दखल क्यों


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आर.के. सिन्हा   इजराइल में सत्ता में परिवर्तन तो हो गया है। वहां नफ्ताली बेनेत ने प्रधानमंत्री पद संभाल लिया है। पर इससे भारत-इजराइल के संबंधों पर किसी तरह का असर नहीं होगा। दोनों देशों के रिश्ते चट्टान से भी ज्यादा मजबूत हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मित्र देश के नए प्रधानमंत्री को बधाई देते हुए कहा कि "अगले वर्ष हमारे राजनयिक रिश्तों को 30 वर्ष हो जायेंगे, जिसे मद्देनजर रखते हुये मैं आपसे मुलाकात करने का इच्छुक हूं और चाहता हूं कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और गहरी हो।"   दरअसल दोनों देशों के रिश्तों को ठोस आधार देने की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी और इजराइल के निवर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार सक्रिय थे। इन नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों से भारत-इजराइल रणनीतिक साझेदारी को बल मिला और उन्होंने इस मुद्दे पर निजी दिलचस्पी ली। भारत- इजराइल संबंधों को गति मिलने में भारत के हजारों यहूदी नागरिकों का भी खास योगदान रहा है। भारत में यहूदी नागरिक महाराष्ट्र, केरल, पूर्वोत्तर और राजधानी दिल्ली आदि में रहते हैं। इजराइल में नफ्ताली बेनेट के नए प्रधानमंत्री बनने के साथ ही राजधानी के एकमात्र सिनोगॉग में उनके यहां आने का इंतजार भी शुरू हो गया है। इसकी वजह यह है कि हुमायूं रोड की जूदेह हयम सिनग़ॉग में बेनेट के पूर्ववर्ती बेंजामिन नेतन्याहू और उनसे पहले इजराइल के शिखर नेता सिमोन पेरेज स्थानीय यहूदी समाज से मिलने और प्रार्थना के लिए आ चुके हैं। वे जब भारत के सरकारी दौरे पर आए तो जूदेह हयम सिनग़ॉग में आना नहीं भूले। इसी सिनग़ॉग से सटी हुमायूँ रोड की कोठी में सांसद के तौर पर 6 वर्ष रहा था I अत: मैं इनकी गतिविधियों से थोड़ा बहुत परिचित तो हूँ ही I नफ्ताली बेनेट को अपने देश के आम चुनाव में बहुमत हासिल हुआ जिसके बाद इन्होंने कार्यभार संभाल लिया है। बेनेट के बारे में पता चला कि वे पहले कभी भारत नहीं आए हैं। चूंकि भारत-इजराइल के संबंध बहुत घनिष्ठ हैं इसलिए उनका आने वाले समय में नई दिल्ली आना तय है।   देखिए, इजराइल कहीं न कहीं भारत के प्रति बहुत आदर का भाव रखता है। इसकी दो वजहें हैं। पहली, भारत में कभी भी यहूदियों के साथ किसी भी तरह के जुल्म नहीं हुए। उन्हें इस देश ने सारे अधिकार और सम्मान भी दिए। इस तथ्य को सारी दुनिया के यहूदी सहर्ष स्वीकार करते हैं। उन्हें पता है कि भारत में कोई यहूदी सेना के शिखर पद पर भी पहुंच सकता है। गवर्नर भी बन सकता है I उन्हें इस बाबत लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर जैकब के संबंध में विस्तार से जानकारी है। राजधानी के जूदेह हयम सिनगॉग के एक हिस्से में यहूदियों का कब्रिस्तान भी है। इसमें पाकिस्तान के खिलाफ 1971 में लड़ी गई जंग के नायक जे.एफ.आर जैकब की भी कब्र है। वे पाकिस्तान के खिलाफ लड़े गए युद्ध के महानायक थे। अगर उस जंग में जैकब की योजना और युद्ध रणनीति पर अमल न होता तो बांग्लादेश को आज़ादी आसानी से नहीं मिलती और लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का शर्मनाक आत्मसमर्पण भी नहीं होता। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अन्दर घुसकर पाकिस्तानी फौजों पर भयानक आक्रमण करवाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल जैकब की वीरता की गाथा प्रेरक है। उनके युद्ध कौशल का ही परिणाम था कि नब्बे हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने हथियारों समेत भारत की सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था, जो कि अभीतक का विश्व भर का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण है।   दूसरी, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों ने बहादुरी का परिचय देते हुए इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराया था। भारतीय सैनिकों की टुकड़ी ने तुर्क साम्राज्य और जर्मनी के सैनिकों से जमकर मुकाबला किया था। माना जाता है कि इजरायल की आजादी का रास्ता हाइफा की लड़ाई से ही खुला था, जब भारतीय सैनिकों ने सिर्फ भाले, तलवारों और घोड़ों के सहारे जर्मनी-तुर्की की मशीनगनों से लैस सेना को धूल चटा दी थी। इस युद्ध में भारत के बहुत सारे सैनिक शहीद हुए थे। राजधानी दिल्ली में आने वाले इजरायल के शिखर नेता से लेकर सामान्य टूरिस्ट अब तीन मूर्ति स्मारक में जाने लगे हैं। इसमें साल 2018 से इजरायल के ऐतिहासिक शहर हाइफा का नाम जोड़ दिया गया है। तब से इस चौक का नाम 'तीन मूर्ति हाइफा' हो गया है।   वास्तव में मोदी और नेतन्याहू के संबंध आत्मीय और मित्रवत हो गए थे। इसके चलते दोनों देशों के आपसी संबंधों में सहयोग और तालमेल निरंतर बढ़ता रहा। महत्वपूर्ण यह है कि भारत-इजरायल की संस्कृति में भी समानता है। हमारे त्योहारों में भी समानता है। भारत में होली मनाई जाती है तो इजराइल में हनुका मनाया जाता है। भारत ने साल 1992 में इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थपित किए थे। साल 2003 में तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत की यात्रा पर आए थे। ऐसा करने वाले वह पहले इजराइली प्रधानमंत्री थे। भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को रक्षा और व्यापार सहयोग से लेकर रणनीतिक संबंधों तक विस्तार देने का श्रेय काफी हद तक उनको ही जाता है। इस बीच, केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के 2014 में सत्तासीन होने के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में नई इबारत लिखी जाने लगी है।   इजराइल साल 1948 में जन्म के बाद से ही फ़लस्तीनियों और पड़ोसी अरब देशों के साथ जमीन के स्वामित्व के प्रश्न पर निरंतर लड़ रहा है। भारत ने 1949 में संयुक्त राष्ट्र में इजराइल को शामिल करने के ख़िलाफ़ वोट दिया था। यह पंडित नेहरू की अदूरदर्शिता थी पर फिर भी उसे संयुक्त राष्ट्र में शामिल कर लिया गया। अगले साल ही भारत ने भी इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था। याद रखें कि यही भारत और इजराइल के संबंधों का श्रीगणेश था। भारत ने 15 सितंबर 1950 को इजराइल को मान्यता दे दी। अगले साल मुंबई में इजराइल ने अपना वाणिज्य दूतावास खोला। पर भारत अपना वाणिज्य दूतावास इजराइल में नहीं खोल सका। भारत और इजराइल को एक-दूसरे के यहां आधिकारिक तौर पर दूतावास खोलने में चार दशकों से भी लंबा वक्त लग गया। मतलब नई दिल्ली और तेल अवीव में इजराइल और भारत के एक-दूसरे के दूतावास सन 1992 में खुले।   इजराइल भारत के सच्चे मित्र के रूप में लगातार सामने आ रहा है। हालांकि फिलस्तीन मसले के सवाल पर भारत आंखें मूंदकर अरब संसार के साथ विगत दशकों में खड़ा रहा, पर बदले में भारत को वहां से कभी भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। कश्मीर के सवाल पर अरब देशों ने सदैव पाकिस्तान का ही साथ दिया। लेकिन, इजराइल ने हमेशा भारत की हर तरह से मदद की और साथ खड़ा रहाI खैर, अब इजराइल में नए प्रधानमंत्री आ गए हैं। पर जैसे कि कहते हैं कि किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति तो स्थिर और स्थायी ही होती है। वह सत्ता परिवर्तन से नहीं बदलती। इसलिए मानकर चलें कि भारत- इजराइल के बीच मैत्री और आपसी सहयोग सघन और गहरा ही होता रहेगा।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 15 June 2021


bhopal,Ganga , turned green!

गिरीश्वर मिश्र   दो दिन हुए टीवी पर सूचना मिली कि काशी में गंगा का जल हरा हो गया है। प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है और उस जल का स्पर्श, स्नान, और पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकर होने से वर्जित कर दिया गया। युगों-युगों से काशी और वहां गंगा पर उपस्थिति दोनों मिलकर भारत के गौरव की श्री वृद्धि करते आये हैं। पुण्यतोया गंगा के महत्त्व को पहचान कर 'नमामि गंगे' परियोजना भी कई हजार करोड़ की लागत से शुरू हुई। इन सबके बावजूद वाराणसी शहर के पास हर तरह के प्रदूषण की वृद्धि ने गंगा को बड़ी क्षति पहुंचाई है। गंगा के प्रवाह को प्रदूषण मुक्त कर स्वच्छ बनाना राष्ट्रीय कर्तव्य है। गंगा-प्रदूषण की मात्रा में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है और इसके लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाना चाहिए।   गंगा भारतीय संस्कृति की जीवित स्मृति है जो युगों-युगों से भौतिक जीवन को संभालने के साथ आध्यात्मिक जीवन को भी रससिक्त करती आ रही है। हिमालय से चलकर तमाम नदियों का जल समेटते हुए बंगाल की खाड़ी से होते हुए समुद्र तक पहुँचने की भौगोलिक यात्रा एक तथ्य है परन्तु लोक मानस में गंगा नदी से ज्यादा एक मान, पापनाशिनी और मोक्षदायिनी जाने कितने रूपों में बसी हुई है। गंगा-स्नान की लालसा सबको गंगा की और लौटने के लिए आमंत्रित और उन्मथित करती रहती है। गंगा नाम लेना और उनका दर्शन मन को पवित्र करता है। गंगा जल लोग आदर से घर ले जाते हैं और प्रेमपूर्वक सहेज कर रखते हैं।   गंगा भारत की सनातन संस्कृति का अविरल प्रवाह है और साक्षी है उसकी जीवन्तता का। कहते हैं भागीरथ ने बड़े श्रम से गंगा को धरती पर अवतरित किया था इसीलिए वह 'भागीरथी' भी कहलाती हैं। कथा के अनुसार राजा सगर के वंशज भगीरथ ने बड़ा तप किया तब कहीं भगवान विष्णु के चरणों से बिंदु-बिदु निकलीं जिसे ब्रह्मा ने झट से अपने कमंडलु में रख लिया। ब्रह्मा को भी भगीरथ ने तप से प्रसन्न किया और तब गंगा का प्रवाह निकला जिसे भगवान शिव ने अपनी जटा में धारण कर लिया। भागीरथ ने फिर तप किया और तब जाकर गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।   गंगा प्रतीक है शुभ्रता का, पवित्रता का, ऊष्मा का, स्वास्थ्य और कल्याण का। भौगोलिक रूप से मध्य हिमालय के अन्दर ऊंचाई पर स्थित कई ग्लेशियरों से जल उपलब्ध होता है। फिर वह गोमुख में एकत्र होता है और वहां से आगे की यात्रा पर निकलता है। आगे चलकर वनों से होते हुए कई प्रवाह समेट कर भागीरथी प्रकट होती है। इसी में केदारनाथ में मंदाकिनी मिलती है जो फिर अलकनंदा से देवप्रयाग में मिलती है। ऋषीकेश से होकर भागीरथी हरद्वार पहुंचती है और फिर गंगा का रूप लेती है। आगे राम गंगा, यमुना से मिलती है। प्रयाग में संगम है जहां गंगा तट पर प्रतिवर्ष विश्व का अद्भुत मेला लगता है। बारह वर्ष पर कुम्भ होता है। फिर गंगा प्रसिद्ध शिव नगरी काशी पहुंचती है जिसे वाराणसी भी कहते हैं। यह अत्यंत प्राचीन नगर अर्धचन्द्र की तरह गंगा से घिरा है। मानों शिव अपने कपाल पर अर्धचन्द्र धारण किये हों। यहाँ से आगे चलकर गंगा घाघरा, सोन, गंडक, वागमती, कोशी तीस्ता आदि नदियों से मिलती है। इसकी दो धाराएं भी बनती हैं- हुबली और पद्मा। हुबली कोलकाता होकर गंगा सागर में बंगाल की खाड़ी में मिलकर समुद्र तक यात्रा पूरी होती है।   गंगा ने राजनैतिक इतिहास के उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। इसके तट पर तपस्वी, साधु-संत बसते रहे हैं और आध्यात्म की साधना भी होती आ रही है। गंगा के निकट साल भर उत्सव की झड़ी लगी रहती है। मान गंगा दुःख और पीड़ा में सांत्वना देने का काम करती है। जीवन और मरण दोनों से जुड़ी है। पतित पावनी गंगा मृत्यु लोक में जीवन दायिनी मां है। गंगा का नाम लेकर उनका आवाहन कर जिस जल का स्पर्श करते हैं वह भी गंगा भाव से भर उठता है। पर गंगा की कृपा से निकटवर्ती क्षेत्र में खेती भी उपजाऊ है। कभी गंगा में जल मार्ग से व्यापार भी होता था जिसकी ओर फिर ध्यान दिया जा रहा है। इन सबके बावजूद नगरों का सारा कचरा और उद्योगों के दूषित सामग्री के अनियंत्रित मेल से गंगा अनेक स्थानों पर विषाक्त सी हो रही है। यह खतरे का संकेत है।   आज मनुष्य भूल गया है कि वह धरती का सहजीवी है स्वामी नहीं है। उसने धरती, हवा, पानी सब पर अधिकार जमा लिया है। जीवन के विकास की कथा की मानें तो मनुष्य ने धरती, पशु, वनस्पति, खनिज पदार्थ आदि प्रकृति के विभिन्न अवयवों पर कब्जा कर अपने उपनिवेश का विस्तार किया और प्रकृति की जीवन-संहिता का उल्लंघन करना शुरू किया। मनुष्य ने प्रकृति के साथ द्रोह की जो ठानी उसके दुष्परिणाम आ रहे हैं और वे हमें चेताते हैं कि संभल जाओ पर अहंकार और आलस्य में हम उन संकेतों की उपेक्षा करते रहते हैं। मनुष्य केन्द्रित दृष्टि में शेष जगत उपभोग की वस्तु हो जाता है और फिर हम उसका अंधाधुंध शोषण करते हैं जो जीवन की कीमत पर होता है। हमारी भोगवादी विकास दृष्टि ने भागीरथी और गंगा का दोहन, शोषण और प्रदूषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गंगा की जीवनी शक्ति पर लगातार प्रहार हो रहे हैं।   गंगा जीवन का प्रतीक है और भारत की सांस्कृतिक पहचान बनाने में उसकी प्रमुख भूमिका है। काशी ही नहीं अनेक तीर्थ गंगा से ही अपनी तेजस्विता ग्रहण करते हैं। कभी रीति काल के प्रमुख कवि पद्माकर ने कहा था: छेम की लहर, गंगा रावरी लहर ; कलिकाल को कहर, जम जाल को जहर है। अब स्थिति ऎसी पल्टा खा रही है कि गंगा का स्वयं का क्षेम की खतरे में है। काशी प्रधानमंत्री जी का क्षेत्र है और काशी में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का तत्काल यत्न जरूरी है। गंगाविहीन देश भारत देश कहलाने का अधिकार खो बैठेगा।   (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 15 June 2021


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गिरीश्वर मिश्र   दो दिन हुए टीवी पर सूचना मिली कि काशी में गंगा का जल हरा हो गया है। प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है और उस जल का स्पर्श, स्नान, और पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकर होने से वर्जित कर दिया गया। युगों-युगों से काशी और वहां गंगा पर उपस्थिति दोनों मिलकर भारत के गौरव की श्री वृद्धि करते आये हैं। पुण्यतोया गंगा के महत्त्व को पहचान कर 'नमामि गंगे' परियोजना भी कई हजार करोड़ की लागत से शुरू हुई। इन सबके बावजूद वाराणसी शहर के पास हर तरह के प्रदूषण की वृद्धि ने गंगा को बड़ी क्षति पहुंचाई है। गंगा के प्रवाह को प्रदूषण मुक्त कर स्वच्छ बनाना राष्ट्रीय कर्तव्य है। गंगा-प्रदूषण की मात्रा में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है और इसके लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाना चाहिए।   गंगा भारतीय संस्कृति की जीवित स्मृति है जो युगों-युगों से भौतिक जीवन को संभालने के साथ आध्यात्मिक जीवन को भी रससिक्त करती आ रही है। हिमालय से चलकर तमाम नदियों का जल समेटते हुए बंगाल की खाड़ी से होते हुए समुद्र तक पहुँचने की भौगोलिक यात्रा एक तथ्य है परन्तु लोक मानस में गंगा नदी से ज्यादा एक मान, पापनाशिनी और मोक्षदायिनी जाने कितने रूपों में बसी हुई है। गंगा-स्नान की लालसा सबको गंगा की और लौटने के लिए आमंत्रित और उन्मथित करती रहती है। गंगा नाम लेना और उनका दर्शन मन को पवित्र करता है। गंगा जल लोग आदर से घर ले जाते हैं और प्रेमपूर्वक सहेज कर रखते हैं।   गंगा भारत की सनातन संस्कृति का अविरल प्रवाह है और साक्षी है उसकी जीवन्तता का। कहते हैं भागीरथ ने बड़े श्रम से गंगा को धरती पर अवतरित किया था इसीलिए वह 'भागीरथी' भी कहलाती हैं। कथा के अनुसार राजा सगर के वंशज भगीरथ ने बड़ा तप किया तब कहीं भगवान विष्णु के चरणों से बिंदु-बिदु निकलीं जिसे ब्रह्मा ने झट से अपने कमंडलु में रख लिया। ब्रह्मा को भी भगीरथ ने तप से प्रसन्न किया और तब गंगा का प्रवाह निकला जिसे भगवान शिव ने अपनी जटा में धारण कर लिया। भागीरथ ने फिर तप किया और तब जाकर गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।   गंगा प्रतीक है शुभ्रता का, पवित्रता का, ऊष्मा का, स्वास्थ्य और कल्याण का। भौगोलिक रूप से मध्य हिमालय के अन्दर ऊंचाई पर स्थित कई ग्लेशियरों से जल उपलब्ध होता है। फिर वह गोमुख में एकत्र होता है और वहां से आगे की यात्रा पर निकलता है। आगे चलकर वनों से होते हुए कई प्रवाह समेट कर भागीरथी प्रकट होती है। इसी में केदारनाथ में मंदाकिनी मिलती है जो फिर अलकनंदा से देवप्रयाग में मिलती है। ऋषीकेश से होकर भागीरथी हरद्वार पहुंचती है और फिर गंगा का रूप लेती है। आगे राम गंगा, यमुना से मिलती है। प्रयाग में संगम है जहां गंगा तट पर प्रतिवर्ष विश्व का अद्भुत मेला लगता है। बारह वर्ष पर कुम्भ होता है। फिर गंगा प्रसिद्ध शिव नगरी काशी पहुंचती है जिसे वाराणसी भी कहते हैं। यह अत्यंत प्राचीन नगर अर्धचन्द्र की तरह गंगा से घिरा है। मानों शिव अपने कपाल पर अर्धचन्द्र धारण किये हों। यहाँ से आगे चलकर गंगा घाघरा, सोन, गंडक, वागमती, कोशी तीस्ता आदि नदियों से मिलती है। इसकी दो धाराएं भी बनती हैं- हुबली और पद्मा। हुबली कोलकाता होकर गंगा सागर में बंगाल की खाड़ी में मिलकर समुद्र तक यात्रा पूरी होती है।   गंगा ने राजनैतिक इतिहास के उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। इसके तट पर तपस्वी, साधु-संत बसते रहे हैं और आध्यात्म की साधना भी होती आ रही है। गंगा के निकट साल भर उत्सव की झड़ी लगी रहती है। मान गंगा दुःख और पीड़ा में सांत्वना देने का काम करती है। जीवन और मरण दोनों से जुड़ी है। पतित पावनी गंगा मृत्यु लोक में जीवन दायिनी मां है। गंगा का नाम लेकर उनका आवाहन कर जिस जल का स्पर्श करते हैं वह भी गंगा भाव से भर उठता है। पर गंगा की कृपा से निकटवर्ती क्षेत्र में खेती भी उपजाऊ है। कभी गंगा में जल मार्ग से व्यापार भी होता था जिसकी ओर फिर ध्यान दिया जा रहा है। इन सबके बावजूद नगरों का सारा कचरा और उद्योगों के दूषित सामग्री के अनियंत्रित मेल से गंगा अनेक स्थानों पर विषाक्त सी हो रही है। यह खतरे का संकेत है।   आज मनुष्य भूल गया है कि वह धरती का सहजीवी है स्वामी नहीं है। उसने धरती, हवा, पानी सब पर अधिकार जमा लिया है। जीवन के विकास की कथा की मानें तो मनुष्य ने धरती, पशु, वनस्पति, खनिज पदार्थ आदि प्रकृति के विभिन्न अवयवों पर कब्जा कर अपने उपनिवेश का विस्तार किया और प्रकृति की जीवन-संहिता का उल्लंघन करना शुरू किया। मनुष्य ने प्रकृति के साथ द्रोह की जो ठानी उसके दुष्परिणाम आ रहे हैं और वे हमें चेताते हैं कि संभल जाओ पर अहंकार और आलस्य में हम उन संकेतों की उपेक्षा करते रहते हैं। मनुष्य केन्द्रित दृष्टि में शेष जगत उपभोग की वस्तु हो जाता है और फिर हम उसका अंधाधुंध शोषण करते हैं जो जीवन की कीमत पर होता है। हमारी भोगवादी विकास दृष्टि ने भागीरथी और गंगा का दोहन, शोषण और प्रदूषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गंगा की जीवनी शक्ति पर लगातार प्रहार हो रहे हैं।   गंगा जीवन का प्रतीक है और भारत की सांस्कृतिक पहचान बनाने में उसकी प्रमुख भूमिका है। काशी ही नहीं अनेक तीर्थ गंगा से ही अपनी तेजस्विता ग्रहण करते हैं। कभी रीति काल के प्रमुख कवि पद्माकर ने कहा था: छेम की लहर, गंगा रावरी लहर ; कलिकाल को कहर, जम जाल को जहर है। अब स्थिति ऎसी पल्टा खा रही है कि गंगा का स्वयं का क्षेम की खतरे में है। काशी प्रधानमंत्री जी का क्षेत्र है और काशी में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का तत्काल यत्न जरूरी है। गंगाविहीन देश भारत देश कहलाने का अधिकार खो बैठेगा।   (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 15 June 2021


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हृदयनारायण दीक्षित   आहार का अर्थ सामान्यतया भोजन होता है लेकिन इन्द्रिय द्वारों से हमारे भीतर जाने वाले सभी प्रवाह आहार हैं। आहार व्यापक धारणा है। मनुष्य में पांच इन्द्रियां हैं। आंख से देखे गए विषय हमारे भीतर जाते हैं और संवेदन जगाते हैं। इसलिए दृश्य भी हमारे आहार हैं। कान से सुने गए शब्द और सारी ध्वनियां भी आहार हैं। संगीत आनंदित करता है और गीत भी। अपशब्द गाली, सुभाषित या संगीत पदार्थ नहीं होते। तो भी वे हमारे भीतर रासायनिक परिवर्तन लाते हैं। ध्वनियां भी हमारा आहार हैं। हम नाक से सूंघते हैं। सुगंध या दुर्गन्ध भीतर जाती है। हम प्रसन्न/अप्रसन्न होते हैं, हमारा मन बदलता है। गंध भी आहार है। स्पर्श भी आहार है। प्रियजन का स्पर्श भी संवेदन जगाता है। हम प्रिय पशु कुत्ता, बिल्ली को सहलाते हैं, वह प्रसन्न होता है। हम प्रसन्न होते हैं। स्पर्श भी आहार है। अन्न भोजन भी आहार है। छान्दोग्य उपनिषद् में आहार विषयक मंत्र है, “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि। सत्वशुद्धौ धु्रवा स्मृतिः। स्मृति लाभै सर्व ग्रन्थीनां विप्रमोक्षः - आहार की शुद्धि से हमारे जीवन की सत्व शुद्धि है। “सत्व शुद्धि से स्मृति मिलती है।” सत्व व्यक्तित्व का रस है। सत्व शुद्धि का परिणाम स्मृति की प्राप्ति है। स्मृति अतीत का स्मरण है। अतीत की घटनाएं मस्तिष्क में होती हैं। लेकिन जन्म के पहले भी हमारा अस्तित्व है। हम मां के गर्भ में होते हैं, जीवन्त होते हैं। मस्तिष्क में उस काल की भी स्मृतियां होनी चाहिए। वैज्ञानिक बताते हैं कि जीवन की हलचल गर्भधारण के कुछेक दिन बाद ही प्रारम्भ हो जाती है। ऐसी स्मृति भी हमारे मस्तिष्क में सुरक्षित होगी। गर्भ के पहले की स्मृति का स्मरण भी संभव है। ऋषि इसी स्मृति की प्राप्ति का उल्लेख करते हैं। शुद्ध आहार जीवन का आधार है। वार्तालाप में शुभ की चर्चा कम होती हैं। अशुभ की चर्चा में सबकी रुचि है। हम किसी की प्रशंसा करते हैं। तत्काल कुतर्क होंगे- ऐसा असंभव है, सब भ्रष्ट हैं। किसी को भ्रष्ट और चरित्रहीन बताओ, सब सुनने को तैयार हैं। हम दिनभर अशुद्ध सुनते हैं। शुद्ध स्वीकार्य नहीं। अशुद्ध प्रिय है। वार्तालाप का आहार भी अशुद्ध है।   प्रकृति की गतिविधि में तमाम कर्णप्रिय ध्वनियां हैं। वायु के झोंकों में नृत्य मगन वृक्षों की ध्वनि उत्तम श्रवण आहार है। कोयल की बोली भी प्रिय है। ऋग्वेद के ऋषियों ने मेढ़क ध्वनि में भी सामगान सुने थे। बच्चों की बोली से कर्णप्रिय और श्रवण आहार क्या होगा? उनका तुतलाना सम्मोहनकारी है। हम ऐसे जीवंत दृश्यों पर ध्यान नहीं देते। गालियां याद रखते हैं, सुभाषित चैपाईयां नहीं सुनते। प्राचीन ज्ञान सुना हुआ आहार है। यह भी प्रभाव डालता है और प्रकाश की सूक्ष्म तरंग भी। आधुनिक दृश्य आहार और भी भयावह है। आंखें शुद्ध सौन्दर्य की प्यासी हैं। सिनेमा दृश्य-श्रव्य माध्यम है। हिंसा, तोड़फोड़ खतरनाक दृश्य आहार हैं। आकाश में उगे मेघ देखने में हमारी रुचि नहीं। वर्षा की हरीतिमा या बसंत की मधुरिमा के दृश्य हमारा आहार नहीं बनते। स्कूल जाते छोटे बच्चों को हम ध्यान से नहीं देखते लेकिन सड़क पर जाता किन्नर प्रिय दृश्य आहार है। नदी का प्रवाह, किसी संकरी गली का दाएं-बाएं मुड़ना, इसी बीच में पेड़ों का लहराना हमारा दृश्य आहार नहीं बनता। हम पक्षियों को ध्यान से नहीं देखते। उनकी निर्दोष आंखों से आंख नहीं मिलाते। उनके बच्चों का शुद्ध सौन्दर्य नहीं देख पाते।   चरक संहिता में आहार को जीवों का प्राण कहा गया है - “वह अन्न-प्राण मन को शक्ति देता है, बल वर्ण और इन्द्रियों को प्रसन्नता देता है।” यहां सुख और दुःख की दिलचस्प परिभाषा है “आरोग्य अवस्था (बिना रोग) का नाम सुख है और रोग अवस्था (विकार) का नाम दुःख है।“ (वही 133) बताते हैं “भोजन से उदर पर दबाव न पड़े, हृदय की गति पर अवरोध न हो, इन्द्रियां (भी) तृप्त रहें।” (वही 562-63) चरक की स्थापना है “सत्व, रज और तम के प्रभाव में मन तीन तरह का दिखाई पड़ता है परन्तु वह एक है।” (वही 118) बताते हैं “जब मन और बुद्धि का समान योग रहता है, मनुष्य स्वस्थ रहता है, जब इनका अतियोग, अयोग और मिथ्या योग होता है तब रोग पैदा होते हैं।” (वही 122) मनोनुकूल स्थान पर भोजन करने के अतिरिक्त लाभ हैं, “मन-अनुकूल स्थान पर भोजन से मानसिक विकार नहीं होते। मन के अनुकूल स्थान और मनोनुकूल भोजन स्वास्थ्यवर्द्धक हैं।” (वही 559) आधुनिक काल में फास्ट फूड की संस्कृति है। मांसाहार के नये तरीके आये हैं। शराब की खपत बढ़ी है। नये-नये रोग बढ़े हैं। तनाव बढ़े है। क्रोध बढ़ा है, क्रोधी बढ़े हैं। चरक संहिता में रोगों का वर्णन है। यहां शब्द, स्पर्श, रूप (दृश्य) रस और गंध के ‘अतियोग और अयोग’ रोग के कारण हैं। ध्वनि शब्द के बारे में कहते हैं, “उग्र शब्द सुनने, कम सुनने अथवा हीन शब्दों को सुनने से श्रवणेन्द्रिय जड़ हो जाती है।” गाली, अप्रिय शब्दों को मिथ्यायोग कहते हैं।” स्पर्श पर टिप्पणी है, “कीटाणु विषैली वायु आदि का स्पर्श” गलत है। रूप के विषय में कहते हैं, “बहुत दूर से देखने और अतिनिकट से देखने को भी गलत बताया गया है। गंध के बारे में कहते हैं “उग्र गंध अतियोग है।”   अन्न भौतिक पदार्थ है। एक मंत्र में कहते हैं “यह व्रत संकल्प है कि अन्न की निन्दा न करें- अन्नं न निन्द्यात्। अन्न ही प्राण है। प्राण ही अन्न है। यह शरीर भी अन्न है। अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित है। जो यह जान लेता है, वह महान हो जाता है - महान् भवति, महानकीत्र्या। (7वां अनुवाक) फिर बताते हैं “यह व्रत है कि अन्न का अपमान न करें- अन्नं न परिचक्षीत, तद् व्रतम्। जल अन्न है। जल में तेज है, तेज जल में प्रतिष्ठित है, अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है। जो यह जानते हैं वे कीर्तिवान होते हैं।” (8वां अनुवाक्) फिर कहते हैं “यह व्रत है कि खूब अन्न पैदा करे- अन्नं बहुकुर्वीत। पृथ्वी अन्न है, आकाश अन्नाद है। आकाश में पृथ्वी है, पृथ्वी में आकाश है। जो यह बात जानते हैं वे अन्नवान हैं और महान बनते हैं।” (9वां अनुवाक) अंतिम मंत्र बड़ा प्यारा है “यह व्रत है कि घर आए अतिथि की अवहेलना न करें। अतिथि से श्रद्धापूर्वक कहें- अन्न तैयार है। इस कार्य को ठीक से करने वाले के घर अन्न रहता है।”   ऐतरेय उपनिषद् में कहते हैं, “सृष्टि रचना के पूर्व ‘वह’ अकेला था, दूसरा कोई नहीं था। उसने सृजन की इच्छा की- स ईक्षत् लोकान्नु सृजा इति। उसने लोक रचे। लोकपाल रचे। फिर इच्छा की कि अब लोक और लोकपालों के लिए अन्न सृजन करना चाहिए। उसने अन्न बनाये। (खण्ड 2 से खण्ड 3 तक) आहार को सुस्वाद बनाने की परम्परा प्राचीन है। मनुष्य जो खाता है, उसी का श्रेष्ठतम अतिथि को खिलाता है। श्रेष्ठतम खाद्य को ही देवों को अर्पित करता है। ऋग्वेद में भुना हुआ अन्न करम्भ कहा गया है। धाना भी भूना जाता है। ऋषि इन्द्र को भुना हुआ धाना भेंट करते हैं। स्तुति है “दिवे-दिवे धानाः सिद्धि - रोज आओ, धाना पाओ। (3.53.3) अग्नि भी धाना पाकर धान्य (सम्पदा) देते हैं। (6.13.14) इन्द्र ‘करम्भ’ प्रेमी हैं लेकिन उन्हें धाना, करम्भ, अपूप (पुआ, पूड़ी) सोम एक साथ भी दिए जाते हैं। ऋषि ‘अपूप’ (पूड़ी, पुआ) खिलाने के लिए इन्द्र के साथ मरूद्गणों को भी न्यौता देते हैं। (3.52.7) आर्यों की दृष्टि में सर्वोत्तम खाद्य सामग्री यही है।   शरीर में प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष हैं। इसी तरह प्राण, मन, आनंद का प्रभाव भी शरीर पर पड़ता है। आहार मनुष्य जीवन का आधार है। गीता की स्थापना है कि दुःख और शोक भी आहार से ही आते हैं। आधुनिक भारत में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है लेकिन आहार की शुद्धि के आदर्श भुला दिए गये हैं। आहार की शुद्धता का दर्शन, रोगरहित, दीर्घायु की गारंटी है।   (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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आर.के. सिन्हा   पीएनबी घोटाले का मास्टरमाइंड मेहुल चोकसी को एंटीगुआ से भारत वापस लाकर जेल की सलाखों के पीछे भेजने की कवायद तो जारी है। इसने हजारों करोड़ रुपए के घोटाले किए हैं। लग तो यही रहा है कि उसे देर-सवेर भारत आना ही होगा। वह कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सकता है। खासकर वर्तमान समय के मोदी सरकार के काल में I सरकारी एजेंसियों को देश के दुश्मन कुछ और भगोड़ों पर भी नजर रखनी होगी। वे देश में बड़े अपराध करके अलग-अलग देशों में रह रहे हैं।   विवादित इस्लामिक धर्मगुरु जाकिर नाइक की वापसी के लिए भी भारत सरकार गंभीर है। सरकार ने मलेशिया सरकार से उसे भारत वापस भेजने को लेकर बात भी की है। जाकिर नाइक अभी मलेशिया में है। भारत का विदेश मंत्रालय उसे मलेशिया से वापस लाने की भरसक कोशिशें कर भी रहा है। वह मलेशिया में रहकर लगातार भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहा है। लेकिन, अब उसके वहां पर बहुत लंबे समय तक रहने की संभावना न के बराबर है I क्योंकि, मलेशिया के प्रधानमंत्री पद से महातिर मोहम्मद हट चुके हैं। यह दुनिया जानती है कि महातिर का जाकिर नाइक को सीधा संरक्षण हासिल था। नाइक पर भारत में देशद्रोह का भी केस चल रहा है। उस पर जैसे ही देशद्रोह का केस दर्ज हुआ तो वह देश से भाग गया। वह सच में बेहद जहरीला किस्म का शख्स है। वह देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में आपसी वामनस्य पैदा करने की कोशिश कर रहा था। उसे हिन्दुओं से सख्त नफरत है। वह मलेशिया में बैठकर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बनने वाले एक मंदिर निर्माण का विरोध भी कर रहा था। इन सारे तथ्यों को देखते हुए जाकिर नाइक को तो तुरंत भारत लाना ही होगा। सरकार कानूनन उसकी मुंबई और दूसरे शहरों की अचल संपतियों को अपने कब्जे में भी ले सकती है।   इसी तरह संगीत निर्देशक नदीम सैफी को भी भारत लाना होगा। उस पर आरोप है कि उसका मुंबई में 12 अगस्त 1997 को म्यूजिक कैसेट कंपनी टी-सीरिज के मालिक गुलशन कुमार की हत्या के षड्यंत्र में हाथ था । उसका नाम जैसे ही गुलशन कुमार की हत्या के अनुसन्धान में आया तो वह ब्रिटेन भाग गया। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने अपनी किताब 'लेट मी से इट नाउ' में लिखा है कि मुंबई पुलिस को गुलशन कुमार की हत्या के प्लान की जानकारी थी। उनके पास 22 अप्रैल 1997 को एक फोन आया। फोन करने वाले शख्स ने बताया कि गुलशन कुमार की हत्या का प्लान बनाया गया है। ये पूछने पर कि इसके पीछे कौन है, उसने बताया- अबू सलेम। उसने यह भी बताया था कि शिव मंदिर जाते वक्त उनकी हत्या की जाएगी।   गुलशन कुमार के पिता की करोलबाग दिल्ली में जूस की दुकान थी। कैसेट किंग के नाम से मशहूर टी सीरीज कंपनी के मालिक गुलशन कुमार की कहानी जीरो से हीरो की थी। उन्होंने 80 के दशक में टी सीरीज की स्थापना की और 90 के दशक तक कैसेट किंग बन गए। टी सीरीज सैकड़ों करोड़ों की कंपनी बन चुकी थी। गुलशन कुमार की हत्या में दाऊद इब्राहिम और अबू सलेम का नाम भी लिया जाता है। इनसे नदीम के साथ गहरे संबंध थे। दाऊद इब्राहिम ने गुलशन कुमार से 10 करोड़ की फिरौती मांगी थी। गुलशन कुमार ने ये रकम देने से मना कर दिया था। तब उनकी हत्या करवाई गई।   दाऊद इब्राहिम तो 1992 में मुंबई धमाकों का मुख्य गुनाहगार भी है। पाकिस्तान में बसने से पहले दाऊद इब्राहिम दुबई में अपना काला कारोबार चला रहा था। हो यह रहा है कि भारत में अपराध करने के बाद कथित सफेदपोश से लेकर शातिर अपराधी देश से बाहर निकल लेते हैं। इस तरह के भगोड़ों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले पर नाराजगी जताते हुए कुछ साल पहले केंद्र सरकार को कहा था- "आजकल कोई भी भारत से भाग जाता है।" सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि ऐसे लोगों को कार्यवाही के लिए विदेश से जल्द भारत लाया जाना चाहिए। जस्टिस जी एस केहर और जस्टिस अरुण मिश्रा ने इस बात को लेकर चिंता व्यक्त की कि लोग आसानी से देश छोड़कर भाग जाते हैं। केंद्र को न्याय के लिए उन लोगों को वापस लाना चाहिए।   मेहुल चोकसी के साथ-साथ दाऊद इब्राहिम, जाकिर नाइक, विजय माल्या, ललित मोदी जैसे अपराधियों को देश वापस लाने की कार्यवाही को गति देनी होगी। इन भगोड़ों को पकड़ना जरूरी इसलिए भी है ताकि देश के अन्दर यह सख्त संदेश जाए कि कानून चाहे तो किसी को भी कहीं से भी पकड़ सकता है। भारत ने लगभग 40 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि की है और आठ देशों के साथ प्रत्यर्पण समझौता किया है। भारत ने परस्पर कानून सहयोग समझौता भी 39 देशों के साथ किया है। ऐसे समझौते में शामिल देश वांछित अपराधी पर मुकदमा चलाने के लिए एक-दूसरे के साथ कानूनी सहयोग करते हैं, जिसमें शरण देने वाले देश में मौजूद उस व्यक्ति की संपत्ति को जब्त करने का प्रावधान भी होता है।   अब जरा ललित मोदी की बात कर लें। वह इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का अध्यक्ष था। उसपर घोटालों के आरोप लगे तो वह लंदन भाग गया। ललित मोदी उद्योगपति कृष्ण कुमार मोदी का बेटा है। कृष्ण कुमार चार हजार करोड़ रुपयों की कीमत वाले मोदी समूह के अध्यक्ष थे। ललित मोदी के दादा राजबहादुर गुजरमल मोदी ने मोदीनगर की स्थापना की थी। ललित मोदी अपने पिता की कुछ साल पहले हुई मौत के समय भी दिल्ली नहीं आया था।   सरकार को इन सब भगोड़ों को वापस देश में लाना है। दाऊद इब्राहिम अब पाकिस्तान के कराची शहर में है। उसकी बेटी की शादी पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर जावेद मियांदाद के बेटे से हुई है। यह बात तो सारी दुनिया जानती है। देखा जाए तो पाकिस्तान को चाहिए कि वह दाऊद इब्राहिम को सीधे-सीधे भारत को सौंप दे। अगर पाकिस्तान इस तरह का कोई कदम उठाता है, तो इससे भारत-पाकिस्तान के बीच फिर से विश्वास का माहौल बनेगा। मेहुल चोकसी को भारत वापस लाने के क्रम में बाकी भगोड़ों को भी याद रखना जरूर होगा। उन्हें भी तो देश की जेलों में चक्की पिसवानी है।     (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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वीरेन्द्र सिंह परिहार   यूं तो कांग्रेस पार्टी और गुटबाजी का सम्बन्ध उसके जन्मकाल के कुछ वर्षाें के उपरांत ही चला आ रहा है, बीसवीं सदी के पहले दशक के उपरान्त ही कांग्रेस में गरमदल एवं नरमदल बतौर अलग-अलग गुट थे। देश की आजादी के बाद भी सरदार पटेल के जीवित रहते कांग्रेस में दो धड़े मौजूद थे। यद्यपि वामपंथी इतिहासकारों ने सरदार को दक्षिणपंथी तो नेहरू को वामपंथी रुझानों वाला साबित करने की कोशिश की है। पर इसमें कोई दो मत नहीं कि सरदार पटेल महान राष्ट्रवादी और तुष्टिकरण के विरोधी थे।   इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती वर्षाें में कांग्रेस में समानान्तर गुटबाजी रही, जिन्हें सिंडीकेट और इंडिकेट कहा गया। यद्यपि 1969 में कांग्रेस के विभाजन के पश्चात यह गुटबाजी समाप्त हो गई, पर तब तस्वीर का एक दूसरा पहलू सामने आया। इंदिरा गांधी का कांग्रेस पार्टी में ही नहीं, पूरे देश में एक छत्रराज कायम हो गया था। इसलिये केन्द्रीय स्तर पर गुटबाजी का सवाल ही नहीं पैदा होता था पर राज्यों में गुटबाजी और ज्यादा प्रत्यक्ष व उग्र ढंग से देखने को मिलती रही। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी राज्यों में खुद इस तरह की गुटबाजी को बढ़ावा देती थीं, ताकि उस राज्य का मुख्यमंत्री अपना स्वतंत्र जनाधार कायम न कर सके और पूरी तरह उनके रहमो-करम पर निर्भर रहे। इसी नीति के तहत वह किसी भी मुख्यमंत्री को ज्यादा दिनों तक पद पर बने नहीं रहने देती थीं। आगे चलकर इंदिरा गांधी ने ऐसे बौनों को मुख्यमंत्री बनाना शुरू किया, जिनका कद उनके घुटनों के नीचे रहे और वह उनके पुत्र संजय गांधी के प्रति असंदिग्ध रूप से वफादार बने रहें।   कमोबेश राजीव गांधी के समय भी कांग्रेस में ऐसी ही स्थिति रही। यद्यपि नरसिंहराव के दौर में कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी तो नहीं थमी, पर केन्द्रीय स्तर से उसको संरक्षण पहले की तरह नहीं मिला। वजह स्पष्ट थी नरसिंहराव न तो वंशवाद की उपज थे और न ही वंशवाद के आधार पर उनका कोई उत्तराधिकारी ही सामने था। सोनिया गांधी के दौर में पार्टी का पूरा एकाधिकार और सत्ता के सूत्र उनके पास होने से केन्द्रीय स्तर पर तो गुटबाजी का सवाल ही नहीं पैदा होता, परन्तु राज्यों के स्तर पर यह गुटबाजी पूर्ववत कायम रही।   यद्यपि यह भी बड़ा सच है कि सोनिया गांधी कम-से-कम इंदिरा गांधी तो थी नहीं, कांग्रेस का प्रभुत्व और प्रभाव भी उस दौर में पूर्व की भांति नहीं रह गया था। जहाँ भाजपा कांग्रेस के सामानान्तर सत्ता की प्रमुख दावेदार बन गई थीं, तो वहीं बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों ने राज्यों को अपने अधिपत्य में ले लिया था। यद्यपि इस दौर में कुछ राज्यों में कांग्रेस पार्टी के कुछ संभावनायुक्त नेता उभरे। उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान में सचिन पायलट और मुम्बई में मिलिंद देवड़ा इत्यादि। पर राहुल गांधी के नेतृत्व को सुरक्षित रखने के लिये इन युवा, गतिशील नेताओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया जिसके चलते ज्योतिरादित्य कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गये और सचिन पायलट फिलहाल सार्थक विकल्प के अभाव में वक्त देख रहे हैं।   अभी जो पांच राज्यों में चुनाव नतीजे सामने आये, उसमें कांग्रेस पार्टी की भारी पराजय झेलनी पड़ी। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद थी कि असम और केरल में सत्ता विरोधी फैक्टर के चलते सत्ता मिल सकती है। पर असम और केरल में सत्ता में आने की जगह वह पुनः विपक्षी पार्टी ही बनी रही। पाण्डुचेरी भी उसके हाथ से निकल गया तो बंगाल में जहां उसके 44 विधायक हुआ करते थे वहां वह शून्य बटे सन्नाटे में आकर ठहर गई है। ले-देकर तमिलनाडु का नतीजा जरूर उसके अनुकूल कहा जा सकता है, पर वहां भी सफलता डीएमके पार्टी की थी जिसमें कांग्रेस पार्टी की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं कही जा सकती। ऐसी स्थिति में सोनिया गांधी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के नेतृत्व में जाँच कमेटी का गठन किया कि वह कांग्रेस पार्टी की पराजयों का विश्लेषण कर प्रतिवेदन दें। कमेटी ने अपने प्रतिवेदन में कांग्रेस में व्याप्त गुटबाजी एवं साम्प्रदायिक तत्वों से किये गए गठबंधन को कांग्रेस पार्टी के पराजय का मुख्य कारण माना। उदाहरण के लिए केरल में पार्टी ओमान चड्डी एवं रमेश चेन्नीथला दो नेताओं के गुटो में बंटी हुई थी। तो असम में एआईयूडीएफ और बंगाल में भी फुरफुरा शरीफ की पार्टी से गठबंधन होना पराजय का कारण माना गया। यद्यपि कांग्रेस पार्टी द्वारा यह कहा गया है कि उपरोक्त रिपोर्ट के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाये जायेंगे लेकिन लाख टके का सवाल यह कि क्या यह संभव है ?   बड़ी सच्चाई यह क वर्तमान दौर में कांग्रेस पूरे देश में गुटबाजी से ग्रस्त है। स्थिति कि भयावहता यह है कि यह रोग अब केन्द्रीय स्तर पर जा पहुंचा है, जिसका उदाहरण गत वर्ष जी 23 बतौर कांग्रेस के कई नेताओं का वह बयान है जिसमें उन्होंने कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की मांग करते हुये कांग्रेस पार्टी में ऊपर से नीचे तक निर्वाचन कराने की मांग करने के साथ कांग्रेस में पूणकालिक अध्यक्ष एवं सामुहिक नेतृत्व पर जोर दिया गया था। स्पष्ट है कि इन नेताओं को यह पता चल चुका है कि सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी में मतदाताओं को आकर्षित करने की क्षमता का अभाव है, ऐसी दशा में उनका हीं नहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी का भविष्य अंधकारमय है। इसलिये बहुत से कांग्रेसी वंशवाद के खूटे से कांग्रेस पार्टी को मुक्त करना चाहते हैं।   जहाँ तक गुटबाजी का सवाल है तो कांग्रेस पार्टी के लिये यही कहा जा सकता है कि गुटबाजी और कांग्रेस पार्टी एक-दूसरे के पर्याय है। पंजाब में अमरिंदर सिंह और सिद्धू लड़ रहे हैं, राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट में तलवारे खिंची हैं। मध्य प्रदेश में भी अजय सिंह जैसे नेता कमलनाथ के एकाधिकार के विरोध में उतर आये हैं। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव के अपने-अपने खेमे हैं। महाराष्ट्र में चौथे नम्बर की पार्टी होते हुये भी कांग्रेस पार्टी कई खेमों में बंटी हुई है।   गौर करने की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी में इस गुटबाजी का मूल कारण क्या है ? इसका कारण है कांग्रेस पार्टी का विचारधारा-विहीन होना, पार्टी का राष्टबोध से रहित होना, इसका बड़ा कारण कांग्रेस में हावी ऊपर से नीचे तक व्यक्तिवादी एवं वंशवादी राजनीति है। वस्तुतः कांग्रेस जिस धर्मनिरपेक्ष विचारधारा की बात करती है, वह क्षमाप्रार्थी धर्मनिरपेक्षता है, जो राष्ट्र की एकता और अखण्डता के लिये घातक है, जिसमें जिहादियों तक का तृष्टिकरण किया जाता है।   बड़ी समस्या यह कि कांग्रेस कितना भी कहे, पर उसमें कोई सुधार आने से रहा। वस्तुतः वह चुनाव लड़ने और सत्ता पाने की एक मशीनरी मात्र बनकर रह गई है, जिसे इस देश का जागरूक मतदाता समझ चुका है। किसी संगठन में सुधार या बदलाव ऊपर से होता है तभी प्रभावी होता है लेकिन यहां शीर्ष में ही कांग्रेस वंशवाद की बेल से जकड़ी हुई है, जिसमें बदलाव के आसार नहीं।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 14 June 2021


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आर.के. सिन्हा   कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने कुछ ही दिनों में देश को अंदर तक हिला कर रख दिया है। इसने अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण, औरत-मर्द में कोई भेदभाव नहीं किया। इसने हरेक घर तक जाकर अपना असर दिखाया। लेकिन, अब दूसरी लहर कमजोर पड़ने लगी है। कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों की तादाद प्राय: हरेक जगह घट रही है। यह संतोष का विषय तो हो सकता है, पर अब कुछ बातों को गांठ बांध लेना भी जरूरी है। पहली बात तो यह कि कोरोना वायरस हमारे बीच में अब लम्बे समय तक रहने वाला है। यही नहीं, इसकी तीसरी लहर आने के भी संकेत मिलने लगे हैं या कहा जाए कि वह कभी भी आ सकती है।   सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि तीसरी लहर दूसरी की तुलना में अधिक मारक हो सकती है। तब रोगियों की संख्या भी दूसरी लहर की तुलना में कहीं अधिक होगी। यह वास्तव में डराने वाली स्थिति है। आईआईटी दिल्ली ने जारी अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि तीसरी लहर में अकेले दिल्ली में ही रोजाना 45 हजार नए मामले आ सकते हैं। यह सुनकर भी रुह कांप उठती है। ऐसे में रोजाना करीब 9 हजार रोगियों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ेगी। दिल्ली को इसके लिए तैयार रहना होगा। यदि यह हालात बनते हैं तो इससे निपटने के लिए दिल्ली में अस्पतालों और रीफिलिंग के लिए कुल मिलाकर प्रतिदिन 944 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी। इतनी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है। जाहिर है, अगर हम तीसरी लहर पर सारे देश की स्थिति पर बात करें तो हालात अकल्पनीय रूप से खराब हो सकते हैं। भगवान करे कि यह न हो। अब दुनिया को और आघात न सहन पड़े। पर किसी ने कहां सोचा था कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर देखते ही देखते अपने शिकंजे में सारे देश को ही ले लेगी। इसलिए युद्धस्तर पर आगे के लिए तैयारी करना लाजिमी है।   चूंकि देश में संक्रमण की दर कम हो रही है इसलिए सरकारों और मेडिकल दुनिया से जुड़े लोगों को अभी आराम करने के मोड में कतई नहीं आना चाहिए। हमें अभी भविष्य में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए समुचित व त्वरित कदम उठाते रहने चाहिए। सबको पता है कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से देशभर में हजारों जानें गईं। अब ये हालात नहीं होने चाहिए। कोरोना के रोगियों के बीच ऑक्सीजन की भारी कमी देखी गयी। उसे देखते हुए अब सब राज्यों को ऑक्सीजन उत्पादन, स्टोरेज और उसके वितरण में सुधार करने की तुरंत आवश्यकता है। सभी अस्पतालों को ऑक्सीजन निस्तारण प्रक्रिया के लिए आवश्यक सभी प्रकार के नोजल, एडेप्टर्स और कनेक्टर्स मुहैया कराने चाहिए। मैं मानता हूँ कि सभी सरकारें और स्थानीय निकाय ऐसा अबतक कर भी रही होंगी I प्रधानमंत्री जी तो सबकी मदद के लिये दिन-रात खड़े हैं हीI   किसे नहीं पता कि अप्रैल महीने में जब कोरोना की दूसरी लहर का पीक था तब सैकड़ों धनी-संपन्न लोगों तक को अस्पतालो में बेड नसीब नहीं हुआ। मुझे पता चला है कि राजधानी दिल्ली के एक मशहूर सेंट लॉरेस स्कूल के संस्थापक और कारोबारी श्री गिरिश मित्तल को लाख चाहने के बाद भी बेड नहीं मिला। अंत में उन्हें फरीदाबाद के एक अस्पताल मे भर्ती करवाया गया। वहां उनकी मृत्यु हो गई। इसी प्रकार प्रख्यात गीतकार डॉ. कुँवर बेचैन और प्रसिद्ध कवि पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र राजहंस को भी नोएडा के प्राइवेट अस्पताल में बचाया न जा सका I जब हर लिहाज से सक्षम लोगों का यह हाल हुआ है तो समझ लें कि बाकी के साथ क्या हुआ होगा। इसीलिये देश के हर छोटे-बड़े शहरों के अस्पतालों में ऑक्सीजन वाले बेडों की संख्या भी बढ़ानी होगी।   इसके साथ ही अब देश को यह भी देखना होगा कि कोरोना के कारण किसी बच्चे के सिर से उसके माता-पिता का साया न उठे। कोरोना की दूसरी लहर के कारण न जाने कितने मासूम बच्चे अनाथ हो गए। इन बच्चों के लिये मुफ्त पढ़ाई और आर्थिक मदद जैसी अनेक घोषणायें राज्य और केंद्र सरकारों ने की हैं। पर अभी इन बच्चों के सामने कुछ और दिक्कतें आ सकती हैं। याद रखें कि कोरोना से मृत्यु का प्रमाणपत्र मिलना अत्यंत कठिन है। सैकड़ों लोग अस्पतालों के दरवाज़ों पर मर गये और बहुत से लोग तो घर पर ही मर गये। बीच में ऐसे भी दिन आये कि टेस्ट होने का नम्बर ही नहीं आया और लोग मर गये। अब ये अनाथ बच्चे कहाँ जायेंगे प्रमाणपत्र बनवाने के लिएI सरकारी दफ्तरों की कठिन प्रक्रिया से कैसे गुजरेंगे? जिनके खाते बैंकों में हैं वह मर गये और उनके नॉमिनी भी मर गये, अब बच्चे रह गये हैं उनका पैसा बैंकों से कैसे निकलेगा? इन सवालों के हल सरकारों को तुरंत तलाश करने होंगे। वर्ना घोषणाएं जमीन पर लागू करना कठिन होगा। बच्चों की मदद में सरकार और संस्थायें खुद आगे नहीं बढ़ेंगी तो ये तमाम घोषणाएं ज़बानी जमा खर्च बनकर रह जायेंगी।   यह सच है कि बहुत से लोग केदारनाथ जैसी आपदाओं में मारे जाते हैं और उनका बैंक एकाउंट लावारिस हो जाता है। बच्चे दर-दर भटकते रहते हैं और पैसा बैंकों में पड़ा रहता है। ये अनाथ हुए बच्चे न मदद माँग पायेंगे न कागजी कार्यवाही पूरी कर पायेंगे। सरकार और समाज को खुद इनकी मदद को आगे आना होगा और नियमों में कुछ शिथिलता देनी होगी।    कोरोना से आगे भी बचे रहने के बाकी उपाय वही हैं। जैसे कि मास्क पहनना, सामाजिक दूरी बनाये रखना और हाथों को बार-बार साबुन से अच्छी तरह से धोना। ये सभी नागरिकों से कम से कम अपेक्षित है ही। हालांकि दूसरी लहर के बाद देखने में आ रहा है कि अब पहले वाली लापरवाही तो ज्यादा लोग नहीं कर रहे हैं। वे कम से कम मास्क तो पहन ही रहे हैं। अब उन्हें कोरोना की भयावहता का अंदाजा भी लग चुका है। जो लापरवाही करेगा, वही फंसेगा। वह अपने साथ अपनों को भी मरवाने का रास्ता साफ करेगा। इसलिए मास्क तो बड़े पैमाने पर पहने जाने लगे हैं। और कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन लेना भी अनिवार्य है, यह लोग समझने लग गये हैंI   देखिए, दुनिया के अनेक देशों ने अपनों को कोरोना से लड़ने के लिए तैयार कर लिया है। वहां तेजी से सब वैक्सीन लगवा रहे हैं। यही हमें भी करना होगा। हमें भी फिलहाल भीड़-भाड़ और बड़े आयोजनों से बचना होगा। अब पहले वाली दुनिया तो नहीं रहने वाली। यह बात लोगों को जितनी जल्दी समझ आ जाए उतना ही अच्छा रहेगा। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 31 May 2021


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रमेश सर्राफ   भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का प्रकोप जारी है। कोरोना महामारी के साथ ही इसके साइड इफेक्ट भी होने लगे हैं। कोरोना से ठीक हो रहे कई लोगों को ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस, येला फंगस जैसी कई अन्य संक्रामक बीमारी जकड़ने लगी है। इन बीमारियों की चपेट में आने से लोग विकलांग होने लगे हैं। कई लोगों ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी है। तो कई लोगों को अन्य तरह की शारीरिक अपंगता झेलनी पड़ रही है।   मई माह के प्रथम सप्ताह में तो कोरोना पॉजिटिव आने वाले लोगों की संख्या प्रतिदिन चार लाख से भी अधिक पहुंच गई थी। पिछले कुछ दिनों में घटकर दो लाख या उससे कम रह रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस समय कोरोना संक्रमित होने वालों से अधिक संख्या कोरोना से रिकवर होने वालों की है। जो सरकार व चिकित्सकों के लिए राहत भरी खबर है। हालांकि राज्य सरकारों द्वारा अपने प्रदेशों में लॉकडाउन लगाया गया है। जिसके बाद ही कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी आई है। देश के प्राय सभी राज्यों में लॉकडाउन चल रहा है। कोरोना मरीजों की संख्या कम आने का कारण लॉकडाउन है या जांच में कमी है यह कहना तो मुश्किल है। मगर लोगों के घरों से बहुत कम निकलने के कारण कोरोना का सामुदायिक प्रसार जरूर कम हुआ है।   देश में कोरोना संक्रमित मिलने के आंकड़ों में जहां कमी आई है। वही कोरोना से मरने वालों की संख्या अभीतक कम नहीं हो पायी है। कोरोना से हर दिन बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है जो सभी के लिए बड़ी चिंता का कारण है। देश में कोरोना से होने वाली मौतों पर जब तक प्रभावी ढंग से नियंत्रण नहीं हो पाता। तब तक यह कहना मुश्किल होगा कि कोरोना संक्रमण का प्रसार कम हो गया है। गत वर्ष कोरोना की पहली लहर में इस बार की तुलना में मरने वालों की संख्या बहुत कम थी। इस बार कोरोना से बड़ी तादाद में लोगों के मरने से आमजन में भय व्याप्त हो रहा है।   आजादी के 74 साल बाद भी देश में ऑक्सीजन गैस के अभाव में लोगों का मरना दुःस्वप्न से कम नहीं है। बड़े शहरों, महानगरों में जितने भी अस्पताल थे वह सब कोरोना  की दूसरी लहर में पस्त हो गए। लोगों को पता चल गया कि देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में भी लोगों की जान बचाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है। जब बड़े शहरों में ही बुरी  स्थिति है तो गांव के तो हाल और भी खराब है। गांव के प्राथमिक, सामुदायिक चिकित्सा केंद्रों पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहता है। वहां जब भी कोई गंभीर मरीज आता है तो उसे बड़े अस्पताल में रेफर कर पीछा छुड़ा लेते हैं। प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों को ढंग से प्राथमिक उपचार भी नहीं मिल पाता है।   देश में चिकित्सा कर्मियों की बड़ी कमी है। जिन्हें पूरा करने के लिए सरकार हर बार दावा तो करती है मगर उसे पूरा नहीं करती है। अस्पतालों में वर्षों से बहुत से पद रिक्त पड़े रहते हैं। सरकारी तंत्र उन पर नियुक्ति करने की तरफ कोई ध्यान नहीं देता हैं। राजनेताओं का ध्यान तो बस विकास के नाम पर सड़क, पुल, रेल, बस, भवन, नहर, बांध निर्माण की तरफ ही रहता है। यदि सरकारें पिछले 74 सालों में चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार की तरफ थोड़ा भी ध्यान देती तो आज हमें इस तरह की बदतर स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। सरकारों को आगे पूरा ध्यान चिकित्सा तंत्र को मजबूत करने पर लगाना चाहिये। बड़े शहरों, महानगरों से लेकर छोटे गांव ढाणी के उप स्वास्थ्य केंद्र तक को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस कर दे। ताकि लोगों को चिकित्सा के अभाव में जान नहीं गंवानी पड़े।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 28 May 2021


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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन के छह माह पूरे होने पर काला दिवस मनाया गया। ऐसा लगता है कि आंदोलन के नेताओं का काला शब्द से लगाव है। इन्होंने तीनों कृषि कानूनों को भी काला ही बताया था। ग्यारह दौर की वार्ताओं में सरकार पूंछती रही कि इन कानूनों में काला क्या है लेकिन आंदोलन के किसी भी प्रतिनिधि ने इसका जवाब नहीं दिया था। उनका यही कहना था कि यह काला कानून है। इसको वापस लिया जाए। इसके आगे फिर वही तर्कविहीन व निराधार आशंकाएं। कहा गया कि किसानों की जमीन छीन ली जाएगी, कृषि मंडी बन्द हो जाएंगी। कानून लागू होने के छह महीने हो गए। आंदोलनकारियों की सभी आशंकाएं निर्मूल साबित हुई है। ऐसे में आंदोलन पूरी तरह निरर्थक साबित हुआ है लेकिन आंदोलन के कतिपय नेताओं ने इसे अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा पूरी करने का माध्यम बना लिया है। इसलिए अब आंदोलन को किसी प्रकार खींचने की कवायद चल रही है।   हकीकत यह है कि इन छह महीनों में इस आंदोलन की चमक पूरी तरह समाप्त हो चुकी।आंदोलन का सर्वाधिक असर पंजाब में था। लेकिन कानून लागू होने के बाद कृषि मंडी से सर्वाधिक खरीद हुई। यहां नौ लाख किसानों से एक सौ तीस लाख टन से अधिक की गेहूं की खरीद की गई। कृषि कानूनों के कारण पहली बार खरीद से बिचौलिए बाहर हो गए। यही लोग आंदोलन में सबसे आगे बताए जा रहे थे। नरेंद्र मोदी सरकार की नीति के अनुरूप तेईस हजार करोड़ रूपये का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया गया।   नए कानून के अनुसार सरकार ने किसानों को अनाज खरीद नामक पोर्टल पर रजिस्‍टर किया गया। पंजाब देश का पहला राज्‍य बन गया है जहां किसानों के जमीन संबंधी विवरण जे फार्म में भरकर सरकार के डिजिटल लॉकर में रखा गया है। इससे किसी प्रकार के गड़बड़ी की आशंका दूर हो गई। कृषि कानून लागू होने से पहले सरकारी एजेंसियां आढ़तियों बिचैलियों के माध्यम से खरीद करती थी। केवल पंजाब में करीब तीस हजार एजेंट थे। खरीद एजेंसी इनकी कमीशन देती थी। ये किसानों से भी कमीशन लेते थे। अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि कानूनों से किसको नुकसान हो रहा था। किसानों को तो अधिकार व विकल्प दिए गए थे। केंद्र सरकार ने पहले ही कह दिया था कि किसानों को सीधे भुगतान की अनुमति नहीं दी गई तो सरकार पंजाब से गेहूं खरीद नहीं करेगी। इसके बाद ही पंजाब सरकार किसानों के बैंक खातों में सीधे अदायगी पर तैयार हुई।   आंदोलन की गरिमा तो गणतंत्र दिवस के दिन ही चली गई थी। फिर भी कुछ नेताओं की जिद पर आंदोलन चलता रहा। अब तो इसके आंतरिक विरोध भी खुलकर सामने आ गए हैं। कोई सरकार से पुनः बात करना चाहता है, कोई इसका विरोध कर रहा है। सच्चाई यह कि इसके नेताओं को आंदोलन में बैठे लोगों, उनके परिजनों व उनके गांवों की कोई चिंता नहीं है। अन्यथा कोरोना की इस आपदा में आन्दोलन को स्थगित तो किया जा सकता था। नए कृषि कानूनों में किसान हितों के खिलाफ कुछ भी नहीं है। पुरानी व्यवस्था कायम रखी गयी है, इसके साथ ही नए विकल्प देकर उनके अधिकारों में बढ़ोत्तरी की गई। ऐसे में किसानों की नाराजगी का कारण नजर नहीं आता। फिर भी किसानों के नाम पर आंदोलन चल रहा है। यह सामान्य किसान आंदोलन नहीं है। इस लंबे और सुविधाजनक आंदोलन के पीछे मात्र किसान हो भी नहीं सकते।   जाहिर है कि आंदोलन केवल किसानों का नहीं है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जो अबतक किसानों की मेहनत का लाभ उठाते रहे हैं। कृषि कानून से इनको परेशानी हो सकती है। नरेंद्र मोदी ने कहा भी था कि बिचौलियों के गिरोह बन गए थे। वह खेतों में मेहनत के बिना लाभ उठाते थे। कृषि कानून से किसानों को अधिकार दिया गया है। पिछली सरकार के मुकाबले नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों की भलाई हेतु बहुत अधिक काम किया है। किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन का क्षेत्र अत्यंत सीमित है। राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक किसानों की इसमें सहभागिता नहीं है। क्षेत्र विशेष की समस्या का समाधान हेतु केंद्र सरकार लगातार प्रयास भी कर रही है। उसने अपनी तरफ से आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों को वार्ता हेतु आमंत्रित किया था। कई दौर की वार्ता हुई। सरकार जानती है कि कृषि कानून का विरोध कल्पना और आशंका पर आधारित है। इसको भी दूर करने के लिए सरकार ने लिखित प्रस्ताव दिए है। लेकिन आंदोलनकारियों ने अनुकूल रुख का परिचय नहीं दिया। वह हठधर्मिता का परिचय दे रहे थे। यह कहा गया कि सरकार कुछ प्रस्ताव जोड़ने की बात कर रही है। इसका मतलब की कानून गलत है। इसको समाप्त किया जाए। जबकि ऐसा है नहीं।   इसमें कोई सन्देश नहीं कि पिछले अनेक दशकों से कृषि आय कम हो रही थी। छोटे किसानों का कृषि से मोहभंग हो रहा था। गांव से शहरों की तरफ पलायन पिछली सभी सरकारें देखती रही। आज उन्हीं दलों के नेता किसानों से हमदर्दी दिखा रहे है। मोदी सरकार ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया। नए कानूनों के माध्यम से खेती के क्षेत्र में निजी निवेश गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। जिससे किसान अगर अपनी उपज वहीं रोकना चाहता है तो उसके लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्टर का प्रावधान किया गया। किसान को मनचाही कीमत पर अपना उत्पादन बेचने को स्वतंत्र किया गया। किसान को आजतक ये अधिकार क्यों नहीं मिला। वह अपना उत्पादन कहां बेचे और किस दाम पर बेचे इसकी स्वतन्त्रता नहीं थी। कानून के माध्यम से किसानों को स्वतंत्रता देने का प्रयास किया है।   कृषि मंत्री ने नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कांट्रेक्ट फार्मिंग से किसान को लाभ होगा। उनकी आय बढ़ेगी। छोटे किसान को यदि बुआई के पहले ही निश्चित कमाई की गारंटी मिल जाए तो ऐसे में उसकी रिस्क लेने की क्षमता बढ़ेगी वो महंगी फसलों की ओर जाने का फैसला ले सकता है।किसान आधुनिक तकनीक का उपयोग कर सकता है। कानून में कृषि उत्पाद हेतु बाजार की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। इससे महंगी फसलों का अधिक दाम मिलना संभव होगा। राज्य सरकार खुद रजिस्ट्रेशन कर सकेगी।   आंदोलन के नेताओं ने कहा कि विवाद का समय एसडीएम नहीं कोर्ट करे। सरकार ने इस पर सकारात्मक रुख दिखाया। उसने अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। सरकार ने छोटे किसानों के हित को ध्यान में रखकर निर्णय किया था। कोर्ट में की प्रकिया लंबी होती है। जबकि एसडीएम किसान के सबसे करीब का अधिकारी है। सरकार ने यह भी तय किया कि एसडीएम को तीस दिन में विवाद का निराकरण करना होगा। वह किसान की भूमि के विरुद्ध किसी भी प्रकार की वसूली का निर्णय नहीं दे सकेगा। नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि साठ वर्ष के ऊपर के किसान को हर महीने तीन हजार पेंशन मिलेगी। कई लाख किसान इसमें रजिस्टर्ड हो चुके हैं। इसकी ओर अभी तक किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया था। सरकार पहले से ही बारह करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि प्रदान कर रही है। खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से लोगों को रोजगार भी मिलेगा। किसान सम्मान निधि के माध्यम से पचहत्तर हजार करोड़ रुपए हर साल किसान के खाते में पहुंचाने का काम किया गया। आंदोलन में कितने किसान हैं, इसको लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 28 May 2021


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मोहन सिंह   कोरोना काल में लगातार दूसरे साल किसानों की दुश्वारियां बढ़ रही हैं। अभी गांव पूरी तरह कोरोना की चपेट में नहीं आये हैं। पर आवाजाही पर लगी रोक, सरकारी खरीद में तमाम तरह की पाबंदियां, कृषि पैदावारों की घटती मांग ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आज फसल के खलिहान से घर आने के बाद किसानों मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।   पहली मुसीबत तो यह कि कोरोना काल में किसानों की पैदावार पर लगी रोक की वजह से किसानों को वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। सरकारी खरीद के काम में इस साल इतनी पाबंदियां हैं कि किसानों को औपचारिकताएं पूरा करने में ही दम निकल जाये। सरकारी मुलाजिम बताते हैं कि ये सारी बंदिशें इस साल भारतीय खाद निगम की ओर से लगायी गयी हैं। यह उस उत्तर प्रदेश की हालत है, जो व्यपारिक सुगमता के लिहाज से देश में दूसरे नम्बर पर है। भारत सरकार की मुख्य खरीद एजेंसी ऐसी तमाम अड़चनें शायद इसलिए पैदा कर रही हैं कि उसे किसानों के कम से कम पैदावार खरीदने पड़े। क्योंकि उसके अपने गोदाम अनाज से भरे हैं। सरकार के पास अनाज का इतना ज्यादा बफर स्टॉक है कि अगर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये दो साल तक मुफ्त में अनाज लोगों में बांटे जाएं तब भी पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था है।   सरकार की ओर से यह सवाल बार-बार सामने आ रहा है और खेती को निजी हाथों सौंपने के पैरोकार भी यह दावा करते ही हैं कि सरकार का मुख्य काम किसान की पैदावार की खरीद, उसके सुरक्षित रखरखाव और बिक्री अथवा निर्यात की व्यवस्था करना है या कुछ और? इस कुछ और के सवाल ने ही सरकार की सोच और पिछले छह महीने से चल रहे किसान आंदोलन के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। मसलन यह कि जैसा किसान आंदोलन के नेता दावा कर रहे हैं कि वे अनाज को तिजोरी में कैद नहीं होने देंगे। भारत सरकार अपनी ओर से किसानों नेताओं को आश्वस्त करने में अबतक विफल रही है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की पैदावार की खरीद की गारंटी देने को तैयार है। सरकार हर साल तेइस तरह के अनाजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। इस समर्थन मूल्य पर भी पूरे देश में महज सात से आठ फीसद किसानों के पैदावार की खरीद होती हैं। बाकी खरीद स्थानीय साहूकारों, बनियों के जरिये ही होती है।   मतलब यह कि आजतक पूरे देश में किसानों की पैदावार खरीदने की कोई मुकम्मल व्यवस्था पंजाब और हरियाणा को छोड़कर अन्य प्रदेशों में नहीं हो पायी है। इस वजह से सरकार विपणन और खरीद का काम निजी हाथों में सौंपने का मन बना चुकी है। सरकारी एजेंसियों को किसानों के अधिकतम पैदावार नहीं खरीदने पड़े, इस वजह से तमाम पाबंदियां लगायी जा रही हैं। उसके लिए जमीन तैयार करने का उपक्रम इस साल कोरोना काल में प्रकट रूप से शुरू हो चुका है। एक ऐसे समय में जब कोरोना महामारी में लाखों जिंदगियां असमय काल कवलित हो गयी। हर किसी ने अपने किसी खास को खोया है। ऐसे वक्त ही गरीब, किसान बेसहारों को सरकार की मदद की दरकार होती है। सरकारों को गरीब परस्त और किसान परस्त होने का सबूत भी ऐसे ही वक्त देना होता है।   निजी पूँजी ऐसे वक्त गरीबों के कल्याण के बजाय अपने मुनाफे पर ही ज्यादा ध्यान देती हैं। इसका असली चरित्र कोरोना काल में परत दर परत उजागर हो रहा है। खासकर जीवनरक्षक दवाओं के जमाखोरी के मामलों में। उन औघोगिक घरानों से यह उम्मीद करना बेमानी होगी कि वे किसानों के मेहनत की पैदावार के वाजिब दाम देंगे। फिर किसान जाएं तो कहां?  जिस देश में सत्तर फीसद आबादी खेती और खेती से जुड़े काम लगी है। जिस देश में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अनुमानतः लगभग पच्चीस लाख करोड़ रुपये की है। पिछले साल जब देश के कुल घरेलू उत्पाद में लगभग बाईस फीसद की गिरावट दर्ज की गयी। उस वक्त भी कृषि सेक्टर ही ऐसा रहा, जहां कोरोना की मार का दंश नहीं झेलना पड़ा और 2.4% की वृद्धि दर्ज हुई।   ऐसे समय में जब कोरोना की दूसरी लहर ज्यादा खौफनाक रूप में सामने रही है, जरूरत है सरकार को आगे बढ़कर किसानों के हाथ थामने की। विडंबना देखिए कि इस विकट स्थिति में निजी कंपनियां तो किसानों की पैदावार वाजिब दाम पर खरीदने में आनाकानी कर ही रही हैं, सरकार भी तमाम तरह की बंदिशें लगाकर सरकारी खरीद से हाथ खींच रही है। सबसे बुरा हाल उन लगभग 88% सीमांत और बटाईदार किसानों का है, जिनके ज्यादा पैदावार ही जी का जंजाल बन गयी है। कारण यह कि अपनी पैदावार की बिक्री के लिए ऐसे किसानों को खतौनी समेत तमाम दूसरी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ रही हैं जो उनके बूते के बाहर हैं। वे उन खेत मालिकों के दरवाजे रोज दस्तक दे रहे, ताकि किसी तरह उनकी पैदावार की सरकारी बिक्री हो जाएं। ताकि वक्त पर वे अपनी मालगुजारी और दूसरे देनदारियों से मुक्त हो सकें।   पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने सीमित स्तर ही सही, पर बटाईदार किसानों के लिए थोड़ी सहूलियत दी थी। पर इस साल इसकी कोई गुंजाइश नहीं दिख रहीं है। उड़ीसा सरकार ने अपने बटाईदार किसानों को वे सारी सुविधाएं उपलब्ध करायी हैं, जो मूल किसानों को हासिल हैं। मसलन प्राकृतिक आपदा के वक्त सरकार से मिलने वाली रियायतें ज्यादातर राज्यों में मूल किसानों को ही मिलती हैं। बटाईदारों को नहीं, जबकि वास्तविक नुकसान खेती करने वाले इन किसानों का ही होता है। पर उड़ीसा सरकार वे सारी सुविधाएं बटाईदार किसानों को भी मुहैया करवायी हैं। एक किसान हितैषी होने का दावा करने वाली किसी भी सरकार को इन किसानों के हक में जरूर कानून बनाना चाहिए।    अब किसानों की लागत का जायजा लें, जो एक किसान को जमीन की मालगुजारी, जोताई बुवाई, सिंचाई, खाद, किसान और उसके परिवार की मेहनत के रूप में निवेश करना पड़ता है। यह सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण का असली आधार होना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं। मसलन खेत की जुताई से लेकर सिंचाई, आनाज की ढुलाई के काम में जिस डीजल का उपयोग होता है, उसमें पिछले साल के मुकाबले इस साल 21 रुपये से 22 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि इसकी तुलना में न्यूनतम समर्थन मूल्य में कितनी वृद्धि हुई? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं। अभी गनीमत है कि खरीफ की बुआई के पहले सरकर ने डीएपी पर 137%सब्सिडी का ऐलान किया है। शायद किसानों के बढ़ते प्रतिरोध को शांत करने की मंशा से। सरकारी खजाने पर इससे 14,775 करोड़ का बोझ पड़ेगा। बता दें कि अपने देश में हर साल 350.42 लाख टन यूरिया और 119.13 लाख टन डीएपी खाद की खपत होती है। सरकार के इस ऐलान से खरीफ की बुआई से पहले किसानों को कुछ राहत की उम्मीद जगी है।   इस बीच धरनारत किसानों ने भी प्रधानमंत्री से नये सिरे से बातचीत की पेशकश की है। एक ऐसे समय में जब देश के लगभग 90 फीसद हिस्से में लॉकडाउन है। सेंटर फॉर मॉनिटएरिंग इंडियन इकोनामी के अनुमान के मुताबिक ग्रामीण इलाके में बेरोजगारी बढ़कर 14.34% और शहरी इलाके में 14.7% हो गई। पिछले साल लॉकडाउन के दौरान 12.2 करोड़ लोगों की नौकरियां खत्म हुई। अब कोरोना की तीसरी लहर की सूचना ने निवेश की सम्भावना को भी खत्म कर दिया है। भारत जैसे देश में जहां खेती-किसानी और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के जल्दी बेहतर और टिकाऊ रोजगार के अवसर परम्परागत रूप से कृषि और ग्रामीण आधारित उद्योगों में उपलब्ध होते रहे हैं। सरकारों को खेती-किसानी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नये सिरे से नयी तकनीक में निवेश की ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि कोरोना काल के बाद पटरी से उतर गयी जीवन की राह सुगम हो और लोगों की ज़िंदगी में उम्मीद की नयी की कपोलें फूटें।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 May 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   किसान आंदोलन को चलते-चलते आज छह महीने पूरे हो गए हैं। ऐसा लगता था कि शाहीन बाग आंदोलन की तरह यह भी कोरोना के रेले में बह जाएगा लेकिन पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान अबतक अपनी टेक पर टिके हुए हैं। उन्होंने आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर विरोध-दिवस आयोजित किया। जो खबरें आई, उनसे ऐसा लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ ढाई प्रांतों में सिकुड़कर रह गया है। पंजाब, हरियाणा और आधा उत्तर प्रदेश। इन प्रदेशों के भी सारे किसानों में यह फैल पाया है नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता। यह आंदोलन तो चौधरी चरण सिंह के प्रदर्शन के मुकाबले भी फीका ही रहा है। उनके आह्वान पर दिल्ली में लाखों किसान इंडिया गेट पर जमा हो गए थे।   दूसरे शब्दों में शक पैदा होता है कि यह आंदोलन सिर्फ खाते-पीते या मालदार किसानों तक ही तो सीमित नहीं है? यह आंदोलन जिन तीन नए कृषि-कानूनों का विरोध कर रहा है, यदि देश के सारे किसान उसके साथ होते तो अभीतक सरकार घुटने टेक चुकी होती लेकिन सरकार ने काफी संयम से काम लिया है। उसने किसान-नेताओं से कई बार खुलकर बात की है। अब भी उसने बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए हैं।   किसान नेताओं को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्होंने जिस तरह से भी छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन किए हैं, उनमें कोरोना की सख्तियों का पूरा उल्लंघन हुआ है। सैकड़ों लोगों ने न तो शारीरिक दूरी रखी और न ही मुखपट्टी लगाई। पिछले कई हफ्तों से वे गांवों और कस्बों के रास्तों पर भी कब्जा किए हुए हैं। इसीलिए आम जनता की सहानुभूति भी उनके साथ घटती जा रही है।   हमारे विरोधी नेताओं को भी इस किसान विरोध-दिवस ने बेनकाब कर दिया है। वे कुंभ-मेले और प.बंगाल के चुनावों के लिए भाजपा को कोस रहे थे, अब वही काम वे भी कर रहे हैं। उन्हें तो किसान नेताओं को पटाना है, उसकी कीमत चाहे जो भी हो। कई प्रदर्शनकारी किसान पहले भयंकर ठंड में अपने प्राण गंवा चुके हैं और अब गर्मी में कई लोग बेमौत मरेंगे। किसानों को उकसाने वाले हमारे नेताओं को किसानों की जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। सरकार का पूरा ध्यान कोरोना-युद्ध में लगा हुआ है लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह किसान-नेताओं की बात भी ध्यान से सुने और जल्दी सुने। देश के किसानों ने इस वर्ष अपूर्व उपज पैदा की है, जबकि शेष सारे उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हुए हैं। सरकार और किसान नेताओं के बीच संवाद फिर से शुरू करने का यह सही वक्त अभी ही है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal, Choksi

डॉ. प्रभात ओझा मेहुल चोकसी के डोमिनिका में पकड़े जाने के बाद उसके साथ नीरव मोदी का जिक्र भी स्वाभाविक है। मेहुल चोकसी और उसके भांजे नीरव मोदी पर पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी के आरोप हैं। मामा-भांजे ने मिलकर बैंक के अधिकारियों से साठगांठ कर कथित तौर पर 13 हजार 500 करोड़ रुपये का घपला किया है। भारत में दोनों के खिलाफ सीबीआई और इडी की जांच जारी है। इस बीच मेहुल चोकसी ने एंटीगा में शरण ले ली, तो नीरव मोदी फिलहाल लंदन की जेल में है। भारत इन दोनों के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहा है। मेहुल की गिरफ्तारी के साथ संकेत मिल रहे हैं कि इस कोशिश में पहली सफलता जल्द मिल सकती है। खबर आ रही है कि भारत सरकार ने पिछले दिनों कुछ कूटनीतिक रास्ते तय किए हैं, जिनके चलते यह मुमकिन हो सकेगा। सफलता किस तरह से नजदीक है, इसे समझने के लिए एंटीगुआ एंव बारमुडा के प्रधानमंत्री का ताजा बयान देखना होगा। उन्होंने कहा है कि डोमिनिका में पकड़े गये मेहुल को भारत भेज दिया जायेगा। तथ्य यह है कि भारत भेजे जाने के डर से ही मेहुल चोकसी एंटीगा से क्यूबा भागने की कोशिश में डोमिनिका में पकड़ लिया गया है। जानकारी मिली है कि एंटीगा के प्रधानमंत्री कार्यालय ने डोमिनिक सरकार से चोकसी को गिरफ्तार करने के लिए कहा था। एंटीगा ने इसके लिए येलो कॉर्नर नोटिस जारी किया था। उसी के तहत यह गिरफ्तारी सम्भव हुई। अब एंटीगा सरकार का यह रुख भारत के अनुकूल होगा कि डोमिनिक सरकार मेहुल को एंटीगा की जगह सीधे भारत को सौंप दे। इस प्रक्रिया में कोई दिक्कत शायद इसलिए नहीं आयेगी, क्योंकि मेहुल एंटीगा का नागरिक बन गया था। अब वही एंटीगा उसके डोमिनिका में गिरफ्तारी के बाद भारत को सौंपने को कह रहा है। मेहुल चोकसी ने 2018 के शुरू में भारत से भागने के पहले 2017 में ही कैरेबियाई देश एंटीगा एंड बारबुडा की नागरिकता ली थी। इस देश में निवेश कर नागरिक बनना सम्भव है। मार्च में खबर आयी थी निवेश के तहत ली गयी मेहुल की यह नागरिकता रद्द कर दी गयी है, पर जल्द ही उसका खंडन कर दिया गया था। हालांकि इसी के साथ एंटीगा एंड बारबुडा के प्रधानमंत्री ने मेहुल को चेतावनी दी थी कि भागने की कोशिश पर उसकी नागरिकता जा सकती है। बहरहाल, अब जबकि मेहुल ने इस चेतावनी को अनसुना कर दिया है, प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन के सामने अपनी चेतावनी को अमल में लाने के साथ भारत के सामने अपनी साख को भी मजबूत करने का अवसर आ गया। गैस्टन ब्राउन ने कूटनीतिक तरीके से याद दिलाया है कि मेहुल ने डोमिनिका की नागरिकता नहीं ली है। ऐसे में डोमिनिका मेहुल का प्रत्यर्पण आसानी से कर सकता है। ब्राउन ने दृढ़ संकल्प जताया है, "हमारा देश मेहुल चोकसी को स्वीकार नहीं करेगा। उसने इस द्वीप से जाकर शर्तों का उल्लंघन करते हुए बड़ी गलती कर दी है।” एंटीगा एंड बारबुडा के प्रधानमंत्री के ताजा बयान में उन्हें यह कहते हुए भी बताया गया कि डोमिनिका की सरकार और अधिकारी एंटीगा के साथ सहयोग कर रहे हैं। बयान के मुताबिक, एंटीगा ने भारत को भी सूचित कर दिया है कि मेहुल चोकसी उसे सौंप दिया जाएगा। खबर तो यह भी है कि एंटीगा अपनी इस कूटनीति में भारत के बताये रास्ते के मुताबिक ही आगे बढ़ा है। अनधिकृत तौर पर मेहुल के भागने के मामले में भी कुछ अलग तरह की खबरें आ रही हैं। खबरें जो भी हों, सच यह है कि वह निवेश के तहत एंटीगा की नागरिकता को भी दरकिनार कर डोमेनिक राज्य में पाया गया है। यदि डमोनिका के साथ उसकी कोई कानूनी संधि नहीं है, तो वह शीघ्र ही भारतीय जेल में रहते हुए अपने बारे में कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगा। इसी के साथ पीएनबी की मुंबई शाखा से फर्जी गारंटी पत्र (एलओयू) के जरिए अन्य भारतीय ऋणदाताओं से भी विदेशी ऋण हासिल करने के मामले में न्याय प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। ईडी और सीबीआई की जांच के आगे बढ़ने से सम्भव है कि मामा मेहुल के बाद भांजा नीरव पर भी शिकंजा कसे। शिकंजा तो उन ढेरों लोगों और बैंक कर्मचारियों पर भी कस सकता है, जिन्होंने इस बड़े घपले में दोनों की मदद की है। (लेखक ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के न्यूज एडिटर हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal, China settled village ,Bhutan

प्रमोद भार्गव   चीन अपनी चालाकियों से बाज नहीं आ रहा है। दुनिया के देश जब अपनी आबादी को कोरोना संकट से छुटकारे के लिए जूझ रहे हैं, तब चीन अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को बढ़ावा देने में लगा है। वैश्विक संस्थाओं और महाशक्तियों की भी उसे परवाह नहीं है। उसकी कुटिल चाल का ताजा खुलासा आस्ट्रेलियाई मीडिया ने किया है कि चीन ने भूटान की भूमि में आठ किमी अंदर घुसकर ग्यालाफुग नाम का गांव बसा लिया है। यही नहीं यहां चीन ने भवन, सड़कें, पुलिस स्टेशन और थलसेना के शिविर भी बना लिए हैं। गांव में बिजली की आपूर्ति के लिए ऊर्जा संयंत्र, गोदाम और चीन की कम्युनिष्ट पार्टी का दफ्तर भी खुल गया है। गांव में 100 से ज्यादा लोग रह रहे है। पहाड़ों पर आवागमन का साथी याक भी 100 की संख्या में मौजूद है। यह भूखंड भूटान का हिस्सा निर्विवाद रूप से है ही, भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा भी इस क्षेत्र से जुड़ती है। चीन अपनी विस्तारवादी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अरुणाचल पर भी दावा ठोकता रहता है। दरअसल भूटान की जमीन कब्जाना तो बहाना भर है, उसका असली निशाना अरुणाचल प्रदेश है।   चीन और भूटान के बीच 470 किमी लंबी सीमा जुड़ी हुई है। वह भलीभांति जानता है कि छोटे-से देश तिब्बत को जिस अनैतिक दखल के चलते हथिया लिया है, उसी तरह भूटान को भी आधिपत्य में ले लेगा। दरअसल चीन को अपनी एक अरब 40 करोड़ की आबादी और विशाल सेना पर घमंड है। इसीलिए सेना ने गांव में एक बड़ा बैनर टांग दिया है। इस पर लिखा है, 'शी जिनपिंग पर विश्वास बनाए रखें।' जबकि सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच कुनमिंग शहर में 25 बैठकें हो चुकी हैं, जो बेनतीजा रहीं। बहरहाल, भूमि के इस टुकड़े पर अतिक्रमण करके चीन ने दोनों देशों के बीच हुए 1998 के समझौते को ठुकरा दिया है। 1980 में चीन ने जो नक्शा सार्वजनिक किया था, उसमें ग्यालाफुग ग्राम को भूटान की सीमा में दिखाया है। चीन ने इसके पहले इस भूखंड पर कभी अपना अधिकार जमाने का दावा नहीं किया। चीन भूटान की 12 प्रतिशत जमीन पर दावा जताता है। चीनी मामलों के विशेषज्ञ रॉबर्ट बर्नेट का कहना है कि चीन यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहा है। चीन की मंशा है कि इस हस्तक्षेप का भूटान विरोध करे और चीन इस जमीन पर अपना अधिकारिक दावा ठोक दे।   दरअसल बौद्ध धर्मावलंबी चीन, भूटान और तिब्बत में अनेक समानताएं हैं। नतीजतन भिन्नताओं का पता करना मुश्किल हो जाता है। चीन को भूटान के भारत से मधुर, व्यापारिक, सामरिक व कूटनीतिक संबंध होना भी सालता है। इसलिए चीन भूटान के बहाने भारत को भी उकसाना चाहता है। चीन ने जब भूटान के डोकलाम क्षेत्र में घुसपैठ की थी, तब भारत के प्रभावी हस्तक्षेप के चलते उसे पीछे हटना पड़ा था। यह फांस भी चीन को चुभ रही है।   चीन ने इस घुसपैठ से पहले डोकलाम क्षेत्र को भी हथियाना चाहा था। चालाकी बरतते हुए चीन ने इसे नया चीनी नाम डोगलांग दे दिया था, जिससे यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है। चीन इसपर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थाई घुसपैठ की कोशिश में है। जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। दरअसल चीन अर्से से इस कवायद में लगा है कि चुंबा घाटी जो कि भूटान और सिक्किम के ठीक मघ्य में सिलीगुड़ी की ओर 15 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ बढ़ती है, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण के बहाने हथिया ले। चीन ने इस मकसद की पूर्ति के लिए भूटान को यह लालच भी दिया था कि वह डोकलाम पठार का 269 वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र चीन को दे दे और उसके बदले में भूटान के उत्तर पश्चिम इलाके में लगभग 500 वर्ग किलोमीटर भूमि ले ले। लेकिन 2001 में जब यह प्रस्ताव चीन ने भूटान को दिया था, तभी वहां के शासक जिग्में सिग्ये वांगचूक ने भूटान की राष्ट्रीय विधानसभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि भूटान को इस तरह का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं है। छोटे-से देश की इस दृढता से चीन आहत है।   भारत और भूटान के बीच 1950 में हुई संधि के मुताबिक भारतीय सेना की एक टुकड़ी भूटान की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भूटान में हमेशा तैनात रहती है। इसी कारण जब चीन भूटान और सिक्किम सीमा के त्रिकोण पर सड़क निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाने का काम करता है, तो भूटान इसे अपनी भौगोलिक अखंडता एवं संप्रभुता में हस्तक्षेप मानकर आपत्ति जताने लगता है। लिहाजा संधि के अनुसार भारतीय सेना का दखल अनिवार्य हो जाता है।   मई 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुशल कूटनीति के चलते सिक्किम को भारत का हिस्सा बना था। सिक्किम ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी चीन के साथ सीमा निर्धारित है। यह सीमा 1898 में चीन से हुई संधि के आधार पर सुनिश्चित की गई थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन और ब्रिटिश भारत के बीच हुई संधि को 1959 में एक पत्र के जरिए स्वीकार लिया था। उस समय चीन में प्रधानमंत्री झोऊ एनलाई थे। हालांकि 1998 में चीन और भूटान सीमा-संधि के अनुसार दोनों देश यह शर्त मानने को बाध्य हैं, जिसमें 1959 की स्थिति बहाल रखनी है। बावजूद चीन इस स्थिति को सड़क के बहाने बदलने को आतुर तो है ही, युद्ध के हालात भी उत्पन्न कर रहा है। भारत इस विवादित क्षेत्र डोकाला, भूटान डोकलम और चीन डोगलांग कहता है। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां आबादी का घनत्व न्यूनतम है। पिछले एक दशक से यहांं पूरी तरह शांति कायम थी, लेकिन चीन ने सैनिकों की तैनाती व सड़क निर्माण का उपक्रम कर क्षेत्र में अशांति ला दी।   अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की जून-2016 में आई रिपोर्ट ने भारत को सचेत किया था कि चीन भारत से सटी हुई सीमाओं पर अपनी सैन्य शक्ति और सामरिक आवागमन के संसाधन बढ़ा रहा है। भारत और चीन के बीच अक्साई चिन को लेकर करीब 4000 किमी और सिक्किम को लेकर 220 किमी सीमाई विवाद है। तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश में भी सीमाई हस्तक्षेप कर चीन विवाद खड़ा करता रहता है। 2015 में उत्तरी लद्दाख की भारतीय सीमा में घुसकर चीन के सैनिकों ने अपने तंबू गाढ़कर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया था। तब दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच 5 दिनों तक चली वार्ता के बाद चीनी सेना वापस लौटी थी। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पानी का विवाद भी खड़ा करता रहता है।   दरअसल चीन विस्तारवादी तथा वर्चस्ववादी राष्ट्र की मानसिकता रखता है। इसी के चलते उसकी दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर वियतनाम, फिलीपिंस, ताइवान और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ ठनी हुई है। भारत समेत 13 देशों के साथ चीन का सीमाई विवाद चल रहा है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड और भूटान में लगातार चीन का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, जो भारत के लिए आसन्न खतरा है। इन देशों से जुड़े कई मामले अंतरराष्ट्रीय पंचायत में भी लंबित हैं। बावजूद चीन अपने अड़ियल रवैये से बाज नहीं आता है। दरअसल उसकी असली मंशा दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधन हड़पना है। इसीलिए आज उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को छोड़ ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जिसे चीन अपना पक्का दोस्त मानता हो।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal,Narada ,communicator of Lokmangal

नारद जयंती (27 मई) पर विशेष   प्रो. संजय द्विवदी   ब्रम्हर्षि नारद लोकमंगल के लिए संचार करने वाले देवता के रूप में हमारे सभी पौराणिक ग्रंथों में एक अनिवार्य उपस्थिति हैं। वे तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए जो कुछ करते और कहते हैं, वह इतिहास में दर्ज है। इसी के साथ उनकी गंभीर प्रस्तुति ‘नारद भक्ति सूक्ति’ में प्रकट होती है, जिसकी व्याख्या अनेक आधुनिक विद्वानों ने भी की है। नारद जी की लोकछवि जैसी बनी और बनाई गई है, वे उससे सर्वथा अलग हैं। उनकी लोकछवि झगड़ा लगाने या कलह पैदा करने वाले व्यक्ति कि है, जबकि हम ध्यान से देखें तो उनके प्रत्येक संवाद में लोकमंगल की भावना ही है। भगवान के दूत के रूप में उनकी आवाजाही और उनके कार्य हमें बताते हैं कि वे निरर्थक संवाद नहीं करते। वे निरर्थक प्रवास भी नहीं करते। उनके समस्त प्रवास और संवाद सायास हैं। सकारण हैं। उद्देश्य की स्पष्टता और लक्ष्यनिष्ठा के वे सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। हम देखते हैं कि वे देवताओं के साथ राक्षसों और समाज के सब वर्गों से संवाद रखते हैं। सब उनपर विश्वास भी करते हैं। देवताओं, मनुष्यों और राक्षसों के बीच ऐसा समान आदर तो देवाधिदेव इंद्र को भी दुर्लभ है। वे सबके सलाहकार, मित्र, आचार्य और मार्गदर्शक हैं। वे कालातीत हैं। सभी युगों और सभी लोकों में समान भाव से भ्रमण करने वाले। ईश्वर के विषय में जब वे हमें बताते हैं, तो उनका दार्शनिक व्यक्तित्व भी हमारे सामने प्रकट हो जाता है।   पुराणों में नारद जी को भागवत संवाददाता की तरह देखा गया है। हम यह भी जानते हैं कि वाल्मीकि जी ने रामायण और महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत गीता का सृजन नारद जी प्रेरणा से ही किया था। नारद अप्रतिम संगीतकार हैं। उन्होंने गंधर्वों से संगीत सीखकर खुद को सिद्ध किया, नारद संहिता ग्रंथ की रचना की। नारद ने कठोर तपस्या कर भगवान विष्णु से संगीत का वरदान लिया। सबसे खास बात यह है कि वे महान ऋषि परंपरा से आते हैं, किंतु कोई आश्रम नहीं बनाते, कोई मठ नहीं बनाते। वे सतत प्रवास पर रहते हैं ,उनकी हर यात्रा उदेश्यपरक है। एक सबसे बड़ा उद्देश्य तो निरंतर संपर्क और संवाद है,साथ ही वे जो कुछ वहां कहते हैं, उससे लोकमंगल की एक यात्रा प्रारंभ होती है। उनसे सतत संवाद,सतत प्रवास, सतत संपर्क, लोकमंगल के लिए संचार करने की सीख ग्रहण की जा सकती है।   भारत के प्रथम हिंदी समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के लिए संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देवर्षि नारद जयंती (30 मई, 1826 / ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया) की तिथि का ही चुनाव किया था। हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला रखने वाले पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर आनंद व्यक्त करते हुए लिखा कि आद्य पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रारंभ होने जा रही है। इससे पता चलता है परंपरा में नारद जी की जगह क्या है।इसी तरह एक अन्य उदाहरण है। नारद जी को संकटों का समाधान संवाद और संचार से करने में महारत हासिल है। आज के दौर में उनकी यह शैली विश्व स्वीकृत है। समूचा विश्व मानने लगा है कि युद्ध अंतिम विकल्प है। किंतु संवाद शास्वत विकल्प है। कोई भी ऐसा विवाद नहीं है, जो बातचीत से हल न किया जा सके। इन अर्थों में नारद सर्वश्रेष्ठ लोक संचारक हैं। सबसे बड़ी बात है नारद का स्वयं का कोई हित नहीं था। इसलिए उनका समूचा संचार लोकहित के लिए है। नारद भक्ति सूत्र में 84 सूत्र हैं। ये भक्ति सूत्र जीवन को एक नई दिशा देने की सार्मथ्य रखते हैं। इन सूत्रों को प्रकट ध्येय तो ईश्वर की प्राप्ति ही है, किंतु अगर हम इनका विश्लेषण करें तो पता चलता है इसमें आज की मीडिया और मीडिया साथियों के लिए भी उचित दिशाबोध कराया गया है।    नारद भक्ति सूत्रों पर ओशो रजनीश, भक्ति वेदांत,स्वामी प्रभुपाद, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, गुरुदेव श्रीश्री रविशंकर, श्री भूपेंद्र भाई पंड्या, श्री रामावतार विद्याभास्कर,स्वामी अनुभवानंद, हनुमान प्रसाद पोद्दार,स्वामी चिन्मयानंद जैसे अनेक विद्वानों ने टीकाएं की हैं। जिससे उनके दर्शन के बारे में विस्तृत समझ पैदा होती है। पत्रकारिता की दृष्टि से कई विद्वानों ने नारद जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का आकलन करते हुए लेखन किया है। हालांकि उनके संचारक व्यक्तित्व का समग्र मूल्यांकन होना शेष है। क्योंकि उनपर लिखी गयी ज्यादातर पुस्तकें उनके आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्ष पर केंद्रित हैं। काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता के आचार्य प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी है। संचार के विद्वान और हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो. बृजकिशोर कुठियाला मानते हैं, नारदजी सिर्फ संचार के ही नहीं, सुशासन के मंत्रदाता भी हैं। वे कहते हैं-“व्यास ने नारद के मुख से युधिष्ठिर से जो प्रश्न करवाये उनमें से हर एक अपने आप में सुशासन का एक व्यावहारिक सिद्धांत है। 123 से अधिक प्रश्नों को व्यास ने बिना किसी विराम के पूछवाया। कौतुहल का विषय यह भी है कि युधिष्ठिर ने इन प्रश्नों का उत्तर एक-एक करके नहीं दिया परंतु कुल मिलाकर यह कहा कि वे ऋषि नारद के उपदेशों के अनुसार ही कार्य करते आ रहे हैं और यह आश्वासन भी दिया कि वह इसी मार्गदर्शन के अनुसार भविष्य में भी कार्य करेंगे।”   एक सुंदर दुनिया बनाने के लिए सार्वजनिक संवाद में शुचिता और मूल्यबोध की चेतना आवश्यक है। इससे ही हमारा संवाद लोकहित केंद्रित बनेगा। नारद जयंती के अवसर नारद जी के भक्ति सूत्रों के आधार पर आध्यात्मिकता के घरातल पर पत्रकारिता खड़ी हो और समाज के संकटों के हल खोजे, इसी में उसकी सार्थकता है।   (लेखक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


bhopal, Arab-Israel India

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   इस्राइल और फलस्तीनियों के संगठन हमास के बीच पिछले 11 दिनों तक युद्ध चलता रहा। अब मिस्र और अमेरिका के प्रयत्नों से वह युद्ध ऊपरी तौर पर शांत हो गया है लेकिन बुनियादी झगड़ा जहां का तहां बना हुआ है। अल-अक्सा मस्जिद, जो कि दुनिया के मुसलमानों का पवित्र तीर्थ-स्थल है, उसमें इस्राइलियों का जाना-आना ज्यों का त्यों बना हुआ है और शेख ज़र्रा नामक पूर्वी यरुशलम से फलस्तीनियों को खदेड़ना जारी है। इन दोनों मसलों के कारण ही यह युद्ध छिड़ा था।   इन दोनों से भी बड़ा और असली मुद्दा है- उस फलस्तीनी भूमि पर दो राष्ट्रों का स्थापित होना। 1948 में इस्राइल वहाँ स्थापित हो गया। उसकी स्थापना में ब्रिटेन और अमेरिका ने जबर्दस्त भूमिका निभाई लेकिन फलस्तीनियों का राज्य बनना अभी तक संभव नहीं हुआ है जबकि उसकी स्थापना के लिए संयुक्तराष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर रखा है। सभी पश्चिमी राष्ट्र और यहां तक कि अरब राष्ट्र भी इस मामले में जबानी जमा-खर्च करके चुप हो जाते हैं।   इस्राइल में रहनेवाले अरबों की दुर्गति तो सबको पता ही है, फलिस्तीनी इलाकों की गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा शब्दों के परे हैं। इसके अलावा पिछले अरब-इस्राइली युद्धों में इस्राइल ने जिन अरब इलाकों पर कब्जा कर लिया था, उनमें रहनेवाले अरबों की हालत गुलामों जैसी है। वे अपने ही घर में बेगानों की तरह रहते हैं। एक जमाना था, जब दुनिया के मालदार इस्लामी राष्ट्र इन शरणार्थियों की खुलकर मदद करते थे लेकिन अब ईरान के अलावा कोई राष्ट्र खुलकर इनकी मदद के लिए सामने नहीं आता। तुर्की और मलेशिया जैसे राष्ट्र जबानी बंदूकें चलाने में उस्ताद हैं लेकिन परेशान फलस्तीनियों की ठोस मदद करनेवाला आज कोई भी नहीं है। खुद फलस्तीनी कई गुटों में बंट गए हैं। अल-फतह और हमास- ये दो तो उनके जाने-पहचाने चेहरे हैं। छोटे-मोटे कई गुट सक्रिय हैं जबकि उनके विरुद्ध पूरा का पूरा इस्राइल एक चट्टान की तरह खड़ा होता है। इस्राइल की पीठ पर अमेरिका की सशक्त यहूदी लाॅबी का हाथ है।   भारत एक ऐसा देश है, जिसका इस्राइल और फलिस्तीन, दोनों से घनिष्ट संबंध है। भारत ने वर्तमान विवाद में अपनी भूमिका के असंतुलन को सुधारा है और निष्पक्ष राय जाहिर की है। वह किसी का पक्षपात करने के लिए मजबूर नहीं है। फलस्तीनियों के प्रसिद्ध नेता यासिर अराफत कई बार भारत आते रहे और भारत सरकार खुलकर उनका समर्थन करती रही है। नरसिंह राव सरकार ने इस्राइल के साथ सक्रिय सहयोग शुरू किया था, जो आज काफी ऊँचे स्तर पर पहुंच गया है। अन्य अरब देश भी भारत का बहुत सम्मान करते हैं। इस्राइल सुरक्षित रहे लेकिन साथ-साथ अरबों को भी न्याय मिले, इस दिशा में भारत का प्रयत्न बहुत सार्थक हो सकता है। भारत दोनों पक्षों से खुलकर बात करे तो वह अमेरिका जो प्रयत्न कर रहा है, उसे सफल बना सकता है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


bhopal, Still taking, Corona vaccine, but why

आर.के. सिन्हा   कोरोना की काट वैक्सीन को लेकर अब भी देश में बहुत से खास और आम लोगों में डर का भाव दिखता है। वे इसे लगवाने से बच रहे हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि उनकी वैक्सीन लगवाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। इस तरह तो देश में कोरोना को मात देना कठिन होगा। अब जरा देखें कि कोरोना की चपेट में आने के बाद उड़न सिख मिल्खा सिंह को मोहाली के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहां भर्ती होने के बाद मिल्खा सिंह ने कहा कि उन्होंने कोरोना वैक्सीन लगवाने के संबंध में सोचा ही नहीं। हां, वे इसके वायरस को हरा देंगे।   बहुत अच्छी बात है कि वे कोरोना के वायरस को हरा दें। पर उनका वैक्सीन न लगवाना कतई सही नहीं माना जा सकता। फिलहाल तो यही एकमात्र कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जरूरी हथियार है। समझ नहीं आता कि मिल्खा सिंह को उनके परिवार के सदस्यों या मित्रों ने वैक्सीन लगवाने के संबंध में क्यों नहीं कहा। अगर उन्होंने कोरोना वैक्सीन को वक्त रहते लगवा लिया होता तो वे दो-तीन दिनों में ठीक भी हो जाते, क्योंकि वैक्सीन कोरोना वायरस के असर को काफी हद तक खत्म कर देती है। इसके उलट मुझे तो प्रतिदिन किसी न किसी मित्र या परिचित के फोन आते हैं कि उन्हें भी कोरोना हुआ पर पर उनकी तो जान सिर्फ इसलिये बच गई क्योंकि, उन्होंने वैक्सीन लगवा रखी थीI   इससे भी गंभीर मामला उत्तर प्रदेश से सामने आ रहा है। वहां कोरोना वैक्सीन लगवाने के डर के कारण अपने पास आती एक मेडिकल टीम को देखकर लोगों ने सरयू जैसी नदी में छलांग लगा दी। बाराबंकी की तहसील रामनगर में पिछले शनिवार को स्वास्थ्य विभाग की टीम ग्रामीणों को कोरोना रोधी टीका लगाने पहुंची, जिसकी भनक से ही ग्रामीण डर गए और छिपकर नदी के किनारे बैठने लगे। खबरें मिल रही हैं कि कुछ ने उफनती नदी में छलांग तक लगा दी ताकि उन्हें कोई टीका न लगाए। अब बताइये कि कोई भी सरकार कैसे कोरोना जैसे भयंकर वायरस को हरा सकेगी।   यकीन मानिए कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद ही भारत में एक हद तक वैक्सीन लगवाने को लेकर गंभीरता भी पैदा हुई है। उससे पहले तो अधिकतर लोग इसे लगवाने से बच ही रहे थे। अब जब कोरोना का संक्रमण बेहद जानलेवा साबित होने लगा तो युवाओं के लिए भी वैक्सीन लगवाना बेहद जरूरी हो गया I क्योंकि, वैक्सीनेशन के बाद बीमारी की गंभीरता और उससे मौत होने का खतरा काफी कम हो जाता है। युवाओं के लिए वैक्सीन लगवाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि युवा तेजी से कोरोना के नए वैरिएंट से संक्रमित हो रहे थे। वैक्सीन लगवाने से कोरोना फैलने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है और लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़ सकते हैं। कई पश्चिमी देशों में भी देखा गया है कि वैक्सीनेशन के बाद लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़ने लगे हैं। अब तो अमेरिका में मास्क लगाना तक जरूरी नहीं रहा और खाने-पीने के सार्वजनिक रेस्टोरेंट तक खुलने लगेI   अगर बात आंकड़ों की करें तो हमारे देश की 38 फीसदी आबादी 19 से 44 उम्र के लोगों की है। देश में अब तक लगभग 18 करोड़ लोग वैक्सीन लगवा चुके हैं। टीकाकरण अभियान के दौरान 45 से 60 साल के 5,76,53,924 लोगों को कोविड-19 टीके की पहली खुराक तथा 92,39,392 लोगों को दूसरी खुराक भी लगायी गयी है। इसके अलावा 60 साल से ऊपर के 5,46,60,900 लोगों को पहली खुराक और 1,79,10,024 लोगों को दूसरी खुराक दी गयी है। पर अभी भी बहुत बड़ा लक्ष्य बाकी है। सारे देश में वैक्सीन लगाने में तो वक्त लगेगा। पर पहले तो देश की जनता जागृत तो हो और इसको लगवाने को लेकर आगे भी आए।   पहले तो बहुत से लोगों में वैक्सीन को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। ये हाल तब है जब सरकार, डॉक्टर, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लगातार इस बात को कहते रहे हैं कि अपनी बारी आने पर वैक्सीन जरूर लें, इससे ही कोरोना संक्रमण की बढ़ती हुई चेन को तोड़ा जा सकता है। इस वैक्सीन को लेकर शुरू में कुछ आशंकाएँ और संदेह भी जाहिर किए जा रहे थे। उन आशंकाओं, अफवाहों और भ्रमों को दूर करने के लिए एम्स के डॉयरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने खुद ही सबसे पहले कोरोना वैक्सीन की डोज ली थी। भारत में कोरोना के खिलाफ टीकाकरण की शुरुआत की दिशा में यह एक बड़ा कदम था। कोरोना वायरस ने तो दुनिया के हरेक इंसान की आंखों से आंसू निकलवा दिए हैं। करोड़ों परिवारों को बर्बाद कर दिया है और लाखों लोगों की जान ले ली हैI   दरअसल यह संक्रमण हवा के जरिए अधिक तेजी से फैल रहा है न कि संक्रमित सतह को छूने से। पूरी दुनिया में भारत फिलहाल एकमात्र ऐसा देश है जहां इसके सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं। अभी वैक्सीन दिये जाने का काम कई राज्यों में रुक-सा भी गया है या मंद पड़ गया है क्योंकि इसकी खुराक ही खत्म हो गई है। पर ये मसला जल्दी ही हल हो जाएगा। देश में कोरोना से लड़ने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है कि टीकाकरण का काम जल्द पूरा हो जाए। हम भारत में कोरोना के प्रभाव को कम करने के लिए अपने देश में बने दो तरह के टीके लगा रहे हैं। अब रूस में बना टीका भी लगने लगेगा। कोरोना के नियंत्रण में रूसी वैक्सीन "स्पूतनिक वी" को 97.6 प्रतिशत तक कारगर माना जा रहा है। इसका अब हिमाचल प्रदेश के बद्दी में बड़े पैमाने पर उत्पादन भी होगा। यहां बनने वाली वैक्सीन की गुणवत्ता की देखरेख रूस से की जाएगी। इसकी आपूर्ति भी रूस को ही जाएगी। बताया जा रहा है कि रूस ने भारत में स्पूतनिक वी की 18 मिलियन खुराक भेजने की योजना की घोषणा की है, जिसमें मई माह में 30 लाख, जून में 50 लाख और जुलाई में 10 मिलियन खुराक शामिल है।   कोरोना की दूसरी लहर घर-घर तक पहुंच गई है। इसने सारे देश को हिलाकर रख दिया है। इसकी वजह से सारे देश को भारी क्षति हुई है। इसलिए अब यह जरूरी है कि कोरोना की वैक्सीन लेने में कतई देरी न की जाए। इस तरह का कोई भी कदम नासमझी भरा ही होगा।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


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प्रमोद भार्गव तौकते चक्रवात का कहर अभी ठंडा भी नहीं पड़ा है कि बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवाती तूफान यास ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कहर ढाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। मौसम विभाग ने बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के चक्रवाती तूफान के संकट की भविष्यवाणी कर दी है। यह तूफान उत्तर-उत्तर पश्चिम की ओर जाएगा तथा 26 मई के आसपास पश्चिम बंगाल-उत्तरी ओड़िशा से टकराएगा। केंद्र सरकार ने इसके मद्देनजर इन दोनों प्रांतों को चेतावनी देते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल की तैनातियां शुरू कर दी है। महाराष्ट्र और गुजरात में 'तौकते' तूफान के दौरान एनडीआरएफ के जो बल तैनात थे, उन्हें हवाई मार्ग से बंगाल और ओड़िशा भेजा जा रहा है। 110 किमी की रफ्तार से आने वाले इस तूफान का असर आंध्र-प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भी पड़ सकता है। मछुआरों को इस दौरान समुद्र से बाहर निकल आने की सलाह दी गई है। तूफान के साथ तूफान प्रभावित क्षेत्रों में तेज बारिश भी होगी। जिसका आंशिक असर दिल्ली, राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी देखने में आएगा।    मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के बावजूद तूफान तौकते अपना भीषण असर दिखाकर आगे बढ़ गया और अब इसके पीछे-पीछे यास ने दस्तक दे दी। इसके पहले इन दोनों राज्यों के इसी इलाके में बुलबुल और फैनी चक्रवातों ने 2019 में तबाही मचाई थी। भारतीय मौसम विभाग के अनुमान अकसर सही साबित नहीं होते, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। किंतु अब समझ आ रहा है कि मौसम विभाग आपदा का सटीक अनुमान लगाकर समाज और प्रशासन को आपदा से जूझने की पूर्व तैयारियों में लगाने में समर्थ हो गया है। अन्यथा मध्य मई में आए तूफान तौकते का असर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात में कहीं ज्यादा देखने में आता। चेतावनी मिलने के साथ ही शासन-प्रशासन और समाज ने जागरूकता व संवेदनशीलता बरतते हुए जान-माल की ज्यादा हानि नहीं होने दी। फेलिन, हुदहुद, तितली, बुलबुल और फैनी चक्रवात से जुड़ी भविष्यवाणियां भी सटीक बैठी थीं।   दरअसल जलवायु परिवर्तन और आधुनिक विकास के कारण देश ही नहीं दुनिया आपदाओं की आशंकाओं से घिरी हुई है। ऐसे में आपदा प्रबंधन की क्षमताओं और संसाधनों को हमेशा सचेत रहने की जरूरत है। उत्तरी हिंद महासागर में आने वाले तूफानों के लिए नाम पहले ही निश्चित कर लिए गए हैं। तौकते का अर्थ छिपकली था, वहीं यास का नामाकरण ओमान ने वहां की स्थानीय बोली के आधार पर रखा है, जिसका अर्थ 'निराशा' होता है। अम्फान नाम थाइलैंड ने दिया था। इसका अर्थ थाई भाषा में आसमान होता है।    हमारे मौसम विज्ञानी सुपर कंप्युटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे हैं। तूफान की तीव्रता, हवा की गति और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए। इन अनुमानों को और कारगर बनाने की जरुरत है, जिससे बाढ़, सूखे, भूकंप, आंधी और बवंडरों की पूर्व सूचनाएं मिल सकें और इनसे सामना किया जा सके। साथ ही मौसम विभाग को ऐसी निगरानी प्रणालियां भी विकसित करने की जरूरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेबार भविष्यवाणियां की जा सकें। यदि ऐसा मुमकिन हो पाता है तो कृषि का बेहतर नियोजन संभव हो सकेगा। साथ ही अतिवृष्टि या अनावृष्टि के संभावित परिणामों से कारगर ढंग से निपटा जा सकेगा। किसान भी बारिश के अनुपात में फसलें बोने लग जाएंगे। लिहाजा कम या ज्यादा बारिश का नुकसान उठाने से किसान मुक्त हो जाएंगे। मौसम संबंधी उपकरणों के गुणवत्ता व दूरंदेशी होने की इसलिए भी जरूरत है, क्योंकि जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से समुद्रतटीय इलाकों में आबादी भी ज्यादा है और वे आजीविका के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। लिहाजा समुद्री तूफानों का सबसे ज्यादा संकट इसी आबादी को झेलना पड़ता है। इस चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी करने में निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट कमोबेश नाकाम रही है।   1999 में जब ओडिशा में नीलम तूफान आया था तो हजारों लोग सटीक भविष्यवाणी न होने और आपदा प्रबंधन की कमी के चलते मारे गए थे। 12 अक्टूबर 2013 को उष्णकटिबंधीय चक्रवात फैलिन ने ओडिशा तट पर दस्तक दी थी। अंडमान सागर में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में उत्पन्न हुए नीलम ने 9 अक्टूबर को उत्तरी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पार करते ही एक चक्रवाती तूफान का रूप ले लिया था। इसने सबसे ज्यादा नुकसान ओडिशा और आंध्र प्रदेश में किया था। इस चक्रवात की भीषणता को देखते हुए 6 लाख लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाएं गए थे। तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफानी हवाएं 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरी थीं। 2004 में आए सुनामी तूफान का असर सबसे ज्यादा इन्हीं इलाकों में देखा गया था। हालांकि हिंद महासागर से उठे इस तूफान से 14 देश प्रभावित हुए थे। तमिलनाडू में भी इसका असर देखने में आया था। इससे मरने वालों की संख्या करीब 2 लाख 30 हजार थी। भारत के इतिहास में इसे एक बड़ी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाता है।   8 और 12 अक्टूबर 2014 में आंध्र एवं ओडिशा में हुदहुद तूफान में भी भयंकर कहर बरपाया था। इसकी दस्तक से इन दोनों राज्यों के लोग सहम गए थे। भारतीय नौसेना एनडीआरएफ ने करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित क्षेत्रों में पहुंचाकर उनके प्राणों की रक्षा की थी। इसलिए इसकी चपेट से केवल छह लोगों की ही मौंतें हुई थीं। हालांकि आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही 1839 में आए कोरिंगा तूफान ने मचाई थी। गोदावरी जिले के कोरिंगा घाट पर समुद्र की 40 फीट ऊंचीं उठी लहरों ने करीब 3 लाख लोगों को निगल लिया था। समुद्र में खड़े 20,000 जहाज कहां विलीन हुए पता ही नहीं चला। 1789 में कोरिंगा से एक और समुद्री तूफान टकराया था, जिसमें लगभग 20,000 लोग मारे गए थे।    कुदरत के रहस्यों की ज्यादातर जानकारी अभी अधूरी है। जाहिर है, चक्रवात जैसी आपदाओं को हम रोक नहीं सकते, लेकिन उनका सामना या उनके असर को कम करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। भारत के तमाम इलाके बाढ़, सूखा, भूकंप और तूफानों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित होते जा रहे पर्यावरण के कारण ये खतरे और इनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कहा भी जा रहा है कि फेलिन, ठाणे, आइला, आईरिन, नीलम सैंडी, अम्फान और तौकते जैसी आपदाएं प्रकृति की बजाय आधुनिक मनुष्य और उसकी प्रकृति विरोधी विकास नीति का पर्याय हैं। उत्तराखंड में तो आधुनिक विकास तबाही की तस्वीर लगातार देखने में आ रही है। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में भूस्खलन और नदियों में बाढ़ एक सिलसिला बनकर कहर बरपा रही हैं।   गौरतलब है कि 2005 में कैटरीना तूफान के समय अमेरिकी मौसम विभाग ने इस प्रकार के प्रलयंकारी समुद्री तूफान 2080 तक आने की आशंका जताई थी, लेकिन वह सैंडी और नीलम तूफानों के रूप में 2012 में ही आ धमके। 19 साल पहले ओड़िशा में सुनामी से फूटी तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने यह तथ्य रेखांकित किया था कि अगर मैग्रोंव वन बचे रहते तो तबाही कम होती। ओड़िशा के तटवर्ती शहर जगतसिंहपुर में एक औद्योगिक परियोजना खड़ी करने के लिए एक लाख 70 हजार से भी ज्यादा मैंग्रोव वृक्ष काट डाले गए थे। दरअसल, जंगल एवं पहाड़ प्राणी जगत के लिए सुरक्षा कवच हैं, इनके विनाश को यदि नीतियों में बदलाव करके नहीं रोका गया तो तय है कि आपदाओं के सिलसिलों को भी रोक पाना मुश्किल होगा ? लिहाजा नदियों के किनारे आवासीय बस्तियों पर रोक और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगलों का सरंक्षण जरूरी है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


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बुद्ध पूर्णिमा (26 मई) पर विशेष   योगेश कुमार गोयल 563 ईसापूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा को लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच एक राजकुमार ने उस समय जन्म लिया, जब उनकी मां कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने पीहर देवदह जा रही थी और रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी। इस राजकुमार का नाम रखा गया सिद्धार्थ, जो आगे चलकर महात्मा बुद्ध के नाम से विख्यात हुए। महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन और उनके विचार आज ढाई हजार से अधिक वर्षों के बेहद लंबे अंतराल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके प्रेरणादायक जीवन दर्शन का जनजीवन पर अमिट प्रभाव रहा है। हिन्दू धर्म में जो अमूल्य स्थान चार वेदों का है, वही स्थान बौद्ध धर्म में ‘पिटकों’ का है। महात्मा बुद्ध स्वयं अपने हाथ से कुछ नहीं लिखते थे बल्कि उनके शिष्यों ने ही उनके उपदेशों को कंठस्थ कर बाद में उन्हें लिखा और लिखकर उन उपदेशों को वे पेटियों में रखते जाते थे, इसीलिए इनका नाम ‘पिटक’ पड़ा, जो तीन प्रकार के हैं:- विनय पिटक, सुत्त पिटक तथा अभिधम्म पिटक।   महात्मा बुद्ध के जीवनकाल की अनेक घटनाएं ऐसी हैं, जिनसे उनके मन में समस्त प्राणीजगत के प्रति निहित कल्याण की भावना तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव का साक्षात्कार होता है। उनके हृदय में बाल्यकाल से ही चराचर जगत में विद्यमान प्रत्येक प्राणी में प्रति करूणा कूट-कूटकर भरी थी। मनुष्य हो या कोई जीव-जंतु, किसी का भी दुख उनसे देखा नहीं जाता था। एकबार की बात है, जंगल में भ्रमण करते समय उन्हें किसी शिकारी के तीर से घायल एक हंस मिला। उन्होंने उसके शरीर से तीर निकालकर उसे थोड़ा पानी पिलाया। तभी उनका चचेरा भाई देवदत्त वहां आ पहुंचा और कहा कि यह मेरा शिकार है, इसे मुझे सौंप दो। इस पर राजकुमार सिद्धार्थ ने कहा कि इसे मैंने बचाया है जबकि तुम तो इसकी हत्या कर रहे थे, इसलिए तुम्हीं बताओ कि इस पर मारने वाले का अधिकार होना चाहिए या बचाने वाले का। देवदत्त ने सिद्धार्थ की शिकायत उनके पिता राजा शुद्धोधन से की। शुद्धोधन ने सिद्धार्थ से कहा कि तीर तो देवदत्त ने ही चलाया था, इसलिए तुम यह हंस उसे क्यों नहीं दे देते?   इस पर सिद्धार्थ ने तर्क दिया, ‘‘पिताजी! इस निरीह हंस ने भला देवदत्त का क्या बिगाड़ा था? उसे आसमान में स्वच्छंद उड़ान भरते इस बेकसूर हंस पर तीर चलाने का क्या अधिकार है? उसने इस हंस पर तीर चलाकर इसे घायल किया ही क्यों? मुझसे इसका दुख देखा नहीं गया और मैंने तीर निकालकर इसके प्राण बचाए हैं, इसलिए इस हंस पर मेरा ही अधिकार होना चाहिए।’’   राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के इस तर्क से सहमत होते हुए बोले, ‘‘तुम बिल्कुल सही कह रहे हो सिद्धार्थ। मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा होता है, इसलिए इस हंस पर तुम्हारा ही अधिकार है।’’   महात्मा बुद्ध जब उपदेश देते जगह-जगह घूमते तो कुछ लोग उनका खूब आदर-सत्कार करते तो कुछ उन्हें बहुत भला-बुरा बोलकर खूब खरी-खोटी भी सुनाते तो कुछ दूर से ही उन्हें अपमानित कर दुत्कार कर भगा देते लेकिन महात्मा बुद्ध सदैव शांतचित्त रहते। एकबार वे भिक्षाटन के लिए शहर में निकले और उच्च जाति के एक व्यक्ति के घर के समीप पहुंचे ही थे कि उस व्यक्ति ने उन पर जोर-जोर से चिल्लाना तथा गालियां देना शुरू कर दिया और कहा कि नीच, तुम वहीं ठहरो, मेरे घर के पास भी मत आओ।   बुद्ध ने उससे पूछा, भाई, यह तो बताओ कि नीच आखिर होता कौन है और कौन-कौनसी बातें किसी व्यक्ति को नीच बताती हैं?’’   उस व्यक्ति ने जबाव दिया, ‘‘मैं नहीं जानता। मुझे तो तुमसे ज्यादा नीच इस दुनिया में और कोई नजर नहीं आता।’’   इस पर महात्मा बुद्ध ने बड़े प्यार भाव से उस व्यक्ति को समझाते हुए कहा, ‘‘जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से ईर्ष्या करता है, उससे वैर भाव रखता है, किसी पर बेवजह क्रोध करता है, निरीह प्राणियों पर अत्याचार या उनकी हत्या करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जब कोई किसी पर चिल्लाता है या उसे अपशब्द कहता है अथवा उसे नीच कहता है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में नीचता पर उतारू होता है क्योंकि असभ्य व्यवहार ही नीचता का प्रतीक है। जो व्यक्ति किसी का कुछ लेकर उसे वापस नहीं लौटाता, ऋण लेकर लौटाते समय झगड़ा या बेईमानी करता है, राह चलते लोगों के साथ मारपीट कर लूटपाट करता है, जो माता-पिता या बड़ों का आदर-सम्मान नहीं करता और समर्थ होते हुए भी माता-पिता की सेवा नहीं करता बल्कि उनका अपमान करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जाति या धर्म निम्न या उच्च नहीं होते और न ही जन्म से कोई व्यक्ति उच्च या निम्न होता है बल्कि अपने विचारों, कर्म तथा स्वभाव से ही व्यक्ति निम्न या उच्च बनता है। कुलीनता के नाम पर दूसरों को अपमानित करने का प्रयास ही नीचता है। धर्म-अध्यात्म के नाम पर आत्मशुद्धि के बजाय कर्मकांडों या प्रतीकों को महत्व देकर खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करके दिखाने का दंभ ही नीचता है।’’   महात्मा बुद्ध के इन तर्कों से प्रभावित हो वह व्यक्ति उनके चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगा। बुद्ध ने उसे उठाकर गले से लगाया और उसे सृष्टि के हर प्राणी के प्रति मन में दयाभाव रखने तथा हर व्यक्ति का सम्मान करने का मूलमंत्र देकर वे आगे निकल पड़े।   अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में महात्मा बुद्ध ने दुनिया भर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए। ईसा पूर्व 483 को वैशाख मास की पूर्णिमा को उन्होंने कुशीनगर के पास हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने उन्हीं साल वृक्षों के नीचे प्राण त्यागे, जिन पर मौसम न होते हुए भी फूल आए थे। उनका अंतिम उपदेश था कि सृजित वस्तुएं अस्थायी हैं, अतः विवेकपूर्ण प्रयास करो। उनका कहना था कि मनुष्य की सबसे उच्च स्थिति वही है, जिसमें न तो बुढ़ापा है, न किसी तरह का भय, न चिन्ताएं, न जन्म, न मृत्यु और न ही किसी तरह के कष्ट और यह केवल तभी संभव है, जब शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मन भी संयमित हो क्योंकि मन की साधना ही सबसे बड़ी साधना है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


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डॉ. दिनेश चंद्र सिंह किसी भी सभ्यता व संस्कृति का विकास, समय-समय पर उसके लोगों के समक्ष आए संकट और उससे उत्पन्न परिस्थितियों से जूझने की उनकी व्यक्तिगत-सामूहिक क्षमता पर निर्भर करता है। वर्तमान वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के प्रकोप से उपजी हुई चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के क्रम में भी हमें विधि के विधान के साथ साथ वैज्ञानिक अवदानों का भी कायल रहना चाहिए। प्रसंगवश, लोक महाकाव्य रामचरितमानस की एक चौपाई को यहां उद्धृत करना चाहूंगा- "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभु, जीवनु-मरनु, जसु-अपजसु विधि हाथ।।"     वास्तव में, ये पंक्तियां सदियों से दु:खी, पीड़ित व वेदनायुक्त समाज में पुनः शक्ति धारण कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का कार्य करती आई हैं। उनका मार्ग सदा से ही प्रशस्त करती आई हैं, लेकिन यह यक्ष प्रश्न मेरे समक्ष समुपस्थित है कि क्या आज भी इसकी प्रासंगिकता है अथवा नहीं ! विचलित मन से ऐसा अनेकों बार सोचा और कभी-कभी सहसा विश्वास भी नहीं होता है। किंतु वर्तमान कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने तो यह विश्वास और गहन कर दिया कि ऊपर की पंक्तियां सच नहीं हैं ! वजह यह कि कोरोना संक्रमण से कुछ ऐसे व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हुई है जिनकी जीवन की यात्रा का यदि निकट से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वह किसी भी प्रकार के व्यसन से कोसों दूर थे। खान-पान की उच्च स्तरीय प्रवृत्ति का अनुसरण अपने जीवन में करते आये थे। स्वास्थ्यगत मानकों पर भी काफी हद तक ठीक थे। परंतु कोरोना के संक्रमण के प्रभाव से उनकी लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता यकायक जवाब दे गई और अकाल मृत्यु का ग्रास बनकर उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई।   यद्यपि, यह वैज्ञानिकों द्वारा तथा अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रमाणित रूप से सिद्ध किया जा चुका है कि जिनको एक से अधिक प्रकार के विभिन्न रोग हैं, जैसे- शुगर, फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, न्यूरो, हार्ट से संबंधित डिजीज, जिन्हें चिकित्सकीय भाषा में कोमोरबिलि कोमोरबीडीटी कहा जाता है, उन्हें बचाना बेहद मुश्किल है। वहीं, यह भी पाया जा रहा है कि मधुमेह, हाइपरटेंशन, रक्त संबंधी रोग एचआईवी पॉजिटिव, कैंसर इत्यादि जैसे एक से अधिक रोग से प्रभावित व्यक्ति भी समुचित इलाज एवं देखभाल से कोरोना को मात देकर स्वस्थ भी हुए हैं। कहने का अभिप्राय यह कि भले ही समुचित चिकित्सा सुविधाएं एवं बेहतर प्रबंधन किसी भी व्यवस्था का कारगर हथियार होते हैं, जिसके बल पर किसी भी चुनौती का मुकाबला करके उसे हराया जा सकता है। लेकिन कहीं-कहीं सामान्य नागरिकों की सोच दो हिस्सों में बंट जाती है। पहला यह कि बेहतर प्रबंधन व उत्कृष्ट चिकित्सा व्यवस्था के अलावा अन्य कोई ईश्वरीय अनुकंपा से व्यक्ति इस संक्रामक रोग से ठीक नहीं हुआ। दूसरा यह कि कुछ ऐसे वर्ग भी हैं जो समुचित चिकित्सा के अभाव में भी होम आइसोलेशन में घरेलू एवं पुरानी चिकित्सकीय व्यवस्था, योग, प्राणायाम आयुर्वेदिक काढ़ा इत्यादि के सेवन से घर पर ही ठीक हो रहे हैं। ऐसे लोग अपनी जीवन शैली एवं ईश्वर की कृपा को अपने ठीक होने का कारण मानते हैं।   वास्तव में, हम किसी भी दशा में उत्कृष्ट प्रबंधन एवं बेहतर चिकित्सकीय व्यवस्था, समुचित निगरानी तंत्र और उत्तर प्रदेश सरकार की टेस्ट, ट्रेस व ट्रीट की वैज्ञानिक पद्धति को कोरोना को हराने एवं संक्रमण से प्रभावित व्यक्तियों को ठीक करने की व्यवस्था को ही उत्कृष्ट मान रहे हैं और मानना भी चाहिए। क्योंकि कर्म एवं मेधा के बल पर किया गया प्रयास सदैव विजयी बनाता है। बावजूद इसके, कहीं न कहीं कतिपय युवकों, बच्चों एवं स्वस्थ व्यक्तियों की मृत्यु के रहस्य की तलाश करते हुए इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, यह सब विधि यानी प्रकृति के हाथ में ही है।   इस बात की प्रमाणिकता के लिए यह अवगत कराना चाहूंगा कि देश एवं दुनिया की 9 प्रतिष्ठित कम्पनियों व उसके लोगों ने, कंपनी से जुड़े वैज्ञानिकों ने रात-दिन प्रयास करके अपने परिश्रम एवं कर्तव्य परायणता से बेहद जटिल कोरोना महामारी की वैक्सीन की खोज की, जिससे इनकी कंपनियों को लाभ-यश के साथ मानवता की रक्षा का पुरस्कार व प्रशंसा मिली। लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब अन्य तमाम कंपनी इस क्षेत्र में कार्य कर रही थीं/ हैं तो फिर लाभ एवं यश इन्हीं 9 कंपनियों व उसके कर्ताधर्ता लोगों को ही क्यों मिला। यहीं से प्रकृति, पौरुषता व प्रारब्ध की चर्चा जगह हासिल करने लगती हैं। उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि कहीं न कहीं रामचरितमानस की उपरोक्त उपदेशात्मक पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती है।   पीपुल्स एलायंस की रिपोर्ट के आधार पर 9 लोग इस संक्रमण काल में भी नए अरबपति बने। पहला, मॉडर्न के सीईओ स्टीफन बैंसल, दूसरा बायोनेट के सीईओ और संस्थापक उगुर साहीन, तीसरा इम्यूनोलॉजिस्ट और मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक टिमोथी स्प्रिंगर, चौथा मॉडर्ना के चेयरमैन नौबार अफेयान, पांचवा मॉडर्ना के वैक्सीन के पैकेज व निर्माण के लिए कार्य करने वाली कंपनी आरओवीआई के चेयरमैन जुआन लोपेज वेलमोंट, छठा मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक एवं विज्ञानी रॉबर्ट लैंगर, सातवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के मुख्य वैज्ञानिक झू ताओ, आठवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के सीनियर वी सी किउ डोंगकसू और नवम कैनसिनो बायोलॉजिक्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व माओ हुइंहोआ।    इसी प्रकार, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक सारस पूनावाला, कैडिला हेल्थकेयर के प्रमुख पंकज पटेल व कई ऐसी संस्था है, जिनको इस काल में लाभ ही लाभ हुआ। यहां पर मैं एक ऐसे नाम का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं, जिनकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। वह हैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एवं बनारस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनिल कुमार मिश्रा, जिन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित 2 डीजी दवा के निर्माण में अभिनव भूमिका निभाई। उनके सह-अनुसंधानकर्ता भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनंत नारायण भट्ट ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। बेशक, ये लोग एक शासकीय सेवा के अंतर्गत वैज्ञानिक पद पर आसीन हैं, इसलिए इनको मौद्रिक लाभ शायद ना हो, लेकिन, इनकी यश-कीर्ति, यश-पताका, मानव की रक्षा हेतु किये गए उपायों की खोज से हासिल की गई उपलब्धियों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इससे आपकी भावी पीढ़ी भी खुद को गौरवान्वित समझेगी। इस खोज के लिए देश आपका सदैव आभारी रहेगा।   निःसन्देह, इन सबकी यश-कीर्ति भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई दृष्टिगोचर हो रही है। इसके साथ ही, कई ऐसे व्यवसाय भी हैं जिनको इस महामारी में लाभ और यश प्राप्त करने का अवसर मिला। कुछ तो ऐसे निकले, जिनको पूर्व में इतनी ख्याति अर्जित नहीं थी और अपनी हानि की बैलेंस शीट बनाते-बनाते थक गए थे। फिर अचानक लाभ का मौका इस महामारी काल में मिला। वहीं, कुछ लोगों को उनकी नकारात्मक सोच, लोभ, छल, कपट एवं स्वार्थपरता के कारण दवाइयों, इंजेक्शन एवं ऑक्सीजन आदि जीवनदायिनी औषधियों की कालाबाजारी के मोहपाश में पड़ने के कारण हानि व अपयश भी मिला। उन्हें जेल की सलाखों के अंदर जाने का दंड भी मिला। ऐसे लोगों ने भविष्य में अपने परिवार की आने वाली पीढ़ियों को भी कलंकित करने का कार्य किया। ऐसे में, मुझे लगा कि रामचरित मानस की निम्न पंक्तियां- "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।।" -आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पहले थी और आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगी।   मेरा दृढ़ मत है कि काम, क्रोध, अहंकार, स्वार्थ के वश में आकर व्यक्ति अपने वात, कफ, पित्त के संतुलन को बिगाड़ लेता है। फिर उसी त्रिदोष के कारण अनेक व्याधियों की चपेट में आकर अकाल मृत्यु, हानि तथा अपयश का भागी बनता रहता है। लिहाजा, हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के इस क्रूर कालखंड में हम सभी यदि अच्छे ढंग से मानवता की रक्षा के लिए एकजुट, संगठित होकर और सामाजिक सरोकार की भावना से पीड़ित, दु:खी एवं संक्रमित व्यक्तियों की सेवा करेंगे तो निश्चित ही हमलोग यश प्राप्त करेंगे। क्योंकि सरकारी तंत्र अपने स्तर से उत्कृष्ट कार्य कर रहा है।    यहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ पंक्तियां मेरे विश्वास को और अधिक मजबूती प्रदान करती हैं। वह यह कि "प्रभु रथ रोको! क्या प्रलय की तैयारी है, बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।...कितने परिचित, कितने अपने, आखिर यूं ही चले गए, जिन हाथों में धन-संबल, सब काल से छले गए।...हे राघव-माधव-मृत्युंजय, पिघलो, यह विनती हमारी है, ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।"    लिहाजा, सभी राजनीतिक दल, उद्योगपति, सक्षम नागरिक, देश की युवा शक्ति, बिना आरोप-प्रत्यारोप के सामूहिकता का भाव लेकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार, देश के समक्ष उत्पन्न इस अप्रत्याशित चुनौती का सामना करने के लिए संबल बनें। क्योंकि, समाज में उत्पन्न निराशा व हताशा के माहौल को आपकी सामूहिक सकारात्मकता व सर्जनात्मकता भाव से, इस विस्मयकारी माहौल से निपटने में मददगार होगी। भविष्य में यह निश्चय ही यादगार भी बनेगी और दृष्टांत स्वरूप उद्धृत भी की जाएगीर। इसलिए, निर्विवाद रूप से आप सभी अपनी सकारात्मकता के माध्यम से यश के भागी बनेंगे, अन्यथा इतिहास हमें कभी नहीं बख्शेगा।      (लेखक, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


Corona, Now the competition, fierce

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   एक-दो प्रांतों को छोड़कर भारत के लगभग हर प्रांत से खबर आ रही है कि कोरोना का प्रकोप वहाँ घट रहा है। अब देश के सैकड़ों अस्पतालों और तात्कालिक चिकित्सा-केंद्र में पलंग खाली पड़े हुए हैं। लगभग हर अस्पताल में आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में है। विदेशों से आए आक्सीजन-कंसन्ट्रेटरों के डिब्बे बंद पड़े हैं। दवाइयों और इंजेक्शनों की कालाबाजारी की खबरें भी अब कम हो गई हैं। लेकिन कोरोना के टीके कम पड़ रहे हैं। कई राज्यों ने 18 साल से बड़े लोगों को टीका लगाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया है।   देश में लगभग 20 करोड़ लोगों को पहला टीका लग चुका है लेकिन ये कौन लोग हैं ? इनमें ज्यादातर शहरी, सुशिक्षित, संपन्न और मध्यम वर्ग के लोग हैं। अभी भी ग्रामीण, गरीब, पिछड़े, अशिक्षित लोग टीके के इंतजार में हैं। भारत में 3 लाख से ज्यादा लोग अपने प्राण गंवा चुके हैं। पिछले 12 दिनों में 50 हजार लोग महाप्रयाण कर गए। इतने लोग तो आजाद भारत में किसी महामारी से पहले कभी नहीं मरे। किसी युद्ध में भी नहीं मरे।   मौत के इस आंकड़े ने हर भारतीय के दिल में यमदूतों का डर बिठा दिया। जो लोग सुबह 5 बजे गुड़गांव में मेरे घर के सामने सड़क पर घूमने निकलते थे, वे भी आजकल दिखाई नहीं पड़ते। सब लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं। आजकल घरों में भी जैसा अकेलापन, सूनापन और उदासी का माहौल है, वैसा तो मैंने अपने जेल-यात्राओं में भी नहीं देखा। अब 50-60 साल बाद लगता है कि कोरोना में रहने की बजाय जेलों में रहना कितना सुखद था। लेकिन जब हम दुनिया के दूसरे देशों को देखते हैं तो मन को थोड़ा मरहम-सा लगता है।   भारत में अबतक 3 लाख मरे हैं जबकि अमेरिका में 6 लाख और ब्राजील में 4.5 लाख लोग ! जनसंख्या के हिसाब से अमेरिका के मुकाबले भारत 4.5 गुना बड़ा है और ब्राजील से 7 गुना बड़ा। अमेरिका में चिकित्सा-सुविधाएं और साफ-सफाई भी भारत से कई गुना ज्यादा है। इसके बावजूद भारत का ज्यादा नुकसान क्यों नहीं हुआ ? क्योंकि हमारे डॉक्टर और नर्स देवतुल्य सेवा कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे भोजन के मसाले, घरेलू नुस्खे, प्राणायाम और आयुर्वेदिक दवाइयां चुपचाप अपना काम कर रही हैं। न विश्व स्वास्थ्य संगठन उन पर मोहर लगा रहा है, न हमारे डाॅक्टर उनके बारे में अपना मुँह खोल रहे हैं और न ही उनकी कालाबाजारी हो रही है। वे सर्वसुलभ हैं। उनके नाम पर निजी अस्पतालों में लाखों रु. की लूटपाट का सवाल ही नहीं उठता।   भारत के लोग यदि अफ्रीका और एशिया के लगभग 100 देशों पर नज़र डालें तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि वे कितने भाग्यशाली हैं। सूडान, इथियोपिया, नाइजीरिया जैसे देशों में कई ऐसे हैं, जिनमें एक प्रतिशत लोगों को भी टीका नहीं लगा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान में भी बहुत कम लोगों को टीका लग सका है। कोरोना की इस लड़ाई में सरकारों ने शुरू में लापरवाही जरूर की थी लेकिन अब भाजपा और गैर-भाजपा सरकारें जैसी मुस्तैदी दिखा रही हैं, यदि तीसरी लहर आ गई तो वे उसका मुकाबला जमकर कर सकेंगी।   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 24 May 2021


bhopal, History will not, forgive depositors

अनिल निगम आज संपूर्ण भारत कोरोना वायरस के चलते भयावह संकट से जूझ रहा है। हजारों परिवार इससे बरबाद हो चुके हैं और लाखों लोगों के सिर पर अब भी खतरा मंडरा रहा है। लगातार लोग कोरोना से जंग हार कर मौत की आगोश में जा रहे हैं,लेकिन आज भी अनेक नेता अपनी सियासी रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। वास्‍तविकता तो यह है कि इस भयावह संकट के दौर में नेताओं से यह आशा की जाती है कि वे परस्‍पर मतभेद भुलाकर मानवसेवा पर अपना ध्‍यान केंद्रित करें। अफसोस कि नेता अपनी जुबानी जंग से देश की जनता को भ्रमित करने के काम में जुटे हुए हैं। नेताओं के इन बयानों का जनता और देश की दशा और दिशा पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? इसका विश्‍लेषण करने के पहले इस बात को समझना जरूरी है कि कौन से ऐसे बयान हैं, जिन्‍होंने प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में नदियों में बहाए गए शवों के बारे में राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि गंगा मां की रेत से दिखता हर शव का कपड़ा कहता है कि उस रेत में सिर दफनाए मोदी सिस्‍टम रहता है। उनकी इस टिपपणी से ऐसा लगता है कि इस सबके लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही जिम्‍मेदार हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में बयान दिया कि कोरोना वायरस का जो सिंगापुर में नया वैरिएंट मिला है, वह बच्‍चों के लिए अत्‍यंत खतरनाक है। यह वैरिएंट भारत में तीसरी लहर के रूप में आ सकता है। इसलिए भारत को सिंगापुर की हवाई यात्राएं अविलंब बंद कर देनी चाहिए। केजरीवाल के इस बयान को सिंगापुर ने बेहद गंभीरता से लिया और भारत के उच्‍चायुक्‍त को बुलाकर इस पर पर कड़ा प्रतिरोध भी दर्ज कराया। इसके पहले देश भर में ऑक्‍सीजन की कमी पर भी खूब बयानबाजी हुई। कांग्रेस नेता व सांसद राहुल गांधी ने कई ट्वीट कर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के लिए निशाना साधते हुए कहा, इस भयावह दौर में चुप्पी साधने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को धन्यवाद। राहुल गांधी के इसी बयान पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पलटवार किया। उन्‍होंने अपने ट्वीट में कहा कि देश में ऑक्सीजन की न कमी है ना होगी, परेशान सिर्फ गिद्ध वाली दूषित राजनीति करने वालों से है। इसी तरह से बिहार में पूर्व मुख्‍यमंत्री लालू यादव और मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने भी एक दूसरे पर जमकर कीचड़ उछाला। दिलचस्‍प यह है कोरोना वैक्‍सीन की कमी का रोना रोने वाले अनेक नेताओं ने वैक्‍सीन की उपयोगिता और विश्‍वसनीयता पर सवाल उठाए थे। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वैक्सीन को बीजेपी की वैक्सीन तक कह दिया था। उन्‍होंने कहा कि 'मैं तो नहीं लगवाऊंगा भाजपा की वैक्सीन।' पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी सहित अनेक नेताओं ने इस पर कई सवाल दागे थे। इस संबंध में भारत बॉयोटेक के डॉ. कृष्णा एल्ला को कहना पड़ा था कि हमने अपना काम ईमानदारी से किया है लेकिन कोई हमारी वैक्सीन को पानी कहे तो बिल्कुल मंजूर नहीं होगा। हम भी वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने अपना काम किया है। कुछ लोगों के जरिए वैक्सीन का राजनीतिकरण किया जा रहा है।   यह बात सोलह आने खरी है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का सशक्‍त होना जरूरी है। अगर विपक्ष सशक्‍त होता है तो देश के शासन और प्रशासन द्वारा की जाने वाली गलतियों पर अंकुश रहता है। लेकिन विपक्ष को चाहिए कि वह धरातल पर काम करे, शोध, अनुसंधान के पश्‍चात सत्‍य पर आधारित तथ्‍यों के आधार पर ही बात करे। आज राजनीति में अब एक दौर चल गया है कि चाहे जो भी हो, विपक्ष को हर मुद्दे का विरोध करना है।  यही कारण है कि  सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक या फिर कोरोना की वैक्सीन, विपक्ष ने सभी पर सवाल उठाए। केंद्र सरकार का विरोध करने में विपक्षी नेता भूल गए कि वे कोरोना वैक्सीन और सर्जिकल स्‍ट्राइक का विरोध करके सरकार का नहीं, बल्कि देश के वैज्ञानिकों और सैनिकों का अपमान कर रहे हैं। बिना शोध अथवा अनुसंधान के केजरीवाल का सिंगापुर के नए वैरिएंट का बखेड़ा खड़ा करना, नदी में प्रशासन द्वारा शवों को बहाने अथवा ऑक्‍सीजन के बारे में अनर्गल बयानबाजी से देश के लोगों में भय और अविश्‍वास का माहौल पैदा हो रहा है। आज देश जिस तरह से संकट के दौर से गुजर रहा है, उसके लिए राजनैतिक दलों को इन मुद्दों पर सियासी रोटियां सेंकने से बाज आना चाहिए।   (लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 May 2021


bhopal,Arab-Israel, Now what next?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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Dakhal News 22 May 2021


bhopal,How ready , country , third wave , Corona

आर.के. सिन्हा   कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने कुछ ही दिनों में देश को अंदर तक हिला कर रख दिया है। इसने अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण, औरत-मर्द में कोई भेदभाव नहीं किया। इसने हरेक घर तक जाकर अपना असर दिखाया। लेकिन, अब दूसरी लहर कमजोर पड़ने लगी है। कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों की तादाद प्राय: हरेक जगह घट रही है। यह संतोष का विषय तो हो सकता है, पर अब कुछ बातों को गांठ बांध लेना भी जरूरी है। पहली बात तो यह कि कोरोना वायरस हमारे बीच में अब लम्बे समय तक रहने वाला है। यही नहीं, इसकी तीसरी लहर आने के भी संकेत मिलने लगे हैं या कहा जाए कि वह कभी भी आ सकती है।   सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि तीसरी लहर दूसरी की तुलना में अधिक मारक हो सकती है। तब रोगियों की संख्या भी दूसरी लहर की तुलना में कहीं अधिक होगी। यह वास्तव में डराने वाली स्थिति है। आईआईटी दिल्ली ने जारी अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि तीसरी लहर में अकेले दिल्ली में ही रोजाना 45 हजार नए मामले आ सकते हैं। यह सुनकर भी रुह कांप उठती है। ऐसे में रोजाना करीब 9 हजार रोगियों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ेगी। दिल्ली को इसके लिए तैयार रहना होगा। यदि यह हालात बनते हैं तो इससे निपटने के लिए दिल्ली में अस्पतालों और रीफिलिंग के लिए कुल मिलाकर प्रतिदिन 944 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी। इतनी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है। जाहिर है, अगर हम तीसरी लहर पर सारे देश की स्थिति पर बात करें तो हालात अकल्पनीय रूप से खराब हो सकते हैं। भगवान करे कि यह न हो। अब दुनिया को और आघात न सहन पड़े। पर किसी ने कहां सोचा था कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर देखते ही देखते अपने शिकंजे में सारे देश को ही ले लेगी। इसलिए युद्धस्तर पर आगे के लिए तैयारी करना लाजिमी है।   चूंकि देश में संक्रमण की दर कम हो रही है इसलिए सरकारों और मेडिकल दुनिया से जुड़े लोगों को अभी आराम करने के मोड में कतई नहीं आना चाहिए। हमें अभी भविष्य में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए समुचित व त्वरित कदम उठाते रहने चाहिए। सबको पता है कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से देशभर में हजारों जानें गईं। अब ये हालात नहीं होने चाहिए। कोरोना के रोगियों के बीच ऑक्सीजन की भारी कमी देखी गयी। उसे देखते हुए अब सब राज्यों को ऑक्सीजन उत्पादन, स्टोरेज और उसके वितरण में सुधार करने की तुरंत आवश्यकता है। सभी अस्पतालों को ऑक्सीजन निस्तारण प्रक्रिया के लिए आवश्यक सभी प्रकार के नोजल, एडेप्टर्स और कनेक्टर्स मुहैया कराने चाहिए। मैं मानता हूँ कि सभी सरकारें और स्थानीय निकाय ऐसा अबतक कर भी रही होंगी I प्रधानमंत्री जी तो सबकी मदद के लिये दिन-रात खड़े हैं हीI   किसे नहीं पता कि अप्रैल महीने में जब कोरोना की दूसरी लहर का पीक था तब सैकड़ों धनी-संपन्न लोगों तक को अस्पतालो में बेड नसीब नहीं हुआ। मुझे पता चला है कि राजधानी दिल्ली के एक मशहूर सेंट लॉरेस स्कूल के संस्थापक और कारोबारी श्री गिरिश मित्तल को लाख चाहने के बाद भी बेड नहीं मिला। अंत में उन्हें फरीदाबाद के एक अस्पताल मे भर्ती करवाया गया। वहां उनकी मृत्यु हो गई। इसी प्रकार प्रख्यात गीतकार डॉ. कुँवर बेचैन और प्रसिद्ध कवि पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र राजहंस को भी नोएडा के प्राइवेट अस्पताल में बचाया न जा सका I जब हर लिहाज से सक्षम लोगों का यह हाल हुआ है तो समझ लें कि बाकी के साथ क्या हुआ होगा। इसीलिये देश के हर छोटे-बड़े शहरों के अस्पतालों में ऑक्सीजन वाले बेडों की संख्या भी बढ़ानी होगी।   इसके साथ ही अब देश को यह भी देखना होगा कि कोरोना के कारण किसी बच्चे के सिर से उसके माता-पिता का साया न उठे। कोरोना की दूसरी लहर के कारण न जाने कितने मासूम बच्चे अनाथ हो गए। इन बच्चों के लिये मुफ्त पढ़ाई और आर्थिक मदद जैसी अनेक घोषणायें राज्य और केंद्र सरकारों ने की हैं। पर अभी इन बच्चों के सामने कुछ और दिक्कतें आ सकती हैं। याद रखें कि कोरोना से मृत्यु का प्रमाणपत्र मिलना अत्यंत कठिन है। सैकड़ों लोग अस्पतालों के दरवाज़ों पर मर गये और बहुत से लोग तो घर पर ही मर गये। बीच में ऐसे भी दिन आये कि टेस्ट होने का नम्बर ही नहीं आया और लोग मर गये। अब ये अनाथ बच्चे कहाँ जायेंगे प्रमाणपत्र बनवाने के लिएI सरकारी दफ्तरों की कठिन प्रक्रिया से कैसे गुजरेंगे? जिनके खाते बैंकों में हैं वह मर गये और उनके नॉमिनी भी मर गये, अब बच्चे रह गये हैं उनका पैसा बैंकों से कैसे निकलेगा? इन सवालों के हल सरकारों को तुरंत तलाश करने होंगे। वर्ना घोषणाएं जमीन पर लागू करना कठिन होगा। बच्चों की मदद में सरकार और संस्थायें खुद आगे नहीं बढ़ेंगी तो ये तमाम घोषणाएं ज़बानी जमा खर्च बनकर रह जायेंगी।   यह सच है कि बहुत से लोग केदारनाथ जैसी आपदाओं में मारे जाते हैं और उनका बैंक एकाउंट लावारिस हो जाता है। बच्चे दर-दर भटकते रहते हैं और पैसा बैंकों में पड़ा रहता है। ये अनाथ हुए बच्चे न मदद माँग पायेंगे न कागजी कार्यवाही पूरी कर पायेंगे। सरकार और समाज को खुद इनकी मदद को आगे आना होगा और नियमों में कुछ शिथिलता देनी होगी।    कोरोना से आगे भी बचे रहने के बाकी उपाय वही हैं। जैसे कि मास्क पहनना, सामाजिक दूरी बनाये रखना और हाथों को बार-बार साबुन से अच्छी तरह से धोना। ये सभी नागरिकों से कम से कम अपेक्षित है ही। हालांकि दूसरी लहर के बाद देखने में आ रहा है कि अब पहले वाली लापरवाही तो ज्यादा लोग नहीं कर रहे हैं। वे कम से कम मास्क तो पहन ही रहे हैं। अब उन्हें कोरोना की भयावहता का अंदाजा भी लग चुका है। जो लापरवाही करेगा, वही फंसेगा। वह अपने साथ अपनों को भी मरवाने का रास्ता साफ करेगा। इसलिए मास्क तो बड़े पैमाने पर पहने जाने लगे हैं। और कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन लेना भी अनिवार्य है, यह लोग समझने लग गये हैंI   देखिए, दुनिया के अनेक देशों ने अपनों को कोरोना से लड़ने के लिए तैयार कर लिया है। वहां तेजी से सब वैक्सीन लगवा रहे हैं। यही हमें भी करना होगा। हमें भी फिलहाल भीड़-भाड़ और बड़े आयोजनों से बचना होगा। अब पहले वाली दुनिया तो नहीं रहने वाली। यह बात लोगों को जितनी जल्दी समझ आ जाए उतना ही अच्छा रहेगा। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 31 May 2021


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रमेश सर्राफ   भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का प्रकोप जारी है। कोरोना महामारी के साथ ही इसके साइड इफेक्ट भी होने लगे हैं। कोरोना से ठीक हो रहे कई लोगों को ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस, येला फंगस जैसी कई अन्य संक्रामक बीमारी जकड़ने लगी है। इन बीमारियों की चपेट में आने से लोग विकलांग होने लगे हैं। कई लोगों ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी है। तो कई लोगों को अन्य तरह की शारीरिक अपंगता झेलनी पड़ रही है।   मई माह के प्रथम सप्ताह में तो कोरोना पॉजिटिव आने वाले लोगों की संख्या प्रतिदिन चार लाख से भी अधिक पहुंच गई थी। पिछले कुछ दिनों में घटकर दो लाख या उससे कम रह रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस समय कोरोना संक्रमित होने वालों से अधिक संख्या कोरोना से रिकवर होने वालों की है। जो सरकार व चिकित्सकों के लिए राहत भरी खबर है। हालांकि राज्य सरकारों द्वारा अपने प्रदेशों में लॉकडाउन लगाया गया है। जिसके बाद ही कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी आई है। देश के प्राय सभी राज्यों में लॉकडाउन चल रहा है। कोरोना मरीजों की संख्या कम आने का कारण लॉकडाउन है या जांच में कमी है यह कहना तो मुश्किल है। मगर लोगों के घरों से बहुत कम निकलने के कारण कोरोना का सामुदायिक प्रसार जरूर कम हुआ है।   देश में कोरोना संक्रमित मिलने के आंकड़ों में जहां कमी आई है। वही कोरोना से मरने वालों की संख्या अभीतक कम नहीं हो पायी है। कोरोना से हर दिन बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है जो सभी के लिए बड़ी चिंता का कारण है। देश में कोरोना से होने वाली मौतों पर जब तक प्रभावी ढंग से नियंत्रण नहीं हो पाता। तब तक यह कहना मुश्किल होगा कि कोरोना संक्रमण का प्रसार कम हो गया है। गत वर्ष कोरोना की पहली लहर में इस बार की तुलना में मरने वालों की संख्या बहुत कम थी। इस बार कोरोना से बड़ी तादाद में लोगों के मरने से आमजन में भय व्याप्त हो रहा है।   आजादी के 74 साल बाद भी देश में ऑक्सीजन गैस के अभाव में लोगों का मरना दुःस्वप्न से कम नहीं है। बड़े शहरों, महानगरों में जितने भी अस्पताल थे वह सब कोरोना  की दूसरी लहर में पस्त हो गए। लोगों को पता चल गया कि देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में भी लोगों की जान बचाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है। जब बड़े शहरों में ही बुरी  स्थिति है तो गांव के तो हाल और भी खराब है। गांव के प्राथमिक, सामुदायिक चिकित्सा केंद्रों पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहता है। वहां जब भी कोई गंभीर मरीज आता है तो उसे बड़े अस्पताल में रेफर कर पीछा छुड़ा लेते हैं। प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों को ढंग से प्राथमिक उपचार भी नहीं मिल पाता है।   देश में चिकित्सा कर्मियों की बड़ी कमी है। जिन्हें पूरा करने के लिए सरकार हर बार दावा तो करती है मगर उसे पूरा नहीं करती है। अस्पतालों में वर्षों से बहुत से पद रिक्त पड़े रहते हैं। सरकारी तंत्र उन पर नियुक्ति करने की तरफ कोई ध्यान नहीं देता हैं। राजनेताओं का ध्यान तो बस विकास के नाम पर सड़क, पुल, रेल, बस, भवन, नहर, बांध निर्माण की तरफ ही रहता है। यदि सरकारें पिछले 74 सालों में चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार की तरफ थोड़ा भी ध्यान देती तो आज हमें इस तरह की बदतर स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। सरकारों को आगे पूरा ध्यान चिकित्सा तंत्र को मजबूत करने पर लगाना चाहिये। बड़े शहरों, महानगरों से लेकर छोटे गांव ढाणी के उप स्वास्थ्य केंद्र तक को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस कर दे। ताकि लोगों को चिकित्सा के अभाव में जान नहीं गंवानी पड़े।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 28 May 2021


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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन के छह माह पूरे होने पर काला दिवस मनाया गया। ऐसा लगता है कि आंदोलन के नेताओं का काला शब्द से लगाव है। इन्होंने तीनों कृषि कानूनों को भी काला ही बताया था। ग्यारह दौर की वार्ताओं में सरकार पूंछती रही कि इन कानूनों में काला क्या है लेकिन आंदोलन के किसी भी प्रतिनिधि ने इसका जवाब नहीं दिया था। उनका यही कहना था कि यह काला कानून है। इसको वापस लिया जाए। इसके आगे फिर वही तर्कविहीन व निराधार आशंकाएं। कहा गया कि किसानों की जमीन छीन ली जाएगी, कृषि मंडी बन्द हो जाएंगी। कानून लागू होने के छह महीने हो गए। आंदोलनकारियों की सभी आशंकाएं निर्मूल साबित हुई है। ऐसे में आंदोलन पूरी तरह निरर्थक साबित हुआ है लेकिन आंदोलन के कतिपय नेताओं ने इसे अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा पूरी करने का माध्यम बना लिया है। इसलिए अब आंदोलन को किसी प्रकार खींचने की कवायद चल रही है।   हकीकत यह है कि इन छह महीनों में इस आंदोलन की चमक पूरी तरह समाप्त हो चुकी।आंदोलन का सर्वाधिक असर पंजाब में था। लेकिन कानून लागू होने के बाद कृषि मंडी से सर्वाधिक खरीद हुई। यहां नौ लाख किसानों से एक सौ तीस लाख टन से अधिक की गेहूं की खरीद की गई। कृषि कानूनों के कारण पहली बार खरीद से बिचौलिए बाहर हो गए। यही लोग आंदोलन में सबसे आगे बताए जा रहे थे। नरेंद्र मोदी सरकार की नीति के अनुरूप तेईस हजार करोड़ रूपये का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया गया।   नए कानून के अनुसार सरकार ने किसानों को अनाज खरीद नामक पोर्टल पर रजिस्‍टर किया गया। पंजाब देश का पहला राज्‍य बन गया है जहां किसानों के जमीन संबंधी विवरण जे फार्म में भरकर सरकार के डिजिटल लॉकर में रखा गया है। इससे किसी प्रकार के गड़बड़ी की आशंका दूर हो गई। कृषि कानून लागू होने से पहले सरकारी एजेंसियां आढ़तियों बिचैलियों के माध्यम से खरीद करती थी। केवल पंजाब में करीब तीस हजार एजेंट थे। खरीद एजेंसी इनकी कमीशन देती थी। ये किसानों से भी कमीशन लेते थे। अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि कानूनों से किसको नुकसान हो रहा था। किसानों को तो अधिकार व विकल्प दिए गए थे। केंद्र सरकार ने पहले ही कह दिया था कि किसानों को सीधे भुगतान की अनुमति नहीं दी गई तो सरकार पंजाब से गेहूं खरीद नहीं करेगी। इसके बाद ही पंजाब सरकार किसानों के बैंक खातों में सीधे अदायगी पर तैयार हुई।   आंदोलन की गरिमा तो गणतंत्र दिवस के दिन ही चली गई थी। फिर भी कुछ नेताओं की जिद पर आंदोलन चलता रहा। अब तो इसके आंतरिक विरोध भी खुलकर सामने आ गए हैं। कोई सरकार से पुनः बात करना चाहता है, कोई इसका विरोध कर रहा है। सच्चाई यह कि इसके नेताओं को आंदोलन में बैठे लोगों, उनके परिजनों व उनके गांवों की कोई चिंता नहीं है। अन्यथा कोरोना की इस आपदा में आन्दोलन को स्थगित तो किया जा सकता था। नए कृषि कानूनों में किसान हितों के खिलाफ कुछ भी नहीं है। पुरानी व्यवस्था कायम रखी गयी है, इसके साथ ही नए विकल्प देकर उनके अधिकारों में बढ़ोत्तरी की गई। ऐसे में किसानों की नाराजगी का कारण नजर नहीं आता। फिर भी किसानों के नाम पर आंदोलन चल रहा है। यह सामान्य किसान आंदोलन नहीं है। इस लंबे और सुविधाजनक आंदोलन के पीछे मात्र किसान हो भी नहीं सकते।   जाहिर है कि आंदोलन केवल किसानों का नहीं है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जो अबतक किसानों की मेहनत का लाभ उठाते रहे हैं। कृषि कानून से इनको परेशानी हो सकती है। नरेंद्र मोदी ने कहा भी था कि बिचौलियों के गिरोह बन गए थे। वह खेतों में मेहनत के बिना लाभ उठाते थे। कृषि कानून से किसानों को अधिकार दिया गया है। पिछली सरकार के मुकाबले नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों की भलाई हेतु बहुत अधिक काम किया है। किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन का क्षेत्र अत्यंत सीमित है। राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक किसानों की इसमें सहभागिता नहीं है। क्षेत्र विशेष की समस्या का समाधान हेतु केंद्र सरकार लगातार प्रयास भी कर रही है। उसने अपनी तरफ से आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों को वार्ता हेतु आमंत्रित किया था। कई दौर की वार्ता हुई। सरकार जानती है कि कृषि कानून का विरोध कल्पना और आशंका पर आधारित है। इसको भी दूर करने के लिए सरकार ने लिखित प्रस्ताव दिए है। लेकिन आंदोलनकारियों ने अनुकूल रुख का परिचय नहीं दिया। वह हठधर्मिता का परिचय दे रहे थे। यह कहा गया कि सरकार कुछ प्रस्ताव जोड़ने की बात कर रही है। इसका मतलब की कानून गलत है। इसको समाप्त किया जाए। जबकि ऐसा है नहीं।   इसमें कोई सन्देश नहीं कि पिछले अनेक दशकों से कृषि आय कम हो रही थी। छोटे किसानों का कृषि से मोहभंग हो रहा था। गांव से शहरों की तरफ पलायन पिछली सभी सरकारें देखती रही। आज उन्हीं दलों के नेता किसानों से हमदर्दी दिखा रहे है। मोदी सरकार ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया। नए कानूनों के माध्यम से खेती के क्षेत्र में निजी निवेश गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। जिससे किसान अगर अपनी उपज वहीं रोकना चाहता है तो उसके लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्टर का प्रावधान किया गया। किसान को मनचाही कीमत पर अपना उत्पादन बेचने को स्वतंत्र किया गया। किसान को आजतक ये अधिकार क्यों नहीं मिला। वह अपना उत्पादन कहां बेचे और किस दाम पर बेचे इसकी स्वतन्त्रता नहीं थी। कानून के माध्यम से किसानों को स्वतंत्रता देने का प्रयास किया है।   कृषि मंत्री ने नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कांट्रेक्ट फार्मिंग से किसान को लाभ होगा। उनकी आय बढ़ेगी। छोटे किसान को यदि बुआई के पहले ही निश्चित कमाई की गारंटी मिल जाए तो ऐसे में उसकी रिस्क लेने की क्षमता बढ़ेगी वो महंगी फसलों की ओर जाने का फैसला ले सकता है।किसान आधुनिक तकनीक का उपयोग कर सकता है। कानून में कृषि उत्पाद हेतु बाजार की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। इससे महंगी फसलों का अधिक दाम मिलना संभव होगा। राज्य सरकार खुद रजिस्ट्रेशन कर सकेगी।   आंदोलन के नेताओं ने कहा कि विवाद का समय एसडीएम नहीं कोर्ट करे। सरकार ने इस पर सकारात्मक रुख दिखाया। उसने अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। सरकार ने छोटे किसानों के हित को ध्यान में रखकर निर्णय किया था। कोर्ट में की प्रकिया लंबी होती है। जबकि एसडीएम किसान के सबसे करीब का अधिकारी है। सरकार ने यह भी तय किया कि एसडीएम को तीस दिन में विवाद का निराकरण करना होगा। वह किसान की भूमि के विरुद्ध किसी भी प्रकार की वसूली का निर्णय नहीं दे सकेगा। नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि साठ वर्ष के ऊपर के किसान को हर महीने तीन हजार पेंशन मिलेगी। कई लाख किसान इसमें रजिस्टर्ड हो चुके हैं। इसकी ओर अभी तक किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया था। सरकार पहले से ही बारह करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि प्रदान कर रही है। खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से लोगों को रोजगार भी मिलेगा। किसान सम्मान निधि के माध्यम से पचहत्तर हजार करोड़ रुपए हर साल किसान के खाते में पहुंचाने का काम किया गया। आंदोलन में कितने किसान हैं, इसको लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 28 May 2021


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मोहन सिंह   कोरोना काल में लगातार दूसरे साल किसानों की दुश्वारियां बढ़ रही हैं। अभी गांव पूरी तरह कोरोना की चपेट में नहीं आये हैं। पर आवाजाही पर लगी रोक, सरकारी खरीद में तमाम तरह की पाबंदियां, कृषि पैदावारों की घटती मांग ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आज फसल के खलिहान से घर आने के बाद किसानों मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।   पहली मुसीबत तो यह कि कोरोना काल में किसानों की पैदावार पर लगी रोक की वजह से किसानों को वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। सरकारी खरीद के काम में इस साल इतनी पाबंदियां हैं कि किसानों को औपचारिकताएं पूरा करने में ही दम निकल जाये। सरकारी मुलाजिम बताते हैं कि ये सारी बंदिशें इस साल भारतीय खाद निगम की ओर से लगायी गयी हैं। यह उस उत्तर प्रदेश की हालत है, जो व्यपारिक सुगमता के लिहाज से देश में दूसरे नम्बर पर है। भारत सरकार की मुख्य खरीद एजेंसी ऐसी तमाम अड़चनें शायद इसलिए पैदा कर रही हैं कि उसे किसानों के कम से कम पैदावार खरीदने पड़े। क्योंकि उसके अपने गोदाम अनाज से भरे हैं। सरकार के पास अनाज का इतना ज्यादा बफर स्टॉक है कि अगर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये दो साल तक मुफ्त में अनाज लोगों में बांटे जाएं तब भी पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था है।   सरकार की ओर से यह सवाल बार-बार सामने आ रहा है और खेती को निजी हाथों सौंपने के पैरोकार भी यह दावा करते ही हैं कि सरकार का मुख्य काम किसान की पैदावार की खरीद, उसके सुरक्षित रखरखाव और बिक्री अथवा निर्यात की व्यवस्था करना है या कुछ और? इस कुछ और के सवाल ने ही सरकार की सोच और पिछले छह महीने से चल रहे किसान आंदोलन के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। मसलन यह कि जैसा किसान आंदोलन के नेता दावा कर रहे हैं कि वे अनाज को तिजोरी में कैद नहीं होने देंगे। भारत सरकार अपनी ओर से किसानों नेताओं को आश्वस्त करने में अबतक विफल रही है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की पैदावार की खरीद की गारंटी देने को तैयार है। सरकार हर साल तेइस तरह के अनाजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। इस समर्थन मूल्य पर भी पूरे देश में महज सात से आठ फीसद किसानों के पैदावार की खरीद होती हैं। बाकी खरीद स्थानीय साहूकारों, बनियों के जरिये ही होती है।   मतलब यह कि आजतक पूरे देश में किसानों की पैदावार खरीदने की कोई मुकम्मल व्यवस्था पंजाब और हरियाणा को छोड़कर अन्य प्रदेशों में नहीं हो पायी है। इस वजह से सरकार विपणन और खरीद का काम निजी हाथों में सौंपने का मन बना चुकी है। सरकारी एजेंसियों को किसानों के अधिकतम पैदावार नहीं खरीदने पड़े, इस वजह से तमाम पाबंदियां लगायी जा रही हैं। उसके लिए जमीन तैयार करने का उपक्रम इस साल कोरोना काल में प्रकट रूप से शुरू हो चुका है। एक ऐसे समय में जब कोरोना महामारी में लाखों जिंदगियां असमय काल कवलित हो गयी। हर किसी ने अपने किसी खास को खोया है। ऐसे वक्त ही गरीब, किसान बेसहारों को सरकार की मदद की दरकार होती है। सरकारों को गरीब परस्त और किसान परस्त होने का सबूत भी ऐसे ही वक्त देना होता है।   निजी पूँजी ऐसे वक्त गरीबों के कल्याण के बजाय अपने मुनाफे पर ही ज्यादा ध्यान देती हैं। इसका असली चरित्र कोरोना काल में परत दर परत उजागर हो रहा है। खासकर जीवनरक्षक दवाओं के जमाखोरी के मामलों में। उन औघोगिक घरानों से यह उम्मीद करना बेमानी होगी कि वे किसानों के मेहनत की पैदावार के वाजिब दाम देंगे। फिर किसान जाएं तो कहां?  जिस देश में सत्तर फीसद आबादी खेती और खेती से जुड़े काम लगी है। जिस देश में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अनुमानतः लगभग पच्चीस लाख करोड़ रुपये की है। पिछले साल जब देश के कुल घरेलू उत्पाद में लगभग बाईस फीसद की गिरावट दर्ज की गयी। उस वक्त भी कृषि सेक्टर ही ऐसा रहा, जहां कोरोना की मार का दंश नहीं झेलना पड़ा और 2.4% की वृद्धि दर्ज हुई।   ऐसे समय में जब कोरोना की दूसरी लहर ज्यादा खौफनाक रूप में सामने रही है, जरूरत है सरकार को आगे बढ़कर किसानों के हाथ थामने की। विडंबना देखिए कि इस विकट स्थिति में निजी कंपनियां तो किसानों की पैदावार वाजिब दाम पर खरीदने में आनाकानी कर ही रही हैं, सरकार भी तमाम तरह की बंदिशें लगाकर सरकारी खरीद से हाथ खींच रही है। सबसे बुरा हाल उन लगभग 88% सीमांत और बटाईदार किसानों का है, जिनके ज्यादा पैदावार ही जी का जंजाल बन गयी है। कारण यह कि अपनी पैदावार की बिक्री के लिए ऐसे किसानों को खतौनी समेत तमाम दूसरी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ रही हैं जो उनके बूते के बाहर हैं। वे उन खेत मालिकों के दरवाजे रोज दस्तक दे रहे, ताकि किसी तरह उनकी पैदावार की सरकारी बिक्री हो जाएं। ताकि वक्त पर वे अपनी मालगुजारी और दूसरे देनदारियों से मुक्त हो सकें।   पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने सीमित स्तर ही सही, पर बटाईदार किसानों के लिए थोड़ी सहूलियत दी थी। पर इस साल इसकी कोई गुंजाइश नहीं दिख रहीं है। उड़ीसा सरकार ने अपने बटाईदार किसानों को वे सारी सुविधाएं उपलब्ध करायी हैं, जो मूल किसानों को हासिल हैं। मसलन प्राकृतिक आपदा के वक्त सरकार से मिलने वाली रियायतें ज्यादातर राज्यों में मूल किसानों को ही मिलती हैं। बटाईदारों को नहीं, जबकि वास्तविक नुकसान खेती करने वाले इन किसानों का ही होता है। पर उड़ीसा सरकार वे सारी सुविधाएं बटाईदार किसानों को भी मुहैया करवायी हैं। एक किसान हितैषी होने का दावा करने वाली किसी भी सरकार को इन किसानों के हक में जरूर कानून बनाना चाहिए।    अब किसानों की लागत का जायजा लें, जो एक किसान को जमीन की मालगुजारी, जोताई बुवाई, सिंचाई, खाद, किसान और उसके परिवार की मेहनत के रूप में निवेश करना पड़ता है। यह सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण का असली आधार होना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं। मसलन खेत की जुताई से लेकर सिंचाई, आनाज की ढुलाई के काम में जिस डीजल का उपयोग होता है, उसमें पिछले साल के मुकाबले इस साल 21 रुपये से 22 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि इसकी तुलना में न्यूनतम समर्थन मूल्य में कितनी वृद्धि हुई? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं। अभी गनीमत है कि खरीफ की बुआई के पहले सरकर ने डीएपी पर 137%सब्सिडी का ऐलान किया है। शायद किसानों के बढ़ते प्रतिरोध को शांत करने की मंशा से। सरकारी खजाने पर इससे 14,775 करोड़ का बोझ पड़ेगा। बता दें कि अपने देश में हर साल 350.42 लाख टन यूरिया और 119.13 लाख टन डीएपी खाद की खपत होती है। सरकार के इस ऐलान से खरीफ की बुआई से पहले किसानों को कुछ राहत की उम्मीद जगी है।   इस बीच धरनारत किसानों ने भी प्रधानमंत्री से नये सिरे से बातचीत की पेशकश की है। एक ऐसे समय में जब देश के लगभग 90 फीसद हिस्से में लॉकडाउन है। सेंटर फॉर मॉनिटएरिंग इंडियन इकोनामी के अनुमान के मुताबिक ग्रामीण इलाके में बेरोजगारी बढ़कर 14.34% और शहरी इलाके में 14.7% हो गई। पिछले साल लॉकडाउन के दौरान 12.2 करोड़ लोगों की नौकरियां खत्म हुई। अब कोरोना की तीसरी लहर की सूचना ने निवेश की सम्भावना को भी खत्म कर दिया है। भारत जैसे देश में जहां खेती-किसानी और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के जल्दी बेहतर और टिकाऊ रोजगार के अवसर परम्परागत रूप से कृषि और ग्रामीण आधारित उद्योगों में उपलब्ध होते रहे हैं। सरकारों को खेती-किसानी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नये सिरे से नयी तकनीक में निवेश की ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि कोरोना काल के बाद पटरी से उतर गयी जीवन की राह सुगम हो और लोगों की ज़िंदगी में उम्मीद की नयी की कपोलें फूटें।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 28 May 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   किसान आंदोलन को चलते-चलते आज छह महीने पूरे हो गए हैं। ऐसा लगता था कि शाहीन बाग आंदोलन की तरह यह भी कोरोना के रेले में बह जाएगा लेकिन पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान अबतक अपनी टेक पर टिके हुए हैं। उन्होंने आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर विरोध-दिवस आयोजित किया। जो खबरें आई, उनसे ऐसा लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ ढाई प्रांतों में सिकुड़कर रह गया है। पंजाब, हरियाणा और आधा उत्तर प्रदेश। इन प्रदेशों के भी सारे किसानों में यह फैल पाया है नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता। यह आंदोलन तो चौधरी चरण सिंह के प्रदर्शन के मुकाबले भी फीका ही रहा है। उनके आह्वान पर दिल्ली में लाखों किसान इंडिया गेट पर जमा हो गए थे।   दूसरे शब्दों में शक पैदा होता है कि यह आंदोलन सिर्फ खाते-पीते या मालदार किसानों तक ही तो सीमित नहीं है? यह आंदोलन जिन तीन नए कृषि-कानूनों का विरोध कर रहा है, यदि देश के सारे किसान उसके साथ होते तो अभीतक सरकार घुटने टेक चुकी होती लेकिन सरकार ने काफी संयम से काम लिया है। उसने किसान-नेताओं से कई बार खुलकर बात की है। अब भी उसने बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए हैं।   किसान नेताओं को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्होंने जिस तरह से भी छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन किए हैं, उनमें कोरोना की सख्तियों का पूरा उल्लंघन हुआ है। सैकड़ों लोगों ने न तो शारीरिक दूरी रखी और न ही मुखपट्टी लगाई। पिछले कई हफ्तों से वे गांवों और कस्बों के रास्तों पर भी कब्जा किए हुए हैं। इसीलिए आम जनता की सहानुभूति भी उनके साथ घटती जा रही है।   हमारे विरोधी नेताओं को भी इस किसान विरोध-दिवस ने बेनकाब कर दिया है। वे कुंभ-मेले और प.बंगाल के चुनावों के लिए भाजपा को कोस रहे थे, अब वही काम वे भी कर रहे हैं। उन्हें तो किसान नेताओं को पटाना है, उसकी कीमत चाहे जो भी हो। कई प्रदर्शनकारी किसान पहले भयंकर ठंड में अपने प्राण गंवा चुके हैं और अब गर्मी में कई लोग बेमौत मरेंगे। किसानों को उकसाने वाले हमारे नेताओं को किसानों की जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। सरकार का पूरा ध्यान कोरोना-युद्ध में लगा हुआ है लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह किसान-नेताओं की बात भी ध्यान से सुने और जल्दी सुने। देश के किसानों ने इस वर्ष अपूर्व उपज पैदा की है, जबकि शेष सारे उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हुए हैं। सरकार और किसान नेताओं के बीच संवाद फिर से शुरू करने का यह सही वक्त अभी ही है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal, Choksi

डॉ. प्रभात ओझा मेहुल चोकसी के डोमिनिका में पकड़े जाने के बाद उसके साथ नीरव मोदी का जिक्र भी स्वाभाविक है। मेहुल चोकसी और उसके भांजे नीरव मोदी पर पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी के आरोप हैं। मामा-भांजे ने मिलकर बैंक के अधिकारियों से साठगांठ कर कथित तौर पर 13 हजार 500 करोड़ रुपये का घपला किया है। भारत में दोनों के खिलाफ सीबीआई और इडी की जांच जारी है। इस बीच मेहुल चोकसी ने एंटीगा में शरण ले ली, तो नीरव मोदी फिलहाल लंदन की जेल में है। भारत इन दोनों के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहा है। मेहुल की गिरफ्तारी के साथ संकेत मिल रहे हैं कि इस कोशिश में पहली सफलता जल्द मिल सकती है। खबर आ रही है कि भारत सरकार ने पिछले दिनों कुछ कूटनीतिक रास्ते तय किए हैं, जिनके चलते यह मुमकिन हो सकेगा। सफलता किस तरह से नजदीक है, इसे समझने के लिए एंटीगुआ एंव बारमुडा के प्रधानमंत्री का ताजा बयान देखना होगा। उन्होंने कहा है कि डोमिनिका में पकड़े गये मेहुल को भारत भेज दिया जायेगा। तथ्य यह है कि भारत भेजे जाने के डर से ही मेहुल चोकसी एंटीगा से क्यूबा भागने की कोशिश में डोमिनिका में पकड़ लिया गया है। जानकारी मिली है कि एंटीगा के प्रधानमंत्री कार्यालय ने डोमिनिक सरकार से चोकसी को गिरफ्तार करने के लिए कहा था। एंटीगा ने इसके लिए येलो कॉर्नर नोटिस जारी किया था। उसी के तहत यह गिरफ्तारी सम्भव हुई। अब एंटीगा सरकार का यह रुख भारत के अनुकूल होगा कि डोमिनिक सरकार मेहुल को एंटीगा की जगह सीधे भारत को सौंप दे। इस प्रक्रिया में कोई दिक्कत शायद इसलिए नहीं आयेगी, क्योंकि मेहुल एंटीगा का नागरिक बन गया था। अब वही एंटीगा उसके डोमिनिका में गिरफ्तारी के बाद भारत को सौंपने को कह रहा है। मेहुल चोकसी ने 2018 के शुरू में भारत से भागने के पहले 2017 में ही कैरेबियाई देश एंटीगा एंड बारबुडा की नागरिकता ली थी। इस देश में निवेश कर नागरिक बनना सम्भव है। मार्च में खबर आयी थी निवेश के तहत ली गयी मेहुल की यह नागरिकता रद्द कर दी गयी है, पर जल्द ही उसका खंडन कर दिया गया था। हालांकि इसी के साथ एंटीगा एंड बारबुडा के प्रधानमंत्री ने मेहुल को चेतावनी दी थी कि भागने की कोशिश पर उसकी नागरिकता जा सकती है। बहरहाल, अब जबकि मेहुल ने इस चेतावनी को अनसुना कर दिया है, प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन के सामने अपनी चेतावनी को अमल में लाने के साथ भारत के सामने अपनी साख को भी मजबूत करने का अवसर आ गया। गैस्टन ब्राउन ने कूटनीतिक तरीके से याद दिलाया है कि मेहुल ने डोमिनिका की नागरिकता नहीं ली है। ऐसे में डोमिनिका मेहुल का प्रत्यर्पण आसानी से कर सकता है। ब्राउन ने दृढ़ संकल्प जताया है, "हमारा देश मेहुल चोकसी को स्वीकार नहीं करेगा। उसने इस द्वीप से जाकर शर्तों का उल्लंघन करते हुए बड़ी गलती कर दी है।” एंटीगा एंड बारबुडा के प्रधानमंत्री के ताजा बयान में उन्हें यह कहते हुए भी बताया गया कि डोमिनिका की सरकार और अधिकारी एंटीगा के साथ सहयोग कर रहे हैं। बयान के मुताबिक, एंटीगा ने भारत को भी सूचित कर दिया है कि मेहुल चोकसी उसे सौंप दिया जाएगा। खबर तो यह भी है कि एंटीगा अपनी इस कूटनीति में भारत के बताये रास्ते के मुताबिक ही आगे बढ़ा है। अनधिकृत तौर पर मेहुल के भागने के मामले में भी कुछ अलग तरह की खबरें आ रही हैं। खबरें जो भी हों, सच यह है कि वह निवेश के तहत एंटीगा की नागरिकता को भी दरकिनार कर डोमेनिक राज्य में पाया गया है। यदि डमोनिका के साथ उसकी कोई कानूनी संधि नहीं है, तो वह शीघ्र ही भारतीय जेल में रहते हुए अपने बारे में कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगा। इसी के साथ पीएनबी की मुंबई शाखा से फर्जी गारंटी पत्र (एलओयू) के जरिए अन्य भारतीय ऋणदाताओं से भी विदेशी ऋण हासिल करने के मामले में न्याय प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। ईडी और सीबीआई की जांच के आगे बढ़ने से सम्भव है कि मामा मेहुल के बाद भांजा नीरव पर भी शिकंजा कसे। शिकंजा तो उन ढेरों लोगों और बैंक कर्मचारियों पर भी कस सकता है, जिन्होंने इस बड़े घपले में दोनों की मदद की है। (लेखक ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के न्यूज एडिटर हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal, China settled village ,Bhutan

प्रमोद भार्गव   चीन अपनी चालाकियों से बाज नहीं आ रहा है। दुनिया के देश जब अपनी आबादी को कोरोना संकट से छुटकारे के लिए जूझ रहे हैं, तब चीन अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को बढ़ावा देने में लगा है। वैश्विक संस्थाओं और महाशक्तियों की भी उसे परवाह नहीं है। उसकी कुटिल चाल का ताजा खुलासा आस्ट्रेलियाई मीडिया ने किया है कि चीन ने भूटान की भूमि में आठ किमी अंदर घुसकर ग्यालाफुग नाम का गांव बसा लिया है। यही नहीं यहां चीन ने भवन, सड़कें, पुलिस स्टेशन और थलसेना के शिविर भी बना लिए हैं। गांव में बिजली की आपूर्ति के लिए ऊर्जा संयंत्र, गोदाम और चीन की कम्युनिष्ट पार्टी का दफ्तर भी खुल गया है। गांव में 100 से ज्यादा लोग रह रहे है। पहाड़ों पर आवागमन का साथी याक भी 100 की संख्या में मौजूद है। यह भूखंड भूटान का हिस्सा निर्विवाद रूप से है ही, भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा भी इस क्षेत्र से जुड़ती है। चीन अपनी विस्तारवादी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अरुणाचल पर भी दावा ठोकता रहता है। दरअसल भूटान की जमीन कब्जाना तो बहाना भर है, उसका असली निशाना अरुणाचल प्रदेश है।   चीन और भूटान के बीच 470 किमी लंबी सीमा जुड़ी हुई है। वह भलीभांति जानता है कि छोटे-से देश तिब्बत को जिस अनैतिक दखल के चलते हथिया लिया है, उसी तरह भूटान को भी आधिपत्य में ले लेगा। दरअसल चीन को अपनी एक अरब 40 करोड़ की आबादी और विशाल सेना पर घमंड है। इसीलिए सेना ने गांव में एक बड़ा बैनर टांग दिया है। इस पर लिखा है, 'शी जिनपिंग पर विश्वास बनाए रखें।' जबकि सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच कुनमिंग शहर में 25 बैठकें हो चुकी हैं, जो बेनतीजा रहीं। बहरहाल, भूमि के इस टुकड़े पर अतिक्रमण करके चीन ने दोनों देशों के बीच हुए 1998 के समझौते को ठुकरा दिया है। 1980 में चीन ने जो नक्शा सार्वजनिक किया था, उसमें ग्यालाफुग ग्राम को भूटान की सीमा में दिखाया है। चीन ने इसके पहले इस भूखंड पर कभी अपना अधिकार जमाने का दावा नहीं किया। चीन भूटान की 12 प्रतिशत जमीन पर दावा जताता है। चीनी मामलों के विशेषज्ञ रॉबर्ट बर्नेट का कहना है कि चीन यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहा है। चीन की मंशा है कि इस हस्तक्षेप का भूटान विरोध करे और चीन इस जमीन पर अपना अधिकारिक दावा ठोक दे।   दरअसल बौद्ध धर्मावलंबी चीन, भूटान और तिब्बत में अनेक समानताएं हैं। नतीजतन भिन्नताओं का पता करना मुश्किल हो जाता है। चीन को भूटान के भारत से मधुर, व्यापारिक, सामरिक व कूटनीतिक संबंध होना भी सालता है। इसलिए चीन भूटान के बहाने भारत को भी उकसाना चाहता है। चीन ने जब भूटान के डोकलाम क्षेत्र में घुसपैठ की थी, तब भारत के प्रभावी हस्तक्षेप के चलते उसे पीछे हटना पड़ा था। यह फांस भी चीन को चुभ रही है।   चीन ने इस घुसपैठ से पहले डोकलाम क्षेत्र को भी हथियाना चाहा था। चालाकी बरतते हुए चीन ने इसे नया चीनी नाम डोगलांग दे दिया था, जिससे यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है। चीन इसपर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थाई घुसपैठ की कोशिश में है। जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। दरअसल चीन अर्से से इस कवायद में लगा है कि चुंबा घाटी जो कि भूटान और सिक्किम के ठीक मघ्य में सिलीगुड़ी की ओर 15 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ बढ़ती है, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण के बहाने हथिया ले। चीन ने इस मकसद की पूर्ति के लिए भूटान को यह लालच भी दिया था कि वह डोकलाम पठार का 269 वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र चीन को दे दे और उसके बदले में भूटान के उत्तर पश्चिम इलाके में लगभग 500 वर्ग किलोमीटर भूमि ले ले। लेकिन 2001 में जब यह प्रस्ताव चीन ने भूटान को दिया था, तभी वहां के शासक जिग्में सिग्ये वांगचूक ने भूटान की राष्ट्रीय विधानसभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि भूटान को इस तरह का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं है। छोटे-से देश की इस दृढता से चीन आहत है।   भारत और भूटान के बीच 1950 में हुई संधि के मुताबिक भारतीय सेना की एक टुकड़ी भूटान की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भूटान में हमेशा तैनात रहती है। इसी कारण जब चीन भूटान और सिक्किम सीमा के त्रिकोण पर सड़क निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाने का काम करता है, तो भूटान इसे अपनी भौगोलिक अखंडता एवं संप्रभुता में हस्तक्षेप मानकर आपत्ति जताने लगता है। लिहाजा संधि के अनुसार भारतीय सेना का दखल अनिवार्य हो जाता है।   मई 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुशल कूटनीति के चलते सिक्किम को भारत का हिस्सा बना था। सिक्किम ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी चीन के साथ सीमा निर्धारित है। यह सीमा 1898 में चीन से हुई संधि के आधार पर सुनिश्चित की गई थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन और ब्रिटिश भारत के बीच हुई संधि को 1959 में एक पत्र के जरिए स्वीकार लिया था। उस समय चीन में प्रधानमंत्री झोऊ एनलाई थे। हालांकि 1998 में चीन और भूटान सीमा-संधि के अनुसार दोनों देश यह शर्त मानने को बाध्य हैं, जिसमें 1959 की स्थिति बहाल रखनी है। बावजूद चीन इस स्थिति को सड़क के बहाने बदलने को आतुर तो है ही, युद्ध के हालात भी उत्पन्न कर रहा है। भारत इस विवादित क्षेत्र डोकाला, भूटान डोकलम और चीन डोगलांग कहता है। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां आबादी का घनत्व न्यूनतम है। पिछले एक दशक से यहांं पूरी तरह शांति कायम थी, लेकिन चीन ने सैनिकों की तैनाती व सड़क निर्माण का उपक्रम कर क्षेत्र में अशांति ला दी।   अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की जून-2016 में आई रिपोर्ट ने भारत को सचेत किया था कि चीन भारत से सटी हुई सीमाओं पर अपनी सैन्य शक्ति और सामरिक आवागमन के संसाधन बढ़ा रहा है। भारत और चीन के बीच अक्साई चिन को लेकर करीब 4000 किमी और सिक्किम को लेकर 220 किमी सीमाई विवाद है। तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश में भी सीमाई हस्तक्षेप कर चीन विवाद खड़ा करता रहता है। 2015 में उत्तरी लद्दाख की भारतीय सीमा में घुसकर चीन के सैनिकों ने अपने तंबू गाढ़कर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया था। तब दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच 5 दिनों तक चली वार्ता के बाद चीनी सेना वापस लौटी थी। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पानी का विवाद भी खड़ा करता रहता है।   दरअसल चीन विस्तारवादी तथा वर्चस्ववादी राष्ट्र की मानसिकता रखता है। इसी के चलते उसकी दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर वियतनाम, फिलीपिंस, ताइवान और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ ठनी हुई है। भारत समेत 13 देशों के साथ चीन का सीमाई विवाद चल रहा है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड और भूटान में लगातार चीन का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, जो भारत के लिए आसन्न खतरा है। इन देशों से जुड़े कई मामले अंतरराष्ट्रीय पंचायत में भी लंबित हैं। बावजूद चीन अपने अड़ियल रवैये से बाज नहीं आता है। दरअसल उसकी असली मंशा दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधन हड़पना है। इसीलिए आज उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को छोड़ ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जिसे चीन अपना पक्का दोस्त मानता हो।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 May 2021


bhopal,Narada ,communicator of Lokmangal

नारद जयंती (27 मई) पर विशेष   प्रो. संजय द्विवदी   ब्रम्हर्षि नारद लोकमंगल के लिए संचार करने वाले देवता के रूप में हमारे सभी पौराणिक ग्रंथों में एक अनिवार्य उपस्थिति हैं। वे तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए जो कुछ करते और कहते हैं, वह इतिहास में दर्ज है। इसी के साथ उनकी गंभीर प्रस्तुति ‘नारद भक्ति सूक्ति’ में प्रकट होती है, जिसकी व्याख्या अनेक आधुनिक विद्वानों ने भी की है। नारद जी की लोकछवि जैसी बनी और बनाई गई है, वे उससे सर्वथा अलग हैं। उनकी लोकछवि झगड़ा लगाने या कलह पैदा करने वाले व्यक्ति कि है, जबकि हम ध्यान से देखें तो उनके प्रत्येक संवाद में लोकमंगल की भावना ही है। भगवान के दूत के रूप में उनकी आवाजाही और उनके कार्य हमें बताते हैं कि वे निरर्थक संवाद नहीं करते। वे निरर्थक प्रवास भी नहीं करते। उनके समस्त प्रवास और संवाद सायास हैं। सकारण हैं। उद्देश्य की स्पष्टता और लक्ष्यनिष्ठा के वे सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। हम देखते हैं कि वे देवताओं के साथ राक्षसों और समाज के सब वर्गों से संवाद रखते हैं। सब उनपर विश्वास भी करते हैं। देवताओं, मनुष्यों और राक्षसों के बीच ऐसा समान आदर तो देवाधिदेव इंद्र को भी दुर्लभ है। वे सबके सलाहकार, मित्र, आचार्य और मार्गदर्शक हैं। वे कालातीत हैं। सभी युगों और सभी लोकों में समान भाव से भ्रमण करने वाले। ईश्वर के विषय में जब वे हमें बताते हैं, तो उनका दार्शनिक व्यक्तित्व भी हमारे सामने प्रकट हो जाता है।   पुराणों में नारद जी को भागवत संवाददाता की तरह देखा गया है। हम यह भी जानते हैं कि वाल्मीकि जी ने रामायण और महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत गीता का सृजन नारद जी प्रेरणा से ही किया था। नारद अप्रतिम संगीतकार हैं। उन्होंने गंधर्वों से संगीत सीखकर खुद को सिद्ध किया, नारद संहिता ग्रंथ की रचना की। नारद ने कठोर तपस्या कर भगवान विष्णु से संगीत का वरदान लिया। सबसे खास बात यह है कि वे महान ऋषि परंपरा से आते हैं, किंतु कोई आश्रम नहीं बनाते, कोई मठ नहीं बनाते। वे सतत प्रवास पर रहते हैं ,उनकी हर यात्रा उदेश्यपरक है। एक सबसे बड़ा उद्देश्य तो निरंतर संपर्क और संवाद है,साथ ही वे जो कुछ वहां कहते हैं, उससे लोकमंगल की एक यात्रा प्रारंभ होती है। उनसे सतत संवाद,सतत प्रवास, सतत संपर्क, लोकमंगल के लिए संचार करने की सीख ग्रहण की जा सकती है।   भारत के प्रथम हिंदी समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के लिए संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देवर्षि नारद जयंती (30 मई, 1826 / ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया) की तिथि का ही चुनाव किया था। हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला रखने वाले पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर आनंद व्यक्त करते हुए लिखा कि आद्य पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रारंभ होने जा रही है। इससे पता चलता है परंपरा में नारद जी की जगह क्या है।इसी तरह एक अन्य उदाहरण है। नारद जी को संकटों का समाधान संवाद और संचार से करने में महारत हासिल है। आज के दौर में उनकी यह शैली विश्व स्वीकृत है। समूचा विश्व मानने लगा है कि युद्ध अंतिम विकल्प है। किंतु संवाद शास्वत विकल्प है। कोई भी ऐसा विवाद नहीं है, जो बातचीत से हल न किया जा सके। इन अर्थों में नारद सर्वश्रेष्ठ लोक संचारक हैं। सबसे बड़ी बात है नारद का स्वयं का कोई हित नहीं था। इसलिए उनका समूचा संचार लोकहित के लिए है। नारद भक्ति सूत्र में 84 सूत्र हैं। ये भक्ति सूत्र जीवन को एक नई दिशा देने की सार्मथ्य रखते हैं। इन सूत्रों को प्रकट ध्येय तो ईश्वर की प्राप्ति ही है, किंतु अगर हम इनका विश्लेषण करें तो पता चलता है इसमें आज की मीडिया और मीडिया साथियों के लिए भी उचित दिशाबोध कराया गया है।    नारद भक्ति सूत्रों पर ओशो रजनीश, भक्ति वेदांत,स्वामी प्रभुपाद, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, गुरुदेव श्रीश्री रविशंकर, श्री भूपेंद्र भाई पंड्या, श्री रामावतार विद्याभास्कर,स्वामी अनुभवानंद, हनुमान प्रसाद पोद्दार,स्वामी चिन्मयानंद जैसे अनेक विद्वानों ने टीकाएं की हैं। जिससे उनके दर्शन के बारे में विस्तृत समझ पैदा होती है। पत्रकारिता की दृष्टि से कई विद्वानों ने नारद जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का आकलन करते हुए लेखन किया है। हालांकि उनके संचारक व्यक्तित्व का समग्र मूल्यांकन होना शेष है। क्योंकि उनपर लिखी गयी ज्यादातर पुस्तकें उनके आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्ष पर केंद्रित हैं। काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता के आचार्य प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी है। संचार के विद्वान और हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो. बृजकिशोर कुठियाला मानते हैं, नारदजी सिर्फ संचार के ही नहीं, सुशासन के मंत्रदाता भी हैं। वे कहते हैं-“व्यास ने नारद के मुख से युधिष्ठिर से जो प्रश्न करवाये उनमें से हर एक अपने आप में सुशासन का एक व्यावहारिक सिद्धांत है। 123 से अधिक प्रश्नों को व्यास ने बिना किसी विराम के पूछवाया। कौतुहल का विषय यह भी है कि युधिष्ठिर ने इन प्रश्नों का उत्तर एक-एक करके नहीं दिया परंतु कुल मिलाकर यह कहा कि वे ऋषि नारद के उपदेशों के अनुसार ही कार्य करते आ रहे हैं और यह आश्वासन भी दिया कि वह इसी मार्गदर्शन के अनुसार भविष्य में भी कार्य करेंगे।”   एक सुंदर दुनिया बनाने के लिए सार्वजनिक संवाद में शुचिता और मूल्यबोध की चेतना आवश्यक है। इससे ही हमारा संवाद लोकहित केंद्रित बनेगा। नारद जयंती के अवसर नारद जी के भक्ति सूत्रों के आधार पर आध्यात्मिकता के घरातल पर पत्रकारिता खड़ी हो और समाज के संकटों के हल खोजे, इसी में उसकी सार्थकता है।   (लेखक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


bhopal, Arab-Israel India

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   इस्राइल और फलस्तीनियों के संगठन हमास के बीच पिछले 11 दिनों तक युद्ध चलता रहा। अब मिस्र और अमेरिका के प्रयत्नों से वह युद्ध ऊपरी तौर पर शांत हो गया है लेकिन बुनियादी झगड़ा जहां का तहां बना हुआ है। अल-अक्सा मस्जिद, जो कि दुनिया के मुसलमानों का पवित्र तीर्थ-स्थल है, उसमें इस्राइलियों का जाना-आना ज्यों का त्यों बना हुआ है और शेख ज़र्रा नामक पूर्वी यरुशलम से फलस्तीनियों को खदेड़ना जारी है। इन दोनों मसलों के कारण ही यह युद्ध छिड़ा था।   इन दोनों से भी बड़ा और असली मुद्दा है- उस फलस्तीनी भूमि पर दो राष्ट्रों का स्थापित होना। 1948 में इस्राइल वहाँ स्थापित हो गया। उसकी स्थापना में ब्रिटेन और अमेरिका ने जबर्दस्त भूमिका निभाई लेकिन फलस्तीनियों का राज्य बनना अभी तक संभव नहीं हुआ है जबकि उसकी स्थापना के लिए संयुक्तराष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर रखा है। सभी पश्चिमी राष्ट्र और यहां तक कि अरब राष्ट्र भी इस मामले में जबानी जमा-खर्च करके चुप हो जाते हैं।   इस्राइल में रहनेवाले अरबों की दुर्गति तो सबको पता ही है, फलिस्तीनी इलाकों की गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा शब्दों के परे हैं। इसके अलावा पिछले अरब-इस्राइली युद्धों में इस्राइल ने जिन अरब इलाकों पर कब्जा कर लिया था, उनमें रहनेवाले अरबों की हालत गुलामों जैसी है। वे अपने ही घर में बेगानों की तरह रहते हैं। एक जमाना था, जब दुनिया के मालदार इस्लामी राष्ट्र इन शरणार्थियों की खुलकर मदद करते थे लेकिन अब ईरान के अलावा कोई राष्ट्र खुलकर इनकी मदद के लिए सामने नहीं आता। तुर्की और मलेशिया जैसे राष्ट्र जबानी बंदूकें चलाने में उस्ताद हैं लेकिन परेशान फलस्तीनियों की ठोस मदद करनेवाला आज कोई भी नहीं है। खुद फलस्तीनी कई गुटों में बंट गए हैं। अल-फतह और हमास- ये दो तो उनके जाने-पहचाने चेहरे हैं। छोटे-मोटे कई गुट सक्रिय हैं जबकि उनके विरुद्ध पूरा का पूरा इस्राइल एक चट्टान की तरह खड़ा होता है। इस्राइल की पीठ पर अमेरिका की सशक्त यहूदी लाॅबी का हाथ है।   भारत एक ऐसा देश है, जिसका इस्राइल और फलिस्तीन, दोनों से घनिष्ट संबंध है। भारत ने वर्तमान विवाद में अपनी भूमिका के असंतुलन को सुधारा है और निष्पक्ष राय जाहिर की है। वह किसी का पक्षपात करने के लिए मजबूर नहीं है। फलस्तीनियों के प्रसिद्ध नेता यासिर अराफत कई बार भारत आते रहे और भारत सरकार खुलकर उनका समर्थन करती रही है। नरसिंह राव सरकार ने इस्राइल के साथ सक्रिय सहयोग शुरू किया था, जो आज काफी ऊँचे स्तर पर पहुंच गया है। अन्य अरब देश भी भारत का बहुत सम्मान करते हैं। इस्राइल सुरक्षित रहे लेकिन साथ-साथ अरबों को भी न्याय मिले, इस दिशा में भारत का प्रयत्न बहुत सार्थक हो सकता है। भारत दोनों पक्षों से खुलकर बात करे तो वह अमेरिका जो प्रयत्न कर रहा है, उसे सफल बना सकता है।     (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


bhopal, Still taking, Corona vaccine, but why

आर.के. सिन्हा   कोरोना की काट वैक्सीन को लेकर अब भी देश में बहुत से खास और आम लोगों में डर का भाव दिखता है। वे इसे लगवाने से बच रहे हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि उनकी वैक्सीन लगवाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। इस तरह तो देश में कोरोना को मात देना कठिन होगा। अब जरा देखें कि कोरोना की चपेट में आने के बाद उड़न सिख मिल्खा सिंह को मोहाली के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहां भर्ती होने के बाद मिल्खा सिंह ने कहा कि उन्होंने कोरोना वैक्सीन लगवाने के संबंध में सोचा ही नहीं। हां, वे इसके वायरस को हरा देंगे।   बहुत अच्छी बात है कि वे कोरोना के वायरस को हरा दें। पर उनका वैक्सीन न लगवाना कतई सही नहीं माना जा सकता। फिलहाल तो यही एकमात्र कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जरूरी हथियार है। समझ नहीं आता कि मिल्खा सिंह को उनके परिवार के सदस्यों या मित्रों ने वैक्सीन लगवाने के संबंध में क्यों नहीं कहा। अगर उन्होंने कोरोना वैक्सीन को वक्त रहते लगवा लिया होता तो वे दो-तीन दिनों में ठीक भी हो जाते, क्योंकि वैक्सीन कोरोना वायरस के असर को काफी हद तक खत्म कर देती है। इसके उलट मुझे तो प्रतिदिन किसी न किसी मित्र या परिचित के फोन आते हैं कि उन्हें भी कोरोना हुआ पर पर उनकी तो जान सिर्फ इसलिये बच गई क्योंकि, उन्होंने वैक्सीन लगवा रखी थीI   इससे भी गंभीर मामला उत्तर प्रदेश से सामने आ रहा है। वहां कोरोना वैक्सीन लगवाने के डर के कारण अपने पास आती एक मेडिकल टीम को देखकर लोगों ने सरयू जैसी नदी में छलांग लगा दी। बाराबंकी की तहसील रामनगर में पिछले शनिवार को स्वास्थ्य विभाग की टीम ग्रामीणों को कोरोना रोधी टीका लगाने पहुंची, जिसकी भनक से ही ग्रामीण डर गए और छिपकर नदी के किनारे बैठने लगे। खबरें मिल रही हैं कि कुछ ने उफनती नदी में छलांग तक लगा दी ताकि उन्हें कोई टीका न लगाए। अब बताइये कि कोई भी सरकार कैसे कोरोना जैसे भयंकर वायरस को हरा सकेगी।   यकीन मानिए कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद ही भारत में एक हद तक वैक्सीन लगवाने को लेकर गंभीरता भी पैदा हुई है। उससे पहले तो अधिकतर लोग इसे लगवाने से बच ही रहे थे। अब जब कोरोना का संक्रमण बेहद जानलेवा साबित होने लगा तो युवाओं के लिए भी वैक्सीन लगवाना बेहद जरूरी हो गया I क्योंकि, वैक्सीनेशन के बाद बीमारी की गंभीरता और उससे मौत होने का खतरा काफी कम हो जाता है। युवाओं के लिए वैक्सीन लगवाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि युवा तेजी से कोरोना के नए वैरिएंट से संक्रमित हो रहे थे। वैक्सीन लगवाने से कोरोना फैलने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है और लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़ सकते हैं। कई पश्चिमी देशों में भी देखा गया है कि वैक्सीनेशन के बाद लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़ने लगे हैं। अब तो अमेरिका में मास्क लगाना तक जरूरी नहीं रहा और खाने-पीने के सार्वजनिक रेस्टोरेंट तक खुलने लगेI   अगर बात आंकड़ों की करें तो हमारे देश की 38 फीसदी आबादी 19 से 44 उम्र के लोगों की है। देश में अब तक लगभग 18 करोड़ लोग वैक्सीन लगवा चुके हैं। टीकाकरण अभियान के दौरान 45 से 60 साल के 5,76,53,924 लोगों को कोविड-19 टीके की पहली खुराक तथा 92,39,392 लोगों को दूसरी खुराक भी लगायी गयी है। इसके अलावा 60 साल से ऊपर के 5,46,60,900 लोगों को पहली खुराक और 1,79,10,024 लोगों को दूसरी खुराक दी गयी है। पर अभी भी बहुत बड़ा लक्ष्य बाकी है। सारे देश में वैक्सीन लगाने में तो वक्त लगेगा। पर पहले तो देश की जनता जागृत तो हो और इसको लगवाने को लेकर आगे भी आए।   पहले तो बहुत से लोगों में वैक्सीन को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। ये हाल तब है जब सरकार, डॉक्टर, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लगातार इस बात को कहते रहे हैं कि अपनी बारी आने पर वैक्सीन जरूर लें, इससे ही कोरोना संक्रमण की बढ़ती हुई चेन को तोड़ा जा सकता है। इस वैक्सीन को लेकर शुरू में कुछ आशंकाएँ और संदेह भी जाहिर किए जा रहे थे। उन आशंकाओं, अफवाहों और भ्रमों को दूर करने के लिए एम्स के डॉयरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने खुद ही सबसे पहले कोरोना वैक्सीन की डोज ली थी। भारत में कोरोना के खिलाफ टीकाकरण की शुरुआत की दिशा में यह एक बड़ा कदम था। कोरोना वायरस ने तो दुनिया के हरेक इंसान की आंखों से आंसू निकलवा दिए हैं। करोड़ों परिवारों को बर्बाद कर दिया है और लाखों लोगों की जान ले ली हैI   दरअसल यह संक्रमण हवा के जरिए अधिक तेजी से फैल रहा है न कि संक्रमित सतह को छूने से। पूरी दुनिया में भारत फिलहाल एकमात्र ऐसा देश है जहां इसके सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं। अभी वैक्सीन दिये जाने का काम कई राज्यों में रुक-सा भी गया है या मंद पड़ गया है क्योंकि इसकी खुराक ही खत्म हो गई है। पर ये मसला जल्दी ही हल हो जाएगा। देश में कोरोना से लड़ने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है कि टीकाकरण का काम जल्द पूरा हो जाए। हम भारत में कोरोना के प्रभाव को कम करने के लिए अपने देश में बने दो तरह के टीके लगा रहे हैं। अब रूस में बना टीका भी लगने लगेगा। कोरोना के नियंत्रण में रूसी वैक्सीन "स्पूतनिक वी" को 97.6 प्रतिशत तक कारगर माना जा रहा है। इसका अब हिमाचल प्रदेश के बद्दी में बड़े पैमाने पर उत्पादन भी होगा। यहां बनने वाली वैक्सीन की गुणवत्ता की देखरेख रूस से की जाएगी। इसकी आपूर्ति भी रूस को ही जाएगी। बताया जा रहा है कि रूस ने भारत में स्पूतनिक वी की 18 मिलियन खुराक भेजने की योजना की घोषणा की है, जिसमें मई माह में 30 लाख, जून में 50 लाख और जुलाई में 10 मिलियन खुराक शामिल है।   कोरोना की दूसरी लहर घर-घर तक पहुंच गई है। इसने सारे देश को हिलाकर रख दिया है। इसकी वजह से सारे देश को भारी क्षति हुई है। इसलिए अब यह जरूरी है कि कोरोना की वैक्सीन लेने में कतई देरी न की जाए। इस तरह का कोई भी कदम नासमझी भरा ही होगा।   (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 26 May 2021


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प्रमोद भार्गव तौकते चक्रवात का कहर अभी ठंडा भी नहीं पड़ा है कि बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवाती तूफान यास ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कहर ढाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। मौसम विभाग ने बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के चक्रवाती तूफान के संकट की भविष्यवाणी कर दी है। यह तूफान उत्तर-उत्तर पश्चिम की ओर जाएगा तथा 26 मई के आसपास पश्चिम बंगाल-उत्तरी ओड़िशा से टकराएगा। केंद्र सरकार ने इसके मद्देनजर इन दोनों प्रांतों को चेतावनी देते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल की तैनातियां शुरू कर दी है। महाराष्ट्र और गुजरात में 'तौकते' तूफान के दौरान एनडीआरएफ के जो बल तैनात थे, उन्हें हवाई मार्ग से बंगाल और ओड़िशा भेजा जा रहा है। 110 किमी की रफ्तार से आने वाले इस तूफान का असर आंध्र-प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भी पड़ सकता है। मछुआरों को इस दौरान समुद्र से बाहर निकल आने की सलाह दी गई है। तूफान के साथ तूफान प्रभावित क्षेत्रों में तेज बारिश भी होगी। जिसका आंशिक असर दिल्ली, राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी देखने में आएगा।    मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के बावजूद तूफान तौकते अपना भीषण असर दिखाकर आगे बढ़ गया और अब इसके पीछे-पीछे यास ने दस्तक दे दी। इसके पहले इन दोनों राज्यों के इसी इलाके में बुलबुल और फैनी चक्रवातों ने 2019 में तबाही मचाई थी। भारतीय मौसम विभाग के अनुमान अकसर सही साबित नहीं होते, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। किंतु अब समझ आ रहा है कि मौसम विभाग आपदा का सटीक अनुमान लगाकर समाज और प्रशासन को आपदा से जूझने की पूर्व तैयारियों में लगाने में समर्थ हो गया है। अन्यथा मध्य मई में आए तूफान तौकते का असर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात में कहीं ज्यादा देखने में आता। चेतावनी मिलने के साथ ही शासन-प्रशासन और समाज ने जागरूकता व संवेदनशीलता बरतते हुए जान-माल की ज्यादा हानि नहीं होने दी। फेलिन, हुदहुद, तितली, बुलबुल और फैनी चक्रवात से जुड़ी भविष्यवाणियां भी सटीक बैठी थीं।   दरअसल जलवायु परिवर्तन और आधुनिक विकास के कारण देश ही नहीं दुनिया आपदाओं की आशंकाओं से घिरी हुई है। ऐसे में आपदा प्रबंधन की क्षमताओं और संसाधनों को हमेशा सचेत रहने की जरूरत है। उत्तरी हिंद महासागर में आने वाले तूफानों के लिए नाम पहले ही निश्चित कर लिए गए हैं। तौकते का अर्थ छिपकली था, वहीं यास का नामाकरण ओमान ने वहां की स्थानीय बोली के आधार पर रखा है, जिसका अर्थ 'निराशा' होता है। अम्फान नाम थाइलैंड ने दिया था। इसका अर्थ थाई भाषा में आसमान होता है।    हमारे मौसम विज्ञानी सुपर कंप्युटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे हैं। तूफान की तीव्रता, हवा की गति और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए। इन अनुमानों को और कारगर बनाने की जरुरत है, जिससे बाढ़, सूखे, भूकंप, आंधी और बवंडरों की पूर्व सूचनाएं मिल सकें और इनसे सामना किया जा सके। साथ ही मौसम विभाग को ऐसी निगरानी प्रणालियां भी विकसित करने की जरूरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेबार भविष्यवाणियां की जा सकें। यदि ऐसा मुमकिन हो पाता है तो कृषि का बेहतर नियोजन संभव हो सकेगा। साथ ही अतिवृष्टि या अनावृष्टि के संभावित परिणामों से कारगर ढंग से निपटा जा सकेगा। किसान भी बारिश के अनुपात में फसलें बोने लग जाएंगे। लिहाजा कम या ज्यादा बारिश का नुकसान उठाने से किसान मुक्त हो जाएंगे। मौसम संबंधी उपकरणों के गुणवत्ता व दूरंदेशी होने की इसलिए भी जरूरत है, क्योंकि जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से समुद्रतटीय इलाकों में आबादी भी ज्यादा है और वे आजीविका के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। लिहाजा समुद्री तूफानों का सबसे ज्यादा संकट इसी आबादी को झेलना पड़ता है। इस चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी करने में निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट कमोबेश नाकाम रही है।   1999 में जब ओडिशा में नीलम तूफान आया था तो हजारों लोग सटीक भविष्यवाणी न होने और आपदा प्रबंधन की कमी के चलते मारे गए थे। 12 अक्टूबर 2013 को उष्णकटिबंधीय चक्रवात फैलिन ने ओडिशा तट पर दस्तक दी थी। अंडमान सागर में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में उत्पन्न हुए नीलम ने 9 अक्टूबर को उत्तरी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पार करते ही एक चक्रवाती तूफान का रूप ले लिया था। इसने सबसे ज्यादा नुकसान ओडिशा और आंध्र प्रदेश में किया था। इस चक्रवात की भीषणता को देखते हुए 6 लाख लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाएं गए थे। तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफानी हवाएं 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरी थीं। 2004 में आए सुनामी तूफान का असर सबसे ज्यादा इन्हीं इलाकों में देखा गया था। हालांकि हिंद महासागर से उठे इस तूफान से 14 देश प्रभावित हुए थे। तमिलनाडू में भी इसका असर देखने में आया था। इससे मरने वालों की संख्या करीब 2 लाख 30 हजार थी। भारत के इतिहास में इसे एक बड़ी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाता है।   8 और 12 अक्टूबर 2014 में आंध्र एवं ओडिशा में हुदहुद तूफान में भी भयंकर कहर बरपाया था। इसकी दस्तक से इन दोनों राज्यों के लोग सहम गए थे। भारतीय नौसेना एनडीआरएफ ने करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित क्षेत्रों में पहुंचाकर उनके प्राणों की रक्षा की थी। इसलिए इसकी चपेट से केवल छह लोगों की ही मौंतें हुई थीं। हालांकि आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही 1839 में आए कोरिंगा तूफान ने मचाई थी। गोदावरी जिले के कोरिंगा घाट पर समुद्र की 40 फीट ऊंचीं उठी लहरों ने करीब 3 लाख लोगों को निगल लिया था। समुद्र में खड़े 20,000 जहाज कहां विलीन हुए पता ही नहीं चला। 1789 में कोरिंगा से एक और समुद्री तूफान टकराया था, जिसमें लगभग 20,000 लोग मारे गए थे।    कुदरत के रहस्यों की ज्यादातर जानकारी अभी अधूरी है। जाहिर है, चक्रवात जैसी आपदाओं को हम रोक नहीं सकते, लेकिन उनका सामना या उनके असर को कम करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। भारत के तमाम इलाके बाढ़, सूखा, भूकंप और तूफानों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित होते जा रहे पर्यावरण के कारण ये खतरे और इनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कहा भी जा रहा है कि फेलिन, ठाणे, आइला, आईरिन, नीलम सैंडी, अम्फान और तौकते जैसी आपदाएं प्रकृति की बजाय आधुनिक मनुष्य और उसकी प्रकृति विरोधी विकास नीति का पर्याय हैं। उत्तराखंड में तो आधुनिक विकास तबाही की तस्वीर लगातार देखने में आ रही है। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में भूस्खलन और नदियों में बाढ़ एक सिलसिला बनकर कहर बरपा रही हैं।   गौरतलब है कि 2005 में कैटरीना तूफान के समय अमेरिकी मौसम विभाग ने इस प्रकार के प्रलयंकारी समुद्री तूफान 2080 तक आने की आशंका जताई थी, लेकिन वह सैंडी और नीलम तूफानों के रूप में 2012 में ही आ धमके। 19 साल पहले ओड़िशा में सुनामी से फूटी तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने यह तथ्य रेखांकित किया था कि अगर मैग्रोंव वन बचे रहते तो तबाही कम होती। ओड़िशा के तटवर्ती शहर जगतसिंहपुर में एक औद्योगिक परियोजना खड़ी करने के लिए एक लाख 70 हजार से भी ज्यादा मैंग्रोव वृक्ष काट डाले गए थे। दरअसल, जंगल एवं पहाड़ प्राणी जगत के लिए सुरक्षा कवच हैं, इनके विनाश को यदि नीतियों में बदलाव करके नहीं रोका गया तो तय है कि आपदाओं के सिलसिलों को भी रोक पाना मुश्किल होगा ? लिहाजा नदियों के किनारे आवासीय बस्तियों पर रोक और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगलों का सरंक्षण जरूरी है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


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बुद्ध पूर्णिमा (26 मई) पर विशेष   योगेश कुमार गोयल 563 ईसापूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा को लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच एक राजकुमार ने उस समय जन्म लिया, जब उनकी मां कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने पीहर देवदह जा रही थी और रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी। इस राजकुमार का नाम रखा गया सिद्धार्थ, जो आगे चलकर महात्मा बुद्ध के नाम से विख्यात हुए। महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन और उनके विचार आज ढाई हजार से अधिक वर्षों के बेहद लंबे अंतराल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके प्रेरणादायक जीवन दर्शन का जनजीवन पर अमिट प्रभाव रहा है। हिन्दू धर्म में जो अमूल्य स्थान चार वेदों का है, वही स्थान बौद्ध धर्म में ‘पिटकों’ का है। महात्मा बुद्ध स्वयं अपने हाथ से कुछ नहीं लिखते थे बल्कि उनके शिष्यों ने ही उनके उपदेशों को कंठस्थ कर बाद में उन्हें लिखा और लिखकर उन उपदेशों को वे पेटियों में रखते जाते थे, इसीलिए इनका नाम ‘पिटक’ पड़ा, जो तीन प्रकार के हैं:- विनय पिटक, सुत्त पिटक तथा अभिधम्म पिटक।   महात्मा बुद्ध के जीवनकाल की अनेक घटनाएं ऐसी हैं, जिनसे उनके मन में समस्त प्राणीजगत के प्रति निहित कल्याण की भावना तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव का साक्षात्कार होता है। उनके हृदय में बाल्यकाल से ही चराचर जगत में विद्यमान प्रत्येक प्राणी में प्रति करूणा कूट-कूटकर भरी थी। मनुष्य हो या कोई जीव-जंतु, किसी का भी दुख उनसे देखा नहीं जाता था। एकबार की बात है, जंगल में भ्रमण करते समय उन्हें किसी शिकारी के तीर से घायल एक हंस मिला। उन्होंने उसके शरीर से तीर निकालकर उसे थोड़ा पानी पिलाया। तभी उनका चचेरा भाई देवदत्त वहां आ पहुंचा और कहा कि यह मेरा शिकार है, इसे मुझे सौंप दो। इस पर राजकुमार सिद्धार्थ ने कहा कि इसे मैंने बचाया है जबकि तुम तो इसकी हत्या कर रहे थे, इसलिए तुम्हीं बताओ कि इस पर मारने वाले का अधिकार होना चाहिए या बचाने वाले का। देवदत्त ने सिद्धार्थ की शिकायत उनके पिता राजा शुद्धोधन से की। शुद्धोधन ने सिद्धार्थ से कहा कि तीर तो देवदत्त ने ही चलाया था, इसलिए तुम यह हंस उसे क्यों नहीं दे देते?   इस पर सिद्धार्थ ने तर्क दिया, ‘‘पिताजी! इस निरीह हंस ने भला देवदत्त का क्या बिगाड़ा था? उसे आसमान में स्वच्छंद उड़ान भरते इस बेकसूर हंस पर तीर चलाने का क्या अधिकार है? उसने इस हंस पर तीर चलाकर इसे घायल किया ही क्यों? मुझसे इसका दुख देखा नहीं गया और मैंने तीर निकालकर इसके प्राण बचाए हैं, इसलिए इस हंस पर मेरा ही अधिकार होना चाहिए।’’   राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के इस तर्क से सहमत होते हुए बोले, ‘‘तुम बिल्कुल सही कह रहे हो सिद्धार्थ। मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा होता है, इसलिए इस हंस पर तुम्हारा ही अधिकार है।’’   महात्मा बुद्ध जब उपदेश देते जगह-जगह घूमते तो कुछ लोग उनका खूब आदर-सत्कार करते तो कुछ उन्हें बहुत भला-बुरा बोलकर खूब खरी-खोटी भी सुनाते तो कुछ दूर से ही उन्हें अपमानित कर दुत्कार कर भगा देते लेकिन महात्मा बुद्ध सदैव शांतचित्त रहते। एकबार वे भिक्षाटन के लिए शहर में निकले और उच्च जाति के एक व्यक्ति के घर के समीप पहुंचे ही थे कि उस व्यक्ति ने उन पर जोर-जोर से चिल्लाना तथा गालियां देना शुरू कर दिया और कहा कि नीच, तुम वहीं ठहरो, मेरे घर के पास भी मत आओ।   बुद्ध ने उससे पूछा, भाई, यह तो बताओ कि नीच आखिर होता कौन है और कौन-कौनसी बातें किसी व्यक्ति को नीच बताती हैं?’’   उस व्यक्ति ने जबाव दिया, ‘‘मैं नहीं जानता। मुझे तो तुमसे ज्यादा नीच इस दुनिया में और कोई नजर नहीं आता।’’   इस पर महात्मा बुद्ध ने बड़े प्यार भाव से उस व्यक्ति को समझाते हुए कहा, ‘‘जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से ईर्ष्या करता है, उससे वैर भाव रखता है, किसी पर बेवजह क्रोध करता है, निरीह प्राणियों पर अत्याचार या उनकी हत्या करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जब कोई किसी पर चिल्लाता है या उसे अपशब्द कहता है अथवा उसे नीच कहता है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में नीचता पर उतारू होता है क्योंकि असभ्य व्यवहार ही नीचता का प्रतीक है। जो व्यक्ति किसी का कुछ लेकर उसे वापस नहीं लौटाता, ऋण लेकर लौटाते समय झगड़ा या बेईमानी करता है, राह चलते लोगों के साथ मारपीट कर लूटपाट करता है, जो माता-पिता या बड़ों का आदर-सम्मान नहीं करता और समर्थ होते हुए भी माता-पिता की सेवा नहीं करता बल्कि उनका अपमान करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जाति या धर्म निम्न या उच्च नहीं होते और न ही जन्म से कोई व्यक्ति उच्च या निम्न होता है बल्कि अपने विचारों, कर्म तथा स्वभाव से ही व्यक्ति निम्न या उच्च बनता है। कुलीनता के नाम पर दूसरों को अपमानित करने का प्रयास ही नीचता है। धर्म-अध्यात्म के नाम पर आत्मशुद्धि के बजाय कर्मकांडों या प्रतीकों को महत्व देकर खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करके दिखाने का दंभ ही नीचता है।’’   महात्मा बुद्ध के इन तर्कों से प्रभावित हो वह व्यक्ति उनके चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगा। बुद्ध ने उसे उठाकर गले से लगाया और उसे सृष्टि के हर प्राणी के प्रति मन में दयाभाव रखने तथा हर व्यक्ति का सम्मान करने का मूलमंत्र देकर वे आगे निकल पड़े।   अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में महात्मा बुद्ध ने दुनिया भर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए। ईसा पूर्व 483 को वैशाख मास की पूर्णिमा को उन्होंने कुशीनगर के पास हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने उन्हीं साल वृक्षों के नीचे प्राण त्यागे, जिन पर मौसम न होते हुए भी फूल आए थे। उनका अंतिम उपदेश था कि सृजित वस्तुएं अस्थायी हैं, अतः विवेकपूर्ण प्रयास करो। उनका कहना था कि मनुष्य की सबसे उच्च स्थिति वही है, जिसमें न तो बुढ़ापा है, न किसी तरह का भय, न चिन्ताएं, न जन्म, न मृत्यु और न ही किसी तरह के कष्ट और यह केवल तभी संभव है, जब शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मन भी संयमित हो क्योंकि मन की साधना ही सबसे बड़ी साधना है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


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डॉ. दिनेश चंद्र सिंह किसी भी सभ्यता व संस्कृति का विकास, समय-समय पर उसके लोगों के समक्ष आए संकट और उससे उत्पन्न परिस्थितियों से जूझने की उनकी व्यक्तिगत-सामूहिक क्षमता पर निर्भर करता है। वर्तमान वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के प्रकोप से उपजी हुई चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के क्रम में भी हमें विधि के विधान के साथ साथ वैज्ञानिक अवदानों का भी कायल रहना चाहिए। प्रसंगवश, लोक महाकाव्य रामचरितमानस की एक चौपाई को यहां उद्धृत करना चाहूंगा- "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभु, जीवनु-मरनु, जसु-अपजसु विधि हाथ।।"     वास्तव में, ये पंक्तियां सदियों से दु:खी, पीड़ित व वेदनायुक्त समाज में पुनः शक्ति धारण कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का कार्य करती आई हैं। उनका मार्ग सदा से ही प्रशस्त करती आई हैं, लेकिन यह यक्ष प्रश्न मेरे समक्ष समुपस्थित है कि क्या आज भी इसकी प्रासंगिकता है अथवा नहीं ! विचलित मन से ऐसा अनेकों बार सोचा और कभी-कभी सहसा विश्वास भी नहीं होता है। किंतु वर्तमान कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने तो यह विश्वास और गहन कर दिया कि ऊपर की पंक्तियां सच नहीं हैं ! वजह यह कि कोरोना संक्रमण से कुछ ऐसे व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हुई है जिनकी जीवन की यात्रा का यदि निकट से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वह किसी भी प्रकार के व्यसन से कोसों दूर थे। खान-पान की उच्च स्तरीय प्रवृत्ति का अनुसरण अपने जीवन में करते आये थे। स्वास्थ्यगत मानकों पर भी काफी हद तक ठीक थे। परंतु कोरोना के संक्रमण के प्रभाव से उनकी लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता यकायक जवाब दे गई और अकाल मृत्यु का ग्रास बनकर उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई।   यद्यपि, यह वैज्ञानिकों द्वारा तथा अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रमाणित रूप से सिद्ध किया जा चुका है कि जिनको एक से अधिक प्रकार के विभिन्न रोग हैं, जैसे- शुगर, फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, न्यूरो, हार्ट से संबंधित डिजीज, जिन्हें चिकित्सकीय भाषा में कोमोरबिलि कोमोरबीडीटी कहा जाता है, उन्हें बचाना बेहद मुश्किल है। वहीं, यह भी पाया जा रहा है कि मधुमेह, हाइपरटेंशन, रक्त संबंधी रोग एचआईवी पॉजिटिव, कैंसर इत्यादि जैसे एक से अधिक रोग से प्रभावित व्यक्ति भी समुचित इलाज एवं देखभाल से कोरोना को मात देकर स्वस्थ भी हुए हैं। कहने का अभिप्राय यह कि भले ही समुचित चिकित्सा सुविधाएं एवं बेहतर प्रबंधन किसी भी व्यवस्था का कारगर हथियार होते हैं, जिसके बल पर किसी भी चुनौती का मुकाबला करके उसे हराया जा सकता है। लेकिन कहीं-कहीं सामान्य नागरिकों की सोच दो हिस्सों में बंट जाती है। पहला यह कि बेहतर प्रबंधन व उत्कृष्ट चिकित्सा व्यवस्था के अलावा अन्य कोई ईश्वरीय अनुकंपा से व्यक्ति इस संक्रामक रोग से ठीक नहीं हुआ। दूसरा यह कि कुछ ऐसे वर्ग भी हैं जो समुचित चिकित्सा के अभाव में भी होम आइसोलेशन में घरेलू एवं पुरानी चिकित्सकीय व्यवस्था, योग, प्राणायाम आयुर्वेदिक काढ़ा इत्यादि के सेवन से घर पर ही ठीक हो रहे हैं। ऐसे लोग अपनी जीवन शैली एवं ईश्वर की कृपा को अपने ठीक होने का कारण मानते हैं।   वास्तव में, हम किसी भी दशा में उत्कृष्ट प्रबंधन एवं बेहतर चिकित्सकीय व्यवस्था, समुचित निगरानी तंत्र और उत्तर प्रदेश सरकार की टेस्ट, ट्रेस व ट्रीट की वैज्ञानिक पद्धति को कोरोना को हराने एवं संक्रमण से प्रभावित व्यक्तियों को ठीक करने की व्यवस्था को ही उत्कृष्ट मान रहे हैं और मानना भी चाहिए। क्योंकि कर्म एवं मेधा के बल पर किया गया प्रयास सदैव विजयी बनाता है। बावजूद इसके, कहीं न कहीं कतिपय युवकों, बच्चों एवं स्वस्थ व्यक्तियों की मृत्यु के रहस्य की तलाश करते हुए इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, यह सब विधि यानी प्रकृति के हाथ में ही है।   इस बात की प्रमाणिकता के लिए यह अवगत कराना चाहूंगा कि देश एवं दुनिया की 9 प्रतिष्ठित कम्पनियों व उसके लोगों ने, कंपनी से जुड़े वैज्ञानिकों ने रात-दिन प्रयास करके अपने परिश्रम एवं कर्तव्य परायणता से बेहद जटिल कोरोना महामारी की वैक्सीन की खोज की, जिससे इनकी कंपनियों को लाभ-यश के साथ मानवता की रक्षा का पुरस्कार व प्रशंसा मिली। लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब अन्य तमाम कंपनी इस क्षेत्र में कार्य कर रही थीं/ हैं तो फिर लाभ एवं यश इन्हीं 9 कंपनियों व उसके कर्ताधर्ता लोगों को ही क्यों मिला। यहीं से प्रकृति, पौरुषता व प्रारब्ध की चर्चा जगह हासिल करने लगती हैं। उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि कहीं न कहीं रामचरितमानस की उपरोक्त उपदेशात्मक पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती है।   पीपुल्स एलायंस की रिपोर्ट के आधार पर 9 लोग इस संक्रमण काल में भी नए अरबपति बने। पहला, मॉडर्न के सीईओ स्टीफन बैंसल, दूसरा बायोनेट के सीईओ और संस्थापक उगुर साहीन, तीसरा इम्यूनोलॉजिस्ट और मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक टिमोथी स्प्रिंगर, चौथा मॉडर्ना के चेयरमैन नौबार अफेयान, पांचवा मॉडर्ना के वैक्सीन के पैकेज व निर्माण के लिए कार्य करने वाली कंपनी आरओवीआई के चेयरमैन जुआन लोपेज वेलमोंट, छठा मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक एवं विज्ञानी रॉबर्ट लैंगर, सातवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के मुख्य वैज्ञानिक झू ताओ, आठवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के सीनियर वी सी किउ डोंगकसू और नवम कैनसिनो बायोलॉजिक्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व माओ हुइंहोआ।    इसी प्रकार, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक सारस पूनावाला, कैडिला हेल्थकेयर के प्रमुख पंकज पटेल व कई ऐसी संस्था है, जिनको इस काल में लाभ ही लाभ हुआ। यहां पर मैं एक ऐसे नाम का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं, जिनकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। वह हैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एवं बनारस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनिल कुमार मिश्रा, जिन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित 2 डीजी दवा के निर्माण में अभिनव भूमिका निभाई। उनके सह-अनुसंधानकर्ता भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनंत नारायण भट्ट ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। बेशक, ये लोग एक शासकीय सेवा के अंतर्गत वैज्ञानिक पद पर आसीन हैं, इसलिए इनको मौद्रिक लाभ शायद ना हो, लेकिन, इनकी यश-कीर्ति, यश-पताका, मानव की रक्षा हेतु किये गए उपायों की खोज से हासिल की गई उपलब्धियों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इससे आपकी भावी पीढ़ी भी खुद को गौरवान्वित समझेगी। इस खोज के लिए देश आपका सदैव आभारी रहेगा।   निःसन्देह, इन सबकी यश-कीर्ति भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई दृष्टिगोचर हो रही है। इसके साथ ही, कई ऐसे व्यवसाय भी हैं जिनको इस महामारी में लाभ और यश प्राप्त करने का अवसर मिला। कुछ तो ऐसे निकले, जिनको पूर्व में इतनी ख्याति अर्जित नहीं थी और अपनी हानि की बैलेंस शीट बनाते-बनाते थक गए थे। फिर अचानक लाभ का मौका इस महामारी काल में मिला। वहीं, कुछ लोगों को उनकी नकारात्मक सोच, लोभ, छल, कपट एवं स्वार्थपरता के कारण दवाइयों, इंजेक्शन एवं ऑक्सीजन आदि जीवनदायिनी औषधियों की कालाबाजारी के मोहपाश में पड़ने के कारण हानि व अपयश भी मिला। उन्हें जेल की सलाखों के अंदर जाने का दंड भी मिला। ऐसे लोगों ने भविष्य में अपने परिवार की आने वाली पीढ़ियों को भी कलंकित करने का कार्य किया। ऐसे में, मुझे लगा कि रामचरित मानस की निम्न पंक्तियां- "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।।" -आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पहले थी और आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगी।   मेरा दृढ़ मत है कि काम, क्रोध, अहंकार, स्वार्थ के वश में आकर व्यक्ति अपने वात, कफ, पित्त के संतुलन को बिगाड़ लेता है। फिर उसी त्रिदोष के कारण अनेक व्याधियों की चपेट में आकर अकाल मृत्यु, हानि तथा अपयश का भागी बनता रहता है। लिहाजा, हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के इस क्रूर कालखंड में हम सभी यदि अच्छे ढंग से मानवता की रक्षा के लिए एकजुट, संगठित होकर और सामाजिक सरोकार की भावना से पीड़ित, दु:खी एवं संक्रमित व्यक्तियों की सेवा करेंगे तो निश्चित ही हमलोग यश प्राप्त करेंगे। क्योंकि सरकारी तंत्र अपने स्तर से उत्कृष्ट कार्य कर रहा है।    यहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ पंक्तियां मेरे विश्वास को और अधिक मजबूती प्रदान करती हैं। वह यह कि "प्रभु रथ रोको! क्या प्रलय की तैयारी है, बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।...कितने परिचित, कितने अपने, आखिर यूं ही चले गए, जिन हाथों में धन-संबल, सब काल से छले गए।...हे राघव-माधव-मृत्युंजय, पिघलो, यह विनती हमारी है, ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।"    लिहाजा, सभी राजनीतिक दल, उद्योगपति, सक्षम नागरिक, देश की युवा शक्ति, बिना आरोप-प्रत्यारोप के सामूहिकता का भाव लेकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार, देश के समक्ष उत्पन्न इस अप्रत्याशित चुनौती का सामना करने के लिए संबल बनें। क्योंकि, समाज में उत्पन्न निराशा व हताशा के माहौल को आपकी सामूहिक सकारात्मकता व सर्जनात्मकता भाव से, इस विस्मयकारी माहौल से निपटने में मददगार होगी। भविष्य में यह निश्चय ही यादगार भी बनेगी और दृष्टांत स्वरूप उद्धृत भी की जाएगीर। इसलिए, निर्विवाद रूप से आप सभी अपनी सकारात्मकता के माध्यम से यश के भागी बनेंगे, अन्यथा इतिहास हमें कभी नहीं बख्शेगा।      (लेखक, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव हैं।)

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Dakhal News 25 May 2021


Corona, Now the competition, fierce

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   एक-दो प्रांतों को छोड़कर भारत के लगभग हर प्रांत से खबर आ रही है कि कोरोना का प्रकोप वहाँ घट रहा है। अब देश के सैकड़ों अस्पतालों और तात्कालिक चिकित्सा-केंद्र में पलंग खाली पड़े हुए हैं। लगभग हर अस्पताल में आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में है। विदेशों से आए आक्सीजन-कंसन्ट्रेटरों के डिब्बे बंद पड़े हैं। दवाइयों और इंजेक्शनों की कालाबाजारी की खबरें भी अब कम हो गई हैं। लेकिन कोरोना के टीके कम पड़ रहे हैं। कई राज्यों ने 18 साल से बड़े लोगों को टीका लगाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया है।   देश में लगभग 20 करोड़ लोगों को पहला टीका लग चुका है लेकिन ये कौन लोग हैं ? इनमें ज्यादातर शहरी, सुशिक्षित, संपन्न और मध्यम वर्ग के लोग हैं। अभी भी ग्रामीण, गरीब, पिछड़े, अशिक्षित लोग टीके के इंतजार में हैं। भारत में 3 लाख से ज्यादा लोग अपने प्राण गंवा चुके हैं। पिछले 12 दिनों में 50 हजार लोग महाप्रयाण कर गए। इतने लोग तो आजाद भारत में किसी महामारी से पहले कभी नहीं मरे। किसी युद्ध में भी नहीं मरे।   मौत के इस आंकड़े ने हर भारतीय के दिल में यमदूतों का डर बिठा दिया। जो लोग सुबह 5 बजे गुड़गांव में मेरे घर के सामने सड़क पर घूमने निकलते थे, वे भी आजकल दिखाई नहीं पड़ते। सब लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं। आजकल घरों में भी जैसा अकेलापन, सूनापन और उदासी का माहौल है, वैसा तो मैंने अपने जेल-यात्राओं में भी नहीं देखा। अब 50-60 साल बाद लगता है कि कोरोना में रहने की बजाय जेलों में रहना कितना सुखद था। लेकिन जब हम दुनिया के दूसरे देशों को देखते हैं तो मन को थोड़ा मरहम-सा लगता है।   भारत में अबतक 3 लाख मरे हैं जबकि अमेरिका में 6 लाख और ब्राजील में 4.5 लाख लोग ! जनसंख्या के हिसाब से अमेरिका के मुकाबले भारत 4.5 गुना बड़ा है और ब्राजील से 7 गुना बड़ा। अमेरिका में चिकित्सा-सुविधाएं और साफ-सफाई भी भारत से कई गुना ज्यादा है। इसके बावजूद भारत का ज्यादा नुकसान क्यों नहीं हुआ ? क्योंकि हमारे डॉक्टर और नर्स देवतुल्य सेवा कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे भोजन के मसाले, घरेलू नुस्खे, प्राणायाम और आयुर्वेदिक दवाइयां चुपचाप अपना काम कर रही हैं। न विश्व स्वास्थ्य संगठन उन पर मोहर लगा रहा है, न हमारे डाॅक्टर उनके बारे में अपना मुँह खोल रहे हैं और न ही उनकी कालाबाजारी हो रही है। वे सर्वसुलभ हैं। उनके नाम पर निजी अस्पतालों में लाखों रु. की लूटपाट का सवाल ही नहीं उठता।   भारत के लोग यदि अफ्रीका और एशिया के लगभग 100 देशों पर नज़र डालें तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि वे कितने भाग्यशाली हैं। सूडान, इथियोपिया, नाइजीरिया जैसे देशों में कई ऐसे हैं, जिनमें एक प्रतिशत लोगों को भी टीका नहीं लगा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान में भी बहुत कम लोगों को टीका लग सका है। कोरोना की इस लड़ाई में सरकारों ने शुरू में लापरवाही जरूर की थी लेकिन अब भाजपा और गैर-भाजपा सरकारें जैसी मुस्तैदी दिखा रही हैं, यदि तीसरी लहर आ गई तो वे उसका मुकाबला जमकर कर सकेंगी।   (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 24 May 2021


bhopal, History will not, forgive depositors

अनिल निगम आज संपूर्ण भारत कोरोना वायरस के चलते भयावह संकट से जूझ रहा है। हजारों परिवार इससे बरबाद हो चुके हैं और लाखों लोगों के सिर पर अब भी खतरा मंडरा रहा है। लगातार लोग कोरोना से जंग हार कर मौत की आगोश में जा रहे हैं,लेकिन आज भी अनेक नेता अपनी सियासी रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। वास्‍तविकता तो यह है कि इस भयावह संकट के दौर में नेताओं से यह आशा की जाती है कि वे परस्‍पर मतभेद भुलाकर मानवसेवा पर अपना ध्‍यान केंद्रित करें। अफसोस कि नेता अपनी जुबानी जंग से देश की जनता को भ्रमित करने के काम में जुटे हुए हैं। नेताओं के इन बयानों का जनता और देश की दशा और दिशा पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? इसका विश्‍लेषण करने के पहले इस बात को समझना जरूरी है कि कौन से ऐसे बयान हैं, जिन्‍होंने प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में नदियों में बहाए गए शवों के बारे में राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि गंगा मां की रेत से दिखता हर शव का कपड़ा कहता है कि उस रेत में सिर दफनाए मोदी सिस्‍टम रहता है। उनकी इस टिपपणी से ऐसा लगता है कि इस सबके लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही जिम्‍मेदार हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में बयान दिया कि कोरोना वायरस का जो सिंगापुर में नया वैरिएंट मिला है, वह बच्‍चों के लिए अत्‍यंत खतरनाक है। यह वैरिएंट भारत में तीसरी लहर के रूप में आ सकता है। इसलिए भारत को सिंगापुर की हवाई यात्राएं अविलंब बंद कर देनी चाहिए। केजरीवाल के इस बयान को सिंगापुर ने बेहद गंभीरता से लिया और भारत के उच्‍चायुक्‍त को बुलाकर इस पर पर कड़ा प्रतिरोध भी दर्ज कराया। इसके पहले देश भर में ऑक्‍सीजन की कमी पर भी खूब बयानबाजी हुई। कांग्रेस नेता व सांसद राहुल गांधी ने कई ट्वीट कर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के लिए निशाना साधते हुए कहा, इस भयावह दौर में चुप्पी साधने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को धन्यवाद। राहुल गांधी के इसी बयान पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पलटवार किया। उन्‍होंने अपने ट्वीट में कहा कि देश में ऑक्सीजन की न कमी है ना होगी, परेशान सिर्फ गिद्ध वाली दूषित राजनीति करने वालों से है। इसी तरह से बिहार में पूर्व मुख्‍यमंत्री लालू यादव और मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने भी एक दूसरे पर जमकर कीचड़ उछाला। दिलचस्‍प यह है कोरोना वैक्‍सीन की कमी का रोना रोने वाले अनेक नेताओं ने वैक्‍सीन की उपयोगिता और विश्‍वसनीयता पर सवाल उठाए थे। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वैक्सीन को बीजेपी की वैक्सीन तक कह दिया था। उन्‍होंने कहा कि 'मैं तो नहीं लगवाऊंगा भाजपा की वैक्सीन।' पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी सहित अनेक नेताओं ने इस पर कई सवाल दागे थे। इस संबंध में भारत बॉयोटेक के डॉ. कृष्णा एल्ला को कहना पड़ा था कि हमने अपना काम ईमानदारी से किया है लेकिन कोई हमारी वैक्सीन को पानी कहे तो बिल्कुल मंजूर नहीं होगा। हम भी वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने अपना काम किया है। कुछ लोगों के जरिए वैक्सीन का राजनीतिकरण किया जा रहा है।   यह बात सोलह आने खरी है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का सशक्‍त होना जरूरी है। अगर विपक्ष सशक्‍त होता है तो देश के शासन और प्रशासन द्वारा की जाने वाली गलतियों पर अंकुश रहता है। लेकिन विपक्ष को चाहिए कि वह धरातल पर काम करे, शोध, अनुसंधान के पश्‍चात सत्‍य पर आधारित तथ्‍यों के आधार पर ही बात करे। आज राजनीति में अब एक दौर चल गया है कि चाहे जो भी हो, विपक्ष को हर मुद्दे का विरोध करना है।  यही कारण है कि  सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक या फिर कोरोना की वैक्सीन, विपक्ष ने सभी पर सवाल उठाए। केंद्र सरकार का विरोध करने में विपक्षी नेता भूल गए कि वे कोरोना वैक्सीन और सर्जिकल स्‍ट्राइक का विरोध करके सरकार का नहीं, बल्कि देश के वैज्ञानिकों और सैनिकों का अपमान कर रहे हैं। बिना शोध अथवा अनुसंधान के केजरीवाल का सिंगापुर के नए वैरिएंट का बखेड़ा खड़ा करना, नदी में प्रशासन द्वारा शवों को बहाने अथवा ऑक्‍सीजन के बारे में अनर्गल बयानबाजी से देश के लोगों में भय और अविश्‍वास का माहौल पैदा हो रहा है। आज देश जिस तरह से संकट के दौर से गुजर रहा है, उसके लिए राजनैतिक दलों को इन मुद्दों पर सियासी रोटियां सेंकने से बाज आना चाहिए।   (लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।)

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Dakhal News 22 May 2021


bhopal,Arab-Israel, Now what next?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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Dakhal News 22 May 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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Dakhal News 22 May 2021


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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक   हमास और इजराइल के बीच चल रहा 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, यह अच्छी खबर है लेकिन सारा मामला हल हो गया है, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में फिलिस्तीनियों और इजराइली  पुलिस के बीच मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पत्थर बरसाए तो यहूदी पुलिसवालों ने हथगोले और अश्रुगैस के गोले बरसाए। यों तो फिलिस्तीनियों के अतिवादी संगठन हमास और इजराइल  के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा की है लेकिन असलियत यह है कि गाजा-क्षेत्र में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए हैं और दो हजार घायल हुए हैं। उनमें यहूदी सिर्फ 12 हैं। हमास ने 11 दिन में 4000 राकेट दागे हैं जबकि इस्राइल ने 1800 ! हमास के राकेटों को यदि लोह-स्तंभ नहीं रोकता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल  राकेटों ने सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, लगभग 17 हजार फिलिस्तीनी घर गिरा दिए और लगभग एक लाख लोगों को गाजा-क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया लेकिन हमास के लोग इस युद्ध-विराम को अपने विजय-दिवस के रुप में मना रहे हैं। वे ऐसा इसीलिए कर रहे हैं कि उन्होंने इजराइली ज्यादती के सामने घुटने नहीं टेके।  यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फलस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों——इस्राइल और फलस्तीन— का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फलस्तीनी इलाका इस्राइल के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फलस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इस्राइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इस्राइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरुरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। यदि इजराइल  के यहूदियों और पुलिस ने फिलिस्तीनियों को उनकी शेख जर्रा की बस्तियों से खदेड़ना शुरु किया और अल-अक्सा मस्जिद परिसर में कब्जा करने की कोशिश की, तो हमास ने राकेट बरसा दिए। अब दोनों पक्षों में युद्ध तो बंद हो गया है लेकिन उस क्षेत्र में दो राज्यों -इजराइल और फिलिस्तीन  का सपना आज भी अधर में लटका हुआ है। संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा दो राज्यों का प्रस्ताव अभी तक सिर्फ कागजों में सिमटा हुआ है। जो फिलस्तीनी इलाका इजराइल  के कब्जे के बाहर है, उसमें भी काफी टूट है। आधा हमास के पास है और आधा अल-फतेह के पास। एक तीसरा अतिवादी इस्लामी संगठन भी पिछले कुछ वर्षों में खम ठोकने लगा है। सारे अरब और मुस्लिम देश भी पूरे मन से फिलिस्तीनियों का साथ नहीं दे रहे हैं। जो कल तक इजराइल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए थे, वे अरब देश अब सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन भी कोरे प्रस्ताव पारित करके अपना मौखिक फर्ज पूरा कर देता है। यदि मिस्र और बाइडन का अमेरिका जी-तोड़ कोशिश नहीं करता तो वर्तमान मुठभेड़ 1967 के अरब-इजराइली युद्ध की भयंकर शक्ल भी ले सकती थी। अब जरूरी है कि भारत-जैसे राष्ट्र, जिनका दोनों पक्षों से अच्छा संबंध है, चुप न रहें, तटस्थ न दिखें, चिकनी-चुपड़ी बातें न करें बल्कि आगे आएं और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति-समाधान करवाएं। (हि. स.)    (लेखक देश के जाने माने पत्रकार हैं) 

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Dakhal News 22 May 2021


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रंजना मिश्रा    17 मई को इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर ने अपने कोविड प्रोटोकॉल में से प्लाज्मा थेरेपी को बाहर निकाल दिया है।  यह निर्णय उस रिसर्च के सामने आने के बाद लिया गया है, जिसमें कहा गया है कि प्लाज्मा थेरेपी से अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीजों की जिंदगी बचाई जा सके, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है।आईसीएमआर ने प्लाज्मा थेरेपी को हटाने के फैसले की जानकारी देते हुए बताया है कि सरकार ने पाया कि कोविड-19 मरीजों के उपचार में प्लाज्मा थेरेपी गंभीर बीमारी को दूर करने और मौत के मामलों को कम करने में फायदेमंद साबित नहीं हुई है। शुरुआत में देशभर में कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी को एक प्रायोगिक इलाज के तौर पर अनुमति मिली थी, हालांकि सरकार ने अक्टूबर 2020 में ही यह संकेत दिए थे कि कोरोना वायरस के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी ज्यादा कारगर साबित नहीं हो रही। अक्टूबर 2020 में आईसीएमआर ने एक रिसर्च का हवाला दिया था, जिसके अनुसार इस थेरेपी से मृत्यु दर में कोई कमी नहीं आती। आईसीएमआर के इस शोध में लगभग 10 पेज की रिपोर्ट तैयार की गई थी, जिसमें कोविड पर प्लाज्मा थेरेपी के असर के बारे में बताया गया है। इस रिसर्च के सामने आने के बाद तकरीबन 6 महीने बाद आईसीएमआर ने प्लाज्मा थेरेपी को कोरोना मैनेजमेंट की लिस्ट से हटा दिया है। प्लाज्मा खून में मौजूद एक लिक्विड कंपोनेंट होता है, यह पीले रंग का होता है। एक स्वस्थ शरीर में 55 फीसदी से ज्यादा प्लाज्मा होता है और इसमें पानी के अलावा हार्मोंस, प्रोटीन, कार्बन डाइऑक्साइड और ग्लूकोज मिनरल्स होते हैं। प्लाज्मा थेरेपी में कोरोना वायरस से ठीक हुए व्यक्ति से रक्त निकाला जाता है, फिर इस रक्त से प्लाज्मा नामक पीले रंग के तरल पदार्थ को अलग किया जाता है। कोरोना वायरस से पीड़ित मरीज को यही प्लाज्मा दिया जाता है। जब किसी व्यक्ति को इंफेक्शन होता है तो उसके शरीर में इंफेक्शन फैलाने वाले वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज बनने लगती हैं, ये एंटीबॉडीज उस इंफेक्शन से लड़ती हैं और शरीर को रोगमुक्त बनाती हैं। कोरोना वायरस से संक्रमित जो लोग ठीक हो रहे हैं ,उनके खून के एक जरूरी हिस्से प्लाज्मा में कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज बन जाती हैं। माना जाता है कि अगर कोरोना वायरस से ठीक हो चुके मरीज का ब्लड प्लाज्मा, बीमार मरीज को दिया जाए तो इससे ठीक हो चुके मरीज की एंटीबॉडीज बीमार मरीज के शरीर में ट्रांसफर हो जाती हैं। इस तरह  ये एंटीबॉडीज मरीज के शरीर में वायरस से लड़ना शुरू कर देती हैं और फिर मरीज ठीक होने लगता है‌। कई डॉक्टर्स का मानना है कि जब वायरस किसी शरीर में बुरी तरह से अटैक करता है और शरीर में एंटीबॉडीज नहीं बन पातीं, तो प्लाज्मा थेरेपी ऐसे समय में काम आ सकती है।  यही कारण है कि कोरोना के इलाज में ब्लड प्लाज्मा की काफी डिमांड रही है, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह असरदार साबित नहीं होती और यह भी देखा गया है कि यह मरीजों की जान नहीं बचा पाती। कोरोना के केवल 10 प्रतिशत मरीजों को ही यह प्लाज्मा थेरेपी दी जा सकती है, किंतु कई रिसर्च से पता चला है कि इन 10 प्रतिशत मामलों में भी यह थेरेपी कारगर साबित नहीं हुई। सबसे पहले 15 मई को यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड की रिकवरी नाम की एक स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल लांसेट में छपी।  इसके अनुसार कोरोना मरीजों के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी मददगार साबित नहीं होती है। यह कोविड मरीजों के इलाज को लेकर की गई अपनी तरह की सबसे बड़ी स्टडी है, इसने दुनिया भर में प्लाज्मा थेरेपी को लेकर चल रही बहस पर विराम लगा दिया है। भारत के 18 बड़े डॉक्टर्स, वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ प्रोफेशनल्स ने भारत सरकार के प्रिंसिपल साइंटिफिक एडवाइजर के. विजय राघवन  को एक पत्र लिखकर सिफारिश की थी कि प्लाज्मा थेरेपी से मरीजों के ठीक होने के सबूत नहीं मिलते, इसलिए इसे लेकर सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए। ब्रिटेन में इस विषय को लेकर 11 हजार लोगों पर एक परीक्षण किया गया, लेकिन इस परीक्षण में कोविड के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी की कोई खास भूमिका देखने को नहीं मिली। अर्जेंटीना में भी इस पर रिसर्च हुई और इसी प्रकार के नतीजे सामने आए।  वहां भी डॉक्टरों ने इस इलाज को कारगर नहीं पाया। भारत में मेडिकल रिसर्च करने वाली सरकारी संस्था आईसीएमआर ने भी पिछले साल इस पर एक रिसर्च की थी ,जिसमें यह बात सामने आई थी कि प्लाज्मा थेरेपी मृत्यु दर को कम करने और कोरोना के गंभीर मरीजों का इलाज करने में कोई खास कारगर नहीं है। हाल ही में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन ने प्लाज्मा थेरेपी के अतार्किक और अवैज्ञानिक इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए थे।  उनके हिसाब से किसी भी बड़ी रिसर्च में इसे जान बचाने वाली थेरेपी नहीं पाया गया। कोरोना की इस दूसरी खतरनाक लहर में संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों को प्लाज्मा डोनेट करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था, लेकिन प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के इलाज को लेकर डॉक्टरों के बीच एकराय कभी नहीं रही। अभी तक हुई किसी मेडिकल रिसर्च में भी इस इलाज का असर स्थापित नहीं हो सका है। ऐसे में अब ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से प्लाज्मा थेरेपी को बाहर करने का फैसला ले लिया गया है। अभी तक इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की गाइडलाइन यह कहती थी कि लक्षण दिखने के 7 दिनों के अंदर प्लाज्मा थेरेपी का ऑफ लेबल इस्तेमाल किया जा सकता है, किंतु कुछ दिनों पूर्व आईसीएमआर और कोविड-19 पर बनी नेशनल टास्क फोर्स की एक मीटिंग हुई, इसमें सभी सदस्यों ने प्लाज्मा थेरेपी को अप्रभावी बताते हुए इसे गाइडलाइन से हटाने की सिफारिश की है। डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने प्लाज्मा थेरेपी को लेकर आईसीएमआर और एम्स को लिखे गए अपने खत में यह आशंका जताई है कि इस थेरेपी से वायरस के नए स्ट्रेन्स पनप सकते हैं। बहुत कम इम्यूनिटी वाले लोगों को प्लाज्मा थेरेपी देने पर न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज कम बनती हैं और इससे नए वेरिएंट्स सामने आ सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लाज्मा थेरेपी के तर्कहीन इस्तेमाल से और अधिक संक्रामक स्ट्रेन्स डेवलप होने की आशंका बढ़ जाती है, अतः इस पर रोक लगानी आवश्यक है। (हि. स.)   लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Dakhal News 22 May 2021


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मोहन सिंह   पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले और नतीजे आने के बाद राज्य की राजनीति रोज नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।लगातार जारी राजनीतिक हिंसा, ममता सरकार और राज्यपाल जगदीप धनकड़ के बीच बढ़ते टकराव, नारदा स्टिंग ऑपरेशन में शामिल चार तृणमूल नेताओं की गिरफ्तारी की वजह से न सिर्फ पश्चिम बंगाल की सियासत एकबार फिर उबाल पर है, बल्कि नए सिरे से संवैधानिक संकट पैदा होने की संभावना भी बढ़ गयी है। संभावना इस बात की है कि पश्चिम बंगाल से निकली राजनीतिक आवाज की अनुगूँजें देश में विपक्षी राजनीति की दशा-दिशा तय करने की कोशिश में है।   एक ऐसे समय में, जब कोरोना महामारी का संकट लगातार बढ़ रहा है। वक्त की मांग और लोगों की लोगों की आपातकाल में जरूरतों के मद्देनजर, आदर्श स्थिति तो यह होती कि राजनीति को कुछ समय के लिए दरकिनार कर राज्य और केंद्र सरकार बेहतर तालमेल के साथ लोगों के आँसू पोछने का काम करती, पर हो रहा है वह सबकुछ जो राजनीति की काली कोठरी में सबके चेहरे पर कालिख पोत रहीं है। एक लोकतांत्रिक देश में संघात्मक ढांचे की धज्जियां उड़ाई जा रही है। राज्यपाल नामक संस्था सवालों के घेरे में खड़ी है। बढ़ती हिंसक घटनाओं की वजह से लोग दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में लोगों के जानमाल, इज्ज़त खतरे में है, पर राज्य की राजनीति पूरे शवाब पर है। इस कोरोना काल में केंद्र और राज्य के बीच एक-दूसरे के सहयोग के बजाय स्थिति रोज तनावपूर्ण स्थिति होती जा रही है। नारदा घोटाले का मामला पिछले पांच साल से राज्य की राजनीति को मथ रहा है। पर इसबार सवाल ऐसे समय सामने आया है जब देश विपत्ति काल से गुजर रहा है और राज्य की चुनी हुई सरकार राजनीतिक हिंसा पर काबू पाने में अक्षम साबित हो रही है। हालांकि सीबीआई जांच के दायरे में आये नेताओं की पूछताछ और छापों के दौरान ममता बनर्जी और केंद्रीय जांच एजेंसी के बीच टकराव कोई नयी बात नहीं है।   सवाल है कि क्या हिंसक राजनीति पश्चिम बंगाल का स्थायी चरित्र हो गया है? वाम मोरचा और ममता बनर्जी के शासनकाल में एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई, जहां विपक्ष के मनोबल को हर तरह तोड़ने की कोशिशें होती हैं, इस क़दर कि कोई सिर उठाने की जुर्रत न करे। इस प्रवृत्ति में बदलाव की कोशिश के बजाय इसे हवा देने में ममता बनर्जी ज्यादा माहिर हैं। इसलिए केंद्रीय सत्ता से निरंतर टकराव अपने मंत्रियों के किये धत्कर्मों के बचाव के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सीबीआई दफ्तर में छह घंटे तक अघोषित धरना देकर नई केंद्रीय सत्ता से टकराव की, जांच एजेंसियों के काम में अड़ंगेबाजी की नयी मिसाल पेश कर रही हैं। क्या ममता बनर्जी के लिए ऐसा करते हुए दिखना जरूरी है?    महात्मा गांधी की राय है कि प्रकृति का यह नियम है कि जो सत्ता जिस तरह से प्राप्त होती है, उसे वैसे ही टिकाए और बचाये रखा जा सकता है। किसी और प्रकार से नहीं। गाँधीजी की यह भी मान्यता रही है कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियां अहिंसा की ज्यादा बेहतर सिपाही हो सकती हैं। आत्मोसर्ग के साहस के लिए स्त्री हमेशा पुरुष से श्रेष्ट रही हैं। यह भी कि हृदयहीन साहस के लिए पुरुष हमेशा स्त्री से आगे रहा है। पिछले दस साल से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है। तीसरी बार पश्चिम बंगाल की सता की बागडोर उनके हाथों में है।पर आज ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीति का नया मॉडल पेश कर रहा है।   याद करें, आजादी के लगभग बीस साल बाद 1967 के दौर को। उसी बंगाल में जलपाईगुड़ी जिले के नक्सलबाड़ी नामक जगह से एक ओर उग्र वामपंथी आन्दोलन का जन्म हो रहा था। दूसरी ओर कलकत्ता में ही डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी गैर कांग्रेसवाद की रणनीति के तहत और न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर हिंदी भाषी कई राज्यों से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर रही थी। बिना किसी हिंसक राजनीति का सहारा लिये, अबतक सत्ता की राजनीति से वंचित सामाजिक समूहों को साधते हुए। उन समूहों को जिसकी दस्तक भारत में नब्बे के दशक की राजनीति से लेकर आजतक की राजनीति को गहरे में प्रभावित कर रही है। उस दौर में कांग्रेसी सरकारों से देशवासियों का मोहभंग होने लगा था। वह दौर देश में साझा सरकारों के बनने का दौर था। बंगाल में भी कांग्रेस में टूट हुई। अजय मुखर्जी के नेतृत्व में बांग्ला कांग्रेस ने सीपीएम नेता ज्योति बसु के साथ मिलकर सरकार बनायी। अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने और ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री।   कम्युनिस्ट पार्टी, जो सत्ता प्राप्ति के लिए हिंसक राजनीति को जायज मानती रही है, उससे अलग हुए समूह ने ही बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी इलाके से हिंसक राजनीति की शुरुआत की। इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे, चारु मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल। इस आन्दोलन को कलकत्ता प्रेसीडेंसी कालेज और खड़गपुर प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्रों का भरपूर सहयोग मिला। जमींदारों के खिलाफ विद्रोह से शुरू हुए आंदोलन ने हाशिये पर खड़े दलित, शोषित, वंचित समूहों को लामबंद किया। सत्ता और सामाजिक ताने बाने में बदलाव के जुनून के साथ शुरू इस आंदोलन की बुनियादी धारणा रही है कि सत्ता की ताकत बंदूक की नली से निकलती है। इन उसूलों में विश्वास करने वाला समूह सीधे सत्ता में तो काबिज नहीं हुआ। पर देश के कई पिछड़े इलाकों में खासकर आदिवासी इलाके में आज भी यह आंदोलन सत्ता के सामने हिंसक गतिविधियों के चलते खासा चुनौती पेश करता रहा है।   पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार के वक्त भी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटाचार्य की सरकार को ऐसी कई चुनौतियों से दो चार होना पड़ा था।खुद ममता बनर्जी वाममोर्चा शासनकाल में कई हिंसक हमलों का सामना कर चुकी हैं। पर लगता नहीं कि ममता बनर्जी और उनके तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस हिंसक राजनीति से कोई सबक सीखा है, बाजदफा तो यह लगता है कि हिंसक राजनीति का नया मॉडल, नये तेवर के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई दिशा देने की ओर उन्मुख है। भ्रष्टाचार के आरोप में आरोप में घिरे मंत्रियों के बचाव में राज्य की मुख्यमंत्री सीबीआई कार्यालय में पूरे लाव-लश्कर के साथ छह घंटे धरना प्रदर्शन कर यह जताने की कोशिश कर रही हैं कि इस लोकतंत्र का एक मतलब भीड़ की ताकत भी है। यह संदेश उस बंगाल से है जो दावा करता रहा है कि बाकी देश जिस बात को दस साल बाद सोचता है, बंगाल उसपर दस साल पहले सोच चुका होता है। इस प्रकट दावे के पीछे सच्चाई भी है कि बंगाल से ही देश में नवजागरण से लेकर देश की आजादी के आंदोलन को दिशा, दार्शनिक आधार और नेतृत्व मिलता आया है।   आज के पश्चिम बंगाल में जो राजनीतिक माहौल पैदा हुआ है, उसके पीछे उस मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है जो लोगों में क्रोध, भय और घृणा और अराजकता की स्थिति पैदा कर रहा है। इस हिंसक राजनीतिक संस्कृति के मनोविज्ञान को समझाते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण का कहना था कि सरकार को यह समझना चाहिए कि कुछ परस्थितियों में हिंसा लोगों के दिलों में ही भड़क उठती है।दूसरे तरह की हिंसा वह है, जो असमाजिक तत्वों के द्वारा की जाती है। तीसरे तरह की हिंसा इस वक्त पश्चिम बंगाल में उन सीमावर्ती इलाकों में ज्यादा हो रही हैं, जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं और जहां अल्पसंख्यकों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है।   दुनिया के दो महान साहित्यकारों गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और मुंशी प्रेमचंद ने क्रोध, भय, घृणा और साहस के मनोविज्ञान को समझाते हुए बखूबी इन पर रोशनी डाला है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का कथन है कि जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप से कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है। दूसरी ओर मुंशी प्रेमचंद का दावा है कि यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और घृणा ही है जो पाखंड और धूर्त्तता का दमन करती है। यह भी कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप साहस है। आत्मरक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी मनोवृत्तियां इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं।   अब इस मनोवैज्ञानिक के आलोक में आज के पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हालात को परखने की जरूरत है। एक ऐसे समाज में जहां राजनीतिक परिस्थितिवश विभिन्न समुदायों, जातीय समूहों के बीच घृणा का माहौल अपने चरम पर है। क्रूरता और दुःसाहस की पराकाष्ठा देखने को मिल रही है। राजनीतिक द्वेषवश बदले की भावना मानवीयता की सारी सीमाएं लांघ रही हैं। इन परिस्थितियों के मद्देनजर रामधारी सिंह दिनकर एक कविता याद आती है- सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है। सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, कांटों में राह बनाते हैं।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 18 May 2021


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मोहन सिंह   पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले और नतीजे आने के बाद राज्य की राजनीति रोज नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।लगातार जारी राजनीतिक हिंसा, ममता सरकार और राज्यपाल जगदीप धनकड़ के बीच बढ़ते टकराव, नारदा स्टिंग ऑपरेशन में शामिल चार तृणमूल नेताओं की गिरफ्तारी की वजह से न सिर्फ पश्चिम बंगाल की सियासत एकबार फिर उबाल पर है, बल्कि नए सिरे से संवैधानिक संकट पैदा होने की संभावना भी बढ़ गयी है। संभावना इस बात की है कि पश्चिम बंगाल से निकली राजनीतिक आवाज की अनुगूँजें देश में विपक्षी राजनीति की दशा-दिशा तय करने की कोशिश में है।   एक ऐसे समय में, जब कोरोना महामारी का संकट लगातार बढ़ रहा है। वक्त की मांग और लोगों की लोगों की आपातकाल में जरूरतों के मद्देनजर, आदर्श स्थिति तो यह होती कि राजनीति को कुछ समय के लिए दरकिनार कर राज्य और केंद्र सरकार बेहतर तालमेल के साथ लोगों के आँसू पोछने का काम करती, पर हो रहा है वह सबकुछ जो राजनीति की काली कोठरी में सबके चेहरे पर कालिख पोत रहीं है। एक लोकतांत्रिक देश में संघात्मक ढांचे की धज्जियां उड़ाई जा रही है। राज्यपाल नामक संस्था सवालों के घेरे में खड़ी है। बढ़ती हिंसक घटनाओं की वजह से लोग दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में लोगों के जानमाल, इज्ज़त खतरे में है, पर राज्य की राजनीति पूरे शवाब पर है। इस कोरोना काल में केंद्र और राज्य के बीच एक-दूसरे के सहयोग के बजाय स्थिति रोज तनावपूर्ण स्थिति होती जा रही है। नारदा घोटाले का मामला पिछले पांच साल से राज्य की राजनीति को मथ रहा है। पर इसबार सवाल ऐसे समय सामने आया है जब देश विपत्ति काल से गुजर रहा है और राज्य की चुनी हुई सरकार राजनीतिक हिंसा पर काबू पाने में अक्षम साबित हो रही है। हालांकि सीबीआई जांच के दायरे में आये नेताओं की पूछताछ और छापों के दौरान ममता बनर्जी और केंद्रीय जांच एजेंसी के बीच टकराव कोई नयी बात नहीं है।   सवाल है कि क्या हिंसक राजनीति पश्चिम बंगाल का स्थायी चरित्र हो गया है? वाम मोरचा और ममता बनर्जी के शासनकाल में एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई, जहां विपक्ष के मनोबल को हर तरह तोड़ने की कोशिशें होती हैं, इस क़दर कि कोई सिर उठाने की जुर्रत न करे। इस प्रवृत्ति में बदलाव की कोशिश के बजाय इसे हवा देने में ममता बनर्जी ज्यादा माहिर हैं। इसलिए केंद्रीय सत्ता से निरंतर टकराव अपने मंत्रियों के किये धत्कर्मों के बचाव के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सीबीआई दफ्तर में छह घंटे तक अघोषित धरना देकर नई केंद्रीय सत्ता से टकराव की, जांच एजेंसियों के काम में अड़ंगेबाजी की नयी मिसाल पेश कर रही हैं। क्या ममता बनर्जी के लिए ऐसा करते हुए दिखना जरूरी है?    महात्मा गांधी की राय है कि प्रकृति का यह नियम है कि जो सत्ता जिस तरह से प्राप्त होती है, उसे वैसे ही टिकाए और बचाये रखा जा सकता है। किसी और प्रकार से नहीं। गाँधीजी की यह भी मान्यता रही है कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियां अहिंसा की ज्यादा बेहतर सिपाही हो सकती हैं। आत्मोसर्ग के साहस के लिए स्त्री हमेशा पुरुष से श्रेष्ट रही हैं। यह भी कि हृदयहीन साहस के लिए पुरुष हमेशा स्त्री से आगे रहा है। पिछले दस साल से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है। तीसरी बार पश्चिम बंगाल की सता की बागडोर उनके हाथों में है।पर आज ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीति का नया मॉडल पेश कर रहा है।   याद करें, आजादी के लगभग बीस साल बाद 1967 के दौर को। उसी बंगाल में जलपाईगुड़ी जिले के नक्सलबाड़ी नामक जगह से एक ओर उग्र वामपंथी आन्दोलन का जन्म हो रहा था। दूसरी ओर कलकत्ता में ही डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी गैर कांग्रेसवाद की रणनीति के तहत और न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर हिंदी भाषी कई राज्यों से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर रही थी। बिना किसी हिंसक राजनीति का सहारा लिये, अबतक सत्ता की राजनीति से वंचित सामाजिक समूहों को साधते हुए। उन समूहों को जिसकी दस्तक भारत में नब्बे के दशक की राजनीति से लेकर आजतक की राजनीति को गहरे में प्रभावित कर रही है। उस दौर में कांग्रेसी सरकारों से देशवासियों का मोहभंग होने लगा था। वह दौर देश में साझा सरकारों के बनने का दौर था। बंगाल में भी कांग्रेस में टूट हुई। अजय मुखर्जी के नेतृत्व में बांग्ला कांग्रेस ने सीपीएम नेता ज्योति बसु के साथ मिलकर सरकार बनायी। अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने और ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री।   कम्युनिस्ट पार्टी, जो सत्ता प्राप्ति के लिए हिंसक राजनीति को जायज मानती रही है, उससे अलग हुए समूह ने ही बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी इलाके से हिंसक राजनीति की शुरुआत की। इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे, चारु मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल। इस आन्दोलन को कलकत्ता प्रेसीडेंसी कालेज और खड़गपुर प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्रों का भरपूर सहयोग मिला। जमींदारों के खिलाफ विद्रोह से शुरू हुए आंदोलन ने हाशिये पर खड़े दलित, शोषित, वंचित समूहों को लामबंद किया। सत्ता और सामाजिक ताने बाने में बदलाव के जुनून के साथ शुरू इस आंदोलन की बुनियादी धारणा रही है कि सत्ता की ताकत बंदूक की नली से निकलती है। इन उसूलों में विश्वास करने वाला समूह सीधे सत्ता में तो काबिज नहीं हुआ। पर देश के कई पिछड़े इलाकों में खासकर आदिवासी इलाके में आज भी यह आंदोलन सत्ता के सामने हिंसक गतिविधियों के चलते खासा चुनौती पेश करता रहा है।   पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार के वक्त भी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटाचार्य की सरकार को ऐसी कई चुनौतियों से दो चार होना पड़ा था।खुद ममता बनर्जी वाममोर्चा शासनकाल में कई हिंसक हमलों का सामना कर चुकी हैं। पर लगता नहीं कि ममता बनर्जी और उनके तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस हिंसक राजनीति से कोई सबक सीखा है, बाजदफा तो यह लगता है कि हिंसक राजनीति का नया मॉडल, नये तेवर के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई दिशा देने की ओर उन्मुख है। भ्रष्टाचार के आरोप में आरोप में घिरे मंत्रियों के बचाव में राज्य की मुख्यमंत्री सीबीआई कार्यालय में पूरे लाव-लश्कर के साथ छह घंटे धरना प्रदर्शन कर यह जताने की कोशिश कर रही हैं कि इस लोकतंत्र का एक मतलब भीड़ की ताकत भी है। यह संदेश उस बंगाल से है जो दावा करता रहा है कि बाकी देश जिस बात को दस साल बाद सोचता है, बंगाल उसपर दस साल पहले सोच चुका होता है। इस प्रकट दावे के पीछे सच्चाई भी है कि बंगाल से ही देश में नवजागरण से लेकर देश की आजादी के आंदोलन को दिशा, दार्शनिक आधार और नेतृत्व मिलता आया है।   आज के पश्चिम बंगाल में जो राजनीतिक माहौल पैदा हुआ है, उसके पीछे उस मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है जो लोगों में क्रोध, भय और घृणा और अराजकता की स्थिति पैदा कर रहा है। इस हिंसक राजनीतिक संस्कृति के मनोविज्ञान को समझाते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण का कहना था कि सरकार को यह समझना चाहिए कि कुछ परस्थितियों में हिंसा लोगों के दिलों में ही भड़क उठती है।दूसरे तरह की हिंसा वह है, जो असमाजिक तत्वों के द्वारा की जाती है। तीसरे तरह की हिंसा इस वक्त पश्चिम बंगाल में उन सीमावर्ती इलाकों में ज्यादा हो रही हैं, जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं और जहां अल्पसंख्यकों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है।   दुनिया के दो महान साहित्यकारों गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और मुंशी प्रेमचंद ने क्रोध, भय, घृणा और साहस के मनोविज्ञान को समझाते हुए बखूबी इन पर रोशनी डाला है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का कथन है कि जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप से कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है। दूसरी ओर मुंशी प्रेमचंद का दावा है कि यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और घृणा ही है जो पाखंड और धूर्त्तता का दमन करती है। यह भी कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप साहस है। आत्मरक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी मनोवृत्तियां इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं।   अब इस मनोवैज्ञानिक के आलोक में आज के पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हालात को परखने की जरूरत है। एक ऐसे समाज में जहां राजनीतिक परिस्थितिवश विभिन्न समुदायों, जातीय समूहों के बीच घृणा का माहौल अपने चरम पर है। क्रूरता और दुःसाहस की पराकाष्ठा देखने को मिल रही है। राजनीतिक द्वेषवश बदले की भावना मानवीयता की सारी सीमाएं लांघ रही हैं। इन परिस्थितियों के मद्देनजर रामधारी सिंह दिनकर एक कविता याद आती है- सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है। सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, कांटों में राह बनाते हैं।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

Dakhal News

Dakhal News 18 May 2021


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मोहन सिंह   पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले और नतीजे आने के बाद राज्य की राजनीति रोज नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।लगातार जारी राजनीतिक हिंसा, ममता सरकार और राज्यपाल जगदीप धनकड़ के बीच बढ़ते टकराव, नारदा स्टिंग ऑपरेशन में शामिल चार तृणमूल नेताओं की गिरफ्तारी की वजह से न सिर्फ पश्चिम बंगाल की सियासत एकबार फिर उबाल पर है, बल्कि नए सिरे से संवैधानिक संकट पैदा होने की संभावना भी बढ़ गयी है। संभावना इस बात की है कि पश्चिम बंगाल से निकली राजनीतिक आवाज की अनुगूँजें देश में विपक्षी राजनीति की दशा-दिशा तय करने की कोशिश में है।   एक ऐसे समय में, जब कोरोना महामारी का संकट लगातार बढ़ रहा है। वक्त की मांग और लोगों की लोगों की आपातकाल में जरूरतों के मद्देनजर, आदर्श स्थिति तो यह होती कि राजनीति को कुछ समय के लिए दरकिनार कर राज्य और केंद्र सरकार बेहतर तालमेल के साथ लोगों के आँसू पोछने का काम करती, पर हो रहा है वह सबकुछ जो राजनीति की काली कोठरी में सबके चेहरे पर कालिख पोत रहीं है। एक लोकतांत्रिक देश में संघात्मक ढांचे की धज्जियां उड़ाई जा रही है। राज्यपाल नामक संस्था सवालों के घेरे में खड़ी है। बढ़ती हिंसक घटनाओं की वजह से लोग दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में लोगों के जानमाल, इज्ज़त खतरे में है, पर राज्य की राजनीति पूरे शवाब पर है। इस कोर