दखल क्यों


bhopal, Two revolutions are necessary in India

डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत में दो क्रांतियों की तत्काल जरूरत है। इन दो क्रांतियों को करने के लिए सबसे पहले भारत को एक राष्ट्र बनाना होगा। भारत इस वक्त एक राष्ट्र नहीं है। एक भारत है और दूसरा 'इंडिया' है। यह 1947 के भारत-विभाजन से भी ज्यादा खतरनाक है। 1947 में भारत के दो टुकड़े करने के लिए हम गांधी और नेहरू को दोषी ठहराते हैं लेकिन भारत और इंडिया के विभाजन का दोषी कौन नहीं है? दिल्ली में बनी अबतक की सरकारें, पार्टियां और नेतागण हैं। कौन-सी ऐसी प्रमुख पार्टी है, जो केंद्र या प्रदेशों में सत्तारूढ़ नहीं रही है लेकिन किसी ने भी शिक्षा और स्वास्थ्य में बुनियादी परिवर्तन नहीं किया। सभी अपनी रेलें अंग्रेजों की बनाई पटरी पर चलाते रहे हैं। वर्तमान सरकार ने नई शिक्षा नीति बनाई है। उसमें कुछ सराहनीय मुद्दे हैं लेकिन वे लागू कैसे होंगे? हमारे बच्चे भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ेंगे लेकिन नौकरियां उन्हें अंग्रेजी के माध्यम से मिलेंगी। सिर्फ मजबूर लोग ही अपने बच्चों को बेकारी की खाई में ढकेलेंगे। जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ेंगे, वे नौकरियों, रुतबे और माल-मत्ते पर कब्जा करेंगे। ये 'इंडिया' के लोग होंगे। इनमें से जिसको भी मौका मिलेगा, वह विदेश भाग खड़ा होगा। जरूरी यह है कि सारे देश में शिक्षा की पद्धति एक समान हो। नैतिक शिक्षा, व्यायाम और ब्रह्मचर्य पर जोर दिया जाए। गैर-सरकारी स्कूलों-कालेजों को खत्म नहीं किया जाए लेकिन उनमें और सरकारी स्कूल-कालेजों में कोई फर्क न हो। न फीस का, न माध्यम का और न ही गुणवत्ता का! सरकारी नौकरियों में से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो। यही क्रांति स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में जरूरी है। चिकित्सा के मामले में भारत बहुत पिछड़ा हुआ है। इंडिया बहुत आगे है। इंडिया के लोग 25-25 लाख रु. खर्च करके कोरोना का इलाज करवा रहे है। लेकिन ग्रामीण, गरीब, दलित, आदिवासी लोगों को मामूली दवाइयां भी नसीब नहीं हैं। तो क्या करें? करें यह कि सभी गैर-सरकारी अस्पतालों पर कड़े कायदे लागू करें ताकि वे मरीजों से लूटपाट न कर सकें। कई नेताओं और अफसरों ने मुझसे पूछा कि गैर-सरकारी अस्पतालों और स्कूलों पर ये प्रतिबंध लगाए जाएंगे तो शिक्षा और चिकित्सा का स्तर क्या गिर नहीं जाएगा? वे सरकारी अस्पतालों और स्कूलों की तरह निम्नस्तरीय नहीं हो जाएंगे? इसका बेहद असरदार इलाज मैं यह सुझाता हूं कि राष्ट्रपति से लेकर नीचे तक सभी कर्मचारियों और चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि वे अपने बच्चों को सिर्फ सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएं और अपने परिवार का इलाज सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही कराएं। देखें, रातोंरात भारत की शिक्षा और चिकित्सा में क्रांति होती है या नहीं? (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal,Guru engaged, sacrificial ritual , donating knowledge

मुरली मनोहर श्रीवास्तव शिक्षा देने वाले शिक्षक तो देश में लाखों की संख्या में हैं लेकिन कुछ ऐसे विरले शिक्षक भी हैं, जो अपनी अनोखी शिक्षण शैली के कारण देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं। हम जिन शिक्षकों के बारे में आपको बताने जा रहे हैं, वे बहुत अलग और अनोखे हैं। सोनम वांगचुक आपने '3 इडियट्स' फिल्म में आमिर खान को जिस शख्सियत का किरदार निभाते देखा था, वास्तव में वे हैं लद्दाख के शिक्षाविद् सोनम वांगचुक। बीते तीन दशकों से शिक्षा की अलख जगाए रखने वाले शिक्षक और मैकेनिकल इंजीनियर वांगचुक उन चंद भारतीय लोगों में से हैं, जिन्हें उनके अनोखे प्रयास के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने सरकार, समाज और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर शिक्षा को व्यावहारिक और उपयोगी बनाने के अनूठे प्रयास किए हैं। लद्दाख जैसे शिक्षा के मामले में पिछड़े इलाके के छात्रों में शिक्षा के प्रति जो जागरुकता आई है, उसका श्रेय इन्हीं को जाता है। फेल होने वाले छात्रों की शिक्षा के लिए भी इन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था की है, जो उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। सुगत मित्रा 2013 में टीइडी (टेक्नोलॉजी, एंटरटेनमेंट, डिजाइन) अवार्ड से सम्मानित हो चुके, कोलकाता से ताल्लुक रखने वाले सुगत मित्रा के 'स्कूल इन द क्लाउड' का कॉन्सेप्ट यह है कि बच्चे ही एक-दूसरे को पढ़ाएं। पेशे से एजुकेशनल रिसर्चर सुगत मित्रा का मानना है कि बच्चों में खुद पढ़ने और दूसरों को पढ़ाने की अद्भुत क्षमता होती है। उनका यह भी मानना है कि अगर हम अपने बच्चों को कंप्यूटर की पर्याप्त सुविधा दें तो वे काफी कुछ खुद ही सीख सकते हैं। उन्हें मिनिमम गाइडेंस के साथ कंप्यूटर की शिक्षा मोटिवेशन और एंटरटेनमेंट के माध्यम से दे सकते हैं। गगन दीप सिंह राजस्थान के जैसलमेर के रहने वाले गगनदीप सिंह ने अबतक दर्जनों दृष्टिहीन बच्चों की जिंदगी में शिक्षा के दीप जलाकर उनकी जिंदगी रोशन की है। इन्होंने हर बच्चे की समस्या के अनुसार अलग शैक्षिक प्रोग्राम बनाया और उसे पढ़ाया। बच्चों के साथ-साथ इन्होंने उनके परिवारों की भी काउंसलिंग की ताकि वे अपने बच्चे को फुल सपोर्ट दे सकें। गगनदीप सिंह ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ द विजुअली इंपेयर्ड में प्रशिक्षण लिया है। ये बच्चों को ब्रेलर्स जैसे इक्विपमेंट का उपयोग भी सिखाते हैं। बाबर अली पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाले बाबर अली ने उस उम्र से शिक्षक की भूमिका निभानी शुरू कर दी, जिस उम्र में लोग खुद पढ़ना सीखते हैं। जी हां! बाबर अली 9 वर्ष की उम्र से लोगों को पढ़ा रहे हैं। आज 23 साल के हो चुके बाबर अली किसी तरह से बनाए अपने स्कूल में 300 से ज्यादा गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इस काम के लिए उन्होंने 6 शिक्षकों को भी रखा है। आदित्य कुमार 'साइकिल गुरुजी' के नाम से मशहूर साइंस ग्रेजुएट आदित्य कुमार शिक्षा के सच्चे वाहक और प्रसारक हैं। ये शिक्षा को उन जगहों तक पहुंचाते हैं, जहां तक स्कूलों की पहुंच नहीं। आदित्य हर रोज अपनी साइकिल पर सवार होकर 60-65 किलोमीटर सफर करके लखनऊ के आसपास के इलाकों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। स्वयं गरीब परिवार में जन्मे आदित्य 1995 से यह अनोखा कार्य कर रहे हैं। आदित्य अपने साथ साइकिल पर ही एक बोर्ड लेकर घूमते हैं। जहां उन्हें कुछ छात्र मिलकर रोक लेते हैं, वे वहीं बैठकर पढ़ाने लगते हैं। अरविंद गुप्ता खेल-खेल में बच्चों को विज्ञान जैसे गूढ़ विषय का ज्ञान देना कोई अरविंद से सीखे। ये बच्चों को खिलौने बनाने की प्रक्रिया के माध्यम से विज्ञान के पाठ पढ़ा देते हैं। खिलौने भी बाजार से खरीदे मैटीरियल से नहीं बनवाते बल्कि कबाड़ से बनवाते हैं। खिलौने बनाने के एक-एक चरण के माध्यम से वे विज्ञान की कोई नई बात सिखा देते हैं। ये अपनी फन टीचिंग टेकनीक के वीडियो यू-ट्यूब पर भी अपलोड करते हैं। राजेश कुमार शर्मा 'अंडर द ब्रिज स्कूल' के संस्थापक राजेश कुमार शर्मा दिल्ली के एक मेट्रो ब्रिज के नीचे लगभग 200 बच्चों का स्कूल लगाते हैं। उनके छात्र आसपास की बस्तियों में रहने वाले बच्चे हैं, जिन्हें अपनी गरीबी के कारण कभी स्कूल जाने का सौभाग्य नहीं मिला। इनके स्कूल में भले ही कोई इमारत, कुर्सी या अन्य सुविधाएं न हों लेकिन बच्चों को शिक्षा अच्छी तरह दी जाती है। यह स्कूल इन्होंने 2005 से शुरू किया। कभी-कभी यहां कुछ चर्चित शख्सियतों को भी बुलाया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि राजेश कुमार पेशे से कभी शिक्षक नहीं रहे। आनंद कुमार बिहार के पटना जिले के रहने वाले शिक्षक आनंद कुमार न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स के बीच एक चर्चित नाम हैं। इनका 'सुपर 30' प्रोग्राम विश्व प्रसिद्ध है। इसके तहत वे आईआईटी-जेईई के लिए ऐसे तीस मेहनती छात्रों को चुनते हैं, जो बेहद गरीब हों। 2018 तक उनके पढ़ाए 480 छात्रों में से 422 अबतक आईआईटीयन बन चुके हैं। आनंद कुमार की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि डिस्कवरी चैनल भी उनपर डॉक्यूमेंट्री बना चुका है। उन्हें विश्व प्रसिद्ध मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और हार्वर्ड युनिवर्सिटी से भी व्याख्यान का न्योता मिल चुका है। आरके श्रीवास्तव बिहार के रोहतास जिले के रहने वाले आरके श्रीवास्तव देश में मैथेमैटिक्स गुरु के नाम से मशहूर हैं। चुटकुले सुनाकर खेल-खेल में जादुई तरीके से गणित पढ़ाने का उनका तरीका लाजवाब है । कबाड़ की जुगाड़ से प्रैटिकल कर गणित सिखाते हैं। सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा लेकर स्टूडेंट्स को पढ़ाते हैं, आर्थिक रूप से सैकड़ों गरीब स्टूडेंट्स को आईआईटी, एनआईटी, बीसीईसीई सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानों मे पहुँचाकर उनके सपने को पंख लगा चुके हैं। वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्डस और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी आरके श्रीवास्तव का नाम दर्ज है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली की प्रशंसा कर चुके हैं। इनके द्वारा चलाया जा रहा नाइट क्लासेज अभियान अद्भुत, अकल्पनीय है । स्टूडेंट्स को सेल्फ स्टडी के प्रति जागरूक करने लिये 250 क्लास से अधिक बार पूरी रात लगातार 12 घंटे गणित पढ़ा चुके हैं। विश्व प्रसिद्ध गूगल ब्वॉय कौटिल्य के गुरु के रूप में भी देश इन्हें जानता है। रोशनी मुखर्जी बैंगलुरु से ताल्लुक रखने वाली डिजिटल टीचर रोशनी मुखर्जी न तो कहीं पढ़ाने जाती हैं, न उन्होंने कोई स्कूल खोल रखा है। इसके बावजूद वे हजारों स्टूडेंट्स की फेवरेट टीचर हैं। असल में रोशनी ने अपना ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म बना रखा है, जिसका लाभ हजारों विद्यार्थी उठा रहे हैं। ये अपने वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड करती हैं, जिनकी मदद से स्टूडेंट्स पढ़ाई करते हैं। उन्हें अपने विद्यार्थियों से लगातार फीडबैक भी मिलता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal, Those who harp in Kashmir come hawk

आर.के. सिन्हा जम्मू-कश्मीर के नज़रबंद नेताओं ने रिहा होते ही फिर पुरानी खुराफात चालू कर दी है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, माकपा तथा जम्मू-कश्मीर अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने हाल ही में यह मांग कर दी कि भारत सरकार राज्य के लोगों को वो सारे अधिकार फिर से वापस लौटाए जो पाँच अगस्त 2019 से पहले उनको हासिल थे। मतलब यह कि वे चाहते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 370 की पुनः बहाली हो जो संसद के दोनों सदनों ने रद्द कर दिया है, ताकि ये मौज कर सकें। ये तो भारत के कट्टर शत्रु चीन और पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। दोनों देश भी यही चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की पुनः बहाली करे। इन नेताओं की बैठक में प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसे गुपकार घोषणापत्र नाम दिया गया था। हालांकि इन नेताओं की मांग ख्वाबों में भी पूरी होती नहीं दिख रही। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के हक में संसद और सरकार के साथ सारा देश खड़ा था। आखिर पता तो चले कि अनुच्छेद 370 में क्या बात है जिसकी मांग कश्मीरी नेता कर रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि अनुच्छेद 370 कश्मीर और भारत को एक-दूसरे से पूरी तरह नहीं जोड़ती था? गृहमंत्री अमित शाह ने सही कहा था कि अनुच्छेद 370 ने भारत और दुनिया के मन में यह गलत और भ्रामक शंका पैदा कर दी थी कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है या नहीं? सारा देश जानता है कि बिना अपनी कैबिनेट को विश्वास में लिए आकाशवाणी के माध्यम से कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की विवादास्पद घोषणा पंडित जवाहर लाल नेहरू ने की थी। किधर हैं हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता पाकिस्तान से चंदा मांगने वाले अब यह मांग कर रहे कि कश्मीर में पुरानी व्यवस्था फिर बहाल हो। अब किधर हैं हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता? वे तो दिन-रात पाकिस्तान का ही गुणगान किया करते थे। सारा देश भलीभांति जानता है कि अनुच्छेद 370 के कारण ही कश्मीर में अलगाववाद बढ़ा था। क्या अब्दुल्ला या महबूबा मुफ्ती ने कभी राज्य के अल्पसंख्यकों के हक भी बोला? क्या वहां हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख नहीं रहते? अनुच्छेद 370 से राज्य के अल्पसंख्यकों के साथ घोर अन्याय हो रहा था। राज्य में 1989 से लेकर 2019 तक हजारों लोग बिना वजह मारे गए। अब जब वहां हालात सामान्य हो चुके हैं तो फिर देश क्या उसी पुराने रास्ते पर चले जिसपर वह पिछले 70 सालों से गलत ढंग से चल रहा था? क्यों कश्मीर के नेता या उनके लिए आंखें नम करने वाले हिमायती यह नहीं बताते कि अनुच्छेद 370 किस तरह कश्मीर का कल्याण कर रहा था? यह विकास, महिला, गरीब विरोधी और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला था और वहां के मुठ्ठी भर परिवारों को भ्रष्टाचार की खुली छूट दे रखी थी जो पूरी तरह बंद हो जाने से वहां के इन भ्रष्ट नेताओं में बेचैनी फैली हुई है। जिस अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग हो रही है, उसकी वजह से राज्य में बाल विवाह कानून लागू नहीं कर सकते थे? क्या कश्मीरी नेता फिर से यही चाहते हैं? इसी के चलते वहां कभी अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना। वहां हिन्दू, जैन, सिख और बौद्ध अल्पसंख्यकों के रूप रहते हैं। हालांकि शिक्षा का अधिकार देश की संसद ने सबको दिया पर जम्मू-कश्मीर के बच्चों को यह अधिकार नहीं था क्योंकि वहां अनुच्छेद 370 लागू था। कश्मीर में अब खारिज कर दिए गए ये नेता यह क्यों नहीं बताते कि राज्य में आरटीआई एक्ट लागू क्यों नहीं हो पाया? इसी धारा 370 के कारण न? ऐसे अनेकों उदहारण हैं जिससे कश्मीर में घोर असमानता, अन्याय, अत्याचार और खुले भ्रष्टाचार को छूट मिली हुई थी। शांति की बहाली बहरहाल, कश्मीरी नेताओं की बैठक में कांग्रेस का कोई नुमाइंदा नहीं था। यह अच्छी बात कही जा सकती है। तो क्या माना जाए कि कांग्रेस ने भी अब महसूस करना चालू कर दिया है कि उसका अबतक राज्य में धारा 370 को समर्थन करना गलत था? हालांकि कांग्रेस के नेता तो यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि इसके निरस्त करने के बाद खूनखराबे की स्थिति बन जाएगी। जबकि इसके हटने के बाद वहां अभूतपूर्व शांति की बहाली हो गई। कोरोना काल से पहले वहां स्कूल भी खुल गए थे। उनमें परीक्षाएं हो रही थीं। श्रीनगर में अस्पताल खुल गए थे। दरअसल अब कश्मीरी नेताओं को जमीनी हकीकत समझने और व्यवहारिक होने की जरूरत है। उन्हें जमीनी हकीकत अब समझ आ जानी चाहिए। उनकी बकवास सुनने वाला कोई नहीं है। वे चाहें तो करके देख लें आंदोलन। उन्हें समझ आ जाएगा कि वे राज्य की जनता का विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। उनसे सारा देश सवाल पूछ रहा है कि वे चीन और पाकिस्तान की भाषा क्यों बोल रहे हैं? चीन कह रहा है कि जम्मू- कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा खत्म करना अवैध और अमान्य है। वह भारत के आंतरिक मामले में दखल देकर अपनी औकात के बाहर चला गया। चीन ने पिछले साल भारत सरकार की तरफ से धारा 370 को हटाने के कदम को 'अस्वीकार्य' करार दिया था। उधर, कश्मीर पर भारत सरकार के कदमों से पाकिस्तान की नींद उड़ी ही हुई है। भारत द्वारा लिए गए फैसले के बाद पाकिस्तान में जबर्दस्त खलबली मच गई। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने संसद का संयुक्त सत्र बुलाया। संयुक्त सत्र में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत सरकार के फैसले को आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला कदम बताया। दिमाग से सनकी हो गए इमरान खान ने भारत के मुसलमानों को भड़काने और उकसाने वाली पूरी बकवास की। वे तब से बार-बार कह रहे हैं कि भारत में मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। इस तरह की बयानबाजी करके इमरान खान यही साबित करते रहे कि वे घनघोर भारत विरोधी हैं और वे यही चाहते हैं कि पाकिस्तान में जो वे हिन्दुओं, सिखों और ईसाइयों के साथ अन्याय कर रहे हैं, वही भारत मुसलमानों के साथ यहाँ करे। वे भारत के मुसलमानों को भड़काने की कोशिश कर आहे हैं, जिसमें वे कभी सफल न होंगे। तो इस आलोक में ये क्यों न कहा जाए कि कश्मीरी नेता भारत के दुश्मनों के हाथों में खेल रहे हैं। जब चीन और पाकिस्तान भारत को जंग की धमकी दे रहे हैं तब कश्मीरी नेता वही अनाप-शनाप मांगे रख रहे हैं जो कभी पूरी नहीं होने वाली। इन्हें समझ आ जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की तरह भारत की एक-एक इंच भूमि पवित्र और खास है। कोई जगह कम या अधिक विशेष नहीं है। देशहित और कश्मीरी नेताओं के हित में यही होगा कि अब वे राज्य के विकास में सरकार का साथ दें और जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करने की कोशिश करें। वे राज्य के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा से मिलकर काम करें। मनोज सिन्हा बेहद समझदार नेता हैं। वे सबको साथ लेकर चलने में यकीन भी करते हैं। लेकिन, चिंता यह है कि यदि राज्य का विकास हो जायेगा तो इन्हें पूछेगा कौन? (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal, Corona period: depression problem becomes serious

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा सुसाइड प्रिविंशन इन इंडिया फाउंडेशन की पिछले दिनों आई सर्वे रिपोर्ट न केवल गंभीर चेतावनी देती है अपितु देश में लोगों की बदलती मानसिकता को भी दर्शाती है। कोरोना के कारण लोग तेजी से अवसाद या यों कहें डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। डिप्रेशन की समस्या हमारे यहां ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आगोश में ले रही है। अंतर केवल यह है कि हमारे यहां डिप्रेशन के इलाज की जिस तरह की व्यवस्था या आधारभूत संरचना होनी चहिए वह अभी कोसों दूर है। दुनिया में सबसे अधिक आत्महत्या करने वाले देशों में हमारा देश शुमार है। कोरोना के इस दौर में जिस तरह लोग अवसाद के शिकार हो रहे हैं वह गंभीर चिंता का विषय है। हालात यह है कि कोरोना अवसाद के कारण चिकित्सक तक मौत को गले लगाने में नहीं हिचक रहे हैं। पिछले दिनों कोविड सेंटरों पर आत्महत्या के मामले देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिले हैं। कोरोना ने एक तरह से सबकुछ हिलाकर रख दिया है। हालांकि दोष केवल कोरोना को ही नहीं दिया जा सकता। हां कोरोना के कारण डिप्रेशन के हालात बहुत अधिक बढ़े हैं। दरअसल कोरोना का भय और शुरुआती दौर में दुर्भाग्य से कोरोना संक्रमित होने पर जिस तरह से उसे कोविड सेंटरों में आइसोलेट करने की तस्वीरें देखने को मिली है, उससे लोगों में दहशत और बढ़ गई है। शुरुआती दिनों में कोविड संक्रमितों को घर से ले जाने, फिर घर को सेनेटाइज करने और फिर आसपास के इलाके को सील करने की तस्वीरें डिप्रेशन बढ़ाने में सहायक रही है। इसके साथ ही कोरोना काल में लाॅकडाउन के दौरान घर में कैद होने और सभी आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से रोजगार की समस्या ने भी लोगों में डिप्रेशन के हालात पैदा किए हैं। लाॅकडाउन में जो जहां था, वहीं बंद होकर रह गया। उद्योग- धंधे बंद हो गए। नौकरियों पर तलवार लटकी, कहीं नौकरी से निकालने का सिलसिला चला तो कहीं सैलेरी में कटौती या भत्तों में कमी हो गई। बहुत सारे ऐसे काम-धंधे हैं जो लाॅकडाउन हटने के बाद भी पटरी पर नहीं आ सके हैं। इनमें होटल्स, माॅल्स, सिनेमा, स्कूल, कोचिंग, टूरिज्म और इसी तरह के अन्य धंधे हैं, जिनके पटरी पर आने में समय लगेगा। देखा जाए तो कोरोना के कारण मेडिकल खासतौर से निजी चिकित्सालयों के हालात भी काफी बदल गए हैं। ऐसे में लोगों में डिप्रेशन आम होता जा रहा है। पिछले दशकों में जिस तरह से हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने लगी है, जिस तरह से रहन-सहन व जीवनशैली बदली है उससे डिप्रेशन के मामले कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के नौकरीपेशा होने, एक ही बच्चा होने, बच्चे के बचपन के स्थान पर प्रतिस्पर्धा में धकेलने और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार संस्कृति डिप्रेशन के प्रमुख कारकों में शामिल हैं। घर, वाहन या अन्य के लिए लिए गए लोन की किस्तें तनाव का कारण बन रही हैं। आय के साधन सीमित होने की आशंका से भी तनाव व कुंठा बढ़ रही है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते भविष्य को लेकर अधिक चिंता होने लगी है। व्यक्ति की सोच में बदलाव आने लगा है तो उसकी प्राथमिकताएं भी बदलने लगी है। दरअसल कोरोना ने सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिगतता को बढ़ावा दिया है। जिस एकाकीपन को सजा माना जाता था वह कोरोनाकाल में जीवन रक्षक बन गई है। इंडियन साइक्रेटिक सोसायटी ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि लाॅकडाउन मेें ढील के बाद भी लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंता का भाव उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है। अप्रैल में किए गए एक सर्वें में शामिल लोगों में 40 फीसदी लोगों को अवसादग्रस्त पाया गया। हो सकता है यह अतिशयोक्तिपूर्ण फीगर हो पर चिंता व विचार का विषय अवश्य है। कोरोना के इस दौर में मनोचिकित्सकीय सुविधाओं के विस्तार की अधिक आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो एक अनुमान के अनुसार 30 लाख लोगों पर एक मनोचिकित्सक व कुछ मनोवैज्ञानिक है वहीं अमेरिका में 30 लाख लोगों पर 100 मनोचिकित्सक व 300 मनोविज्ञानी है। यूरोपीय देशों में भी स्थिति में सुधार है तो इंग्लैण्ड ने इसके लिए अलग मंत्रालय व मंत्री बना दिया है ताकि डिप्रेशन के कारण आत्महत्याओं को रोका जा सके। लोगों की सही तरीके से काउंसलिंग हो सके। कोरोना के हालातों में अब दुनिया के देशों में मनोचिकित्सकों और मनोविज्ञानियों की अधिक आवश्यकता हो गई है और इस दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित देशों की सरकारों को ठोस प्रयास करने होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 19 October 2020


bhopal,China becomes an advocate of exploiting human rights

प्रमोद भार्गव संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् (यूएनएचआरसी) में चीन का चुना जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों के शोषकों के आगे घुटने टेक दिए हैं। भविष्य में वह मानवाधिकारों की लड़ाई चीन जैसे देशों के खिलाफ सख्ती से नहीं लड़ पाएगा। चीन के समर्थन से पाकिस्तान और नेपाल भी चुने गए हैं। रूस और क्यूबा जैसे अधिनायकवादी देश भी इस परिषद् के सदस्य हैं। इस कारण यूएनएचआरसी की विश्वसनीयता लगातार घट रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियों ने बयान दिया है कि ऐसे हालातों के चलते परिषद् से अमेरिका के अलग होने का फैसला उचित है। दरअसल जब अमेरिका ने परिषद् से बाहर आने का ऐलान किया था, तब संयुक्त राष्ट्र ने सदस्य देशों से परिषद् में तत्काल सुधार का आग्रह किया था परंतु किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि अधिकतम मानवाधिकारों का हनन करने वाले देश इसके सिरमौर बन बैठे हैं। पाकिस्तान में हिंदुओं और इसाइयों के साथ-साथ अहमदिया मुस्लिमों पर निरंतर अत्याचार हो रहे हैं। वहीं चीन ने तिब्बत को तो निगल ही लिया है, उईगर मुस्लिमों का नरसंहार भी लगातार कर रहा है। चीन के साम्राज्यवादी मंसूबों से वियतनाम चिंतित है। हांगकांग में वह इकतरफा कानूनों से दमन की राह पर चल रहा है। इधर चीन और कनाडा के बीच भी मानवाधिकारों के हनन को लेकर तनाव बढ़ना शुरू हो गया है। भारत से सीमाई विवाद तो सर्वविधित है ही। लोक-कल्याणकारी योजनाओं के बहाने चीन छोटे से देश नेपाल को भी तिब्बत और चैकोस्लोवाकिया की तरह निगलने की फिराक में है। साफ है, चीन वामपंथी चोले में तानाशाही हथकंडे अपनाते हुए हड़प नीतियों को बढ़ावा दे रहा है। दरअसल चीन का लोकतंत्रिक स्वांग उस सिंह की तरह है जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणियों का शिकार कर करता है। इसी का नतीजा है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो ने कहा है कि उनका देश चीन में होने वाले मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ हमेशा खड़ा रहेगा। कनाडा में चीन के राजदूत कोंग पियू ने हांगकांग छोड़कर आ रहे लोगों को शरण नहीं देने के मामले में चेतावनी देते हुए कहा है कि कनाडा हांगकांग में रहने वाले तीन लाख कनाडाई नागरिकों के बारे में और वहां कारोबार कर रहीं कंपनियों के बारे में सोचता है तो उसे चीन की हिंसा से लड़ने के प्रयासों में सहयोग करना होगा। लेकिन टूडो ने स्पष्ट किया है कि हम मानवाधिकारों के समर्थन में मजबूती से खड़े रहेंगे। फिर चाहे वे कनाडाई नागरिकों की हों अथवा उइगर समुदाय के शोषण की? कनाडा में विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी के नेता इरिन ओटूले ने अपने बयान में चीनी राजदूत से माफी मांगने को कहा है। ऐसा नहीं करने पर सरकार से उन्हें देश से बाहर निकाल देने की मांग की है। कनाडा के इस रुख का समर्थन अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों ने भी किया है। इस परिप्रेक्ष्य में सवाल उठता है कि चीन का राजदूत हिंसा को नीति मानते हुए, हिंसक गतिविधियों में सहयोग की मांग कनाडा जैसे समावेशी देश से कर रहा हो, वह चीन मानवाधिकारों की लड़ाई कैसे लड़ेगा? भारत के साथ टकराव के बीच अब दक्षिण चीन सागर के देश वियतनाम पर चीन अपना संयम खो रहा है। इधर वियतनाम की राष्ट्रपति साई इंग वेन को चिंता है कि अमेरिका में यदि चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन होता है तो कहीं अमेरिका से उसका जो चालीस साल पहले सुरक्षा संबंधी समझौता है, वह संकट में न पड़ जाए। दरअसल ताइवान से अमेरिका के राजनयिक संबंध नहीं है, बावजूद 'ताइवान रिलेशन एक्ट-1979' के तहत अमेरिका उसकी सुरक्षा के प्रति जवाबदेह है। ज्ञातव्य है कि ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच हमेशा टकराव रहा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसे पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में मिलाने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं, जबकि अमेरिका ताइवान की स्वतंत्रता का पक्षधर हैं। पिछले दिनों चीन ने ताइवान के सैन्य-अभ्यास और चीन की जासूसी करते हुए ताइवानी व्यापारी का कबूलनामा टीवी पर प्रसारित किए थे। इसीलिए अमेरिका में ताइवानी राजदूत हिसियाओं बीखिम ने चीन से बढ़ते तनाव के चलते अमेरिकी मंशा जाननी चाहिए। हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वियतनाम को लेकर चीन की खोटी नीयत को कई बार लताड़ लगा चुके हैं। साम्यवादी देशों की हड़प नीति के चलते ही छोटा-सा देश चेकोस्लोवाकिया बरबाद हुआ। चीनी दखल के चलते बर्बादी की इसी राह पर नेपाल है। नेपाल ने बिना सोचे-समझे भारत से भी दुश्मनी मोल लेना शुरू कर दी है, जो उसे भविष्य में महंगी पड़ेगी। पाकिस्तान में भरपूर निवेश करके चीन ने मजबूत पैठ बना ली है। बांग्लादेश को भी वह बरगलाने में लगा है। श्रीलंका में हंबन तोता बंदरगाह में निवेश कर उसे अपने जाल में फांसने की कोशिश की थी, लेकिन जल्दी ही श्रीलंका ने चीन के गलत मंसूबे को ताड़ लिया और चीन को बाहर का रास्ता दिखा दिया। दरअसल पड़ोसी देशों को अपने नियंत्रण में लेकर चीन सार्क देशों का सदस्य बनने की फिराक में है। ऐसा संभव हो जाता है तो उसका क्षेत्रीय दखल दक्षिण एशियाई देशों में और बढ़ जाएगा। इन कूटनीतिक चालों से इस क्षेत्र के छोटे-बड़े देशों में उसका निवेश और व्यापार तो बढ़ेगा ही सामरिक भूमिका भी बढ़ेगी। यह रणनीति वह भारत से मुकाबले के लिए रच रहा है। चीन की दोहरी कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं है। वह केवल घुसपैठ करके अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बतियों को भारत में शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे। दरअसल भारत ने तिब्बत को लेकर शिथिल व असंमजस की नीति अपनाई है। जब हमने तिब्बतियों को शरणार्थियों के रूप में जगह दे ही दी थी तो तिब्बत को स्वंतत्र देश मानते हुए अंतराष्ट्रीय मंच पर समर्थन की घोषणा करने की जरूरत भी थी? डॉ. राममनोहर लोहिया ने संसद में इस आशय का बयान भी दिया था। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण नेहरू ऐसा नहीं कर पाए। इसके दुष्परिणाम भारत आज भी झेल रहा है। यह ठीक है कि भारत और चीन की सभ्यता 5000 साल से भी ज्यादा पुरानी है। करीब 2000 साल पहले बौद्ध धर्म भारत से ही चीन गया था। वहां पहले से कनफ्यूशिस धर्म था। दोनों को मिलाकर नव-कनफ्यूशनवाद बना, जिसे चीन ने अंगीकार किया। लेकिन चीन भारत के प्रति लंबे समय से आंखे तरेरे हुए है। इसलिए भारत को भी आंख दिखाने के साथ कूटनीतिक परिवर्तन की जरूरत है। भारत को उन देशों से मधुर व सामरिक संबंध बनाने की जरूरत है, जिनसे चीन के तनावपूर्ण संबंध चल रहे हैं। ऐसे देशों में जापान, वियतमान और म्यांमार हैं। हालांकि भारत ने इस दिशा में पहल शुरू कर दी है। भारत के इस बदले और कठोर रुख से आहत चीन भी सीमाई विवाद बढ़ाए रखकर भारत के धैर्य की परीक्षा लेने में लगा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 19 October 2020


bhopal,Parali: When will you understand the value

ऋतुपर्ण दवे पराली को लेकर आधे अक्टूबर से दिसंबर और जनवरी के शुरू तक बेहद हो हल्ला होता है। व्यापक स्तर पर चिन्ता की जाती है, किसानों पर दण्ड की कार्रवाई की जाती है। बावजूद इसके समस्या जस की तस रही आती है। सच तो यह है कि जिस पराली को बोझ समझा जाता है वह बहुत बड़ा वरदान है। अच्छी खासी कमाई का जरिया भी बन सकती है बशर्ते उसकी खूबियों को समझना होगा। पराली के अनेकों फायदे हैं। खेतों के लिए यह वरदान भी हो सकती है और पशुओं के लिए तो खुराक ही है। इसके अलावा पराली के ऐसे उपयोग हो सकते हैं जिससे देश में भारी उद्योग खड़ा हो सकता है, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। इसके लिए जरूरत है सरकारों, जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, किसानों और बाजार के बीच जल्द से जल्द समन्वय की और खेतों में ठूठ के रूप में जलाकर नष्ट की जाने वाली पराली जिसे अलग-अलग रूप और नाम में पुआल, नरवारी, पैरा और भूसा भी कहते हैं। देखते ही देखते भारत में एक बड़ा बाजार और उद्योग का रूप लेगा। बस सवाल यही कि मौजूदा लचर व्यवस्था के बीच जागरूकता और अनमोल पराली का मोल कबतक हो पाएगा? फिलहाल धान की खेती के बाद खेतों में बचे उसके ठूठ यानी पराली यूँ तो पूरे देश में जहाँ-तहाँ बड़ी समस्या हैं। वक्त के साथ यह समूचे उत्तर भारत खासकर दिल्ली और आसपास इतनी भारी पड़ने लगी कि घनी आबादी वाले ये इलाके गैस चेम्बर में तब्दील होने लगे। अक्टूबर से जनवरी-फरवरी तक पराली का धुआं राष्ट्रीय चिन्ता का विषय बन जाता है। सच भी है कि वर्तमान में उत्तर भारत में यह बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण एक तो सरकारी तौर पर कोई स्पष्ट व सुगम नीति का न होना और दूसरा उपयोगिता को लेकर ईमानदार कोशिशों की कमी भी है। उससे भी बड़ा सच केन्द्र और राज्यों के बीच आपसी तालमेल की कमी भी है। पराली पहले इतनी बड़ी समस्या नहीं थी जो आज है। पहले हाथों से कटाई होती थी तब खेतों में बहुत थोड़े से ठूठ रह जाते थे जो या जुताई से निकल जाते थे या फिर पानी से गलकर मिट्टी में मिल उर्वरक बन जाते थे। लेकिन मामला दिल्ली से जुड़ा है जहाँ चौबीसों घण्टे लाखों गाड़ियाँ बिना रुके दौड़ती रहती हैं इसलिए पराली का धुँआ वाहनों के वाहनों के जहरीले धुँए में मिल हवा को और ज्यादा खतरनाक बना देता है। यूँ तो कानूनन सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने पराली जलाने को दण्डनीय अपराध घोषित कर रखा है। कई ऐसे उपकरण इजाद किए गए हैं जिससे खेतों में धान की ठूठ यानी पराली का निस्तारण हो सके। उपकरणों पर 50 से 80 प्रतिशत का सरकारी अनुदान भी है लेकिन जानकारी के आभाव और उससे भी ज्यादा कागजी कवायद के चलते किसान इसमें उलझने के बजाए जलाना ही उचित समझता है। शायद किसान अनजान रहता है कि पराली में फसल के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्वों में शामिल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश (एनपीके) मिट्टी की सेहत के लिए सबसे जरूरी बैक्टीरिया और फंगस भी होते हैं। यही नहीं भूसे के रूप में बेजुबान पशुओं का हक भी मारा जाता है। इस तरह भूमि के कार्बनिक तत्व, कीमती बैक्टीरिया, फफूंद भी जलाने से नष्ट हो जाते हैं ऊपर से पर्यावरण को नुकसान और ग्लोबल वॉर्मिंग एक्सट्रा होती ही है। पराली जलाकर उसी खेत का कम से कम 25 प्रतिशत खाद भी अनजाने ही नष्ट कर दिया जाता है। एक अध्ययन से पता चला है कि प्रति एकड़ पराली के ठूंठ जलाकर कई पोषक तत्वों के साथ लगभग 400 किलोग्राम फायदेमंद कार्बन, मिट्टी के एक ग्राम में मौजूद 10 से 40 करोड़ बैक्टीरिया और 1 से 2 लाख फफूंद जल जाते हैं जो फसल के लिए जबरदस्त पोषण का काम करते हैं। बाद में इन्हें ही फसल के न्यूट्रीशन के लिए ऊंची कीमतों में अलग-अलग नाम से खरीदकर खेतों को वापस देते हैं। इस तरह दोहरा नुकसान होता है। एक जानकारी बताती है कि प्रति एकड़ कम से कम 18 क्विंटल धान का भूसा यानी पराली बनती है, जिसे पशु बड़े चाव से खाता है। यदि सीजन में इसकी कम से कम कीमत आँकें तो भी 400 से 500 के बीच बनती है यानी प्रति एकड़ 7200 से 9000 हजार रुपए का यह नुकसान अलग। ऊपर से पराली जलाने से उस जगह की नमी सूखी और ताप से भूजल स्तर भी प्रभावित हुआ। अब वह दौर है जब हर वेस्ट यानी अपशिष्ट समझे जाने वाले पदार्थों का किसी न किसी रूप में उपयोग किया जाने लगा है। चाहे वह प्लास्टिक कचरा हो, कागजों और पैकिंग कार्टून्स की रद्दी हो, स्टील, तांबा, यहाँ तक कि रबर भी। सबकुछ रिसाइकल होने लगा है। बड़े शहरों में सूखा कचरा और गीला कचरा प्रबंधन कर उपयोगी खाद बनने लगी है जिसमें सब्जी-भाजी के छिलके भी उपयोग होते हैं। ऐसे में पराली का जलाया जाना अपने आप में बड़ा सवाल है। देश में कई गांवों में महिलाएं पराली से चटाई और बिठाई (छोटा टेबल, मोढ़ा) जैसी वस्तुएं बनाती हैं। अभी भोपाल स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआइआर और एडवांस मटेरियल्स एंड प्रोसेस रिसर्च यानी एम्प्री ने तीन साल की कोशिशों के बाद एक तकनीक विकसित की है जिसमें धान की पराली, गेहूं व सोयाबीन के भूसे से प्लाई बनेगी। इसमें 30 प्रतिशत पॉलीमर यानी रासायनिक पदार्थ और 70 प्रतिशत पराली होगी। इसके लिए पहला लाइसेंस भी छत्तीसगढ़ के भिलाई की एक कंपनी को दे दिया गया है जिससे 10 करोड़ की लागत से तैयार कारखाना मार्च 2021 से उत्पादन शुरू कर देगा। सबसे बड़ी खासियत यह कि देश में यह इस किस्म की पहली तकनीक है जिसे यूएसए, कनाडा, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन समेत आठ देशों से पेटेंट मिल चुका है। इस तरह खेती के अपशिष्ट से बनने वाली यह प्लाई आज बाजार में उपलब्‍ध सभी प्लाई से न केवल चार गुना ज्यादा मजबूत होगी। पराली से लेमिनेटेड और गैर लेमिनेटेड दोनों तरह की प्लाई बनेंगी जिसकी कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 26 से 46 रुपए वर्गफीट तक होगी। निश्चित रूप से सस्ती भी होगी और टिकाऊ भी। इसकी बड़ी खूबी यह कि 20 साल तक इसमें कोई खराबी नहीं आएगी। जरूरत के हिसाब से इसे हल्की व मजबूत दोनों तरह से बनाया जा सकेगा। इसके लिए बहुत ज्यादा पराली की जरूरत होगी व कई और फैक्टरियाँ खुलने से उत्तर भारत में पराली की इतनी डिमाण्ड बढ़ जाएगी कि 80 से 90 फीसदी खपत इसी में हो जाए। जहाँ तक पराली की बात है अभी अनुमानतः भारत में 388 मिलियन टन फसल अवशेष हर वर्ष रह जाता है जिसमें करीब 27 प्रतिशत गेहूं और 51 प्रतिशत धान का शेष दूसरी फसलों का होता है। जाहिर है जिस तरह की तैयारियाँ हैं बस कुछ ही वर्ष में पराली जलाने नहीं बनाने के काम आएगी और देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा और बड़ा उद्योग होगी। किसी ने सही कहा है कि घूरे के दिन भी फिरते हैं। बहुत जल्द ही पराली प्रदूषण फैलाने नहीं धनवर्षा का साधन बनेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 October 2020


bhopal,Parali: When will you understand the value

ऋतुपर्ण दवे पराली को लेकर आधे अक्टूबर से दिसंबर और जनवरी के शुरू तक बेहद हो हल्ला होता है। व्यापक स्तर पर चिन्ता की जाती है, किसानों पर दण्ड की कार्रवाई की जाती है। बावजूद इसके समस्या जस की तस रही आती है। सच तो यह है कि जिस पराली को बोझ समझा जाता है वह बहुत बड़ा वरदान है। अच्छी खासी कमाई का जरिया भी बन सकती है बशर्ते उसकी खूबियों को समझना होगा। पराली के अनेकों फायदे हैं। खेतों के लिए यह वरदान भी हो सकती है और पशुओं के लिए तो खुराक ही है। इसके अलावा पराली के ऐसे उपयोग हो सकते हैं जिससे देश में भारी उद्योग खड़ा हो सकता है, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। इसके लिए जरूरत है सरकारों, जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, किसानों और बाजार के बीच जल्द से जल्द समन्वय की और खेतों में ठूठ के रूप में जलाकर नष्ट की जाने वाली पराली जिसे अलग-अलग रूप और नाम में पुआल, नरवारी, पैरा और भूसा भी कहते हैं। देखते ही देखते भारत में एक बड़ा बाजार और उद्योग का रूप लेगा। बस सवाल यही कि मौजूदा लचर व्यवस्था के बीच जागरूकता और अनमोल पराली का मोल कबतक हो पाएगा? फिलहाल धान की खेती के बाद खेतों में बचे उसके ठूठ यानी पराली यूँ तो पूरे देश में जहाँ-तहाँ बड़ी समस्या हैं। वक्त के साथ यह समूचे उत्तर भारत खासकर दिल्ली और आसपास इतनी भारी पड़ने लगी कि घनी आबादी वाले ये इलाके गैस चेम्बर में तब्दील होने लगे। अक्टूबर से जनवरी-फरवरी तक पराली का धुआं राष्ट्रीय चिन्ता का विषय बन जाता है। सच भी है कि वर्तमान में उत्तर भारत में यह बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण एक तो सरकारी तौर पर कोई स्पष्ट व सुगम नीति का न होना और दूसरा उपयोगिता को लेकर ईमानदार कोशिशों की कमी भी है। उससे भी बड़ा सच केन्द्र और राज्यों के बीच आपसी तालमेल की कमी भी है। पराली पहले इतनी बड़ी समस्या नहीं थी जो आज है। पहले हाथों से कटाई होती थी तब खेतों में बहुत थोड़े से ठूठ रह जाते थे जो या जुताई से निकल जाते थे या फिर पानी से गलकर मिट्टी में मिल उर्वरक बन जाते थे। लेकिन मामला दिल्ली से जुड़ा है जहाँ चौबीसों घण्टे लाखों गाड़ियाँ बिना रुके दौड़ती रहती हैं इसलिए पराली का धुँआ वाहनों के वाहनों के जहरीले धुँए में मिल हवा को और ज्यादा खतरनाक बना देता है। यूँ तो कानूनन सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने पराली जलाने को दण्डनीय अपराध घोषित कर रखा है। कई ऐसे उपकरण इजाद किए गए हैं जिससे खेतों में धान की ठूठ यानी पराली का निस्तारण हो सके। उपकरणों पर 50 से 80 प्रतिशत का सरकारी अनुदान भी है लेकिन जानकारी के आभाव और उससे भी ज्यादा कागजी कवायद के चलते किसान इसमें उलझने के बजाए जलाना ही उचित समझता है। शायद किसान अनजान रहता है कि पराली में फसल के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्वों में शामिल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश (एनपीके) मिट्टी की सेहत के लिए सबसे जरूरी बैक्टीरिया और फंगस भी होते हैं। यही नहीं भूसे के रूप में बेजुबान पशुओं का हक भी मारा जाता है। इस तरह भूमि के कार्बनिक तत्व, कीमती बैक्टीरिया, फफूंद भी जलाने से नष्ट हो जाते हैं ऊपर से पर्यावरण को नुकसान और ग्लोबल वॉर्मिंग एक्सट्रा होती ही है। पराली जलाकर उसी खेत का कम से कम 25 प्रतिशत खाद भी अनजाने ही नष्ट कर दिया जाता है। एक अध्ययन से पता चला है कि प्रति एकड़ पराली के ठूंठ जलाकर कई पोषक तत्वों के साथ लगभग 400 किलोग्राम फायदेमंद कार्बन, मिट्टी के एक ग्राम में मौजूद 10 से 40 करोड़ बैक्टीरिया और 1 से 2 लाख फफूंद जल जाते हैं जो फसल के लिए जबरदस्त पोषण का काम करते हैं। बाद में इन्हें ही फसल के न्यूट्रीशन के लिए ऊंची कीमतों में अलग-अलग नाम से खरीदकर खेतों को वापस देते हैं। इस तरह दोहरा नुकसान होता है। एक जानकारी बताती है कि प्रति एकड़ कम से कम 18 क्विंटल धान का भूसा यानी पराली बनती है, जिसे पशु बड़े चाव से खाता है। यदि सीजन में इसकी कम से कम कीमत आँकें तो भी 400 से 500 के बीच बनती है यानी प्रति एकड़ 7200 से 9000 हजार रुपए का यह नुकसान अलग। ऊपर से पराली जलाने से उस जगह की नमी सूखी और ताप से भूजल स्तर भी प्रभावित हुआ। अब वह दौर है जब हर वेस्ट यानी अपशिष्ट समझे जाने वाले पदार्थों का किसी न किसी रूप में उपयोग किया जाने लगा है। चाहे वह प्लास्टिक कचरा हो, कागजों और पैकिंग कार्टून्स की रद्दी हो, स्टील, तांबा, यहाँ तक कि रबर भी। सबकुछ रिसाइकल होने लगा है। बड़े शहरों में सूखा कचरा और गीला कचरा प्रबंधन कर उपयोगी खाद बनने लगी है जिसमें सब्जी-भाजी के छिलके भी उपयोग होते हैं। ऐसे में पराली का जलाया जाना अपने आप में बड़ा सवाल है। देश में कई गांवों में महिलाएं पराली से चटाई और बिठाई (छोटा टेबल, मोढ़ा) जैसी वस्तुएं बनाती हैं। अभी भोपाल स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआइआर और एडवांस मटेरियल्स एंड प्रोसेस रिसर्च यानी एम्प्री ने तीन साल की कोशिशों के बाद एक तकनीक विकसित की है जिसमें धान की पराली, गेहूं व सोयाबीन के भूसे से प्लाई बनेगी। इसमें 30 प्रतिशत पॉलीमर यानी रासायनिक पदार्थ और 70 प्रतिशत पराली होगी। इसके लिए पहला लाइसेंस भी छत्तीसगढ़ के भिलाई की एक कंपनी को दे दिया गया है जिससे 10 करोड़ की लागत से तैयार कारखाना मार्च 2021 से उत्पादन शुरू कर देगा। सबसे बड़ी खासियत यह कि देश में यह इस किस्म की पहली तकनीक है जिसे यूएसए, कनाडा, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन समेत आठ देशों से पेटेंट मिल चुका है। इस तरह खेती के अपशिष्ट से बनने वाली यह प्लाई आज बाजार में उपलब्‍ध सभी प्लाई से न केवल चार गुना ज्यादा मजबूत होगी। पराली से लेमिनेटेड और गैर लेमिनेटेड दोनों तरह की प्लाई बनेंगी जिसकी कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 26 से 46 रुपए वर्गफीट तक होगी। निश्चित रूप से सस्ती भी होगी और टिकाऊ भी। इसकी बड़ी खूबी यह कि 20 साल तक इसमें कोई खराबी नहीं आएगी। जरूरत के हिसाब से इसे हल्की व मजबूत दोनों तरह से बनाया जा सकेगा। इसके लिए बहुत ज्यादा पराली की जरूरत होगी व कई और फैक्टरियाँ खुलने से उत्तर भारत में पराली की इतनी डिमाण्ड बढ़ जाएगी कि 80 से 90 फीसदी खपत इसी में हो जाए। जहाँ तक पराली की बात है अभी अनुमानतः भारत में 388 मिलियन टन फसल अवशेष हर वर्ष रह जाता है जिसमें करीब 27 प्रतिशत गेहूं और 51 प्रतिशत धान का शेष दूसरी फसलों का होता है। जाहिर है जिस तरह की तैयारियाँ हैं बस कुछ ही वर्ष में पराली जलाने नहीं बनाने के काम आएगी और देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा और बड़ा उद्योग होगी। किसी ने सही कहा है कि घूरे के दिन भी फिरते हैं। बहुत जल्द ही पराली प्रदूषण फैलाने नहीं धनवर्षा का साधन बनेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 19 October 2020


bhopal,Mother is Goddess, Mother Goddess

हृदयनारायण दीक्षित प्रकृति दिव्यता है, सदा से है। देवी है। मनुष्य की सारी क्षमताएँ प्रकृति प्रदत् हैं। जीवन के सुख-दुख, लाभ-हानि व जय-पराजय प्रकृति में ही संपन्न होते हैं। दुनिया की अधिकांश संस्कृतियों में ईश्वर या ईश्वर जैसी परमसत्ता को प्रकृति का संचालक जाना गया है। ईसाईयत में यह संचालक पिता-परमेश्वर है। अन्य सभ्यताओं, पंथिक मान्यताओं में भी किसी अज्ञात शक्ति को प्रकृति का संचालक बताया गया है। भारत में प्रकृति और प्रकृति के संचालक को ‘माँ‘ की तरह देखा गया है। ईश्वर भी प्रकृति में अवतरित होने के लिए माता पर ही निर्भर है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वही दाता-विधाता व भाग्य निर्माता कहा जाता है, लेकिन माता का पुत्र है। भारत में नवरात्र देवी उपासना का अवसर होता है। यह माता परम है लेकिन भिन्न-भिन्न रूपों में इसकी उपासना होती है। दुर्गासप्तशती का पाठ नवरात्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्यक्ष रूप में इस उपासना का व्यवस्थित कर्मकांड है लेकिन इस कर्मकांड की शुरुआत के चार मंत्र ध्यान देने योग्य हैं। यह संकल्प के पहले का हिस्सा है। पहले में आत्मतत्व शुद्धिकरण की प्रार्थना है। दूसरे में ज्ञानतत्व और तीसरे में शिव तत्व का आवाह्न है और अन्त में सभी तत्वों के शोधन की प्रार्थना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले मित्र कर्मकांड को मान्यता नहीं देते लेकिन इस कर्मकाण्ड में भी प्रकृति के प्रत्यक्ष भौतिक प्रपंचों की ही स्तुति है। देवी उपासना प्रकृति के दिव्य गोचर प्रपंचों से शक्ति प्राप्त करने का अनुष्ठान है। सप्तशती की कथा भी दार्शनिक है। ऋषि के अनुसार सुरथ एक लोकप्रिय राजा थे। शत्रुओं ने उनको पराजित किया। मंत्रियों ने भी उन्हें धोखा दिया। वह घर छोड़कर वन गमन के लिए निकले। वन में उन्हें मेधा ऋषि का आश्रम दिखाई पड़ा। वहीं समाधि नामक एक दुखी वैश्य भी थे। राजा ने वैश्य से दुखी होने का कारण पूछा। वैश्य ने बताया कि मेरे पास बहुत धन था। घर के लोगों ने मेरा धन छीन लिया। फिर भी मुझे अपने परिवार की याद आती है। राजा ने कहा कि जिन पारिवारिक सदस्यों ने तुमको निकाल दिया है उनके प्रति मोह क्यों है? व्यापारी ने कहा कि आपकी बात सही है लेकिन मेरा मन ऐसा ही है। राजा ने ऋषि मेधा से प्रश्न पूछा कि मेरा राज्य चला गया है तो भी मेरे मन में ममता है। जानता हूँ कि वह मेरा नहीं है लेकिन मुझे दुख होता है। व्यापारी भी परिजनों से अपमानित होकर आया था लेकिन उसी परिवार के प्रति मोह रखता है। हम दोनों बहुत दुखी हैं। ऋषि ने कहा कि संसार की ऐसी प्रकृति है। संसार का संचालन महादेवी करती हैं। उन्हीं की कृपा से दुख मुक्ति मिलती है। विश्व की संचालक शक्ति यहाँ देवी है। कथा में देवी को नित्य बताया गया है लेकिन देवी के प्रकटीकरण का ब्योरा भी है। बताते हैं कि प्रकृति की दिव्य शक्तियों से तेज प्रकट हुआ और नारी रूप में परिवर्तित हो गया। शिव के तेज से मुख और विष्णु के तेज से भुजाएं प्रकट हुई। इसी तरह चन्द्रमा, वरुण, इन्द्र, कुबेर आदि के तेज से भिन्न-भिन्न अंग प्रकट हुए। फिर सभी देवों ने उस देवी को अस्त्र आदि दिए। यहाँ देवता प्रकृति की शक्तियाँ हैं। सब मिलकर महाशक्ति महादेवी हैं। देवी के अनेक रूप हैं। शक्ति उपासकों के लिए दुर्गा हैं। धन-वैभव के अभिलाषी के लिए महालक्ष्मी व ज्ञान उपासकों के लिए वे सरस्वती हैं। सभी जीव माँ का विस्तार हैं। माँ न होती तो हम भी न होते। माँ सृष्टि की प्रथम अनुभूति है। ऋग्वेद में भी माँ की अनुभूति का चरम है। कुछ लोग मानते हैं कि ऋग्वेद पुरुष सत्ता वाले समाज के अभिजनों की रचना है। वे ऋग्वेद में देवी उपासना की प्रतिष्ठा पर ध्यान नहीं देते। वैदिक अनुभूति में पृथ्वी माता है। हमारे सभी अंगों की निर्मिति का मूल आधार है। पितृसत्ताक समाज में माता की अनुभूति नहीं हो सकती। मातृसत्ताक समाज में ही माता की श्रेष्ठता है। ऋषि नदियों को भी माता कहते हैं। ऋग्वेद में सिन्धु और सरस्वती भी माता है। वैसे प्रकृति की शक्तियाँ स्त्रीलिंग या पुल्लिंग नहीं हो सकतीं। सामाजिक विकास के सिद्धान्त के अनुसार मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में माँ का प्रभाव ज्यादा था। माँ ही प्रमुख थी। देवी उपासना का विकास उसी कालखण्ड में हुआ था। ऋग्वेद में जल आपः मातरम्- जल माताएँ हैं। ऋग्वेद की अपो देवी या आपः मातरम् - जलमाताएँ मातृ-सत्तात्मक समाज की ही अनुभूति है। यहा आपः मातरम् या जलमाताएँ सम्पूर्ण जड़-स्थिर और गतिशील की माताएँ हैं- विश्वस्य स्थातुरर्जगतो जनित्री। (6.50.7) जल को सृष्टि की माता कहना बड़ी अनुभूति है। ऋग्वेद में अनेक देवियाँ हैं। एक वाग्देवी हैं। वे रुद्र और वसुओं के साथ गतिशील हैं। (10.125) वे राष्ट्र और राष्ट्र की वैभवदाता राष्ट्र संगमनी हैं। (10.125.3) सूर्योदय के ठीक पहले ऊषा हैं। वे सुन्दरी हैं। सभी मनुष्यों को जगाती हैं और नमस्कारों के योग्य हैं। रात्रि भी देवी हैं। वे ऋग्वेद के ऋषियों की दृष्टि में ’’अविनाशी अमर बताई गयी हैं। वे आकाश की पुत्री हैं। वे अन्तरिक्ष को आच्छादित करती हैं। फिर धरती के ऊंचे-नीचे क्षेत्रों को भरती हैं।’’ ऋषि संवाद करते हैं, ’’उनके आगमन पर हम सब गौ, अश्व आदि और पशु-पक्षी विश्राम करते हैं।’’ (10.127) प्रकृति की अनेक शक्तियों व आयामों को देवी रूप् श्रद्धा करने की परम्परा अति प्राचीन है। प्रकृति की शक्ति का ज्ञान विज्ञान का ही भाग होता है। पूर्वज तर्क-प्रतितर्क और अनुभव आदि प्रत्यक्ष उपकरणों से अपने निष्कर्ष का सतत् निरीक्षण भी करते थे। जांचा-परखा निष्कर्ष भावबोध में श्रद्धा है। ऋग्वेद में ’श्रद्धा’ भी एक देवी हैं। श्रद्धा हमारी आन्तरिक अनुभूति है। प्रकृति की विभूति है श्रद्धा। ऋग्वेद के ऋषियों ने श्रद्धा को भी देवी बताया है। अस्तित्व या उसकी शक्तियों पर श्रद्धा करना सही है। श्रद्धा दिव्यता है। ऋषि कहते हैं कि श्रद्धा प्रकृति की विभूतियों में शिखर है, ’’श्रद्धा भगस्तस्य भूर्धनि। (10.151.1) जीवन की प्रत्येक गतिविधि में श्रद्धा की प्रतिष्ठा है। ऋषि बताते हैं, ’’हम प्रातःकाल श्रद्धा का आवाहन करते हैं, मध्यान्ह में श्रद्धा का आवाह्न करते हैं, सूर्यास्त काल में श्रद्धा की ही उपासना करते हैं। हे श्रद्धा हम सबको श्रद्धा से परिपूर्ण करें। (10.151.5) यहाँ श्रद्धा जीवन और कर्म की शक्ति हैं। मन संकल्प का केन्द्र है और विकल्प भी। मन गतिशील कहा जाता है। मन की चंचलता कर्मसाधना में बाधक प्रभाव डालती है। मन के साधक मनीषी कहे जाते हैं। ऋग्वेद में मन की शासक शक्ति का नाम ’मनीषा देवी’ है। ऋषि मनीषा देवी का आवाहन करते हैं- ’प्र शुकैतु देवी मनीषा’। (7.34.1) माँ रूप देवी की उपासना ऋग्वेद में है। इसके बाद उत्तर वैदिक काल में है। तैत्तिरीय उपनिषद में ’मातृ देवों भव है ही। पुराणों में देवी का विस्तार अनंत है। दुर्गा सप्तशती परौराणिक काल की रचना है। इसके पाँचवें अध्याय में शक्ति लज्जा, क्षमा, क्षुधा, चेतना आदि को भी मातृरूपेण देवी कहकर प्रत्येक भाव को पांच बार नमस्कार किया गया है- या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्यो नमो नमः। देवी सर्वव्यापी है। देवी उपासना का स्रोत जम्बूद्वीप है। जम्बूद्वीप के भीतर भरतखण्ड है। इसका दार्शनिक स्रोत माता है। माता ही हम सबके जनन का स्रोत है। वह जननी है। प्रत्यक्ष रूप में अपनी माता के प्रति अचल, अविचल और ध्रुव श्रद्धा ही इसका मूल है। इस जगत् में हम सबके सम्भवन का उद्गम, कारण माता है। यह माता देवी है। देवी माता है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 18 October 2020


bhopal, The aim of Ramleela is secondary

योगेश कुमार गोयल प्रतिवर्ष दशहरे से काफी समय पहले ही देशभर में रामलीलाओं के आयोजन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। रावण, कुम्भकर्ण व मेघनाद के 90-100 फुट तक ऊंचे पुतले तैयार होने लगते हैं। हालांकि इस वर्ष कोरोना महामारी का असर रामलीलाओं के वृहद् आयोजनों पर भी पड़ेगा। रामलीलाओं के आयोजन की शुरुआत कब हुई थी, दावे के साथ यह कह पाना तो मुश्किल है क्योंकि इस बारे में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं किन्तु रामलीलाओं के आयोजन का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट रहा है, कथा मंचन के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना। इस उद्देश्य में रामलीलाएं काफी हद तक सफल भी रही हैं। भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाई जाती रही रामलीलाओं ने भारतीय संस्कृति एवं कला को जीवित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। श्रीराम के आदर्श, अनुकरणीय एवं आज्ञापालक चरित्र तथा सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान, जटायु, विभीषण, शबरी इत्यादि रामलीला के विभिन्न पात्रों द्वारा जिस प्रकार अपार निष्ठा, भक्ति, प्रेम, त्याग एवं समर्पण के भावों को रामलीला के दौरान प्रकट किया जाता है, वह अपने आप में अनुपम है और नई पीढ़ी को धर्म एवं आदर्शों की प्रेरणा देने के साथ-साथ उसमें जागरुकता का संचार करने के लिए भी पर्याप्त है। यह आयोजन कला को भी एक नया आयाम प्रदान करते हैं। रामलीलाओं की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि इनके मंचन में हिन्दुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोगों का भी विशेष सहयोग मिलता रहा है और रामलीला देखने के लिए भी सभी धर्मों के लोग आते हैं। रामलीलाओं में हमें भक्ति, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, कला, संस्कृति एवं अभिनय का अद्भुत सम्मिश्रण देखने को मिलता रहा है। बहरहाल, ज्यों-ज्यों भारतीय संस्कृति पर आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है, रामलीलाएं भी आधुनिकता की चकाचौंध से दूर नहीं रह पाई हैं। रामलीला के नाम पर अब हर साल जिस तरह के आयोजन आजकल होने लगे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि आधुनिकता की चपेट में आई इस प्राचीन परम्परा का मूल स्वरूप और धार्मिक अर्थ अब धीरे-धीरे गौण हो रहे हैं। एक-एक रामलीला के आयोजन में पंडाल और मंच की साज-सज्जा पर ही अब लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने लगे हैं। पंडालों की आकृतियां लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल जैसी भव्य ऐतिहासिक इमारतों के रूप में बनाई जाने लगी हैं। आधुनिक सूचना तकनीक ने रामलीलाओं में गहरी पैठ बना ली है। संवाद बोलने के लिए मंच पर लंबे-चौड़े माइकों की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि कलाकारों के गले में छोटे-छोटे माइक्रोफोन लटके रहते हैं। इतना ही नहीं, कुछ रामलीला कमेटियां तो पंडालों में लंबी-चौड़ी वीडियो स्क्रीन लगाकर स्पेशल इफैक्ट्स दिखाने का बंदोबस्त भी करने लगी हैं। पंडालों के भीतर हर तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाने के इंतजाम भी किए जाते हैं। यदि रामलीलाओं के आयोजन में आधुनिक सूचना तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता लेकिन जिस तरह से रामलीला कमेटियों द्वारा आजकल ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के लिए नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं और उनमें होड़ लगी रहती है कि किसके मंच पर ज्यादा चमक-दमक हो, किसका रावण सबसे बड़ा हो, कौन कितने बड़े-बड़े राजनेताओं को अपने आयोजन में बुलाने में सफल होता है, इससे रामलीलाओं के मंचन का मूल उद्देश्य गौण होने लगा है। जाहिर है कि बहुत से आयोजकों द्वारा रामलीलाओं के आयोजन को पूर्ण रूप से व्यावसायिक बना दिया गया है और इन आयोजनों के जरिये उनका उद्देश्य राजनेताओं के साथ अपने सम्पर्क दायरे का विस्तार करना, अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाना और आर्थिक लाभ कमाना ही हो गया है। रामलीलाओं के दौरान लोगों को आकर्षित करने और उनका मनोरंजन करने के लिए जादू शो, चैरिटी शो, लक्की ड्रा तथा आकर्षक झांकियों के प्रयोग तक तो बात समझ में आती है लेकिन अगर ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में दर्शकों की ज्यादा से ज्यादा भीड़ एकत्रित कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के नाम पर महंगी नृत्य पार्टियों और रास मंडलियों को बुलाकर रामलीला के दौरान उनके कार्यक्रम स्टेज पर आयोजित किए जाने लगें तो इसे क्या कहा जाएगा? रामलीलाओं के दौरान अब फिल्मी गीत-संगीत पर नाच-गाना एक आम बात हो गई है। हद तो यह है कि कुछ आयोजक रामलीलाओं के मंचन के दौरान कैबरे नृत्यों का भी सहारा लेने लगे हैं। आयोजक रामलीला के नाम पर इस तरह के भौंडे आयोजन कर चांदी कूट रहे हैं। हालत यह हो गई है कि फिल्मों व टीवी धारावाहिकों की ही तर्ज पर रामलीलाएं भी अब प्रायोजित की जाने लगी हैं और जाहिर है, ऐसे में मंच पर वही होगा, जो प्रायोजक चाहेंगे। मंच से रामलीला के कलाकारों द्वारा प्रायोजकों व आयोजकों का महिमामंडन भी परम्परा बनती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक रामलीला कमेटियों का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ कलाकारों के जरिये रामकथा की जीवंत प्रस्तुति करना होता था और इसके लिए बाकायदा अयोध्या, फैजाबाद, लखनऊ इत्यादि विभिन्न स्थानों से अच्छे-अच्छे कलाकार बुलाए जाते थे लेकिन चूंकि आयोजक इन कलाकारों को पूरा पारिश्रमिक देने में अक्सर आनाकानी करते हैं, इसलिए ये कलाकार भी अब अपनी कला के प्रति इतने निष्ठावान नहीं रहे। काशी की चित्रकूट रामलीला का बहुत पुराना किस्सा प्रचलित है। बताया जाता है कि 1868 में मंचित की जा रही उस रामलीला में पं. गंगाधर भट्ट नामक एक कलाकार हनुमान का किरदार निभा रहा था। उस समय दर्शकों में एक अंग्रेज पादरी मैकफर्सन भी शामिल था। सीता की खोज के लिए हनुमान द्वारा समुद्र लांघने का दृश्य चल रहा था, तभी मैकफर्सन ने व्यंग्य कसा कि अगर रामायण में हनुमान 400 कोस का समुद्र लांघ गए थे तो रामलीला का यह हनुमान क्या वरुणा नदी के इस 27 हाथ चौड़े पाट को भी नहीं लांघ सकता? गंगाधर भट्ट से यह सब सुनकर रहा न गया। उसने अचानक मन में कुछ निश्चय कर ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए छलांग लगा दी और 27 हाथ चौड़े पाट को लांघने में तो सफल हुआ किन्तु चोट इतनी लगी कि उसे बचाया नहीं जा सका। बताते हैं कि उस घटना के बाद मैकफर्सन उसकी निष्ठा और भक्ति के आगे नतमस्तक हो गया था। हालांकि रामलीलाओं के अधिकांश आयोजकों का मानना है कि चूंकि आज मनोरंजन के बहुत सारे साधन हो गए हैं इसलिए जबतक रामलीलाओं के आयोजन एवं मंचन में कुछ खास न हो, तबतक रामलीलाएं दर्शकों को खींचने में सफल नहीं हो सकती। माना कि यह बात कुछ हद तक सही भी है और रामलीला मंचन में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को भी उचित माना जा सकता है किन्तु इस तरह की दलीलों से लोगों की श्रद्धा एवं भक्ति से जुड़े इस तरह के आयोजनों में भौंडेपन के समावेश को हरगिज उचित नहीं ठहराया जा सकता। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 18 October 2020


bhopal, New trouble on islam

डॉ. वेदप्रताप वैदिक फ्रांस में महजब के नाम पर कितनी दर्दनाक खूंरेजी हुई है। एक स्कूल के फ्रांसीसी अध्यापक सेमुअल पेटी की हत्या इसलिए कर दी गई कि उसने अपनी कक्षा में पैगंबर मुहम्मद के कार्टूनों की चर्चा चलाई थी। मुहम्मद के कार्टून छापने पर डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अखबार के खिलाफ 2006 में सारे इस्लामी जगत में और यूरोपीय मुसलमानों के बीच इतने भड़काऊ आंदोलन चले थे कि उनमें लगभग 250 लोग मारे गए थे। 2015 में इन्हीं व्यंग्य-चित्रों को लेकर फ्रांसीसी पत्रिका 'चार्ली हेब्दो' के 12 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। यह पत्रिका इस घटना के पहले सिर्फ 60 हजार छपती थी लेकिन अब यह 80 लाख छपती है। इस व्यंग्य-पत्रिका में ईसाई, यहूदी और इस्लाम आदि मजहबों के बारे में तरह-तरह के व्यंग्य छपते रहते हैं। सेमुअल पेटी की हत्या छुरा मारकर की गई। हत्यारे अब्दुल्ला अज़ारोव की उम्र 18 साल है और वह चेचन्या का मुसलमान है। रूस का चेचन्या इलाका मुस्लिम-बहुल है। वहां अलगाववाद और आतंकवाद का आंदोलन कुछ वर्ष पहले इतना प्रबल हो गया था कि रूसी सरकार को अंधाधुंध बम-वर्षा करनी पड़ी थी। अब फ्रांसीसी पुलिस को अब्दुल्लाह की भी हत्या करनी पड़ी, क्योंकि वह आत्मसमर्पण नहीं कर रहा था। अब्दुल्लाह के परिवार समेत नौ लोगों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, क्योंकि या तो उन्होंने उसे भड़काया था या वे उसके इस अपराध का समर्थन कर रहे थे। इस घटना के कारण अब यूरोप में मुसलमानों का जीना और भी दूभर हो जाएगा। यूरोप के लोग मजहब के मामले में अपने ढंग से जीना चाहते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करते हुए वे इस्लाम, कुरान और मुहम्मद की भी उसी तरह कड़ी आलोचना करते हैं, जैसी कि वे कुंआरी माता मरियम, मूसा और ईसा की करते हैं। वे पोप और चर्च के खिलाफ क्या-क्या नहीं बोलते और लिखते हैं। मैं अपने छात्र-काल में अमेरिकी विद्वान कर्नल राॅबर्ट इंगरसोल की किताबें पढ़ता था तो आश्चर्यचकित हो जाता था। वे एक पादरी के बेटे थे। उन्होंने ईसाइयत के परखच्चे उड़ा दिए थे। इसी प्रकार महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने विलक्षण ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' के 14 अध्यायों में से 12 अध्यायों में भारतीय धर्मों और संप्रदायों की ऐसी बखिया उधेड़ी है कि वैसा साहस पिछले दो हजार साल में किसी भारतीय विद्वान ने नहीं किया लेकिन उसकी कीमत उन्होंने चुकाई। उन्हें ज़हर देकर मारा गया। उनके अनुयायी पं. लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद, महाशय राजपाल आदि की हत्या की गई। महर्षि दयानंद ने बाइबिल और कुरान की भी कड़ी आलोचना की है लेकिन उनका उद्देश्य ईसा मसीह या पैगंबर मुहम्मद की निंदा करना नहीं था बल्कि सत्य और असत्य का विवेक करना था। मैं थोड़ा इससे भी आगे जाता हूं। मैं मूर्ति-पूजा का विरोधी हूं लेकिन विभिन्न समारोहों में मुझे तरह-तरह की मूर्तियों और फोटुओं पर माला चढ़ानी पड़ती है। मैं चढ़ा देता हूं, इसलिए कि जिन आयोजकों ने वे मूर्तियां वहां सजाई हैं, मुझे उनका अपमान नहीं करना है। क्या यह बात हमारे यूरोपीय नेता और पत्रकार खुद पर लागू नहीं कर सकते लेकिन उनसे भी ज्यादा दुनिया के मुसलमानों को सोचना होगा। उन्हें खुद से पूछना चाहिए कि इस्लाम क्या इतना छुई-मुई पौधा है कि किसी का फोटो छाप देने, आलोचना या व्यंग्य या निंदा कर देने से वह मुरझा जाएगा ? अरब जगत की जहालत (अज्ञान) दूर करने में इस्लाम की जो क्रांतिकारी भूमिका रही है, उसको देश-काल के अनुरूप ढालकर और अपना और दूसरा का भी भला करना मुसलमानों का लक्ष्य होना चाहिए। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 18 October 2020


bhopal. Abolition , religious preaching, name of education

आर.के. सिन्हा   यह सवाल अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है कि क्या भारत में शिक्षा के नाम पर धर्म प्रचार की अनुमति जारी रहनी चाहिए? किसे नहीं पता कि धर्म प्रचार के कारण हमारे देश और पूरे विश्व में करोड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं और रोज मारे जा रहे हैं। क्या यह सच नहीं है कि भारत में कुछ खास धर्मों के मानने वाले शिक्षण संस्थानों में अपने-अपने धर्मों के प्रचार के लिए कोशिशें करते रहते हैं। कभी-कभी सच में लगता है इसपर देश में एकबार खुली बहस हो जाए कि भारत में धर्म प्रचार की स्वतंत्रता जारी रहे अथवा नहीं?   देखा जाए तो अपने धर्म पालन की सबको स्वतंत्रता होनी चाहिये। लेकिन, शिक्षण संस्थानों में अबोध बच्चों को अपने धर्म की अच्छाई और बाकी धर्मों की बुराई बताना, अबोध उम्र में उन्हें कट्टर बनाना और दूसरे धर्मावलम्बियों के प्रति घृणा फैलाना कहाँ तक उचित है? यही तो देश में धार्मिक उन्माद फैला रहा है। धर्म कोई दुकान या व्यापार तो है नहीं जिसका प्रचार-प्रसार जरूरी हो।   भारतीय संविधान धर्म की आजादी का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 25 (1) में कहा गया है कि " सभी व्यक्ति समान रूप से धर्म का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं।" लेकिन अनुच्छेद 26 कहता है कि धार्मिक आजादी और धार्मिक संप्रदायों के क्रियाकलाप में शांति और नैतिकता की शर्तें भी हैं। अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि सरकारी शैक्षिक संस्थानों में कोई धार्मिक निर्देश नहीं दिया जाएगा।   अगर हम इतिहास के पन्नों को खंगालें तो देखते हैं कि भारत के संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी। क्या इसकी कोई आवश्यकता थी? यह मानना होगा कि दो धर्म क्रमश: इस्लाम और ईसाई धर्म के मानने वालों की तरफ से लगातार यह प्रयास होते रहते हैं कि अन्य धर्मों के लोग भी येन-केन-प्रकारेण किसी भी लालच में उनके धर्म का हिस्सा बन जाएं। यह कठोर सत्य है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसपर देश में बार-बार बहस होती रही है और आरोप भी लगते रहे हैं कि इन धर्मों के ठेकेदार लालच या प्रलोभन देकर गरीब आदिवासियों, दलितों वगैरह को अपना अंग बनाने की फिराक में लगे रहते हैं।   बेशक, भारत में ईसाई धर्म की तरफ से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस और ईमानदारी से काम भी किया गया है। पर उस सेवा की आड़ में धर्मांतरण ही मुख्य लक्ष्य रहा है। मदर टेरेसा पर भी धर्मांतरण के अकाट्य आरोप लगे। उधर, इस्लाम का प्रचार करने वाले बिना कुछ कहे ही धर्मांतरण करवाने के मौके लगातार खोजते हैं। हालांकि मुसलमानों के अंजुमन इस्लाम ने भी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। यह मुंबई में सक्रिय है। अब आप देखें कि आर्य समाज, सनातन धर्म और सिखों की तरफ से देश में सैकड़ों स्कूल, कॉलेज, अस्पताल वगैरह चल रहे हैं। पर इन्होंने किसी ईसाई या मुसलमान के धर्मान्तरण का कभी प्रयास नहीं किया। एक छोटा-सा उदाहरण और देना चाहूंगा। एमडीएच नाम की मसाले बनाने वाली कंपनी के संस्थापक महाशय धर्मपाल गुलाटी को सारा देश जानता है। वे पक्के आर्य समाजी हैं। महाशय जी पूरी दुनिया में 'किंग ऑफ़ स्पाइस' माने जाते है। वे देश की राजधानी में एक अस्पताल और अनेक स्कूल चलाते हैं। कोई बता दे कि उन्होंने कभी किसी गैर-हिन्दू को हिन्दू धर्म से जोड़ने की कोशिश की हो।   खैर, धर्म परिवर्तन केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में एक जटिल मसला रहा है। इसपर लगातार बहस होती रही है। यह समझने की जरूरत है कि मोटा-मोटी संविधान कहता है कि कोई भी अपनी मर्जी से धर्म बदल सकता है, यह उसका निजी अधिकार है। पर किसी को डरा-धमकाकर या लालच देकर जबरदस्ती या लव जिहाद करके धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते।   संविधान संशोधन द्वारा धर्म प्रचार को रोकना सम्भव तो है पर यह देखना चाहिए कि धर्म के नाम पर बवाल किस वजह से हुआ? यदि धर्म प्रचार की वजह से हुआ है तो किन लोगों की वजह से हुआ है? एक राय यह भी है कि भारत में उन धर्मों के प्रचार की स्वतंत्रता होनी चाहिए जिनका उदय भारत भूमि पर हुआ है। जैसे हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध। अगर यह धर्म अपनी जन्मभूमि पर भी अधिकार खो देंगे तो यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। समस्या का मूल कारण इस्लाम और ईसाई हैं। इस्लाम और ईसाइयत को छोड़ दें तो बाकी धर्मों के बीच कोई आपसी विवाद नहीं है। यदि सभी धर्म प्रतिबन्धित हों, जिनमें हिन्दू धर्म और उससे निकले दूसरे धर्म भी शामिल होंगे तो यह गेहूँ के साथ घुन पिसने जैसी बात हो जायेगी। हाँ केवल इस्लाम और ईसाइयत का धर्म प्रचार प्रतिबन्धित हो तो युक्ति संगत लगता है।   फिर भी इतना तो हो ही सकता है कि विदेशियों को भारत में धर्म प्रचार की मनाही होनी चाहिए। आगे बढ़ने से पहले पारसी धर्म की भी बात करना सही रहेगा। यह भी भारत की भूमि का धर्म नहीं है। यह भारत में इस्लाम और ईसाइयत की तरह ही आया है लेकिन पारसियों ने भारत में अपने धर्म के प्रसार-प्रचार की कभी चेष्टा तक नहीं की। भारत में टाटा, गोदरेज, वाडिया जैसे बड़े उद्योगपति हैं। इन समूहों में लाखों लोग काम करते हैं। ये देश के निर्माण में लगे हुए हैं। सारा देश इनका आदर करता है। इनसे तो किसी को कोई मसला नहीं रहा।   इस बीच, धर्म की अवधारणा से भिन्न है मजहब का ख्याल। धर्म का तात्पर्य मुख्यतः कर्तव्य से है जबकि मजहब की अवधारणा किसी विशिष्ट मत को मानने से है। इसमें किसी क़िताब में दर्ज शब्दों के अक्षरशः पालन की अपेक्षा की जाती है। किताबिया मजहब जो मानते हैं उन्हें वैसा ही मानते रहने की आज़ादी बेशक बनी रहे कोई हर्ज नहीं, जैसे कोई सोते रहने की आज़ादी का तलबगार है, जागना नहीं चाहता, उसे सुख से सोने दीजिए। मगर दूसरों से यह कहने का अधिकार कि सत्य का ठेकेदार वही है, असंवैधानिक घोषित होना ही चाहिए। मतलब मजहबी प्रचार पर रोक लगाने पर बहस हो और इसपर एक कानून बन जाये तो क्या बुराई है। एकबार इस तरह की व्यवस्था हो जाए तो यह भी पता चल जाएगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कितने लोग निःस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं और कितने सेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन में लगे हैंI     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 16 October 2020


bhopal, Navratri: the meeting of the nine powers

नवरात्रि (17- 25 अक्टूबर) पर विशेष   योगेश कुमार गोयल   भारतीय समाज और विशेषकर हिन्दू समुदाय में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है, जो आदि शक्ति दुर्गा की पूजा का पावन पर्व है। नवरात्रि के नौ दिन देवी दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं इसीलिए नवरात्रि को नौ शक्तियों के मिलन का पर्व भी कहा जाता है। प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलने वाले नवरात्र नवशक्तियों से युक्त है और हर शक्ति का अलग महत्व है।   नवरात्र के पहले स्वरूप में मां दुर्गा पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में विराजमान हैं। नंदी नामक वृषभ पर सवार शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।   मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप ‘ब्रह्मचारिणी’ को समस्त विद्याओं की ज्ञाता माना गया है। माना जाता है कि इनकी आराधना से अनंत फल की प्राप्ति और तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है। ‘ब्रह्मचारिणी’ अर्थात् तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए सुशोभित है। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में पार्वती स्वरूप में थीं। वह भगवान शिव को पाने के लिए 1000 साल तक सिर्फ फल खाकर रहीं और 3000 साल तक शिव की तपस्या सिर्फ पेड़ों से गिरी पत्तियां खाकर की। इसी कड़ी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।   मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप है चंद्रघंटा। शक्ति के रूप में विराजमान मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा है। देवी का यह तीसरा स्वरूप भक्तों का कल्याण करता है। इन्हें ज्ञान की देवी भी माना गया है। बाघ पर सवार मां चंद्रघंटा के चारों तरफ अद्भुत तेज है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। यह तीन नेत्रों और दस हाथों वाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। कंठ में सफेद पुष्पों की माला और शीष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है। यह साधकों को चिरायु, आरोग्य, सुखी और सम्पन्न होने का वरदान देती हैं। कहा जाता है कि यह हर समय दुष्टों का संहार करने के लिए तत्पर रहती हैं और युद्ध से पहले उनके घंटे की आवाज ही राक्षसों को भयभीत करने के लिए काफी होती है।   चतुर्थ स्वरूप है कुष्मांडा। देवी कुष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। यह बाघ की सवारी करती हुईं अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्नजडि़त स्वर्ण मुकुट पहने उज्ज्वल स्वरूप वाली दुर्गा हैं। इन्होंने अपने हाथों में कमंडल, कलश, कमल, सुदर्शन चक्र, गदा, धनुष, बाण और अक्षमाला धारण की हैं। अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी तो चारों तरफ सिर्फ अंधकार था। ऐसे में देवी ने अपनी हल्की-सी हंसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। वह सूरज के घेरे में रहती हैं। सिर्फ उन्हीं के अंदर इतनी शक्ति है, जो सूरज की तपिश को सहन कर सकें। मान्यता है कि वही जीवन की शक्ति प्रदान करती हैं।   दुर्गा का पांचवां स्वरूप है स्कन्दमाता। भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण देवी के इस स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। यह दोनों हाथों में कमलदल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनतकुमार को थामे हुए हैं। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है।   दुर्गा मां का छठा स्वरूप है कात्यायनी। यह दुर्गा देवताओं और ऋषियों के कार्यों को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुईं। उनकी पुत्री होने के कारण ही इनका नाम कात्यायनी पड़ा। देवी कात्यायनी दानवों व पापियों का नाश करने वाली हैं। वैदिक युग में ये ऋषि-मुनियों को कष्ट देने वाले दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थीं। यह सिंह पर सवार, चार भुजाओं वाली और सुसज्जित आभा मंडल वाली देवी हैं। इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार व दाएं हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा है।   दुर्गा का सातवां स्वरूप कालरात्रि है, जो देखने में भयानक है लेकिन सदैव शुभ फल देने वाला होता है। इन्हें ‘शुभंकारी’ भी कहा जाता है। ‘कालरात्रि’ केवल शत्रु एवं दुष्टों का संहार करती हैं। यह काले रंग-रूप वाली, केशों को फैलाकर रखने वाली और चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं। यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़ग-तलवार से उनका नाश करने वाली कालरात्रि विकट रूप में विराजमान हैं। इनकी सवारी गधा है, जो समस्त जीव-जंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी माना गया है।   नवरात्र के आठवें दिन दुर्गा के आठवें रूप महागौरी की उपासना की जाती है। देवी ने कठिन तपस्या करके गौर वर्ण प्राप्त किया था। कहा जाता है कि उत्पत्ति के समय 8 वर्ष की आयु होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं, इसलिए अष्टमी के दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी है। यह एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू लिए हुए हैं। गायन और संगीत से प्रसन्न होने वाली ‘महागौरी’ सफेद वृषभ यानी बैल पर सवार हैं।   नवीं शक्ति ‘सिद्धिदात्री’ सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं, जिनकी उपासना से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कमल के आसन पर विराजमान देवी हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हैं। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 16 October 2020


bhopal, Kashmir: The desire , dissolve poison , Jannat again

डॉ. रमेश ठाकुर   नजरबंदी से मुक्त हुए कश्मीरी नेताओं ने फिर मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। कश्मीर घाटी हिंदुस्तान की जन्नत है लेकिन उस जन्नत में आजादी से ही जहर घुला था। बीते बारह-चौदह महीनों में वहां की आबोहवा में परिवर्तन आया। पिछले वर्ष पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35ए निरस्त होने के बाद समूचे प्रदेश का माहौल बदला। एकबार फिर उस जन्नत में जहर घोलने की कोशिशें होने लगी हैं। जम्मू-कश्मीर के एकीकरण के लिए कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों ने आपस में हाथ मिलाया है। बंदी से आजाद होने के बाद दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर में फिर से माहौल बिगाड़ने की सामूहिक साजिशें शुरू की हैं।   वादी में आग लगाने के लिए फारूख-महबूबा व अन्य कश्मीरी नेताओं के बीच बैठकों का दौर जारी है। बीते गुरूवार को सुबह और शाम में लगातार दो बैठकें हुईं, जिसमें जम्मू-कश्मीर के तमाम छोटे-बड़े सियासी दलों के बीच ‘गुप्त चर्चाएं होती रहीं, जिसमें प्रमुख रूप से नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीडीपी पार्टी नेता शामिल हुए। चेहरे सभी के मुरझाए हुए थे। चौदह महीने की बंदी से मुक्त हुए ये नेता एक सुर में फिर से अनुच्छेद 370 और 35ए को बहाल करने की मांग उठाते हुए अपने लिए पहले जैसा वातावरण चाहते हैं। शायद ये संभव नहीं? पर इतना जरूर है वह इन हरकतों से अपनी जगहंसाई जरूर करा रहे हैं।   बहरहाल, जम्मू में इस समय नेताओं के बीच जो खिचड़ी पक रही है उसकी भनक दिल्ली की सियासत को है। केंद्र की पैनी नजर उनकी प्रत्येक हलचल पर है। तभी तो चलती बैठक के बीच दिल्ली से जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा को सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने को कह दिया गया। बैठक खत्म करके कश्मीरी नेता जैसे ही बाहर निकले, उन्होंने दरवाज़ों पर सुरक्षाकर्मियों का भारी हजूम देखा और पूरे माजरे को समझ गए। इतना समझ गए कि उनकी कोई भी प्लानिंग अब आसानी से कारगर साबित नहीं होने वाली। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने और नेताओं को नजरबंदी से मुक्त कराने के बाद ये उनकी पहली बड़ी बैठक थी। लेकिन कहानी फिर वही से दोहराई जो पिछले साल चार अगस्त को छोड़ी थी।   कश्मीर को जब अनुच्छेद 370 से मुक्ति के लिए दिल्ली में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री में सुगबुगाहट हो रही थी तो उसकी भनक कश्मीर नेताओं को हो गई थी। वह भी केंद्र सरकार को घेरने के लिए घेराबंदी का प्लान बना रहे थे लेकिन सरकार ने उनको उतना मौका ही नहीं दिया। सबकुछ गुप्त प्लानिंग के साथ बहुत जल्दी किया गया। करीब सौ से ज्यादा कश्मीरी नेताओं को जो जिस हाल में था, उन्हें घरों में कैद कर दिया। बंदी के बाद घर के बाहर सख्त पहरेदारी बिठा दी। सुरक्षा के इतने तगड़े बंदोबस्त किए गए कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। लेकिन इसी सप्ताह वहां की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, सज्जाद लोन, यूसुफ़ तारिगामी और फारूख अब्दुल्ला की जैसे ही नजदबंदी हटाई गई, उन्होंने उछलकूद मचाना शुरू कर दिया। बंदी से आजाद होने के बाद महबूबा मुफ्ती का आतंकी को शहीद बताना और फारूख अब्दुल्ला का चीन के प्रति अपने मंसूबों को उजागर करने के पीछे की मंशा को केंद्र सरकार ने भांपने में देर नहीं की। फारूख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 बहाल करने की मांग को लेकर चीन से समर्थन मांगने की बात कह चुके हैं जिसके लिए उनकी पूरे देश में थू-थू हो रही है।   बहरहाल, सभी कश्मीरी नेताओं की हरकतों पर पैनी नजर हुई। अगर हरकतें बर्दाश्त से बाहर हुई तो हो सकता है उनकी नजरबंदी दोबारा बढ़ा दी जाए। इतना तय है केंद्र सरकार अपने फैसले से रत्ती भर भी इधर-उधर नहीं होने वाली। फारूख अब्दुल्ला जैसे नेताओं की मांगों को हुक़ूमत नज़रअंदाज़ करके ही चलेगी। केंद्र सरकार को वहां अभी राज्यपाल शासन लगे रहने देना चाहिए क्योंकि खुदा न खास्ता अगर विधानसभा के चुनाव होते हैं तो जनता को ये नेता रिझा लेंगे। जनसमर्थन मिलने के बाद ये लोग ना चाहते हुए भी केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर देंगे। एक बात और जो समझ से परे हैं। पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस की चुप्पी बनी हुई है। कश्मीरी नेता सोनिया गांधी से समर्थन मांग रहे हैं लेकिन उन्हें मुकम्मल जवाब नहीं मिल रहा। सोनिया गांधी के अलावा कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी फिलहाल इस कवायद से दूरी बना ली है। दिल्ली के अलावा जम्मू का भी कोई राजनेता फारूख अब्दुल्ला की बैठक में शामिल नहीं हुआ।   खुफ़िया एजेंसियों के पास ऐसे इनपुट हैं जिसमें कश्मीरी नेता फिर से प्रदेश में उपद्रव कराने की साजिश में हैं। कश्मीर में जिन नेताओं ने अभीतक जहर फैला कर राजनीति की थी, उन सभी नेताओं के लिए माहौल अब पहले जैसा नहीं रहा। यही वजह है कि नजरबंदी से आजाद होने के बाद फारूख-महबूबा जैसे लोग बदले माहौल में राजनीति की नई राह तलाश रहे हैं।   करीब एक साल नजरबंदी में रहने के बाद अब फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती अपने रूतबे को पाने के लिए बेचैन हैं। नजरबंदी के बाद का माहौल उन्हें बदला हुआ दिख रहा है। न समर्थक दिखाई पड़ते हैं, न ही कार्यकर्ताओं की उनके पक्ष में नारेबाज़ी, सब कुछ नदारद है। पाकिस्तान जो कभी उनका खुलकर समर्थन करता था, उसकी हालत भी पहले से पतली है। वहां फांके पड़े हैं, पाकिस्तान की इमरान सरकार कब धराशायी हो जाए, खुद प्रधानमंत्री इमरान खान को भी पता नहीं। ऐसे में कश्मीरी नेताओं का अलग-थलग पड़ जाना स्वाभाविक है। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बहाली और राज्य के एकीकरण के मुद्दे पर बेशक फारूख और महबूबा मुफ्ती ने हाथ मिलाये हों, पर होने वाला कुछ नहीं।        (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 October 2020


bhopal, Maharaja Agrasen was the founder of socialism

जयन्ती (17 अक्टूबर) पर विशेष   रमेश सर्राफ धमोरा   महाराजा अग्रसेन को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया था कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले प्रत्येक परिवार की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक परिवार उसे एक सिक्का व एक ईंट देगा। जिससे आने वाला परिवार स्वयं के लिए मकान व व्यापार का प्रबंध कर सके। महाराजा अग्रसेन ने शासन प्रणाली में नयी व्यवस्था को जन्म दिया। उन्होंने वैदिक सनातन आर्य संस्कृति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौ-पालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना की थी। महाराजा अग्रसेन एक सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। महाराज अग्रसेन ने नागलोक के राजा कुमद के यहां आयोजित स्वयंवर में राजकुमारी माधवी का वरण किया। इस विवाह से नाग एवं आर्यकुल का नया गठबंधन हुआ। महाराजा अग्रसेन समाजवाद के प्रर्वतक, युगपुरुष, रामराज्य के समर्थक एवं महादानी थे। माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुये। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश की स्थापना हुई। ऋषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों के साथ उनके द्वारा बसायी 18 बस्तियों के निवासियों ने भी धारण कर लिया। एक बस्ती के साथ प्रेम भाव बनाये रखने के लिए एक सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि अपने पुत्र और पुत्री का विवाह अपनी बस्ती में नहीं दूसरी बस्ती में करेंगे। आगे चलकर यह व्यवस्था गोत्रों में बदल गई जो आज भी अग्रवाल समाज में प्रचलित है। धार्मिक मान्यतानुसार मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवीं पीढ़ी में सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ। जिसे दुनिया भर में अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। राजा वल्लभ के अग्रसेन और शूरसेन नामक दो पुत्र हुये थे। अग्रसेन महाराज वल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय गर्ग ऋषि ने महाराज वल्लभ से कहा था कि यह बालक बहुत बड़ा राजा बनेगा। इसके राज्य में एक नई शासन व्यवस्था उदय होगी और हजारों वर्ष बाद भी इनका नाम अमर होगा। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे। महाराजा वल्लभ के निधन के बाद अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेड़िये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। ऋषि-मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास है। आज भी यह स्थान अग्रहरि और अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और मां लक्ष्मी देवी का भव्य मंदिर है। अग्रसेन अपने छोटे भाई शूरसेन को प्रतापनगर का राजपाट सौंप दिया। महाराजा अग्रसेन अग्रवाल जाति के पितामह थे। उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया। उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एकबार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोड़े को बहुत बैचैन और डरा हुआ देख उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने पशु बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवंश समाज हिंसा से दूर रहता है। कहा जाता है कि महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया। महाराज अग्रसेन ने एक ओर हिन्दू धर्म ग्रंथों में वैश्य वर्ण के लिए निर्देशित कर्म क्षेत्र को स्वीकार किया और नए आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन के मूल रूप से तीन आदर्श हैं- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, आर्थिक समरूपता एवं सामाजिक समानता। एक निश्चित आयु प्राप्त करने के बाद कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श पर वे आग्रेय गणराज्य का शासन अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु के हाथों में सौंपकर तपस्या करने चले गए। कहते हैं कि एकबार अग्रोहा में बड़ी भीषण आग लगी। उसपर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघर हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे। पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोड़ी। वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं। वैसे महाराजा अग्रसेन पर अनगिनत पुस्तके लिखी जा चुकी हैं। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र जो खुद भी अग्रवाल समुदाय से थे, उन्होंने 1871 में अग्रवालों की उत्पत्ति नामक एक प्रामाणिक ग्रंथ लिखा है। जिसमें विस्तार से इनके बारे में बताया गया है। 24 सितंबर 1976 में भारत सरकार द्वारा 25 पैसे का डाक टिकट महाराजा अग्रसेन के नाम पर जारी किया गया था। सन 1995 में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से 350 करोड़ रुपये में एक विशेष तेलवाहक पोत (जहाज) खरीदा, जिसका नाम महाराजा अग्रसेन रखा गया। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 10 का आधिकारिक नाम महाराजा अग्रसेन पर है। आज का अग्रोहा ही प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित अग्रवालों का उद्गम स्थान आग्रेय है। अग्रोहा हिसार से 20 किलोमीटर दूर महाराजा अग्रसेन राष्ट्र मार्ग संख्या 10 के किनारे एक साधारण गांव के रूप में स्थित है। जहां पांच सौ परिवारों की आबादी रहती है। इसके समीप ही प्राचीन राजधानी अग्रेह (अग्रोहा) के अवशेष के रूप में 650 एकड़ भूमि में फैला महाराजा अग्रसेन धाम है। जो महाराज अग्रसेन के अग्रोहा नगर के गौरव पूर्ण इतिहास को दर्शाता है। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज में पांचवें धाम के रूप में पूजा जाता है। अग्रोहा विकास ट्रस्ट ने यहां पर बहुत सुंदर मन्दिर, धर्मशालाएं आदि बनाकर यहां आने वाले अग्रवाल समाज के लोगों के लिए बहुत सुविधायें उपलब्ध करवायी हैं। इतिहास में महाराज अग्रसेन परम प्रतापी, धार्मिक, सहिष्णु, समाजवाद के प्रेरक महापुरुष के रूप में उल्लेखित हैं। देश में जगह-जगह महाराजा अग्रसेन के नाम पर बनाये गये स्कूल, अस्पताल, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि महाराजा अग्रसेन के जीवन मूल्यों का आधार हैं। जो मानव आस्था के प्रतीक हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 15 October 2020


bhopal,Look at Dalit voters

मुरली मनोहर श्रीवास्तव बिहार विधानसभा चुनाव में दलित वोटबैंक सभी दलों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसे साधने के लिए सभी पार्टियां पुरजोर कोशिश कर रही हैं। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में 38 एससी और 02 एसटी के लिए सुरक्षित हैं। 22 अलग-अलग जातियों के महादलित, राज्य के कुल मतदाताओं के लगभग 16 प्रतिशत हैं लेकिन दलित वोटों का प्रभाव इन सीटों से कहीं ज्यादा आंकी जाती है। चुनाव करीब आते ही दलितों को रिझाने के लिए सभी दल अपने-अपने तरीके से लगी हुई हैं। मगर अफसोस कि दलितों के सहयोग से बनने वाली सरकारों ने कभी दलित उत्पीड़न के लिए कोई कारगर उपाय नहीं निकाला। हालांकि बिहार के मुखिया नीतीश कुमार, इस समुदाय से मुख्यमंत्री बनाने से लेकर महादलितों के लिए कई योजनाओं की घोषणा कर दलित नेताओं पर भी बिहार में भारी पड़ रहे हैं। एक तरफ कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से जहां चुनाव आयोग चुनाव नहीं टालने के पक्ष में था, नीतीश कुमार ने सबसे पहले बिहार में महादलित कार्ड खेलकर राजनीतिक चाल पहले ही चल दी। विकास के मामले में भी नीतीश कुमार के कार्यों को दरकिनार करना आसान नहीं है। इन्हीं कार्यों और राजनीतिक महारत के बूते नीतीश कुमार चौथी बार सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं। विकास और महादलित कार्ड नीतीश ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (उत्‍पीड़न रोकथाम) अधिनियम 1995 के तहत गठित राज्य स्तरीय सतर्कता और निगरानी समिति की बैठक में अधिकारियों से कहा, "उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए हम समुदाय के उत्थान के लिए कई योजनाएं चला रहे हैं। दूसरी योजनाओं और परियोजनाओं के बारे में भी आपलोग सोचिए। उनकी सहायता के लिए जो भी आवश्यक होगा हम करेंगे।" इतना ही नहीं नीतीश ने 20 सितंबर तक अधिकारियों से लंबित मामलों को निपटाने का भी निर्देश दिया था। साथ ही एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो उस स्थिति में अनुकंपा के आधार पर परिवार के एक सदस्य को तत्काल रोजगार प्रदान करने के नियम बनाने का भी नीतीश कुमार ने आदेश दिया। दलित कार्ड से तिलमिलाए विपक्षी नीतीश कुमार और उनकी कार्यशैली जाति की राजनीति करने वालों पर अक्सर भारी पड़ जाती है। अगर आपको यकीन नहीं होता तो तेजस्वी यादव के उस बयान को याद कीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि "नीतीश कुमार ने सरकारी नौकरियां देने की घोषणा की है क्योंकि चुनाव सिर पर है। यह एससी/एसटी लोगों की हत्या को प्रोत्साहन देने जैसा है। फिर ओबीसी या सामान्य वर्ग के उन लोगों को भी नौकरी क्यों नहीं दी जानी चाहिए जिनकी हत्या हुई है?"  नीतीश के इस घोषणा के बाद दलित राजनीति करने वाली बसपा अध्यक्ष मायावती भला कैसे चुप रह जातीं। उन्होंने कहा कि बिहार में जद(यू)-भाजपा सरकार वोट की खातिर एससी-एसटी लोगों को लालच दे रही है। उन्होंने यह भी कहा कि "बिहार सरकार समाज के इस तबके के कल्याण के लिए वास्तव में इतनी ही गंभीर है तो इतने साल तक उनकी जरूरतों और मांगों की अनदेखी कर सोती क्यों रही?" वहीं, भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि "जब, सरकार ने इस संबंध में घोषणा की है तो इसका विरोध क्यों किया जा रहा है?" वे पूछते हैं, "क्या राजद यह घोषणा कर सकता है कि अगर उन्हें (सरकार बनाने का) मौका मिलता है तो अनुकंपा के आधार पर मिली नौकरियों और सभी प्रकार की मदद को रोक देगा?"  चिराग की नीतीश से नाराजगी नीतीश कुमार पर चुनाव से पहले हमलावर रहे लोक जनशक्ति पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान ने इस मुद्दे पर नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखकर अपनी नाराजगी दर्ज करायी थी। चिराग ने नीतीश के इस कदम को "चुनावी घोषणा" बताया। चिराग ने कहा कि "नीतीश सरकार ईमानदार है तो उसे एससी-एसटी समुदाय के उन लोगों को नौकरी देनी चाहिए, जिन्होंने बिहार में उनके 15 साल के शासन के दौरान अपनी जान गंवाई।" लोजपा संस्थापक रामविलास पासवान दुसाध (पासवान) समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में एक थे। 8 अक्टूबर को इनके निधन से पूरा देश गमगीन हो गया। बिहार में दलितों की सबसे प्रमुख जाति पासवान हर चुनाव में लगभग 7 प्रतिशत वोट के साथ अपनी दावेदारी पेश करती है। नीतीश का मांझी कार्ड कितना कारगर पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्यूलर) के नेता जीतन राम मांझी का फिर से एनडीए में आना चिराग को खल गया। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि "एससी/एसटी अधिनियम के तहत पहले से ही एक प्रावधान है, जो कमजोर वर्गों से मारे गए लोगों के परिजनों को रोजगार प्रदान करता है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उन्हें अधिनियम को दोबारा ध्यान से पढ़ना चाहिए।" नीतीश कुमार का हर कदम सधा हुआ होता है तभी तो मुसहर समाज के कद्दावर नेता मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी 8 माह के लिए बैठाया था और उस दरम्यान कई घोषणाएं भी हुई थीं। हालांकि मांझी के नीतीश के साथ आने पर राजद नेताओं ने कहा कि अपने साथ हुए व्यवहार को शायद मांझी भूल गए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 14 October 2020


bhopal,Train the navy

प्रमोद भार्गव दक्षिण-कश्मीर के शोपियां जिले में एक धार्मिक मदरसे के 13 छात्रों के आतंकवादी समूहों में शामिल होने की खबर अत्यंत चिंताजनक है। जामिया-सिराज-उल-उलूम नाम के इस मदरसे के तीन अध्यापकों को जन-सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत बंदी बनाया गया है। अन्य छह अध्यापक संदेह के घेरे में हैं। इसे कश्मीर के नामी मदरसों में गिना जाता है। इसके पहले भी यह मदरसा हिंसक घटनाओं, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और यहां के छात्रों के आतंकी वारदातों में शामिल होने के कारण जांच एजेंसियों के रडार पर रहा है। हैरानी की बात है कि पिछले कुछ सालों में जो छात्र दक्षिण-कश्मीर में मारे गए हैं, उनमें से 13 ने इसी मदरसे से आतंक का पाठ पढ़ा था। पुलवामा हमले में शामिल रहे सज्जाद बट ने भी यहीं से पढ़ाई की थी, जिसे इसी साल अगस्त में सुरक्षाबलों ने मारा है। अल-बदर का आतंकी जुबैर नेंगरू, हिज्बुल का आतंकी नाजमीन डार और एजाज अहमद पाल भी जिहाद की इसी पाठशाला से निकले थे। यह मदरसा जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा है। इस मदरसे में जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तर-प्रदेश, केरल, और तेलंगाना के छात्र भी पढ़ने आते हैं। इस खुलासे से साफ है कि घाटी में सेना, सुरक्षाबलों और स्थानीय पुलिस का शिकंजा कस रहा है। इसलिए आतंकी संगठन मदरसों को ठिकाना बनाकर छात्रों को आतंकी बनाने का क्रूर खेल, खेलने में लग गए हैं। बच्चों धार्मिक कट्टरता के बहाने आतंक का पाठ पढ़ाना आसान होता है। चूंकि धारा-370 और 35-ए के खात्मे के बाद घाटी की आम जनता खुले रूप में न केवल मुख्यधारा में शामिल हो रही है, बल्कि शासन-प्रशासन की योजनाओं में बढ़-चढ़कर भागीदारी भी कर रही है। इसलिए आतंकी संगठन जनता में घुसपैठ बनाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। नतीजतन ये उन मदरसों में घुसपैठ कर रहे हैं जिनका इतिहास आतंकियों की शरणस्थली बने रहने का रहा है। घाटी के आतंकी दौर की हकीकत रही है कि पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों पर जो आत्मघाती हमले कराए हैं, उनमें बड़ी संख्या में मासूम बच्चों और किशोरों का इस्तेमाल किया गया था। इस सत्य का खुलासा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की 'बच्चे एवं सशस्त्र संघर्ष' नाम से आई रिपोर्ट में भी किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे आतंकी संगठनों में शामिल किए जाने वाले बच्चे और किशोरों को आतंक का पाठ मदरसों में पढ़ाया गया है। साल 2017 में कश्मीर में हुए तीन आतंकी हमलों में बच्चों के शामिल होने के तथ्य की पुष्टि हुई थी। पुलवामा जिले में मुठभेड़ के दौरान 15 साल का एक नाबालिग मारा गया था और सज्जाद बट शामिल था, जिसे अगस्त-2020 में सुरक्षाबलों ने मारा है। यह रिपोर्ट जनवरी-2017 से दिसंबर तक की है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों ने ऐसे वीडियो जारी किए हैं, जिनमें किशोरों को आत्मघाती हमलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाकिस्तान में सशस्त्र समूहों द्वारा बच्चों व किशोरों को भर्ती किए जाने और उनका इस्तेमाल आत्मघाती हमलों मेें किए जाने की लगातार खबरें मिल रही हैं। जनवरी-17 में तहरीक-ए-तालिबान ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें लड़कियों सहित बच्चों को सिखाया जा रहा है कि आत्मघाती हमले किस तरह किए जाते हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनियाभर में बाल अधिकारों के हनन के 21,000 मामले सामने आए हैं। पिछले साल दुनियाभर में हुए संघर्षों में 10,000 से भी ज्यादा बच्चे मारे गए या विकलांगता का शिकार हुए। आठ हजार से ज्यादा बच्चों को आतंकियों, नक्सलियों और विद्रोहियों ने अपने संगठनों में शामिल किया है। ये बच्चे युद्ध से प्रभावित सीरिया, अफगानिस्तान, यमन, फिलीपिंस, नाईजीरिया, भारत और पाकिस्तान समेत 20 देशों के हैं। भारत के जम्मू-कश्मीर में युवाओं को आतंकवादी बनाने की मुहिम कश्मीर के अलगाववादी चलाते रहे हैं। इस तथ्य की पुष्टि 20 वर्षीय गुमराह आतंकवादी अरशिद माजिद खान के आत्मसमर्पण से हुई थी। अरशिद कॉलेज में फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी था। किंतु कश्मीर के बिगड़े माहौल में धर्म की अफीम चटा देने के कारण वह बहक गया और लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हो गया। उसके आतंकवादी बनने की खबर मिलते ही मां-बाप जिस बेहाल स्थिति को प्राप्त हुए टीवी चैनलों पर दिखाए गए थे, उससे अरशिद का हृदय पिघल गया और वह घर लौट आया। दरअसल कश्मीरी युवक जिस तरह से आतंकी बनाए जा रहे हैं, यह पाकिस्तानी सेना और वहां पनाह लिए आतंकी संगठनों का नापाक मंसूबा है। इसके लिए मुस्लिम कौम के उन गरीब व लाचार बच्चों, किशोर और युवाओं को इस्लाम के बहाने आतंकवादी बनाने का काम मदरसों में किया जा रहा है, जो अपने परिवार की आर्थिक बदहाली दूर करने के लिए आर्थिक सुरक्षा चाहते हैं। पाक सेना के भेष में यही आतंकी अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेखा को पार कर भारत-पाक सीमा पर छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध में भी इन छद्म बहरुपियों की मुख्य भूमिका थी। इस सच्चाई से पर्दा संयुक्त राष्ट्र ने अब उठाया है, किंतु खुद पाक के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे, शाहिद अजीज ने 'द नेशनल डेली अखबार' में पहले ही उठा दिया था। अजीज ने कहा था कि 'कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं।' कमोबेश आतंकवादी और अलगाववादियों की शह के चलते यही हश्र कश्मीर के युवा भोग रहे हैं। पाक की इसी दुर्भावना का परिणाम था कि जब 10 लाख का खूंखार इनामी बुरहान वानी भारतीय सेना के हाथों मारा गया तो उसे शहीद बताने के बाबत जो प्रदर्शन हुए थे, उनमेें करीब 100 कश्मीरी युवक मारे गए थे। दरअसल यह स्थिति धारा-370 खत्म होने से पहले तक सीमा पार से अलगाववादियों को मिल रहा बेखौफ प्रोत्साहन रहा था। जबकि अलगाव का नेतृत्व कर रहे कश्मीरी नेताओं में ज्यादातर के बीबी-बच्चे कश्मीर की सरजमीं पर रहते ही नहीं हैं। इनके दिल्ली में आलीशान घर हैं और इनके बच्चे देश के नामी स्कूलों में या तो पढ़ रहे हैं या फिर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। इन्हीं अलगाववादियों की शह से घाटी में संचार सुविधाओं के जरिए चरमपंथी माहौल विकसित हुआ था। अलगाववाद से जुड़ी जो सोशल साइटें हैं, वे युवाओं में भटकाव पैदा कर रही थीं। इसीलिए जब भी रमजान के महीने में केंद्र सरकार ने उदारता बरती तब इसके सकारात्मक परिणाम निकलने की बजाय सेना को पत्थरबाजों का दंश झेलना पड़ा था। यही नहीं संघर्ष विराम का लाभ उठाते हुए आतंकियों ने राइफलमैन औरंगजेब और संपादक शुजात बुखारी की निर्मम हत्याएं कर दी थीं। इन घटनाओं से प्रेरित होकर अलगाववादियों ने आजादी की मांग के साथ इस्लामिक स्टेट को जम्मू-कश्मीर में लाने का नारा बुलंद कर दिया था। यही वजह रही थी कि पहले कश्मीर के भटके युवा अपने लोगों को नहीं मारते थे और न ही पर्यटकों व पत्रकारों को हाथ लगाते थे। लेकिन इसके बाद जो भी उन्हें, उनके रास्ते में बाधा बनता दिखा, उसे निपटाने लग गए थे। इसी क्रम में औरंगजैब और शुजात बुखारी से पहले ये आतंकी उपनिरीक्षक गौहर अहमद, लेफ्टिनेंट उमर फैयाज और डीएसपी अयूब पंडित की भी हत्या कर चुके थे। सैन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि पहले ज्यादातर आतंकी कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन बाद में जो आतंकी सामने आए, वे काफी पढ़े-लिखे थे। यही वजह है कि ये ज्यादा निरंकुश और दुर्दांत रूप में पेश आए थे। बहरहाल देश की जांच एजेंसियों और स्थानीय पुलिस को घाटी में मौजूद मदरसों व अन्य शैक्षिक संस्थाओं पर नियंत्रण व निगरानी बनाए रखने की जरूरत है, जिससे आतंकी छात्रों के कोमल व निर्दोष मन-मस्तिष्क को राष्ट्रघाती मंशाओं के अनुरूप ढालने में सफल नहीं होने पाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 October 2020


bhopal, Dr. Kalam

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जयंती (15 अक्टूबर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल देश के पूर्व राष्ट्रपति, देश के महान वैज्ञानिक व प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम) सच्चे अर्थों में ऐसे महानायक थे, जिन्होंने अपना बचपन अभावों में बीतने के बाद भी पूरा जीवन देश और मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया। छात्रों और युवा पीढ़ी को दिए गए उनके प्रेरक संदेश तथा उनके स्वयं के जीवन की कहानी देश की आनेवाली कई पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करने का कार्य करती रहेगी। न केवल भारत के लोग बल्कि पूरी दुनिया मिसाइलमैन डॉ. कलाम की सादगी, धर्मनिरपेक्षता, आदर्शों, शांत व्यक्तित्व और छात्रों व युवाओं के प्रति उनके लगाव की कायल थी। डॉ. कलाम देश को वर्ष 2020 तक आर्थिक शक्ति बनते देखना चाहते थे। डॉ. कलाम का मानना था कि केवल शिक्षा के द्वारा ही हम अपने जीवन से निर्धनता, निरक्षरता और कुपोषण जैसी समस्याओं को दूर कर सकते हैं। उनके ऐसे ही महान विचारों ने देश-विदेश के करोड़ों लोगों को प्रेरित करने और देश के लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने का कार्य किया। उनका ज्ञान और व्यक्तित्व इतना विराट था कि उन्हें दुनिया भर के 40 विश्वविद्यालयों ने डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि प्रदान की। तमिलनाडु के छोटे से गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में 15 अक्तूबर 1931 को जन्मे डॉ. कलाम छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए अक्सर कहा करते थे कि छात्रों के जीवन का एक तय उद्देश्य होना चाहिए। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि वे हरसंभव स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करें। छात्रों की तरक्की के लिए उनके द्वारा जीवन पर्यन्त किए गए महान कार्यों को देखते हुए ही सन् 2010 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा उनका 79वां जन्म दिवस ‘विश्व विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया और तभी से डॉ. कलाम के जन्मदिवस 15 अक्तूबर को प्रतिवर्ष ‘विश्व विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है। समय-समय पर युवाओं को दिए गए उनके प्रेरक संदेशों की बात करें तो वे कहा करते थे कि अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हो तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो। वे कहते थे कि अगर आप फेल होते हैं तो निराश मत होइए क्योंकि फेल होने का अर्थ है ‘फर्स्ट अटैंप्ट इन लर्निंग’ और अगर आपमें सफल होने का मजबूत संकल्प है तो असफलता आप पर हावी नहीं हो सकती। इसलिए सफलता और परिश्रम का मार्ग अपनाओ, जो सफलता का एकमात्र रास्ता है। डॉ. कलाम कहते थे कि आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते लेकिन अपनी आदतें बदल सकते हैं और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी। वे हमेशा कहा करते थे कि महान सपने देखने वाले महान लोगों के सपने हमेशा पूरे होते हैं। उनका कहना था कि इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्योंकि सफलता का आनंद उठाने के लिए कठिनाइयां बहुत जरूरी हैं। सपने देखना जरूरी है लेकिन केवल सपने देखकर ही उसे हासिल नहीं किया जा सकता बल्कि सबसे जरूरी है कि जिंदगी में स्वयं के लिए कोई लक्ष्य तय करें। कलाम साहब कहते थे कि इस देश के सबसे तेज दिमाग स्कूलों की आखिरी बेंचों पर मिलते हैं। हम सबके पास एक जैसी प्रतिभा नहीं है लेकिन अपनी प्रतिभाओं को विकसित करने के अवसर सभी के पास समान हैं। सादगी की प्रतिमूर्ति डॉ. कलाम के विराट व्यक्तित्व को परिभाषित करते कई किस्से सुनने को मिलते हैं।  डॉ. कलाम राष्ट्रपति जैसे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन रहते हुए भी आम लोगों से मिलते रहे। एकबार कुछ युवाओं ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की और इसके लिए उन्होंने उनके कार्यालय को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी मिलने के बाद डॉ. कलाम ने उन युवाओं को अपने पर्सनल चैंबर में आमंत्रित किया और वहां न केवल उनसे मुलाकात की बल्कि उनके विचार, उनके आइडिया सुनते हुए काफी समय उनके साथ गुजारा। जिस समय डॉ. कलाम भारत के राष्ट्रपति थे, वे एक बार आईआईटी के एक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए पहुंचे। उनके पद की गरिमा का सम्मान करते हुए आयोजकों द्वारा उनके लिए मंच के बीच में बड़ी कुर्सी लगवाई गई। डॉ. कलाम जब वहां पहुंचे और उन्होंने केवल अपने लिए इस प्रकार की विशेष कुर्सी की व्यवस्था देखी तो उन्होंने उस कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया, जिसके बाद आयोजकों ने उनके लिए मंच पर लगी दूसरी कुर्सियों जैसी ही कुर्सी की व्यवस्था कराई। उनके मन में दूसरे जीवों के प्रति भी किस कदर करूणा और दयाभाव विद्यमान था, इसका अंदाजा इस घटनाक्रम से सहज ही लग जाता है। जब 1982 में वे डीआरडीओ के चेयरमैन बने तो उनकी सुरक्षा के लिए डीआरडीओ की सेफ्टी वाल्स पर कांच के टुकड़े लगाने का प्रस्ताव लाया गया लेकिन कलाम साहब ने यह कहते हुए उसके लिए साफ इनकार कर दिया था कि दीवारों पर कांच के टुकड़े लगाने से पक्षी नहीं बैठ पाएंगे और ऐसा करने की प्रक्रिया में पक्षी घायल भी हो सकते हैं। इस कारण उस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। राष्ट्रपति जैसे बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी कलाम अपने बचपन के दोस्तों को नहीं भूलते थे। 2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद एकबार वे तिरुअनंतपुरम के राजभवन में मेहमान थे, तब उन्होंने अपने स्टाफ को वहां के एक मोची और ढाबे वाले को खाने पर बुलाने का निर्देश दिया। सभी उनके इस निर्देश को सुनकर हैरान थे। बाद में पता चला कि ये दोनों कलाम साहब के बचपन के दोस्त थे। दरअसल, कलाम साहब ने अपने जीवन का बहुत लंबा समय केरल में बिताया था और उसी दौरान उनके घर के पास रहने वाले उस मोची तथा ढाबे वाले से उनकी दोस्ती हो गई थी। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे तिरुअनंतपुरम पहुंचे, तब भी वे अपने इन दोस्तों को नहीं भूले और उन्हें राजभवन बुलाकर उन्हीं के साथ खाना खाकर उन्हें इतना मान-सम्मान दिया। डॉ. कलाम के जीवन के अंतिम पलों के बारे में उनके विशेष कार्याधिकारी रहे सृजनपाल सिंह ने लिखा है कि शिलांग में जब वह डॉ. कलाम के सूट में माइक लगा रहे थे तो उन्होंने पूछा था, ‘फनी गाय हाउ आर यू’, जिसपर सृजनपाल ने जवाब दिया ‘सर ऑल इज वेल’। उसके बाद डॉ. कलाम छात्रों की ओर मुड़े और बोले ‘आज हम कुछ नया सीखेंगे’- इतना कहते ही वे पीछे की ओर गिर पड़े। पूरे सभागार में सन्नाटा पसर गया और इस प्रकार इस महान विभूति ने दुनिया को अलविदा कह दिया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 October 2020


bhopal,The heart of the thoughts of the Sangh chief

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   आरएसएस सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है। इसकी स्थापना सकारात्मक चिंतन के आधार पर हुई थी। अर्थात संघ का उद्देश्य किसी का विरोध करना नहीं बल्कि हिंदुओं को संगठित करना रहा है। जब हिंदुत्व की बात आती है तो किसी अन्य पंथ के प्रति नफरत, कट्टरता या आतंक का विचार स्वतः समाप्त हो जाता है। तब वसुधैव कुटुंबकम व सर्वे भवन्तु सुखिनः का भाव ही जागृत होता है। भारत जब विश्व गुरु था तब भी उसने किसी अन्य देश पर अपने विचार थोपने के प्रयास नहीं किये। भारत शक्तिशाली था तब भी तलवार के बल पर किसी को अपना मत त्यागने को विवश नहीं किया। दुनिया की अन्य सभ्यताओं से तुलना करें तो भारत बिल्कुल अलग दिखाई देता है। जिसने सभी पंथों को सम्मान दिया। सभी के बीच बंधुत्व का विचार दिया। ऐसे में भारत को शक्ति संम्पन्न बनाने की बात होती है तो उसमें विश्व के कल्याण का विचार ही समाहित होता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ऐसे ही भारत को पुनः देखना चाहता है। इस दिशा में प्रयास कर रहा है।   सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक साक्षात्कार में इसी के अनुरूप विचार व्यक्त किये। उन्होंने भारत के पुनः विश्व गुरु होने सहित आत्मनिर्भर भारत, राममंदिर, शिक्षा नीति आदि अनेक सामयिक व ज्वलन्त विषयों पर विचार व्यक्त किये। संघ प्रमुख के विचार मार्गदर्शक रूप में महत्वपूर्ण हैं। भारत की प्रकृति मूलतः एकात्म है और समग्र है। अर्थात भारत संपूर्ण विश्व में अस्तित्व की एकता को मानता है। इसलिए हम टुकड़ों में विचार नहीं करते। हम सभी का एक साथ विचार करते हैं। जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। निर्माण का यह विषय पूर्ण हुआ। लेकिन श्रीराम तो भारत के आत्मतत्व में हैं, शाश्वत है। इसलिए श्रीराम का विषय कभी समाप्त नहीं हो सकता। श्रीराम भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए भगवान हैं और जिनके लिए भगवान नहीं भी हैं, उनके लिए आचरण के मापदंड तो हैं। भगवान राम भारत के उस गौरवशाली भूतकाल का अभिन्न अंग हैं। राम थे, हैं और रहेंगे।   वास्तविकता यह है कि ये प्रमुख मंदिर इस देश के लोगों के नीति एवं धैर्य को समाप्त करने के लिए तोड़े गए थे। इसलिए हिंदू समाज की तब से ही यह इच्छा थी कि ये मंदिर फिर से बनें। "परमवैभव संपन्न विश्वगुरु भारत" बनाने के लिए भारत के प्रत्येक व्यक्ति को वैसा भारत निर्माण करने के योग्य बनना पड़ेगा। अत: मन की अयोध्या बनाना तुरंत शुरू कर देना चाहिए।   समाज का आचरण शुद्ध होना चाहिए। इसके लिए जो व्यवस्था है उसमें ही धर्म की भी व्यवस्था है। धर्म में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, स्वाध्याय, संतोष, तप को महत्व दिया गया। समरसता सद्भाव से देश का कल्याण होगा। हमारे संविधान के आधारभूत तत्व भी यही हैं। संविधान में उल्लेखित प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य, नागरिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व यही बताते हैं। जब भारत एवं भारत की संस्कृति के प्रति भक्ति जागती है व भारत के पूर्वजों की परंपरा के प्रति गौरव जागता है, तब सभी भेद तिरोहित हो जाते हैं। भारत ही एकमात्र देश है जहाँ पर सबके सब लोग बहुत समय से एक साथ रहते आए हैं। सबसे अधिक सुखी मुसलमान भारत देश के ही हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश है जहाँ उस देश के वासियों की सत्ता में दूसरा संप्रदाय रहा हो। हमारे यहाँ मुसलमान व इसाई हैं। उन्हें तो यहाँ सारे अधिकार मिले हुए है, पर पाकिस्तान ने तो अन्य मतावलंबियों को वे अधिकार नहीं दिए। बाबासाहेब आंबेडकर भी मानते थे कि जनसंख्या की अदला-बदली होनी चाहिए। परंतु उन्होंने भी यहाँ जो लोग रह गए उन्हें स्थानांतरित करने का प्रावधान संविधान में नहीं किया। बल्कि उनके लिए भी एक जगह बनाई गई। यह हमारे देश का स्वभाव है और इस स्वभाव को हिंदू कहते हैं। हम हिंदू हैं और हम भारतीय हैं। हम मुसलमान हैं लेकिन हम अरबी अथवा तुर्की नहीं हैं। शिक्षा में आत्म भान व गौरव भाव होना चाहिए। गौरवान्वित करने वाली बातों को देने वाले संस्कार शिक्षा से, सामाजिक वातावरण से एवं पारिवारिक प्रबोधन से मिलना चाहिए।   आत्मनिर्भरता स्वाबलंबी या विजयी भाव नहीं है। हम कभी भी अतिवादी नहीं हो सकते। डॉ. आंबेडकर ने संसद में कहा स्वतंत्रता और समता एक साथ लाना है तो बंधुभाव चाहिए। विश्व की अर्थव्यवस्था में एक हजार वर्ष तक भारत नंबर वन पर रहा। उस समय विश्व के बहुत बड़े भूभाग पर हमारा प्रभाव तो था। हमारा साम्राज्य भी बहुत बड़ा था। लेकिन ऐसा सब होने के बावजूद हमने दुनिया में जाकर किसी देश को समाप्त नहीं किया। हमारी शिक्षा दुनिया के संघर्ष में खड़ा होकर अपना और अपने परिवार का जीवन चला सके, इतनी कला और इतना विश्वास देने वाली होनी चाहिए।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 October 2020


bhopal, Rudram: The invincible warrior on the battlefield

योगेश कुमार गोयल एलएसी पर चीन के साथ तनाव के बीच भारत स्वदेशी तकनीकों द्वारा निर्मित मिसाइलों के लगातार सफल परीक्षण कर पूरी दुनिया को अपनी मिसाइल शक्ति का स्पष्ट अहसास करा रहा है। मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में भारत ने हाल ही में एक और ऊंची छलांग लगाई है। खासतौर से भारतीय वायुसेना के लिए डीआरडीओ (डिफेंस रिसर्च एंड डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) द्वारा बनाई गई ‘रुद्रम’ नामक एंटी रेडिएशन मिसाइल का गत 9 अक्तूबर को उड़ीसा के बालासोर में इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आइटीआर) में सफल परीक्षण कर डीआरडीओ ने रक्षा क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है। इस मिसाइल को डीआरडीओ के वैज्ञानिकों द्वारा सुखोई एसयू-30एमकेआई फाइटर जेट के जरिये छोड़ा गया और ‘रुद्रम’ अपने निशाने को पूरी तरह से नष्ट करने में सफल रही। यह देश में बनी अपनी तरह की नई पीढ़ी की पहली एंटी रेडिएशन मिसाइल है, जिसकी रेंज 100 से 150 किलोमीटर के बीच है। जमीन से हवा में मार करने वाली यह पहली ऐसी मिसाइल है, जो दुश्मन के हवाई ठिकानों को पलक झपकते ध्वस्त कर सकती है और जिसकी रेंज अलग-अलग परिस्थितियों में बदल सकती है। इस मिसाइल के जरिये दुश्मन के सर्विलांस रडार, ट्रैकिंग और कम्युनिकेशन सिस्टम को आसानी से टारगेट किया जा सकता है। फिलहाल डीआरडीओ द्वारा रुद्रम का परीक्षण सुखोई एसयू-30 के साथ किया गया है लेकिन इसे पूरी तरह विकसित करने के बाद मिराज 2000, जगुआर, एचएएल तेजस तथा एचएएल तेजस मार्क 2 के साथ जोड़ने की भी योजना है। दुश्मन के रडार तथा उसकी वायु सुरक्षा प्रणाली की धज्जियां उड़ाने में सक्षम रुद्रम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसे अपना निशाना खोजने में महारत हासिल है। यह दुश्मनों के रडार को निशाना बनाकर उसे ध्वस्त कर देती है, जिसके चलते दुश्मनों के लिए इस मिसाइल का पता लगा पाना असंभव हो जाता है। टारगेट को ढूंढ़कर निशाना बनाने में सक्षम ‘रुद्रम’ में एक रडार डोम है, जिसकी मदद से जमीन पर मौजूद दुश्मन के रडार को ध्वस्त किया जा सकता है। रेडियो सिग्नल तथा रडार के साथ एयरक्राफ्ट में लगे रेडियो भी इसके निशाने पर रहेंगे। यही कारण है कि अनेक विशेषताओं से लैस इस मिसाइल को ‘युद्ध के मैदान का अजेय योद्धा’ माना जा रहा है। भारत में निर्मित पहली एंटी रेडिएशन मिसाइल ‘रुद्रम’ की गति मैक-2 से मैक-3 तक जा सकती है अर्थात् यह मिसाइल ध्वनि की गति से भी दो से तीन गुना तेज गति से अपने लक्ष्य की ओर बढ़कर उसे भेद सकती है। यह किसी भी प्रकार के सिग्नल तथा रेडिएशन को पकड़कर रडार को नष्ट करने में सक्षम है। डी-जी बैंड के बीच ऑपरेट करने वाली इस नई एंटी रेडिएशन मिसाइल की बड़ी विशेषता यह है कि यह 100 किलोमीटर की दूरी से ही यह पता लगा सकती है कि रेडियो फ्रीक्वेंसी कहां से आ रही है। अब यह भी जान लेते हें कि एंटी रेडिएशन मिसाइलें आखिर होती क्या हैं? ये ऐसी मिसाइलें होती हैं, जिन्हें दुश्मनों के कम्युनिकेशन सिस्टम को ध्वस्त करने के उद्देश्य से ही बनाया जाता है। इन मिसाइलों में सेंसर्स लगे होते हैं, जिनके जरिये रेडिएशन का स्रोत ढूंढ़ने के पश्चात् उसके पास जाते ही मिसाइल फट जाती है। ये दुश्मन के रडार, जैमर्स और बातचीत के लिए इस्तेमाल होने वाले रेडियो के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती हैं। इस तरह की मिसाइलों का इस्तेमाल किसी युद्ध के शुरुआती चरण में होता है। इसके अलावा ये मिसाइलें अचानक आने वाली जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के खिलाफ भी छोड़ी जा सकती है। रुद्रम की लम्बाई करीब साढ़े पांच मीटर और वजन 140 किलोग्राम है और इसमें सॉलिट रॉकेट मोटर लगी है। यह 100 से 250 किलोमीटर की रेंज में किसी भी टारगेट को उड़ा सकती है। यह विमानों में तैनात की जाने वाली पहली ऐसी स्वदेशी मिसाइल है, जिसे किसी भी ऊंचाई से दागा जा सकता है। इस मिसाइल को 500 मीटर की ऊंचाई से लेकर 15 किलोमीटर तक की ऊंचाई से लांच किया जा सकता है और इसकी बेहद तेज रफ्तार इसे युद्ध के मैदान में एक अजेय योद्धा बनाती है। यह 250 किलोमीटर तक की रेंज में हर ऐसी वस्तु को निशाना बना सकती है, जिससे रेडिएशन निकल रहा हो। इसमें अंतिम हमले के लिए आइएनएस-जीपीएस नेविगेशन के साथ प्राइमरी गाइडेंस सिस्टम के तौर पर अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर लक्ष्यों की पहचान और उन्हें वर्गीकृत कर निशाना साधने के लिए उपयोग किए जाने वाले पैसिव होमिंग हेड (पीएचएच) भी मौजूद हैं। ब्रॉडबैंड क्षमता से लैस पीएचएच से मिसाइलों को एमिटर्स में से अपना टारगेट चुनने की विशेषता मिलती है। रुद्रम का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना द्वारा दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के अलावा उन रडार स्टेशनों को उड़ाने में भी किया जा सकता है, जो डिटेक्शन से बचने के लिए अपने आपको शटडाउन कर लेते हैं। निष्क्रिय होमिंग हेड से लैस रूद्रम रेडिएशन के कई प्रकार के स्रोतों को ट्रैक करने के बाद उन्हें लॉक देती है। ऐसे में मिसाइल के लांच होने के बाद अगर दुश्मन अपने रडार को बंद भी कर देता है, तब भी दुश्मन का रडार रुद्रम के निशाने पर रहेगा। रुद्रम को लांच करने के बाद भी इसे टारगेट के लिए लॉक किया जा सकता है। रुद्रम को रक्षा शक्ति की दिशा में एक बड़ा कदम इसीलिए माना जा रहा है क्योंकि दुनिया के कई प्रमुख देश अब ऐसे हथियार विकसित करने में जुटे हैं, जिनके जरिये किसी युद्ध के शुरूआती दौर में ही दुश्मन के सिग्नल और रडार को नष्ट किया जा सके और रुद्रम भी इसी पैमाने पर खरी उतरती है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि रुद्रम के जरिये भारतीय वायुसेना के पास इतनी क्षमता आ गई है कि वह दुश्मन के इलाके में सीमा के भीतर घुसकर उसकी हवाई शक्ति को तहस-नहस कर सकती है, साथ ही इस मिसाइल की मदद से भारतीय वायुसेना को बिना किसी रुकावट के अपना मिशन पूरा करने में भी मदद मिलेगी। भारत के लिए इस समय रुद्रम जैसी एंटी रेडिएशन मिसाइलों की इसलिए सख्त जरूरत है क्योंकि पड़ोसी दुश्मन देश अपनी-अपनी सीमाओं पर रडार तथा निगरानी तंत्र को मजबूत करते हुए भारत के लिए लगातार चुनौतियां बढ़ा रहे हैं। ऐसे में रुद्रम जैसी उच्च तकनीक की एंटी रेडिएशन मिसाइलें विकसित करना समय की मांग है और देश के लिए गर्व करने की बात यही है कि हम अब अपने वैज्ञानिकों की प्रतिभा की बदौलत दुश्मन देश के वायु रक्षा ढांचे को तहस-नहस करने में सक्षम होने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 October 2020


bhopal, Protection of saints and saints

सियाराम पांडेय 'शांत' साधु-संतों की हत्या पर पक्ष-विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। साधु-संतों पर होने वाले जानलेवा हमलों से संत-समाज भी नाराज है। हमले एक ही राज्य में हो रहे हों, ऐसा भी नहीं है लेकिन लोग अपने-अपने चश्मे से इसे देख रहे हैं। हाथरस की घटना पर वहां जाने की विपक्ष में होड़ लगी थी। लेकिन राजस्थान जाने में किसी विपक्षी दलों की कोई रुचि नहीं थी जहां दो बहनों ओर एक महिला के साथ के साथ बलात्कार की घटना की वीभत्स घटना हुई। वहीं एक पुजारी की बर्बरता से जलाकर हत्या कर दी गई लेकिन वहां भाजपा को छोड़कर शायद ही कोई विपक्षी दल मुखर हुआ है। यह विरोध की लामबंदी है या लामबंदों का विरोध। बलात्कार और हत्या जैसे मामले में इस देश का नेतृवर्ग जबतक अपना चुनावी लाभ तलाशेगा, इस तरह की घटनाओं को रोक पाना बेहद मुश्किल होगा। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इटियाथोक इलाके के तिर्रे मनोरमा के श्रीराम जानकी मंदिर के पुजारी सम्राट दास पर जानलेवा हमले को लेकर राजनीतिक पारा चढ़ गया है। विपक्ष ने योगी सरकार पर सीधे तौर पर निशाना साधा है। कांग्रेस ने जहां भूमाफियाओं के साथ सरकार की मिलीभगत को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया है। वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि यूपी में लगातार साधु- संतों और पुजारियों पर हमले हो रहे हैं। पुजारियों पर हमले हो रहे हैं लेकिन सरकार चुप है। कांग्रेस ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि विगत दो साल में यूपी में साधु-संतों पर 20 हमले हुए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि कुछ हत्याओं को पुलिस आत्महत्या बताकर कन्नी काट लेती है। साधु-संतों और पुजारियों के हमलों पर राजनीति करने वाले सपा और कांग्रेस को 1990 में सपा राज में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई गोलाबारी तो याद ही होगी। इसमें कारसेवकों के साथ कितने साधु-संत हताहत हुए होंगे, इसका कुछ अंदाज तो उसे होगा ही। 1966 के गौरक्षा आंदोलन में इंदिरा गांधी द्वारा गौरक्षकों पर गोली चलवाने की घटना की स्मृति तो होगी ही। उन्हें यह बताने में शायद परेशानी होगी कि इस गोलीकांड में कितने गौरक्षक और साधु-संत हताहत हुए होंगे लेकिन भारत का आम जनमानस जानता है कि यह संख्या हजारों में थी। साधु-संतों के प्रति कांग्रेस की अहिष्णुता देखनी हो तो नसबंदी के दौर को उसे जरूर याद करना चाहिए जब सरकार को नसबंदी का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए साधु-संतों और फकीरों तक की नसबंदी कर दी गई थी। विपक्ष को वर्ष 2000 में त्रिपुरा में स्वामी शांतिकाली जी महाराज की हत्या का भी संज्ञान लेना चाहिए जो एक ईसाई उग्रवादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने की थी। पालघर में दो और नांदेड़ में एक साधु की हत्या के बाद साधु-संतों की नाराजगी से यह देश अपरिचित नहीं है। राजस्थान के करौली में बहुत दिन नहीं हुए जब एक पुजारी की पेट्रोल छिड़ककर हत्या कर दी गई। मायावती ठीक कह रही हैं कि जंगलराज तो कांग्रेस शासित राज्यों में भी है लेकिन उसके नेताओं को अपने राज्यों में हो रहे अपराध शायद दिखते नहीं। इसे कहते हैं सुविधा का संतुलन जिसमें चित-पट दोनों ही अपना दिखता है। 23 अगस्त 2008 में उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या की गई थी। उस दौरान इसके पीछे ईसाई मिशनरियों और माओवादियों का कनेक्शन सामने आया था। बुलंदशहर और बागपत में संतों की हत्याएं हृदयविदारक हैं, इस सिलसिले को अविलंब खत्म होना चाहिए। अगस्त 2018 में मध्य प्रदेश में 10 दिनों में 6 साधु, 1 पुजारी और 3 सेवादारों की हत्या कर दी गई थी। 13 अगस्त, 2018 को अलीगढ़ के एक मंदिर में 75 वर्षीय साधु व उनके साथी की हत्या कर दी गई थी। 16 अगस्त को ओरैया के मंदिर में तीन साधुओं की हत्या कर दी गई थी। 19 अगस्त को हरियाणा के करनाल स्थित एक मंदिर में मंदिर में 1 पुजारी, 1 साधु व 2 सेवादारों की हत्या और हत्या की गई थी। 20 अगस्त, 2018 को प्रयाग में एक साधु की हत्या की गई थी। सवाल यह है कि साधु-संत अराजक तत्वों और बदमाशों के टारगेट पर क्यों हैं। राजस्थान के करौली में एक पुजारी की निर्मम हत्या के बाद पूरे देश में बहस छिड़ गई है कि क्या हिंदुस्तान में साधु-संत सुरक्षित नहीं हैं? तमिलनाडु के प्रसिद्ध पंडित मुसनीश्वर मंदिर के एक पुजारी की अज्ञात हमलावरों ने मंदिर परिसर में घुसकर डंडों और अन्य हथियारों से पीट-पीटकर बेहद क्रूरता से हत्या कर दी। पुलिस ने बताया है कि मृतक पुजारी जी. मुथुराजा था जो अंधराकोट्टम हैमलेट का रहने वाला था। अच्छा होता कि उत्तर प्रदेश समेत सभी राज्यों की सरकारें इस बावत मंथन करतीं और साधु-संतों, पुजारियों, सेवादारों आदि की सुरक्षा के समुचित प्रयास करती। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को इतना तो समझना ही होगा कि साधु सपना देखकर गड़ा धन निकालने की राय ही नहीं देते वे समाज को सही राह भी दिखाते हैं। उन्हें संयमित जीवन जीने की शिक्षा भी देते हैं। साधु-संत इस देश की संस्कृति को बचाने में भी सहायक हैं। काश, राजनीतिक दल सतही विरोध की राजनीति की बजाय साधु-संतों, पुजारियों और सेवादारों की सुरक्षा की कोई व्यापक रणनीति बनाते। गोंडा में पुजारी सम्राटदास पर हमले के पीछे 120 बीघे जमीन का विवाद है। भूमाफिया उसपर कब्जा चाहता है। इस वजह से इस मंदिर में पहले भी भूमाफिया के हमले हुए हैं। यहां पुलिस सुरक्षा भी दी गई थी। अब पुलिस की जगह यहां होमगार्ड सुरक्षा कर रहे हैं। हमले के मूल में कहीं सेक्योरिटी हासिल करने की रणनीति तो नहीं है। विचार तो इस बिंदु पर भी किया जाना चाहिए। एक ओर तो अपराधियों के मानमर्दन की बात हो रही है, दूसरी ओर अपराधियों की बढ़ती सक्रियता बेहद चिंताजनक है। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 12 October 2020


bhopal, Cash suddenly increased in Pakistan!

डॉ. प्रभात ओझा ई-कॉमर्स और डिजिटल लेन-देन के बढ़ते चलन के बीच पाकिस्तान में नोटों की छपाई का बेतहाशा बढ़ना वहां के आर्थिक जगत में चिंता का कारण है। पूरी दुनिया को पता है कि नोट छापने के तय मानकों के उल्लंघन का क्या मतलब होता है। मानकों के पालन के साथ भी नोट औसत से अधिक छपें तो कम से कम देश में मुद्रा स्फीति और इसके कारण महंगाई में तेजी से वृद्धि होती ही है। पाकिस्तान सरकार और वहां की सरकारी एजेंसियां भले नोटों की छपाई के मामले में चुप हों, पर कुछ सरकारी संस्थाओं के आंकड़े इस असंतुलन की पुष्टि कर रहे हैं। और तो और विदेशी संवाद एजेंसियां, विशेषकर बीबीसी ने इस ओर दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है। पाकिस्तान में नोट छापने और प्राइज बांड के लिए पेपर बनाने वाली 'सिक्योरिटी पेपर्स लिमिटेड' के वित्तीय नतीजे इस बात पर मुहर लगाते हैं कि वहां नोटों की छपाई अचानक बढ़ी है। पाकिस्तान में वित्तीय वर्ष 01 जुलाई से प्रारम्भ होता है। इस साल 30 जून को समाप्त वित्तीय वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक वहां पिछले आठ वर्षों में नोटों के चलन में इस वित्तीय वर्ष में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है। अकेले इस एक वर्ष करेंसी नोटों की संख्या में 1.1 ट्रिलियन तक बढ़ी। पाकिस्तान का आर्थिक जगत मानता है कि नोटों की संख्या बढ़ने का मतलब पुराने नोटों को नए नोटों में बदलना हो सकता है। मुमकिन है कि इसके अलावा बड़ी संख्या में नये नोट भी छापे गए हैं। फिर भी बाजार की जरूरतों के हिसाब से संतुलन के लिए कुछ अधिक नोट तो छापे जा सकते हैं। इसमें असामान्य बढ़ोतरी का मतलब बहुत अधिक नोट छापना ही है। पाकिस्तान में ऐसा ही हुआ है। पाकिस्तान में एकेडी सिक्योरिटीज के हेड ऑफ रिसर्च फरीद आलम भी मानते हैं कि पिछले आठ साल में पिछले वर्ष की मुद्रा छापने का औसत सबसे अधिक है। पिछली सरकार के मुकाबले यह भी देखने में आया है कि नई सरकार ने पहले के मुकाबले दोगुना अधिक नोट छापे हैं। बहरहाल, देखने वाली बात यह है कि पाकिस्तान में नोट छापने का असंतुलन ऐसे समय देखा जा रहा है, जब वहां की सरकार आईएमएफ की शर्तों के मुताबिक, स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान से उधार नहीं ले पा रही है। शर्तें बाध्य करती हैं कि पाकिस्तान सरकार अपना बजट घाटा पूरा करने के लिए कमर्शियल बैंकों से ओपन मार्केट ऑपरेशन के जरिए धन हासिल करे। करेंसी नोटों के मामले में पाकिस्तान में यह व्यवस्था है कि सरकार अपने केंद्रीय बैंक (स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान) से कर्ज लेती है, तब यह केंद्रीय बैंक नई करेंसी छापता है। अब प्रश्न यह है कि आईएमएफ की शर्तों के कारण सरकार केंद्रीय बैंक से ऋण नहीं ले रही है तो चल कैसे रहा है। जवाब में कह सकते हैं कि पाकिस्तान में सबकुछ मुमकिन है। वहां कुछ भी पारदर्शी नहीं हुआ करता है। वहां के अर्थशास्त्री डॉ. कैसर बंगाली याद दिलाते हैं कि बजट के समय उन्होंने स्टेट बैंक से कर्ज लेना बंद होने के हालात में भी करेंसी नोट बढ़ने पर चिंता जताई थी। तब सरकार ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया था। पाकिस्तान वैसे भी पिछले 5-6 साल से मुद्रा स्फिति से जूझ रहा है। करीब 5 साल पहले जब सरकार ने बैंकों से लेनदेन पर चार्जेज बढ़ा दिए तो लोगों ने अधिक नकदी घर में ही रखना शुरू कर दिया। अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से नए समझौते के मुताबिक केंद्रीय बैंक से सरकार ऋण नहीं ले रही है। फिर आम लोगों के बैंकिंग कार्य पर भी कई तरह के टैक्स बढ़ाए गए हैं। ऐसा सरकारी राजस्व में वृद्धि के लिए किया गया, पर लोगों ने घर में ही नकदी और बढ़ा ली है। सरकार की मुसीबत यह है कि कोरोना काल में कई जरूरी खर्च करने ही हैं। ऐसे में भी करेंसी छपाई में बढ़ोतरी हुई होगी। जो भी हो, अधिक करेंसी का परिणाम यह है कि बाजार में भी नकदी अधिक आई। लोग बैंक में जमा नहीं कर नकदी रख रहे हैं तो जरूरत के मुताबिक खर्च भी कर रहे होंगे। अधिक खर्च से महंगाई की आशंका रहती है। आर्थिकी का सामान्य नियम है कि कम उत्पादन के बदले बाजार में अधिक नकदी महंगाई बढ़ने का कारण बनती है। फिर अधिक नकदी से कालाबाजारी को भी बढ़ावा मिलता है। प्रचलन में बहुत अधिक नकदी हो तो काला धन जमा करने वाले गोरखधंधे में लग जाते हैं। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार की पत्रिका `यथावत' के समन्वय सम्पादक हैं।)

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Dakhal News 12 October 2020


bhopal, The truth between competition and coaching

ऋतुपर्ण दवे काश, दौलत से सपने भी खरीद पाते लेकिन यह न सच है और न कभी होगा। फिर भी हर आम और खास अंधी दौड़ में शामिल होकर दौलत के बलबूते अपनी संतानों को सपनों के उस तिलिस्म तक पहुँचाना चाहता है जो पूरी तरह उसकी प्रतिभा और क्षमता पर निर्भर होती है। अभिभावकों को जो तैयारी बचपन से करनी चाहिए वो संतान के वयःसंधि में पहुँचने पर एकाएक करने लगते हैं। उसे लगता है कि दौलत ही वह सहारा है जो उसकी संतान को सुखद भविष्य दे सकता है। बस यही सपना नौनिहालों की ब्रॉन्डिंग के लिए दो-ढाई दशक से कथित ठेकेदार बने आलीशान कोचिंग संस्थान और उनके शानदार शो रूम की फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती रिसेप्शनिस्ट और एयरकंडीशन्ड कमरे में बैठा संचालक भी दिखाते हैं। लोग खुद-ब-खुद ऐसे सब्जबाग की गिरफ्त में आ जाते हैं। कोचिंग ले रहे नौनिहालों का कड़वा सच भी जानना जरूरी है। सूचना के अधिकार से प्राप्त एक जानकारी बेहद गंभीर और चिन्ताजनक है। 2011 से 2019 तक यानी महज 8 सालों में अकेले राजस्थान के कोटा शहर के विभिन्न कोचिंग संस्थानों के 104 छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें 31 लड़कियाँ हैं। जान देने वाले मेडिकल और इंजीनियरिंग के कड़े कॉम्पटीशन की तैयारियों में जुटे थे, जिसमें लाखों लोगों का रेला होता है। नीमच के चन्द्रशेखर गौड़ को कोटा पुलिस ने जानकारी देकर बताया है कि 2011 में 6, 2012 में 9, 2013 में 13, 2014 में 8, 2015 में 17, 2016 में 16, 2017 में 7, 2018 में 20 और 2019 में 8 ने आत्महत्या की। मरने वालों की उम्र 15- 30 साल के बीच थी। ये राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, झारखण्ड, केरल, गुजरात, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु यानी देश के हर क्षेत्र से थे। आरटीआई के जवाब में मौत के कारणों का कोई जवाब नहीं दिया गया। जाहिर है इसके पीछे मृतकों पर मानसिक दबाव बड़ी वजह रही होगी। अकूत धन खर्च के बाद भी अभिभावकों की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाना वजह हो सकती है। अवसाद और कुण्ठा ने दूर बैठे बच्चे को उस स्थिति में पहुँचा दिया होगा जहाँ उसकी मनःस्थिति को पढ़ने और समझने वाला कोई नहीं था। सैकड़ों मील दूर बैठे माता-पिता को काश पता हो पाता कि कोचिंग कर रही संतान उसके कितने अनुकूल है या प्रतिकूल है। कॉम्पीटीशन की होड़ में क्या केवल प्रतिस्पर्धी शिक्षा के साथ मानसिक परिपक्वता और जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर बच्चों को असल देखभाल की अभी ही जरूरत है, इसे भी समझना होगा। बस यही कमी या दूरी घर से दूर एक अनजान जगह छोटे से कमरे में कैदी सदृश्य जीवन जी रहे उन्मुक्त हवा में जीने के आदी बच्चों के मस्तिष्क पर क्या असर डालती है, माँ-बाप या अभिभावक को पता नहीं होता। दुर्भाग्यवश हादसा होने के बाद सिवाय पश्चाताप के कुछ बचता नहीं है। देश में न जाने कितनों के साथ ऐसा हुआ, इसका सही डेटा नहीं है। किसी की खून-पसीने की कमाई, तो किसी का कर्ज में लिया गया पैसा तो मिट्टी में मिला ही लेकिन उसके जिगर का टुकड़ा भी छिनने का दर्द ताउम्र भारी पड़ गया। हाल के वर्षों की ऐसी अनेकों घटनाओं ने यही सवाल पैदा किया है। थोड़ा पीछे मुड़ना होगा। 15 से 20 साल पहले कोचिंग का मतलब व्यक्तिगत रूप से किसी विद्यार्थी की मदद थी। अब यह सेक्टर संगठित इण्डस्ट्री का रूप ले चुका है। अनुमानतः अभी यह नया सेक्टर कम से कम 100 से 200 अरब डॉलर के बीच कारोबार करता है। उससे भी बड़ा सच कि इसमें सबसे ज्यादा योगदान उसी मध्यम वर्ग का है जो पहले ही अपनी आय बढ़ाने को लेकर बहुत जूझता रहता है। एसोचेम के एक सर्वे के अनुसार मेट्रोपोलिटन शहरों में प्राइमरी स्कूल तक के 87 प्रतिशत और हाईस्कूल के 95 प्रतिशत बच्चे स्कूल के अलावा कोचिंग का सहारा लेते हैं। वह भी तब, जब इस स्तर पर नौकरी के लिए कॉम्पटीशन जैसी कोई बात ही नहीं। क्या यह प्रवृत्ति उन सरकारी और प्राइवेट स्कूलों पर तमाचा नहीं जहाँ बच्चों के बुनियाद की ठेकेदारी भी कोचिंग पर हो? सच यह है कि कोचिंग कोई रेडीमेड साँचे या इंस्टैन्ट घूंटी नहीं, जहाँ पहुँचते ही कोई ढल जाए। अभिभावकों को भी ऐन वक्त पर यह सूझता है। काश इसी सच को समझ, पहले ही प्रतिस्पर्धा में भेजे जाने वाली संतान की योग्यता और दक्षता को अपने स्तर पर परख कर तराशने में जुट गए होते तब यही कोचिंग वाकई उन्हें वांछित सांचे में ढालने को अनुकूल होतीं। अच्छी शिक्षा जरूरी है, उसके लिए संसाधन भी अच्छे होने चाहिए लेकिन शिक्षादान का मकसद पवित्र होना चाहिए, बस यही नहीं है। देशभर में कोचिंग संस्थानों के फैले मकड़जाल में 90 से 95 प्रतिशत अभिभावक अभिमन्यु की भाँति चक्रव्यूह में उलझ तो जाते हैं लेकिन निकलने तक जो हश्र होता है वह सिवाय उनके कोई और जानता भी नहीं है। ग्लानिवश अपने मर्म और दर्द को किसी से कह भी नहीं पाता। इसे समझना होगा, भ्रम को तोड़ना होगा कि कोचिंग ही कॉम्पटीशन के साँचे में ढालने का जरिया नहीं बल्कि कोचिंग में ढालने के लिए घर से ही तैयारी हो। इस सच को भी समझना ही होगा। आम आदमी का ऊंचा लक्ष्य और बड़ा सपना अच्छी बात है लेकिन उसे केवल पैसों से कोचिंग के दम पर पूरा करने का भ्रम बहुत बड़ा धोखा है। पुराने जमाने में न कोचिंग थे न पढ़ाई के लिए आज जैसे साधन। तब भी लोग बड़े-बड़े कॉम्पटीशन में सफल होते थे। लालटेन, दिया, ढिबरी, लैम्प पोस्ट के नीचे पढ़कर देश में ऊँचे पदों तक पहुँचे ढेरों लोगों के जीवन्त उदाहरण हैं। माना कि तब प्रतिस्पर्धा ऐसी नहीं थी लेकिन तब भी तो सफल होने की आज जैसी ही चुनौती थी। जो जितनी भी मदद या कोचिंग मिलती थी वह इलाके तक ही सीमित थी। स्थानीय गुरूजन, ऊंची कक्षाओं के विद्यार्थी, पास-पड़ोस के बड़े अधिकारी जिनकी टिप ही काफी होती थी।  आज देश का सबसे बड़ा कॉम्पीटीशन सिविल सर्विस है। इसके कई-कई कोचिंग संस्थानों में सेलेक्टेड एक ही प्रतिभागी की तस्वीर दिख जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि माजरा क्या है। सिविल सेवा के एक सफल उम्मीदवार की बातें समझनी होगी जो कहता है कि ऐसी बहुत-सी कोचिंग्स को जानता हूँ जिनका नाम है, बहुत भीड़ है पर पढ़ाई कुछ भी नहीं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं कि परीक्षा में आकलन किन चीजों का होता है। इनका मकसद बस पैसे कमाना और बेवकूफ बनाना है। जाहिर है कोचिंग को लेकर सच कम भ्रम ज्यादा है लेकिन बड़ी सच्चाई भी जाननी चाहिए कि सेल्फ स्टडी से जो आत्मविश्वास बनता है, उसमें खुद सवालों से जूझना और उत्तर तलाशने की सीख मिलती है। यह सफलता का रास्ता बनाने में सहायक है। कॉम्पटीशन के रास्ते की तकलीफों से निपटने खातिर तमाम वैकल्पिक व सर्वसुलभ साधन भी हैं। बेहद गुणवत्ता पूर्ण सामग्री, तौर-तरीकों को सिखाने वाली तमाम ऑनलाइन सुविधाएँ भी हैं जो काफी सस्ती हैं। समय और धन दोनों की बचत के साथ घर बैठे कोचिंग हासिल करने के तरीकों से ईमानदार तैयारियों का भी रास्ता बनता है। बस जरूरत है बिना भटके इसपर बढ़ते जाने की। यह जितना अभिभावक को समझना है उतना ही कॉम्पीटीटर को भी समझना होगा। निश्चित रूप से आने वाले समय में पूरी तरह से सेल्फ स्टडी का वो दौर भी आएगा जिसमें कॉम्पीटीशन के लिए प्रतिभागी खुद ही अपना रास्ता बनाकर सफलता का परचम गाड़ते नजर आएंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 October 2020


bhopal, Increasing number of psychiatrists

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष डॉ. रमेश ठाकुर हिन्दुस्तान में मनोरोगियों की बढ़ोतरी का सालाना आंकड़ा भयभीत करता है। इसमें प्रत्येक वर्ष एकाध प्रतिशत का इज़ाफा हो रहा है। मनोरोग की रोकथाम का जो मौजूदा सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर है वह नाकाफी है। जहां लाखों मनोचिकित्सकों की जरूरत है, वहां कुछ हजार चिकित्सक हैं। देश के चुनिंदा अस्पतालों को छोड़ दें तो बाकी अस्पतालों में चिकित्सकों की तैनाती नहीं है। वहीं, गांव-देहात के अस्पतालों में तो मनोचिकित्सकों की मौजूदगी बिल्कुल नदारद है। जबकि, डब्लूएचओ का आंकड़ा ये कहता है कि अगले दो दशकों के भीतर भारत में मेंटल समस्या अव्वल स्थान पर होगी। उस हिसाब से तो हमारा मेंटल इंफ्रास्ट्रक्चर कहीं नहीं टिकता। इसलिए समय रहते हमें अपने मेंटल इंफ्रास्ट्रक्चर में विस्तार करना होगा। भागदौड़ भरी लाइफ में मानसिक सेहत को संभाले रखना हम सबके लिए बड़ी चुनौती है। इस क्षेत्र में अन्य मुल्कों के मुकाबले हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर काफी पिछड़ा हुआ है। समय रहते उसे सुदृढ़ करने की जरूरत है। मनोरोगियों की संख्या न सिर्फ भारत में बढ़ रही है, बल्कि समूचे संसार में तेजी से बढ़ रही है। बीते आठ-दस माह से समूचा संसार वैश्विक महामारी कोविड-19 से जूझ रहा है जिसने इंसान की मानसिक सेहत को बिगाड़ दिया है। कुल मिलाकर मेंटल इश्यू हम सबके माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है। डब्ल्यूएचओ की मानें तो कोरोना संकट में मनोरोगियों की संख्या में अप्रत्याशित इज़ाफा हुआ है। कोरोना काल में लोगों के काम-धंधे, रोज़गार के साधन व जीवन-यापन जैसी ज़रूरतों पर प्रत्यक्ष रूप से संकट आ जाने के चलते मानसिक सेहत खराब हुई है। अक्टूबर की दस तारीख यानी आज के दिन को पूरा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के संबंध में जन मानस को जागरूक करना और मानसिक बीमारियों से बचने के प्रयासों को बताना होता है। ये दिवस इस बात पर भी जोर देता है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए और क्या किए जाने की हमें जरूरत है। अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि विश्व का दसवाँ व्यक्ति कोरोना संकट में किसी न किसी रूप से मानसिक बीमारी से ग्रस्त हुआ है जिसमें मनोरोग मुख्य है। मौजूदा वक्त ऐसा है जिसमें इंसानी जीवन चौतरफा घिर गया है। एक नहीं, बल्कि एक साथ कई समस्याओं में उलझ कर खुद से सामना कर रहा है। मानसिक बीमारी लोगों को आत्महत्या करने को प्रेरित करने लगी है। पूर्व केसों के मुकाबले लाॅकडाउन में पूरे विश्व में सर्वाधिक सुसाइट के केस रजिस्टर्ड हुए। आत्महत्या सिर्फ आम इंसान नहीं कर रहे, खास लोगों की संख्या भी बढ़ी हुई है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का मामला चर्चाओं में है ही। हाल ही में सीबीआई के एक पूर्व निदेशक द्वारा की गई आत्महत्या ने समाज के भीतर नई बहस छेड़ दी है। एक संपन्न व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य इस कदर बिगड़ रहा है जिससे वह मौत को गले लगाने लगा है। मानसिक बीमार के लिए ख़ुदकुशी एक त्रासदी है। सभ्य समाज उसे बहादुरी नहीं कायरता की श्रेणी में रखता है, रखना भी चाहिए। गौरतलब है, खराब सेहत वाले इंसान के लिए सुसाइट एक ऐसा विषय है जिसे वह अपनी सहमति से चुनता है। इस सब्जेक्ट पर सदियों से रिसर्च होती रही है। आत्महत्या को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन हमेशा से हमें मानसिक सेहत को चंगा रखने को कहता आया है। बेवजह की टेंशन नहीं लेनी चाहिए, मन में उत्पन्न होने वाले विकारों को अपने परिचितों से शेयर करना चाहिए। जिंदगी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, उसमें अपना और अपने चाहने वालों का हस्तक्षेप होते रहना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि अपना जब कोई अवसाद से घिर जाए तो उसे अकेला और एकांत नहीं छोड़ना चाहिए, उस वक्त उसे हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। हालांकि अवसाद की अवस्था में वह हमसे दूरी बनाएगा, लेकिन हमें दूरी नहीं बनानी चाहिए। अवसाद में इंसान के भीतर कुछ ऐसे विचार मन में उत्पन्न होने लगते हैं जब वह खुद से स्नेह करना छोड़ देता है। हर तरह की मोहमाया उसे बेमानी लगने लगती है। जीवन और दुनिया को व्यर्थ समझने लगता है। ऐसी स्थिति में इंसान आत्महत्या की ओर बढ़ जाता है। विश्व के मुकाबले हिंदुस्तान में मनोरोगियों की स्थिति बहुत खराब है। संसार की कुल पंद्रह फीसदी मनोरोगियों की आबादी भारत में है। ये संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार से लेकर हेल्थ सिस्टम भी परेशान है। सन् 2017 में केंद्र सरकार को संसद में मानसिक स्वास्थ्य बिल भी लाना पड़ा। बाक़ायदा सभी सदस्यों की हामी से पारित भी किया गया। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तेजी से बढ़ती मानसिक बीमारी पर काबू करने के लिए विशेष एक्ट की भी जरूरत आन पड़ी। मनोरोग की कई विधाएं होती हैं। एंग्जायटी साइकोसिस भी इन दिनों एक बड़ी समस्या बन रही है। इसके चुंगल में प्रतिष्ठित और साधन संपन्न लोग भी आ रहे हैं। गंभीर मंथन करने वाली बात है, जब ऐसे व्यक्ति ख़ुदकुशी तय कर ले तो कुछ भी कहते नहीं बनता। नगालैंड के राज्यपाल रहे, सीबीआई प्रमुख की भूमिका निभाने वाले हिमाचल प्रदेश के पूर्व डीजीपी अश्वनी कुमार की ख़ुदकुशी हमें विचलित ही नहीं करती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। वह ऐशोआराम जैसे जीवन से तंग थे। उनके जीवन में भी उदासीनता थी, मनोरोगी थे। इस शून्यता को कोई भला कैसे रेखांकित करे। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विश्व के सभी देशों की सरकारों को इस क्षेत्र में मुकम्मल सिस्टम स्थापित करने के अलावा मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल यानी मनोचिकित्सकए क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट और मनोवैज्ञानिक कार्यकर्ता को बढ़ावा देने के लिए जागरूक करना होगा। क्योंकि इन ज़रूरतों का बहुत बड़ा गैप है। ये सेवाएं हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। अस्पतालों में मनोचिकित्सा विभागों की कमी है। मनोरोग पर काबू करने के लिए स्वास्थ्य सिस्टम को अमूलचूक परिवर्तन लाना होगा। अलग से विशेष मेडिकल दस्ते की स्थापना करनी होगी। मेंटल केसों को हैंडल करने में अभी जो चिकित्सक लगाए जाते हैं उन्हें मानसिक बीमारियों के संबंध में उपयुक्त जानकारियाँ नहीं होती। हिंदुस्तान में पचास हजार से अधिक मनोचिकित्सकों की मांग है। इस वक्त मात्र चार हजार के आसपास मनोचिकित्स हैं। जबकि, भारत में आबादी के 9 फीसदी लोग दिमागी मरीज हैं और विश्व के कुल मनोरोगियों की संख्या पंद्रह प्रतिशत भारत में है। ऐसे में सख्त जरूरत है मेंटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करने की। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, Question from the heirs of Loknayak

जेपी जन्मदिवस 11 अक्टूबर पर विशेष   डॉ. अजय खेमरिया   आजादी के स्वर्णिम आंदोलन के बाद जिस महान नेता को देश ने लोकनायक के रूप में स्वीकार किया उस जयप्रकाश नारायण यानी जेपी के बिना आजाद भारत का कोई भी राजनीतिक विमर्श पूर्ण नहीं होता है। समकालीन राजनीति में नेतृत्व करने वाली पूरी पीढ़ी वस्तुतः जेपी की छतरी से निकलकर ही स्थापित हुई है ,जो आज पक्ष-विपक्ष की भूमिकाओं में है। जेपी के महान व्यक्तित्व को लोग कैसे स्मरण में रखना चाहेंगे यह निर्धारित करने की जवाबदेही असल में उनके राजनीतिक शिष्यों की ही थी। जेपी का मूल्यांकन उनके वारिसों के उत्तरावर्ती योगदान के साथ की जाए तो जेपी की वैचारिकी का हश्र घोर निराशा का अहसास ही कराता है। जिस सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्रांति के लिये जेपी ने आह्वान किया था वह आज भी भारत में कहीं नजर नहीं आती है। सत्ताई तानाशाही और सार्वजनिक जीवन के कदाचरण के विरुद्ध जेपी ने समग्र क्रांति का बिगुल फूंका था। अपनी बेटी के समान प्रिय इंदिरा गांधी के साथ उनके मतभेद असल में व्यवस्थागत थे। बुनियादी रूप से शासन में भ्रष्ट आचरण को लेकर जेपी यह मानते थे कि देश की जनता के साथ छलावा किया जा रहा है। जिस उद्देश्य से गांधी और अन्य नेताओं ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी उसे इंदिरा और कांग्रेस ने महज सत्ता तक सीमित करके रख दिया है। असल में गांधी मौजूदा कांग्रेस को सेवा संघ में बदलने की बात कर रहे थे, उसे नेहरू और इंदिरा ने परिवार की विचारशून्य पैदल सेना बना दिया। सम्पूर्ण क्रांति भारत के उसी नवनिर्माण को समर्पित एक जनांदोलन था जिसमें गांधी के सपनों को जमीन पर उतारने की बचनबद्धता भी समाई हुई थी। नवनिर्माण आंदोलन ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ा, देश ने एक वैकल्पिक सरकार भी देखी लेकिन यह एक असफल विकल्प भी था जो इस आंदोलन के अग्रणी नेताओं की नैतिक गिरावट का परिणाम भी था। जेपी की विरासत है तो बहुत लंबी पर आज निष्पक्ष होकर कहा जा सकता है कि जो वैचारिक हश्र गांधी का कांग्रेस की मौजूदा पीढ़ियों ने किया है, वही मजाक जेपी और समाजवादी आंदोलन के लोहिया, नरेंद्र देव, विनोबा, अच्युत पटवर्द्धन,अशोक मेहता, मीनू मसानी, जनेश्वर मिश्र जैसे नेताओं के साथ उनके काफिले में पीछे चलने वाले समाजवादी नेताओं ने बाद में किया। आज लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, हुकुमदेव नारायण, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, मुलायम सिंह, विजय गोयल, रेवती रमण सिह, केसी त्यागी से लेकर उतर भारत और पश्चिमी भारत के सभी राज्यों में जेपी आंदोलन के नेताओं की 60 प्लस पीढ़ी सक्रिय है। इनमें से अधिकतर केंद्र और राज्यों की सरकारों में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। सवाल यह उठाया जाना चाहिये कि जिस नवनिर्माण के लिये जेपी जैसी शख्सियत ने कांग्रेस में अपनी असरदार हैसियत छोड़कर समाजवाद और गांधीवाद का रास्ता चुना, उस जेपी के अनुयायियों ने देश के पुनर्निर्माण में क्या योग दिया है? लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह के रूप में जेपी के चेले सिर्फ इस बात की गवाही देते हैं कि राजनीतिक क्रांति तो हुई लेकिन सिर्फ मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्री पदों तक। जेपी और लोहिया का नारा लगाकर यूपी, बिहार, ओडिसा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के सीएम बने नेताओं ने भारत के भीतर उस व्यवस्था परिवर्तन के लिये क्या किया है जिसके लिये सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा और अपरिहार्यता को जेपी ने अपने त्याग और पुरुषार्थ से प्रतिपादित किया था। क्या जातियों की गिरोहबंदी, अल्पसंख्यकवाद, जातीय प्रतिक्रियावाद, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, शैक्षणिक माफ़ियावाद जैसी उपलब्धियां नहीं है जेपी के वारिसों के खातों में। सामाजिक न्याय के नाम पर लालू, मुलायम, बीजू, देवगौड़ा, अजीत सिंह ने शासन के विकृत संस्करण इस देश को नहीं दिए। माँ-बेटे (इंदिरा -संजय) के सर्वाधिकार को चुनौती देने वाली जेपी की समग्र क्रांति से सैफई, पाटिलीपुत्र, भुवनेश्वरऔर हासन के समाजवादी सामंत किस राजनीतिक न्याय की इबारत लिखते हैं? यह सवाल क्या आज पूछा नहीं जाना चाहिए। यूपी और बिहार जैसे देश के सबसे बड़े राज्यों में जेपी आंदोलन के वारिस लंबे समय तक सत्ता में रहे हैं। क्या आज इन दोनों राज्यों में शिक्षा क्रांति से कोई नया भारत गढ़ा जा चुका है? बिहार और यूपी बोर्ड की परीक्षाओं के दृश्य असल में माफ़ियावाद की क्रांति की कहानी ही कहते हैं। तेजस्वी, अखिलेश, मीसा, चिराग, नवीन, कुमारस्वामी जैसे चेहरों को ध्यान से देखिये और जेपी आंदोलन के उस नारे को याद कीजिये जो संजय और इंदिरा गाँधी को लेकर देशभर में सम्पूर्ण क्रान्ति के अलमबरदार गुनगुनाते थे। आज जेपी के पुण्य स्मरण के साथ उनकी विरासत के पुनर्मूल्यांकन की भी आवश्यकता है। हकीकत यह है कि भारत से समाजवाद का अंत इसी के उपासकों ने कर लिया है। भारत में जेपी को आज एक महान विचारक और सत्ता से सिद्धांतों के लिये जूझने वाले योद्धा की तरह याद किया जाएगा। इस त्रासदी के साथ कि उनके अनुयायियों ने उनके विचारों के साथ व्यभिचार की सीमा तक अन्याय किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा था- "क्षमा करो बापू तुम हमको/ वचनभंग के हम अपराधी/ राजघाट को किया अपावन/ भूले मंजिल यात्रा आधी।/ जयप्रकाश जी! रखो भरोसा/ टूटे सपनों को जोड़ेंगे/ चिता भस्म की चिंगारी से/ अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे।" टूटते विश्वास के इस तिमिर में आशा कीजिये अटल जी की बात सच साबित हो। भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिये जेपी की समग्र क्रांति और गांधी दोनों आज भी सामयिक आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, India not become ,American Pappu

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   अफगानिस्तान के वर्षों विदेश मंत्री रहे डाॅ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला आजकल अफगानिस्तान की राष्ट्रीय मेल-मिलाप परिषद के अध्यक्ष हैं। वे अफगानिस्तान के लगभग प्रधानमंत्री भी रहे हैं। वे ही दोहा में तालिबान के साथ बातचीत कर रहे हैं। वे भारत आकर हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से मिले हैं। क़तर की राजधानी दोहा में चल रही इस त्रिपक्षीय बातचीत- अमेरिका, काबुल सरकार और तालिबान- में इस बार भारत ने भी भाग लिया है। हमारे नेताओं और अफसरों से उनकी जो बात हुई है, उसकी जो सतही जानकारी अखबारों में छपी है, उससे आप कुछ भी अंदाज नहीं लगा सकते। यह भी पता नहीं कि इसबार अब्दुल्ला दिल्ली क्यों आए थे? अखबारों में जो कुछ छपा है, वह वही घिसी-पिटी बात छपी है, जो भारत सरकार कुछ वर्षों से दोहराती रही है याने अफगानिस्तान में जो भी हल निकले, वह अफगानों के लिए, अफगानों द्वारा और अफगानों का ही होना चाहिए?   ट्रंप ने कह दिया है कि हमारी फौजें क्रिसमस तक अफगानिस्तान से लौट आएंगी तो फिर ट्रंप यह बताएं कि काबुल में क्या होगा? क्या उन्होंने तालिबान से गुपचुप हाथ मिला लिया है? तालिबान तो आजतक अड़े हुए हैं। दोहा में बातें चल रही हैं तो चलती रहें। तालिबान बराबर हमला और हल्ला बोल रहे हैं। आए दिन दर्जनों लोग मारे जा रहे हैं। तालिबान अपने मालिक खुद हैं। उनके कई गुट हैं। उनमें से ज्यादातर गिलज़ई पठान हैं। हर पठान अपना मालिक खुद होता है। ज़रा याद करें, अब से लगभग पौने दो सौ साल पहले प्रथम अफगान-ब्रिटिश युद्ध में क्या हुआ था? 16 हजार की ब्रिटिश फौज में से हर जवान को पठानों ने कत्ल कर दिया था। सिर्फ डाॅ. ब्राइडन अपनी जान बचाकर छिपते-छिपाते काबुल से पेशावर पहुंचा था। पठानों से भिड़कर पहले रूसी पस्त हुए और अब अमेरिकियों का दम फूल रहा है। अमेरिका अपनी जान छुड़ाने के लिए कहीं भारत को वहां न फंसा दे? अमेरिका तो चाहता है कि भारत अब चीन के खिलाफ भी मोर्चा खोल दे और एशिया में अमेरिका का पप्पू बन जाए। जबतक पाकिस्तान से अमेरिका की छन रही थी, उसने भारत की तरफ झांका भी नहीं लेकिन उसके और हमारे नीति-निर्माताओं को पता होना चाहिए कि यदि भारत ने अफगानिस्तान में अमेरिका की जगह लेने की कोशिश की तो हमारा हाल वही होगा, जो 1838-42 में ब्रिटेन का हुआ था। 1981 में प्रधानमंत्री बबरक कारमल ने चाहा था कि रूसी फौजों का स्थान भारतीय फौजें ले लें। हमने विनम्रतापूर्वक उस आग्रह को टाल दिया था। अब भी हमें सावधान रहना होगा। आज भी अफगान जनता के मन में भारत का बहुत सम्मान है। भारत ने वहां अद्भुत सेवा-कार्य किया है। अमेरिकी वापसी के दौरान भारत को अपने कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे।     (लेखक, पाक-अफगान मामलों के विशेषज्ञ हैं।)

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bhopal, Peace and harmony,needed for mental health

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 10 अक्टूबर पर विशेष   गिरीश्वर मिश्र   मन चंगा तो कठौती में गंगा यानी मन प्रसन्न हो तो अपने पास जो है वही पर्याप्त है। आज की परिस्थितियों में मन चंगा नहीं हो पा रहा है। स्वास्थ्य और खुशहाली की जगह रोग-व्याधि के चलते लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। सामाजिक स्तर पर जीवन की गुणवत्ता घट रही है। हिंसा, भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, अपराध और सामाजिक भेदभाव जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। चिंता की बात है कि उन घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता भी घट रही है।   व्यक्ति और समाज दोनों के कल्याण की मात्रा में गिरावट स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकर है। इसका नकारात्मक असर उत्पादकता पर पड़ता है। इसका एक बड़ा कारण हमारी विश्व दृष्टि भी है। हम एक नए ढंग का भौतिक आत्मबोध विकसित कर रहे हैं जो सबकुछ तात्कालिक प्रत्यक्ष तक सीमित रखता है। कभी हम सभी पूरी सृष्टि को ईश्वर के करीब पाते थे और सबके बीच निकटता देखते थे। आदमी को उस 'पूर्ण' की चिंता थी जिसमें से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण बचा रहता था। आदमी सबके जीवन में अपना जीवन और अपने जीवन में सबका जीवन देखता था क्योंकि 'आत्मा' निजी नहीं सबका था और सबसे बड़ा यानी 'ब्रह्म' होने के नाते उसके आगे सारे पैमाने छोटे पड़ जाते थे। आदमी जल ,थल, वनस्पति, वायु, अग्नि और अंतरिक्ष सबकी शान्ति की कामना करता था।   मनुष्य भी एक जीव था। इस नजरिए में सारा जीवन केंद्र में था न कि सिर्फ मनुष्य। मनुष्य की मनुष्यता उसके अपने आत्मबोध के विस्तार में थी और वह सबकी चिंता करता था। उसका धर्म अभ्युदय (अर्थात भौतिक समृद्धि) और नि:श्रेयस ( आध्यात्मिक श्रेष्ठता या मोक्ष ) दोनों को पाने की चेष्टा करता था। आदमी सिर्फ धन दौलत ही नहीं बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए सचेष्ट रहता था। आधुनिक चेतना ने धर्ममुक्त समाज की कल्पना की और मनुष्य की तर्क बुद्धि की सीमा जानते हुए भी उसे विराट चैतन्य भाव से मुक्त कर दिया। भौतिक सुख के साधन जुटाने में सबको लगा दिया, जिसके नशे में सभी दौड़ रहे हैं पर दौड़ पूरी नहीं हो रही है। इस मिथ्या मरीचिका के असह्य होने पर लोग आत्मह्त्या तक करने को उद्यत होने लगे हैं।   जीवन का गणित अब विज्ञान के ईश्वरविहीन होते दौर में लड़खड़ाने लगा है। इसके परिणाम सामने हैं। अपने और पराए, मैं और तुम तथा हम और वे के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। अपने 'मैं' को लेकर हम सब सचेष्ट हैं तथा उसकी सुरक्षा और सेवा-टहल के लिए समर्पित हैं। मैं से अलग जो अन्य या दूसरा है वह भिन्न है और मैं न होना उसकी उपेक्षा, निंदा और हिंसा के लिए पर्याप्त आधार हो जाता है। दूसरा हमारे लिए (अपने जैसे मनुष्य के स्तर से खिसक कर) वस्तु हो जाता है। हम उपयोगिता के हिसाब से उसकी कीमत लगाते हैं और उससे होने वाले नफे-नुकसान के आधार पर व्यवहार करते हैं। अपनी आत्म को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दूसरे के शोषण या हानि को स्वाभाविक ठहराते जा रहे हैं या उसके प्रति तटस्थ होते जा रहे हैं। सभी अपने-अपने मैं (अर्थात स्वार्थ) के लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। एकांत स्वार्थ भीषण होता है और अपना ही नाश करता है। आज के दौर हर कोई अधिकाधिक पाने की दौड़ में इस कदर व्यस्त हो चला है कि कुछ भी मिल जाय मन बेचैन ही रहता है। अभाव की सतत अनुभूति के बीच मन और शरीर दोनों खिन्न रहते हैं। ऐसे में शान्ति, आनंद, सुख, मस्ती, प्रसन्नता, खुशी, उल्लास और आह्लाद जैसे शब्द अब लोगों की आम बातचीत से बाहर हो रहे हैं। इस तरह के अनुभव जीवन से जहां दूर होते जा रहे हैं वहीं उनकी जगह चिंता, उलझन, दुःख, तनाव, परेशानी, कुंठा, संत्रास, अवसाद, घुटन, कलह और द्वंद्व जैसी अनुभूतियाँ लेती जा रही हैं। मनोरोग आज तेजी से बढ़ रहे हैं और गरीब व धनी दोनों इससे प्रभावित हैं।   आत्म भाव को स्थूल और मूर्त बनाने के क्रम में शरीर केन्द्रिकता हमारी मनःस्थिति का एक मुख्य भाग होती जा रही है। आज शरीर को उपभोग की वस्तु बनाकर उसे हमारी चेतना का एक ख़ास हिस्सा बना दिया गया है। शरीर का रखरखाव और प्रस्तुति आज एक जरूरी काम हो गया है। सौन्दर्य प्रसाधन का बाजार जितनी गहनता से विविधतापूर्ण हुआ है उसकी किसी और क्षेत्र से तुलना नहीं की जा सकती। नैसर्गिक सौन्दर्य को परे हटाकर मीडिया और विज्ञापन की दुनिया कहती जा रही है कि हमारे पास सभ्य, योग्य और सम्मानजनक अस्तित्व के लिए क्या-क्या होना चाहिए। नख-शिख तक पूरे संवारने-सजाने के उपकरण, उपचार और वस्त्राभूषण की नित्य नवीन शैलियों की जानकारी का प्रचार-प्रसार इस तेजी से हो रहा है कि किसी न किसी कोण से हर कोई अपने को अधूरा ही महसूस करता है। इससे जुड़ा बाजार नित्य नई वस्तुओं को प्रस्तुत कर आबाल वृद्ध सब में अभाव ग्रस्तता और कमी की अनुभूति को तीखा करने में जुटा रहता है। हमारी अतिरिक्त या अनावश्यक आवश्यकताओं की सूची दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उनकी पूर्ति में श्रम, धन और समय का बड़ा अनुपात जाया होता है, जिसके कारण जीवन के और कामों की उपेक्षा होती है या फिर उनमें व्यवधान आता है। इन उपादानों के प्रयोग से उपजने वाली स्वास्थ्य की समस्याएँ दूसरे तरह के व्यतिक्रम पैदा करती रहती हैं। तीव्र सामाजिक बदलाव के दौर में मनोरोगियों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। कोविड महामारी के दौरान आर्थिक संकट और विस्थापन जैसी मुश्किलों ने मानसिक रोग की चुनौतियों को और बढ़ाया है।   मानसिक स्वास्थ्य की समस्या की जड़ में सामाजिक तुलना भी एक प्रमुख कारक बन रहा है। दूसरों को देखकर हम अपने सुख-दुःख और लाभ-हानि को समझने की कोशिश करते हैं। इसका दुष्परिणाम होता है कि हम अपने में न केवल लगातार कमी और हीनता की अनुभूति करते हैं बल्कि दूसरों के प्रति दुराव और वैमनस्य का भाव भी विकसित करने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि एक व्यक्ति के रूप में शरीर का रूप-रंग ही नहीं सभी विशेषताओं में हर व्यक्ति सबसे अलग और ख़ास होता है। दूसरे की तरह होना और प्रतिस्पर्धा से अधिक उपयोगी है कि हम अपनी राह खुद बनाएं और अपनी अलग पहचान बनाएं। स्वास्थ्य के लिए मन, शरीर और आत्मा सबकी खुराक मिलनी चाहिए। शरीर का उपयोग न होना और श्रम हीनता आज इज्जत का पर्याय बन गया है, जिसके कारण मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग आम हैं। इन सबके पीछे हमारे द्वारा आवश्यकता और लोभ के बीच अंतर न कर पाना एक बड़ा कारण है।   संयम और संतुष्टि का अभ्यास ही इसका एकमात्र समाधान है। तभी आत्म नियंत्रण हो सकेगा। मन की चंचलता से विचलित होना स्वाभाविक है परन्तु उसे साधकर नियंत्रण में लाना जरूरी चुनौती है जिसे सचेत होकर स्वीकार करना पड़ेगा। इस दृष्टि से योग और ध्यान को जीवन में स्थान देना होगा। जीवन स्वयं एक योग है, उसे संयोग के हवाले करना बुद्धिमानी नहीं होगी। निजी जीवन में प्रसन्नता के लिए समृद्धि और संतोष का समीकरण जरूरी है।     (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 9 October 2020


bhopal, Decision on Shaheen Bagh

डॉ. रामकिशोर उपाध्याय नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के नाम पर राजधानी दिल्ली में शाहीन बाग को घेरकर लगभग सौ दिनों तक मार्ग अवरुद्ध करने वालों को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस प्रकार के जमावड़े को अवैध एवं अस्वीकार्य माना है। शाहीन बाग का धरना-प्रदर्शन जिसे संविधान बचाने का प्रतीक बताया जा रहा था, जिसकी परिणति दिल्ली के भयंकर दंगों के रूप में हुई और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का काम किया गया। उसी धरने-प्रदर्शन को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आम जनता के अधिकारों का अतिक्रमण ठहराया है। न्यायालय के आदेश के बाद भविष्य में कोई व्यक्ति, संगठन या दल अपने एजेंडे के लिए किसी सार्वजनिक स्थल या सड़क को जाम नहीं कर पाएगा। इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि संविधान की पुस्तक और बाबा साहब अम्बेडकर के चित्र हाथ में लेकर, शाहीन बाग पर बैठे धरने पर बैठे लोग, लाखों लोगों का मार्ग अवरुद्ध कर स्वयं दूसरों के अधिकारों की अवहेलना कर रहे थे। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि विरोध-प्रदर्शन के लिए जो स्थान सरकार द्वारा तय हैं, केवल उन्हीं चिह्नित या निर्दिष्ट स्थानों का प्रयोग किया जाना चाहिए। कोर्ट के निर्णय के बाद शाहीन बाग़ को घेरना गैरकानूनी कृत्य सिद्ध हो गया है। दिल्ली के लोगों को इस सड़क पर सौ दिनों तक चले व्यवधान से घोर परेशानी झेलनी पड़ी। वे समय पर कार्यालय नहीं पहुँच पाए या जिनको महीनों सड़क जाम के कारण उपचार आदि में भारी कष्ट उठाना पड़ा। शाहीन बाग सड़क दिल्ली से नोएडा और कई विश्वविद्यालयों को जोड़ने वाली प्रमुख सड़क है, इसे घेरकर लाखों लोगों को तीन-चार महीने तक जो परेशान किया गया, कष्ट दिया गया इसके लिए प्रत्येक उस व्यक्ति को दिल्ली-वासियों से क्षमा माँगनी चाहिए, जो वहाँ भाषण देने गये और जो लोग शाहीन बाग में धरना समाप्त होने पर दुःख व्यक्त कर रहे थे। क्या टाइम्स मैगजीन शाहीन बाग की दादी का महिमामंडित चित्र प्रकाशित करने पर खेद प्रकट करेगी? न्यायालय ने सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए भी टिप्पणी की है कि उन्हें ऐसे धरने तत्काल हटा देने चाहिए थे। इस टिप्पणी से आम आदमी पार्टी भी रेखांकित हो गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस धरने को बड़ी चतुराई से अपने सहयोगियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष समर्थन दिया था। यह निर्णय अपने आप में ऐतिहसिक है क्योंकि अभी धरने-प्रदर्शन के नाम पर कोई भी व्यक्ति या संगठन सार्वजनिक स्थान को घेरकर बैठ जाता है। अब सरकार के लिए यह गाइड लाइन बन जाएगी कि वह सार्वजनिक स्थानों और मार्गों पर होने वाले प्रदर्शन तत्काल रोके, कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा न करे। कोर्ट ने इस बात को भी उद्धृत किया है कि “असहमति एवं लोकतंत्र साथ-साथ चलने चाहिए” किन्तु असहमति के नाम पर किसी भी सार्वजनिक स्थान को घेरकर लाखों लोगों के जीवन को कष्ट में डाल देना तो लोकतंत्र का गला दबाने जैसा ही है। आश्चर्य की बात है कि स्वयं को जनता का सेवक कहने वाले राजनेता प्रदर्शन के नाम पर उसी जनता को दारुण दुःख देने में संकोच नहीं करते। धरना-प्रदर्शन हो, रैली, स्वागत, लोकार्पण या भूमि पूजन, आम आदमी के आवागमन को बाधा पहुँचाए बिना संपन्न क्यों नहीं हो पाते? आजकल कोई भी विरोध-प्रदर्शन शासकीय संपत्ति को क्षति पहुँचाये बिना या निजी वाहनों में तोड़फोड़ और हुडदंग के बिना संपन्न क्यों नहीं हो पाते? लोकतंत्र बचाने के नाम पर किये जाने वाले आन्दोलन अलोकतांत्रिक ढंग से संचालित किये जाते हैं क्यों? जबतक इस प्रकार के उग्र प्रदर्शनों पर कठोर दण्ड का विधान नहीं होगा तबतक आम जनता यों ही कष्ट और दुःख झेलती रहेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 October 2020


bhopal, World Post Day, simple postman ,can spell great

रमेश सर्राफ धमोरा   पूरी दुनिया में 09 अक्टूबर विश्व डाक दिवस के तौर पर मनाया जाता है। वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किया था।1969 में जापान के टोकियो शहर में आयोजित सम्मेलन में विश्व डाक दिवस के रूप में इसी दिन को चयन किये जाने की घोषणा की गयी थी। एक जुलाई 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत पहला एशियाई देश था। जनसंख्या और अंतरराष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर भारत शुरू से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा है।   भारतीय डाक प्रणाली का जो उन्नत और परिष्कृत स्वरूप आज हमारे सामने है, वह सैकड़ों साल के लंबे सफर की देन है। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल पहले अलग-अलग हिस्सों में अपने तरीके से चल रही डाक व्यवस्था को एक सूत्र में पिरोने की पहल की थी। उन्होने भारतीय डाक को नया रूप और रंग दिया। अंग्रेजों की डाक प्रणाली उनके सामरिक और व्यापारिक हितों तक केंद्रित थी। विश्व डाक दिवस का मकसद देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में डाक क्षेत्र के योगदान के बारे में जागरुकता पैदा करना है। दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 150 से ज्यादा देशों में विविध तरीके से विश्व डाक दिवस आयोजित किया जाता है।   डाक विभाग के महत्व को मशहूर शायर निदा फाजली के 'सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान' शेर से समझा जा सकता है। फाजली ने जब यह शेर लिखा था उस वक्त डाक विभाग देश में संदेश पहुंचाने का एकमात्र साधन था। डाकिये के थैले में से निकलने वाली चिट्ठियां किसी को खुशी तो किसी को गम का समाचार देती थी। मगर आज नजारा पूरी तरह से बदल चुका है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को बहुत सीमित कर दिया है। लोगों ने हाथों से चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया। अब ई-मेल, वाट्सएप जैसे माध्यमों से मिनटों में संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा।   डाक विभाग हमारे जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। गांव में जब डाकिया डाक का थैला लेकर आता था तो बच्चे-बूढ़े सभी उसके साथ डाकघर की तरफ इस उत्सुकता से चल पड़ते थे कि उनके भी किसी परिजन की चिट्ठी आयेगी। डाकिया जब नाम लेकर एक-एक चिट्ठी बांटना शुरू करता तो लोग अपनी या अपने पड़ोसी की चिट्ठी ले लेते व उसके घर जाकर चिट्ठी देते थे। उस वक्त शिक्षा का प्रसार न होने से अक्सर महिलायें चिट्ठी लाने वालों से ही चिट्ठियां पढ़वाती और लिखवाती थीं। कई बार चिट्ठी पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को ईनाम स्वरूप कुछ पैसा या खाने को गुड़-पताशे भी मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा घरों में चिट्ठियां पहुंचाने का प्रयास करते थे।   उस वक्त गांवों में बैक की शाखा नहीं होती थी। इस कारण बाहर कमाने गये लोग अपने घर पैसा भी डाक में मनीआर्डर के द्वारा भेजते थे। मनीआर्डर देने डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता व भुगतान के वक्त एक गवाह से हस्ताक्षर भी करवाता था। इसी तरह रजिस्टर्ड पत्र देते वक्त भी प्राप्तकर्ता के हस्ताक्षर करवाये जाते थे। डाक विभाग अति आवश्यक संदेश को तार के माध्यम से भेजता था। तार की दर अधिक होने से उसमें संक्षिप्त व जरूरी बातें ही लिखी जाती थी। 15 जुलाई 2013 से सरकार ने तार सेवा को बन्द कर दिया।   आज डाक में लोगों की चिट्ठियां गिनती की ही आती हैं। मनीआर्डर भी बन्द से हो गये हैं। मगर डाक से अन्य सरकारी विभागों से सम्बन्धित कागजात, बैंकों व अन्य संस्थानों के प्रपत्र काफी संख्या में आने से डाक विभाग का महत्व फिर से बढ़ गया है। डाक विभाग कई दशकों तक देश के अंदर ही नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश तक सूचना पहुंचाने का सर्वाधिक विश्वसनीय, सुगम और सस्ता साधन रहा है। लेकिन इस क्षेत्र में निजी कम्पनियों के बढ़ते दबदबे और फिर सूचना तकनीक के नये माध्यमों के प्रसार के कारण डाक विभाग की भूमिका लगातार कम होती गयी है।   वैसे इसकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में आज भी बरकरार है। बदलते तकनीकी दौर में दुनिया भर की डाक व्यवस्थाओं ने मौजूदा सेवाओं में सुधार करते हुए खुद को नयी तकनीकी सेवाओं के साथ जोड़ा है। डाक, पार्सल, पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एक्सप्रेस सेवाएं शुरू की हैं। डाकघरों द्वारा मुहैया करायी जानेवाली वित्तीय सेवाओं को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है। दुनियाभर में इस समय 55 से भी ज्यादा विभिन्न प्रकार की पोस्टल ई-सेवाएं उपलब्ध हैं। भविष्य में पोस्टल ई-सेवाओं की संख्या और बढ़ायी जायेगी। डाक विभाग से 82 फीसदी वैश्विक आबादी को होम डिलीवरी का फायदा मिलता है।   भारत की आजादी के बाद डाक प्रणाली को आम आदमी की जरूरतों को केंद्र में रखकर विकसित करने का नया दौर शुरू हुआ था। नियोजित विकास प्रक्रिया ने ही भारतीय डाक को दुनिया की सबसे बड़ी और बेहतरीन डाक प्रणाली बनाया है। राष्ट्र निर्माण में भी डाक विभाग ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। जिससे इसकी उपयोगिता लगातार बनी हुई है। आज भी आम आदमी डाकघरों और डाकिये पर भरोसा करता है। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में आम जनता का इतना जन विश्वास कोई और संस्था नहीं अर्जित कर सकी है। यह स्थिति कुछ सालों में नहीं बनी है। इसके पीछे डाक विभाग के कार्मिकों का बरसों का श्रम और लगातार प्रदान की जा रही सेवा है।     (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)  

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Dakhal News 9 October 2020


bhopal,Which party will bring investment ,private sector in Bihar

आर.के. सिन्हा   बिहार एकबार फिर चुनावी समर के लिए तैयार है। राज्य का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। नेताओं का जनसंपर्क अभियान जारी है। अब जल्दी ही वहां चुनावी सभाएं शुरू हो जाएंगी। सभी दलों के नेता जनता से तमाम वादे भी करेंगे। फिर ये दल अपने घोषणापत्र से भी जनता को लुभाने आएंगे। उसमें जनता और राज्य के विकास के लिए तमाम वादे किए गए होंगे। कितना अच्छा हो कि इसबार बिहार विधानसभा चुनाव जाति के सवाल की बजाय विकास के मुद्दे पर लड़ा जाए। इस मसले पर सभी क्षेत्रों में गंभीर बहस हो। सभी दल अपना विकास का रोडमैप जनता के सामने रखें।   दुर्भाग्यवश बिहार में विकास के सवाल गौण होते जा रहे हैं। हमने पिछला राज्य विधानसभा चुनाव भी देखा था। तब कैंपेन में विकास के सवाल पर महागठबंधन के नेता फोकस नहीं कर पा रहे थे। अभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकास को सारी कैंपेन के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है। पिछले चुनाव में तो एनडीए के खिलाफ खड़ी तमाम शक्तियां राज्य के विकास के बिन्दु पर तो बात करने से भी कतरा रही थीं। उनमें जाति के नाम पर वोट हासिल करने की होड़-सी मची हुई थी। इसी मानसिकता के चलते बिहार विकास की दौड़ में बाकी राज्यों से कहीं बहुत पीछे छूट गया। यह सच में बेहद गंभीर मसला है। बिहार में जाति की राजनीति करने वालों के कारण ही राज्य में औद्योगिक विकास नहीं के बराबर हुआ।   बिहार के नौजवानों का संकट आप बता दीजिए कि बिहार में पिछले तीस वर्षों में कौन से बड़े औद्योगिक घरानों ने अपनी इकाई लगाई? टाटा, रिलायंस, महिन्द्रा, गोयनका, मारुति, इंफोसिस जैसी किसी भी बड़ी कंपनी ने बिहार में निवेश करना उचित नहीं समझा। इसी का नतीजा है कि बिहार के नौजवानों को अपने घर के आस-पड़ोस में कोई कायदे की नौकरी नहीं मिलती। उसे घर से बाहर दूर निकलना पड़ता है। आप दिल्ली, मुंबई, पुणे, चेन्नई, हैदराबाद, बैगलुरू, लुधियाना समेत देश के किसी भी औधोगिक शहर में चले जाइये, बिहारी नौजवान हर तरह की नौकरी करते मिलेंगे। क्या बिहार में जाति की राजनीति करने वाले इस सवाल का कोई जवाब दे पाएंगे कि उनकी गलत नीतियों के कारण राज्य में निजी क्षेत्र से कोई निवेश करने की हिम्मत तक नहीं करता?   याद रख लें कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडू जैसे राज्यों का तगड़ा विकास इसलिए हो रहा है, क्योंकि इनमें हर साल निजी क्षेत्र का भारी निवेश आ रहा है। केन्द्र सरकार हर साल एक रैंकिंग जारी करती है कि देश के किन राज्यों में कारोबार करना आसान और कहां सबसे मुश्किल है। सरकार ने हाल ही में "ईज ऑफ डूइंग बिजनेस" की रैंकिंग जारी की। इसमें पहले पायदान पर आंध्र प्रदेश है। इसका मतलब है कि देश में आंध्र प्रदेश में कारोबार करना आज के दिन सबसे आसान है। तेलंगाना दूसरे पायदान पर है। हरियाणा तीसरे नंबर पर है। कारोबार करने में आसानी के मामले में मध्य प्रदेश चौथे तो झारखंड पांचवें स्थान पर हैI वहीं, छत्तीसगढ़ 6वें, हिमाचल प्रदेश 7वें और राजस्थान 8वें स्थान पर है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल इसबार शीर्ष 10 में शामिल होते हुए 9वें नंबर पर पहुँच गया है। वहीं, गुजरात ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में 10वें पायदान पर है। लेकिन बिहार तो इसमें 15 वें स्थान तक कहीं नहीं है। कैसे होगा बिहार का विकास?   दरअसल इस रैंकिंग का उद्देश्य घरेलू और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर कारोबारी माहौल में सुधार लाने के लिए राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू करना है। सरकार राज्यों की रैंकिंग को कंस्ट्रक्शन परमिट, श्रम कानून, पर्यावरण पंजीकरण, इंफॉर्मेशन तक पहुंच, जमीन की उपलब्धता और सिंगल विंडो सिस्टम के आधार पर मापती हैं।   बिहार के नेताओं की कब आंखें खुलेंगी अब उपर्युक्त रैकिंग से बिहार के सभी नेताओं और दलों को सबक लेना चाहिए। उन्हें पता चल गया होगा कि उनके राज्य की स्थिति कारोबार के लिहाज से कतई उपयुक्त नहीं है। यह सच है कि पिछले लंबे समय से बिहार में औद्योगिक क्षेत्र का विकास थम-सा गया है। अब बिहार में जो भी नई सरकार बने, उसे देश के प्रमुख उद्योग और वाणिज्य संगठनों जैसे फिक्की, सीआईआई या एसोचैम से तालमेल रखकर उद्योगपतियों को राज्य में निवेश करने के लिए प्रयास करने होंगे। यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि बिहार के औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ेपन के कई कारण हैं। जैसे कि राज्य में नए उद्यमियों और पहले से चलने वाले उद्योगों के मसलों को हल करने के लिए कोई सिंगल विंडो सिस्टम नहीं बनाया गयाI बिहार में अपना कारोबार स्थापित करने वाले उद्योगों के लिए भूमि आवंटन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई तथा राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत तक नहीं समझी गई है। यानी बिजली-पानी की आपूर्ति की व्यवस्था तक पक्की नहीं है। सड़कें खस्ताहाल हैं। पब्लिक ट्रासंपोर्ट व्यवस्था बेहद खराब है। स्वास्थ्य सेवाएं भी राम भरोसे हैं।   हालाँकि, नीतीश जी के शासन में विकास के प्रयास कम हुये, ऐसा भी नहीं है पर लालू-राज में जो छवि राज्य की बन गई, उसे निवेशकों के मन से निकालना आसान भी नहीं है। इन हालातों में बिहार में कौन-सा निवेशक आकर निवेश करेगा भला? बिहार में फूड प्रोसेसिंग, कृषि आधारित हजारों उद्योग, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, इलेक्ट्रानिक हार्डवेयर उद्योग, कपड़ा, कागज और आईटी उद्योग वगैरह का भारी विकास संभव है। इस तरफ ध्यान देना होगा।     बिहार क्यों नहीं बना औद्योगिक हब पिछले 20-25 वर्षों के दौरान देश के अनेक शहर मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र के "हब" बनते चले गए। इस लिहाज से बिहार पिछड़ गया। बिहार का कोई भी शहर नोएडा, मानेसर, बद्दी या श्रीपेरम्बदूर नहीं बन सका। नोएडा और ग्रेटर नोएडा को ही लें। इनमें इलेक्ट्रानिक सामान और आटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े सैकड़ों उत्पादों का उत्पादन हो रहा है। इसके अलावा यहाँ सैकड़ों आईटी कंपनियों में लाखों नौजवानों को रोगजार मिल रहा है, जिसमें एक बड़ा प्रतिशत बिहारी नौजवानों का है। इधर दक्षिण कोरिया की एलजी इलेक्ट्रोनिक्स, मोजर बेयर, यमाहा, न्यू हालैंड ट्रेक्ट्रर्स, वीडियोकॉन इंटरनेशनल, श्रीराम होंडा पॉवर इक्विमेंट तथा होंडा सिएल ने नॉएडा-ग्रेटर नॉएडा में तगड़ा निवेश किया है।   इसी तरह हरियाणा का शहर मानेसर एक प्रमुख औद्योगिक शहर के रूप में स्थापित हो चुका है। मानेसर गुड़गांव जिले का तेजी से उभरता औद्योगिक शहर है I साथ ही यह दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एनसीआर का हिस्सा भी है। मानेसर में आटो और आटो पार्ट्स की अनेक इकाइयां खड़ी हो चुकी हैं। इनमें मारुति सुजुकी, होंडा मोटर साइकिल एंड स्कूटर इंडिया लिमिटेड शामिल हैं। इनमें भी लाखों लोग काम करते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में बिहारी हैं। मानेसर को आप उत्तर भारत का श्रीपेरम्बदूर मान सकते हैं। तमिलनाडू के श्रीपेरम्बदूर में भी आटो सेक्टर की कम से 12 बड़ी कंपनियां उत्पादन कर रही हैं और इन बड़ी कंपनियों को पार्ट-पुर्जे सप्लाई करने के लिए सैकड़ों सहयोगी उद्योग भी चल रहे हैं।   और अब चलते हैं महाराष्ट्र के चाकण में। चाकण पुणे से 50 किलोमीटर तथा मुंबई 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर बजाज आटो तथा टाटा मोटर्स की इकाइयां हैं। इन दोनों बड़ी कंपनियों की इकाइयों के आ जाने के बाद चाकण अपने आप में एक खास मैन्यूफैक्चरिंग हब का रूप ले चुका है। इधर हजारों पेशेवर और श्रमिक काम कर रहे हैं। अब महिन्द्रा समूह ने भी चाकण में दस हजार करोड़ रुपये की लागत से अपनी एक नई इकाई स्थापित करने का फैसला किया है। वाल्कसवैगन भी यहाँ आ चुकी है। इनके अलावा देश के अनेक शहर इसी तरह मैन्यूफैक्चरिंग या सेवा क्षेत्र के केन्द्र बने।   दूसरी तरफ जिस बिहार ने टाटा नगर और डालमिया नगर जैसे निजी औद्योगिक शहर आजादी के पूर्व ही बसा रखे थे, उसी बिहार का कोई शहर क्यों मैन्यूफैक्चरिंग या सेवा क्षेत्र का हब नहीं बन सका? इस बिहार के बिहार विधानसभा के चुनाव में इन मसलों पर भी बात हो और जनता उसे ही वोट दे जो बिहार में निजी क्षेत्र का निवेश लाए तब कोई बात बने।     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 8 October 2020


bhopal,This war can become more severe

अरविंद कुमार शर्मा   अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच संघर्ष ईरान की चेतावनी के बाद पहले से और अधिक भयंकर रूप ले सकता है। ईरान ने कहा है कि दोनों देशों के बीच लड़ाई 'क्षेत्रीय युद्ध' भड़का सकती है। कुछ रिपोर्ट में यह जानकारी आयी है कि अर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच युद्ध में उत्तरी सीमा से लगे ईरान के कुछ गांवों में भी गोले गिरे हैं। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी इन्हीं घटनाओं का हवाला देते हुए चेतावनी देते हैं कि ईरान की जमीन पर गलती से भी मिसाइल या गोले गिरे तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। किसी भी कीमत पर हम इसे बर्दास्त नहीं करेंगे। हम किसी भी स्थिति में अपने शहरों और गांवों की रक्षा करेंगे। राष्ट्रपति रूहानी के अलावा ईरानी बॉर्डर गार्ड्स के कमांडर कासम रेजाई ने भी माना है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ तो कुछ गोले और रॉकेट ईरान के इलाके में भी गिरे। खबर मिल रही है कि गोले गिरने की इन घटनाओं के बाद ईरान की सेनाओं को सतर्क कर दिया गया है।   ईरान ही नहीं, लगता है कि रूस भी स्थिति को गंभीर मानकर चल रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस लड़ाई को एक त्रासदी बताया है। रूस ने आर्मीनिया के साथ सैन्य गठबंधन किया है। आर्मीनिया में उसका एक सैन्य अड्डा भी है। वैसे अज़रबैजान के साथ भी रूस का करीबी रिश्ता है। दोनों ही सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं। असल में, जिस नागोर्नो-काराबाख इलाके पर दोनों देशों के बीच विवाद है, वह साढ़े चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला पहाड़ी क्षेत्र है। सोवियत संघ के विघटन के पहले यह अज़रबैजान के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी क्षेत्र रहा है। विकट स्थिति यह है कि धार्मिक, भौगोलिक और राजनीतिक हितों के कारण तुर्की ने अज़रबैजान के लोगों का पक्ष लिया है। वह काकेशियान क्षेत्र में अर्मीनिया का असर कम करना चाहता है। दूसरी ओर, रूस एवं ईरान ने अपने हितों के लिए आर्मेनिया का साथ दिया। ये दोनों देश पूर्व सोवियत संघ के दौर के अपने हित देख रहे हैं और अज़रबैजान के ईरानी सीमा पर बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश करते रहे हैं।   विवादित नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी आर्मीनियायी लोगों की है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे अज़रबैजान का ही अंग माना गया है। यहां आर्मीनियायी मूल के ईसाई और तुर्की मूल के मुसलमान निवास करते हैं। सोवियत संघ के दौर का हिस्सा होने के कारण रूस से इसके स्वाभाविक जुड़ाव हैं। दोनों ही देश थोड़ी मात्रा में मौजूद बहुमूल्य पेट्रोलियम उत्पाद के बूते वैश्विक अर्थव्यवस्था में दखल के सपने देखते हैं। इस विवाद की जड़ 20वीं शताब्दी में दिखने लगी थी, जब स्टालिन ने नागोर्नो-काराबाख वाले भाग को सोवियत अज़रबैजान के स्वायत्त शासन में दे दिया। तब भी आर्मेनिया के निवासियों ने इसका विरोध किया था। फिर 1988 में इस प्रांत को सोवियत आर्मेनिया को देने की मांग की गयी। वर्ष 1991 में आर्मेनियायी सेना ने नागोनरे-करबाख प्रांत सहित अज़रबैजान के सात अन्य प्रांतों पर कब्जा कर उनकी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। कहीं भी विद्रोही अथवा स्वयंभू सरकारों को मान्यता नहीं दी जाती, पर मौके पर आर्मीनियायी लोगों का बहुसंख्यक होना विद्रोह को बढ़ावा दे रहा है।   सोवियत संघ के विघटन के बाद वाले रूस की ताकत आज भी मायने रखती है। रूसी राष्ट्रपति ने एक टेलीविजन साक्षात्कार में उम्मीद जतायी कि यह संघर्ष जल्द समाप्त हो जाएगा। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव से फोन पर बात भी की है। रूस के साथ अमेरिका और फ्रांस ने भी संयुक्त रूप से नागोर्नो-काराबाख में संघर्ष की निंदा की है। जिस युद्ध की ईरान ने निंदा करते हुए इलाकाई लड़ाई का डर बताया है, वहां के हालात पर नजर डालना चाहिए। आर्मीनियायी आबादी के प्रभुत्व वाले हिस्सा नागोर्नो-काराबाख के बारे में अज़रबैजान का दावा है कि वह बेहतर स्थिति में है। उसने अधिक गोला बारूद और उच्च कोटि के हथियार रखने का भी दावा किया है। अज़रबैजान के पक्ष में सीरियायी लड़ाकों के भी युद्ध में शामिल होने की खबरें हैं। इसके बावजूद सच्चाई यह है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्मीनियाई सेनाएं गोलाबारी कर रही हैं। अज़रबैजान का टारटर शहर तो वीरान ही हो गया है। यह शहर विवादित क्षेत्र नागोर्नो- काराबाख से सटा हुआ है। करीब एक लाख की आबादी में से अब कुछ ही लोग जमीन के नीचे बने खंदकों में देखे गए हैं। शहर की दुकानों और मकान के शीशे टूटे पड़े हैं और सड़कें सुनसान हो चुकी हैं। उधर, अज़रबैजान के सबसे बड़े शहर गांजा पर भी हमला हुआ है। रेडक्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति ने बड़ी संख्या में आम नागरिकों के मारे जाने की पुष्टि की है।   कुल मिलाकर जुलाई में शुरू हुआ संघर्ष अब भयंकर हो रहा है। करीब 72 हजार लोग निर्वासित हो चुके हैं और लगभग तीन सौ से अधिक आम लोगों की मौत हो गई है। हालात पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो जैसी ईरान ने आशंका जतायी है, यह युद्ध क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ग्रहण कर सकता है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 8 October 2020


bhopal, Chirag on electoral, hunting by rebels

मुरली मनोहर श्रीवास्तव   बिहार विधानसभा चुनाव में जहां कलतक एनडीए और महागठबंधन के बीच वाकयुद्ध और राजनीतिक लड़ाई जारी थी। आज एनडीए और महागठबंधन अंदरुनी कलह से जूझ रहे हैं। महागठबंधन में कलतक कांग्रेस, राजद, रालोसपा, वीआईपी एक साथ थे, सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद होने के बाद महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, माले, सीपीआई एक हो गए। जबकि रालोसपा की एनडीए में बात नहीं बनी तो उसके नेता उपेंद्र कुशवाहा बसपा के साथ जुड़कर बिहार की सियासत में वजूद बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं। वीआईपी महागठबंधन से दूरी बनाने के बाद 11 सीटों के साथ एक विधान पार्षद की सीट लेकर एनडीए में अपनी जगह सुनिश्चित करने में सफल हो गए। अब बिहार की सत्ता पर काबिज होने की लड़ाई लड़ी जा रही है। सभी दल नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।   चिराग की भूल या सियासत राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ओत-प्रोत लोजपा सुप्रीमो सह सांसद चिराग पासवान पिछले कई दिनों से एनडीए में कोहराम मचाए हुए थे। उन्होंने बिहार में एनडीए से खुद को किनारा कर लिया है। लेकिन अलग होने की बात पर यकीन नहीं होता क्योंकि एक तरफ वे प्रधानमंत्री के गुणगान में लगे हुए हैं वहीं जदयू व नीतीश कुमार के सारे विकास कार्यों को ढकोसला बताकर विरोध जता रहे हैं। इतना भी करते तो बात होती मगर नीतीश सरकार के सात निश्चय पर अंगुली उठाने वाले चिराग इस बात को भूल रहे हैं कि जिस सरकार पर अंगुली उठा रहे हैं वो भी इस सरकार के अंग हैं।   लोजपा किसका विरोध कर रही है सत्ता पर पकड़ बनाए रखने और आगे की रणनीति पर खुद को काबिज करने के लिए चिराग पासवान लगातार पैंतरे बदल रहे हैं। एक तरफ नीतीश कुमार का विरोध कर रहे हैं और जदयू के खिलाफ उनके क्षेत्र में कैंडिडेट दे रहे हैं। वहीं भाजपा के कई कद्दावर नेताओं को तोड़कर अपने दल में ज्वाइन करा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि पिछले चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री कैंडिडेट माने जा रहे राजेंद्र सिंह ने भाजपा छोड़कर लोजपा ज्वाइन कर लिया है और बिहार सरकार के मंत्री जयकुमार सिंह के विरोध में दिनारा से ताल ठोकेंगे। इतना ही नहीं नोखा से भाजपा के रामेश्वर चौरसिया भी भाजपा छोड़कर लोजपा के साथ हो लिए हैं। जबकि भाजपा की पूर्व विधायक उषा विद्यार्थी ने भी लोजपा का दामन को थाम लिया है। साथ ही भोजपुर के जगदीशपुर के पूर्व विधायक भगवान सिंह कुशवाहा ने टिकट नहीं मिलने से खफा होकर लोजपा का दामन को थाम लिया है।   जदयू का विरोध या भाजपा का समर्थन बिहार में लोजपा खुद को स्थापित करने की कोशिश तो कर रही है मगर एक बात समझ में नहीं आ रही है कि लोजपा के चिराग भाजपा का अगर गुणगान कर रहे हैं तो भाजपा के नेताओं को धड़ाधड़ टिकट क्यों बांट रहे हैं। जदयू के क्षुब्ध नेताओं को टिकट दे रहे हैं तो ये बात समझ में आती है। लेकिन भाजपा के लगातार जनसंघ के समय से साथ रहने वाले नेताओं का टूटकर लोजपा के साथ होना लोजपा और भाजपा दोनों पर सवाल खड़ा कर रहा है।   भाजपा को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी एनडीए में कलतक भाजपा-जदयू और लोजपा साथ चल रहे थे। लेकिन इधर कुछ दिनों से लोजपा ने खुद को अलग कर लिया है और लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गुणगान कर रहे हैं। चिराग कहते हैं कि हम जीतने के बाद भाजपा का ही समर्थन करेंगे। हालांकि भाजपा ने बयान दिया है कि लोजपा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तस्वीरों का इस्तेमाल नहीं कर सकती। बावजूद इसके लोजपा लगातार जदयू से ज्यादा भाजपा को ही हानि पहुंचा रहा है।   चुनाव में अगर छोटी-सी भूल होगी तो इसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ सकता है। महागठबंधन अगर खुद पर भरोसा करके राजनीति कर रहा है तो उसका सोचना अपने तरीके से सही है। मगर एनडीए में लोजपा की कार्यशैली कई सवाल खड़े कर रही है। देखना दिलचस्प होगा कि एनडीए में भाजपा किस प्रकार अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब होती है। वैसे, नीतीश कुमार को भी हल्के में लेना भाजपा और लोजपा के लिए बड़ी भूल होगी। क्योंकि अगर भाजपा और लोजपा के बीच कुछ अंदरुनी खिचड़ी पक रही है तो उसको भी यह बात मान लेना चाहिए कि नीतीश कुमार भी राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 8 October 2020


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भारतीय वायुसेना दिवस 08 अक्टूबर पर विशेष योगेश कुमार गोयल 8 अक्तूबर को भारतीय वायुसेना अपना 88वां स्थापना दिवस मनाएगी। वायुसेना दिवस के अवसर पर पहली बार राफेल लड़ाकू विमान गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर वायुसेना की वार्षिक परेड की अगुवाई करेंगे। इस वर्ष वायुसेना के लिए यह दिवस बेहद खास है क्योंकि राफेल सहित कुछ और शक्तिशाली लड़ाकू विमानों तथा हेलीकॉप्टरों के वायुसेना की विभिन्न स्क्वाड्रनों में शामिल होने से वायुसेना कई गुना शक्तिशाली हो चुकी है। राफेल विमानों की पहली खेप से वायुसेना की युद्धक क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ी है और अब हम पहले से ज्यादा मजबूत हुए हैं। भारतीय वायुसेना देश की करीब 24 हजार किमी लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी मुस्तैदी से निभाती है। चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर जारी तनाव के मौजूदा दौर में भारतीय वायुसेना की ताकत को लेकर वायुसेना प्रमुख आरकेएस भदौरिया ने हाल ही में दो टूक लहजे में कहा कि चीनी वायुशक्ति भारत की क्षमताओं से बेहतर नहीं हो सकती। उनका कहना है कि समय के साथ वायुसेना ने बहुत तेजी से बदलाव किए हैं और काफी हद तक कमियों को दूर कर लिया गया है। देश के समक्ष उभर रही चुनौतियों ने हमें भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए अधिकृत किया है और हमारी क्षमताओं ने विरोधियों को चौंकाया है। वायुसेना प्रमुख के अनुसार हमारे पड़ोस में और आसपास के क्षेत्रों में उभरते हुए खतरे के परिदृश्य में युद्ध लड़ने की मजबूत क्षमता होना आवश्यक है और ऑपरेशनली भारतीय वायुसेना सर्वश्रेष्ठ है। उनका साफतौर कहना है कि भारत किसी भी खतरे से निपटने और दोनों मोर्चों पर युद्ध करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके मुताबिक वायुसेना उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं के साथ दोतरफा युद्ध से निपटने के लिए तत्पर है। इस समय राफेल के अलावा चिनूक और अपाचे भी वायुसेना की बेमिसाल ताकत बने हैं। आगामी पांच वर्षों में तेजस, कॉम्बैट हेलीकॉप्टर, ट्रेनर एयरक्राफ्ट सहित कई और ताकतवर हथियार वायुसेना की अभेद्य ताकत बनेंगे। तीन वर्षों में राफेल तथा एलसीए मार्क-1 स्क्वाड्रन पूरी ताकत के साथ शुरू हो जाएगी। डीआरडीओ तथा एचएएल के स्वदेशी उत्पादन भी वायुसेना की ताकत को लगातार बढ़ा रहे हैं। वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए आने वाले समय में 83 हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) तेजस (मार्क-1ए), 114 एमआरएफए विमानों की खरीद किए जाने की संभावना है। वायुसेना की पहली स्क्वाड्रन 1993 में बनी थी और हर भारतीय के लिए यह गर्व की बात है कि हमारी वायुसेना आज इतनी ताकतवर हो चुकी है कि इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, मल्टीरोल एयरक्राफ्ट, हमलावर एयरक्राफ्ट तथा हेलीकॉप्टरों सहित 2200 से अधिक एयरक्राफ्ट तथा करीब 900 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट शामिल हो चुके हैं। वैसे भारतीय वायुसेना चीन के साथ एक तथा पाकिस्तान के साथ चार युद्धों में अपना पराक्रम दिखा चुकी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् 1947 में भारत-पाक युद्ध, कांगो संकट, ऑपरेशन विजय, 1962 में भारत-चीन तथा 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध, ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन पूमलाई, ऑपरेशन पवन, ऑपरेशन कैक्टस, 1999 में कारगिल युद्ध इत्यादि में अपनी वीरता का असीम परिचय देते हुए वायुसेना ने हर तरह की विकट परिस्थितियों में भारत की आन-बान की रक्षा की। वायुसेना का ध्येय वाक्य है- ‘नभः स्पृशं दीप्तम’ अर्थात् आकाश को स्पर्श करने वाले दैदीप्यमान। गीता के 11वें अध्याय से लिए गए ये शब्द भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन से कहे थे। भारतीय वायुसेना को दुनिया की चौथी बड़ी सैन्यशक्ति वाली वायुसेना माना जाता है। इसकी स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में 8 अक्तूबर 1932 को हुई थी और तब इसका नाम था ‘रॉयल इंडियन एयरफोर्स।’ 1945 के द्वितीय विश्वयुद्ध में रॉयल इंडियन एयरफोर्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय वायुसेना पर आर्मी का ही नियंत्रण होता था। इसे एक स्वतंत्र इकाई का दर्जा दिलाया था इंडियन एयरफोर्स के पहले कमांडर-इन-चीफ सर थॉमस डब्ल्यू एल्महर्स्ट ने, जो हमारी वायुसेना के पहले चीफ एयर मार्शल बने थे। ‘रॉयल इंडियन एयरफोर्स’ की स्थापना के समय इसमें केवल चार एयरक्राफ्ट थे और इन्हें संभालने के लिए कुल 6 अधिकारी और 19 जवान थे। आज वायुसेना में डेढ़ लाख से भी अधिक जवान और हजारों एयरक्राफ्ट्स हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् वायुसेना को अलग पहचान मिली और 1950 में ‘रॉयल इंडियन एयरफोर्स’ का नाम बदलकर ‘इंडियन एयरफोर्स’ कर दिया गया। एयर मार्शल सुब्रतो मुखर्जी इंडियन एयरफोर्स के पहले भारतीय प्रमुख थे। उनसे पहले तीन ब्रिटिश ही वायुसेना प्रमुख रहे। भारतीय वायुसेना में अभीतक कुल 23 एयर चीफ स्टाफ रह चुके हैं। इंडियन एयरफोर्स का पहला विमान ब्रिटिश कम्पनी ‘वेस्टलैंड’ द्वारा निर्मित ‘वापिती-2ए’ था। ‘ग्लोबल फायरपावर’ के अनुसार दुनिया की शक्तिशाली वायुसेना के मामले में चीन तीसरे और भारत चौथे स्थान पर है। चीन के पास भारत के मुकाबले में दो गुना लड़ाकू और इंटरसेप्टर विमान हैं, भारत से दस गुना ज्यादा रॉकेट प्रोजेक्टर हैं लेकिन चीनी वायुसेना भारत के मुकाबले मजबूत दिखने के बावजूद भारत का पलड़ा उसपर भारी है। दरअसल भारतीय लड़ाकू विमान चीन के मुकाबले ज्यादा प्रभावी हैं। भारत के मिराज-2000 और एसयू-30 जैसे जेट विमान किसी भी मौसम में और कैसी भी परिस्थितियों में उड़ान भर सकते हैं। मिराज-2000 और एसयू-30 ऑल-वेदर मल्टीरोल विमान हैं। भारत के पास दुश्मन के रडार को चकमा देने में सक्षम 952 मीटर प्रति सैकेंड की रफ्तार वाली ब्रह्मोस मिसाइलों के अलावा कई दूसरी घातक मिसाइलें भी हैं। इनके अलावा एक बार में 4200 से 9000 किलोमीटर की दूरी तक 40-70 टन के पेलोड ले जाने में सक्षम सी-17 ग्लोबमास्टर एयरक्राफ्ट भी वायुसेना के बेड़े में शामिल हैं। मिराज-2000, मिग-29, सी-17 ग्लोबमास्टर, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस के अलावा सुखोई-30 जैसे लड़ाकू विमान करीब पौने चार घंटे तक हवा में रहने और तीन हजार किलोमीटर दूर तक मार करने में सक्षम हैं। इनके अलावा चिनूक और अपाचे जैसे अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर भी वायुसेना की मजबूत ताकत बने हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 7 October 2020


bhopal, Laws of misdemeanor women misdeeds

प्रमोद भार्गव अनेक कानूनी उपाय और जागरूकता अभियानों के बावजूद बच्चों व महिलाओं से दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इनपर गंभीरता से विचार किए बिना हाथरस कांड को भीड़ जातीय आग्रहों-दुराग्रहों को लेकर देशभर में सड़कों पर उतर रही है। चिंतनीय पहलू यह है कि जातिगत आधार पर इस घिनौने मुद्दे को छोटी-बड़ी जातियों की लड़ाई बनाने की कोशिश हो रही है। इसे तूल देकर जातीय दंगे भड़काने की साजिश के खुलासे की रिपोर्ट जांच एजेंसियों ने योगी आदित्यनाथ सरकार को दी है। उत्तर-प्रदेश में जातीय व सांप्रदायिक उन्मात फैलाने, अफवाहों और फर्जी सूचनाओं के जरिए अशांति पैदा करने में सोशल मीडिया की भूमिका भी एक “षड्यंत्र'' के रूप में सामने आई है। इस सिलसिले में लखनऊ की हजरतगंज कोतवाली में एक मुकदमा भी दर्ज किया गया है। चूंकि मृतक पीड़िता दलित थी, इसलिए दंगों को आसान मानते हुए सौ करोड़ के वित्त पोषण की बात भी सामने आई है। ऐसे में जले पर नमक छिड़कने का काम सरकार ने जरूरत से ज्यादा पर्देदारी करके भी की है। बलात्कार के मामले उत्तर-प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल राजस्थान में सबसे ज्यादा 5,997 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि उत्तर-प्रदेश 3,065 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर था। इस सूची में मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र-प्रदेश, केरल और दिल्ली भी शामिल है। दिल्ली के निर्भया और हैदराबाद की पशु चिकित्सक से क्रूरतापूर्वक हुए दुष्कर्मों ने देश को दहला दिया था। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर उन क्षेत्रों में त्वरित न्यायालय अस्तित्व में आ रहे हैं, जिन जिलों में महिला एवं बाल यौन उत्पीड़त से जुड़े 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इन अदालतों का गठन बाल यौन उत्पीड़न निषेध कानून (पोक्सो) के तहत हुआ है। ये अदालतें सिर्फ पोक्सो से संबंधित मामले ही सुनती हैं। दरअसल, अदालत ने देशभर से बाल दुष्कर्म के मामलों के आंकड़े इकट्ठे किए थे। इससे पता चला कि एक जनवरी से 30 जून 2019 तक बालक-बालिकाओं से दुष्कर्म के 24,212 मामले सामने आए। इनमें से 6,449 में ही चालान पेश किया जाकर अदालतों में सुनवाई शुरू हुई और 911 में त्वरित निर्णय भी हो गया। मध्य-प्रदेश की त्वरित न्यायालयों ने अल्प समय में निर्णय सुनाने में रिकॉर्ड कायम किया है। दुष्कर्म मामलों में त्वरित न्याय का सिलसिला चल निकलने के बाद भी महिलाओं व बलिकाओं से दुष्कर्म की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। बीते साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश लाकर 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी को मौत की सजा और 16 साल से कम उम्र की किशोरी के साथ बलात्कार एवं हत्या के आरोपी को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया था। इस आध्यादेश ने कानूनी रूप भी ले लिया है। पॉक्सो कानून की धारा 9 के तहत किए गए प्रावधानों में शामिल है कि बच्चों को सेक्स के लिए परिपक्व बनाने के उद्देश्य से उन्हें यदि हार्मोन या कोई रासायनिक पदार्थ दिया जाता है तो इस पदार्थ को देने वाले और उसका भंडारण करने वाले भी अपराघ के दायरे में आएंगे। इसी तरह पोर्न सामग्री उपलब्ध कराने वाले को भी दोषी माना गया है। ऐसी सामग्री को न्यायालय में सबूत के रूप में भी पेश किया जा सकता है। पहले कानून से कहीं ज्यादा आदमी को धर्म और समाज का भय था। नैतिक मान-मर्यादाएं कायम थीं। नैतिक पतन के कई स्वरूप होते हैं, व्यक्तिगत, संस्थागत और सामूहिक। व्यक्तिगत पतन स्वविवेक और पारिवारिक सलाह से रोका जा सकता है। किंतु संस्थागत और सामूहिक चरित्रहीनता के कारोबार को सरकार और पुलिस ही नियंत्रित कर सकती है। दवा कंपनियां कामोत्तेजना बढ़ाने के जो रसायन और सॉफ्टवेयर कंपनियां पोर्न फिल्में बनाकर जिस तरह से इंटरनेट पर परोस रही हैं, उसपर कानूनी उपायों से ही काबू पाना संभव है। पोर्न फिल्मों की ही देन है कि गली-गली में दुष्कर्मी घूम रहे हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि जहां कानूनी प्रावधानों के साथ सामाजिक दबाव भी होता है, वहां बलात्कार जैसी दुष्प्रवृत्तियां कम पनपती हैं। विडंबना है कि राजनीति का सरोकार समाज-सुधार से दूर हो गया है। उसकी कोशिश सिर्फ सत्ता में बने रहकर, उसका दोहन करना भर रह गया है। यही वजह है कि भिन्न विचारधाराओं की राजनीति सत्ता के लिए जिस तरह एकमत हो जाते हैं, उसी तर्ज पर दुष्कर्म मामलों में भी भिन्न धर्मों और जातियों के लोग एक हो जाते हैं। स्त्री उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं महानागरों के उन इलाकों में घट रही है, जहां समाज और परिवार से दूर वंचित समाज रह रहा है। ये लोग अकेले गांव में रह रहे परिवार की आजीविका चलाने के लिए शहर मजदूरी करने आते हैं। ऐसे में मोबाइल पर उपलब्ध कामोत्तेजक सामग्री इन्हें भड़काने का काम करती हैं। ये बालिकाओं अथवा महिलाओं को बहला-फुसलाकर या उनकी लाचारी का लाभ उठाकर यौन उत्पीड़न कर डालते हैं। हैदराबाद की चिकिस्तक के साथ जो घटना घटी थी, उसकी पृष्ठभूमि में लाचारी थी। स्कूटी कम आबादी वाले इलाके में पंक्चर हो गई और इंसानियत के दुश्मन मदद के बहाने हैवानियत पर उतर आए थे। इस घटना की पृष्ठभूमि में फैलता शहरीकरण और परिचितों से बढ़ती दूरियां भी रही हैं। यही वजह रही कि दरिंदों को रोकने के लिए न तो व्यक्ति था और न ही दरिंदों को ललकारने वाली कोई आवाज उठी? इसी लाचारी का शिकार निर्भया सिटी बस में सफर के दौरान हुई थी। अक्सर निर्भया, प्रियंका या हाथरस की बालिका की चीखें जब मौन होकर राख में बदल जाती हैं, तब देश में हर कोने से दरिंदों को फांसी देने की मांग उठने लगती है। किंतु न्यायशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि जीवन खत्म करने का अधिकार आसान नहीं होना चाहिए। इसलिए फांसी की सजा जघन्यतम या दुर्लभ मामलों में ही देने की परंपरा है। नतीजतन निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा पर अमल भी जल्दी नहीं होता। मप्र में 2018 में रिकॉर्ड 58 दोषियों को दुष्कर्म व हत्या के मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई है, लेकिन एक भी सजा पर अमल नहीं हो पाया है। ये मामले उच्च, उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति के पास दया याचिका के बहाने लंबित हैं। सभी जगह दोषी को क्षमा अथवा सजा कम करने की प्रार्थना से जुड़े आवेदन लगे हुए हैं। इन आवेदनों के निरस्ती के बाद ही दोषी का फांसी के फंदे तक पहुंचना मुमकिन हो पाता है। साफ है, दुष्कर्म से जुड़े कानूनों को कठोर बना दिए जाने के बावजूद इस परिप्रेक्ष्य में क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। पुलिस और अदालतों की कार्य-संस्कृति यथावत है। मामले तारीख दर तारीख आगे बढ़ते रहते हैं। कभी गवाह अदालत में पेश नहीं होते है तो कभी फोरेंसिक रिपोर्ट नहीं आने के कारण तारीख बढ़ती रहती है। गोया, इस बाबत न्यायिक व पुलिस कानून में सुधार की बात अर्से से उठ रही हैं। लिहाजा विशेष अदालतें गठित हो भी जाएं तो कानूनी प्रक्रिया में शिथिलता के कारण गति आना मुश्किल है। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध और अपराधियों को जातीय रंग देना और जाति-धर्म के आधार पर दंगों की साजिश रचने के षड्यंत्रकारी उपाय देश की जातीय समरसता और धार्मिक सद्भाव के लिए घातक हैं। दुष्कर्मियों की न कोई जाति होती है और न कोई धर्म। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 7 October 2020


bhopal, Political competition movement

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   विपक्षी दल प्रायः चुनावी वर्ष में किसी कानून को निरस्त करने का वादा करते हैं। चुनावी समय में संबंधित कानून के लाभ-हानि व उसपर आमजन की प्रतिक्रिया सामने आ जाती है। संबंधित कानून से यदि लोगों की नाराजगी है तो उसे निरस्त करने का वायदा लाभ दे जाता है। राहुल गांधी ने भी वादा किया है कि जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आई, उसी दिन तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर दिया जाएगा। इन कानूनों को फाड़कर कूड़ेदान में फेंका जाएगा, जिससे देश का किसान बच सके। यह विचार उन्होंने खेती बचाओ, किसान बचाओ ट्रैक्टर यात्रा शुरू करने से पहले व्यक्त किये।   राहुल गांधी को अपना यह वादा पूरा करने के लिए न्यूनतम 2024 तक तो इंतजार करना ही होगा। उसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है। इस बीच यदि नए कानून से लाभ दिखने लगे तब भी क्या राहुल गांधी इसे हटाकर दम लेंगे। क्योंकि वे किसी बेहतर विकल्प की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि नए कानून पर हमला कर रहे हैं। पुराने कानून की अच्छाईयों व स्वामीनाथन रिपोर्ट पर मौन हैं।   किसानों के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की जिम्मेदारी तत्कालीन यूपीए सरकार की थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की जो सिफारिश की गई थी, कांग्रेस उससे बचती रही। मोदी सरकार ने स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिश पर अमल किया। किसानों को उसका लाभ दिया। जबकि नरेंद्र मोदी के पिछले कार्यकाल में कांग्रेस सवाल करती थी कि स्वामीनाथन रिपोर्ट कब लागू होगी। सरकार का साफ कहना है कि न तो कृषि मंडियां समाप्त होंगी, न न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना को हटाया जाएगा। ऐसे में किसानों के नाम पर आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है।   वैसे यह दावा कोई नहीं कर सकता कि इस आंदोलन में कितने किसान और कितने बिचौलिए व राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हैं। ट्रक पर लादकर ट्रैक्टर लाना, उसे मुख्य मार्ग पर आग लगाना, यह कार्य किसान कभी नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा कि किसान व हमारा समाज जिन यंत्रों की विधिवत पूजा करता है, उसे जलाया जा रहा है। अनुमान लगाया जा सकता है कि किसानों के नाम पर जमकर राजनीति चल रही है। इस आंदोलन के नेतृत्व को देखकर ही बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में राहुल-प्रियंका सक्रिय हुए तो अन्य विपक्षी भी सामने आ गए।   पंजाब का आंदोलन सर्वाधिक दिलचस्प है। यहां मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह किसान आंदोलन की कमान अपने पास रखना चाहते थे। यह देखकर अकाली दल बेचैन हो गया। सिमरनजीत बादल केंद्रीय मंत्री पद छोड़कर आंदोलन में कूद पड़ीं। अकाली दल किसी भी दशा में अमरिंदर सिंह को वॉकओवर नहीं देना चाहता। यह राजनीति यहीं तक सीमित नहीं है। अमरिंदर की राह रोकने के लिए राहुल गांधी स्वयं नवजोत सिद्धू को लेकर आ गए। राहुल गांधी के प्रयासों से नवजोत सिंह सिद्धू डेढ़ साल बाद कांग्रेस के मंच पर नजर आए। वह कृषि कानूनों के विरोध में कांग्रेस द्वारा निकाली गई ट्रैक्टर रैली में शामिल हुए। राहुल गांधी के नेतृत्व में निकाली गई रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने उस ट्रैक्टर को चलाया जिसपर कैप्टन अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी सवार थे।   कैप्टन व सिद्धू में छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। बताया जाता है कि राहुल ने इस मिशन पर हरीश रावत को लगाया था। हरीश रावत ने सिद्धू को कांग्रेस का भविष्य करार दिया था। इस बयान से कांग्रेस की आंतरिक राजनीति तेज हो गई है। कैप्टन अमरिंदर सिंह खेमा इस बयान से नाराज है। डेढ़ साल पहले नवजोत सिंह सिद्धू से स्थानीय निकाय विभाग वापस लेकर उन्हें ऊर्जा मंत्री बनाया था। इसके विरोध में नवजोत सिद्धू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद नवजोत सिंह सिद्धू न तो किसी भी विधानसभा सत्र में शामिल हुए और न ही उन्होंने कांग्रेस के किसी कार्यक्रम में भाग लिया।   दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि किसानों के लिए मोदी सरकार ने जितने काम किए हैं उतने किसी दूसरी सरकार ने नहीं किए। किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को लेकर चल रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। स्वामीनाथन आयोग की जिन सिफारिशों को कांग्रेस सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, मोदी सरकार ने उन सिफारिशों को स्वीकार किया है। किसानों के लिए उनकी फसल का उत्पादन लागत का न्यूनतम डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित करने की घोषणा की। इसके बाद प्रति वर्ष रवी एवं खरीफ फसलों की एमएसपी में लगातार वृद्धि की जा रही है।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 7 October 2020


bhopal, Who makes a mockery of Hathras

आर.के. सिन्हा   उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित कन्या के साथ बलात्कार और हत्या से सारा देश गुस्से में है। यह स्वाभाविक ही है। अब उत्तर प्रदेश सरकार से यही अपेक्षा की जाती है कि वह पकड़े गए आरोपियों को वही सजा दिलवाएगी जो निर्भया के दोषियों को मिली थी। लेकिन इस जघन्य कृत्य में भी कुछ लोग जाति खोजने से बाज नहीं आए। यह वास्तव में दुखद है। ये अपने को दलितों का शुभचिंतक मानते हैं। इनमें कुछ राजनीतिक दल और गुजरे जमाने के सरकारी बाबू भी शामिल हैं। ये कभी इन तथ्यों को देश के सामने नहीं लाते कि कुछ साल पहले ही एक दलित लड़की यूपीएससी की परीक्षा में भी टॉपर रही थी, युवराज वाल्मिकी जैसे दलित भारत की हॉकी टीम से खेल रहे हैं, देशभर में दलित डॉक्टर, इंजीनियर और जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सफल भी हो रहे हैं। देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी भी दलित समाज से ही आते हैं।   अच्छी बात यह है कि इन्हें करारा जवाब भी विश्वास से लबरेज और सफल दलित ही दे रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में संस्कृत की प्रोफेसर डॉ.कौशल पंवार गर्व के साथ बताती हैं कि हमें इस देश के संविधान ने बहुत कुछ दिया है। आरक्षण से दलितों को भारी लाभ हुआ है। हालांकि प्रोफेसर डॉ.कौशल पंवार यह भी कहती हैं कि हाथरस जैसी घटनाएं हर हाल में रोकी जानी चाहिए। उनकी राय से कोई इनकार भी नहीं कर सकता।   अफसोस कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल हाथरस और कुछ रिटायर हो गए ऊँचे सरकारी बाबू हाथरस की घटना के बहाने अपनी राजनीति कर रहे हैं। पहला सवाल इन सियासी जमातों से यह पूछा जाना चाहिए कि इन्होंने सत्ता पर काबिज रहते दलितों के हक में क्या किया? दलितों, पिछड़ों या समाज के किसी भी अन्य उपेक्षित वर्ग के हितों में बोलना कतई गलत नहीं है। उनके सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक उत्थान की मांग की ही जानी चाहिए। लेकिन यह सवाल तो पूछा जायेगा कि उपर्युक्त पार्टियों ने अपने शासनकाल में इन उपेक्षित वर्गों के लिए क्या किया? सच्चाई यही है कि इन्होंने दलितों को हमेशा छला है। उन्हें वोटबैंक से अधिक कुछ नहीं माना।   उप्र और महाराष्ट्र के दलितों में फर्क आप उत्तर प्रदेश के दलितों की तुलना महाराष्ट्र के दलितों से करके देख लीजिये। महाराष्ट्र में हजारों दलित नौजवान आज के दिन सफल उद्यमी बन चुके हैं। वहां का दलित अब तेजी से बदल रहा है। वे सिर्फ नौकरी से लेकर शिक्षण संस्थानों में अपने लिए आरक्षण की ख्वाहिश भर नहीं रखते। वे अब बिजनेस की दुनिया में भी अपनी सम्मानजनक जगह बना रहे हैं। वे सफल उद्यमी बन रहे हैं। उन्हें सफलता भी मिल रही है। महाराष्ट्र के दलितों ने तो फिक्की, एसोचैम और सीआईआई की तर्ज पर अपना मजबूत संगठन भी बना लिया है। उसका नाम है "दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री" (डिक्की)। इसमें अधिकतर महाराष्ट्र से संबंध रखने वाले दलित उद्यमी हैं। महाराष्ट्र के दलित नौजवानों को डिक्की के जरिये पूंजी और तकनीकी सहायता तक मुहैया कराई जा रही है।   क्यों सरकार पर वार करते बाबू अगर सियासत से इतर बात की जाए तो इधर देखने में आ रहा कि कुछ गुजरे जमाने के आला सरकारी बाबू भी अपने निहित स्वार्थ के लिये सरकार पर हल्ला बोलने में सक्रिय रहने लगे हैं। हाथरस गैंगरेप मामले में 92 रिटायर हो गए आईएएस और आईपीएस अफसरों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा है। ये सरकार द्वारा बरती गयी कथित प्रशासनिक लापरवाहियों का जिक्र करते हैं। ये हाथरस की पीड़िता के लिए किसी भी कीमत पर न्याय सुनिश्चित करने की अपील करते हैं। इस पत्र में अशोक वाजपेयी, वजाहत हबीबुल्लाह, हर्ष मंदर, जूलियो रिबेरो, एनसी सक्सेना, शिवशंकर मेनन, नजीब जंग, अमिताभ पांडे आदि भी शामिल हैं। आप गौर करें कि ये अफसर दिल्ली दंगों की जांच में कथित गड़बड़ से लेकर हाथरस की घटना तक सरकार को फौरन पत्र लिख देते हैं।   दिल्ली, नोएडा और देश के दूसरे खास शहरों की पॉश कॉलोनियों में रहने वाले इन पूर्व अफसरों में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष वजाहत हबीबउल्ला, दिल्ली के पूर्व उप राज्यपाल नजीब जंग, मोदी सरकार की निंदा करने का कोई भी मौका नहीं गंवाने वाले हर्ष मंदर, महाराष्ट्र और पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक जूलियस रिबेरो, पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, पुरस्कार वापसी गैंग के प्रमुख सदस्य डॉ. अशोक वाजपेयी, अमिताभ पांडे और प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार शामिल हैं। इन सबका वामपंथी और इस्लामवाद का इतिहास सर्वविदित है।   मंदर साहब से तो पूरा देश वाकिफ है। ये शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कह रहे थे-"हमें सुप्रीम कोर्ट या संसद से कोई उम्मीद नहीं रह गई है। हमें अब सड़क पर उतरना होगा।" मंदर के जहरीले भाषण को सैकड़ों लोगों ने सुना था। टीवी चैनलों ने प्रसारित भी किया था। जब उन्हें न तो संसद पर भरोसा रहा है और न ही सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है, तो दनादन सरकार को पत्र क्यों लिखते हैं। क्या उन्हें भारत की न्याय व्यवस्था और सरकार पर अब भरोसा पैदा हो गया है। अशोक वाजपेयी पुरस्कार वापसी गैंग के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। उनसे भी एक सवाल पूछने का मन कर रहा है। क्या उनकी लेखनी से कोई आम पाठक वाकिफ है? कतई नहीं। और यही इनकी सबसे बड़ी असफलता है। ये और इनके जैसे तमाम कथित लेखक और कवि एक भी सफल रचना दे पाने में असफल रहे हैं, जो जनमानस को इनसे जोड़ सके। अब अशोक वाजपेयी जी भी हाथरस की घटना से दुबले हो रहे हैं।   याद करें कि ये सब महाराष्ट्र में साधुओं की नृशंस हत्या के वक्त मर्माहत नहीं हुए थे। इन्होंने तब महाराष्ट्र सरकार से कोई सवाल तक नहीं पूछा था। सवाल जूलियस रिबेरो ने भी नहीं पूछा। आखिर उन्हीं के राज्य में दो साधुओं को भीड़ ने पीट-पीटकर कर नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी थी। पर मजाल है कि रिबेरो या कोई अन्य अफसर बोला भी हो। अपने को मानवाधिकारवादी कहने वाले हर्ष मंदर की भी जुबान सिली रही। वे भी साधुओं के कत्ल पर एक शब्द नहीं बोले। अमिताभ पांडे या जवाहर सरकार के संबंध में टिप्पणी करने का कोई मतलब नहीं है। ये अपनी फेसबुक वॉल पर मोदी सरकार की नीतियों की मीन-मेख निकालते रहते हैं।   सवाल यह है कि क्या आप सच के साथ खड़े हैं? क्या आप देश के साथ खड़े हैं? अगर ये बात होती तो इन बाबुओं के पत्र पर किसी को कोई एतराज क्यों होता। कौन चाहता है कि देश में हाथरस जैसी घटनाएं हों? कोई भी सरकार इस तरह की भयावह घटना का समर्थन नहीं कर सकती। पर कोई भी सरकार अपना काम विधि और नियमों के अनुसार ही करती है। हर बात पर उसकी छीछालेदर करने का भी कोई मतलब है? सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों में कोई गड़बड़ हो तो सरकार को जरूर घेरिए। पर बिना तथ्यों के सरकार को घेरने से आपकी ही विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाएगा। फिलहाल, राज्य की पुलिस और प्रशासन पर पक्षपात का आरोप लगा है, मुख्यमंत्री योगी जी ने केस की जाँच सीबीआई को सौंपकर सही निर्णय लिया है।    (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 6 October 2020


bhopal, Manikchandra Vajpayee, Exemplary Paramhans of Journalism

मामाजी जन्मशती समापन 7 अक्टूबर पर विशेष   डॉ. अजय खेमरिया   पत्रकारिता के पराभव काल की मौजूदा परिस्थितियों में मामाजी यानी माणिकचंद्र जी वाजपेयी का जीवन हमें युग परिवर्तन का बोध भी कराता है। पत्रकारिता में मूल्यविहीनता के अपरिमित सैलाब के बीच अगर मामाजी को याद किया जाए तो इस बात पर सहज भरोसा करना कठिन हो जाता है कि पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में कोई हाड़ मांस का इंसान ध्येयनिष्ठा के साथ पत्रकारीय जीवन की यात्रा को जीवंत दर्शन में भी तब्दील कर सकता है।   मामाजी पत्रकारिता जगत की अमूल्य और अनुकरणीय निधि हैं। वे निर्मोही और परमहंस गति के सांसारिक शख्स थे। उनका व्यक्तित्व उन सन्त महात्माओं के लिए भी विचारण पर बाध्य कर सकता है जो सार्वजनिक संभाषण में सादगी और सदाचार के लिए आह्वान करते हैं। मामाजी का व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में विभूतिकल्प था। वे सांसारिक जीवन के सन्त थे और एक योद्धा की तरह समाज कर्म में संलग्न रहे। अपनी वैचारिकी के प्रति सांगोपांग समर्पित इस महान शख्स की जीवन यात्रा का अवलोकन मौजूदा दौर के एक महत्वपूर्ण पक्ष को भी उद्घाटित करता है, वह यह कि पहचान और प्रतिष्ठा केवल प्रोफेशन, सेंसेशन और इंटेंशन से ही अर्जित नहीं की जाती है बल्कि ईमानदारी, सादगी और ध्येय निष्ठा ही किसी जीवन को टिकाऊ और अनुकरणीय बनाते हैं। मामाजी पत्रकारिता के इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सरोकारों और सत्यनिष्ठा के प्रतिमानों को खड़ा कर गए हैं।   पत्रकार के रूप में मामाजी के बीसियों किस्से आज की पीढ़ी के लिए सीखने और धारण करने के लिए उपलब्ध है। मामाजी ने एक संवाददाता, संपादक, लेखक, वक्ता, विचारक के रूप में राष्ट्र चिंतन का समुच्चय समाज को दिया। उनके लेखन में राष्ट्रीयता और समाज की सर्वोच्च प्राथमिकता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। मूल रूप से मामाजी आरएसएस के स्वयंसेवक थे और वे आजन्म स्वयंसेवक की सीमाओं और सत्यनिष्ठा के साथ जीये। उनके व्यक्तित्व का फलक इतना व्यापक था जिसमें आप एक तपोनिष्ठ प्रचारक, पत्रकार, राजनेता, शिक्षक, समाजकर्मी, गृहस्थ, संन्यासी का अक्स पूरी प्रखरता से चिन्हित कर सकते हैं। एक प्रचारक के जीवन में संघ नियामक की तरह होता है इसलिए इस पैमाने पर मामाजी का जीवन शत-प्रतिशत खरा उतरता है। वे संघ के आदेश पर हर भूमिका के लिए तत्पर रहे।   नई दुनिया के महानतम संपादकों में एक राहुल बारपुते ने एक लेख में मामाजी की सादगी को भारतीय सन्त मनीषा का प्रेरणादायक समुच्चय बताया था। असल में मामाजी की वेशभूषा और जीवनशैली को देखकर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जाना संभव नहीं था। बेतरतीब सिर के बाल, सिकुड़न समेटे धोती-कुर्ता और कपड़े के साधारण जूतों में रहने वाले मामाजी हर उस नए आदमी को अचंभित कर देते थे जो उनकी ख्याति और कृतित्व को सुनकर उनसे मिलने आता था। आज के दौर ही नहीं मामाजी के समकालीन पत्रकारों में भी सरकारी सुविधाओं के प्रति जबरदस्त आकर्षण होता था लेकिन मामाजी सदैव सुविधाभोगी पत्रकारिता से दूर रहे। स्वदेश ग्वालियर और इंदौर के संस्थापक संपादकों जैसी महती जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाने वाले मामाजी ने पत्र के माध्यम से राष्ट्रीयता के विचार पुंज को भोपाल, रायपुर समेत प्रदेश भर में आलोकित किया। उनके मार्गदर्शन में स्वदेश की पत्रकारीय पाठशाला में अनेक पत्रकारों ने प्रशिक्षण प्राप्त कर राष्ट्रीय और प्रादेशिक पत्रकारिता में स्तरीय मुकाम हासिल किया है।   मामाजी एक प्रशिक्षक के रूप में प्रभावी और सहज अधिष्ठाता की तरह थे। वे स्वभाव से जितने विनम्र थे कमोबेश उनकी लेखनी उतनी ही कठोरता से सरोकारों के लिये चलती थी। उनके सानिध्य में आया हर शख्स यही समझता था कि मामाजी उसके परिवार के सदस्य हैं। यही उनके उदारमना हृदय का वैशिष्ट्य था जो उन्हें हरदिल अजीज बनाता था। प्रख्यात पत्रकार राजेन्द्र शर्मा का कहना है कि मामाजी का मूलतः एक ही सार्वजनिक व्यक्तित्व था जिसमें निश्छलता और निष्कपटता के अलावा कोई दूसरा तत्व समाहित नहीं था इसीलिए वे हर सम्पर्क वाले आदमी को अपने आत्मीयजन का अहसास कराते थे।   उनके लेखन का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीयता को प्रतिबिंबित और प्रतिध्वनित करता है। मामाजी के व्यक्तित्व का एक अहम पक्ष उनकी राष्ट्र आराधना में समर्पण का है। बहुत कम इस बात की चर्चा होती है कि उनके गृहस्थ जीवन में एक के बाद एक वज्राघात हुए। उनके इकलौते पुत्र का निधन संघ शिक्षा वर्ग में उनकी व्यस्तता के बीच हुआ तो पुत्री के निधन की परिस्थितियों ने भी उन्हें संघ शाखा के दायित्व से नहीं डिगने दिया। पत्नी भी असमय साथ छोड़ चुकी थी, इसके बावजूद वे संघ कार्य में अंतिम सांस तक जुटे रहे। आज के दौर में हम देखते हैं कि किसी सांसद, विधायक या मंत्री के परिजन और उनके नजदीकी किस तरह दंभ और ठसक से भर जाते हैं लेकिन मामाजी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चचेरे भाई थे इसके बावजूद उन्होंने कभी इस रिश्ते को न तो प्रकट किया न किसी अन्य को इस रिश्ते को प्रचारित करने की अनुमति दी। 2002 में अटल जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए एक सार्वजनिक समारोह में मामाजी के चरण छूने की इच्छा व्यक्त कर देश के समक्ष यह संदेश दिया था कि मामाजी की महानता और संतत्व का मूल्यांकन करने में सत्ता और समाज भूल कर गया है। शीर्ष राजसत्ता का मामाजी के समक्ष अटल जी के रूप में दण्डवत होने का यह घटनाक्रम कोई साधारण बात नही थी बल्कि मामाजी के विभूतिकल्प व्यक्तित्व को राष्ट्रीय अधिमान्यता देने जैसा ही था।   तथापि यह भी तथ्य है कि सामाजिक जीवन में मामाजी के जीवन दर्शन को सुस्थापित करने के नैतिक दायित्व को निभाने में हम खरे नहीं उतरे हैं। उनके जीवन को दर्शन की श्रेणी में इसीलिए भी रखा जाता है क्योंकि उन्होंने जो लिखा या कहा उसे खुद के जीवन में उतारकर भी दिखाया। क्या ऐसे व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शन से परे कुछ और निरूपित किया जा सकता है? आइये पत्रकारिता में टूटती मर्यादाओं के इस तिमिराच्छन दौर में मामाजी के शाश्वत और कालजयी दीपक को प्रकाशित कर राष्ट्रीयता की जमीन को सशक्त करने का संकल्प लें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 6 October 2020


bhopal, Social media and credibility crisis

प्रभुनाथ शुक्ल   आज की दुनिया में सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है। आभासी दुनिया और इंटरनेट ने वैचारिक आजादी का नया संसार गढ़ा है। अब अपनी बात कहने के लिए अखबारों और टीवी के कार्यालयों और पत्रकारों की चिरौरी नहीं करनी पड़ती है। उसका समाधान खुद आदमी के हाथों में है। अब वर्चुअल प्लेटफॉर्म खुद खबर का जरिया और नजरिया बन गया है। टीवी और अखबार की दुनिया वर्चुअल मीडिया के पीछे दौड़ रहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ भी लिखा- पढ़ा जा सकता है किसी को रोक-टोक नहीं है।   अभिव्यक्ति का संवाद इतना गिर चुका है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है। विचार के नाम पर ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सप, इंस्टाग्राम और न जाने कितनी अनगिनत सोशल साइटों पर कुछ लोगों की तरफ से गंदगी फैलाई जा रही है। अनैतिक बहस और विचारों के शाब्दिक युद्ध को देख एक अच्छा व्यक्ति कभी भी सोशल मीडिया पर कुछ कॉमेंट नहीं करना चाहेगा। वर्चुअल मंच पर विचारों का द्वंद देखना हो तो किसी चर्चित मसले पर ट्विटर और फेसबुक के कॉमेंट्स आप देख सकते हैं।   वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्म ने लोगों को बड़ा मंच उपलब्ध कराया है, लेकिन उसका उपयोग सिर्फ़ सामाजिक, राजनैतिक और जातिवादी घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। इतने भ्रामक और आक्रोश फैलाने वाले पोस्ट डाले जाते हैं कि जिसे पढ़कर दिमाग फट जाता है। समाज में जिन्होंने अच्छी प्रतिष्ठा, पद और मान हासिल कर लिया है उनकी भी वॉल पर कभी-कभी कितनी गलत पोस्ट की जाती है। आजकल पूरी राजनीति वर्चुअल हो गई है। कोरोना संक्रमण काल में यह और तीखी हुई है। सत्ता हो या विपक्ष सभी ट्विटर वार में लगे हैं।   सोशल मीडिया पुरी तरह सामाजिक वैमनस्यता फैलाने का काम कर रहा है। हालांकि वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्म पर देश की नामी-गिरामी सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, फिल्मकार, संगीतकार, अधिवक्ता, पत्रकार, चिंतक, वैज्ञानिक और समाज के हर तबके के लोग जुड़े हैं। लोग सकारात्मक टिप्पणी करते हैं। लोगों के अच्छे विचार भी पढ़ने को मिलते हैं। इस तरह का तबका काफी है। उनकी बातों का असर भी व्यापक होता है। लेकिन इंसान की जिंदगी बाजारवाद बन गई है, जिसकी वजह से बढ़ती स्पर्धा, सामंती सोच हमें नीचे धकेल रही है। अपना स्वार्थ साधने के लिए मुट्ठी भर लोग विद्वेष फैला रहे हैं।   पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक बेटी के साथ हुई अमानवीय घटना ने पूरी इंसानियत को शर्मसार कर दिया। इसकी वजह से योगी सरकार घिर गई है। राजनैतिक विरोधी सरकार की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। पूरे देश में हाथरस एक अहम मुद्दा बन गया है। अब इस जघन्य अपराध को भी जातीय और सियासी चश्मे से देखा जा रहा है। विकास दुबे एनकाउंटर के बाद यह दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसे विरोधी योगी सरकार पर जातिवाद को संरक्षण देने का आरोप लगा रहे हैं।   विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद वर्चुअल मीडिया पर यह बहस अभी ब्राह्मण और ठाकुरवाद के बीच थी, लेकिन अब यह दलित और ठाकुरवाद के बीच हो गई है। जबकि इस तरह के आरोप निराधार हैं। लेकिन एक तथ्यहीन जातिवादी टिप्पणी को खूब घुमाया जा रहा है। ट्विटर पर तो यह बहस इतिहास खंगालने लगी है। यूजर्स व्यक्तिगत गाली-गलौज पर उतर आए हैं। जातिवाद की लामबंदी दिखती है। इस तरह की बहस देखकर आप ख़ुद शर्मसार हो जाएंगे कि हमारा समाज कहां जा रहा है। हम मंगल पर दुनिया बसाने की बात करते हैं लेकिन सोच कितनी गिर गई है इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 6 October 2020


bhopal, Achyuta Samanta,Angels serve, Corona victims

रामजी तिवारी   जिस कोरोना काल के शुरू होते भारत के तमाम नेता अपने-अपने आवास में दुबक कर बैठ गये थे और अभीतक अपने घरों से निकलने में डर रहे हैं, उस महामारी से बेखौफ होकर डॉ. सामंत एक कोरोना योद्धा की तरह अपने संस्थान के बच्चों और आम जनता से लेकर प्रशासन तक की हरसंभव मदद करते नजर आ रहे हैं। पिछले 6 महीने के भीतर उन्होंने अपनी ओर से ओडिशा सरकार का समर्थन प्राप्त करते हुए चार-चार कोविद-19 अस्पताल खोले हैं।   घर-घर पहुंचाई पुस्तकें और अनाज डॉ. सामंत का दावा है कि कोरोना महामारी के दौर में उन्होंने बतौर सांसद और समाजसेवक अपने क्षेत्र के किसी भी शख्स को भूखा नहीं सोने दिया। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए भी सभी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। विदित हो कि डॉ. सामंत की तरफ से तकरीबन 30 हजार आदिवासी बच्चों को उनके होमटाउन में न सिर्फ प्रत्येक महीने पाठ्य-पुस्तकें बल्कि सूखा राशन आदि निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा शायद ही दुनिया के किसी कोने में ऐसी पहल सुनने-देखने को मिली हो।   मुफ्त में पढ़ाएगा कीस शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य करने वाले समाजसेवी डॉ. अच्युत सामंत ने कोरोना बीमारी के शिकार व्यक्ति के परिवार के लिए बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने इस महामारी से मरने वाले व्यक्ति के बेटे या बेटी द्वारा कीट विश्वविद्यालय में तकनीकी उच्च शिक्षा के लिए इच्छा जताए जाने पर उसे तकनीकी व वृत्तिगत (प्रोफेसनल) शिक्षा मु्फ्त में मुहैया कराने का वादा किया है।   गुपचुप बेचने वाला फ्री में करेगा मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोरोना महामारी के शिकार लोगों के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने का वादा करने वाले डॉ. सामंत का आशीर्वाद उड़ीसा के केंदुझार जिले के आनंतपुर में गुपचुप बेचने वाले बच्चे को मिला। हाल ही में जिसके पिता की मृत्यु कोविड के चलते हो गई थी। राहुल महत की मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई का जिम्मा अब कीस फाउंडेशन ने लिया है। वह अब तकनीकी शिक्षा को कीट जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में बिल्कुल मुफ्त प्राप्त करेगा।   कौन हैं डॉ. अच्युत सामंत उड़ीसा का कलिंग कहे जाने वाले जाने-माने शिक्षाविद् एवं शिक्षाशास्त्री डॉ. अच्युत सामंत कंधमाल सीट से सांसद हैं। कभी घोर गरीबी में पले-बढ़े अच्युत सामंत आज आदिवासी क्षेत्र के सौ दो सौ नहीं बल्कि 30,000 से ज्यादा गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा, भोजन, आवास और सेहत संबंधी सुविधाएं उपलब्ध करवा रहे हैं। वर्तमान में कीस में ओडिशा के आदिवासी क्षेत्र वाले कुल 23 जिलों के बच्चों का भविष्य संवारने का कार्य होता है। नब्बे के दशक में उनके द्वारा शुरू किए कीस और कीट संस्थान से निकला बच्चा आज शिक्षा ही नहीं खेल की दुनिया में भी पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन कर रहा है।

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal,Completed Projects

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   रोहतांग सुरंग का सपना अटल बिहारी वाजपेयी ने देखा था। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने इसकी कार्ययोजना बनाई थी। नरेंद्र मोदी सरकार ने इस कठिन कार्य को पूर्ण करके दिखाया। इतनी ऊंचाई पर विश्व की सबसे बड़ी सुरंग का निर्माण आसान नहीं था। अनेक दुर्गम स्थल इसके रास्ते में थे। आधुनिक दृष्टि से इसका निर्माण किया गया है। इसका व्यापक महत्व है। चीन से संघर्ष की दशा में यह बहुत उपयोगी साबित होगी। पहले इसका नाम रोहतांग सुरंग था। इसके निर्माण की योजना अटल बिहारी वाजपेयी ने बनाई थी इसलिए उनके नाम पर उसका नामकरण किया गया। नौ किमी लंबी यह सुरंग दस हजार फीट की ऊंचाई पर है। इस प्रकार इसे दुनिया की सर्वाधिक ऊंचाई पर निर्मित सुरंग का गौरव मिला। इससे लेह और मनाली के बीच की दूरी 46 किमी कम हो जाएगी।   2003 में इस परियोजना को अंतिम तकनीकी स्वीकृति मिली थी। इससे रोहतांग दर्रे के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हुआ है। मनाली वैली से लाहौल और स्पीति वैली तक पहुंचने में करीब पांच घंटे का समय लगता था। अब मात्र दस मिनट लगेंगे। पहले बर्फबारी के कारण वर्ष में छह महीने यह मार्ग बंद रहता था। अब लद्दाख में तैनात सैनिकों से सुगम संपर्क कायम रहेगा। उन्हें हथियार और रसद न्यूनतम समय में पहुंचाई जा सकेगी। आपात परिस्थितियों के लिए इस सुरंग के नीचे एक अन्य सुरंग का भी निर्माण किया जा रहा है। यह किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए बनाई जा रही है। विशेष परिस्थितियों में यह आपातकालीन निकास का काम करेगी।   नरेंद्र मोदी ने अटल टनल के वर्चुअल लोकार्पण से इनकार कर दिया। उन्होंने कोरोना काल में भी यहां जाने का निर्णय लिया। एकदिन में यहां तीन कार्यक्रम लगाए गए। मोदी ने इसे अवसर के रूप में स्वीकार किया। यहां के कार्यक्रम मुख्य रूप से दो रूप में महत्वपूर्ण रहे। पहला यह कि यह देश की सुरक्षा से भी जुड़ा था। अटल टनल से सामरिक सुविधा भी मिलेगी। दूसरा यह कि इन कार्यक्रमों से अटल बिहारी वाजपेयी का नाम जुड़ा है। नरेंद्र मोदी ने अटल टनल राष्ट्र को समर्पित की। यह अत्यंत दुष्कर परियोजना थी। भौगोलिक बाधाएं पहाड़ जैसी थी लेकिन सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई। इसी भावना के अनुरूप निर्माण कार्य से संबंधित लोगों ने मेहनत व जज्बे का प्रदर्शन किया। जिसके कारण यह सफलता मिली। नरेंद्र मोदी ने इन सभी कर्मयोगियों का अभिनन्दन किया।   बात इस परियोजना के पूर्ण होने की चली तो मोदी को पिछली सरकार की कार्यशैली याद आ गई। उन्होंने उसका भी उल्लेख किया। उन्होंने कई उदाहरण दिए। प्रश्न किया। लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी के रूप में सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण एयर स्ट्रिप चार दशकों तक बंद रही। क्यों राजनीतिक इच्छाशक्ति नजर नहीं आई। ऐसी दर्जनों लम्बित परियोजनाएं थी। इनमें सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी थी लेकिन वर्षों तक नजरअंदाज की गई। असम के डिब्रूगढ़ शहर के पास बोगीबील में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बोगीबील पुल और बिहार में कोसी महासेतु अति महत्वपूर्ण थे। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद परियोजाओं में तेजी लाई गई। इन्हें पूरा किया गया। सीमा पर युद्ध की स्थिति में सैनिकों को शीघ्र सहायता पहुंचाने हेतु आवश्यक ढांचागत निर्माण में लापरवाही की गई। जबकि चीन ने छह दशक पहले तैयारी शुरू कर दी थी।   अटल टनल की सौगात के साथ मोदी ने हिमाचल प्रदेश के लिए एक अन्य घोषणा की। हमीरपुर में छांछठ मेगावॉट के धौलासिद्ध हाइड्रो प्रोजेक्ट को स्वीकृति दे दी गयी है। इस प्रोजेक्ट से देश को बिजली तो मिलेगी ही, हिमाचल के युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। मोदी ने कहा कि किसान सम्मान निधि के तहत देश के लगभग सवा करोड़ किसान परिवारों के खाते में अबतक करीब एक लाख करोड़ रुपये जमा किये जा चुके हैं। नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि पूर्ववर्ती सरकार परियोजनाओं को लम्बित रखने में विश्वास करती थी। यूपीए सरकार जिस प्रकार कार्य कर रही थी, उससे यह सुरंग दो हजार चालीस में बनती। उनकी सरकार के छह साल में छब्बीस साल का काम किया गया। पहले की सरकार ने सामरिक योजनाओं को लटकाया, भटकाया। छह वर्षो में पूरी ताकत से कार्य हो रहा। दर्जनों प्रोजेक्ट पूरे हुए। अनेक पर कार्य चल रहा है। इतनी तेजी से पहले कभी कार्य नहीं किया गया।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal, Pollution ruining ,health and beauty

शहनाज़ हुसैन   मार्च में केन्द्र सरकार ने जब लॉकडाउन किया तो महानगर में लोगों ने नीला आसमान देखा, हवा एकदम साफ हो गई, प्रदूषण गायब हो गया। मैदानी इलाकों से हिमालय पर्वत दिखाई देने लगा। सोशल मीडिया नदियों में बहते स्वच्छ जल, साफ वातावरण, नीले आसमान और प्रकृति के विभिन्न रूपों के फोटो/वीडियो से भर गया। शहरों की साफ आबोहवा और स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभावों की चर्चा चलती रही। लॉकडाउन में भारतीय शहरों में प्रदूषण की दर रिकॉर्ड 80 प्रतिशत तक गिर गई। अब सरकार ने सभी गतिविधियों को खोलना शुरू कर दिया है। अनलॉक 5 की गाइडलाइन्स जारी होने के बाद एक ओर जहाँ स्वागत हो रहा है तो दूसरी ओर अनलॉक प्रक्रिया के पूरे होने पर फैक्ट्रियों, दफ्तर, सड़क, रेल, हवाई यातायात आदि सामान्य रूप से चलने से वायु प्रदूषण में इजाफा रिकॉर्ड किया जा रहा है।   देश के अधिकतर शहरों के आसमान में धुएं, धूल, एसिड से भरी जहरीली हवा की परत बार-बार खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण से फेफड़ों के रोगों के अलावा समय से पहले बुढ़ापा, पिगमेंटेशन, त्वचा के छिद्रों में ब्लॉकेज आदि अनेक सौन्दर्य समस्यायें भी खड़ी होती हैं। ज्यादातर भारतीय शहरों में वाहनों, एयर कण्डीशन, धूल, धुएं आदि से आसमान में बनने वाली जहरीली धुंध की चादर से माइक्रोस्कोपिक केमिकल्स की एक परत बन जाती है। इसके कण हमारे छिद्रों के मुकाबले 20 गुणा ज्यादा पतले होते हैं जिसकी वजह से वे हमारी त्वचा से हमारे छिद्रों में प्रवेश कर त्वचा की नमी खत्म कर देते हैं। इससे त्वचा में लालिमा, सूजन, काले दाग, त्वचा में लचीलेपन में कमी आ जाती है। त्वचा निर्जीव, शुष्क, कमजोर एवं बुझी-बुझी हो जाती है। वायु में विद्यमान रसायनिक प्रदूषण त्वचा तथा खोपड़ी के सामान्य सन्तुलन को बिगाड़ देते हैं। इससे त्वचा में रूखापन, संवेदनहीनता, लाल चकत्ते, मुहांसे, खुजली एवं अन्य प्रकार की एलर्जी व बालों में रूसी आदि की समस्यायें उभर सकती हैं।   अगर आप शहरों में रहते हैं तो प्रदूषण से कभी छुटकारा नहीं पा सकते। लेकिन अच्छी बात ये है कि आप प्रदूषण से सौन्दर्य को होने वाले नुकसान को काम जरूर कर सकते हैं। आयुर्वेदिक घरेलू उपचार तथा प्राचीन औषधीय पौधों की मदद से प्रदूषण के सौंदर्य पर पढ़ने वाले प्रभाव को पूरी तरह रोका जा सकता है। सौन्दर्य को सामान्य रूप से निखरा रह सकता है।   वायु प्रदूषण का सबसे खतरनाक असर त्वचा पर पड़ता है क्योंकि प्रदूषण के विषैले तत्व त्वचा पर सीधा प्रहार करके त्वचा में विषैले पदार्थो का जमाव कर देते हैं। वास्तव में यह विषैले पदार्थ त्वचा में खुजली के प्रभावकारी कारक होते हैं। वायु में विद्यमान विषैले पदार्थों का सौंदर्य पर दीर्घकालीन तथा अल्पकालिक प्रभाव पड़ता है। वायु में विद्यमान रसायनिक प्रदूषण वातावरण में आक्सीजन को कम कर देते हैं जिससे त्वचा में समय से पूर्व झुर्रियां दिखने शुरू हो जाते हैं। त्वचा पर जमी मैल, गन्दगी तथा रसायनिक तत्वों से छुटकारा प्रदान करने के लिए त्वचा की सफाई अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि आपकी त्वचा शुष्क है तो आपको क्लीजिंग क्रीम तथा जैल का प्रयोग करना चाहिए जबकि तैलीय त्वचा में क्लीनिंग दूध या फेशवाश का उपयोग किया जा सकता है। सौंदर्य पर प्रदूषण के प्रभावों को कम करने के लिए चन्दन, यूकेलिप्टस, पुदीना, नीम, तुलसी, घृतकुमारी जैसे पदार्थों का उपयोग कीजिए। इन पदार्थो में विषैले तत्वों से लड़ने की क्षमता तथा बलवर्धक गुणों की वजह से त्वचा में विषैले पदार्थों के जमाव तथा फोडे़-फुन्सियों को साफ करने में मदद मिलती है।   वायु प्रदूषण खोपड़ी पर भी जमा हो जाते हैं। एक चम्मच सिरका तथा घृतकुमारी में एक अण्डे को मिलाकर मिश्रण बना लीजिए तथा मिश्रण को हल्के-2 खोपड़ी पर लगा लीजिए। इस मिश्रण को खोपड़ी पर आधा घण्टा तक लगा रहने के बाद खोपड़ी को ताजे एवं साफ पानी से धो डालिए। आप वैकल्पिक तौर पर गर्म तेल की थिरैपी भी दे सकते हैं। नारियल तेल को गर्म करके इसे सिर पर लगा लीजिए। अब गर्म पानी में एक तौलिया डुबोइए तथा तौलिए से गर्म पानी निचोड़ने के बाद तौलिए को सिर के चारों ओर पगड़ी की तरह बांधकर पांच मिनट तक रहने दीजिए। इस प्रक्रिया को 3-4 बार दोहराइए। इससे बालों तथा खोपड़ी पर तेल को सोखने में मदद मिलती है। इस तेल को पूरी रात सिर पर लगा रहने दें तथा सुबह ताजे ठण्डे पानी से धो डालिए।   प्रदूषण से लड़ने में पानी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आप ताजा, स्वच्छ जल का अधिकतम उपयोग कीजिये क्योंकि पानी शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकलने तथा कोशिकाओं को पौष्टिक पदार्थों को बनाये रखने में मदद करता है। प्रदूषण की वजह से त्वचा को हुए नुकसान की भरपाई पानी से आसानी से की जा सकती है।   ओमेगा 3 तथा ओमेगा 6 फैटी एसिड्स त्वचा को प्रदूषण के दुष्प्रभाव से बचाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। फैटी एसिड्स त्वचा में आयल शील्ड बना देते हैं, जिससे त्वचा को अल्ट्रा वायलेट किरणों से होने वाले नुकसान से सुरक्षा प्राप्त होती है।    ओमेगा 3 फैटी एसिड्स बर्फीले पहाड़ों की नदियों में पाए जाने वाली मछली, अखरोट, राजमा तथा पालक में प्रचूर मात्रा में मिलता है जबकि ओमेगा 6 चिकन, मीट, खाद्य तेलों, अनाज तथा खाद्य बीजों में पाया जाता है।   वायु में प्रदूषण तथा गन्दगी से आंखों में जलन तथा लालिमा आ सकती है। आंखों को ताजे पानी से बार-2 धोना चाहिए। काटनवूल पैड को ठण्डे गुलाब जल या ग्रीन-टी में डुबोइए। इसे आंखों में आई पैड की तरह प्रयोग कीजिए। आंखों में आई पैड लगाने के बाद जमीन में गद्दे पर 15 मिनट तक आराम में शवासन की मुद्रा में लेट जाइए। इससे आंखों में थकान मिटाने में मदद मिलती है। वायु में प्रदूषण के कारण सांस तथा फेफड़ों की बीमारी सामान्य बन गई है। घर के अंदर प्रदूषित हवा से सिरदर्द, आखों में जलन जैसी बीमारियां हो सकती है। वास्तव में सरकारी तथा वैज्ञानिक संगठनों का मुख्य लक्ष्य वर्तमान में विद्यमान प्रदूषण के उच्च स्तर को सामान्य स्तर तक लाना है जिसे हम कुछ औषधीय पौधों को मदद से प्राप्त कर सकते है। इन पौधों में एलोवेरा सबसे लाभदायक माना जाता है जो कि सामान्यतः सभी भारतीय घरों में आसानी से देखा जा सकता है। यह घरों में आक्सीजन के प्रवाह को तेज करता है तथा प्रदूषण के प्रभाव को कम करता है। यह कार्बनडायक्साईड तथा कार्बन मोनोआक्साइड को सोखकर आक्सीजन को वातावरण में छोड़ता है।   (लेखिका अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं।)

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Dakhal News 3 October 2020


bhopal,Increased danger of environmental imbalance

योगेश कुमार गोयल बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में बदलाव के कारण पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण के तेजी से बदलते दौर में हमें भली-भांति जान लेना चाहिए कि इनके लुप्त होने का सीधा असर समस्त मानव सभ्यता पर पड़ना अवश्यंभावी है। विश्वभर में आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को जागरूक करने के लिहाज से ठोस कदम उठाने की दरकार है। हमें यह स्वीकार करने से गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम स्वयं हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का बेहतरीन अवसर दिया था कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी की वजह धरती कराहती रही है। प्रकृति मनुष्य को बार-बार बड़ी आपदा के रूप में चेतावनियां भी देती रही है लेकिन उन चेतावनियों को दरकिनार किया जाता रहा है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ही नतीजा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट दिखाई दिया है। वर्ष दर वर्ष जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, हमें समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के चलते प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। पर्यावरण प्रदूषण के कारण पिछले तीन दशकों से जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद अगर हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं- जल, जंगल और जमीन, जिनके बगैर प्रकृति अधूरी है और यह विडम्बना है कि प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि प्रकृति का संतुलन डगमगाने लगा है, जिसकी परिणति भयावह प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आने लगी है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए जल, जंगल, वन्य जीव और वनस्पति, इन सभी का संरक्षण अत्यावश्यक है। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा है कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के कारण मनुष्यों के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ ही रहा है, जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां भी लुप्त हो रही हैं। दुनियाभर में पानी की कमी के गहराते संकट की बात हो या ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के तपने की अथवा धरती से एक-एक कर वनस्पतियों या जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने की, इस तरह की समस्याओं के लिए केवल सरकारों का मुंह ताकते रहने से ही हमें कुछ हासिल नहीं होगा। प्रकृति संरक्षण के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर अपना योगदान देना होगा। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय में भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ वातावरण के कारण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी अब तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है। दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन, सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरे जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक भी अब लगातार कम हो रही है। स्थिति इतनी बदतर होती जा रही है कि अब हिमाचल की धर्मशाला, सोलन व शिमला जैसी हसीन वादियों और यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में कटरा जैसे ठंडे माने जाते रहे स्थानों पर भी पंखों, कूलरों के अलावा ए.सी. की जरूरत महसूस की जाने लगी है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती है। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है। जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा सामने आती है तो हम प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं लेकिन हम नहीं समझना चाहते कि प्रकृति तो रह-रहकर अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है। दोषी हम खुद हैं। हमारी ही करतूतों के चलते वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियों के साथ-साथ टीबी, कैंसर जैसी कई और असाध्य बीमारियां जकड़ने लगी हैं। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तबतक नहीं खुलती, जबतक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। अधिकांश राज्यों में सीवेज ट्रीटमेंट और कचरा प्रबंधन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाला धुआं वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचाता रहा है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें स्वयं सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। सरकार और अदालतों द्वारा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनती पॉलीथीन पर पाबंदी लगाने के लिए समय-समय पर कदम उठाए गए लेकिन हम पॉलीथीन का इस्तेमाल करने के इस हद तक आदी हो गए हैं कि हमें आसपास के बाजारों से सामान लाने के लिए भी घर से कपड़े या जूट का थैला साथ लेकर जाने के बजाय पॉलीथीन में सामान लाना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। अपनी सुविधा के चलते हम बड़ी सहजता से पॉलीथीन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं। अपनी छोटी-छोटी पहल से हमसब मिलकर प्रकृति संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। हम प्रयास कर सकते हैं कि हमारे दैनिक क्रियाकलापों से हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसों का वातावरण में उत्सर्जन कम से कम हो। कोरोना महामारी के इस दौर में पहली बार ऐसा हुआ, जब प्रकृति को स्वयं को संवारने का सुअवसर मिला। अब प्रकृति का संरक्षण करते हुए पृथ्वी को हम कबतक खुशहाल रख पाते हैं, यह सब हमारे ऊपर निर्भर है। कितना अच्छा हो, अगर हम प्रकृति संरक्षण दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने स्तर पर उस पर ईमानदारी से अमल भी करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 3 October 2020


bhopal, for a better world

गिरीश्वर मिश्र   पिछली तीन सदियों के बीच पूंजीवाद और प्रौद्योगिकी ने एक नई तरह की सभ्यता का आगाज किया था। इन विचारों का जिस तरह वैश्विक स्तर पर फैलाव हुआ और वह सभी क्षेत्रों, वर्गों और संस्कृतियों पहुंचा उसने औद्योगिक क्रान्ति को जन्म दिया। पूंजीवाद के इस विस्तार ने ज्ञान का अर्थ ही बदल दिया। ज्ञान जो पहले मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ा था अब वह कर्म में प्रयुक्त हो गया। यह एक साधन और उपयोगी वस्तु हो गया। ज्ञान को उपकरणों, प्रक्रियाओं और उत्पादों में प्रयुक्त किया जाने लगा। इसने औद्योगिक क्रान्ति को जन्म दिया। साथ ही इसने अलगाव को भी खूब बढ़ाया। हमारा समाज ज्ञानकेन्द्रित तो नहीं हुआ है पर अर्थव्यवस्था जरूर ज्ञानकेन्द्रित हो चुकी है।   अब आर्थिक समृद्धि परवान चढ़ने लगी। विश्व में आर्थिक प्रगति की दृष्टि से ध्रुवीकरण होता गया और पहली, दूसरी और तीसरी दुनिया के बीच देशों को बांटा जाने लगा। विकास का पैमाना विकसित देशों से लिया गया और सभी देशों को उससे नापने की व्यवस्था की गई। वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण को महामंत्र मानकर सारी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधताओं को किनारे रख पिछड़े देशों को कर्जदार बनाकर एक विलक्षण आर्थिक प्रगति का एकहरा माडल आरोपित किया गया। इसके परिणाम मिश्रित हैं। अनचाही प्रतिस्पर्धा, हिंसा और प्राकृतिक संसाधनों का का अनियंत्रित दोहन प्रकृति के स्वाभाविक चक्र को ही खंडित कर रहा है। विकास की दौड़ विनाश जैसी लगने लगी है। सभी सकते में हैं और धरती और पूरा पर्यावरण जोखिम की गिरफ्त में है। विकल्प की तलाश में हमारा ध्यान गांधी के नजरिए पर जाता है। सादगी और अहिंसा के उनके विचार मानव कर्तृत्व की एक सहज व्यवस्था में स्थापित हैं और संतुष्टि की अर्थव्यवस्था की ओर न कि वृद्धि की अर्थव्यवस्था की ओर ले चलते हैं। यह उस उत्पादन-उपभोग की प्रधानता वाली शैली के विपरीत है जिसमें असमानता और गरीबी दोनों ही मजबूती के साथ आज भी टिके हुए हैं।   सादगी और अहिंसा के विचार परस्पर जुड़े हुए हैं। पश्चिमी तार्किक निगमन से भिन्न गांधी जी प्रज्ञा और सत्य के साक्षात अनुभव वाली आध्यात्मिक परम्परा से जुड़े हुए थे। अहिंसा का विचार पीड़ा न पहुँचाने के भाव से जुड़ा हुआ है। इसमें नकारात्मक भाव के बदले में न केवल हिंसा का त्याग निहित है बल्कि यह एक सकारात्मक स्थिति है जिसमें सभी प्राणियों के साथ तादात्म्य स्थापित करना प्रमुख कार्य है। ऐसी स्थिति में आदमी प्यार के भाव से अर्थात अपने और दूसरे दोनों के हित-साधन के भाव से कार्य करता है। साथ ही वह हर संभव पीड़ा के प्रति सतर्क भी रहता है। उसका हर कार्य प्रीतिबर्धक हो जाता है और सादगी विश्व के प्रति प्यार का रूप ले लेती है। उदाहरण के लिए हम प्लास्टिक के झोले उपयोग में लाते हैं परन्तु यदि सारी दुनिया के साथ तादात्म्य हो जाय तो धरती की चिंता होगी और उपभोक्ता का भाव बदल जायगा और हम उसका उपयोग छोड़ देंगे। गांधी जी अपने को अद्वैतवादी कहते हैं और सभी के बीच एक अनिवार्य एका देखते हैं। उनका विश्वास था कि एक आदमी की आध्यात्मिकता की वृत्ति से सारी दुनिया को फ़ायदा होता है।   आधुनिक उत्पादन-उपभोग की प्रणाली सबके साथ तादात्म्य की बात नहीं करती। इसका परिणाम गरीबी और असमानता ही नहीं बल्कि पर्यावरण का दोहन भी है। प्रजातियाँ तक लुप्त होती जा रही हैं। संपत्ति का अधिकार आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में अति उत्पादन और अति उपभोग को जन्म दे रहे हैं। इसका परिणाम पारिस्थितिक असंतुलन और वैश्विक असमानता है। वैश्विक संस्थाएं गरीब देशों में गरीबी और पीड़ा को जन्म देती हैं। स्वास्थ्य और स्वच्छता की चुनौतियां, धर्म, भाषा, कला, विज्ञान आदि का क्षेत्र जो संस्कृति में आता है वह भी इसका कारण है। पर इन आलोचनाओं में सबके साथ तादात्मीकरण का भाव नहीं देखते हैं। भौतिक दृष्टि से परे एक सर्वातिक्रामी नजरिये की जरूरत है ताकि धरती की सीमा में ही उत्पादन और उपभोग हो। आज एक बिलियन भूखे और कुपोषित जन हैं जो 'दूसरे' हैं। गांधी का नुस्खा विश्व की जरूरतों का समता के आधार पर और बिना किसी टकराव के समाधान देने की कोशिश करता है।   आज की कानूनी व्यवस्था में इस बात पर बहुत कम विचार हुआ है कि वे उत्पादन-उपभोग के प्रारूप के अंतर्गत वैश्विक दुःख और गैर टिकाऊ के पक्ष में कैसे काम करती हैं। संपत्ति का विचार और उसके बहुराष्ट्रीय स्वरूप को लेकर समीक्षा नहीं होती है। ऐसी सारी कम्पिनियाँ अपने उत्पादन के क्रम में हानि पहुंचाती हैं, संपत्ति के ऐसे उपयोग को देखें तो गांधी जी की आधुनिक सभ्यता की आलोचना बरबस याद आ जाती है। गांधी ने बड़ी प्रखरता से कहा था कि सभ्यता तभी टिकाऊ शान्ति ला सकेगी जब संसाधनों और व्यक्तियों के साथ सम्बंधों के बारे में वह पश्चिमी विचारों को बदले। आज की उपभोग की आदतें कहाँ ले जा रही हैं, यह गंभीर विचार का प्रश्न है।   गांधी जी से किसी पत्रकार ने जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में व्यक्त करने को कहा तो ईशावास्योपनिषद को उद्धरित करते हुए कहा "त्याग करो और आनंद करो।" कुछ न चाहकर वास्तविक स्वतंत्रता मिलती है। अनंत उपभोग की पक्षधर संस्कृति किसी स्थायी सुख की उपलब्धि नहीं करा सकती। इस तरह की व्यवस्था में भौतिकता प्रधान समाज दूसरों पर दबदबा बनाते हैं और अस्थाई और क्षण भंगुर अस्थाई संतुष्टि ही देते हैं। यह एक घोर अंतर्विरोध है की स्थिति है- आनंद उपभोग में है और उपभोग अनंत है।   आज अध्ययन यह बता रहे हैं कि सुख पर भौतिक समृद्धि का रिश्ता सीधी रेखा में नहीं चलता है। एक बिन्दु पर धन की वृद्धि अपना महत्त्व खो देता है। मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद समृद्धि का असर उतना नहीं होता। डेनियल काह्न्मन के हिसाब से पचहत्तर हजार डालर तक वार्षिक आय की बढ़त खुशहाली बढ़ाती है पर उसके ऊपर संपत्ति और सुख के बीच कोई रिश्ता नहीं रह जाता। अत्यधिक भौतिक समृद्धि और सुख के बीच के कमजोर रिश्ते की बात वैज्ञानिक शोध से पुष्ट हो रही है। गरीबी से मुक्त होने के बाद थोड़ा और सुख पर्याप्त होता है। इसी तरह अत्यधिक उपभोग अस्थाई है और लोगों को भ्रम में रखता है और विश्व के अधिकाधिक संसाधन के उपभोग की मिथ्या चाहत बनी रहती है।   भौतिक इच्छाओं से स्थायी सुख नहीं पाया जा सकता है। शाश्वत उपभोग की इच्छा के वश में आकर हम वस्तुत: सतत असंतुष्टि को ही खरीदते हैं। उपभोग की संस्कृति में पले-बढ़े लोग तत्काल संतुष्टि की सोचते हैं। यह सतत बाजारीकरण का परिणाम है। बीसवीं सदी के आरम्भ में विज्ञापन का दौर शुरू हुआ था। उसने उपभोक्ताओं में असुरक्षा का भाव पैदा किया और उसकी तरकीबें भी ईजाद की गईं। जनता को जितना ज्यादा असंतुष्ट रखा जाय यानी खरीददार असंतुष्ट रहे तो रोजगार में ज्यादा नफ़ा होगा। अत: उपभोक्ता का दिमाग काबू में कर उत्पादों के लिए इच्छा पैदा करना स्वयं में एक धंधा बन गया। यह मान कर कि सामाजिक संस्थाएं व्यक्ति की रक्षा करेंगी, कानून के दायरे में किसी भी तरह व्यापार करने की छूट है। अवांछित उपभोग पर अंकुश लगाने वाली संस्थाओं के अभाव में उपभोक्ता पर उन संदेशों की भरमार होती गई कि 'खरीदो।' लोग नाखुश रहकर उपभोग के लिए लालायित बने रहें और उपभोग करते रहें। वस्तुत: अंतहीन उपभोग सुखी नहीं बनाता है।   गांधी जी इसे आधुनिक जीवन की कमी मानते थे। गाँव की अपेक्षा शहर की तेज रफ़्तार जिन्दगी में बिना संतुष्टि के आदमी भागते-दौड़ते रहते हैं, भौतिकता की ललक को लक्ष्य बनाकर प्रगति की राह पर नीचे गिरते हैं। आज व्याकुल आधुनिक भारतीय के लिए यम नियम का देसी विचार आत्म नियंत्रण और चरित्र निर्माण की ओर ध्यान आकृष्ट करता है। इन नैतिक अभ्यासों का पालन आंतरिक शान्ति और सामाजिक समरसता दिला सकता है। गांधी जी दीर्घजीवी खुशी को आवश्यक जरूरतों ( नीड) से जुड़ी पाते हैं न की चाहतों या इच्छाओं (वांट ) से जुड़ा पाते हैं। इसी तरह असते (चोरी न करना) और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना) भी जरूरी सीमाएं बनाते हैं। आनंद का स्रोत अभौतिक है और अन्दर होता है। अतृप्त रहने वाली कामनाओं की पूर्ति करना उन वस्तुओं के अस्थाई स्वभाव को न समझने के कारण है।   भौतिक उपलब्धि को ही अंतिम लक्ष्य मानकर चलना असंगत है। महात्मा गांधी टिकाऊ उपभोग के लक्ष्य के लिए गुणात्मक परिवर्तन चाहते हैं। ऐसा करते हुए संसाधन का दबाव कम होगा और वैश्विक सुख और शान्ति आ सकेगी। अतः अपरिग्रह आवश्यक है और खुशी एक मानसिक दशा है। मनुष्य खुश या नाखुश गरीबी के कारण ही नहीं होता। धनी लोग भी नाखुश होते हैं। खुशी की अर्थव्यवस्था से समाज में शान्ति और निश्चिंतता बढ़ती है। इसके मूल में नैतिकता पर आधारित आधृत आर्थिक प्रगति की अवधारणा है। यही वह मार्ग है जिसमें मानवता का भविष्य है।   (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 2 October 2020


bhopal, God bless everyone

गांधी जयंती पर विशेष रमेश सर्राफ धमोरा भारत सहित दुनिया के कई देशों में आज गांधी जयंती मनाई जाती है। 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर में मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ था। देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई में गांधीजी ने अहिंसा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया था। अहिंसा की बदौलत ही अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा तथा 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने पूरे देश की जनता का प्रभावी ढंग से नेतृत्व किया। संस्कृत भाषा में महात्मा एक सम्मानसूचक शब्द है। गांधीजी को महात्मा के नाम से सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया था। एक अन्य मत के अनुसार स्वामी श्रद्धानन्द ने 1915 में महात्मा की उपाधि दी थी। तीसरा मत ये है कि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने महात्मा की उपाधि प्रदान की थी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित करते हुए आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएं मांगीं थीं। देश की आजादी के बाद उन्होंने कोई भी सरकारी पद लेने से इनकार कर दिया था। इसलिए देशवासियों ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिया। आज हम सब उन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। महात्मा गांधी भारत में सबसे अधिक सम्मानित व लोकप्रिय नेता हैं। देश में किसी भी दल की सरकार हो, सभी महात्मा गांधी के प्रति पूरा सम्मान प्रकट करती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जनप्रियता के ही कारण आज देश के सभी सरकारी कार्यालयों में उनकी तस्वीर लगी होती है। जो हर एक को शांति व अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। देश की संसद में भी महात्मा गांधी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसके समक्ष बैठकर विभिन्न दलों के सांसद अहिंसात्मक तरीके से सरकारों के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन करते रहते हैं। भारत जैसे विशाल देश में जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे विचारधारा के क्रन्तिकारियों के रहते महात्मा गांधी ने शांति के पथ पर चलकर अंग्रेजों से देश की आजादी के लिए संघर्ष करने के लिए पूरे देश को एकजुट करने का काम किया। जो उनके करिश्माई व्यक्तित्व के कारण ही संभव हो पाया था। देश की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक को भी त्याग कर शरीर पर सिर्फ एक धोती को हाथ में एक लाठी और चश्मा पहनकर आजादी के संघर्ष में अपना योगदान देने के लिए देश की जनता को जगाने अकेले ही निकल पड़े थे। देखते ही देखते पूरे देश के लोग उनके साथ जुड़ते गए। अंततः उन्होंने अपने ही तरीके से ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़कर जाने को मजबूर किया। आज महात्मा गांधी एक नाम नहीं एक प्रतीक बन चुके हैं। उनका बताया शांति का मार्ग आज पूरी दुनिया को अच्छा लग रहा है। बड़े-बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष उनके बताए मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। उनके सिद्धांतों पर चलने का प्रयास करते हैं। देश-दुनिया से आने वाला हर बड़ा नेता दिल्ली में राजघाट स्थित उनकी समाधि पर जाकर उनको श्रद्धांजलि देना नहीं भूलते हैं। देश में महात्मा गांधी ही एकमात्र ऐसे नेता है जिनके पूरी दुनिया में लाखों-करोड़ों श्रद्धालु मौजूद है। दुनिया में जब भी कहीं युद्ध की बात आती है तो लोग अक्सर महात्मा गांधी को याद करते हैं और उनके बताए सिद्धांतों पर चलकर मार्ग युद्ध को टालने का प्रयास करते हैं। इसीलिए पूरी दुनिया महात्मा गांधी को शांति का पुजारी मानती है। प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को उनका जन्मदिन भारत में गांधी जयंती के रूप में और पूरे विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है। पूरी दुनिया को शांति का सन्देश देने वाले महात्मा गाँधी को कभी भी शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 2 October 2020


bhopal, Owaisi ji, now stop disrespecting the court

आर.के. सिन्हा कथित बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई कोर्ट के फैसले के बाद फिर से उम्मीद के मुताबिक ही कुछ सेक्युलरवादी और कठमुल्ले विरोध जता रहे हैं। अब कह रहे हैं कि कोर्ट का यह फैसला सहीं नहीं है। मतलब इन्हें अपने मन का फैसला सुनने से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है। सीबीआई की विशेष अदालत ने इस केस में अपना फ़ैसला सुनाते हुए सभी 32 अभियुक्तों को समस्त आरोपों से बरी कर दिया है। माननीय जज ने कहा कि इस मामले में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। यह विध्वंस सुनियोजित नहीं था। कुछ अराजक तत्वों ने ढांचे को तोड़ा। इसके साथ ही बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत कुल 32 लोग अब चैन से सो सकेंगे। इन्हें इस मामले में कांग्रेस सरकार द्वारा अभियुक्त बनाया गया था। क्या कोई पूछेगा कि इन सबने 32 सालों तक कितनी मानसिक यंत्रणा झेली? किसकी वजह से ऐसा हुआ? बीते दशकों से कहा जा रहा था कि इनके जहरीले भाषणों के कारण ढांचा तोड़ा गया था। क्या जो लोग इनपर तमाम आरोप लगा रहे थे, अब इनसे माफी मागेंगे? साक्ष्य में तो यह आया कि जब कुछ नवयुवक ढांचे पर चढ़ने लगे तभी से वे माइक पर सबसे नीचे उतरने की अपील कर रहे थेI विशेष सीबीआई जज एसके यादव ने अपने 2300 पन्नों के फैसले में कहा, "बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित नहीं था, यह अचानक हुआ और इसमें किसी भी अभियुक्त का हाथ नहीं था। इसलिए सभी अभियुक्तों को बरी किया जाता है। किसी अभियुक्त के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिला।" पर फैसला आते ही सेक्युलरवादियों और कठमुल्लों ने हंगामा मचाना चालू कर दिया था। देश की न्यायपालिका पर सवाल खड़े करते रहे। सीबीआई कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बजाय ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लीमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी कहने लगे कि "क्या दुनिया ने नहीं देखा कि उमा भारती ने कहा था कि एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो?" क्या यह सबने नहीं देखा था कि जब मंदिर टूट रही थी तो ये नेता मिठाइयां बांट-खा रहे थे? तो क्या पैगाम दे रहे हैं आप इतनी बड़ी हिंसा की घटना पर?" किसने गिराई मेरी मस्जिद? क्या मस्जिद जादू से गिर गई? क्या ताले अपने आप खुल गए और मूर्तियां अपने आप रख गईं?" वे इस प्रकार की बातें कर कोर्ट का खुलकर अनादर करते हैं। मतलब यह कि ओवेसी जैसों को अपने मनमाफिक फैसला चाहिए था। वह नहीं आया तो उन्हें तकलीफ होने लगी। यही है इनका इस्लामिक लोकतंत्र। ओवेसी जी ने कोर्ट का फैसला यदि सही से पढ़ा होता तो वे इस प्रकार चिल्लाने नहीं लगते। माननीय जज ने यह भी कहा कि विश्व हिंदू परिषद् के नेता अशोक सिंघल (अब स्मृति शेष) ढांचे को बचाना चाहते थे, क्योंकि अंदर राम की मूर्तियां थी। कोर्ट की इस राय पर भी सबको ध्यान देना चाहिए। अफसोस कि अशोक सिंघल जैसे संत पुरुष पर भी सेक्युलरवादी और कठमुल्ले लगातार हमले बोलते रहे। तो किसने गिराया ढांचा अब इस पहलू की जांच भी हो जानी चाहिए कि ढांचा गिराने वाले आखिरकार कौन थे। अब कहने वाले कह रहे हैं कि ढांचा कांग्रेस ने ही सुनियोजित ढंग से गिराया ताकि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार को गिरा सकें। क्या वास्तव में इस तरह का कोई षड्यंत्र था? कहा तो यही जा रहा है कि ढांचा कांग्रेस ने गिराया था और भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के नेताओं को आरोपी बना दिया गया। दरअसल अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा टूटा। 5 दिसंबर 1992 को अयोध्या में रात दस बजे बजरंग दल के नेता विनय कटियार के घर पर भोज रखा गया था। भोज के लिए पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और संघ के दूसरे नेता पहुंचे थे। सीबीआई ने अपनी जांच में विनय कटियार का नाम शामिल किया था और उनके ऊपर षड्यंत्र का आरोप लगाया। कोर्ट ने सीबीआई की यह दलील नहीं मानी। विनय कटियार ने बताया कि उनके यहां सिर्फ प्रतीकात्मक कारसेवा को लेकर योजना बनी थी। मस्जिद गिराने जैसी किसी बात पर चर्चा तक नहीं हुई थी। अब भूल जाओ बाबरी को देखिए यह देशहित में होगा कि अब बाबरी मस्जिद को सब भूल जाएं। यह बात औवेसी जैसों के लिए खासतौर पर लागू हो रही है। वे बाबरी मस्जिद के नाम पर मुसलमानों को लगातार उकसाते रहे हैं। इससे पहले अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास क्या हो गया असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड परेशान हो गया। आपको याद होगा कि ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस बेशर्मी से राममंदिर के भूमि पूजन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ज़रिये उसकी आधारशिला रखे जाने पर अनाप-शनाप बोला था, उससे समाज बंटा ही था। ये नहीं चाहते कि भारत प्रगति करे और विश्व गुरु बने। एक बात यह भी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को किसने अधिकार दे दिया कि वह मुसलमानों की ठेकेदारी करे। पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था की राममंदिर के निर्णय को समय बदलने के पश्चात् उसी प्रकार बदल देंगे जैसे तुर्की की हगिया सोफिया मस्जिद के साथ हुआ। यह धमकाने वाला लहजा कभी भी हिन्दू बहुल देश स्वीकार नहीं करेगा। बेशक ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की भाषा 9 नवम्बर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी घोर अपमान करती है। इन्हें प्रधानमंत्री मोदी के अयोध्या जाने पर खासतौर कष्ट था। क्या इन्होंने तब कभी आपत्ति जताई थी जब देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दशकों से इफ्तार पार्टियों का आयोजन करते थे? ये सब नेहरू जी को अपना आदर्श मानते हैं। बहुत अच्छी बात है। उनसे किसी का विरोध नहीं है। पर क्या इन्हें पता है कि वे कुंभ स्नान के लिए जाते थे? वे महत्वपूर्ण विषयों पर ज्योतिषियों की सलाह लेते थेI ओवैसी और दूसरे तमाम कथित सेक्युलरवादी अल्पसंख्यकों के हितों की तो खूब बातें करते हैं। उन्हें उनके अधिकार बिल्कुल मिलने भी चाहिए। पर ये सब कश्मीर में हिन्दू पंडितों के अधिकार देने के मसले पर चुप क्यों हो गए थे। पाकिस्तान अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिखों, इसाइयों पर जो अत्याचार कर रहा है उसपर अबतक चुप्पी क्यों साध रखी हैI औवेसी बता दें कि उन्होंने कब अपने पसमांदा मुसलमानों के हक में कभी कोई आंदोलन किया। अगर जनसंख्या के हिसाब से देखें तो अजलाफ़ (पिछड़े) और अरजाल (दलित) मुसलमान भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी का कम-से-कम 85 फीसद है। पसमांदा आंदोलन, बहुजन आंदोलन की तरह मुसलमानों के पिछड़े और दलित तबकों की नुमाइंदगी करता है और उनके मुद्दों को उठाता है। पर औवेसी जैसे अपने को मुसलमानों का मसीहा बताने वाले ढोंगी नेता कभी पसमांदा मुसलमानों के हक में आवाज बुलंद नहीं करते। औवेसी और उनके जैसे सांकेतिक और जज्बाती मुद्दों जैसे कि बाबरी मस्जिद, उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पर्सनल लॉ इत्यादि को बार-बार उठाते हैं। इन मुद्दों पर गोलबंदी कर अपने पीछे मुसलमानों का हुजूम दिखा कर ये मुसलमानों के नेता बनते हैं, अपना हित साधने के लिए और सत्ता में अपनी जगह पक्की करते हैं। इस तरह के जज्बाती मुद्दों के ज़रिये ये सियासत में आगे बढ़ते रहते हैं मगर मुसलमानों को भी चाहिए कि ऐसे ढोंगी नेताओं से सावधान रहें क्योंकि भारत में रहने वाले मुसलमानों का भी देश तो भारत ही है, पाकिस्तान या अरब नहीं! (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

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Dakhal News 2 October 2020


bhopal, Shastriji never compromised with self-respect

शास्त्री जी की जयंती (02 अक्टूबर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल 2 अक्तूबर 1904 को उत्तर प्रदेश में मुगलसराय में जन्मे भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बचपन से ही इतने मेधावी थे कि हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान प्रायः देरी से पहुंचने के बावजूद सजा के तौर पर कक्षा के बाहर खड़े रहकर ही पूरे नोट्स बना लिया करते थे। दरअसल वे घर से प्रतिदिन अपने सिर पर बस्ता रखकर कई किलोमीटर लंबी गंगा नदी को पार करके स्कूल जाया करते थे। वे गांधी जी के विचारों और जीवनशैली से बहुत प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने एकबार भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की कड़े शब्दों में निंदा की थी। शास्त्री जी उससे इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में ही देश के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने की ठान ली। जब वे सोलह वर्ष के थे, उसी दौरान गांधी जी ने देशवासियों से असहयोग आन्दोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। शास्त्री जी ने उनके इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का ही निर्णय किया। परिजन पढ़ाई-लिखाई छोड़ने के उनके निर्णय के सख्त खिलाफ थे लेकिन शास्त्री जी ने किसी की एक न सुनी और असहयोग आन्दोलन के जरिये देश के स्वतंत्रता संग्राम का अटूट हिस्सा बन गए। स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के बाद उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया और वर्ष 1921 से लेकर 1946 के बीच अलग-अलग समय में नौ वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में बंदी भी रहे। कांग्रेस सरकार के गठन के बाद शास्त्री जी ने देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाई। रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृहमंत्री तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू की बीमारी के दौरान वे बगैर विभाग के मंत्री भी रहे। अपने मंत्रालयों के कामकाज के दौरान भी कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे। 1964 में जब वे देश के प्रधानमंत्री बने, तब भारत बहुत सारी खाद्य वस्तुओं का आयात किया करता था और अनाज के लिए एक योजना के तहत उत्तरी अमेरिका पर ही निर्भर था। 1965 में पाकिस्तान से जंग के दौरान देश में भयंकर सूखा पड़ा। अमेरिका द्वारा उस समय अपने एक कानून के तहत भारत में गेहूं भेजने के लिए कई अघोषित शर्तें लगाई जा रही थी, जिन्हें मानने से शास्त्री जी ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि हम भूखे रह लेंगे लेकिन अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे। उसके बाद उन्होंने आकाशवाणी के जरिये जनता से कम से कम हफ्ते में एकबार खाना न पकाने और उपवास रखने की अपील की। उनकी अपील का देश के लोगों पर जादुई असर हुआ। उन्हीं दिनों को याद करते हुए लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री कहते हैं कि एक दिन पिताजी ने घर के सभी सदस्यों को रात के खाने के समय बुलाकर कहा कि कल से एक हफ्ते तक शाम को चूल्हा नहीं जलेगा। बच्चों को दूध और फल मिलेगा और बड़े उपवास रखेंगे। एक हफ्ते बाद उन्होंने हम सबको फिर बुलाया और कहा कि मैं सिर्फ देखना चाहता था कि यदि मेरा परिवार एक हफ्ते तक एक वक्त का खाना छोड़ सकता है तो मेरा बड़ा परिवार अर्थात् देश भी हफ्ते में कम से कम एकदिन भूखा रह ही सकता है। दरअसल, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि जो कार्य वे दूसरों को करने के लिए कहते थे, उससे कई गुना ज्यादा की अपेक्षा स्वयं से और अपने परिवार से किया करते थे। उनका मानना था कि अगर भूखा रहना है तो परिवार देश से पहले आता है। वे ऐसे इंसान थे, जो खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में खुश और संतुष्ट होते थे। शास्त्री जी का कहना था कि हमारी ताकत और मजबूती के लिए सबसे जरूरी है लोगों में एकता स्थापित करना। वे प्रायः कहा करते थे कि देश की तरक्की के लिए हमें आपस में लड़ने के बजाय गरीबी, बीमारी और अज्ञानता से लड़ना होगा। पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग खत्म करने के लिए वे ताशकंद समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए ताशकंद गए थे। उस समय वे पूर्ण रूप से स्वस्थ थे लेकिन उसके ठीक एकदिन बाद 11 जनवरी 1966 की रात को एकाएक खबर आई कि उनकी हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई है। हालांकि उनकी संदेहास्पद मृत्यु को लेकर आजतक रहस्य बरकरार है। शास्त्री जी को लेकर बहुत से ऐसे किस्से प्रचलित हैं, जो उनकी सादगी, ईमानदारी, देशभक्ति, नेकनीयती और स्वाभिमान को प्रदर्शित करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1940 के दशक में लाला लाजपत राय की संस्था ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ द्वारा गरीब पृष्ठभूमि वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को जीवन-यापन हेतु आर्थिक मदद दी जाती थी। उसी समय की बात है, जब शास्त्री जी जेल में थे। उन्होंने जेल से ही अपनी पत्नी ललिता जी को पत्र लिखकर पूछा कि उन्हें संस्था से पैसे समय पर मिल रहे हैं या नहीं और क्या इतनी राशि परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है? पत्नी ने उत्तर लिखा कि उन्हें प्रतिमाह पचास रुपये मिलते हैं, जिसमें से करीब चालीस रुपये ही खर्च हो पाते हैं, शेष राशि वह बचा लेती हैं। पत्नी का यह जवाब मिलने के बाद शास्त्री जी ने संस्था को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने धन्यवाद देते हुए कहा कि अगली बार से उनके परिवार को केवल चालीस रुपये ही भेजे जाएं और बचे हुए दस रुपये से किसी और जरूरतमंद की मदद कर दी जाए। 1964 में जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ इंपाला शेवरले कार भी मिली थी लेकिन उसका उपयोग वे बहुत ही कम किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। एकबार की बात है, जब शास्त्री जी के बेटे सुनील शास्त्री किसी निजी कार्य के लिए यही सरकारी कार उनसे बगैर पूछे निकालकर ले गए और अपना काम पूरा करने के पश्चात् कार चुपचाप लाकर खड़ी कर दी। जब शास्त्री जी को इस बात का पता चली तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि गाड़ी कितने किलोमीटर चलाई गई? ड्राइवर ने बताया, चौदह किलोमीटर! उसके बाद शास्त्री जी ने उसे निर्देश दिया कि रिकॉर्ड में लिख दो, ‘चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज’। वे इतने से ही शांत नहीं हुए, उन्होंने पत्नी ललिता जी को बुलाया और निर्देश दिया कि निजी कार्य के लिए गाड़ी का इस्तेमाल करने के लिए उनके निजी सचिव से कहकर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैंं।)

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Dakhal News 1 October 2020


bhopal, light of Gandhiji

प्रो. दिनेश सिंह इन दिनों समूचा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है। उससे निपटने की व्यापक कोशिश हो रही है। लेकिन किसी के हाथ कुछ ठोस समाधान लगा नहीं है। इस वजह से उहापोह का माहौल है। तो इस संकट निकलने के लिए अतीत में झांकना होगा और उन महान व्यक्तियों के तौर-तरीकों को अपनाना होगा जो इस तरह के संकट से लड़ चुके हैं। उनसे यह भी सीखना होगा कि भय और अवसाद के माहौल में खुद के मनोबल को कैसे बनाए रखा जाए। इसके लिए महात्मा गांधी से बेहतर कौन हो सकता है। उन्होंने ऐसे संकट को जीया है; साहस, दृढ़ निश्चय और संगठित तरीके से लड़ा है। यह बात तब की है जब गांधी 35 वर्ष के थे। साल 1905 था। दक्षिण अफ्रीका का जोहान्सबर्ग शहर प्लेग महामारी की चपेट में था। इस शहर के एक हिस्से में भारतीयों की आबादी अच्छी-खासी तादाद में थी। कई भारतीय इस बीमारी से ग्रस्त थे। युवा गाधी ने उनकी देखभाल के लिए कमर कस ली थी। यह जानते हुए कि यह संक्रमण उन्हें भी हो सकता है। लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं थे। तब तक एंटी बाॅयोटिक का अविष्कार नहीं हुआ था। इस वजह से प्लेग का इलाज संभव नहीं था। संक्रमण तेजी से फैल रहा था। गांधी बेखौफ संक्रमित लोगों की देखभाल में लगे थे जबकि वह जानते थे कि रोग होने पर बचने की संभावना न के बराबर है। फिर भी वे डटे रहे। उन्होंने स्वयंसेवकों से इस शर्त पर सहयोग लेना स्वीकार किया था कि उनका न तो कोई परिवार है और न ही कोई आश्रित। इस तरह की शर्त वो गांधी रख रहे थे जिनकी पत्नी अभी युवा थी और उनके चार छोटे-छोटे बच्चे भी थे। पूरा परिवार उनपर ही आश्रित था। बीमारी ऐसी थी कि लग जाए तो मरना तय था। ऐसा हो भी चुका था। एक ब्रिटिश महिला जो उनकी सहयोगी थीं, वह संक्रमण के कारण मर चुकी थी। बावजूद इसके गांधी पीछे नहीं हटे। यह उनके अदम्य साहस का नमूना है। यहां एक पत्र का जिक्र। वह पत्र गांधीजी को लिखा गया था। तब वे भारत आ चुके थे। उस पत्र को उन्होंने नवजीवन में छापा में था। उस पत्र में कहा गया था- गांधी की अहिंसा, शहीद भगत सिंह के अनुकरणीय साहसिक कार्यों के बजाए कायरता से उपजी थी। गांधी ने इसका जवाब दिया। लेकिन अपना उदाहरण पेश नहीं किया। उन्होंने लोकमान्य तिलक और गोपाल कृष्ण के साहस और बलिदान का हवाला देते हुए कहा कि भगत सिंह, तिलक और गोखले के साहस और बलिदान की एक-दूसरे से तुलना करना ठीक नहीं है। सबने अपने तरीके से काम किया। गांधीजी ने भी जो जोहान्सबर्ग में किया, वह भी इसी श्रेणी में आता है। वह इसलिए क्योंकि संक्रमित लोगों की जिस तरह वे देखभाल कर रहे थे, उसकी वजह से उनके सीधे संपर्क में थे। लोगों की देखरेख के अलावा, एक और मोर्चा उन्होंने खोल रखा था। वह साफ-सफाई का था। उनकी पूरी कोशिश थी कि भारतीय समुदाय साफ-सफाई को अपना स्वभाव बना ले। गांधीजी की आदत में ही वह शुमार था। इसी वजह से वे साफ-सफाई को बहुत महत्व देते थे। उन्होंने इसके लिए जोहान्सबर्ग नगर निगम को आड़े हाथ लिया था और कहा था कि महामारी फैलाने में इनकी भी भूमिका है क्योंकि नगर निगम ने सफाई पर ध्यान नहीं दिया था। तो इसलिए यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कोविड 19 के इस दौर में अगर गांधी होते तो क्या करते। इस संदर्भ में यह बताना जरूरी है कि स्पेनिश फ्लू के समय में भी महात्मा गांधी थे। लेकिन ऐसा माना जाता है कि वे वायरस से पीड़ित नहीं थे। वास्तव में वे पेट के संक्रमण की वजह से बिस्तर पर थे। उसकी एक वजह प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना में भारतीयों की भर्ती भी थी। इस कारण भी उनका स्वास्थ्य प्रभावित था। उनके दो पोते स्पेनिश फ्लू का शिकार हो चुके थे।  मौजूदा समय में कोविड 19 की वैक्सीन को लेकर वैश्विक स्तर पर जो प्रयास चल रहा है, क्या गांधीजी उसका समर्थन करते? इस सवाल के खड़े होने की दो वजह है। एक- गांधीजी प्राकृतिक चिकित्सा के पैरोकार थे और दूसरा, चेचक की वैक्सीन के विरोधी थे। हालांकि उसके विरोध के लिए उनका जो तर्क था, वह बहुत तार्किक था। वे कहते थे कि चेचक का वैक्सीन तैयार करने के लिए गाय के साथ जिस तरह की क्रूरता की जा रही है, वह अमानवीय है। उनका कहना था कि वैक्सीन बनाने का तरीका हिंसक है और वह गाय के मांस खाने जैसा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि वे वैक्सीन के विरोधी थे। वर्धा में उन्होंने सेवाग्राम के बाशिंदों को हैजा का टीका लगवाने के लिए कहा था। उसकी एक वजह तो यह थी कि वह चेचक के टीके की तरह तैयार नहीं किया जाता था। इसके बनाने की विधि के कारण ही गांधीजी के अनुयायी मोराजी देसाई ने कभी चेचक का टीका नहीं लगवाया। जब वे प्रधानमंत्री बने तो ब्रिटेन जैसे देशों ने उनके लिए विशेष व्यवस्था की। ब्रिटेन उन देशों में शुमार था जहां का वीसा हासिल करने के लिए चेचक का टीका लगवाना एक शर्त थी। वैसे आज गांधीजी होते तो वे चेचक के टीके का विरोध नहीं करते क्योंकि मौजूदा समय में उसके उत्पादन का तरीका बदल गया है। मेरा मानना है कि वे कोरोना वैक्सीन के उत्पादन को लेकर चल रहे प्रयास का भी विरोध नहीं करते। मौजूदा संकट को देखते हुए कुछ और बातें भी गांधीजी से सीखी जा सकती है। यह बात 1932 की है। गुजरात प्लेग की चपेट में था। बोरसद तालुका सबसे ज्यादा प्रभावित था। सरदार पटेल ने वहां मोर्चा संभाल रखा था। बाद में गांधीजी भी आ गए। घर-घर जाकर लोगों से बात की। उन्हें स्वच्छता का महत्व समझाया और वहां के लोगों को महामारी से उबारा। उससे हमें आज सीखने की जरूरत है। एक और बात जो इस आपदा के दौर में हुई है, वह अर्थव्यवस्था का चरमराना है। उन लाखों करोड़ों प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा है जिनके हाथ में काम नहीं है। ऐसे दौर में गांधीजी क्या करते? वह इससे निपटने के लिए बहुत व्यवहारिक तरीका चुनते। पहले तो वे उस माध्यम को अपनाते जिसके जरिए शहरों से भाग रहे करोड़ों श्रमिक सकुशल और सुरक्षित गांव पहुंच सकें। फिर उनके स्वरोजगार की व्यवस्था करते। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इरविन शूमाकर ने अपनी किताब 'स्माल इज ब्यूटीफुल' में जिस अर्यव्यवस्था का विचार रखा है, यदि भारत उसे अपनाता तो उसे प्रवासी संकट से नहीं गुजरना पड़ता। मेरा मानना है कि अर्थव्यवस्था को लेकर गांधीजी के जो विचार हैं, उसे शूमाकर ने बेहतर तरीके से उकेरा है। गांव बदल चुके हैं। इसी वजह से ग्रामीण, रोजगार के लिए अपने गांव से इतना दूर निकल आए हैं। अगर उनको गांव में काम मिल जाता वे इतना दूर क्यों जाते? गांधीजी की हमेशा यही सोच रही कि गांव स्वावलंबी हो। वे कोशिश भी करते रहे। चरखा उसी स्वालंबन का बिम्ब है। इसलिए गांधीजी उसपर जोर देते थे। उन्होंने ही चरखे का मर्म समझाया। वे कहते थे कताई करना ध्यान और पूजा है। वे यह भी कहते थे कि कताई चरित्र का भी निर्माण करती है। निःसंदेह भारत की भूखी लाखों जनता के लिए यह आर्थिक सशक्तीकरण के साथ स्वाभिमान का भी जरिया है। मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री थे तब भी वे रोज चरखा से सूत कातते थे। हालांकि मैं यह मानता था कि गांधीजी मशीनों से डरते हैं इसलिए चरखे का महिमामंडन करते हैं। वह मेरी बात पर हंसते और कहते- जबतक तुम खुद चरखा नहीं चलाओगे तबतक इसकी ताकत को नहीं समझोगे। सालों बाद, मैं समझ पाया कि मोरारजी भाई कितने सही थे। जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में चरखा लेकर आया तब मुझे इसकी ताकत का अंदाजा लगा। जल्द ही छात्रों पर इसके सकारात्मक प्रभाव दिखने लगे जो अविश्वसनीय थे। कई लोगों ने बताया कि चरखे की वजह से उनका अवसाद दूर हो गया और माइग्रेन की समस्या खत्म हो गई। जाहिर है महामारी के इस अंधकार में जब डर और अवसाद लोगों में घर कर चुका है और रोजगार छिन चुका है तब महात्मा गांधी के ही तरीकों को अपनाना होगा। लेकिन हमें याद रखना होगा कि वे टीके के विरोधी नहीं थे बल्कि वे चाहते थे कि गांव के लोग खुद कुछ सोचें और एक आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली विकसित करें जिसमें चरखा और अन्य चीजें उत्प्रेरक का काम करे। उन्होंने एक गांव में चरखे के जरिए सूत कातने का फायदा बताते हुए कहा -'यदि आपने चरखे पर सूत कातना शुरू कर दिया तो मैं आपको वचन देता हूं कि औद्योगिकीकरण नियत समय में होगा'। कोरोना के इस दौर में गांधीजी भारतीय गांव के लिए उम्मीदों का प्रतीक हैं। (लेखक दिल्ली विवि के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 1 October 2020


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डॉ. मोक्षराज   स्वतंत्रता से बड़ा कोई सुख नहीं और पराधीनता से बड़ा कोई दु:ख नहीं। भारत लगभग 800 वर्ष से अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं प्राकृतिक विरासत व संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करता हुआ आजादी के लिए छटपटा रहा था। भारतीय जनमानस के महान गुण अर्थात् दयालुता, सहिष्णुता, क्षमा, अहिंसा और उदारतापूर्वक अतिथि सत्कार का धर्म निभाना उसके लिए अभिशाप बन चुका था। भारत की धर्मभीरु एवं भोली जनता पर तनिक से बल और छल प्रयोग से शासन करना आसान हो गया था। यद्यपि ऐसा नहीं था कि इन आठ सौ वर्षों में भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष नहीं हुए थे, किन्तु छह सौ से अधिक छोटे-बड़े राज्यों की सीमाओं में आत्ममुग्ध देशी राजाओं की द्वेष भावना व फूट ने बाहर की ताक़तों को भारत पर शासन करने का बड़ा अवसर प्रदान किया। भारतीय जनमानस पराधीनता को अपना भाग्य मान बैठा था।   1857 की क्रान्ति के पश्चात् कुछ विचारवान लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जबतक संपूर्ण भारत में पराधीनता के विरुद्ध एक स्वर में शंखनाद नहीं किया जाएगा तबतक भारत को स्वतंत्र कराना असंभव है। तब उक्त क्रान्ति में सक्रिय रहे तथा उसकी विफलता व भावी सफलता का गहन चिंतन करने वाले गुरु स्वामी विरजानन्द दंडी ने उन्हीं की भाँति 1857 की क्रान्ति में हिस्सा ले चुके तथा क्रान्ति की विफलता की अग्नि से जल रहे युवा संन्यासी स्वामी दयानंद सरस्वती को अपना शिष्य बनाया। उन्हीं महा तेजस्वी योगी दयानंद द्वारा सन् 1875 में स्थापित आर्यसमाज स्वतंत्रता के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ। जिसने सम्पूर्ण भारत की रियासतों तथा विशेष रूप से आज जिन्हें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात व बंगाल का क्षेत्र कहते हैं वहाँ के प्रमुख क्षेत्रों में रहने वाले देशी राजाओं में स्वतंत्रता की संजीवनी जागृत की। लाहौर क्रान्तिकारियों का प्रमुख केन्द्र रहा। लाहौर डीएवी कॉलेज व लाहोर आर्यसमाज के द्वारा स्वामी श्रद्धानंद, भाई परमानन्द, लाला लाजपत राय, गुरुदत्त विद्यार्थी, पंडित लेखराम तथा सरदार भगत सिंह के परिवार की तीन पीढ़ियाँ भी आज़ादी के संग्राम में कूद पड़ी थी। इसके अलावा रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, अशफाक उल्ला खाँ जैसे हजारों क्रांतिकारी इसके प्रभाव व आश्रय से पैदा होकर गरम दल और नरम दल का नेतृत्व कर रहे थे।   वहीं स्वामी श्रद्धानन्द ने सक्रिय क्रान्ति एवं गुरुकुल परंपरा के साथ-साथ शुद्धि आंदोलन द्वारा धर्मांतरण पर लगाम कसनी आरंभ कर दी थी। आर्यसमाज क्योंकि आरंभ से ही स्वराज्य व स्वदेशी स्वाभिमान के साथ काम कर रहा था अतः कालांतर में महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार में उन विचारों को सम्मिलित किया। स्वामी श्रद्धानंद जिनका पूर्व नाम महात्मा मुंशीराम था, उन्होंने शुद्धि आंदोलन के साथ-साथ अनेक राजनैतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। रोलेट एक्ट के विरुद्ध चाँदनी चौक दिल्ली में अंग्रेजों की संगीनों के सम्मुख छाती तानकर यह कहने वाले कि "हिम्मत हो तो चलाओ गोली", तत्कालीन सर्वोच्च धार्मिक एवं क्रांतिकारी नेता थे। जलियाँवाला बाग की क्रूरतम घटना के बाद जब कॉंग्रेस अमृतसर में सम्मेलन का साहस नहीं कर पा रही थी तब भी उस सम्मेलन का जिम्मा अपने हाथ में लेकर वे स्वागताध्यक्ष बने और सम्मेलन आयोजित हुआ। स्वामी श्रद्धानंद काँगड़ी गुरुकुल के माध्यम से आर्यसमाजियों एवं गांधीजी की दक्षिणी अफ्रीका में भी आर्थिक एवं मानव संसाधन द्वारा सहायता करते थे। उस काल में उनके गुरुकुल में आने वाले ईसाई या मुस्लिम भी स्वामी जी के साथ एक ही पंगत में बैठकर भोजन करते थे अर्थात् मानवता के नाते उनमें किसी के प्रति ईर्ष्या या द्रोह नहीं था, किन्तु धर्मांतरण के विषय में वे बेबाक थे। उनका कहना था कि यदि मुसलमान या ईसाई धर्मांतरण बंद नहीं करेंगे तो हम भी शुद्धि आंदोलन बंद नहीं कर सकते। उनके इस स्पष्ट विचार से मोहनदास करमचंद गांधीजी को आपत्ति थी, किन्तु उस काल में भारतीय जनमानस में स्वामी श्रद्धानंद का कद शीर्ष पर था और वे अपने सत्याग्रह में किसी की परवाह नहीं करते थे। किन्तु कुछ "दुष्ट कभी दुष्टता नहीं छोड़ते" यह कहावत है, अतः यही हुआ, 23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद नाम के एक धर्मांध व्यक्ति ने रुग्ण अवस्था में लेटे हुए 70 वर्षीय स्वामी श्रद्धानंद के सीने पर गोलियाँ दाग दी।   स्वामी श्रद्धानंद की मृत्यु के बाद साइमन कमीशन का विरोध कर रहे आर्यसमाजी नेता लाला लाजपत राय को भी अंग्रेजों की लाठियों के हिंसक प्रहार ने 1928 में बलिदानी बना दिया। 1938 में डीएवी कॉलेज के संस्थापक एवं आर्यसमाजी नेता महात्मा हंसराज की मृत्यु हो गई। इसके उपरांत हजारों क्रांतिकारियों ने महात्मा गांधी का नेतृत्व स्वीकार किया। अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े रहे अनेक क्रांतिकारियों के कुछ वंशज अमेरिका में भी निवास करते हैं, जिनमें से तीन लोगों के अनुभव उल्लिखित हैं।   इनमें 86 वर्षीय ओमप्रकाश आर्य जो मैरिलैंड में रहते हैं, उनका कहना है कि मेरे पिता सन् 1890 में पेशावर में पैदा हुए थे। वे स्थानीय आर्यसमाज के प्रधान रहे तथा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। वह स्वयं तो स्वतंत्रता सेनानी थे ही उनका तत्कालीन प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे लाला लाजपत राय आदि से गहरा परिचय था। हमारे पिताजी श्री लालचंद आर्य ने जहाँ स्वामी श्रद्धानंद द्वारा संचालित "शुद्धि आंदोलन" में सक्रियतापूर्वक भाग लिया वहीं महात्मा गांधीजी के "अंग्रेजो भारत छोड़ो" तथा "विदेशी वस्तु बहिष्कार अभियान" तथा "सविनय अवज्ञा आंदोलन" में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी का भी त्याग कर दिया तथा 1944 में हमारी बहन के विवाह में जो दहेज दिया उसमें भी विदेशी वस्तुएँ नहीं थीं। पिताजी ने विदेश की बनी साइकिल का भी त्याग कर दिया था और वे काम पर पैदल जाने लगे थे। उन्होंने अपने विदेशी कोट-पैंट के साथ बहुत ज़रूरी चीज़ें भी त्याग दी थीं । जब भी गांधीजी जेल में जाते थे तब वे खाट पर नहीं सोते थे बल्कि जमीन पर सोते थे। जब उन्हें पता चला कि चीनी अंग्रेजी मिल में बनती है तो उन्होंने चीनी खाना बंद कर दिया व गुड़ ही खाते थे। पिताजी स्वयं भी खादी पहनते व हम सब भाई-बहिनों को खादी के वस्त्र ही पहनाते थे। वह खादी अंग्रेजी मिल की बनी नहीं होती थी। मेरे पिताजी का 1970 में देहान्त हुआ, वे नित्य हवन संध्या करते थे। अमेरिका में रहते हुए भी मैं व मेरा भाई वीरेंद्र आर्य आज भी नित्य संध्या करते हैं तथा साप्ताहिक हवन भी अवश्य करते हैं।   वर्जीनिया में रहने वाली 87 वर्षीया उमा गुप्ता बताती हैं कि उनके पिता बद्री प्रसाद गुप्ता एक सच्चे देशभक्त व कर्मशील आर्य समाजी क्रान्तिकारी थे। उनका जन्म अलीगढ़ जिले के बली गाँव में हुआ था। वे दक्षिण अफ़्रीका में काम करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी भाई परमानंद तथा महात्मा हंसराज के संपर्क में भी रहे। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा चलाए गए शुद्धि आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया जिसके कारण वे अधिकांश समय प्रवास पर रहते थे। वे चार माह तक महात्मा गांधीजी के साथ जेल में रहे। आर्य समाज बेमेल विवाह, बाल विवाह जैसी कुरीतियों को दूर करने में लगा था, अतः आर्य समाज के विद्वानों को समाज में प्रेरणा के लिए कुछ उदाहरण भी प्रस्तुत करने होते थे। अतः उन्होंने मेरा विवाह 20 वर्ष की आयु में एक प्रतिष्ठित आर्य समाजी ब्राह्मण परिवार में कराया। मेरे पिताजी ने खेतों में एक विशाल यज्ञशाला बनवाई जिसमें 150 से अधिक लोग हवन-सत्संग कर सकते थे। मैंने अपने पिता से प्रभावित होकर नारी शिक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु दिल्ली में रहते हुए कन्याओं की शिक्षा के लिए 4 विद्यालय खोले। हम आज भी नित्य वैदिक संध्या तथा साप्ताहिक हवन करते हैं। मेरी पाँचों पुत्रियाँ अमेरिका में हैं, जिन्होंने जातीय बंधन तोड़कर विवाह किए हैं। वे सभी हवन संध्या करती हैं। मुझे अपने यशस्वी पिता पर अभिमान है।   वर्जीनिया में रहने वाले 90 वर्षीय राजेंद्र शर्मा बताते हैं कि उनके पिता पंडित सुरेन्द्र शर्मा गौड़ काव्यतीर्थ का जन्म मथुरा में हुआ था। बाद में हम दिल्ली रहने लगे। मेरे पिता पंडित सुरेन्द्र शर्मा शास्त्रार्थ महारथी भी थे जिन्होंने स्त्री शिक्षा, धार्मिक शुद्धि संस्कार तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में पूरी निष्ठा से भाग लिया। गोरी सरकार ने उन्हें देश निकाला देकर तड़ीपार का आदेश दिया जिसके कारण वे सन् 1929 से 1931 तक बर्मा में निष्कासित रहे। वहाँ उन्होंने कई आर्यसमाजों की स्थापना की व कन्या पाठशालाएँ आरंभ कीं तथा बर्मा में भी क्रांति का शंखनाद किया। पिताजी ने सन् 1937 में गुरुकुल पोठोहार, जो रावलपिंडी से कई मील की दूरी पर स्थित है, स्थापित किया व वहाँ एक गुफा में रहकर योगाभ्यास करते थे। सन् 1944 से 1947 के बीच गुरुकुल मलीर, कराची में स्थापित किया। नारी कल्याण के क्रम में उन्होंने जहां स्त्री शिक्षा के लिए व्यवस्था की, वहीं विधवा पुनर्विवाह एवं विधवाओं के पुनर्वास के लिए भी काम किये। सन् 1942 में महात्मा गांधी ने आदेश दिया था- 'करो या मरो' तथा 'विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करो।' तब मेरे पिताजी ने संपूर्ण भारत में जनजागृति के लिए भ्रमण किया। वे अपने पास निजी धन की गिन्नियाँ रखते थे, तब उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के क्रम में ब्रिटेन में बनी गिन्नियों का भी त्याग कर दिया तथा 1942 से मृत्यु पर्यन्त अर्थात् 1987 तक 45 वर्षों में कभी भी विदेश की बनी गिन्नियों को हाथ नहीं लगाया। मेरे पिताजी की वेदों और हवन में बहुत श्रद्धा थी, इसलिए उन्होंने यजुर्वेद के 65 बार, अथर्ववेद के 18 बार, सामवेद के 17 बार और ऋग्वेद के 16 बार अर्थात् कुल 116 बार चारों वेदों से महायज्ञ कराए। वे शास्त्रार्थ में भी अग्रणी रहा करते थे तथा आर्यसमाज कलकत्ता, दिल्ली, मथुरा, साधु आश्रम अलीगढ़ व हरिद्वार आदि से जुड़े रहे। उनके मित्र व सहयोगी साथियों में स्वामी श्रद्धानंद, पंडित इन्द्र विद्यावाचस्पति, नारायण स्वामी, पंडित लेखराम, रामचंद्र देहलवी, पंडित चमूपति, पंडित गणपति शर्मा, धुरेन्द्र शास्त्री, पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार, पंडित गंगाप्रसाद, करपात्रीजी महाराज, डॉक्टर युधवीर सिंह और बैरिस्टर आसफ़ अली आदि से उनकी विशेष घनिष्ठता थी। हमें अपने पिता के इन महान कार्यों पर अत्यंत गर्व अनुभव होता है। आज भारत स्वतंत्र व शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में बढ़ रहा है यह हमारे लिए परम संतोष का विषय है।     (लेखक, वॉशिंगटन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)

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Dakhal News 1 October 2020


bhopal,Gandhiji

गांधी जयंती (2 अक्तूबर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल देश के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अविस्मरणीय योगदान से पूरी दुनिया सुपरिचित है। वे जीवन पर्यन्त देशवासियों के लिए आदर्श नायक बने रहे। अहिंसा की राह पर चलते हुए देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने वाले गांधीजी ने पूरी दुनिया को अपने विचारों से प्रभावित किया। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर कई किताबें लिखी, जो हमें आज भी जीवन की नई राह दिखाती हैं क्योंकि उनके अनुभव, उनके विचार आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने उस दौर में थे। उनके जीवन के तीन महत्वपूर्ण सूत्र थे, जिनमें पहला था सामाजिक गंदगी दूर करने के लिए झाडू का सहारा। दूसरा, जाति-पाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सामूहिक प्रार्थना को बल देना। तीसरा, चरखा, जो आगे चलकर आत्मनिर्भरता और एकता का प्रतीक माना गया। गांधीजी अक्सर कहा करते थे कि प्रसन्नता ही एकमात्र ऐसा इत्र है, जिसे आप दूसरों पर डालते हैं तो उसकी कुछ बूंदें आप पर भी गिरती हैं। वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं बल्कि उसके चरित्र से होती है। दूसरों की तरक्की में बाधा बनने वालों और नकारात्मक सोच वालों में सकारात्मकता का बीजारोपण करने के उद्देश्य से ही उन्होंने कहा था कि आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी। लोगों को समय की महत्ता और समय के सदुपयोग के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति समय को बचाते हैं, वे धन को भी बचाते हैं और इस प्रकार बचाया गया धन भी कमाए गए धन के समान ही महत्वपूर्ण है। वह कहते थे कि आप जो कुछ भी कार्य करते हैं, वह भले ही कम महत्वपूर्ण हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप कुछ करें। लोगों को जीवन में हर दिन, हर पल कुछ न कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित करते हुए गांधीजी कहा करते थे कि आप ऐसे जिएं, जैसे आपको कल मरना है लेकिन सीखें ऐसे कि आपको हमेशा जीवित रहना है। महात्मा गांधी के विचारों में ऐसी शक्ति थी कि विरोधी भी उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रहते थे। ऐसे कई किस्से सामने आते हैं, जिससे उनकी ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और शिष्टता की स्पष्ट झलक मिलती है। एकबार महात्मा गांधी श्रीमती सरोजिनी नायडू के साथ बैडमिंटन खेल रहे थे। श्रीमती नायडू के दाएं हाथ में चोट लगी थी। यह देखकर गांधीजी ने भी अपने बाएं हाथ में ही रैकेट पकड़ लिया। श्रीमती नायडू का ध्यान जब इस ओर गया तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी, ‘‘आपको तो यह भी नहीं पता कि रैकेट कौन-से हाथ में पकड़ा जाता है?’’ इसपर बापू ने जवाब दिया, ‘‘आपने भी तो अपने दाएं हाथ में चोट लगी होने के कारण बाएं हाथ में रैकेट पकड़ा हुआ है और मैं किसी की भी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहता। अगर आप मजबूरी के कारण दाएं हाथ से रैकेट पकड़कर नहीं खेल सकती तो मैं अपने दाएं हाथ का फायदा क्यों उठाऊं?’’ एकबार गांधीजी जैतपुर में हरिजनों तथा मेमन जाति के मोहल्ले में आयोजित सभा में भाषण दे रहे थे। मेमन जाति कठियावाड़ी मुसलमानों की एक विशेष जाति होती है। इस जाति के लड़के उन दिनों बिगड़े हुए व शरारती किस्म के हुआ करते थे। जैसे ही गांधीजी ने अपना भाषण शुरू किया, उसी समय एक 10-12 वर्ष का लड़का भी सभास्थल पर पहुंचा और लोगों को धक्के देता हुआ मुंह में बीड़ी लगाए सबसे आगे जा पहुंचा। बीड़ी का धुआं छोड़ते हुए अशिष्टतापूर्ण नजरों से वह गांधीजी की ओर देखने लगा। गांधीजी की नजर उस लड़के पर पड़ी तो उन्होंने अपना भाषण बीच में ही रोककर उस लड़के की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे, देखो इतना छोटा-सा लड़का बीड़ी पी रहा है। अरे फेंक दे भाई, बीड़ी को फेंक दे।’’ गांधीजी के इतने सरल शब्दों का उस लड़के पर जादुई असर हुआ। उसने तुरंत बीड़ी मुंह से निकालकर फेंक दी तथा श्रोताओं के बीच शिष्टता से बैठकर बड़े ध्यान से गांधीजी का भाषण सुनने लगा। महात्मा गांधी एकबार चम्पारण से बेतिया रेलगाड़ी में सफर कर रहे थे। गाड़ी में अधिक भीड़ न होने के कारण वे तीसरे दर्जे के डिब्बे में जाकर एक बर्थ पर लेट गए। अगले स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रूकी तो एक किसान उस डिब्बे में चढ़ा। उसने बर्थ पर लेटे हुए गांधीजी को अपशब्द बोलते हुए कहा, ‘‘यहां से खड़े हो जाओ। बर्थ पर ऐसे पसरे पड़े हो, जैसे यह रेलगाड़ी तुम्हारे बाप की है।’’ गांधी जी किसान को बिना कुछ कहे चुपचाप उठकर एक ओर बैठ गए। तभी किसान बर्थ पर आराम से बैठते हुए मस्ती में गाने लगा, ‘‘धन-धन गांधीजी महाराज! दुःखियों का दुःख मिटाने वाले गांधीजी।’ रोचक बात यह थी कि वह किसान कहीं और नहीं बल्कि बेतिया में गांधीजी के दर्शन के लिए ही जा रहा था लेकिन इससे पहले उसने गांधीजी को कभी देखा नहीं था, इसलिए रेलगाड़ी में उन्हें पहचान न सका। बेतिया पहुंचने पर स्टेशन पर जब हजारों लोगों की भीड़ ने गांधीजी का स्वागत किया, तब उस किसान को वास्तविकता का अहसास हुआ और शर्म के मारे उसकी नजरें झुक गई। वह गांधीजी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगा। गांधीजी ने उसे उठाकर प्रेमपूर्वक गले से लगा लिया। एक अन्य किस्सा उन दिनों का है, जब गांधीजी सश्रम कारावास की सजा भुगत रहे थे। एकदिन जब उनके हिस्से का सारा काम समाप्त हो गया तो वे खाली समय में एक ओर बैठकर पुस्तक पढ़ने लगे। तभी जेल का एक संतरी दौड़ा-दौड़ा उनके पास आया और उनसे कहने लगा कि जेलर साहब जेल का मुआयना करने इसी ओर आ रहे हैं, इसलिए उनको दिखाने के लिए कुछ न कुछ काम करते रहें लेकिन गांधीजी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और कहा, ‘‘इससे तो बेहतर होगा कि मुझे ऐसे स्थान पर काम करने के लिए भेजा जाए, जहां इतना अधिक काम हो कि उसे समय से पहले पूरा किया ही न जा सके।’’ जिस समय द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ, उस समय हमारे देश के अधिकांश नेता इस बात के पक्षधर थे कि अब देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का बिल्कुल सही मौका है और इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें इस समय देश में बड़े पैमाने पर आन्दोलन छेड़ देना चाहिए। दरअसल उन सभी का मानना था कि अंग्रेज सरकार द्वितीय विश्वयुद्ध में व्यस्त रहने के कारण भारतवासियों के आन्दोलन का सामना नहीं कर पाएगी और आखिरकार उसे उनके इस राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के समक्ष सिर झुकाना पड़ेगा। इस प्रकार अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करने पर बड़ी आसानी से विवश किया जा सकेगा। जब यही बात गांधीजी के सामने उठाई गई तो उन्होंने अंग्रेजों की मजबूरी से फायदा उठाने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि उस दौरान अंग्रेजों के खिलाफ गांधीजी ने आन्दोलन जरूर चलाया लेकिन उनका वह आन्दोलन सामूहिक न होकर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया आन्दोलन ही था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 September 2020


bhopal,Gandhi and Village Swaraj

डॉ. नाज़ परवीन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज का सपना, श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त भारत की समृद्धि एवं विकास की प्रबल संभावनाओं से भरा था। ग्राम स्वराज अर्थात ’आत्मबल का होना।’ गांधी का मानना था कि गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज की स्थापना होगी। जिसके लिए उन्होंने सन् 1909 में ’हिन्द स्वराज’ में समृद्ध समाज की परिकल्पना तैयार की थी। जिसका सीधा सम्बन्ध भारत के सात लाख गांवों के विकास से जुडा था। 10 नवम्बर 1946 के ’हरिजन सेवक’ के अंक में गांधीजी लिखते हैं कि ’गांव वालों में ऐसी कला और कारीगरी का विकास होना चाहिए, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत मिल सके। जब गांवों का पूरा विकास हो जाएगा तो गांव वालों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरूषों की गांवों में कमी नहीं रहेगी। गांव में कवि होंगे, चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पण्डित और शोध करने वाले लोग भी होंगे। तब जिन्दगी की ऐसी कोई चीज न होगी जो गांव में न मिले। आज हमारे गांव उजड़े हुए और कूड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं। कल वही सुंदर बगीचे होंगे और ग्रामवासियों को ठगना या उनका शोषण करना असम्भव हो जाएगा।’ गांधी की सत्यनिष्ठा समाज के उपेक्षित, शोषित तथा समाज के उस अन्तिम वंचित व्यक्ति से थी जो सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा था। उसमें महिलाऐं, बच्चे, बूढ़े भी शामिल थे। जिनके लिए उनका स्नेह, आत्मीयता, मानवीय गुणों से लबालब थी। वे ग्रामीण भारत की समस्याओं को कभी नज़रअंदाज नहीं करते थे, इसलिए जीवन भर ग्रामीण भारत की समृद्धि की वकालत करते रहे। ग्रामीण एवं शहरी असमानता को देख गांधी चिंतित थे। उनका मानना था कि भारत की संस्कृति ग्रामीण संस्कृति है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का द्वार हमारे गांवों से ही खुल सकता है। उनका कहना था कि जबतक हम अपने गांवों में गरीबी से त्रस्त लोगों की स्थिति में परिवर्तन नहीं लाएंगे, तब तक भारत की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होगा और न इसकी प्रगति का सपना पूरा हो सकता है। महात्मा गांधी ने ग्रामीण विकास की आधारशिला चरखा व करघा, ग्रामीण व कुटीर उद्योग, सहकारी खेती, ग्राम पंचायतों व सहकारी संस्थाओं, राजनीति व आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण, अस्पृश्यता निवारण, मद्य निषेध, बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा तैयार करके रखी। गांधी का चरखा व करघा एवं ग्रामीण कुटीर उद्योग, बेरोजगारी की समस्या का हथियार बने। आजादी की लड़ाई में चरखा आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों की पहचान बना। गांधी जी ने औद्योगिकीकरण का विरोध किया क्योंकि वे बेरोजगारी की समस्या का निदान स्वावलम्बन में मानते थे। उनका कहना था कि ’हमें इस बात पर शक्ति केन्द्रित करनी होगी कि गांव स्वावलम्बी बनें और अपने उपयोग के लिए माल स्वयं तैयार करें। अगर कुटीर उद्योग का यह स्वरूप कायम रखा जाए तो ग्रामीणों को आधुनिक यंत्रों और औजारों को काम में लेने के बारे में मेरा कोई ऐतराज नहीं।’ वे यंत्रों के विरोधी नहीं थे, अपितु उनके पागलपन का विरोध करते थे। 2 अगस्त 1942 के ’हरिजन सेवक’ में गांधीजी लिखते हैं कि ’ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा। फिर भी बहुत-सी दूसरी जरूरतों के लिए जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा, वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस प्रकार हर एक गांव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिए जिसमें ढोर चर सकें और गांव के बड़ों व बच्चों के लिए मन बहलाव के साधन और खेलकूद के मैदान वगैरह का बंदोबस्त हो सके। हर एक गांव में गांव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा भवन रहेगा। पानी के लिए उसका अपना अलग इन्तजाम होगा जिससे गांव के सभी लोग शुद्ध पानी प्राप्त कर सकें। बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी, जहां तक सम्भव हो सकेगा।’ गांधीजी का सपना ऐसे ग्राम स्वराज का था जो भाषा, जाति और धर्म की संकीर्ण भावनाओं से परे हो। वे ऐसे आदर्श समाज की कल्पना करते थे जिसमें हर आंख से आंसू मिटाए जा सकें। कोरोना संकट के इस दौर में जहां दुनिया के बाजार और रोजगार ठप्प हो गए थे, गांधी के उसी ग्राम स्वराज के सपने ने बहुत से लोगों की आर्थिकी को संभाले रखा। दुनियाभर के देशों में जहां मास्क की कमी देखी गई, हमारे भारत में घरों में छोटे-मोटे रोजगार के तौर पर आपदा को अवसर में बदलने के कई उदाहरण पेश किए। जिनमें हाथों से मास्क बनाना, उनमें तरह-तरह की पेन्टिग करके डिजाइनर मास्क तैयार करना शामिल था। जिसने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ग्राम स्वावलम्बन के सपनों को पुनर्जीवित करने का काम किया। (लेखिका, अधिवक्ता हैं।)

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Dakhal News 30 September 2020


bhopal,Will Malaysia be friends, send Naik to India?

आर.के. सिन्हा मोहातिर मोहम्मद के मलेशिया के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद ऐसा लगने लगा है कि मलेशिया अब सीधी पटरी पर आ गया है। या यूँ कहें कि पहले से ज्यादा व्यावहारिक हो गया है। उसने खुलकर भारत विरोध अब लगभग बंद कर दिया है। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन ज्यादा समझदार लगते हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में दिए अपने भाषण में शायद सोच-समझकर मोहातिर से अलग रुख अपनाते हुए कोई भारत विरोधी बात नहीं की। उनके भाषण का मुख्य फोकस कोविड-19 से दुनिया किस तरह से लड़े, इसी पर रहा जो सकारात्मक सोच का संकेत है। मोहिउद्दीन यासीन के पूर्ववर्ती मोहातिर मोहम्मद हर जगह भारत के खिलाफ जहर उगलने से बाज नहीं आते थे। मोहातिर ने जिस तरह कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर बयान दिये थे, वे शर्मनाक थे। उसका भारत ने विरोध भी दर्ज कराया था। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कश्मीर और सीएए उसके सर्वथा आंतरिक मसले हैं और इनपर बोलने का मोहातिर मोहम्मद को कोई अधिकार नहीं। मोहातिर मोहम्मद ढोंगी धर्मगुरू जाकिर नाईक को भी खुला संरक्षण देते थे। अब उसकी भी भारत वापसी हो सकती है ताकि उसपर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा सके। मोहातिर मोहम्मद एक के बाद एक भारत के खिलाफ बयानबाजी कर यही साबित कर रहे थे कि वे सामान्य मानसिक स्थिति में नहीं हैं। यह बात वैसे किसी को अबतक समझ नहीं आई कि आखिर मोहातिर मोहम्मद, जाकिर नाइक को भारत भेजने में आनाकानी करने से लेकर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने और नागरिकता संशोधन क़ानून पर भारत के खिलाफ अनावश्यक और अनाधिकृत गलत बयानबाजी क्यों करते जा रहे थे। किसकी सलाह पर वे ऐसा कर रहे थे। मोहातिर मोहम्मद ने नागरिकता संशोधन क़ानून की ज़रूरत पर सवाल उठाते हुए कहा था "जब भारत में सब लोग 70 साल से साथ रहते आए हैं, तो इस क़ानून की आवश्यकता ही क्या थी।" उन्होंने यहाँ तक कहा, "लोग इस क़ानून के कारण अपनी जान गँवा रहे हैं।" जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन का संयुक्त राष्ट्र में भाषण बेहद नपा-तुला रहा। वे बड़े परिपक्व नेता के रूप में बोले। किसी देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से यही अपेक्षा रहती है कि वह संयुक्त राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण मंच का सकारात्मक सदुपयोग करे। इसी साल मार्च में मोहिउद्दीन मलेशिया के प्रधानमंत्री बने थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उन्होंने भारत को किसी भी तरह से नाराज करने वाली हरकत नहीं की है। वे एक तरह से डैमेज कंट्रोल में लगे हुए हैं, ताकि उनके देश के भारत के साथ संबंध पहले की तरह सामान्य हो जाएं। मोहातिर मोहम्मद को तब भी बहुत तकलीफ हुई थी जब कश्मीर से धारा 370 ख़त्म कर दी गई थी। तब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में कहा था कि भारत ने कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर रखा है। जब भी भारत अपने किसी भाग को लेकर कोई अहम फैसला लेता था, परेशान मोहातिर मोहम्मद हो जाते थे। वे आंखें मूंदकर पाकिस्तान के साथ बिना सोचे-समझे खड़े दिखाई देते थे। वे इमरान खान के खासमखास मित्र के रूप में उभरे। पर पाकिस्तान में जब शिया मुसलमानों से लेकर अहमदिया और कादियां समाज के साथ हिन्दू, सिख और ईसाईयों का उत्पीड़न होता था तब उनकी जुबान सिल जाती थी। मलेशिया के भारतवंशियों को धमकी मोहातिर मोहम्मद कह रहे थे, "मैं यह देखकर दुखी हूँ कि जो भारत अपने को सेक्युलर देश होने का दावा करता है, वो कुछ मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए क़दम उठा रहा है। अगर हम अपने देश में ऐसा करें तो मुझे पता नहीं है कि क्या होगा? हर तरफ अफरातफरी और अस्थिरता होगी और हर कोई प्रभावित होगा।" मोहातिर एक तरह से अपने देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियों को चेतावनी भी दे रहे थे। सारी दुनिया को पता है कि उनके देश में बसे भारतवंशी दोयम दर्जे के नागरिक ही समझे जाते हैं। उनके मंदिरों को लगातार तोड़ा जाता रहा है। तब तो मोहातिर साहब बेशर्मी से चुप्पी साधे रहते थे। मजेदार बात यह है कि मोहातिर समेत मलेशिया के लगभग सारे मुसलमानों के पुरखे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल के पूर्वी तटीय इलाकों के मछुआरे ही थे जिन्हें बाद में जबरन या लालच देकर मुसलमान बनाकर मलेशिया में बसा लिया गया था। अब एक उम्मीद ये पैदा हुई है कि प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन अपने देश में बसे भारतवंशियों की स्थिति को सुधारेंगे। मलेशिया के निर्माण में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यदि भारतीय मजदूरों का जाना वहां बंद हो जाये तो मलेशिया का सारा विकास कार्य ठप्प हो जायेगा। उन्हें बदले में सरकार से कोई पारितोषिक नहीं मिलता। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में बड़ी तादाद में मलेशिया से भारतवंशियों की टोली आती है। ये सब अपनी व्यथा सुनाते हैं कि वहां उन्हें किस तरह मूलभूत अधिकारों से भी वंचित किया जाता है। कुछ तो अपनी दर्दभरी दास्तान सुनाते रो पड़ते हैं। इनमें से अधिकतर के पुरखे तमिलनाडु से संबंध रखते हैं। इन्हें करीब 150 साल पहले ब्रिटिश सरकार मलेशिया में मजदूरी के लिए लेकर गई थी। ये अब भी दिल से भारत को बेहद प्रेम करते हैं। मेरा स्वयं का अनुभव है कि मेरे एक तमिल मूल के सिंगापुर के उद्योगपति मित्र की भतीजी कुआलालमपुर किसी कंपनी में नौकरी करने गई। उस कंपनी के मालिक ने उससे जबरन सम्बन्ध बनाया और जब वह गर्भवती हो गई तो इसी शर्त पर अपनी तीसरी पत्नी के रूप में रखने पर राजी हुआ, जब उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। ऐसी घटनाएँ वहां रोज होती हैं। खुराफाती नाइक लौटेगा भारत अगर मोहिउद्दीन अपने को इस्लामिक विद्वान बताने वाले ढोंगी और खुराफाती जाकिर नाइक को भारत भेजने का रास्ता साफ कर दें, तो निश्चित रूप से दोनों देशों के संबंधों को नई उर्जा मिलेगी। उसपर भारत में कई गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। नाइक को मोहातिर का पूरा संरक्षण हासिल था। नाइक ने कुछ समय पहले पाकिस्तान सरकार को ऐसी सलाह दी थी कि इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर निर्माण की इजाजत नहीं देनी चाहिए। नाइक भारत में भी शांतिपूर्ण सामाजिक वातावरण को विषाक्त करता रहा है। वह एक जहरीला शख्स है। उसके खून में हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा करना है। ज़ाकिर नाइक पिछले चार साल से भारत से भागकर मलेशिया जाकर बसा हुआ है। उसे मोहातिर मोहम्मद ने शरण दी थी। अब मोहातिर सत्ता से बाहर हो चुके हैं। कथित उपदेशक ज़ाकिर नाइक पुत्रजया शहर में रहता है। मलेशिया में रहकर नाइक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू समाज की हर दिन मीन-मेख निकालता रहता है। नाइक ने मलेशिया के हिंदुओं को लेकर भी तमाम घटिया बातें कही हैं। एकबार उसने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू, मलेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद मोहातिर से ज़्यादा मोदी के प्रति समर्पित हैं। अब आप समझ सकते हैं कि कितना नीच किस्म का इँसान है नाइक। नाइक को यह भी लग रहा है कि अब वह बहुत लंबे समय तक मलेशिया में नहीं रह पाएगा क्योंकि वहां उसके संरक्षक मोहातिर मोहम्मद सत्ता से बाहर हो चुके हैं। बहरहाल, अब लगता यही है कि भारत और मलेशिया के संबंध वापस पुरानी पटरी पर लौटने लगेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 30 September 2020


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आर.के. सिन्हा मोहातिर मोहम्मद के मलेशिया के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद ऐसा लगने लगा है कि मलेशिया अब सीधी पटरी पर आ गया है। या यूँ कहें कि पहले से ज्यादा व्यावहारिक हो गया है। उसने खुलकर भारत विरोध अब लगभग बंद कर दिया है। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन ज्यादा समझदार लगते हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में दिए अपने भाषण में शायद सोच-समझकर मोहातिर से अलग रुख अपनाते हुए कोई भारत विरोधी बात नहीं की। उनके भाषण का मुख्य फोकस कोविड-19 से दुनिया किस तरह से लड़े, इसी पर रहा जो सकारात्मक सोच का संकेत है। मोहिउद्दीन यासीन के पूर्ववर्ती मोहातिर मोहम्मद हर जगह भारत के खिलाफ जहर उगलने से बाज नहीं आते थे। मोहातिर ने जिस तरह कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर बयान दिये थे, वे शर्मनाक थे। उसका भारत ने विरोध भी दर्ज कराया था। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कश्मीर और सीएए उसके सर्वथा आंतरिक मसले हैं और इनपर बोलने का मोहातिर मोहम्मद को कोई अधिकार नहीं। मोहातिर मोहम्मद ढोंगी धर्मगुरू जाकिर नाईक को भी खुला संरक्षण देते थे। अब उसकी भी भारत वापसी हो सकती है ताकि उसपर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा सके। मोहातिर मोहम्मद एक के बाद एक भारत के खिलाफ बयानबाजी कर यही साबित कर रहे थे कि वे सामान्य मानसिक स्थिति में नहीं हैं। यह बात वैसे किसी को अबतक समझ नहीं आई कि आखिर मोहातिर मोहम्मद, जाकिर नाइक को भारत भेजने में आनाकानी करने से लेकर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने और नागरिकता संशोधन क़ानून पर भारत के खिलाफ अनावश्यक और अनाधिकृत गलत बयानबाजी क्यों करते जा रहे थे। किसकी सलाह पर वे ऐसा कर रहे थे। मोहातिर मोहम्मद ने नागरिकता संशोधन क़ानून की ज़रूरत पर सवाल उठाते हुए कहा था "जब भारत में सब लोग 70 साल से साथ रहते आए हैं, तो इस क़ानून की आवश्यकता ही क्या थी।" उन्होंने यहाँ तक कहा, "लोग इस क़ानून के कारण अपनी जान गँवा रहे हैं।" जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन का संयुक्त राष्ट्र में भाषण बेहद नपा-तुला रहा। वे बड़े परिपक्व नेता के रूप में बोले। किसी देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से यही अपेक्षा रहती है कि वह संयुक्त राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण मंच का सकारात्मक सदुपयोग करे। इसी साल मार्च में मोहिउद्दीन मलेशिया के प्रधानमंत्री बने थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उन्होंने भारत को किसी भी तरह से नाराज करने वाली हरकत नहीं की है। वे एक तरह से डैमेज कंट्रोल में लगे हुए हैं, ताकि उनके देश के भारत के साथ संबंध पहले की तरह सामान्य हो जाएं। मोहातिर मोहम्मद को तब भी बहुत तकलीफ हुई थी जब कश्मीर से धारा 370 ख़त्म कर दी गई थी। तब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में कहा था कि भारत ने कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर रखा है। जब भी भारत अपने किसी भाग को लेकर कोई अहम फैसला लेता था, परेशान मोहातिर मोहम्मद हो जाते थे। वे आंखें मूंदकर पाकिस्तान के साथ बिना सोचे-समझे खड़े दिखाई देते थे। वे इमरान खान के खासमखास मित्र के रूप में उभरे। पर पाकिस्तान में जब शिया मुसलमानों से लेकर अहमदिया और कादियां समाज के साथ हिन्दू, सिख और ईसाईयों का उत्पीड़न होता था तब उनकी जुबान सिल जाती थी। मलेशिया के भारतवंशियों को धमकी मोहातिर मोहम्मद कह रहे थे, "मैं यह देखकर दुखी हूँ कि जो भारत अपने को सेक्युलर देश होने का दावा करता है, वो कुछ मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए क़दम उठा रहा है। अगर हम अपने देश में ऐसा करें तो मुझे पता नहीं है कि क्या होगा? हर तरफ अफरातफरी और अस्थिरता होगी और हर कोई प्रभावित होगा।" मोहातिर एक तरह से अपने देश के लगभग 30 लाख भारतवंशियों को चेतावनी भी दे रहे थे। सारी दुनिया को पता है कि उनके देश में बसे भारतवंशी दोयम दर्जे के नागरिक ही समझे जाते हैं। उनके मंदिरों को लगातार तोड़ा जाता रहा है। तब तो मोहातिर साहब बेशर्मी से चुप्पी साधे रहते थे। मजेदार बात यह है कि मोहातिर समेत मलेशिया के लगभग सारे मुसलमानों के पुरखे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल के पूर्वी तटीय इलाकों के मछुआरे ही थे जिन्हें बाद में जबरन या लालच देकर मुसलमान बनाकर मलेशिया में बसा लिया गया था। अब एक उम्मीद ये पैदा हुई है कि प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन अपने देश में बसे भारतवंशियों की स्थिति को सुधारेंगे। मलेशिया के निर्माण में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यदि भारतीय मजदूरों का जाना वहां बंद हो जाये तो मलेशिया का सारा विकास कार्य ठप्प हो जायेगा। उन्हें बदले में सरकार से कोई पारितोषिक नहीं मिलता। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में बड़ी तादाद में मलेशिया से भारतवंशियों की टोली आती है। ये सब अपनी व्यथा सुनाते हैं कि वहां उन्हें किस तरह मूलभूत अधिकारों से भी वंचित किया जाता है। कुछ तो अपनी दर्दभरी दास्तान सुनाते रो पड़ते हैं। इनमें से अधिकतर के पुरखे तमिलनाडु से संबंध रखते हैं। इन्हें करीब 150 साल पहले ब्रिटिश सरकार मलेशिया में मजदूरी के लिए लेकर गई थी। ये अब भी दिल से भारत को बेहद प्रेम करते हैं। मेरा स्वयं का अनुभव है कि मेरे एक तमिल मूल के सिंगापुर के उद्योगपति मित्र की भतीजी कुआलालमपुर किसी कंपनी में नौकरी करने गई। उस कंपनी के मालिक ने उससे जबरन सम्बन्ध बनाया और जब वह गर्भवती हो गई तो इसी शर्त पर अपनी तीसरी पत्नी के रूप में रखने पर राजी हुआ, जब उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। ऐसी घटनाएँ वहां रोज होती हैं। खुराफाती नाइक लौटेगा भारत अगर मोहिउद्दीन अपने को इस्लामिक विद्वान बताने वाले ढोंगी और खुराफाती जाकिर नाइक को भारत भेजने का रास्ता साफ कर दें, तो निश्चित रूप से दोनों देशों के संबंधों को नई उर्जा मिलेगी। उसपर भारत में कई गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। नाइक को मोहातिर का पूरा संरक्षण हासिल था। नाइक ने कुछ समय पहले पाकिस्तान सरकार को ऐसी सलाह दी थी कि इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर निर्माण की इजाजत नहीं देनी चाहिए। नाइक भारत में भी शांतिपूर्ण सामाजिक वातावरण को विषाक्त करता रहा है। वह एक जहरीला शख्स है। उसके खून में हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा करना है। ज़ाकिर नाइक पिछले चार साल से भारत से भागकर मलेशिया जाकर बसा हुआ है। उसे मोहातिर मोहम्मद ने शरण दी थी। अब मोहातिर सत्ता से बाहर हो चुके हैं। कथित उपदेशक ज़ाकिर नाइक पुत्रजया शहर में रहता है। मलेशिया में रहकर नाइक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू समाज की हर दिन मीन-मेख निकालता रहता है। नाइक ने मलेशिया के हिंदुओं को लेकर भी तमाम घटिया बातें कही हैं। एकबार उसने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू, मलेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद मोहातिर से ज़्यादा मोदी के प्रति समर्पित हैं। अब आप समझ सकते हैं कि कितना नीच किस्म का इँसान है नाइक। नाइक को यह भी लग रहा है कि अब वह बहुत लंबे समय तक मलेशिया में नहीं रह पाएगा क्योंकि वहां उसके संरक्षक मोहातिर मोहम्मद सत्ता से बाहर हो चुके हैं। बहरहाल, अब लगता यही है कि भारत और मलेशिया के संबंध वापस पुरानी पटरी पर लौटने लगेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 30 September 2020


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डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   कृषि लागत और मूल्य आयोग ने पहली बार केन्द्र सरकार को खाद अनुदान की राशि सीधे किसानों को उनके खातों में उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है। हालांकि इससे पहले इस आयोग द्वारा कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों का ही सुझाव प्रमुखता से दिया जाता रहा है। यह सुझाव इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह राशि सीधे किसान के पास जाएगी। आयोग ने सुझाव दिया है कि खाद अनुदान के रूप में यह राशि रबी और खरीफ फसल के लिए 2500-2500 रु. के अनुसार दो किस्तों में किसानों को दी जाए। सरकार द्वारा किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को छह हजार रु. प्रतिवर्ष की राशि दी जा रही है। किसानों के लिए इस तरह साल भर में ग्यारह हजार रुपए मिलना बड़ी राहत होगी। निश्चित रूप से इससे किसानों को बड़ा संबल मिलेगा। इसमें दो राय नहीं कि यह अपने आप में अच्छा सुझाव है। सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लिए संकल्पित है तो उस दिशा में यह अग्रगामी कदम माना जा सकता है।   पिछले कुछ सालों से सरकारें चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, किसानों के प्रति संवेदनशील हो रही है। भले इसे वोटबैंक का कारण माना जाए। कोरोना ने खेती-किसानी के महत्व को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। सरकारों को लोक लुभावन घोषणाओं के स्थान पर खेती-किसानी के लिए अब कुछ खास करना ही होगा। केन्द्र सरकार के किसानों के लिए लाए गए तीन विधेयकों को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचना और राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण अलग-अलग राय हो सकती है पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अब समय आ गया है जब अन्नदाता की समस्या को समझना ही होगा। सरकारों द्वारा चुनावों के समय जिस तरह कृषि ऋण माफी की घोषणाएं की जाती है वह किसानों या यों कहें कि खेती-किसानी की समस्या का स्थाई हल हो ही नहीं सकता। हालांकि खाद अनुदान राशि और सम्मान निधि को देने का जो तरीका है उसको लेकर विचार किया जाना अभी भी आवश्यक है।   इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की सहायता किसानों को अवश्य दी जानी चाहिए पर यदि खेती किसानी को बढ़ाना है और वास्तव में किसानों के भले के लिए सरकारें गंभीर हैं तो उसका सबसे बेहतर तरीका नकद राशि चाहे वह सीधे खाते मेें स्थानांतरित हो रही है उसके स्थान पर सरकार को आदान के रूप में उपलब्ध कराने से इसका सीधा लाभ अधिक प्रभावी तरीके से किसान और देश को प्राप्त होगा। भले सरकार राशि की सीमा यही रखे पर इस राशि की सीमा तक किसानों को उसकी मांग के अनुसार खाद-बीज उपलब्ध कराए जाते हैं तो उसका वास्तविक लाभ मिल सकेगा। खाद-बीज मिलेगा तो किसान सीधे-सीधे इनका उपयोग खेत में करेगा और उससे उत्पादन बढ़ेगा। उत्पादन बढ़ने का फायदा प्रत्यक्ष रूप से किसान और देश दोनों को होगा।   देखा जाए तो किसानों के साथ खाद-बीज को लेकर अधिक ठगी होती है। नकली या घटिया बीज मिलने से किसान की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। ऐसे में सरकार यह सुनिश्चित करे कि किसानों को जो बीज उपलब्ध कराए जाएंगे, वे उच्च गुणवत्ता के साथ उनमें रोगनिरोधक क्षमता हो। इससे दोहरा लाभ होगा। किसानों को समय पर मांग के अनुसार बीज मिल जाएंगा तो दूसरी और उनकी प्रमाणिकता व गुणवत्ता मेें कोई संदेह नहीं रहेगा। ऐसे में उत्पादन बढ़ेगा और किसान को अधिक लाभकारी मूल्य मिल सकेगा। इसके लिए भले ही सरकार राशि की सीमा पांच हजार ही रखे पर इतनी राशि के बीज-उर्वरक मिलेंगे तो इसका असर उत्पादकता पर पड़ेगा। इसे यों समझना होगा कि नकद राशि भले किसान को सीधे खाते में हस्तांतरित हो पर उसका उपयोग खेती-किसानी के लिए ही होगा, यह पक्का नहीं कहा जा सकता। ऐसे में यदि प्रमाणिकता, गुणवत्ता और क्षेत्र विशेष की जरूरत के अनुसार इतनी राशि के कृषि आदान किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं तो यह किसान व देश दोनों के लिए ही फायदे का सौदा होगा। वर्षों से खाद पर अनुदान सीधे उत्पादक कंपनियों को दिया जा रहा है। इसका सही लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा है। धनराशि का उपयोग खेती-किसानी मेें ही होगा यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता लेकिन खाद-बीज वितरण के रूप में इस राशि का उपयोग किया जाएगा तो शत-प्रतिशत सही होगा कि उसका उपयोग खेत में ही होगा। सरकारी बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी तो उत्पादन बढ़ेगा और इससे देश में अन्नधन का भंडार भरेगा। किसान की आय बढ़ेगी और सही मायने में खेती-किसानी का भला होगा। सरकारों को किसान की जरूरत की वस्तुएं अनुदान या निश्चित राशि तक की वस्तुएं उपलब्ध कराने की पहल करनी चाहिए। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीर होना होगा। कोरोना महामारी ने कृषि पर अधिक ध्यान दिये जाने की आवश्यकता महसूस करा दी है। ऐसे में नीति निर्माताओं को इस दिशा में चिंतन और मनन करना होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 September 2020


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योगेश कुमार गोयल एक ओर जहां चीन की विस्तारवादी नीतियों के कारण एलएसी पर अप्रैल माह से काफी तनावपूर्ण हालात हैं, वहीं चीन की गोद में खेल रहा नेपाल भी चीन की इन्हीं नीतियों का शिकार हो रहा है। हाल ही में इसका खुलासा होने के बाद कि चीनी सैनिकों ने नेपाल के हुम्ला जिले में सीमा स्तंभ से दो किलोमीटर अंदर तक कब्जा कर लिया है, चीन में हंगामा मचा है और काठमांडू स्थित चीनी दूतावास के बाहर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए हैं। दरअसल ड्रैगन नेपाल के इस इलाके में अब तक नौ भवनों का निर्माण कर चुका है। यही नहीं, उसके सैनिकों ने यहां नेपाली नागरिकों के आने-जाने पर पाबंदी लगा दी है। जैसी ड्रैगन की फितरत रही है कि वह किसी भी देश की जमीन कब्जाने के बाद दादागीरी दिखाते हुए उसे अपना भूभाग बताता है, ऐसा ही दावा उसने नेपाली जमीन कब्जाने के बाद किया है। नेपाली अधिकारियों का कहना है कि चीन ने नेपाली भूमि में अतिक्रमण करते हुए इमारतें बनाई हैं लेकिन ड्रैगन का दावा है कि उसने जहां इमारतें बनाई है, वह उसका अपना भूभाग है। नेपाली अधिकारी जब चीनी सैनिकों से बात करने उस जगह पहुंचे तो उन्होंने इस बारे में बात करने से ही इनकार कर दिया। गौरतलब है कि नेपाल के सीमावर्ती करनाली प्रांत के दूरस्थ हुमला जिले में दो वर्ष पूर्व तक चीन सीमा पर केवल तीन ही भवन थे लेकिन चीनी सेना पीएलए अब यहां नौ वाणिज्यिक भवन बना चुकी है। नेपाली जनता के प्रबल रोष का सबसे बड़ा कारण यही है कि एक तरफ नेपाल से नजदीकियां बढ़ाने की आड़ में चीन नेपाल में अपना आधार मजबूत कर वहां की जमीन हथियाने के मंसूबे पूरे करने के प्रयासों में जी-जान से जुटा है, वहीं उनके प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सबकुछ जानते-समझते हुए भी चुप्पी साधे हैं। उनके मौन समर्थन का नतीजा है कि नेपाल ड्रैगन के क्रूर पंजों में फंसता जा रहा है और नेपाल को चीन से उसकी दोस्ती बहुत महंगी साबित हो रही है। चीन बेकाबू होकर नेपाली जमीनें हथिया रहा है। तिब्बत में सड़क निर्माण के नाम पर भी नेपाली भूमि का अतिक्रमण कर रहा है। माना जा रहा है कि ड्रैगन नेपाल के कई अन्य हिस्सों में जमीन कब्जाने के बाद धीरे-धीरे नेपाल में आगे बढ़ रहा है। मानवाधिकार आयोग के मुताबिक दारचुला के जिउजिउ गांव पर भी चीन ने कब्जा कर रखा है। कई मकान, जो कभी नेपाल का हिस्सा हुआ करते थे, वे अब चीन में मिला दिए गए हैं। हालांकि नेपाली जनता विरोध-प्रदर्शन कर रही है क्योंकि उसका मानना है कि चीन अपनी इन्हीं विस्तारवादी नीतियों के चलते एक दिन तिब्बत की तरह नेपाल को भी हड़प लेगा। ओली सरकार नेपाली गांवों पर चीन के अवैध कब्जों के बावजूद खामोश है क्योंकि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती। वैसे ओली और उनकी पार्टी उसी चीनी सत्ता पर काबिज शी जिनपिंग की पार्टी की विचारधारा की समर्थक है। इसी कारण ओली ने चीन से प्रेम की पींगें बढ़ाते हुए भारत से दूरियां बढ़ानी शुरू की थी। भारत के इसी विरोध के चलते ओली ने नेपाल के हिन्दू राष्ट्र का दर्जा भी खत्म किया था। इसी साल जून में विपक्षी नेपाली कांग्रेस के सांसदों ने आरोप लगाया था कि चीन ने देश के दोलखा, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासभा, गोरखा और रसुवा जिलों में 64 हेक्टेयर भूमि का अतिक्रमण किया है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि नेपाल और चीन के बीच 1414.88 किलोमीटर की सीमा पर करीब 98 पिलर गायब हैं और कईयों को नेपाल के अंदर खिसका दिया गया है। नेपाली कांग्रेस द्वारा नेपाली संसद के निचले सदन में रेजॉल्यूशन पेश करते हुए ओली सरकार से चीन की छीनी हुई जमीन वापस लेने को कहा गया था। विपक्ष के तीखे तेवरों के बावजूद ओली सरकार खामोशी का लबादा ओढ़े रही है। ओली सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) को बचाने की हरसंभव कोशिश कर रही है। नेपाली जमीनों पर चीनी कब्जों के बावजूद अगर नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप ग्यवली कहते रहे हैं कि नेपाल का सीमा विवाद चीन के साथ नहीं बल्कि भारत के साथ है, समझा जा सकता है कि नेपाल में निर्णय लेने की क्षमता पर किस कदर चीनी दबाव हावी है। देश की बदतर आर्थिक स्थिति और भ्रष्टाचार के अलावा एनसीपी के भीतर मचे घमासान के बीच ओली सरकार के समक्ष चीन को नाराज करने का विकल्प नहीं है। यही कारण है कि ओली चीन के इशारों पर कठपुतली की भांति नाच रहे हैं। दो नेपाली एजेंसियों द्वारा नेपाली जमीन हड़पने की खबरों के अलावा हाल में नेपाल के कृषि मंत्रालय के सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट में भी खुलासा हुआ है कि ड्रैगन सात सीमावर्ती जिलों में फैले कई स्थानों पर नेपाल की जमीनों पर कब्जा कर चुका है। सर्वे डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है और ज्यादा से ज्यादा जमीन का अतिक्रमण कर रहा है। रिपोर्ट में 33 हेक्टेयर दायरे में फैले उन 10 इलाकों का भी जिक्र है, जहां चीन ने बागडारे खोला, करनाली, सिनजेन, भुरजुक, जंबुआ खोला इत्यादि नदियों का रूख मोड़कर नेपाली जमीनें कब्जाई है। इन चार नेपाली जिलों में अधिकांश क्षेत्र नदियों के जलग्रहण क्षेत्र हैं, जिनमें हुमला, कर्णली, संजेन, लेमडे, भृजुग, खारेन, सिंधुपालचौक, भोटेकोसी, जाम्बु नदीय कामाखोला, अरूण नदी प्रमुख हैं। नेपाल के सर्वे और मैपिंग विभाग का कहना है कि चीन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमा को नेपाल के दोलखा में 1500 मीटर अंदर धकेल दिया गया है। विभाग के मुताबिक चीन ने गोरखा और दारचुला जिलों में नेपाली गांवों पर कब्जा कर लिया है। अपने ही मंत्रालयों और सरकारी विभागों की ऐसी रिपोर्टें सामने आने के बाद भी अगर प्रधानमंत्री ओली चीन की गोद में खेल रहे हैं तो हैरानी होती है। वे भारत से दुश्मनी बढ़ाने पर उतारू हैं तो यह तय है कि चीन से उनकी यह दोस्ती उनके देश को अंततः बहुत महंगी पड़ने वाली है। लाप्चा-लिमी क्षेत्र में चीन रणनीतिक रूप से पिछले कई वर्षों से सड़कें बनाने में जुटा है। जब उसने करीब दस वर्ष पूर्व इस सीमावर्ती इलाके में एक वाणिज्यिक भवन तैयार किया था, तब नेपाल सरकार ने आपत्ति जताई थी लेकिन चीन द्वारा उस भवन को पशु चिकित्सा केन्द्र का भवन बताते हुए दलील दी गई थी कि यह सीमा के दोनों तरफ के लोगों के माल ढुलाई करने वाले पशुओं की उचित देखभाल के लिए लाभदायक साबित होगा। कटु सत्य यही है कि चीन बरसों से धीरे-धीरे नेपाली जमीन पर कब्जा करने के लिए प्रयासरत है और नेपाल ने वर्ष 2005 से ही उसके साथ सीमा वार्ता को आगे बढ़ाने से परहेज किया है। दरअसल वहां की पूर्ववर्ती सरकारें भी नेपाली जमीन वापस लेने के लिए चीन को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। नेपाली नागरिक मानने लगे हैं कि चीन भारत के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नेपाल को मोहरा बना रहा है और नेपाली जमीनें कब्जाकर भारत तक अपनी पहुंच आसान करना चाहता है। ड्रैगन के इशारों पर ओली के नाचने का सबसे बड़ा कारण यही है कि वे नेपाल में अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए ड्रैगन का सहारा ले रहे हैं। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख को लेकर सीमा विवाद चल रहा है और पिछले दिनों लिपुलेख के पास ट्राई-जंक्शन क्षेत्र में चीन द्वारा अपनी मिलिट्री साइट का निर्माण शुरू करने की तस्वीरें भी सामने आई थी। नेपाली नागरिक अब ओली सरकार से मांग करने लगे हैं कि वह ड्रैगन को नेपाली भूमि से बाहर करें लेकिन यह चीन को अगर नेपाल में उसके मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी का समर्थन मिल रहा है तो वह नेपाली पीएम ओली ही हैं। दरअसल, वे चीनी सत्ता के सहारे ही नेपाली सत्ता में टिके हुए हैं। पिछले कुछ महीनों में चीन-नेपाल के बीच घनिष्ठ हुए संबंधों के बीच अब नेपाल में चीन द्वारा जमीनें हड़पने के मामलों को लेकर जिस तरह घमासान मचा है, ऐसे में आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों पर पूरी दुनिया की नजरें केन्द्रित रहेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 September 2020


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गिरीश्वर मिश्र   किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में भाषा बड़ी अहमियत रखती है। भाषा हमारे जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में दखल देती है। वह स्मृति को सुरक्षित रखते हुए एक ओर अतीत से जोड़े रखती है तो दूसरी ओर कल्पना और सर्जनात्मकता के सहारे अनागत भविष्य के बारे में सोचने और उसे रचने का मार्ग भी प्रशस्त करती है।   भारत भाषाओं की दृष्टि से अद्भुत देश है, जहां सोलह सौ से अधिक भाषाएं हैं। जिनमें भारतीय आर्य उपभाषा और द्रविड़ भाषा परिवारों की प्रमुखता है। ऐसे में द्विभाषिकता यहाँ की एक स्वाभाविक भाषाई व्यवहार रूप है और बहुभाषिकता भी काफी हद तक पाई जाती है। आर्य भाषा समूह में आने वाली हिंदी मध्य देश में प्रयुक्त भाषा समूह का नाम है। इसके बोलने वाले एक विशाल भू भाग में बिखरे हुए हैं। सामाजिक गतिशीलता के चलते यहां के लोग देश-विदेश में अनेक स्थानों पर पहुंचे। पर हिंदी के नाना रूप हैं जो उसकी बोलियों या सह भाषाओं में परिलक्षित होते हैं। साथ ही हिंदी का दूसरी भाषा के रूप में उपयोग करने वालों की संख्या भी बहुत बढ़ी है। इसके विपरीत अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है और बहुत थोड़े से लोगों की ही मातृभाषा है पर रुतबे के हिसाब से लाजवाब है।   यह भी अजब ऐतिहासिक संयोग है कि 'हिंदी' शब्द इस अर्थ में हिंदी भाषा का नहीं है क्योंकि यह भारत से बाहर के लोगों द्वारा भारतवासियों के लिए प्रयुक्त किया गया। कदाचित यह ईरानी ग्रंथ अवेस्ता में मिलने वाले 'हेंदु' से जुड़ा है। मध्यकाल की ईरानी भाषा में 'हिंदीक' शब्द मिलता है। कहते हैं कि कभी गुजरात से भीतरी देश तक के विस्तृत क्षेत्र को हिंद प्रदेश माना जाता था और हिंदी शब्द देशबोधक था। जबाने हिंदी तो संस्कृत भाषा थी। बहुत समय तक हिंदी नाम की कोई अलग भाषा का उल्लेख नहीं मिलता है अत: हिंद क्षेत्र की भाषा हिंदी है। सत्रहवीं सदी तक हिंदवी और हिंदी समानार्थी थे और मध्य देश की भाषा का अर्थ प्रदान करते थे। बीजापुर और गोलकुण्डा जैसे दक्षिण के राज्यों में भी दिल्ली और मेरठ की खड़ी बोली प्रचलित थी। इस तरह दक्षिण में 'दक्खिनी' हिंदी और उत्तर भारत की भाषा के लिए हिंदी का उपयोग होने लगा। अंग्रेजों के जमाने में हिंदवी वह भाषा बनी जो हिंदुस्तान के आमजनों की भाषा थी। इस तरह हिंदी समग्र देश से जुड़ी रही है।   भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण से संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के विविध रूपों का विकास चिह्नित हुआ है जो लगभग 1000 ईस्वी तक चला और तब शौरसेनी, नागर, अर्ध मागधी और मागधी अपभ्रंश से तमाम आधुनिक अर्य भाषाओं का उद्गम हुआ। ऐसे में क्षेत्रीय भिन्नताओं के मद्देनजर साहित्यिक और मौखिक रूपों वाली इंद्रधनुषी छटा वाली हिंदी पनपी। साहित्यिक उन्मेष की दृष्टि से ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और खड़ी बोली अधिक समृद्ध हुई और अब खड़ी बोली प्रमुख हो चली है पर वह हिंदी के विविध भाषा रूपों का प्रतिनिधित्व करती है। वही अकेली हिंदी नहीं है और उसकी ऊर्जा अन्य विभिन्न सहभाषाओं से आती है।   यह याद रखना होगा कि अंतत: भाषा का लोक रूप यानी मौखिक व्यवहार ही केंद्रीय होता है और वह देश काल सापेक्ष होने से बदलता रहता है। आज छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, बघेली, अवधी, मगही, ब्रज, मैथिली, बुंदेली, जयपुरी, भोजपुरी, कुमाऊनी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, तथा खड़ी बोली आदि हिंदी के विविध रूप लोक प्रचलित हैं। उर्दू भी खड़ी बोली का ही रूप है जिसमें अरबी और फारसी का पुट है। अर्थात सिर्फ खड़ी बोली ही हिंदी नहीं है। राजनीति और लोभ लाभ की सहज मानवी प्रवृत्ति ने अनेक विवाद खड़े किए और वह प्रभुत्ववादी प्रवृत्ति अभी भी बनी हुई है जो हिंदी के वृहत्तर रूप को खंडित करती है।   ऐतिहासिक रूप से हिंदी भारत के लोक-जीवन से स्वाभाविक रूप से जुड़ी रही। स्वतंत्रता संग्राम में उसकी अखिल भारतीय भागीदारी ने उसे 'राष्ट्रभाषा' बना दिया। अंग्रेज सरकार सरकारी और शिक्षा के लिए अंग्रेजी को अधिकृत कर स्थापित कर चुकी थी और अफसरशाही अंग्रेजी और अंग्रेजियत का पर्याय बन चुकी थी। दूसरी ओर पराधीन भारत को स्वाधीन करने के लिए संग्राम का बिगुल बजाने में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की प्रजा के बीच जन भाषा की भूमिका थी। उनमें हिंदी का स्वर प्रमुख रहा और जनता से जुड़ने के प्रयास में हिंदी भारत में चतुर्दिक गूंजी। सहज सम्पर्क के लिए हिंदी स्वाभाविक माध्यम बनी। महाराष्ट्र हो या बंगाल, कश्मीर हो या गुजरात, पंजाब हो या दक्षिण भारत हर कहीं गणमान्य जन नेताओं ने हिंदी को अंगीकार किया। बापू ने 1917 में देश को सम्बोधित करते हुए कहा था- " आज की पहली और सबसे बड़ी समाज सेवा यह है कि हम अपनी देशी भाषाओं की ओर मुड़ें और हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करें। हमें अपनी सभी प्रादेशिक कारवाइयां अपनी-अपनी भाषाओं में चलानी चाहिए तथा हमारी राष्ट्रीय कारवाइयों की भाषा हिंदी होनी चाहिए।"   आगे चलकर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने कई कदम भी उठाए। संविधान की रचना तक पहुंचते-पहुंचते भाषा और सरकार के बीच की समझ बदल गई और सरकारी कामकाज की भाषा यानी 'राजभाषा ' (आफीशियल लैंग्वेज) का विचार अपनाया गया और जैसा कि संविधान का भाग 17 का अनुछेद 343 कहता है संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि 'देवनागरी' ठहराई गई। राज भाषा शब्द को अपरिभाषित छोड़ दिया गया परंतु प्रशासनिक उद्देश्य से उसे जोड़ा गया। साथ ही अनुछेद 351 में हिंदी के विकास को संघ के कर्तव्य के रूप में दर्ज किया गया। इसके लिए राजभाषा विभाग बना और हिंदी फले-फूले इसके लिए तामझाम के साथ बहुत से उपक्रम शुरू हुए। राजभाषा नीति और उसके अनुपालन को लेकर सरकारी धींगामुश्ती होती रही। संविधान ने आठवीं सूची नामक एक विशेष और विलक्षण प्रावधान बनाया और 14 भाषाओं की एक सूची डाली। इस सूची का विस्तार होता रहा और अब इसमें 22 भाषाएं हैं। अभी 38 अन्य भाषाओं की ओर से गुहार है कि उनको भी इस सूची में शामिल कर लिया जाय हालांकि सूची में सदस्यता का भाषा के विकास के साथ कोई कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं दिखता।   1965 आते-आते हिंदी की राजभाषा का सवाल अनिश्चितकाल के लिए मुल्तबी हो गया क्योंकि वह सक्षम नहीं हो सकी थी और अंग्रेजी में कार्य करते रहने के लिए अनंतकाल की छूट ले ली गई। लोकतंत्र स्थापित होने पर भी सरकार चलाने के लिए अंग्रेजी की गुलामी बरकरार रही। इस बीच हिंदी के संस्थानों, समितियों, पुरस्कारों, अकादमियों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की जाने वाली सरकारी पहलों की फेहरिस्त लम्बी ही होती गई पर उनके क्षणिक उत्साहवर्धक और सीमित प्रभाव को छोड़कर उनका योगदान प्राय: असंतोषजनक रहा।   राजनीति के परिसर में भाषा ही नहीं कोई भी मुद्दा सत्ता और शक्ति के प्रयोजनों से जुड़कर ही अर्थवान होता है। इस हिसाब से यदि हिंदी हाशिए पर बनी रही तो कोई आश्चर्य नहीं। हिंदी की अनेक गैर सरकारी संस्थाओं का स्वास्थ्य अन्यान्य कारणों से गिरता गया। इधर भाषा प्रौद्योगिकी में चमत्कारिक बदलाव से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को जीवनदान मिला है और अब रचनात्मक अभिव्यक्ति का विराट विस्फोट हो रहा है। मीडिया, व्यापार जगत और मनोरंजन आदि के क्षेत्रों में हिंदी की पकड़ मजबूत हुई है परंतु हड़बड़ी में हिंदी के हिंग्लिश होते जाने की चिंता भी सताने लगी है। इस पूरे परिवेश में देश की ताजा शिक्षा नीति ने प्रकट रूप से मातृभाषा को सम्मान देने और अपनी भाषा में शिक्षा देने लेने के अवसर का एक खाका खींचा है। भाषा का प्रयोग अस्मिता और भावना के साथ जीवन में अवसरों की उपलब्धता से भी जुड़ी है। अंग्रेजी के सम्मोहन से उबरने के लिए स्वाभाविक हिंदी की जो समन्वय और लोक से जुड़कर जीवन पाती रही है, उसके उपयोग को बढ़ाना होगा। भाषाओं के भविष्य को लेकर जो चिंताएं आजकल व्यक्त की जा रही हैं उन्हें देखकर यह बेहद जरूरी हो गया है कि हिंदी के गौरव गान वाली समारोह की मानसिकता को छोड़कर हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अध्ययन और अनुसंधान के लिए समर्थ बनाया जाय।     (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 28 September 2020


bhopal, Now goverment at the court frame

सियाराम पांडेय 'शांत'   अयोध्या में भले ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के बालस्वरूप को न्याय मिल गया हो लेकिन मथुरा में लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के बाल रूप को अभी न्याय की दरकार है। श्रीराम का भी जन्मभूमि का विवाद था और श्रीकृष्ण का भी जन्मभूमि का ही विवाद है। श्रीकृष्ण का जन्मभूमि मंदिर तो राममंदिर से पहले टूटा था। महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था। राममंदिर तो बस एकबार टूटा लेकिन कृष्ण जन्मभूमि मंदिर चार बार बना और चार बार टूटा। अयोध्या में हिंदुओं को अपनी आस्था की जंग जीतने में 492 साल लग गए लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को ऐतिहासिक फैसला देकर अयोध्या में राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।   ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने यहां पहला मंदिर बनवाया था। यहां मिले ब्राह्मी-लिपि में लिखे शिलालेखों से पता चलता है कि यहां शोडास के शासनकाल में वसु ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर, उसके तोरण-द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। इतिहासकार मानते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में दूसरा भव्य मंदिर 400 ईसवी में बनवाया गया था। खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि 1150 ईस्वी में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान जाजन उर्फ जज्ज ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया मंदि‍र बनवाया था। इस मंदिर को 16वीं शताब्दी के शुरुआत में सिकंदर लोधी के शासनकाल में नष्ट कर दिया गया था। इसके 125 साल बाद जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर चौथी बार मंदिर बनवाया। इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया।   वर्ष 1815 में नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने इस जगह को खरीद लिया था। वर्ष 1940 में जब यहां पंडि‍त मदन मोहन मालवीय आए तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखकर वे काफी निराश हुए। मालवीय जी ने जुगल किशोर बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनरुद्धार के संबंध में पत्र लिखा। मालवीय की इच्छा का सम्मान करते हुए बिड़ला ने 7 फरवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खरीद लिया। इससे पहले कि वे कुछ कर पाते मालवीय जी का देहांत हो गया। बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की। ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही यहां रहने वाले कुछ मुसलमानों ने 1945 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट दायर कर दी। इसका फैसला 1953 में आया। इसके बाद ही यहां कुछ निर्माण कार्य शुरू हो सका। यहां गर्भगृह और भव्य भागवत भवन के पुनरुद्धार और निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ।   श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह के बीच पहला मुकदमा 1832 में शुरू हुआ था। तब से लेकर विभिन्न मसलों को लेकर कई बार मुकदमेबाजी हुई लेकिन जीत हर बार श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान की हुई। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के सदस्य गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी की मानें तो पहला मुकदमा 1832 में हुआ था। अताउल्ला खान ने 15 मार्च 1832 में कलेक्टर के यहां प्रार्थनापत्र दिया। जिसमें कहा कि 1815 में जो नीलामी हुई है उसको निरस्त किया जाए और ईदगाह की मरम्मत की अनुमति दी जाए। 29 अक्टूबर 1832 को आदेश कलेक्टर डब्ल्यूएच टेलर ने आदेश दिया जिसमें नीलामी को उचित बताया गया और कहा कि मालिकाना हक पटनीमल राज परिवार का है। इस नीलामी की जमीन में ईदगाह भी शामिल थी। इसके बाद तमाम मुकदमे हुए। 1897, 1921, 1923, 1929, 1932, 1935, 1955, 1956, 1958, 1959, 1960, 1961, 1964, 1966 में भी मुकदमे चले।   गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 को अयोध्या के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में काशी-मथुरा समेत देश में नई मुकदमेबाजी के लिए दरवाजा बंद कर दिया था। साथ ही यह भी टिप्पणी की थी कि अदालतें ऐतिहासिक गलतियां नहीं सुधार सकतीं। सवाल यह है कि क्या मथुरा और काशी के मामले को यूं ही छोड़ दिया जाए या उसपर कुछ किया जाए। भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की सखी लखनऊ निवासी वकील रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य भक्तों प्रवेश कुमार, राजेशमणि त्रिपाठी, करुणेश कुमार शुक्ला, शिवाजी सिंह और त्रिपुरारी तिवारी की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन और हरिशंकर जैन ने स्थानीय न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में जमीन को लेकर 1968 के समझौते को गलत बताया गया है।   रामनगरी अयोध्या में राममंदिर निर्माण का काम चल रहा है। इसी बीच मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर का मामला स्थानीय कोर्ट में पहुंचने से माहौल गरमा गया है। इस सिविल केस में 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए स्वामित्व मांगा गया है और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि जमीन के मालिक कृष्ण जन्मस्थान पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण है। जमीन पर मालिकाना हक विराजमान भगवान श्रीकृष्ण का है। जबकि श्रीकृष्ण जन्म स्थान सोसाइटी द्वारा 12 अक्टूबर 1968 को कटरा केशव देव की जमीन का समझौता हुआ और 20 जुलाई 1973 को यह जमीन समझौते के बाद डिक्री की गई। भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की जमीन की डिक्री करने का अधिकार सोसाइटी को नहीं है। लिहाजा सोसाइटी की जमीन की डिक्री खत्म की जाए और भगवान श्रीकृष्ण विराजमान को उनकी 13.37 एकड़ जमीन का मालिकाना हक दिया जाए। अधिवक्ताओं ने बताया कि याचिका में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, कमेटी ऑफ मैनेजमेंट ट्रस्ट शाही मस्जिद ईदगाह, श्रीकृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट, श्रीजन्मस्थान सेवा संस्थान को प्रतिवादी बनाया गया है।     (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 27 September 2020


bhopal, How the happiness of children returned

आर.के. सिन्हा कमबख्त कोरोना संक्रमण ने दुनिया को अनेकों तरह से चोट पहुंचाई है। इसने छोटे- छोटे मासूम बच्चों पर सच में बहुत बड़ा अन्याय किया है। उन्हें अपने दोस्तों से दूर कर दिया। खेल के मैदानों से पूरी तरह वंचित कर दिया है। जो बच्चे रोज अपने दोस्तों के साथ खेलते-पढ़ते और मस्ती करते रहते थे, उन सब खुशियों को कमबख्त चीनी कोरोना ने उनसे छीन लिया है। वे सिर्फ घरों की चहारदीवारी तक सिमट कर रह गए हैं। वे घरों में ही रहकर कंप्यूटर या मोबाइल पर ऑनलाइन पढ़ाई करने को बाध्य हैं। किसी भी परिस्थिति में ऑनलाइन पढ़ाई क्लास रूम का विकल्प नहीं हो सकती न? वह क्लास रूम का हुड़दंग बच्चे भूल नहीं पा रहे। पर क्या किया जाए? बच्चे स्कूल में जाकर अपने अध्यापकों के साथ-साथ दोस्तों से भी बातचीत में प्रश्नोत्तर में, विचार-विमर्श में बहुत कुछ सीखते थे। वह ज्ञानोपार्जन भी फिलहाल बंद हो गया है। बच्चों का स्कूल में इंटरवल के समय अपने साथियों के साथ-साथ बैठकर लंच करने का आनंद भी चल गया है। चुहलबाजी और छीना-झपटी तो एक सपना-सा बनकर रह गया है। दुनिया के हरेक शख्स के लिए सुबह स्कूली बच्चों को कंधे पर बैग लटकाए स्कूल जाते या स्कूल की बस का इंतजार करते देखना बहुत सुखद होता था। इन बच्चों को इनकी मां तैयार करके स्कूल भेजती थी। वह सिलसिला भी अब कोरोना के कारण स्थगित है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा वगैरह में सुबह के वक्त आप हजारों लड़कियों को साइकिल पर स्कूल जाते हुए देखा करते थे। अब तो उन दिनों की यादें ही रह गई हैं। कोरोना जाए तब तो फिर से दुनिया अपनी रफ्तार से चले। जरा कोरोना काल से पहले के दिनों को याद कीजिए। आपको देश भर के सभी छोटे- बड़े शहरों के स्कूलों के बाहर सुबह-दोपहर में स्कूली बच्चों के आने-जाने और मस्ती से सारा माहौल खुशगवार रहा करता था। एक प्यार भरा कोलाहल अब कहाँ गया? पर अब सब तरफ सन्नाटा है। एक उदासी-सी पसरी है। स्कूल बसें स्कूलों के परिसरों में धूलों से ढंकी खड़ी हैं। सामान्य दिनों में तो बच्चों को किसी खास जगह से लेने आने वाली मम्मियों के बीच भी कुछ गपशप हो जाया करती थी। हालांकि बच्चों की बसों के आते ही वह चर्चाएं भी खत्म हो जाया करती थीं। फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि कब कोरोना का प्रकोप खत्म होगा और इन स्कूलों और इनके आसपास की जिंदगियां सामान्य होंगी? कब इन स्कूलों के बाहर आइसक्रीम, छोले-भठूरे, आलू टिक्की, समोसे, गुलाब जामुन, बर्फ का गोला और दूसरे आइटम बेचने वाले फिर से आने लगेंगे। वे भी बेचारे तो स्कूलों के बंद होने से बेरोजगारी का शिकार बन गए हैं। अगर बड़े शहरों में स्कूली बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं, वहीं झारखंड, हिमाचल, उत्तराखंड जैसे राज्यों के दूरदराज इलाकों की स्थिति अलग है। कोरोना काल में जहां राज्य के शहरों के बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे है, वहीं यहां के छोटे शहरों और गांवों के बच्चे घर की दीवार पर ही थोड़ी दूरी पर कई ब्लैकबोर्ड बनाकर पढ़ रहे हैं। इस तरह से सोशल डिस्टेंसिग का पालन भी हो रहा है। जरा सोचिए कि इस कठिन दौर में दिव्यांग बच्चे किस तरह से पढ़ पा रहे होंगे। स्थिति सच में बेहद विकट है। इनकी व्यथा अलग प्रकार की है। आपने भी महसूस किया होगा कि हाल के दौर में बच्चों में अपना जन्मदिन उत्साहपूर्वक तरीके से मनाने की चाहत भी रहने लगी है जो नितांत स्वाभाविक है। वे अपने जन्मदिन पर स्कूल और आस-पड़ोस के दोस्तों को बुलाते थे अबतक। उस दिन उनके घर में केक कटता था और स्वादिष्ट खानपान की व्यवस्था रहती थी। फिर गीत-संगीत के दौर में नाच-गाना भी होता था। कहाँ गया बच्चों का वह आनंद? बच्चों के लिए उनका जन्मदिन दिवाली से कम महत्व नहीं रखता। अच्छी बात यह है कि सभी अभिभावक भी अपने बच्चों की भावनाओं का ख्याल करते हुए उनके जन्मदिन को भव्य तरीके से मनाने में लग जाते हैं। इसी तरह बच्चे अपने दोस्तों के जन्मदिन का भी इंतजार करते थे। दोस्तों के जन्मदिन पर उसके घर अवश्य कोई न कोई गिफ्ट लेकर जाते थे। ये सब बच्चों की प्यारी-सी खिलखिलाती दुनिया का अबतक अभिन्न अंग रहा है। कोरोना ने उनकी इस खुशी को छीन लिया है। ये सच में कोई छोटी बात नहीं है। यकीन मानिए कि इन सब वजहों से बच्चों के ऊपर नकारात्मक असर तो हो रहा होगा। बच्चों से जुड़े मसलों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों को उन उपायों के बारे में सोचना होगा ताकि बच्चों के जीवन में आई हताशा-निराशा कम से कम कुछ हद तक दूर किया जा सके। कोरोना काल से पहले बच्चे अपने माता-पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ बाजारों में घूमने या पिक्चर देखने जाया करते थे। इससे वे पढ़ाई के बोझ के तनाव से छुटकारा महसूस करते थे। जाहिर है कि जब स्कूल बंद है और घर के बाहर तक निकलना बंद है, तो पिकनिक पर जाने का भी कोई सवाल नहीं है। इसबार तो बच्चे गर्मियों की छुट्टी में कहीं घूमने भी नहीं गए। यानी वे घरों के अंदर ही सिमट कर रह गए हैं। जिन्हें बार-बार घूमना होता था, या खेलना होता था, वे घरों में बंद हैं। यह एक कारावासनुमा अनुभव बचारे बच्चे समझ तो नहीं पा रहे, पर माँ-बाप की बात मानने को विवश भी हैं, अजीब स्थिति है। इसके साथ ही 10 वीं और 12 वीं की परीक्षाएं देने वालों के बारे में जरा सोचिए। अगले साल उन्हें अपनी बोर्ड की परीक्षाएं देनी हैं। सामान्य रूप से 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं किसी विद्यार्थी के जीवन की धारा को तय कर देती हैं। हम सितंबर महीने के अंत में पहुंच रहे हैं। इस वक्त इन दोनों कक्षाओं के विद्र्यार्थियों की कसकर पढ़ाई चल रही होती है। वे टयूशन भी ले रहे होते हैं। पर कोरोना ने सब पूरी तरह बंद करवा दिया है। राजधानी दिल्ली के मुखर्जी नगर में बिहार, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा वगैरह से आए हजारों नौजवान फिलहाल अपने घरों को वापस जा चुके हैं। ये सब प्रतियोगी परीक्षाओं भाग लेने के साथ-साथ आसपास के इलाकों में ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्चा भी निकालते थे। चूंकि सब तरफ ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है, इसलिए ये बाहरी राज्यों से आए नौजवान अपने घरों को चले गए। इनके लिए दिल्ली में किराए पर रहना और खाने का इंतजाम करना बेहद कठिन था। इन्हें इस दौर में कहीं से ट्यूशन का काम नहीं मिल रहा था। इन्होंने अपने मकान मालिकों से लॉकडाउन काल का किराया माफ करने को कहा तो इनकी फरियाद भी सुनी नहीं गई। फिलहाल तो कोरोना के खत्म होने का इंतजार है, ताकि दुनिया फिर से अपनी गति से चल सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना से लड़ने वाली वैक्सीन जल्दी ही ईजाद हो जायेगी और सामाजिक गतिविधियाँ पटरी पर वापस आ सकेंगी। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 27 September 2020


bhopal,Modi and Imran: Who said who spoke?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने संयुक्तराष्ट्र में जो भाषण दिए, क्या उनकी तुलना की जा सकती है? जब कल सुबह मैंने इमरान खान का भाषण सुना तो मुझे लगा कि शाम को नरेंद्र मोदी अपने भाषण में उसके परखच्चे उड़ा देंगे। कुछ टीवी चैनल भी यही कह रहे थे लेकिन जो सोचा था, वह हुआ नहीं।   जाहिर है कि इमरान का भाषण किसी पाकिस्तानी फौजी अफसर का लिखा हुआ था। उसमें न तो पाकिस्तान की अर्थ-व्यवस्था का कोई जिक्र था, न ही इमरान सरकार के द्वारा किए गए रचनात्मक कार्यों का विवरण था और न ही विश्व-शांति के किसी काम में पाकिस्तान के योगदान का उल्लेख था। इमरान का भाषण पूरी तरह भारत पर केंद्रित था। उसमें पाकिस्तान द्वारा आर्थिक मदद के लिए झोली फैलाने का जिक्र जरूर था लेकिन इसके विपरीत मोदी के भाषण में कहीं भी पाकिस्तान का नाम तक नहीं था। उन्होंने किसी भी राष्ट्र पर सीधे या घुमा-फिराकर हमला नहीं किया। उन्होंने यह जरूर कहा कि किसी राष्ट्र (अमेरिका) के साथ दोस्ती का अर्थ यह नहीं कि किसी अन्य राष्ट्र (चीन) से भारत की दुश्मनी है। उन्होंने विश्व-परिवार की भावना का आह्वान किया, उनकी सरकार द्वारा किए गए लोक-सेवा के कार्यों को गिनवाया, दुनिया के देशों में भारत की शांति-सेनाओं के योगदान को रेखांकित किया और संयुक्तराष्ट्र संघ के नवीनीकरण की मांग की। 75 वर्ष की संस्था के चेहरे से बुढ़ापे की झुर्रिया हटाकर उसे जवान बनाने का नारा लगाया। कोरोना के इस विश्व-संकट से उबरने में भारत की भूमिका को स्पष्ट किया। उन्होंने भारत की क्षमता और सामर्थ्य का बड़बोला गुणगान करने की बजाय मर्यादित शब्दों में मांग की कि उसे उसका उचित स्थान मिलना चाहिए।   दूसरे शब्दों में मोदी ने इस विश्व-मंच का इस्तेमाल इस तरह से किया कि भारत की विश्व-छवि में चार चांद लगे और इमरान ने इस तरह किया कि पाकिस्तान दुनिया की नजरों में दया का पात्र बन गया। जैसा कि मैं इमरान को जानता हूं, इसमें शायद इमरान का दोष बहुत कम होगा। दोष उसी का है, जिसने उन्हें गद्दी पर बिठाया है। अपनी फौज की आवाज को उन्होंने सं. रा. में गुंजाया और मोदी ने अपने देश की आवाज को। दोनों के भाषणों की तुलना करें तो आपको पता चल जाएगा कि कौन किसकी बोली बोल रहा था?   (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 27 September 2020


bhopal,Imran

डॉ. वेदप्रताप वैदिक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा में भारत-विरोधी भाषण दिया, जिसका तगड़ा जवाब अब नरेंद्र मोदी को देना ही पड़ेगा। इमरान खान ने अफगानिस्तान और अरब-इस्राइल संबंधों पर तो काफी सम्हलकर बोला लेकिन कश्मीर और भारतीय मुसलमानों के बारे में वे इस तरह बोल रहे थे मानो वे असदुद्दीन औवेसी या राहुल गांधी हों। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वे कोई विदेशी प्रधानमंत्री हैं। यदि उन्हें कश्मीर की आजादी और भारतीय मुसलमानों की इतनी चिंता है तो उनसे कोई पूछ सकता है कि पाकिस्तान में जो रहते हैं, वे लोग क्या मुसलमान नहीं हैं? उनके साथ पाकिस्तान की सरकारें और फौज कैसा सलूक कर रही हैं? पाकिस्तानी कश्मीर और गिलगिट-बल्टीस्तान का क्या हाल है? इन दोनों पाक-प्रांतों में पाकिस्तानी पुलिस और फौज ने जैसा खून-खराबा किया है, क्या वैसा हिंदुस्तान में होता है? हां, भारत में हिंदू-मुस्लिम दंगों की वारदातें हुई हैं लेकिन अदालतों ने हमेशा इंसाफ किया है। जिसका भी दोष सिद्ध होता है, वह सजा भुगतता है, चाहे हिंदू या मुसलमान! इमरान ने गुजरात के दंगों से लेकर शरणार्थी कानून को लेकर हुए दंगों और गिरफ्तारियों को सिलसिलेवार गिनाया है और मुसलमानों पर होनेवाले जुल्मों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्व की विचारधारा को जिम्मेदार ठहराया है। उसकी तुलना उन्होंने हिटलर के नाजीवाद से की है। यदि इमरान को भारतीय राजनीति और संघ के आधुनिक दर्शन की पूरी जानकारी होती तो मुस्लिम लीग की इस 80-90 साल पुरानी लकीर को वे संयुक्तराष्ट्र में नहीं पीटते। क्या उन्हें संघ के मुखिया मोहन भागवत का यह कथन उनके भाषण-लेखक अफसरों ने नहीं बताया कि भारत का प्रत्येक नागरिक, जो भारत में पैदा हुआ है, वह हिंदू है। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (शरणार्थी कानून- सीएए) के बारे में भी कहा कि मजहब के आधार पर पड़ोसी देशों के शरणार्थियों में भेदभाव करना उचित नहीं है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, धारा 370 तो कभी की ढेर हो चुकी थी। बड़ी बात यह है कि उसके औपचारिक खात्मे के बाद सरकार ने ऐसा इंतजाम किया कि कश्मीर में खून-खराबा न हो। इमरान यह कहना भी भूल गए कि कश्मीर, गुजरात, सीएए और सांप्रदायिक दंगों पर इमरान से ज्यादा सख्ती और सच्ची सहानुभूति भारत के अनेक हिंदू नेताओं ने दिखाई है। आतंक और हिंसा के गढ़ में बैठकर इमरान के मुंह से शांति की बात अजीब-सी लगती है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 26 September 2020


bhopal, Dialogue will control incidents like suicide

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   जयपुर में कर्ज से परेशान एक सर्राफा व्यापारी द्वारा पत्नी और दो बच्चों के साथ आत्महत्या का समाचार अंदर तक झकझोरने वाला, मानवता के लिए शर्मनाक और गंभीर चिंता का विषय है। गौर किया जाए तो पिछले दिनों इस तरह के समाचार देशभर में देखने को मिल जाएंगे। दरअसल, कोरोना ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। कोरोना के कारण जिस तरह आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं और उद्योग-धंधों व रोजगार पर असर पड़ा है, उसके दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। एक बात समझ से परे है कि जब सारी दुनिया में ही नवंबर-दिसंबर, 2019 से कोरोना ने प्रभाव दिखाना आरंभ किया और हमारे देश में जिस तरह से कोरोना के कारण मार्च माह से लाॅकडाउन का दौर चला, उससे व्यक्ति घर पर बंद होकर रह गया तो ऐसी स्थिति में जीडीपी की गिरावट की बात आज किस आधार पर की जा रही है। जब सबकुछ ठप हो गय तो फिर कल-कारखाने कहां से चलेंगे, कहां से उत्पादन और विपणन होगा। दरअसल आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से उसके दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं।   आजादी के 75 साल बाद भी देश में सूदखोरी की अंतिम परिणति मौत को गले लगाना ही हो तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक क्या हो सकता है। कर्ज का बोझ नहीं सह पाने के कारण अब सामूहिक आत्महत्या का दौर चल पड़ा है। यह अपने आपमे चिंता का कारण है। देश में इस तरह की घटनाएं आम हैं। बैंकिंग क्षेत्र के इतने विकास और आसान शर्तों पर कर्ज की सरकारी घोषणाओं के बावजूद सूदखोरों को जाल फैला हुआ है तो यह सरकार और समाज दोनों के लिए शर्मनाक स्थिति है।   कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या करनेवालों में मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग के रहे हैं लेकिन देश-दुनिया में सूदखोरों के चंगुल से बचाकर गरीब और साधनहीन लोगों की रुपए पैसे की जरूरतों को पूरा करने के लिए सारी दुनिया चिंतित रही है। सरकार ने आर्थिक पैकेज के तहत बैंकों की किस्तें तो आगे बढ़ा दी पर लोगों द्वारा सूदखोरों द्वारा या व्यापारिक लेन-देन में फंसा रुपया लेने या वापस देने में असुविधा के कारण जो तनाव हो रहा है, उसे सहन नहीं कर पाने के कारण आत्महत्या का दौर चल निकला है।   प्रश्न यह है कि देश में गरीब और साधनहीन लोगों के साथ ही कारोबारियों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की सरकारी- गैर सरकारी बैंकों की योजनाओं के बावजूद सूदखोरों का रैकेट देश के सभी इलाकों में कैसे जारी है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियां कोरोना के कारण उत्पन्न हुई है। हालात यह है कि जिसने किसी को सामान दिया है वह उसका पैसा लेने का तकादा कर रहा है तो दूसरा जिसने किसी से सामान या पैसा किसी भी रूप में ले रखा है उसके सामने वापस लौटाने का संकट है। जयपुर में परिवार के साथ सामूहिक आत्महत्या का हालिया प्रकरण लगभग इसी तरह का है। एक तरफ एक करोड़ की लेनदारी थी तो दूसरी और डेढ़ करोड़ की देनदारी। देनेवाले दे नहीं रहे थे तो लेने वाले दबाव बना रहे थे। कमोबेश यह स्थिति आज पूरे देश की है।   सवाल यह नहीं है कि कितनी लेनदारी है या कितनी देनदारी। सवाल यह भी नहीं है कि लेनदारों का तकादा मौत का कारण बना। हो सकता है लेनदार भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहा हो। प्रश्न यह है कि आत्महत्या जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता, ऐसी मानसिकता क्यों बनती जा रही है। दरअसल कोरोना के कारण जिस तरह से समाज, परिवार और एक-दूसरे से कटाव हुआ है उसके कारण व्यक्ति अपनी समस्याओं को दूसरे से साझा नहीं कर पा रहा। ऐसे में अति संवेदनशील लोग तनाव व संत्रास के कारण आत्महत्या जैसा कदम उठाने लगे हैं। उसकी मानसिकता दबाव सहन नहीं कर पाती और कुंठा व निराशा में ऐसे कदम उठा लेते हैं जो विचारणीय है। यह समाज और समाज विज्ञानियों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।   कोरोना ने सोशल डिस्टेंस की जो हालात बना दी है उसमें हमारे सामने एक विकल्प अवश्य है कि अन्य साधनों मोबाइल फोन, सोशल मीडिया आदि से एक-दूसरे से संवाद कायम रखा जाए। आपसी बातचीत से दिल का बोझ हल्का हो जाता है और सांत्वना या अन्य तरीके से बातचीत से व्यक्ति का हौसला बढ़ता है। ऐसे में बुरे वक्त को वह निकाल लेता है और आत्महत्या जैसा निर्णय पर रोक लग जाती है। कोरोना के इस माहौल में संवाद के अन्य साधनों को अपनाना होगा ताकि एक-दूसरे की भावनाओं को साझा कर सके। सरकार, मीडिया, समाज विज्ञानियों, गैर सरकारी संगठनों को इसके लिए मुहिम चलानी होगी ताकि इस तरह की घटनाएं न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 26 September 2020


bhopal, How to secure Bihar

आर.के. सिन्हा आज से तीस साल पहले की तुलना में देश की आबादी ने एक स्थान से दूसरे स्थान पर आना-जाना बहुत अधिक कर दिया है। जनता अपने करियर को पंख लगाने के लिए एक शहर से दूसरे शहर में बसने या कामकाज के सिलसिले में जाने लगी है। इसके चलते राजमार्गों पर यातायात भी बहुत बढ़ा है। जो लोग हवाई मार्ग या रेल के रास्ते अपनी मंजिल तक नहीं जाते, वे सड़क मार्गों का ही सहारा लेते हैं। सड़कों से माल ढुलाई का काम तो होता ही है। देश में सबसे बड़ा हाईवे का नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है। राज्य में 8,483 किलोमीटर लंबा हाईवे है। उसके बाद नंबर आता है बिहार का। वहां राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई 4,967 किलोमीटर है। बाकी राज्यों में भी हाईवे की लंबाई अच्छी खासी है। भारत में आज के दिन करीब एक लाख किलोमीटर लंबा नेशनल हाईवे का जाल बिछा हुआ है। होगा राजमार्गों का कायाकल्प इस बीच, बिहार के लिए यह अच्छी खबर आई है कि वहां 14 हजार करोड़ रुपए की राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई है। इस राशि से बिहार के राजमार्गों का विस्तार होगा। राजमार्ग परियोजनाओं में 3 बड़े ब्रिज और राजमार्गों को चार लेन तथा 6 लेन में अपग्रेड किया जाना शामिल है। बिहार में अब सभी नदियों पर पुल तो होंगे ही और सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण का काम होगा। इस समय बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग का काम तेज़ी से किया जा रहा है। पूर्वी बिहार को पश्चिमी बिहार से जोड़ने के लिए चार लेन की 5 परियोजनाओं और उत्तर बिहार को दक्षिण बिहार से जोड़ने के लिए 6 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। बेशक, बिहार में आवागमन में सबसे बड़ी बाधा बड़ी नदियों के चौड़े पाट और तेज बहाव के चलते थी, इसीलिए बिहार के विकास के लिए प्रधानमंत्री पैकेज की घोषणा में पुलों के निर्माण को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया था। इसके अंतर्गत गंगा नदी पर 17 पुलों का निर्माण किया जा रहा है जिसमें से अधिकांश पूर्ण होने के चरण में है। इसी तरह से गंडक और कोसी नदियों पर भी पुलों का निर्माण किया जा रहा है। पटना रिंग रोड और पटना में गंगा नदी पर महात्मा गांधी सेतु के समानांतर तथा विक्रमशिला सेतु के समानांतर पुलों के निर्माण से पटना और भागलपुर के बीच संपर्क में उल्लेखनीय सुधार होगा। ताकि सुरक्षित हो राजमार्ग देखिए एक बात तो समझ लेनी चाहिये कि हाई-वे के निर्माण के बाद यह भी बिहार सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि उन पर सफर करने वालों को किसी सड़क हादसों से दो-चार न होना पड़े। उत्तर प्रदेश और बिहार से गुजरने वाले हाईवे ही देश के सबसे असुरक्षित हैं। इन पर भीषण हादसों से लेकर हत्याएं और लूटपाट आम बात है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो समझ आ जाएगा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के हाईवे कितने असुरक्षित हो चुके हैं। इनके बाद क्रमश: उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश का नंबर आता है। हाईवे पर होने वाले अपराध पुलिस के लिए नया सिरदर्द बन रहे हैं। तो कैसे थमे इन पर होने वाले अपराध और हादसे? इसका यही उपाय समझ आता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ हो। वे अपराध को अंजाम देने से पहले दस बार सोचें। इसी तरह हाईवे पर तयशुदा रफ्तार से ज्यादा स्पीड से वाहन चलाने वालों पर भी कैमरों की नजर हो। हाईवे पर यातायात के नियमों का पालन न करने वालों पर कठोर दंड हो। उनके लाइसेंस कैंसिल कर दिए जाएं। कठोर एक्शन लिए बगैर हाईवे सुरक्षित नहीं होने वाले। योजना है कि कोरोना काल के बावजूद इस साल के अंत तक बिहार के सभी हाईवे पर तेजी से गाड़ियां दौड़ें। इसके लिए पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, गया, भागलपुर, मुंगेर, बिहारशरीफ, आरा, समस्तीपुर, मधुबनी, छपरा, सिवान, गोपालगंज शहर में बाईपास निर्माण भी किये जा रहे हैं। ऐसे में इन हाईवे के निर्माण लागत के साथ ही चौड़ीकरण के उपयोग में आने वाली जमीन के अधिग्रहण की लागत भी सरकार वहन कर रही है। हाईवे का अर्थ होता है उन सड़कों से जिनसे वाहन बिना ठहराव के अपनी मंजिल की तरफ जा सकता है। पर इन पर वाहनों की तादाद तेजी से बढ़ जाए और ये अपराधियों के स्वर्ग बनने लगे तो उसके पूर्व ही कारगर कदम उठाए जाने चाहिए। इसलिए देश के हाईवे को हर लिहाज से सुरक्षित बनाना ही होगा। बहरहाल, देश के बुनियादी क्षेत्र के विकास पर जितना काम हो रहा है और जिस गति से इस काम को निपटाया जा रहा है वह अतुलनीय है। फिलहाल राजमार्गों के निर्माण की गति 2014 से पहले के मुकाबले दोगुनी हो गई है। 2014 से पहले की तुलना में राजमार्ग निर्माण पर खर्च भी 5 गुना बढ़ा दिया गया है। सरकार ने आगामी 5 वर्षों के भीतर बुनियादी ढांचागत विकास पर 110 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की है। इसमें 19 लाख करोड़ रुपए राजमार्गों के विकास के लिए ही समर्पित है। एक बात जान लें कि किसी भी देश की प्रगति की रफ्तार को जानने के लिए उसके हाईव को देख लेना चाहिए। अमेरिका में एक कहावत प्रचलित है- "अमेरिका की सड़कें इसलिये शानदार नहीं हैं क्योंकि अमेरिका एक महान राष्ट्र हैI बल्कि, यह कहना उचित होगा कि अमेरिका एक महान राष्ट्र है क्योंकि अमेरिका की सड़कें शानदार हैंI" माफ करें हमारे देश में राजमार्गों के विस्तार पर बड़े स्तर पर काम अटल बिहारी वाजपेयी की दूरदृष्टि के चलते ही शुरू हो पाया। अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1996 में प्रधानमंत्री बनते ही देश के चार बड़े महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को चार से छह लेन वाले राजमार्गों के नेटवर्क से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई। इसे नक्शे पर देखने पर यह राजमार्ग चतुर्भुज आकार का दिखता है और इसी वजह से इस योजना को "स्वर्णिम चतुर्भुज" नाम दिया गया। इसपर साल 1999 में काम चालू हुआ और साल 2001 में इसपर काम का श्रीगणेश भी हो गया। यह परियोजना साल 2012 में पूर्ण हुई। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत बने राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 5,846 कि.मी. है। इसके निर्माण में लगभग 6 खरब रुपए का खर्च आया था। आप कह सकते हैं कि अटल जी ने जिस परियोजना को चालू किया था उसी ने वस्तुतः देश में हाई-वे के विस्तार की नींव रखी, जिसे मौजूदा मोदी सरकार गति दे रही है। यह संयोग ही है कि नितिन गडकरी जैसा उत्साही और कार्यकुशल कर्मठ मंत्री मोदी सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्रालय देख रहे हैं। उन्होंने अपने मंत्रालय की छवि को चमका दिया है। वे रिजल्ट देने वाले मंत्रियों में हैं। बहरहाल, देश उम्मीद करता है कि उनका हाई-वे के विस्तार का काम तेजी से जारी रहेगा। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 26 September 2020


bhopal,Justification , Panchayat elections , Corona period

रमेश सर्राफ धमोरा राजस्थान में कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा है। हर दिन पिछले दिनों से अधिक नए कोरोना संक्रमित मरीज मिल रहे हैं। पिछले दिन तक प्रदेश में एकदिन में सर्वाधिक 1946 करोना संक्रमित लोग मिले थे। जो एकदिन में मिले सबसे अधिक केस हैं। इस दिन प्रदेश में कोरोना से 15 लोगों की मौतें भी हुई है। राजस्थान में कोरोना पॉजिटिव लोगों की संख्या बढ़कर एक लाख 21 हजार हो चुकी है। कोरोना से प्रदेश में मरने वालों का आंकड़ा 1382 तक पहुंच गया है। हालांकि कोरोना से प्रदेश में एक लाख तीन हजार लोग ठीक भी हो चुके हैं। लेकिन अभी भी प्रदेश में कोरोना के 18 हजार सक्रिय मरीजों का होना बड़ी चिंता की बात है। राजस्थान में कोरोना से ठीक होने वालों की रिकवरी रेट 83.12 प्रतिशत है। 16.88 प्रतिशत लोग प्रदेश के अस्पताल में कोरोना संक्रमण का उपचार करवा रहे हैं। प्रदेश का हर आदमी कोरोना के बढ़ते प्रभाव से डरा हुआ है। कोरोना के कारण प्रदेश में जनजीवन अभीतक सामान्य नहीं हो पाया है। ऐसे माहौल में प्रदेश सरकार आगामी 28 सितंबर से 10 अक्टूबर तक प्रदेश में 3848 ग्राम पंचायतों में सरपंचों व पंचों के चुनाव करवाने जा रही है। जिससे कोरोना के और अधिक सामुदायिक फैलाव की आशंकाएं जताई जा रही हैं। कोरोना के बढ़ते प्रभाव के कारण राज्य सरकार ने प्रदेश में सर्वाधिक कोरोना प्रभावित 11 जिलों में धारा 144 फिर से लागू कर दी है। ताकि लोगों के घरों से निकलने को नियंत्रित किया जा सके। मगर गांवों में होने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव में लोगों को नियंत्रित किया जाना मुश्किल है। चुनाव लड़ने वाला हर दावेदार अपने समर्थकों के साथ घर-घर जाकर प्रचार कर रहे हैं। हालांकि राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव को लेकर गाइड लाइन जारी की है। जिसमें चुनाव प्रचार करने पर कई तरह की बंदिशें लगाई गई हैं। मगर गांव में जाकर हकीकत देखें तो चुनाव के लिए लगाई गई बंदिशें कहीं नजर नहीं आ रही हैं। झुंझुनू जिले की मलसीसर ग्राम पंचायत में चुनाव लड़ रहे एक उम्मीदवार द्वारा कोरोना गाइड लाइंस का पालन नहीं करने पर उपखंड अधिकारी शकुंतला चौधरी ने सरपंच प्रत्याशी डालचंद पर 8 हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। राज्य सरकार एक तरफ तो कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए गांव में लगातार अभियान चला रही है। लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रही है। प्रदेश के स्कूल, कॉलेज बंद पड़े हैं। आगामी 31 अक्टूबर तक प्रदेश में सभी तरह के बड़े आयोजनों पर रोक लगाई गई है। विवाह में 50 व अंतिम संस्कार में 20 लोगों की अधिकतम संख्या तय की गई है। शादी की सूचना समय से पहले उपखंड अधिकारी को देनी जरूरी है। ऐसी परिस्थिति में राज्य सरकार का प्रदेश में पंचायत चुनाव करवाने का निर्णय किसी के गले नहीं उतर रहा है। चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी व वोट देने वाले मतदाता दोनों डरे नजर आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत चुनाव में भी सरकार पूरी पंचायती राज प्रक्रिया के चुनाव नहीं करवा रही है। सिर्फ सरपंचों व पंचों के चुनाव करवा रही है। राजनैतिक दलों के चुनाव चिन्ह पर होने वाले ब्लॉक सदस्यों, जिला परिषद के सदस्यों, ब्लॉक प्रमुख व जिला परिषद के प्रमुखों के चुनाव की कहीं कोई चर्चा नहीं है। प्रदेश में पंचायत चुनाव के साथ ही नगरीय निकायों के चुनाव भी लंबित हैं। सभी जगह प्रशासक लगे हुए हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के भी निर्देश हैं कि नगरीय निकायों के चुनाव यथाशीघ्र करवाए जाएं। उसके बावजूद सरकार हाईकोर्ट में नगरीय निकाय चुनाव करवाने में असमर्थता जताते हुए कोरोना के बहाने उनको आगे खिसकाने का प्रयास कर रही है। वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्र में पंचायतों के चुनाव करवा रही है। लोगों का मानना है कि यह सरकार की दोमुंही नीति है। कोरोना के चलते ही सरकार ने विधानसभा के पिछले सत्र को समय पूर्व समाप्त कर दिया था। उस समय सरकार का कहना था कि कोरोना के बढ़ते प्रभाव के कारण विधायकों की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए विधानसभा का सत्र समय पूर्व समाप्त किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ सरकार प्रदेश में पंचायतों के चुनाव करवा कर लोगों के जीवन को खतरे में डाल रही है। चुनाव के कारण प्रदेश में लगी आचार संहिता के चलते सरकारी कार्यालयों में लोगों के काम नहीं हो पा रहे हैं। इससे उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना संक्रमण के चलते राजस्थान में अभी चुनाव कराने का सही समय नहीं है। प्रदेश में किसान फसल कटाई में जुट गए हैं। चुनाव के दौरान बहुत से नागरिकों के बेवजह कोरोना संक्रमित लोगों के संपर्क में आने की आशंका बनी रहेगी। चुनावी प्रक्रिया में लगे सरकारी कर्मचारियों की भी कोरोना जांच नहीं करवाई जाती है। चुनावी प्रक्रिया में लगा कोई कर्मचारी यदि कोरोना पॉजिटिव निकल जाता है तो उससे काफी लोगों के संक्रमित होने का खतरा बना रहता है। सरकार द्वारा अभी चुनाव करवाना एक तरह से लोगों पर जबरन चुनाव थोपने जैसा है। नगरीय निकायों व पंचायत राज के अन्य चुनाव के साथ ही ग्राम पंचायतों में सरपंच और पंचों के चुनाव करवाए जाते तो प्रदेश के लोगों के लिए ज्यादा हितकर होते। लोगों का मानना है कि राजस्थान में सत्तारूढ़ पार्टी में चल रही अंदरूनी राजनीतिक उठापटक से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए ही पंचायत चुनाव करवाए जा रहे हैं। आने वाले पंचायत चुनाव प्रदेश की जनता पर बहुत भारी पड़ने वाले हैं। चुनावों के दौरान कोरोना का सामुदायिक विस्तार होने की प्रबल आशंका बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं। सरकार को समय रहते सभी बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही पंचायत चुनाव करवाने का फैसला करना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 September 2020


bhopal,UP: Poster on misdeeds

सियाराम पांडेय 'शांत' उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एंटी रोमियो स्क्वॉयड की समीक्षा के दौरान राज्य में 'ऑपरेशन दुराचारी' चलाने की बात कही है। इसके तहत महिलाओं और बच्चियों से दुष्कर्म और छेड़छाड़ करने वालों के पोस्टर चौक-चौराहों पर लगाए जाएंगे। पोस्टर में दुष्कर्मियों और मनचलों के मददगारों के नामों का भी खुलासा होगा। महिलाओं के लिए इससे अच्छी खबर भला और क्या हो सकती है? अगर यह अभियान अमल में आता है और इसका हश्र पुराने अभियानों जैसा नहीं होता है तो इससे न केवल महिलाओं और बच्चियों को राहत मिलेगी बल्कि मनचलों और दुराचारियों पर भी शिकंजा कसेगा। मुख्यमंत्री ने इस अभियान में चौकी इंचार्ज से लेकर सर्किल अफसर तक की जिम्मेदारी तय किये जाने और लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। छेड़छाड़ और दुष्कर्म के आरोपियों को महिला पुलिसकर्मी से दंडित कराने का भी मुख्यमंत्री ने विचार जाहिर किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए और भारत के सभी राज्य में, सभी जिलों, तहसीलों और थाना क्षेत्रों में इस तरह के अभियान चलाए जाने चाहिए। मुख्यमंत्री ने इधर कई बड़ी घोषणाएं की हैं। एक तो उत्तर प्रदेश में देश की सबसे खूबसूरत फिल्म सिटी बनाने की, दूसरी उत्तर प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश बनाने की। दोनों ही घोषणाओं का मतलब है कि इसके लिए उन्हें प्रदेश में पुलिस का खोया हुआ रसूख वापस लाना होगा। एंटी रोमियो स्क्वॉड की समीक्षा के क्रम में मुख्यमंत्री ने यह तो कहा है कि जिस तरह एंटी रोमियो स्क्वॉड ने बेहतरीन काम किया, मनचलों और महिलाओं के साथ अपराध करने वालों की कमर तोड़ी, वैसे ही हर जनपद की पुलिस यह अभियान चलाती रहे। उन्होंने लगे हाथ यह भी चेतावनी दी है कि कहीं भी महिलाओं के साथ कोई आपराधिक घटना हुई तो संबंधित बीट इंचार्ज, चौकी इंचार्ज, थाना प्रभारी और सीओ जिम्मेदार होंगे। किसी भी जिम्मेदार मुख्यमंत्री को यही कहना चाहिए। शासन-प्रशासन प्रोत्साहन और कार्रवाई के भय के संतुलन से ही ठीक-ठाक चलता है। अन्यथा अराजकता अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है। उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो स्क्वॉयड गठित करने का भाजपा ने चुनावी वायदा किया था और महिलाओं और बच्चियों के साथ दरिंदगी करने वालों को जेल के सीखचों में डालने की बात कही। योगी आदित्यनाथ के शपथग्रहण के दिन ही सूबे में एंटी स्क्वॉयड सक्रिय हो गया था लेकिन जिस तेजी के साथ एंटी रोमियो स्क्वॉयड सक्रिय हुआ, उसी तेजी के साथ वह निष्क्रिय भी हो गया। आंकड़े गवाह हैं कि मार्च 2018 तक एंटी रोमियो स्क्वॉड ने 26 लाख 36 हजार से ज्यादा लोगों की जांच की थी। गौरतलब है कि 2017 से 18 के बीच जब स्क्वॉड काफी सक्रिय था, यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले काफी बढ़ गए। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में 9,075 से 11,249 तक इजाफा हो गया। लोग पकड़े जाएंगे, उनपर केस दर्ज होंगे तो जाहिर है कि वह दिखेंगे लेकिन जब न तो जांच होगी और न ही पुलिस इस तरह के मामले दर्ज करेगी तो महिला विरोधी अपराध कम होंगे। इसे किसी भी सरकार की सफलता का मानक नहीं कहा जा सकता। 22 मार्च 2017 से 15 मार्च 2020 तक यूपी के 10 जोन में कुल 79 लाख 42 लाख 124 लोगों की चेकिंग की। जिसमें 10, 831 लोगों की गिरफ्तारी हुई और 33 लाख 34 हजार 852 लोगों को चेतावनी जारी की गई। इससे पता चलता है कि एंटी रोमियो स्क्वॉयड कितना सक्रिय रहा और कितना निष्क्रिय। पुलिसिया आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में लूट, रेप, हत्‍या और डकैती जैसे अपराधों में 99 फीसदी गिरावट आई है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में हर दिन महिलाओं के खिलाफ औसतन 162 मामले दर्ज होते थे। यूपी पुलिस की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2019 के पहले 6 महीने में यूपी में 19,761 आपराधिक मामले सामने आए थे। इनमें रेप के 1,224, शारीरिक शोषण के 4,883, छेड़छाड़ के 293 और घरेलू हिंसा के 6,991, हत्‍या के 1,088 और अपहरण के 5,282, मामले शामिल थे। अपराध को छिपाने और दबाने की नहीं, उसे उजागर और समाप्त करने की जरूरत है। अपराध हुआ क्यों, उसका कारण और मनोविज्ञान जानने की आवश्यकता है। छेड़खानी और दुष्कर्म के ज्यादातर मामले रसूखदारों से जुड़े होते हैं। प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कितनी कार्रवाई होती है, किस तरह की कार्रवाई होती है, यह किसी से छिपी नहीं है। अपराधियों से सांठगांठ भी उजागर होती रही है। पुलिस पर हमलों की घटनाएं भी बढ़ी हैं। महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। जिस देश-प्रदेश में महिलाएं सुरक्षित नहीं होतीं, वह देश-प्रदेश तरक्की के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो पाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर जब पहली बार तिरंगा फहराया था तो उन्होंने हर-माता पिता से अपने बेटों पर ध्यान देने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि सिर्फ बेटियों से ही मत पूछो कि वे कहां गई थीं, बेटों को भी नियंत्रित करो। इसपर कितना अमल हुआ, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन दुराचार और छेड़छाड़ सामाजिक समस्या है। समाज के लोग जबतक रोक-टोक करना नहीं सीखेंगे तबतक अकेले पुलिस इस समस्या का समाधान नहीं कर सकती। चौक-चौराहों पर पोस्टर लगाना अच्छा उपाय है लेकिन इसकी अहमियत तभी है जब लोग ऐसे अनैतिक चरित्र के व्यक्तियों से हर तरह के रिश्ते तोड़ लें। स्कूल उनके बच्चों को प्रवेश न दें। दुकानदार उन्हें सामान न दें। लोग उन्हें सम्मान न दें। रहीम ने लिखा था कि भारी मार बड़ेन की चित से देहु उतार लेकिन अब आदमी की नजरों से शर्मो-हया का पानी उतर गया है। पहले जेल जाना शर्म की बात थी। अब जेल जाने वालों का स्वागत होता है। जबतक इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगेगी तबतक केवल पोस्टर लगा देने भर से बात नहीं बनेगी। पोस्टर लगाने से पहले पुलिस को इस बात की तहकीकात भी करनी होगी कि आरोपों में कितना दम है। अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए भी कुछ लोग षड्यंत्र कर सकते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है। खासकर विवेचनाधिकारियों को। चौराहों पर पोस्टर लगाने का विचार बुरा नहीं है लेकिन उसकर उचित ढंग से अनुपालन होना चाहिए और इसमें पूरी पारदर्शिता और नीर-क्षीर विवेक होना चाहिए तभी बात बन पाएगी। कुछ मानवाधिकारवादियों को इस पर ऐतराज भी हो सकता है लेकिन दुष्टों का साथ सभी के लिए कष्टकारी होता है। चाणक्य ने लिखा था कि दुष्ट और कांटे की प्रवृत्ति एक जैसी होती है, इनसे निपटने के दो ही मार्ग हैं। या तो इनका मुंह तोड़ दिया जाए या इनसे बचकर निकल लिया जाए। वैसे भी केवल पोस्टर लगाने से ही काम नहीं चलेगा, ऐसे लोगों को अविलंब सजा भी होनी चाहिए। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 25 September 2020


bhopal, Is there, intrusion into privacy , pretext ,Couple Challenge

डॉ. रमेश ठाकुर   फेसबुक ने एकबार फिर 'कपल चैलेंज' का टास्क देकर युवाओं को उलझा रखा है। फेसबुक इस्तेमाल करने वाले ग्राहक पत्नी, महिला मित्रों की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। इस मिशन में उम्रदराज लोगों की संख्या कम है, पर युवाओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। समय-समय पर फेसबुक द्वारा दिए जाने वाले चैलेंज रूपी टास्कों पर कुछ संदेह होने लगा है कि इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं? जबकि पत्नी, बच्चों और पारिवारिक लोगों की तस्वीरें निजी सामग्री मानी जाती है। एक जमाना था, जब शादी-ब्याह के वक्त कोई घर की महिलाओं की तस्वीर चुपके से उतार लेता था तो लठ्ठासन की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। उस वक्त कोई व्यक्ति अपने घरों की महिलाओं की तस्वीरों को सार्वजनिक करना पसंद नहीं करता था। बड़े-बूढे तो सख्त खिलाफ हुआ करते थे। लेकिन समय बदल गया। पुरानी परंपराएं बेमानी हो गई हैं।   बीते कुछ समय से फेसबुक के कहने मात्र से हम वैसा ही करने को राजी हो जाते हैं जैसा वह चाहता है। लेकिन थोड़ी देर के लिए शायद यह भूल जाते हैं कि इस चैलेंज से हम निजी जानकारियाँ तो उन्हें उपलब्ध नहीं करा रहे? इसके दूरगामी परिणाम अभी नहीं, कुछ समय बाद दिखाई देंगे। इसकी आड़ में कोई हमारा निजी वस्तुओं का डाटा बेस तो तैयार नहीं कर रहा है। यह गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इन्हीं हरकतों को लेकर फेसबुक और व्हॉट्सएप पिछले कुछ समय से सवालों के घेरे में हैं। इनपर आरोप है कि ये दोनों ग्राहकों की निजी जानकारियों पर हमला कर रहे हैं। सुशांत सिंह राजपूत केस में व्हॉट्सएप के जरिए सामने आए ड्रग एंगल ने भी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन पर सवाल खड़े किए हैं।   साइबर एक्सपर्ट भी अचंभित हैं कि कैसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने सुशांत केस में बॉलीवुड ड्रग एंगल खोजा और कैसे पुराने संदेशों को एक्सेस करने में कामयाबी हासिल की? जबकि, सोशल नेटवर्क प्लेटफॉर्म व्हॉट्सएप हमेशा से कहता आया है कि उसके संदेश सुरक्षित हैं कोई तीसरा पक्ष उन्हें एक्सेस नहीं कर सकता। फिर ये कैसे संभव हुआ। ये हमारे लिए सांकेतिक मात्र है। सिर्फ इतना समझने के लिए कि हम फेसबुक और व्हॉट्सएप पर जो गुप्त चैट करते हैं वह कतई सुरक्षित नहीं। कई साइबर जानकारों को संदेह है कि कहीं फेसबुक फिर से चैलेंज देकर हमसे हमारी निजी वस्तुओं को हथियाने की कोई सुनियोजित साजिश तो नहीं रच रहा?   ग़ौरतलब है कि कुछ संदेह प्रमाणित भी हो चुके हैं कि फेसबुक और व्हॉट्सएप हमारी उन चीजों पर खास नजर रखता है जिसे हम गुप्त मानते हैं। उन चैट्स और फोटोज को डाटा बेस बनाकर अपने पास सुरक्षित रखता है। बाद में अपने हिसाब से उसका मिसयूज खुद नहीं, बल्कि दूसरों के जरिए करवाता है। इसकी भनक केंद्र सरकार को भी है लेकिन हम फेसबुक-व्हॉट्सएप के इतने आदी हो चुके हैं कि इनके बिना रह नहीं सकते। इसलिए फेसबुक हमसे जो भी करवाता है, हम करने को राजी हो जाते हैं। फेसबुक इससे पहले भी साड़ी चैलेंज, 20 वर्ष पुरानी फोटो जैसे टास्क यूजरों को दे चुका है। ग्राहकों ने भी उनके आदेश को हाथोंहाथ लिया। लोगों ने पुराने संदूकों, अलमारियों, किताबों से खोज-खोजकर फोटो निकाले और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किए। बहरहाल, इन सबके पीछे हम अपनी जरा भी अक्ल नहीं लगा रहे।   चीन द्वारा करीब नौ से दस हजार भारतीयों की जासूसी कराने का मामला इस वक्त चर्चाओं में है जिनमें हर क्षेत्र के लोग शामिल हैं। उन्होंने ये डाटा सोशल नेटवर्किंग साइटों से एंट्री करने के अलावा अपने गुप्तचरों के माध्यम से एकत्र करवाया। ये काम एकदिन का नहीं, बल्कि सालों का है। फेसबुक की पहुंच अब मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं रही, गांव, कस्बों, देहातों तक यह फैल चुका है। फेसबुक की दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है। खेतों में काम करने वाला मजदूर भी प्रत्येक पांच-दस मिनट के अंतराल में अपनी फेसबुक आईडी चेक करता है, देखता है क्या-क्या हलचल हुई। फेसबुक या सोशल नेटवर्किंग साइटों में कोई एक देश नहीं, बल्कि समूचा संसार गिरफ़्त में है। ज्यादा से ज्यादा समय लोगों का इन्हीं में खप रहा है। आँखें, दिमाग सबकुछ खराब हो रहा है बावजूद इसके किसी संभावित खतरे की कोई परवाह नहीं।   फेसबुक यूज में हम इतने मग्न हो गए कि दैनिक एक्टिविटी भी नियमित रूप से फेसबुक को बता देते हैं। किनसे मिले, पूरे दिन में क्या किया, किस प्रोजेक्ट में हाथ डाला, किस मित्र से मिले, फलाना-फलाना सबकुछ हम फेसबुक से साझा कर रहे हैं। गौर से सोचने वाली है कि हमारे पास फिर बचा क्या? सबकुछ तो सार्वजनिक कर दिया। बुजुर्गों ने हमें सदैव यही सिखाया है कि एक हाथ से करो, दूसरे हाथ को पता तक न चले।   सोशल मीडिया ने इंसान के रहन-सहन के तरीकों को बदलकर रख दिया है। हम दिन में क्या खा-पी रहे हैं, क्या ओढ़- पहन रहे वह भी यहां शामिल होता है। कुल मिलाकर सुबह से लेकर शाम को सोने से पहले की सभी सूचनाएं हम साझा कर रहे हैं। जमाना भेड़चाल का है, एक करता है तो उसके देखा-देखी दूसरा भी वैसा ही करता है। सही-गलत बताने की कोई कोशिश भी करता है तो उसे आड़े हाथों ले लिया जाता है। अभिव्यक्ति की आजादी, मॉडर्न युग, आधुनिकता की दुहाई देकर उसे सरेआम नंगा कर दिया जाता है। खैर, कहने का मकसद मात्र इतना है कि सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने से पहले हमें एकबार सोचना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 September 2020


bhopal, Politics should stop on agrarian reform

प्रभुनाथ शुक्ल   कृषि सुधार के तीन विधेयकों पर सड़क से लेकर संसद तक की राजनीति गरमा गई है। किसान एकबार फिर सियासी मोहरा बन गया है। किसान, कितना मुनाफे और घाटे में होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन किसान हिमायती बनने के लिए संसद में जिस तरह माननीयों का दंगल देखने को मिला उसे अनैतिक राजनीति की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। उप सभापति के आसन के सामने आकर माननीयों ने बिल की प्रतियों को फाड़ माइक तक तोड़ डाली। इस अमर्यादित आचरण के लिए सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलम्बित करना पड़ा।   अभी किसानों का आंदोलन पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित है। जबकि विपक्ष चाहता है कि इसकी आग पूरे देश में फैले। केंद्र सरकार बिल को लेकर इतनी उतावली क्यों है। बिल को पास कराने में उसने जल्दबाजी क्यों दिखाई। सरकार बिल पर मत विभाजन को क्यों तैयार नहीं हुई। सरकार वास्तव में अगर किसान हितैषी है तो इतनी जल्दबाजी दिखाने की क्या ज़रूरत है। सरकार बिल लाने के पूर्व इस बिल को क्यों किसानों के बीच लेकर नहीँ गई। विपक्ष मत विभाजन पर अड़ा था तो ध्वनिमत पर उसने भरोसा क्यों जताया। देश की 80 फीसदी मेहनतकश आबादी के भाग्य का फैसला जो बिल करने वाला है उसे ध्वनिमत से पास करना कहाँ का इंसाफ है। ध्वनिमत का प्रस्ताव विषम स्थितियों में होना चाहिए लेकिन अब यह उपाय सत्ता की कमजोरी बनता दिखता है।   केंद्र सरकार जिन तीन विधेयकों को ऐतिहासिक बता रही है उनमें एक 'कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य' संवर्धन और सरलीकरण विधेयक है। इस बिल पर सरकार का कहना है कि यह किसानों को पूरी उपज मंडी से बाहर बेचने की आजादी देता है। फिर क्या इसके पहले ऐसा नहीँ होता था। किसान तब भी पूरी आजादी के साथ अपनी उपज को कहीँ भी बेच सकता था। सरकार का इस प्रावधान में दावा है कि इस बिल से किसान अपनी उपज को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जा सकता है। इस श्रेणी में कितने फीसद किसान आएंगे यह सरकार खुद जानती है। किसान अगर अपनी फसल मंडी से बाहर बेचेगा तो कहाँ बेचेगा। उसे खरीदने वाला कौन होगा। उसकी शर्त क्या होगी।   लोकसभा और राज्यसभा से पास दूसरा बिल कृषक सशक्‍तिकरण से सम्बन्धित है। यह अनुबंध खेती को अधिक बढ़ावा देगा। मध्यमवर्गीय किसान को बहुत बड़ा फ़ायदा होने वाला फ़िलहाल नहीँ दिखता है। तीसरा बिल आवश्यक वस्तु से सम्बन्धित है। जिसमें अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटाने का विधान करता है। इसका मतलब आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी अब अपराध नहीँ होगी। कोई भी व्यापारी किसानों से इन वस्तुओं की खरीद कर जमाखोरी कर मुनाफा कमा सकता है। बिल के बाद बाजार पर क्या सरकार का नियंत्रण होगा कि कोई भी 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' से नीचे किसान की उपज नहीँ खरीद सकता है। 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' की शर्त क्या वर्तमान में लागू हैं? वर्तमान समय में किसानों का विश्वास जीतने के लिए गेहूँ की एमएसपी 50 रुपए बढ़ा दिया है। अब यह 1925 के बजाय 1975 रुपए प्रति कुंतल (एमएसपी) होगी।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कृषि बिल को किसानों के लिए नया अध्याय बताया है। उन्होंने विपक्ष पर किसानों को गुमराह करने का भी आरोप लगाया है। प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि मंडी परिषद नहीं ख़त्म होगी और 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' जारी रहेगा। यही वजह रही कि सरकार ने समय से पहले फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया। किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूँजीपतियों के हाथ में चला जाएगा। कॉरपोरट जगत अपनी शर्तों पर किसानों से अनुबंध करेगा।   देश में कृषि सुधार अहम जरूरत है लेकिन किसान और मजदूर हमेशा वोटबैंक की राजनीति का हिस्सा रहा है। यह विषय राजनीति से ऊपर उठकर है लेकिन यह सम्भव नहीँ दिखता। लॉकडाउन में अगर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इतनी मज़बूत न होती तो क्या हालात होते इसकी कल्पना की जा सकती है। ऐसे में किसानों पर राजनीति बंद होनी चाहिए।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 September 2020


bhopal,How fair is the opposition to agricultural laws

अनिल निगम   राजनीतिक दल सोची-समझी रणनीति के तहत किसानों से संबंधित तीन कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इनका सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर था कि सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त कर दिया है। अकाली दल की नेत्री हरसिमरत बादल का केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा एक राजनीतिक चाल है। अकाली दल पंजाब में अपने घटते जनाधार से बेहद चिंतित है। इसलिए उन्होंने इस इस्तीफे से पंजाब के किसानों को ये संदेश देने की कोशिश की है कि अकाली दल उनका हितैषी है।   पंजाब और हरियाणा किसानों के गढ़ हैं। सबसे ज्यादा फसल पंजाब में उगती है। कुछ पंजाबी किसान संगठनों ने इन तीनों कानूनों को किसान-विरोधी बताया है और वे इनके विरुद्ध आंदोलन चला रहे हैं। कुछ दूसरे प्रदेशों में भी विरोधी दलों के उकसावे पर किसानों ने धरना-प्रदर्शन किया अथवा ऐसा करने की योजना बना रहे हैं।   निस्संदेह, तीनों कानून किसानों को ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंचाने के लिए बनाए गए हैं। पहला कानून किसान का उत्पाद, व्यापार एवं विपणन, दूसरा- आवश्यक अधिनियम 1955 में संशोधन और तीसरा अधिनियम कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर बनाया गया है। पूर्व में प्रावधान था कि देश के किसान अपनी फसल बेचने के लिए अनिवार्य रूप से अपनी स्थानीय मंडियों में जाएं और दलालों-आढ़तियों की मदद से अपना खाद्यान्न बेचें। लेकिन अब उनके ऊपर से ये बाध्यता समाप्त हो जाएगी। अब वे अपना माल सीधे बाजार में ले जाकर बेच सकते हैं। कहने का आशय यह है कि किसानों के लिए अब पूरा देश खुल गया है। उनकी निर्भरता मंडियों और आढ़तियों पर खत्म हो जाएगी। जब किसान अपनी फसल स्थानीय मंडियों में बेचते थे तो उनको आढ़तियों या दलालों को कमीशन देना पड़ता था। लेकिन उक्त कानून लागू होने के बाद उनको न मंडी-टैक्स देना पड़ेगा और न ही आढ़तियों को कमीशन। चूंकि अब वे अपने माल को देश की किसी भी मंडी या व्यापारी को बेचने को स्वतंत्र होंगे, इसलिए उन्हें फसल की कीमतें ज्यादा मिलेंगी।   इसके बावजूद कुछ विपक्षी दलों ने किसानों को उकसाया कि नए कानून पूरी तरह से किसान विरोधी हैं और इससे किसानों का बहुत बड़ा नुकसान होने वाला है। तर्क दिया गया कि फसल अब औने-पौने दामों पर बिका करेगी, क्योंकि बाजार तो बाजार है। बाज़ार में दाम उठते-गिरते रहते हैं। परन्तु मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने से किसानों की अधिक सुरक्षा रहती है। किसानों के इस डर को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संसद में दूर कर दिया। उन्होंने बताया कि किसानों को उनकी फसल का न्यूनतम मूल्य हर हाल में मिलेगा। इसको सरकार समाप्त नहीं करेगी।   भारत में आज भी 50 फीसदी से अधिक आबादी कृषि कार्य में लगी हुई है। लेकिन भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ 18 फीसदी योगदान है। यह अत्यंत विचारणीय बिंदु है। पिछले वर्ष किए गए एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत कर्ज़ में दबे हुए हैं। वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी। वास्तव में किसानों को अपने उत्पाद का सही मूल्य इसलिए नहीं मिल पाता क्योंंकि वे बिचौलियों की मर्जी पर निर्भर हैं। हर किसान को खुला बाजार मिलने से उन्हें अपना माल बेचने की आजादी होगी। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछ राजनीतिक दल किसानों को एक पक्षीय तस्वीर दिखा रहे हैं।   सरकार की मंशा किसानों को उनकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाने की है। यह कानून किसानों के लिए काफी फायदेमंद सिद्ध हो सकता है। हालांकि इस बात का खतरा जरूर है कि उनकी फसलों पर देश के बड़े पूंजीपति अग्रिम कब्जा कर बाजार में ज्यादा महंगा बेचने लगें। ऐसा भी संभव है कि वे किसानों को अग्रिम पैसा देकर फसलों की खरीददारी पहले ही सुनिश्चित कर लें। यह खतरा तो रहेगा। पर इसमें भी फायदा किसानों का ही होगा। इस नई व्यवस्था में किसानों का कोई अहित न होने पाए, इसके लिए सरकार एक सशक्त मॉनिटरिंग सिस्टम अवश्य बनाना चाहिए।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 23 September 2020


bhopal, Physicians

प्रमोद भार्गव भारत सरकार और राज्य सरकारें चिकित्साकर्मियों को कोरोना योद्धा का दर्जा दे रही हैं। इस सम्मान के वास्तव में वे अधिकारी हैं। अलबत्ता यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संसद में जब समाजवादी पार्टी के सांसद रविप्रकाश वर्मा ने सवाल पूछा कि अबतक देश में कितने चिकित्सक और चिकित्साकर्मियों की मौतें हुई हैं तो इसके उत्तर में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे का उत्तर आश्चर्य में डालने वाला रहा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के पास कोरोना संक्रमण से प्राण गंवाने वाले चिकित्सकों के आंकड़े नहीं हैं, क्योंकि यह मामला केंद्र का विषय न होकर राज्य का विषय है। निश्चित ही यह विषय राज्य का है लेकिन इस कंप्युटर युग में राज्यों से आंकड़े जुटाना केंद्र के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। इसी तरह सरकार ने कोरोना काल में मृतक पुलिसकर्मियों और प्रवासी मजदूरों के आंकड़े देने में असमर्थता जता दी। हालांकि भारतीय चिकित्सा संगठन (आईएमए) ने अगले दिन कोरोना काल में सेवाएं देते हुए शहीद 382 चिकित्सकों की सूची जारी कर दी। आईएमए ने इन्हें त्याग की प्रतिमूर्ति और राष्ट्रनायक मानते हुए प्राण गंवाने वाले चिकित्सकों को शहीद और परिवार को मुआवजा देने की मांग भी की है। यह सूची 16 सितंबर 2020 तक कोरोना काल के गाल में समाए चिकित्सकों की है। कोरोना से शहीद हुए चिकित्सकों की इस सूची में केवल एमबीबीएस डॉक्टर हैं। इनके अलावा आयुर्वेद, होम्योपैथी और अन्य वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े डॉक्टर भी कोरोना की चपेट में आकर मारे गए हैं। अभीतक कुल 2238 एमबीबीएस चिकित्सक कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं। चिकित्सकों के प्राणों का इस तरह से जाना, निकट भविष्य में चिकित्सकों की कमी और बढ़ा सकता है। इस सबके बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। विपरीत परिस्थितियों में इलाज करना बहुत मुश्किल है लेकिन उनका उत्साह बरकरार है। जबकि अस्पतालों में विषाणुओं से बचाव के सुरक्षा उपकरण पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं, बावजूद डॉक्टर जान हथेली पर रखकर इलाज में लगे हैं। यह विषाणु कितना घातक है, यह इस बात से भी पता चलता है कि चीन में फैले कोरोना वायरस की सबसे पहले जानकारी व इसकी भयावहता की चेतावनी देने वाले डॉ ली वेनलियांग की मौत हो गई। चीन के वुहान केंद्रीय चिकित्सालय के नेत्र विशेषज्ञ वेनलियांग को लगातार काम करते रहने के कारण कोरोना ने चपेट में ले लिया था। वेनलियांग ने मरीजों में सात ऐसे मामले देखे थे, जिनमें सॉर्स जैसे किसी वायरस के संक्रमण के लक्षण दिखे थे और इसे मनुष्य के लिए खतरनाक बताने वाला चेतावनी से भरा एक वीडियो भी सार्वजनिक किया था। भारत में वैसे भी आबादी के अनुपात में चिकित्सकों की कमी है। इसके बावजूद वे दिन-रात अपने कर्तव्य के पालन में जुटे हैं। दरअसल कोरोना वायरस संक्रमण से हमारे चिकित्सक और चिकित्साकर्मी सीधे जूझ रहे हैं। चूंकि ये सीधे रोगियों के संपर्क में आते है, इसलिए इनके लिए विशेष प्रकार के सूक्ष्म जीवों से सुरक्षा करने वाले बायो सूट और एन-5 मास्क पहनने को दिए जाते हैं। बायो सूट को ही पीपीई अर्थात व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण कहा जाता है। यह एक प्रकार का बरसात में उपयोग में लाए जाने वाले बरसाती जैसा होता है। किंतु लगातार काम करते रहने के दौरान अदृश्य कोरोना विषाणु कब स्वास्थ्कर्मियों को हमला बोल दे, इसका अहसास मुश्किल है। भारत में चिकित्सकों की असमय मौत इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर की मौजूदगी अनिवार्य मानता है, लेकिन भारत में यह अनुपात 0.62.10 है। 2015 में राज्यसभा को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने बताया था कि 14 लाख ऐलौपैथी चिकित्सकों की कमी है। किंतु अब यह कमी 20 लाख हो गई है। इसी तरह 40 लाख नर्सों की कमी है। अबतक सरकारी चिकित्सा संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता और चिकित्सकों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन ध्यान रहे कि लगभग 60 प्रतिशत मेडिकल कॉलेज निजी क्षेत्र में हैं। कोरोना के इस भीषण संकट में सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज दिन-रात रोगियों के उपचार में लगे हैं, लेकिन जिन निजी अस्पतालों और कॉलेजों को हम उपचार के लिए उच्च गुणवत्ता का मानते थे, उनमें से ज्यादातर की इस संकटकाल में तालाबंदी कर दी है। जिला और संभाग स्तर के अधिकांश निजी अस्पताल बंद रहे थे। हालांकि अब ये अस्पताल खुलने लगे हैं, लेकिन रोगी में कोरोना के लक्षण देखते ही उसे अस्पताल से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। एमसीआई द्वारा जारी 2017 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 10.41 लाख ऐलोपैथी डॉक्टर पंजीकृत हैं। शेष या तो निजी अस्पतालों में काम करते हैं या फिर निजी प्रैक्टिस करते हैं। इसके उलट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पंजीकृत ऐलोपैथी डॉक्टरों की संख्या 11.59 लाख है, किंतु इनमें से केवल 9.27 लाख डॉक्टर ही नियमित सेवा देते हैं। देश में फिलहाल 11082 की आबादी पर एक डॉक्टर का होना जरूरी है। लेकिन घनी आबादी वाले बिहार में 28,391 की जनसंख्या पर एक डॉक्टर है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी हालात बहुत अच्छे नहीं है। यदि देश की कुल 1.35 करोड़ आबादी का औसत अनुपात निकालें तब भी 1445 लोगों पर एक ऐलोपैथी डॉक्टर होना आवश्यक है। कोरोना महामारी के चलते स्पष्ट देखने में आ रहा है कि देश के ज्यादातर निजी चिकित्सालय बंद हैं, साथ ही जो ऐलोपैथी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते हैं, उन्होंने भी फिलहाल रोगी के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों को इस कोरोना संकट से सबक लेते हुए ऐसे कानूनी उपाय करने होंगे कि बढ़ते निजी चिकित्सालयों और निजी प्रैक्टिस पर लागम लगे तथा सरकारी अस्पताल व स्वास्थ्य केंद्रों की जो श्रृंखला गांव तक है, उसमें चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थित की अनिवार्यता के साथ उपकरण व दवाओं की मात्रा भी सुनिश्चित हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 September 2020


bhopal,Alternative routes to school education

गिरीश्वर मिश्र स्कूली शिक्षा सभ्य बनाने के लिए एक अनिवार्य व्यवस्था बन चुकी है। शिक्षा का अधिकार संविधान का अंश बन चुका है। भारत में स्कूलों पर प्रवेश के लिए बड़ा दबाव है और अभी करोड़ों बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। जो स्कूल जा रहे हैं उनमें से काफी बड़ी संख्या में बीच में ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। यानी शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। दूसरी तरफ स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। बच्चों को उनकी रुचि, क्षमता और स्थानीय सांस्कृतिक प्रासंगिकता आदि को दरकिनार रख सभी को एक ही ढाँचे में एक ही तरह के सांचे में ढाल कर शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। सरकार की औपचारिक शिक्षा प्रणाली फैक्ट्री में थोक के हिसाब से माल तैयार करने के तर्ज पर एक ही तरह के मानक की पक्षधर है। मनुष्य मात्र में जन्म से ही दिखने वाली व्यक्तिगत भिन्नता के तथ्य की अनदेखी करते हुए और मानवीय प्रतिभा की सृजनात्मकता और स्वतन्त्र चिंतन की नैसर्गिक विशेषताओं को भुलाकर सबके लिए एक ही पैमाने का उपयोग व्यवस्था की दृष्टि से सुभीता तो जरूर देता है पर सहज मानसिक विकास में बाधक होता है। कुल मिलाकर मुख्यधारा के स्कूलों को लेकर काफी असंतोष देखने को मिलता है। शिक्षा में जिस खुलेपन और विविधता की जरूरत होती है उसके लिए विद्यालय की संस्था को अधिक संवेदनशील और आग्रहमुक्त होने की जरूरत है। वैसे भी विश्व की अनेक प्रतिभावान विभूतियों ने स्कूल की संस्था की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न उठया है। स्कूलों की संस्था की उपयोगिता के विवाद में न भी पड़ें तो स्कूलों में विविधता इसलिए भी जरूरी है कि स्कूली आयु के बच्चे न केवल सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अनेक तरह की पृष्ठभूमियों से आते हैं बल्कि उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, स्कूल के लिए तत्परता और शारीरिक-मानसिक क्षमता (जैसा दिव्यांग बच्चों में मिलता है) और जटिल सामाजिक पारिवारिक परिवेश में भी अंतर पाए जाते हैं। कुंठा के चलते स्कूल छोड़कर चले जाने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है। देश अभी भी पूर्णत: साक्षर नहीं हो सका है। ऐसे में वैकल्पिक स्कूलों की व्यवस्था का महत्त्व बढ़ जाता है। आधुनिक भारत में प्रचलित स्कूली व्यवस्था एक ओर अपने औपनिवेशिक अतीत से बंधी है तो दूसरी ओर अब उसपर वैश्विकता का भूत सवार है। इन सबके बीच यथास्थिति बनी हुई है- न ययौ न तस्थौ। इनको अपर्याप्त मानते हुए वैकल्पिक स्कूल को लेकर कई प्रयास होते रहे हैं। पाठशाला, गुरुकुल और मदरसे तो जमाने से चले आ रहे थे। अंग्रेजों के जमाने में नया ढांचा चला जो अब मुख्यधारा बना हुआ है। गांधीजी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया था परन्तु 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी प्रतियोगिता और उपभोक्तावाद के आगोश में हम उसी शिक्षा पद्धति को चलाते रहे। इससे सामाजिक असमानता भी बढ़ी और मूल्यों की दृष्टि से भी हम कमजोर पड़ते गए। इसके समानांतर महंगे निजी स्कूलों की भी भरमार हो गई। वैकल्पिक दृष्टि से स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद ने प्रयास शुरू किया था। महात्मा गांधी, गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर, श्री अरविन्द, गीजू भाई बधेका, जिद्दू कृष्णमूर्ति के शैक्षिक प्रयासों से नए तरह के स्कूल के प्रयोग शुरू हुए। चिन्मय मिशन, साधू वासवानी ट्रस्ट, दयालबाग शैक्षिक संस्थान आदि भी इस दिशा में कार्यरत हैं। ऐसे ही मांटेसरी पद्धति के विद्यालय भी चल रहे हैं। सत्तर के दशक में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम, बंगलोर का विकासना, राजस्थान में दिगंतर, उत्तराखंड में सिद्ध स्कूल, मध्य प्रदेश में आधारशिला शिक्षण केंद्र, तमिलनाडु में विद्योदय स्कूल, बिहार में चरवाहा विद्यालय जैसे प्रयासों के साथ ही पूरे देश में इस तरह के प्रयास हो रहे हैं। राष्ट्रीय मुक्त शिक्षा संस्थान भी इस दिशा में कई नवाचारी प्रयास कर रहा है। इन वैकल्पिक स्कूलों के विचारों और अभ्यासों को आत्मसात कर मुख्यधारा की शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकेगा। भारत में नवाचारों के लिए प्रतिरोध आम बात है। माता-पिता, अभिभावक, नीति निर्माता, अध्यापक सभी चाहते हैं कि सुधार हो परन्तु यह सरल नहीं होता है। हम विकल्प के स्कूल के रूप में जिन संस्थाओं को पाते हैं वे प्राय: उन सीमाओं को लांघने की कोशिशें हैं, जिनसे उबरने के लिए मुख्यधारा की संस्थाएं जूझ रही हैं। वैकल्पिक स्कूल शिक्षा के उन्नयन की राह दिखाते हैं। इनमें बच्चे स्वयं अपनी प्रतिभा और रुचि को तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं। इस काम में अध्यापक, माता-पिता, हित मित्र सहायक का काम करते हैं। सीखना अपने आसपास के पूरे परिवेश के बीच और परिवेश के माध्यम से होता है। ज्ञान, कौशल और मूल्यों की बच्चे की अपनी चाह को आदर देते हुए वैकल्पिक स्कूल परीक्षा, प्रतिष्ठा और पद की लालसा के बदले सीखने की सामर्थ्य पर बल देते हैं। इनमें बच्चा या विद्यार्थी ही केंद्र में होता है। सीखने और सिखाने की कोई एक मानक शैली न होकर उसकी कई राहें खुली होती हैं। इन स्कूलों में ज्ञान के विषयों की सीमाएं आपस में मिलती हैं और उनके आपसी रिश्तों की पड़ताल की जाती है। सीखते हुए और खेलकूद, संगीत और कल्पनाशीलता के लिए अवसर मिलने से बच्चे की संवेदना का भी विस्तार होता है। जीवन को समृद्ध करने वाले आध्यात्मिक, सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों के साथ दायित्वों को जीवन में उतारने की कोशिश इन स्कूलों की ख़ास विशेषता होती है। लोकतांत्रिक और लचीले प्रशासन के बीच संचालित होने वाले इन स्कूलों में बच्चों को व्यावसायिक शिक्षा और उनके हुनर विकसित करने की भी व्यवस्था होती है। वैकल्पिक स्कूल बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं और उनमें ऐसा बहुत कुछ है जो मुख्यधारा के लिए प्रासंगिक और उपयोगी है। देश के लिए विकसित हो रही नई शिक्षा नीति में भी वैकल्पिक स्कूली शिक्षा को समर्थ बनाने की बात कही गई है। जरूरी है कि इस तरह के वैकल्पिक स्कूल से उन तत्वों को ग्रहण किया जाय जिनसे शिक्षा की मुख्यधारा को उस कैद से आजाद किया जाय जिनके चलते सीखने की जगह परीक्षा और कौशल की जगह प्राप्तांक को तरजीह मिलाती है। (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 22 September 2020


bhopal, India

रमेश सर्राफ धमोरा भारत-चीन सीमा पर पिछले 5 महीने से लगातार तनाव बना हुआ है। भारत में लद्दाख के पास भारत-चीन के मध्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों देशों की सेना तैनात है। जो हर स्थिति का सामना करने के लिए तत्पर है। भारत-चीन सीमा पर जारी तनाव के मद्देनजर पिछले 15 जून की रात्रि में हुए खूनी संघर्ष में भारतीय सेना के एक कर्नल सहित 20 जवान शहीद हो गए थे। हालांकि चीन की सेना की ओर से भी हताहत होने वाले जवानों की संख्या भारतीय जवानों से कई गुना अधिक थी। मगर चीन ने उस दिन मरने वाले जवानों का अधिकृत आंकड़ा अभीतक सार्वजनिक तौर पर जारी नहीं किया है। बरसों बाद सीमा रेखा पर भारत व चीन की सेना के जवानों में हुई मुठभेड़ में चीनी सेना को इस बात का एहसास हो गया कि भारतीय सेना के जवान उनसे कहीं अधिक मजबूत हैं। उस दिन अचानक हुए संघर्ष में चीनी सैनिकों ने लोहे की राड से बने पुरातन समय जैसे हथियारों का प्रयोग किया था। जबकि भारतीय सैनिक वैसा कोई हथियार लेकर नहीं गए थे। उस झड़प के बाद दोनों पक्षों के सैन्य कमांडरों में कई दौर की बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे हटने का फैसला किया था। मगर चीन की सेना ने उस फैसले का पूरी तरह पालन नहीं किया। जिस कारण दोनों तरफ तनाव बरकरार रहा। 28-29 अगस्त की रात्रि को चीनी सैनिकों ने लद्दाख के समीप एलएसी पर स्थित पैंगोंग झील के पास भारतीय सीमा में स्थित पहाड़ियों की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास किया था। मगर वहां पहले से ही मौजूद भारतीय सेना के जवानों ने चीनी सेना के मंसूबों को नाकामयाब कर दिया। भारतीय सेना के जवानों को पहले ही सूचना मिल गई थी कि चीन के सैनिक रात्रि में भारतीय सीमा में स्थित कई महत्वपूर्ण पहाड़ियों की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास करेंगे। इसलिए चीनी सैनिकों के पहुंचने से पहले ही भारतीय सैनिकों ने उन चोटियों पर पहुंचकर कब्जा जमा लिया। उसके बाद चीन द्वारा निरंतर प्रयास किया जा रहा है कि सीमा रेखा के नजदीक स्थित भारतीय क्षेत्र की ऊंची चोटियों पर अपना कब्जा जमाकर सामरिक दृष्टि से बढ़त हासिल कर लें। मगर भारतीय सेना के जवानों के सामने चीनी सैनिकों की सभी चालें असफल होती जा रही हैं। इससे चीन बुरी तरह बौखलाया हुआ है। वह चाहता है कि किसी तरह भारतीय सेना से उन महत्वपूर्ण चोटियों को खाली कराया जाये। चीन द्वारा लद्दाख से लगती भारतीय सीमा क्षेत्र के पास वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती की जा रही है। भारी मात्रा में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, तोपे, गोला बारूद व लड़ाई का अन्य साजो-सामान एकत्रित किया जा रहा है। इधर भारतीय सेना द्वारा भी चीनी सेना की तैयारियों को देखते हुए लद्दाख क्षेत्र में भारी सैन्य बल तैनात किया गया है। साथ ही बड़ी संख्या में युद्धक विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, तोप, मिसाइलें लगाई गई हैं। भारतीय सैनिकों ने जर्मनी से आए विशेष टेंट भी लगाने शुरू कर दिए हैं। जिनमें सर्दी के समय माइनस 50 डिग्री तापमान में भी आसानी से रह सकते हैं। भारतीय सेना द्वारा सीमा के निकट बड़ी मात्रा में सैनिकों के लिए खाद्य सामग्री, गोला बारूद व युद्ध का अन्य सामान पहुंचाया जा रहा है। इस काम में सेना सी- 17 ग्लोब मास्टर विमान, चिनूक हेलीकॉप्टर का उपयोग कर रही है। चिनूक हेलीकॉप्टर के माध्यम से अमेरिका में बनी होवित्जर तोप को भी पहाड़ों की चोटियों पर तैनात किया जा रहा है। साथ ही कारगिल युद्ध में पराक्रम दिखा चुकी बोफोर्स तोप व स्वदेषी धनुष तोप को भी सीमावर्ती क्षेत्र में लगाया जा रहा है। भारतीय सेना चीनी सेना को हर तरह से जवाब देने में सक्षम है। भारतीय सेना के जवानों का जोश देखने काबिल है। वह चीन से अपनी 1962 की हार का बदला लेने को बेकरार नजर आ रहे हैं। छोटी-छोटी मुठभेड़ों से ही चीनी सेना को पता लग गया है कि अब भारत में 1962 से स्थिति एकदम से पलट गई है। भारतीय सेना भी युद्ध के लिए पूरी तैयारी कर रही है। चीन से मुकाबला करने के लिए भारतीय वायुसेना में हाल ही में शामिल फ्रांस में बने राफेल युद्धक विमानों को भी पहाड़ी मोर्चे पर तैनात कर दिया गया है। राफेल विमान सीमा के निकटवर्ती क्षेत्रों में लगातार उड़ान भर रहे हैं। किसी भी स्थिति का मुकाबला करने को लेकर वो पूरी तरह से तैयार नजर आ रहे हैं। कोविड-19 के कारण चीन पहले ही पूरी दुनिया के निशाने पर आया हुआ है। उससे दुनिया का ध्यान हटाने के लिए चीन भारतीय सीमा पर छेड़खानी कर रहा है। मगर इसबार भारतीय सेना भी उनके गले की घंटी बन गई है। वर्षों से चीन की नीति रही है कि भारतीय सीमा में घुसकर अपना रुतबा जमाता आ रहा है। फिर भारतीय पक्ष उसको पीछे हटने का निवेदन करता रहा है। मगर इसबार वैसा कुछ भी नहीं हुआ। चीन अपनी पुरानी आदत के अनुसार जैसे ही भारतीय सीमा में घुसपैठ करना शुरू किया। वैसे ही उसे भारतीय सैनिकों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सेना को चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी छूट प्रदान की है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15-16 जून की घटना के बाद लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा कर भारतीय सेना के जवानों से मिलकर उनका मनोबल बढ़ाया। चीन का मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना द्वारा लगातार आधुनिक हथियार व गोला-बारूद की आपातकालीन खरीदारी की जा रही है। सेना को उसकी जरूरत का हर साजो-सामान मुहैया कराया जा रहा है। इस वक्त अमेरिका, इजरायल, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी कोरिया जैसे देश भी खुलकर भारत के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। अमेरिका, इजरायल, फ्रांस, रूस तो अपने आधुनिकतम हथियार तक भारत को देने के लिए तैयार हो गए हैं। चीन की सेना यदि भारत से युद्ध करती है तो उससे मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना पूरी तरह सजग व सतर्क नजर आ रही है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 5 सालों में भारतीय सेना का तेजी से आधुनिकीकरण किया जा रहा है। सेना की हर जरूरत को सरकार प्राथमिकता के आधार पर पूरा कर रही है। इसी श्रृंखला में पूर्व सैनिकों को बहु प्रतीक्षित वन रैंक वन पेंशन का लाभ दिया जा चुका है। अग्रिम मोर्चे पर लड़ने वाले सेना के जवानों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट, बुलेट प्रूफ हेलमेट, अत्याधुनिक राइफलें उपलब्ध करवाई गई है। सर्दी के मौसम में हिमालय क्षेत्र में तैनात जवानों के लिए विशेष ड्रेस तैयार करवाई गई है। जिनको पहनकर सैनिक आराम से सर्दी का मुकाबला कर सकते हैं। चीन, पाकिस्तान सहित दुनिया के उन देशों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि आज का भारत दुनिया में किसी देश से कम नहीं है। हालांकि भारत युद्ध में विश्वास नहीं रखता है हमेशा शांति के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। मगर युद्ध की स्थिति में किसी भी चुनौती का मुकाबला करने में हर हाल में सक्षम है। यदि कोई भारतीय सेना की शक्ति को कमतर करके आंकता है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। आज भारतीय सेना विश्व की प्रथम पांच सबसे मजबूत सेना में शामिल है। ऐसे में भारत से टकराने की हिमाकत शायद ही कोई देश करेगा। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 22 September 2020


bhopal,Cheap politics on farmers

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   किसानों के बारे में लाए गए विधेयकों पर राज्यसभा में जिस तरह का हंगामा हुआ है, क्या इससे हमारी संसद की इज्जत बढ़ी है? दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भारत है। पड़ोसी देशों के सांसद हमसे क्या सीखेंगे? विपक्षी सांसदों ने इन विधेयकों पर सार्थक बहस चलाने के बजाय राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश पर सीधा हमला बोल दिया। उनका माइक तोड़ दिया। नियम-पुस्तिका फाड़ दी। धक्का-मुक्की की। सदन में अफरा-तफरी मचा दी। उच्च सदन को निम्न कोटि का बाजार बना दिया। यही विधेयक लोकसभा में भी पारित हुआ है लेकिन वहां तो ऐसा हुड़दंग नहीं हुआ। जिसे वरिष्ठ नेताओं का उच्च सदन कहा जाता है, उसके आठ सदस्यों को निलंबित करना पड़ जाए तो उसे आप सदन कहेंगे या अखाड़ा?   विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि उपसभापति ने ध्वनिमत से इन किसान-कानूनों को पारित करके 'लोकतंत्र की हत्या' कर दी है और सत्तारूढ़ दल के नेता इसे विपक्षियों की 'शुद्ध गुंडागर्दी' बता रहे हैं। यह ठीक है कि ध्वनि मत से प्रायः वे ही विधेयक पारित किए जाते हैं, जिन पर लगभग सर्वसम्मति-सी होती है। यदि एक भी सांसद किसी विधेयक पर बाकायदा मतदान की मांग करे तो पीठासीन अध्यक्ष को मजबूरन मतदान करवाना पड़ता है। इस संसदीय नियम का पालन नहीं हो पाया, क्योंकि विपक्षी सांसदों ने इतना जबर्दस्त हंगामा मचाया कि सदन में अराजकता फैल गई। विपक्ष की सोच है कि यदि बाकायदा मतदान होता तो ये विधेयक कानून नहीं बन पाते।   विपक्ष को पिछले 6 साल में यही मुद्दा हाथ लगा है, जिसके दम पर देश में गलतफहमी फैलाकर कोई आंदोलन खड़ा कर सकता है। प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री ने साफ-साफ कहा है कि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्यों, मंडियों और आड़तियों की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहेगी लेकिन अब किसानों के लिए खुले बाजार के नए विकल्प भी खोले जा रहे हैं ताकि उनकी आमदनी बढ़े। इस नए प्रयोग के लागू होने के पहले ही उसे बदनाम करने की कोशिश को घटिया राजनीति नहीं कहें तो क्या कहेंगे? सरकार ने छह रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में 50 से 300 रु. प्रति क्विन्टल की वृद्धि कर दी है। प्रसिद्ध किसान नेता स्व. शरद जोशी के लाखों अनुयायियों ने इस कानून के पक्ष में आंदोलन छेड़ दिया है। मेरी राय में ये दोनों आंदोलन इस समय अनावश्यक हैं। ज़रा सोचें कि कोई राजनीतिक दल देश के 50 करोड़ किसानों को लुटवाकर अपने पांव पर क्या कुल्हाड़ी मारना चाहेगा?   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 22 September 2020


bhopal,Government over government in Pakistan

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   पाकिस्तान में पीपल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने लगभग सभी प्रमुख विरोधी दलों की बैठक बुलाई, जिसमें पाकिस्तानी फौज की कड़ी आलोचना की गई। पाकिस्तानी फौज की ऐसी खुलेआम आलोचना करना तो पाकिस्तान में देशद्रोह-जैसा अपराध माना जाता है। नवाज़ शरीफ ने अब इस फौज को नया नाम दे दिया है। उसे नई उपाधि दे दी है। फौज को अबतक पाकिस्तान में और उसके बाहर भी 'सरकार के भीतर सरकार' कहा जाता था लेकिन मियां नवाज़ ने कहा है कि वह 'सरकार के ऊपर सरकार' है। यह सत्य है।   पाकिस्तान में अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ ने अपना फौजी शासन कई वर्षों तक चलाया ही लेकिन जब गैर-फौजी नेता लोग सत्तारुढ़ रहे, तब भी असली ताकत फौज के पास ही रहती चली आई है। अब तो यह माना जाता है कि इमरान खान को भी जबर्दस्ती जिताकर फौज ने ही पाकिस्तान पर लादा है। फौज के इशारे पर ही अदालतें जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और गिलानी जैसे नेताओं के पीछे पड़ती रही हैं। ये ही अदालतें क्या कभी पाकिस्तान के बड़े फौजियों पर हाथ डालने की हिम्मत करती हैं? पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा की अकूत संपत्तियों के ब्यौरे रोज़ उजागर हो रहे हैं लेकिन उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। मियां नवाज ने कहा है कि विपक्ष की लड़ाई इमरान खान से नहीं है, बल्कि उस फौज से है, जिसने इमरान को गद्दी पर थोप रखा है।   यहां असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के नेता लोग फौज से लड़ पाएंगे? ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि फौज थोड़ी पीछे खिसक जाए। सामने दिखना बंद कर दे, जैसा कि 1971 के बाद हुआ था या जैसा कि कुछ हद तक आजकल चल रहा है लेकिन फौज का शिकंजा पाकिस्तानियों के मन और धन पर इतना मजबूत है कि उसे कमजोर करना इन नेताओं के बस में नहीं है। पाकिस्तान का चरित्र कुछ ऐसा ढल गया है कि फौजी वर्चस्व के बिना वह जिंदा भी नहीं रह सकता। यदि पंजाबी प्रभुत्ववाली फौज कमजोर हो जाए तो पख्तूनिस्तान और बलूचिस्तान टूटकर अलग हो जाएंगे। सिंध का भी कुछ भरोसा नहीं।1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तानी जनता के मन में भारत-भय इतना गहरा पैठ गया है कि उसका एकमात्र मरहम फौज ही है। फौज है तो कश्मीर है। फौज के बिना कश्मीर मुद्दा ही नहीं रह जाएगा। इसके अलावा फौज ने करोड़ों-अरबों रु. के आर्थिक व्यापारिक संस्थान खड़े कर रखे हैं। जबतक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का मूल चरित्र नहीं बदलेगा, वहां फौज का वर्चस्व बना रहेगा। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Now Delhi will be

ऋतुपर्ण दवे कहते हैं समय के साथ काफी कुछ बदल जाता है या बदल दिया जाता है। कुछ इसी तर्ज पर लुटियंस की दिल्ली की सबसे बड़ी पहचान इण्डियन होने जा रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मंदिर जहाँ जनता के प्रतिनिधि बैठते हों उसकी स्वतंत्रता के बरसों बाद तक विदेशी छाप क्यों रहे? वर्तमान संसद भवन को चाहे गुलामी की मानसिकता से जकड़ी भव्य इमारत कह लें या अंग्रेजी वास्तु शिल्प की मिसाल या फिर स्वंतत्रता के बाद भी गुलामी की पहचान लेकिन सच यही है कि अंदर बैठने वाले हों या बाहर से देखने वाले, हर भारतीय के मन में लुटियंस की यह साकार परिकल्पना जरूर टीसती होगी। आज भी जब दिल्ली के संदर्भ में लुटियंस की चर्चा होती है तो यह गुलामी के दौर की भावना का अंदर तक एहसास कराता है। शायद ऐसा कुछ संसद में बैठकर हमारे गणमान्य भी महसूस करते रहे होंगे, शायद इसी भावना से निर्णय भी लिया गया हो! जिससे भारतीय वास्तुशिल्प की नई कृति के रूप में नया और विशुध्द भारतीय संसद भवन बने। जो भारतीय नक्शाकारों, भारतीय हाथों और वर्तमान भारतीय जरूरत के हिसाब से न केवल डिजाइन्ड हो बल्कि भविष्य की जरूरतों और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप देश के लिए वह नया मॉडल बने जिसे हम गर्व से कह सकें कि ये लुटियंस की नहीं इण्डियन्स की बनाई संसद है। करीब सवा बरस में 92 बरस पूर्व बनी संसद का नया भवन राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट के बीच 60 हजार स्क्वायर मीटर में त्रिकोणीय आकार में बनेगा, जिसके माथे पर प्रतीक चिन्ह अशोक भी संभव है। इसमें 120 दफ्तर होंगे। सांसदों, उप-राष्ट्रपति और स्पीकर समेत विशिष्ट अतिथियों के लिए छह अलग-अलग दरवाजे होंगे। यहाँ 1350 सांसद बैठ सकेंगे। राज्यसभा की नई इमारत में 400 सीटें होंगी। यह भविष्य के परिसीमन की जरूरतों को लंबे समय तक पूरा करेगा। इसकी गैलरी में 336 से अधिक लोग बैठ पाएंगे। इसमें दो सांसदों के लिए एक सीट होगी, जिसकी लंबाई 120 सेंटीमीटर होगी यानी एक सांसद को बैठने की खातिर 60 सेमी जगह मिलेगी। संयुक्त सत्र के दौरान इन्हीं दो सीटों पर तीन सांसद बैठेंगे। नयी संसद में देश की विविधता को दर्शाने के लिए विशेष ध्यान रख एक भी खिड़की किसी दूसरी खिड़की से मेल खाने वाली नहीं होगी यानी हर खिड़की अलग आकार और अंदाज की होगी जो भारतीय विविधताओं को दर्शाएगी। निश्चित रूप से नयी संसद सुन्दरता और भारतीय वास्तु शिल्प के लिहाज से अनूठी होगी। नई इमारत संसद भवन के प्लॉट संख्या 18 पर बनेगी। निर्माण सेंट्रल विस्टा रिडेवलपमेंट परियोजना के तहत होगा। साढ़े 9 एकड़ में संसद भवन की नयी इमारत बनेगी जबकि करीब 63 एकड़ में नया केन्द्रीय सचिवालय और 15 एकड़ में आवास बनेगा। इससे अलग-अलग स्थानों पर दूर-दूर मौजूद सभी केन्द्रीय मंत्रालय, उनके कार्यालय एक ही जगह यानी आसपास हो जाएं। जाहिर है देश की जरूरतों के लिहाज से सारे कार्यालय एक जगह होना समय की बचत के साथ बेहद सुविधाजनक व खर्चों में कमी के लिहाज से उपयोगी होगा। यहाँ प्रधानमंत्री आवास भी केन्द्रीय सचिवालय के आसपास साउथ ब्लॉक स्थित बनने वाले नए प्रधानमंत्री कार्यालय के पास बन सकता है जो अभी लोक कल्याण मार्ग पर है। जिससे प्रधानमंत्री के घर व दफ्तर आते-जाते वक्त यातायात न रोकना पड़े। शायद इसीलिए केवल एक प्लाट जिसकी संख्या 7 है, उसका भू-उपयोग बदलकर आवासीय किया गया है जो उत्तर में साउथ ब्लॉक, दक्षिण में दारा शिकोह रोड, पूर्व में साउथ ब्लॉक का हिस्सा है। जबकि पश्चिम में राष्ट्रपति भवन के दरम्यान 15 एकड़ क्षेत्रफल में फैला है। वहीं अलग-अलग क्षेत्रफल के प्लाट संख्या 3, 4, 5 और 6 का भू उपयोग सरकारी कार्यालयों एवं मनोरंजन पार्क में किया जाएगा। इस तरह संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय एवं आवास, केन्द्रीय सचिवालय सब एक ही जगह हो जाएंगे जो देखने लायक और दिल्ली में लुटियंस नहीं इण्डियन्स की पहचान बनेंगे। नए केंद्रीय सचिवालय के लिए विजय चौक से इंडिया गेट के बीच चार प्लॉट पर 10 आधुनिक इमारतें बनेंगी, जिनमें केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय होंगे। अभी केंद्र के 51 मंत्रालयों में केवल 22 मंत्रालय सेंट्रल विस्टा में हैं। तीन प्लॉट में तीन-तीन 8 मंजिला इमारतें और चौथे प्लॉट में एक इमारत के अलावा कन्वेंशन सेंटर होगा जिसमें 8000 लोगों की बैठक क्षमता होगी तथा 7 हॉल होंगे। सबसे बड़े हॉल में 3500 लोग, दूसरे में 2000, तीसरे में 1000 लोग बैठ सकेंगे जबकि 500 लोगों की बैठने की क्षमता के तीन छोटे हॉल भी होंगे। सभी इमारतों की ऊंचाई इंडिया गेट से कम होगी। नए निर्माण के दौरान कृषि भवन, शास्त्री भवन, निर्माण भवन व साउथ ब्लॉक के समीप कई अन्य महत्वपूर्ण इमारतों, बंगलों को तोड़कर नया परिसर बनेगा। इसका मतलब यह नहीं कि मौजूदा संसद भवन का महत्व कमेगा। यह ऐतिहासिक धरोहर थी, है और रहेगी। 91 साल पुरानी मौजूदा संसद, वास्तु शिल्प का बेजोड़ नमूना है जो मात्र 83 लाख रुपए में, करीब 6 वर्षों में बनी थी। जबकि नया भवन बस सवा साल में 861.90 करोड़ रुपयों में भारतीय कंपनी टाटा ग्रुप के हाथों बनेगा। वर्तमान संसद भवन की नींव 12 फरवरी 1921 को ड्यूक ऑफ कनाट ने रखी थी जिसके नाम पर कनाट प्लेस है। दिल्ली के सबसे भव्य भवनों में एक मौजूदा भवन उस वक्त के मशहूर वास्तुविद एडविन लुटियंस के डिजाइन और हर्बर्ट बेकर की देखरेख में बना। अपने अद्भुत खम्भों और गोलाकार बरामदों के कारण यह पुर्तगाली स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना कहलाया। इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया था। शुरू में यह सर्कुलर हाउस कहलाया जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं। गोलाकार आकार में निर्मित भवन का व्यास 170.69 मीटर और परिधि आधा किमी से अधिक 536.33 मीटर है जो करीब 6 एकड़ (24281.16 वर्ग मीटर) में फैला हुआ है। दो अर्धवृत्ताकार भवन, केन्द्रीय हाल को खूबसूरती से घेरे हुए हैं। भवन के पहले तल का गलियारा 144 खम्भों पर टिका है जिसके हर खम्भे की लंबाई 27 फीट है। बाहरी दीवार में मुगलकालीन जालियां लगी हैं और बहुत ही जिओमेट्रिकल ढंग से बनीं हैं। पूरे भवन में 12 दरवाजे और एक मुख्य द्वार है। यूं तो पूरा संसद तीन भागों लोकसभा, राज्यसभा और सेण्ट्रल हाल में बंटा है। जिसमें लोकसभा का कक्ष 4800 वर्गफीट में बना है। बीच में एक स्थान पर लोकसभा अध्यक्ष का आसन है। सदन में केवल 550 सदस्यों के लिए 6 भागों में बंटी 11 पंक्तियों की बैठक व्यवस्था के अलावा अधिकारियों, पत्रकारों के बैठने की व्यवस्था है। ऐसी ही बैठक व्यवस्था राज्यसभा सदस्यों की भी है जिनकी संख्या 238 है जो 250 तक बढ़ सकती है। संसद का तीसरा प्रमुख भवन केन्द्रीय कक्ष है जो गोलाकार है। इसके गुम्बद का व्यास 98 फीट है जो विश्व के महत्वपूर्ण गुम्बदों में एक और बेहद खास है क्योंकि यहीं 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने भारतीयों को उनकी सत्ता सौंपी थी। भारतीय संविधान का प्रारूप भी यहीं तैयार हुआ। मौजूदा संसद की पूरी डिजाइन, मध्य प्रदेश के मुरैना जिला स्थित मितालवी में बने 9 वीं शताब्दी के इकोत्तरसो या इंकतेश्वर महादेव मंदिर जिसे अब चौंसठ योगिनी मंदिर के नाम से जाना जाता है, उससे प्रेरित है। नया संसद भवन समय के साथ प्रासंगिक है। 2026 में संसदीय क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा, आबादी के साथ संसदीय कार्यक्षेत्रों की संख्या बढ़ेगी, तब सुरक्षा, तकनीक और सहूलियत के लिहाज से भी नया भवन जरूरी होगा और दिल्ली की पहचान धीरे-धीरे लुटियंस नहीं इण्डियन्स की दिल्ली होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal,Farmer freed from middlemen

प्रमोद भार्गव कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयक जबरदस्त हंगामें के बाद राज्यसभा से भी पारित हो गए। दरअसल तीन माह पहले जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने इनका स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा में पारित कराने के बाद राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तो एकाएक राजनीतिक गुल खिलने शुरू हो गए। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान मच गया। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हो गए। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं सामने आने लगीं। दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार दावा कर रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा और किसान को वैकल्पिक बाजार मिलेगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेश से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पादकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 को कानूनी दर्जा दे दिया है। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गईं मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा खत्म हो जाएगी। किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रॉनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया जाएगा। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहे उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को आशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण कर नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है। लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है। चूंकि इन विधेयकों ने अब कानूनी रूप ले लिया है, इसलिए भारतीय कृषि को नए युग में प्रवेश के द्वार खुल गए हैं। बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। क्योंकि विधेयक में इस बावत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं। क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। बावजूद एमएसपी इसलिए बनी रहेगी, क्योंकि सरकार को लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाने और आपात स्थितियों से निपटने के लिए अनाज का भंडारण करना जरूरी है। साथ ही पूरे देश की खाद्य सुरक्षा की गारंटी केंद्र सरकार की है। इसलिए भारतीय खाद्य निगम द्वारा अनाज की खरीद जारी रखना मजबूरी भी है और जरूरी भी। निगम और अन्य सरकारी व सहकारी एजेंसियां जो उपज खरीदती हैं, उसी पर एमएसपी दी जाती है। सरकार को यह गारंटी जरूर देनी चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंका दूर हो जाती है तो किसान निश्चिंत हो जाएगा। विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, नतीजतन मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव-खेत में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभीतक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को धनराशि के लिए व्यापारी के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति' लाई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। बीते कुछ समय से पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निःसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Anti-India terror and espionage

डॉ. वेदप्रताप वैदिक नौ आतंकियों और तीन जासूसों की गिरफ्तारी की खबर देश के लिए चिंताजनक है। आतंकी अल-कायदा और पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं और जासूस चीन से! जासूसी के आरोप में राजीव शर्मा नामक एक पत्रकार को भी गिरफ्तार किया गया है। जिन नौ आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है, वे सब केरल के हैं। वे मलयाली मुसलमान हैं। इनमें से कुछ प. बंगाल से भी पकड़े गए हैं। इन दोनों राज्यों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इन लोगों को कुख्यात अल-कायदा और पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी से संपर्क रखते हुए पकड़ा है। इनपर आरोप है कि इनके घरों से कई हथियार, विस्फोटक सामग्री, जिहादी पुस्तिकाएं और बम बनाने की विधियां और उपकरण पकड़े गए हैं। ये आतंकी दिल्ली, मुंबई और कोची में हमला बोलनेवाले थे। ये कश्मीर पहुंचकर पाकिस्तानी अल-कायदा द्वारा भेजे गए हथियार लेनेवाले थे। ये लोग केरल और बंगाल के भोले मुसलमानों को फुसलाकर उनसे पैसे भी उगा रहे थे। भारत में लोकतंत्र है और कानून का राज है, इसलिए इन लोगों पर मुकदमा चलेगा। ये लोग अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए तथ्य और तर्क भी पेश करेंगे। उन्हें सजा तभी मिलेगी, जबकि वे दोषी पाए जाएंगे। लेकिन ये लोग यदि हिटलर के जर्मनी में या स्तालिन के सोवियत रुस में या माओ के चीन में या मि के उ. कोरिया में पकड़े जाते तो आप ही बताइए इनका हाल क्या होता? इन्हें गोलियों से भून दिया जाता। अन्य संभावित आतंकियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाती। ये आतंकी यह क्यों नहीं समझते कि इनके इन घृणित कारनामों की वजह से इस्लाम और मुसलमानों की फिजूल बदनामी होती है। जहां तक चीन के लिए जासूसी करने का सवाल है, यह मामला तो और भी भयंकर है। जहां तक आतंकियों का सवाल है, वे लोग या तो मज़हबी जुनून या जिहादी उन्माद में फंसे होते हैं। उनमें गहन भावुकता होती है लेकिन शीर्षासन की मुद्रा में। किन्तु जासूसी तो सिर्फ पैसे के लिए की जाती है। लालच के खातिर ये लोग देशद्रोह पर उतारू हो जाते हैं। पत्रकार राजीव शर्मा और उसके दो चीनी साथियों पर जो आरोप लगे हैं, वे यदि सत्य हैं तो उनकी सजा कठोरतम होनी चाहिए। राजीव पर पुलिस का आरोप है कि उसने एक चीनी औरत और एक नेपाली आदमी के जरिए चीन-सरकार को दोकलाम, गलवान घाटी तथा हमारी सैन्य तैयारी के बारे में कई गोपनीय और नाजुक जानकारियां भी दीं। इन तीनों के मोबाइल, लेपटाॅप और कागजात से ये तथ्य उजागर हुए। राजीव के बैंक खातों की जांच से पता चला है कि साल भर में उसे विभिन्न चीनी स्त्रोतों से लगभग 75 लाख रु. मिले हैं। भारत के विरुद्ध जहर उगलनेवाले अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' में राजीव ने लेख भी लिखे हैं। देखना यह है कि उन लेखों में उसने क्या लिखा है? दिल्ली प्रेस क्लब के अध्यक्ष आनंद सहाय ने बयान दिया है कि राजीव शर्मा स्वतंत्र और अनुभवी पत्रकार है और उसकी गिरफ्तारी पुलिस का मनमाना कारनामा है। वैसे तो किसी पत्रकार पर उक्त तरह के आरोप यदि सत्य हैं तो यह पत्रकारिता का कलंक है और यदि यह असत्य है तो इसे सरकार और पुलिस का बेहर गैर-जिम्मेदाराना काम माना जाएगा। दिल्ली पुलिस को पहले भी पत्रकारों के दो-तीन मामलों में मुंह की खानी पड़ी है। उसे हर कदम फूंक-फूंककर रखना चाहिए। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 20 September 2020


bhopal, There is more reason for disillusionment with studies

डॉ. राकेश राणा विद्यालयों के प्रति विद्यार्थियों का होता मोहभंग, हमें सोचने पर विवश करता है। आखिर ऐसे कौन से कारण हैं जो विद्यार्थियों को इस स्तर तक विमुख कर रहे हैं कि वे मौज-मस्ती की उम्र में भी कॉलेज जैसे आनन्द स्थलों पर झांकना पसंद नहीं कर रहे हैं। हम निरन्तर स्कूल, कॉलेज और विद्यालयों-विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं। दूसरी तरफ बच्चे इनमें आ नहीं रहे हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है। मजे की बात यह है कि नामांकन का आंकड़ा बढ़ रहा है। कहीं-कहीं और कुछ विषयों एवं क्षेत्रों में तो यह उल्लेखनीय ढंग से दर्ज हो रहा है। देश के कुछ बड़े शहरों और प्रतिष्ठत संस्थानों में दाखिलों को लेकर जो मारा-मारी हर सत्र में दिखती है वह विरोधाभासों के साथ इस समस्या की जटिलता को उजागर करती है। प्रत्येक बच्चा पढ़ना चाहता है और प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है। फिर भी विद्यार्थी विद्यालय और कक्षाओं में नहीं हैं। अभी कोरोना संकट के चलते यह स्थिति और पेचीदा होती जा रही है। आखिर बच्चों की अनुपस्थिति की वजह क्या है? क्या उनकी अध्ययन में कोई रुचि नहीं है? क्या कक्षाएं इतनी अनाकर्षित हो गई हैं? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी निरुद्देश्य हो गयी है? क्या गुरु-ब्रहम् की संस्कृति का मूल्य इतना तिरोहित हो गया है? उथली वजहों में पाठ्यक्रमों का रुचिकर न होना, पाठ्यक्रमों का नीरस, बोझिल और एक ही ढर्रे पर बने रहना, पाठयक्रमों का विद्यार्थियों की रुचियों से दूर-दूर तक ताल्लुक न होना, महाविद्यालय प्रांगण का नीरस वातावरण, बदलते दौर में शिक्षक-शिक्षार्थी के मध्य समरसता का अभाव, युवक-युवतियों के बदलते व्यवहार के प्रति उपेक्षा भाव, परम्परागत दिनचर्या में नवीनता का अभाव में इसकी ढेरों वजह खोजी जा सकती है। शिक्षा-शिक्षक-विद्यालय-पाठ्यक्रम-समुदाय इन सबके बीच कहीं कोई तारतम्य इस पूरी व्यवस्था में नहीं है, यह सच है। विद्यार्थियों का विद्यालयों से विलगाव बहुत से सामाजिक-आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक कारकों के कारण हुआ है। इन विभिन्न कारणों के केन्द्र में शिक्षा व्यवस्था की बहुत-सी खामियां तो हैं ही। इस कटघरे में शिक्षक की भूमिका प्रमुखता से आ रही है। शिक्षा का छात्रों को मौजूदा वातावरण तथा वास्तविक एवं सामाजिक जीवन से कहीं कोई सम्बन्ध नहीं दिखता है। न सुरक्षित भविष्य की आश्वस्ति है, न व्यवसायपरक व्यक्तित्व का आत्मविश्वास है। न समाज या देश के प्रति स्वयं को अर्थवान महसूस करने की वजह है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो नौजवानों के भविष्य को सुनिश्चित न कर रहीं हो तो वह किसी को अपनी ओर आकर्षित कैसे कर सकती है? दूसरी ओर परीक्षा प्रणाली ने शिक्षा के प्रति जो अनास्था बढ़ायी है वह कोई छोटा खतरा नहीं है। जिस मूल्यांकन पद्धति की विश्वसनीयता और वैधता ही संदिग्ध हो उसमें व्यापकता और वस्तुनिष्ठता हो भी तो भी वह अपने पात्रों में आत्मविश्वास कहां से पैदा कर देगी। कक्षाओं में अनुपस्थिति के आर्थिक कारण भी अहम हैं। वहीं समाज का नैतिक पतन एक सतत संकट है। शिक्षकों द्वारा छात्रों के प्रति स्नेह या भयवश दर्शायी गयी अवास्तविक उपस्थिति की उदारता भी बच्चों को विद्यालय और कक्षाओं से दूर कर रही है। जहां शिक्षण परीक्षा के अधीन हो, पाठ्यक्रम पूरा करना ही सत्र की शर्त हो। जहां व्यापक उद्देश्यों वाली परीक्षा प्रणाली का किसी को दूर तक भान ना हो। गेस-पेपर्स, मॉडल ऑनश्वर, गाइड और शार्ट-कट से तरासे गये युवा दिमागों को जिन्दगी में शार्ट-कट ढूंढने से कैसे रोका जा सकता है। जब एक रात के अध्ययन से ही उत्तीर्ण हुआ जा सकता है, तो कक्षाध्ययन की क्या आवश्यकता? समाज में घर करती यह सोच इस समस्या को और भी जटिल बना देती है। जो शिक्षण परीक्षण पर पूरा हो जाता हो। उससे राष्ट्र निर्माण जैसा महानतम लक्ष्य कैसे पाया जा सकता है। बच्चों को कक्षा से दूर ले जाने की ढेरों वजहों में से बड़ी वजह विद्यार्थियों की स्तर-भिन्नता है। कुछ कक्षा से नीचे अनुभव करते हैं तो कुछ अपने लिए वहां कुछ भी नहीं पाते हैं। इस हीनता-श्रेष्ठता में ही अनुपस्थिति के अंकुर फूटते हैं। जो विद्यार्थियों को धीरे-धीरे कक्षाओं से विमुख कर देते हैं। कक्षा के ढाँचे में कुछ भी उन्हें लुभावना नहीं लगता। शिक्षा जगत के अनुभव बताते हैं कि बच्चे कक्षा से कतराते हैं। इस सार्वभौमिक समस्या के पीछे सीखने की क्षमताओं में भिन्नता है। स्तरानुसार एकसाथ मिलकर काम करना सबको अच्छा लगता है। स्तरानुसार शिक्षण सुनिश्चित करना ही सफल-असफल अध्यापक की कसौटी है। जब बच्चों के अपनी कक्षा के ज्ञान-स्तर आधारित समूह नहीं बन पाते हैं तो भी वे कक्षा से जी चुराने लगते हैं और फिर धीरे-धीरे विद्यालय से भी। शिक्षा प्रशासन की उदासीनता, शिक्षकों में योग्यता एवं अनुभव का अभाव, चलताऊ ढर्रें पर चलने वाला शिक्षण, विद्यालय-कक्षाओं मे बैठने की समुचित व्यवस्था का अभाव, शिक्षण-प्रशिक्षण की सुविधाओं और संसाधनों का अभाव, पुस्तकालयों में पुस्तकों का अकाल, यह पूरा परिदृश्य नयी पीढ़ी को लुभाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। अभाव, नीरसता, प्रतिस्पर्धा, प्रतिबंधिता, व्यक्तिवादिता और निश्चित ढर्रे में ढली दिनचर्या तथा शिक्षकों की स्थायी मानसिकता सबके सब विद्यार्थियों के विरुद्ध जैसे अभियान छेड़े हुए हैं, उन्हें शिक्षालय से दूर करने का। स्वाधीनता के बाद शिक्षा व्यवस्था में जो आमूल परिवर्तन होने थे उनसे हम चूक गये। हमने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसलिए शिक्षा ने भी धीरे-धीरे हमें गंभीरता से लेना छोड़ दिया। शिक्षा का व्यक्ति, समाज और राष्ट्र से संबंध शिथिल हो चला है। परिणाम शिक्षा नीरस प्रतियोगिताओं से लैस अत्यधिक असुरक्षित आार्थिक परिस्थितियों से निपटने का असफल प्रयास बनकर रह गई है। इस ढाँचे में न पाठ्यक्रम प्रभावी है, न पठन-पाठन का परिदृश्य। विषयों के जीवन से जुड़ाव का दूर-दूर तक कोई सूत्र मौजूदा शिक्षा प्रणाली में नहीं दिखता है। समाज से कटा समाज शास्त्र और राजनीति से रिक्त राजनीति शास्त्र की तरह इन्हें आखिर कोई कबतक रटे। कुछ भी सीखने की प्रक्रिया में सन्दर्भ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल पूरे स्कूली जीवन को हमने इतना कृत्रिम बना दिया है कि सामाज की वास्तविकताओं से बच्चा उसे जीवनभर जोड़ ही नहीं पाता है। नयी शिक्षा नीति-2020 से कुछ आशाएं उभरी हैं। जिसमें इस नीरसता को तोड़ने के प्रयास दिखते हैं। बच्चों के लिए शिक्षा को रुचिकर बनाना ही। अभी शिक्षक-शिक्षा-परीक्षा के अर्न्तविरोध विद्यार्थियों को विद्यालयों से दूर ले जा रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 September 2020


bhopal,Importance of man made word world

हृदयनारायण दीक्षित विश्व की सभी सभ्यताओं में पुस्तकों का आदर किया जाता है। पुस्तकों में वर्णित जानकारियाॅं लेखक के कौशल से सार्वजनिक होती हैं। शब्द स्वयं में सार्वजनिक सम्पदा है। शब्द सबके हैं लेकिन शब्दों के अर्थ अपने-अपने हैं। शब्द का प्रयोग करने वाले की क्षमता उन्हें अर्थ देती है। पुस्तकों में लेखक का शब्द कौशल विचार और कल्पना एकसाथ प्रकट होता है। पुस्तक रचनाकार की शब्ददेह होती है। चर्चित चलचित्र लेख ह्वाइटलांगमैन ने लिखा था कि यह पुस्तक नहीं मेरी देह है। जो इसे छूते हैं, वह एक मनुष्य को छूते हैं और वह मनुष्य मैं हूँ। मैं पुस्तक के पृष्ठों से प्रकट होकर आपके हृदय में पैठ जाऊंगा। मनुष्य मरणशील है लेकिन मनुष्य रचित शब्द संसार अमर है। भारतीय चिन्तन में शब्द ब्रह्म कहे गये हैं। पुस्तकें पृथ्वी का समस्त ज्ञान एकसाथ धारण करती हैं। एक सृष्टि प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्ष सृष्टि में पृथ्वी है, आकाश है, सूर्य है, तारे हैं, करोड़ों जीवधारी हैं। हमसब इसी सृष्टि का भाग है। दूसरी सृष्टि शब्दों से बनती है इसमें भी सूर्य, चन्द्र, तारे, पर्वत, नदियाँ और करोड़ों प्राणी हैं। हम समूची सृष्टि में भ्रमण नहीं कर सकते। हमारी गति और जानकारी की सीमा है। लेकिन पुस्तकों के माध्यम से समूची सृष्टि की जानकारी प्राप्त करते हैं। पुस्तकें भाषा वाणी और सृष्टि का रूपायन है। मैं कई बार सोचता हूं कि पुस्तकें न होती तो यह संसार कैसा होता? सबसे पहले शब्द प्रकट हुए। भाषा में जानकारियाँ साझा करने की सुविधा हुई। फिर पुस्तकें बनी। अध्ययन एक विशेष प्रकार का रसायन है। यह मनुष्य के शरीर के स्वास्थ्यवर्धक रसायनों को प्रेरित करता है। वैज्ञानिकों ने पुस्तक अध्ययन को वृद्धावस्था की तमाम बीमारियों से बचाने वाला व्यायाम कहा है। हम पुस्तकें पढ़ते हैं। शब्द मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं। मस्तिष्क में शब्दों के रूप बनते हैं। रूप हमारे सामने जीवन्त होते हैं। हम शब्दों के साथ विश्व के किसी भी क्षेत्र की यात्रा पर होते हैं। शब्द की क्षमता बड़ी है, शब्द सत्ता अध्ययनकर्ता को विशेष आनन्द लोक में ले जाती है। ज्ञात सार्वजनिक सम्पदा है और अज्ञात व्यक्तिगत। अनुभव भी व्यक्तिगत होते हैं। हम पुस्तकों के माध्यम से व्यक्तिगत ज्ञान को भी सार्वजनिक ज्ञान सम्पदा के रूप में प्राप्त करते हैं। अध्ययन कभी-कभी खूबसूरत निष्कर्ष भी देते हैं और कभी-कभी सुन्दर जिज्ञासा भी। बहुत लोग पुस्तकों की प्रशंसा करते हैं, लेकिन समय की कमी का रोना रोते हैं। सारी दुनिया के मनुष्यों के लिए समय अखण्ड सत्ता है। प्रत्येक व्यक्ति को दिन-रात मिलाकर 24 घण्टे मिलते हैं। इसी समय में हम ढेर सारे काम करते हैं, लेकिन अध्ययन के सम्बन्ध में हम समय की कमी अनुभव करते हैं। यह हमारी प्राथमिकता है कि हम पढ़ें। समय निकालकर पढ़ें अथवा स्वयं को व्यस्त जानकर न पढ़ें। अध्ययन बौद्धिक और आत्मिक गतिशीलता है। न पढ़ना जड़ता है। पढ़ना गतिशीलता है। पुस्तक अध्ययन प्रतिदिन हमारे चित्त को नया करता है। अध्ययन स्वयं को पुनर्सृजित करना है। अध्ययन सर्वोत्तम आनंद है। यशदाता है। सर्वोत्तम सुख है और राष्ट्रीय कर्तव्य भी है। तैतरीय उपनिषद् के 9वें अनुवाक् के प्रथम मंत्र में कहते हैं, ’’प्रकृति के ऋत विधान का पालन करें। अध्ययन करें और पढ़े हुए को सबको बतायें। अध्ययन से प्राप्त ज्ञान को समाज हित में प्रवाहित करना कर्तव्य है। अगले मंत्र में कहते हैं, ’’सत्यव्रत का पालन करें अध्ययन और प्रवचन करें। कठिन परिश्रम करें, अध्ययन करें। पढ़े हुए को बतायें। अतिथि सत्कार करें, अध्ययन प्रवचन करें। सुन्दर लोक व्यवहार करें, ध्यान प्रवचन करें।’’ ऋषि निर्देश है कि कोई भी काम करें, लेकिन पढ़ें और पढ़े हुए को बतायें। सम्पूर्ण संसार एक विराट पुस्तक है, किसी वृक्ष को ध्यान से देखना अध्ययन है। किसी प्राणी को भी ध्यान से देखना अध्ययन है। सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेना अनुभव प्राप्त करना और ध्यान से समझना भी अध्ययन है। प्रत्येक मनुष्य भी एक सुन्दर लेकिन जटिल पुस्तक है। मनुष्य का भौतिक अध्ययन आसान है। शारीरिक दृष्टि से सभी मनुष्य लगभग एक जैसे हैं, लेकिन आंतरिक संरचना में जटिल है। मन चेतना के आंतरिक व्यापार को समझना कठिन है, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को स्वयं को पुस्तक मानकर अध्ययन करना चाहिए। ऐसा अध्ययन चुनौती भरा है, लेकिन सरल है। हम स्वयं पुस्तक हैं। जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ-वहाँ हम अपने साथ होते हैं। हम अपने भीतर प्रतिपल बदलते भावों को पुस्तक की तरह पढ़ सकते हैं। हम जीवन के तमाम कार्यों में व्यस्त रहते हैं, लेकिन स्वयं की पुस्तक को स्वयं ही नहीं पढ़ते। स्वयं द्वारा स्वयं को पढ़ना बड़ा उपयोगी है। स्वयं के भीतर के रागद्वेष, आत्मीयता, संशय, क्रोध, लोभ, मोह को पढ़ना बड़ा मनोरंजक है। यह अध्ययन बड़ा सस्ता है। कोई पुस्तक खरीदने की जरूरत नहीं। स्वयं द्वारा स्वयं को पढ़ना व समझने का प्रयास करना सुन्दर कृत्य है। हम सब दिन भर वार्तालाप करते हैं। दुनिया के सभी लोगों की वार्ता को एकत्रित करके करोड़ों पुस्तकें बनाई जा सकती हैं। सोचता हॅूं कि वार्ता अगर पदार्थ होती तो प्रत्येक मनुष्य द्वारा बोले गए वाक्यों पदार्थों से दुनिया भर जाती। पूर्वज प्राकृतिक ज्ञान और अनुभवों को सुनते-सुनाते थे। तब लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था। आधुनिक काल में भी परस्पर वार्ता होती है। लेकिन अब वार्ता के माध्यम बदल गए हैं। मोबाइल एसएमएस है, वीडियो चैटिंग है, वीडियो कॉन्फ्रेसिंग है। लेकिन इनमें पुस्तक का आनंद नहीं है। लिपि के आविष्कार के बाद छापेखाने की खोज से ज्ञान संचार और ज्ञान प्राप्ति के कर्म में क्रांति आई। बोला सुना वैदिक वा›मय भी अब पुस्तक रूप में उपलब्ध है। विश्व के हजारों लेखकों-कवियों का सृजन पुस्तक रूप में सहज प्राप्त है। मैं अकेले नहीं रह सकता। पुस्तकों के साथ रहने में आनंद मिलता है। मैं पुस्तकों से बातें करता हॅूं। वे भी मुझसे बातें करती हैं। मैं यात्रा में भी अपने साथ कुछ पुस्तकें रखता हॅूं। प्रवास के दौरान घर के पुस्तकालय की पुस्तकें याद आती रहती हैं। घर लौटता हॅूं। वे उदास जान पड़ती हैं। मैं कुशल क्षेम पूछता हॅूं। वे कहती हैं कि ’’समय अच्छा नहीं कटा। अब मुझे हाथ में लो, मेरे शब्द हृदय में उतारो।’’ मैं उन्हें प्रणाम करता हॅूं। मैं राजनैतिक कार्यकर्ता हॅूं। मुझे समर्थकों का बड़ा संसार चाहिए। भीड़भाड़, समर्थक, प्रशंसक आदि। लेकिन पुस्तकें हमारा अभिन्न हिस्सा हैं। मेरा पहला प्यार-’पुस्तकें’ ही हैं। पुस्तकों के संग्रह या अध्ययन में मैंने चुनाव नहीं किया। जो मिला, सो पढ़ा। संभवतः इसी इच्छा और आकर्षण के चलते मैं अच्छा विद्यार्थी बना। अध्ययन सुंदर कृत्य है। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 20 September 2020


bhopal, Congress office, bearers became, leaders without

रमेश सर्राफ धमोरा कांग्रेस पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखने की घटना के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने सोनिया गांधी को अगले एक साल के लिए फिर से कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में कई बदलाव किए। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कांग्रेस कार्यसमिति व कांग्रेस के महासचिव के पदों पर किया गया है। हालांकि असंतुष्ट गुट के 23 नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष से कांग्रेस कार्यसमिति के प्रत्यक्ष चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन उनकी इस मांग को नजरअंदाज कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों का नामांकन कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कांग्रेस कार्यसमिति में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी, कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ महासचिव मो