लक्ष्य पूर्ण हो सके। किसानों को अधिक लाभ देने के लिये सरकार कृषि व्यवसाय को बढ़ावा दे रही है। अमेजन, अलीबाबा, ई-बे, वालमार्ट जैसी ई-कॉमर्स ऐजेंसियों ने आर्टीफिसियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग के माध्यम से व्यापार की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं। ई-कॉमर्स की इस क्रांति की तरह ही ई-कृषि/डिजीटल एग्रीकल्चर का एक प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है, जिससे कृषि व्यवसाय योजना प्रमुख शहरी एवं कस्बाई क्षेत्रों में भी पहुंच जायेगी। बिग बास्केट एवं ग्रोफर्स जैसी होम डिलीवरी ऐजेंसियों ने कृषि विशेषज्ञों की मदद से अपने स्वयं के लाभदायक कृषि व्यवसाय विकसित करने की राह प्रशस्त की है। ग्रीन फार्म हाउस, पॉलीहाउस, विशेष सब्जियां उगाने के लिये छोटे जैविक फार्म आदि जैसे कृषि नवाचार गुणवत्ता एवं उचित मूल्य के कारण किसानों के लिये लाभदायक बन रहे हैं। जैविक खेती आजकल महिला कृषकों में भी लोकप्रिय हो रही है। आज कृषि व्यवसाय योजना को कृषक एक व्यवसायी के तौर पर एक स्टार्ट-अप के रूप में आरंभ कर सकता है और स्थायी आय के स्रोत के रूप में इनका विकास कर अपने उत्पादों को खुल बाजार में बेच सकता है। औषधीय पौधों जैसे कि ऐलोवेरा, नीम, तुलसी आदि का चिकित्सकीय एवं फार्माक्यूटिकल क्षेत्रों के लिये बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है। सरकार की तरफ से वे हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं, जिससे किसानों को उपने उत्पाद उनकी इच्छानुसार बेचने की आजादी और सुविधा मिल सके। भारत सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार और ग्रामीण विकास के लिये बेहतर मार्ग बनाने के लिये नवाचारों और उन्नत वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा दे रही है जिससे समावेशी विकास हो सके। कुछ महत्वपूर्ण उन्नत कृषि तकनीकें जो भारतीय कृषि का कायापलट कर सकती हैं वे इस प्रकार हैं- 1. जैव प्रौद्योगिकी- यह ऐसी तकनीक है जो किसानों को उन्नत कृषि पद्धतियों का उपयोग कर कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन में सहयोग करती है। यह पर्यावरण के अनुकूल तकनीक भी है और इससे पौधों एवं पशु अपशिष्ट का उपयोग कर खाद्य उत्पादन को बढावा देने में सहयोग मिलता है। 2. नैनो विज्ञान- यह एक ऐसी तकनीक है जो स्मार्ट डिलीवरी सिस्टम और नैनो सेंसर के माध्यम से किसानों को इस बात की जानकारी देती है कि पानी और आवश्यक तत्व पौधों को पर्याप्त रूप से मिल रहे हैं या नहीं। साथ ही यह उत्पादित भोजन की गुणवत्ता की जानकारी भी देती है। 3. भू-स्थानिक खेती-  इसकी सहायता से बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। खरपतवार, मिट्टी की गुणवत्ता एवं नमी, बीज की उत्पादन दर, उर्वरक आवश्यकताओं एवं अन्य कारकों के आधार पर उच्च उत्पादन किया जा सकता है। 4. बिग डेटा- बिग डाटा से स्मार्ट कृषि होगी और किसानों को समय पर सही निर्णय लेने में सहायता प्राप्त होगी। इससे पूर्वानुमान में मदद मिलेगी जिससे कृषि विकास मजबूत होगा। 5. ड्रोन्स- ये निगरानी कार्य के माध्यम से कम लागत एवं कम नुकसान का काम कर उत्पादन बढ़ाने में सहायता करते हैं। उन्नत सेंसर, डिजिटल इमेजिंग की क्षमता, मिट्टी का विश्लेषण, फसल स्प्रेंइंग, फसल निगरानी, फंगस संक्रमण सहित फसलों के स्वास्थ्य का विश्लेषण ड्रोन तकनीक के माध्यम से संभव है। कृषि और अन्य कार्यां के लिये आवश्यक अनुमति केन्द्र सरकार से अभी मिलनी बाकी है। अभी हाल ही में राजस्थान में हुए टिड्डी हमले जैसी आपदाओं में भी ड्रोन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दुनियाभर में व्याप्त कोरोना महामारी के संकट को हम एक अवसर के रूप में प्रयुक्त कर सकते हैं क्योंकि इस महामारी के कारण पूरे विश्व में खाद्य पदार्थों की कमी को लेकर चिंता है। इसी चिंता की वजह से मांग और आपूर्ति में भारी अंतर आने लगा है क्योंकि लोग खाद्य पदार्थों का भंडारण करने लग गये हैं। ऐसी स्थिति को हम भारतीय एक अवसर के रूप में काम में लेकर इस तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे हमारे किसानों की आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो। ये उपाय हमें स्वतः ही सन 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का अवसर प्रदान करेंगे और भारत को कृषि क्षेत्र में भी एक अहम स्थान प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आज विज्ञान एवं तकनीक का जमाना है। हमें भी समय के साथ चलते हुए तकनीकों का इस्तेमाल कर हमारी कृषि का इस तरह विकास करना चाहिये ताकि प्रौद्योगिकी हमारी मददगार बन सके और प्रौद्योगिकी के माध्यम से हम समावेशी कृषि विकास का वांछित लक्ष्य प्राप्त कर सके। (लेखक भारत सरकार में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री हैं।)

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Dakhal News 1 August 2020


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  याज्ञवल्क्य शुक्ला महज 34 वर्षों के बाद भारत में पुनः नई शिक्षा नीति लागू किया जाना, सराहनीय फैसला है। मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा। स्पष्ट रूप से शिक्षा को पुनः सर्वोपरि मानना इस परिवर्तन का मुख्य कारण है। शेष सभी बातें शिक्षा से नैसर्गिक रूप से आगे बढ़ेंगे।   नई शिक्षा नीति को इसरो प्रमुख रहे के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञों की समिति ने तैयार किया है और पीएम मोदी ने 1 मई को इसकी समीक्षा की थी। विद्यालयी शिक्षा में 5+3+3+4 के मजबूत शैक्षणिक ढांचे से प्रत्येक बच्चे को प्रारम्भिक काल में ही आवश्यक आधार प्राप्त होनेवाला है। इसका मूल रूप से अभाव था। बचपन की देखभाल और शिक्षा-ECCE के अंतर्गत प्री प्राइमरी शिक्षा आंगनबाड़ी और स्कूलों के माध्यम से संचालित किए जाएंगे। शिक्षा की व्यापकता अनौपचारिक पारिवारिक शिक्षा से औपचारिक शिक्षा जुड़ जाए, इसकी बहुत जरूरत थी। पूर्व में परिवार में सीख रहे बच्चे विद्यालय की नई दुनिया में अचानक प्रवेश करते हुए अनभिज्ञ से लगते थे। अब प्रारम्भ के पांच वर्ष को फॉउंडेशन स्टेज के पांच वर्ष में स्थानीय, क्षेत्रीय या मातृभाषा को समान रूप से माध्यम बनाते अनौपचारिक पारिवारिक शिक्षा के माहौल से बच्चों को आगे के प्रीपेरेटरी स्टेज के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किया जा सकेगा। स्कूली शिक्षा तीन भाषा आधारित होगी जिसमे फॉरेन लैंग्वेज कोर्स भी शामिल होंगे। स्थानीय भाषा यानी मातृभाषा में शिक्षा की उपलब्धता के तहत 8 साल तक के बच्चे किसी भी भाषा को आसानी से सीख सकते हैं और कई भाषाएँ जानने वाले छात्रों को भविष्य में करियर में भी अच्छा स्कोप मिलता है। इसलिए उन्हें कम से कम तीन भाषाओं की जानकारी दी जाए।   भारत की क्लासिक भाषा की जानकारी के तहत कक्षा 6 से 8 तक छात्रों को भारत की भाषा और उसे जुड़े इतिहास व साहित्य-संसाधन से परिचित कराया जाएगा। समृद्ध भाषाओं को बनाए रखने के लिए ये जरूरी है। भारत की विविध भाषाओं को ध्यान में रखते हुए इसे तैयार किया गया है। शिक्षा के आदान-प्रदान में ऊपर से नीचे तक तकनीक के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी गई है जो वर्तमान आवश्यकता के अनुकूल है।   नये पाठ्यक्रम के तहत नए तौर-तरीके से युक्त पहले 5 वर्ष तक के बच्चों को फाउंडेशन स्टेज में रखा जाएगा। उसके बाद के 3 साल के बच्चों को प्री-प्राइमरी स्टेज में रखा जाएगा। अगले 3 वर्ष वाले प्रिपेटरी या लैटर प्राइमरी में रहेंगे। मिडिल स्कूल के पहले 3 साल में छात्रों अपर प्राइमरी समूह में रखा जाएगा। 9वीं से 12वीं तक तक छात्र सेकेंडरी स्टेज में रहेंगे।   शिक्षकों की गुणवत्ता के लिए सेकंडरी लेवल तक शिक्षक पात्रता परीक्षा-TET लागू होना आवश्यक कदम है। राज्यों के लिए संस्था में सभी राज्यों में पठन-पाठन पर नज़र बनाए रखने के लिए स्वतंत्र ‘स्टेट स्कूल रेगुलेटरी बॉडी’ का गठन किया जाएगा। ये सभी राज्यों में अलग-अलग होगी। इसके चीफ शिक्षा विभाग से जुड़े होंगे। शिक्षक प्रशिक्षण के लिए इंटर के बाद 4 ईयर इंटेग्रेटेड बीएड के अलावा 2 ईयर बीएड या 1 ईयर बीएड कोर्स चलेंगे।   शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से हटाए जाने की बातें सराहनीय है, सिर्फ चुनाव ड्यूटी लगेगी, बीएलओ ड्यूटी से शिक्षक हटेंगे, मध्याह्न भोजन से भी शिक्षकों को मुक्त किया जाएगा। स्कूलों में एसएमसी/एसडीएमसी के साथ एससीएमसी यानी स्कूल कॉम्प्लेक्स मैनेजमेंट कमेटी बनाई जाएगी। शिक्षक नियुक्ति में डेमो, स्किल टेस्ट और इंटरव्यू को भी शामिल शामिल किया जाना गुणवत्ता के लिए सार्थक पहल है। अब नई ट्रांसफर पॉलिसी आयेगी, जिसमें ट्रांसफर लगभग बन्द हो जाएंगे, ट्रांसफर सिर्फ पदोन्नति पर ही होंगे। इससे भ्रष्टाचार एवं शिक्षकों के साथ अन्याय बंद होगा।   ग्रामीण इलाकों में केंद्रीय विद्यालयों की तर्ज पर स्टाफ क्वार्टर बनाए जाने की भी बातें की गई है। शिक्षा अधिकार अधिनियम-RTE को कक्षा 12 तक या 18 वर्ष की आयु तक लागू किया जाएगा। मिड डे मील के साथ हैल्थी ब्रेकफास्ट भी स्कूलों में दिया जाएगा।विज्ञान और गणित को बढ़ावा दिया जाएगा, हर सीनियर सेकंडरी स्कूल में गणित और विज्ञान अनिवार्य होंगे। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद - NCERT देश में नोडल एजेंसी के रूप में महत्वपूर्ण नियामक बॉडी होगी। स्कूलों में राजनैतिक व सरकार का हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो जाएगा यानी शिक्षा को उन्मुक्त रखा जाएगा।   उच्च शिक्षा में क्रेडिट बेस्ड सिस्टम लागू होगा जिससे कॉलेज बदलना आसान और सरल होगा। बीच में कोई भी कॉलेज आसानी से बदला जा सकता है। किसी भी तरह की कठोर प्रणाली दोषपूर्ण होती है तो शिक्षा में कठोर प्रणाली कैसे स्वीकार की जा सकती थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को विषयों में चयन या परिवर्तन की सुविधा देकर प्रतिभाओं को नई उड़ान देने जैसा है।   शिक्षा का यूनिवर्सल एक्सेस का सपना पूरा होगा। हयूमैनिटिज़, आर्ट्स और साइंस के बीच कोई दीवार नहीं बनने देना प्रगतिशील कदम है। सरकार का मुख्य जोर शिक्षा में समानता पर है। साथ ही सभी को गुणवत्ता वाली शिक्षा से कैसे जोड़ा जाए, इसपर जोर दिया गया है। नए फ्रेमवर्क के जरिए 21वीं सदी में ज़रूरी स्किल्स पर जोर दिया गया है। साथ ही पर्यावरण, कला और खेल जैसे क्षेत्रों को भी प्राथमिकता दी गई है। शारीरिक शिक्षा को स्थान देते हुए फिजिकल सक्रियता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। खेल, योग, मार्शल आर्ट्स, व्यायाम, नृत्य और बागबानी सम्बंधित गतिविधियों में बच्चों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी। स्थानीय शिक्षकों को इसके लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।   नेशनल रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च प्रपोज़ल्स की सफलता के आधार पर रिसर्च के लिए पर्याप्त फंड्स मुहैया कराए जाएँगे। सभी विषयों में रिसर्च को बढ़ावा दिये जाने की बात शिक्षा में अनुसंधान के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का झलक है।   (लेखक अभाविप झारखंड प्रदेश संगठन मंत्री हैं।)

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Dakhal News 1 August 2020


bhopal, Lively Village,Self-reliant India, Strong India

  डॉ. ओ.पी. चौधरी आजकल 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का नारा बुलंदियों पर है, हमारे प्रधानमंत्री का नया संकल्प आत्मनिर्भर भारत का है। यह नया संप्रत्यय या संकल्पना नहीं अपितु अत्यंत पुरानी है। राष्ट्रपिता बापू तो स्वराज की कल्पना ही आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान,आत्मगौरव और राष्ट्रबोध के रूप में करते थे। पहले हमारे गाँव आत्मनिर्भर थे। आपसी भाईचारा, सद्यव्यवहार, शालीनता, संस्कार वहाँ के जनजीवन में रचा-बसा था। लेकिन विकास, आधुनिकता, नगरीकरण, वैश्वीकरण, वर्चस्व और सत्ता की भूख ने सब निगल लिया। गाँवों की क्या गजब जीवन शैली थी, पुजारी और पशुच्छेदन करने वाले चमकटिया, सबकी अपनी-अपनी इज्जत थी, सम्मान था। कोई किसी भी जाति का हो, सबसे कोई न कोई रिश्ता था- बाबा, काका-काकी, भाई-भौजी, बूढ़ी माई, बुआ, बहिन, बड़की माई, आजी। सबकी इज्जत और मर्यादा थी। धन की असमानता कितनी भी रही हो, अट्टालिकाओं और झोपड़ियों का अंतर भले रहा हो, जात-पात, ऊंच-नीच, छुआछूत कितना भी रहा हो लेकिन दिलों में दूरी नहीं हुआ करती थी। कोई घटना-दुर्घटना होने पर गाँव का दृश्य दर्शनीय होता था। किसी बरगद वृक्ष के नीचे या किसी कुँए की जगत पर या गाँव से सटी बाग में पूरा गाँव इकट्ठा हो जाता था। दुर्घटना के दिन पूरे गाँव में चूल्हा मुश्किल से जलता था। सामान्यतया लोग एक-दूसरे की मदद करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। शादी-ब्याह, तेरही, बरही या भोज सबके आपसी सहयोग से देखते-देखते हो जाते थे, बोझ नहीं लगता था और सभी हर्षोल्लास के साथ, अपनी इज्जत समझ कर जुटे रहते थे। महिलाएं महावर लगाकर अवसरानुकूल गीत गाते हुए आह्लादित मन से खाना बनाने के साथ ही अन्य कामों को आसानी से निपटा लेती थीं और सामंजस्य और सहयोग का अद्भुत तालमेल दिखाई पड़ता था। हाथ तो सबके तंग थे। पेट मुश्किल से भरते थे लेकिन सबके चेहरे खिले रहते थे। होंठों पे मुस्कान रहती थी। दिलों में प्यार का सागर हिलोरे मारता था। गाँव में कोई भूख से नहीं मरता था। एक-दूसरे को सभी के घरों की रसोई का पता होता था। जिसके गाय-भैंस नहीं होती थी उसे भी दूध, दही या मट्ठे के लिए तरसना नहीं होता था। आज वैश्वीकरण ने गाँवों की सहजता को निगल लिया है और उन्हें विद्रूप कर दिया है। 'विकास' नाम के धोखे ने गाँवों को ठग लिया है। उनके उत्थान के कथित नारे मृगमरीचिका साबित हुये हैं। प्राकृतिक स्रोतों के अंधाधुंध दोहन से संतुलन गड़बड़ हो गया है। आज आत्मनिर्भरता का नारा दिया जा रहा है। ये नारा नया नहीं, महात्मा गांधी का स्वप्न था। बापू ने "मेरे सपनों का भारत" में पूरा खाका खींचा है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने इसपर बहुत अध्ययन किया, चिंतन किया, व्यवहार में लाये और कई योजनाओं को क्रियान्वित भी किया। आज जब कुटीर उद्योग बचे नहीं हैं, लघु उद्योग समाप्तप्राय हैं, मध्यम उद्योगों की आर्थिक स्थिति गंभीर है, बड़े सरकारी उद्योगों या उपक्रमों की नीलामी निरंतर जारी है और फिर जब आज भी हम निवेश हेतु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरफ निगाह लगाए बैठे हैं, ऐसे में भारत आत्मनिर्भर कैसे बनेगा? गाँवों में कृषि आधारित या उससे जुड़े हुए कुटीर उद्योगों की स्थापना, छोटे- छोटे कस्बों में, वहाँ उपलब्ध कच्चे माल के अनुरूप, कुटीर, लघु या मध्यम उद्योगों की स्थापना की कोई योजना अभी धरातल पर कहीं दिखाई नहीं पड़ रही है। जबतक गाँवों व छोटे कस्बों में समुचित उद्योग, सड़कें, स्वच्छ पेयजल, चिकित्सालय, शिक्षण संस्थान इत्यादि जो आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं, व्यवस्था नहीं की जाती तबतक हर क्षेत्र का समुचित व समान विकास संभव ही नहीं है। जहाँ तक मैं समझता हूँ, केवल देश या प्रदेश की राजधानियों या फिर जनपद मुख्यालय के अगल-बगल उद्योंगों को स्थापित करने से, सर्वजन कल्याण होना व देश को आत्मनिर्भर बनाना दिवास्वप्न सरीखा है। इतना ही नहीं जबतक गाँवों में, छोटे कस्बों में आवश्यकतानुरूप आधारभूत सुविधाएं स्थापित नहीं होती, तबतक हमारे गाँव व छोटे कस्बे गरीब व बीमार ही रहेंगे। दरअसल गाँवों की इस जीर्ण अवस्था के मूल में हम तथाकथित विवेकी और सभ्यजनों द्वारा केवल वहाँ के संसाधनों का दोहन करना बदले में उनके विकास व उत्थान के लिए कुछ न करना ही है। हमसे अभिप्राय हर उस नागरिक से है, वो चाहे एमपी हो, एमएलए हो, अभिनेता हो, उद्योगपति हो, व्यवसायी हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, शिल्पी हो, किंतु जो गाँवों में पैदा हुआ, पला-बढ़ा लेकिन शहर आने के बाद फिर पलट के उधर नहीं देखा, शहरों की चकाचौंध में डूब गया। इस कोरोना काल में आज शहरी चकाचौंध कुछ धूमिल हुई है और शहरों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन लगातार हो रहा है। ये पलायन जहाँ एक तरफ कुछ दुश्वारियां पैदा करेगा वहीं दूसरी तरफ गाँवों के उत्थान में मददगार होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मनरेगा का दायरा बढ़ाया जाए। इसे कृषि कार्य से जोड़ा जाए, इससे अन्न उत्पादन बढ़ेगा, पराली जलाने की समस्या का समाधान होगा, मनरेगा के द्वारा पराली एकत्र कर सरकारी गौशालाओं के लिए पुआल व भूसा (चारा) एकत्र किया जा सकता है, यह आत्मनिर्भर भारत की ओर एक श्रेष्ठ कदम होगा। विशेषकर अपना देश जो जैव विविधता से सम्पन्न है, आत्मनिर्भरता असंभव नहीं है। यह एक अच्छा अवसर है जब गाँवों को, मजरों को फिर खुशहाल किया जा सकता है। सबका कल्याण हो! हम आत्मनिर्भर बनें, भारत महान हो! (लेखक एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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Dakhal News 31 July 2020


bhopal, After all, why did Gurudev , Baba Saheb , education , mother tongue

  आर.के. सिन्हा नई शिक्षा नीति-2020 की घोषणा हो गई है। इसके विभिन्न बिन्दुओं पर बहस होगी ही। पर इसने एक बड़े और महत्वपूर्ण दिशा में कदम बढ़ाने का इरादा व्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में नई शिक्षा नीति में पाँचवीं क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को ही पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे तक भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी स्तर से होगी। नई शिक्षा नीति में यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को विद्यार्थियों पर जबरदस्ती थोपा नहीं जाएगा। यह बार-बार सिद्ध हो चुका है कि बच्चा सहज भाव से अपनी भाषा में पढ़ाए जाने पर उसे तत्काल ग्रहण करता है। जैसे ही उसे मातृभाषा की जगह किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाने लगता है, तब गड़बड़ चालू हो जाती है। जो बच्चे अपनी मातृभाषा में शुरू से ही पढ़ना चालू करते हैं, उनके लिए शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावनाएं अधिक प्रबल रहती हैं। यानि बच्चे जिस भाषा को घर में अपने अभिभावकों, भाई-बहनों, मित्रों के साथ बोलते हैं, उसमें ही उन्हें पढ़ने में उन्हें अधिक सुविधा रहती है। पर हमारे यहाँ तो कुछ दशकों से अंग्रेजी के माध्यम से स्कूली शिक्षा लेने-देने की महामारी ने अखिल भारतीय स्वरूप ले रखा था। क्या आप मानेंगे कि जम्मू-कश्मीर तथा नागालैंड ने अपने सभी स्कूलों में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही किया हुआ है? महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडू, बंगाल समेत कुछ अन्य राज्यों में छात्रों को विकल्प दिए जाते रहे कि वे चाहें तो अपनी पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी रख सकते हैं। यानि उन्हें अपनी मातृभाषा से दूर करने के सरकारी स्तर पर ही प्रयास हुए लेकिन यह स्थिति अब ख़त्म होगी। कोई भी देश तब ही तेजी से आगे बढ़ सकता है, जब उसके नौनिहाल अपनी जुबान में पढ़ाई शुरू करने का सौभाग्य पाते हैं। और, बच्चों को नर्सरी से पांचवीं कक्षा तक की प्रारंभिक शिक्षा यदि उसी भाषा में दी जाय जो वह अपने घर में अपनी माँ और दादा-दादी से बोलना पसंद करता है तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। आपको जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपने लिए खास जगह बनाने वाली अनेक हस्तियां मिल जाएंगी जिन्होंने अपनी प्राइमरी शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही ग्रहण की। इनमें गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर से लेकर प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बाबा साहब अंबेडकर शामिल हैं। गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगोर की शुरुआती का शिक्षा का श्रीगणेश अपने उत्तर कलकत्ता के घर में ही हुआ। उनके परिवार में बांग्ला भाषा ही बोली जाती थी। उन्होंने जिस स्कूल में दाखिला लिया, वहां पर भी पढ़ाई का माध्यम बांग्ला ही था। यानी बंगाल की धरती की भाषा। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की आरंभिक शिक्षा बिहार के सीवान जिले के अपने गांव जीरादेई में ही हुई। उधर तब तक अंग्रेजी का नामोनिशान नहीं था। उन्होंने स्कूल में हिन्दी, संस्कृत और फारसी पढ़ी। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कोलकात्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से ली। बाबा साहेब की प्राथमिक शिक्षा सतारा, महाराष्ट्र के एक सामान्य स्कूल से हुई। उधर पढ़ाई का माध्यम मराठी था। भारत की चोटी की इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सक्रिय लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमेन रहे ए.वी. नाईक का संबंध दक्षिण गुजरात से है। उन्हें अपने इंदहल गांव के प्राइमरी स्कूली में दाखिला दिलवाया गया। वहां उन्होंने पांचवीं तक गुजराती, हिन्दी, सामाजिक ज्ञान जैसे विषय पढ़े। अंग्रेजी से उनका संबंध स्थापित हुआ आठवीं कक्षा में आने के बाद। टाटा समूह के नए चेयरमेन नटराजन चंद्रशेखरन के नाम की घोषणा हुई। तब कुछ समाचार पत्रों ने उनका जीवन परिचय देते हुए लिखा कि चंद्रशेखरन जी ने अपनी स्कूली शिक्षा अपनी मातृभाषा तमिल में ग्रहण की थी। उन्होंने स्कूल के बाद इंजीनियरिंग की डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कॉलेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल की। यह जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण थी। खास इस दृष्टि से थी कि तमिल भाषा से स्कूली शिक्षा लेने वाले विद्यार्थी ने आगे चलकर अंग्रेजी में भी महारत हासिल किया और करियर के शिखर को छुआ। बेशक, एड गुरु और गीतकार प्रसून जोशी के पिता उत्तर प्रदेश में एक सरकारी स्कूल के अध्यापक थे। इसलिए जगह-जगह तबादले होते रहते थे। इसके चलते प्रसून ने मेरठ, गोपेश्वर, हापुड़ वगैरह के सरकारी स्कूलों में विशुद्ध हिन्दी माध्यम से अपनी स्कूली शिक्षा लेनी शुरू की थी। वे कहते हैं कि अगर उन्होंने स्कूली दिनों में हिन्दी का बढ़िया तरीके से अध्ययन न किया होता तो वे एड की दुनिया में अपने पैर नहीं जमा पाते। भारत में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने की अंधी दौड़ के चलते अधिकतर बच्चे असली शिक्षा पाने के आनंद से वंचित रह जाते हैं। दिक्कत ये है कि अधिकतर अंग्रेजी के मास्टरजी तो अंग्रेजी की व्याकरण से स्वयं ही वाकिफ नहीं होते। बहरहाल, आप असली शिक्षा का आनंद तो तब ही पा सकते हैं, जब आपने कम से कम पांचवीं तक की शिक्षा अपनी मातृभाषा में हासिल की हो। ऐसे सौभाग्यशाली लोगों में मैं भी शामिल हूँ और मुझे इस बात पर गर्व है। स्पष्ट कर दूं कि अंग्रेजी का कोई विरोध नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा या अध्ययन को लेकर कोई आपत्ति भी नहीं है। मसला यह है कि हम अपनी मातृभाषा, चाहे हिन्दी, तमिल, बांग्ला असमिया, उड़िया, तेलगू, मलयालम, मराठी, गुजरती में प्राइमरी स्कूली शिक्षा देने के संबंध में कब गंभीर होंगे? अब नई शिक्षा नीति के लागू होने से स्थिति बदलेगी। अभीतक हम बच्चों को सही माने में शिक्षा तो नहीं दे रहे थे। हां, शिक्षा के नाम पर प्रमाणपत्र जरूर दिलवा देते थे। शिक्षा का अर्थ है ज्ञान। बच्चे को ज्ञान कहां मिला? हम तो उन्हें नौकरी पाने के लिए तैयार करते रहते हैं। हमारे यहां दुर्भाग्यवश स्कूली या कॉलेज शिक्षा का अर्थ नौकरी पाने से अधिक कुछ नहीं रहा है। स्कूली शिक्षा में बच्चों को मातृभाषा से इतर किसी अन्य भाषा में पढ़ाना उनके साथ अन्याय करने से कम नहीं है। यह मानसिक प्रताड़ना के अतिरिक्त और क्या है? शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है। दूसरा, उसे उत्तम नागरिक तथा तीसरा, परिवार के पालन-पोषण करने योग्य और अंतिम सुख की प्राप्ति कराना है। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं। क्या जो शिक्षा हमारे देश के करोड़ों बच्चों को मिलती रही है उससे उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हो हुई? नहीं। इधर तो व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रहा। जब इस तरह की सोच के साथ हम शिक्षा का प्रसार-प्रचार करेंगे तो मातृभाषा की अनदेखी स्वाभाविक ही है। बहरहाल, अब लगता है कि हालात बदलेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 31 July 2020


bhopal, Gold collection , interest of economy

प्रमोद भार्गव भारत समेत पूरी दुनिया में कोरोना महामारी के चलते अर्थव्यवस्था जबरदस्त मंदी का सामना कर रही है। बाजार में धन की तरलता कम हो जाने के कारण अधिकतर देशों की माली हालत लड़खड़ा गई है और बेरोजगारी बढ़ रही है। बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर सोने की खरीद में तेजी आई हुई है। इस खरीद की पृष्ठभूमि में बैंक में जमा धनराशि की ब्याजदरों में कमी, जमीन- जायदाद और श्ोयर बाजार का कारोबार लगभग ठप पड़ जाना है। इसलिए लोग ठोस सोने- चांदी की खरीदकर संग्रह में लगे हैं। सोने में पूंजी का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। इसीलिए बीते पांच दाश्कों में सोने में 14 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। बीते एक साल में यह वृद्धि 40 प्रतिशत रही है। कुछ साल पहले रिर्जव बैंक द्वारा सोने में आयात के नियमों में ढील देने के कारण सोने का आयात बढ़ा है, जो विदेशी मुद्रा डॉलर में होता है। सोने की तस्करी भी बड़ी मात्रा में हो रही है। केरल की स्वप्ना सुरेश प्रभु नाम की महिला ही 230 किलो सोने की तस्करी मात्र बीते एक साल के भीतर कर चुकी है। इसकी कीमत 125 से 130 करोड़ बताई जा रही है। एनआईए ने खुलासा किया है कि इस मामले से जुड़े आरोपी केटी रमीज के आतंकियों से संबंध है और वह इस धन से आतंकवाद के वित्त पोषण में लगा है। इस बिना पढ़ी-लिखी महिला के तार केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर संयुक्त अरब आमीरात के महावाणिज्य दूतावास तक जुड़े हैं। जाहिर है, यदि इस अनुत्पादक और मृत संपदा में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार खप जाएगा तो निकट भविष्य में देश को विदेशी मुद्रा के संकट का सामना करना पड़ सकता है। एक समय भले ही भारत सोने की चिड़िया कहा जाता हो, लेकिन आज तो उसे अपनी जरूरतों के लिए 95 फीसदी सोना दूसरे देशों से खरीदना होता है। कच्चे तेल के बाद सोने के आयात में ही सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में मिलावटी सोना भी खूब बिक रहा है। कोरोना काल में सोने में बहुत तेजी देख्ने में आई है। सोना अब करीब 54 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया है। इससे पहले सोने के दाम इतने कभी नहीं उछले। चांदी भी 64 हजार रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। दुनिया में रफ्तार के पहिए थम जाने के कारण ऐसा लग रहा है कि इन धातुओं के दामों में फिलहाल गिरावाट आने वाली नहीं है। भारतवासियों को सोने का बढ़ा महत्व और लालच है। सोना भारतीय परंपरा में धार्मिक,सामाजिक और आर्थिक दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पूजा-पाठ से लेकर शादी में वर-वधु को सोने के गहने देना प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रतीक है। जीवन में बुरे दिन आ जाने की आशंकाओं के चलते भी सोना सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति आम आदमी में खूब है। इसलिए जैसे ही सोना सस्ता होता है,इसकी खरीद बढ़ जाता है। जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सोना डॉलर में आयात किया जाता है। इस वजह से व्यापार घाटा खतरनाक तरीके से बढ़ जाता है। इस कारण रूपए की कीमत भी गिरने लगती है। 2003 में जहां हम 3.8 अरब डॉलर सोने का आयात करते थे,वहीं देश के धनी लोगों की स्वर्ण-लिप्सा के चलते 2011-12 में यह आंकड़ा 57.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत सोने के आयात के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर हैं। 2016-17 में 771.2 टन और 2018-19 में 760.4 टन सोने का आयात किया गया। राजस्व गुप्तचर निदेश्शालय यानी डीआरआई की 2019 में आई रिपोर्ट के मुताबिक देश में सोने की तस्करी लगातार बढ़ रही है। 2017-18 में कुल 974 करोड़ रुपए का सोना पकड़ा गया। इसके अलावा कस्टम विभाग ने भी लगभग इतने ही सोने की अंतरराष्ट्रीय हवाई-अड्डों और बंदरगाहों से की। डीआरआई का मानना है कि तस्करी के जरिए जितना सोना भारत में आता है, उसका मात्र 5 से 10 प्रतिशत ही सोना पकड़ में आ पाता है। इस हिसाब से डीआरआई का मानना है कि 10 हजार करोड़ रुपए का सोना देश में तस्करी के जरिए आया है। विश्व स्वर्ण परिषद् का मानना है कि सोने पर 2.5 प्रतिशत कर बढ़ा दिए जाने के कारण तस्करी में वृद्धि हुई है। सोने की वैध खरीद पर कुल 12.5 प्रतिशत कर लगता है। सोना और इसके अभूषणों पर 3 प्रतिशत जीएसटी लगती है। इसके अलावा सोने के व्यापारी और स्वर्णकार इस पर दो प्रतिशत अलग से शुल्क लेते हैं। मसलन सब कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार से सोने के भाव में अंतर 15.5 प्रतिशत तक होता है। इस कारण तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक समग्र स्वर्ण नीति बनाने की घोषणा की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद इस पर अमल नहीं हुआ। बृहत्तर भारत में सोने का भण्डार लगातार बढ़ रहा है। यह सोना देश के स्वर्ण आभूषण विक्रेताओं, घरों, मंदिरों और भारतीय रिजर्व बैंक में जमा है। 2014-15 में ही 850 टन सोना आयात किया गया था। इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद विश्व स्वर्ण परिषद् का मानना है कि भारत के सरकारी खजाने में सिर्फ 557.7 टन सोना है। सोने के सरकारी भंडार के मामले में भारत 11वें स्थान पर है। इसके इतर इसी परिषद् का अनुमान है कि भारत में 22 हजार टन सोना घरों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों एवं पूंजीपतियों के न्यासों के पास है। गुजरे जमाने के सामंतों के पास भी अकूत सोना हैं। सोने की उपलब्धता की जानकारी देने वाली यह रपट 'इंडिया हार्ट आॅफ गोल्ड 2015’ शीर्षक से जारी की गई थी। यह रिपोर्ट विश्व के तमाम देशों में सोने की वस्तुस्थिति के सिलसिले में किए गए एक अध्ययन के रुप में सामने आई थी। अमेरिका के पास 8133.5 टन सोने के भंडार हैं। दुनिया का लगभग 32 प्रतिशत सोना भारत के पास है। 1991 में जब भारत की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी, तब तात्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर सरकार ने बैंक आॅफ इंग्लैण्ड में 65.27 टन सोना गिरवी रखकर अर्थव्यवस्था को गति दी थी। देश में सोने की मजबूत स्थिति के चलते ही, देश को सोने की चिड़िया कहा जाता है। यदि इस सोने को देश की कुल आबादी में बराबर-बराबर टुकड़ों में बांटा जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक के हिस्से में करीब आधा औंस सोना आएगा। हालांकि प्रति व्यक्ति सोने की यह उपलब्धता पश्चिमी देशों के प्रति व्यक्ति की तुलना में बहुत कम है। लेकिन विशेषकर भारतीय महिलाओं में स्वर्ण-आभूषणों के प्रति लगाव के चलते रिर्जव बैंक ने सोने की जो बिक्री शुरू की हैं, उसके चलते व्यक्तिगत सोने की उपलब्धता में और बढ़ोत्तरी होगी। वैसे भी हमारे यहां लोग धन की बचत करने में दुनिया में सबसे अग्रणी हैं। भारतीय अपनी कुल आमदनी का तीस फीसदी हिस्सा बचत खाते में डालते हैं। इसमें अकेले सोने में 10 फीसदी निवेश किया जाता है। शादियों में भी बेटी-दामाद को स्वर्ण आभूषण दान में देने का प्रचलन है, इस कारण भी सोने की घरेलू मांग देश में हमेशा बनी रहती है। इसीलिए इस कोरोना-काल में सोने के दाम आसमान छू रहे हैं। भारत के स्वर्ण बाजार को ख्याल में रखते हुए विश्व स्वर्ण परिषद् द्वारा यह रिपोर्ट इस मकसद से जारी की गई थी, जिससे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां निर्मित स्वर्ण आभूषण बाजार में पूंजी निवेश करने की संभावनाएं तलाशें। क्योंकि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय सराफा बाजार के लिए भारत के आभूषण बाजार बेहद महत्वपूर्ण हैं। वैसे सोना भारतीय समाज का अंतरंग हिस्सा है। देश में सोना जमीन-जायदाद व अन्य अचल संपत्तियों से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। घरों में सोना रखना इसलिए भी जरुरी माना जाता है, जिससे विपरीत परिस्थिति, मसलन हारी-बीमारी में सोना गिरवी रखकर नकद रकम हासिल की जा सके। सोने में बचत निवेश लोग इसलिए भी अच्छा मानते हैं, क्योंकि इसके भाव कुछ समय के लिए स्थिर भले ही हो जाएं, घटते कभी नहीं हैं। लिहाजा सोने में पूंजी निवेश को कमोबेश सुरक्षित माना जाता है। बशर्ते सोना चोरी न हो ? हालांकि अब सक्षम लोग बैंक लॉकरों में सोना रखने लगे हैं वर्तमान में उंची कीमतों के बावजूद लोग सोने में खूब निवेश कर रहे हैं। रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अनुच्छेद 33 (5) के अनुसार रिर्जव बैंक के स्वर्ण भंडार का 85 प्रतिशत भाग बैंक के पास सुरक्षित रखना जरुरी है। यह सोने के सिक्कों, बिस्किट्स, ईंटों अथवा शुद्ध सोने के रुप में रिजर्व बैंक या उसकी एजेंसियों के पास आस्तियों अथवा परिसंपत्तियों के रूप में रखा होना चाहिए। इस अधिनियम से सुनिश्चित होता है कि ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी स्वर्ण भंडार ही देश के बाहर गिरवी रखा जा सकता है अथवा बेचा जा सकता है। जबकि 1991 में इंग्लैण्ड में जो 65.27 टन सोना गिरवी रखा गया था, वह रिजर्व बैंक में उपलब्ध कुल सोने का 18.24 प्रतिशत था। जो रिजर्व बैंक की कानूनी-शर्तों के मुताबिक ही 3.24 फीसदी ज्यादा था। रिजर्व बैंक में जो सोना सुरक्षित होता है, उसका एक प्रतिशत से भी कम रिटर्न हासिल होता है। लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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Dakhal News 31 July 2020


bhopal. Chinese move to surround India

  डॉ. वेदप्रताप वैदिक   गलवान घाटी के खूनी टकराव पर चीन ने चुप्पी साध रखी है। लेकिन वह भारत पर सीधा कूटनीतिक या सामरिक हमला करने की बजाय अब उसके घेराव की कोशिश कर रहा है। घेराव का मतलब है, भारत के पड़ोसियों को अपने प्रभाव-क्षेत्र में ले लेना! चीन के विदेश मंत्री ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल के विदेश मंत्रियों के साथ एक संयुक्त वेबिनार किया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री कोरोनाग्रस्त हैं, इसलिए एक दूसरे मंत्री ने इस वेबिनार में भाग लिया। यह संयुक्त बैठक की गई कोरोना से लड़ने के उद्देश्य को लेकर उसमें हुए संवाद का जितना विवरण हमारे सामने आया है, उससे क्या पता चलता है? उसका एक मात्र लक्ष्य था, भारत को दक्षिण एशिया में अलग-थलग करना। नेपाल और पाकिस्तान के साथ आजकल भारत का तनाव चल रहा है, चीन ने उसका फायदा उठाया। इसमें उसने अफगानिस्तान को भी जोड़ लिया है। ईरान को उसने क्यों नहीं जोड़ा, इसका मुझे आश्चर्य है। वांग ने तीनों देशों को कहा और उनके माध्यम से दक्षिण एशिया के सभी देशों को कहा कि देखो, तुम सबके लिए अनुकरण के लिए सबसे अच्छी मिसाल है- चीन-पाकिस्तान दोस्ती। इसी उत्तम संबंध के कारण इन दोनों 'इस्पाती दोस्तों' ने कोरोना पर विजय पाई है। सारी दुनिया कोरोना फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा रही है लेकिन चीन उल्टा दावा कर रहा है और पाकिस्तान में कोरोना महामारी का प्रकोप दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा है लेकिन चीन द्वारा इस मिसाल का जिक्र इसीलिए किया गया है कि वह घुमा-फिराकर भारत-विरोध का प्रचार करे। वह यह भूल गया कि भारत ने दक्षिण एशियाई देशों को करोड़ों रुपए और दवाइयां दी हैं ताकि वे कोरोना से लड़ सकें। वांग ने कोरोना से लड़ने के बहाने चीन के सामरिक लक्ष्यों को भी जमकर आगे बढ़ाया। उसने अपनी 'रेशम महापथ' की योजना में अफगानिस्तान को भी शामिल कर लिया। चीन अब हिमालय के साथ हिंदूकुश का सीना चीरकर ईरान तक अपनी सड़क ले जाएगा। यदि यह सड़क पाकिस्तानी कश्मीर से होकर नहीं गुजरती तो शायद भारत इसपर एतराज नहीं करता लेकिन असली सवाल यह है कि दक्षिण एशिया में भारत की कोई गहरी और लंबी समर-नीति है या नहीं? वह सारे दक्षिण एशिया को थल-मार्ग और जल-मार्ग से जोड़ने की कोई बड़ी नीति क्यों नहीं बनाता?     (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद् के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 30 July 2020


bhopal , Arrange  grand , divine form of Ayodhya

  सियाराम पांडेय 'शांत' अयोध्या के भव्य और दिव्य रूप का सबको इंतजार है। सरकार से लेकर देश का आम और खास यही चाहता है कि अयोध्या फिर गौरवशाली बने। पांच अगस्त को अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच रजत शिलाओं को रखकर भूमि पूजन करेंगे। सरकार की योजना भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या को त्रेतायुग की तरह भव्य और दिव्य बनाने की है। इस निमित्त तैयारियां तेज हो गई हैं।   भगवान राम विश्व सम्राट हैं। अयोध्या उनकी जन्मभूमि है। राजधानी है। अयोध्या को सजाने-संवारने का काम तेज हो गया है। अयोध्या के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपयें की योजनाओं को मंजूरी दी गई है। लोग अभी से इस बात का कयास लगाने लगे हैं कि राम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या का स्वरूप क्या होगा? उसकी श्री-समृद्धि का स्तर क्या होगा? इतने खर्च के बाद भी त्रेता युग जैसी अयोध्या बन पाएगी या नहीं, यह बात हर आम और खास की जुबान पर है। यह जानने के लिए सर्वप्रथम तो यह जानना होगा कि त्रेतायुग में अयोध्या का स्वरूप क्या रहा होगा? तत्कालीन कवि बाल्मीकि ने राम जन्म से पहले ही रामायणम की रचना कर ली थी लेकिन उसका गायन सबसे पहले उनके शिष्यों लव-कुश जो भगवान राम के पुत्र थे, द्वारा सर्वप्रथम अयोध्या की जनसभा में हुआ था। उस बाल्मीकि रामायण में अयोध्या का सविस्तार वर्णन मिलता है। इसमें अयोध्या के क्षेत्रफल आदि का भी जिक्र है। वाल्मीकि कृत रामायण के बालकाण्ड में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या 12 योजन-लम्बी और 3 योजन चौड़ी थी।   कोसल नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान। निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्। (1/5/5) अर्थात : सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कोसल नामक एक बड़ा देश था। इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी।' -(1/5/6) ऋषि बाल्मीकि ने लिखा है कि पृथ्‍वी तल पर तो अयोध्या के टक्‍कर की दूसरी नगरी थी ही नहीं। उस उत्‍तम पुरी में गरीब यानी धनहीन तो कोई था ही नहीं, बल्‍कि कम धन वाला भी कोई न था। वहां जितने कुटुम्‍ब बसते थे, उन सबके पास धन-धान्‍य, गाय, बैल और घोड़े थे। रामचरित मानस में रामराज्य की व्याख्या के क्रम में कुछ ऐसा ही कहा गया है। सवाल यह उठता है कि त्रेता युग की तरह अयोध्या तो बनेगी लेकिन क्या त्रेता युग जितनी समृद्ध और विवेकयुक्त भी अयोध्या होगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।   विश्व सम्राट राम की जन्मभूमि सनातन धर्म का प्राण बिंदु है। इस अयोध्या की रक्षा स्वयं हनुमानजी करते हैं। शास्त्रों में वर्णित 36 वर्ग योजन की सम्पूर्ण अयोध्या केवल और केवल राजा रामचंद्र जी की है। वाल्मीकि ऋषि ने रामायण के बाल कांड के पंचम सर्ग में इसका वर्णन कुछ इस तरह किया है।   'आयता दस च द्वे च योजनानि महापुरी।श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा।' इसलिए अयोध्या की उक्त वर्णित भूमि पर केवल और केवल राजा रामचंद्र जी व उनकी भक्त प्रजा का ही विशेषाधिकार है, शेष जो इस भूमि के किसी भी हिस्से पर दावा करता है, वह घोर दण्ड का भागी है। नगर की लंबाई, चौड़ाई और सड़कों के बारे में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं- इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं। वाल्‍मीकि ऋषि अयोध्या की सड़कों की सफाई और सुंदरता के बारे में लिखते हैं कि वह पुरी चारों ओर फैली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुशोभित थी। सड़कों पर नित्‍य जल छिड़का जाता था और फूल बिछाए जाते थे। इन्द्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था। इस पुरी में राज्‍य को खूब बढ़ाने वाले महाराज दशरथ उसी प्रकार रहते थे जिस प्रकार स्‍वर्ग में इन्‍द्र वास करते हैं। इस पुरी में बड़े-बड़े तोरण द्वार, सुंदर बाजार और नगरी की रक्षा के लिए चतुर शिल्‍पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्‍त्र रखे हुए थे। उसमें सूत, मागध बंदीजन भी रहते थे, वहां के निवासी अतुल धन संपन्‍न थे, उसमें बड़ी-बड़ी ऊंची अटारियों वाले मकान जो ध्‍वजा-पताकाओं से शोभित थे। महर्षि वाल्‍मीकि ने लिखा है कि स्‍त्रियों की नाट्य समितियों की भी यहां कमी नहीं है और सर्वत्र जगह-जगह उद्यान निर्मित थे। आम के बाग नगरी की शोभा बढ़ाते थे। नगर के चारों ओर साखुओं के लंबे-लंबे वृक्ष लगे हुए ऐसे जान पड़ते थे, मानो अयोध्‍यारूपिणी स्‍त्री करधनी पहने हो। यह नगरी दुर्गम किले और खाई से युक्‍त थी तथा उसे किसी प्रकार भी शत्रुजन अपने हाथ नहीं लगा सकते थे। हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्‍चर सभी जगह-जगह दिखाई पड़ते थे।   राजभवनों का रंग सुनहला था। विमानगृह जहां देखो, वहां दिखाई पड़ते थे। उसमें चौरस भूमि पर बड़े मजबूत और सघन मकान अर्थात बड़ी सघन बस्‍ती थी। कुओं में गन्‍ने के रस जैसा मीठा जल भरा हुआ था। नगाड़े, मृदंग, वीणा, पनस आदि बाजों की ध्‍वनि से नगरी सदा प्रतिध्‍वनित हुआ करती थी। सातवीं सदी में यहां आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अयोध्या को पिकोसिया कहा था। उसके अनुसार इसकी परिधि 16ली (एक चीनी ली बराबर है 1.6 मील के) थी। संभवतः उसने बौद्ध अनुयायियों के हिस्से को ही इस आयाम में सम्मिलित किया हो। आईने अकबरी में भी इस नगर की लंबाई 148 कोस तथा चौड़ाई 32 कोस बताई गई थी।   गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या की सुंदरता का वर्णन करते हुए लिखा है कि 'बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे संवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि। भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।' अर्थात अनेक प्रकार के मंगल-कलश घर-घर सजाकर बनाए गए हैं। श्री रघुनाथजी की पुरी (अयोध्या) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं। उस समय राजमहल (अत्यन्त) शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेव भी मन मोहित हो जाता था।   प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥2॥ सुंदर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं, मानो इन्द्रधनुष सजाए हों। अटारियों पर सुंदर और चपल स्त्रियां प्रकट होती और छिप जाती हैं (आती-जाती हैं), वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो बिजलियां चमक रही हों। श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत्‌ में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते। अयोध्या में रघुनाथ जी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एक मात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्मांड हैं, उनके लिए सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है। अयोध्या में भगवान राम की कई पीढ़ियों का राज्य रहा है और समस्त त्रिलोकी में उसकी अपनी प्रतिष्ठा रही है। रघुवंशम में गोस्वामी तुलसीदास ने रघु से लेकर उनके पूरे वंश और खासकर अयोध्या की समृद्धि और उसके नयनाभिराम सौंदर्य का जिक्र किया है।   ज्यों-ज्यों 5 अगस्त की तिथि नजदीक आ रही है। अयोध्या से जुड़ने की हर राह को सजाने-संवारने की प्रक्रिया तेज हो गई है। अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग का कायाकल्प किया जा रहा है। इसे डबल लेन में बदलने की सरकार की योजना है। इसके विकास और सुंदरीकरण के लिए तीन हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 275 किलोमीटर के इस परिक्रमा मार्ग में अधिकांश जगहों पर एकल मार्ग है। इस परिक्रमा मार्ग में दो पुलों का निर्माण भी किया जाना है। अयोध्या और चित्रकूट को जोड़ने के लिए 165 किलोमीटर लंबी सड़क बनाये जाने की योजना है। अयोध्या की दीवारों पर , खंभों पर, उससे जुड़ने वाले मार्गों पर राम कथा का चित्रण किया जाना है। 600 एकड़ में हाईटेक नव्य अयोध्या विकसित की जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि राममंदिर निर्माण के साथ ही नव्य अयोध्या के निर्माण का कार्य भी पूरा हो जाएगा। 25 हजार करोड़ की योजना का ब्लू प्रिंट बताता है कि अगर इस राशि का ईमानदार सदुपयोग हुआ तो अयोध्या का कायाकल्प होते देर नहीं लगेगी। नागर शैली में बनने वाले राममंदिर का मॉडल भी बताता है कि इसबार अयोध्या में जो कुछ भी होगा, भव्य और दिव्य ही होगा। श्रीरामचंद्र इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण, अयोध्या के चारों ओर रिंग रोड, अयोध्या के जर्जर पौराणिक भवनों का पुनिर्माण जैसी स्थापनाएं अयोध्या को निश्चित ही गौरव प्रदान करेंगी। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 30 July 2020


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  डॉ. रामकिशोर उपाध्याय   केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा चम्बल एक्सप्रेस-वे के निर्माण की घोषणा ने सदियों से उपेक्षित, पिछड़े और घोर अभावों में जीने वाले चम्बल के सैकड़ों गाँवों के मन में आशा का संचार कर दिया है। इस परियोजना के अंतर्गत 8250 करोड़ रुपये की राशि से चम्बल के किनारे-किनारे राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य की सीमा पर जहाँ सामान्यतः बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता, 404 किलोमीटर लम्बे उन्नत राजमार्ग का निर्माण किया जाना है। राजस्थान के कोटा से प्रारंभ होकर मध्य प्रदेश के श्योपुर, मुरैना और भिंड जिले से होता हुआ यह एक्सप्रेस-वे उत्तर प्रदेश के इटावा तक जाएगा जो आगे चलकर कानपुर से जुड़ता है। इस एक्सप्रेस-वे का सबसे बड़ा क्षेत्र केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के निर्वाचन क्षेत्र में आता है इसीलिये वे इस प्रोजेक्ट को लेकर पिछले कई वर्षों से प्रयासरत हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए यह प्रोजेक्ट चम्बल क्षेत्र में सरकार के प्रति विश्वास जगाने का सुनहरा अवसर है क्योंकि वर्तमान सरकार इसी क्षेत्र के विधायकों के समर्थन से बनी है। मुख्यमंत्री ने इस एक्सप्रेस-वे को प्रोग्रेस-वे की संज्ञा दी है। यदि वे ऐसा करने में सफल हुए तो चम्बल के विकास पुरुष के रूप में उन्हें याद किया जाएगा।   भारत की सुरक्षा में बड़ी संख्या में अपने बच्चों को भेजने वाले चम्बल अंचल के लिए कितने दुःख की बात है कि उसे आज भी डाकुओं के लिए ही उल्लेखित किया जाता है जबकि चम्बल बहुत पहले डाकुओं से मुक्त हो चुका है। पीला सोना (सरसों) उपजाने वाले चम्बल को अभीतक विकास का अवसर ही नहीं दिया गया। राजनीतिक रूप से पिछड़े होने के कारण यह क्षेत्र अभी भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ था। मुरैना जिले की रतन बसई ग्राम पंचायत के चम्बल नदी के किनारे बसे हुए गाँव सुखध्यान का पुरा, इन्द्रजीत का पूरा, होला पूरा, रामगढ़ आदि चौमासे (वर्षा के दिनों) में मुख्य मार्गों से पूरी तरह कट जाते हैं। यहाँ कृषि के अतिरिक्त जीविका का अन्य कोई साधन नहीं है और कृषि भी चम्बल पर निर्भर है। पिछले वर्ष आई बाढ़ के कारण हुए दल-दल ने चुस्सलई गाँव तक कई किसानों के खेत छीन लिए थे। बेरोजगारी और निर्धनता के कारण लोग गाँवों से धीरे-धीरे पलायन करते जा रहे हैं। ऐसे में इस राजमार्ग ने पुनः एक आशा का दीप जलाया है किन्तु वह तभी कारगर होगा जब यहाँ उद्योग स्थापित हों व लोगों को स्व रोजगार के लिए भी प्रेरित और प्रशिक्षित किया जाए। चम्बल के बीहड़ों की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ मिट्टी के पहाड़ (टीले) हैं, जिन्हें आसानी से समतल किया जा सकता है,जबकि अन्य जंगलों और बीहड़ों में पथरीली भूमि होने के कारण खुदाई में बहुत कठिनाई आती है।   इसके साथ-साथ चम्बल अंचल में ऊर्जावान युवकों की एक बड़ी संख्या है जो बेरोजगारी से जूझ रही है। यदि उद्योग-व्यापार को बढ़ावा दिया जाए तो यहाँ की लैंड पॉवर और मैन पॉवर दोनों का ही सदुपयोग किया जा सकता है। चम्बल नदी की सहायक नदियाँ क्वारी, आसन आदि के किनारे भी भूमि का एक बड़ा भाग बीहड़ों के रूप में है। शासन की लापरवाही के कारण इन बीहड़ों के अधिकांश भाग पर अवैध कब्जे होते जा रहे हैं। ध्यान यह भी रखना होगा कि यदि सभी बीहड़ तोड़ कर भूमि समतल कर दी गई तो बाढ़ के समय चम्बल का पानी इन गांवों को नष्ट कर देगा इसीलिये चम्बल के किनारे दोनों ओर दो किमी भूमि के बीहड़ों को उनके प्राकृतिक रूप में रखते हुए वहाँ वृक्षारोपण भी कराना चाहिए।   यद्यपि चम्बल को लेकर देश और प्रदेश की सरकारों ने अबतक उतना ध्यान नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए था। अशिक्षा और जागरुकता के अभाव में विकास की अधिकांश परियोजनाएँ घोषित होकर रह जाती हैं या फाइलों में ही समाप्त हो जाती हैं। लगभग तीस वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने पिनाहट उसैद घाट पुल का शिलान्यास किया था किन्तु अबतक पुल का निर्माण नहीं हो पाया है, एक पीढ़ी इस पुल के निर्माण कार्य के आरम्भ होने की बाट जोहते चली गई। अनेक प्रयासों के बाद अब जाकर निर्माण कार्य आरंभ हुआ है। यदि उसैद घाट पुल 25-30 वर्ष पूर्व बन गया होता तो इस मार्ग पर अबतक अनेक व्यापारिक गतिविधियाँ प्रारंभ हो चुकी होतीं।   कहा जा रहा है कि इस उन्नत राजमार्ग के द्वारा चम्बल अंचल, स्वर्ण चतुर्भुज गलियारे से क्रॉस कनेक्टिविटी में आ जाएगा। सुदूर अंचल में बसे गाँवों के लिए भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि शहरों तक आने-जाने का मार्ग सुगम हो जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस उन्नत राजमार्ग के बनने से चम्बल में विकास के नए युग का प्रारंभ होगा। किन्तु इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन को विशेष परिश्रम करना होगा। एक्सप्रेस-वे के आसपास के गाँवों की श्रम शक्ति और भूमि के अध्ययन द्वारा समयानुकूल प्रोजेक्ट तैयार करने होंगे। चम्बल में अभी सरसों, गेहूँ, बाजरा, चना आदि ही मुख्य रूप से पैदा किये जाते हैं। यहाँ की भूमि के मृदा परीक्षण द्वारा जैविक एवं औषधीय कृषि की दिशा में कार्य किया जा सकता है। डेयरी उद्योग, फूड प्रोसेसिंग, पशुपालन व कृषि से जुड़े प्रोजेक्ट्स आरम्भ कर इसे प्रोग्रेस-वे बनाया जा सकता है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 July 2020


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  डॉ. अजय खेमरिया   मध्य प्रदेश में बीजेपी के कुछ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के दलबदल के साथ ही मुरझाए हुए हैं। कैबिनेट गठन के बाद तो मामला सन्निपात-सा हो गया है। बड़े सुव्यवस्थित तरीके से पार्टी में एक विमर्श खड़ा किया जा रहा है कि बाहर से आये नेताओं को समायोजित करने से पार्टी का कैडर ठगा महसूस कर रहा है। कैडर के हिस्से की सत्ता दूसरे दलों से आये नेता ले जा रहे हैं। इस विमर्श के अक्स में बीजेपी की विकास यात्रा पर नजर दौड़ाई जाए तो स्पष्ट है कि सिंधिया के आगमन और उनकी धमाकेदार भागीदारी बीजेपी में कोई नया घटनाक्रम नहीं है। आज की अखिल भारतीय भाजपा असल में राजनीतिक रूप से गैर भाजपाईयों के योगदान का भी परिणाम है।   जिन सिंधिया को लेकर बीजेपी का एक वर्ग आज प्रलाप कर रहा है उन्हें याद होना चाहिये कि 1967 में सिंधिया की दादी राजमाता विजयराजे अगर कांग्रेस छोड़कर बारास्ता स्वतन्त्र पार्टी, जनसंघ में न आई होतीं तो क्या मप्र में इतनी जल्दी पार्टी का कैडर खड़ा हुआ होता? एक बहुत ही प्रैक्टिकल सवाल विरोध के स्वर बुलन्द करने वालों से पूछा जा सकता है कि क्या वे जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं उसके आसपास की विधानसभाओं में उनकी भीड़ भरी सभाएं सिंधिया की टक्कर में आयोजित की जा सकती है? क्या देश भर में सिंधिया की उपयोगिता से कोई इनकार कर सकता है? क्या मप्र में सिंधिया के भाजपाई हो जाने से कांग्रेस का अस्तित्व संकट में नहीं आ गया?   रही बात बीजेपी कैडर की तो वह सदैव यह चाहता ही है कि उसकी पार्टी के व्यास का विस्तार हो। यह निर्विवाद तथ्य है कि बीजेपी में उसकी रीति नीति को आत्मसात करने वाले ही आगे बढ़ पाते हैं। ऐसा भी नहीं कि बाहर से आये सभी नेताओं के अनुभव खराब हैं। मप्र में जनसंघ के अध्यक्ष रहे शिवप्रसाद चिनपुरिया मूल कैडर के नहीं थे। इसी तरह ब्रजलाल वर्मा भी बीजेपी में बाहर से आकर प्रदेश अध्यक्ष तक बने। ऐसा लगता है कि बीजेपी ने मप्र में सिंधिया के दबाव में 14 मंत्री बना दिए हैं लेकिन पार्टी ने बहुत करीने से अपने नए कैडर को मप्र की राजनीति में मुख्यधारा में खड़ा कर दिया है। मसलन कमल पटेल, मोहन यादव, इंदर सिंह परमार, अरविंद भदौरिया-को मंत्री बनाकर खांटी संघ कैडर को आगे बढ़ने का अवसर दिया गया है। उषा ठाकुर, भूपेंद्र सिंह, भारत सिह कुशवाहा, प्रेम पटेल, कावरे मीना सिंह जैसे जन्मजात भाजपाईयों को जिस तरह मंत्री बनाया गया है उसे आप पार्टी का सोशल इंजीनियरिंग बेस्ड पीढ़ीगत बदलाव भी कह सकते हैं।   जाहिर है जो मीडिया विमर्श बीजेपी को ज्योतिरादित्य सिंधिया के आगे सरेंडर दिखाता है उसके उलट मप्र में नए नेतृत्व की स्थापना को भी देखने की जरूरत है। मप्र में पार्टी के मुखिया के रूप में बी़डी शर्मा की ताजपोशी क्या किसी ने कल्पना की थी।बीडी शर्मा असल में मप्र की भविष्य की राजनीति का चेहरा भी हैं, वे पीढ़ीगत बदलाव के प्रतीक भी हैं। यानी मप्र में दलबदल के बावजूद वैचारिक अधिष्ठान से निकला कैडर मुख्यधारा में सदैव बना रहा है।   मप्र राजमाता सिंधिया को बीजेपी ने सदैव राजमाता बनाकर रखा, अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की बारी है कि वे अगर अपनी दादी के सियासी अक्स को अपने जीवन में 25 फीसदी भी उतार सकें तो वह भी महाराजा की तरह प्रतिष्ठित पायेंगे। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने तो उनको राजमाता की तरह ही अवसर उपलब्ध करा दिया है। वैसे बीजेपी में बाहर से आये नेताओं को उनकी निष्ठा के अनुसार सदैव प्रतिष्ठा मिली है। मप्र की सियासत के ताकतवर चेहरे डॉ. नरोत्तम मिश्रा का परिवार कभी कांग्रेस में हुआ करता था उनके ताऊ महेश दत्त मिश्र कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे है लेकिन नरोत्तम मिश्रा को बीजेपी ने इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद आगे बढ़ाया।   सवाल यह है कि जब बीजेपी का राजनीतिक दर्शन पार्टी को सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी बनाने का है तब मप्र में सिंधिया प्रहसन पर सवाल क्यों उठाये जा रहे हैं? क्या यह तथ्य नहीं है कि सिंधिया के कारण ही मप्र जैसे बड़े राज्य में पार्टी को फिर से सत्ता हासिल हुई। क्या सवाल उठाने वाले चेहरों ने सत्ता बनी रहे, इसके लिए अपने खुद के योगदान का मूल्यांकन ईमानदारी से किया है? क्या इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि सिंधिया प्रहसन पर आपत्ति केवल उन लोगों को है जो जीवन भर बीजेपी में रहकर दल से बड़ा देश अपने मन मस्तिष्क में उतार ही नहीं पाए।   तथ्य यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में आने से मप्र में कांग्रेस नेतृत्व विहीन होकर रह गई है।आज कमलनाथ और दिग्विजय सिंह 70 पार वाले नेता हैं और दोनों के पुत्रों को मप्र की सियासत में स्थापित होने में लंबा वक्त लगेगा। सिंधिया का आकर्षक व्यक्तित्व और ऊर्जा, बीजेपी के लिए मप्र में अपनी जमीन को फौलादी बनाने में सहायक हो सकती है। सिंधिया के लिए भी बीजेपी एक ऐसा मंच और अवसर है जिसके साथ सामंजस्य बनाकर वह जीवन की हर सियासी महत्वाकांक्षा को साकार कर सकते हैं क्योंकि यहां एक व्यवस्थित संगठन है, अनुशासन है और एक सशक्त आनुषंगिक नेटवर्क है।   आवश्यकता इस बात की है कि बीजेपी संगठन की प्रभावोत्पादकता सत्ता साकेत में कमजोर न हो। संगठन और विचार का महत्व बनाए रखने की जवाबदेही मूल पिंड से उपजे नेताओं की ही होती है। बीजेपी के वैचारिक अधिष्ठान में प्रचारक की तरह आचरण अपेक्षित है। जो नेता इस अधिष्ठान को समझते हैं उनका उत्कर्ष यहां बगैर वकालत के निरन्तर होता रहा है। इसलिए सिंधिया हों या पायलट, सामयिक रूप से जो सियासी उत्कर्ष में सहायक हो उन्हें लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिये। अगर ऐसे नेताओं के अंदर समन्वय और वैचारिक अबलंबन का माद्दा होगा तो वह मूल विचार के लिए उपयोगी ही होंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 July 2020


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प्रमोद भार्गव सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल हुई है, जिसमें संविधान की प्रस्तावना में बाद में जोड़े गए दो शब्द समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष हटाने की अपील की गई है। इसमें कहा गया है कि न्यायालय घोषित करे कि प्रस्तावना में दिए गए ये शब्द गणतंत्र की अवधारणा की प्रकृति से जुड़े भी हैं अथवा नहीं ? जन-प्रतिनिधित्न कानून की धारा 29-ए (5) में दर्ज समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं थे, इन्हें 42वें संविधान संशोधन के जरिए 3 जनवरी 1977 को जोड़ा गया। इस समय देश में आपातकाल लागू था और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। संशोधन के इस प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में बहस भी नहीं हुई थी, क्योंकि सभी विपक्षी दलों के प्रमुख नेता आपातकाल के दौरान जेलों में बंद कर दिए गए थे। यह याचिका वकील विष्णुशंकर जैन, बलराम सिंह और करुणेश कुमार शुक्ला ने प्रस्तुत की है। यह सही है कि भारत का धर्मरिपेक्ष स्वरूप भारतीय संविधान का बुनियादी आधार है। लेकिन इस अभिव्यक्ति की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है। इसलिए जब भी गीता या रामायण के नैतिक मूल्यों और चारित्रिक शुचिता से जुड़े अंशों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो वामपंथी दल व अन्य बुद्धिजीवी इन पहलों को लोकतंत्र के मूलभूत संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विरुद्ध बताने लगते हैं। दरअसल स्वतंत्रता के बाद से ही केवल हिंदू और हिंदुओं से जुड़े प्रतिरोध को ही धर्मनिरपेक्षता मान लेने की परंपरा सी चल निकली है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि मूल संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष’ शब्द था ही नहीं। यह शब्द तो आपातकाल के दौरान 42वां संविधान संशोधन लाकर समाजवादी धर्मनिरपेक्ष संविधान अधिनियम 1976’ के माध्यम से जोड़ा गया था।आपातकाल के बाद जब जनता दल की केंद्र में सरकार बनी तो यह सरकार 43वां संशोधन विधेयक लाकर सेक्युलरिज्म मसलन धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या स्पष्ट करना चाहती थी, प्रस्तावित प्रारूप में इसे स्पष्ट करते हुए वाक्य जोड़ा गया था, गणतंत्र शब्द जिसका विशेषण धर्मनिरपेक्ष’ है का अर्थ है, ऐसा गणतंत्र जिसमें सब धर्मो के लिए समान आदर हो, ’ लेकिन लोकसभा से इस प्रस्ताव के पारित हो जाने के बावजूद कांग्रेस ने इसे राज्यसभा में गिरा दिया था। अब यह स्पष्ट उस समय के कांग्रेसी ही कर सकते हैं कि धर्मों का समान रूप से आदर करना धर्मनिरपेक्षता क्यों नहीं है ? गोया, इसके लाक्षणिक महत्व को दरकिनार कर दिया गया। शायद ऐसा इसलिए किया गया जिससे देश में सांप्रदायिकसद्भाव स्थिर न होने पाए और सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता को अनंतकाल तक वोट की राजनीति के चलते तुष्टिकरण के उपायों के जरिए भुनाया जाता रहे। साथ ही इसका मनमाने ढंग से उपयोग व दुरूपयोग करने की छूट सत्ता-तंत्र को मिली रहे। जहां तक गणतंत्र शब्द का प्रश्न है तो विक्टर ह्यूगो ने इसे यूं परिभाषित किया है, जिस तरह व्यक्ति का अस्तित्व उसके जीने की इच्छा की लगातार पुष्टि है, उसी तरह देश का अस्तित्व उसमें रहने वालों का परस्पर तालमेल नित्य होने वाला जनमत संग्रह है।’ दुर्भाग्य से हमारे यहां परस्पर तालमेल खंडित हो रहा है। अलगाव और आतंकवाद की अवधारणाएं निरंतर देश की संप्रभुता व अखण्डता के समक्ष खतरा बनकर उभरी हैं। राष्ट्रवाद और भारत माता की जय को भी संकीर्ण और अल्प-धार्मिक दृष्टि से देखा जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू विवि में जिस तरह से देश के हजार टुकड़े करने के नारेलगाए गए और उन्हें अभीव्यक्ति की आजादी के परिप्रेक्ष्य में संवैधानिक ठहराने की कोशिशें हुईं, उस संदर्भ में लगता है कि धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी केमायने राष्ट्रद्रोह को उकसाने और उन्हें सरंक्षित करने के उपाय साबित हो रहे हैं। लिहाजा इन शब्दों को संविधान से विलोपित किया जाना जरूरी है। इन हालातों से स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान जिस नागरिकता को मान्यता देता है, वह एक भ्रम है। सच्चाई यह है कि हमारी नागरिकता भी खासतौर से अल्पसंख्यक- बहुसंख्यक समुदायों में बंटी हुई है। लिहाजा इसका चरित्र उत्तरोत्तर सांप्रदायिक हो रहा है। हिंदु, मुसलमान और ईसाई भारतीय नागरिक होने का दंभ बढ़ रहा है। जबकि नागरिकता केवल देशीय मसलन भारतीय होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है,क्योंकि भारत में कुल 4635 समुदाय हैं। जिनमें से 78 प्रतिशत समुदायों की न सिर्फ भाषाई एवं सांस्कृतिक बल्कि सामाजिक श्रेणियां भी हैं। इन समुदायों में 19.4 प्रतिशत धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। गोया, छदम् धर्मनिरपेक्षता की जरूरत ही क्या है। हालांकि आजादी के ठीक बाद प्रगतिशील बौद्धिकों ने भारतीयनागरिकता को मूल अर्थ में स्थापित करने का प्रयास किया था, लेकिन धर्मनिरपेक्षता के फेर में मूल अर्थ सांप्रदायिक खानों में विभाजित होता चला गया, जिसका संकट अब कुछ ज्यादा ही गहरा गया है। वर्तमान में हमारे यहां धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के शब्द सेक्युलर’ के अर्थ में हो रहा है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध आॅक्सफोर्ड शब्द-कोश में इसका अर्थ ईश्वर’ विरोधी दिया है। भारत और इस्लामिक देश ईश्वर विरोधी कतई नहीं हैं। ज्यादातर क्रिश्चियन देश भी ईसाई धर्मावलंबी हैं। हां, बौद्ध धर्मावलंबी चीन और जापान जरूर ऐसे देश हैं,  जो धार्मिक आस्था से पहले राष्ट्रप्रेम को प्रमुखता देते हैं। हमारे संविधान की मुश्किल यह भी है कि उसमें धर्म की भी व्याख्या नहीं हुई है। इस बाबत न्यायमूर्ति राजगोपाल आयंगर ने जरूर इतना कहा है, 'मैं यह जोड़ना चाहता हूं कि अनुच्छेद 25 और 26 में धार्मिक सहिष्णुता का वह सिद्धांत शामिल है, जो इतिहास के प्रारंभ से ही भारतीय सभ्यता की विशेषता रहा है।’ इसी क्रम में उच्चतम न्यायालय ने कहा, धर्म शब्द की व्याख्या लोकतंत्र में नहीं हुई है और यह ऐसा शब्द है, जिसकी निश्चित व्याख्या संभव नहीं है।’ संभवतः इसीलिए न्यायालय को कहना पड़ा कि गणतंत्र का धर्मनिरपेक्ष स्वभाव राष्ट्रनिर्माताओं की इच्छा के अनुरूप होना चाहिए और इसे ही संविधान का आधार माना जाना चाहिए।’ अब यहां संकट यह भी है कि भारत राष्ट्र का निर्माता कोई एक नायक नहीं रहा। गरम और नरम दोनों ही दलों के विद्रोह से विभाजित स्वतंत्रता संभव हुई। नतीजतन धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या को किसी एक इबारत में बांधना असंभव है। इसीलिए श्रीमद्भागवत गीता में जब यक्ष धर्म को जानने की दृष्टि से प्रश्न करते हैं तो धर्मराज युधिष्ठिर का उत्तर होता है, तर्क कहीं स्थिर नहीं हैं, श्रुतियां भी भिन्न-भिन्न हैं। एक ही ऋषि नहीं है, जिसका प्रमाण माना जाए और धर्म का तत्व गुफा में निहित है। अतः जहां से महापुरूष जाएं, सही धर्म या मार्ग है।’ वैसे भारतीय परंपरा में धर्म कर्तव्य के अर्थ में प्रचलित है। यानी मां का धर्म, पिता का धर्म, पुत्र का धर्म, स्वामी का धर्म और सेवक का धर्म, इस संदर्भ में कर्तव्य से निरपेक्ष कैसे रहा जा सकता है। सेक्युलर के लिए शब्द-कोश में पंथनिरपेक्ष शब्द भी दिया गया है, पर इसे प्रचलन में नहीं लिया गया। कर्तव्य के उपर्युक्त पालन के निहितार्थ ही संविधान के 42वें संशोधित अधिनियम 1976 के अंतर्गत बुनियादी कर्तव्य के परिप्रेक्ष्य में एक परिच्छेद संविधान में जोड़ा गया है। अनुच्छेद 51ए (ई) में कहा गया है, धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और भेदों से ऊपर उठकर सौहाद्र्र और भाईचारे की भावनाएं बनाए रखना और स्त्रियों की गरिमा की सुरक्षा करना हरेक भारतीय नागरिक का दायित्व होगा। 1973 में न्यायमूर्ति एच.आर.खन्ना ने भी धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए कहा था राज्य, धर्म के आधार पर किसी नागरिक के साथ पक्षपात नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया की परिभाषा उपरोक्त परिभाषाओं से पृथक है। उन्होंने कहा था, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध नहीं हो सकता।’ जाहिर है, धर्मनिरपेक्षता को हथियार मानते हुए जो लोग इसका दुरुपयोग बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध करते हैं, उन पर नियंत्रण का संकेत इस टिप्पणी में परिलक्षित है। संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर ने भी संविधान को धर्मनिरपेक्ष नहीं माना था, क्योंकि वे जानते थे कि एक बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुभाषीय देश के चरित्र में ये प्रवृत्तियां उदार एवं एकरूप नहीं हो सकती हैं। नतीजतन धर्म, जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय पहचानों को मिटाना एकाएक संभव नहीं है। फिर हमारे यहां सामंतशाही और विदेशी हमलावरों के सत्तापर काबिज हो जाने के चलते स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की भी एक सुदीर्घ परंपरा रही है, जो सामान्य से लेकर विशिष्ट नागरिकों को भी चंचल व विचलित बनाए रखने का काम करती है। फलस्वरूप धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में राजनीतिक दलों ने भी अपनी-अपनी परिभाषाएं गढ़ लीं। कांग्रेस की परिभाषा है, सर्व-धर्म, समभाव’ और भाजपा की है, न्याय सबको, पक्षपात किसी को नहीं।’ इसी तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने चुनावी नारा दिया था। सबका साथ, सबका विकास।’ लेकिन इन परिभाषाओं के भावार्थ राजनेताओं के चरित्र में शुमार दिखाई नहीं देते। इसीलिए गांधी जी ने कहा था, वास्तव में धर्म आपके प्रत्येक क्रियाकलाप मंे अंतर्निहित होना चाहिए।’ ऐसा होगा तो एक साझा उद्देश्य, साझा लक्ष्य और साझा भाईचारा दिखाई देगा। देश में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए इन्हीं उपायों की जरूरत है। लेकिन विधि सम्मत दायरे में धर्मनिरपेक्ष शब्द की अपरिभाषितस्थिति में कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि इसका लचीलापन दुरुपयोग का सबब बन रहा है। हालांकि देश को एकरूपता देने की दृष्टि से नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर कोविशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 को हटाकर इस दिशा में उल्लेखनीय विधि-सम्मत पहल की है।लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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Dakhal News 28 July 2020


bhopal, After all, how long will floods help!

  ऋतुपर्ण दवे   स्वतंत्रता के बाद देश में यदि कुछ तय है तो वह है कुछ खास प्रदेशों के निश्चित इलाकों में बाढ़ की विभीषका। यह बात अलग है कि किसी साल यह ज्यादा तबाही मचाती है तो कभी थोड़ा बहुत ताण्डव कर शांत हो जाती है। बाढ़ को लेकर बिहार, असम, प. बंगाल और कुछ अन्य इलाकों में दो महीनों का हाहाकर झेलने वाले वहां के लोग और सरकारें इन्हीं मामलों पर 10 महीनों के लिए ऐसे बेकार हो जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं! इसके लिए दोषी भले हम नेपाल या चीन को ठहराएं लेकिन सबसे बड़ी हकीकत यही है कि व्यवस्था कहें या नीति निर्धारण, यह लगातार लापरवाहियों का नतीजा है। जुलाई-अगस्त के बाद यही बाढ़ पीड़ित इसे नियति मान जहां फिर से अपनी गृहस्थी सजाने की फिक्र में अगले दस महीने यूं जुट जाएंगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वहीं सरकारें भी नीचे से ऊपर तक कागजी घोड़े दौड़ा बाढ़ पर हकीकत में दिखने वाली कार्रवाइयों से इतर चिट्ठी, पत्री, ई-मेल भेज-भेजकर अपनी सक्रियता दिखाने लग जाती है। इस बीच फिर जुलाई-अगस्त आ जाता है। यानी दिखावे की व्यस्तता के बीच सितम्बर से जून कब बीत जाएगा, किसी को पता नहीं चलता और फिर दो महीने वही पुराना हाहाकार हरा हो जाएगा। बाढ़ की विभीषिका का यही सच है।   बाढ़ का एक सच यह भी कि यहां नदियों के किनारों पर ही जबरदस्त अतिक्रमण है जिससे रास्ता भटकी नदियां उसी इलाके में बाढ़ का कारण बन जाती हैं। यकीनन नदियां तो अपनी जगह हैं लेकिन तटों पर कब्जों ने चाल जरूर बदल दी। शायद इस कारण भी सरकारें कई बार बाढ़ रोक पाने में विफल हो जाती हैं। बिहार में अभी जहां कोई दर्जन भर जिलों के साथ लगभग 7 से 8 सौ गांव बुरी तरह से बाढ़ की चपेट में हैं वहीं अगले कुछ दिनों का रेड एलर्ट है। सात जिले ऐसे हैं जो नेपाल से सटे हैं जिनमें पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज शामिल हैं। चूंकि नेपाल पहाड़ी इलाका है इसलिए जब वहां बारिश होती है तो पानी नदियों से नीचे आकर नेपाल के मैदानी इलाकों में भर जाता है। खेती की जमीन के लिए जंगल पहले ही काट दिए गए हैं ऐसे में कोई रोक नहीं होने से कई नदियां जो नेपाल के पहाड़ी इलाकों से निकलकर मैदानी इलाकों में होते हुए वहां से और नीचे जाकर जैसे ही बिहार में प्रवेश करती हैं, बाढ़ के हालात विकराल हो जाते हैं। जंगल होते तो पेड़ होते, पेड़ होते तो मिट्टी होती, मिट्टी होती तो पानी का बहाव भी रुकता और कटाव भी लेकिन ऐसा कुछ है नहीं इसलिए पानी सीधे भारत में आकर तबाही मचाता है। इस दिशा में बहुत ज्यादा काम की जरूरत है लेकिन सच यह है कि असल शुरुआत ही नहीं हुई है जिससे 73 सालों से यह समस्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है।   जहां नेपाल और भारत के बीच अब छोटे-छोटे विवाद भी बड़े हो रहे हैं वहीं सैकड़ों बरस पुराने आत्मीय रिश्ते भी खत्म हो रहे हैं जिससे योजनाएं धरी रह जाती हैं। गण्डक नदी जो दोनों देशों में बहती है, उसके गेट खुलते ही भारत में तबाही कोई नई कहानी नहीं है। यह भी सच है कि तरक्की के लिहाज से बने बांध ही सिरदर्द बने। ऐसा ही कुछ प. बंगाल में है जहां जानकारों की चेतावनी की अनदेखी की गई थी। अंग्रेजों ने पहले दामोदर नदी को नियंत्रित करने खातिर 1854 में उसके दोनों और बांध बनाए लेकिन समझ आते ही 1869 में तोड़ भी दिया। उन्हें आभास हो गया कि प्रकृति से छेड़छाड़ ठीक नहीं। फिर तो भारत में रहने तक किसी नदी को बांधने का प्रयास नहीं किया। एक बात और जो शायद कम ही लोग जानते हों कि फरक्का बैराज और दामोदर घाटी परियोजना विरोधी एक विलक्षण प्रतिभाशाली इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य थे। योजना की रूपरेखा आते ही, 40 वर्ष पहले ही उन्होंने वो प्रभावी और अकाट्य तर्क दिए कि कोई काट तो नहीं सका अलबत्ता उन्हें बर्खास्त जरूर कर दिया गया। अब उनकी बातें, हू-ब-हू सच हो रही हैं। उन्होंने एक लेख में चेताया था कि दामोदर परियोजना से पश्चिम बंगाल के पानी को निकालने वाली हुगली प्रभावित होगी जिससे भयंकर बाढ़ आएगी और कलकत्ता बंदरगाह पर बड़े जलपोत नहीं आ पाएंगे। इससे नदी के मुहाने जमने वाली मिट्टी साफ नहीं हो पाएगी और गाद जमेगी तथा जहां-तहां टापू बनेंगे। नतीजतन प्राकृतिक तौर पर दो-तीन दिन चलने वाली बाढ़ महीनों रहेगी। सबकुछ सच निकला बल्कि स्थितियां और भी बदतर हुईं।   असम में भी इसबार बाढ़ की स्थिति भयावह है। 33 में से 30 जिले इसकी चपेट में हैं। ब्रह्मपुत्र समेत तमाम नदियां खतरे के निशान से ऊपर है। राष्ट्रीय आपदा मोचन यानी एनडीआरएफ की 12 टीमें यहां हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र बाढ़ग्रस्त असम में राहत कार्यों भारत की सहायता को तैयार है। बिहार में भी एनडीआरएफ की19 टीमें तैनात हैं। उधर यूनिसेफ ने बीते गुरुवार को कहा कि जहां अकेले भारत में बाढ़ की ताजा हालत से बिहार,असम, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 60 लाख से ज्यादा प्रभावित हैं जिनमें जिसमें 24 लाख बच्चे हैं। एक बेहद चिन्ताजनक स्थिति यह भी है कि इसबार मध्य जुलाई भारी बारिश हुई। दक्षिण एशिया में यूनिसेफ की क्षेत्रीय निदेशक जीन गफ ने जबरदस्त चिंता जताई है। ऐसे वक्त आई तबाही जिसमें गुजरते वक्त की भारी मानसूनी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन ने 24 लाख बच्चों और उनके परिवारों की दुनिया उजाड़ दी, दोहरी मार जैसी है क्योंकि जब दुनिया कोविड-19 महामारी और इसकी रोकथाम में जुटी थी कि तभी यह दूसरी समस्या बड़ी मुसीबत बन आ खड़ी हुई।   असम की नियति देखिए। सितंबर 2015 की एक रिपोर्ट बताती है कि 1954 से लेकर 2015 के बीच बाढ़ की वजह से असम में 3 हजार 800 वर्ग किमी की खेती की जमीन बर्बाद हो गई। मतलब 61 साल में बाढ़ के कारण असम में जितनी खेतिहर जमीन बर्बाद हुई है, वो गोवा जैसे राज्य के क्षेत्रफल से ज्यादा है। समझा जा सकता है किजिस राज्य के 75 प्रतिशत लोग सिर्फ खेती पर निर्भर हों वहां यह रोजी-रोटी पर कैसा असर पड़ा होगा! 2010 से 2015 यानी केवल 5 बरस में 880 से ज्यादा गांव तबाह हुए और 36 हजार 981 परिवार बेघर हुए। नतीजतन रहने को जगह कम हो गई। भीषण बारिश वहां की बड़ी और स्थायी समस्या है। भले इसबार बाढ़ ने तीन राज्यों में खासी तबाही मचाई हो लेकिन यह सच है कि दुनिया में बाढ़ से होने वाली मौतों में 20 फीसदी अकेले भारत में होती है। दरअसल भारत दुनिया का ऐसा देश है जिसमें हर साल कहीं न कहीं विकराल बाढ़ आती है। जहां गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु नदी से बिहार, प. बंगाल असम, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा में जबरदस्त बाढ़ आती है वहीं ओड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात,आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान भी कई बार बाढ़ से प्रभावित हो जाते हैं। औसतन 400 लाख हेक्टेयर जैसा बड़ा क्षेत्रपल हर साल बाढ़ के खतरे से ग्रस्त रहता है और औसतन 77 लाख हेक्टेयर एरिया में बाढ़ आती है। इससे अमूमन 35 लाख हेक्टेयर की फसलें बरबाद होती हैं। इसबार बाढ़ की विकरालता और मिस मैच टाइमिंग से यह एरिया काफी बड़ा होने जा रहा है।   दरअसल मौजूदा हालात में बजाए बड़ी नदियों पर बड़े-बड़े बांध के छोटी व सहायक नदियों यहां तक कि गांवों के नालों पर जगह-जगह जलाशय और चेक डैम बनें ताकि बारिश का उपयोग भी हो और नियंत्रित भी किया जा सके। इससे जहां नदियों का कटाव रुकेगा, वहीं बड़ी नदियों में बाढ़ के हालात भी कमेंगे। हालाकि इस दिशा में काम तो हो रहा है और आजकल गांव-गांव में स्टाप डैम और चेक डैम ग्राम पंचायतें बनवा भी रही हैं लेकिन इसकी हकीकत को भी परखना होगा कि मनरेगा व दूसरी योजनाओं से बनने वाले ये डैम, कागजों में तो बन जाते हैं लेकिन वास्तव में ये कितने कारगर हैं? इस तरह की कोशिशों से दूसरे कई लाभ भी हैं जो अलग लिखा जाने वाला विषय है। अब तो अक्षांतर, देशांतर तथा सैटेलाइट तकनीक से निर्माण स्थल की सटीकता और गुणवत्ता को जांचने की तकनीक विकसित कर निर्माणों की जांच के लिए देशव्यापी आकस्मिक यानी कहीं भी मुआयने की सटीक व्यवस्था भी हो सकती है जिससे निर्माण एजेंसियों में भ्रष्टाचार को लेकर खौफ रहे ताकि निर्माण का काम पुख्ता हो. ऐसा न होने पर कागजों में चेक-स्टाप डैम यूं ही अनचेक होकर भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढ़ बाढ़ को बढ़ावा देते रहेंगे। यदि बाढ़ पर काबू की कोशिशें कामयाब नहीं हुईं तो 2050 तक भारत की आधी आबादी के रहन-सहन के स्तर में जबरदस्त गिरावट होगी। अभी 30 बरस का वक्त है जो कम नहीं है। इसके लिए अभी से कमर कसकर पारदर्शी व्यवस्था करनी होगी। व्यवस्थाएं सुधरीं तो बाढ़ नियंत्रण सुधार कोई बड़ी चुनौती नहीं होगी और भारत के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 July 2020


bhopal. Rajasthan

  प्रमोद भार्गव राजस्थान का सत्ता-संग्राम राजस्थान उच्च न्यायालय के बाद राजभवन पहुंच गया। न्यायालय ने कांग्रेस के 19 बागी विधायकों की याचिका पर विधानसभा अध्यक्ष से यथास्थिति बनाए रखने को कहा है। साफ है, अब अध्यक्ष सीपी जोशी सचिन पायलट समेत 19 विधायकों को एकाएक अयोग्य घोषित नहीं कर पाएंगे? सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में भी इस मामले पर सुनवाई होनी है। इसी घटनाक्रम के दौरान अशोक गहलोत अपने विधायकों को होटल से लेकर राजभवन पहुंचे और विधायक परिसर में ही धरने पर बैठ गए। गहलोत समेत विधायकों ने नारे लगाए और आरोप लगाया कि सरकार विधानसभा-सत्र बुलाना चाहती है लेकिन राज्यपाल कलराज मिश्र 'ऊपरी दबाव' के चलते सत्र बुलाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री और राज्यपाल की दो घंटे चली गुप्त चर्चा के बाद विधायक होटल चले गए। अलबत्ता विधानसभा अध्यक्ष की दलील है कि उच्च न्यायालय उन्हें बागी विधायकों को अयोग्यता की कार्यवाही से नहीं रोक सकता है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने नसीहत दी है कि 'लोकतंत्र में असहमति के स्वर को दबाया नहीं जा सकता है। असंतुष्ट विधायक भी जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, अतएव वे असहमति व्यक्त कर सकते हैं। अन्यथा लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा।' इसी बीच राजस्थान के सियासी दंगल में केंद्र सरकार ने भी दखल दे दिया। लिहाजा उच्च न्यायालय ने पायलट खेमे की ओर से केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने के लिए दी गई अर्जी को स्वीकार कर लिया है। साफ है, अब केंद्र का पक्ष भी सुना जाएगा। केंद्र की ओर से महाअधिवक्ता आरडी रस्तोगी सरकार का पक्ष रखेंगे। बहरहाल यह मामला इतना पेचीदा हो गया है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सरकार बचाना मुश्किल होगा? लेकिन पायलट की गति भी 'दोई दीन से गए पांडे, हलुआ मिले न माड़े' कहावत को चरितार्थ हो सकती है क्योंकि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। दरअसल मुख्यमंत्री गहलोत का यह बयान उन्हीं के लिए उल्टा पड़ सकता है कि 'यदि राजस्थान की जनता राजभवन का घेराव करती है तो मेरी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी।' यह बयान इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि अबतक गहलोत स्वयं मुख्यमंत्री हैं और कानून व्यवस्था की सीधे-सीधे जिम्मेदारी उन्हीं के हाथ है, इसलिए वे यदि यह कहते हैं कि वे सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकते तो यह कहने से पहले उन्हें राज्यपाल को त्यागपत्र सौंप देना चाहिए था। शायद इसीलिए राज्यपाल ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा भी है 'यदि राज्य सरकार राज्यपाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकती है तो यह सवाल उठता है कि ऐसे राज्य में कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति होगी।' यही नहीं राज्यपाल कलराज मिश्र ने बाकायदा मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा, 'इससे पहले कि मैं विधानसभा सत्र बुलाए जाने के संबंध में संविधान विशेषज्ञों से चर्चा करता, आपने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि यदि राजभवन का घेराव होता है तो यह आपकी जिम्मेदारी नहीं होगी। यदि आप और आपका गृह मंत्रालय राज्यपाल की सुरक्षा नहीं कर सकता तो राज्य में कानून व्यवस्था का क्या हश्र होगा? मैंने कभी किसी मुख्यमंत्री का ऐसा बयान नहीं सुना। यह गलत प्रवृत्ति की शुरुआत है। जहां विधायक राजभवन के भीतर विरोध प्रदर्शन कर रहे है।' साफ है, मुख्यमंत्री के बयान ने इस मामले को और पेचीदा बना दिया है। अशोक गहलोत की मुश्किलें आगे और भी बढ़ती दिखाई दे रही है। दरअसल गहलोत ने बहुजन समाज पार्टी के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में विलय करा लिया था, विलय का यह मामला भी उच्च न्यायालय पहुंच गया है। भाजपा विधायक दिलावर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इन विधायकों के कांग्रेस में विलय पर सवाल उठाए हैं। इस याचिका पर फिलहाल सुनवाई होना शेष है। दिलावर ने इसी सिलसिले में विधानसभा अध्यक्ष को भी एक याचिका दायर की है। उल्लेखनीय है कि ये सभी विधायक सितंबर 2019 में बसपा छोड़ कांग्रेस में विलय हो गए थे। इस घटना को बीते एक साल बाद ये याचिकाएं दायर की गई हैं। इससे तय होता है कि अशोक गहलोत को चारों तरफ से घेरा जा रहा है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि सचिन पायलट ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रेरणा से गहलोत को पटकने के घटनाक्रम को अंजाम दिया हुआ है। लेकिन सिंधिया के साथ सुविधा यह रही कि वे अपने 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ने की घोषणा के साथ इस्तीफे भी दे चुके थे। इसलिए उन्हें राज्यसभा सदस्य बना देने से लेकर मध्य-प्रदेश की कमलनाथ सरकार को पटकनी देने का बीड़ा शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा ने उठा लिया था। इस घटना को अंजाम तक पहुंचाने में सहयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी कर रहे थे। इसलिए कमलनाथ सरकार को बहुमत के बावजूद गिराना आसान हो गया और इसके प्रमुख सूत्रधार शिवराज सिंह मुख्यमंत्री भी बन गए। कालांतर में सिंधिया को भी केंद्रीय मंत्री की शपथ दिला दी जाएगी। इस परिप्रेक्ष्य में सचिन दुविधा में रहे। उन्होंने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है कि वे अपने 19 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो भी रहे हैं अथवा नहीं? यदि सचिन इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो भी जाते हैं तो उन्हें कोई उपलब्धि मिलना मुश्किल है? दरअसल उनके पास इतने विधायक नहीं है कि वे भाजपा के 72 विधायकों के साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री बन जाएं? इसीलिए गहलोत सचिन को तेजाबी शब्दवाणों से कोसते हुए निकम्मा और नाकारा तक कह रहे हैं। ऐसा इसलिए भी कहा गया है कि वे सरकार में उप-मुख्यमंत्री और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए सरकार गिराने में निर्लज्जता से जुटे हैं। जबकि सिंधिया ने बगावत का रुख इसलिए किया क्योंकि उन्हें चाहने के बावजूद न तो प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह तैयार थे और न ही उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाए जाने की गारंटी दी जा रही थी। इस अनिश्चितता से उबरने के लिए उन्होंने अपने निष्ठावान अनुयायी विधायकों के साथ भाजपा का दामन थाम लेने में ही राजनैतिक भविष्य की गारंटी समझी और सफलता भी प्राप्त कर ली। राजस्थान में इतनी बड़ी राजनीतिक उठा-पटक चल रही है लेकिन यहां की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की कद्दावर नेत्री वसुंधरा राजे सिंधिया अबतक मौन हैं। सभी जानते हैं कि वे भाजपा आलाकमान की आंख की किरकिरी बनी हुई हैं। जबकि भाजपा के सहयोगी रालोपा के सांसद हनुमान बेनीवाल ने राजे पर अशोक गहलोत सरकार को बचाने में सहयोग देने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है। बावजूद भाजपा के किसी भी नेता ने बेनीवाल की लानत-मलानत नहीं की। अलबत्ता वसुंधरा राजे ने भी कांग्रेस की दबे स्वर में आलोचना जरूर की, पर उनको लेकर गहलोत सरकार बचाने की जो शांकाएं की जा रही हैं, उस सिलसिले में कोई सफाई नहीं दी। दरअसल राजे गहलोत सरकार गिराने के खेल से इसलिए दूर बनी हुई हैं क्योंकि वे भलि-भांति जानती हैं कि यदि कांग्रेस सरकार गिरती भी है तो केंद्रीय नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री बना देने का अवसर नहीं देगा। इस पद पर अलाकमान के पसंदीदा केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत बिठाए जा सकते हैं? दरअसल वसुंधरा की आलाकमान अर्थात नरेंद्र मोदी से आरंभ से ही नहीं पटी। तमाम कोशिशों के बावजूद वसुंधरा लगातार चौथी बार धौलपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीते अपने बेटे दुष्यंत को केंद्र सरकार का हिस्सा नहीं बना पाई हैं। उनके भतीजे ज्योतिरादित्य के भाजपा में आने से उनकी बची-खुची उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है। ऐसे में गहलोत सरकार गिरी तो उन्हें भाजपा के 72 विधायकों पर भी पकड़ मजबूत बनाए रखना चुनौती साबित होगी? गोया, गहलोत सरकार गिर भी जाती है तो सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तो मुश्किल होगा ही वसुंधरा भी कोई गुल खिला दें, ऐसा लगता नहीं है? ऐसे में अंततः राजस्थान में मध्यावधि चुनाव की ज्यादा उम्मीद लगती है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 July 2020


bhopal, Pakistanis confess , stabbing in the back

  बिक्रम उपाध्याय कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक ने सैनिकों को सलाम किया। जागरूक देशवासियों ने भी उनको नमन किया। देशवासियों के सामने  21 साल पहले पाकिस्तान के छल को लोगों ने सामने रखा।1999 में  कारगिल और उसके आसपास की चोटियों  पर उसने चुपचाप कब्ज़ा कर लिया। पाकिस्तान के कुछ  सैन्य अधिकारियों का यह सोचना था कि भारत कारगिल को छुड़ाने के लिए कोई बड़ी जंग नहीं करेगा और पाकिस्तान उस कब्जे के बदले या तो सियाचिन से भारत को हट जाने के लिए विवश करेगा या भारत सरकार को लंबे समय तक युद्ध में फंसा कर कश्मीर में अपनी शर्तें मनवा लेगा। लेकिन हुआ ठीक इसके उलटा। पाकिस्तान न सिर्फ कारगिल में बुरी तरह हारा बल्कि पूरी दुनिया में उसकी थू-थू हुई। भारत के जवाबी हमले का अंदाजा पाकिस्तान को बिल्कुल नहीं था।   हालांकि शुरुआत में कहता रहा कि कारगिल में जो कुछ हुआ वह भारत के खिलाफ जंग लड़ रहे, कश्मीर की आजादी चाहने वाले लोग थे। लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ समेत वहां के अनेक राजनेताओं ने विभिन्न मंचों से समय-समय पर यह स्वीकार किया कि यह पूरी तरह से पाकिस्तानी सेना की करतूत थी और इसकी साजिश तत्कालीन सेना प्रमुख और बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे परवेज मुशर्रफ ने रची थी।   पाक के पूर्व सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन का खुलासा मुशाहिद हुसैन ने खुद बीबीसी उर्दू को बताया कि उन्हें उस वक्त डीजी (आईएसपीआर) ने ही बताया कि कारगिल में पाकिस्तान की रेगुलर आर्मी थी। वहां पाकिस्तान की नार्दन लाइट इनफैंट्री बैठी थी। पाकिस्तान के इस दावे, कि कारगिल की लड़ाई वह जीत चुका था, की हवा खुद मुशाहिद हुसैन ने ही बीबीसी उर्दू के साथ अपनी बातचीत में निकाल दी। उन्होंने कहा- मेरी नजर में कारगिल में हमने (पाकिस्तान ने) वही भूल की जो 1965 में की थी कि हमने सरकार के स्तर पर सामूहिक निर्णय नहीं लिया। जिसका पाकिस्तान को बहुत बड़ा नुकसान हुआ। कश्मीर के संघर्ष को आतंकवाद के साथ जोड़ दिया गया और अमेरिका का भारत की तरफ रुझान बढ़ गया। मुशाहिद हुसैन ने उस इंटरव्यू में यह भी माना कि पाकिस्तान की आर्मी के जवान काफी संख्या में कारगिल में मारे गए और पाकिस्तान उन तक मदद भी नहीं पंहुचा पाया। पाकिस्तान की फौज के अंदर ही कोआर्डिनेशन नहीं था, केवल चार-पांच लोगों को ही यह मालूम था। कोर कमांडर को भी कारगिल के बारे में नहीं पता था। इस बातचीत में मुशाहिद हुसैन ने यह खुलासा किया कि पाकिस्तानी सेना तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लाहौर आने से खुश नहीं थी। एक उर्दू पत्र ने वाजपेयी के आने से दो-तीन दिन पहले बड़ी हेडलाइन के साथ यह खबर छापी थी कि फौज ने वाजपेयी को रिसीव करने से इनकार किया।   नजम सेठी ने बताया गैंग ऑफ़ फोर का षड्यंत्र पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने जियो न्यूज पर कहा- 1999 में आर्मी चीफ जनरल मुशर्रफ, चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जनरल अजीज, जो कि कश्मीर में जिहाद के लिए भी जिम्मेदार थे और आईएसआई में रह चुके थे, टेंथ कोर के कमांडर जनरल महमूद और कारगिल इलाके के इंचार्ज ब्रिगेडियर जावेद हसन, जिन्हें गैंग ऑफ़ फोर भी कहा जाता है, ने कारगिल ऑपरेशन की तैयारी की। नजम सेठी के अनुसार इन चारों मिलिट्री अफसरों की सोच यह थी कि कारगिल पर कब्जा कर सियाचिन का बदला ले लिया जाएगा और अगर भारत अपनी सेना कारगिल में हमें हटाने के लिए भेजेगा, तब हम कश्मीर में भारी संख्या में मुजाहिदीन भेजकर वहाँ खून खराबा मचा देंगे। मुशर्रफ की यह भी सोच थी कि भारत कारगिल छुड़ाने के लिए पाकिस्तान के साथ बॉर्डर पार कर लड़ाई नहीं लड़ेगा, क्योंकि उसे मालूम है कि अब पाकिस्तान भी न्यूक्लियर स्टेट है। नजम सेठी  के अनुसार इन चारों मिलिट्री अधिकारियों ने ऑपरेशन पर पूरी तरह से विश्वास रखते हुए पहले 200 पाकिस्तानी जवानों को मुजाहिदीन के कपड़े पहनाकर जनवरी 1999 में कारगिल की पहाड़ियों की चोटी पर भेजा। वे दो महीने में रेंगते हुए कारगिल हिल पर पहुंचे। धीरे-धीरे पाकिस्तान अपने जवानों की संख्या बढ़ाता गया और मई तक भारत के 140 पोस्ट को कब्जे में ले लिया। ये वे आउट पोस्ट थीं जिन पर आपसी सहमति से सैनिक नहीं तैनात किए जाते थे। खासकर बर्फ के दिनों में दोनों तरफ के सैनिक आउट पोस्ट खाली कर कैंप में चले जाते थे। इन्हीं सैन्य चौकियों पर पाकिस्तान ने योजना बनाकर धोखे से कब्जा कर लिया।   इन गैंग ऑफ फोर ने इतना सीक्रेट प्लान चलाया कि 15 मई, 1999 तक  डीजीएमओ, डीजीएमआई, आईएसआई, एयरफोर्स चीफ और नेवी चीफ में से किसी को पता नहीं था कि कारगिल में पाकिस्तानी सेना कुछ कर रही है। यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी मई के तीसरे सप्ताह में तब इसकी ब्रीफिंग दी गई जब भारत के साथ जंग शुरू हो गई थी और यह सूचना भी आईएसआई ने दी थी। लेकिन उस समय भी नवाज शरीफ को यह नहीं बताया गया कि कारगिल हाइट्स पर पाकिस्तान की सेना बैठी है। उन्हें यह जानकारी दी गई कि वहां मुजाहिदीन हैं और सेना बस उन्हें कुछ सहायता दे रही है। नजम सेठी के अनुसार 20 मई, 1999 के आसपास जब मियां नवाज शरीफ चीन में थे और उनकी लंबी बातें पाकिस्तान के मिलिट्री अधिकारियों से हो रही थीं तब किसी ने उनकी बातचीत को टेप कर लिया और बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल गई कि कारगिल में पाकिस्तानी सेना थी। भारत के प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी नवाज शरीफ को फोन पर कारगिल पहाड़ियों पर पाकिस्तानी सेना के होने की बात कही। नजम सेठी के अनुसार मई 1999 के अंत तक भारत ने अपनी सेना को कारगिल युद्ध में पूरी तरह से उतार दिया था। भारतीय वायुसेना भी ऑपरेशन में शामिल हो गई थी, जबकि पाकिस्तान अपने सैनिकों के लिए कुछ भी नहीं भेज पा रहा था। भारत ने अमेरिका, रूस, चीन और ब्रिटेन सहित तमाम देशों को यह बताया कि पाकिस्तान किस तरह भारत की सीमा में आकर मिलिट्री ऑपरेशन कर रहा है।  नजम सेठी के अनुसार भारत ने बोफोर्स गन से इतनी फायर की थी कि पाकिस्तान के पांव उखड़ गए। भारी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। बकौल नजम सेठी, पाकिस्तान न सिर्फ कारगिल का युद्ध हारा बल्कि आंतरिक स्तर पर कश्मीर को लेकर जो राय उसके पक्ष में बन सकती थी, वह भारत के पक्ष में बन गई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर इतना दबाव बन गया कि उन्हें अपनी ही सेना के खिलाफ कार्रवाई के आर्डर देने पड़ गए। सबसे बड़ी बात कि चीन ने भी पाकिस्तान का कोई साथ नहीं दिया।   'विटनेस टू ब्लंडर' से पाकिस्तान की किरकिरी कारगिल पर किताब 'विटनेस टू ब्लंडर' लिखने वाले पाकिस्तान के कर्नल अशफाक हुसैन का कहना है- कारगिल में पाकिस्तान की सेना की सफलता उस वक्त तक थी जबतक भारत की सेना से सामना नहीं हुआ था। पाकिस्तान की सेना उस वक्त लाइन ऑफ कंट्रोल को पार कर कारगिल हाइट्स पर चली गई जब वहां भारत मौजूद नहीं था। उनका कहना था कि जून से पहले भारत को पता ही नहीं चलेगा। जिन पाकिस्तानी सेना के जवानों को वहाँ भेजा गया था उन्हें भी यह नहीं बताया गया था कि क्या करने जा रहे हैं। कर्नल अशफाक ने आगे कहा कि कारगिल युद्ध में शामिल कई मिलिट्री अधिकारियों से मैंने एक ही बात पूछी कि कारगिल में आपका उद्देश्य क्या था, सबने कहा कि उन्हें मालूम नहीं क्या हासिल करना था।   इसी तरह कारगिल पर एक और पाकिस्तानी जनरल शाहिद अजीज ने एक किताब 'ये ख़ामोशी कहां तक' लिखी है। उन्होंने पाकिस्तान के एक टीवी चैनल पर बातचीत में कहा- कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के 600 सैनिकों के शव आए और कई सैनिकों के शव हमने लिए ही नहीं। हम शायद यह बताना नहीं चाहते थे कि हमारे सैनिक मारे गए थे। जनरल शाहिद अजीज ने स्पष्ट कहा कि जिन पोस्टों पर हमने कब्जा किया था, हमारे पास वहां से हटने या मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। अजीज ने इस कार्यक्रम में जनरल मुशर्रफ के उस दावे को भी सरासर गलत बताया कि जिसमें मुशर्रफ ने दावा किया था कि पाकिस्तान की राजनीतिक कमजोरी के कारण हम कारगिल हारे। शाहिद अजीज के अनुसार कारगिल युद्ध की कोई तैयारी नहीं की गई थी, वहाँ से निकलने का कोई मार्ग नहीं बनाया गया था। शाहिद अजीज पाकिस्तान में 12 अक्टूबर, 1999 को हुए तख्तापलट को भी कारगिल में हार को जिम्मेदार मानते हैं।   उनका कहना था कि कारगिल में मुँह की खाने के बाद जनरल मुशर्रफ को यह डर हो गया था कि नवाज शरीफ उनके खिलाफ कोई इन्कवायरी बिठाएंगे। पाकिस्तान में कारगिल की हार का बड़ा असर हुआ। वहां सेना और सरकार के बीच में टकराव हुआ और पाकिस्तान में तख्तापलट हो गया।   मियां शरीफ का कबूलनामा सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ ने स्वयं माना कि यह पाकिस्तान की करतूत थी, जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं थे। मियां शरीफ ने तख्ता पलट जाने और उसके बाद मुशर्रफ के भी देश छोड़ देने के बाद एक जनसभा में कहा कि मैंने तो भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। खुद प्रधानमंत्री बाजपेयी बस से लाहौर आए थे। उसके बाद जो हुआ तो प्रधानमंत्री बाजपेयी ने मुझे फोन कर कहा कि आपने हमारी पीठ में छुरा घोंपा है। मैं उनकी बात का जवाब नहीं दे सका। क्योंकि यह बात सही थी।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 27 July 2020


bhopal, New maneuver of Zakir Naik

  आर.के. सिन्हा अपने को इस्लामिक विद्वान बताने वाला ढोंगी और खुराफाती जाकिर नाईक बाज आने से रहा। वह सुधरने की कोशिश भी नहीं कर रहा। यह उसकी फितरत ही नहीं है। भारत में अपने विवादास्पद बयानों से समाज को बांटने का कोई भी मौका न छोड़ने वाले नाईक ने अब मलेशिया से यह कहा है कि पाकिस्तान सरकार को इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर निर्माण की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अगर यह होता है तो यह गैर-इस्लामिक होगा। अब कोई उससे पूछे कि तुम्हें इस बात से क्या मतलब कि पाकिस्तान मंदिर के निर्माण की अनुमति दे या ना दे? पर नाईक को तो सारे वातावरण को विषाक्त करना है। एक जहरीले शख्स से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं। उसके तो खून में हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा करना है। लगता है जैसे उसके बाप-दादा भारतवंशी हैं ही नहीं। सीधे ऊपर से मुंबई में आ टपके थे। जाकिर नाइक लगभग चार साल से भारत से भागकर मलेशिया जाकर बसा हुआ है। उसे वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने शरण दे दी थी। अब महातिर सत्ता से बाहर हो चुके हैं। कथित उपदेशक जाकिर नाइक पुत्रजया शहर में रहता है। इसका शाब्दिक अर्थ है जय के पुत्र का बसाया शहर। यह शहर मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के कुछ ही दूर है। वहां रहकर नाईक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू समाज की हर दिन मीनमेख निकालता रहता है। नाईक ने मलेशिया के हिंदुओं को लेकर भी तमाम घटिया बातें कही हैं। एकबार उसने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू मलेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर से ज़्यादा मोदी के प्रति समर्पित हैं। अब आप समझ सकते हैं कि कितना नीच किस्म का इँसान है नाईक। दरअसल मलेशिया में 20-25 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। ये अधिकतर तमिल हिन्दू हैं। कुछ भारतीय मुसलमान और सिख भी हैं। वहां के भारतवंशी भारत से भावनात्मक स्तर पर तो जुड़े हैं, पर वे मलेशिया को ही अपना देश मानते हैं। वे वहां की संसद तक में हैं। मंत्री हैं। उन पर नाईक की बेहद गैर-जिम्मेदराना और विद्वेषपूर्ण टिप्पणी कतई सही नहीं मानी जा सकती है। एक राय यह भी है कि जाकिर नाईक ने पाकिस्तान में मंदिर न बनाने संबंधी बयान देकर पाकिस्तान के कठमुल्लों को खुश कर दिया है। यानी अगर इन्हें मलेशिया से कभी बाहर किया गया तो उन्हें पाकिस्तान में सिर छिपाने की जगह तो मिल ही जाएगी। जाकिर के हक में हाफिज सईद और मौलाना अजहर महमूद जैसे कठमुल्ले पाकिस्तान सरकार पर दबाव डालने लगेंगे ताकि उसे पाकिस्तान में शरण मिल जाए। इसीलिए वह पाकिस्तान में मंदिर के निर्माण का विरोध कर रहा है। नाईक को कहीं न कहीं यह भी लग ही रहा है कि अब वे बहुत लंबे समय तक मलेशिया में नहीं रह पाएँगे क्योंकि वहां उनके संरक्षक महातिर मोहम्मद सत्ता से बाहर हो चुके हैं। महातिर मोहम्मद भारत के पक्के दुश्मन थे। वे कश्मीर से लेकर तमाम मसलों पर भारत की निंदा करने से बाज नहीं आते थे। ऐसा पहले नहीं था लेकिन जब से मोदी सरकार आई, उनका रुख बदला। वैसे भी नब्बे पार महातिर के पैर कब्र में हैं। दूसरी बात यह भी है कि मलेशिया के अल्पसंख्यक हिन्दू जाकिर नाइक की उनके देश में उपस्थिति से बेचैन हैं। उनकी चाहत है कि मलेशिया सरकार जाकिर नाइक को भारत भेज दे ताकि उसके खिलाफ भारत में लगे अभियोग कोर्ट में चल सकें। जाकिर इस दबाब से बचना चाहता है। इसी कारण पाकिस्तान का रुख कर रहा है। जाकिर नाइक के खिलाफ भारत में वॉरंट जारी है। हमेशा टाई सूट पहनने वाले नाईक पर सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के गंभीर अभियोग हैं। भारत सरकार इस अभियोगों के आधार पर मलेशिया सरकार से जाकिर नाइक को प्रत्यर्पित करने की लगातार मांग कर रही है। पर मलेशिया की सरकार अभीतक धूर्त नाईक को बचाती रही थी। चूंकि अब महातिर मोहम्मद सत्ता के केन्द्र में नहीं हैं इसलिए नाईक परेशान बताया जाता है। अब लगता है कि अगर मलेशिया से निकाला गया तो उसके लिए पाकिस्तान ही एकमात्र जगह हो सकती है इसलिए वे अब पाकिस्तानी कठमुल्लों को खुश करने में लगे हैं। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में पहले से ही हिन्दू मंदिर बनने को लेकर अवरोध और विरोध जारी है। हालत यह है कि धार्मिक सभाओं में हिंसक धमकियां दी जा रही हैं। पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक फतेह ने इसे लेकर वीडियो भी ट्वीट किया है। उसमें कई मौलाना मंदिर बनाए जाने पर सिर काटने की धमकी दे रहे हैं। एक मौलाना धमकी देते हुए कह रहा है कि जो लोग इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर बनाने का समर्थन कर रहे हैं, उनके सिर काट दिए जाएंगे। 'तुम्हारे सिर मंदिर में चढ़ा दिए जाएंगे और कुत्तों को खिला दिए जाएंगे।' पाकिस्तान बनने के 70 सालों में उसकी राजधानी में किसी एक भी मंदिर का न बनना सिद्ध करता है कि वह घोर सांप्रदायिक देश है। तो जाकिर नाईक और पाकिस्तानी मौलाना इस्लामाबाद में मंदिर के निर्माण पर लगभग एक जैसी भाषा बोल रहे हैं। गौर करें कि कुछ साल पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी अबू धाबी के पहले हिन्दू मंदिर के भूमि पूजन में शामिल हुए थे तब तो नाईक ने कोई विरोध नहीं जताया था। उन्होंने यूएई सरकार के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला था। अबू धाबी सरकार ने मंदिर बनाने के लिए 20 हजार वर्ग मीटर जमीन हिन्दुओं को दी थी। नाईक ने विरोध इसलिए नहीं जताया था क्योंकि उसे पता था कि यूएई सरकार उसे घास तक नहीं डालेगी। उसके लिए वहां शरण की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि भारत-यूएई के बीच बहुत मधुर संबंध हैं। तो वह बहुत समझदारी और धूर्तता से अपना खेल खेल रहा है। लगता है कि नाईक भी दाऊद इब्राहिम की तरह पाकिस्तान में शेष जीवन बिताना चाहता है। भारत आया तो वह सीधा जेल की हवा खाएगा। सख्त सजा तो निश्चित है ही। तो क्यों न एक पनाह ढूंढ लिया जाये। उसने भारत के सीधे-सादे मुसलमानों को सांप्रदायिकता की ज्वाला में झोंकने का कोई अवसर नहीं छोड़ा। वह अंग्रेजी बोलने वाला एक कठमुल्ला शातिर उपदेशक है। जाकिर नाईक भारत के बहुलतावादी समाज और संस्कृति पर कलंक है। भारत शहीद ब्रिगेडियर अब्दुल हमीद, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम, एक्टर इरफान खान जैसों का सम्मान करता है। उन्हें देश का गौरव मानता है। ये देश के नायक इसलिए नहीं हैं कि ये सिर्फ मुसलमान हैं। यह अपनी देशभक्ति और जनसेवा के चलते देश के नायक बने। फिर यह देश जाकिर नाईक जैसे समाज तोड़ने वाले को अपना नायक कैसे मान ले। भारत के खून में धर्मनिरपेक्षता है। हमारी संस्कृति के मूल में ही "सर्वधर्म-समभाव" है। इसी भारत की एयरफोर्स के चीफ इदरीस हसन लतीफ रहे हैं। राष्ट्रपति डॉ. अबुल कलाम रहे हैं। पर नाईक को भारत में सबकुछ बुरा नजर आता है। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 25 July 2020


bhopal, Big ways of barrier free farming

  प्रमोद भार्गव भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए दो अध्यादेश लागू कर किसानों को बड़ी राहत देने के उपाय किए हैं। अब किसान अपनी फसल को देश की किसी भी कृषि उपज मंडी में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गईं मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा एक अध्यादेश के जरिए दूर कर दी गई है। एक अन्य अध्यादेश लागू कर किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार, खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य' (संवर्धन एवं सुविधा) और 'किसान समझौता एवं कृषि सेवा' अध्यादेश लागू कर दिए हैं। ये अध्यादेश किसान को फसल के इलेक्ट्रॉनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। छह माह के भीतर इन अध्यादेशों को कानूनी रूप दे दिया जाता है तो भारतीय कृषि को नए युग में प्रवेश का रास्ता खुल जाएगा और किसान का आर्थिक रूप से तो सरंक्षण होगा ही, खेती-किसानी का ढांचा भी सशक्त होगा। हालांकि बीते छह साल से नरेंद्र मोदी सरकार की यह कोशिश निरंतर बनी हुई है कि किसान की आय दोगुनी हो और खेती उन्नत होने के साथ किसान व गांव आत्ममिर्भर हो। दरअसल इस कोरोना संकट में खेती देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के रूप में रेखांकित हुई है, इसलिए उसके सरंक्षण के उपाय जरूरी हैं। पिछले चार माह से चल रहे कोरोना संकट ने अब तय कर दिया है कि आर्थिक उदारीकरण अर्थात पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की पोल खुल गई है और देश आर्थिक व भोजन के संकट से मुक्त है तो उसमें केवल खेती-किसानी का सबसे बड़ा योगदान रहा है। भारत सरकार ने इस स्थिति को समझ लिया है कि बड़े उद्योगों से जुड़े व्यवसाय और व्यापार जबरदस्त मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। वहीं किसान ने 2019-20 में रिकॉर्ड 29.19 करोड़ टन अनाज पैदा करके देश की ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को तो तरल बनाए ही रखा है, साथ ही पूरी आबादी का पेट भरने का इंतजाम भी कर दिया है। इसबार अनाज का उत्पादन आबादी की जरूरत से 7 करोड़ टन ज्यादा हुआ है। किसान भविष्य में भी फसल उत्पादन बढ़ाए रखे इस दृष्टि से 14 फसलों का समर्थन मूल्य भी बढ़ाकर नए सिरे से तय किया है। सबसे ज्यादा कीमत 755 रुपए प्रति क्विंटल रामतिल की बढ़ाई गई है, क्योंकि इस फसल का उत्पादन लगातार कम हो रहा है। इसके पीछे तेल उत्पादन के लक्ष्य को बढ़ावा देना भी है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और किसान को इसलिए भी बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि देश से किए जाने वाले कुल निर्यात में 70 प्रतिशत भागीदारी केवल कृषि उत्पादों की है। यानि सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा कृषि उपज निर्यात करके मिलती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अमर्त्य सेन और अभिजीत बनर्जी सहित थॉमस पिकेटी दावा करते रहे हैं कि कोरोना से ठप हुई ग्रामीण भारत पर जबरदस्त अर्थ-संकट गहराएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2017-18 के निष्कर्ष ने भी कहा था कि 2012 से 2018 के बीच एक ग्रामीण का खर्च 1430 रुपए से घटकर 1304 रुपए हो गया है। जबकि इसी समय में एक शहरी का खर्च 2630 रुपए से बढ़कर 3155 रुपए हुआ है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत में यही परिभाषित है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा में गरीब आदमी को ही सबसे ज्यादा संकट झेलना होता है। लेकिन इस कोरोना संकट में पहली बार देखने में आया है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार रहे बड़े और मध्यम उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी भी न केवल आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, बल्कि उनके समक्ष रोजगार का संकट भी पैदा हुआ है। लेकिन पिछले तीन महीने में खेती-किसानी से जुड़ी उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि देश को कोरोना संकट से केवल किसान और पशु-पालकों ने ही बचाए रखने का काम किया है। किसान और पशु-पालकों का ही करिश्मा है कि पूरे देश में कहीं भी खाद्यान्न संकट पैदा नहीं हुआ। यही नहीं जो प्रवासी मजदूर ग्रामों की ओर लौटे उनके लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था का काम भी गांव-गांव किसान व ग्रामीणों ने किया है। वे ऐसा इसलिए कर पाए, क्योंकि उनके घरों में अन्न के भंडार भरपूर थे। इसलिए अब अनुत्पादक लोगों की बजाय, उत्पादक समूहों को प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। इस परिप्रेक्ष्य में अन्नदाता की आमदनी सुरक्षित करने की जरूरत है। क्योंकि समय पर किसान द्वारा उपजाई फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाने के कारण अन्नदाता के सामने कई तरह के संकट मुंहबाए खड़े हो जाते हैं। ऐसे में वह न तो बैंकों से लिया कर्ज समय पर चुका पाते हैं और न ही अगली फसल के लिए वाजिब तैयारी कर पाते हैं। बच्चों की पढ़ाई और शादी भी प्रभावित होते हैं। यदि अन्नदाता के परिवार में कोई सदस्य गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो उसका इलाज कराना भी मुश्किल होता है। इन वजहों से उबर नहीं पाने के कारण किसान आत्मघाती कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि पिछले तीन दशक से प्रत्येक 37 मिनट में एक किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। इसी कालखंड में प्रतिदिन करीब 2052 किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले जाते हैं। इसलिए खेती-किसानी से जुड़े लोगों की गांव में रहते हुए ही आजीविका कैसे चले, इसके पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति' लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। बीते कुछ समय से पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है। केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में 'ए-2' फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली और बढ़ जाएगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने भी वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। इन वृद्धियों से कृषि क्षेत्र की विकास दर में भी वृद्धि होने की उम्मीद बढ़ेगी। वैसे भी यदि देश की सकल घरेलू उत्पाद दर को दहाई अंक में ले जाना है तो कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत होनी चाहिए। खेती उन्नत होगी तो किसान संपन्न होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी। इसका लाभ देश की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 July 2020


bhopal, Corona: Negligence to safety standards after all

  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा कोरोना से बचाव के उपाय के प्रति हम कितने गंभीर हैं, उसे इसी से समझा जा सकता है कि झारखण्ड सरकार को मास्क नहीं लगाने पर अब एक लाख रु. तक के जुर्माने और दो साल तक की सजा का प्रावधान करना पड़ा है। पिछले दिनों एक प्रदेश के मंत्री का मास्क नहीं लगाने पर जुर्माने का समाचार आम है तो देशभर में मास्क नहीं लगाने और सोशल डिस्टेंस सहित सुरक्षा मानकों की पालना नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में चालान और जुर्माना वसूली हमारी लापरवाही को दर्शाते हैं। कोरोना संक्रमण के प्रति हम कितने गंभीर हैं, इसी से समझा जा सकता है कि अनलॉक होते ही देशभर में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए किए गए सारे उपाय धता बताते दिखने लगे हैं। कोरोना से बचने के लिए जारी बचाव उपायों की पालना के प्रति आम आदमी गंभीर नहीं है। मास्क लगाना, सोशल डिस्टेसिंग का पालन, सार्वजनिक स्थानों पर थूकना, सेनेटाइजर का उपयोग और हाथ धोने के प्रति लापरवाही साफ परिलक्षित हो रही है। मास्क नहीं पहनने सहित सुरक्षा मानकों की पालना नहीं करने के कारण होने वाले चालानों की संख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी देखी जा रही है। समूचे देश में राजस्थान पहला प्रदेश है जहां राजस्थान महामारी अध्यादेश जारी किया गया। यही कारण है कि राजस्थान में एक मोटे अनुमान के अनुसार जुलाई के पहले पखवाड़े के अंत तक दो लाख 87 हजार से अधिक चालान इस महामारी अध्यादेश के तहत हुए हैं और करीब साढ़े चार करोड़ रुपए की राशि जुर्माने के रूप में वसूल हुई है। करीब सवा लाख से अधिक चालान तो मास्क नहीं पहनने के ही हैं। बिना मास्क पहने दुकानों पर सामान की बिक्री के चालान भी यही कोई दस हजार के आसपास है। सोशल डिस्टेंसिंग की पालना नहीं करने के मामले तो रिकार्ड स्तर पर यानी सर्वाधिक एक लाख 55 हजार से अधिक सामने आए हैं। यह तो केवल और केवल सरकारी आधिकारिक आंकड़े हैं। झारखण्ड ने जिस सख्त रुख को अपनाया है और जुर्माना राशि एक लाख तक की है तो इससे स्थिति की भयावहता साफ दिखाई देती है। इसमें भी राजस्थान, झारखण्ड सहित प्रदेशों की सरकार की गंभीरता झलक रही हैं। वहीं इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि समूचे देश को इसी पैरामीटर पर देखा जाए तो हमारी लापरवाही की स्थिति कितनी गंभीर स्तर पर है, साफ हो जाती है। यह साफतौर पर मानकर चलना होगा कि जितने सरकारी आंकड़ों में मामले सामने आ रहे हैं उनसे कई गुणा अधिक लापरवाही की वास्तविकता है। ऐसे में कोरोना पर काबू पाने की बात करना बेमानी नहीं तो और क्या होगी? देश के कई प्रदेशों में कम्युनिटी स्प्रेड की आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी है, वहीं प्रतिदिन कोरोना पोजिटिव सारे रिकार्ड तोड़ते दिखाई देने लगे हैं। कोरोना संक्रमण में अब हमारा देश तीसरे पायदान पर पहुंच गया है। जब यह बात साफ हो गई है कि कोरोना से सुरक्षा मानकों की पालना ही बचाव है तो इसे समझना प्रत्येक नागरिक का दायित्व हो जाता है। पर लगता है लॉकडाउन हटते ही हमारी गंभीरता लगभग समाप्त हो गई है। दरअसल देखा जाए तो हम सभ्य नागरिक कहलाने का हक नहीं रखते। यदि हेल्थ एडवाइजरी की पालना सही तरीके से होती रहती है तो फिर कोरोना के नए प्रकरण इतनी अधिक संख्या में आने ही नही चाहिए। देशभर में 12 लाख के करीब कोरोना पोजिटिव मामले आ चुके हैं। महाराष्ट्र् में यह आंकड़ा तीन लाख को पार कर चुका है। देश-दुनिया में संक्रमितों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही हैं अपितु देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या लगतार बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में दिन-प्रतिदिन स्थिति गंभीर होती जा रही है। आखिर हमारी मानसिकता ऐसी क्यों हैं ? कई बार लगता है कि तुलसीदास जी ने सच ही कहा है कि भय बिन प्रीत न होय गोसाई। यदि हम मास्क लगाकर बाहर निकलेंगे, प्रोपर सेनेटाइज करेंगे, कार्यस्थल पर मास्क का उपयोग करेंगे, बार-बार हाथ धोएंगे, बाहर से आने पर हाथ धोने-सेनेटाइज करने आदि सुरक्षा मानकों का पालन करने से हम हमारा बचाव तो करेंगे ही दूसरों को भी संक्रमित होने से बचा सकेंगे। कोरोना संक्रमण की गंभीरता तो अब सारी दुनिया समझ ही चुकी है। ऐसे मेें सुरक्षा मानकों के पालन की प्रति हमें गंभीर होना ही होगा। हमें सबकुछ सरकार पर ही छोड़ने, सरकार की आलोचना करने, कमियां निकालने की मानसिकता से बाहर आकर अपने दायित्वों के प्रति सजग होना होगा। ऐसे में सामाजिक संगठनों का दायित्व भी अधिक हो जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि सुरक्षा उपायों को अब दुनिया का हर आदमी जानता है और समझता है। ले देकर करना भी तो यही है कि मास्क का प्रयोग करें, सोशल डिस्टेंस की पालना करें और बार-बार हाथ धोएं। यह सामान्य-सी प्रक्रिया है। हमारी आदत में आ ही जानी चाहिए। आखिर कब तक लॉकडाउन के चंगुल में हम आना चाहेंगे। कंटेनमेंट जोन या कर्फ्यू वाली स्थिति भी क्यों आएं। हमारी थोड़ी सी सजगता जब इस कोरोना महामारी से बचा सकती है तो सबकुछ ठप्प करने के हालात ही क्यों हो? आखिर हमारा भी दुनिया, देश और समाज के प्रति कोई दायित्व हो जाता है। हमें समझना होगा कि हमारी जरा-सी लापरवाही का खामियाजा समूचे देश व समाज को क्यों भुगतना पड़े। क्यों सरकार को बार-बार लॉकडाउन लगाने के लिए सोचना पड़े। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 July 2020


bhopal, Why tourists ,Buddha countries,Thailand instead, India

  आर.के. सिन्हा यह मत सोचें कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण सरकारी कामकाज और भावी योजनाओं पर स्थायी रोक लग गई है। ऐसा बिलकुल नहीं है। सच्चाई तो यह है कि सरकार के तमाम विभाग पहले की भांति ही सक्रिय हैं। सरकार का इस समय एक फोकस भगवान बुद्ध को मानने वाले देशों से पर्यटकों को भारत लाना है। यह पर्यटकों का एक बहुत बड़ा समूह है। दुनियाभर में फैले करोड़ों बौद्ध धर्म के अनुयायियों को अभीतक हम भारत के प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थलों की तरफ लाने में असफल ही रहे हैं। यह एक सच्चाई है। अबतक हमने ताजमहल और डल लेक के अतिरिक्त पर्यटकों को कहीं और आकर्षित करने की योजना बनाने की नहीं सोची।   यदि आप कभी थाईलैंड या श्रीलंका नहीं गए तो आपको यकीन नहीं होगा कि वहां के बुद्ध मंदिरों में हर समय बुद्ध देशों के हजारों पर्यटक आ-जा रहे होते हैं। ये भगवान बुद्ध की मूर्तियों के दर्शन करके अभिभूत होते हैं। इस बीच, बुद्ध देशों के पर्यटकों को भारत लाने की कोशिशों में सरकार का एक बड़ा फैसला कुशीनगर के एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाना है। यह निर्णय पूर्णतः सही है। भारत की कोशिश होनी चाहिए कि कम से कम डेढ़-दो करोड़ बुद्ध पर्यटक हमारे यहां हर साल आएं। अभी तो हमारे यहां कुछ लाख ही बौद्ध पर्यटक पहुंचते हैं। बौद्ध पर्यटकों की विशेषता यह है कि जब भी वह भारत आते हैं, दो-तीन हफ्ता गुजारते ही हैं। बोधगया से वैशाली, सारनाथ से कुशीनगर का चक्कर लगते रहते हैं। कुछ नागपुर की दीक्षा भूमि भी जाकर देखते हैं जहाँ डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।   बोधगया से सारनाथ और आगे हमें बोधगया में अधिक से अधिक पर्यटकों को लाना होगा। यहाँ ही राजकुमार सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई और वे बुद्ध बने। बोधगया आने वाले पर्यटक सारनाथ भी अवश्य जाते हैं। सारनाथ में बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद अपना पहला उपदेश दिया था। बौद्ध अनुयायियों का गौतम बुद्ध की जन्मस्थली और कार्यस्थली भारत को लेकर आकर्षण स्वाभाविक है। बोधगया-राजगीर-नालंदा सर्किट देश के सबसे खासमखास पर्यटन स्थलों में माना जाता है। इधर दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका, जापान वगैरह से पर्यटक पहुंचते हैं। उसके बाद राजगीर चले जाते हैं, जहां से बुद्ध ने अपनी आगे की यात्रा की। यूं तो पर्यटक सालभर आते ही रहते हैं पर अक्तूबर से मार्च तक इनकी संख्या सबसे अधिक रहती है। अगर आप इन सैलानियों की संख्या की तुलना थाईलैंड और श्रीलंका से करेंगे तो आप निराश होंगे। इन दोनों छोटे से देशों में भारत की तुलना में कई गुना अधिक बुद्ध सैलानी पहुंचते हैं।   बेशक, जब से बौद्ध सर्किट से जुड़े स्थानों को बेहतर बनाने का सिलसिला शुरू हुआ है, तब से थाईलैंड, श्रीलंका, साउथ कोरिया, जापान और दूसरे तमाम बौद्ध देशों से आने वाले पर्यटकों की तादाद में कुछ इजाफा तो हुआ है। पर अभी हमें बहुत कुछ और भी करना है। अकेले थाईलैंड में ही हर साल साढ़े चार-पांच करोड़ पर्यटक आते हैं। श्रीलंका में भी इसी प्रकार आते हैं। बोधगया और उससे सटे बुद्ध सर्किट के शहरों-राजगीर और नालंदा, वैशाली, वाराणसी, सारनाथ और कुशीनगर का दौरा करने वाले पर्यटक साल भर में मोटा पैसा खर्च करते है।   बने नए बुद्ध तीर्थ स्थल एक बात समझनी होगी कि जैसे थाईलैंड में नए-नए बुद्ध तीर्थस्थल विकसित हो रहे हैं, उसी तरह से हमें भी बौद्ध सर्किट के विकास पर जोर देना होगा। हमने कुछ किए भी हैं। उदाहरण के रूप में राजधानी दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित महाबोधि मंदिर है। यह दिल्ली का पहला बुद्ध मंदिर है। इसका उदघाटन महात्मा गांधी ने 1939 में किया था। महाबोधि मंदिर में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर जैसी शख्सियतें भी विशेष अवसरों पर आती रही हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की एक सुंदर मूर्ति स्थापित है। इधर भी विदेशी पर्यटक लाए जाए जा सकते हैं। इसी तरह से राजधानी का बुद्ध जयंती पार्क है। बुद्ध जयंती पार्क भगवान बुद्ध के निर्वाण के 2500वें वर्ष के स्मरणोत्सव के समय 1959 में तैयार किया गया था। इसमें भिक्षु शासनधर सागर ने 2 अक्तूबर 1993 को महात्मा बुद्ध के एक मंदिर का उद्घाटन किया था। इधर बुद्ध की बैठी हुई अवस्था में प्रतिमा है। बुद्ध जयंती पार्क में एक पीपल का वृक्ष भी है जिसका संबंध भगवान बुद्ध से है। जिस पीपल के पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था, उसकी एक टहनी सम्राट अशोक के पुत्र द्वारा श्रीलंका में भी रोपित की गई थी। श्रीलंका की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती सिरिमाओ भंडारनायके ने इस वृक्ष की एक टहनी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को 1964 में भेंट की थी। उन्होंने उसी टहनी को 25 अक्तूबर 1964 को यहां रोपित किया। आज यह वृक्ष पूर्ण रूप से हरा भरा है।   दरअसल,भारत में विदेशी पर्यटकों के आने का क्रम जो मेगस्थनीज, फाह्यान, हवेन त्सांग वगैरह के साथ शुरू हुआ था, वह जारी है। पर रहना चाहिए, हमारे यहां दुर्भाग्य से पर्याप्त पर्यटक नहीं आते। दुनियाभर के लिए भारत कौतूहल पैदा करता है। भारत का चप्पा-चप्पा पर्यटकों को अपनी तरफ खींचता है। हर तरह के पर्यटकों को भारत भाता भी है। सबकी दिलचस्पी का भारत में कुछ न कुछ है ही। इतिहास के दर्शन करने वालों से लेकर, घने जंगलों में विचरण करते पशुओं को देखने की चाहत रखने वालों से लेकर, अध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए बेजोड़ है भारत। भारत में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस और श्रीलंका से सबसे ज्यादा सैलानी आते हैं। इस तरह का दावा भारत का पर्यटन मंत्रालय करता है। कुल विदेशी पर्यटकों में 16 फीसद अमेरिका और 12.6 फीसद ब्रिटेन से आते हैं। विदेशी पर्यटकों के सबसे पसंदीदा पाँच स्थान आगरा, गोवा, केरल, वाराणसी और दिल्ली/कश्मीर माने जाते हैं।   आमतौर पर माना जाता है कि पर्यटक कुछ खास पर्यटन स्थलों को ही देखने के लिए यहां आते हैं। इसके साथ यह भी सच्चाई है कि अब बड़ी संख्या में पर्यटक भारत के कुछ शहरों तक अपने सफर को सीमित रखते हैं। साऊथ अफ्रीका के राजधानी में तैनात एक रायनयिक ने बताया कि उनके देश के पर्यटक दिल्ली और मुंबई भर ही जाना चाहते हैं। दिल्ली में उन्हें गांधी जी की समाधि के साथ-साथ कुतुब मीनार, लाल किला, पुराना किला, लोटस टेम्पल और अक्षरधाम मंदिर देखने को मिल जाता है। मौका लगने पर वे ताजमहल देखने आगरा भी चले जाते हैं।कहते हैं कि अमेरिकियों के लिए कोई खास शहर या स्थान अहमियत नहीं रखता। इनमें से बहुत सारे दिल्ली, जयपुर, आगरा, वाराणसी तो जाते ही हैं। कुछ दिल्ली, मुंबई और केरल ही जाना पसंद करते हैं। गोवा भी अनेकों विदेशी पर्यटक जाना पसंद करते हैं? गोवा के अद्भुत समुद्री तट साऊथ अमेरिका और कैरिबियाई द्वीपों से बहुत मिलते-जुलते हैं। इसलिए इन देशों से आने वाले पर्यटकों को गोवा का सफर अच्छा लगता है। देखिए, हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि सारी दुनिया से हमारे यहां सैलानी सैर-सपाटे के लिए आएं। उनके आने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और लोगों को रोजगार मिलता है। पर हमें पहला फोकस बुद्ध देशों पर ही करना होगा। इन्हें हम छोड़ने की मूर्खता नहीं सकते।  (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 23 July 2020


bhopal, India does not become American pawn

  डॉ. वेदप्रताप वैदिक आजकल भारत और अमेरिका के बीच जैसा प्रेमालाप चल रहा है, मेरी याददाश्त में कभी किसी देश के साथ भारत का नहीं चला। शीतयुद्ध के घनेरे बादलों के दौरान जवाहरलाल नेहरू और सोवियत नेता ख्रुश्चोफ और बुल्गानिन के बीच भी नहीं। इसका कारण शायद यही समझा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को सम्मोहित कर लिया है। यह समझ नहीं, भ्रम है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यक्तिगत संबंधों की भूमिका बहुत सीमित होती है। उसका संचालन राष्ट्रहितों के आधार पर होता है। इस समय ट्रंप प्रशासन चीन के घुटने टिकवाने के लिए कमर कसे हुआ है। इसीलिए वह भारत के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम दिखाई पड़ रहा है। उसने कोविड-19 के लिए चीन को सारी दुनिया में सबसे ज्यादा बदनाम किया। उसने चीन के विरुद्ध यूरोपीय संघ और आग्नेय एशिया के राष्ट्रों को लामबंद किया। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में चीन को धमकाने के लिए एक प्रस्ताव भी लाया गया। उसमें अमेरिकी सांसदों ने चीन से कहा है कि वह भारत के साथ तमीज से पेश आए। डंडे के जोर से वह भारत की जमीन हड़पने की कोशिश न करे। अमेरिका ने ताइवान को लेकर पहले चीन से अपनी भिट्टियां भिड़ा रखी थीं, अब हांगकांग के सवाल पर उसने पूरा कूटनीतिक मोर्चा ही खोल दिया है। दक्षिण चाइना-सी के मामले में वह चीन के पड़ौसी और तटवर्ती राष्ट्रों का खुलकर समर्थन कर रहा है। गलवान घाटी में हुई भारत-चीन मुठभेड़ तो ऐसी है, जैसे ट्रंप के हाथों बटेर लग गई। पहले उन्होंने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पहल की और फिर चीन के विरुद्ध छर्रे छोड़ने शुरू कर दिए। हमारे अंडमान-निकोबार द्वीप के आस-पास अमेरिकी नौ सैनिक जहाज 'निमिट्ज' के साथ भारतीय जहाज सैन्य-अभ्यास भी कर रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि यदि उसे चीन के खिलाफ एक विश्व-मोर्चा खोलना पड़े तो एशिया में भारत उसका सिपहसालार बने। भारत को अमेरिका का यह अप्रत्याशित टेका भी खूब सुहा रहा है, क्योंकि भारत के लगभग सभी पड़ोसियों पर चीन ने डोरे डाल रखे हैं लेकिन भारतीय विदेश-नीति निर्माता यह भयंकर भूल कतई न करें कि वे अमेरिका के मोहरे बन जाएं। इस अमेरिकी मजबूरी का फायदा जरूर उठाएं लेकिन यह जानते हुए कि ज्यों ही अमेरिकी स्वार्थ पूरे हुए कि वह भारत को भूल जाएगा और फिर ट्रंप का कुछ पता नहीं कि वे दुबारा राष्ट्रपति बनेंगे या नहीं? (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 July 2020


bhopal, Is it necessary to write fail

  डॉ. रामकिशोर उपाध्याय पहली बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) ने 12 वीं का परीक्षा परिणाम घोषित करते समय एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है-अंक तालिका में ‘फेल’ शब्द के स्थान पर ‘एसेंशियल रिपीट’ शब्द लिखा गया है। स्वतंत्रता पश्चात शिक्षा-क्षेत्र में अबतक के निर्णयों में यह सबसे महत्वपूर्ण, मानवतावादी और गरिमायुक्त निर्णय है। किन्तु फेल शब्द केवल इसीबार के लिए हटाया गया है अथवा हमेशा के लिए, यह अभी स्पष्ट नहीं है। यदि यह कोरोना महामारी के कारण उठाया गया कदम है तो भी इसपर विचार कर फेल शब्द को हमेशा के लिए हटा देना चाहिए क्योंकि फेल शब्द भी एक माहमारी ही है जो अनेक प्रतिभाओं को निगल जाती है। वर्ष पर्यंत किये गए श्रम का मूल्यांकन केवल तीन घंटे की लिखित परीक्षा के आधार पर कर देना भी कोई वैज्ञानिक पद्धति नहीं है। इसमें भी सुलेख, आगे पीछे वाले से थोड़ी बहुत पूछताछ का अवसर, याद किये गए प्रश्नों का ही आ जाना, शिक्षक द्वारा बनवाए गए नोट्स में से प्रश्न-पत्र का मेल खा जाना, स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक की गुणवत्ता और कहीं-कहीं नकल का चल जाना आदि कारकों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। किन्तु हमारे तंत्र को तो दो ही शब्द भा गए हैं- फेल या पास। चूँकि पास होने वाले नौकरी भी मांगेंगे इसीलिये उनमें फिर से श्रेणी विभाजन। यहाँ भी तृतीय श्रेणी वालों को लगभग अछूत जैसा ही माना जाता है। अब स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि 60-65 प्रतिशत प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में से भी अधिकांश के माता-पिता विशेष प्रसन्नता व्यक्त नहीं करते। मैंने फेसबुक पर एक भी पोस्ट ऐसी नहीं देखी जिसमें 70 प्रतिशत से कम वाले को भी कोई बधाई देता हुआ दिखा हो। बच्चों के मूल्यांकन की निर्मम पद्धति ने समाज को भी इतना निष्ठुर बना दिया है कि अब उन्हें 90 प्रतिशत से कम पर बधाई देने-लेने में भी संकोच होता है ! प्रथम श्रेणी में भी यह प्रतियोगिता 100 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, अब इसे और कहाँ तक ले जाओगे? 90-100 प्रतिशत लाने वाले भी हमारे गौरव हैं, उनका अभिनन्दन है किन्तु जिन लोगों में लिखित के स्थान पर मौखिक रूप से विषय संपादन की अधिक क्षमता है उनका क्या? परीक्षा और रिजल्ट दो ऐसे कठोर शब्द हैं जिनके भय से बड़े-बड़े कम्पित हो उठते हैं। फिर फूल से कोमल बच्चों के मानसिक चित्त की दशा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जब फेल होने के अवसाद में बच्चों ने आत्महत्या न की हो। कुछ प्रकरणों में आत्महत्या करने के दस-बीस दिन पश्चात् वही बच्चे पुनर्मूल्यांकन में बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी हुए हैं किन्तु फेल शब्द इतना भयानक और वीभत्स है कि उसका आभास मात्र बच्चों के मानसिक चित्त को क्षत-विक्षत कर डालने के लिए पर्याप्त है। अँगरेजों ने औपनिवेशिक देशों में अपना राजकाज चलाने के लिए एक शिक्षा व्यवस्था बनाई थी, उस व्यवस्था में जो पास होते थे उन्हें वे अपने यहाँ नौकरी पर रख लेते थे किन्तु स्वतंत्र भारत में क्या जो फेल हो गया वो अब किसी काम का नहीं रहा या वर्ष भर पढ़ने वाले को तीन घंटे में न लिख पाने के कारण फेल घोषित करने का औचित्य समझ से परे है। कितने ही उदाहरण हैं जिनमें हमारी शिक्षा व्यवस्था से फेल का प्रमाणपत्र लेने वालों ने इसी देश में सर्वोच्च पदों पर पहुँचने का कीर्तिमान रचा। वर्तमान में मुंबई पश्चिम के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त डॉ. मनोज कुमार शर्मा भी उन्हीं में से एक हैं। मध्य प्रदेश के मुरेना जिले के छोटे से गाँव में जन्मे मनोज कुमार 10 वीं की परीक्षा में तृतीय श्रेणी पास होने से खिन्न थे इसीलिये अगली बोर्ड परीक्षा में प्रथम श्रेणी लाने के लिए प्रयासरत थे क्योंकि हमारे देश में तृतीय श्रेणी पास होने वाले को बेकार ही समझा जाता है लेकिन वे 12 वीं की बोर्ड परीक्षा में भी फेल हो गए। इसी 12 वीं फेल छात्र ने अपनी कड़ी मेहनत से आगे चलकर पी.एचडी. तक पढ़ाई की। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर आई.पी.एस बने और आज देश के बड़े पद पर सबसे बड़े महानगर मुंबई में कार्यरत हैं। ऐसे कितने ही मनोज होंगे जिन्हें हमारी शिक्षा प्रणाली ने फेल का ठप्पा लगाकर उनकी प्रतिभा को न पहचान पाने का प्रमाण दिया होगा। यदि फेल का अर्थ प्रतिभा विहीन नहीं होता तो फेल क्यों लिखा जाए? इस बात में किंचित मात्र संदेह नहीं कि हमारी शिक्षा पद्धति में किसी भी बालक के खिलाड़ी, कलाकार और समाजसेवी आदि होने की प्रतिभा का बोर्ड की अंकसूची में कोई स्थान नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 July 2020


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  डाॅ. रमेश ठाकुर आधुनिक लखनऊ के शिल्पकार, सफल राजनेता व प्रशासक लाल जी टंडन का परलोक वासी हो जाने का मतलब हिंदुस्तान की सियासत में गहरा शून्य छोड़ जाने जैसा है। आम इंसान के दर्द को समझना और उसका तत्काल समाधान खोजना, उनकी आदत हुआ करती थी। उन्होंने अपने पूरे सियासी और सार्वजनिक जीवनकाल में कभी आम और खास में अंतर नहीं समझा, हमेशा इंसानियत को तवज्जो दी। यही कारण था कि न सिर्फ भाजपा नेताओं का उनसे जुड़ाव रहा, बल्कि विपक्षी नेता भी उनकी सरल-सादगी से मन मोहित होते थे। वह जरूरतमंदों और गरीबों से प्रत्यक्ष संवाद करने में विश्वास रखते थे। लाल जी टंडन के न रहने की खबर मंगलवार को तड़के जैसे ही आई, लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके परिवार का कोई सदस्य उनसे रुखसत हो गया हो। लखनऊ के अलावा पूरा देश उनके निधन से स्तब्ध है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ उनकी राजनीतिक कर्मशाला और पाठशाला जैसी रही, तभी उन्हें 'लखनऊ का लाल' कहा जाता था। लखनऊ की मिट्टी से दो राजनेताओं का जुड़ाव सबसे ज्यादा रहा। अव्वल, अटल बिहारी वाजपेई और दूसरे लाल जी टंडन। बाबूजी के नाम से प्रसिद्व लाल जी टंडन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के हमेशा करीबी और अतिप्रिय रहे। अटल जी का राजनैतिक इतिहास अगर लखनऊ की धरती से जुड़ा, तो उसके पीछे लाल जी टंडन की मुख्य भूमिका रही।   अटल जी ने लखनऊ के अलावा कई बार दूसरे शहरों से चुनाव लड़ने का मन बनाया लेकिन ऐसा हो ना सका, कारण था? लखनऊ की जनता के प्रति उनका विशेष लगाव। लखनऊ के लोग कितना प्यार करते थे, ये बातें लाल जी टंडन ही उन्हें बताया करते थे। लाल जी का अलविदा कहना, निश्चित रूप से भारतीय राजनीति में एक ऐसा खालीपन होगा, जिसकी भरपाई सदियों कोई नहीं कर पाएगा? अटल जी का लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से अन्य शहरों में कहीं भी जाना होता, तो लाल जी टंडन उनके साथ साए की तरह साथ रहते थे। खैर, कुदरत की नियति और नियमों के समक्ष भला किसका जोर चला। मध्य प्रदेश के राज्यपाल और उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले लाल जी टंडन अब हमारे बीच नहीं रहे।   राजनीति में उनकी खास पहचान इसलिए मानी गई, वह अटल बिहारी वाजपेई के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में गिने जाते थे। अटल जी जी उनपर आंख मूंदकर विश्वास किया करते थे। राजनीति में लाल जी टंडन का उप नाम बाबू जी था। इसी नाम से वह पुकारे जाते थे। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक समर्पित सेवक रहे। राजनीति के शुरुआती दिनों से ही उनकी संघ के भीतर सक्रियता अग्रणी रही। कई मंचों पर अटल जी ने अपने संबोधन में लाल जी को निष्ठावान और ईमानदार कार्यकर्ता कहा था। बाबूजी ने सियासत का ककहरा लखनऊ से सीखा। उन्होंने सदैव अटल जी को ही अपना राजनीतिक गुरु माना। मध्य प्रदेश के राज्यपाल बनाए जाने के बाद भी उनका लखनऊ नियमित आना-जाना रहा। लखनऊ की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। अटल बिहारी वाजपेई के विभिन्न चुनावों के रणनीतिकार हुआ करते थे। टंडन जी विधान परिषद् एवं विधान सभा के सदस्य रहे। उत्तर प्रदेश के मंत्री के नाते उन्होंने प्रदेश के अनेक नगरों को विकास की ओर अग्रसर किया, विशेष कर नगरीय सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण काम किया। लखनऊ के नवीनीकरण में उनका योगदान सदा स्मरणीय रहेगा। टंडन जी कार्यकर्ताओं के बीच भी बेहद लोकप्रिय थे। उनका निधन राजनीति के लिए अपूर्णीय क्षति हुई है। टंडन जी के जाने से सुसंस्कृत एवं सिद्धांत प्रिय व्यक्तिव का गहरा अभाव रहेगा। हर दिल अजीज थे और लखनऊ की परंपराओं में रचे बसे थे।   विपक्ष दलों के भीतर भी बाबूजी का बड़ा आदर हुआ करता था। बसपा प्रमुख मायावती ने उनको मुंह बोला भाई बनाया हुआ था। प्रत्येक रक्षाबंधन पर उन्हें राखी बांधने घर जाया करती थीं। उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा के बीच जब गठबंधन हुआ था, उसमें टंडन जी की अहम भूमिका थी। मायावती और लाल जी के बीच भाई-बहन का रिश्ता बन जाने के बाद दोनों दल एक साथ आए थे और मिलकर सरकार बनाई थी। प्रदेश भर में राखी बांधने की चर्चाएं हुआ करती थी। दरअसल, मायावती लाल जी टंडन को हमेशा चांदी की राखी बांधा करती थीं। मायावती खुद पर लाल जी टंडन का एहसान समझती थीं।   बात 1995 की है जब चर्चित गेस्ट हाउस कांड की घटना घटी, उस दौरान मायावती की जान खतरे में पड़ी, तब लाल जी टंडन और एक अन्य भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने मौके पर पहुँचकर मायावती को सकुशल आजाद कराया था। तभी से मायावती उनका एहसान मानती थी। उसके कुछ सालों बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। वह मुख्यमंत्री बनी थी। वहीं से मायावती और लाल जी टंडन के बीच भाई-बहन का रिश्ता बना, जो हमेशा यथावत रहा। रिश्ते-संबंध निभाने में उनका कोई सानी नहीं था। हर रिश्ते में वह ईमानदारी दिखाते थे। लाल जी टंडन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपना साथी, भाई और पिता मानते थे। उनके साथ करीब पांच दशकों तक रहे। इतना लंबा साथ अटल का शायद ही किसी और राजनेता के साथ रहा हो। लाल जी का यूं चले जाना, भाजपा के लिए बड़ा आघात है। वह पार्टी के लिए विशालकाय प्रशिक्षक, थिंकर, प्रेरणादायक जैसे थे। आधुनिक लखनऊ के वह शिल्पकार थे। उन्हें श्रद्धांजलि! (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal, Dragon, filled key , India, neighboring countries

अनिल निगम कोरोना वायरस फैलाने का जिम्‍मेदार चीन, भारत को हर तरह से घेरने की फिराक में है। वह कूटनीतिक तरीके से पड़ोसी देशों को भारत के खिलाफ भड़काने और उकसाने में जुटा है। वह इसके लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाकर भारत को कमजोर करने की साजिश कर रहा है। इसी का परिणाम है कि कुछ पड़ोसी देशों के भारत के खिलाफ सुर बदलने लगे हैं। ड्रैगन की साम्राज्‍यवादी नीति से संपूर्ण विश्‍व परिचित है। पहले उसने पाकिस्‍तान और श्रीलंका को ऋण और विकास का लालच देकर अपने जाल में फंसाया और फिर भारत के खिलाफ भड़काया। अब यही काम उसने भारत के पुराने मित्र नेपाल पर डोरे डालकर किया है। नेपाल ड्रैगन के ही इशारे पर भारत के खिलाफ लगातार विषवमन कर रहा है। गलवान घाटी में मुंह की खाने के बाद अब चीन बांग्‍लादेश और भूटान को भी भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर ड्रैगन भारत के पड़ोसी देशों को क्‍यों भड़का रहा है? भारत के पड़ोसी देशों का हितैषी बनने का दंभ भरने वाले चीन का असली चरित्र क्‍या है? वह भारत से सीधी वार्ता या युद्ध करने की जगह भारत को घेरने की रणनीति क्‍यों अपना रहा है? नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का चीन के प्रति झुकाव सर्वविदित है। केपी ओली ने कवि भानुभक्त के जन्मदिन पर यह बयान देकर कि असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज के पास एक गांव है, जहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था, सभी को भौंचक्‍का कर दिया। उन्‍होंने कहा कि कवि भानुभक्त ने नेपाली भाषा में रामायण लिखी थी। साथ ही यह भी दावा किया कि हमें सांस्कृतिक रूप से दबाया गया है। हालांकि नेपाल और भारत की जनता के आक्रोश को देखते हुए बाद में उन्‍होंने अपने बयान पर लीपापोती कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश भी की। यह सर्वविदित है कि ड्रैगन अनेक प्रलोभन देकर पाकिस्तान और श्रीलंका की हालत पहले ही खराब कर चुका है। दोनों देशों को ऋण देने का लालच देकर फंसाया। अब वह बांग्लादेश को ऐसे ही जाल में फंसाने की कोशिश कर रहा है। चीन ने बांग्लादेश को कर छूट का लालच दिया है। उसने कहा है कि 5,161 सामान जिनका चीन और बांग्लादेश व्यापार करते हैं, उसमें 97 फीसदी तक कर की छूट दी जाएगी। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत ने आजादी के बाद चीन की तरफ लगातार दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन चीन ने भारत को हमेशा धोखा दिया। भारत ने 1954 में दोनों देशों के बीच परस्‍पर रिश्‍ते मजबूत करने के उद्देश्‍य से चीन के साथ पंचशील संधि की। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा भी दिया लेकिन चीन ने इस प्रेम और विश्वास को धूल में मिलाते हुए 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया था। इसी तरह से चीन आतंकवाद के मसले पर हमेशा पाकिस्‍तान के साथ खड़ा नजर आया। चीन बार-बार भारत को यह भरोसा दिलाता रहा कि वह वास्‍तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सम्‍मान करेगा परंतु उसने ऐसा नहीं किया बल्कि 2017 में डोकलाम में चीन की घुसपैठ उसकी चालबाजी का एक और उदाहरण है। हाल ही में गलवान घाटी में चीन ने एलएसी का उल्‍लंघन करते हुए भारतीय सीमा में घुसपैठ की, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। लेकिन भारत के आक्रामक तेवरों और वैश्‍विक माहौल के कारण थोड़ा ठिठक गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली भारत सरकार ने ड्रैगन की घुसपैठ का जवाब कई तरह से दिया है। उसने चीन के 59 एैप्‍स पर भारत में रोक लगा दी। भारत के निर्माण एवं विकास कार्यों में चीनी कंपनियों के अनेक ठेकों को रद्द कर दिया। इसके अलावा संपूर्ण देश में चीन के खिलाफ आक्रोश पैदा हो गया और व्‍यापारियों, उद्यमियों और आम जनता ने चीनी उत्‍पादों का बहिष्‍कार करने की घोषणा कर दी। प्रधानमंत्री ने सीमा पर जाकर सुरक्षा तैयारियों का जायजा लिया और कहा कि अगर चीन हमला करता है तो भारत उसका मुंहतोड़ जवाब देगा। चीन के रुख को देखते हुए अमेरिका ने उसकी चारों ओर से सै‍न्‍य घेराबंदी कर दी। भारत के तीखे तेवरों और वैश्विक महाशक्तियों के रवैया के चलते चीन की चूलें हिल गईं हैं। साम्‍यवादी चीन यह अच्‍छी तरह जानता है कि वह भारत से सीधे-सीधे युद्ध नहीं कर सकता। इसलिए वह पड़ोसी देशों को लालच का चारा डालकर भारत के खिलाफ उन्हें भड़का रहा है। भारतीय उप महाद्वीप में बांग्‍लादेश, श्रीलंका, म्‍यांमार, नेपाल और भूटान भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण देश हैं और इन देशों से भारत के पारस्‍परिक संबंध दोस्‍तानापूर्ण रहे हैं। इसलिए पड़ोसी राज्‍यों को प्रलोभन देकर भारत के खिलाफ माहौल तैयार करने की चीन की कूटनीति का भारत को पर्दाफाश करना ही होगा, साथ ही पड़ोसी देशों में यह विश्वास भी जगाना होगा कि उनका असली हितैषी चीन नहीं बल्कि भारत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal, Chabahar Rail Project: Need to solve the issue

  अरविंद कुमार शर्मा एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने 14 जुलाई को बताया कि ईरान ने चाबहार रेल परियोजना से भारत को अलग कर खुद ही इसे पूरा करने का फैसला किया है। करीब चार साल पहले दोनों देशों के बीच चाबहार से अफगानिस्तान के जाहेदान तक रेल लाइन बिछाने का समझौता हुआ था। ईरान ने इस परियोजना पर काम शुरू भी कर दिया है। करीब 628 किलोमीटर लंबे इस रेलमार्ग के निर्माण का शुभारम्भ ईरान के यातायात और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने किया।   समाचार की इन पंक्तियों पर नजर डालने से यह मात्र एक सूचना की तरह दिखता है। चाबहार रेल परियोजना को ईरान और अफगानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग बनाने की भारत की कोशिश के रूप में देखें तो इसके महत्व का पता चल जाता है। अभी भारत को अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान होकर जाना पड़ता है। परन्तु तनाव के बीच इस मार्ग का प्रयोग मुश्किल ही है। चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत ने पहले ही मुख्य भूमिका निभाई थी। अब इस रेल परियोजना के जरिए भारत ने एक और बाइपास लेने की कोशिश की। असल में इससे भारत की पहुंच मध्य एशिया, रूस और यहां तक कि यूरोप तक आसान हो सकती है। चाबहार बंदरगाह को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जवाब के तौर पर देखा जा रहा था। ग्वादर पोर्ट चाबहार से सिर्फ 70 किमी दूर है। यही कारण है कि पाकिस्तान भी भारत-ईरान-अफगानिस्तान की इस योजना को तिरछी नजर से देखता है।   यह देखना जरूरी है कि चाबहार से अफगानिस्तान के जाहेदान तक इस रेल परियोजना से भारत को क्यों अलग कर दिया गया है। भारत की ओर से इंडियन रेलवेज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) को इस रेल परियोजना पर काम करना था। समझौता भारत-अफगानिस्तान और ईरान के बीच हुआ था। इसके लिए इरकॉन ने सभी सेवाएं, सुपरस्ट्रक्टर वर्क और आर्थिक सहयोग (करीब 1.6 अरब डॉलर) देने का वादा किया था। इरकॉन के इंजीनियर मौके पर भी गये और ईरानी रेलवे ने तैयारी की। इरकॉन और ईरानी रेलवे कंपनी में इस तरह के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके विपरीत भारत ने अपने हिस्से की अदायगी समय से नहीं की। यह निर्माण और आर्थिक सहयोग, दोनों ही स्तर पर है।   फिर वही सवाल कि इस देरी मात्र से भारत को अलग कर दिया गया? मसला इतना ही नहीं लगता। इसे इस तरह देखा जाना चाहिए कि भारत को इससे ऐसे समय पर अलग किया गया है, जब उसका चीन के साथ तनाव चल रहा है। फिर उधर, चीन और ईरान के बीच चार सौ अरब डॉलर के रणनीतिक निवेश को लेकर समझौता हुआ है। पहली नजर में साफ हो चला है कि ईरान ने चाबहार रेल लाइन परियोजना से भारत को चीन के दबाव में अलग किया। सहयोग में देरी तो एक बहाना है। वैसे हलके स्वर में यह भी बात आ रही है कि भारत पर अमरीका का भी दबाव था कि वह चीन के करीब जा रहे ईरान से कोई सहयोग न करे। इसे सीधे नहीं देखकर इस रूप में समझना होगा कि अमरीका के दबाव में भारतीय कंपनी इरकॉन को निर्माण स्थल पर जरूरी उपकरण आपूर्तिकर्ता और सहभागी मिलने में दिक्कतें आ रही थीं। मई 2016 में एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग निर्मित करने के फैसले से पाकिस्तान परेशान था। चाबहार बंदरगाह पर तेजी से काम चलने के साथ इस रेलमार्ग के विकास से भारत को बड़ा रणनीतिक फायदा होता। अब दिक्कत और बड़ी हो सकती है। पिछले दिनों ईरान ने चीनी कंपनी द्वारा चलाए जा रहे पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और चाबहार के बीच एक समझौते का प्रस्ताव दिया था। आशंका तो यहां तक जताई गई है कि ईरान चाबहार बंदरगाह चीन को लीज पर दे सकता है। ऐसे में रेल लाइन ही नहीं, चाबहार बंदरगाह भी चीन के हाथों जा सकता है। वैसे वरिष्ठ ईरानी अधिकारी इस तरह की खबरों से इनकार करते हैं।   बहरहाल, ईरान यदि इस प्रोजेक्ट के लिए चीन के करीब गया तो चीन का सीधे मध्य पूर्व में प्रवेश आसान हो जायेगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत ने चाहे जिस कारण इस प्रोजेक्ट से हाथ खींचा हो, अब शीघ्र ही उसे आगे की रणनीति पर काम करना होगा। इस दिशा में भारत अब अमरीका, इसराइल और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ मिलकर इसका प्रतिवाद कर सकता है। विशेषज्ञ ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना देख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो इससे चीन के प्रति ईरान के रुख में परिवर्तन आ सकता है। भारत- ईरान के बीच ऐतिहासिक रिश्तों और दोस्ती का ख्याल कर भी बहुत कुछ हो सकता है। जो भी हो, इस मसले को हल करना होगा। बेहतर तो यही होगा कि भारतीय कंपनी इरकॉन फिर से इस परियोजना में शामिल हो सके।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal, Lal Ji Tandon: Maintenance of ideological heritage

  डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   मध्य प्रदेश के राज्यपाल लाल जी टण्डन अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने अपनी पुस्तक `अनकहा लखनऊ' में अनेक तथ्य उजागर किये थे। मिलनसार होना लखनऊ का चिर परिचित मिजाज रहा है, लाल जी टण्डन की जीवन शैली भी इसी के अनुरूप थी। तरुणावस्था में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। यहीं से उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ। इसके बाद समाज के बीच रहना, हमेशा लोगों से मिलना-जुलना, सभी के सुख-दुख में सहभागी होना, उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया। उन्होंने सामाजिक जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे, पार्षद से लेकर सांसद, मंत्री, राज्यपाल तक हुए लेकिन उनके मूल स्वभाव में कभी परिवर्तन नहीं हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी को राजनीति में अजातशत्रु कहा जाता है। लाल जी टण्डन उनके अनुज की तरह थे। अटल जी की तरह उन्हें भी यही पहचान मिली। राजनीति में मतभेद खूब रहा लेकिन उन्होंने भी अटल जी की तरह मनभेद पर विश्वास नहीं किया। वैचारिक प्रतिबद्धता सदैव रही, कभी उससे विचलित नहीं हुए।   एकबार लखनऊ राजभवन में उनसे मुलाकात हुई। वही उनकी चिरपरिचित सहजता। तब वह चुनावी राजनीति से अलग हो चुके थे। लखनऊ से उन्होंने दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। मैंने टण्डन जी से कहा कि आप इस समय राजभवन में आये हैं, मेरी अभिलाषा है कि आप राजभवन में रहें। वह मुस्कराये, बोले क्या मतलब? उन्होंने मेरे कथन पर क्या सोचा होगा, मैं नहीं जानता। मैंने कहा कि आप भी राज्यपाल बनें। उन्होंने जो कहा उससे उनके राजनीतिक सिद्धान्त व वैचारिक निष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि राजनीति में पहले दिन से लेकर आजतक मैंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। किसी पद की अभिलाषा नहीं की,अपने बारे में स्वयं कोई निर्णय नहीं लिया। जो पार्टी का आदेश हुआ, उसपर अमल किया। यह सुखद संयोग था कि इसके कुछ समय बाद वह बिहार के राज्यपाल बनाये गए। इसके पहले संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप भाजपा से त्यागपत्र दे दिया था। इसके बाद उन्हें मध्य प्रदेश का राज्यपाल नामित किया गया था। दोनों प्रदेशों में उन्होंने संविधान के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वहां के लोगों से संवाद बनाये रखा। सीमित समय में ही बिहार और मध्य प्रदेश में आमजन के बीच रहने वाले राज्यपाल की उनकी छवि बनी थी।   वैचारिक निष्ठा के उनके कथन का एक संस्मरण याद आया। टण्डन जी लखनऊ में पत्रकारों को चाट की दावत पर आमंत्रित करते थे। यह उनका नियम बन गया था। इसमें बड़ी सहजता से वह सभी पत्रकारों से मिलते, बातें करते थे। एकबार राजकुमार प्लाजा के सामने स्थित उनके सरकारी आवास पर ऐसी ही चाट पार्टी थी। राजनीति की हल्की-फुल्की बातें भी चल रही थी। एक प्रश्न के जवाब में टण्डन जी ने आवास के बगल में स्थित ऊंची दीवार की ओर इशारा किया। कहा कि पार्टी आदेश करे तो मैं इस दीवार से भी कूद जाऊं। उनकी बात पर ठहाका लगा लेकिन यह उनकी वैचारिक निष्ठा को उजागर करने वाला प्रतीक था। जब वह भारतीय जनसंघ के सदस्य बने, तब संघर्ष का दौर था। तब यह माना जाता था कि कांग्रेस के व्यापक प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता। जनसंघ की स्थापना सत्ता के लिए नहीं हुई है इसलिए पद नहीं सेवा की प्रेरणा वाले ही इसके सदस्य बनते हैंं। टण्डन जी भी उन्हीं में एक थे। परिवार व व्यवसाय से अधिक ध्यान वह समाज सेवा में लगाते थे। पार्टी के आदेश पर वह पूरी क्षमता से अमल करते थे। बसपा से गठबंधन का निर्णय भी उनका नहीं था लेकिन जब दायित्व मिला तो वही उसके शिल्पी थे।   टण्डन जी के सामाजिक जीवन की शुरुआत सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस से हुई थी। 1960 में वह सक्रिय राजनीति में आये। दो बार पार्षद और दो बार विधान परिषद् सदस्य रहे। तीन बार विधानसभा और एकबार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। प्रदेश की कल्याण सिंह, बसपा गठबन्धन और राजनाथ सिंह की सरकारों में वे कैबिनेट मंत्री रहे। इसके अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद लखनऊ लोकसभा सीट खाली हुई थी। उनके उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी ने उन्हें लखनऊ प्रत्याशी बनाया था। वह भारी बहुमत से विजयी हुए। वे अटल जी को अपना भाई, पिता, मित्र मानते थे। सादर नमन!   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal,No space for pilot

  डॉ. वेदप्रताप वैदिक राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला कांग्रेस के बागी नेता सचिन पायलट के या तो पक्ष में आएगा या विरोध में आएगा। या हो सकता है कि अदालत सारे मामले को विधानसभा अध्यक्ष पर ही छोड़ दे। हर हालत में अब सचिन पायलट का राजस्थान की कांग्रेस में रहना लगभग असंभव है। उनका कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष का पद गया, उप-मुख्यमंत्री और मंत्री पद गया। अब वे साधारण विधायक हैं। यदि अदालत ने उनके विरुद्ध फैसला दे दिया तो विधानसभा अध्यक्ष उन्हें विधानसभा का सदस्य भी नहीं रहने देंगे। दल-बदल विरोधी कानून की खूंटी पर सचिन और उनके साथियों को लटका दिया जाएगा। पार्टी की सदस्यता भी जाती रहेगी। यदि अदालत ने सचिन के पक्ष में फैसला दे दिया तो विधानसभा अध्यक्ष शायद अपना नोटिस वापिस ले लेंगे। फिर आगे क्या होगा? आगे होगा विधानसभा का सत्र! सचिन गुट तब भी कांग्रेस का सदस्य माना जाएगा। यदि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी सरकार के प्रति विश्वास का प्रस्ताव लाएंगे तो सचिन-गुट क्या करेगा? वह यदि उस प्रस्ताव के पक्ष में वोट देता है तो वह अपनी नाक कटा लेगा और यदि विरोध में वोट देता है तो दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत पूरा का पूरा गुट विधानसभा की सदस्यता खो देगा। इसीलिए अदालत में जाने का कोई फायदा दिखाई नहीं पड़ रहा है। इस वक्त राजस्थान की कांग्रेस भी सचिन-गुट को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्यमंत्री गहलोत ने सचिन के लिए जितने कड़ुवे बोल बोले हैं, उसके बाद भी यदि सचिन-गुट राजस्थान की कांग्रेस में रहता है तो उसकी इज्जत दो कौड़ी भी नहीं रह जाएगी। ऐसी स्थिति में सचिन-गुट के लिए अपनी खाल बचाने का क्या रास्ता है? एक तो यह कि पूरा का पूरा गुट और उसके सैकड़ों-हजारों कार्यकर्त्ता कांग्रेस से इस्तीफा देकर अपनी एक नई पार्टी बनाए। दूसरा, यह कि सचिन समर्थक विधानसभा में टिके रहें और गहलोत-भक्तिमें निमग्न हो जाएं लेकिन स्वयं सचिन विधानसभा से इस्तीफा दें और राजस्थान की राजनीति छोड़कर दिल्ली में आ बैठें। कांग्रेस की डूबती नाव को बचाने में जी-जान लगाएं। राजस्थान में सचिन ने जो बचकाना हरकत कर ली, उसका वह हर्जाना भी भर दे और अपनी राजनीति को किसी न किसी रूप में जीवित रखें। अब राजस्थान के जहाज में पायलट के लिए कोई जगह नहीं बची है।   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal, Smriti Shesh, Jagdev Ramji , conductor of Vanvasi culture

  अरविन्द मिश्रा 15 जुलाई 2020 को वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदेव रामजी उरांव का निधन सिर्फ वनवासी समाज ही नहीं देश के लिए अपूरनीय क्षति है। 72 वर्ष की आयु में जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने वनांचल समाज के लिए जिस प्रकार स्वयं को समर्पित किया, वह राष्ट्र मनीषियों की हमारी सनातन परंपरा का एक चरित्र है। जगदेव रामजी का जन्म छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) के रायगढ़ जिला स्थिति कोमोंडो गांव में हुआ। पांच भाई-बहनों के साथ जगदेव रामजी ने अभावों के बीच शिक्षा अर्जित की और जीवनपर्यंत वनवासी और समाज की मुख्यधारा के बीच गहराती खाई को पाटने के लिए सेतु बन कार्य करते रहे। वनांचल समाज के मध्य कार्य करने के लिए जब और जैसी योग्यता और प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ी, उसे अर्जित किया। गांव केरी जनपद प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर 1962 में पूर्व माध्यमिक शिक्षा के लिए जशपुर नगर आए।1962 में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा वनवासी कल्याण आश्रम के संपर्क में आए। बचपन में राष्ट्र भावना के जो बीज उनके मन में अंकुरित हुए वह जीवन भर पल्लवित, पुष्पित और फलित होता रहा। वन में रहने वाले वंचित व अभावग्रस्त समाज के उत्थान के लिए कार्य करते हुए उन्होंने शैक्षणिक गतिविधियों को कभी नहीं छोड़ा। 1967 में हायर सेकण्डरी करने के पश्चात अगले वर्ष ही कल्याण आश्रम पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए और गांव-गांव वनवासियों को उनके अधिकारों के लिए जागरूक किया। वनवासी कल्याण आश्रम के विद्यालयों में शारीरिक शिक्षकों की कमी नजर आई तो समस्या पर चिंतन करने की जगह स्वयं समाधान बनने की वृत्ति लिए 1969-70 में तात्या टोपे राज्य शारीरिक शिक्षा महाविद्यालय में शारीरिक शिक्षण (सीपीएड) प्राप्त किया। जगदेव रामजी के प्रयासों से आश्रम के विद्यालयों में शारीरिक शिक्षण को स्थायी पाठ्यक्रम बनाया गया। अध्यापन के साथ उन्होंने स्वाध्याय के जरिए स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षाएं भी उत्तीर्ण की। 1975 में जगदेव रामजी को आपातकाल के दौरान काले कानून मीसा में छह माह तक जेल की यातनाएं भी सहनी पड़ीं। जेल में रहकर भी उन्होंने वनवासियों को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों के विरुद्ध मीसाबंदियों के बीच जन जागरण का कार्य किया। 1995 में आश्रम के संस्थापक अध्यक्ष वनयोगी श्री बाला साहब देशपाण्डे के स्वर्गवास के बाद उनके ऊपर कल्याण आश्रम का गुरुतर दायित्व आ गया। यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन है कि श्री बाला साहब देशपाण्डे ने 1980 के दशक में आश्रम के कार्य विस्तार हेतु देश के कोने-कोने में प्रवास का व्यापक क्रम प्रारंभ किया किया, उस दौरान उन्होंने जगदेव रामजी को निरंतर सहयात्री के रूप में अपने साथ रखा। यही वजह है कि उनके पूरे सार्वजनिक जीवन में श्री बाला साहब देशपाण्डे के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव नजर आता है। जनजातीय समाज के उत्थान के लिए दृष्टि नीति पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) जगदेव रामजी की ही परिकल्पना थी। इसका विमोचन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने किया था। इस दृष्टि नीति पत्र में वनवासियों के सामाजिक और आर्थिक जीवन के विविध पहलूओं की व्यावहारिक समझ के आधार पर उनके जीवन स्तर में बदलाव लाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव व अनुशंसाएं की गईं। राष्ट्रीय जनजाति नीति, वन अधिकार कानून, संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची एवं राज्यपालों की भूमिका, पंचायत-पैसा कानून, विस्थापन एवं पुनर्वास आदि अनेक विषयों को इसमें सम्मिलित किया गया था। उरांव जनजाति के आस्था का केंद्र रोहतासगढ़ के इतिहास का पुनर्जागरण करने और देश के विविध भागों में रहने वाली उरांव समाज के लोगों को एकजुट करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जनजाति समाज को उसके आत्मगौरव का स्मरण कराने में जगदेव रामजी ने अभूतपूर्व योगदान दिया। एक अखंड कर्मयोगी के रूप में वह जीवन भर वनांचल समाज में रहने वाले वनबंधुओं की सेवा का हर संभव मार्ग विकसित करते रहे। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड, ओडिसा और पूर्वोत्तर के वनवासी क्षेत्र में जगदेव रामजी की प्रेरणा से संचालित सेवाकार्यों की सुंगध की अनुभूति की जा सकती है। देश के 500 से अधिक जनजाति समूहों, 50 हजार से अधिक गांव में संचालित लगभग 20 हजार प्रकल्पों के जरिए वन बंधुओं के जीवन स्तर को गुणवत्ता देने का सफल प्रयास हो रहा है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वनवासी बहुल जिलों में उनके निरंतर प्रवास होते थे। मध्य प्रदेश के विन्ध्य में सीधी, सिंगरौली,पन्ना समेत महाकौशल के मंडला, नरसिंहपुर व निमाड़ अंचल में जनजातीय संस्कृति को सहेजने में उन्होंने स्थानीय जनमानस को तो प्रोत्साहित किया है, सरकारों को मार्ग भी सुझाया। इस अंचल में वनवासियों के बीच स्वावलंबन के प्रकल्प विकसित करने के साथ उनकी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों के भी वह अगुआ रहे हैं। पर्यावरण को लेकर जगदेव रामजी का आग्रह और प्रतिबद्धता कैसी थी, इसका श्रेष्ठ उदाहरण विद्यार्थी परिषद के अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री रहे एक कार्यकर्ता ने अपने अनुभव में बताया है, जिसमें वह कहते हैं- छत्तीसगढ़ में एकबार जगदेव रामजी कल्याण आश्रम के कुछ कार्यकर्ताओं के साथ, जीप में प्रवास पर जा रहे थे। रास्ते में कार्यकर्ताओं को एक आम का पेड़ दिखाई दिया, जिसमें कच्चे आम लगे हुए थे। गंतव्य स्थान में जाने की कोई जल्दी नहीं थी इसलिए कार्यकर्ताओं ने जीप रोकी। पेड़ से कुछ कच्चे आम तोड़े, उन्हें काटा और जगदेव रामजी को देने लगे। जगदेव रामजी ने विनम्रतापूर्वक आग्रह अस्वीकार्य कर दिया। कार्यकर्ताओं ने जब पूछा कि आप आम नहीं खाते हैं क्या तो उन्होंने उत्तर दिया ‘’नहीं, हम वनवासी आंखा तीज (अक्षय तृतीया) से पहले आम नहीं खाते।‘’ जिज्ञासावश जब एक कार्यकर्ता ने पूछा, ऐसा क्यूं? तो उन्होंने कहा ‘‘आंखा तीज से पहले आम में गुठली नहीं बनती। हम वनवासी जब उस ऋतु में आम खाते हैं, तो सबसे पहले आम की गुठली जमीन पर गाड़ते हैं। हमारा मानना है कि उस गुठली से आने वाली पीढ़ी को आम मिलेंगे। चूंकि आंखा तीज से पहले आम में गुठली नहीं बनती इसलिए ऐसे आम को खाना माने उस आम की भ्रूणहत्या करना है, ऐसा हमलोग मानते हैं, इसलिए वनवासी आंखा तीज के बाद ही आम खाते हैं। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक कुंभ के आयोजन और जनजातीय समाज के लोगों के लिए कुंभ मेले के दर्शन जैसे सामाजिक समरसता कार्यक्रमों में जगदेव रामजी प्रेरणापुंज बन समाज का मार्गदर्शन करते रहे। वनवासी युवाओं की शारीरिक क्षमता को खेल के क्षेत्र में निखारने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम के प्रयासों में जगदेव रामजी की दूरदृष्टि स्पष्ट परिलक्षित होती है। वनवासी समाज के उत्थान के लिए प्रकृति और पर्यावरण के साथ उनके सहकार की संपन्न विरासत को सहेजना ही होगा, इस बात को जगदेव रामजी ने अपना वैचारिक और कृति दर्शन बनाया। ‘‘वनवासी, गिरिवासी वंचित, बंधु सहोदर हैं अपने, सबको लेकर साथ चलें हम, पूर्ण करें सबके सपने, समरस जीवन से टूटेगी भेदभाव की कारा ! इससे ही एकात्म हुआ है सारा राष्ट्र हमारा।’’ एक गीत की इन पंक्तियों में यदि किसी व्यक्ति के जीवन का वैचारिक अधिष्ठान और कृतित्व दर्शन खोजना हो, तो वह खोज जगदेव रामजी उरांव के रूप में पूर्ण होती है। आज सही अर्थों में उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही राष्ट्र जन-जंगल और जमीन से जुड़ी कई चुनौतियों का समाधान प्राप्त कर सकता है। वन आधारित संस्कृति के आजीवन प्रखर वक्ता को सही अर्थों में यही सच्ची आदरांजलि होगी।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 July 2020


bhopal,Leaders selling money

    डॉ. वेदप्रताप वैदिक   राजस्थान के राजनीतिक दंगल ने अब एक बड़ा मजेदार मोड़ ले लिया है। कांग्रेस मांग कर रही है कि भाजपा के उस केंद्रीय मंत्री को गिरफ्तार किया जाए, जो रिश्वत के जोर पर कांग्रेसी विधायकों को पथभ्रष्ट करने में लगा हुआ था। उस मंत्री की बातचीत के टेप सार्वजनिक कर दिए गए हैं। एक दलाल या बिचैलिए को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। दूसरी तरफ यह हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष ने सचिन पायलट और उसके साथी विधायकों को अपदस्थ करने का नोटिस जारी कर दिया है, जिसपर उच्च न्यायालय में बहस चल रही है। पता नहीं, न्यायालय का फैसला क्या होगा लेकिन कर्नाटक में दिए गए अदालत के फैसले पर हम गौर करें तो यह मान सकते हैं कि राजस्थान का उच्च न्यायालय सचिन-गुट के 19 विधायकों को विधानसभा से निकाल बाहर करेगा।   यह ठीक है कि सचिन का दावा है कि वह और उसके विधायक अभी भी कांग्रेस में हैं और उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन नहीं किया है, क्योंकि ऐसा तभी होता है जबकि विधानसभा चल रही हो। मुख्यमंत्री के निवास पर हुई विधायक-मंडल की बैठक में भाग नहीं लेने पर आप व्हिप कैसे लागू कर सकते हैं? इसी आधार पर सचिन-गुट को दिए गए विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस को अदालत में चुनौती दी गई है। कांग्रेस के वकीलों का तर्क है कि दल-बदल विरोधी कानून के मुताबिक अध्यक्ष का फैसला इस मामले में सबसे ऊपर और अंतिम होता है। अभी अध्यक्ष ने बागी विधायकों पर कोई फैसला नहीं दिया है। ऐसी स्थिति में अदालत को कोई राय देने का क्या हक है? इसके अलावा, जैसा कि कर्नाटक के मामले में तय हुआ था, उसके विधायकों ने औपचारिक इस्तीफा तो नहीं दिया था लेकिन उनके तेवरों से साफ हो गया था कि वे सत्तारुढ़ दल के साथ नहीं हैं यानि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। यदि यह तर्क जयपुर में भी चल पड़ा तो सचिन पायलट-गुट न इधर का रहेगा न उधर का! यदि अदालत का फैसला पायलट के पक्ष में आ जाता है तो राजस्थान की राजनीति कुछ भी पल्टा खा सकती है।   जो भी हो, राजस्थान की राजनीति ने आजकल बेहद शर्मनाक और दुखद रूप धारण कर लिया है। करोड़ों रु. लेकर विधायकगण अपनी निष्ठा दांव पर लगा रहे हैं। वे पैसे पर अपना ईमान बेच रहे हैं। क्या ये लोग नेता कहलाने के लायक हैं? भाजपा-जैसी राष्ट्रवादी और आदर्शोन्मुखी पार्टी पर रिश्वत खिलाने का आरोप लगानेवालों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए और यदि ये आरोप सच हैं तो भाजपा का कोई भी नेता हो, पार्टी को चाहिए कि उसे तत्काल निकाल बाहर करे और राजस्थान की जनता से माफी मांगे।   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 19 July 2020


bhopal, RSS during, corona ,epidemic crisis

प्रभात झा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी अनूठी कार्यपद्धति के कारण विश्व में जाना जाता है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सांस्कृतिक संगठन समाज आधारित है न कि सरकार आधारित। संघ विश्व का ऐसा संगठन है जिसका निरंतर विकास हो रहा है। नेहरूजी , इंदिराजी और नरसिम्हाराव जैसे तीन-तीन प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने कार्यकाल में तीन-तीन बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया पर संघ न रुका , न झुका, न थका, उलटे समाज के सहयोग से निरंतर बढ़ता ही रहा है। लोग सोचते हैं कि संघ सतत् अपनें कार्य में कैसे लगा रहता है। शायद उन्हें यह नहीं पता कि यहां सभी राष्ट्र के स्वयंसेवक के नाते स्वप्रेरणा से कार्य करते हैं। यहां कार्य करने वाले सभी स्वयंसेवक का एक ही भाव होता है निःस्वार्थ भावना। जब सभी का भाव निःस्वार्थ होता है तो टकराहट जन्म ही नहीं ले पाती। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा की भावना से बढ़ रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक। इस भौतिकवादी समय में लाभ-हानि न सोचकर सतत काम में लगे रहते हैं। देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें की स्पष्टता रहती है।संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवारजी ने सन 1925 को जब विजयादशमी के दिन नागपुर में प्रथम शाखा शुरू की तो उपस्थित स्वयंसेवकों ने कहा कि आप संघ के गुरु बन जाईये। डॉ. हेडगेवारजी ने कहा कि हम सबका गुरु व्यक्ति नहीं परमपवित्र भगवाध्वज होगा। यहीं से संदेश चला गया कि संघ व्यक्ति आधारित नहीं बल्कि विचार आधारित मां भारती के सेवार्थ कार्य करने वाला एक सुदृढ़ सांस्कृतिक संगठन बनेगा। हिंदू संस्कृति की विजयपताका विश्व में फहराएगा। देश भर में संघ की सात्विक और आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तबसे ज्यादा बदनाम और समाप्त करने की कोशिश की, जब से संघ की प्रेरणा से भारतीय राजनीति में जनसंघ का जन्म हुआ। उससे पूर्व गांधी हत्याकांड में झूठा आरोप लगाकर जिस तरह से स्वयंसेवकों को यातना दी गई आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। तत्कालीन सरसंघचालक विश्व के सबसे सबलतम आध्यात्मिक पुरुष डॉ. माधव सदाशिव गोलवलकर “गुरूजी” को जेल तक भेज दिया। संघ पर यातनाओं का दौर चला प्रतिबंध लगा दिया गया। पर सत्य की जीत हुई। न्यायालय ने कहा कि गांधी ह्त्या में संघ का और संघ के स्वयंसेवकों का कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस सहित तत्कालीन शासक को मुंह की खानी पड़ी। मुझे याद है , एक साक्षात्कार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वसंत साठे ने मुझे कहा था कि 'मैं समझ ही नहीं पाता कि संघ का विरोध लोग क्यों करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आपातकाल में मैंने इंदिराजी को कहा था, पर उन्होंने एक नहीं सुनी। संघ का कार्य निरंतर चलता रहता है। संघ की स्पष्ट मान्यता है कि संघ शाखा लगाएगा और सवयंसेवक दसों दिशाओं में समाज के हर क्षेत्र में काम खड़ा करेंगे। सबसे अच्छी बात है कि संघ किसी को अपना प्रतिद्वंदी नहीं मानता। यहां तक कि संघ को जो अपना दुश्मन मानते हैं उसके बारे में गुरूजी कहा करते थे कि हमारा आज का विरोधी कल का समर्थक होगा। हमें इसी भाव से काम करना है। संघ संस्कृति और राष्ट्र ध्वज की भावना को लेकर काम करता है। आज स्थिति क्या है कि देश में मनुष्य को परिवार में मिलने वाले संस्कार के अलावा राष्ट्रीय संस्कार का शिक्षण कहीं दिया जा रहा है क्या? कहीं नहीं। संघ का प्रमुख उद्देश्य है चरित्र निर्माण करना और मनुष्य को संस्कारवान बनाना। यही नहीं आज बाल्यकाल से बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति में पलें-बढ़ें , अध्ययन करें , इसके लिए संघ की प्रेरणा से विद्या भारती के मार्गदर्शन में देशभर में लाखों विद्यार्थी सरस्वती शिशु मंदिर के माध्यम से अध्ययन करते हैं। तरुण विद्यार्थियों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद। देश के हिंदू सनातन धर्म के रक्षार्थ विश्व हिंदू परिषद। मजदूरों के बीच, कर्मचारियों के बीच, शिक्षकों के बीच , समाज के इन वर्गों के बीच काम करने के लिए भारतीय मजदूर संघ की स्थापना। ये सभी संगठन संघ की प्रेरणा से परंतु अपनी योजना से काम करते हैं। किसानों के बीच काम करने के लिए भारतीय किसान संघ, वनवासियों के बीच काम करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम, संस्कार भारती, सेवा भारती, लघु उद्योग भारती, क्रीड़ा भारती, आरोग्य भारती , संस्कृत भारती, प्रज्ञा भारती, विज्ञान भारती, भारत विकास परिषद, राष्ट्रीय संपादक परिषद, स्वदेशी जागरण मंच , हिंदू स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय शिक्षण मंडल जैसे अनेक संस्थान आज के विभिन वर्गों में काम कर रहे हैं।भारत प्रकाशन , विश्व संवाद केंद्र , दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति , भरतीय विचार केंद्र , राष्ट्रीय सिख संगत, विवेकानंद केंद्र, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक परिषद, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद , सहकार भर्ती, ग्राहक पंचायत , सामाजिक समरसता मंच , हिंदू जागरण मंच, अखिलभारतीय साहित्य परिषद, पर्यावरण समिति , दधीचि देहदान समिति तक संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं। संघ को कोई भी दूर से नहीं समझ सकता। जैसे आंख होते हुए भी लोग कान से राजनीति करते हैं और धोखा खा जाते हैं, वैसे ही संघ को देखकर ही संघ को समझा जा सकता है। संघ के बारे में सुनकर आश्चर्य ही प्रकट कर सकते हैं। राष्ट्रपिता बापू, बिनोवा भावे, सरदार वल्ल्भ भाई पटेल, लोकनायक जय प्रकाश सहित अगर अभी की बात करें तो भारत रत्न प्राप्त डॉ. प्रणव मुख़र्जी ने भी संघ को जब करीब से देखा-समझा तो उनका मन बदला। संघ की मान्यता है , यहां पद नहीं दायित्व होता है। कोई भी कार्यकर्ता अपरिहार्य नहीं। यही नहीं, मत अनेक हो सकते हैं पर निर्णय एक। निर्णय के पूर्व विस्तृत चर्चा, निर्णय के बाद सिर्फ उसके संपादन में लगना। आज तो कोरोना है। आपातकाल में तो हजारों स्वयंसेवक भारत के जेलों में अकारण ठूंस दिए गए थे। अनेक यातनाएं और अत्याचार स्वयंसेवकों और उनके परिजनों पर किये गए। बावजूद इसके स्वर्गीय दीनानाथ मिश्र ने नामक आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की दूसरी लड़ाई में संघ की जो भूमिका थी उसको दर्शाता है। इससे साफ़ हो जाता है कि संघ को मात्र स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार ही कार्य में जुटा रहता है। साथ ही परिवार को पता होता है कि उनका बेटा संघ का माध्यम बनकर राष्ट्रीय कार्य में जुटा हुआ है। संघ कार्य की नींव में आपसी विश्वसनीयता,आत्मीयता, मानवता और भारतीयता के साथ सबसे बड़ी बात है कि स्वयंसेवक जैसे देश की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानता है वैसे ही स्वयंसेवक पर आई पीड़ा को भी अपने परिवार की पीड़ा मानता है और उसे दूर करने में तन-मन-धन से लग जाता है। संघ का कार्य अपेक्षा के बीज पर खड़ा नहीं हुआ है। स्वयंसेवक के रूप में देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी पहले स्वयंसेवक थे जो देश के प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री बने। आज तो देश की जनता ने स्थिति ही बदल दी है। देश में संघ के स्वयंसेवक के नाते भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति पूर्व में प्रचारक रहे। पूर्व में प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं। साथ ही,ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं। इतना ही नहीं, देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल कई सदस्य, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल संघ से संबंधित हैं। संघ को निश्चय ही यह सब अच्छा लगता होगा , पर वह अपने को आज भी समाज आधारित संगठन ही मानता है।संघ जड़ नहीं है बल्कि प्रवाहमान संगठन है। संघ के जितने भी अनुषांगिक संगठन हैं उनमें सभी संगठन आज भारत में नंबर एक का संगठन है। संघ का कार्य वैश्विक स्तर पर भी है। विश्व के अनेक राष्ट्रों में शाखा लगती है। राष्ट्रीय सेविका समिति देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए सबसे बड़ी महिला संस्था है। संघ का कार्य स्वयंसेवक अपने को मिटाकर करता है। यह ऐसा सांस्कृतिक संगठन है जो संघ के स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा से चलता है। संघ में प्रचारक नाम की एक अद्भुत व्यवस्था है। देशभर में संघ के हज़ारों प्रचारक अपना स्वयं का जीवन राष्ट्र को यानी मां भारती को समर्पित कर कार्य करते हैं। संघ के कार्य का सबसे मजबूत नैतिक आधार प्रचारक ही होता है। सरल, सामान्य, नैतिकता, प्रामाणिकता एवं संवेदनशीलता से जुड़कर मानवता भाव से वह सहज ही संघ का कार्य करता है। संघ कार्य के विस्तार में प्रचारको की सबसे बड़ी भूमिका रहती है। वे अपने बारे मे नहीं बल्कि रात-दिन भारतमाता को वैभवशाली बनानें मे जुटे रहते हैं। आज भी लॉकडाउन में संघ का कार्य पूरी तरह चल रहा है। स्वयंसेवक अपने-अपने संघ कार्यालय में, परिवार में शाखा लगाते हुए राष्ट्र वंदना और संघ की प्रार्थना कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने लॉकडाउन में बिना प्रचार किये जो सेवा कार्य भारत के प्रत्येक प्रांत और जिलो में किया है वह सराहनीय है। केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में जिस तरह संघ के स्वयंसेवकों ने भोजन, खाद्यान और वहां रह रहे अन्य प्रांतों के निवासियों की सेवा की है, उसे देखकर वहां की सरकारें भी हतप्रभ थी। *मानव सेवा* संघ के कार्य का मुख्य आधार है। इस लॉकडाउन में पूरे भारतवर्ष में यह सभी ने अपनी आखों से देखा है। लोगों को भोजन कराना, ठहराना, खाद्य सामग्री समाज से एकत्रित करके उन्हें उपलब्ध कराना। जनसेवा के ये कार्य संघ के सभी अनुषांगिक संगठन कर रहे हैं। संघ स्वयं प्रचार-प्रसिद्धि से दूर रहता है। क्योंकि वह इन सेवाकार्यो को अपना राष्ट्रधर्म मानता है। अनेक स्थानों पर संगोष्ठियां, संघ विचारकों का बौद्धिक, ऑडियो-वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से विषयों पर चर्चाएं पूरे भारतवर्ष में चल रहा है। सभी अनुषांगिक संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य प्रारंभकिया हुआ है। संघ नूतनता को आमंत्रित भी करता है और पुरातनता को सम्मान भी देता है। संघ कभी नहीं कहता कि हम ही भारत को वैभवशाली बनाएंगे, संघ कहता है कि हम भी भारत को वैभवशाली बनाने में प्रमुख भूमिका बनाएंगे। संघ को समझना है तो उसे अपनी आखों से देखना होगा न कि कानों से सुनकर। संघ भारत की सांस्कृतिक प्रकृति है। आज नहीं तो कल इस प्रकृति की गोद में सभी को आना ही होगा। संघ लम्बे समय से धारा 370 , श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन , सामान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर जन-जागरण कार्य करता रहा है। आज देश में राष्ट्रीय विचारों की सरकार है। संघ के ये संकल्प बिना किसी व्यवधान के साकारहो रहे हैं। संघ की गतिविधियों का आधार है शाखा। देश के सुदूर स्थानों पर भी शाखाएं लगती हैं। लाखों स्थान पर शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण साकार होता है। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी आपदाएं आती हैं तो संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचकर राहत कार्य में जुट जाते हैं। संघ भारत की सांस्कृतिक एवं सनातनी आत्मा है। संघ वंदे मातरम है। संघ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है। इस पुनीत कार्य रूपी यज्ञ में जो अपनी आहुति देता है, वह धन्य होता है। संघ न किसी का विकल्प है और न संघ का कोई विकल्प है। संघ तो भारत माता को वैभवशाली बनाने का एक अनवरत चलने वाला लाखों स्वयंसेवकों का अटूटसंकल्प है।(लेखक भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद)

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Dakhal News 19 July 2020


bhopal,Corona showed the path to digital payment

  डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   अब इसे कोरोना का साइड इफेक्ट कहें या कुछ और पर इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना के बाद देश में डिजिटल लेन-देन अब आदत में शामिल होता जा रहा है। 2016 में नोटबंदी के बाद सरकार ने लोगों को अपने लेन-देन डिजिटल प्लेटफार्म पर करने के लिए प्रेरित किया और 2020 तक 40 अरब ट्रांजेक्शन का लक्ष्य रखा था जो न केवल हासिल कर लिया गया है अपितु 14 प्रतिशत अधिक ट्रांजेक्शन के साथ करीब 46 अरब को छू गया है।   दरअसल कई बातें समय और परिस्थितियों के अनुसार गति पकड़ती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लाॅकडाउन के कारण शुरुआती दौर में औद्योगिक गतिविधियों में तेजी से गिरावट दर्ज की गई पर डिजिटल प्लेटफार्म के उपयोग के नए क्षेत्रों में तेजी दर्ज की गई। दरअसल कोरोना के कारण लोगों को एटीएम तक के उपयोग से संकोच होने लगा और इस कारण जरूरी भुगतान भले ही कम राशि के भुगतान हो पर वे डिजिटल प्लेटफार्म पर होने लगे हैं। करीब तीन माह के लाॅकडाउन व अब ओपनिंग के दौर में लोगों की आदत में ऑनलाईन लेन-देन आम होता जा रहा है। रेजरपे के अनुसार देश में एक नया रुझान और सामने आने लगा है। अब मेट्रोपोलिटन सिटीज से बाहर ऑनलाईन भुगतान की आदत में तेजी से बढ़ोतरी होने लगी है। दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों में डिजिटल भुगतान में बढ़ोतरी देखी जा रही है। डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान में जहां 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी जा रही हैं वहीं नेटबैंकिंग क्षेत्र में भी लेन-देन में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अनुदान भुगतान में तो 148 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी गई है।   कोरोना के कारण सरकारी अनुदान वितरण में तेजी आई है। कोविड-19 में सरकार द्वारा गरीबों और जरूरतमंद लोगों तक ऑनलाइन सीधे उनके खातों में अनुदान की राशि उपलब्ध कराई है। इससे सबसे अधिक लाभ यह हुआ है कि कोरोना लाॅकडाउन और आर्थिक गतिविधियों के लगभग बंद रहने की स्थिति में जरूरतमंद लोगों को बड़ी राहत मिल सकी है। खास बात यह है कि डिजिटल भुगतान के कारण व्यवस्था में पारदर्शिता तो आई ही, लक्षित व्यक्ति तक एक रुपये में से 15 पैसा पहुंचने की स्थितियों में बदलाव आया है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि डिजिटल भुगतान से भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार दो साल पहले तक देश में प्रतिवर्ष सवा 3 लाख करोड़ रु. से अधिक की सब्सिडी दी जाती रही है। इसमें बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप, विभिन्न तरह की पेंशन योजनाएं, डीजल, एलपीजी, उर्वरकों सहित सरकार द्वारा लाभार्थियों को दी जाने वाली सब्सिडी शामिल है। इसमें करीब 12.5 करोड़ परिवारोें को मनरेगा कार्यक्रम में लाभान्वित किया जाता है। साढ़े छह करोड़ बीपीएल परिवारों को सब्सिडी की सुविधा दी जाती है। देश में डे़ढ़ करोड़ लोगों को वृद्धावस्था पेंशन दी जाती है। 55 लाख विद्यार्थियों को प्री मेट्कि और 7 लाख छात्रों को पोस्ट मैट्कि स्कॉलरशिप दी जाती है। मनरेगा, पेंशन, जननी सुरक्षा योजना सहित फ्लैगशिप कार्यक्रम व 22 तरह की स्काॅलरशिप के साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित होने वाले गेहूं, चावल, चीनी, केरोसीन आदि के साथ ही रसोई गैस, रासायनिक उर्वरक आदि व व्यक्तिगत की लाभ की योजनाओं में सब्सिडी का भुगतान किया जाता है।   एक समय माना यह जाता रहा है कि सब्सिडी की राशि लाभार्थियों तक पूरी पहुंच नहीं पाती। इसके अलावा उर्वरकों, पेट्रोल उत्पादोें आदि पर सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी सीधे उत्पादकों को जाने से आम लोगों को पता ही नहीं चलता कि सरकार द्वारा उन्हें किसी तरह की सब्सिडी दी भी जा रही है? सरकार का यह भी मानना है कि लाखों करोड़ों रुपए की सब्सिडी के बावजूद सरकार के प्रति लोगों का नजरिया नकारात्मक ही रहता है। पेंशन, स्काॅलरशिप आदि में भ्रष्टाचार व घोटालों के कारण भी सरकार की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। किसानों को करोड़ों रुपए की सब्सिडी देने के बाद भी उर्वरकों के भाव बढ़ने व बीज, बिजली, डीजल आदि महंगे होने का खामियाजा सरकार को ही भुगतना पड़ता है। ऐसे मेें सीधे खाते में डीबीटी से भुगतान से लाभार्थियों तक राशि पहुंचने लगी है।   यह तो अनुदान का सरकारी पक्ष है। पर दैनिक जीवन में लोगों को डिजिटल लेन-देन की जो आदत सरकार डालना चाहती है वह कोरोना के चलते कारगर होती जा रही है। अब तो गली के किराने की दुकान, सब्जी वाला, पान की दुकान वाला या फेरी लगाने वाला भी एप्स के माध्यम से भुगतान लेने लगा है। भले ही यह भुगतान छोटा हो, राशि का लेन-देन कम हो पर अब दस-बीस-पचास रुपए का भुगतान भी जिस तरह से डिजिटल प्लेटफार्म पर होने लगा है उससे नोट और एटीएम का उपयोग सीमित होने लगा है। पानी, बिजली, टेलीफोन, मोबाइल आदि जरुरी भुगतान डिजिटल प्लेटफार्म पर होने से लोगों को भुगतान को लेकर जो तनाव रहता था उसमें भी कमी आई है। पानी, बिजली, फोन के बिल के लिए लंबी लाइनें या ई-मित्र के चक्कर काटना अब बीते जमाने की बात होती जा रही है। इससे आम आदमी को बड़ी राहत मिली है। डिजिटल भुगतान अब आदत बनता जा रहा है। ऐसे में सरकार खासतौर से बैंकिंग संस्थाओं को कुछ राहतें या सुविधाएं लेकर आना चाहिए ताकि लोग और अधिक प्रोत्साहित व डिजिटल भुगतान के लिए प्रेरित हो सके।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal,Yugpurush Baleshwar Agrawal: Grandfather of Hindi Journalism

  बालेश्वर अग्रवाल के जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष   सियाराम पांडेय 'शांत'   बालेश्वर अग्रवाल जितने अच्छे पत्रकार थे, उतने ही बेहतरीन इंसान भी थे। व्यक्तित्व के जितने अच्छे पारखी थे, उतने ही बड़े कद्रदान भी थे। बालेश्वर अग्रवाल पत्रकारिता जगत का वह सुपरिचित नाम हैं, जिन्हें पत्रकारों की नई पौध विकसित करने में महारत हासिल थी। हिंदी पत्रकारिता का अगर उन्हें पुरोधा कहा जाए तो कदाचित गलत नहीं होगा। बालेश्वर अग्रवाल हिन्दुस्थान समाचार (बहुभाषी न्यूज एजेंसी) के 1956 से 1982 तक प्रधान सम्पादक व महाप्रबंधक रहे। इस दौरान उन्होंने विश्व भर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ऐतिहासिक काम किया। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया था। वसुधैव कुटुंबकम की भावना को उन्होंने अपने जीवन और व्यवहार में प्रत्यक्ष किया था। भारतीय संस्कृति, सिद्धांत और जीवनमूल्यों के प्रति निष्ठा के वे आजीवन ध्वजवाहक बने रहे। उनका जन्म 18 जुलाई, 1921 को उड़ीसा के बालासोर में हुआ था। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा अगर उन्होंने बिहार के हजारीबाग में प्राप्त की तो वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने अभियंत्रण की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1949 में इंजीनियरिंग की परीक्षा पासकर उन्होंने भी सामान्य युवक की तरह रोजी-रोटी के जुगाड़ तलाशने की कोशिश की लेकिन ईश्वर ने उनके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। ऐसी प्रतिभाएं घर गृहस्थी के बंधन में फंसने की बजाय कुछ अलहदा करती हैं। उनके लिए समाज और देश ही प्रमुख होता है। बालेश्वर अग्रवाल भी ऐसी ही प्रतिभाओं में एक थे। उन्होंने समर्पित भाव के साथ अपना हर पल देश के नाम किया। उनकी हर सांस में देश के हित का भाव समाहित था। बालेश्वर अग्रवाल समाजसेवा के रास्ते पर जीवन के अन्तिम क्षण तक चलते रहे। इस क्रम में उन्होंने निरन्तर नई-नई मंजिलें तय कीं। हिंदुस्थान समाचार से अलग होने के पश्चात उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद का काम संभाला और साथ ही युगवार्ता प्रसंग सेवा के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता से जुड़े रहे।   हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी के यशस्वी संपादक, अन्तरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संस्थापक बालेश्वर अग्रवाल का परिचय संसार बहुत विशाल था और उन्होंने विश्व भर में फैले भारतीय समाज को जोड़ने का बहुत उल्लेखनीय कार्य किया। बालेश्वर अग्रवाल लोगों को भीतर से जोड़ते थे। मॉरिशस से लेकर नेपाल तक उन्होंने न केवल भारतीय समुदायों को जोड़ने का काम किया बल्कि इन देशों के भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ बनाने में भी भूमिका निभाई। बालेश्वर अग्रवाल स्नेह-सहयोग और परमार्थ का साक्षात व व्यावहारिक स्वरूप थे। वे सादा जीवन-उच्च विचार की परंपरा में यकीन रखने वाले थे। अपने लिए कठोर और दूसरों के लिए सरल। बाल्यकाल में संघ से जुड़े और जीवनभर संघ के प्रचारक रहे बालेश्वर अग्रवाल कहा करते थे कि जीवन मूल्य किताबों और दीवारों पर लिखने के लिए नहीं होते बल्कि व्यवहार में प्रकट होने चाहिए। बालेश्वर जी ने अपने जीवनकाल में विश्व भर में भारतीय समुदायों को जोड़ने की पहल कर जो बड़ा सपना देखा था, जो बीजारोपण किया था,उसके फलदायी होने का अब समय आ गया है। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इस हिन्दुस्थान समाचार को भारत की सबसे बड़ी और विश्वस्त एजेंसी के रूप में स्थापित कराने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। राजनीतिक पूर्वाग्रहों के चलते जब इंदिरा गांधी ने हिन्दुस्थान समाचार को कुचल डालने के षड्यंत्र रचा तो उनका मन खिन्न हो गया। इसके बाद जो दूसरा कार्य उन्होने शुरू किया, वह भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर आज भी याद किया जा रहा है। उन्होंने अनेक देशों के राजदूतों से लेकर राष्ट्राध्यक्षों तक से जो सहज और आत्मीय संबंध बनाए, वह किसी सामान्य व्यक्ति का काम नहीं कहा जा सकता। मॉरिशस को तो उनका दूसरा घर ही कहा जाता था। भारत-नेपाल के बीच जो कुछ आजकल हो रहा है, उसमें बालेश्वर की बहुत याद आती है। काश, वे जीवित होते तो ऐसा न होता। उन्होंने नेपाल को गहरे से जाना-समझा था और कूटनीतिक तौर पर भी उन्होंने नेपाल के शीर्ष लोगों से बहुत सहज संबंध बनाए थे।   विदेशों से आने वाले प्रवासी भारतीयों की सुविधा के लिए नई दिल्ली में प्रवासी भवन का निर्माण कर उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। भारत सरकार द्वारा 9 जनवरी को मनाये जाने वाले प्रवासी दिवस की सर्वप्रथम कल्पना भी उन्हीं के दिमाग की उपज थी। अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग न्यास की स्थापना कर प्रतिवर्ष वे एक ऐसे भारतवंशी को सम्मानित करते थे जो विदेश की सरजमीं पर रहते हुए भी भारतीय मूल के लोगों और भारत के मध्य सेतु की भूमिका निभाता हो। उनके लिए कल्याणकारी कार्य करता हो। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।   पत्रकारिता और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रवासी भारतीयों के सन्दर्भ में किए गए उनके प्रयास सर्वविदित हैं। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में उस समय एक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ जब 1954 में नागरी लिपि में दूरमुद्रक ( टेलीप्रिन्टर) द्वारा पहली बार पटना और दिल्ली को इसके द्वारा सम्बद्ध किया गया। इस सेवा का शुभारम्भ स्व.राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने किया था। यह पहला अवसर था जब हिन्दी के समाचार दूरमुद्रक के माध्यम से हिन्दी में भेजे जाने लगे। इससे पूर्व देश में पी.टी.आई. और यू.एन.आई के माध्यम से देश भर में अंग्रेजी भाषा में समाचार प्रेषित किए जाते थे और हिन्दी के समाचार पत्र उन समाचारों का अनुवाद करके छापने को विवश थे। देवनागरी के जिस दूरमुद्रक ने समाचार जगत में क्रान्ति की उसको वास्तविकता और व्यवहारिता का अमली-जामा पहनाने का श्रेय बालेश्वर अग्रवाल को जाता है। पटना को दिल्ली से जोड़ने के बाद इस क्रान्ति ने रुकने का नाम नहीं लिया। बालेश्वर अग्रवाल दरअसल उस युग के पत्रकार थे जब समाचार को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना एक बहुत बड़ी समस्या होती थी और वह भी देवनागरी लिपि में। बालेश्वर अग्रवाल के इस एक सफल प्रयास से हिन्दी समाचार पत्रों के सम्पादकीय विभाग में काम करने वालों को अनुवादक की बजाय सम्पादक बना दिया। अब तक जो लोग केवल अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद कर समाचार बनाते थे अब अपना समय समाचारों के सम्पादन में लगाने लगे। देखा जाए तो इस बहाने बालेश्वर अग्रवाल ने हिन्दी के सम्पादकों की कई पीढ़ियां तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान दिया।   बालेश्वर अग्रवाल उस समय हिन्दुस्थान समाचार की पटना शाखा के प्रभारी थे और अंग्रेजी समाचारों के हिंदी रूपांतरण को असहनीय मानते थे। वे हिन्दुस्थान समाचार के साथ उसके स्थापना काल से ही जुड़ गए थे। बाद में तो हिन्दुस्थान समाचार और बालेश्वर अग्रवाल के मध्य अद्वैत की ही स्थिति बन गई थी। हालात यह थे कि बालेश्वर अग्रवाल के बिना हिन्दुस्थान समाचार की कल्पना तक करना असंभव हो गया था। इसी प्रकार हिंदुस्थान समाचार के बिना बालेश्वर अग्रवाल सम्पूर्ण नजर नहीं आते थे। दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए थे। 1949 से लेकर 1982 तक बालेश्वर अग्रवाल के लिए हिन्दुस्थान समाचार ही सर्वस्व था। इसमें काम करने वाले कर्मचारी ही उनके परिजन थे। हिन्दुस्थान समाचार और उससे जुड़े लोगों की उन्नति ही उनके जीवन का एक मात्र ध्येय था।   हिन्दुस्थान समाचार ने जिन पत्रकारों को पत्रकारिता की प्रारम्भिक शिक्षा दी आज वे पत्रकार पूरी तरह से देश के पत्रकार जगत पर छाए हुए हैं। इस प्रकार यदि उन्हें हिन्दी पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी का भीष्म पितामह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बालेश्वर अग्रवाल ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में समाचार एजेन्सी की भूमिका को भी नये आयाम दिए। हिन्दुस्थान समाचार से पूर्व देश के सभी समाचार पत्र अंग्रेजी की समाचार एजेंसियों पर आश्रित थे। ये एजेंसियां भले ही भारत में काम करती थीं परन्तु उन्हें भी अधिकांश समाचारों के लिए विदशी समाचार एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता था। बालेश्वर अग्रवाल की नियमबद्ध परम अनुशासित कार्यशैली अनुकरणीय थी। उनका मन अति निर्मल था यद्यपि कि कई बार उनके व्यवहार में असहनीय रूखापन भी नजर आता था। लेकिन उन्होंने कभी किसी के प्रति अपने मन में दुराव का समावेश नहीं होने दिया। वे अपने हर कार्य नियत समय पर करने के लिए जाने जाते थे। जरा सा विलम्ब भी उन्हें विचलित कर देता था। इस आपाधापी के भौतिक परिवेश में जब हर व्यक्ति अपने सम्बन्धों को भुनाने में लगा है, बालेश्वर जी निस्पृह रहकर अपना कार्य करते थे। देश के शीर्षस्थ नेताओं से उनके अति आत्मीय और घनिष्ठ सम्बंध थे परन्तु इसका कोई लाभ उन्होंने लिया हो, इसके एक भी उदाहरण नहीं हैं।   प्रवासी भारतीयों के बारे में डॉ. एलएम सिंघवी की अध्यक्षता में सितंबर 2000 में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई, उसमें आरएल भाटिया, जेआर हीरेमथ, बालेश्वर अग्रवाल और विदेश मंत्रालय के सचिव जेसी शर्मा बतौर सचिव शामिल थे। इस समिति ने 8 आठ सितंबर 2002 को पूर्ण रिपोर्ट सौंपने से पहले तीन अंतरिम रिपोर्टें सौंपी थीं। इनमें भारतीय मूल के लोगों के लिए कार्ड की योजना के साथ ही प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की बात कही गई थी। तीसरी रिपोर्ट में कहा गया कि प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार दिए जाने चाहिए। समिति ने अंतिम रूप से जो रिपोर्ट सौंपी उसमें 160 विभिन्न सिफ़ारिशें की गई थीं। इनमें हवाई अड्डों की हालत सुधारने की बात भी शामिल थी। एक संस्तुति यह भी थी कि प्रवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों से विवाह करने वाली महिलाओं के शोषण के बारे में एक विशेष शाखा का गठन किया जाए जिससे उसमें मुफ़्त वैधानिक सलाह भी दी जाए। दूल्हों को उस समय की वैवाहिक स्थिति के बारे में शपथ पत्र देना होगा। विदेश में श्रमिक के तौर पर काम कर रहे भारतीयों के हितों के संरक्षण पर भी जोर देने और इसके लिए मुख्य तौर पर बीमा योजना की बात भी इस रिपोर्ट में शामिल थी। जाहिर है कि बालेश्वर अग्रवाल कितनी सूक्ष्म दृष्टि से चीजों को देखते-समझते और समस्याओं का निदान करते थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद को भारतीय मूल के लोगों के साथ रिश्तों के सूत्र को और मजबूत करना चाहिए। छुट्टी के दिनों में छात्रों का आदान-प्रदान कार्यक्रम भी होना चाहिए। दूसरे देशों में आईआईटी, आईआईएम और अन्य मेडिकल कॉलेजों की शाखाएं भी खोले जाने का प्रस्ताव रखा गया था। उनके समाज सेवा के भाव को देखते हुए ही पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की थी कि मॉरीशस के 'विश्व हिन्दी सचिवालय' भवन में स्थित पुस्तकालय भवन का नाम 'बालेश्वर अग्रवाल पुस्तकालय' होगा और नियत समय पर पुस्तकालय का नामकरण इस राष्ट्रसेवी महामनीषी के नाम पर हुआ भी।   यह कहना गलत नहीं होगा कि विश्व भर में उनके प्रति आदर का भाव रखने वाले लोग बड़ी संख्या में मौजूद हैं। उन्हीं में से एक मॉरीशस निवासी प्रेमचन्द बुझावन ने बालेश्वर अग्रवाल पुस्तकालय का सुझाव दिया था। इससे पता चलता है कि लोक में उनके प्रति कितनी श्रद्धा थी। कितना विश्वास था। वर्ष 2013 में भले ही वे हम सबको दैहिक रूप से छोड़ गए लेकिन उनकी आत्मा, उनके विचार युगों-युगों तक इस देश-दुनिया का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनकी जन्मशताब्दी के अवसर पर उनकी महान आत्मा का पुण्य स्मरण नयी दिशा देता है और देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा भी देता है। लगता है, आज भी वे हमारे बीच हैं और हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। उस अमित तेजस्वी यशकाय और सर्वहितकारिणी दिव्यात्मा को शत-शत नमन।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, Mindset is not changing towards Dalits

संदर्भ- गुना में दलितों पर पुलिस की बर्बरता प्रमोद भार्गव          मध्य-प्रदेश के गुना में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण से जुड़े एक मामले में कानूनी कार्यवाही के नाम पर पुलिस जिस तरह से बेलगाम हुई, उसने कानून और मानवीयता की सभी हदें तोड़ दीं। साफ है, कानून के रखवालों को चाहे जितने नियमों के पाठ पढ़ाए जाएं, लाचारों के सामने आक्रामकता दिखाने से वे बाज नहीं आते है। गुनाजिले के जगनपुर चक में मॉडल महाविद्यालयों को राजस्व विभाग ने चालीस बीघा जमीन आवंटित की थी। इस जमीन पर पिछले 15 साल से गबरू पारदी नाम के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति का कब्जा था। उसने यह जमीन राजकुमार अहिरवार को तीन लाख रुपए लेकर खेती के लिए ठेके पर दे दी थी। राजू और उसकी पत्नी सावित्री ने कर्ज लेकर इस जमीन पर हाड़-तोड़ महनत करके फसल उगाई। इसी समय पुलिस और राजस्व आमला जेसीबी मशीन लेकर जमीन खाली कराने के लिए पहुंच गया। राजकुमार और सावित्री ने फसल पकने तक खेत नहीं उजाड़ने की हाथ जोड़कर प्रार्थना की। लेकिन जब जेसीबी ने फसल रौंदना शुरू कर दी तो किसान दंपति की सभी आशाओं पर पानीफिर गया और उन्होंने झोंपड़ी से कीटनाशक दवा उठाकर पी ली। उनके चार बच्चे इस हालात को देखकर रोने-चिल्लाने लगे। तब राजकुमार का छोटा भाई शिशुपाल और उसकी पत्नी दौड़कर आए। इन निहत्थों पर पुरुष एवं महिला पुरुष ने इतनी लाठियां बरसाईं कि उनके कपड़े तक चिथड़े-चिथड़े हो गए। जब दोनों निढाल होकर खेत में पसर गए तब बेरहम पुलिस की बर्बरता थमी। इस हृदय विदारक घटना का समाचार प्रकाशित व प्रसारित होने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कलेक्टर व एसपी के तबादले कर दिए और छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। लेकिन इसके पहले दलित किसानों पर सरकारी काम में बाधा डालने की एफआईआर पुलिस ने दर्ज कर ली। सरकार की ओर से न तो अभी तक इस मामले को खत्म करने का भरोसा दिया है और न ही दलितों को काई आर्थिक मदद की घोषणा की है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जरूर दलित किसान को सवालाख रुपए की मदद की है। इस मामले की पड़ताल से पता चलता है कि इसमें राजस्व विभाग बुनियादी तौर से दोषी है। जब जमीन पर 15 साल से कब्जा चला आ रहा था तो उसे शुरूआत में ही क्यों नहीं रोका गया ? दरअसल मध्य- प्रदेश में जितनी भी राजस्व और वन विभाग की जमीनों पर कब्जे कर खेती हो रही है, उन पर सुनियोजित ढंग से राजस्व और वनकर्मियों ने ही कब्जा कराया हुआ है। ये लोग बीघा के हिसाब से कब्जेधारी से खेती करने के पैसे लेते हैं। बांधो के निर्माण में जो जमीन डूब क्षेत्र में आई हुई है, उसे मुआवजा दे दिए जाने के बावजूद सिंचाई विभाग के लोग खेती के लिए ठेके पर दे रहे हैं। नदियों से अवैध रूप में रेत उत्खनन का खेल तो पूरे मध्य-प्रदेश में खुले रूप में नेता-अधिकारी और ठेकेदारों की मिलीभगत से चल रहा है। इस खनन के आए दिन समाचार भी आते रहते हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। देश को आजाद हुए 72 साल हो गए, लेकिन आज तक राजस्व दस्तावेजों का संधारण सहीं नहीं है। कंप्यूटरीकरण ने इस गड़बड़ी को और बढ़ा दिया है। विडंबना है कि पूरे देश में समूचे पुलिस तंत्र पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, लेकिन पुलिस का रवैया बदल नहीं रहा है। जिस राजस्व और पुलिस अमले ने भूमि खाली कराने के लिए गैर-कानूनी हथकंडे अपनाए, उनका इस्तेमाल किए बिना कानूनी तरीके से भी कब्जा हटाया जा सकता था। लेकिन पुलिस जब लाचार व दलित फटेहालों से रूबरू होती है तो वह अकसर बेलगाम होकर तानाशाह बन जाती है। ऐसी ही घटनाओं के बरक्श मध्य-प्रदेश भू- राजस्व संहिता और पुलिस सुधारों में बदलाव की बात उठती है, लेकिन यह आवाज कुछ दिनों में ही नक्कारखाने की तूती बन रहकर दम तोड़ देती है। सामाजिक अन्याय व असमानता की शुरुआत जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था से हुई थी। इसीलिए अंबेडकर ने कहा था कि सामाजिक न्याय जातिविहीन सामाजिक संरचना से ही संभव है। इसी नजरिये से उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता, एकजुटता और जातिविहीन समाज का वैकल्पिक दृष्टिकोण देश के सामने रखा। दलित और वंचितों को राष्ट्र के प्रजातांत्रिक मूल्यों व अधिकारों सेजोड़ने का यह एक कारगर मंत्र था। लेकिन देश में जाति प्रथा की जड़ें और उससे घृणा की हद तक जुड़ी कड़वाहटें इतनी गहरी थीं कि मंत्र की सिद्धि अनेक कानूनी संवैधानिक प्रावधानों के वजूद में होने के बावजूद संभव नहीं हुई। बावजूद केन्द्र व राज्य सरकारों की विडंबना रही है की वे इस विरोधाभास की हकीकत को आधिकारिक तौर सेस्वीकारने से भी बचती रहीं कि देश में जाति प्रथा का अस्तित्व है अथवा नहीं ? वास्तव में दलितों के उत्थान के लिए आजादी के बाद तीन चरण सामने आए हैं। पहले चरण में भीमराव आंबेडकर ने कांग्रेस के साथ मिलकर संविधान लिखने और वंचितों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने में योगदान किया। दूसरा चरण कांशीराम का था, जिन्होंने संगठन के माध्यम से दलितों में सशक्तीकरण को बढ़ाया। इस चरण में मायावती ने भी अहम् भूमिका निभाई। देश अब तीसरे चरण से गुजर रहा है, जहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू है,नेतृत्व का विकास।’ लेकिन वाकई दलित आंदोलन को आगे बढ़ाना है तो एक दलित नेता या दो दलित नेता पर्याप्त नहीं हैं, लाखों दलित नेताओं की जरुरत पड़ेगी ? लेकिन फिलहाल दलित आंदोलन के नेतृत्व पर मायावती ने कब्जा कर रखा है, वह दूसरों को आगे बढ़ने की इजाजत ही नहीं देतीं। मायावती बहुजन समाज पार्टी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बजाय, एकतंत्री हुकूमत से चला रही हैं। यह सामंती मानसिकता पार्टी में चरणबद्ध नेतृत्व को उभरने नहीं दे रही हैं। बावजूद देश में दलित हमेशा राजनीति के केन्द्र में रहे हैं। इधर कुछ समय से हमारे सभी दलों के नेता दलितों के घर जाकर ठहरने,भोजन करने और दलितों के पैर धोने तक के उदाहरण पेश कर चुके हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में इसी साल संपन्न हुए अर्धकुंभ मेले में पांच सफाईकर्मियों के पैर धोए और तौलिए से पोंछे। इनमें तीन पुरुष और दो महिलाएं थीं। समाजिक समरसता का यह एक बड़ा उदाहरण था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी दलितों को श्ोष हिंदू समाज से जोड़ने का अभियान चलाकर दलितोद्धार में लगा है। बावजूद ये उपक्रम सांकेतिक हैं, क्योंकि इनसे लाचार की बुनियादी जरुरतें पूरी नहीं होतीं और वे सरकारी जमीनों पर आजीविका के लिए खेती करने को विवश होते हैं।   गुना के दलित दंपति की यही लाचारी थी। दलितों के उद्धार के लिए महात्मा ज्योति बा फुले, डॉ अंबेडकर और महात्मा गांधी अग्रदूत बनकर सामने आए। उन्होंने इस तबके कोमुख्यधारा में जोड़ने की दृष्टि से सवर्णों के समकक्ष राजनीति व रोजगार के अवसरों में आरक्षण के प्रावधान भी रखे। जातिसूचक शब्दों का उल्लेख भी दण्डनीय अपराध में शामिल किया। बावजूद इस तबके में बड़े पैमाने पर जातीय उद्धार संभव नहीं हुआ। इसका एक कारण यह रहा कि जो दलित अवसरों का लाभ उठाकर सरकारी नौकरियों में आते गए, उनमें से ज्यादातर अपने ही समुदाय से दूरी बनाकर आभिजात्य बनने की होड़ में लग गए ? वर्तमान में जो दलित राजनीति अथवा सरकारी क्षेत्र में ऊंचे पद पर आरक्षण की सीढ़ी चढ़कर पहुंचे हैं, उनमें से अधिकतर के जीवनसाथी सवर्ण हैं। इससे लगता है कि इनमें सामाजिक उपेक्षा और प्रताड़ना ने इतना हीनता बोध भर दिया है कि ये उच्च शिक्षित होने के बावजूद इस बोध से उबर नहीं पा रहे हैं। ये जाति को छिपाने के उपक्रम में भी लगे रहते हैं। लिहाजा दलितों के कल्याण के लिए जो दलित आरक्षण का लाभउठाकर सामाजिक व आर्थिक रुप से सक्षम हो गए हैं उन्हें भी जातीय शर्म से ऊपर उठकर अपनी जाति से जुड़े रहना जरुरी है। इस सहभागिता से भी हाशिए पर पड़े दलितों को मुख्य धारा से जुड़ने का रास्ता प्रशस्त होगा।       लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, West Bengal is synonymous with bloody politics

संदर्भ- बंगाल में भाजपा विधायक की संदिग्ध आत्महत्याप्रमोद भार्गवपश्चिम बंगाल में भाजपा विधायक देवेंद्र नाथ राय का शव एक दुकान के बरामदे में पंखे से लटका मिला है। राय उत्तर दिनाजपुर जिले की हेमताबाद विधानसभा से विधायक थे। पुलिस इसे जेब से मिले, आत्महत्या पूर्व लिखे पत्र के चलते खुदकुशी मान रही है, जबकि उनके परिजन और भाजपा कार्यकर्ता इसे जघन्य हत्या बता रहे हैं। दरअसल यह सब सार्वजनिक स्थल पर लटका मिला है। विधायक जैसा बड़ी पहचान वाला व्यक्ति सार्वजनिक ठौर पर आत्मघाती पहल नहीं कर सकता। हत्या की आशंका इस वजह से भी है कि उन्हें स्थानीय लोग रात 1 बजे बुलाकर अपने साथ बाइक से ले गए थे। सुबह उनकी बंद दुकान के बरामदे में लाश मिली। 59 साल के देवेंद्र नाथ पिछले साल ही माकपा से भाजपा में शामिल हुए थे। बंगाल में वामदल अर्से से खूनी हिंसा के पर्याय बने हुए हैं। शायद इसीलिए बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनकड़ ने भी विधायक की मौत पर सवाल उठाते हुए इसे प्रतिशोध की राजनीति बताया है। भाजपा इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रही है। क्योंकि बंगाल पुलिस अन्य राज्यों की पुलिस की तरह तृणमूल कांग्रेस की कठपुतली बनी हुई है। बंगाल की राजनीति में विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं होती रही हैं। वामदलों के साढ़े तीन दशक चले शासन में राजनीतिक हिंसा की खूनी इबारतें निरंतर लिखी जाती रही थीं। दरअसल वामपंथी विचारधारा विरोधी विचार को तरजीह देने की बजाय उसे जड़-मूल खत्म करने में विश्वास रखती हैं। ममता बनर्जी जब सत्ता पर काबिज हुई थीं, तब यह उम्मीद जगी थी कि बंगाल में लाल रंग का दिखना अब समाप्त हो जाएगा। लेकिन धीरे- धीरे तृणमूल कांग्रेस वामदलों के नए संस्करण में बदलती चली गई। यही कारण रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भी बंगाल को खूब रक्त से सींचने की कवायदें पेश आती रही थीं। हालांकि बंगाल में विधानसभा चुनाव 2021 में होंगे। लेकिन विधायक की हत्या से लग रहा है कि चुनाव की पृष्ठभूमि हिंसक राजनीतिक टकराव से तैयार की जाने लगी है। जिससे भाजपा में वामदलों से लेकर कांग्रेस और तृणमूल के नेताओं के जाने का जो सिलसिला चल पड़ा है, वह थम जाए। इसीलिए प्रत्येक चार-छह दिन में एक बड़ी राजनैतिक हत्या बंगाल में देखने का सिलसिला बना हुआहै। हिंसा की इस राजनीतिक संस्कृति की पड़ताल करें तो पता चलता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का पहला सैनिक विद्रोह इसी बंगाल के कलकत्ता एवं बैरकपुर में हुआ था, जो मंगल पाण्डे की शहादात के बाद 1947 में भारत की आजादी का कारण बना। बंगाल में जब मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, तब सामाजिक व आर्थिक विषमताओं के विद्रोह स्वरूप नक्सलवाड़ी आंदोलन उपजा। लंबे समय तक चले इस आंदोलन को क्रूरता के साथ कुचला गया। हजारों दोषियों के दमन के साथ कुछ निर्दोष भी मारे गए। इसके बाद कांग्रेस से सत्ता हथियाने के लिए भारतीय माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चा आगे आया। इस लड़ाई में भी विकट खूनी संघर्ष सामने आया और आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में वामदलों ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीन ली। लगातार 34 साल तक बंगाल में माक्र्सवादियों का शासन रहा। इस दौरान सियासी हिंसा का दौर नियमित चलता रहा। तृणमूल सरकार द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1977 से 2007 के कालखंड में 28 हजार राजनेताओं की हत्याएं हुईं। सर्वहारा और किसान की पैरवी करने वाले वाममोर्चा ने जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों की खेती की जमीनें टाटा को दीं तो इस जमीन पर अपने हक के लिए उठ खड़े हुए किसानों के साथ ममता बनर्जी आ खड़ी हुईं। मामता कांग्रेस की पाठशाला में ही पढ़ी थीं। जब कांग्रेस उनके कड़े तेवर झेलने और संघर्ष में साथ देने से बचती दिखी तो उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़ा और तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व में लाकर वामदलों से भिड़ गईं। इस दौरान उन पर कई जानलेवा हमले हुए, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जबकि 2001 से लेकर 2010 तक 256 लोग सियासी हिंसा में मारे गए। यह काल ममता के रचनात्मक संघर्ष का चरम था। इसके बाद 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए और ममता ने वाममोर्चा  का लाल झंडा उतारकर तृणमूल की विजय पताका फहरा दी। इस साल भी 38 लोग मारे गए। ममता बनर्जी के कार्यकाल में भी राजनीतिक लोगों की हत्याओं का दौर बरकरार रहा। इस दौर में 58 लोग मौत के घाट उतारे गए। बीते दिनों ही तृणमूल और वामपंथी संगठन के बीच हुई झड़प में दोनों पक्षों के एक-एक नेता मारे गए हैं। इस घटना के कुछ दिन पहले ही अलग-अलग घटनाओं में पांच राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं थीं। बंगाल की माटी पर एकाएक उदय हुई भाजपा ने ममता के वजूद को संकट में डाल दिया है। बांगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 90 फीसदी तृणमूल के खाते में जाते हैं। इसे तृणमूल का पुख्ता वोट-बैंक मानते हुए ममता ने अपनी ताकत मोदी व भाजपा विरोधी छवि स्थापित करने में झांेक दी है। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का संदेश भी छिपा था। किंतु इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रया हिंदुओं में स्व-स्फूर्त धु्रवीकरण के रूप में दिखाई देने लगी। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए भाजपा को वजूद के लिए खतरा मानकर देख रहे हैं, नतीजतन बंगाल के चुनाव में हिंसा का उबाल आया हुआ है। इस कारण बंगाल में जो हिंदी भाषी समाज है, वह भी भाजपा की तरफ झुका दिखाई दे रहा है। हैरानी इस बात पर भी है कि जिस ममता ने 'मां माटी और मानुष' एवं 'परिवर्तन' का नारा देकर वामपंथियों के कुशासन और अराजकता को चुनौती दी थी, वही ममता इसी ढंग की भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बौखला गई हैं। उनके बौखलाने का एक कारण यह भी है कि 2011-2016 में उनके सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ जो वामपंथी और कांग्रेसीकार्यकर्ता आ खड़े हुए थे, वे भवष्यि की राजनीतिक दिशा भांपकर भाजपा का रुख कर रहे हैं। 2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा नंगा नाच, नाच रही थी, तब ममता ने अपने कार्यकताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, 'बदला नहीं, बदलाव चाहिए'। लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक व अराजक लग रहे हैं। ममता को हिंसा के परिप्रेक्ष्य में आत्ममंथन करने की जरूरत है कि बंगाल में ही हिंसा परवान क्यों चढ़ी है ? जबकि ऐसी हिंसा देश के अन्य किसी भी राज्य में दिखाई नहीं दे रही है। अतएव ममता को लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को ठेंगा दिखाने से बचना चाहिए ? लेकिन बंगाल में इस खूनी सिलसिले का थमना आसान नहीं लग रहा है। क्योंकि राजनीति, पुलिस और प्रशासन के स्तर पर दूर-दूर तक सुधार की कोई पहल नहीं की जा रही है।   लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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Dakhal News 15 July 2020


bhopal, Congress goes to the edge of youth thinking

कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय   सुरेश हिंदुस्थानी   गत दो लोकसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद अभी तक के राजनीतिक इतिहास में अपने सबसे बड़े दुर्दिनों का सामना कर रही कांग्रेस पार्टी समूहों में विभाजित होकर अवनति के मार्ग पर बेलगाम बढ़ती जा रही है। यह समस्याएं उसकी खुद की देन हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में कांग्रेस की राजनीति में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसके पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि आज की कंग्रेस में स्पष्ट दिशा और स्पष्ट नीति का अभाव सा पैदा हो गया है। उसके जिम्मेदार नेताओं को यह भी नहीं पता कि कौन से मुद्दे पर राजनीति की जानी चाहिए और किस पर नहीं। इसी कारण कांग्रेस का जो स्वरूप दिखाई दे रहा है, वह अविश्वसनीयता के घेरे में समाता जा रहा है। कांग्रेस के प्रति इसी अविश्वास के कारण उसके युवा नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। इसलिए कांग्रेस के युवा नेता अब कांग्रेस से ही किनारा करने की भूमिका में आते जा रहे हैं।   कांग्रेस के अंदर जिस प्रकार की दुरूहता की स्थिति बनी है, उसके पीछे एक बड़ा कारण यह माना जा सकता है कि गत तीन दशक से कांग्रेस लगातार अवनति के मार्ग पर अग्रेसित होती दिखाई दे रही है, ऐसी स्थिति में भविष्य में शिखर की राजनीति करने की महत्वाकांक्षा रखने वाले नेता सशंकित अपने सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न अंकित होते हुए देख रहे हैं। इसी कारण कांग्रेस का युवा वर्ग अपनी ही पार्टी से किनारा करने की मनःस्थिति की जाते हुए दिख रहे हैं। पहले मध्यप्रदेश में लंबे समय तक उपेक्षा का दंश भोगने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को गहरा आघात दिया था, उसके कारण कांग्रेस को अपनी राज्य सत्ता से हाथ धोना पड़ा। अब लगभग वैसी ही स्थिति राजस्थान में प्रादुर्भित होती दिखाई दे रही है। राजस्थान की रेतीली राह पर अशोक गहलोत की गति फिसलन की अवस्था में है।    यह स्थिति जहां एक ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेतृत्व के प्रति अनास्था की धारणा को जन्म देने वाला कहा जा सकता है, वहीं यह भी प्रदर्शित कर रहा है कि राहुल गांधी युवाओं को आकर्षित करने में असफल साबित हुए हैं। इसमें उनकी अनियंत्रित बयानबाजी भी कारण है। हम जानते हैं कि कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार नहीं, बल्कि कई बार झूठे बयान दिए हैं, जिसमें वे माफी भी मांग चुके हैं। यह बात सही है कि झूठ के सहारे आम जनता को भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन जब सत्य सामने आता है, तब उसकी कलई खुल जाती है। सबसे बड़ी विसंगति तो तब बनती है, जब अपने नेता के बयान को कांग्रेस के अन्य नेता समर्थन करने वाले अंदाज में निरर्थक रूप से पुष्ट करने का असफल प्रयास करते हैं। ऐसे प्रयासों से भले ही यह भ्रम पाल ले कि उसने केन्द्र सरकार को घेर लिया, लेकिन वास्तविकता यही है कि इसके भंवर में वह स्वयं ही फंसी नजर आती है।   पिछले दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जो राजनीतिक स्थिति बनी है, वह कांग्रेस को सबक देने के लिए काफी था, लेकिन इसके बाद भी अपनी शर्मनाक पराजय पर न तो कोई चिंतन ही किया है, और न ही उसने इस बात की जरूरत महसूस की। हां राहुल गांधी ने यह कहकर पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ दिया था कि अब पार्टी दूसरे किसी ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाए जो गांधी परिवार से बाहर का हो, लेकिन यह बात ही हवाहवाई ही प्रमाणित हुई। यह ऐसे झूठ हैं जो कांग्रेस के लिए विनाशकारी साबित हो रहे हैं। राजस्थान कांग्रेस में चल रहे घमासान के कारण प्रदेश किस स्थिति में पहुंचेगी, यह शीघ्र ही पता चल जाएगा, लेकिन यह तो मानना ही होगा कि देश में कांग्रेस पार्टी के अंदर कहीं न कहीं विद्रोह करने की भावना परवान चढ़ती जा रही है। इसके लिए कांग्रेस अपनी कमियों को छिपाने के लिए भले ही भाजपा पर आरोप लगाने की राजनीति करे, लेकिन सत्य यह है कि इसके लिए कांग्रेस की कुछ नीतियां और वर्तमान में नेतृत्व की खामियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। अभी फिर से सुनाई देने लगा है कि राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की मुहिम चल रही है। जो सीधे तौर पर जमीनी नेताओं को किनारे करने की राजनीतिक चाल है। मध्यप्रदेश के बाद अब राजस्थान में कांग्रेस सरकार के विदाई की तैयारी होने की स्थितियां निर्मित होने लगी हैं। राजस्थान में जमीनी राजनीति करने वाले सचिन पायलट बगावती स्वर मुखरित करने की मुद्रा में आ चुके हैं।   कांग्रेस की राजनीति का प्रिय शगल रहा है कि जिस नेता के हाथों में शक्ति आ जाती है, वह अपना एक नया गुट बनाने की कवायद करने में लग जाता है, साथ ही अपने लिए खतरा बन सकने वाले नेताओं को किनारे करने की भी राजनीति प्रारंभ हो जाती है। उल्लेखनीय है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट के नाम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भी उठ चुके हैं। यह स्वाभाविक रूप से यही संकेत करते हैं कि इन दोनों नेताओं में काबिलियत है। जिसे कांग्रेस नेतृत्व पहचानने में असमर्थ साबित हुआ है। हमें यह भी स्मरण होगा कि कांग्रेस आलाकमान ने गत विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन बाद की राजनीति में उनको किनारे कर दिया और कमलनाथ सत्ता के शिखर पर पदासीन हो गए। इसी प्रकार की स्थिति राजस्थान में अशोक गहलौत के साथ बनी, जिसमें सचिन पायलट को किनारे किया गया। लगभग डेढ़ साल तक सचिन पायलट ने अपमान का घूंट पीकर राजनीति की। और अब परिणाम सामने हैं।   बूढ़ी सोच ज्यादा दिनों तक नहीं उठाई जा सकती है, पहले मध्य प्रदेश में और अब राजस्थान में बगावत की जो सुर मुखर होकर सामने आए हैं उससे यह तो साफ हो गया है कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व किसी भी तरह का बदलाव नहीं चाहता है। बहरहाल राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार संकट में है और अगर वह संकट से उबर भी जाती है तो आने वाले दिनों में उसके भविष्य पर खतरा मंडराता ही रहेगा। राजस्थान में सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन उन्हें दरकिनार कर राज्य की कमान गांधी परिवार के पुराने दरबारी अशोक गहलोत को सौंप दी। देश की राजनीति में भाजपा के उभार और विशेषकर 2014 के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अपनी ही गलतियों के कारण कांग्रेस सत्ता से हाथ धोना पड़ा। यही नहीं वह निरंतर कमजोर होती गई और जनता के बीच अपने विश्वास को भी बचाकर नहीं रख सकी।   मध्यप्रदेश और राजस्थान की घटनाक्रमों से यह संदेश तो गया है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन पूरी तरह खत्म हो गया है। सवाल यह है कि मतदाताओं ने क्या इसी दिन को देखने के लिए राजस्थान में कांग्रेस को चुना था। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जो हुआ, वही राजस्थान में सचिन पायलट के साथ हुआ। संभावना यह भी है कि आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ में भी इसी इतिहास को न दोहरा दिया जाए क्योंकि वहां भी भूपेश बघेल और सिंह देव सिंह के बीच तनातनी की खबरें सामने आ रही हैं। राज्यों में कांग्रेस के भीतर क्या हो रहा है, शीर्ष नेतृत्व इससे बेखबर है या फिर आंख, मुंह और कान बंद करके बैठा हुआ है। राहुल गांधी जिनसे पार्टी के युवाओं को उम्मीदें हैं, राजस्थान में हो रही उठापटक के बीच अब तक सामने नहीं आए हैं। उनकी पूरी ऊर्जा इस पर खर्च हो रही है कि मोदी सरकार पर ट्वीट के जरिए कैसे निशाना साधा जाए। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की नींद भी तब टूटती है जब पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है। कहा जा रहा है सचिन पायलट ने अपने कदम बढ़ाने से पहले अपनी बात आलाकमान तक पहुंचाने की कोशिश की लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। अंतत: उन्हें बगावत जैसा कदम उठाना पड़ा।     (लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार है)  

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Dakhal News 15 July 2020


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  गिरीश्वर मिश्र आकाश में आजकल बादल छा रहे हैं और वर्षा भी हो रही है। यह समय वृक्षारोपण के लिए हर तरह से उपयुक्त है। आसपास का पर्यावरण इस समय हरी घास, हरे-भरे वृक्ष और लहलहाते तृण, लता-गुल्म और तमाम तरह की वनस्पतियों से खिलखिला रहा है। इनके माध्यम से प्रकृति का जीवंत संगीत मानव हृदय को अकल्पनीय सुख देता है। हरियाली आंखों को सुकून देती है और जीवन के गतिमय , सृजनशील और विकसित होते हुए ऊपर उठने की प्रवृत्ति को साकार करती है। उनसे प्राण वायु आक्सीजन मिलती है और प्रकृति के विभिन्न अवयवों के बीच संतुलन बना रहता है। शायद वृक्षों से ज्यादा परोपकारी सृष्टि में कोई और नहीं होगा। उनका पूरा अस्तित्व ही दूसरों के लिए ही होता है। पेड़ की घनी छाया तपती दुपहरी में बड़ी प्रिय होती है। इनके फल-फूल, जड़ , छाल सबकुछ उपयोगी होते हैं। उनके द्वारा मिलने वाले बहुत से खाद्य पदार्थ और औषधियों का तो कहना ही क्या। उनकी तो ये खान हैं। आयुर्वेद की एक शाखा ही 'वृक्षायुर्वेद' है। नैसर्गिक रूप से विकसित होते जंगल बेतरतीब होते हैं और जैव विविधता की दृष्टि से अनमोल। जंगलों में बहुत से जीव-जंतु भी रहते हैं। उनकी वासस्थली जो ठहरे! तरह-तरह की लकड़ी का नाना प्रकार का उपयोग होता है। मिट्टी का संरक्षण और जल की उपलब्धता या कहें जलचक्र को भी ये निर्धारित करते हैं। हमारा जीवन और वन दोनों एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर हैं। वृक्ष लगाना पुण्य का कार्य माना जाता रहा है और वे मनुष्य को सदा से समृद्ध करते रहे हैं। कभी धरती का आधा हिस्सा वनाच्छादित था। अब तीस प्रतिशत के करीब बचा है। यदि वृक्षों और वनों का पालन-पोषण और रक्षा का काम होता रहे तो वन भी रहेंगे और जीवन भी रहेगा। भारत में वन, जंगल या अरण्य कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। परम्परागत जीवन का तीसरा आश्रम वानप्रस्थ है और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की अनेक कथाएं वन के बिना कही ही नहीं जा सकतीं। भगवान राम जैसे कथानायक के जीवन में वन की भूमिका से हम सभी भारतवासी भलीभांति अवगत हैं। गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का तीसरा कांड अरण्यकांड है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में वन बड़े महत्व के रहे हैं। ऋषि और मुनि का नाम सुनते ही वन तत्काल याद आ जाते हैं। वैदिक साहित्य का एक हिस्सा 'आरण्यक' है, जिसमें आध्यात्मिक विचार विमर्श है। अथर्व वेद को छोड़ सभी वेदों से जुड़े आरण्यक मिलते हैं। कहते हैं दही में जैसे मक्खन होता है वैसे ही वेद में आरण्यक हैं। 'ऐतरेय'और 'बृहदारण्यक' तो बड़े प्रसिद्ध हैं। हमारे विश्वासों में वृक्षों पर सिर्फ देवता बसते ही नहीं हैं, कई वृक्ष देवता का दर्जा भी पा चुके हैं। पीपल (अश्वत्थ) और बरगद (वट) ऐसे ही वृक्ष हैं। यह कहने का आशय मात्र यह है कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति में और लोकजीवन में वृक्षों की अभी भी महत्वपूर्ण जगह बनी हुई है। दुर्भाग्य से आधुनिकता, नगरीकरण और औद्योगिकीकरण की जो धारा प्रवाहित हुई, उसने हमारा नजरिया बदल दिया। बाजार ही सबसे बड़ा तर्क हो गया। आज हम वनों को संसाधन (रिसोर्स) मानते हैं और उनका मनमाना दोहन करते हैं। उन्हें लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। वनों की कटाई हो रही है, उनकी जगह वृक्षारोपण भी नहीं हो रहा है। इधर वृक्षारोपण की ओर ध्यान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने 'संकल्प पर्व' आयोजित कर सबको प्रेरित करने का बीड़ा उठाया है। आवश्यकता है कि इसे एक प्रभावी मुहिम के रूप में स्वीकार कर धरती को हरा-भरा बनाया जाय। जन्मभूमि ही देशवासी की मां होती है। संकल्प पर्व की मुहिम हमारे मातृऋण की अदायगी का एक उपक्रम होगा। सारी भौतिक प्रगति के बावजूद प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है। जल, वायु और अन्न उपलब्ध कराने वाली प्रकृति हम सबका भरण-पोषण करती है। वह वस्तुत: जीवन का पर्याय है और हमारी उपेक्षा दृष्टि का नुकसान झेलते हुए जीवनक्रम अव्यवस्थित-सा हो रहा है। अत: हम सबको जहां भी अवसर मिले इस पुनीत कार्य को बल देते हुए आगे बढ़ाना चाहिए। वृक्ष हैं तो जीवन है। (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 15 July 2020


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  सियाराम पांडेय 'शांत' आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए ऊर्जा बहुत जरूरी है। कोयले और जल से प्राप्त बिजली ही देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक नहीं है। इन दोनों ही संसाधनों से विद्युत उत्पादन में रेडिएशन और प्रदूषण का खतरा भी कम नहीं। देश की बढ़ती आबादी और कारोबारी संभावनाओं के मद्देनजर वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत की तलाश बहुत पहले ही आरम्भ हो गई थी और कहना न होगा कि अपनी इस तलाश में भारत न केवल सफल हुआ बल्कि स्वच्छ और किफायती ऊर्जा बनाने के मामले में उसने दुनिया के शक्तिशाली देशों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर यह कह रहे हैं कि सुरक्षित विश्व की नींव रीवा में पड़ी है तो पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से वह उचित ही है। इस बात को कुछ लोग अतिशयोक्ति के चश्मे से देख सकते हैं लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा जिले में एशिया के सबसे बड़े 750 मेगावाट क्षमता के सौर ऊर्जा संयंत्र का शुभारंभ भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि है। चार हजार करोड़ की लागत से बने इस सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना से रीवा, सफेद बाघ और नर्मदा के लिए ही नहीं, सौर पार्क के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाएगा। यहां उत्पन्न होने वाली वैकल्पिक, स्वच्छ और सस्ती सौर ऊर्जा का लाभ मध्य प्रदेश ही नहीं, दिल्ली मेट्रो को भी मिलेगा।   बकौल प्रधानमंत्री, भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सर्वाधिक आकर्षक विश्व बाजार के रूप में उभरा है। सौर ऊर्जा भरोसेमंद, शुद्ध और सुरक्षित है। भारत अब दुनिया के सौर ऊर्जा उत्पादक शीर्ष पांच देशों में शामिल हो गया है। इससे बड़ी उपलब्धि और प्रसन्नता की बात किसी देश के लिए भला और क्या हो सकती है। रीवा सौर पार्क को मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड और सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त उपक्रम रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर द्वारा विकसित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर यह विश्वास दिलाया है कि इस संयंत्र के सुचारू संचालन के साथ ही मध्य प्रदेश साफ-सुथरी और सस्ती बिजली का हब बन जाएगा। इससे किसानों, मध्यम और गरीब परिवारों और आदिवासियों को फायदा होगा।   रीवा सौर ऊर्जा संयंत्र स्वच्छ प्रौद्योगिकी कोष से 0.25 फीसदी ब्याज पर 40 साल की अवधि के लिए प्राप्त धन से तैयार भारत की पहली सौर ऊर्जा परियोजना है। यह भारत का पहला सोलर पार्क है जिसे विश्व बैंक से रियायती ऋण मिला है। इस परियोजना से राज्य डिस्कॉम को 4600 करोड़ रुपये और दिल्ली मेट्रो को 1400 करोड़ रुपये की बचत होगी, ऐसा दावा किया जा रहा है। रीवा परियोजना में 250-250 मेगावॉट की तीन सौर उत्पादक इकाइयां हैं और यह सौर पार्क के अंदर 500 हेक्टेयर की जमीन पर स्थापित हैं। अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा संयंत्र के निर्माण के लिए 1542 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई गई है। जिसमें 1276.546 हेक्टेयर वन भूमि अधिग्रहीत की गई है, शेष निजी भूमि है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अगर यह कह रहे हैं कि विभिन्न सौर ऊर्जा परियोजनाओं के जरिये मध्य प्रदेश भविष्य में 10 हजार मेगावॉट बिजली का उत्पादन करेगा और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अहम योगदान देगा तो इससे उनके आत्मविश्वास और देश को आगे ले जाने की भावना ही झलकती है। शाजापुर, नीमच और छतरपुर में भी बड़े सोलर पावर प्लांट पर काम चल रहा है। ओमकारेश्वर बांध पर तैरने वाला सौर ऊर्जा संयंत्र लगा है, यह इस बात का द्योतक है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने की बड़ी सोच के तहत यह सब किया जा रहा है।   सौर ऊर्जा को श्योर, प्योर और सिक्योर बताते हुए प्रधानमंत्री ने जो वजह बताई हैं,वे पूर्णतया वाजिब है। सूर्य हमेशा चमकता रहेगा। उससे इस देश को हमेशा ऊर्जा मिलती रहेगी। इससे पर्यावरण पूरी तरह से सुरक्षित और साफ-सुथरा बना रहेगा। इससे बिजली की जरूरत को आसानी से पूरा किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री ने वन वर्ल्ड, वन सन, वन ग्रिड की बात कहकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। रीवा के गुढ़ में स्थापित इस सौर ऊर्जा संयंत्र परियोजना से पैदा हुई बिजली का 76% हिस्सा प्रदेश की पावर मैनेजमेंट कंपनी और 24% दिल्ली मेट्रो को मिल रहा है। 2 रुपए 97 पैसे प्रति यूनिट बिजली मिलना, इस परियोजना की बड़ी खासियत है। रीवा सौर परियोजना से हर साल 15.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उर्त्सजन रुकेगा। जाहिर है, इन अपर संभावनाओं को देखता हुए इस क्षेत्र में विदेशी निवेश में भी बढ़ोतरी होगी।   इसमें शक नहीं कि वर्ष 2015 से 2017 की अवधि में भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन अपनी स्थापित क्षमता से 4 गुना बढ़कर 10 हजार मेगावाट पार कर गया था। यह देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता का 16 फीसदी है। यह ऊर्जा संरक्षण और उसके विकल्पों पर भी तेजी से काम करने का संकेत है। सरकार पवन ऊर्जा के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। वर्ष 1986 में देश में पवन ऊर्जा बनाने की पहल हुई थी। 55 किलोवाट क्षमता के पवन ऊर्जा संयंत्र महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में लगाए गए थे। मौजूदा समय में देश के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों में लगभग 24,759 मेगावाॅट पवन ऊर्जा उत्पन्न हो रही है। मध्य प्रदेश में भी पवन ऊर्जा उत्पादन पर काम चल रहा है। भारत पवन ऊर्जा उत्पादन में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी के बाद चौथे स्थान पर है। आगामी 5 वर्षों में देश अक्षय उर्जा के उपयोग में काफी आगे रहेगा । वर्ष 2030 तक भारत में क्लीन उर्जा का उपयोग आज से 60 फीसदी अधिक होने के आसार हैं।   फिलहाल क्लीन एनर्जी के उत्पादन पर देश जिस तरह आगे बढ़ रहा है,उससे 2050 तक बिजली के स्रोतों पर निर्भरता घट जाएगी। कर्नाटक अक्षय ऊर्जा उत्पादन के मामले में भारत का अग्रणी राज्य है जहां गत वर्ष तक उसकी कुल स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता 12.3 गीगावॉट हो गई थी। वर्ष 2035 तक देश में सौर ऊर्जा की मांग 7 गुना बढ़ने की संभावना है। भारत सरकार 2022 तक देश में 170 गीगावाट (1.70 लाख मेगावाट) अक्षय ऊर्जा उत्पादन करना चाहती है इसमें से 100 गीगावाट सोलर पावर का लक्ष्य है। 31 दिसंबर 2019 तक देश में लगभग 85908 मेगावाट क्षमता के अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित हो चुकी हैं। इनमें पवन ऊर्जा की उत्पादन क्षमता 37505 मेगावाट, सौर ऊर्जा की उत्पादन क्षमता 33730 मेगावाट शामिल है।   भारत के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र पर कोरोना वायरस का भी प्रभाव पड़ा है। चीन और मलेशिया से आने वाले मॉड्यूल की आपूर्ति कोरोना की वजह से प्रभावित हुई है। लद्दाख की गलवां घाटी में हुए भारत-चीन सैन्य संघर्ष के बाद चीन से भारत के व्यापारिक रिश्ते प्रभावित हुए हैं। ऐसे में भारत को सौर ऊर्जा उपकरणों के देश में ही उत्पादित करने की रीति-नीति पर जोर देना होगा। कोरोना को अवसर में तब्दील करने का यही उपयुक्त समय है। हमें चीन पर निर्भरता घटाने के साथ ही अक्षय ऊर्जा संयंत्रों में लगने वाले उपकरण खुद बनाने होंगे। चीन अगर कम लागत के उपकरण बना सकता है तो भारत क्यों नहीं। हमें चीन से सीखना होगा। तकनीकी विकास से जुड़ना, वक्त का तकाजा है।     (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 14 July 2020


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  योगेश कुमार सोनी कोरोना के लगातार बढ़ रहे मामलों से पहले ही दुनिया परेशान है और अब मानसून में जन्म लेने वाले मच्छर से होने वाली बीमारी डेंगू को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है। इस मामले के वैज्ञानिकों ने कहा है कि इसबार अन्य बार की अपेक्षा ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। वैज्ञानिकों यह कहते हुए चेताया कि डेंगू के प्रकोप से कोरोना संकट बढ़ने की आशंका है और यदि ऐसा हुआ तो स्थिति को संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा। दरअसल कोरोना व डेंगू के अधिकतर लक्षण एक जैसे हैं, जिसमें मुख्य है कि दोनों से संक्रमिक होने पर सिर व शरीर में दर्द होता है और तेज बुखार आता है। डेंगू से ग्रस्त होने वाले मरीजों को कोरोना अपनी चपेट में आसानी से ले सकता है। यदि दोनों बीमारी से ग्रसित होने वाली मरीजों की संख्या बढ़ी तो मौत के आंकड़ों में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी होगी और स्थिति भयावह हो सकती है। अबतक आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में कोरोना के करीब आठ लाख केस आ चुके हैं और तेईस हजार लोगों की मौत भी हो चुकी है। आंकड़ों के अनुसार डेंगू की वजह से हर वर्ष करीब डेढ़ लाख मामले आते हैं। बीते वर्ष 2019 में एक लाख पैंतीस हजार से भी अधिक केस आए थे जिसमें 132 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। डेंगू से रिकवरी की प्रतिशत बहुत बेहतर है लेकिन कोरोना काल में डेंगू के मरीज बढ़ते हैं तो डेंगू से ग्रस्त मरीजों को कोरोना होने की आशंका बहुत अधिक है, जिससे अभी से ही शासन-प्रशासन के हाथ-पांव फूलने शुरू हो चुके हैं। दरअसल मामला गंभीर इसलिए भी हो जाता है कि दोनों ही वायरस की वैक्सीन नहीं बनी है। अन्य बीमारियों की अपेक्षा डेंगू में वायरस बहुत प्रभावशाली होता है। डेंगू मादा एडीज इजिप्ची नाम के मच्छर के काटने से होता है। यह मच्छर जब काटता है तो मनुष्य का खून चूसता है और वायरस शरीर में छोड़ देता है और उसके बाद किसी अन्य व्यक्ति को काटता है तो फिर दूसरे को और अधिक तेजी से यह वायरस प्रभावित करता है, इसी तरह इसकी चेन बनती चली जाती है। डॉक्टरों के अनुसार डेंगू को तीन तरह से वर्गीकृत किया है जिसमें पहली स्थिति में साधारण बुखार होता है, दूसरी में हैमरेजिक बुखार व तीसरी स्थिति में जो सबसे खतरनाक मानी जाती है वह है शॉक सिंड्रोम। तेज बुखार, मांसपेशियों में दर्द, कमजोरी और हल्का गले में दर्द होने पर आप क्षेत्रीय डॉक्टरों से उपचार करा सकते हैं लेकिन जब शरीर के किसी भी अंग से खून आना और बार-बार होश खो देने पर तुरंत स्पेशलिस्ट से संपर्क करना चाहिए व अस्पताल में एडमिट होना अनिवार्य समझा जाता है। डेंगू, बरसात के मौसम में पनपना शुरू होता है और जुलाई से अक्टूबर तक सबसे ज्यादा प्रभावित करता है क्योंकि इस मौसम सभी तरह के मच्छरों के पनपने का समय होता है। डेंगू मच्छर कम ऊंचाई तक उड़ पाता और खासतौर पर सुबह के समय ही काटता है। इसे ग्रस्त होने के बाद बचने के तमाम उपाय हैं लेकिन यदि यह कोरोना काल में होता है तो हालात नाजुक हो जाएंगे। आपकी जरा-सी मेहनत आपको इस बड़े संकट में फंसने से पहले ही निकाल सकती है। वैसे तो हर बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय सफाई है लेकिन आज के दौर में थोड़ा-सा और अतिरिक्त कर लिया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। अपने घर को स्वच्छ रखना तो स्वभाविक है लेकिन साथ में अपने आसपास भी गंदगी व पानी न जमा होने दें। जहां पानी जमा रहता है जैसे कि कूलर व अन्य इस प्रकार की कोई भी जगह तो वहां आप एक ढक्कन या आवश्यकतानुसार मिट्टी का तेल जरूर डाल दें। जैसे हम बदलते दौर के फैशन में अपने कपड़ों, जूतों व अन्य इस प्रकार की चीजों के साथ अपडेट व अपग्रेड कर लेते हैं वैसे ही बढ़ती बीमारियों से लड़ने के लिए इस तर्ज पर चलने की जरूरत है। हमारे देश में हर किसी को यह लगता है कि यह घटना हमारे साथ तो हो ही नहीं सकती लेकिन जब ऐसा सोचने वाला चपेट में आता है तब पछतावे के अलावा वह कुछ नहीं कर पाता। कोरोना से आए संकट से हमें सबक व सीख लेनी चाहिए। कोरोना को आए चार महीने करीब हो चुके हैं और इससे बचने के लिए कितनी सतर्कता बरत रहे हैं। यदि हम बाकी बीमारियों से बचने के लिए इस तरह की सुरक्षा अपना लेंगे तो निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी। हमें अपने आप को बचाने के लिए तैयार रहना चाहिए और यह डेंगू से लड़ने व बचने का बिल्कुल सही समय है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 July 2020


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  डॉ. दिलीप अग्निहोत्री कांग्रेस का आंतरिक संकट जारी है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान की बारी है। वस्तुतः यह कांग्रेस हाईकमान के लिए आत्मचिंतन का अवसर है किन्तु लगता नहीं कि ऐसा हो सकेगा। कांग्रेस अब राहुल गांधी के बयानों से संचालित हो रही है। इसमें आत्मचिंतन की दूर-दूर तक कोई गुंजाइश नहीं है। अन्यथा इसके अवसर अनेक बार आये थे।   कांग्रेस के निष्कर्ष में इसके लिए भाजपा दोषी है, उसने कर्नाटक, मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकारों को अस्थिर किया, विधायकों की खरीद-फरोख्त की गई। यही प्रयोग राजस्थान में किया जा रहा है। इस प्रकार जब कांग्रेस ने अपनी सरकारें गिरने का पूरा ठीकरा भाजपा पर फोड़ दिया, तब उसके लिए आत्मचिंतन के लिए कुछ बचा ही नहीं। मतलब कांग्रेस की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा। सबकुछ पहले की तरह चलता रहेगा। पहले की तरह कांग्रेस हाईकमान की प्रदेश संगठनों से संवादहीनता बनी रहेगी, पहले की तरह राहुल गांधी बयान देते रहेंगे, पहले की ही तरह पार्टी जबरदस्ती उनके बयानों का बचाव करती रहेगी। इससे होने वाले प्रभाव को देखने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता।   कर्नाटक में कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ मंत्री के नेतृत्व में विधायकों ने बगावत की थी, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट जैसे दिग्गज नेताओं ने बगावत की कमान संभाली। क्या इसे खरीद-फरोख्त कहा जा सकता है। ज्योतिरादित्य और सचिन के लिए ऐसा सोचना भी गलत होगा। क्या यह सच नहीं कि पार्टी और प्रदेश की सरकार में इनकी उपेक्षा की जा रही थी। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य और राजस्थान में सचिन पायलट अपनी उपेक्षा से आहत थे। मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ के निशाने पर ज्योतिरादित्य थे। वह उन्हें कमजोर करने में लगे थे। जबकि सिंधिया मध्य प्रदेश में उनसे अधिक लोकप्रिय रहे हैं। मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी वही थे। जबकि कमलनाथ का प्रभाव छिंदवाड़ा के इर्द-गिर्द सीमित रहा है। कांग्रेस ने उनको मुख्यमंत्री बना दिया। इसके बाद से ही सिंधिया और कमलनाथ के बीच तनाव था। लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया। यही नजारा राजस्थान में था। यहां सचिन पायलट उपेक्षा झेल रहे थे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उन्हें अलग-थलग रखने का प्रयास कर रहे थे। ऐसे में इतने समय तक सचिन पायलट का धैर्य रखना ही महत्वपूर्ण था। मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान की समस्या के प्रति भी कांग्रेस हाईकमान लापरवाह बना रहा। इसी का परिणाम सामने आ रहा है।   कांग्रेस हाईकमान को केवल इन तात्कालिक प्रसंगों पर ही विचार नहीं करना होगा। बल्कि कुछ पहले की घटनाओं पर भी ध्यान देना होगा। प्रश्न केवल सँख्या बल का नहीं है। चुनावी राजनीति में यह स्वभाविक है। लेकिन मुख्य प्रश्न वैचारिक बल का है। भाजपा के भी कभी लोकसभा में मात्र दो सदस्य थे। प्रदेशों में भी उसकी सत्ता नहीं थी। इसके बाद भी उसने वैचारिक बल को कम नहीं होने दिया। इस धरातल पर वर्तमान कांग्रेस आज कहाँ है। क्या अभी चीन के साथ हुए तनाव में उसके विचार भारतीय जनभावना के अनुरूप थे। जब पार्टी लाइन से ऊपर उठकर उसे सरकार का समर्थन करना चाहिए था। विपक्ष की अनेक क्षेत्रीय पार्टियां ऐसा कर रही थी। लेकिन राहुल गांधी चीन को नहीं अपनी सरकार को ललकार रहे थे। क्या भारत की जमीन पर कब्जा करने वाला उनका बयान चीन का मंसूबा नहीं बढ़ा रहा था। पिछले लोकसभा चुनाव के बहुत पहले राहुल गांधी ने राफेल और चौकीदार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास किया था। वह प्रधानमंत्री के लिए किस प्रकार के नारे लगवा रहे थे। इसका क्या परिणाम हुआ, यह सबके सामने है। कांग्रेस को ऐसे मसलों पर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। कोरोना काल में भी कांग्रेस कोई वैचारिक सन्देश नहीं दे सकी। इन सबके कारण कांग्रेस में निराशा का माहौल कायम हुआ। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान प्रकरण इसी के प्रमाण हैं।   राजस्थान की कांग्रेस सरकार के साथ ही संगठन में भी विवाद चल रहा था लेकिन हाईकमान को इससे कोई मतलब नहीं था। अशोक गहलोत और सचिन पायलट में जो खींचतान चल रही थी, उसका असर प्रदेश संगठन पर भी पड़ रहा था। अशोक गहलोत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से सचिन पालयट को हटाने के लिए कटिबद्ध थे। वह अपने वफादार को इस कुर्सी पर बैठाना चाहते थे। सचिन पायलट अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। बताया जाता है कि अध्यक्ष पद पर बने रहने की शर्त पर ही वे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने को तैयार हुए थे। इसमें संदेह नहीं कि सचिन पायलट ने कांग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 July 2020


bhopal, Village one integrated family

  हृदयनारायण दीक्षित तमाम अभावों के बावजूद ग्राम निवासियों के मन में गांवों का आकर्षण है। कोरोना महामारी के प्रकोप के समय महानगरों में मजदूरी करने वाले ग्रामीण गांवों की ओर भागे। इनकी संख्या लाखों में थी। हजारों प्रवासी पैदल भी लम्बी यात्रा करते देखे गए थे। अपने गांव का नेह, स्नेह अव्याख्येय है। महामारी का प्रकोप भी गांवों में बहुत कम है। गांव वाले गंवई हैं लेकिन उन्हें गंवार भी कहते हैं। गंवार गांव वाले का पर्यायवाची है। गांवों का अपना संसार है, अपनी देशज संस्कृति। वे रिश्तों में डूबे हुए प्रायद्वीप हैं। गांव की परिभाषा करना सचमुच में बड़ा कठिन काम है। यहां प्रेम रस से लबालब उफनाते रिश्ते हैं, अपने होने का स्वाभिमान है, गरीबी और अभाव के बावजूद संतोष के छन्द हैं, सबका साझा व्यक्तित्व है, संक्षेप में कहें तो प्रीतिरस की झील में रिश्ते-नातों की मनतरंग वाली नाव ही हमारे गांव हैं। दुनिया के सभी महानगर गांव वालों की उत्पादन शक्ति और श्रमशक्ति से ही बने। प्राचीन महानगरीय हड़प्पा सभ्यता के पीछे भी सिंधु सरस्वती के विशाल भूभाग में फैले गांवों की श्रमशक्ति का ही कौशल है। गांव रोटी, दाल, दूध, सब्जी की गारंटी है। महानगरों के लोग प्रत्यक्ष कृषि उत्पादन में नहीं जुटते। औद्योगिक उत्पादन की श्रमशक्ति का मूल केन्द्र भी गांव ही है। गांव का जीवन ममता और समता में ही रमता है। यहां ईश भक्ति के साथ दर्शन का भी विविध आयामी सौन्दर्य है। यहां आस्तिक हैं। खांटी भौतिकवादी हैं, तो आध्यात्मवादी भी हैं।   गांव में सभी ऋतुओं की पुलक। मधुरस भरा बसंत। आम्र मंजरियों की सुगंध। चहुं तरफा मदन रस। जल-रस भरा सावन। चैती, कजरी। रक्षाबंधन का नेह। कजरी तीज। करवा चैथ। जगमग दीप पर्व। रावण दहन वाला दशहरा। उत्तरायण/दक्षिणायन के मिलनसंधि पर मकर संक्रांति। सहभोज। महाभोज। ब्रह्मभोज। ज्ञानदान, दीपदान, भूमिदान और कन्यादान। बिटिया की विदाई पर पूरा गांव रोता था। बारात की अगवानी और स्वागत में पूरा गांव लहालोट था। नदियां माताएं थीं, नीम का पेड़ देवी था, बरगद का पेड़ देव था। पीपल का पेड़ ब्रह्म था। कुलदेवता थे, चांद और सूरज भी देवता थे, ग्राम देवता भी थे। मुखिया गांव का मुख था। ऋग्वेद में इसे ‘ग्रामणी’ कहा गया। वे ‘‘प्रथमो हुत एति अग्रएति’’ सबसे पहले आमंत्रित होते हैं और सबके आगे चलते हैं।’’ (ऋ 10.107.5) हम सबके आदि पूर्वज मनु भी गांव निवासी थे। उनके पास हजारों गायें थीं। वे भी अपने गांव के प्रधान (ग्रामणी) थे। (ऋ 10.62.11)। हमारे गांव में भी मुखिया थे। वे पुलिस दरोगा और सरकारी अफसरों का सत्कार करते थे। बाद में प्रधान होने लगे। गांव पंचायतें सरकारी हो गयीं। चुनाव हुए तो गांव लड़ाई-झगड़े में फंस गये। अब हर जगह लट्ठम-लट्ठा है।   ग्राम गठन की इकाई ‘परिवार’ है। परिवार गठन का मूल आधार ‘विवाह’ संस्था हैं गांवों में विवाह एक पवित्र संस्कार था। विवाह ही किसी पुरूष को पिता होने का अवसर देता है और स्त्री को माँ होने का गौरव। विवाह पूरे गांव के उत्सव थे। पूरा गांव बारात की अगवानी करता था। पूरा गांव विवाहोत्सव को सफल बनाने में जुटता था। पति और पत्नी मर्यादा में थे। अजीब तरह के अव्याख्येय रिश्ते थे तब। विवाह की मजबूती का आधार अग्नि के 7 फेरे थे। ‘पाणिग्रहण’ (विवाह) भारत की दिलचस्प और वैज्ञानिक संस्था है। प्राचीन ग्राम परम्परा के तमाम भावुक सांस्कृतिक अवशेष गांवों में आज भी जस तस मौजूद हैं। कन्या विवाह के पूर्व दिन में पूरे गांव में घर-घर जाती है। वह पूरे गांव से आशीष मांगती है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में इसे ‘सोहाग’ मांगना भी कहते हैं। वह इस गांव को छोड़ रही है। अब नया घर मिलेगा। गांव नया होगा।   गांव एक एकात्म परिवार थे। गांव का अपना जीवमान व्यक्त्वि था। पूरा गांव समवेत उत्सवों में खिलता था और दुख में एक साथ दुखी था। हमारा गांव भी प्रकृति की गोद में है। यहां सूर्य का तेजस् और चन्द्रमा का मधुरस था। गांव में दिव्यता का प्रसाद। निर्दोष पक्षियों के कलरव। छत पर, गांव के पेड़ पर पक्षी है। उनकी बोली गांव वालों को प्रिय थी। गांव सांस्कृतिक रस में डूब कविता हैं। पूर्वज ऊषा के पहले ही जागते थे। जागे हुए लोग ही ऊषाकाल की अरुणिमा और मधुरिमा में भावुक हुए होंगे। उन्होंने ऊषा पर काव्य रचे, देवी जाना, देवी माना और ऊषा को नमन भी किया। सविता देव तो ऊषा के बाद ही उगते हैं। प्रकृति की कार्यवाही में संविधान नहीं टूटता। पहले ऊषा फिर सूर्योदय। गंवई गंवार इस संविधान को छाती के भीतर मर्मस्थल पर धारण करते हैं। सो ऊषा के पहले ही जागरण, ऊषा का स्वागत, सूर्य को नमन फिर सतत् कर्म। गंवई गंवार को जगाने की जरूरत नहीं पड़ती। उन्हें रात्रि में नींद की गोली खाने की भी आवश्यकता नहीं। गांव की गंध में मस्ती है, कर्म यहां धर्म है सो रात्रि देवी का आगमन सहज ही उन्हें निद्रा देवी के आंचल में समेट लेता है। निद्रा यहां माता है। ये माता सभी प्राणियों में अवस्थित हैं- या देवी सर्वभूतेषु निद्ररूपेण संस्थिता। ऐसी निद्रा माता को पौराणिक ऋषियों ने बार-बार नमस्तस्यै कहा है। गांव और प्रकृति पर्यायवाची हैं। प्रकृति रूप रस गंध आपूरित मधुमती है। वनस्पति, कीट पतिंग और पशु पक्षियों से भरीपूरी है। हमारे गांव में जंगल थे। इनमें सियार, लोमड़ी, उदबिलाव, स्याही जैसे जानवर थे। मैंने सियारों के युगल को प्रेमालाप करते, लोमड़ी और उदबिलाव को आंख मटकाते बहुत नजदीक से देखा है। मैं सैकड़ों किस्म के पक्षी देखकर सृष्टि विविधता पर आश्चर्यचकित भी हुआ। उनके रंगबिरंगे रूप सौन्दर्य और विविध जीवन शैली वाले पहलुओं पर लहालोट भी हुआ हूँ।   अतिथि देवतुल्य हैं। गांव में अतिथि सत्कार की प्राचीन परम्परा है। गंवई गंवार अतिथि के सत्कार में अपना सर्वोत्तम प्रकट करते हैं। घर का सबसे अच्छा बिस्तर, घर का सबसे सुन्दर कमरा और सर्वोत्तम भोजन। गांव के अपने विश्वास। मैं आज भी व्यग्र हॅूं कि बिल्ली का रास्ता काटना या कौए का घर की मुड़ेर पर आना क्या अप्रिय या प्रिय घटित होने की पूर्व सूचना है? मैं नहीं जान पाया कि सच क्या है? गांव में गरीबी और अभाव का संसार है। तन पर कपड़ा नहीं, रोटी का जुगाड़ नहीं, तो भी गांव मस्त थे। होली में पूरा गांव नाचता था। अवनि अम्बर भी गंवई महारास में शामिल थे। मैं भी गाता था। बाढ़ और अषाढ़ सावन साथ-साथ आते थे। अषाढ़ पहले आता था। सावन के आने की खबर देता था। सावन का कहना ही क्या? आसमान पर बादलों की लुकाछिपी, रह-रहकर वर्षा, धूप छांव का खेल, प्रकृति की अल्हड़ मस्त जवानी।   गांव की अपनी सुरभि है, अपनी गंध है। गांवों से बाहर जाती और सांझ समय खेतों से लौटती गायें जो धूलि उड़ाती है, उसकी गंध देवों को भी प्रिय है। महानगरों में टेम्पो-वाहनों की दुर्गंध है। गांव में गेंदा है, चमेली है, रातरानी है, गुलाब है, गेहूं फसल की पुष्प गंध है, आम्र मंजरियों की रसगंध है, महुआ रस की मदहोश गंध है, चाची-नानी-भौजाई के रिश्तों की प्रीति गंध है, बड़ों के प्रणाम की रीति गंध है। नवरात्रि, सत्यनारायण कथा और विवाह मुण्डन पर आयोजित हवन की देव गंध है। भजन कीर्तन नौटंकी की गंधर्व गंध है। हाड़तोड़ श्रम तप के पसीने की मानुषगंध है। प्रकृति नर्तन की नृत्यगंध है। लोकगीतों की छन्द गंध है। गांव गंध सुगंध का हहराता दिव्य लोक है। गांव स्वाभाविक ही सबका आकर्षण हैं।     (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Corona beach guru share house-to-house knowledge

  ऋतुपर्ण दवे जब समूची दुनिया कोरोना संक्रमण काल को झेल रही हो, उस दौर में नौनिहालों की शिक्षा की चिन्ता स्वाभाविक है लेकिन जहाँ एक वायरस के दुष्परिणाम से उबरना तो दूर, ठीक-ठीक दवा तक न मालूम हो वहीं ऑनलाइन की नई बला को बुलाना कितना सही है? सच तो यह है कि इस बारे में अभी तो जाहिर तौर पर किसी को ज्यादा नहीं पता है लेकिन जैसा नजर आने लगा है, आधी-अधूरी तैयारी के बीच सवालों से घिरी ऑनलाइन शिक्षा कहीं अभिमन्यु के चक्र भेदन-सी न बन जाए?   ऑनलाइन शिक्षा पर हर कहीं जबरदस्त असमंजस के बीच अपने-अपने तर्कों और सुझावों का राग अलापा जा रहा है। जहाँ निजी स्कूलों की चिन्ता महज उनकी फीस उगाही की है, वहीं सरकारी स्कूलों में अफसरों की आँखों में मुफ्त में बैठे पगार लेते खटकते टीचर हैं। साफ है कोरोना के जबरदस्त संक्रमण काल में भी देश में बच्चों के साल बरबाद होने की जो चिन्ता इस वक्त दिख रही है, काश वैसी चिन्ता सामान्य काल में पढ़ाई के स्तर और सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को लेकर की गई होती तो बात समझ आती। लेकिन जब सरकारी हुक्मरान एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर बेतुके और अप्रासंगिक फरमान जारी करें तो लगता है कि ऐसी रस्म अदायगी में आगे नूराकुश्ती कोरोना और शिक्षा के बीच होनी है। सच तो यह है कि देशभर में मार्च के दूसरे हफ्ते में एकाएक स्कूल, कॉलेज बन्द कर दिए गए। कई जगह परीक्षाएं आधी-अधूरी रह गईं। नतीजतन बिना वक्त गंवाए ऑनलाइन शिक्षा को बेहतर विकल्प मान आनन-फानन में आदेशों का सिलसिला शुरू हो गया।   देखते ही देखते चंद दिनों में पूरा देश ऑनलाइन शिक्षा से रंगा दिखने लगा। वहीं चंद दिनों में इसको लेकर तमाम विसंगतियाँ और दूसरे नुकसान भी सामने आने लगे। हफ्ते भर में समझ में आ गया कि बिन गुरु ज्ञान महज परिकल्पना नहीं वास्तविकता है (यह अलग विस्तृत चर्चा का विषय है)। वो दुष्परिणाम और शिकायतें भी तुरंत सामने आने लगीं, जिनमें उन हाथों में मोबाइल आसानी से पहुँचने का गुस्सा था जिसको लेकर कलतक बच्चों को कितनी उलाहना, समझाइश देने के साथ नजर रखी जाती थी। कहने की जरूरत नहीं ऑनलाइन शिक्षा बिना मोबाइल संभव नहीं और गूगल के पिटारे में कुछ भी असंभव नहीं। कहीं बच्चों को पढ़ाई कम गेम ज्याद खेलते देखा गया तो कहीं प्रतिबंधित वेबसाइट्स तक बच्चों की पहुंच का दर्द भी अभिभावकों में देखा गया।   शुरू में कुछ राज्यों में प्री-प्राइमरी और प्राइमरी के बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई प्रतिबंधित कर दी गई लेकिन जल्द ही इसकी तोड़ भी निकाल ली गई। इस मामले में मप्र सबसे आगे निकला, जहाँ राज्य शासन के 31 जुलाई 2020 तक स्कूलों को शुरू नहीं करने के पुराने आदेश के बावजदू 6 जुलाई से राज्य शिक्षा केंद्र ने“हमारा घर, हमारा विद्यालय” अभियान शुरू कर दिया। तर्क दिया गया कि विद्यार्थियों का नुकसान न हो। इतना ही नहीं यह हुक्म जारी हुआ कि जिन विद्यार्थियों के पास स्मार्टफोन नहीं है उन्हें शिक्षक घर जाकर दिखाएंगे और उनके बड़े भाई-बहन तथा बड़े-बूढ़ों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। इतना ही नहीं हर रोज 5 परिवारों से शिक्षकों का संपर्क होगा। रोज घरों में थाली बजाकर कक्षाएं शुरू करानी है। आदेश मिलते ही किंकर्तव्यविमूढ़ शिक्षकों ने गली-मोहल्ले में पहुँच जगह तलाशनी शुरू कर दी। किसी को जगह मिली तो कहीं जगह न मिलने से पेड़ों के नीचे ही थाली बजाकर कक्षाएं शुरू कर दीं। पूरे मप्र से ऐसे नजारे आने शुरू हो गए।   इस फरमान की जमकर आलोचना हुई तो उपहास भी कम नहीं हुआ लेकिन ऑनलाइन-ऑफलाइन को मिलाकर बीच का यह फण्डा मप्र में जारी है। ऐसे सिस्टम को न तो पूरी तरह से कक्षा ही कह सकते हैं और न ही डिजिटल क्लास। रोज तस्वीरें खींचनी हैं, जनशिक्षा केन्द्र के वाट्सएप ग्रुप में पोस्ट करनी है। जाहिर है बच्चों को पढ़ाते हुए शिक्षक को रोजाना ताजा तस्वीर भेजनी है यानी हर दिन कपड़े बदले हुए होंगे तभी साबित होगा कि तस्वीर नई है। यह तो हुई प्राइमरी से लेकर मिडिल स्कूल के बच्चों की “हमारा घर हमारा विद्यालय” की कहानी। वहीं हाईस्कूल और हायर सेकेण्डरी स्कूल के विद्यार्थियों को वाट्सऐप पर लिंक भेजी जाती है जिसे देखकर उसे पढ़ना है। इस पूरी अधकचरी व्यवस्था का फीडबैक भी लिया जाता है लेकिन एक बात यह भी चर्चाओं में है कि चाहे प्राइमरी से मिडिल हो या हाई और हायर सेकेण्डरी, जो लिंक भेजी जाती है वह कहाँ से ली जाती है, उसका स्रोत क्या है और लिंक को रिकमण्ड किसने किया? जाहिर है सवाल उठने हैं क्योंकि यू-ट्यूब चैनल को ज्यादा देखने पर उसके ओनर को पैसे मिलते हैं। इसके अलावा रेडियो और दूरदर्शन पर सरकारी चैनलों से दृश्य और श्रव्य माध्यम से भी शिक्षा पहले से दी जा रही है।   सवाल वही जो सबको पता है, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 90 प्रतिशत बच्चे गरीब परिवारों से होते हैं। ऐसे में कितने घरों में रेडियो की गूंज या टीवी की आवाज सुनाई देती है? जाहिर है पूरे दिन मेहनत-मजदूरी कर परिवार पालने वाले घरों में बमुश्किल अकेले मुखिया के पास ही मोबाइल होता है वह भी साधारण जिसे लेकर काम पर जाता है। इत्तेफाक से कोई एण्ड्रायड रखता भी तो उसके पास डेटा का इतना पैसा नहीं कि बच्चे को घण्टों यू-ट्यूब दिखा सके। इस तरह भारत में अभी ऑनलाइन कहें या स्मार्ट शिक्षा फिलहाल दूर का सपना है। फिर भी यदि सरकारें इसे महज खानापूर्ति का जरिया बना आंकड़ों के रिकॉर्ड दुरुस्त करना चाहे तब तो ठीक है लेकिन हकीकत में ऐसी शिक्षा से लाभ होता कुछ दिख नहीं रहा है।   इधर संक्रमण के ताजा आँकड़ों की अनदेखी भी भारी भूल होगी। पूरे देश में जहाँ संक्रमण के 19 मई तक केवल 1 लाख मामले थे उसने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि महज तीन दिनों में एक लाख तक पहुँचने लगे। जहाँ अकेले 7 जुलाई से 10 जुलाई के बीच 3 दिनों 1 लाख संक्रमित बढ़े और अब करीब साढ़े 9 लाख हो गए, वहीं 12 जुलाई तड़के एक दिन में 28637 संक्रमण का रिकॉर्ड भी बना। अब शहर छोड़िए छोटे-छोटे गाँवों में थोक में कोरोना पॉजिटिव मिलना शुरू हो गए। ऐसे में गाँव के सरकारी स्कूल का वही शिक्षक हर रोज 5 नए घरों में जाकर संपर्क करेगा और बच्चों को इकट्ठा कर पढ़ाएगा तो कोरोना संक्रमण का खतरा होगा या नहीं? इस बात की क्या गारण्टी है कि हर रोज बिना एहतियात बरते यानी बगैर पीपीई किट, हाथों में ग्लब्स और सेनेटाइजर की शीशी लिए केवल मास्क बाँधे शिक्षक गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले 5 घरों में रोज घूमें और ईश्वर न करें कि एसिम्पटोमेटिक संक्रमित हो जाएं! दुर्भाग्य से यदि ऐसा हुआ तो उन सरकारी फरमानों का क्या होगा जिसमें साफ लिखा है कि 10 साल से छोटे बच्चे और 65 साल से ऊपर के बुजुर्ग घरों से न निकलें। यहाँ तो शिक्षक इन्हीं छोटे-छोटे बच्चों के साथ गली-मुहल्ले घूम मोहल्ला स्कूल लगाए!   कुल मिलाकर कोरोना के इस पीक में ज्यादा सतर्कता की जरूरत है और केन्द्र व तमाम राज्यों की सरकारें भी बेहद चिन्तित हैं। ऐसे में कोई भी सरकार इस तरह का जोखिम नहीं लेना चाहेगी तो अफसरशाही का यह कैसा फैसला? वह भी तब जब कहीं धीरे-धीरे फिर लॉकडाउन की ओर बढ़ा जा रहा है तो कहीं लॉकडाउन बढ़ा दिया गया। ऐसे में मोहल्ले के किसी घर या पेड़ के नीचे कक्षाएं लगाने का हुक्म मुल्तवी कर देना ही बेहतर होगा वरना बदकिस्मती से घरों में दुबके, सहमे गरीबों और कमजोर तबके के बच्चे संक्रमण का शिकार होना शुरू हुए तो दिनभर काम पर रहने वाले माँ-बाप के बिना कौन देखरेख करेगा और बिना काम पर गए कौन उनके घर का चूल्हा जलाएगा?     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 July 2020


bhopal,Angels of service in the coronary

  वैजयंती कुलकर्णी आप्टे कोरोना महामारी के संकटकाल में शासन-प्रशासन के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न संगठन भी अपने-अपने स्तर पर समाज सेवा में सहभागिता निभा रहे हैं। इसके तहत जरूरतमंदों की सहायता तो की ही जा रही है, वैश्विक महामारी को मात देने के लिए लोगों के बीच जनजागरण भी जोर-शोर से किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न संगठनों में सेवा भारती, ग्राम भारती, एकल विद्यालय और वनवासी कल्याण आश्रम की प्रमुख भूमिका है।   जब सारा देश अपने घरों में कैद होने को मजबूर है। वायरस जानलेवा के प्रकोप से जहां शहर के शहर लॉकडाउन हो गए हैं। आवागमन बंद हुआ पड़ा है। ऐसी स्थिति में भी संघ से प्रेरित स्वयंसेवक अपनी जान की परवाह किए बिना देश के अलग-अलग हिस्सों में जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने में जुटे हुए हैं। कोरोना के इस महासंकट से निजात पाने में दुनिया की बड़ी-बड़ी शक्तियां धराशायी हो गईं हैं, ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके स्वयंसेवक अपनी सुनियोजित तैयारी, संकल्प एवं सेवा-प्रकल्पों के जरिये कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जरूरतमंदों की सहायता के लिये मैदान में हैं। ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के मंत्र पर चलते हुए हर स्तर पर राहत पहुंचाने में जुटे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में वे गरीब और जरूरतमंदों को भोजन खिला रहे हैं, बस्तियों में जाकर, मास्क, सेनेटाइजर, दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामग्री बांटकर लोगों को राहत पहुंचा रहे हैं, जागरूक कर रहे हैं। वे इस आपदा-विपदा में किसी देवदूत की भांति सेवा कार्यों में लगे हुए हैं।   हम महाराष्ट्र की बात करें तो राज्य सरकार के टास्क फोर्स, स्वास्थ्य सेवाएं, मुंबई नगर निगम के अस्पताल और इनमें दिन-रात मेहनत करने वाले स्वास्थ्यकर्मी, इनका कोरोना काल में बहुत बड़ा योगदान है। इसी के चलते इन्हें कोरोना योद्धा कहा गया है। साथ ही कई स्वयंसेवी संस्थाएं और समाजसेवी व्यक्तित्व भी सेवाकार्यों में अपना योगदान दे रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और उनके माध्यम से किए गए कार्यों की सराहना किए बिना यह चर्चा अधूरी लगती है। देश में जब कभी भी कोई प्राकृतिक विपदा आई या कोई बड़ी दुर्घटना हो गई, तब स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के सेवा में आगे रहे हैं।   प्राकृतिक आपदा, देश के समक्ष चुनौती की परिस्थितियों में संघ के स्वयंसेवक हमेशा नर सेवा को नारायण सेवा मानकर योगदान देते हैं। पिछले साल महाराष्ट्र के सांगली और कोल्हापुर में आई बाढ़ हो या फिर जून, 2020 में कोंकण के इलाके में आया चक्रवात, इन सभी आपदाओ में संघ के स्वयंसेवक हमेशा लोगों की सहायता में सबसे आगे रहे। यदि कोरोना महामारी की बात करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जन कल्याण समिति और अन्य सेवा प्रकल्पों के माध्यम से स्वयंसेवकों की विशाल संख्या जनसेवा के लिए सक्रिय दिखाई दी। आज भी जहां कहीं भी संकट के काले बादल मंडराए, वहां स्वयंसेवक मदद के लिए आगे आए। मुंबई में कोरोना महामारी ने भयानक रूप धारण किया हुआ है। ऐसी मुश्किल घड़ी में भी सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी में संघ के स्वयंसेवक सहायता के लिए खड़े दिखाई दिये। इतना ही नहीं राज्य के नागपुर, नासिक, पुणे, कोल्हापुर, सांगली जैसे महानगरों की गलियों से आप गुजरें तो आपको संघ का कोई न कोई स्वयंसेवक समाजसेवा करता दिख जाएगा।   संघ भारत की सेवा-संस्कृति एवं संस्कारों को जीवंत करने का एक गैर राजनीतिक आन्दोलन है। सेवा-भावना, उदारता, मानवीयता एवं एकात्मकता संघ की जीवनशैली एवं जीवनमूल्य हैं। संघ के समविचारी संगठन सेवा भारती और सेवा विभाग की कार्य योजना दिनों-दिन गंभीर होती स्थिति के बीच राहत की उम्मीद बनी है। इस कार्ययोजना में कोरोना वायरस से निपटने के लिए जनता की मदद की जा रही है। इनमें स्वेच्छा से लॉकडाउन का पालन करवाना, जिला और स्थानीय प्रशासन की मदद करना तथा अपने मोहल्ले और बस्ती में जिस भी प्रकार की मदद की आवश्यकता हो, वह पूरी तत्परता से करना शामिल है। इस साल 22 मार्च से पहले तक संघ की देश भर में 67 हजार से अधिक शाखाएं प्रतिदिन लगती थीं। एक शाखा के प्रभाव में 20 से 25 हजार की आबादी आती है। प्रत्येक शाखा के प्रभाव में कम से कम 100 से 150 तक प्रशिक्षित स्वयंसेवक होते हैं। इन स्वयंसेवकों को संकट के समय मदद करने का भी प्रशिक्षण होता है। संघ के अलावा अन्य 36 समविचारी संगठन भी अपने-अपने स्तर पर तय योजना के अनुसार सेवा कार्यों में लगे हैं। कई बस्तियों में 15 दिन के लिए कार्यकर्ताओं ने ही गोद ले लिया है। पूर्ण लॉकडाउन के दौरान जो विद्यार्थी हॉस्टल अथवा गेस्ट हाउस में फंसे थे, उनकी व्यवस्था भी स्वयंसेवकों ने विशेष तौर पर की। किसी परिवार में दवाई की आवश्यकता हो या अस्वस्थता हो तो भी उस समय पूर्ण रूप से उनको हर चिकित्सीय सुविधा प्रदान कराई गई।   इस महासंकट में हैरान, परेशान लोगों की समस्याओं को दूर करने में सहायक बनकर उनेक घावों पर मरहम लगाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने जैसा किया, वैसा उदाहरण विश्व में दूसरा नहीं मिलेगा। अपनी इन्हीं खूबियों के कारण ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बना हुआ है और उसका प्रभाव निरंतर बढ़ता ही जा रहा है।     (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Ban on Indian channels in Nepal

  डॉ. वेदप्रताप वैदिक नेपाल ने भारत के टीवी चैनलों पर प्रतिबंध लगा दिया है। सिर्फ दूरदर्शन चलता रहेगा। यह प्रतिबंध इसलिए लगाया है कि नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद ओली और चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी के बारे में हमारे किसी टीवी चैनल ने कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी और किसी अखबार ने ओली पर एक मजाकिया कार्टून भी छाप दिया था। ओली सरकार की यह आक्रामक प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, क्योंकि उसके प्राण इस समय संकट में फंसे हुए हैं लेकिन नेपाल की इस कार्रवाई का संदेश हमारे चैनलों के लिए स्पष्ट है। पहली बात तो यह कि नेपाल ने दूरदर्शन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया? उसे चालू क्यों रखा? क्योंकि उसपर गैर-जिम्मेदाराना खबरें और बहसें प्रायः नहीं होतीं। अगर वैसा कभी हो जाए, जैसा कि चीनी राष्ट्रपति के नाम के गलत उच्चारण में हो गया था तो उसपर तुरंत कार्रवाई की जाती है लेकिन यह भी तथ्य है कि दूरदर्शन के मुकाबले गैर-सरकारी चैनलों की दर्शक-संख्या ज्यादा होती है। क्यों होती है? क्योंकि वे अपने करोड़ों दर्शकों को लुभाने के लिए चटपटे, उत्तेजक और फूहड़ दृश्य और कथन भी जमकर दिखाते हैं। उन पर चलनेवाली बहसों में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता एक-दूसरे पर हमले करते हैं। वे अक्सर शिष्टता और शालीनता की मर्यादा भंग करते हैं। चैनलों के एंकर उन वार्ताकारों से भी ज्यादा चीखते-चिल्लाते हैं। जिस विषय पर बहस होती है, उसके विशेषज्ञ और विद्वान तो कभी-कभी ही दिखाई पड़ते हैं। टीवी के बक्से को अमेरिका में पचास साल पहले 'इडियट बाक्स' याने 'मूरख-बक्सा' कहा जाता था, वह आजकल प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। उन दिनों कोलंबिया युनिवर्सिटी के प्रोफेसर इसे 'मूरख-बक्सा' क्यों कहते थे, यह बात आजकल मुझे अच्छी तरह समझ में आती है। इसमें शक नहीं कि हमारे कुछ चैनलों और कुछ एंकरों का आचरण सभी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है लेकिन ज्यादातर चैनलों का आचरण, हमारे पड़ोसी देशों के चैनलों का भी, मर्यादित होना चाहिए। यह काम सरकारें करें उससे बेहतर होगा कि मालिक लोग करें। नेपाल सरकार इस वक्त अधर में लटकी हुई है। वह कुछ नेपाली चैनलों पर भी रोक लगानेवाली है। इसीलिए उसने भारतीय चैनलों के विरुद्ध इतना सख्त कदम उठा लिया है लेकिन ओली-विरोधी नेपाली नेता भी भारतीय चैनलों पर रोक का समर्थन कर रहे हैं। यह असंभव नहीं कि कुछ चैनलों पर नेपाल मानहानि का मुकदमा भी चला दे। बेहतर तो यही है कि इस वक्त ओली अपनी सरकार बचाने पर ध्यान दें। चैनलों पर बोले जानेवाले वाक्यों और चलनेवाली नौटंकियों पर दर्शक भी कितना ध्यान देते हैं। इधर बोला और उधर हवा में उड़ा। (लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद् के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 11 July 2020


bhopal,Positivity is necessary to fight Corona

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा जयपुर के आरयूएसएम की दूसरी मंजिल से कूदकर संदिग्ध कोरोना मरीज 78 वर्षीय बुजुर्ग कैलाश चंद्र की आत्महत्या का मामला हो या पिछले दिनों ही दिल्ली में पत्रकार तरुण सिसौदिया के कोरोना केन्द्र की छत से कूदकर जीवन लीला समाप्त करने का प्रकरण। दोनों में समानता है और यह कोई जयपुर और दिल्ली का ही उदाहरण नहीं है अपितु इस तरह के उदाहरण खासतौर से कोरोना के कारण आत्महत्या के प्रयास या गहरे डिप्रेशन के समाचार समूची दुनिया से आ रहे हैं। कोरोना महामारी का डर और कोरोना के कारण दुनियाभर में समय-समय पर लगाए गए लाॅकडाउन का साइड इफेक्ट यह सामने आ रहा है कि दुनिया के देशों में डिप्रेशन के मामलों में तेजी आई है। आदमी अपने आप में खोने लगा है। देखा जाए तो कोरोना महामारी ने केवल बीमारी ही नहीं अपितु इसने जीवन के लगभग सभी मोर्चों पर हिलाकर रख दिया है। पहली बात तो किसी से भी मिलने से डर तो दूसरी बात अधिकांश समय घर में बंद या फिर थोड़ा बुखार खांसी या इस तरह की स्थिति होते ही कोरोना का भय सताने लगता है। दूसरी ओर कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर हाॅस्पिटल की या यों कहें कि इलाज की जो तस्वीर सामने आ रही है और जिस तरह से घर-परिवार, मिलने जुलने वालों से आइसोलेट हो जाता है तो इससे थोड़े भी संवेदनशील मानसिकता के लोग डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। इसका दुष्परिणाम यह भी आता है कि ऐसे मरीजों के रिकवर होने में अधिक समय लगने लगता है।   कोरोना महामारी के कारण डिप्रेशन की स्थिति को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट भी दहला देने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार यही हालत रहे तो देश के 20 फीसदी लोग कोरोना के कारण डिप्रेशन का शिकार हो जाएंगे। यह अपने आप में गंभीर और चिंतनीय है। चेन्नई के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक डाॅ. आर.पूर्णा चन्द्रा के अनुसार अप्रैल माह में ही हालात यह रहे कि कोरोना के कारण डिप्रेशन से प्रभावित 3632 लोगों ने फोन से सलाह प्राप्त की। यह तो केवल बानगी मात्र है। दरअसल लोग कोरोना से इस कदर भयक्रांत हो गए हैं कि वे सोच-सोच कर ही डिप्रेशन में जाने लगे हैं। देखा जाए तो कोरोना से लड़ने के लिए जिस तरह का सकारात्मक माहौल बनना चाहिए वह दुनिया के देशों में कहीं नहीं बन रहा है। एक सकारात्मक संदेश की दरकार बनी हुई है। इसका कारण भी यह है कि सुबह उठते ही सबसे पहले कोरोना प्रभावितों के आंकड़े सामने आते हैं फिर उनमें से मरने वालों के आंकड़े होतेे हैं और फिर रिकवरी वालों के आंकड़े होते हैं। पर संवेदनशील व्यक्ति पर सबसे ज्यादा असर जो डालता है वह प्रतिदिन आने वाले संक्रमितों के आंकड़े हैं तो कोरोना के कारण बिगड़ती स्थितियों के समाचार या आलेख। कमोबेश यही हाल टीवी चैनलों का है और रात को सोते समय भी व्यक्ति यही देखकर सोता है। इसके साथ ही जिस तरह से कोरोना प्रभावितों को अस्पताल ले जाया जाता है, वह दृश्य और उसके बाद कंटेनमेंट जोन वाली स्थिति से रूबरू होना पड़ता है। हालांकि यह जरूरी है और लोगों में जागरुकता भी होनी चाहिए पर संक्रमण का भय, अब क्या होगा का भय, नौकरी जाने का या इनकम कम होने के भय के कारण कमजोर मानसिकता वाले लोग जल्दी डिप्रेशन का शिकार होने लगे हैं। इसलिए कहीं ना कहीं मनोविश्लेषकों को इसका हल खोजना होगा ताकि लोगों में सकारात्मकता बढ़े, लोग अच्छे को समझें और विल पाॅवर सशक्त हो सके।   कोरोना का जो दूसरा साइड इफेक्ट खासतौर से आर्थिक क्षेत्र में सामने आया है वह भी अपने आप में गंभीर और अधिक चुनौतीपूर्ण है। हालांकि अब लाॅकडाउन के स्थान पर ओपनिंग 2 का दौर आ गया है, उद्योग-धंघें और बाजार खुलने लगे हैं, काम-धंधा शुरू होने लगा है पर कोरोना ने बीमारी, बीमारी से बचाव के उपायों के साथ ही अब सबसे अधिक भय का माहौल रोजी-रोटी को लेकर बना दिया है। लाॅकडाउन के कारण पहले नौकरी पर जा नहीं सके। अब उद्यमों या कारोबारियों की भी अपनी समस्या है। हेल्थ प्रोटोकाल व सोशल डिस्टेसिंग जैसे कारणों के साथ ही आय प्रभावित होने के कारण नौकरी पर संकट आने लगा है। लोगों की नौकरी छिन रही है तो दूसरी ओर कोरोना के नाम पर कारोबारियों ने तनख्वाह कम करने लगे हैं। लोगों को जीवन चलाने का भय सताने लगा है। इसके साथ ही जिस तरह से माइग्रेशन हुआ है उससे रोजगार की स्थितियों में भी बदलाव आया है। कहीं रोजगार छिन गए हैं तो कहीं नए सिरे से रोजगार की तलाश में जुटना पड़ रहा है।   कोरोना के इन साइड इफेक्ट के कारण लोगों की नींद उड़ने लगी है तो व्यक्ति एकाकी होने लगा है। घर का वातावरण भी बोझिल होता जा रहा है तो बाहर निकलते ही डर लगने लगा है। इससे डिप्रेशन के सामान्य लक्षण बैचेनी, नींद नहीं आना, नकारात्मक विचार आदि तो अब आम होता जा रहा है। ऐसे में मनोविज्ञानियों और मनोविश्लेषकों के सामने मेडिकल चिकित्सकों से भी अधिक चुनौती उभरकर आई है। जब यह तय है कि अभी लंबे समय तक हमें कोरोना के साथ ही जीना है तो हमें अपनी सोच में सकारात्मकता लानी होगी। लोगों में भय के स्थान पर जीवटता पैदा करनी होगी तभी कोरोना के इस संक्रमण काल से हम निकल पाएंगे। सरकार, गैरसरकारी संगठनों, मीडिया को इस तरह के जागरुकता के कैप्सूल तैयार करने होंगे जो लोगों में आत्मविश्वास पैदा कर सके। लोगों में पॉजिटिव सोच विकसित हो सके और परिस्थितियों से लड़ने की ताकत पा सकें।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 11 July 2020


bhopal, A vibrant India is needed for self-reliance!

  गिरीश्वर मिश्र इसमें कोई संदेह नहीं कि बदलते वैश्विक समीकरण में भारतवर्ष के लिए आत्मनिर्भर होना सबसे अच्छा विकल्प है। इस प्रकार का शुभ संकल्प देश के गौरव और क्षमता की वृद्धि के लिए सर्वथा स्वागत-योग्य है। इस आत्मनिर्भरता की पुकार है कि भारत में जागरण का प्रवाह हो और एक सुसंगठित सामाजिक संरचना के रूप में भारत एक जीवंत इकाई बने। देश एक प्राणवान सत्ता है-एक जीवित प्राणी! इस रूप में देश का एक व्यक्तित्व है। कोई भी देश वहां के निवासियों के समुच्चय से बनता है पर सिर्फ लोगों के इकट्ठा होने मात्र से देश नहीं बन जाता। समग्र की जीवंतता मनुष्यों के योग मात्र से अधिक है, वैसे ही जैसे चैतन्य के बिना शरीर मात्र शव रहता है, निर्जीव और अस्वास्थकर और उसमें चैतन्य के निवेश से शिवत्व की प्रतिष्ठा होती है और यह शरीर सक्रिय होकर उत्कर्ष की ओर उन्मुख होता है। यह एक रोचक और प्रेरक तथ्य है कि जीवंतता का एक प्रखर रूप वैदिक काल में मिलता है जो भारत के ज्ञात इतिहास का उषाकाल कहा जाता है। शतपथ ब्राह्मण की मानें तो जातिगत रूप से भारतवासी भरत नाम वाली अग्नि के उपासक समुदाय के वारिस हैं (भरतो अग्नि इत्याहु: ) अर्थात तेज उनका आंतरिक गुण है। यह संभरण करने वाली आग है। यजुर्वेद यह संकल्प लेता है-वयं राष्ट्रे जागृयाम: अर्थात हम सब अग्रसर होकर राष्ट्र को जागृत करें। अथर्व वेद की घोषणा है कि उत्तम प्रजा जनों से राष्ट्र उत्तम रहता है (उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावत )। रोचक तथ्य यह भी है कि वैदिक युग में भी सामाजिक विविधता थी, अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले थे (जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम ) परंतु सभी मिलकर मातृभूमि को शक्ति देते हैं और उसकी समृद्धि करते हैं। उनके मन में यह भावना है कि यह धरती मां है और हम सब उसकी संतान हैं- माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या: । अथर्व वेद में 'समानो मंत्र: समिति: समानी समानं ब्रतं सह चित्तमेषां ' आदि मंत्रों का स्पष्ट अभिप्राय राष्ट्र की सजीव एकता को रेखांकित करता है। विचार, संकल्प, चित्त सबमें समान होने का आह्वान है। समान मन के साथ ऐक्य भाव से आनंदपूर्वक रह सकना संभव है- समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति। तात्पर्य यह कि जीवंत राष्ट्र की अपेक्षा है ऐक्य और पारस्परिक सम्मान के भाव के साथ देश के प्रति उन्मुख होकर सक्रिय और स्वस्थ जीवन। सजीव देश की परिकल्पना लोकमंगल के आख्याता गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य के रूप में की थी, जिसमें सभी जन धर्मानुकूल आचरण करते हैं और बिना राग-द्वेष के सुखपूर्वक रहते हैं (राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि , राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदरथ चारि )। इस तरह के रामराज्य में किसी भी तरह का ताप या कष्ट किसी को नहीं है और सबके बीच परस्पर प्रेम है और सभी स्वधर्म के अनुसार आचरण करते हैं- दैहिक दैविक भौतिक तापा राम राज्य काहू नहिं व्यापा , सब नर करहिं परस्पर प्रीति चलहिं स्वधर्म निरति श्रुति नीति।' आधुनिक भारत में बंकिम बाबू ने 1876 में 'बंदे मातरम्' गीत में सुजलाम्, सुफलाम् , मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम् द्वारा देश की जीवंत संकल्पना प्रस्तुत की थी। इसी प्रकार 1909 में महात्मा गांधी ने 'हिंद स्वराज' में अंग्रेजी दासता से मुक्त स्वतंत्र भारत का एक स्वप्न खींचा था और उसके लिए अपने को अर्पित कर दिया था। वे अपने ऊपर राज्य करने की , स्वायत्त जीवन की बात कर रहे थे। यह अलग बात है कि स्वतंत्र होने पर शासन का अर्थ हमने प्राय: वही लगाया जो अंग्रेजों के व्यवहार में था और बापू ने जन भागीदारी, स्वावलम्बन, विकेंद्रीकृत शासन और शिक्षा, स्वास्थ्य , न्याय आदि के क्षेत्र में जिस तरह के बदलावों के बारे में सोचा था वह व्यवहार में नहीं आ सका। हमारी अपनी सोच की भारतीय परिपाटी नहीं बन सकी। गरीबी-अमीरी की खाई बढ़ती गई और विकसित देशों को छू लेने की मृगमरीचिका और बदलती वैश्विक परिस्ठिति ने हमें कई घाव दिए। आज जब हम आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं तो उसके लिए जरूरी होगा कि देश को जीवंत बनाया जाय। आज की परिस्थिति में सोचते हुए देश की जीवंतता एक बहुस्तरीय और बहुआयामी संकल्पना प्रतीत होती है। हम यहां इसके आर्थिक, भौतिक, बौद्धिक , सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों पर विचार करेंगे। इन सभी पक्षों के बीच पारस्परिक अंत:सम्बंध हैं और जिन्हें व्यक्ति, समुदाय और देश के स्तर पर पहचाना जा सकता है। स्मरणीय है कि जीवंतता एक सकारात्मक अवधारणा है। ठीक वैसे ही जैसे रोग का अभाव ही स्वास्थ्य नहीं है। स्वस्थ व्यक्ति सक्रिय रहता है और उत्पादक कार्यों में संलग्न होता है। उसी तरह जीवंतता सकारात्मक पक्षों की उपस्थिति को द्योतित करती है। जीवंत होने की स्थिति में जन आकांक्षाओं और समस्याओं का समाधान शीघ्रता से होगा और चुनौतियों का सामना गुणवत्तापूर्ण ढंग से किया जायगा। उसमें अपेक्षित लचीलापन और प्रतिरोध की क्षमता भी होगी। वह निष्क्रिय या स्पंदनहीन नहीं होगा। यदि आर्थिक दृष्टि से देखें तो जीवन स्तर , औद्योगिक उत्पादन, व्यापार में लाभ , निर्यात , सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) तथा रोजगार की उपलब्धता आदि इसके ज्ञापक हो सकते हैं। स्पष्ट ही राजनैतिक नेतृत्व की बड़ी भूमिका है। वर्तमान नेतृत्व ने जीएसटी लागू कर, गरीब जनों को सीधे उनके खाते में सहायता राशि पहुंचाने की व्यवस्था कर और उनके लिए सस्ते भवन के निर्माण कर महत्वपूर्ण पहल की हैं परंतु सामाजिक सुरक्षा का कवच कई मोर्चों पर कमजोर भी हुआ है। जब हम भौतिक पक्ष पर विचार करते हैं तो अनेक ऐसे पक्ष सामने आते हैं जिनपर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सुविधाओं और उपायों को देखें या फिर स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों के लिए आवश्यक व्यवस्था को देखें तो अनेक कठिनाइयां दिखती हैं। सामान्य जनों के दैनिक जीवन में जरूरी नागरिक सुविधाओं को सुगमता से उपलब्ध कराना अभी भी टेढ़ी खीर है। बौद्धिक या मानसिक दृष्टि से देखें तो शिक्षा संस्थाओं की संख्या में तो वृद्धि हुई पर गुणवत्ता के साथ हम समझौता करते गए। शिक्षा की विषय वस्तु और पद्धति को लेकर अभीतक यह स्पष्टता नहीं आ सकी है कि हम अपने देश के लिए किस तरह का समाज चाहते हैं और किन मूल्यों को स्थापित करना चाहते हैं। उच्च शिक्षा बिना विचारे अधिकांशत: पश्चिमी देशों के मॉडल पर फलफूल रही है और विदेशों में जो हो रहा है उसकी छाया में उसी की प्रतिलिपि तैयार करने में जुटी है। उसका सारा ज्ञान विषयक माल ताल विदेश से ही आता है। उसकी भारतीय समाज और संस्थाओं से दूर का रिश्ता होता है और वह बहुलांश में भारत से अपरिचय को बढ़ाने में मदद दे रही है क्योंकि भारत को अस्वीकार करना ( या न जानना) उसके मूल में है। ज्ञान का सांस्कृतिक अनुबंधन जानते हुए भी हम यहां के समाज और ज्ञान को हीन मानते हुए विदेशी ज्ञान जाल की पकड़ को ही सुदृढ किए हुए हैं। यह पूरी प्रक्रिया मौलिकता और सृजनशीलता के विरुद्ध जा रही है। जबतक शिक्षा को निजी और सामाजिक विकास के लिए भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक और मूल्यपरक नहीं बनाएंगे, बात नहीं बन सकेगी। राजनैतिक-सामाजिक दृष्टि से विधायिका , न्यायपालिका और कार्यपालिका की कार्यप्रणाली और उसकी कार्यक्षमता को लेकर अनेक मोर्चों पर असंतुष्टि जाहिर होती रही है। जरूरी सुधारों की गति धीमी है और जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं। सामाजिक स्तर पर जिस समावेशी दृष्टि की जरूरत है उसमें पिछड़ने के कारण सौमनस्य की दृष्टि से सामाजिक ऊर्जा का समुचित उपयोग न होकर उसका क्षरण-सा होने लगता है जिसका लाभ लेते हुए विभिन्न राजनैतिक दल देशहित को भुलाते हुए तात्कालिक लाभ की सोचने लगते हैं। राजनैतिक विमर्श का स्तर और प्रयोजन धूमिल होने लगता है और देश हित पृष्ठभूमि में तिरोहित होने लगता है। आज आवश्यकता है कि हम क्षुद्र स्वार्थ, निष्क्रियता, आलस्य, अलगाव, नकारात्मकता, प्रतिक्रियावादिता और भाग्यवादिता जैसे मनोभावों से बचें और आशावादी दृष्टि के साथ नवाचार, भरोसे वाले, ऊर्जस्वित और भविष्योन्मुख दृष्टिकोण अपनाएं जिससे सशक्तिकरण और उत्पादकता में वृद्धि हो, तभी जीवन संतुष्टि बढ़ेगी और देश की उन्नति होगी। ऐसा जीवंत भारत ही आत्मनिर्भर हो सकेगा। (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 11 July 2020


bhopal, Nepal

  डॉ. रमेश ठाकुर चीन की कठपुतली बनकर नेपाल क्या-क्या रंग दिखा रहा है, उसकी एक और तस्वीर सामने आई है। तराई क्षेत्र अमूनन शांत रहता है। दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले इसके भूजल स्तर में नमी की तरावट पूरी आबादी को ठंडक से लबरेज रखती है। समूचा इलाका वन क्षेत्र और फसली जमीन से घिरा है। प्राकृतिक धरोहर एवं दुर्लभ किस्म के जंगली जानवरों की चहलकदमी हमेशा बनी रहती है। लेकिन अपनी नापाक हरकत से नेपाल ने इस क्षेत्र में अशांति फैलाने की हिमाकत की है। हिमाकत कोई छोटी नहीं बल्कि बड़े स्तर की, जो बर्दाश्त करने लायक नहीं। नेपाल ने सीमा निर्धारित क्षेत्र का घोर उल्लंघन करते हुए, पीलीभीत जिले से सटे क्षेत्र में ‘नो मैन्स लैंड‘ में जबरन सड़क का निर्माण किया। खबर जैसे ही स्थानीय प्रशासन को लगी, आला अफसरों की टीम तुरंत वहां पहुंची और निर्माण कार्य को रुकवाया। फिलहाल नेपाल की इस ताजा हरकत ने दोनों मुल्कों के बॉर्डर क्षेत्र को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। भारत के अधिकृत क्षेत्र में बीते रविवार को नेपाल के लोगों ने सुबह के वक्त आकर सड़क बनानी शुरू कर दी। जबकि वह क्षेत्र ‘नो मैन्स लैंड‘ में आता है, जिसका मतलब होता है कि जब किन्हीं दो मुल्कों के दरम्यान सीमा निर्धारित करने के लिए कुछ भूमि छोड़ी जाती है तो उसे ‘नो मेंस लैंड’ कहा जाता है। जो अधिकृत रूप से किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं होती है और इसमें सीमा निर्धारण के लिए स्तंभ, पिल्ले या बाड़ लगा दी जाती है। तराई क्षेत्र में भी दोनों मुल्कों की सीमा से सटा ऐसा क्षेत्र मौजूद है जो दशकों पहले निर्धारित हुआ था। जिसपर नेपाल ने दूसरी बार बिना वजह विवाद खड़ा किया है। ‘नो मेंस लैंड’ एरिया की कुछ शर्तें और नियम होते हैं, जिसका दोनों तरफ से पालन होता है। दोनों देशों के बीच 18-18 गज की चौड़ाई में जमीन छोड़ी हुई है। छोड़ी गई जमीन को ही ‘नो मेंस लैंड’ कहते है। भारत-नेपाल के बाॅर्डर क्षेत्र में भी ये भूमि मौजूद है। इसलिए छोड़ी हुई उस जगह पर न भारत अपना हक जमा सकता है और न नेपाल? किसी भी तरह का निर्माण कार्य वहां वर्जित होता है। ये भूमि हर उस मुल्क को छोड़नी होती है जिनकी सीमाएं दूसरे देशों से लगी होती है। ये सब जानने के बावजूद नेपाल ने उस वर्जित और प्रतिबंधित क्षेत्र में सड़क बनाने की जुर्रत की। उनकी इस हिमाकत के बाद काठमांडू से दिल्ली तक माहौल गर्मा गया है। आखिर ऐसा क्या है जो कुछ समय के अंतराल बाद नेपाल सीमाई क्षेत्रों में उछलकूद मचा रहा है। अभी थोड़े दिन पहले भी नेपाली सैनिकों ने बिहार से लगे क्षेत्र में अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक भारतीय नागरिक को मार दिया था। जबसे चीन-भारत के बीच माहौल गर्म हुआ है तभी से नेपाल भारतीय सीमाओं पर लगातार कोई न कोई खुराफात कर रहा है। तराई क्षेत्र के ‘नो मेंस लैंड’ में जिस तरह से नेपाल ने हरकत की है, उससे कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि उनके निर्माण कार्य को पीलीभीत जिला प्रशासन ने रुकवा दिया है लेकिन उस घटना के बाद पीलीभीत और लखीमपुर खीरी दोनों जिलों की सीमाओं से सटे बॉर्डर क्षेत्र पर भारत ने एसएसबी की कई टुकड़ियों की तैनाती करके उन्हें सतर्क रहने का आदेश दिया है। एकाध सप्ताह पहले भी नेपालियों ने बसही बॉर्डर पर भी जबरन निर्माण करके बवाल किया था। तराई ऐसा क्षेत्र है जहां कभी भी इस तरह की हरकतें नहीं हुई। पर, अचानक से नेपाल की तरफ से ने कूद-फांद शुरू कर दी गयी है। केंद्र सरकार भी सकते में है, आखिर नेपाल ऐसा कर क्यों रहा है? संदेह ऐसा भी है कि कहीं किसी के उकसाने से तो ये हरकत नहीं कर रहा। फिलहाल सरकार ने पूरे मामले पर नेपाल सरकार से जवाब मांगा है और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास को भी अलर्ट किया है। जवाब मांगना भी चाहिए ताकि माजरा पता चले। गौरतलब है कि नेपाल के साथ हमारी ‘नो मेंस लैंड’ क्षेत्र से उत्तर प्रदेश के कुछ जिले जुड़े हुए हैं जिनमें पीलीभीत, लखीमपुर, गोंडा, बहराइच आदि प्रमुख हैं। कुछ क्षेत्रफल उत्तराखंड का भी आता है। इन क्षत्रों में नेपाली लोग बिना वीजा के भारतीय क्षेत्रों में मजदूरी-नौकरी आदि करते आते हैं। ज्यादातर खेतों में काम करने आते हैं। इस वक्त खेतों में धान की रोपाई हो रही है तो ज्यादातर मजदूर नेपाल से आ रहे हैं। कभी कोई रोकधाम नहीं हुई लेकिन उनके मौजूदा कृत्य ने सतर्कता बढ़ा दी। वहां से भारतीय क्षेत्रों में मजदूरी करने आने वाले मजदूरों को रोक दिया गया है। नेपाल सीमा पर भारतीय सैनिकों की जबरदस्त पहरेदारी शुरू हो गई है। घटना बीते रविवार यानी पांच अप्रैल की है तब से लेकर अभीतक कई मजदूरों को पुलिस ने जबरन भारतीय सीमाओं में घुसने को लेकर अरेस्ट भी किया है। बखेड़ा ज्यादा खड़ा होने के बाद से एसएसबी के जवान बॉर्डर से सटे नेपाली गांवों पर भी नजर बनाए हुए हैं। नेपालियों ने जिस क्षेत्र पर सड़क का निर्माण शुरू किया था, उसे टिल्ला नंबर-4 कहते हैं, जो नेपाल का पचंवी नामक गांव से बिल्कुल सटा हुआ है। इस गांव के लोग काफी समय से भारतीय क्षेत्र को अपना बताते आए हैं लेकिन दो सौ वर्ष पूर्व के कालखंडों और दस्तावेजों के मुताबिक वह क्षेत्र अधिकारिक रूप से भारत का ही है। आज से करीब पचास साल पहले भी नेपाल ने एकबार और विवाद खड़ा किया था। तब भी नो मैंस लैंड सीमा में करीब दस मीटर अंदर तक नेपालियों ने घुसकर अपना झंडा गाड़ा था। विरोध में तब हमारे एसएसबी जवानों द्वारा हवाई गोलियां चलाईं और करीब दस राउंड फायरिंग व आंसू गैस के गोले दागने के बाद नेपाली पीछे हटे थे। खैर, उस समय दोनों तरफ के अधिकारियों ने मसला सुलझा लिया था। उस समय सहमति बनी थी कि वहां दोनों ओर से किसी प्रकार का कोई निर्माण नहीं किया जाएगा। लेकिन पुरानी बातें भूलकर नेपाल ने एकबार फिर नो मैंस लैंड एरिया में सड़क बनाने का नाकाम प्रयास किया। इसबार भी खदेड़े गए हैं लेकिन उनकी इन हरकतों के बाद से सीमा पर माहौल तनातनी का बन गया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 July 2020


bhopal, Life with corona

  रमेश सर्राफ धमोराकोरोना महामारी से आज पूरी दुनिया पीड़ित है। भारत में हर दिन स्थिति पहले से अधिक खराब होती जा रही है। देश में करीबन 2 महीने तक चार बार किए गए लॉकडाउन के बाद अब अनलॉक 2.0 चल रहा है। सरकार इस बात की पूरी कोशिश कर रही है कि धीरे-धीरे जनजीवन पूर्व की भांति सामान्य स्थिति में आ जाए। इसीलिए एक-एक कर पाबंदियां हटाई जा रही हैं। ताकि लोग लॉकडाउन से पहले की तरह सामान्य जीवन जीने लगें। सरकार का प्रयास है कि कोरोना संक्रमण के विस्तार को हर हाल में रोका जाए। मगर कोरोना संक्रमण की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही है। बीते 5 दिनों में ही एक लाख नए कोरोना संक्रमण के मामले सामने आए। कोरोना संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। कोरोना संक्रमण की संख्या के मामले में भारत अब सिर्फ अमेरिका और ब्राजील से ही पीछे है। भारत में गत दिनों एकदिन में रिकॉर्ड 25 हजार नए केस दर्ज किए गए हैं। जो अबतक का सबसे बड़ा डरावना आंकड़ा है। भारत में कोरोना से अबतक सात लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं। यहां करीबन 20 हजार लागों की कोरोना से मौत हो चुकी है। जबकि चार लाख तीस हजार लोग ठीक हो चुके हैं। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक 5 जुलाई तक देश में टेस्ट किए गए सैंम्पलों की कुल संख्या करीब एक करोड़ है। जिनमें एकदिन में सबसे अधिक एक लाख 81 हजार सैंपल टेस्ट किए गए। दुनिया में कोरोना से संक्रमित लोगों का आंकड़ा एक करोड़ 15 लाख से अधिक हो चुका है। दुनिया के करीब 213 देश अभीतक इस महामारी की चपेट में आ चुके हैं। भारत में सबसे अधिक कोरोना का संक्रमण महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान में है। इन राज्यों में देश के करीब 80 प्रतिशत कोरोना संक्रमित लोग पाए गए हैं। मगर यहां सबसे अच्छी बात यह है कि भारत में कोरोना पॉजिटिव से रिकवर कर नेगेटिव होने वालों की संख्या अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है। भारत में करीबन औसतन 61 प्रतिशत कोरोना संक्रमित लोग स्वस्थ होकर घर जा रहे हैं। कोरोना के उपचार के लिए देश में इस समय 1105 बायो लेबोरेटरी काम कर रही हैं। जिनमें से 788 सरकारी क्षेत्र की व 317 निजी क्षेत्र की हैं। कोरोना की रोकथाम के लिए भारत में अभी भी अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन सेवा, जल परिवहन सेवा बंद है। देश में भी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाने के लिए सीमित संख्या में हवाई जहाज एवं रेलगाड़ियां संचालित की जा रही है। देश में तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण इन दिनों लोगों में पहले से अधिक भय व्याप्त हो रहा है। इसी कारण बहुत कम संख्या में लोग घरों से बाहर निकाल रहे हैं। रेलगाडियां, हवाई जहाज, बसों में भी बहुत कम लोग यात्रा कर रहे हैं। कोरोना का लोगों में कितना भय है इसकी एक बानगी मैंने स्वयं महसूस की। मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार को वृद्धावस्था के चलते शुगर, बीपी, निमोनिया की बीमारी के उपचार के लिए जयपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहां उनकी प्रथम जांच में कोरोना की रिपोर्ट नेगेटिव आई थी लेकिन दूसरे दिन फिर जांच करवायी गयी। जिसमें उनको कोरोना पाजिटिव पाया गया। इसके बाद उनको एक निजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवा दिया गया। एक सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसी दौरान उनके परिवार के सभी लोगों की कोरोना जांच करवाई गई, जिसमें अधिकांश लोग पॉजिटिव पाये गये। तब उन सभी को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इसी दौरान जयपुर के अस्पताल में भर्ती वृद्ध व्यक्ति की मौत के बाद उनके शव की पहचान कर अंतिम संस्कार कराने के लिये प्रशासन ने उनके परिवार के किसी सदस्य को इजाजत नहीं दी। तब मैंने जयपुर जाकर उनका अंतिम संस्कार कराया। ऐसे में यहां देखने को आया कि कोरोना के कारण एक व्यक्ति की मौत हो जाती है। उनके परिवार के सभी सदस्य कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के कारण अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में उस वृद्ध व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए कोरोना के डर से कोई रिश्तेदार तैयार नहीं होता। लोगों में कोरोना का ऐसा डर बैठ गया है कि ऐसी स्थिति में हर कोई बचकर निकलना चाहता है। नजदीकी व्यक्ति भी कोरोना संक्रमित परिवार के यहां जाने से गुरेज करता है। ऐसे में उस परिवार की स्थिति एक बहिस्कृत परिवार की हो जाती है। जिसका उस परिवार के लोगों के दिलोदिमाग पर काफी ख़राब असर पड़ता है। कोरोना पॉजिटिव से मृत व्यक्ति के परिवार का कोई भी सदस्य कहीं बाहर की यात्रा करके नहीं आया था। न ही उनके परिवार में कोई बाहरी व्यक्ति आया था। जयपुर के निजी अस्पताल में उपचार के दौरान ही वो कहीं से कोरोना संक्रमित हुए थे। जिसका खामियाजा उनके पूरे परिवार को उठाना पड़ा। सरकार कहती है कि अब हमको कोरोना के संग ही जीना पड़ेगा। लेकिन ऊपर जैसी स्थिति का वर्णन किया गया है, वैसी स्थिति में भला कोई भी व्यक्ति कोरोना के साथ कैसे जी सकता है। जिस व्यक्ति को भी ऐसी स्थिति से गुजरना पड़ता है, उसकी जिंदगी बहुत खराब हो जाती है। कोरोना के डर से हर कोई उससे दूर रहने का प्रयास करता है। नजदीकी रिश्तेदार भी दूरी बना लेते हैं। सरकार बार-बार कहती है कि हर व्यक्ति 2 गज की दूरी बना कर रखे तथा जब भी कहीं बाहर निकलो, मुंह पर मास्क लगाकर निकलो। लेकिन देखने में आता है कि अक्सर लोग लापरवाही के चलते ऐसा नहीं करते हैं। बड़े-बड़े मंत्रियों, राजनेताओं, अधिकारियों द्वारा भी अक्सर कार्यक्रमों में सरकार के दिशा-निर्देशों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। जिससे आमलोगों में सरकारी नियम-कानून पालना करने की भावना समाप्त हो जाती है। सरकार को चाहिए कि कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए जांच करवाने में तेजी लाई जाए। साथ ही लोगों को शारीरिक दूरी व मुंह पर मास्क लगाने की कड़ाई से पालना करवाई जाए। जहां कहीं भी कोई राजनेता या सरकारी अधिकारी, कर्मचारी सरकारी गाइडलाइंस का उल्लंघन करता मिले, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। तभी सरकारी नियमों की पालना हो सकेगी।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 July 2020


bhopal,Reduce dependence on China

  आर.के. सिन्हा चीन से सीमा पर भीषण झड़प के बाद देश में माहौल बन रहा है कि अपने शत्रु देश चीन से आयात अब बंद किया जाए। चीन पर निर्भरता खत्म की जाए। यह बात दीगर है कि कुछ निराशावादियों को लगता है कि यह मुमकिन नहीं। ये अपने पक्ष में तमाम कमजोर तर्क और कुतर्क देने लगते हैं। इन्हें देश के आत्मसम्मान से वैसे भी कोई लेना-देना नहीं है। और तो और, इन्हें नहीं पता कि सरकार और निजी क्षेत्र अपने स्तर पर चीन का बहिष्कार करने के लिए भरसक प्रयासों में लगी है। पहले बात करते हैं देश की सड़क परियोजनाओं की। सरकार की सड़कों को बनाने के लिए अब ऐसी किसी भी कंपनी को ठेका नहीं दिया जाएगा जिनकी साझेदार कोई चीनी कंपनी है। केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ''हमलोगों ने यह सख़्त स्टैंड लिया है कि अगर चीनी कंपनियां किसी ज्वाइंट वेंचर्स के ज़रिए भी हमारे देश में आना चाहती हैं तो हम इसकी इजाज़त नहीं देंगे।" देश में फिलहाल केवल कुछ परियोजनाएं ही ऐसी हैं, जिनमें चीनी कंपनियां हिस्सेदार हैं लेकिन उनको कई टेंडर पहले ही मिले थे। इसी के साथ लद्दाख की गलवान घाटी में चीन की करतूत के बाद भारतीय रेलवे भी उसे सबक सिखाने में जुट गया है। भारतीय रेलवे ने एक चीनी कंपनी से अपना एक करार खत्म कर दिया है। 2016 में चीनी कंपनी से 471 करोड़ का करार हुआ था, जिसमें उसे 417 किलोमीटर लंबे रेल ट्रैक पर सिग्नल सिस्टम लगाना था। इससे पहले सरकार ने बीएसएनएल और एमटीएमएल को निर्देश दिया था कि वो भी चीनी उपकरणों का इस्तेमाल कम करे। आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने भारत में प्रचलित चीन के 59 एपों पर प्रतिबंध लगा ही दिया है। इनमें टिकटॉक, हेलो, वीचैट, यूसी न्यूज आदि तमाम चीन के एप भारत की संप्रभुता, अखंडता व सुरक्षा को लेकर पूर्वाग्रह रखते थे। ऐसे में, सरकार ने आईटी एक्ट के 69ए सेक्शन के तहत 59 एप पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। दरअसल सरकार को इनके गलत इस्तेमाल को लेकर लगातार कई शिकायतें मिल रही थीं। अगर सरकार चीन को सबक सिखाने के लिए कमर कस चुकी है तो देश का निजी क्षेत्र भी कहां पीछे रहने वाला है। देश की प्रमुख स्टील कंपनी जिंदल साउथ-वेस्ट (जेएसडब्ल्यू) ने चीन से आयात खत्म करने का फैसला किया है। जेएसडब्ल्यू चीन से अपनी स्टील फैक्ट्रियों की भट्टियों के लिए कच्चा माल लेता है। अब कंपनी ने ये सामान ब्राजील और तुर्की से मंगवाने का फैसला किया है। एक बात साफ है कि अगर विकल्प खोजें जाएं तो मिलगे ही। हमें चीन से आगे भी सोचना होगा, चलना होगा। देश का आटो सेक्टर भी चीन से कच्चे माल का भारी आयात करता है। उसका लगभग 40 फीसद कच्चा माल चीन से ही आता है। उसे भी अब अन्य विकल्प तलाश करने होंगे। चीन-चीन करने वालों को सीमा पर देश के वीरों के बलिदान को भी याद रखना होगा। अगर हम चीन की तमाम हरकतों को नजरअँदाज करते हुए भी उससे आयात जारी रखते हैं तो हम एक तरह से अपने शहीदों का अपमान ही तो करेंगे। जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया है तब से कुछ सेक्युलरवादी परम ज्ञानी यह भी कहने लगे हैं कि चीन से आयात किए बिना तो हमारी फार्मा कंपनियां सड़कों पर आ जाएंगी। भारत की जो दवा कंपनियां जेनेरिक दवाएं बनाती हैं, वे 80 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) चीन से ही आयात करती है। एपीआई यानी दवाओं का कच्चा माल। भारत में एपीआई का उत्पादन बेहद कम है, इसे तेजी से बढ़ाना होगा । अब भारत की फार्मा कंपनियों को भी एपीआई तबतक अन्य देशों से लेने के विकल्प खोजने होंगे जबतक हम स्वयं एपीआई के उत्पादन में स्वाबलंबी नहीं हो जाते। सच में ये शर्मनाक है कि हर साल अरबों रुपये कमाने वाली फार्मा कंपनियां चीन पर इस हद तक निर्भर है। तो उनकी अपनी उपलब्धि क्या है? क्यों नहीं उन्होंने निवेश किया खुद एपीआई के निर्माण में। उन्होंने अपने को आत्मनिर्भर बनने की चेष्टा नहीं की। ये तब है जब ये किसी भी गंभीर रोग की दवा या वैक्सीन ईजाद करने में तो विफल ही रही है। सच में कमियां हमारी भी रही हैं। हमने अपने को काहिल बना लिया है। क्या सारा देश बीते कई सालों से मेड इन चाइना दिवाली नहीं मना रहा है? भारत में हर साल दिवाली पर हजारों करोड़ रुपये की चीनी लाइट्स, पटाखे, देवी-देवताओं की मूर्तियां वगैरह भारी मात्रा में आयात की जाती हैं। क्या ये भी बनाने में हम असमर्थ हैं? लानत है। अगर हम चीन में बनी लाइट्स का आयात बंद कर दें तो स्वदेशी माल की खपत बढ़ेगी। गरीब कुम्भ्कारों की रोजी-रोटी पुनर्जीवित हो उठेगी। पर हमने इस बाबत सोचा कब। कुल मिलाकर हमारे यहां मिठाई को छोड़कर सबकुछ चीन से ही तो आ रहा था। उद्योग और वाणिज्य संगठन एसोचैम का दावा है कि दिवाली पर मेड इन चीन सामान की मांग 40 फीसद प्रति साल की दर से बढ़ रही है। कहना न होगा कि इसके चलते भारत के घरेलू उद्योगों पर भारी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। हजारों बंद हो गए और लाखों लोग बेरोजगार हो गए होंगे। याद करें कि चीन से चालू सीमा विवाद से पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को दुनिया का बड़ा मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना चाहते थे। पर हमने उनके आह्वान पर कायदे से गौर ही नहीं किया। हालांकि भारत के पास कौशल (स्किल) , प्रतिभा ( टैलेंट) और अनुशासन (डि‍सि‍पलीन) भी है। जब चीन भारतीय बाजारों में अपना घटिया सामान भरने लगा था तभी हमें समझ जाना चाहिए था पर हम नहीं सुधरे। यह काम सिर्फ सरकार को ही नहीं करना था, इसे सारे देश को करना था। कम से कम अब तो हमारी आंखें खुली। भारत-चीन के बीच दोतरफा व्यापार लगभग 100 अरब रुपये का है। यह लगभग पूरी तरह से चीन के पक्ष में है। धूर्त चीन के साथ हम इतने बड़े स्तर का आपसी व्यापार नहीं कर सकते। उससे हमें कई स्तरों पर लोहा लेना होगा। उसी क्रम में एक रास्ता यह है कि हम उससे होने वाला आयात बंद करें। (लेखक वरिष्ठ स्तभंकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 8 July 2020


bhopal, What the Global Times is saying on India-China relations

बिक्रम उपाध्याय चीन गलवान घाटी में पीछे हट रहा है। हालांकि अभीतक वह स्थिति बहाल नहीं हुई है जो मई के पहले सप्ताह में थी। यही चीन की रणनीति रही है। वह अपनी विस्तारवादी नीति के तहत पहले तो काफी आगे तक अतिक्रमण करता है और फिर कुछ पीछे हट जाता है। इसबार भारत ने उसका यह चेहरा दुनिया में सबके सामने लाने के साथ ही जिस तरह से प्रतिरोध किया, उससे चीन को यकीन नहीं है कि भारत के साथ सीमा पर कोई स्थाई शांति स्थापित हो पाएगी। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भले ही 5 जुलाई को स्टेट काउंसलर और उनके विदेश मंत्री वांग यी और भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बीच बातचीत के बाद एक सहमति के तहत दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट रही हैं लेकिन लगता नहीं कि यह सहमति लंबे समय तक बनी रहेगी। ग्लोबल टाइम्स ने दोबारा फिर झड़प होने की संभावना का कारण भारत के राष्ट्रवाद को बताया है और कहा है कि जिस तरह भारतीय सेना को यह महसूस हो रहा है कि उन्होंने गलवान घाटी में कुछ खो दिया है और जो उनका व्यवहार चीन के प्रति है, उससे लगता है कि लड़ाई फिर छिड़ सकती है। ग्लोबल टाइम्स ने अपने दो विशेषज्ञों की राय भी प्रकाशित की है। सरकारी मीडिया होने के कारण ग्लोबल टाइम्स की हमेशा से कोशिश रहती है कि वह सारे विवाद का ठीकरा भारत पर फोड़ दे, पर इस चीनी सरकारी भोंपू की बात पर कोई यकीन नहीं करता। हालांकि इसपर विशेषज्ञ टिप्पणियों और लेखों से अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन किस दिशा में सोच रहा है। वह चीनी जनता सहित पूरे विश्व समुदाय को धोखे में रखने और एक वातावरण निर्माण की योजना में लगा है। चीन के सामरिक मामलों के अनुभवी विशेषज्ञ और टीवी कमेंट्रेटर सांग झानपिंग का कहना है कि चीन सैन्य शक्ति के मामले  में भारत से काफी मजबूत है इसलिए यदि कोई युद्ध छिड़ा है तो चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी आसानी से भारत को हरा देगी। झानपिंग का कहना है कि दोनों देशों ने आपसी सहमति के आधार पर सैनिकों को पीछे भेजने का फैसला किया है, किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि चीन ने कमज़ोरी के कारण पीछे हटना मंजूर किया है। चीन हमेशा अपने पड़ोसियों से दोस्ताना संबंध रखना चाहता है। उम्मीद है कि भारत भी इस द्विपक्षीय विवाद पर संयम के साथ पेश आएगा। झानपिंग का यह भी कहना है कि भारत में लगातार राष्ट्रवाद की भावना बढ़ रही है। आजादी के समय से ही भारत अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के प्रयास में है। सेना के प्रति अंधविश्वास भारत में कूट-कूट कर भरा है। कुछ पूरब व पश्चिम के देश. हथियारों के जरिए भारत के साथ नजदीकी संबंध बनाए हुए हैं लेकिन वे सिर्फ अपने हथियार बेच रहे हैं, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण भारत की सैन्य क्षमता नहीं बढ़ रही है। झानपिंग ने ‘बायकाट चाइना’ पर भी रोष जताया है। उनका कहना है कि कुछ लोग बहुत पहले से चीन के सामान पर प्रतिबंध लगाने की सोच रहे थे लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल रहा था। इस सीमा विवाद के बाद उनको अवसर मिल गया लेकिन इस तरह भारत न तो अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा सकता है और न सैन्य ताकत हासिल कर सकता है। वह चीन के सामने तो टिक ही नहीं सकता। अपने विचार के अंत में झानपिंग ने कहा है कि इस समय दोनों पक्षों ने सीमा विवाद से निपटने पर सहमति बनाई है लेकिन सच तो यह है कि दोनों के बीच आपसी विश्वास काफी कम हो गया है। भारतीय सेना को लगता है कि उन्हें गलवान घाटी के संघर्ष में काफी कुछ खोना पड़ा है। यदि यही भावना लंबे समय तक रही तो भारत-चीन के बीच सैन्य संबंधों में फिर से तनाव उत्पन्न हो सकता है। भारत लगातार हथियार खरीद रहा है और सीमा के पास सुविधाओं का निर्माण व विस्तार करता जा रहा है। वास्तव में भारत चीन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है। भारत की यह कल्पना दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को बिगाड़ने का काम करेगी। उम्मीद है कि भारत भी अपनी ओर से सकारात्मक पहल दिखाएगा। चीन के एक और विशेषज्ञ लैन झिआनसे, जो चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के एशिया पैसेफिक विभाग के डायरेक्टर हैं, ने भी यही आशंका जताई है कि भारत और चीन के बीच विवाद सुलझाने का यह फैसला लंबे समय तक बरकरार नहीं रह पाएगा। उन्होंने ग्लोबल टाइम्स में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा है कि भारत और चीन मिलिट्री और डिप्लोमेटिक चैनलों के जरिए लंबे समय से बात करते आ रहे हैं लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि क्या वाकई सीमा पर तनाव कम हो गया। इस समय तो ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि सीमा पर कहीं भी तनाव कम हुए हैं। झियानसे का कहना है कि भारत में चीन विरोधी भावना चरम पर है। चीन के सामान के बहिष्कार की आवाज़ काफी प्रबल है। इससे दोनों देशों के बीच विश्वास के माहौल को बनने में काफी कठिनाई आ सकती है। नई दिल्ली ने बीजिंग के साथ दूरियां बढ़ाने के प्रयास किए हैं। उसने सीमा पर टकराव बढ़ाया है और अब अन्य क्षेत्रों में भी चीन के साथ संबंधों को बिगाड़ने में लगा है। इससे सीमा पर तनाव कम करने में परेशानी होगी। अब नई दिल्ली को यह ज़िम्मेदारी लेनी है कि आगे कोई उकसावे वाली कार्रवाई न करे जिससे चीन और भारत के संबंध पूरी तरह से बिगड़ जाएं।झिआनसे ने चीन को भी यह सुझाव दिया है कि वह शांत व स्थिर रहे। भारत के साथ किसी विवाद पर जुबानी जंग के बजाय चीन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह बताना चाहिए कि क्या सही है व क्या गलत और यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि टकराव भारत के कारण उत्पन्न हो रहा है। चीन को विवादित क्षेत्र से अपने सैनिकों को पूरी तरह हटा लेना चाहिए लेकिन इस बीच चीन को सजग और तैयार रहना चाहिए कि यदि भारत कोई हिमाकत करता है तो उसे भरपूर जवाब दिया जाए, खासकर तब जब भारत ने सीमा पर टकराव की स्थिति में नियम को बदल दिया है। यानी अपने सैनिकों को गोली चलाने का भी आदेश दे दिया है। झिआनसे ने अंत में कहा है कि यह भारत को निर्णय करना है कि उसे तनाव बढ़ाना या घटाना है। इस चीनी एक्सपर्ट ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अप्रैल 2018 में हिंदुस्तान टाइम्स में छपे उस इंटरव्यू का हवाला दिया है, जिसमें मोदी ने कहा था- एलएसी को लेकर कुछ भ्रम के चलते कई बार सीमा पर भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी झड़पें हुई हैं लेकिन दोनों देश मिलिट्री या डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए आपसी बातचीत से मामले को सुलझा लेते हैं। इससे पता चलता है कि दोनों देशों के नेता परिपक्व हैं, आपस में शांतिपूर्ण तरीके से मामले को सुलझाने में सक्षम हैं।’ चीन के इस एक्सपर्ट ने प्रधानमंत्री मोदी से अपेक्षा की है कि वे अपने बयान पर कायम रहेंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 July 2020


bhopal, Galvan: Successful initiative of Doval

  डॉ. वेदप्रताप वैदिक गलवान घाटी से इस वक्त खुश-खबर आ रही है। हमारे टीवी चैनल यह दावा कर रहे हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा से चीन पीछे हट रहा है। चीन अब घुटने टेक रहा है। अपनी हठधर्मी छोड़ रहा है, लेकिन इस तरह के बहुत-से वाक्य बोलने के बाद वे दबी जुबान से यह भी कह रहे हैं कि दोनों देश यानि भारत भी उस रेखा से पीछे हट रहा है। वे यह भी बता रहे हैं कि हमारे सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच दो घंटे वीडियो-बातचीत हुई। इसी बातचीत के बाद दोनों देशों ने अपनी सेनाओं को पीछे हटाने का फैसला किया है लेकिन हमारे टीवी चैनलों के अति उत्साही एंकर साथ-साथ यह भी कह रहे हैं कि धोखेबाज चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। एक अर्थ में हमारे ये टीवी एंकर चीन के बड़बोले अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' से टक्कर लेते दिखाई पड़ते हैं। यह अच्छा हुआ कि भारत सरकार हमारे इन एंकरों की बेलगाम और उकसाऊ बातों में बिल्कुल नहीं फंसी और उसने संयम से काम लिया। यह अलग बात है कि टीवी चैनलों को देखने वाले करोड़ों भारतीय नागरिक चिंताग्रस्त हो गए और उन्होंने राष्ट्रभक्ति का प्रदर्शन करने के लिए स्वतःस्फूर्त चीनी माल का बहिष्कार भी शुरू कर दिया और चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग के पुतले फूंकने भी शुरू कर दिए,  लेकिन सरकार और भाजपा के किसी नेता ने इस तरह के कोई भी  निर्देश नहीं दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन का नाम लेकर एक भी उत्तेजक बयान नहीं दिया। उन्होंने हमारी फौज के जवानों के बलिदान को पूरा सम्मान दिया, लद्दाख की अपनी यात्रा और भाषण से फौज के मनोबल में चार चांद लगा दिए और गलवान की मुठभेड़ को लेकर चीन पर जितना भी निराकार दबाव बनाना जरूरी था, बनाया। चीनी 'एप्स' पर तात्कालिक प्रतिबंध, चीन की अनेक भारतीय-परियोजनाओं पर रोक की धमकी और लद्दाख में विशेष फौजी जमाव आदि से सीधा संदेश दिया। उधर चीन ने भी अपनी प्रतिक्रिया को संयत और सीमित रखा। इन बातों से दोनों सरकारों ने यही संदेश दिया कि गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ तात्कालिक और आकस्मिक थी। वह दोनों सरकारों के सुनियोजित षड़यंत्र का परिणाम नहीं थी। मैं 16 जून से यही कह रहा था और चाहता था कि दोनों देशों के शीर्ष नेता सीधे बात करें तो सारा मामला हल हो सकता है। अच्छा हुआ कि डोभाल ने पहल की। परिणाम अच्छे हैं। डोभाल को अभी मंत्री का ओहदा तो मिला ही हुआ है। अब उनकी राजनीतिक हैसियत इस ओहदे से भी ऊपर हो जाएगी। अब उन्हें सीमा-विवाद के स्थायी हल की पहल भी करनी चाहिए। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 6 July 2020


bhopal, Yogi government, breaking record

  सियाराम पांडेय 'शांत' उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पौधरोपण के मामले में अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। निर्धारित लक्ष्य 25 करोड़ से भी 87 हजार अधिक पौधे लगाना और वह भी कोरोना काल में, यह बड़ी उपलब्धि है। बकौल मुख्यमंत्री यह सब कोरोना काल में दो गज की दूरी बनाते हुए किया गया है। इसमें सरकारी विभागों ने ही नहीं, समाज के हर तबके ने सहयोग दिया है। सरकारी विभागों, स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने भी अपने श्रम और समय का नियोजन किया है। अगर ऐसा है तो इसकी सराहना की जानी चाहिए। न कि आलोचना। विडंबना इस बात की है कि अपने देश में अच्छे कामों का भी विरोध होने लगता है। गत वर्ष भी योगी सरकार ने 22 करोड़ से ज्यादा पौधे लगाए थे। उन्हें जियो टैग भी किया गया था। उनका देश की प्रतिष्ठित एजेंसियों से सत्यापन भी कराया गया। बकौल मुख्यमंत्री गत वर्ष लगाए गए 22 करोड़ पौधों में से 95 प्रतिशत पौधे सुरक्षित हैं। वे अखिलेश यादव के उन सवालों का जवाब दे रहे थे जिसमें उन्होंने 22 करोड़ पौधे लगाने के सरकारी दावे को भ्रामक और गुमराहकारी बताया था। उन्होने यह भी कहा था कि सरकार बताए कि उसने गत वर्ष कितने पौधे कहां लगाए और उनमें से कितने सुरक्षित हैं।तथ्य यह है कि योगी सरकार में कांग्रेस, सपा और बसपा शासन के मुकाबले नि:संदेह ज्यादा पौधे लगाए गए हैं। अन्य सरकारों में पौधरोपण सरकारी उपक्रम तो था लेकिन उसमें सरकार और जनसहभागिता का स्तर नहीं के बराबर था। वह तो योगी सरकार है जिसने इस अभियान को पौधरोपण महाकुम्भ का नाम दिया और उसके नतीजे आज सबके सामने है। योगी राज में पहली बार 2018 में 9 करोड़ पौधे लगाए गए थे।उन्होंने अगले सत्र में 35 करोड़ पौधे लगाने की लोगों से अपेक्षा की है। हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि यह सरकार पौधरोपण में विविधता ही नहीं, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की अनुकूलता का भी विचार कर रही है। सहजन का पौधा हर गरीब परिवार को उपलब्ध कराना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। अखिलेश यादव को योगी सरकार में बने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड पर आपत्ति है तो वर्ष 2016 में गिनीज बुक में 5 करोड़ पौधरोपण के लिए उनकी सरकार का भी नाम आ चुका है। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी 2012-13 में 39290146 पौधे लगवाए थे। 2013-14 में 45667661 पौधे लगे थे। 2014-15 में पौधरोपण की संख्या घटकर 32287602 हो गई थी। जो सवाल वे योगी सरकार पर आज उठा रहे हैं, वैसे ही सवाल उनकी सरकार में भी उठते रहे हैं। संख्या को लेकर तब भी संदेह व्यक्त किए जाते रहे। उनपर भी संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के आरोप लगते रहे हैं। इस सरकार ने फलदार पौधों के साथ ही औषधीय महत्व के पौधे भी लगवाए हैं, यह एक अच्छी बात है। गंगा-यमुना आदि नदियों की अविरलता और निर्मलता को बनाए रखने के लिए भी सरकार अगर पौधरोपण को जरूरी समझती है तो इसमें बुरा क्या है? उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सवाल का स्वागत किया जाना चाहिए। पौधे लगाना ही काफी नहीं है, उनकी सुरक्षा भी जरूरी है। योगी सरकार ज्यादा जवाबदेह है कि उसने ज्यादा पौधे लगवा दिए। गिनीज बुक में उसका नाम आ गया है। 22 करोड़ की संख्या बड़ी है। यह उत्तर प्रदेश की जनसंख्या से थोड़ा ही कम है। लेकिन इसबार तो लगाए गए पौधों की संख्या उत्तर प्रदेश की जनसंख्या से भी एक करोड़ 87 लाख अधिक हो गई है। यह संख्या आसानी से किसी के भी गले नहीं उतरती लेकिन अगर काम होगा तो वह जमीन पर तो दिखेगा ही। इस प्रदेश का हर आदमी अगर एक पौधे लगा दे तो किसी वन महोत्सव की या फिर अलग आयोजन की जरूरत भी नहीं। आलोचक वर्ग को इतनी बात तो समझ में आनी ही चाहिए। सवाल यह है कि साल दर साल जितने पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं, अगर उनके आधे भी पेड़ बन जाएं तो यूपी में पेड़ ही पेड़ नजर आएंगे।हरियाली ही हरियाली दिखेगी तो क्या आंकड़े बताने में गलती हो रही है। यह विचार का एक बिंदु हो सकता है। देश में 1861 में वन विभाग का श्रीगणेश हुआ। यूपी में 1868 में वन विभाग की स्थापना हुई। यूपी वानिकी परियोजना वर्ष 1998 में शुरू की गयी। 2001 में ग्रीन योजना शुरू की गई। ईंधन एवं चारा प्रोजेक्ट तो 1990-91 में ही आरंभ हो गया था। 1952 से ही यूपी में वन महोत्सव मनाया जा रहा है। जिसका मंत्र वाक्य है-वृक्ष का अर्थ है जल, जल का अर्थ है रोटी और रोटी का अर्थ है जीवन। स्टेट फारेस्ट रिपोर्ट -2017 बताती है कि प्रदेश में 6.09 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। वनों में पेड़ों की कटान जिस तेजी के साथ हुई है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। अगर 1952 को ही पौधरोपण का आदर्श वर्ष मानें तो यूपी को शस्यश्यामल बनाने के लिए 68 साल कम नहीं होते। इसका मतलब है कि जिम्मेदारी ठीक से निभाई नहीं गई वार्ना आज तस्वीर का रुख कुछ और होता? समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार के एक ही दिन में करोड़ों की तादाद में पौधरोपण को भाजपा का नया झूठ करार दे रहे हैं। पूछ रहे हैं कि इसके लिए जितनी जमीन चाहिए वह कहां है? एक हजार एकड़ क्षेत्र में 1.34 लाख वृक्ष लगते हैं। लगता है कि कागज पर ही पेड़ लगाकर अपना नाम दर्ज कराने का कारनामा भाजपा ने कर दिखाया है। उन्होंने दावा किया कि एक ही दिन में पांच करोड़ पौधे लगाने का रिकार्ड सपा शासन में हुआ था, जो गिनीज बुक में दर्ज है। सवाल यह उठता है कि सपा अगर चमत्कार कर सकती है तो भाजपा सरकार क्यों नहीं कर सकती?उत्तर प्रदेश की 1762 नर्सरियों में वन विभाग द्वारा 44 करोड़ पौधे तैयार करने का दावा किया है। पौधारोपण अच्छी बात है लेकिन पौधे निर्धारित मानक के अनुरूप ही लगाए जाने चाहिए तभी उसका फायदा भी है अन्यथा संख्या की होड़ में सब किया-धरा बेकार हो जाएगा। बाद में पेड़ों को काटने की नौबत न आए, इसका विचार अभी से कर लिया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। राजनीति में प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए लेकिन अनावश्यक आलोचना से बचा जाना चाहिए। सत्तारूढ़ दल को भी सोचना चाहिए कि वह सटीक आंकड़े ही दे जिससे किसी को शक न हो क्योंकि शक, विकास की राह में अक्सर बाधक बनता है। प्रदेश को आगे ले जाना है तो इसका विचार करना ही होगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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Dakhal News 6 July 2020


bhopal,Make disaster management part of life

  अरविन्द मिश्रा इन दिनों देश न सिर्फ कोरोना संकट से जूझ रहा है, बल्कि आए दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से भूकंप, बिजली गिरने और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समाचार सुनने को मिल रहे हैं। ऐसी स्थिति में आपदा प्रबंधन में सामाजिक सहभागिता के प्रयास और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में आपदा प्रबंधन को सिर्फ सरकार, प्रशासन और संबंधित प्राधिकरणों की जिम्मेदारी मान लिया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण के जरिए हर साल देश में एक करोड़ लोगों की जान बचाई जा सकती है। नीतिगत रूप से देखें तो आपदा प्रबंधन राज्य सरकार का विषय है। केंद्र सरकार नीतियां और गाइडलाइंस बनाती है। देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमओ) के साथ कई राज्य सरकारें और उनके विभाग प्राकृतिक व मनुष्य जनित विभीषिकाओं के दौरान पूरी दक्षता और संवेदनशीलता के साथ कार्य भी करते हैं लेकिन आज भी हमारे यहां आपदाओं से निपटने की तैयारी में जन सहभागिता का नितांत अभाव नजर आता है। दुर्भाग्य से स्कूल और कॉलेज के बच्चों को आपदा प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की बजाय यह विषय कुछ कक्षाओं के पाठ्यक्रम में औपचारिकता स्वरूप ही नजर आता है। वहीं, जापान, इंडोनेशिया, इजरायल और यूरोप के कई देशों में आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण लोगों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यही कारण है कि इन देशों में आपदाओं से होने वाला नुकसान भारत जैसे देशों की तुलना में काफी कम होता है। आपदा प्रबंधन को समझने के लिए सर्वप्रथम उसके दायरे को समझना होगा। आपदाएं सामान्यत: दो प्रकार की होती हैं। पहला, प्राकृतिक तथा दूसरी मानवजनित। प्राकृतिक आपदाओं में तूफान, चक्रवात, भूकंप, बाढ़, जंगल की आग, बिजली गिरने जैसी घटनाएं प्रमुख हैं। मानव जनित आपदाएं तो कई बार प्राकृतिक आपदाओं से भी खतरनाक होती हैं। ईमारत का ढह जाना, गैस रिसाव, विस्फोट, सड़क, रेल हादसे, हवाई जहाज का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना तथा परमाणु हादसे व प्रदूषण आदि भी मानवजनित आपदाओं में शामिल हैं। यहां तक की अचानक किसी व्यक्ति के बेहोश होने से लेकर ह्दयघात या ऐसी बीमारियां भी आपदाओं की श्रेणी में आती है, जिसमें आकस्मिक स्थिति में उचित प्रबंधन से व्यक्ति की जान बचाए जाने की संभावना निहित है। अर्थात आपदाएं और मानवीय जीवन एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं। आपदाओं का यदि उचित प्रबंधन न हो तो यह व्यक्ति, समाज और देश पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती हैं। कई बार जान-माल की हानि इस कदर होती है कि उसकी भरपाई करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि आपदा प्रबंधन के महत्व को समझते हुए प्रशिक्षण प्राप्त कर उसे जीवन में उतारा जाए। एक नजरिए से देखा जाए तो यह कार्य बेहद आसान है लेकिन उसे व्यवहार में लाते समय सावधानियों का तकनीकी प्रशिक्षण आवश्यक है। अन्यथा जरा-सी लापरवाही आपदा प्रबंधन के उद्देश्यों को धूमिल कर देगी। आपदा प्रबंधन का प्राथमिक सिद्धांत कहता है कि सबसे पहले हमें यह पता होना चाहिए हम जिस क्षेत्र में रह रहे हैं, वहां किस प्रकार की आपदाओं का संकट अधिक है। भारत में 59 फीसदी भूमि भूकंप प्रभावित है, वहीं 12 प्रतिशत में बाढ़ का संकट बना रहता है। घर के पास स्थित तालाब, नदी, नाले, बड़ी आधारभूत संरचनाएं जैसे पुल, रेलवे ट्रैक, राजमार्ग आदि भी आपके आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण का हिस्सा होते हैं। हमें इन संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबंधन को चरणबद्ध तरीके से अपनाना चाहिए। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा प्रसारित जागरुकता कार्यक्रम इस ओर हमें पर्याप्त बातें बताते हैं। जैसे, हमें हमेशा प्राकृतिक आपदाओं को लेकर एक फैमिली इमरजेंसी प्लान तैयार रखना चाहिए, जिसमें आपदा के समय परिवार के हर सदस्य द्वारा किए जाने वाले कार्य की भूमिका तय हो। ध्यान रहे आपातकालीन स्थिति में कौन कहां होगा, किस स्थिति में होगा, यह किसी को नहीं पता होता। ऐसे में आपात स्थिति में हम एक-दूसरे से कैसे और कहां संपर्क करेंगे, यह आवश्यक होता है। हम कैसे और कहां मिलेंगे, भूकंप या बाढ़ में हमारा मीटिंग प्वाइंट क्या होगा, इसकी जानकारी परिवार के सभी सदस्यों को होनी चाहिए। संपर्क का पहला स्थल घर के बाहर होना चाहिए, वहीं दूसरा मीटिंग प्वाइंट शहर से दूर रहे तो बेहतर होगा। परिवार के सभी सदस्य इस स्थल से परिचित हों, यह सुनिश्चित करें। एक अन्य जानकारी जो घर के सभी सदस्यों को होनी चाहिए वह किन्हीं एक-दो रिश्तेदारों के फोन नंबर याद होना चाहिए। बच्चों को भी मोबाइल आदि से मैसेज भेजना सिखाएं। इससे आप विषम परिस्थिति में अपनी सही जानकारी उनतक पहुंचा सकेंगे। ऐसा देखने में आया है कि प्राकृतिक आपदाओं के समय आपदा स्थल के निकट की संचार व्यवस्थाएं नष्ट हो जाती हैं लेकिन कुछ किलोमीटर दूरी पर दूरसंचार व्यवस्थाएं अप्रभावित रहती हैं। आपदा प्रबंधन के दूसरे चरण में, आपके घर में हमेशा एक डिजास्टर किट तैयार होनी चाहिए। इस डिजास्टर किट में कुछ वस्तुएं जैसे पानी की बोतल, दवाएं, फर्स्ट एड की सामग्री, टॉर्च, रेडियो, बैटरी, आपके आवश्यक दस्तावेज आधार कार्ड, आपके स्वास्थ्य की जानाकारी देने वाले दवाओं के पर्चे आदि रखे हों। इसके साथ ही मोबाइल पर अलर्ट सर्विस भी सब्सक्राइव करना चाहिए। आजकल भारत सरकार द्वारा बहुत सी प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व सूचना की जानकारी मुहैया कराई जा रही है। घर से निकलते समय बिजली, गैस सिलेंडर आदि बंद कर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। घर से निकलते समय पूर्व बनाई गई योजना में यह तय होना चाहिए कि कौन-सा व्यक्ति क्या करेगा। जैसे बिजली के स्विच बंद करने से लेकर, चाभी निकालने, डिजास्टर किट लेने तक की जिम्मेदारी बंटी होनी चाहिए। आपदाओं के समय हर एक क्षण कीमती होता है। इन दिनों मानसून का सीजन है, देश के कई हिस्सों में बाढ़ और बिजली गिरने का का खतरा रहता है। ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में शिक्षित युवाओं को लोगों को छोटे-छोटे जागरुकता कार्यक्रम के जरिए ऐसी आपदाओं से बचाव के टिप्स देने चाहिए। यदि डूब क्षेत्र में घर हो तो बरसात के दिनों में समय रहते सुरक्षित स्थानों पर चले जाना चाहिए। घर से बाहर निकलते समय जूते पहनकर और हाथ में डंडा लेकर ही निकलें। रात के समय टॉर्च आदि अनिवार्य रूप से हाथ में होनी चाहिए। अक्सर हमने देखा है कि लोग बारिश के वक्त पेड़ों के नीचे खड़े रहते हैं, जबकि प्रयास करना चाहिए कि आप जितना जल्दी हो सके सुरक्षित व सूखे जगह पर खड़े हों। इन दिनों जल आपूर्ति तंत्र बुरी तरह प्रदूषित हो जाता है, ऐसे में पानी में क्लोरीन की गोलियां डाल दें या फिर उबला हुआ जल ही पीना चाहिए। आज शहरों में जल निकासी के लिए जिस प्रकार नालियों का जाल बिछाया गया है, ऐसे में सड़क पर चलते समय सावधानी बरतें। सामान्यत: जल निकासी के लिए बनाई गई पाइपलाइन और गटर आदि के ऊपर पैर नहीं रखना चाहिए। यह छोटी बातें होती हैं, लेकिन आए दिन लोगों की मौत की वजह बन जाते हैं। आपका घर शहरी इलाके में हो या ग्रामीण हिस्से में, घर में अनिवार्य रूप से फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस, पुलिस थाने आदि के नंबर चस्पा होने चाहिए। यह कुछ ऐसी बातें और प्रशिक्षण हैं जिससे जुड़े तथ्य, सूचना और संचार के इस युग में हर जगह आपको आसानी से मिल जाएंगे। केंद्र और राज्य सरकारों के संबंधित विभाग सिविल सोसाइटी की मदद से आपदा प्रबंधन के विषय को जन-जन के जीवन का हिस्सा बनाएं। इसके साथ ही एक आदर्श नागरिक के रूप में हम सभी को आपदाओं से निपटने की छोटी-छोटी तकनीकी जानकारी अनिवार्य रूप से हासिल करनी होगी। आपदाओं से होने वाली व्यापक जन-धन की हानि को कम करने का यह सबसे सशक्त माध्यम है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 6 July 2020


bhopal, Modi

डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक लद्दाख का दौरा कर डाला. अचानक इसलिए कि यह दौरा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को करना था. इस दौरे को रद्द करके मोदी स्वयं लद्दाख पहुंच गए. विपक्षी दल इस दौरे पर विचित्र सवाल खड़े कर रहे हैं. कांग्रेसी नेता कह रहे हैं कि 1971 में इंदिरा गांधी ने भी लद्दाख का दौरा किया था लेकिन उसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए. अब मोदी क्या करेंगे? कांग्रेसी नेता आखिर चाहते क्या हैं? क्या भारत चीन पर हमला कर दे? तिब्बत को आजाद करा दे? अक्साई चिन को चीन से छीन ले? सिंक्यांग के मुसलमानों को चीन के चंगुल से बाहर निकाल ले? सबसे दुखद बात यह है कि भारत और चीन के बीच तो समझौता-वार्ता चल रही है लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बीच वाग्युद्ध चल रहा है. कांग्रेस के नेता यह क्यों नहीं मानते कि मोदी के इस लद्दाख-दौरे से हमारे सैनिकों का मनोबल बढ़ेगा? मुझे नहीं लगता कि मोदी लद्दाख इसलिए गए हैं कि वे चीन को युद्ध का संदेश देना चाहते हैं. उनका उद्देश्य हमारी सेना और देश को यह बताना है कि हमारे सैनिकों की जो कुर्बानियां हुई हैं, उस पर उन्हें गहरा दुख है. उन्होंने अपने भाषण में चाहे चीन का नाम नहीं लिया लेकिन अपने फौजियों को इतना प्रेरणादायक और मार्मिक भाषण दिया कि वैसा भाषण आजतक शायद किसी भी अन्य प्रधानमंत्री ने नहीं दिया. मोदी पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे अत्यंत प्रचारप्रिय प्रधानमंत्री हैं. इस लद्दाख दौरे को वे अपनी छवि बनाने के लिए भुना रहे हैं लेकिन भारत में कौन प्रधानमंत्री ऐसा रहा है (एक-दो अपवादों को छोड़कर), जो अपने मंत्रियों और पार्टी-नेताओं को अपने से ज्यादा चमकने देता है? यह दौरा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह भी कर सकते थे लेकिन मोदी के करने से चीन को भी एक नरम-सा संदेश जा सकता है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बधाई देने और अरबों रु. के रूसी हथियारों के सौदे के बाद मोदी का लद्दाख पहुंचना चीनी नेतृत्व को यह संदेश देता है कि सीमा-विवाद को तूल देना ठीक नहीं होगा. मोदी के इस लद्दाख-दौरे को भारत-चीन युद्ध का पूर्वाभ्यास कहना अनुचित होगा. अगर आज युद्ध की ज़रा-भी संभावना होती तो क्या चीन चुप बैठता? चीन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मुंह पर मास्क क्यों लगा रखा है? वे भारत के विरुद्ध एक शब्द क्यों नहीं बोल रहे हैं? क्योंकि भारत और चीन, दोनों परमाणुशक्ति राष्ट्र आज इस स्थिति में नहीं हैं कि कामचलाऊ सीमा-रेखा के आर-पार की थोड़ी-सी जमीन के लिए लड़ मरें. (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं.)

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Dakhal News 5 July 2020


bhopal, Why goon-rk sinha outweighs the police

आर.के. सिन्हा उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक शहर कानपुर में राज्य पुलिस के एक डीएसपी समेत आठ जवानों का गुंडागर्दी का शिकार होकर शहीद होना चीख-चीखकर कह रहा है कि देश में खाकी का भय खत्म होता जा रहा है. कानपुर न तो कश्मीर है और न ही नक्सल प्रभावित इलाका. इसके बावजूद रात में बदमाशों की फायरिंग में आठ जवानों के मारे जाने से बहुत से सवाल खड़े हो रहे हैं. शहीद पुलिस वाले हिस्ट्रीशीटर विकास दूबे को गिरफ्तार करने गए थे. उसके बाद वहां जो कुछ हुआ वह सबको पता है. विकास दूबे और उसके गुर्गे अब बचेंगे तो नहीं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अचानक पुलिस पर हिंसक हमले क्यों बढ़ रहे हैं? मौजूदा कोरोना काल के दौरान भी पुलिस पर हमले हो रहे हैं. जबकि देश भर में पुलिस का अति संवेदनशील और मानवीय चेहरा उभरकर सामने आया है. कुछ समय पहले पंजाब में एक सब इंस्पेक्टर का हाथ काट दिया गया था. उसका आरोप था कि उसने पटियाला में बिना पास के सब्जी मंडी के अंदर जाने से कुछ निहंगों को रोका था. रोका इसलिए था क्योंकि तब कोरोना के संक्रमण चेन तोड़ने के लिए सख्त लॉकडाउन की प्रक्रिया चल रही थी. बस इतनी-सी बात पर निहंगों ने उस पुलिस कर्मी का हाथ ही काटकर अलग कर दिया था. हमलावर निहंग हमला करने के बाद एक गुरुद्वारे में जाकर छिप गए थे. गुरुद्वारे से आरोपियों ने फायरिंग भी की और पुलिसवालों को वहां से चले जाने के लिए कह रहे थे. खैर, उन हमलावर निहंगों को पकड़ लिया गया था. पर जरा उनकी हिम्मत देखिए. कुछ इसी तरह की स्थिति तब बनी थी जब पीतल नगरी मुरादाबाद में कोरोना रोगियों के इलाज के लिए गए एक डॉक्टर पर उत्पाती भीड़ द्वारा सुनियोजित हमला बोला गया. उस हमले में डॉक्टर लहूलुहान हो गये थे. खून से लथपथ उनके चेहरे को सारे देश ने देखा था. सोचने वाली बात यह है कि अगर पुलिस का भय आम आदमी के जेहन से उतर गया तो फिर बचेगा क्या? क्या हम जंगलराज की तरफ बढ़ रहे हैं? कोई देश कानून और संविधान के रास्ते पर ही चल सकता है. गुंडे-मवालियों का पुलिस को अपना बार-बार शिकार बनाना इस बात का ठोस संकेत है कि पुलिस को अपने कर्तव्य के निवर्हन के लिए नए सिरे से सोचना होगा. क्या यह माना जाए कि पुलिस महकमे में कमजोरी आई है, जिसके चलते पुलिस का भय सामान्य नागरिकों के जेहन से खत्म हो रहा है? कानपुर की घटना से कुछ दिन पहले हरियाणा के सोनीपत जिले में गश्त कर रहे 2 पुलिसवालों की भी हत्या कर दी गई थी. दोनों पुलिसकर्मियों को शहीद का दर्जा दिया जा रहा है. यह उचित निर्णय है. दोनों पुलिसवालों एसपीओ कप्तान व हवलदार रविंद्र के शव बुरी तरह से क्षत-विक्षत थे. प्रथम दृष्टया जो बात सामने आ रही है उसके मुताबिक, दोनों पुलिसवालों की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई लगती है. गौर करें कि बदमाशों ने चौकी से थोड़ी ही दूर पर इस वारदात को अंजाम दिया. यानी कहीं भी पुलिस का डर दिखाई नहीं दे रहा है. अपराधियों के दिलो-दिमाग में पुलिस का भय फिर से पैदा करने के लिए जरूरी है कि सर्वप्रथम सभी राज्यों में पुलिसकर्मियों के खाली पद भरे जाएं. पुलिस वालों की ड्यूटी का निश्चित टाइम भी तय हो. आबादी और पुलिसकर्मियों का अनुपात तय हो. शातिर अपराधियों को पुलिस का रत्ती भर खौफ नहीं रहा. ये बेखौफ हो चुके हैं. ये पुलिस वालों की हत्या करने से तनिक भी परहेज नहीं करते. अब पुलिस को अधिक चुस्त होना पड़ेगा. अगर कानून की रक्षा करने वाले पुलिसकर्मी ही अपराधियों से मार खाने लगेंगे तो फिर सामान्य नागरिक कहां जाएगा? कानपुर की भयानक घटना के कारणों पर चर्चा करते हुए इतना कहना होगा कि जब स्थानीय पुलिस को इस बात की पूरी जानकारी थी कि दूबे के पास भी एक निजी छोटी सेना और स्वचलित हथियार हैं तो फिर पुलिस क्यों रात 1:30 बजे बिना पूरी तैयारी के साथ गई? यह एक बड़ा सवाल है. स्पष्ट है कि दूबे के गैंग को जानकारी थी कि उनपर हमला हो सकता है. इसलिए उसने पुलिस बल पर उनके पहुंचते ही ताबड़तोड़ हमला कर दिया. यानी पुलिस प्रशासन के अंदर ही कुछ लोग दूबे के लिए निश्चित रूप से मुखबिरी कर रहे थे. अब खबरें आ रही हैं कि आरोप है कि यही दूबे एक राज्यमंत्री को थाने में ही मरवा देता है. इसके बावजूद उसे उस मामले में सेशन कोर्ट से बरी कर दिया जाता है, साक्ष्यों के अभाव में. क्या यह उस समय की पुलिस और प्रशासन की नाकामी नहीं है? यह नाकामियां और अपराधियों से मिलीभगत ही आज भारी पड़ गई कुछ परिवारों पर. अगर आप पटियाला से लेकर कानपुर, मुरादाबाद आदि की घटनाओं का बारीकी से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि जब-जब पुलिस पर हमले हुए या उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा तब तो मानवाधिकार संगठनों और वामपंथी सेक्यूलर वादियों ने कोई प्रतिक्रिया तक देना मुनासिब नहीं माना. मानवाधिकारवादी संगठनों के इस चरित्र को देश पंजाब में आतंकवाद के दौर से ही करीब से देख रहा है. अगर आतंकी या अपराधी मारा गया तो ये उनके हकों की बात उठाने के लिए तुरंत कूद पड़ते हैं लेकिन जब पुलिस वाला मारा जाता है तब ये नदारद हो जाते हैं. इनका यह दोगला चरित्र अब सबकी समझ में आ रहा है. क्या पुलिसवाले का हक नहीं है? क्या वह इंसान नहीं है? खैर, इनके चरित्र को देश ने कई बार देख लिया. मुझे याद है कि लगभग बीस वर्ष पूर्व दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में वामपंथी मानवाधिकारियों ने एक सेमिनार आयोजित किया था. उन दिनों सर्वोच्च न्यायलय में मुख्य न्यायाधीश के बाद वरिष्ठतम न्यायधीश न्यायमूर्ति पसायत होते थे. उन्हें अध्यक्षता के लिए बुलाया गया था. मैं न्यायमूर्ति पसायत को सुनना चाहता था. अत: पहुँच गया. एक-एक कर सारे वक्ता सरकार और पुलिस पर छूटकर गालियों की बौछार कर रहे थे. ज्यादातर झोलाधारी वामपंथी तालियों की गड़गड़ाहट कर रहे थे. अंत में जस्टिस पसायत ने संक्षिप्त अध्यक्षीय भाषण दिया जो आज के सन्दर्भ में भी मार्गदर्शन कर सकता है. उन्होंने कहा, “मानवाधिकार एक अच्छी चीज है. समस्त मानव जाति और कानून मानने वाले सभी नागरिकों को मानवाधिकार प्राप्त होना ही चाहिये. लेकिन, उन अपराधियों, उग्रवादियों, आतंकवादियों, नक्सलियों के लिए मानवाधिकार कैसा जो मानव जैसा व्यवहार ही नहीं करते.” देखिए कानपुर की घटना के बहाने सारे देश की पुलिस पर बात करनी जरूरी है. सभी जगह से काहिल, करप्ट और कामचोर पुलिस वालों को बाहर करना होगा. पुलिस वालों को आम आदमी के साथ खड़ा होना होगा. कोराना काल में पुलिस की सराहनीय भूमिका को देश ने देखा है. पुलिस के सम्मान की बहाली जरूरी है. अन्यथा देश के कानून में यकीन रखने वाले नागरिकों के लिए देश में रहना कठिन हो जाएगा. सरकार को इनकी सेवा शर्तों में और सुधार करने होंगे. पुलिस वालों को ज्यादा अधिकार और बेहतर हथियार देने होंगे. आत्म रक्षार्थ गोली चलाने की छूट देनी होगी. मानवाधिकारों को पुनः परिभाषित करना होगा. तभी पुलिस बल स्वतंत्र होकर कार्य कर सकेगी. अब भी एक सामान्य पुलिस वाले को दिन में कम-से-कम 12 घंटे तक मुस्तैद रहना होता है. कभी-कभी तो उससे भी ज्यादा. बहुत साफ बात है कि कोई भी शख्स रोज 12-12 घंटे काम नहीं कर सकता. अगर आप उससे इतना काम लेंगे तो वह टूट जाएगा. यानी देश को अपनी पुलिस को फिर से एक सशक्त और कारगर बल के रूप में खड़ा करना होगा. (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं.)

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Dakhal News 5 July 2020


bhopal,Baloch on the path of terror

  प्रमोद भार्गव जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, एकदिन वही उसमें गिरता है। पाकिस्तान का यही हश्र होता दिखाई दे रहा है। कराची में पाकिस्तान के सबसे पुराने और इकलौते 'पाकिस्तान स्टॉेक एक्सचेंज' पर आतंकियों ने बड़ा हमला बोला है। हमलावर पाक के मित्र चीन के सुरक्षा बलों द्वारा पहनने वाली वर्दी पहने हुए थे। कार से पहुंचे इन हमलावरों ने इमारत में दाखिल होने से पहले हथगोले फेंके और एके-47 से फायरिंग की। इस हमले में कुल 11 लोग मारे गए हैं। हमलावर बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की माजिद ब्रिग्रेड के सदस्य थे। पुलिस ने चारों हमलावरों को मार गिराया। इनके पास से बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री मिली है। बलूचिस्तान में बीएलए लंबे समय से पाकिस्तान से मुक्ति के लिए अलगाववादी आंदोलन चला रही है। लेकिन बलूचिस्तान से बाहर कराची जैसे शहर में आतंकी चेहरे के रूप में यह शायद पहली बार देखने में आई है। महजबी गर्भ से उपजे आतंकवादियों ने पाकिस्तान के पेशावर में भी कुछ साल पहले बड़ा हमला बोला था। यह हमला सैनिक पाठशाला में बोला गया था। करीब डेढ़ सौ छात्रों को एक कतार में खड़ा करके मौत के घाट उतार दिया था। निर्दोष व निहत्थे बचपन को खून में बदलने वाले ये हत्यारे वाकई दरिंदे थे क्योंकि इन्होंने वारदात की जिम्मेदारी लेने में एक तो देरी नहीं की थी। दूसरे उन्होंने क्रूर मंशा जताते कह भी दिया कि 'फौजियों के बच्चों को इसलिए मारा गया है, ताकि तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ वजीरिस्तान में पाक फौज जो मुहिम चला रही है, पाक सैनिक अपनों के मरने की पीड़ा को समझ सकें।' जाहिर है, ये नए-नए आतंकी गिरोह खड़े करके अपने घिनौने और बर्बर मंसूबों को हिंसक वारदातों से साधने में लगे हैं। लिहाजा इस पागलपन का इलाज अब वैश्विक स्तर पर खोजना जरूरी है। कराची के पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में खेली इस खूनी होली को पाकिस्तान को एक बड़ी चेतावनी के रूप में लेने की जरुरत है। क्योंकि जिन्हें उसने भारत के खिलाफ खड़ा किया था, अब वे उसी के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं। हालांकि यह घटना उसी के बोए बीजों का परिणाम है। इन बीजों को जमीन में डालते वक्त पाकिस्तान ने यह कतई नहीं सोचा होगा कि ये कल विष-फल निकलेंगे। इनके विषैले होने का पाकिस्तान को अब पता चल रहा है। एक बार आतंकियों ने पाक सेना के कराची हवाई हड्डे पर हमला बोलकर उसे कब्जाने की कोशिश की थी। दरअसल बलूचिस्तान ने 73 साल पहले हुए पाक में विलय को कभी स्वीकार नहीं किया। पाक की कुल भूमि का 40 फीसदी हिस्सा बलूचिस्तान में है। करीब 1 करोड़ 30 लाख की आबादी वाले इस हिस्से में सर्वाधिक बलूच हैं। पाक और ब्लूचिस्तान के बीच संघर्ष 1945, 1958, 1962-63, 1973-77 में होता रहा है। 77 में पाक द्वारा दमन के बाद करीब 2 दशक तक शांति रही। लेकिन 1999 में परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने बलूच भूमि पर सैनिक अड्डे खोल दिए। इसे बलूचों ने अपने क्षेत्र पर कब्जे की कोशिश माना और फिर से संघर्ष तेज हो गया। इसके बाद यहां कई अलगाववादी आंदोलन वजूद में आ गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी है। इसी ने कराची के स्टॉक एक्सचेंज पर खूनी हमला बोला। साफ है, बलूचों का अलगाववादी आंदोलन अब आतंकी हमलों के रूप में आगे बढ़ रहा है। वैसे भी इस पूरे क्षेत्र मेंं अलगाव की आग निरंतर सुलग रही है। नतीजतन 2001 में यहां 50 हजार लोगों की हत्या पाक सेना ने कर दी थी। इसके बाद 2006 में अत्याचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करनेवाले 20 हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को अगवाकर लिया गया था, जिनका आजतक पता नहीं है। 2015 में 157 लोगों के अंग-भंगकर दिए थे। फिलहाल बलूचिस्तान के जाने-माने एक्टिविस्ट बाबा जान इन मुद्दों को विभिन्न मंचों से उठाते रहते हैं। पिछले 18 साल से जारी दमन की इस सूची का खुलासा एक अमेरिकी संस्था 'गिलगिट-बलूचिस्तान नेशनल कांग्रेस' ने किया है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और बलूचिस्तान में लोगों पर होने वाले जुल्म एवं अत्याचार के बाबत पाक को दुनिया के समक्ष जवाब देना होगा। कालांतर में उसे इस क्षेत्र को मुक्त भी करना होगा? यह सही है कि जब राजा हरि सिंह कश्मीर के शासक थे, तब पाकिस्तानी कबाइलियों ने अचानक हमला करके कश्मीर का कुछ हिस्सा कब्जा लिया था। तभी से पाकिस्तान उसे अपना बताता आ रहा है, जो पूरी तरह असत्य है। गोया, पाक अधिकृत कश्मीर न केवल भारत का है, बल्कि वहां के लोग गुलाम कश्मीर को भारत में शामिल करने के पक्ष में भी आ रहे हैंं। पाक अधिकृत कश्मीर में पाक सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार होते रहते हैं। इसकी वजह, वहां हो रहे नागरिकों का शोषण और दमन है। इस दमन की तस्वीरें व वीडियो निरंतर मीडिया में सुर्खियां बनते रहते हैं। गिलगित और बलूचिस्तान पर पाक ने सेना के बूते अवैध कब्जा कर लिया था, तभी से यहां राजनीतिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक समाज का दमन किया जा रहा है। यह आग अस्तोर, दियामिर और हुनजासमेत उन सब इलाकों में सुलग रही है, जो शिया बहुल हैं। सुन्नी बहुल पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुस्लिमों समेत सभी धार्मिक अल्पसंख्यक प्रताड़ित किए जा रहे हैं। अहमदिया मुस्लिमों के साथ तो पाक के मुस्लिम समाज और हुकूमत ने भी ज्यादती बरती है। 1947 में उन्हें गैर मुस्लिम घोषित कर दिया गया था। तबसे वे पाकिस्तान में न केवल बेगाने हैं, बल्कि मजहबी चरमपंथियों के निशाने पर भी हैं। पीओके और बलूचिस्तान पाक के लिए बहिष्कृत क्षेत्र हैं। पीओके की जमीन का इस्तेमाल वह, जहां भारत के खिलाफ शिविर लगाकर गरीब व लाचार मुस्लिम किशोरों को आतंकवादी बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है, वहीं बलूचिस्तान की भूमि से खनिज व तेल का दोहनकर अपनी आर्थिक स्थिति बहाल किए हुए है। अकेले मुजफ्फराबाद में 62 आतंकी शिविर हैं। यहां के लोगों पर हमेशा पुलिसिया हथकंडे तारी रहते हैं। यहां महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं है। गरीब महिलाओं को जबरन वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेल दिया जाता है। 50 फीसदी नौजवानों के पास रोजगार नहीं है। 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। 88 प्रतिशत क्षेत्र में पहुंच मार्ग नहीं है। बावजूद पाकिस्तान पिछले 73 साल से यहां के लोगों का बेरहमी से खून चूसने में लगा है। जो व्यक्ति अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है उसे सेना, पुलिस या फिर आइएसआई उठा ले जाती है। पूरे पाक में शिया मस्जिदों पर हो रहे हमलों के कारण पीओके के लोग मानसिक रूप से आतंकित हैं। दूसरी तरफ पीओके के निकट खैबूर पख्तूनख्वा प्रांत और कबाइली इलाकों में पाक फौज और तालिबानियों के बीच अक्सर संघर्ष जारी रहता है, इसका असर गुलाम कश्मीर को भोगना पड़ता है। नतीजतन यहां खेती-किसानी, उद्योग-धंधे, शिक्षा-रोजगार और स्वास्थ्य-सुविधाएं तथा पर्यटन सब चौपट हैे। गोया यहां के लोग पाकिस्तान से स्वतंत्रता की राह तलाश रहे हैं। कराची में लिखी गई खूनी इबारत इसी मंशा की पर्याय है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 4 July 2020


bhopal,It is worrying that millions of students fail in Hindi

  डॉ. रमेश ठाकुर   अपनी मातृभाषा हिंदी के साथ हमारा रवैया क्या है, उसकी डरावनी तस्वीर सामने आयी है। बीते 27 जून को घोषित उत्तर प्रदेश के हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा परिणामों में कई लाख छात्र हिंदी विषय में फेल हो गए। निःस्संदेह देश के सबसे बड़े हिंदीभाषी सूबे से यह संकेत चिंता बढ़ाने वाला है। हिंदुस्तान को हिंदी का मायका कहा गया है। इसी मिट्टी में उसका जन्म हुआ लेकिन लगातार तीन वर्षों से छात्रों का हिंदी में कम अंक लाना, गंभीर चिंता पैदा करता है। उत्तर प्रदेश की हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा में 7,97,826 परीक्षार्थी अनिवार्य विषय हिंदी में असफल होना, बेहद खतरनाक संकेत है। पिछले दो वर्ष तो इससे भी बुरे रहे। 2018 में दस लाख तो 2019 में हाईस्कूल और इंटर दोनों मिलाकर 9,98,250 परीक्षार्थी हिंदी में धराशायी हुए थे। यह सिलसिला इसबार भी जारी रहा। 10वीं में सर्वाधिक 5,27,866 और 12वीं में 2,69,960 परीक्षार्थी हिंदी में फेल बताए गए हैं।   हिंदी से हमारी सांस्कृतिक पहचान है। हिंदी, हिंद और हिंदुस्तान तीनों का आपस में गंगा-जमुना जैसा संगम रहा है। फिर क्यों हिंदी का मान दिनोंदिन गिर रहा है। हमारी घरेलू और देसी जुबान क्यों दूसरी भाषाओं के आगे उपेक्षित हो रही हैं। युवा पीढ़ी क्यों हिंदी को पसंद नहीं करती। अगर ऐसा ही रहा तो एकाध दशकों बाद हिंदी खुद के वजूद के लिए संघर्ष करती दिखाई देने लगेगी। वैसे भी कई क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त हो ही चुकी हैं। अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं का हिंदुस्तान में प्रसार हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन कम से कम हिंदी के लिए मुसीबत तो न बनें। क्यों लोग हिंदी को त्यागकर अंग्रेजी अपनाने को लालायित हैं।   इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि अंग्रेजी के प्रति बढ़ते मोह ने छात्रों-अभिभावकों को कहां लाकर खड़ा कर दिया। इस तस्वीर पर गौर से सोचें तो पता चलता है कि हिंदी के प्रति पहले जैसी गंभीरता अब न छात्रों में रही और न शिक्षकों में। हिंदी का युग बदल चुका है। छात्रों के लिए हिंदी उनकी प्राथमिकताओं से दूर हो चुकी है। सोचने वाली बात है, जिस राज्य ने देश को उच्च चोटी के हिंदी के विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार, वहां के लोग अब हिंदी से लगाव नहीं रखते। अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व ने हिंदी के प्रति विमुख बना दिया है। प्रत्येक अभिभावकों की यही चाहत होती है कि बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोले। हुकूमतें या संपन्न लोग, हिंदी को बढ़ावा देने की बातें तो करते हैं पर सच्चाई यह भी है कि अपने बच्चों को टाॅप के इंग्लिश स्कूलों में ही पढ़ाते हैं। हिंदी सिर्फ नारों तक सिमटती जा रही है।   गौरतलब है, पश्चिमी हवा जिस गति से हमारे यहां चल रही है उसमें देसी और खांटी की परंपरागत संस्कृति उड़ती जा रही है। यही कारण है, बदलते माहौल में लोग हिंदी भाषा को कमतर रूप में देखने लगे हैं। अंग्रेजी का चारों ओर बोलबाला है। जिसे अंग्रेजी पढ़नी-बोलनी आती है उसे बेहद शिक्षित समझा जाता है, फिर चाहे उसे दूसरी भाषाओं को ज्ञान कतई न हो। वहीं, ठेठ हिंदी बोलने वाला, चाहे कितना भी निपुण क्यों न हो, उसे देहाती ही समझा जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं छात्रों के दिलो-दिमाग में ये बात घर करती जा रही है कि हिंदी के बूते भविष्य में रोजी-रोटी का जुगाड़ करना शायद संभव नहीं इसलिए उसी रास्ते पर चला जाए, जिसपर दूसरे लोग हैं। दिक्कत यहीं से शुरू हुई, जब लोगों यह महसूस करना आरंभ किया, हिंदी से उन्होंने पीछा छुड़ाना शुरू कर दिया। अपने बच्चों को हिंदी मीडियम स्कूलों की जगह अंग्रेजी मीडियमों में पढ़ाना आरंभ कर दिया।   अंग्रेजी के प्रति लोगों का मोह ज्यादा पुराना नहीं बल्कि दो दशक पहले से शुरू हुआ, जो इस वक्त कहां आकर रुका है। प्रतिदिन दो सौ रुपए कमाने वाला रिक्शा चालक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी का ज्ञान दिलवाना चाहता है। अंग्रेजी अब शहरों तक सीमित नहीं रही, उसकी जड़ें गांव-कस्बों तक फैल गई हैं। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा में एक साथ लाखों बच्चों का हिंदी में फेल होना दर्शाता है कि आने वाला वक्त हिंदी के लिए कैसा होने वाला है। इसे लेकर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी का हाल संस्कृत जैसा होगा। 21वीं सदी में जन्म लेने वाले बच्चे संस्कृत भाषा से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा जैसे हिंदी पट्टी राज्यों में हमेशा से हिंदी का बोलबाला रहा है लेकिन एकाध दशकों में वहां के हालात एकदम बदले। हिंदी भाषी राज्य उत्तर प्रदेश में हाईस्कूल व इंटरमीडियट में हजार नहीं, लाख नहीं बल्कि एकसाथ कई लाख छात्र अपनी मातृभाषा हिंदी में मात खा गए।   हिंदी के प्रचार-प्रसार में केंद्र सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही। छह वर्ष पूर्व जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने वित्त-फाइनेंस जैसे मंत्रालयों में भी बोलचाल के तौर पर हिंदी को अनिवार्य किया। दूसरे मंत्रालयों में भी यही नियम लागू किया गया। बावजूद इसके हिंदी की ऐसी दुर्दशा हो गई। परीक्षाओं में हिंदी विषय में कई लाख छात्रों के असफल होने और हमारी राष्ट्रभाषा के नारों के बीच ये स्थिति बताती है कि हिंदी को लेकर न सिर्फ छात्र बेखबर हैं बल्कि शिक्षक-अभिभावक भी अब पहले जैसे गंभीर नहीं हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 July 2020


bhopal, China

  ऋतुपर्ण दवे कहते हैं कि किसी की हेकड़ी और औकात दोनों ही नाप दी जाए तो उसे अपनी हैसियत समझ आती है। चीन के साथ ऐसा ही हुआ। वह भी तब जब अभी उसके साथ हुए अधिकतर व्यापारिक समझौते प्रतिबंधित नहीं हुए हैं। महज 59 चीनी ऐप क्या बैन हो गए उसको अपना डूबता भविष्य नजर आने लगा। बहुत जल्द प्रतिक्रिया न देने और खामोशी से काम करने वाली चीनी सरकार के मुँह इस मामले में अचानक खुल गए। यह वही चीन है जिसकी नीयत उसी समय समझ आ गई थी जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इसके लिए जिम्मेदार पाकिस्तान का नाम उसने अपने एक ऐप में नहीं आने दिया। जबकि वहाँ कार्यरत भारतीय कर्मचारी ने इसके लिए अपने वरिष्ठ से पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा कि देख लो पर ऐसा कर नहीं पाओगे क्योंकि सारा कंट्रोल उन चाइनीज मशीनों से है, जिनका सर्वर चीन में लगा है। ऐप्स के कंटेंट जांचने के लिए ऑटोमेटिक इण्टेलीजेंस का सहारा लिया जाता है जिससे हर वह मैटरियल खुद हट जाता है जिसको उसे डेवलप करने वाला नहीं चाहता है। जाहिर है भारतीय कर्मचारी बेबस था। लेकिन कोई अकेला मामला नहीं है। कुछ चीनी ऐप ने पहले भी कई मौकों पर प्रधानमंत्री के बयान तक हटाए थे। इधर देश के आईटी मंत्रालय ने चीन की हरकतों को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से शत्रुता का भाव बताते हुए ऐप के जरिए आम भारतीयों के आंकड़ों को सहेजना और उनके सूक्ष्म विश्लेषण करने के प्रयासों को देश की संप्रुभता और अखण्डता पर आघात बताते हुए बहुत ही गंभीर मामला कहते हुए न केवल चिन्ता जताई बल्कि आईटी कानूनों और नियमों के तहत धारा 69-ए के तहत तत्काल प्रभाव से ऐसे ऐप्स को तुरंत बैन भी कर दिया। अगर आपने भी कभी कोई चीनी ऐप अपने मोबाइल पर डाउनलोड किया होगा तो पाया होगा कि प्राइवेसी से इतर वह कई जानकारियों की इजाजत मांगता है जिन्हें हम बिना दूर की सोचे आसानी से दे भी देते हैं। साइबर दुनिया का बेताज बादशाह बनने की तरफ बढ़ रहा चीन अपने ऐसे ऐप्स के जरिए न केवल निजी जानकारियाँ हासिल करता है बल्कि वह उस ऐप के जरिए कहाँ और किससे हुई बातचीत तक सुन सकता है। निश्चित रूप से अनभिज्ञ लोग खुद ही अनुमति देकर अपने सारे डेटा आसानी से चीनी सर्वर में इकट्ठा करवा रहे हैं। महज एक अकेले आदेश से 59 चीनी ऐप्स प्रतिबंधित क्या हुए चीन की बिलबिलाहट समझ आ गई जबकि यह तो शुरुआत है। हो भी क्यों न, दुनिया भर में हर तरह सेअकेला व्यापारिक साम्राज्य स्थापित करने की मंशा रखने वाले चीन को उसके गंदे धंधे से हो रहा नुकसान भी नागवार गुजरा और वह अब अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का हवाला देकर अपनी सफाई देने लगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि चीन खुद अपने देश के लोगों को क्यों नहीं दूसरों के ऐप्स और वेबसाइट्स के इस्तेमाल की इजाजत देता है? खुद दुनिया भर में अपने ऐसे ऐप्स के जरिए अपनी दखल रखना तो चाहता है लेकिन जब खुद पर आती है तो चीनियों को उनकी देशभक्ति सिखाता है। आज दुनिया भर से यह सवाल उठ रहे हैं कि क्यों नहीं चीन में गूगल, फेसबुक, वाट्सऐप, ट्वीटर, इन्टाग्राम का उपयोग किया जा रहा है? सबको पता है कि इसका जवाब न तो चीन ने पहले दिया था और न आगे देगा। अब अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की दुहाई देने वाले चीन से दुनिया को पूछना चाहिए कि वह खुद कहाँ के कानूनों से नियंत्रित है? यह सच है कि चीनी ऐप्स का जाल पूरी दुनिया में फैला हुआ है। शायद ही कोई देश इससे अछूता हो। इन ऐप्स के जरिए लगभग हर देश में उसने लंबा निवेश किया है। चीनी ऐप्स ने भारत में ही हजारों करोड़ का निवेश कर रखा है। बैन से उसकी साँसें उखड़ना स्वाभाविक है। चीन की साजिश अपने लोकप्रिय ऐप्स के जरिए ही चलती हो ऐसा भी नहीं। कम लोगों को पता होगा कि दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू व दूसरे आईटी प्रमुख भारतीय शहरों में चीनी कंपनियाँ वहाँ के स्थानीय निवासियों से ऐप्स डेवलेप कराती हैं और मार्केट में उन्ही के नाम से लाती हैं। जब ये ऐप्स लोकप्रिय होने लग जाते हैं तो अपने अनुबंधों के तहत उन्हें टेकओवर कर लेती हैं। इस तरह कई बार महज भारतीय नाम के धोखे की वजह से अनजाने ही लोग भारतीय ऐप्स समझ कर चीनी ऐप्स अपने मोबाइल पर डाउनलोड कर लेते हैं। वेंचर इंटेलिजेंस के अनुसार अलीबाबा, टेंसेंट, हिलहाउस कैपिटल और टीआर कैपिटल सहित चीनी निवेशकों ने पिछले 4 वर्षों में भारत के स्टार्टअप कंपनी क्षेत्र में 5.5अरब डॉलर का भारी भरकम निवेश किया है। जबकि अकेले टिकटॉक के भारत में ही 20 करोड़ से अधिक यूजर हैं। वहीं अलीबाबा का यूसी मोबाइल इंटरनेट ब्राउजर को बीते साल सितंबर तक अकेले भारत में 55 करोड़ से ज्यादा लोग इस्तेमाल करते थे जो अब कहीं ज्यादा होंगे। इस ब्राउजर के अभी भी पूरी दुनिया में 1.2 अरब उपयोगकर्ता बताए जा रहे हैं जो चीन के अलावा हैं। इन आँकड़ों से चीन ने अपनी धरती पर बैठकर फैलाए जा रहे कारोबार और साइबर स्पेस व्यापार में नए साम्राज्य को किस तरह से फैलाया और नियंत्रित किया है, उसे समझा जा सकता है। अब कुछ भी हो, भारत ने एक बड़े वाल्यूम के चीनी कारोबार में से महज 59 ऐप्स पर प्रतिबंध लगा चीन की धड़कनें जरूर बढ़ा दी है। लेकिन भले ही जिन जगजाहिर मौजूदा कारणों से सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति शत्रुता का भाव रखने वाले ऐसे तत्वों द्वारा आंकड़ों के संकलन, इसकी जांच-पड़ताल और प्रोफाइलिंग को आखिर भारत की संप्रभुता और अखंडता पर आघात माना है वह बेहद संवेदनशील और चिन्ता बढ़ाने वाली बात है। इन ऐप्स के कई भारतीय विकल्प भी हैं जिनका धड़ल्ले से भारतीय मोबाइल यूजर उपयोग कर रहे हैं। ऐप स्टोर पर कई सारे भारतीय विकल्प अब धड़ल्ले से डाउनलोड हो रहे हैं जिनमें मित्रों, चिंगारी, गूगल के फाइल गो, गूगल के गूगल मीट, वाट्स ऐप, गुगल ड्युओ ने चीनी प्रतिबंधित ऐप्स का बड़ा स्थान ले लिया। यदि प्रतिबंधित ऐप्स पर नजर डालें तो टिकटॉक, वीचैट , कैम स्कैनर, वीगो लाइव, हेलो, लाइकी, वीगो वीडियो, क्लैश ऑफ किंग्स, एमआई वीडियो कॉल-शाओमी, एमआई कम्युनिटी के साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफार्म का ऐपक्लब फैक्टरी और शीइन भी हैं। इनमें भारत में टिकटॉक के प्रति लोगों की दीवानगी देखते ही बनती थी। टिकटॉक के चक्कर में खुद का अलग वीडियो पोस्ट करने की होड़ में कितने लोगों की जान चली गई वहीं दफ्तरों में कैमस्कैनर से डाक्युमेण्ट की कम्बाइन्ड पीडीएफ फाइल बनाने का सबसे सरल ऐप होने की वजह से पूरे देश में न जाने कितने विभागों और न जाने कितने गोपनीय दस्तावेजों में सेंध लगा चुकी होगी जो अलग बड़ी चिन्ता का विषय है। निश्चित रूप से चीन के ऐप्स का भविष्य अब भारत सरकार के रहमोकरम पर ही निर्भर होगा। हालांकि इसके लिए चीन ने हाथ पैर मारने जरूर शुरू कर दिए हैं। एक समिति ने इन ऐप्स को कारण-बताओ नोटिस देकर पूछा है कि चीनी एजेंसियों ने उनसे कितनी बार डेटा माँगे और उसका क्या इस्तेमाल किया? पता तो यह भी चला है कि यह आदेश फिलहाल अंतरिम है जिसमें संयुक्त सचिव स्तर के एक पैनल को सभी प्रतिबंधित ऐप्स कंपनियों के प्रतिनिधियों से स्पष्टीकरण सुनने को कहा है। सुनवाई के बाद ये समिति अपनी रिपोर्ट दूसरी सचिव-स्तरीय समिति को सौंपेगी जो प्रधानमंत्री कार्यालय तक हर अपडेट पहुँचाएगी। यह भी तय है कि इन ऐप्स कंपनियों से यह भी पूछा जाएगा कि उन्होंने उपभोक्ताओं के डेटा कितनी बार लिए और कहाँ रखे तथा मकसद क्या है। फिलहाल भारतीय ऐप्स डेवलपर के लिए यह बहुत ही सुनहरा मौका है कि वो अपनी प्रतिभा व दमखम से दुनिया के साइबर व्यापार में अपनी हैसियत दिखाएं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 2 July 2020


bhopal, Elephants in the village

  प्रमोद भार्गव मध्य प्रदेश के सीधी जिले के कई ग्रामों में हाथियों के झुण्ड ने हमला बोला हुआ है। जनपद पंचायत कुसमी के ये सभी आदिवासी ग्राम हैं। हाथियों ने कई घरों को तोड़ दिया, वन विभाग के पेट्रोलिंग कैंप को ढहा दिया और अनेक खेतों की फसलें चौपट कर दीं। घरों में रखे धान, चावल और गेहूं खा गए। ग्रामों की पानी और बिजली की व्यवस्था भी ध्वस्त कर दी। हाथियों ने सबसे ज्यादा उत्पात तिनगी और गजर ग्रामों में मचाया है। ये हाथी छत्तीसगढ़ के संजय गांधी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से चलकर सीधी के जंगलों में पहुंचे हैं। इसके पहले भी यही हाथी इसी क्षेत्र के अनेक ग्रामों में आते रहे हैं। सूचना देने के बावजूद वन अमला तो इन्हें भगाने का कोई उपाय नहीं करता है, तब ग्रामीण ही पीपे व थाली बजाकर इन्हें भगाने का काम करते हैं। लेकिन ये बार-बार लौट आते हैं। भारत सरकार ने हाथी को दुर्लभ प्राणी व राष्ट्रीय धरोहर मानते हुए इसे वन्य जीव सरंक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची.1 में सूचीबद्ध करके कानूनी सुरक्षा दी हुई है। इसलिए जंगलों में हाथियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। हालांकि हमारी सनातन संस्कृति में हाथी सह-जीवन का हिस्सा है। इसीलिए हाथी पाले और पूजे जाते हैं। असम के जंगलों में हाथी लकड़ी ढुलाई का काम करते हैं। सर्कस के खिलाड़ी और सड़कों पर तमाशा दिखाने वाले मदारी इन्हें पढ़ा व सिखाकर अजूबे दिखाने का काम भी करते रहे हैं। साधु-संत और सेनाओं ने भी हाथियों का खूब उपयोग किया है। कई उद्यानों में पर्यटकों को हाथी की पीठ पर बिठाकर बाघ के दर्शन कराए जाते हैं। वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद अब ये केवल प्राणी उद्यानों और चिड़ियाघरों में ही सिमट गए हैं। बावजूद इन उद्यानों में इसकी हड्डियों और दांतों के लिए खूब शिकार हो रहा है। हाथी के शिकार पर प्रतिबंध है लेकिन व्यवहार में हाथी का शिकार करने वालों से लेकर आम लोग भी इस तरह के कानूनों की परवाह नहीं करते। कर्नाटक के जंगलों में कुख्यात तस्कर वीरप्पन ने इसके दांतों की तस्करी के लिए सैंकड़ों हाथियों को मारा। चीन हाथी दांत का सबसे बड़ा खरीददार है। जिन जंगलों के बीच रेल पटरियां बिछी हैं, वहां ये रेलों की चपेट में आकर बड़ी संख्या में प्राण गंवाते रहते हैं। मनुष्य के जंगली व्यवहार के विपरीत हाथियों का भी मनुष्य के प्रति क्रूर आचरण देखने में आता रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के जंगली हाथी अक्सर जंगल से भटककर ग्रामीण इलाकों में उत्पात मचाते रहते हैं। कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में हाथियों ने इतना भयानक उत्पात मचाया था कि यहां 22 निर्दोष आदिवासियों की जान ले ली थी। कर्नाटक और झारखंड में इन हाथियों द्वारा मारे गए लोगों की संख्या भी जोड़ लें तो ये हाथी दस-बारह साल के भीतर करीब सवा सौ लोगों की जान ले चुके हैं। झारखंड के सिंहभूमि इलाके के पोरहाट वन से भटके हाथी रायगढ़ और सरगुजा जिलों के ग्रामीण अंचलों में अकसर कहर बरपाते रहते हैं। इनके आतंक क्षेत्र का विस्तार झारखंड में रांची व गुमला जिलों तक और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ से कर्नाटक है। एक समय अपने मूल निवास से भटककर ढाई सौ हाथी नए आवास और आहार की तलाश में लगातार छह साल तक ग्रामों में कहर ढहाते रहे थे। इन हाथियों में से कुछ ओड़ीसा और पश्चिम बंगाल में घुस गए थे और 18 हाथी मध्य प्रदेश की सीमा में आ गए थे। झारखंड से ही अंबिकापुर के जंगलों में प्रवेश कर भटके हुए हाथियों के झुंड कुछ साल पहले शहडोल जिले के ग्रामीण इलाकों में आतंक और दहशत का पर्याय बन गया था। इन हाथियों में एक नर, तीन मादा और दो बच्चे थे। वन अधिकारी बताते हैं कि शहडोल, रायगढ़, सरगुजा जिलों के दूरदराज के गांवों में रहने वाले आदिवासियों के घरों में उतारी जाने वाली शराब को पीने की तड़प में ये हाथी गंध के सहारे आदिवासियों की झोंपड़ियों को तोड़ते हुए घुसते चले जाते हैं और जो भी सामने आता है उसे सूंड से पकड़ कर और पेट पर भारी-भरकम पैर रख उसकी जीवन लीला खत्म कर देते हैं। इस तरह से इन मदांध हाथियों द्वारा हत्या का सिलसिला हर साल अनेक गांवों में देखने में आता रहता है। पालतू हाथी भी कई बार गुस्से में आ जाते हैं। ये गुस्से में क्यों आते हैं, इसे समझने के लिए इनके आचार-व्यवहार और प्रजनन संबंधी क्रियाओं व भावनाओं को समझना जरूरी है। हाथी मद की अवस्था में आने के बाद ही मदांध होकर अपना आपा खोता है। हाथियों की इस मनःस्थिति के सिलसिले में प्रसिद्ध वन्य प्राणी विशेषज्ञ रमेश बेदी ने लिखा है कि जब हाथी प्रजनन की अवस्था में आता है तो वह समागम के लिए मादा को ढूंढता है। ऐसी अवस्था में पालतू नर हाथियों को लोगों के बीच नहीं ले जाना चाहिए। मद में आने से पूर्व हाथी संकेत भी देते हैं। हाथियों की आंखों से तेल जैसे तरल पदार्थ का रिसाव होने लगता है और उनके पैर पेशाब से गीले रहने लगते हैं। ऐसी स्थिति में महावतों को चाहिए कि वे हाथियों को भीड़ वाले इलाके से दूर बंदी अवस्था में ही रखें क्योंकि अन्य मादा प्राणियों की तरह रजस्वला स्त्रियों से एस्ट्रोजन हार्मोन्स की महक उठती है और हाथी ऐसे में बेकाबू होकर उन्मादित हो उठते हैं। त्रिचूर, मैसूर और वाराणसी में ऐसे हालातों के चलते अनेक घटनाएं घट चुकी हैं। ये प्राणी मनोविज्ञान की ऐसी ही मनस्थितियों से उपजी घटनाएं हैं। वैसे हाथियों के ऐसे व्यवहार को लेकर काफी नासमझी की स्थिति है मगर समझदारी इसी में है कि धन के लालच में मद में आए हाथी को किसी उत्सव या समारोह में न ले जाया जाए। उत्पाती हाथियों को पकड़ने के लिए बीस साल पहले मध्य प्रदेश में ऑपरेशन खेदा चलाया गया था। हालांकि पूर्ण वयस्क हो चुके हाथियों को पालतू बनाना एक चुनौती व जोखिम भरा काम है। हाथियों को बाल्यावस्था में ही आसानी से पालतू बनाया जा सकता है। हाथी देखने में भले ही सीधे-भोले लगे पर आदमी की जान के लिए जो सबसे ज्यादा खतरनाक प्राणी हैं, उनमें एक हाथी और दूसरा भालू है। हाथी उत्तेजित हो जाए तो उसे संभालना मुश्किल होता है। फिलहाल इस तरह हाथी को पालतू बनाए जाने के उपाय बंद हैं। आखिर जिस वन अमले पर अरबों रुपए का बजट सालभर में खर्च होता है, उसके पास इस समस्या से निपटने के लिए कोई कारगर उपाय क्यों नहीं है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 2 July 2020


bhopal, How Rahul Gandhi is trying to make China happy

  आर.के.सिन्हा आज सारा देश देख रहा है कि भारत वर्तमान में वैश्विक महामारी कोरोना और चीन की शरारतपूर्ण सीमा विवाद के रूप में दो घोर चुनौतियों से प्रतिदिन सामना कर रहा है। भारत इन दोनों चुनौतियों का मुकाबला भी कर रहा है, पर कांग्रेस और उसके नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी सरकार से प्रतिदिन इस तरह के सवाल कर रहे हैं मानों वे भारत के साथ नहीं बल्कि चीन के साथ खड़े हों। कभी-कभी लगता है कि उनकी चर्चा करना व्यर्थ है क्योंकि ये सुधरने वाले तो हैं नहीं। ये वक्त की नजाकत को समझने के लिए भी तैयार नहीं हैं। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को बता चुके हैं कि चीन ने भारत की एक इंच भी जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, तो सवाल पर सवाल करने का मतलब ही क्या है? मोदी ने कहा, ''जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। देश की संप्रभुता सर्वोच्च है। देश की सुरक्षा करने से हमें कोई भी रोक नहीं सकता। हमारे दिवंगत शहीद वीर जवानों के विषय में देश को इस बात का गर्व होगा कि वे दुश्मनों को मारते-मारते ही शहीद हुए हैं।"क्या आपको देश के सूरते हाल पर प्रधानमंत्री से भी अधिक विश्वसनीय जानकारी कोई दे सकता है? पर यह छोटी-सी बात सोनिया या राहुल गांधी को समझ नहीं आ रही है। वे बार-बार यही कह कर देश को गुमराह कर रहे हैं कि चीन के साथ हुई झड़प पर संसद का सत्र बुलाया जाए। क्या कोरोना काल में यह करके वे सबकी जान जोखिम में डालना चाहते हैं। वास्तव में राहुल गांधी संकट की इस घड़ी में ओछी राजनीति कर रहे हैं। उनके बयानों को सुन-पढ़कर चीन अवश्य खुश होता होगा कि आखिर "राजीव गाँधी फाउंडेशन" को कई लाख डालर का दिया गया चंदा काम आ गया। 1962 की जंग से डोकलाम विवाद तक आज दुश्मन की भाषा बोलने वाले जरा 1962 की हार से लेकर डोकलाम विवाद तक के पन्नों को खोलकर देख लें। पंडित नेहरू की अदूरदर्शी चीन नीति का परिणाम यह रहा था कि देश को अपने मित्र पड़ोसी बौध राज तिब्बत के अस्तित्व को खोना पड़ा, 1962 में युद्ध लड़ना पड़ा और युद्ध में मुंह की खानी पड़ी। उस जंग के 58 साल गुजरने के बाद भी चीन ने हमारे अक्सई चिन पर अपना कब्जा जमाया हुए है। अक्सई चिन का कुल क्षेत्रफल 37,244 वर्ग किलोमीटर है। यह एक रणनीतिक क्षेत्र है। जल संसाधनों और खनिजों से भरपूर है और हमारे हिन्दू आस्था केन्दों के नजदीक है। क्या इसपर वापस कब्जा करने की चिंता पिछले 58 वर्षों में नहीं होनी चाहिये थी। नेहरू ने ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में भारत का स्थान ठुकराकर चीन का नाम प्रस्तावित किया था। उस समय तो नेहरू गुटनिरपेक्षता के वायरस से ग्रस्त थे और वे विश्व नेता बनना चाह रहे थे। न तो वह कर पाये न ही अपनी सीमाओं को सुरक्षित रख पाये। पूरी कश्मीर समस्या के जन्मदाता भी वही हैं। यदि उन्होंने कश्मीर को अपने हाथ में रखने की जिद न की होती तो सरदार पटेल कब का समाधान कर चुके होते। पंडित नेहरू अपने से बड़ा और समझदार विदेश मामलों का जानकार किसी को मानते ही नहीं थे। इसीलिये उनकी जिद में देश फँसा। उन्हें कैबिनेट की विदेश मामलों की समिति के मेंबर गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1950 में एक पत्र में चीन तथा उसकी तिब्ब्त के प्रति नीति से सावधान रहने को कहा था। अपने पत्र में पटेल ने चीन को "भावी शत्रु" तक घोषित कर दिया था। पर, नेहरू ने उनकी एक नहीं सुनी और पटेल की भविष्यवाणी ठीक 12 वर्षों के बाद 1962 में सच निकली। कैसे भड़कते थे नेहरू भारतीय संसद में 14 नवंबर,1963 को चीन के साथ युद्ध के बाद की स्थिति पर चर्चा हुई। नेहरू ने प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा- "मुझे दुख और हैरानी होती है कि अपने को विस्तारवादी शक्तियों से लड़ने का दावा करने वाला चीन खुद विस्तारवादी ताकतों के नक्शेकदम पर चलने लगा।" वे बता रहे थे कि चीन ने किस तरह भारत की पीठ पर छुरा घोंपा। वे बोल ही रहे थे कि करनाल से सांसद स्वामी रामेश्वरनंद ने व्यंग्य भरे अंदाज में कहा, 'चलो अब तो आपको चीन का असली चेहरा दिखने लगा।' इसपर, नेहरू नाराज हो गए और स्वामी रामेश्वरनंद की टिप्पणी पर क्रुद्ध होकर कहने लगे, "अगर माननीय सदस्य चाहें तो उन्हें सरहद पर भेजा जा सकता है।" सदन को नेहरू जी की यह बात समझ नहीं आई। पंडित नेहरू प्रस्ताव पर बोलते ही जा रहे थे। तब एक और सदस्य एच.वी. कामथ ने कहा, "आप बोलते रहिए। हम बीच में व्यवधान नहीं डालेंगे।" अब नेहरू जी विस्तार से बताने लगे कि चीन ने भारत पर हमला करने से पहले कितनी तैयारियां की हुई थी। पर उन्होंने ये नहीं बताया था कि चीन के मुकाबले भारत की तैयारी किस तरह और क्या तैयारी थी। इसी बीच, स्वामी रामेश्वरानंद ने फिर तेज आवाज में कहा, 'मैं यह जानने में उत्सुक हूं कि जब चीन तैयारी कर रहा था, तब आप क्या कर रहे थे।' सवाल वाजिब था। पर अब नेहरू जी अपना आपा खोते हुए कहने लगे, 'मुझे लगता है कि स्वामी जी को कुछ समझ नहीं आ रहा। मुझे अफसोस है कि सदन में इतने सारे सदस्यों को रक्षा मामलों की पर्याप्त समझ नहीं है।" मतलब तीखा सवाल पूछ लिया तो वे खफा हो गए। बुरा मत मानिए कि जिस शख्स को बहुत ही लोकतान्त्रिक नेता माना और बताया जाता है, वह कभी भी स्वस्थ आलोचना झेलने का माद्दा नहीं रखता था। अपने को गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मुखिया बताने वाले नेता, चीन के साथ संबंधों को मजबूत करना तो छोड़िए, संबंधों को सामान्य बनाने में भी मात खा गये थे। अक्साई चिन की 37000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा पर बोलते हुए पंडित नेहरू ने कहा कि " इस अक्साई चिन का क्या करना? वहां तो घास भी पैदा नहीं होती? नेहरू जी गंजे थे। एक सदस्य ने कहा, "तब तो सारे गंजों को सिर कटवा लेना चाहिये।" आंखों में आंख डालकर बात अब तो यह स्थिति आ गई कि चीन से सम्मान और अपनी भूमि खोने वाला भारत भी उससे आंखों में आंखें डालकर बातें तो कर रहा है। मोदी सरकार ने चीन को डोकलाम विवाद में ही उसको औकात समझा दी थी। वो डोकलाम पर मात खाने के बाद चुप हो गया। अब तो भारत चीन का हर स्तर पर मुकाबला करने के लिए तैयारी भी कर चुका है। जल, थल और नभ में हम तैयार हैं। हाँ, भारत ने कभी वार्ता के दरवाजे बंद नहीं किए। लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से भारत का रुख भी आक्रामक बना हुआ है। भारत गलवान घाटी की घटना के लिए सीधे तौर पर चीन को जिम्मेदार ठहरा चुका है। यह बात विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी चीनी विदेश मंत्री को टेलीफोन पर बातचीत के दौरान साफ कर दी थी। भारत के इसी रवैये के कारण अब चीन, सीमा पर तनाव खत्म करना चाहता है। चीन समझ गया है कि यदि युद्ध की स्थिति आई तो पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा होगा और उसके साथ पाकिस्तान के अतिरिक्त कोई न होगा। भारत की भी यही चाहत है। गलवान में अपने 20 सैनिकों को खोने वाले भारत ने चीन के 40 से अधिक सैनिकों और उसके कमांडिंग ऑफिसर को मार डाला था। भारत इस बार आर-पार के संघर्ष के लिए तैयार है। वह हालात पर नजर बनाए हुए है। हालांकि वह यही चाहता कि दोनों देश बातचीत के जरिए विवाद को सुलझाएं। हिंसा से तो किसी को फायदा नहीं होगा। पर इस बार हिंसा या जंग का जवाब शांति की अपील से नहीं दिया जाएगा। बुद्ध, महावीर और गांधी को अपना आदर्श मानने वाले भारत में अर्जुन, कर्ण, छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप और रानी लक्ष्मीबाई को भी राष्ट्रनायक माना जाता है। अब इस तथ्य से चीन जितना जल्द वाकिफ हो जाए वही बेहतर है। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 2 July 2020


bhopal,Congress

  डॉ. दिलीप अग्निहोत्री चीन मसले पर कांग्रेस के शीर्ष बयान फजीहत कराने वाले हैं और संकट के समय देश की एकजुटता से कांग्रेस अलग दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं उसने स्वयं अपने अतीत को उभरने का मौका दिया है। उससे प्रश्न केवल 1962 की पराजय का नहीं है बल्कि सीमा क्षेत्र की रक्षा तैयारियों में घोर लापरवाही के लिए भी वह जवाबदेह है। जबकि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने चीन सीमा पर आधारभूत ढांचा निर्माण शुरू किया। इससे परेशान चीन ने डोकलाम में सीमा का अतिक्रमण किया था लेकिन मोदी सरकार द्वारा कठोर रवैया अपनाने के बाद उसे पीछे हटना पड़ा था।   प्रजातंत्र में मतभेद स्वभाविक है। सरकार की निंदा का विपक्ष को पूरा अधिकार है लेकिन संकटकाल की मर्यादा भी होती है। कांग्रेस के बयानों में चीन के लिए भी कोई कठोर शब्द थे? ऐसा लग रहा था कि उसके तरकश में सारे तीर नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह के लिए थे। ऐसा भी नहीं कि पहली बार ऐसा हुआ, पुलवामा हमले के समय भी तो ऐसे ही बयान दिखाई दिए थे, अनुच्छेद 370 को हटाने की चर्चा में विरोधी नेताओं और पाकिस्तान के बयानों में क्या उल्लेखनीय अंतर था। यही बात नागरिकता संसोधन कानून के समय देखी गई। लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद राहुल गांधी ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। लेकिन वह केवल अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से हटे हैं, उनका शिकंजा पहले जैसा ही है। वह बोलते हैं, ऊपर से नीचे तक पार्टी उसी स्वर में बोलने लगती है, उनका बचाव करती है। इसका पार्टी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है इसकी चिंता किसी को नहीं है।   पिछले दिनों चीन के साथ भारत की झड़प हुई। हमारे जांबाज सैनिकों ने बलिदान देकर चीन के मंसूबों को विफल कर दिया। पूरा देश उनके प्रति कृतज्ञ था। राहुल गांधी बोले नरेंद्र मोदी ने सरेंडर कर दिया। चीन ने आगे बढ़ने का प्रयास किया होगा। हमारे सैनिकों ने रोक दिया। इसी में झड़प हुई। चीन ने एक हफ्ते बाद माना कि उसका अधिकारी व कई सैनिक मारे गए हैं। राहुल को बताना चाहिए कि सरेंडर हुआ कहाँ है। क्या वह 1962 के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री का भी ऐसे नामकरण कर सकते हैं। क्या उस समय के लिए वह प्रश्न कर सकते हैं कि चीन की हिम्‍मत कैसे हुई कि उसने हमारे सैनिकों को मार दिया, चीन की हिम्‍मत कैसे हुई कि वह हमारी सीमा में घुस आया, सैनिकों को निहत्‍थे सीमा पर क्‍यों भेजा गया। यह सभी प्रश्न कांग्रेस और बाद में उसके समर्थन वाली सरकार पर लागू होते हैं। 1962 में अक्साई चीन, अगले वर्ष काराकोरम पास, 2008 में तिया पंगनक और चाबजी घाटी, इसके अगले वर्ष डूम चेली और 2012 में डेमजोक में चीन ने कब्‍जा किया था। इसके लिए राहुल किसको सरेंडर का नाम देंगे।   केंद्रीय मंत्री पूर्व जनरल वीके सिंह ने दावा किया भारत ने भी चीन के चालीस से ज्यादा सैनिकों को मार गिराया है। बीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। बताया जा रहा है कि चीन ने कुछ भारतीय सैनिक पकड़े थे, बाद में उन्हें लौटाया था। इसी तरह हमने भी चीन के सैनिक पकड़े, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि गलवान घाटी में जो इलाका भारत के पास था, वह अब भी हमारे पास ही है। झगड़ा पेट्रोल प्वाइंट चौदह को लेकर है, ये अभी भी भारत के नियंत्रण में है। गलवान घाटी का एक हिस्सा चीन के पास और एक हिस्सा अब भी हमारे पास है। जबकि कांग्रेस के लिये यह राष्ट्रीय सुरक्षा का नहीं बल्कि राजनीति का समय था। उनके निशाने पर चीन नहीं नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह थे। वह देश के प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को ललकार रहे थे। कह रहे थे कहाँ छिप गए, गुमराह करने के बजाय उन्हें सामने आकर जवाब देना चाहिए। उनके प्रवक्ता भी बोले कि सरकार ने सुध ली होती तो चीन कभी यह दुस्साहस नही कर सकता था, अब तो ट्विटर से बाहर आ चुप्पी तोड़िए, प्रधानमंत्री जी कब कुछ कहेंगे आदि। राष्ट्रीय संकट के समय यह कांग्रेस की शब्दावली थी। दूसरी तरफ चीन है, जहां सरकार का विरोध संभव नहीं।   हमारे यहां प्रजातंत्र है। सरकार का विरोध होना चाहिए लेकिन शत्रु मुल्क से तनाव की स्थिति हो तब उसके खिलाफ राष्ट्रीय सहमति की बुलंद अभिव्यक्ति होनी चाहिए। लेकिन कांग्रेस के सवाल केवल नरेंद्र मोदी व राजनाथ तक सीमित नहीं थे, इनका सेना पर अपरोक्ष रूप में प्रभाव पड़ सकता था। इस स्थिति में ऐसे बयानों से बचने की आवश्यकता थी। उस समय सभी को चीन के खिलाफ ही आवाज बुलंद करनी चाहिए थी। सरकार ने प्रजातांत्रिक मान्यताओं के कारण ही इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। बेहतर यह होता कि इसके माध्यम से हमारी एकजुटता की गूंज चीन तक सुनाई देती। लेकिन कांग्रेस के कारण ऐसा नहीं हो सका।   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार बताए कि इस सारी स्थिति से निपटने के लिए भारत की सोच, नीति और हल क्या है। सोनिया गांधी को अपरोक्ष रूप से सरकार संबन्धी कार्यों की बहुत जानकारी है। उनको यह पता होना चाहिए कि कोई सरकार संघर्ष, तनाव की ऐसी स्थिति में इस प्रकार के बेतुके प्रश्न का जवाब नहीं दे सकती क्योंकि इससे दुश्मन देश लाभ उठा सकता है। ऐसी रणनीति गोपनीय होती है। सैनिक कमांडरों से विचार-विमर्श के बाद ही शायद उसका निर्धारण होता है। इसकी जानकारी सोनिया गांधी को मांगनी ही नहीं चाहिए थी।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 July 2020


bhopal, Politics on oil is not appropriate

    अरविन्द मिश्रा अर्थव्यवस्था का ईंधन कहे जाने वाले पेट्रोल और डीजल की दरों में हुई हालिया वृद्धि को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नूराकुश्ती शुरू हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पहले तो इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की और अब कांग्रेस कार्यकर्ता हाईकमान के इशारे पर लॉकडाउन में भी सड़क पर उतरने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस मोदी सरकार पर कोरोना संकट में पेट्रोल और डीजल से मिले टैक्स से तिजोरी भरने का आरोप लगा रही है। वहीं भाजपा प्रवक्ताओं के साथ सरकार के मंत्री, कांग्रेस सरकारों द्वारा दामाद और राजीव गांधी फाउंडेशन को पहुंचाए गए फायदे की याद दिला रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पिछले लगभग एक माह में डीजल 11 रुपए और पेट्रोल 9.12 रुपए प्रति लीटर महंगा हो चुका है। देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 80.38 रुपये जबकि डीजल 80.40 रुपए प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गया है। यह पहला मौका है जब डीजल ने पेट्रोल को कीमतों में पीछे छोड़ दिया है। पेट्रोल-डीजल की दरों में मौजूदा वृद्धि पर नाराज विपक्ष का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पिछले कुछ महीनों में जिस तरह निचले स्तर पर आई हैं, उसके बाद भी सरकार ने अब तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा आम आदमी को नहीं दिया। दरअसल, पेट्रोल-डीजल की दरें सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर असर डालती हैं। लेकिन जब कोरोना संकट से देश ही नहीं पूरी दुनिया का अर्थतंत्र संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़ोत्तरी को पहले की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार और उपभोक्ता दोनों को वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर ही पेट्रोल-डीजल की दरों का विश्लेषण कर समाधान निकालना होगा। कोरोना त्रासदी की वजह से सरकारों के समक्ष राजस्व का संकट कितना बड़ा है, यह किसी से छिपा नहीं है। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के उस बयान से सरकार की आर्थिक चुनौतियों का आकलन किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा कि इस वित्तीय वर्ष में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये का राजस्व कम आएगा। वहीं केंद्र सरकार ने इस बात के भी संकेत दिए हैं कि राजस्व संकट के कारण इस वित्तीय वर्ष में अब नई योजनाएं शुरू नहीं की जाएंगी बल्कि कोरोना से निपटने के लिए जारी राहत कार्य को ही प्रभावी रूप से संचालित किया जाएगा। क्या आर्थिक गतिविधियों के ठप पड़ जाने पर भी सरकार ने कोरोना से लड़ी जाने वाली लड़ाई को कमजोर होने दिया है, इस बात का भी तटस्थ आकलन करना होगा। स्वास्थ्य अधोसंरचना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, रोजगार समेत कई मोर्चे पर सरकार को अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता पड़ रही है। बावजूद इसके लॉकडाउन के शुरुआती दिनों से ही केंद्र सरकार ने राज्यों को कोविड-19 अस्पताल बनाने, जांच की सुविधा प्रदान करने के लिए तत्काल बजट उपलब्ध कराया है। लॉकडाउन की सबसे अधिक मार गरीब परिवारों और श्रमिकों पर पड़ी है इसलिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के जरिए गरीबी रेखा के नीचे रह रहे परिवारों को छह माह तक नि:शुल्क राशन, तीन माह तक उज्ज्वला सिलेंडर प्रदान करने की योजना के जरिए राहत देने का अभूतपूर्व प्रयास हुआ है। प्रधानमंत्री किसान योजना के अंतर्गत लगभग 9 करोड़ किसानों को 2 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जा चुकी है। जनधन योजना के अंतर्गत 20 करोड़ महिला खाताधारकों को 1,500 रुपये की राहत राशि सीधे उनके बैंक खातों में जमा करा दी गई है। आंकड़ों के मुताबिक 52,600 करोड़ रुपये डीबीटी के जरिए आर्थिक रूप से गरीब लोगों के बैंक खातों में जमा कराए गए। जबकि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को राहत पहुंचाने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये की इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल का प्रबंध किया गया है। इस तरह करीब 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज और गरीब रोजगार योजना के जरिए अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने के बहुआयामी प्रयास भी जारी हैं। जाहिर है, इन सभी योजनाओं को उसके वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचाने के लिए बड़े आर्थिक संसाधन की आवश्यकता पड़ेगी। इस राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए पेट्रोल और डीजल की दरों में वृद्धि ही केंद्र और राज्यों के लिए अहम विकल्प के रूप में सामने आती है। यही वजह है कि केंद्र ही नहीं राज्य सरकारें चाहे वह भाजपा शासित हों या कांग्रेस, सभी ने वर्तमान परिस्थितियों में पेट्रोलियम उत्पादों के जरिए राजस्व जुटाने की नीति को अपनाया है। हाल के दिनों में लगभग 28 राज्यों द्वारा पेट्रोल और डीजल पर वैट में की गई वृद्धि से यह बात प्रमाणित होती है। कीमतों में वृद्धि को लेकर अपने बचाव में उतरी केंद्र सरकार का कहना है कि लॉकडाउन के बाद अनलॉक की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था में पेट्रोल-डीजल की खपत कम होने के कारण कीमतों में वृद्धि का असर उपभोक्ताओं पर उतना अधिक नहीं पड़ा है, जितना ढ़िढोरा विपक्ष पीट रहा है। वैसे अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में वर्तमान अस्थिरता और भारत में तेल की मांग में अप्रैल-मई महीने में 70 फीसदी तक की गिरावट केंद्र सरकार के पक्ष को प्रमाणित करती है। ऐसी परिस्थितियों में विपक्ष ने जैसे ही तेल के जरिए सरकार पर खजाना भरने का आरोप लगाया, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सोनिया गांधी के आरोपों का जवाब देने खुद सामने आ गए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ये कांग्रेस की सरकार नहीं है जो पेट्रोल और डीजल से मिले राजस्व को दामाद और राजीव गांधी फाउंडेशन के खाते में जमा कराएगी। ये वही धर्मेंद्र प्रधान हैं, जिनकी निगरानी में लॉकडाउन की विषम परिस्थितियों में भी तेल कंपनियों ने न सिर्फ पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति जारी रखी बल्कि घर-घर एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति को सुनिश्चित किया। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार की अस्थिरता के बीच कच्चे तेल के घटे दाम का फायदा उठाते हुए भारत ने भूमिगत तेल भंडारों, टैंकों, पाइपलाइनों में 53.3 लाख टन तेल का भण्डारण कर लिया है। इसी तरह 85 से 90 लाख टन तेल जलपोतों में भी संग्रहित किया गया है। इसके अलावा 65 टन अतिरिक्त तेल का भण्डारण करने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय गंभीरता से काम कर रहा है। इससे तेल के आयात पर होने वाला भारी-भरकम खर्च तो कम होगा ही भविष्य में तेल की उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी। ऐसा नहीं है कि सरकार को आम आदमी पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ और महंगाई की चिंता नहीं है। लेकिन जैसा कि हमारे घर में भी कोई आर्थिक संकट या बड़ा कार्य होता है तो हम आर्थिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने की नीति अपनाते हैं, ठीक उसी तरह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई मौजूदा वृद्धि को भी देखना चाहिए। केंद्र सरकार पहले ही पेट्रोलियम उत्पादों पर राजस्व के लिए जरूरत से अधिक निर्भरता को कम करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। स्वयं पेट्रोलियम मंत्री पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की वकालत कर चुके हैं। हालांकि बहुत-सी भाजपा ही नहीं कई कांग्रेस शासित राज्य सरकारें फिलहाल इसके पक्ष में नहीं हैं। कुछ अन्य उपायों में सरकार पेट्रोल और डीजल के वायदा कारोबार को बढ़ावा देने पर विचार कर रही है। स्पष्ट है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष को तकरार के बजाय बीच का ऐसा मार्ग निकालना होगा, जिससे राजस्व का विकल्प भी कमजोर न हो और आर्थिक संकट के बीच उपभोक्ताओं पर लॉकडाउन और महंगाई की दोहरी मार भी न पड़े। यह तभी संभव है जब विपक्ष कोरोना संकट के दौरान देश की प्राथमिकताओं को लेकर संवेदनशील हो, क्योंकि तेल की कीमतों को लेकर देश की जनता ने अबतक जिस धैर्य का परिचय दिया है, उसमें हर मुद्दे पर राजनीति का अवसर खोजने वाले हमारे राजनीतिक दलों के लिए बड़ा संदेश छिपा है।    (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 July 2020


bhopal,Apni Boli, Apna Village

  डॉ. पवनपुत्र बादल   कोरोना से आज भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व इसकी चपेट में है। इस महामारी ने विश्व में ऐसी तबाही मचा रखी है कि मानवता भी कराह उठी है। विश्व की महाशक्तियाँ इसके आगे धराशायी हो गयी लेकिन भारत में आज भी उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं। अभीतक हम इस महामारी और इससे उत्पन्न दुश्वारियों पर यथासम्भव नियन्त्रण करने में सफल रहे हैं। जब सारा देश अपने घरों में कैद होने को मजबूर है, सम्पूर्ण देश के शहर, गाँव-गली ढाई महीने तक लॉकडाउन की स्थिति में रहने के बाद आज भी जीवन्त नहीं हो पा रहे हैं, आवागमन के साधन यहाँ तक कि आवश्यक सेवाओं को छोड़कर दोपहिया वाहन भी तीन महीने से खड़े हैं।   औद्योगिक प्रतिष्ठान, व्यापारिक केन्द्र, दुकानें आदि बन्द पड़ी हैं, लोगों के सामने विशेषकर रोजाना कमाने खाने वालों के सामने रोजगार का संकट है। ऐसे समय में सामाजिक संस्थाओं, विशेष रूप से संघ और उसके आनुशंगिक संगठनों ने असहाय, गरीबों, जरूरतमन्दों की सेवा का बीड़ा उठाया और कार्यकर्ता सेवा कार्य के लिए निकल पड़े घरों के बाहर। नर सेवा-नारायण सेवा का मूलमन्त्र ही राष्ट्रभक्ति का ध्येय होता है, अतः इस संकट के समय निर्बल निरीहों की सहायता को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने अपना लक्ष्य बनाया। इस महामारी के समय संगठन की गतिविधियाँ सामान्य समय से बहुत बढ़ी हुई रहीं। अपने सहयोगियों के साथ जुट पड़ने का आह्वान किया और इस पुनीत कार्य में देखते-देखते अनेक बुद्धिजीवी, साहित्यकार बंधु, बहिनें, जीवन की परवाह किये बिना, अपने शहर-गाँव की निर्धन बस्तियों में जा-जाकर सेवा कार्य करने लगे। उन्हें भोजन सामग्री, मास्क, सेनेटाइजर एवं अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं, दवायें आदि वितरित कर कोरोना से बचाव के तरीके बताकर उन्हें जागरूक किया जाने लगा। यह क्रम लगातार ढाई महीने तक चलता रहा। लेखनी पकड़ने वाले हाथ सेवाकार्य से जुड़कर यहाँ भी उत्तम से उत्तम कार्य करने में अग्रणी रहे।   इस संकटकाल में कुछ राष्ट्र विरोधी संगठन एवं असामाजिक तत्व भी सक्रिय हो गये जो सामाजिक ताना-बाना बिगाड़कर जातिगत, क्षेत्रगत विद्वेष फैलाकर देश को कमजोर करना चाहते थे। ऐसे लोगों ने देश के विभिन्न प्रदेशों के बड़े औद्योगिक नगरों में अन्य प्रदेशों के कामगार बंधुओं-मजदूरों के प्रति झूठी अफवाहें फैलाकर क्षेत्रवाद व जातिवाद के नारे उछालकर, लोगों को भड़काकर, वैमनस्य उत्पन्न करके पलायन करने को मजबूर कर दिया। देश में स्थिति एकबार सन 1947 के विभाजन जैसी पलायन की हो गयी। फलस्वरूप लाखों कामगार मजदूरों को शहर छोड़कर सैकड़ों हजारों किमी दूर अपने गाँव जाना पड़ा। पैदल ही सुदूर गांव जा रहे मजदूरों के लिये मुख्यमंत्री ने पूरी संवेदना के साथ साधन व सुविधाएँ उपलब्ध करायी।   एक तरफ अन्धेरा है तो दूसरी ओर प्रकाश भी होता है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री ने जिस संवेदना के साथ सभी का साथ दिया। परिवहन, भोजन, दवाइयों और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध करवायी, इसे देख सभी कामगार मजदूर आत्मविश्वास के साथ अपने गाॅव लौटे। जैसे ही संघ व अन्य संगठनों को इसकी जानकारी हुई यहाँ भी हम अपने लोगों की सेवा करने में, भोजन-पानी, दवा आदि देकर तथा यथासम्भव स्थानीय प्रशासन व उदारवादी दानशील लोगों के सहयोग से परिवहन साधन की व्यवस्था कराकर उन्हें उनके गन्तव्य तक पहुँचाने में सहयोग करते रहे। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के कार्यकर्ता भी विभिन्न जिलों में सेवा भारती के साथ मिलकर सेवाकार्य में जो सहयोग किये वह प्रशंसनीय है।   साहित्य परिषद् की राष्ट्रीय स्तर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के सभी प्रदेशों के पदाधिकारियों ने ई-वेबिनार के रूप में प्रतिभाग किया। संगोष्ठी का विषय-'स्वदेशी अवधारणा और यथार्थ' था, जिसमें देश के विद्वान वक्ताओं ने स्वदेशी की अवधारणा पर अपने उद्बोधन से मार्गदर्शन किया। वेबिनार का आयोजन अलग-अलग तिथियों में किया गया। जिसके तीन मुख्य विषय थे, पहला 'स्वदेशी अवधारणा और यथार्थ' दूसरा 'अपनी बोली अपना गाँव' एवं तीसरा 'अपने लोक देवता-ग्राम देवता'। तीनों विषयों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की जड़ें ग्राम्य स्तर तक किस तरह जुड़ी हुई हैं, इस पर विस्तार से चर्चा की गयी।   उत्तर प्रदेश साहित्य परिषद् द्वारा प्रान्त स्तर पर उत्तर प्रदेश के छहों प्रान्तों की संगोष्ठी का आयोजन क्षेत्रवार 'अपनी बोली अपना गाॅंव' विषय पर किया गया। जिसमें सभी 75 जिलों में गाॅंवों तथा महानगरों के पदाधिकारियों सहित प्रान्तीय कार्यकर्ताओं की सहभागिता रही। इतने व्यापक आयोजन के लिए हम अपने समस्त सहयोगियों को साधुवाद देते हैं। साहित्य परिषद् की इन ई-गोष्ठियों का मूल उद्देश्य भारत की मूल ईकाई गाॅंव की भूमिका, स्थानीय बोली एवं 'अपने लोक देवता-ग्राम देवता' से जुड़कर देश की संस्कृति को अक्षुण्ण तथा शक्तिशाली बनाने का लक्ष्य रहा।      (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 July 2020


bhopal, Blog single photo Rahul talks about Modi during Corona era

  सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश अभियान का शुभारंभ कर दिया है। इस बीच उन्होंने पूरे दस मिनट तक उत्तर प्रदेश सरकार की सराहना की। इसे बहुत हल्के में नहीं लिया जा सकता। कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री विदेश जाएं या देश के किसी राज्य में, वहां के मुखिया को सम्मान देते ही हैं फिर इसमें नया क्या है? इसे समझने के लिए इस बात पर गौर करना होगा कि केंद्र सरकार की सभी योजनाओं को उत्तर प्रदेश में पुरजोर ढंग से क्रियान्वित कराने की हरसंभव कोशिश योगी सरकार ने की है। तभी तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि आपदा को अवसर के रूप में तब्दील करने के मामले में उत्तर प्रदेश देश के सभी राज्यों से आगे है। उन्होंने कहा कि विषम कोरोना काल में उन्होंने न केवल चिकित्सा सुविधा को चाक चौबंद रखा, बल्कि प्रवासी श्रमिकों के हितों की भी रक्षा की। उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने से लेकर उनके रोजगार तक की व्यवस्था की। दुनिया के सुपरपावर कहे जाने वाले देशों इंग्लैंड, फ्रांस, इटली और स्पेन की तुलना करते हुए कहा कि इनकी कुल आबादी उत्तर प्रदेश की आबादी 24 करोड़ से बहुत कम है। फिर भी वहां कोरोना संक्रमितों और उससे मरने वालों की संख्या उत्तर प्रदेश के कोरोना पीड़ितों और कोरोना से मरने वालों से कहीं ज्यादा है। उन्होंने इतना जरूर कहा कि कोरोना का इलाज जबतक मिल नहीं जाता तबतक दो गज दूरी के सिद्धांत को अपनाए रखने में ही हम सबका कल्याण है। प्रधानमंत्री कोई बात कहें और राहुल गांधी मुद्दा न बनाएं, यह संभव नहीं है। उन्होंने कहा है कि देश में नए इलाकों में कोरोना तेजी से फैल रहा है लेकिन सरकार के पास इसे हराने का कोई प्लान नहीं हैं। प्रधानमंत्री खामोश हैं। उन्होंने सरेंडर कर दिया है और बीमारी से लड़ने से इनकार कर दिया है। चीन के मामले में दिए गए अपने बयान में प्रधानमंत्री को सरेंडर तो वे बहुत पहले ही करा चुके हैं। राहुल गांधी के पास एक मोर्चा तो है नहीं। संघर्ष के लिए एकाग्रता जरूरी होती है। राहुल को राजनीति करनी है, एकाग्रता का अभ्यास थोड़े करना है। सो कभी वे समस्या की इस डाल पर तो कभी समस्या की दूसरी डाल पर उछलकूद करते नजर आते हैं। उनके हिसाब से सरकार अगर लड़े तो वह हमेशा लड़ती ही रह जाएगी और एक भी समस्या की तह तक नहीं पहुंच पाएगी। भारत एक अरब 38 करोड़ की आबादी वाला देश है। एक अरब 38 करोड़ समस्याओं को एक व्यक्ति एक साथ एक झटके में कैसे हल कर सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंसान हैं, भगवान नहीं। प्रधानमंत्री अगर यह कह रहे हैं कि सरकार का मार्गदर्शन भारत का संविधान करता है और इसलिए सरकार धर्म, लिंग, जाति, नस्ल या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करती है। हम 138 करोड़ भारतीयों को सशक्त बनाने की इच्छा से निर्देशित होते हैं और हमारा मार्गदर्शन भारत का संविधान करता है तो इसमें कदाचित कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन, राहुल गांधी को इतनी सामान्य सी बात समझ में क्यों नहीं आती? इसमें संदेह नहीं कि भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। एकदिन में सर्वाधिक 18,552 नए मामलों का सामने आना और 384 लोगों का मरना डराता है। हालात यह है कि भारत में कोरोना संक्रमितों की तादाद पांच लाख से अधिक हो गई। भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या भी बढ़कर 15,685 हो गई है। देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या एक लाख तक पहुंचने में 110 दिन लगे थे लेकिन 27 जून को पांच लाख का आंकड़ा छूने में मात्र 39 और दिन लगे। यह बेहद भयावह तस्वीर है। सवाल यह है कि कोरोना के बढ़ते मामलों और उससे होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार कौन है? अकेले मोदी सरकार या कांग्रेस समेत अन्य विपक्ष भी। प्रधानमंत्री ने जब लॉकडाउन का निर्णय लिया था तब भी कांग्रेस उनके निर्णय की आलोचना कर रही थी। फिर प्रवासी मजदूरों के पलायन मामले में उसने केंद्र सरकार को घेरना आरंभ कर दिया। सरकार चाहती थी कि जो जहां है, वहीं रहे लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में फैक्ट्रियों पर ताले जड़ दिए गए, मजदूरों को काम से निकाल दिया गया। उन्होंने जो काम किया था, उसका भुगतान तक नहीं किया गया। वर्ना वे पैदल चलने को विवश ही क्यों होते? जिस समय नरेंद्र मोदी ने देश भर में लॉकडाउन लागू किया तो राहुल गांधी में अल्बर्ट आइंसटीन की आत्मा आ गई थे। वे उन्हीं की भाषा बोलने लगे थे कि यह लॉकडाउन साबित करता है कि अज्ञानता से अधिक खतरनाक चीज केवल घमंड है। इससे पहले भी राहुल गांधी ने लॉकडाउन के बावजूद कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या को लेकर चार ग्राफ ट्वीट किए थे। इसमें उन्होंने यह बताने और जताने की कोशिश की थी कि देश में बार-बार लॉकडाउन लगाया जा रहा है लेकिन कुछ हासिल नहीं हो पा रहा है बल्कि कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा व कांग्रेस के लोग अगर वाकई सच समझ रहे होते तो उन्हें पता होता कि संक्रामक रोग भीड़ बढ़ने से फैलते हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों को घर में रहते हुए एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की नसीहत दी थी तो इसमें उनकी दूरदृष्टि थी। कांग्रेस ने कोरोना से निपटने के कोई प्रयास किए होते तो बात समझ भी आती लेकिन वह कोरोना से लड़ रहे लोगों का मनोबल तोड़ने में ही अपनी 'शल्य' वीरता समझती रही। उसने प्रवासी मजदूरों को मदद पहुंचाने का प्रयास किया भी लेकिन उसमें भी उसने बसों की जगह ऑटो के नंबर यूपी सरकार को सौंप दिए। राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष से डोनेशन प्राप्त करने का मामला हो या फिर चीन से, कांग्रेस का चेहरा बेनकाब होने लगा है। जिस बीमारी से निपट पाने में दुनिया के समर्थ और शक्तिशाली देश भी परेशान हैं। जिस बीमारी के लक्षणों पर ही दुनिया के स्वास्थ्य वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं, जिसकी वैक्सीन या उचित दवा विकसित नहीं हो पाई है, उस बीमारी के इलाज से ज्यादा बचाव की जरूरत है। प्रधानमंत्री अगर इस रोग से बचकर रहने की बात कर रहे हैं तो इसमें आत्मसमर्पण जैसी बात कहां है? उत्तर प्रदेश में न केवल कोरोना महामारी से निपटने के प्रयास हो रहे हैं बल्कि गांवों में ही रोजगार सृजन के प्रयास आरंभ हो गए हैं। अब पलायन गांव से शहर की ओर नहीं, शहर से गांव की ओर हो रहा है। गांव, ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर उद्योग लगाने के ताने-बाने बुने जाने लगे हैं। आपदा आती ही इसलिए है कि उसका सामना किया जाए। यह पहली और आखिरी आपदा नहीं है। जब कोई नई बीमारी आती है तभी उसका इलाज ढूंढ़ा जाता है। इसमें समय लगता है। राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस को हथेली पर सरसों उगाने की बजाए धैर्य का परिचय देना चाहिए। अगर आप कुछ कर सकते हैं तो सरकार को सुझाव दें कि आपके पास कोरोना से लड़ने का यह तरीका है और नहीं तो जो इसके लिए लड़ रहे हैं, उन कोरोना योद्धाओं का सम्मान बढ़ाएं। इसी में देश का कल्याण निहित है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 30 June 2020


bhopal,Locust farmers attacked by locust attack

  योगेश कुमार गोयल राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान पिछले कई दिनों से टिड्डी दलों के हमले से काफी परेशान हैं। टिड्डियों का यह हमला अब हरियाणा, उत्तर प्रदेश इत्यादि उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों तक पहुंच गया है। कई-कई किलोममीटर लंबे टिड्डी दल फसलों को पूरी तरह तबाह कर आगे बढ़ रहे हैं। पाकिस्तानी सीमा से भारत में आए ये टिड्डी दल राजस्थान के दो दर्जन से अधिक जिलों तथा मध्य प्रदेश के भी कई इलाकों में कई लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों को नष्ट कर चुके हैं। अब इन दोनों राज्यों के साथ देश के कई अन्य राज्यों में भी टिड्डी दलों का फसलों पर कहर देखा जा रहा है। टिड्डियों के कई-कई किलोमीटर लंबे दल अलग-अलग स्थानों पर पहुंचकर फसलों को चट करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। भारत में वर्ष 1926 से 1931 के बीच टिड्डियों के कारण तत्कालीन मुद्रा में करीब दस करोड़ रुपये तथा 1940 से 1946 के दौरान दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इसे देखते हुए वर्ष 1946 में लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन (एलडब्ल्यूओ) यानी टिड्डी चेतावनी संगठन की स्थापना की गई थी। एलडब्ल्यूओ केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के अंतर्गत कार्यरत है। भारत में 1949-55 के दौरान टिड्डी दलों के हमले से दो करोड़, 1959-62 के दौरान पचास लाख तथा 1993 में करीब 75 लाख रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया था। अभी ऐसे हमलों में नुकसान करोड़ों-अरबों रुपये तक पहुंच जाता है। महज ढाई-तीन इंच आकार का यह कीट प्रतिदिन अपने वजन के बराबर खाना खा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के संगठन ‘फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन’ के अनुसार एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आठ करोड़ के करीब टिड्डियां हो सकती हैं। मई माह में जब राजस्थान में टिड्डी दलों ने फसलों पर हमला बोला था, तब वहां के कृषि अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने जो टिड्डी दल का काफिला देखा, वह छह किलोमीटर लंबा तथा तीन किलोमीटर चौड़ा था। अब हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में जो टिड्डी दल देखे जा रहे हैं, वे भी काफी लंबे हैं। ऐसे में अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि फसलों पर इतनी सारी टिड्डियों के हमलों से एक ही दिन में कितने बड़े पैमाने पर फसलों का सफाया हो सकता है। ब्रिटेन के खाद्य एवं पर्यावरण संस्थान (फेरा) द्वारा टिड्डियों पर किए गए एक शोध में पाया गया है कि इनकी खाने की क्षमता और उड़ने की रफ्तार मवेशियों से कहीं तेज है। एक अनुमान के अनुसार टिड्डियों का एक बहुत छोटा झुंड भी एकदिन में करीब 35 हजार लोगों का खाना खा जाता है। इनका एक छोटा दल एक दिन में दस हाथियों या पच्चीस ऊंटों के खाने के बराबर फसलें चट कर सकता है। टिड्डी दल दस किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से सफर करता है और एक दिन में 150 किलोमीटर तक उड़ने की क्षमता रखता है। टिड्डी का जीवनकाल प्रायः पांच महीने का होता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी रबी फसलों की कटाई और थ्रैशिंग तो कर ली गई है लेकिन जिन क्षेत्रों में हरे चारे के लिए ज्वार, बाजरा तथा सब्जी और मूंग आदि बोई हुई है, वहां टिड्डी दलों से होने वाले नुकसान से बचने के लिए किसानों को कीटनाशक रसायनों का इस्तेमाल करना चाहिए। टिड्डी प्रकोप के समय उन्हें दो पारियों में क्लोरपायरीफोस 20 प्रतिशत ईसी 1200 मिली प्रति हेक्टेयर, क्लोरपायरीफॉस 50 ईसी 480 मिली प्रति हेक्टेयर, डेल्टामेथरिन 2.8 प्रतिशत ईसी 625 मिली प्रति हेक्टेयर, बेन्डियोकार्ब 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी 125 ग्राम प्रति हेक्टेयर, मेलाथियॉन 50 प्रतिशत ईसी 1850 मिली प्रति हेक्टेयर या मैलाथियॉन 25 प्रतिशत डब्ल्यूपी 3700 ग्राम उपलब्धता के अनुसार 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इन कीटनाशक रसायनों का प्रयोग करते समय किसानों को चेहरे पर मास्क तथा हाथों में दस्ताने अवश्य पहनने चाहिए तथा छिड़काव भी व्यस्क व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए। पाकिस्तान की तरफ से आए टिड्डी दलों ने पिछले साल भी भारत में 21 मई को दस्तक दी थी लेकिन तब उस हमले को हल्के में लिया गया था। जैसे-जैसे इनका दायरा विस्तृत होता गया, वैसे-वैसे यह बात साफ होती गई कि यह हमला 1993 से भी बड़ा है। अगस्त-सितंबर 1993 में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास भारी बारिश के कारण टिड्डियों के प्रजनन के लिए अनुकूल स्थिति बन गई थी और तब राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों में टिड्डी दल का सबसे खतरनाक हमला देखा गया था। हालांकि फिर ठंड बढ़ने के कारण अक्तूबर माह में वह प्रकोप खत्म हो गया था। 2019 में राजस्थान के जैसलमेर इलाके में रेगिस्तानी टिड्डी दलों के हमले की शुरुआत के बाद इनका प्रकोप करीब नौ महीनों तक देश के कई हिस्सों में देखा गया। वर्षा के बाद जिन इलाकों में मौसम ठंडा हुआ, टिड्डी दल उसे छोड़ अपेक्षाकृत गर्म इलाकों की ओर प्रस्थान करता गया था। खाद्य और कृषि संगठन ने पिछली जुलाई में कहा था कि टिड्डियों का प्रकोप अधिकतम नवंबर माह तक रह सकता है लेकिन यह सिलसिला जब दिसंबर और जनवरी के ठंडे मौसम में भी बरकरार रहा तो कृषि वैज्ञानिक चौंके। टिड्डियां सर्दियों में अपने आप ही खत्म हो जाती हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन या किसी और वजह से इनका व्यवहार बदल गया है और ये कड़ाके की ठंड में भी कहर बरपाने लगी हैं। जहां अक्तूबर 1993 में ठंड के कारण सारी टिड्डियां मर गई थी, वहीं पिछले साल गर्मी में शुरू हुआ उनका प्रकोप इस वर्ष सर्दी का मौसम चरम पर होने के बावजूद जारी रहा। वैज्ञानिक अब यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर सर्दियों में खत्म हो जाने वाली टिड्डियां भीषण ठंड में भी कैसे अपना अस्तित्व बचाने में सफल हो रही हैं। वैज्ञानिकों का अभीतक यही मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसमों के बदलते पैटर्न ने ही टिड्डियों के जैविक व्यवहार में यह बदलाव किया है। संभवतः उन्हें घनघोर जाड़ों में भी किसी क्षेत्र विशेष में ज्यादा समय तक सुरक्षित रहने का अवसर मिल रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 June 2020


bhopal,Public Transport: Case Study of Leader-Officer Alliance

  डॉ. अजय खेमरिया लोक परिवहन सुविधा के अभाव में मध्य प्रदेश के लोग बुरी तरह से परेशान हैं। सड़कों पर यात्री वाहन नदारद है और नागरिकों के पास आने-जाने का कोई विकल्प नहीं है। किसान बोवनी के लिए बाजार जाकर खाद, बीज, कीटनाशक लाने के लिए या तो ट्रैक्टर का सहारा ले रहे हैं या बाइक। डीजल-पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों के चलते यह नया संकट किसानों की कमरतोड़ रहा है। किसानों के अलावा गरीब और निम्नमध्यवर्गीय परिवारों के सामने लोक परिवहन के आभाव ने रोजमर्रा के तमाम संकट खड़े कर दिए हैं। प्राइवेट बस ऑपरेटरों ने 22 मार्च से ही मध्य प्रदेश में बसें बन्द कर रखी हैं। ऑपरेटर लॉकडाउन अवधि का टैक्स माफ करने की मांग पर अड़े हुए है जो व्यवहारिक रूप से ठीक भी है।बहरहाल इस मामले को केवल कोविड संकट के सीमित दायरे में ही समझने की जरूरत नहीं है बल्कि यह अफ़सरशाही और नेताओं के गठजोड़ द्वारा जनता को दिया गया एक दर्दनाक दंश भी है। मप्र में 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने सड़क परिवहन निगम को बंद करने का इकतरफा निर्णय लिया था। दावा किया गया था कि निगम का घाटा लगातार बढ़ रहा है जबकि हकीकत यह थी लोक परिवहन के धंधे पर नेताओं की नजर काफी लंबे समय से थी और वे इसे सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कराकर इसपर एकाधिकार चाहते थे। आज मप्र में लगभग हर जिले में प्रभावशाली नेता बस ऑपरेटर है। पंजाब में ऑर्बिट बस सेवा बादल परिवार चलाता है जो पूरे पंजाब में सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कम्पनी है। बिहार में भी निगम बन्द कर दबंग नेताओं के लिए यह धंधा उन्मुक्त किया जा चुका है। राजस्थान में पिछली सरकार ने तो राजकीय निगम को बंद करने का निर्णय ले ही लिया था। दावा किया जाता है कि राजस्थान में निगम 2700 करोड़ के घाटे में है, वहाँ 20 हजार कर्मचारियों द्वारा इसे चलाया जाता है। दिल्ली निगम का यह घाटा 3991 करोड़ ,केरल का 755 करोड़ है। कुछ समय पूर्व देश के 54 में से 46 परिवहन निगमों के प्रदर्शन पर जारी रिपोर्ट में ओडीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश को छोड़कर शेष सभी निगमों के घाटे को रेखांकित किया गया है। उतर प्रदेश का बस निगम 72 साल पुराना है और देश के आठ राज्यों के लिए यहां से बसें चलाई जाती हैं। हिमाचल, कर्नाटक के निगम भी अपने दूरवर्ती इलाकों तक सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। एक दौर में मप्र परिवहन निगम भी फायदे का कारोबार कर नागरिकों को सस्ती और सुदूर इलाकों तक सेवाएँ उपलब्ध कराता था। मप्र की कहानी असल नेताओं और अफसरों की मिलीभगत की केस स्टडी भी है जिसका अनुशरण अधिकतर राज्य कर रहे हैं या कर चुके हैं। 1990 तक मप्र में निगम को अफसर चलाते थे लेकिन बाद में सरकार ने इसमें नेताओं को मंत्री दर्जा देकर बिठाना शुरू कर दिया। 1994 में आईएएस भगीरथ प्रसाद ने 450 कर्मचारियों की भर्ती कर ली जबकि उस समय 1500 कर्मी अतिशेष यानी सरप्लस थे। इनमें से अधिकतर नेताओं, अफसरों के नजदीकी थे। 1995 से 1997 के बीच आईएएस यूके शामल ने गोवा की एक कम्पनी से 400 बसें दो गुनी से ज्यादा कीमतों पर खरीदी जबकि ऐसी बसें निगम की तीन सर्वसुविधायुक्त कर्मशालाओं में आसानी से निर्मित हो सकती थी। 1998 से 2001 के मध्य के सुरेश ने 16 ऐसी निजी फाइनेंस कम्पनियों से 1 हजार बसें खरीदने के लिए 90 का ऋण 16 फीसदी ब्याज पर लिया और शर्त यह भी रखी गई कि अगर निगम किश्त चुकाने में नाकाम रहता है तो 18 से 36 फीसदी पैनल्टी वसूली जायेगी। जबकि सरकारी बैंकों में यही ऋण 10 फीसदी पर उपलब्ध था। इस तरह के स्वेच्छाचारी निर्णयों से निगम का दीवाला निकलना सुनिश्चित हो गया। जिस समय निगम में तालाबंदी की गई तब मासिक घाटा लगभग साढ़े तीन करोड़ ही था। हालांकि इसे बंद करने की प्रक्रिया तो 1993 से ही शुरू हो गई थी लेकिन दिग्विजय सिंह कैबिनेट में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था। 2005 में मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने इसे बगैर केंद्र सरकार की अनुमति के बंद कर दिया। जबकि 29.5 फीसदी केंद्रीय भागीदारी इन निगमों की रहती है। एकबार निगम के बन्द करने से आम आदमी किस तरह परेशान हो रहा है इसका भान इसे बंद करने वाले सुविधासम्पन्न लोगों को कभी नहीं हो सकता।भोपाल से 500, इंदौर से 400 और ग्वालियर, जबलपुर जैसे शहरों से लगभग 300 बसें औसतन 500 किलोमीटर तक की दूरी सफर करती थी। सुदूर गांव-देहातों को कवर करती इन बसों से कस्बाई और ग्रामीण लोकजीवन और आर्थिकी चला करती थी। आज ग्रामीण रूटों पर कोई बस नहीं है और केवल फायदे के राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही बसें चल रही हैं। 2013 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने निजी ऑपरेटरों के लिए अनुदान की घोषणा की लेकिन उसपर कोई अमल नहीं हुआ। 23 जून 2018 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूत्र बस सेवा का उद्घाटन किया। दावा किया गया नगरीय निकाय इनके संचालन को पूर्ववर्ती निगम से भी बेहतर करेंगे। केंद्र सरकार की अमृत और स्मार्टसिटी योजनाओं से फंड दिलाये गए। इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर खड़े किए गए लेकिन जिन 1600 बसों के संचालन का दावा था उनमें से आज 160 भी सड़कों पर नहीं है। मजबूर नागरिक निजी ऑपरेटर की मनमानी और लूट के शिकार हैं। बेहतर होगा कि मप्र सहित अन्य राज्य यूपी, ओडीसा, कर्नाटक, हिमाचल के मॉडल को अपनाकर अपने निगमों को पुनर्जीवित करें क्योंकि निम्नमध्यवर्गीय और गरीब आदमी के लिए आज सड़क तो है लेकिन परिवहन की सुविधा नहीं। डीजल-पेट्रोल की बढ़ती खपत रोकने के लिए भी सार्वजनिक परिवहन समय और पर्यावरण की मांग है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 June 2020


bhopal, Challenges of Self-reliant India

  अनिल निगम कोरोना वैश्‍विक महामारी के बाद अस्‍त-व्‍यस्‍त और पस्‍त हो चुकी अर्थव्‍यवस्‍था में जान फूंकने की दरकार है। यद्यपि केंद्र सरकार देश को आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए पहले ही 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा कर चुकी है। निःसंदेह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकल के लिए वोकल बनकर उसे ग्‍लोबल बनाने का सपना चुनौतियों को अवसर में बदलने का मूलमंत्र साबित हो सकता है। पर यह जितना दूर से सहज दिख रहा है, वह उतना ही जटिल है। भारत के आत्‍मनिर्भर बनने की राह में अनेक कांटे और चुनौतियां हैं। सरकार को सबसे पहले उन चुनौतियों से दो-चार होना पड़ेगा तभी लोकल की स्‍वीकार्यता और व्‍यापकता को धरातल पर उतारा जा सकता है। आत्‍मनिर्भरता की राह में बाधाओं का विश्‍लेषण करने के पूर्व मैं सबसे पहले आपको आत्‍मनिर्भर अभियान के पैकेज की कुछ विशेषताओं से वाकि‍फ कराना चाहूंगा। कोरोना वायरस महामारी की सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है। आत्मनिर्भर भारत अभियान में 3 करोड़ किसानों को 4.22 लाख करोड़ रुपये का कृषि ऋण दिया गया है। किसानों को यह ऋण 3 महीने तक वापस करने की आवश्‍यकता नहीं है। इस अभियान में केंद्र सरकार ने किसानों को मार्च और अप्रैल के बीच 86,600 करोड़ रुपये के 63 लाख ऋण कृषि क्षेत्र में दिए हैं। इसके साथ ही सहकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक को नाबार्ड ने 29,500 करोड़ रुपये दिए हैं। इसके अलावा विभिन्‍न राज्यों को ग्रामीण क्षेत्रों में इंफ्रास्‍ट्रक्चर के विकास के लिए 4200 करोड़ की मदद दी है। कोरोना काल के बाद प्रवासी मजदूर और शहरी गरीबों को परेशानी न हो, इसके लिए भी कई उपाय किए गए हैं। इसमें प्रवासी मजदूर के रहने और खाने के लिए स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड के रकम के उपयोग की इजाजत दी गई है। केंद्र सरकार ने प्रदेश सरकारों को 11000 करोड़ रुपये दिए हैं जिससे कि वह स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड की मदद से इनके लिए काम कर सकें। लॉकडाउन के दौरान अनेक प्रवासी मजदूर अपने गांव वापस चले गए हैं। मजदूरों को घर पर ही काम मिल सके, इसके लिए सरकार ने मनरेगा के माध्यम से मदद की पहल की है। 13 मई तक मनरेगा में 14.62 करोड़ मानव दिवस काम बनाया गया। इस तारीख तक वास्तव में मनरेगा पर खर्च 10,000 करोड़ हो चुके थे। इसके तहत देश के करोड़ों लोगों ने काम के लिए आवेदन किया। केंद्र सरकार ने श्रमिकों के लिए नये लेबर कोड की व्‍यवस्‍था की है। इस कोड से पूरे देश में एक जैसी न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था करने में मदद मिलने की उम्‍मीद है। साथ ही सभी श्रमिकों को समय पर भुगतान कराने में भी मदद मिलने की आशा है। इस समय न्यूनतम वेतन का फायदा सिर्फ 30 फ़ीसदी श्रमिक उठा पाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार का भारत को आत्‍मनिर्भर बनाने का सपना देश और समाज हित में है। आत्‍मनिर्भरता से आशय है कि भारत की निर्भरता निर्मित आया‍तित माल पर समाप्‍त हो जाए। भारत अपने देशवासियों की जरूरतों को पूरा कर सके। इसके अलावा वह विश्‍व के अनेक देशों को भारतीय निर्मित उत्‍पादों का निर्यात भी कर सके। हालांकि इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में सरकार के समक्ष अनेक बाधाएं और चुनौतियां हैं। वैश्‍विक महामारी कोरोना के कारण विश्व की अन्य दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था भी बेजार हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा है कि आत्‍मनिर्भरता के भवन का निर्माण करने के लिए पांच स्‍तंभों-अर्थव्‍यवस्‍था, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, सिस्‍टम, डेमोग्राफी और डिमांड की जरूरत होगी। नेशनल पाइपलाइन (एनआईपी) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ज‍नसंख्‍या के मामले में भारत विश्‍व में दूसरे, अर्थव्‍यवस्‍था में पांचवें और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के मामले में 70 वें स्‍थान पर है। कोरोना महामारी से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था बदहाल है। इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और तकनीकी सिस्‍टम को तो सुधारना ही होगा लेकिन देश में वीआईपी कल्‍चर और नौकरशाही के मकड़जाल में उलझ चुके कार्य व्‍यवहार को सुधारना सहज नहीं होगा। समरथ को नहीं दोष गोसाईं वाली कहावत भारत की नौकरशाही पर सटीक बैठती है। आज अगर किसी भारतीय को कोई उद्योग शुरू करना हो तो उसकी राह में कांटे ही कांटे हैं। अधिकारियों के रवैये से तंग आकर कई बार एक आम आदमी या तो भ्रष्‍ट लोगों की मुट्ठियां गर्म करने को मजबूर हो जाता है अथवा थक हारकर उद्योग लगाने का अपना निर्णय बदल देता है। गौरतलब है कि हमारे देश में अनेक उपकरण, मशीनें और कच्‍चा माल आज भी विदेशों से आयात करना पड़ता है। अगर आयात की जाने वाली मशीनों को यहीं पर बनाया जाता है तो यहां बनाने वाले उत्‍पादों की लागत बढ़ जाएगी। दूसरी ओर, महामारी के चलते देश का प्रवासी मजदूर बड़े शहरों को छोड़कर अपने गांवों को चले गए हैं। ऐसे में अनेक उद्योग बंद हो गए हैं। सभी मजदूरों को शहरों में फिर से वापस लाना सहज नहीं होगा। इसके लिए सरकार को बेहद सशक्‍त नीति बनानी पड़ेगी। लघु और सूक्ष्‍म उद्योगों को लगाने के लिए युवा पीढ़ी की एक फौज तैयार करनी पड़ेगी और यह काम देश के गांव से ही शुरू करना चाहिए। लेकिन उसके पहले गांवों में यातायात, बिजली, पानी और इंटरनेट की सुविधा के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को सशक्‍त करना होगा और साथ ही वहां कच्‍चे माल की उपलब्‍धता और निर्मित माल के लिए बाजार सुलभ कराना होगा। भारत को आत्‍मनिर्भर बनाने का लक्ष्‍य कठिन जरूर है पर नामुमकिन नहीं है। दृढ़ इच्‍छा शक्ति के साथ अनवरत प्रयास करने से भारत आत्‍मनिर्भरता की मंजिल को प्राप्‍त कर सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 June 2020


bhopal,Imperialist behavior in leftist dress

  प्रमोद भार्गव चीन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो चोला तो वामपंथी वैचारिकता का ओढ़े हुए है लेकिन उसके सभी आचरण निरंकुश और सम्राज्यवादी हैं। इसकी शुरुआत चीन ने 1950 में तिब्बत के दमन और वहां की जनता के साथ क्रूरता बरतते हुए किया था। माओत्से तुंग उस समय कम्युनिस्ट चीन के प्रमुख थे। इस आक्रामण को करने वाली सेना को जनमुक्ति सेना नाम दिया गया था। इस अमानवीय हमले को जरूरी बताते हुए वामपंथी नेताओं ने इसे मुक्ति अभियान का नाम दिया। उस समय प्रचारित किया गया कि चीनी सेना, तिब्बती जनता को प्रतिक्रियावादी शासन से मुक्त कराने के लिए तिब्बत में घुसी है। तब चीन की कम्युनिस्ट क्रांति और माओत्से तुंग के व्यक्तित्व से प्रभावित लोगों ने चीन के हाथों तिब्बत की स्वतंत्रता हथियाने के सैनिक हमले पर चुप्पी साध ली थी। भारत के कम्युनिस्टों ने भी अपने होठ लिए। किंतु डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने स्पष्ट तौर से कहा था कि `चीन का यह हमला भारतीय हितों पर आघात है। यह हमला करके चीन ने एक बालक को मार डालने का राक्षसी काम किया है।' इस चेतावनी के बावजूद नेहरू ने तिब्बत को चीन का अंग मानने की सौहार्दपूर्ण घोषणा करके चीन के दमन को सही ठहराने की बड़ी गलती कर दी थी। तत्काल तो चीन ने इस समर्थन के मिलने पर हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगाए और फिर इनकी ओट में पंचशील के पवित्र सिद्धांतों पर अतिक्रमण शुरू कर दिया। इसी का परिणाम 1962 में भारत पर चीन के हमले के रूप में देखने में आया। तबसे से लेकर आजतक चीन की साम्राज्यवादी लिप्सा सुरसा के मुख की तरह फैलती जा रही है और चीन इसे व्यापार के बहाने विस्तार दे रहा है। दरअसल चीन में कुछ समय पहले संविधान को संशोधित कर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों पर केवल दो बार बने रहने की शर्त हटा दी गई थी। इसके बाद से ही सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता शी जिनपिंग राष्ट्रपति और दूसरे बड़े नेता ली क्विंग प्रधानमंत्री बने हुए हैं। अब ये आजीवन बने रह सकते हैं। जिनपिंग को इस समय चीन में माओत्से तुंग माना जाता है। जीवनपर्यंत पद पर बने रहने की छूट के बाद जिनपिंग की साम्राज्यवादी लिप्सा बेलगाम होती जा रही है। वे चीन की केंद्रीय सैनिक समिति के अध्यक्ष भी हैं। इसलिए चीन का यह नेतृत्व पंचशील मसलन शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए ऐसे पांच सिद्वांतों को मानने को तैयार नहीं है, जिनपर इस संधि से जुड़े देश अमल के लिए वचनबद्ध हैं। पंचशील की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एनलाई ने 28 जून 1954 में की थी। बाद में म्यांमार ने भी इन सिद्धातों को स्वीकार लिया था। ये पांच सिद्धांत थे- संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का परस्पर सम्मान करनाए परस्पर रूप से आक्रामक नहीं होना, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों ने हस्तक्षेप नहीं करना और परस्पर लाभ एवं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के अवसर को बनाए रखना। लेकिन चीन परस्पर व्यापारिक लाभ के सिद्धातों को छोड़ सब सिद्धातों को नकारता रहा है। चीन सबसे ज्यादा उस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है जो भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा है। यही मनमानी चीन अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ कर रहा है। भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी चीन के लोकतांत्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा। यही वजह रही कि हम चीन की हड़प नीतियों व मंसूबों के विरुद्ध न तो कभी दृढ़ता से खड़े हो पाए और न ही कड़ा रुख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की भी उदारता जताई। इस खुली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की घुसपैठ शुरू हुर्ह। इन सैनिकों ने वहां की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई तेवर और धार्मिक संस्कारों में पर्याप्त दखलंदाजी कर दुनिया की छत को कब्जा लिया। ग्वादर बंदरगाह के निर्माण की शुरुआत चीन ने की थी लेकिन बाद में पाकिस्तान सरकार ने यह काम सिंगापुर की एक निर्माण कंपनी को दे दिया। धीमी गाति से निर्माण होने के कारण पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ रही थी। लिहाजा इस अनुबंध को खारिज कर पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्रिमण्डल ने यह काम चीन के सुपुर्द करने की मंजूरी दे दी। यह सौदा 1331 करोड़ रुपए का है। अब यह बंदरगाह लगभग बनकर तैयार है। चीन ने यहां अपना नौसेनिक अड्डा भी बना लिया है। अब यहां युद्ध के माहौल में युद्धपोतों की आवाजाही भी बढ़ जाने की आशंका है। यदि इसका उपयोग रक्षा संबंधी मामलों के परिपेक्ष्य में होने लग गया तो चीन यहां से मघ्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों की भी निगरानी करने लगेगा। गौरतलब है कि बलूचिस्तान में अशांत माहौल के बावजूद चीन यहां विकास कार्य करने का जोखिम उठा रहा है। जाहिर है चीन की रणनीतिक मंशा मजबूत है। इस बंदरगाह से चीन शिनचांग प्रांत के लिए तेल और गैस भी ले जा सकता है। लेकिन इस मकसद पूर्ति के लिए उसे मोटी और लंबी पाइपलाइन शिनचांग तक बिछानी होगी। यह काम लंबे समय में पूरा होने वाला जरूर है किंतु ऐसे चुनौतीपूर्ण कार्यों को चीन अंजाम तक पहुंचाता रहा है। 1999 में चीन ने मालदीव के मराओ द्वीप को गोपनीय ढंग से लीज पर ले लिया था। चीन इसका उपयोग निगरानी अड्डे के रूप में गुपचुप करता रहा। वर्ष 2001 में चीन के प्रधानमंत्री झू रॉंन्गजी ने मालदीव की यात्रा की तब दुनिया इस जानकारी से वाकिफ हुई कि चीन ने मराओ द्वीप लीज पर ले रखा है और वह इसका इस्तेमाल निगरानी अड्डे के रूप में कर रहा है। इसी तरह चीन ने दक्षिणी श्रीलंका के हंबनतोता बंदरगाह पर एक डीप वाटर पोर्ट बना रखा है। चीन ने श्रीलंका में इस बंदरगाह समेत अन्य विकास कार्यों के लिए 520 अरब रुपए उधार दिए थे। श्रीलंका एक छोटा व कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश है, लिहाजा वह इस राशि को लौटाने में असमर्थ रहा। इसके बदले में चीन ने 99 वर्ष के लिए हंबनतोता बंदरगाह लीज पर ले लिया। भारतीय रणनीतिक क्षेत्र के हिसाब से यह बंदरगाह बेहद महत्वपूर्ण है। यहां से भारत के व्यापारिक और नौसेनिक पोतों की आवाजाही बनी रहती है। बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह के विस्तार के लिए चीन करीब 46675 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। इस बंदरगाह से बांग्लादेश का 90 प्रतिशत व्यापार होता है। यहां चीनी युद्धपोतों की मौजदूगी भी बनी रहती है। म्यांमार के बंदरगाह का निर्माण भारतीय कंपनी ने किया था लेकिन इसका फायदा चीन उठा रहा है। चीन यहां पर तेल और गैस पाइपलाइन बिछा रहा है जो सितवे गैस क्षेत्र से चीन तक तेल व गैस पहुंचाने का काम करेगी। इन बंदरगाहों के कब्जे से चीन की राजनीतिक व सामरिक पहुंच मध्य-एशिया से होकर पाकिस्तान और मध्य-पूर्व तक लगभग हो गई है। दक्षिण चीन सागर पर चीन ने इतना निर्माण कर लिया है कि वह उसे अपना ही हिस्सा मानने लगा है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर एक साथ तीन आलीशान बांधों का निर्माण कर रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत के असम और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्र की प्रमुख नदी है। करोड़ों लोगों की आजीविका इसी नदी पर निर्भर है। इन बांधों के निर्माण से भारत को यह आशंका बढ़ी है कि चीन ने कहीं पानी रोक दिया तो नदी सूख जाएगी और नदी से जुड़े लोगों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी। एक आशंका यह भी बनी हुई है कि चीन ने यदि बांधों से एक साथ ज्यादा पानी छोड़ा तो भारत में तबाही की स्थिति बन सकती है और कम छोड़ा तो सूखे की। इस लिहाज से जो जलीय मामलों के विशेषज्ञ हैं वे चाहते थे कि बांधों का निर्माण रोक दिया जाए। इस मुद्दे पर चीन बस इस बात के लिए राजी हुआ है कि मानसून के दौरान अपने हाइड्रोलॉजिकल स्टेशनों के जलस्तर व जल प्रवाह की जानकारी दिन में दो बार देता रहेगा। तय है कि शंकाएं बरकरार रहेंगी।दरअसल, पंचशील जैसी लोकतंत्रिक अवधारणाएं चीन के लिए उस सिंह की तरह हैं जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणियों का शिकार करते हैं। चेकोस्लोवाकिया, तिब्बत और नेपाल को ऐसे ही मुखौटे लगाकर चीन जैसे साम्यवादी देश ने बरबाद किया है। पाक आतंकियों को भी चीन, भारत के खिलाफ छायायुद्ध के लिए उकसाता है। दरअसल चीन के साथ दोहरी मुश्किल यह है कि वह बहु ध्रुवीय वैश्विक मंच पर तो अमेरिका से लोहा लेना चाहता है। किंतु एशिया महाद्वीप में चीन एक ध्रुवीय वर्चस्व का पक्षधर है। इसलिए जापान और भारत को जब-तब उकसाने की हरकतें करता रहता है। चीन के इन निरंकुश विस्तारवादी मंसूबों से साफ होता है कि इस वामपंथी देश के लिए पड़ोसी देशों की सांस्कृतिक बहुलता, सहिष्णुता, शांति और पारस्परिक समृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 June 2020


bhopal,Corona: Google-Apple together will break the chain of infection!

  योगेश कुमार गोयल पिछले कुछ महीने से विभिन्न देशों द्वारा कोरोना संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। कई देशों ने लॉकडाउन को एक कारगर हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया तो कईयों ने इसके लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया है। संक्रमण की चेन तोड़ने के इन्हीं प्रयासों की ऐसी आधुनिक तकनीकों में विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा कुछ मोबाइल एप के जरिये करोड़ों लोगों की पल-पल ट्रैकिंग किया जाना भी शामिल है। विश्व बैंक की दक्षिण आर्थिक केन्द्रित रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि कोरोना के प्रसार की निगरानी के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर आबादी को शिक्षित करने व संक्रमण को ट्रेस करने में ये तकनीकें मददगार हो सकती हैं। भारत में कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए जहां ‘आरोग्य सेतु एप’ का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं दुनिया के कई अन्य देश भी ऐसी ही अलग-अलग तकनीकों के सहारे कोरोना पर लगाम कसने के प्रयासों में जुटे हैं। सिंगापुर तथा ताइवान में सार्वजनिक स्थानों पर मोबाइल एप तथा क्यूआर स्कैन कोड के जरिये नए आगंतुकों की सतत निगरानी की जा रही है जबकि चीन के कई शहरों में हेल्थ कोड सिस्टम का प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें कलर कोड के माध्यम से कोरोना संक्रमण के खतरे के स्तर का पता लगाया जाता है। कोरोना से जंग में संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए गूगल तथा एपल जैसी दुनिया की प्रख्यात टैक कम्पनियां भी मैदान में कूद चुकी हैं। दोनों कम्पनियों ने स्मार्टफोन के लिए एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो कांटैक्ट ट्रेसिंग में मदद करने के साथ यूजर्स को सूचित भी करेगा कि वे कोविड-19 संक्रमित व्यक्तियों के सम्पर्क में आए हैं या नहीं। एपल तथा गूगल द्वारा मिलकर एक ऐसा विशेष प्लेटफॉर्म ‘एक्सपोजर नोटिफिकेशन एपीआई कांटैक्ट ट्रेसिंग’ भी लांच किया जा चुुका है, जिससे कोरोना संक्रमितों का पता लगाना आसान हो जाएगा। यह प्लेटफॉर्म ऐसे लोगों के सम्पर्क में आने वालों को चेतावनी भेजेगा। 22 देश तथा अमेरिका के कई राज्य इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने की इजाजत मांग चुके हैं। किसी भी देश की सरकार ही अपनी एप को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ सकती है और इसका इस्तेमाल सरकार तथा उसका स्वास्थ्य विभाग ही कर सकता है। एपल तथा गूगल का कहना है कि प्राइवेसी और सरकार द्वारा लोगों के डाटा को इस्तेमाल करने से बचाना उनकी प्राथमिकता है। दरअसल यह सिस्टम ब्लूटूथ सिग्नल के जरिये काम करेगा और इसमें यूजर्स की निजता भंग होने से बचाने के लिए जीपीएस लोकेशन तथा उसके डाटा के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक रहेगी। हालांकि यह केवल एक प्लेटफॉर्म है, कोई एप नहीं और इसे दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियां अपने एप के साथ जोड़ सकती हैं। एपल के सीईओ टिम कुक के मुताबिक यह तकनीक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए कोरोना संक्रमितों की पहचान में मददगार साबित होगी। वैसे भारत के इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक सिंह का कहना है कि भारत का आरोग्य सेतु एप इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है। मैप्स की मदद से गूगल अब ऐसी व्यवस्था भी बना रहा है, जिससे यूजर्स जान सकेंगे कि किस सड़क पर अथवा बिल्डिंग में कितनी भीड़ है ताकि लोग वहां जाने को लेकर निर्णय कर सकें। सरकारें इसका उपयोग यह जानने में कर सकती हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का सही तरीके से पालन हो रहा है या नहीं। पहले से ही दुनियाभर में करोड़ों यूजर्स की गतिविधियों को ट्रैक करती रही गूगल, फेसबुक तथा ऐसी ही कुछ जानी-मानी कम्पनियों की मदद से अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी ‘माई हैल्थ’ नामक एक एप बना रहा है। इस एप की मदद से डब्ल्यूएचओ बताने में सक्षम हो सकेगा कि कहां-कहां बीमारियां फैल चुकी हैं और कहां फैलने वाली हैं। बहरहाल, दुनियाभर में लाखों लोगों की जान ले चुके कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है लेकिन कई स्थानों पर एप के जरिये डाटा और निजता की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में तकनीक के सहारे कोरोना पर प्रहार करने के लिए विभिन्न एप का इस्तेमाल करते हुए डाटा और निजता की सुरक्षा को लेकर भी तमाम सरकारों द्वारा अपेक्षित कदम उठाए जाने चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 June 2020


bhopal,Ayurveda: Our loyalty and the spanking of multinational companies

  डॉ. मोक्षराज भारत में ही नहीं बल्कि प्राचीन सभ्यताओं वाले अनेक देशों को सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं सामाजिक स्तर पर पंगु बनाने के लिए अंग्रेजों के षड्यंत्रों की जितनी निंदा की जाए कम है। उन्होंने भारत की प्रतिभाओं को भी हीनभावना से ग्रस्त करने के लिए 200 वर्ष पहले ही खाका तैयार कर लिया था। भारत के पावन सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रहार करने के लिए जहाँ उन्होंने प्रोफ़ेसर मैक्समूलर को दायित्व सौंपा, वहीं भारतीय शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने के लिए लार्ड मैकाले को आगे किया। भारतीय समाज की सुदृढ़ व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए भी इन्होंने भेदभाव व फूट की नीति का अनुसरण किया। भारत के कला-विज्ञान की चोरी कर ये रि-इंजीनियरिंग करते रहे हैं, साथ ही वे चिकित्सा के क्षेत्र में भी अपने षड्यंत्रों से बाज़ नहीं आए तथा उनके द्वारा सन् 1835 के बाद आयुर्वेद की परंपरा को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया जाना आरम्भ हुआ। भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तथा कुछ दशकों बाद तक हमारी आयुर्वेद की विद्या स्वाभाविक रूप से गाँव-गाँव तक प्रचलित थी। भारत के गाँव एवं नगरों में प्रायः निःशुल्क या नगण्य द्रव्य में गंभीर से गंभीर रोग का आयुर्वेदिक उपचार हो जाता था। क्योंकि भारतीय धर्मशास्त्रों में रस विक्रय, शहद, दूध-घी एवं औषधि के विक्रय को निंदनीय माना गया है, अतः अधिकांश आयुर्वेदिक चिकित्सक उसी पावन परंपरा का आश्रय लेते थे, जिसे कालांतर में मूल्यहीनता के अंधेरे में धकेल दिया गया। प्रायः सभी गांवों में एक-दो कुशल वैद्य सहजता से मिल ही जाते थे एवं गाँव के चरवाहे, ग्वाले तथा साधारण किसान भी अपने आसपास या जंगल की सैकड़ों औषधियों-वनस्पतियों के गुण-दोष एवं उनके उपयोग को भलीभाँति जानते थे। किन्तु कालांतर में अंग्रेज़ी ढर्रे से केवल साक्षर हुए हम लोग उस परंपरा से इतने दूर चले गये कि हमारा मस्तिष्क बॉटनी व आयुर्वेद विषय के द्वारा भी अंग्रेज़ी नामों की भेंट चढ़ने लगा। जिस गोचर भूमि या जंगल में ऋतु अनुसार औषधियाँ नैसर्गिक रूप से उगती व पनपती थी, वह भूमि या तो एलोपैथिक चिकित्सालय या किसी सरकारी योजना के लिए घेर ली गईं या बिलायती बबूल अथवा घातक गाजर-घास से ढंक गई या फिर उसपर भू-माफ़िया ने कंक्रीट का ढेर निर्मित कर दिया। विभिन्न दवा कम्पनियों के लुभावने प्रचार व सूटबूट वाले प्रचारकों तथा आकर्षक पैकिंग ने भारत के जनमानस व सत्तासीनों के हृदय में यह भ्रम फैलाने में सफलता पाई कि चिकित्सा के नाम पर केवल ऐलोपैथी ही श्रेष्ठ है। अंग्रेज़ी दवाओं के व्यापार की मोहिनी ने सरकारों को इतना सम्मोहित कर दिया था कि वे 2013-14 तक भी चिकित्सा सुविधाओं के नाम पर घोषित बजट का 98.3% भाग केवल ऐलोपैथी से संबन्धित विभिन्न योजनाओं के खाते में डालने लगे तथा शेष बचे 1.7% बजट में आयुर्वेद, योग-प्राकृतिक, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी आदि को समेटते थे। उदाहरण के तौर पर 2013-14 में पूर्व सरकारों ने आयुष के लिए सर्वाधिक बजट रखा जो ऐलोपथिक की तुलना में औसतन 1:60 था। जहाँ हैल्थ एंड फैमिली वेलफेयर, नव राष्ट्र हैल्थ मिशन तथा मेडिकल एडजुकेशन के निमित्त 63336 करोड़ था वहीं आयुर्वेद, योग-प्राकृतिक, यूनानी, सिद्धा, होम्योपैथी को 1069 करोड़ ही था। आयुर्वेद पद्धति को हतोत्साहित करने के लिए इससे बड़ा क्या प्रमाण हो सकता है। आयुर्वेद सहित अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों के साथ निरंतर यही सौतेला व्यवहार कई दशकों तक चलता रहा। जिसके कारण एक ओर जहाँ आयुर्वेद विभाग में नीरसता व हीन भावना उत्पन्न हुई और उसके कार्मिक कुंठा का शिकार होने लगे। वहीं दूसरी ओर ऐलोपैथी का अहंकार आसमान छू रहा था। आयुर्वेद के साथ हो रहे इस अन्याय, अत्याचार व सौतेले व्यवहार से भारत के अनेक उच्च कोटि के वैद्य बहुत चिंतित थे, किंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में बिक चुका तंत्र भारत की मूल परंपरा का शत्रु बन बैठा था। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अंग्रेज़ी दवाओं के उत्पादन और वितरण का भी ऐसा मकड़़जाल बुना गया कि उसमें भारत की सरकारों के निर्णय भी अदूरदर्शी सिद्ध हुए। घर को लगी थी आग घर के चिराग से। ऐसी विकट परिस्थिति में भी कुछ गुरुकुलों, धर्मार्थ ट्रस्टों ने आयुर्वेद की परंपरा को बचाए रखने का प्रयत्न जारी रखा। इन संस्थाओं में काँगड़ी गुरुकुल, झज्जर गुरुकुल, डावर, कालेडा, मोहता, ऊँझा, हमदर्द आदि प्रमुख फार्मेसी संघर्ष कर रही थीं। किन्तु, विगत 20 वर्ष से पतंजलि योगपीठ व दिव्य योग मंदिर ने इस दिशा में एक विशाल क्रांति का सूत्रपात किया जिसके परिणामस्वरूप स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण ने कुछ हद तक 200 वर्षों से चले आ रहे विदेशी षड्यंत्रों के चक्रव्यूह को तोड़ डाला तथा देश विदेश की जो एलोपैथी से जुड़ी जानी-मानी संस्थाएँ व उनके नुमाइंदे पतंजलि का मज़ाक उड़ाते थे, वे तथा उनके हजारों चहेते अपने रोगियों को आसन, प्राणायाम, ध्यान, एलोवेरा तथा गिलोय का सेवन करना लाभप्रद बताने लगे। आयुर्वेद एवं अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को महत्व देने के लिए 6 वर्ष पूर्व मोदी सरकार ने आयुष मंत्रालय के रूप में एक स्वतंत्र अस्तित्व विकसित किया तथा श्रीपद नाईक को उसका पहला मंत्री नियुक्त कर अपनी सकारात्मक नीयत व इच्छा शक्ति का परिचय दिया। इसी मंत्रालय के माध्यम से विश्व भर में योग दिवस की धूम मची तथा भारत ने यह प्रमाणित किया कि वह किसी मानव के साथ सौदा नहीं बल्कि सच्ची सेवा करना चाहता है। यही कारण रहा कि भारत ने योग को बेचा नहीं बल्कि जन-जन को परोसा है। भारत का यह पवित्र कार्य उन धूर्त्त ताक़तों के गाल पर तमाचा है, जिन्होंने विश्व को केवल एक बाज़ार मानकर दर्द से कराहती मनुष्यता को कई दशकों तक लगातार लूटा है। लागत से कई सौ व कई हजार गुना मुनाफ़ा कमाकर भी जिन लोगों का पेट नहीं भरा था, उन निर्दयी ड्रग माफ़ियाओं ने अनेक ग़रीब देशों के नागरिकों के अंगों तक को बेचने में संकोच नहीं किया। साथ ही ऐलोपैथिक दवाओं के साइड इफ़ेक्ट एवं अनेक कंपनियों द्वारा आयुर्वेद के नुस्खों को चुराकर अंग्रेज़ी दवाओं में बदलने की एक अलग ही कहानी है! वर्षों से सम्पूर्ण विश्व का उत्पीड़न करने वाली इन राक्षस कंपनियों को बाबा रामदेव से तक़लीफ़ तो होगी ही। स्वामी रामदेव अपने देश की सेवा के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में योग के प्रचार के लिए भी जाने जाते हैं। वे अपने लाइव कार्यक्रमों में लोगों को नि:शुल्क परामर्श देकर अपनी उदार संत परंपरा का परिचय देते हैं। सही मायने में देखा जाए तो वे अपनी औषधियाँ या अन्य द्रव्य बेचते नहीं बल्कि भारत की विभिन्न समस्याओं से लड़ने व धूर्त्त ड्रग माफ़ियाओं की विदाई के लिए अपेक्षित अर्थतंत्र तैयार करते हैं। उनके हृदय में सदैव आयुर्वेद के उत्थान की धड़कन स्पष्ट सुनाई देती है। स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण ने संपूर्ण विश्व का बड़ा उपकार किया है, वे किस