दखल क्यों


bhopal,Why don,you remember, Bismil, Ashfaq and Rajendra Nath

बेगूसराय, 04 दिसम्बर (हि.स.)। दिसम्बर आते ही लोग सब कुछ भूलकर नव वर्ष की पूर्व संध्या और प्रथम प्रभात के स्वागत में लग जाते हैं। इस भागदौड़ में किसी को भी याद नहीं है की दिसम्बर माह के महीने में उन्हें भी याद करना है, जिनके लिए मेले लगाने की बात देशभक्ति गानों में कही गई है। आज के कुछ देशवासी यह जानते भी नहीं है कि सच्चे हिंदुस्तानी वह थे जिन्होंने भारत मां को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। स्वतंत्र भारत की रक्षा के लिए कभी पाकिस्तान, कभी चीन और फिर पहाडों की बर्फीली चोटियों पर जान हथेली पर रख दुश्मन से लोहा लेते हुए विजय प्राप्त किया। उन्होंने अपनी जवानियां देश के लिए अर्पित कर दी।  क्या सभी देशवासी जानते हैं कि दिसम्बर में ही काकोरी कांड के शहीद अशफाक उल्ला ने फांसी का फंदा गले में डालने से पहले कहा था 'हिंदुस्तान की जमीन में पैदा हुआ हूं। हिंदुस्तानी मेरा घर, धर्म और ईमान है। हिंदुस्तान के लिए मर मिटूंगा और इसकी मिट्टी में मिलकर फख्र महसूस करूंगा।' शहीद मदनलाल ढींगरा ने लंदन के जेल में फांसी दिए जाने से पहले कहा था 'भारत मां की सेवा मेरे लिए श्री राम और कृष्ण की पूजा है।' आजादी के दीवानों के लिए भारत में थी और अब भी है। लेकिन स्वतंत्र भारत के कुछ तथाकथित उच्च शिक्षित एवं सत्ता वालों ने इसकी संस्कृति को विस्मृत कर दिया।    महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस के नेतृत्व में मां भारती के वीर पुत्रों ने अपने संकल्प बल से 23 दिसम्बर 1912 को दिनदहाड़े दिल्ली के दिल चांदनी चौक पर एक धमाका कर अंग्रेजी शासकों का स्वागत किया था। कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाकर अंग्रेजी शासक अपनी सत्ता का सिक्का जमाना चाहते थे तो इस धमाके से हड़कंप मच गया और सत्ता के मद में चूर लॉर्ड हार्डिंग घायल हो गया। जिसमें बाल मुकुंद, अवध बिहारी, अमीरचंद और बसंत कुमार आदि पकड़े गए। अदालतों में न्याय का नाटक हुआ और सभी क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर लटका दिए गए।    वह शहीद हो गए, किंतु शहीदों की चिताओं पर मेले लगाने का संकल्प करने वाले शहीदों को भी भूल गए। मेला लगना तो दूर लोग भूल चुके हैं कि चांदनी चौक पर इसी दिसम्बर के महीने में किसी ने जीवन देकर अंग्रेजों का दिल दहला लाया था। काकोरी कांड को लेकर इसी दिसम्बर के महीने में राम प्रसाद बिस्मिल के साथ राजेंद्र नाथ लाहिरी, अशफाक और रोशन आदि क्रांतिकारी युवा पकड़े गए थे। वचन के धनी राम प्रसाद बिस्मिल ने जो कहा वह कर दिखाया और 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया। काकोरी कांड के दूसरे क्रांतिकारी वीर अशफाक उल्ला को भी जीवन के 27 वें वर्ष में 19 दिसम्बर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया।    फांसी पर लटकाए जाने से पहले अशफाक ने कहा था 'यह तो मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे वतन का आलातरीन इनाम मिला है, मुझे फख्र है, पहला मुसलमान होऊंगा जो भारत की आजादी के लिए फांसी पा रहा हूं। बंगाल के राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को भी काकोरी में रामप्रसाद बिस्मिल के साथ रहने के कारण 17 दिसम्बर 1927 को भी फांसी के फंदे पर झूलना पड़ा था। भारत के बेटे फांसी के फंदे पर झूल कर अमर हो गए। तीन दिन में मां भारती के तीन बेटे फांसी पर लटका दिए गए।    दिसम्बर के शहीदों की कड़ी में स्वामी श्रद्धानंद का नाम भी अविस्मरणीय है। मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानंद बने इस महापुरुष ने अंग्रेजी साम्राज्य और अंग्रेजी व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन चलाया। गुरुकुल शिक्षा पद्धति इन्हीं की देन है और कई सामाजिक धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध भी इन्होंने सफल आंदोलन चलाया। इसी कारण कुछ कट्टरवादी विचारधारा वाले लोगों ने 23 दिसम्बर 1926 को गोलियों से भून डाला। ऐसे अनेक महापुरुष है जो राष्ट्र और समाज हित के लिए जीवन अर्पण कर गए।    फिर भी करोड़ों देशवासी और नेता दिसम्बर में शहीदों को भूल गए। केवल नया बरसे उन्हें याद है मौज मस्ती करने के लिए। कटु सत्य तो यह कि नई पीढ़ी इन बलिदानों से परिचित ही नहीं हो सकी और इसके लिए दोषी हैं हमारे देश के नेता, तथाकथित कर्णधार, धर्मगुरु, शिक्षा व्यवस्था और टीवी चैनलों के नीति निर्धारक। जो कि नववर्ष के स्वागत के कार्यक्रमों का आनंद की चिंतापूर्ण तैयारी में बेचैन और परेशान हैं। इसलिए दिसम्बर में याद करें उन शहीदों की शहादत को, हमारा कुछ कर्तव्य है राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होने वाले दीवानों और परिंदों के लिए।

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Dakhal News 4 December 2020


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वाल्ट डिज्नी के जन्मदिवस (5 दिसम्बर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल 5 दिसम्बर 1901 को जन्मे वाल्टर एलियास वाल्ट डिज्नी द्वारा मूल रूप से अमेरिका के कैलिफोर्निया के एनाहिम स्थित 'डिज्नीलैंड' एक ऐसा मनोरंजन और थीम पार्क है, जहां दुनियाभर से आनेवाले बच्चों के साथ-साथ बड़े भी मस्ती करते हैं। यह ऐसी जगह है, जहां कल्पनाओं से भरी अनूठी दुनिया हर किसी को आनंदित करती है। वाल्ट डिज्नी द्वारा बनवाए गए डिज्नीलैंड में प्रतिवर्ष करीब एक करोड़ साठ लाख पर्यटक पहुंचते हैं, जहां अभीतक 50 करोड़ से भी ज्यादा पर्यटक पहुंच चुके हैं। इन पर्यटकों में कई देशों के राष्ट्रपति, राष्ट्राध्यक्ष तथा अनेक शाही लोग भी शामिल हैं। डिज्नीलैंड का नाम इसके संस्थापक वाल्ट डिज्नी के नाम पर रखा गया। वाल्ट डिज्नी एक ऐसे थीम पार्क का निर्माण चाहते थे जहां माता-पिता और बच्चे, एकसाथ आनंद ले सकें। डिज्नीलैंड के रूप में उन्होंने अपने इसी विचार को मूर्त रूप दिया। वर्ष 1940 के आसपास की बात है, जब एकबार रविवार के दिन वाल्ट डिज्नी अपनी दोनों बेटियों डियान और भोरॉन के साथ ग्रिफिश पार्क में घूमने गए। हालांकि वहां दूसरे बच्चे मस्ती कर रहे थे लेकिन उनकी बेटियों को वह पार्क इतना अच्छा नहीं लगा। तब वाल्ट डिज्नी के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसी जगह विकसित की जाए, जहां बच्चों के साथ-साथ बड़े भी भरपूर मस्ती कर सकें। उसी के बाद वाल्ट डिज्नी थ्रिलर और मस्ती से भरी ऐसी ही दुनिया के निर्माण में जुट गए। कहा जाता है कि वाल्ट डिज्नी 'डिज्नीलैंड' की स्थापना करने के मुकाम तक पहुंचने में करीब तीन सौ बार असफल हुए किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। काफी लंबे प्रयासों तथा अथक परिश्रम के बाद 'डिज्नीलैंड' के रूप में उनका सपना साकार हुआ, जो आज दुनियाभर में हर किसी के आकर्षण का केन्द्र है। असफलताओं से जूझते-जूझते सफलता के इतने बड़े मुकाम तक पहुंचने की उनकी यह कहानी, ऐसे लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा है, जो एक-दो बार की असफलता से ही हार मानकर जीवन से निराश हो जाते हैं। वाल्ट डिज्नी जब 19 साल के थे, तब उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक कमर्शियल आर्टिस्ट कम्पनी की नींव रखी। उस समय वे कई अखबारों और प्रकाशकों के लिए कार्टून बनाया करते थे। 16 अक्तूबर 1923 को उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर 'डिज्नी ब्रदर्स कार्टून स्टूडियो' की नींव रखी। बहुत थोड़े समय में डिज्नी के कार्टून्स की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग चिट्ठियां लिख-लिखकर उनके स्टूडियो में आने की इच्छा जताने लगे। उनका स्टूडियो छोटा था इसलिए उन्होंने ऐसा थीम पार्क बनाने के अपने आइडिया को मूर्त रूप देने का निश्चय किया, जहां लोग दिनभर परिवार के साथ खूब मस्ती कर सकें। हालांकि पहले इस पार्क को स्टूडियो के पास ही तीन एकड़ जगह पर बनाए जाने पर विचार हुआ किन्तु बाद में इसे एनाहिम में 65 एकड़ के विशाल क्षेत्र में बनाया गया। डिज्नीलैंड की स्थापना के बाद वाल्ट डिज्नी दुनियाभर के मनोरंजन पार्कों में घूम-घूमकर देखते रहे कि वहां लोगों की दिलचस्पी किन-किन चीजों में है, उसी के आधार पर डिज्नीलैंड में भी वे उन सभी चीजों का समावेश करते रहे, जो लोगों को ज्यादा आकर्षित करती थी। 'वाल्ट डिज्नी पार्क्स' के स्वामित्व वाले डिज्नीलैंड की स्थापना 17 जुलाई 1955 को हुई थी। उस दिन सजीव टेलीविजन प्रसारण के साथ डिज्नीलैंड का पूर्वावलोकन किया गया था, जिसे आर्ट लिंकलेटर और रोनाल्ड रीगन द्वारा आयोजित किया गया था। उसके अगले दिन 18 जुलाई 1955 को डिज्नीलैंड को आम लोगों के लिए खोल दिया गया, जहां एक डॉलर मूल्य का इसका सबसे पहला टिकट इसके संस्थापक वाल्ट डिज्नी के भाई ने खरीदा था। आजकल यहां के एकदिन के टिकट की कीमत सौ डॉलर से भी ज्यादा है। 17 जुलाई को ओपनिंग के दिन हालांकि वाल्ट डिज्नी ने ओपनिंग सेरेमनी में कुछ खास मेहमानों के अलावा कुछ पत्रकारों को ही आमंत्रित किया था किन्तु इस समारोह में करीब 28 हजार लोग पहुंचे गए। इनमें से आधे से भी ज्यादा ऐसे लोग थे, जिन्हें कोई आमंत्रण नहीं दिया गया था। डिज्नीलैंड के उस समारोह का सीधा प्रसारण किया गया था। लोगों की अचानक उमड़ी भीड़ के चलते चारों तरफ अव्यवस्था का आलम बन गया था। पीने के पानी की कमी हो गई थी, बेहद गर्मी के चलते कुछ ही समय पहले वहां कुछ जगहों पर जमीन पर डाला गया तारकोल पिघलने से महिलाओं की सैंडिलें उसपर चिपक रही थी। जो कोल्ड ड्रिंक कम्पनी डिज्नीलैंड की उस ओपनिंग सेरेमनी को स्पांसर कर रही थी, उसने पानी की कमी होने पर नलों से पानी आना बंद होने पर नलों के पास ही कोल्ड ड्रिंक बेचना शुरू कर दिया था, जिससे लोगों में खासी नाराजगी भी उत्पन्न हो गई थी। यही वजह रही कि डिज्नीलैंड के 'ओपनिंग डे' को 'ब्लैक संडे' के नाम से भी जाना जाता है। 'वाल्ट डिज्नी पार्क्स' द्वारा 'डिज्नीलैंड' के अलावा 'डिज्नीलैंड रिसोर्ट कॉम्प्लेक्स' का भी संचालन किया जाता है। डिज्नीलैंड को इस रिसोर्ट कॉम्पलैक्स से भिन्नता प्रदान करने के लिए 1998 में डिज्नीलैंड को 'डिज्नीलैंड पार्क' नाम दिया गया। डिज्नीलैंड की सबसे खास बात यह है कि यहां के हर हिस्से में काम करने वाले कर्मचारी सदैव चेहरे पर मुस्कराहट के साथ नजर आएंगे किन्तु यहां की एक जगह ऐसी है, जहां कर्मचारियों को मुस्कुराने की इजाजत नहीं है। यह जगह है डिज्नीलैंड का 'हांटेड हाउस', जिसके बारे में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसमें वास्तव में 'भूत' भी हो सकते हैं। कुछ समय पहले तक इस 'हांटेड हाउस' में पर्यटक सेल्फी स्टिक के साथ सेल्फी के लिए आते थे किन्तु अब इसमें सेल्फी स्टिक लेकर जाने पर पाबंदी लगा दी गई। वैसे तो पूरा डिज्नीलैंड कल्पनाओं, रहस्य और रोमांच से भरा है, फिर भी मिकी माउस, मिनी माउस, प्रिंसेस टियाना, टिंकर बेल, गूफी, पूह जैसे डिज्नी कार्टून कैरेक्टर्स के साथ अलग-अलग थीम पर बने डिज्नीलैंड में पेड़ पर टारजन का घर, इंडियाना जोंस, टेंपल ऑफ द फॉरबिडेन आई, पायरेट्स ऑफ द कैरेबियन, माउंटेड मेंसन, पैसेंजर ट्रेन, रोमांच से भरी जंगल लाइफ, फेरिस व्हील, स्काई राइड इत्यादि हर समय आकर्षण का मुख्य केन्द्र बने रहते हैं। बच्चे टीवी पर जिस मिकी माउस और मिनी माउस को देखकर खुश होते हैं, वे उन्हें यहां जगह-जगह घूमते-फिरते, बातें करते और डांस करते नजर आएंगे। इस खूबसूरत मनोरंजन पार्क में 'मिकी टूनटाउन' में बच्चों के इन पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर्स का घर बनाया गया है। हालांकि 1971 में फ्लोरिडा के ऑरलैंडो में डिज्नी वर्ल्ड, 1983 में टोक्यो में डिज्नीलैंड, 1992 में पेरिस में यूरो डिज्नीलैंड तथा 2005 में हांगकांग डिज्नीलैंड की भी स्थापना हुई है किन्तु अमेरिका के कैलिफोर्निया के एनाहिम में स्थित 'डिज्नीलैंड' सबसे पुराना और सबसे विस्तृत डिज्नीलैंड है। इसका कुल क्षेत्रफल 73.5 हेक्टेयर है, जिसमें से 30 हेक्टेयर में थीम पार्क है। बताया जाता है कि यह इतना विशाल मनोरंजन पार्क है कि इसके संचालन और देखभाल के लिए यहां 65 हजार से भी ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं। 2017 में मनोरंजन के उद्देश्य से यहां करीब 1.83 करोड़ पर्यटक आए थे। दुनियाभर के किसी भी अन्य मनोरंजन पार्क में एक साल में इतने ज्यादा पर्यटक कभी नहीं पहुंचे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 December 2020


bhopal,Get natural beauty with flowers

शहनाज हुसैन फूलों की पंखुड़ियां महिलाओं की सुन्दरता में चार चांद लगाती रही हैं। भारत में सदियों से फूलों की पंखड़ियों से हर्बल सौंदर्य उत्पाद बनाये जाते रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सौंदर्य प्रसाधन बाजार में उतरने से पहले महिलायें सौंदर्य निखारने के लिए फूलों को उपयोग में लाती रही हैं। फूलों को पूजा, जन्मदिवस, विवाह, पार्टियों तथा विभिन आयोजनों में सजावट के लिए प्रयोग किया जाता है। रासायनिक सौन्दर्य प्रसाधनों के बाजार में आने से पहले फूल महिलाओं की त्वचा तथा बालों के सौन्दर्य को निखारने में प्रयोग किये जाते रहे हैं। इन्हीं फूलों को अगर आप सौन्दर्य निखारने में भी प्रयोग में लाती हैं तो आप बिना किसी सौन्दर्य प्रसाधन के दमकती त्वचा तथा चमकीले बाल प्राप्त कर सकती हैं। आज भले ही फूलों के सौंदर्य उत्पाद आकर्षक पैक में महंगे दामों पर बाजार में उपलब्ध हैं लेकिन इन उत्पादों की शेल्फ लाइफ को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिए जिन रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है वह फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा करते हैं। ऐसे में अगर आप थोड़ा समय निकल कर घर में फूलों के सत से हर्बल उत्पाद तैयार कर सौंदर्य निखारने का प्रयोग करें तो इससे जहाँ पैसे की बचत होगी वहीं आपकी आभा में चार चाँद लगेंगे। गुलाब, लेवेन्डर, जैसमिन, गुड़हर आदि फूलों का उपयोग करके आप प्राकृतिक सौन्दर्य प्राप्त कर सकती हैं। फूलों से वातावरण में वनस्पतिक उर्जा मिलती है। फूलों की सुगन्ध तथा रंगों से न केवल हमारी इन्द्रियां आनन्दित महसूस होती हैं बल्कि फूलों में ताकतवर गुणकारी तत्व भी विद्यमान होते हैं। अनेक फूलों की प्रजातियों की सुगन्ध से ही मानसिक शांति प्राप्त हो जाती है। प्राचीनकाल में गुलाब, चमेली, लवेन्डर तथा नारंगी फूलों से मानसिक विकारों से ग्रस्त रोगियों का इलाज किया जाता था। आधुनिक सौन्दर्य देखभाल में सुन्दरता ग्रहण करने के लिए मानसिक तनाव से मुक्ति को परम आवश्यक माना गया है। सौन्दर्य से जुड़ी अनेक समस्यायें जैसे बालों का गिरना, गंजापन, कील-मुहांसे आदि मानसिक तनाव की देन माने जाते हैं। फूलों की सुगन्ध से तनाव से मुक्ति के साथ शरीर में शांतिदायक तथा ताजगी के पलों का एहसास मिलता है। ब्यूटी सैलूनों में सौन्दर्य उपचार के लिए सौन्दर्य उत्पादों में फूलों के सत्त तथा सुगन्धित तेल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। तिल, नारियल, जैतून तथा बादाम आदि का प्रेसड ऑयल सुगन्धित तेल से बिल्कुल भिन्न है। सुगन्धित तेल प्राकृतिक रूप में काफी जटिल होते हैं तथा सुगन्धित तेल पौधों के सुगन्धित हिस्से से संघटित होते हैं। यह पौधे की प्राण शक्ति माने जाते हैं। सुगन्धित तेलों को औषधीय तेलों के साथ-साथ सुगन्ध के लिए जाना जाता है। गुलाब, चन्दन, मोंगरा, चमेली, लवेन्डर आदि फूलों की महक सुगन्धित तेलों की वजह से होती है तथा इन फूलों के सुगन्धित तेलों को सौन्दर्य निखारने में बखूबी प्रयोग किया जाता है। हमें यह सचेत रहने की जरूरत है कि सुगन्धित तेलों को दूसरे बादाम, तिल, जैतून तथा गुलाब जल लोशन से मिश्रित करके ही उपयोग में लाना चाहिए तथा सुगन्धित तेलों को विशुद्ध रूप से कभी उपयोग में नहीं लाना चाहिए। फूलों से घरेलू सौन्दर्य गुलाबजल को त्वचा का बेहतरीन टोनर माना जाता है। थोड़े से गुलाबजल को एक कटोरी में ठंडा करें। काॅटनवूल की मदद से ठंडे गुलाब जल से त्वचा को साफ करें तथा त्वचा को हल्के-हल्के थपथपायें। इससे त्वचा में यौवनता तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाये रखने में मदद मिलती है। यह गर्मियों तथा बरसात ऋतु में काफी उपयोगी साबित होता है। तैलीय त्वचा के लिएः एक चम्मच गुलाबजल में दो-तीन चम्मच नींबू का रस मिलायें तथा इस मिश्रण में काॅटनवूल पैड डुबोकर इससे चहरे को साफ करें। इससे चेहरे पर जमा मैल, गन्दगी, पसीने की बदबू को हटाने में मदद मिलेगी। ठंडा सत्त तैयार करने के किए जपा पुष्प के फूल तथा पत्तियों को एक तथा छह के अनुपात में रात्रिभर ठण्डे पानी में रहने दें। फूलों को निचोड़कर प्रयोग करने से पहले पानी को बहा दें। इस सत्त को बालों तथा सिर को धोने के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। इस सत्त या फूलों के जूस में मेहंदी मिलाकर बालों पर लगाने से बालों को भरपूर पोषण मिलता है तथा यह बालों की कंडीशनिंग उपचार के लिए प्रयोग में लाया जाता है। गेंदे या केलैन्डयुला के ताजा या सूखे पत्तों का भी प्राकृतिक सौन्दर्य में उपयोग किया जा सकता है। चार चम्मच फूलों को उबलते पानी में डालिये लेकिन इसे उबालें नहीं। फूलों को 20 या 30 मिनट तक गर्म पानी में रहने दीजिए। इस मिश्रण को ठंडा होने के बाद पानी को निकाल दें तथा मिश्रण को बालों के संपूर्ण रोगों के उपचार के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। ठंडे पानी से चेहरे को धोने से चेहरे में प्राकृतिक निखार आ जायेगा। इस मिश्रण से तैलीय तथा कील-मुहांसों से प्रभावित त्वचा को अत्यधिक फायदा मिलता है। (लेखिका अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सौन्दर्य विशेषज्ञा हैं।)

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Dakhal News 3 December 2020


bhopal,Film City in U.P.

सियाराम पांडेय 'शांत' मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में विश्वस्तरीय फिल्म सिटी बनाने की घोषणा क्या की, महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे उसी दिन से प्रलाप की मुद्रा में आ गए। अब जब योगी आदित्यनाथ मुंबई में हैं और वहां के एक होटल में उन्होंने कई फिल्मी हस्तियों से बात की है और उन्हें अपनी परियोजना से अवगत कराया है, तब उद्धव ठाकरे के राजनीतिक प्रलाप में और तेजी आ गई है। मराठी मानुष की बात करने वाली शिवसेना और मनसे को लग रहा है कि फिल्म सिटी यूपी गई तो महाराष्ट्र में कुछ नहीं बचेगा। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुंबई पहुंचते मनसे ने वहां के चौक-चौराहों पर मराठी भाषा में पोस्टर टंगवा दिए। पोस्टर में लिखा है कि 'दादासाहेब फाल्के द्वारा बनाई गई फिल्म सिटी को यूपी ले जाने के मुंगेरी लाल के सपने हैं। कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। कहां महाराष्ट्र का वैभव और कहां यूपी की दरिद्रता। नाकाम राज्य की बेरोजगारी छुपाने के लिए मुंबई के उद्योग को यूपी ले जाने आया है ठग। भले ही प्रत्यक्ष तौर पर योगी आदित्यनाथ का जिक्र नहीं है लेकिन उनके लिए ठग जैसा संबोधन न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायोचित। जब शिवसेना और मनसे को पता है कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बीच कोई समानता नहीं है तो फिर उसके नेता बौखलाए से क्यों हैं? इस बात का जवाब तो खैर उन्हें ही देना चाहिए। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री अशोक चव्हाण ने कहा है कि भाजपा बॉलिवुड का एक टुकड़ा इस उत्तरी राज्य में ले जाने का षड्यंत्र रच रही है। शिवसेना के बड़बोले सांसद संजय राउत को लगता है कि मुम्बई की 'फिल्म सिटी' को कहीं और स्थापित करना आसान नहीं है। उसे लखनऊ या पटना में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। मुंबई का शानदार फिल्मी इतिहास रहा है। अब उन्हें कौन बताए कि मुंबई को फिल्मिस्तान बनाने में अकेले मुंबईकरों का हाथ नहीं है। देशभर के कलाकारों की भावनाएं, संवेदनाएं और श्रम उससे जुड़े हैं। बालीवुड को बॉलीवुड बनाने में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल की भी अहम भूमिका रही है। फिर कला किसी क्षेत्र विशेष का एकाधिकार नहीं। मराठी मानुष के नाम पर महाराष्ट्र में कब-कब क्या-क्या हुआ है, परप्रांतियों के साथ कितनी ज्यादतियां हुई, यह किसी से छिपा नहीं है। अपने जिस स्वनामधन्य पिता के कसीदे उद्धव ठाकरे गढ़ रहे हैं, उन्होंने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ लुंगी उठाओ, पुंगी बजाओ अभियान छेड़ा। उनकी नजर में राष्ट्रीयता नहीं, क्षेत्रीयता अहम थी। यूपी-बिहार के लोगों के साथ भी शिवसेना और मनसे का व्यवहार बहुत अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगर कह रहे हैं कि देश को बॉलीवुड से भी अच्छी फिल्म सिटी की दरकार है और इस निमित्त वे विश्वस्तरीय फिल्म सिटी का निर्माण उत्तर प्रदेश में करना चाहते हैं तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। फिर कलाकार तो वहीं जाएगा जहां सम्मान, दाम और सुविधाएं पाएगा। उद्धव ठाकरे, संजय राउत, मनसे और राकांपा नेताओं के विरोध को खारिज करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेहद सटीक और पते की बात कही है कि वह किसी राज्य से कुछ भी कहीं नहीं ले जा रहे हैं। यूपी में फिल्म सिटी वहां की मांग और जरूरतों के हिसाब से बन रही है। मुंबई की फिल्म सिटी अपनी जरूरतों के हिसाब से काम करेगी। हम उत्तर प्रदेश में एक विश्व स्तरीय फिल्म सिटी बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं इसीलिए फिल्म जगत से जुड़े लोगों से मुलाकात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगर मुंबई में हैं तो इसलिए कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। वहां ज्यादातर पूंजीपतियों के व्यापार और मुख्यालय हैं। वे उद्योगपतियों से भी बात कर रहे हैं और फिल्मी कलाकारों से भी। केवल बात करने से कोई किसी के पीछे नहीं चल देता। उसे सहमत करना पड़ता है। उद्धव ठाकरे और संजय राउत को अगर यह लगता है कि मुंबई के उद्योगपति यूपी जा सकते हैं तो उन्हें सहमत करने और यूपी जाने से रोकने का मार्ग स्वत: अपना सकते हैं। इसके लिए योगी आदित्यनाथ के होटल पर प्रदर्शन की जरूरत बिल्कुल नहीं थी। कोरोना काल में जब महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब और अन्य राज्यों से प्रवासी मजदूर काम के अभाव में पैदल अपने घरों के लिए निकल पड़े थे तब भी योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि वे अपने राज्य के मजदूरों को अन्य राज्यों में नहीं जाने देंगे। उन्हें उत्तर प्रदेश में ही काम देंगे और बहुत हद तक उन्होंने मजदूरों से किया गया वादा निभाया भी। योगी आदित्यनाथ की इच्छाशक्ति ही है कि उनके मुंबई जाने भर से वहां के मुख्यमंत्री के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है। योगी आदित्यनाथ ने यूपी में फिल्म सिटी को लेकर मुंबई के उद्यमियों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों से बातचीत की है। यूपी में फिल्म सिटी बनाए जाने को लेकर प्रस्ताव, सुझाव और सहयोग मांगे हैं। जिस तरह यूपी सीएम उद्यमियों से बात कर रहे थे, उसी दौरान होटल के बाहर एनसीपी के कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया। यूपी सरकार के एक मंत्री ने तो यहां तक कहा है कि अंडरवर्ल्ड के जरिए धमकी दी जा रही है कि यूपी में फिल्म सिटी न बने। दरअसल यह सब चल क्या रहा है। अगर दक्षिण के राज्यों में फिल्म सिटी बन सकती है तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। फिर योगी आदित्यनाथ ने तो पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यूपी फिल्म सिटी में केवल हिदी फिल्में ही नहीं बनेंगी। वहां दक्षिण की फिल्में भी बनेंगी और अंग्रेजी की फिल्में भी बनेंगी। फिर संजय राउत का यह कहना कि योगी दक्षिण के राज्यों के कलाकारों से ही क्यों नहीं मिल रहे हैं। पश्चिम बंगाल के कलाकारों से नहीं मिल रहे हैं। वे मुंबई ही क्यों आए हैं? इस तरह के बिना सिर-पैर के सवाल परेशान करने वाले हैं। हर प्रांत के मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य की बेहतरी का प्रयास करे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वही कर रहे हैं। कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण का ट्वीट है कि जब भाजपा महाराष्ट्र में सत्ता में थी तब कई उद्योग एवं कार्यालय गुजरात स्थानांतरित कर दिए गए थे। महाराष्ट्र में सरकार बदल गई, लेकिन भाजपा उत्तर प्रदेश सरकार के नाम पर अब बॉलीवुड का एक टुकड़ा ले जाने की पटकथा तैयार कर रही है। भाजपा के शासनकाल में जो कुछ हुआ, हम फिर वह नहीं होने देंगे।' इसे दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या कहा जाएगा? सवाल यह उठता है कि उन्हें क्यों ऐसा लग रहा है कि योगी आदित्यनाथ महाराष्ट्र का हक छीनने आए हैं। गौरतलब है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नोएडा में एक फिल्म सिटी स्थापित करने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना सितंबर में सामने रखी थी और फिल्म बिरादरी को फिल्म निर्माण के वास्ते उत्तर प्रदेश आने की पेशकश की थी। तभी से इस प्रकरण पर शिवसेना और भाजपा में तनातनी है।नोएडा में फिल्म सिटी बनाने की कवायद से उद्धव ठाकरे नाराज हैं और कह रहे हैं कि वे ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे। महाराष्ट्र मैग्नेटिक राज्य है। उद्योगपतियों में आज भी महाराष्ट्र का आकर्षण कायम है। राज्य का कोई भी उद्योग बाहर नहीं जाएगा, बल्कि अन्य राज्यों के उद्योगपति भी महाराष्ट्र में उद्योग लगाने के लिए आएंगे। राज्य के उद्योग राज्य में ही रहेंगे। गत 19 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में नोएडा क्षेत्र में एक भव्य और विशाल फिल्म सिटी बनाने की घोषणा की थी तो एकबारगी लगा था कि अभी यह एक घोषणा ही है, जो न जाने कब शुरू और कब पूरी होगी लेकिन योगी ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है, वह बताती है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है। फिल्म सिटी की इस योजना को पंख तब लगे जब 22 सितंबर को ही मुख्यमंत्री योगी ने इसकी मीटिंग के लिए कुछ फिल्म वालों को लखनऊ में लंच पर बुला लिया। इससे यह संदेश गया कि योगी फिल्म सिटी की योजना को लंबा न खींचकर जल्द से जल्द पूरा करने का मन बना चुके हैं। अब उद्धव और उनकी टीम सोचे कि उसे अपनी जरूरतों की प्रतिपूर्ति के लिए क्या कुछ करना है। (लेखक हिन्दुस्तान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 3 December 2020


bhopal, gas tragedy, disposal ,toxic waste,big challenge

भयावह त्रासदी (03 दिसम्बर) के 36 वर्ष योगेश कुमार गोयल भोपाल शहर में वर्ष 1984 में हुई भयानक गैस त्रासदी, पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी और हृदयविदारक औद्योगिक दुर्घटना मानी जाती है। 2-3 दिसम्बर 1984 को आधी रात के बाद यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) से निकली ‘मिथाइल आइसोसाइनाइट’ नामक जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली। लाखों की संख्या में लोग प्रभावित हुए। दुर्घटना के चंद घंटे के भीतर कई हजार लोग मारे गए। मौतों का सिलसिला उस रात से शुरू होकर लंबे अरसे तक अनवरत चलता रहा। इस हादसे के 36 साल बीत जाने के बाद भी इसका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यह इस कदर विचलित कर देने वाला हादसा था कि इसमें मारे गए लोगों को सामूहिक रूप से दफनाया या अंतिम संस्कार किया गया। करीब दो हजार जानवरों के शवों को विसर्जित करना पड़ा। आसपास के सभी तरह के पेड़ बंजर हो गए थे। एक शोध में यह तथ्य सामने आया है कि भोपाल गैस पीड़ितों की बस्ती में रहने वालों को दूसरे क्षेत्रों में रहने वालों की तुलना में किडनी, गले तथा फेफड़ों का कैंसर 10 गुना ज्यादा है। इस बस्ती में टीबी तथा पक्षाघात के मरीजों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। इस गैस त्रासदी में पांच लाख से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे, जिनमें से बड़ी संख्या में लोगों की मौत मौके पर ही हो गई थी। जो जिंदा बचे, वे विभिन्न गंभीर बीमारियों के शिकार होकर जीवित रहते हुए भी तिल-तिलकर मरने को विवश हुए। इनमें से बहुत से लोग कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और सालों बाद भी इसके दुष्प्रभाव खत्म नहीं हो रहे। गैस त्रासदी के 36 साल बीत जाने के बाद भी इस त्रासदी से पीड़ित होने वालों के जख्म हरे हैं। विषैली गैस के सम्पर्क में आने वाले लोगों के परिवारों में इतने वर्षों बाद भी शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम बच्चे जन्म ले रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गैस त्रासदी से 3787 की मौत हुई और गैस से करीब 558125 लोग प्रभावित हुए थे। हालांकि कई एनजीओ का दावा रहा है कि मौत का यह आंकड़ा 10 से 15 हजार के बीच था तथा बहुत सारे लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए। विभिन्न अनुमानों के मुताबिक करीब 8 हजार लोगों की मौत तो दो सप्ताह के भीतर हो गई थी जबकि करीब 8 हजार अन्य लोग रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों के चलते मारे गए थे। बताया जाता है कि कारखाने के टैंक संख्या 610 में निर्धारित मात्रा से ज्यादा एमआईसी गैस भरी हुई थी और गैस का तापमान निर्धारित 4.5 डिग्री के स्थान पर 20 डिग्री था। पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेंट ने काम करना बंद कर दिया था। इसके अलावा बिजली का बिल बचाने के लिए मिक को कूलिंग स्तर पर रखने के लिए बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी बंद कर दिया गया था। 03 दिसम्बर 1984 को इस कार्बाइड फैक्टरी से करीब 40 टन गैस का जो रिसाव हुआ, उसका एक बड़ा कारण माना गया कि टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के साथ पानी मिल जाने से रासायनिक प्रतिक्रिया होने के परिणामस्वरूप टैंक में दबाव बना और टैंक का अंदरूनी तापमान 200 डिग्री के पार पहुंच गया। इससे धमाके के साथ टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया और जहरीली गैस देखते ही देखते पूरे वायुमंडल में फैल गई। अचानक हुए जहरीली गैस के रिसाव से बने गैस के बादल हवा के झोंके के साथ वातावरण में फैल गए और इसकी चपेट में आनेवाले लोग मौत की नींद सोते गए। इस दुर्घटना के चार दिनों बाद 7 दिसम्बर 1984 को यूसीआईएल अध्य्क्ष एवं सीईओ वारेन एंडर्सन की गिरफ्तारी हुई थी किन्तु विडम्बना देखिये कि इतने भयानक हादसे के मुख्य आरोपी को गिरफ्तारी के महज छह घंटे बाद मात्र 2100 डॉलर के मामूली जुर्माने पर रिहा कर दिया गया था। उसके बाद वह अवसर का लाभ उठाते हुए भारत छोड़कर अपने देश अमेरिका भाग गया, जिसे भारत लाकर सजा देने की मांग निरन्तर उठती रही लेकिन भारत सरकार अमेरिका से उसका प्रत्यर्पण कराने में सफल नहीं हुई। अंततः 29 सितम्बर 2014 को वारेन एंडर्सन की मौत हो गई। इस हादसे पर वर्ष 2014 में ‘भोपाल: ए प्रेयर फॉर रेन’ नामक फिल्म भी बन चुकी है। भले ही गैस रिसाव के करीब आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैस के असर से मुक्त मान लिया गया था किन्तु हकीकत यह है कि इस गैस त्रासदी के 36 वर्षों बाद भी भोपाल उससे उबर नहीं पाया है। हादसे से पर्यावरण को ऐसी क्षति पहुंची, जिसकी भरपाई सरकारें आजतक नहीं कर पाई हैं। सरकारों का इस पूरे मामले में रुख संवेदनहीन ही रहा है। कई रिपोर्टों में इस क्षेत्र में भूजल प्रदूषण की पुष्टि होने के बाद भी सरकार द्वारा जमीन में दफन जहरीले कचरे के निष्पादन की कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई है। दरअसल इस भयावह गैस त्रासदी के बाद हजारों टन खतरनाक अपशिष्ट भूमिगत दफनाया गया था और सरकारों ने भी स्वीकार किया है कि यह क्षेत्र दूषित है। विभिन्न रिपोर्टों में बताया जाता रहा कि यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास की 32 बस्तियों का भूजल प्रदूषित है और यह सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा रही कि गैस पीड़ित वर्ष 2014 तक इसी प्रदूषित भूजल को पीते रहे। हालांकि वर्ष 2014 में इन क्षेत्रों में पानी की पाइपलाइन डाली गई लेकिन तबतक जहरीले रसायन लोगों के शरीर में गहराई तक घुल चुके थे। स्थिति यह है कि पानी की कमी होने पर लोग आज भी इस दूषित जल का उपयोग कर लेते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूनियन कार्बाइड कारखाने के 10 टन कचरे का निस्तारण इन्दौर के पास पीथमपुर में किया जा चुका है लेकिन पर्यावरण पर उसका क्या असर पड़ा, यह एक रहस्यमयी पहेली है। यहां जहरीली गैसों का खतरा अभी भी बरकरार है क्योंकि उस त्रासदी के 346 टन जहरीले कचरे का निस्तारण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है, जो हादसे की वजह बने यूनियन कार्बाइड कारखाने में कवर्ड शेड में मौजूद है। इसके खतरे को देखते हुए यहां आम लोगों का प्रवेश वर्जित है। जहरीली गैस के कारखाने से निकले खतरनाक कचरे के निपटान के लिए सरकार कोई गंभीर प्रयास नहीं कर पाई और करीब 36 सालों से पड़ा यह कचरा कारखाने के आसपास की जमीन, जल और वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। इस जहरीले कचरे का निस्तारण बड़ी चुनौती इसलिए है क्योंकि भारत के पास इसके निस्तारण की तकनीक और विशेषज्ञ मौजूद नहीं हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 2 December 2020


bhopal,How successful, will the corona vaccine be

रंजना मिश्रा किसी भी बड़ी बीमारी की वैक्सीन के रिसर्च, ट्रायल और लोगों तक उसे पहुंचने में 10 वर्ष या उससे अधिक समय लग सकता है। पोलियो की वैक्सीन बनाने में 47 वर्ष, चिकन पॉक्स की वैक्सीन बनाने में 42 वर्ष, इबोला की वैक्सीन में 43 वर्ष, हेपेटाइटिस बी की वैक्सीन बनाने में 13 वर्ष लगे और एचआईवी एड्स का इलाज ढूंढने में 61 वर्ष लग गए किंतु इसका इलाज अभीतक संभव नहीं हुआ। पिछले 200 वर्षों में केवल स्मालपॉक्स को ही जड़ से मिटाया जा सका है। इसके अलावा इंसानों को होने वाली किसी संक्रामक बीमारी को अभीतक जड़ से समाप्त नहीं किया जा सका। अब दुनियाभर के वैज्ञानिक कोरोना वायरस को जड़ से समाप्त करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। कोरोना वायरस की वैक्सीन को मात्र 10 महीने में तैयार कर लिया गया है। दुनिया भर में अब कोरोना वायरस की कई वैक्सीन तैयार हो चुकी है। इन वैक्सीनों को बनाने वाली कंपनियां अपनी-अपनी वैक्सीन की सफलता के अलग-अलग दावे कर रही हैं। फाइज़र कंपनी अपनी वैक्सीन के 95% तक प्रभावशाली होने का दावा कर रही है। वहीं मॉडर्ना 94.5%, रूस की स्पुतनिक वी 95%, ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन 90% और भारत में बन रही कोवैक्सीन के 60% तक सफल होने का अनुमान लगाया गया है। ये सभी नतीजे एक नियंत्रित वातावरण में किए गए तीसरे चरण के ट्रायल से प्राप्त हुए हैं। लेकिन जब ये सामान्य जन तक पहुंचेंगी तो इनकी सफलता दर काफी नीचे गिर सकती है। क्योंकि ट्रायल के दौरान लोगों को दो ग्रुपों में बांटा जाता है, इनमें से आधे लोगों को वैक्सीन दी जाती है और आधे लोगों को नहीं दी जाती। फाइज़र के ट्रायल में 43 हजार लोग शामिल हुए, इनमें से 170 लोगों को कोरोना का संक्रमण हुआ लेकिन इनमें से 162 लोगों को कोई वैक्सीन नहीं दी गई जबकि 8 लोगों को वैक्सीन दी गई। इसी आधार पर इस वैक्सीन के 95% तक सफल होने का दावा किया गया है किंतु ये इस वैक्सीन की एफीकेसी है इफेक्टिवनेस नहीं। एफीकेसी का अर्थ है कि ट्रायल के दौरान इस वैक्सीन में लोगों को 95% तक ठीक करने की क्षमता पाई गई। आमतौर पर ट्रायल में शामिल लोग स्वस्थ होते हैं, उन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। जब यही वैक्सीन दुनिया के करोड़ों लोगों को दी जाएगी तभी इसके असली असर के बारे में पता चल पाएगा। क्योंकि द लैंसेट मेडिकल जर्नल के मुताबिक दुनिया के 95% लोगों को पहले से ही कोई न कोई बीमारी होती है। इसलिए जब यह वैक्सीन लोगों को दी जाएगी तभी सही रूप से अलग-अलग लोगों और अलग-अलग परिस्थितियों पर इनकी सफलता का प्रतिशत पता चल पाएगा। दुनियाभर के देशों ने इन अलग-अलग वैक्सीनों को खरीदने की तैयारी शुरू कर दी है। किंतु सभी देश अगले एक वर्ष में सिर्फ 20 से 25% लोगों को ही वैक्सीन उपलब्ध करा पाएंगे। पहले चरण में ये वैक्सीन स्वास्थ्यकर्मियों को मिलेंगी, दूसरे चरण में सोशल केयर वर्कर्स को मिलेगी, तीसरे चरण में 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को मिलेगी और चौथे चरण में आम जनता को दी जाएगी। आमतौर पर वैक्सीन को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर स्टोर करने की आवश्यकता होती है। अमीर देशों में इनके रखरखाव में कोई मुश्किल नहीं होगी किंतु गरीब और विकासशील देशों में जहां संसाधनों की कमी है और बिजली की समस्या है, वहां इन्हें स्टोर करके रखना मुश्किल काम हो सकता है। वैक्सीन संक्रमण के बाद नहीं बल्कि संक्रमण से बचाव के लिए लगाई जाती हैं, ज्यादातर वैक्सीन के निर्माण में इसी के कमजोर हो चुके वायरस का इस्तेमाल किया जाता है या फिर मरे हुए वायरस से वैक्सीन बनाई जाती है। इसलिए इस वैक्सीन के लगने के बाद लोगों में कोविड-19 के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। जैसे-तेज बुखार आना, मांसपेशियों में दर्द होना, ध्यान एकाग्र करने में कमी आना और सिरदर्द की शिकायत। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इस वायरस को पहचान कर उससे लड़ने लगती है और यहीं से वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी तैयार होती है। इसके बाद वैक्सीन की दूसरी डोज़ दी जाती है। इसके दुष्प्रभाव पहले से कम होते हैं। संक्रमण के खिलाफ अक्सर चार प्रकार की वैक्सीन काम करती है। पहली होती है जेनेटिक वैक्सीन, इसमें वायरस के जींस शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करते हैं। दूसरी है वायरल वेक्टर वैक्सीन, ये वैक्सीन शरीर की कोशिकाओं यानी सेल्स में प्रवेश करती है और कोशिकाएं वायरस से लड़ने वाले प्रोटीन का निर्माण करने लगती हैं। तीसरी है प्रोटीन आधारित वैक्सीन, इनमें कोरोना वायरस के प्रोटीन होते हैं। चौथी है निष्क्रिय वैक्सीन, जो कमजोर या निष्क्रिय हो चुके वायरस से तैयार की जाती है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 2 December 2020


bhopal,Government dedicated, Covid Center , becoming life-giving

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा अपवादों को छोड़ दिया जाए तो कोरोना के खिलाफ जंग केवल सरकारी डेडिकेटेड कोविड सेंटरों के माध्यम से ही बेहतर तरीके से जीती जा सकती है। यह मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर साझा कर रहा हूं। दीपावली की सुबह लगभग काल बनकर ही मेरे लिए आई थी पर जयपुर का सरकारी आरयूएचएस अस्पताल नया जीवनदाता बनकर उभरा। यह कोई जयपुर या राजस्थान के हालात नहीं बयां कर रहा बल्कि जिस तरह की व्यवस्थाएं सरकारों द्वारा कोरोना संक्रमितों के लिए की जा रही है, वह वास्तव में सराहनीय है। लगभग देश के सभी सरकारी डेडिकेटेड कोविड सेंटरों में कमोबेश यही स्थिति है। पर धवल पक्ष के स्थान पर स्याह पक्ष को सामने लाया जा रहा है। दीपावली की सुबह परिजनों ने शुभचिंतकों के सहयोग से अतिगंभीर स्थिति में आरयूएचएस के आउटडोर में दिखाकर वार्ड 8 में भर्ती कराया। तत्काल इलाज शुरू हुआ और दो दिनों में एक-दो बार बेहोशी को देखते हुए आरयूएचएस प्रभारी डॉ. अजित सिंह ने स्वयं आकर दूसरे कमरे में शिफ्ट किया। तत्काल रेमडेसिविर के साथ अन्य इंजेक्शन और ऑक्सीजन की व्यवस्था की गई। यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि यह व्यवस्था अकेले मेरे लिए नहीं अपितु आरयूएचएस में आने वाले सभी कोरोना मरीजों के लिए हो रही है। वह भी पूरी तरह निःशुल्क। इसके बाद जिस तरह का बेहतरीन इलाज एसएमएस हास्पिटल के नोर्थ विंग वार्ड में डॉ. नवल व उनकी टीम द्वारा उपलब्ध कराया गया वह वास्तव में धरती के भगवान का साक्षात रूप देखने को मिला। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कोरोना के प्रति विजन, वार्डो में अधिक बेड की व्यवस्था व कोविड सेंटरों पर मरीज के नाश्ते से लेकर महंगी रेमडेसिविर जैसी दवाओं की निःशुल्क व्यवस्था, मरीजों के लिए बड़ी राहत से कम नहीं। सवाल उठता है कि मीडिया में सरकारी व्यवस्था को लेकर इतनी आलोचना क्यों कर हो रही है। हो सकता है व्यवस्था में थोड़ी कमी रह जाए पर संक्रमित की गंभीर स्थिति खासतौर से डायबिटिज और बीपी की स्थितियां भी काफी कुछ निर्भर करती है। दूसरी ओर मरीज को किस स्थिति में अस्पताल में ले जाया गया है, यह भी अपने आप में गंभीर है। देश के मीडिया समूहों ने सरकारी व्यवस्था को लेकर तो प्रश्न उठाए हैं पर क्या किसी समूह ने खुलकर निजी अस्पतालों में मौत का आंकड़ा या इलाज पर होने वाले बेतहाशा खर्च के आंकड़ों को उजागर किया है। शायद इसका उत्तर नहीं में ही आएगा। आंकड़ों का अध्ययन किया जाए और सरकारी व गैर सरकारी अस्पतालों के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो स्थितियां विपरीत होंगी। राजस्थान सहित देश के सभी सरकारी सेंटरों पर व्यवस्थाओं की खुले मन से सराहना की जानी चाहिए। देश में जिस तरह से कोरोना संक्रमितों के मामले बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए मीडिया सहित सभी का सकारात्मक माहौल बनाने का दायित्व भी हो जाता है। सरकारी व्यवस्थाओं में कमी निकालना आसान है लेकिन सही ढंग से आकलन किया जाए तो आरयूएचएस जैसे सरकारी डेडिकेटेड कोविड सेंटर ही आम संक्रमितों के लिए जीवनदाता बन रहे हैं। कोरोना के इस भयावह दौर में सबसे अधिक आवश्यकता सकारात्मक माहौल बनाने की है। सरकारी कोविड सेंटरों के बारे में आम कोरोना संक्रमितों में पॉजिटिव सोच विकसित होगी तो आम आदमी इन केन्द्रों पर ही जाने को प्राथमिकता देगा और इसका सीधा लाभ संक्रमितों को मिलेगा। विचारणीय यह है कि पहले संक्रमण की दहशत और उसके बाद सरकारी केन्द्रों के प्रति नकारात्मक माहौल बनाने से नुकसान किसका हो रहा है? आम आदमी का। साधनहीन आदमी का। वह बेचारा डर के मारे अस्पताल जाने से ही कतराने लगता है। ऐसे में सामाजिक दायित्व बड़ी बात हो जाती है जिसे समझना होगा। दरअसल भयमुक्त वातावरण तैयार कर ही कोरोना के खिलाफ जंग जीती जा सकती है। क्योंकि वैक्सीन अभी दूर है। सरकार के सख्त कानूनों की अवहेलना आम है। बाजार खुले हैं तो शादी-विवाह के दौर में लापरवाही अधिक हो रही है। मास्क का किस तरह और कितना उपयोग हो रहा है वह सामने है। यूरोप में दिन-प्रतिदिन बिगड़ती स्थितियां सामने हैं। देश में भी नए संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में केवल जागरुकता के जरिये ही लोगों को सही और सस्ते इलाज की सुविधा से लाभान्वित किया जा सकता है। बेशक कमियों को उजागर किया ही जाना चाहिए पर आमजन में सरकारी व्यवस्था के प्रति सही सोच बनाना भी हमारा दायित्व है ताकि लोग कोरोना संक्रमण का सही इलाज प्राप्त कर सकें और इलाज के नाम पर लुटने से बच सकें। जब सरकारी व्यवस्था में जांच से लेकर दवाओं तक की उचित व्यवस्था है तो लोगों तक यह जानकारी पहुंचाना हमारा दायित्व है। आखिर केन्द्र व राज्य सरकारें किसके लिए इतने प्रयास कर रही हैं। साफ है आम आदमी के लिए ही। ऐसे में सकारात्मक भूमिका निभाकर उन्हें अधिक लाभान्वित किया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 1 December 2020


bhopal, Dev Deepavali, Kashi: 84 ghats, 1.5 million lamps

सियाराम पांडेय 'शांत' 84 घाट, 15 लाख दीप और सौ टके की बात। बतौर प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 23वीं बार पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी में केवल देव दीपावली का ही दीप नहीं जलाया, उन्होंने विकास का भी दीप जलाया। आस्था का भी दीया जलाया। अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी को उन्होंने जहां करोड़ों रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी, अपने विरोधियों पर जमकर हमला बोला। काशी में देव दीपावली इस साल भी सोल्लास मनाई गई। काशी में गंगा के सभी 84 घाटों पर 15 लाख दीप जलाए गए। पहला दीप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलाया। यह पहला अवसर है जब देव दीपावली पर किसी प्रधानमंत्री ने शिरकत की है और इतनी बड़ी तादाद में दीपक जलाए गए हैं। काशीवासियों का संकल्प था कि वे इसबार अयोध्या से भी भव्य दीपावली का आयोजन करेंगे और ऐसा हुआ भी। यूं तो काशी में शताब्दियों से देव दीपावली मनाई जा रही है लेकिन पिछले कुछ सालों से खासकर योगी आदित्यनाथ के शासन में काशीवासी अभूतपूर्व उत्साह के साथ देव दीपावली मना रहे हैं। अयोध्या में लंका विजय के बाद वहां के लोगों ने स्वत: दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था लेकिन काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान की परंपरा स्वयं काशीपुराधिपति भगवान शिव के आदेश पर शुरू हुई। काशी में देव दीपावली प्रतीक है त्रिपुरासुर पर भगवान शिव के विजय का। तैंतीस कोटि देवता आज काशी में आते हैं और भगवान शिव तथा मां गंगा की पूजा करते और दिवाली मनाते हैं। पुराणों में कथा आती है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था। उसके बाद उन्होंने इस तिथि को प्रकाश उत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की थी। यही वजह है कि हर वर्ष देवता गण काशी में आकर देव दीपावली मनाने लगे। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान करने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। गंगा या किसी पवित्र नदी के पास पूर्णिमा की रात्रि में दीप जलाने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर जलाए गए दीपक के प्रकाश से प्राणी के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का नाश होता है। इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है। ब्रह्माजी का अवतरण भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागरण से प्रसन्न होकर समस्त देवी-देवता ने पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती की थी। वह दिन कार्तिक पूर्णिमा का ही था। कार्तिक माह भगवान कार्तिकेय द्वारा की गई साधना का माह है। ऐसा कहा गया है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में श्रीकेशव के निकट अखण्ड दीपदान करता है, वह दिव्य कान्ति से युक्त हो जाता है। जो लोग कार्तिक मास में श्रीहरि के मन्दिर में रखे दीपों को प्रज्वलित करते हैं, उन्हें नर्क नहीं भोगना पड़ता है। काशी और गंगा के तो दर्शन से ही मुक्ति मिल जाती है। प्रधानमंत्री ने नये कृषि कानून को लेकर किसानों के बीच उपजी आशंकाओं के लिए विपक्ष को जिम्मेवार ठहराया। वहीं विपक्ष के छल और अपनी गंगाजल जैसी नीयत का इजहार कर उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नई बहस का सूत्रपात भी किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार गंगाजल जैसी पवित्र नीयत से काम कर रही है, जिसके बेहतर परिणाम आने शुरू हो गये हैं और किसी को भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। वाराणसी संसदीय क्षेत्र के मिर्जामुराद के खजुरी में 2,447 करोड़ रुपये की हंडिया-राजातालाब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि किसानों के साथ दशकों से छल किया जा रहा था। पिछली सरकारों के कार्यकाल में किसानों को तरह-तरह के धोखे दिये जा रहे थे। कभी फसलों के न्यूनतम मूल्य दिलाने के नाम पर तो कभी सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर और कभी किसानों के बकाया ऋण माफ करने के नाम पर। इन सबका लाभ कभी किसानों को नहीं मिल पाता था। इसलिए उनकी स्थिति लगातार खराब होती चली गई। नये कानून से किसानों को लाभ मिलने शुरू हो गये हैं। आने वाले समय में देश के सभी छोटे-बड़े किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा लेकिन जो लोग किसानों के साथ छल करते रहे, अब वे निरंतर भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। जिससे सावधान रहने की जरूरत है। नये कृषि कानूनों को लेकर किसानों को अगर कोई शंका है तो सरकार उसे लगातार दूर कर रही है तथा इस प्रकार के प्रयास आगे जारी रहेंगे। अपने 40 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने 26 मिनट तक किसानों के मुद्दे पर ही बात की। वाराणसी के दशहरी और लंगड़ा आम की तारीफ करना भी वे नहीं भूले। उन्होंने किसानों को लगे हाथों यह बताने की भी कोशिश की कि अगर वे पुराने सिस्टम से ही लेनदेन को ठीक समझते हैं तो उनपर भी कहीं कोई रोक नहीं लगी है। नया कानून उनके लिए फायदेमंद है। इसमें उन्हें और आजादी दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूर्व की सरकारों ने कितनी खरीदारी की और भाजपा सरकार ने कितनी खरीदारी की। यह भी समझाया कि अगर मंडियों को ही खत्म करना होता तो वे उन्हें इतना मजबूत क्यों बनाते। उनकी योजनाओं तो मंडियों को और अधिक अत्याधुनिक बनाने की है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 1 December 2020


bhopal, Dev Deepavali, Kashi: 84 ghats, 1.5 million lamps

सियाराम पांडेय 'शांत' 84 घाट, 15 लाख दीप और सौ टके की बात। बतौर प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 23वीं बार पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी में केवल देव दीपावली का ही दीप नहीं जलाया, उन्होंने विकास का भी दीप जलाया। आस्था का भी दीया जलाया। अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी को उन्होंने जहां करोड़ों रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी, अपने विरोधियों पर जमकर हमला बोला। काशी में देव दीपावली इस साल भी सोल्लास मनाई गई। काशी में गंगा के सभी 84 घाटों पर 15 लाख दीप जलाए गए। पहला दीप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलाया। यह पहला अवसर है जब देव दीपावली पर किसी प्रधानमंत्री ने शिरकत की है और इतनी बड़ी तादाद में दीपक जलाए गए हैं। काशीवासियों का संकल्प था कि वे इसबार अयोध्या से भी भव्य दीपावली का आयोजन करेंगे और ऐसा हुआ भी। यूं तो काशी में शताब्दियों से देव दीपावली मनाई जा रही है लेकिन पिछले कुछ सालों से खासकर योगी आदित्यनाथ के शासन में काशीवासी अभूतपूर्व उत्साह के साथ देव दीपावली मना रहे हैं। अयोध्या में लंका विजय के बाद वहां के लोगों ने स्वत: दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था लेकिन काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान की परंपरा स्वयं काशीपुराधिपति भगवान शिव के आदेश पर शुरू हुई। काशी में देव दीपावली प्रतीक है त्रिपुरासुर पर भगवान शिव के विजय का। तैंतीस कोटि देवता आज काशी में आते हैं और भगवान शिव तथा मां गंगा की पूजा करते और दिवाली मनाते हैं। पुराणों में कथा आती है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था। उसके बाद उन्होंने इस तिथि को प्रकाश उत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की थी। यही वजह है कि हर वर्ष देवता गण काशी में आकर देव दीपावली मनाने लगे। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान करने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। गंगा या किसी पवित्र नदी के पास पूर्णिमा की रात्रि में दीप जलाने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर जलाए गए दीपक के प्रकाश से प्राणी के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का नाश होता है। इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है। ब्रह्माजी का अवतरण भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागरण से प्रसन्न होकर समस्त देवी-देवता ने पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती की थी। वह दिन कार्तिक पूर्णिमा का ही था। कार्तिक माह भगवान कार्तिकेय द्वारा की गई साधना का माह है। ऐसा कहा गया है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में श्रीकेशव के निकट अखण्ड दीपदान करता है, वह दिव्य कान्ति से युक्त हो जाता है। जो लोग कार्तिक मास में श्रीहरि के मन्दिर में रखे दीपों को प्रज्वलित करते हैं, उन्हें नर्क नहीं भोगना पड़ता है। काशी और गंगा के तो दर्शन से ही मुक्ति मिल जाती है। प्रधानमंत्री ने नये कृषि कानून को लेकर किसानों के बीच उपजी आशंकाओं के लिए विपक्ष को जिम्मेवार ठहराया। वहीं विपक्ष के छल और अपनी गंगाजल जैसी नीयत का इजहार कर उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नई बहस का सूत्रपात भी किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार गंगाजल जैसी पवित्र नीयत से काम कर रही है, जिसके बेहतर परिणाम आने शुरू हो गये हैं और किसी को भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। वाराणसी संसदीय क्षेत्र के मिर्जामुराद के खजुरी में 2,447 करोड़ रुपये की हंडिया-राजातालाब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि किसानों के साथ दशकों से छल किया जा रहा था। पिछली सरकारों के कार्यकाल में किसानों को तरह-तरह के धोखे दिये जा रहे थे। कभी फसलों के न्यूनतम मूल्य दिलाने के नाम पर तो कभी सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर और कभी किसानों के बकाया ऋण माफ करने के नाम पर। इन सबका लाभ कभी किसानों को नहीं मिल पाता था। इसलिए उनकी स्थिति लगातार खराब होती चली गई। नये कानून से किसानों को लाभ मिलने शुरू हो गये हैं। आने वाले समय में देश के सभी छोटे-बड़े किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा लेकिन जो लोग किसानों के साथ छल करते रहे, अब वे निरंतर भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। जिससे सावधान रहने की जरूरत है। नये कृषि कानूनों को लेकर किसानों को अगर कोई शंका है तो सरकार उसे लगातार दूर कर रही है तथा इस प्रकार के प्रयास आगे जारी रहेंगे। अपने 40 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने 26 मिनट तक किसानों के मुद्दे पर ही बात की। वाराणसी के दशहरी और लंगड़ा आम की तारीफ करना भी वे नहीं भूले। उन्होंने किसानों को लगे हाथों यह बताने की भी कोशिश की कि अगर वे पुराने सिस्टम से ही लेनदेन को ठीक समझते हैं तो उनपर भी कहीं कोई रोक नहीं लगी है। नया कानून उनके लिए फायदेमंद है। इसमें उन्हें और आजादी दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूर्व की सरकारों ने कितनी खरीदारी की और भाजपा सरकार ने कितनी खरीदारी की। यह भी समझाया कि अगर मंडियों को ही खत्म करना होता तो वे उन्हें इतना मजबूत क्यों बनाते। उनकी योजनाओं तो मंडियों को और अधिक अत्याधुनिक बनाने की है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 1 December 2020


bhopal, Dev Deepavali, Kashi: 84 ghats, 1.5 million lamps

सियाराम पांडेय 'शांत' 84 घाट, 15 लाख दीप और सौ टके की बात। बतौर प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 23वीं बार पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी में केवल देव दीपावली का ही दीप नहीं जलाया, उन्होंने विकास का भी दीप जलाया। आस्था का भी दीया जलाया। अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी को उन्होंने जहां करोड़ों रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी, अपने विरोधियों पर जमकर हमला बोला। काशी में देव दीपावली इस साल भी सोल्लास मनाई गई। काशी में गंगा के सभी 84 घाटों पर 15 लाख दीप जलाए गए। पहला दीप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलाया। यह पहला अवसर है जब देव दीपावली पर किसी प्रधानमंत्री ने शिरकत की है और इतनी बड़ी तादाद में दीपक जलाए गए हैं। काशीवासियों का संकल्प था कि वे इसबार अयोध्या से भी भव्य दीपावली का आयोजन करेंगे और ऐसा हुआ भी। यूं तो काशी में शताब्दियों से देव दीपावली मनाई जा रही है लेकिन पिछले कुछ सालों से खासकर योगी आदित्यनाथ के शासन में काशीवासी अभूतपूर्व उत्साह के साथ देव दीपावली मना रहे हैं। अयोध्या में लंका विजय के बाद वहां के लोगों ने स्वत: दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था लेकिन काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान की परंपरा स्वयं काशीपुराधिपति भगवान शिव के आदेश पर शुरू हुई। काशी में देव दीपावली प्रतीक है त्रिपुरासुर पर भगवान शिव के विजय का। तैंतीस कोटि देवता आज काशी में आते हैं और भगवान शिव तथा मां गंगा की पूजा करते और दिवाली मनाते हैं। पुराणों में कथा आती है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था। उसके बाद उन्होंने इस तिथि को प्रकाश उत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की थी। यही वजह है कि हर वर्ष देवता गण काशी में आकर देव दीपावली मनाने लगे। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान करने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। गंगा या किसी पवित्र नदी के पास पूर्णिमा की रात्रि में दीप जलाने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर जलाए गए दीपक के प्रकाश से प्राणी के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का नाश होता है। इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है। ब्रह्माजी का अवतरण भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागरण से प्रसन्न होकर समस्त देवी-देवता ने पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती की थी। वह दिन कार्तिक पूर्णिमा का ही था। कार्तिक माह भगवान कार्तिकेय द्वारा की गई साधना का माह है। ऐसा कहा गया है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में श्रीकेशव के निकट अखण्ड दीपदान करता है, वह दिव्य कान्ति से युक्त हो जाता है। जो लोग कार्तिक मास में श्रीहरि के मन्दिर में रखे दीपों को प्रज्वलित करते हैं, उन्हें नर्क नहीं भोगना पड़ता है। काशी और गंगा के तो दर्शन से ही मुक्ति मिल जाती है। प्रधानमंत्री ने नये कृषि कानून को लेकर किसानों के बीच उपजी आशंकाओं के लिए विपक्ष को जिम्मेवार ठहराया। वहीं विपक्ष के छल और अपनी गंगाजल जैसी नीयत का इजहार कर उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नई बहस का सूत्रपात भी किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार गंगाजल जैसी पवित्र नीयत से काम कर रही है, जिसके बेहतर परिणाम आने शुरू हो गये हैं और किसी को भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। वाराणसी संसदीय क्षेत्र के मिर्जामुराद के खजुरी में 2,447 करोड़ रुपये की हंडिया-राजातालाब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि किसानों के साथ दशकों से छल किया जा रहा था। पिछली सरकारों के कार्यकाल में किसानों को तरह-तरह के धोखे दिये जा रहे थे। कभी फसलों के न्यूनतम मूल्य दिलाने के नाम पर तो कभी सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर और कभी किसानों के बकाया ऋण माफ करने के नाम पर। इन सबका लाभ कभी किसानों को नहीं मिल पाता था। इसलिए उनकी स्थिति लगातार खराब होती चली गई। नये कानून से किसानों को लाभ मिलने शुरू हो गये हैं। आने वाले समय में देश के सभी छोटे-बड़े किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा लेकिन जो लोग किसानों के साथ छल करते रहे, अब वे निरंतर भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। जिससे सावधान रहने की जरूरत है। नये कृषि कानूनों को लेकर किसानों को अगर कोई शंका है तो सरकार उसे लगातार दूर कर रही है तथा इस प्रकार के प्रयास आगे जारी रहेंगे। अपने 40 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने 26 मिनट तक किसानों के मुद्दे पर ही बात की। वाराणसी के दशहरी और लंगड़ा आम की तारीफ करना भी वे नहीं भूले। उन्होंने किसानों को लगे हाथों यह बताने की भी कोशिश की कि अगर वे पुराने सिस्टम से ही लेनदेन को ठीक समझते हैं तो उनपर भी कहीं कोई रोक नहीं लगी है। नया कानून उनके लिए फायदेमंद है। इसमें उन्हें और आजादी दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूर्व की सरकारों ने कितनी खरीदारी की और भाजपा सरकार ने कितनी खरीदारी की। यह भी समझाया कि अगर मंडियों को ही खत्म करना होता तो वे उन्हें इतना मजबूत क्यों बनाते। उनकी योजनाओं तो मंडियों को और अधिक अत्याधुनिक बनाने की है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 1 December 2020


bhopal,Confusion of agricultural laws

प्रमोद भार्गव तीन नए कृषि कानूनों के विरोध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को आईना दिखाया है। उन्होंने कहा, 'जिनका इतिहास छल का रहा है, वे किसानों में नए कानून को लेकर भ्रम फैला रहे हैं।' कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तब विपक्ष ने खूब हंगामा किया। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान हुआ। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया था। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में तभी से अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हैं। पंजाब एवं हरियाणा की ग्राम पंचायतें फैसला ले रही हैं कि हर घर से एक व्यक्ति आंदोलन में भागीदारी करे। हरियाणा की 130 खाप पंचायतें भी इस किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई हैं। साफ है, सिंधु सीमा पर डेरा डाले किसान लंबी लड़ाई लड़ने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं बेबुनियाद हैं। दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार भरोसा दे रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेशन से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पदकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। हालांकि पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, केरल और हिमाचल प्रदेश में राज्य सरकारों ने पहले से ही अनुबंध खेती की सुविधा दी हुई है। इससे किसानों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इसलिए किसान कह रहे हैं कि किसान हित मंडी व्यवस्था के सुधार और एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाने में सुरक्षित हो जाएंगे। भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 विधेयकों को कानूनी दर्जा दिया है। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गई मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा खत्म हो गई है। प्रधानमंत्री ने बनारस की सभा में कहा कि, 'इसी के चलते किसान बनारस के लंगड़ा और दशहरी आम के साथ सब्जी, खाड़ी देशों से लेकर लंदन तक बेचने लगे।' किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया है। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहें उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को आशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण करके नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है। लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है। बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। क्योंकि विधेयक में इस बाबत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। अच्छा है, सरकार इस मुद्दे को विधेयक की इबारत में स्पष्ट कर दे। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंकाएं दूर हो जाती हैं तो किसान निश्चिंत हो जाएगा। विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, नतीजतन मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभीतक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को व्यापारी के धनराशि के लिए चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति' लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में 'ए-2' फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 December 2020


bhopal,Confusion of agricultural laws

प्रमोद भार्गव तीन नए कृषि कानूनों के विरोध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को आईना दिखाया है। उन्होंने कहा, 'जिनका इतिहास छल का रहा है, वे किसानों में नए कानून को लेकर भ्रम फैला रहे हैं।' कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तब विपक्ष ने खूब हंगामा किया। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान हुआ। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया था। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में तभी से अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हैं। पंजाब एवं हरियाणा की ग्राम पंचायतें फैसला ले रही हैं कि हर घर से एक व्यक्ति आंदोलन में भागीदारी करे। हरियाणा की 130 खाप पंचायतें भी इस किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई हैं। साफ है, सिंधु सीमा पर डेरा डाले किसान लंबी लड़ाई लड़ने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं बेबुनियाद हैं। दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार भरोसा दे रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेशन से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पदकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। हालांकि पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, केरल और हिमाचल प्रदेश में राज्य सरकारों ने पहले से ही अनुबंध खेती की सुविधा दी हुई है। इससे किसानों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इसलिए किसान कह रहे हैं कि किसान हित मंडी व्यवस्था के सुधार और एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाने में सुरक्षित हो जाएंगे। भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 विधेयकों को कानूनी दर्जा दिया है। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गई मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा खत्म हो गई है। प्रधानमंत्री ने बनारस की सभा में कहा कि, 'इसी के चलते किसान बनारस के लंगड़ा और दशहरी आम के साथ सब्जी, खाड़ी देशों से लेकर लंदन तक बेचने लगे।' किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया है। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहें उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को आशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण करके नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है। लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है। बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। क्योंकि विधेयक में इस बाबत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। अच्छा है, सरकार इस मुद्दे को विधेयक की इबारत में स्पष्ट कर दे। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंकाएं दूर हो जाती हैं तो किसान निश्चिंत हो जाएगा। विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, नतीजतन मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभीतक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को व्यापारी के धनराशि के लिए चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति' लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में 'ए-2' फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 1 December 2020


bhopal,Confusion of agricultural laws

प्रमोद भार्गव तीन नए कृषि कानूनों के विरोध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को आईना दिखाया है। उन्होंने कहा, 'जिनका इतिहास छल का रहा है, वे किसानों में नए कानून को लेकर भ्रम फैला रहे हैं।' कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तब विपक्ष ने खूब हंगामा किया। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान हुआ। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया था। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में तभी से अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हैं। पंजाब एवं हरियाणा की ग्राम पंचायतें फैसला ले रही हैं कि हर घर से एक व्यक्ति आंदोलन में भागीदारी करे। हरियाणा की 130 खाप पंचायतें भी इस किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई हैं। साफ है, सिंधु सीमा पर डेरा डाले किसान लंबी लड़ाई लड़ने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं बेबुनियाद हैं। दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार भरोसा दे रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेशन से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पदकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। हालांकि पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, केरल और हिमाचल प्रदेश में राज्य सरकारों ने पहले से ही अनुबंध खेती की सुविधा दी हुई है। इससे किसानों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इसलिए किसान कह रहे हैं कि किसान हित मंडी व्यवस्था के सुधार और एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाने में सुरक्षित हो जाएंगे। भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 विधेयकों को कानूनी दर्जा दिया है। अभीतक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गई मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्यकारी थे। अब यह बाधा खत्म हो गई है। प्रधानमंत्री ने बनारस की सभा में कहा कि, 'इसी के चलते किसान बनारस के लंगड़ा और दशहरी आम के साथ सब्जी, खाड़ी देशों से लेकर लंदन तक बेचने लगे।' किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया है। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहें उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को आशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण करके नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है। लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है। बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी। क्योंकि विधेयक में इस बाबत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। अच्छा है, सरकार इस मुद्दे को विधेयक की इबारत में स्पष्ट कर दे। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंकाएं दूर हो जाती हैं तो किसान निश्चिंत हो जाएगा। विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, नतीजतन मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभीतक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को व्यापारी के धनराशि के लिए चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति' लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में 'ए-2' फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 1 December 2020


bhopal,Beauty tips

शहनाज हुसैन सर्दियों में वातावरण में नमी की वजह से होठों का फटना आम बात है। फटे होठ जहां चेहरे को बदनुमा रूप देते हैं, शारीरिक पीड़ा का कारण भी बनते हैं। सौंदर्य विशेषज्ञों का मानना है कि नारियल तेल, आर्गन तेल पर आधारित होठों के बाम तथा लिपिस्टिक के प्रयोग से होठों को फटने से बचाया जा सकता है। होंठ चेहरे की सुन्दरता में अहम भूमिका अदा करते हैं। होंठ चेहरे की बनावट में आंखों तथा नाक की तरह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। होठों की सुन्दरता से चेहरे की आभा तथा निखार को चार चान्द लग जाते हैं। सर्दी के मौसम में नमी की कमी के अलावा शरीर में पोषाहार तत्वों की कमी की वजह से भी होंठ फट जाते हैं। शरीर में विटामिन-ए, सी तथा बी-2 की कमी से कई बार होठों में दरारें आ जाती है तथा खून बहना शुरू हो जाता है। सर्दियों में अगर आपके होंठ लगातार फट रहे हैं तथा सामान्य घरेलू उपचारों द्वारा राहत नहीं मिल रही है तो आप बाहरी सौन्दर्य प्रसाधनों की बजाय अपने खानपान पर ज्यादा ध्यान दीजिए। आप खट्टे फल, पका पपीता, टमाटर, हरी पत्तों वाली सब्जियां, गाजर, जैई तथा दूध वाले पदार्थो को जरूर शामिल कीजिए। लेकिन यदि आप डायबिटिज या उच्च रक्तचाप की समस्या से भी जूझ रहे हैं तो अपने डाईट में बदलाव से पहले डॉक्टर से सलाह-मशविरा जरूर कर लीजिए। अपने होठों पर साबुन या पाउडर के प्रयोग से परहेज कीजिए तथा होठों पर बाम तथा चिकनी लिपस्टिक का उपयोग कीजिए। होठों पर बादाम तेल या क्रीम लगाकर इसे रात्रि में लगा रहने दें। लिपस्टिक क्लीजिंग क्रीम या जैल से हटाइए। होठों को बालों या आयल गलैडस की प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं होती जिससे वह शरीर के अन्य अंगों की अपेक्षा जल्दी शुष्क हो जाती है। सर्दियों में अपने होठों को जीभ से कतई मत चाटिए। इससे होठों में शुष्कता आने से फटने की सम्भावनायें बढ़ जाती है। होठों की कद्र करने से होठों की सुन्दरता बढ़ती है। होठों की चमड़ी पतली तथा अत्यन्त संवेदनशील होती है जिससे यह सर्दियों में फट जाती है। सर्दियों में चेहरे को धोने के बाद होठों को मुलायम तौलिये से हल्के से पोंछना चाहिए ताकि मृत कोशिकाओं को हटाया जा सके। रात्रि को आप प्रतिदिन एक घंटे तक होठों पर मलाई लगाकर रख सकते हैं तथा यदि इससे होठों का रंग काला पड़ जाता है तो मलाई में नींबू जूस की कुछ बूंदें शामिल कर लीजिए। रात्रि में शुद्ध बादाम तेल तथा ऑर्गन तेल होठों की त्वचा को पौष्टिकता प्रदान करने में अहम भूमिका अदा करते हैं। ऑर्गन आयल को मुख्यतः खाद्य तेल तथा त्वचा एवं खोपड़ी की समस्या से जूझने के लिए उपयोग किया जाता रहा है। आर्गन आयल अनसैचूरेटड फैटी एसिड से भरपूर होता है तथा इससे माइस्चराइड क्रीम, लोशन, फेश पैक तथा हेयर ऑयल जैसे सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयोग किया जाता है। यह त्वचा की लचकीलेपन जैसे गुणों को बनाए रखकर त्वचा में नवयौवनता का संचार करके बुढ़ापे के लक्ष्णों को रोकता है। इससे त्वचा में शीघ्रता से समा जाने के गुणों से यह होठों के लिए अति उत्तम माना जाता है। आर्गन आयल की बूंदों को आप सीधे होठों पर मालिश कर सकते हैं। नारियल तेल को पोषक तथा नमी बनाए रखने के गुणों से भरपूर माना जाता है। यह त्वचा को मुलायम तथा कोमल बनाता है। इसे होठों पर लगाने से सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों के नुकसान को रोका जा सकता है तथा यह त्वचा की क्रीम से बेहतर सुरक्षा कवच प्रदान करता है। नारियल तेल को मुख्यतः चेहरे के मेकअप को हटाने में प्रयोग किया जा सकता है। नारियल तेल को सौंदर्य प्रसाधन तथा खाद्य तेल दोनों प्रकार से पूरी तरह सुरक्षित रूप से प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि अन्य सौंदर्य प्रसाधनों के मुकाबले इसमें कोई भी सिंथेटिक संघटक विद्यमान नहीं होते। अन्य तेलों की अपेक्षा नारियल तेल से कभी दुर्गन्ध भी नहीं आती, नारियल तेल तथा ऑर्गन तेल आधारित बाम तथा क्रीम, सर्दियों में होठों के सौंदर्य में प्रयोग की जा सकती है। (लेखिका अंंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 27 November 2020


bhopal,Beauty tips

शहनाज हुसैन सर्दियों में वातावरण में नमी की वजह से होठों का फटना आम बात है। फटे होठ जहां चेहरे को बदनुमा रूप देते हैं, शारीरिक पीड़ा का कारण भी बनते हैं। सौंदर्य विशेषज्ञों का मानना है कि नारियल तेल, आर्गन तेल पर आधारित होठों के बाम तथा लिपिस्टिक के प्रयोग से होठों को फटने से बचाया जा सकता है। होंठ चेहरे की सुन्दरता में अहम भूमिका अदा करते हैं। होंठ चेहरे की बनावट में आंखों तथा नाक की तरह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। होठों की सुन्दरता से चेहरे की आभा तथा निखार को चार चान्द लग जाते हैं। सर्दी के मौसम में नमी की कमी के अलावा शरीर में पोषाहार तत्वों की कमी की वजह से भी होंठ फट जाते हैं। शरीर में विटामिन-ए, सी तथा बी-2 की कमी से कई बार होठों में दरारें आ जाती है तथा खून बहना शुरू हो जाता है। सर्दियों में अगर आपके होंठ लगातार फट रहे हैं तथा सामान्य घरेलू उपचारों द्वारा राहत नहीं मिल रही है तो आप बाहरी सौन्दर्य प्रसाधनों की बजाय अपने खानपान पर ज्यादा ध्यान दीजिए। आप खट्टे फल, पका पपीता, टमाटर, हरी पत्तों वाली सब्जियां, गाजर, जैई तथा दूध वाले पदार्थो को जरूर शामिल कीजिए। लेकिन यदि आप डायबिटिज या उच्च रक्तचाप की समस्या से भी जूझ रहे हैं तो अपने डाईट में बदलाव से पहले डॉक्टर से सलाह-मशविरा जरूर कर लीजिए। अपने होठों पर साबुन या पाउडर के प्रयोग से परहेज कीजिए तथा होठों पर बाम तथा चिकनी लिपस्टिक का उपयोग कीजिए। होठों पर बादाम तेल या क्रीम लगाकर इसे रात्रि में लगा रहने दें। लिपस्टिक क्लीजिंग क्रीम या जैल से हटाइए। होठों को बालों या आयल गलैडस की प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं होती जिससे वह शरीर के अन्य अंगों की अपेक्षा जल्दी शुष्क हो जाती है। सर्दियों में अपने होठों को जीभ से कतई मत चाटिए। इससे होठों में शुष्कता आने से फटने की सम्भावनायें बढ़ जाती है। होठों की कद्र करने से होठों की सुन्दरता बढ़ती है। होठों की चमड़ी पतली तथा अत्यन्त संवेदनशील होती है जिससे यह सर्दियों में फट जाती है। सर्दियों में चेहरे को धोने के बाद होठों को मुलायम तौलिये से हल्के से पोंछना चाहिए ताकि मृत कोशिकाओं को हटाया जा सके। रात्रि को आप प्रतिदिन एक घंटे तक होठों पर मलाई लगाकर रख सकते हैं तथा यदि इससे होठों का रंग काला पड़ जाता है तो मलाई में नींबू जूस की कुछ बूंदें शामिल कर लीजिए। रात्रि में शुद्ध बादाम तेल तथा ऑर्गन तेल होठों की त्वचा को पौष्टिकता प्रदान करने में अहम भूमिका अदा करते हैं। ऑर्गन आयल को मुख्यतः खाद्य तेल तथा त्वचा एवं खोपड़ी की समस्या से जूझने के लिए उपयोग किया जाता रहा है। आर्गन आयल अनसैचूरेटड फैटी एसिड से भरपूर होता है तथा इससे माइस्चराइड क्रीम, लोशन, फेश पैक तथा हेयर ऑयल जैसे सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयोग किया जाता है। यह त्वचा की लचकीलेपन जैसे गुणों को बनाए रखकर त्वचा में नवयौवनता का संचार करके बुढ़ापे के लक्ष्णों को रोकता है। इससे त्वचा में शीघ्रता से समा जाने के गुणों से यह होठों के लिए अति उत्तम माना जाता है। आर्गन आयल की बूंदों को आप सीधे होठों पर मालिश कर सकते हैं। नारियल तेल को पोषक तथा नमी बनाए रखने के गुणों से भरपूर माना जाता है। यह त्वचा को मुलायम तथा कोमल बनाता है। इसे होठों पर लगाने से सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों के नुकसान को रोका जा सकता है तथा यह त्वचा की क्रीम से बेहतर सुरक्षा कवच प्रदान करता है। नारियल तेल को मुख्यतः चेहरे के मेकअप को हटाने में प्रयोग किया जा सकता है। नारियल तेल को सौंदर्य प्रसाधन तथा खाद्य तेल दोनों प्रकार से पूरी तरह सुरक्षित रूप से प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि अन्य सौंदर्य प्रसाधनों के मुकाबले इसमें कोई भी सिंथेटिक संघटक विद्यमान नहीं होते। अन्य तेलों की अपेक्षा नारियल तेल से कभी दुर्गन्ध भी नहीं आती, नारियल तेल तथा ऑर्गन तेल आधारित बाम तथा क्रीम, सर्दियों में होठों के सौंदर्य में प्रयोग की जा सकती है। (लेखिका अंंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं।)

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Dakhal News 27 November 2020


bhopal,Progress stops, due to strike, stoves, poor houses, extinguished.

सियाराम पांडेय 'शांत' विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की ताकत है लेकिन तभी जब वह सार्थक और सकारात्मक हो। इसलिए विरोध जरूरी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विरोध के नाम पर व्यवस्था बिगाड़ दी जाए। विरोध लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। जरूरी मुद्दों पर होना चाहिए और उसमें किसी भी तरह की राजनीति का प्रवेश नहीं होना चाहिए। भारतीय मजदूर संघ को अपवाद मानें तो देशभर के मजदूर संगठनों ने धरना-प्रदर्शन और रैलियों का आयोजन किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने मौके की नजाकत को देखते हुए पहले ही राज्य में एस्मा लागू कर दिया है, जिसमें कर्मचारियों के छह माह तक हड़ताल करने पर रोक है लेकिन इसके बाद भी कुछ मजदूरों संघों ने धरना-प्रदर्शन किया। रैलियां निकालीं। मजदूर संगठनों और किसानों ने संविधान दिवस को ही विरोध के लिए चुना। इसके भी अपने मंतव्य हैं। उन्हें सोचना होगा कि हर हड़ताल से देश की प्रति रुक जाती है। विकास का ढांचा हिल जाता है। विकास की श्रृंखला टूटती है, रोटेशन बिगड़ता है तो उसका खामियाजा देश के हर आम और खास को भुगतना पड़ता है और इस हड़ताल से रोजमर्रा की जिंदगी जीने वाले मजदूरों के घरों के चूल्हे बुझ जाते हैं। कभी किसी मजदूर संगठन ने उनकी पीड़ा जानने-समझने की कोशिश नहीं की। विपक्ष का हमेशा आरोप रहा है कि भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारों में संविधान की हत्या हो रही है। संविधान दिवस के ही दिन मजदूरों के धरना-प्रदर्शन और रैलियों से उनके आरोपों को मजबूती मिली है लेकिन अपनी बात को सच साबित करने के लिए उन्होंने देश का कितना नुकसान किया है। इस आंदोलन के जरिये वे कितने लोगों की परेशानियों के सबब बने हैं, इसपर शायद विचार नहीं किया गया और न ही कभी इस आत्मचिंतन होने की संभावना है। मजदूर संगठनों की जुबान पर बस एक ही बात है, वह यह कि केंद्र सरकार की नीतियां जनविरोधी, मजदूर विरोधी और राष्ट्रविरोधी हैं लेकिन अपनी बात को साबित करने के लिए बहुतों के पास कोई आधार नहीं है। जो उनके संगठन के मुखिया ने समझा दिया, वही उनके लिए ब्रह्मवाक्य है। हर आंदोलन देश को एक घाव दे जाता है और वह घाव है विकास की दौड़ में एकदिन पिछड़ जाने का। आज के मजदूर आंदोलन का भी कुल मिलाकर यही हश्र रहा है। मजदूर संगठन जब अपनी आंखों पर राजनीति का चश्मा लगा लेते हैं तो ऐसा ही होता है। अपने सवार्थ की प्रतिपूर्ति के चक्कर में वे देश का हिताहित भूल जाते हैं। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। मजदूर संगठनों का आंदोलन हो तो उन्हें समर्थन देने वालों की भी सहसा पौध उग आती है। इसबार भी कमोबेश ऐसा ही हुआ है। मजदूरों के समर्थन में किसान संगठन भी सड़कों पर उतर गए और जगह-जगह सरकारी मशीनरी के साथ उनकी खींचातानी भी हुई है। हाल ही में लागू किए गए कृषि संबंधित तीन नए कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तथा अन्य राज्यों के किसान दिल्ली चलो नारे के साथ दो दिन का विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। श्रमिकों और कर्मचारी संगठनों के आंदोलन के चलते बैंकिंग, बीमा, खनन और अन्य विनिर्माण गतिविधियां लगभग ठप रहीं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों की कोयला खदानों तथा अन्य खदानों में कामकाज नहीं हुआ। बैंकों के कर्मचारी भी हड़ताल पर रहे और बीमा कर्मचारियों ने भी हड़ताल में हिस्सा लिया। वाम दलों का अनुमान है कि आंदोलन में 25 करोड़ से अधिक कर्मचारियों ने भाग लिया। वाम समर्थित 10 केंद्रीय मजदूर संगठनों के आह्वान पर आयोजित इस हड़ताल में भारतीय जनता पार्टी समर्थक भारतीय मजदूर संघ शामिल नहीं हुआ क्योंकि भारतीय मजदूर संघ ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया है। मजदूरों की हड़ताल में बैंक कर्मचारी भी शामिल रहे तथा विभिन्न सरकारी, निजी और कुछ विदेशी बैंकों के लगभग चार लाख कर्मचारियों ने केंद्रीय मजदूर संगठनों की इस एकदिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल में भाग लिया। कुछ स्वतंत्र फेडरेशन व संगठन भी हड़ताल का हिस्सा बने। पुड्डुचेरी, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, मणिपुर, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में भी मजदूरों ने विरोध-प्रदर्शन किया। मजदूर संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार जनविरोधी नीतियां लागू कर रही है और आम जनता के खिलाफ फैसले ले रही है। मजदूर संगठन सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश और इनका निजीकरण करने का विरोध कर रहे हैं। मजदूर संगठनों ने न्यूनतम पेंशन, न्यूनतम मजदूरी, सभी मजदूरों को सामाजिक दायरे में लाने और समान वेतन व्यवस्था की मांग की है। वे हाल ही में किए गए श्रमिक सुधारों का भी विरोध कर रहे हैं और मजदूरों का आरोप है कि इनसे उनके हितों को नुकसान पहुंचेगा। हड़ताल के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान और ग्रामीण बाजार 80 प्रतिशत बंद रहे। हरियाणा और उत्तर प्रदेश से दिल्ली में आने वाले दिल्ली, गाजियाबाद बॉर्डर, दिल्ली फरीदाबाद बॉर्डर, करनाल हाईवे, हापुड़ उत्तर प्रदेश, दिल्ली-चंडीगढ़ हाईवे, अंबाला पटियाला बॉर्डर, शंभू बॉर्डर अंबाला हरियाणा बॉर्डर सहित राज्य मार्गों पर पुलिस और किसानों के बीच में जमकर संघर्ष हुआ। घनघोर शीतलहर में किसानों पर पुलिस के द्वारा आंसू गैस का प्रयोग कर वाटर कैनन से पानी की बरसात कर उन्हें भिंगोया गया फिर भी किसान डटे रहे। इससे जरूरतमंद लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को लगता है कि किसानों पर कड़ाके की ठंड में पानी की बौछार अन्याय है लेकिन रेल यातायात बाधित करना, सरकारी संपत्ति को नष्ट करना कितना जायज है, राहुल गांधी को विचार तो इस बात पर करना चाहिए। उनका तर्क है कि किसानों से सबकुछ छीना जा रहा है और पूंजीपतियों को थाल में सजाकर बैंक, कर्जमाफी, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन बांटे जा रहे हैं। सवाल यह है कि निजीकरण की पहल तो कांग्रेस शासन में भी हुई थी। जिन उद्योगपतियों को आगे बढ़ाने के वे दावे कर रहे हैं, उन उद्योगपतियों के पास क्या था। सच यह है कि उन्हें आगे बढ़ाने में कांग्रेस का भी हाथ रहा है। देश घोर राजनीतिक अराजकता के दौर से गुजर रहा है और इसका नुकसान इस देश को हो रहा है। अच्छा होता कि राजनीतिक दल और मजदूर संगठन विरोध करने से पूर्व एकबार आत्ममंथन तो कर लेते। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 27 November 2020


bhopal,Why India ,should get ,wise Muslim ,religious leaders ,like Maulana Kalbe

आर.के. सिन्हा शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक जैसे शांत और समझदार सारे मुस्लिम धर्मगुरु हो जाएं तो इस्लाम की विश्व भर में बिगड़ती छवि अवश्य सुधर सकती है। मौलाना कल्बे सादिक के निधन से हमारे देश ने ही नहीं बल्कि विश्व ने एक उदारवादी मुस्लिम धर्मगुरु खो दिया। अगर मौलाना कल्बे सादिक की सलाह को मान लिया जाता तो राम जन्मभूमि विवाद का हल दशकों पूर्व ही सभी के लिये स्वीकार करने योग्य सम्मानजनक और शांतिपूर्ण ढंग से निकल सकता था। उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद पर फैसला अगर मुसलमानों के हक में हो तो उसे शांतिपूर्वक और सम्मानपूर्वक स्वीकार करें। जहां उन्होंने मुसमलानों से उनके पक्ष में या हिन्दुओं के पक्ष में आए फैसले को शांतिपूर्वक स्वीकार करने के लिए कहा था तो उन्होंने हिंदुओं को जन्मभूमि की जमीन देने की बात भी कही थी। मतलब यह कि उनका कहना था कि विवादित स्थान पर हिन्दू भी अपना राममंदिर बना लें, जिसे वे आस्थापूर्वक रामजन्म भूमि मानते आये हैं। सबका दिल जीता था कल्बे सादिक ने कहा था कि अगर फैसला मुसलमानों के हक में न हो तो भी वे खुशी-खुशी सारी जमीन हिंदुओं को दे दें। यह बात कहकर मौलाना साहब ने सबका दिल जीत लिया था। उन्होंने एक तरह से साबित कर दिया था कि भगवान श्रीराम न मात्र हिंदुओं के हैं और न मुसलमानों के, बल्कि वे भारत की आत्मा हैं। उनकी उदारवादी सोच के कारण ही उनसे कठमुल्ले नाराज रहते थे। देखा जाए तो कठमुल्लों ने मौलाना साहब से कुछ नहीं सीखा। अगर कुछ सीखा होता तो अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होने के बाद असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी नासमझी के कारण आगबबूला नहीं होते। आपको याद होगा कि राममंदिर का शिलान्यास होने के बाद ये नासमझ कठमुल्ले कह रहे थे कि भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ गई है। असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस बेशर्मी से राममंदिर के भूमि पूजन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ज़रिये उसकी आधारशिला रखे जाने पर अनाप-शनाप बोला था, उससे मौलाना साहब दुखी जरूर हुए होंगे। मौलाना साहब ने तो हिन्दू-मुसिलम एकता के लिए जीवन भर ईमानदारी से काम किया। मोदी मुसलमानों के लिये अछूत नहीं मौलाना सादिक़ साहब को कई बार सुना तो मैं उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। वे जब थे, तो लगता था जैसे वे तकरीर नहीं आपस में बातचीत कर रहे हों, बातचीत भी इस अंदाज़ से कि हर सुनने वाले को लगता था कि वे उसी से बात कर रहे हैं। निहायत इत्मीनान और सभ्य अंदाज़ में मौलाना गुफ़्तुगू करते थे। उनकी बातों में इल्म, दूरअंदेशी और गहरा ज्ञान होता था। याद करें कि मौलाना कल्बे सादिक ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कहा था कि नरेंद्र मोदी मुसलमानों के लिये अछूत नहीं हैं। मौलाना कल्बे सादिक़ सच बोलने से कभी डरते नहीं थे। वे इस लिहाज से बहुत निर्भीक इंसान थे। वे कई बार ऐसी बातें भी बोल देते थे, जिन्हें ज्यादातर मुस्लिम समाज एकदम से पसंद नहीं करता था I लेकिन, वे कहते थे कि जो मैं कह रहा हूँ, सच्चाई यही है। उन्होंने साल 2016 में कहा था, "मुसलमानों को ख़ुद तो जीने का सलीका नहीं पता और वो युवाओं को धर्म का रास्ता दिखाते हैं। उन्हें पहले तो ख़ुद सुधरना होगा जिससे कि मुस्लिम युवा उनकी बताई राहों पर चलें। आज मुसलमानों को धर्म से ज़्यादा अच्छी शिक्षा की जरूरत है।" मौलाना कल्बे सादिक़ इस बात से बहुत चिंतित रहते थे कि मुसलमान धर्मगुरु समाज की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं। मौलाना कल्बे सादिक देश के कथित नामवर मुस्लिम लेखकों, कलाकारों और बुद्धजीवियों में से नहीं थे जो मुस्लिम समाज की कमजोरियों के संवेदनशील सवालों पर चुप्पी साध लेते हैं। वे इन बुराईयों को उजागर करने के लिए खुलकर और जमकर स्टैंड लेते थे। मुस्लिम अदीबों के साथ भारी दिक्कत यह है कि वे अपने समाज के ही गुंडों से डरते हैं। वे कभी उनसे लड़ने के लिए सामने नहीं आते। न जाने क्यों इन दबंग मुसलमानों से इतना डरते हैं ये लोग। इसलिए ये कठमुल्ले पूरे समाज में इतना आतंक मचाते हैं। पर मौलाना कल्बे कठमुल्लों को सदा ललकारते थे। इसलिए बहुत से मुसलमान उनसे नाराज भी रहते थे। पर वे एक ऐसी कमाल की शख़्सियत थे जिन्होंने सभी उदारवादी भारतीयों के दिलों में जगह बनाई थी। वे भी पाकिस्तानी मूल के, अब कनाडा में रह रहे प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार तारेक फ़तेह की तरह "अल्ला के इस्लाम" के पक्ष में थे और "मुल्लों के इस्लाम" के सख्त खिलाफ थे जो कठमुल्लों द्वारा प्रचारित था जिसका कुरान शरीफ या हदीस में जिक्र तक नहीं। माफ करें मैं यहां पाकिस्तान के मौलाना सईद को भी लाना चाहता हूं। वह भी कहने को तो इस्लाम का विद्वान है। पर वह असलियत में मौत के सौदागर है। वह मुंबई में 26/11 को हुए भयानक हमले के षड्यंत्र को रचने वाला था। लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात मुखिया हाफिज सईद की मुंबई हमलों में भूमिका जगजहिर थी। वह अजमल कसाब से भी संपर्क बनाए हुआ था। अब आप खुद सोच लें कि मौलाना कल्बे और हाफिज सईद में कितना फर्क है। दुनिया को कल्बे जैसे मौलाना चाहिए न कि सईद जैसे। कल्बे सादिक को पूरा विश्व आपसी भाईचारे और मोहब्बत का पैगाम देने वाले शिया धर्मगुरु के रूप में याद रखेगा। उन्होंने समाज के उत्थान के लिये शिक्षा के महत्व पर सदैव बल दिया। यह मानना होगा कि लगभग सभी शिया मुसलमान शिक्षा के महत्व को समझते हैं। इसलिए शिया मुस्लमान जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। मौलाना कल्बे सादिक की शिक्षा लखनऊ में हुई थी। वे चाहते थे कि मुसलमान अपने बच्चों को मदरसों के स्थान पर सबके साथ सबके जैसी आधुनिक शिक्षा दिलवाएं। चूंकि अब मौलाना कल्बे नहीं रहे तो मुसलमानों को उनके बताए रास्ते पर चलने से ही भला होगा। उन्हें फालतू के बहकावों में पड़े बिना अपने बच्चों की शिक्षा पर फोकस करना होगा। मुसलमान देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है, पर शिक्षा के मामले में सबसे खराब हालत इनकी है। वास्तव में हैरानी तब होती है कि भारत के मुसलमानों का एक बड़ा तबका मौलाना कल्बे के स्थान पर अपने को इस्लामिक विद्वान बताने वाले ढोंगी और खुराफाती जाकिर नाईक से ज्यादा प्रभावित दिखता है। अपने विवादास्पद बयानों से समाज को बांटने का कोई भी मौका न छोड़ने वाले नाईक ने कुछ समय पहले मलेशिया में कहा था कि पाकिस्तान सरकार को इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर निर्माण की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अगर यह होता है तो यह गैर-इस्लामिक होगा। देखिए मौलाना कल्बे राममंदिर बनाने की हिमायत करते थे। जबकि नाईक पाकिस्तान में मंदिर के निर्माण का विरोध करता है। इसके बावजूद उसे चाहने वाले लाखों में रहे हैं। नाईक सारे वातावरण को विषाक्त करता है, कल्बे साहब समाज को जोड़ते थे। नाईक एक जहरीला शख्स है। उसके खून में ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा करना है। ज़ाकिर नाइक भारत से भागकर मलेशिया में बसा हुआ है। वहां रहकर नाईक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू समाज की हर दिन मीन-मेख निकालता रहता है। नाईक ने मलेशिया के हिंदुओं को लेकर भी तमाम घटिया बातें कही हैं। एकबार तो उसने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू मलेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर से ज़्यादा मोदी के प्रति समर्पित हैं। उसे शायद यह नहीं पता था कि लगभग पूरा मलेशिया दक्षिण भारत के हिन्दू मछुआरों द्वारा ही बसाया गया है। वे बाद में लालच या सत्ता के दबाव में मुसलमान बनाये गये। अब आप समझ सकते हैं कि कितना नीच किस्म का इँसान है नाईक। जबकि मौलाना कल्बे कभी किसी की निंदा नहीं करते थे। सच में भारत ही नहीं पूरे विश्व को चाहिए दर्जनों कल्बे साहब जैसे मुस्लिम धर्मगुरु। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

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Dakhal News 27 November 2020


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आर.के. सिन्हा शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक जैसे शांत और समझदार सारे मुस्लिम धर्मगुरु हो जाएं तो इस्लाम की विश्व भर में बिगड़ती छवि अवश्य सुधर सकती है। मौलाना कल्बे सादिक के निधन से हमारे देश ने ही नहीं बल्कि विश्व ने एक उदारवादी मुस्लिम धर्मगुरु खो दिया। अगर मौलाना कल्बे सादिक की सलाह को मान लिया जाता तो राम जन्मभूमि विवाद का हल दशकों पूर्व ही सभी के लिये स्वीकार करने योग्य सम्मानजनक और शांतिपूर्ण ढंग से निकल सकता था। उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद पर फैसला अगर मुसलमानों के हक में हो तो उसे शांतिपूर्वक और सम्मानपूर्वक स्वीकार करें। जहां उन्होंने मुसमलानों से उनके पक्ष में या हिन्दुओं के पक्ष में आए फैसले को शांतिपूर्वक स्वीकार करने के लिए कहा था तो उन्होंने हिंदुओं को जन्मभूमि की जमीन देने की बात भी कही थी। मतलब यह कि उनका कहना था कि विवादित स्थान पर हिन्दू भी अपना राममंदिर बना लें, जिसे वे आस्थापूर्वक रामजन्म भूमि मानते आये हैं। सबका दिल जीता था कल्बे सादिक ने कहा था कि अगर फैसला मुसलमानों के हक में न हो तो भी वे खुशी-खुशी सारी जमीन हिंदुओं को दे दें। यह बात कहकर मौलाना साहब ने सबका दिल जीत लिया था। उन्होंने एक तरह से साबित कर दिया था कि भगवान श्रीराम न मात्र हिंदुओं के हैं और न मुसलमानों के, बल्कि वे भारत की आत्मा हैं। उनकी उदारवादी सोच के कारण ही उनसे कठमुल्ले नाराज रहते थे। देखा जाए तो कठमुल्लों ने मौलाना साहब से कुछ नहीं सीखा। अगर कुछ सीखा होता तो अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होने के बाद असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी नासमझी के कारण आगबबूला नहीं होते। आपको याद होगा कि राममंदिर का शिलान्यास होने के बाद ये नासमझ कठमुल्ले कह रहे थे कि भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ गई है। असदुद्दीन ओवैसी तथा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस बेशर्मी से राममंदिर के भूमि पूजन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ज़रिये उसकी आधारशिला रखे जाने पर अनाप-शनाप बोला था, उससे मौलाना साहब दुखी जरूर हुए होंगे। मौलाना साहब ने तो हिन्दू-मुसिलम एकता के लिए जीवन भर ईमानदारी से काम किया। मोदी मुसलमानों के लिये अछूत नहीं मौलाना सादिक़ साहब को कई बार सुना तो मैं उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। वे जब थे, तो लगता था जैसे वे तकरीर नहीं आपस में बातचीत कर रहे हों, बातचीत भी इस अंदाज़ से कि हर सुनने वाले को लगता था कि वे उसी से बात कर रहे हैं। निहायत इत्मीनान और सभ्य अंदाज़ में मौलाना गुफ़्तुगू करते थे। उनकी बातों में इल्म, दूरअंदेशी और गहरा ज्ञान होता था। याद करें कि मौलाना कल्बे सादिक ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कहा था कि नरेंद्र मोदी मुसलमानों के लिये अछूत नहीं हैं। मौलाना कल्बे सादिक़ सच बोलने से कभी डरते नहीं थे। वे इस लिहाज से बहुत निर्भीक इंसान थे। वे कई बार ऐसी बातें भी बोल देते थे, जिन्हें ज्यादातर मुस्लिम समाज एकदम से पसंद नहीं करता था I लेकिन, वे कहते थे कि जो मैं कह रहा हूँ, सच्चाई यही है। उन्होंने साल 2016 में कहा था, "मुसलमानों को ख़ुद तो जीने का सलीका नहीं पता और वो युवाओं को धर्म का रास्ता दिखाते हैं। उन्हें पहले तो ख़ुद सुधरना होगा जिससे कि मुस्लिम युवा उनकी बताई राहों पर चलें। आज मुसलमानों को धर्म से ज़्यादा अच्छी शिक्षा की जरूरत है।" मौलाना कल्बे सादिक़ इस बात से बहुत चिंतित रहते थे कि मुसलमान धर्मगुरु समाज की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं। मौलाना कल्बे सादिक देश के कथित नामवर मुस्लिम लेखकों, कलाकारों और बुद्धजीवियों में से नहीं थे जो मुस्लिम समाज की कमजोरियों के संवेदनशील सवालों पर चुप्पी साध लेते हैं। वे इन बुराईयों को उजागर करने के लिए खुलकर और जमकर स्टैंड लेते थे। मुस्लिम अदीबों के साथ भारी दिक्कत यह है कि वे अपने समाज के ही गुंडों से डरते हैं। वे कभी उनसे लड़ने के लिए सामने नहीं आते। न जाने क्यों इन दबंग मुसलमानों से इतना डरते हैं ये लोग। इसलिए ये कठमुल्ले पूरे समाज में इतना आतंक मचाते हैं। पर मौलाना कल्बे कठमुल्लों को सदा ललकारते थे। इसलिए बहुत से मुसलमान उनसे नाराज भी रहते थे। पर वे एक ऐसी कमाल की शख़्सियत थे जिन्होंने सभी उदारवादी भारतीयों के दिलों में जगह बनाई थी। वे भी पाकिस्तानी मूल के, अब कनाडा में रह रहे प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार तारेक फ़तेह की तरह "अल्ला के इस्लाम" के पक्ष में थे और "मुल्लों के इस्लाम" के सख्त खिलाफ थे जो कठमुल्लों द्वारा प्रचारित था जिसका कुरान शरीफ या हदीस में जिक्र तक नहीं। माफ करें मैं यहां पाकिस्तान के मौलाना सईद को भी लाना चाहता हूं। वह भी कहने को तो इस्लाम का विद्वान है। पर वह असलियत में मौत के सौदागर है। वह मुंबई में 26/11 को हुए भयानक हमले के षड्यंत्र को रचने वाला था। लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात मुखिया हाफिज सईद की मुंबई हमलों में भूमिका जगजहिर थी। वह अजमल कसाब से भी संपर्क बनाए हुआ था। अब आप खुद सोच लें कि मौलाना कल्बे और हाफिज सईद में कितना फर्क है। दुनिया को कल्बे जैसे मौलाना चाहिए न कि सईद जैसे। कल्बे सादिक को पूरा विश्व आपसी भाईचारे और मोहब्बत का पैगाम देने वाले शिया धर्मगुरु के रूप में याद रखेगा। उन्होंने समाज के उत्थान के लिये शिक्षा के महत्व पर सदैव बल दिया। यह मानना होगा कि लगभग सभी शिया मुसलमान शिक्षा के महत्व को समझते हैं। इसलिए शिया मुस्लमान जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। मौलाना कल्बे सादिक की शिक्षा लखनऊ में हुई थी। वे चाहते थे कि मुसलमान अपने बच्चों को मदरसों के स्थान पर सबके साथ सबके जैसी आधुनिक शिक्षा दिलवाएं। चूंकि अब मौलाना कल्बे नहीं रहे तो मुसलमानों को उनके बताए रास्ते पर चलने से ही भला होगा। उन्हें फालतू के बहकावों में पड़े बिना अपने बच्चों की शिक्षा पर फोकस करना होगा। मुसलमान देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है, पर शिक्षा के मामले में सबसे खराब हालत इनकी है। वास्तव में हैरानी तब होती है कि भारत के मुसलमानों का एक बड़ा तबका मौलाना कल्बे के स्थान पर अपने को इस्लामिक विद्वान बताने वाले ढोंगी और खुराफाती जाकिर नाईक से ज्यादा प्रभावित दिखता है। अपने विवादास्पद बयानों से समाज को बांटने का कोई भी मौका न छोड़ने वाले नाईक ने कुछ समय पहले मलेशिया में कहा था कि पाकिस्तान सरकार को इस्लामाबाद में हिन्दू मंदिर निर्माण की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अगर यह होता है तो यह गैर-इस्लामिक होगा। देखिए मौलाना कल्बे राममंदिर बनाने की हिमायत करते थे। जबकि नाईक पाकिस्तान में मंदिर के निर्माण का विरोध करता है। इसके बावजूद उसे चाहने वाले लाखों में रहे हैं। नाईक सारे वातावरण को विषाक्त करता है, कल्बे साहब समाज को जोड़ते थे। नाईक एक जहरीला शख्स है। उसके खून में ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा करना है। ज़ाकिर नाइक भारत से भागकर मलेशिया में बसा हुआ है। वहां रहकर नाईक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू समाज की हर दिन मीन-मेख निकालता रहता है। नाईक ने मलेशिया के हिंदुओं को लेकर भी तमाम घटिया बातें कही हैं। एकबार तो उसने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू मलेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर से ज़्यादा मोदी के प्रति समर्पित हैं। उसे शायद यह नहीं पता था कि लगभग पूरा मलेशिया दक्षिण भारत के हिन्दू मछुआरों द्वारा ही बसाया गया है। वे बाद में लालच या सत्ता के दबाव में मुसलमान बनाये गये। अब आप समझ सकते हैं कि कितना नीच किस्म का इँसान है नाईक। जबकि मौलाना कल्बे कभी किसी की निंदा नहीं करते थे। सच में भारत ही नहीं पूरे विश्व को चाहिए दर्जनों कल्बे साहब जैसे मुस्लिम धर्मगुरु। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)  

Dakhal News

Dakhal News 27 November 2020


bhopal, Corruption is courtesy

डॉ. वेदप्रताप वैदिक ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की ताजा रपट के अनुसार एशिया में सबसे अधिक भ्रष्टाचार यदि कहीं है तो वह भारत में है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इससे गंदा प्रमाणपत्र क्या मिल सकता है? इसका अर्थ क्या हुआ? क्या यह नहीं कि भारत में लोकतंत्र या लोकशाही नहीं, नेताशाही और नौकरशाही है? पिछले पांच-छह साल में नेताओं के भ्रष्टाचार की खबरें काफी कम आई हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार मुक्त हो गई है। उसका भ्रष्टाचार मुक्त होना असंभव है। इस अनिवार्यता को अब से ढाई हजार साल पहले आचार्य चाणक्य और यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अच्छी तरह समझ लिया था। इसीलिए चाणक्य ने अपने अति शुद्ध और सात्विक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया और प्लेटो ने अपने ग्रंथ 'रिपब्लिक' में 'दार्शनिक राजा' की कल्पना की, जिसका न तो कोई निजी परिवार होता है और न ही निजी संपत्ति। लेकिन आज की राजनीति का लक्ष्य इसका एक दम उल्टा है। परिवारवाद और निजी संपत्तियों के लालच ने हिंदुस्तान की राजनीति को बर्बाद करके रख दिया है। उसको ठीक करने के उपायों पर फिर कभी लिखूंगा लेकिन नेताओं का भ्रष्टाचार ही नौकरशाहों को भ्रष्ट होने के लिए प्रोत्साहित करता है। हर नौकरशाह अपने मालिक (नेता) की नस-नस से वाकिफ होता है। उसे उसके हर भ्रष्टाचार का पता या अंदाज होता है। इसीलिए नौकरशाह के भ्रष्टाचार पर नेता उंगली नहीं उठा सकता है। भ्रष्टाचार की इस नारकीय वैतरणी के जल का सेवन करने में सरकारी बाबू और पुलिसवाले भी पीछे क्यों रहें? इसीलिए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोगों के काम रिश्वत के बिना नहीं होते। इसीलिए अब से 60 साल पहले इंदौर में विनोबाजी के साथ पैदल-यात्रा करते हुए मैंने उनके मुख से सुना था कि आजकल भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 26 November 2020


bhopal,Are you also a victim of loot?

डॉ. अजय कुमार मिश्रा हम अक्सर विभिन्न माध्यमों से सुनते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट कम कर दिया है, जिसका असर यह पड़ेगा कि विभिन्न लोनधारकों की लोन ईएमआई में कमी आयेगी। यानी लोनधारकों को कम ईएमआई देनी पड़ेगी। पर क्या इसका लाभ वास्तव में मौजूदा ग्राहकों को मिलता है? यह अपने आपमें रहस्य से कम नहीं है। जानकारी का आभाव कहिये या फिर बैंको की मनमानी, इसका खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ रहा है। यह हालात तब है जबकि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया, बैंकों पर कड़ी निगरानी करता है। आपको एक-दो नहीं अनेकों लोग मिल जायेंगे जो इस लाभ से आजतक वंचित हैं और शायद अगले कई वर्षों तक वंचित रहेंगे। इसे समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या है। रेपो रेट : वह दर होती है जिसपर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है। बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को ऋण देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाते हैं, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन इत्यादि। रिवर्स रेपो रेट : वह दर होती है जिसपर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। ये दो मुख्य माध्यम है जिसके जरिये रिजर्व बैंक बाजार में नगदी को नियंत्रित करता है। यानि रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आता है। बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे। इसके ठीक विपरीत जब बाजार में नकदी की कमी होती है तो रिजर्व बैंक रेपो रेट में कमी कर देता है, जिससे आम जनता को कम ब्याज दर पर लोन मिलने लगता है और बाजार में नकदी बढ़ जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस बात को महसूस किया था कि रेपो रेट में कमी करने के लाभ को बैंक लोनधारको को स्थानांतरित नहीं कर रहे हैं इसलिए उन्होंने 24 जुलाई 2017 को इंटरनल स्टडी ग्रुप बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य रेपो रेट में कमी होने के लाभ को ग्राहकों तक कैसे पहुचाया जाये, इसपर रिपोर्ट देनी थी। 25 सितम्बर 2017 को स्टडी ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर भारतीय रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने 1 अक्टूबर 2019 से यह अनिवार्य कर दिया कि कोई भी नया लोन रेपो रेट लिंक्ड ही होगा। यानी रेपो रेट में कमी होने पर लोन की ईएमआई स्वतः कम हो जाएगी और रेपो रेट में वृद्धि होने पर लोन की ईएमआई बढ़ जाएगी। ठीक फिक्स्ड डिपोजिट और आर.डी. की तरह जहाँ बैंक तुरंत परिवर्तन लागू कर देते हैं। अक्टूबर 2019 के पहले के मौजूदा सभी लोन ग्राहकों को बैंक द्वारा सूचित करना था कि अपना लोन स्वैच्छिक रूप से रेपो रेट लिंक्ड में परिवर्तित करा लें परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई बड़े बैंकों ने इसको आजतक जरूर नहीं समझा। इसके पहले बैंक द्वारा 01 जुलाई 2010 से बेस रेट सिस्टम और 1 अप्रैल 2016 से MCLR सिस्टम पर लोन दिया जा रहा था। जो कहीं न कहीं वर्तमान रेपो रेट लिंक्ड लोन से कम फायदेमंद है। यदि आप अपने बैंक की शाखा में जाकर रेपो रेट लिंक्ड ब्याज दर में अपना मौजूदा लोन परिवर्तित कराते हैं तो नोमिनल प्रोसेसिंग चार्ज के साथ निर्धारित समयावधि पश्चात् परिवर्तित हो जायेगा और बैंक आपसे कहेगा कि मौजूदा ईएमआई ही आपको देनी है, इससे आपके लोन का प्रिंसिपल जल्दी कम होगा और निर्धारित लोन अवधि के पूर्व ही आपका लोन पूरा हो जायेगा। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ने भी खेद जताया था कि बैंक रेपो रेट में कमी का लाभ आम जनता को नहीं दे रहे हैं। वास्तविक समस्या तब फेस करनी पड़ेगी जब आप लोन की ईएमआई को कम करने की बात कहेंगे। 1000 में से 999 ग्राहकों को बैंक समझा-बुझाकर या अधूरे नियमों का हवाला देकर यह मना लेता है कि ईएमआई में कोई परिवर्तन न करना उनके हित में है और लोन अवधि के पहले पूरा करना बड़ा लाभ। जबकि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया का उद्देश्य यह है कि लोनधारकों की जेब पर ईएमआई के भार को कम किया जा सके। इससे आम आदमी अपनी कई जरूरी कार्यों को भी पूरा कर सके। मेरा स्वयं का अनुभव भी आम जनता जैसा ही रहा है। सार्वजानिक बैंक की ब्रांच में लोन को रेपो रेट लिंक्ड ब्याज दर में परिवर्तित कराने पर ब्रांच द्वारा यह बताया गया कि लोन की ईएमआई कम नहीं होगी, यह असंभव है बल्कि लोन अवधि जल्दी पूरा हो जायेगा। ब्रांच में लिखित निवेदन करने के 25 दिनों के पश्चात् कोई कार्यवाही नहीं की गयी, बैंक के ज़ोन ऑफिस में जाने के पश्चात, ब्रांच की तरह ही जवाब मिला। जब रिक्वेस्ट लैटर को बैंक के एमडी तक भेजा गया और व्यक्तिगत रूप से बात की गयी तो पूरे एक महीने पांच दिन बाद लोन की ईएमआई को परिवर्तित किया गया। एक लम्बी और जटिल प्रक्रिया और सिस्टम से लड़ना सबके बूते की बात आज के आधुनिक समाज में भी नहीं है, ऐसे में अनेकों ग्राहक आज भी वित्तीय भार से दबे हुए हैं और अपनी कई जमीनी जरूरतों का त्याग करके भारी भरकम ईएमआई भर रहे हैं।  आज भी करोड़ों कर्जधारक बैंक की मनमानी का शिकार हो रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसकी जानकारी रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को भी है, फिर भी आम आदमी ईएमआई के भार में दबा हुआ है। कहने को तो बैंकों के शिकायत अधिकारी हैं पर वहां तक मात्र .0001 प्रतिशत लोग ही पहुँच पाते हैं जिनमे से अधिकांश को समझा-बुझाकर वापस कर दिया जाता है। बैंकिंग ओम्बड्समैन आज भी आम आदमी की समझ से दूर है। अब जरूरत है रिजर्व बैंक को बड़े और कड़े निर्णय लेने की और न केवल सभी बैंको को अनिवार्य रूप से निर्देशित करें कि मौजूदा ग्राहकों द्वारा रेपो रेट लिंक्ड ईएमआई में परिवर्तित कराने पर ईएमआई स्वतः ही कम हो जाये यदि कोई लोनधारक पुरानी ईएमआई देना चाहे तो उससे शपथपत्र लिया जाये। सभी बैंक अनिवार्य रूप से अपने मौजूदा लोन ग्राहकों को अगले 6 माह में रेपो रेट लिंक्ड ब्याज दर में शामिल होने के लिए लिखित सूचना प्रेषित करें और विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से आम आदमी में जागरुकता लायी जाये जिससे आम आदमी के हितों को संरक्षित किया जा सकें। बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कम्पनी के लोन दर में समानता लायी जाये। रेपो रेट लिंक्ड लोन के लाभ को छोटे-से उदहारण से समझा जा सकता है। 50 लाख के होम लोन, 15 वर्ष की अवधि, 8.5 प्रतिशत की दर से ब्याज को, MCLR लोन रेट की अपेक्षा रेपो रेट लिंक्ड लोन में होने पर 6.57 लाख रुपये की ब्याज दर में कमी का लाभ लिया जा सकता है। यानी रेपो रेट लिंक्ड कहीं बेहतर है आम आदमी के लिए। बैंकों द्वारा लूट का खेल जारी है जिसमें सार्वजनकि क्षेत्र के बैंक भी पीछे नहीं हैं। आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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संविधान दिवस (26 नवम्बर ) पर विशेष डॉ. अजय खेमरिया आज ही के दिन (26 नवम्बर 1949) हम भारतीयों का संविधान बनकर तैयार हुआ था। आज 71 वर्ष बाद हमारा संविधान क्या अपनी उस मौलिक प्रतिबद्धता की ओर उन्मुख हो रहा है, जिसे इसके रचनाकारों ने अपनी भारतीयता के प्रधान तत्व को आगे रखकर बनाया था। आज इस सवाल को सेक्यूलरिज्म के आलोक में विश्लेषित किये जाने की भी आवश्यकता है क्योंकि मूल संविधान की इबारत में यह अवधारणा कहीं थी ही नहीं। इसे 1976 में प्रस्तावना में जोड़ा गया है। यहां सवाल यह भी उठाया जाना चाहिये कि जिस दलित चेतना के नाम पर अक्सर संविधान को बाबा साहब अंबेडकर की अस्मिता के साथ जोड़ा जाता है, क्या उसके साथ बुनियादी खिलवाड़ 1976 में ही नहीं हो गया है। दलित वर्ग को यह भय अक्सर दिखाया जाता रहा है कि कतिपय मनुवादी मानसिकता आरक्षण को खत्म कर बाबा साहब के बनाये संविधान को बदलना चाहती है लेकिन कभी इस प्रश्न को नहीं उठाया जाता कि मूल संविधान के साथ बुनियादी छेड़छाड़ क्यों और किस मानसिकता के साथ की गई है? आज इस बात पर सँवाद होना चाहिये कि क्या मौलिक रूप से भारत का संविधान उस हिन्दू जीवन दृष्टि से शासन और राजनीति को दूर रहने की हिदायत देता है क्या? जिसे आधार बनाकर पिछले 45 वर्षो में इस देश की संसदीय राजनीति और प्रशासन को परिचालित किया जाता रहा है। अगर हम मूल संविधान की प्रति उठाकर पन्नों को पलटते हैं तो हमें उसके अंदर सुविख्यात चित्रकार नन्दलाल बोस की कूची से बनाये हुए कुल 22 चित्र नजर आते हैं। इन चित्रों से हम समझ सकते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं के मन और मस्तिष्क में कैसे आदर्श भारतीय समाज की परिकल्पना रही होगी। इन चित्रों की शुरुआत मोहनजोदड़ो से होती है और फिर वैदिक काल के गुरुकुल, महाकाव्य काल में लंका पर प्रभु राम की विजय, गीता का उपदेश देते श्री कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार (मौर्यकाल), गुप्तवंशीय कला को प्रदर्शित करता हनुमानजी का दृश्य, विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा विश्वविद्यालय, उड़िया मूर्तिकला, नटराज की प्रतिमा, भागीरथ की तपस्या से गंगा का अवतरण, मुगलकाल में अकबर का दरबार, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह जी, टीपू सुल्तान और महारानी लक्ष्मीबाई, गांधी जी का दांडी मार्च, नोआखली में दंगा पीड़ितों के बीच गांधीजी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, हिमालय का प्रेरक दृश्य, रेगिस्तान का दृश्य, महासागर का दृश्य शामिल है। इन 22 चित्रों के जरिये भारत की महान परम्परा की कहानी बयां की गई है। इनमें राम कृष्ण, हनुमान, बुद्ध, महावीर, विक्रमादित्य, अकबर, टीपू सुल्तान, लक्ष्मीबाई, गांधी, सुभाष क्यों हैं? क्या केवल संविधान की किताब को कलात्मक कलेवर देने के लिये? शायद बिल्कुल नहीं।असल में यह चित्र भारत के लोकाचार और मूल्यों का प्रतिनिधित्व देने के लिये नन्दलाल बोस से बनवाये गए। ये चित्र संविधान की इबारत के जरिये शासन और सियासत के अभीष्ट निर्धारित किये गए थे। सवाल यह है कि इन्हीं 22 चित्रों में नन्दलाल बोस ने रंग क्यों भरा है संविधान की पुस्तक में? इसका बहुत ही सीधा और सरल जवाब यही है कि ये सभी चित्र भारत के महान सांस्कृतिक जीवन और विरासत के ठोस आधार हैं। ये सभी चित्र भारत की अस्मिता के प्रमाणिक अवसरों के दस्तावेज हैं जिनके साथ हर भारतवासी एक तरह के रागात्मक अनुराग जन्मना महसूस करता है। राम, कृष्ण, हनुमान, गीता, बुद्ध, महावीर, नालंदा, गुरु गोविंद असल में हजारों साल से भारतीय लोकजीवन के दिग्दर्शक हैं। जाहिर है संविधान की मूल रचना में इन्हें जोड़ने के पीछे यही सोच थी कि भारत की आधुनिकता और विकास की यात्रा इन जीवनमूल्यों के आलोक में ही निर्धारित की जाना चाहिये। लेकिन दुःखद अनुभव यह है कि पिछले कुछ दशकों ने भारतीय संविधान निर्माताओं की भावनाओं के उलट देश के शासनतंत्र और चुनावी राजनीति के माध्यम से भारत के लोकजीवन को धर्मनिरपेक्षता औऱ अल्पसंख्यकवाद के शोर से दूषित करने का प्रयास किया गया है। यही धर्मनिरपेक्षता की राजनीति भारत के आधुनिक स्वरूप की समझ और स्वीकार्यता को खोखला साबित करने के लिये पर्याप्त इसलिये है क्योंकि परम्परागत भारत और आधुनिक भारत के मध्य जिस संविधान के प्रावधानो को अलगाव का आधार बनाया जाता है असल में वे आधार तो कहीं संविधान के दर्शन में है ही नहीं। इसलिये सवाल यह है कि क्या पिछले 45 साल से संविधान की विकृत व्याख्या के जरिये इस देश की सियासत और प्रशासन को परिचालित किया जा रहा है? जिस राम, कृष्ण, हनुमान को शासन के स्तर पर सेक्युलरिज्म के शोर में अछूत मान लिया गया क्या वे संविधान निर्माताओं के लिये भी अश्पृश्य थे? क्या राम की मर्यादा, कृष्ण का गीता ज्ञान, हनुमान का शौर्य, बोस की वीरता, गुरुकुल की शैक्षणिक व्यवस्था, गांधी के रामराज्य, अकबर का सौहार्द, बुद्ध की करुणा, महावीर की शीलता, गुरुगोविंद सिंह जी का बलिदान, लक्ष्मीबाई के शौर्य का अक्स भारत के साथ समवेत होने से हमारी आधुनिकता में कोई ग्रहण लगाने का काम करता है? हमारे पूर्वजों ने ऐसा नहीं माना इसीलिए मूल संविधान में इन सभी प्रतीकों का समावेश डंके की चोट पर किया है क्योंकि भारत कोई जमीन पर उकेरी गई या जीती गई या समझौता से बनाई गई भौगोलिक संरचना मात्र नहीं है, यह तो एक जीवंत सभ्यता है जो सृष्टि के सर्जन के समानांतर चल रही है। 26 नवम्बर 1949 को जिस संविधान सभा ने नए विलेख को आत्मार्पित, आत्मसात किया है, असल में वह परम्परा और आधुनिक भारत के सुमेलन का उद्घोष मात्र था। लेकिन कालान्तर में यह धारणा मजबूत हुई कि आधुनिक भारत का आशय सिर्फ पश्चिमी नकल, परंपरागत भारत के विसर्जन के साथ हिन्दू जीवन शैली को अपमानित करने से ही है। इसी बुनियाद पर भारत के शासन तंत्र को बढ़ाने की कोशिशें की गई। जबकि यह भुला दिया गया कि जिस सनातनी संस्कार से परम्परागत भारत भरा है, वही आधुनिक भारत को वैश्विक स्वीकार्यता दिला सकता है। दुनिया में शांति, सहअस्तित्व, पर्यावरण संरक्षण जैसे आज के ज्वलंत संकटों का समाधान आखिर किस सभ्यता और सेक्युलरिज्म के पास है? सिवाय हमारे उन आदर्शों के जिन्हें आधुनिक लोग पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं। हमें यह याद रखना चाहिये कि जबतक सनातन सभ्यता की व्याप्ति सशक्त नहीं होगी, भारत दुनिया में अपनी वास्तविक हैसियत हासिल नहीं कर सकता। दुर्भाग्य से इसी आधार को शिथिल करने में एक बहुत बड़ा वर्ग लगा हुआ है। हमारे पूर्वजों के पास अद्भुत दिव्यदर्शन था इसलिए उन्होंने भारत को धर्मनिरपेक्ष नहीं बनाया बल्कि धर्मचित्रों को आगे रखकर लोककल्याण के निर्देश स्थापित किये। धर्म हमारी सनातन निधि में इस्लाम या ईसाइयत की तरह पूजा पद्धति नहीं, कर्तव्य का विस्तार है। कर्तव्य भी किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं है। इसे समझने के लिये भारत की संसद के द्वार पर उकेरी गई पंक्ति देखिये- "लोक देवेंरपत्राणर्नु पश्येम त्वं व्यं वेरा" मतलब लोगों के कल्याण का मार्ग का खोल दो उन्हें बेहतरीन सम्प्रभुता का मार्ग दिखाओ। संसद के सेंट्रल हॉल के द्वार पर लिखा है- "अयं निज:परावेति गणना लघुचेतसाम उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम' भारत सरकार का ध्येय वाक्य "सत्यमेव जयते" है। इन उद्घोष में सम्पूर्ण मानव के कल्याण और सद्गुणों की चर्चा है इसलिए संविधान निर्माताओं की गहरी अंतर्दृष्टि को हमें समझना होगा। आज योग दुनिया में लोकस्वास्थ्य का मंत्र बन रहा है। अयोध्या में राम की प्रमाणिकता को सर्वोच्च अदालत स्वीकृति दे रही है। करोड़ों भारतीय समरस होकर अपनी वैभवशाली विरासत पर गर्व कर रहे हैं। डेटा की ताकत ने आज हमारे युवाओं को राम, कृष्ण, गांधी और गीता के प्रति सजग किया है तो यह उन पूर्वजों के सपने को साकार करने की चहलकदमी ही है जिसे आज के दिन दस्तावेजों में कल्पित किया था। यह सुखद दौर है जब प्रधानमंत्री मोदी के सशक्त नेतृत्व में नया भारत नन्दलाल बोस के उकेरे गए चित्रों के अनुरूप ही आमजन और नेतृत्व को अनुप्राणित और आत्मप्रेरित कर रहा है।आज भारतीय शासन राम को लेकर किसी अपराधबोध से नहीं बल्कि गौरवभाव के साथ राममंदिर के भूमिपूजन में साष्टांग दण्डवत नजर आता है। सबका साथ सबका विकास और विश्वास, नई शासन संस्कृति का मंत्र बन रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 26 November 2020


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डॉ. रामकिशोर उपाध्याय जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद् (डीडीसी), पंचायतों एवं शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के चुनाव होने जा रहे हैं। धारा 370 हटने, लद्दाख के पृथक हो जाने और जम्मू-कश्मीर के केंद्र-शासित राज्य बन जाने के पश्चात होने वाले चुनाव अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। भाजपा के विरुद्ध वहाँ के लगभग दस स्थानीय दल एक-साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इस नए गठबंधन को गुपकार अलायंस नाम दिया गया है। कांग्रेस पार्टी इस गुपकार गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। गुपकार का घोषणापत्र पूरे देश के सामने एक चुनौती और चिंता का विषय है, वे जम्मू-कश्मीर को पुनः पुरानी स्थिति में ले जाने के लिए एकजुट हुए हैं। कांग्रेस का गुपकार में मिलना जम्मू-कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादियों के संकल्प का समर्थन माना जा रहा है। देशभर में इसके लिए कांग्रेस की आलोचना भी हो रही है। कांग्रेस का तर्क है कि भाजपा स्वयं पीडीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं? यह तर्क कहने-सुनने में तो ठीक लगता है किन्तु इसके पीछे की मंशा और उद्देश्य को जान लें तो कांग्रेस को अपनी भूल का आभास हो जाएगा। पीडीपी से गठबंधन करना भाजपा की सोची-समझी रणनीति थी, जिसके अनुसार भाजपा ने पीडीपी से जुड़कर उसका जनाधार कम कर दिया, समर्थन वापस लेकर 370 समाप्त कर दी और पीडीपी को अब्दुल्ला परिवार की शरण लेने पर विवश का दिया। क्या कांग्रेस भी ऐसे किसी बड़े उद्देश्य के लिए गुपकार से मिल रही है? कांग्रेस को गुपकार दलों के साथ जाने से लाभ कम हानि अधिक होने वाली है क्योंकि कांग्रेस का विरोध केवल भाजपा से है जबकि गुपकार का विरोध कश्मीर के विलय से है। भाजपा पीडीपी के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ जुड़ी थी और कांग्रेस गुपकार की ही शर्तों पर उनके साथ खड़ी है। यदि कांग्रेस गुपकार के एजेंडे में से 370 के विरोध को हटाकर, विकास के मुद्दे पर गठबंधन करे तो उसकी छवि उज्ज्वल बनी रहेगी। किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए स्थानीय चुनाव में हार-जीत से अधिक महत्वपूर्ण होती है उसकी विश्वसनीयता, नीतियाँ और देशहित में लिए गए निर्णय। धारा 370 हटने के बाद पिछले एक वर्ष से जम्मू-कश्मीर में शांति का वातावरण निर्मित हो रहा है। आम कश्मीरियों के मन में लोकतंत्र के प्रति आस्था और विश्वास बढ़ा है। नवयुवकों के हाथों में पत्थरों के स्थान पर नौकरी के आवेदन और सुनहरे भविष्य के सपने हैं। कश्मीरी लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़ते हुए दीख रहे हैं। इसी बात से कश्मीरियत के नाम पर राजनीति करने वाले और विदेशों से पैसा पाने वाले व्यक्ति व दल विचलित हैं। कश्मीर को पुनः अशांत करने के लिए कट्टरपंथी, अलगाववादी सहित वहाँ के प्रमुख राजनीतिक दल एक साथ, एक मंच पर आ गये हैं। यद्यपि ये एक-दूसरे के धुर-विरोधी और कट्टर शत्रु हैं किन्तु कश्मीर को देश से अलग करने के एजेंडे पर एकमत हैं। इस एजेंडे को “गुपकार घोषणा” नाम दिया गया है। इसके तहत ये लोग लद्दाख को पुनः कश्मीर में जोड़ने, 370 को लागू करने और तिरंगे के स्थान पर कश्मीरी झंडे को पुनः मान्यता दिलाने के लिए चीन और पाकिस्तान तक से सहायता माँगने को तत्पर हैं। चूँकि ये अलाइंस फारुख अब्दुल्ला के गुपकार रोड आवास पर बना इसलिए इसे गुपकार नाम दे दिया गया है। आश्चर्य ये है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी इनके साथ गठबंधन कर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है। हो सकता है ऐसा करने से कांग्रेस को घाटी में पार्टी का झंडा उठाने वाले दो-चार लोग मिल जाएँ किन्तु इससे समग्र देश में उसकी जो आलोचना आरंभ हुई है वह घातक है। अभी कांग्रेस के सामने केवल नेतृत्व का संकट है किन्तु गुपकार से जुड़ने के बाद उसके सामने अस्तित्व का संकट भी आ सकता है। गुपकार अलायंस के साथ हाथ मिलाकर कांग्रेस अपने बचे-खुचे अस्तित्व को भी दाँव पर लगाने जा रही है। देश का कोई भी नागरिक नहीं चाहता कि, जम्मू-कश्मीर में पुनः दो विधान दो निशान और दो प्रधान वाला समय लौटकर आए। देश की नई पीढ़ी अब पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को भारत में मिलाने वाले दल का समर्थन करेगी न कि गुपकार अलाइंस और उसके समर्थकों का। एक समय था जब अलगाववादी पाकिस्तान से मिल जाने का भय दिखाकर, कांग्रेस पर दवाब बनाकर, अपनी मनमानी कर लिया करते थे किन्तु अब समय बदल गया है। अलगाववादी हाशिये पर हैं, लोकतंत्र स्थापित हो रहा है, दलितों को अधिकार मिलने जा रहे हैं, लद्दाखवासी प्रसन्न हैं। ऐसे में कांग्रेस सहित देश के प्रत्येक राजनीतिक दल का कर्तव्य है कि अलगाववादियों को हतोत्साहित कर कश्मीर और कश्मीरियों को देश के साथ समरस होने दें। कश्मीर में चुनाव विकास, रोजगार, सामाजिक समरसता और समानता के अधिकार के एजेंडे पर लड़ा जाना चाहिए न कि देश को बांटने, कमजोर करने और अलगाववादी शक्तियों के हित संरक्षण के लिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 November 2020


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सियाराम पांडेय 'शांत' देश के विधान मंडलों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का शताब्दी वर्ष चल रहा है। पीठासीन अधिकारियों को संसदीय संस्थाओं में स्वस्थ परंपराओं को विकसित करने और संरक्षित करने में मदद करने के लिए अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की शुरुआत वर्ष 1921 में हुई थी। 14-15 सितंबर 2020 से 14-15 सितंबर 2021 को शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। किसी सम्मेलन के सौ साल मायने रखते हैं। हालांकि विधानमंडलों के पीठाधिकारियों के अखिल भारतीय सम्मेलन क्रमिक रूप से राज्यों में होते रहे और इसमें विधानसभा और विधान परिषद के संचालन और उसमें आने वाली दिक्कतों के समाधान का प्रयास होता रहा है। गत वर्ष देश के विधान मंडलों के पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में हुआ था जबकि इसबार संविधान दिवस के मौके पर नर्मदा के तट पर गुजरात के केवडिया में 25 और 26 नवंबर को 80 वां सम्मेलन आयोजित है। इस सम्मेलन का उद्घाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद करेंगे। नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध के निकट दुनिया की सबसे ऊंची लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के पास इस सम्मेलन के आयोजन की अपने आप में बहुत खास अहमियत है। इस वर्ष 'सशक्त लोकतंत्र हेतु विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का आदर्श समन्वय' विषय पर तो चर्चा होनी ही है, इसके अतिरिक्त विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारी लोकतंत्र के तीन स्तंभों के बीच बेहतर सहयोग और समन्वय की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालेंगे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के मुताबिक, सम्मेलन में 26 नवम्बर को संविधान दिवस के अवसर पर सभी प्रतिनिधि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के संविधान में दी गई प्रस्तावना को पढ़ेंगे। संकल्प पारित करने के साथ ही संविधान दिवस पर प्रदर्शनी भी आयोजित करेंगे। गत वर्ष देहरादून में आयोजित सम्मेलन में शून्यकाल और अन्य संसदीय साधनों के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने, क्षमता निर्माण और संविधान की दसवीं अनुसूची तथा पीठासीन अधिकारियों की भूमिका से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हुई थी। इस बावत तीन समितियों का गठन किया गया था। केवडिया में उन तीनों समितियों की रिपोर्टों पर भी विचार-मंथन होना है। वर्ष 2018 में जब गुजरात के गांधीनगर में यह सम्मेलन हुआ था तब लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हुआ करती थीं और इसबार ओम बिरला उनकी जगह होंगे। एक बात और, 26 नवंबर 1949 को भारत के संविधान को अंगीकृत किया गया था। इस लिहाज से देखा जाए तो इसबार यह देश संविधान को अंगीकृत किए जाने का 72 वां वर्ष मना रहा है। यही वजह है कि देश 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाता आ रहा है। इसमें संदेह नहीं कि इस सम्मेलन के जरिए सभी पीठासीन अधिकारियों को अपने विचार और और सुझाव को देश के समक्ष रखने का उचित मंच मिलता है, वहीं इससे विधानमंडलों में अपेक्षित और जरूरी बदलाव सहजता से कर पाना मुमकिन हो पाता है। वर्ष 2019 में देहरादून के उद्घाटन समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदनों के सुचारू संचालन पर जोर देते हुए कहा कि सभा में वाद-विवाद, सहमति-असहमति और चर्चा हो, लेकिन इसमें गतिरोध नहीं होना चाहिए। विरोध में भी गतिरोध न हो, यही विधायिका की मर्यादा है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी। उन्होंने यह भी कहा था कि विधायी निकाय लोगों की आकांक्षाओं व आस्था के मंदिर हैं। ऐसे में जरूरी है कि इन संस्थाओं में जनता के विश्वास को सुदृढ़ कर इसे मजबूत बनाया जाए। लिहाजा, लोकतंत्र के इन मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा न बनने दें। देश में मतदान का बढ़ता प्रतिशत ये बयां करता है कि लोकतंत्र के मंदिरों के प्रति जनता का विश्वास दृढ़ हुआ है। हमें इस भरोसे और लोकतंत्र की गरिमा को मजबूत बनाना होगा। वर्ष 2022 में यह देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ भी मनाएगा लेकिन क्या विधानमंडलों की कार्यवाहियां निरापद संपन्न हो पाती हैं। पीठासीन अधिकारियों की अपेक्षाओं पर सदन खरा उतर पाते हैं, संभव है, इन सवालों के जवाब एकबार फिर तलाशे जाएं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा था कि सत्ता पक्ष और विपक्ष राम व लक्ष्मण की तरह हैं। राम नरम हैं तो लक्ष्मण आक्रामक। ऐसे में पीठ की भूमिका अभिभावक की होती है। कई अवसरों पर स्थिति कष्टप्रद होती है, जिससे असहजता पैदा होती है। विचारणीय तो यह हे कि ऐसा क्यों होता है? लोकसभा अध्यक्ष की अपेक्षाओं के अनुरूप हम संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही को आज तक पेपरलेस क्यों नहीं बना पाए? संसदीय समितियों की मजबूती व पारदर्शिता पर अगर आज भी सवाल उठते हैं तो इसका मतलब कुछ तो व्यवस्थागत खामियां हैं ही। अपेक्षा की जानी चाहिए कि सरदार पटेल की प्रतिमा के नजदीक इस समस्या का संभवत: हल जरूर मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पहली बार राष्ट्रमंडल संसदीय संघ भारत क्षेत्र का 7वां सम्मेलन वर्ष 2019 में हुआ था। 2018 में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ, भारत क्षेत्र का छठां सम्मेलन पटना में हुआ था। पटना में 'सतत विकास कार्यों की प्राप्ति में संसद और सांसदों की भूमिका' इस विषय पर सार्थक चर्चा हुई थी। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने बहुत बेहतर ढंग से बजट के सभी प्रावधानों को रखा था। इस सम्मेलन में उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, असम, नागालैंड, मणिपुर, सिक्किम, मेघालय और गोवा के प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी। वर्ष 2016 में गांधीनगर में भारत के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों और सचिवों के महाकुंभ में सहमति बनी कि बड़े राज्य विधानमंडलों में साल में कम से कम 60 दिन और छोटे राज्यों में 30 दिन का कामकाज होना ही चाहिए। इसका कुछ राज्यों में असर दिखा भी लेकिन कुछ राज्य आज भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। गिरती साख और छवि की बहाली के लिए सम्मेलन में चिंतन जरूरी है। पीठासीन अधिकारियों के स्तर पर भी पूर्व के सम्मेलनों में यह बात स्वीकार की जाती रही है कि जनमानस में विधायिका की छवि धूमिल हो रही है। विश्वास बहाली के लिए विधायिका को कुछ ठोस पहल करनी होगी। अनुशासन स्थापित करना होगा। लोकतंत्र के प्रति जिस तरह देश में नैराश्य भाव पनप रहा है। सदनों में आरोप प्रत्यारोप, शोरशराबा, नारेबाजी, अध्यक्ष के आदेशों की अवहेलना, बात-बात पर अवरोध के हालात बनते हैं, उसे देखते हुए प्रभावी कदम उठाये जाने की नितांत आवश्यकता है। सदस्यों का अध्यक्ष के आसन तक पहुंच जाना, बार-बार सदन की कार्रवाई स्थगित होना और कई अशोभनीय घटनाएं साल-दर-साल अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं। सदन बाद में आरंभ होता है, उसे चलने न देने की रणनीति पहले ही बन जाती है। यह किस तरह का लोकतांत्रिक विरोध है, इस बावत सोचने-समझने की जहमत कोई भी राजनीतिक दल उठाता नहीं है। वह विरोध करते वक्त उसके प्रभाव नहीं, केवल अपनी सुविधा का संतुलन देखते है। सदन संचालन की अपनी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों से निपटे बगैर लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। इस बात को जितनी जल्दी समझ लिया जाए, उसी में देश का कल्याण है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 24 November 2020


bhopal,Who needs All India Muslim Party

आर.के. सिन्हा बिहार विधानसभा के चुनाव पर न जाने क्यों देश के कथित सेक्युलरवादियों की खास नजरें थीं। वे महागठबंधन के हक में लगातार हर प्रकार से लिख-बोल रहे थे। उनका अफसोस यह रहा कि नतीजे उनके मनमाफिक नहीं आए। अब वे मांग करने लगे हैं कि जब देश में जाति/धर्म के आधार पर शिवसेना, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी जैसे दल खड़े हो सकते हैं तो फिर एक दल मुसलमानों का भी बन जाए। ये मुसलमानों का दल अखिल भारतीय स्तर पर बने। इनका मानना है कि यह दल मुसलमानों के हकों के लिए सक्रिय हो सकता है। इस तरह की मांग करता एक लेख, देश के वरिष्ठ माने जानेवाले अंग्रेजी के लेखक स्वामीनाथन अय्यर ने लिखा है। यहां पाठकों को यह जानना जरूरी होगा कि वे कांग्रेस के पूर्व विवादास्पद सांसद मणिशंकर अय्यर जी के अनुज हैं। कहना न होगा कि एक पृथक मुस्लिम दल की मांग करना बेहद गॅंभीर मामला है। इस तरह की मांग करने वाले भूल रहे हैं कि आल इंडिया मुस्लिम लीग नाम की भी एक पार्टी थी, जिसने देश को धर्म के नाम पर 73 साल पहले बांट दिया था। वे यह भी भूल रहे हैं या भूलने का नाटक कर रहे हैं कि अब भी इस देश में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन (एमआईएम), इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) जैसे मुस्लिम हितों के लिए लड़ने वाले कई मुस्लिम दल पहले से सक्रिय हैं और जहरीली राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ओवैसी की पृष्ठभूमि जिस ओवैसी की एमआईएम को बिहार में 5 सीटों पर सफलता मिली और उससे पहले लोकसभा चुनावों में दो सीटों पर विजयी मिली थी, उसने हैदराबाद के भारत में विलय का कड़ा विरोध किया था। सन 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन नाम की पार्टी बनी। इसपर शुरू से ही ओवैसी खानदान का कब्ज़ा रहा। पहले ओवैसी के दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी का, उसके बाद उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी का। अब असद्दुदीन ओवैसी और उसके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी इसे चलाते हैं। एमआईएम हैदराबाद के गद्दार निजाम की कट्टर समर्थक थी। यही वजह है कि जब 1947 में देश आजाद हुआ तो हैदराबाद रियासत के भारत में विलय का एमआईएम ने जमकर विरोध किया था। इसके हजारों समर्थक हैदराबाद को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे। निज़ाम के राज्य में 95 प्रतिशत सरकारी नौकरियों पर उस समय मुसलमानों का ही कब्ज़ा था। सरदार पटेल ने हैदराबाद में देशद्रोही गतिविधियों से तंग आकर 10 सितंबर 1948 को हैदराबाद के निजाम को खत लिखा जिसमें उन्होंने हैदराबाद को भारत में शामिल होने का मौका दिया था। लेकिन हैदराबाद के धूर्त निजाम ने सरदार पटेल की अपील ठुकरा दी। तब एमआईएम ने भारत सरकार को खुलेआम धमकी दी कि यदि सेना ने हमला किया तो उन्हें रियासत में रह रहे करोड़ों हिन्दुओं की लाशें मिलेंगी। इस धमकी से बेपरवाह सरदार पटेल ने सितम्बर 1948 में मिलिट्री एक्शन लिया और हैदराबाद का भारत में बिना किसी खूनखराबे के विलय करवाया। कितनी पाक अजमल की पार्टी अब बात करेंगे असम में जहर फैलाने वाले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) की। इसके प्रमुख बदरुद्दीन अजमल हैं। वे इत्र के बड़े कारोबारी हैं। धुबरी से सांसद भी रहे हैं। असम में इस समय 35 प्रतिशत मुसलमान हैं।अजमल की पार्टी भी मुसलमानों को गोलबंद करने की भरसक कोशिश करती रहती है। कुछ समय पहले एआईयूडीएफ के विधायक अमीनुल इस्लाम को गिरफ्तार कर लिया गया था। अमीनुल इस्लाम पर सांप्रदायिक ऑडियो क्लिप शेयर करने का आरोप है। दरअसल पुलिस को एक ऑडियो क्लिप मिली थी, जिसमें अमीनुल इस्लाम ने निजामुद्दीन मरकज में शामिल होनेवालों के कोरोना पॉजिटिव होने पर मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी। देवबंद से पढ़ाई करने वाले अजमल की सारी राजनीति घोर सांप्रदायिक रही है। यह सच में भारत जैसे उदार देश में ही संभव है कि जिस मोहम्मद अली जिन्ना की आल इंडिया मुस्लिम लीग ने भारत को तोड़ा था, उससे मिलते-जुलते नाम से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग भारत के विभाजन के कुछ माह बाद ही राजनीतिक पार्टी के रूप में सामने आई। इसका गठन 10 मार्च 1948 को हुआ। ये मुख्य रूप से केरल में है। कभी-कभी तमिलनाडू में भी चुनाव लड़ती रही है। जरा देखिए कि जो पार्टी केरल में सक्रिय है वह मुसलमानों के लिए अंग्रेजी, अरबी और उर्दू शिक्षा की पक्षधर है। ये केरल के मुसलमानों के लिए मलयालम या राष्ट्रभाषा हिन्दी के महत्व को कत्तई तवज्जो नहीं देती। यह पार्टी भी जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को बनाए रखने के पक्ष में थी। इस पार्टी का एक घोषित लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनने से रोकना और भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाये रखना भी है। यहीं पर इसकी पोल खुलती है। यह भारत को तो एक तरफ धर्मनिरपेक्ष रखना चाहती है पर दूसरी तरफ मुसलमानों से इस्लाम के अनुसार जीवन जीने की अपेक्षा रखती है। यानि इसका कहना है मुसलमान भारत के सॅंविधान और कानून की जगह इस्लाम की जो व्याख्या मुल्ला करते हैं उसे ही मानें। यह है इसका दोहरा मापदंड। जो तथाकथित सेक्युलरवादी एक अखिल भारतीय मुस्लिम दल बनाने का सपना देख रहे हैं, वे इतिहास के कड़वे सत्य से रूबरू होना नहीं चाहते। उन्हें कौन बताए कि आल इंडिया मुस्लिम लीग भी शुरू में पृथक राष्ट्र की मांग के साथ स्थापित नहीं हुई थी। आगे चलकर उसने अलग पाकिस्तान की मांग चालू कर दी और भीषण नरसॅंहार के बाद उनकी मांग मानी भी गई। हमारे ये ही सेक्युलरवादी जिन्ना जैसे घोर सांप्रदायिक इंसान को भी बेशर्मी से सेक्युलर बता देते हैं। दरअसल ये जिन्ना के 11 अगस्त, 1947 को दिए भाषण का हवाला देकर उन्हें (जिन्ना) सेक्युलर साबित करते हैं। अंग्रेजी में दिए उस भाषण में जिन्ना कहते हैं "पाकिस्तान में अब सभी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता होगी। अब हिन्दू मंदिर में पूजा करने के लिए स्वतंत्र हैं, मुसलमान अपने इबादतगाहों में जाने को आजाद हैं।" लगता है, इन खान मार्किट गैंग के सदस्यों ने जिन्ना के 11 अगस्त,1947 के भाषण से पहले दिए किसी भाषण को जाना ही नहीं। दरअसल, जिन्ना का 23 मार्च,1940 को दिया भाषण उनकी घनघोर सांप्रदायिक सोच और पर्सनेल्टी को रेखांकित करता है। उस दिन आल इंडिया मुस्लिम लीग ने पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव मशहूर हुआ था 'पाकिस्तान प्रस्ताव' के नाम से। इसमें कहा गया था कि आल इंडिया मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र का ख्वाब देखती है। वह इसे पूरा करके ही रहेगी। प्रस्ताव के पारित होने से पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने दो घंटे लंबे बेहद आक्रामक भाषण में हिन्दुओं को कसकर कोसा था। कहा था- "हिन्दू-मुसलमान दो अलग धर्म हैं। दो अलग विचार हैं। दोनों की परम्पराएं और इतिहास अलग हैं। दोनों के नायक अलग हैं। इसलिए दोनों कतई साथ नहीं रह सकते।" तो जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले और भारत में एक अखिल भारतीय मुस्लिम दल वाले आंखें खोल लें। समझ लें कि उनकी मांग कितनी खतरनाक है। इसे देश की जनता किसी भी सूरत में नहीं मानेगी। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 24 November 2020


bhopal, Reverse ordinance of kerala

डॉ. वेदप्रताप वैदिक केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उसपर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है। इस अध्यादेश का उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों पर होनेवाले शाब्दिक हमलों से उन्हें बचाया जा सकेगा। केरल पुलिस एक्ट की इस धारा 118 (ए) के अनुसार उस व्यक्ति को तीन साल की जेल या 10 हजार रु. जुर्माना या दोनों होंगे, ''जो किसी व्यक्ति या समूह को धमकाएगा, गालियां देगा, शर्मिंदा या बदनाम करेगा।'' इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी। अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था। केरल के इस अध्यादेश में तो किसी खबर या लेख या बहस के जरिए यदि किसी के प्रति कोई गलतफहमी फैलती है या उसे मानसिक कष्ट होता है तो उसी आरोप में पुलिस उसे सीधे गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस को इतने अधिकार दे दिए गए हैं कि वह किसी शिकायत या रपट के बिना भी किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। क्या केरल में अब रूस का स्तालिन-राज या चीन का माओ-राज कायम होगा? जाहिर है कि यह अध्यादेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है। बिल्कुल इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना काम केरल की वामपंथी सरकार ने 'नागरिकता संशोधन कानून' के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके किया था। वह संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी। देश की दक्षिणपंथी सरकारों पर जिस संकीर्णता का आरोप हमारे वामपंथी लगाते हैं, वैसे ही और उससे कहीं ज्यादा संकीर्णता अब वे खुद भी दिखा रहे हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार इस कानून के सहारे अनेक पत्रकारों, लेखकों और विपक्षी नेताओं को डराने और कठघरों में खड़ा करने का काम करेगी। आश्चर्य तो इस बात का है कि आरिफ मोहम्मद खान जैसे राज्यपाल ने, जो अनुभवी राजनीतिज्ञ और कानून के पंडित हैं, ऐसे अध्यादेश पर दस्तखत कैसे कर दिए? उन्होंने पहले भी राज्य सरकार को कुछ गलत पहल करने से रोका था और इस अध्यादेश को भी वे लगभग डेढ़ माह तक रोके रहे लेकिन केरल या केंद्र के सभी वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने भी मुंह पर पट्टी बांधे रखी तो उन्होंने भी सोचा होगा कि वे अपने सिर बल क्यों मोल लें? उनके दस्तखत करते ही कांग्रेसी और भाजपा नेताओं तथा देश के बड़े अखबारों ने इस अध्यादेश की धज्जियां उड़ाना शुरू कर दीं। इसके पहले कि सर्वोच्च न्याालय इसे रद्द कर दे, केरल सरकार इसे अपनी मौत मर जाने दे तो बिल्कुल सही होगा। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 23 November 2020


bhopal, Kovid,example , negligence, capital of the country

अनिल निगम देश की राजधानी दिल्ली में कोविड महामारी का भीषण प्रकोप देखा जा रहा है। सरकार और जनता, दोनों ही स्तरों पर घोर लापरवाही का ही नतीजा है कि आज दिल्ली की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ रहे हैं। मौतें अधिक होने के कारण मृतकों का अंतिम संस्कार रात में ही किया जा रहा है। पूरे भारत में बीते शनिवार को कोविड महामारी से 501 लोगों की मौतें हुई, जिसमें महज दिल्ली में 111 लोगों की मौतें हुईं। कुछ लोग न केवल कोविड प्रोटोकाल का उल्लंघन कर रहे हैं बल्कि वे अफवाहों का बाजार भी गर्म कर रहे हैं कि कोरोना जैसा कोई वायरस नहीं है। अगर कुछ है भी तो वह साधारण बीमारी है। यही कारण है कि बहुत सारे लोग कोविड प्रोटोकाल का उल्लंघन कर रहे हैं। इसी का नतीजा है कि दिल्ली में पिछले महज 20 दिनों में संक्रमितों और मृतकों का आंकड़ा बहुत तेजी से बढ़ा है। दिल्ली सरकार यह कहकर अपनी लापरवाही पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है कि दिल्ली में संक्रमितों की संख्या इसलिए बढ़ रही है क्योंकि दिल्ली में पहले से ज्यादा टेस्टिंग हो रही है। अगर दिल्ली सरकार की इस बात को मान भी लिया जाए तो सवाल यह है कि यह टेस्टिंग पहले ही ज्यादा क्यों नहीं की गई? आज दिल्ली ने मास्क न लगाने पर चालान की राशि 500 रुपये से बढ़ाकर 2000 रुपये क्यों की? यही नहीं, अनेक ऐसे सवाल हैं जो सरकार और जनता की लापरवाही को ओर स्पष्ट इशारा करते हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि दिल्ली के अलावा पश्चिम बंगाल, राजस्थान और केरल राज्यों में भी संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों में भी मास्क लगाने में लापरवाही और दो गज की दूरी का पालन करने में कहीं न कहीं लापरवाही हो रही है। अगर हम दिल्ली की बात करें तो यह बात सच है कि लापरवाही ही एक ऐसा कारण है कि हम एक बार मई-जून वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं। लेकिन सर्वाधिक अफसोसजनक बात यह है कि शमशान घाटों में दिन-रात जलती लाशों को देखकर भी लोगों के अंदर भय नहीं पैदा हो रहा। ध्यान देने की बात यह है कि विशेषज्ञों ने पहले ही चेताया था कि दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने से कोरोना का खतरा बढ़ सकता है। अनलॉक के विभिन्न चरणों में छूट मिलने के बाद लोगों को ऐसा आभास होने लगा कि अब कोरोना खत्म हो गया है और अब गाइडलाइन्स का भी पालन करने की आवश्यकता नहीं है। यही नहीं, दशहरा और दीवाली के दौरान बाजारों में उमड़ी भीड़ ने कोविड की स्थिति को भयावह बना दिया। चूंकि लोगों ने मास्क का ठीक तरीके से प्रयोग नहीं किया और दो गज की दूरी का पालन नहीं किया। आज बाजारों में भीड़भाड़ बढ़ चुकी है। सिटी बसों, ऑटो और मेट्रो में भीड़ उमड़ रही है। सार्वजनिक स्थानों और आयोजनों के दौरान लोगों को देखकर ऐसा लगता है जैसे कोरोना खत्म हो चुका है। इसलिए स्थिति बदतर होती रही और दिल्ली सरकार भी नियमों का पालन कराने में विफल रही। यह सच है कि दिल्ली सरकार ने मई और जून महीने में दिल्ली में संक्रमण रोकने में जो तत्परता दिखाई थी, वह बाद में कहीं विलुप्त-सी हो गई है। लेकिन स्थिति खराब होने के कारण दिल्ली सरकार कुछ प्रतिबंध बढ़ाकर एकबार फिर सक्रियता दिखा रही है। वास्तविकता यह है कि दिल्ली सरकार के सरकारी अस्पतालों में कोविड का इलाज करने के लिए बिस्तर कम पड़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने 20 जून को कोरोना का इलाज करने वाले प्राइवेट अस्पतालों के बिलों को काबू करने के लिए, प्राइवेट अस्पतालों में 60 प्रतिशत बेड के कोरोना पैकेज पर लगाने का आदेश दिया था। इसके मुताबिक दिल्ली के प्राइवेट अस्पताल कोरोना के सामान्य रोगी जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत हो, उनका एक दिन का अधिकतम पैकेज 10 हजार, गंभीर रोगी जिन्हें वेंटिलेटर की जरूरत नहीं है, उनका अधिकतम पैकेज 15 हजार और गंभीर रोगी जिन्हें वेंटिलेटर की जरूरत हो उनका अधिकतम पैकेज 18 हजार रुपए तक ही हो सकता है। यह सब तय होने के बावजूद निजी अस्पतालों पर इस आदेश के उल्लंघन करने के आरोप लगते रहे हैं। यह संतोष की बात है कि केंद्र सरकार कोविड 19 को फैलने से रोकने के लिए दिल्ली सरकार की मदद के लिए आगे आई है बल्कि चिकित्सकों की टीमों को भी इस काम में लगा दिया है। सरकार बिस्तरों की संख्या बढ़ाने में सहयोग कर रही है। लेकिन सरकारों के प्रयासों के साथ-साथ हम सभी को यह समझने की आवश्यकता है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन अभी आई नहीं है। अगर वैक्सीन आ भी जाती है तो भी हमें लंबे समय तक अनुशासन में रहना होगा ताकि अपनों के जीवन को बचा सकें और कोरोना वायरस नामक साइलेंट किलर को परास्त किया जा सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 November 2020


bhopal, Corona

ऋतुपर्ण दवे कोरोना जुड़े सवालों, हकीकत और बदलते तेवरों से समूची दुनिया परेशान है। यह सच है जो दिखा भी कि एक संक्रमण जिसे आमभाषा में छुआछूत कहते हैं, कितना भयावह, जानलेवा और दुखदायी हो सकता है। इस पीढ़ी और 21 वीं सदी के लिए यह अलग अनुभव है। पृथ्वी पर मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति के इस कालखण्ड में शायद ही इससे बड़ा जीवन के लिए प्रकोप बना हो। चीन खुश होगा कि उसका भूतिया नाम दुनिया में गूंज रहा है। भले चीन इसे अपनी उपलब्धि कह ले लेकिन विश्व समुदाय में चीन की नीयत और करतूत को लेकर पनपा संदेह उस विश्वास में तब्दील हुआ है जिससे उसकी साख और धाक दोनों में जबरदस्त कमी आई है। चीन अन्दरूनी तौर पर परेशान भी होगा। इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि वुहान की प्रयोगशाला में जन्मा चीनी संक्रमण देर-सबेर चीन के ही व्यापार की ताबूत बन आखिरी कील भी साबित हो। दुनिया में चीन को लेकर नकारात्मकता, घृणा और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में मानव अस्तित्व से ऐसे खिलवाड़ की मंशा समूचा विश्व देख और समझ रहा है। बच्चे, बूढ़े, शिक्षित, अशिक्षित हर कोई कोरोना से परिचित है। लेकिन यह विडंबना नहीं तो क्या जो जीवन के लिए बेहद डरावने और जानलेवा संक्रमण को लेकर लोग एकदम से निडर हो गए! ऐसी निडरता किस कदर और कितनी भारी पड़ने वाली है इसका अंदाजा भी है, लेकिन लोग हैं कि मानते नहीं। हर धर्म और संप्रदाय में नवजात के जन्म के बाद उसको बाहरी संपर्क से रोकने के लिए अपनी-अपनी रीतियाँ हैं। अमूमन सभी का मकसद एक ही होता है कि बच्चा बुरे यानी सेहत के प्रतिकूल प्रभावों या बाहरी संक्रमण से बचा रहे और स्वस्थ रहे। बस यही भावना सरकार की कोरोना को लेकर भी है लेकिन आश्चर्य और दुख है कि शुरू में तो सरकारी आदेशों के दौर में लोगों ने इसे माना भले ही मजबूरी में और कोरोना को मात भी मिली। लेकिन यह भी सच है कि लंबे समय तक सारी गतिविधियों को ठप्प भी तो नहीं किया जा सकता। जैसे ही कठिन बंदिशों का दौर ढील में तब्दील होने लगा, लोग एकाएक इतने बेकाबू हो गए कि कोरोना संक्रमण को लेकर बनी और प्रभावी गाइड लाइन्स से उलट एकदम बेफिक्र हो गए। तमाम नियम और आदेश बस कागजों में ही सिमट गए। वाकई इस चूक, लापरवाही या नाफरमानी की बहुत बड़ी कीमत सार्वजनिक जीवन और स्वास्थ्य को लेकर चुकानी होगी और चुका भी रहे हैं। दो उदाहरणों से समझना होगा। इसी साल 15 जनवरी को साउथ कोरिया और अमेरिका में कोरोना के पहले मामले एक साथ सामने आए। जहाँ साउथ कोरिया ने पूरी सतर्कता और पारदर्शिता बरती, नागरिकों को लगातार समझाइश और चेतावनी देता रहा जिससे मार्च मध्य तक उसने काफी हद तक इसपर काबू पाकर उसे फैलने से रोक लिया। वहीं अमेरिका ने यहाँ तक कि वहाँ के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक ने मजाक उड़ाया और कोरोना को बेहद हल्के से लिया। आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश जो स्वास्थ्य सुविधाओं में अव्वल होने, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सकों की फौज, प्रयोगशालाओं, शोध में भी आगे होने के बावजूद कोरोना संक्रमण के चलते कितनी बुरी स्थिति में है सबको पता है। इतना ही नहीं कोरोना के लेकर ट्रम्प को अपने बयानों, विफलताओं यहाँ तक कि मास्क न लगा घूमने-फिरने की क्या कीमत चुकानी पड़ रही है जगजाहिर है। कोरोना के लक्षण को लेकर भी धारणा और वास्तविकता दोनों तेजी से बदले हैं। पहले मार्च में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि जिन्हें लक्षण दिख रहे हैं वहीं मास्क लगाएँ लेकिन देखते ही देखते सबके लिए मास्क जरूरी हुआ बल्कि सामाजिक दूरी भी मजबूरी बनी। इसी तरह पहले कोरोना के साधारण लक्षण सर्दी, खाँसी, खराश, बुखार और साँस लेने में तकलीफ, फेफड़े में संक्रमण और खून का थक्का जमने तक ही सीमित थे। लेकिन देखते ही देखते दूसरे गंभीर लक्षण भी कारण बनते चले गए जिनमें अतिसार यानी डायरिया, गैस्ट्रो इन्ट्राइटिस यानी जठरांत्र शोथ का कारण भी कोरोना बन गया। इसके अलावा कई लोगों को सूँघने की शक्ति का जाना, कुछ को तेज सिरदर्द तो कइयों को बहुत ज्यादा कमजोरी की शिकायत भी कोरोना वायरस का प्रकोप बना। अभी कोरोना के मामलों में एकाएक गिरावट दर्ज होने के बाद जिस तरह की देशव्यापी लापरवाहियाँ उजागर हुई हैं उससे कोरोना की दूसरी लहर को फैलने में मदद मिली। हालाकि अभी भी 7 राज्यों में 5 लाख से ऊपर संक्रमण के मामले हैं लेकिन यह आगे नहीं बढ़ेंगे इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है। सबको पता है कि भारत दुनिया का दूसरी बड़ी आबादी वाला देश है। कोरोना से निपटने की हर राज्यों की अपनी अलग योजना भी है। इसपर सभी जुटे भी हैं उसके बावजूद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और छोटे से राज्य केरल से ही अभी लगभग हर दिन कुल मामलों के 25 प्रतिशत सामने आना बेहद चिन्ताजनक संकेत है। यह भी सही है कि कई राज्यों में टेस्टिंग में कमी भी आई है, कहीं चुनाव तो कहीं उपचुनाव के चलते भी टेस्टिंग प्रभावित होने की बातें सुनाई दे रही हैं। स्वाभाविक है भारत बहुत घनी आबादी वाला देश है, कई कारण हो सकते हैं लेकिन इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि जान है तो जहान है। दिल्ली की मौजूदा स्थिति की भयावहता को नसीहत समझ ही लोग सतर्क हो जाएं तो काफी है। वहाँ संक्रमण को लेकर चौंकाने वाले आँकड़े सामने आए हैं। मौतों के हर रोज चौंकाते आँकड़ों ने एक अलग ही चिन्ता की लकीर खींच दी है। शमशान और कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी प्रतीक्षा बुरा संकेत है।  दरअसल कुछ सवाल जो कई लोग पूछते हैं वह भी जरूरी है कि रात का कर्फ्यू भी काफी हद तक प्रभावी रहा। देर रात तक घूमने-फिरने और तफरीह पर इससे जहाँ रोक लगी वहीं संक्रमण पर भी काफी काबू रहा। सबको पता है कि भारत ही नहीं दुनिया भर में शाम से लेकर रात तक मॉल, सिनेमाघर, होटल, रेस्टॉरेन्ट, क्लब, मयखाने आबाद रहते हैं। जितने लोग दिनभर सड़कों या दुकानों पर नजर नहीं आते उससे कई गुने ज्यादा रात के चन्द घण्टों में निकल पड़ते हैं। काश पूरे देश में एकबार फिर तालाबन्दी तो नहीं लेकिन रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक का नाइट कर्फ्यू लगा दिया जाए तो ठण्ड के इस मौसम जो कोरोना के लिए वरदान बनने जा रहा है, अभिशाप बन सकता है। इसके अलावा हर चेहरे पर मास्क की अनिवार्यता को कठोरता, भारी भरकम जुर्माना लगाकर लागू किया जाए। तमाम शोधों से सामने आए उस सच पर अमल किया जाए कि बार-बार हाथ धोने से कोरोना वायरस निष्प्रभावी हो जाता है। इस बात को समझा जाए कि जहाँ कोरोना ने अपने स्वरूप को और भी कठोर कर कई बीमारियों को समाहित कर लिया है। हर छोटे-बड़े संक्रमण को लेकर सतर्क रहना ही कोरोना से बचाव है और मुकाबला भी। वैक्सीन को लेकर भी समझना होगा कि पास आकर भी यह हर किसी को मयस्सर होने से रही। 135 करोड़ की आबादी उसमें भी बड़ी संख्या बुजुर्गों, बच्चों और संक्रमितों की जिन्हें तुरंत वैक्सीन की जरूरत है। ऐसे में हर किसी को तुरंत वैक्सीन मिले, असंभव है। बस बचाव ही सतर्कता है और यही कोरोना को चुनौती भी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 23 November 2020


bhopal,TV

विश्व टेलीविजन दिवस (21 नवम्बर) पर विशेष योगेश कुमार गोयल वर्ष 1925 में स्कॉटिश इंजीनियर तथा अन्वेषक जॉन लॉगी बेयर्ड द्वारा टेलीविजन का आविष्कार किया गया। उन्होंने 26 जनवरी 1926 को लंदन शहर स्थित रॉयल इंस्टीट्यूशन से लंदन के पश्चिम स्थित ‘सोहो’ नामक स्थान पर टेलीविजन संदेशों का सफल प्रसारण करके दिखाया। उनके द्वारा बनाए गए मैकेनिकल टेलीविजन के बाद 1927 में फिलो फॉर्न्सवर्थ द्वारा इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन का आविष्कार किया गया, जिसका 3 सितम्बर 1928 को उनके द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। कुछ असफलताओं के बाद सदी के महान् आविष्कार टेलीविजन को 1934 में पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक रूप देने में सफलता मिली। बिजली से चलने वाले उस अद्भुत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की बदौलत आगामी वर्षों में कई आधुनिक टीवी स्टेशन खोले गए। जिसके बाद लोग बड़ी संख्या में टीवी खरीदने लगे और टेलीविजन धीरे-धीरे मनोरंजन एवं समाचार का महत्वपूर्ण माध्यम बनता गया। इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन ने अपने आविष्कार के करीब 32 साल बाद भारत में पहला कदम रखा। भारत में टीवी का पहला प्रसारण प्रायोगिक तौर पर दिल्ली में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना के साथ 15 सितम्बर 1959 को शुरू किया गया। उस समय टीवी पर सप्ताह में केवल तीन दिन ही मात्र तीस-तीस मिनट के कार्यक्रम आते थे लेकिन इतने कम समय के बेहद सीमित कार्यक्रमों के बावजूद टीवी के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता गया और यह बहुत जल्द लोगों की आदत का अहम हिस्सा बन गया। दूरदर्शन का व्यापक प्रसार हुआ वर्ष 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के आयोजन के प्रसारण के बाद। दूरदर्शन द्वारा अपना दूसरा चैनल 26 जनवरी 1993 को शुरू किया गया और उसी के बाद दूरदर्शन का पहला चैनल डीडी-1 और दूसरा नया चैनल डीडी-2 के नाम से लोकप्रिय हो गया, जिसे बाद में ‘डीडी मैट्रो’ नाम दिया गया। भले ही टीवी के आविष्कार के इन दशकों में इसका स्वरूप और तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है लेकिन इसके कार्य करने का मूलभूत सिद्धांत अभी भी पहले जैसा ही है। ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ बुद्धू बक्सा अपने सहज प्रस्तुतिकरण के दौर से गुजरते हुए कब आधुनिकता के साथ कदमताल करते हुए सूचना क्रांति का सबसे बड़ा हथियार और हर घर की अहम जरूरत बन गया, पता नहीं चला। यह दुनिया जहान की खबरें देने और राजनीतिक गतिविधियों की सूचनाएं उपलब्ध कराने के अलावा मनोरंजन, शिक्षा तथा समाज से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं को उपलब्ध कराने, प्रमुख आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए समूचे विश्व के ज्ञान में वृद्धि करने में मदद करने वाला सशक्त जनसंचार माध्यम है। यह संस्कृतियों और रीति-रिवाजों के आदान-प्रदान के रूप में मनोरंजन का सबसे सस्ता साधन है, जो तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए पूरी दुनिया के ज्ञान में असीम वृद्धि करने में मददगार साबित हो रहा है। मानव जीवन में टीवी की बढ़ती भूमिका तथा इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 21 नवम्बर को ‘विश्व टेलीविजन दिवस’ मनाया जाता है। संचार और वैश्वीकरण में टेलीविजन की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए इसके महत्वों को रेखांकित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘विश्व टेलीविजन दिवस’ मनाने की जरूरत महसूस की गई और आम जिंदगी में टीवी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए आखिरकार टीवी के आविष्कार के करीब सात दशक बाद वर्ष 1996 में ‘विश्व टेलीविजन दिवस’ मनाने की घोषणा कर दी गई। दरअसल टीवी के आविष्कार को सूचना के क्षेत्र में ऐसा क्रांतिकारी आविष्कार माना गया है, जिसके जरिये समस्त दुनिया हमारे करीब रह सकती है। हम घर बैठे दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटनाओं को लाइव देख सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहली बार 21 तथा 22 नवम्बर 1996 को विश्व टेलीविजन मंच का आयोजन करते हुए टीवी के महत्व पर चर्चा करने के लिए मीडिया को प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया गया था। उस दौरान विश्व को परिवर्तित करने में टीवी के योगदान और टीवी के विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में व्यापक चर्चा की गई थी। उसी के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में 17 दिसम्बर 1996 को एक प्रस्ताव पारित करते हुए प्रतिवर्ष 21 नवम्बर को विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और तभी से प्रतिवर्ष 21 नवम्बर को ही यह दिवस मनाया जाता रहा है। हालांकि किसी भी वस्तु के अच्छे और बुरे दो अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। कुछ ऐसा ही सूचना एवं संचार क्रांति के अहम माध्यम टीवी के मामले में भी है। एक ओर जहां यह मनोरंजन और ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है और नवीनतम सूचनाएं प्रदान करते हुए समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, वहीं टेलीविजन की वजह से ज्ञान-विज्ञान, मनोरंजन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि तमाम क्षेत्रों में बच्चों से लेकर बड़ों तक की सभी जिज्ञासाएं शांत होती हैं। अगर नकारात्मक पहलुओं की बात करें तो टीवी के बढ़ते प्रचलन के साथ इसपर प्रदर्शित होते अश्लील, हिंसात्मक, अंधविश्वासों का बीजारोपण करने तथा भय पैदा करने वाले कार्यक्रमों के कारण हमारी संस्कृति, आस्था और नैतिक मूल्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। टीवी पर विभिन्न कार्यक्रमों में लगातार हत्या और बलात्कार जैसे दृश्य दिखाने से बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है। मौजूदा समय में टीवी मीडिया की सबसे प्रमुख ताकत के रूप में उभर रहा है और मीडिया का हमारे जीवन में इस कदर हस्तक्षेप बढ़ गया है कि टीवी के वास्तविक महत्व के बारे में अब लोगों को पर्याप्त जानकारी ही नहीं मिल पाती। देश में जहां दूरदर्शन की शुरूआत के बाद दशकों तक दूरदर्शन के ही चैनल प्रसारित होते रहे, वहीं 1990 के दशक में निजी चैनल शुरू होने की इजाजत मिलने के साथ एक नई सूचना क्रांति का आगाज हुआ। इन तीन दशकों में निजी चैनलों को लगातार मिले लाइसेंस के चलते अब देशभर में टीवी पर करीब एक हजार चैनल प्रसारित होते हैं। इससे दूरदर्शन जैसे माध्यम कमजोर हो गए हैं और अब हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां सूचना व संचार माध्यमों ने हमें इस कदर अपना गुलाम बना लिया है कि इनके अभाव में जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते। हालांकि ढेर सारे टीवी चैनलों की बदौलत जहां ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, सूचना आदि के स्रोत बढ़े हैं, वहीं चिंताजनक स्थिति यह है कि टीआरपी की बढ़ती होड़ में बहुत से निजी टीवी चैनल जिस प्रकार गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के चलते समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करते हुए दर्शकों के समक्ष कुछ भी परोसने को तैयार रहते हैं, उससे युवा पीढ़ी दिशाहीन हो रही है और जनमानस में गलत संदेशों का बीजारोपण होता है। इसीलिए मांग उठने लगी है कि दिशाहीन टीवी कार्यक्रमों के नकारात्मक प्रभावों पर अंकुश लगाने और अपसंस्कृति के प्रसार को रोकने के लिए इन पर कुछ कड़े कानूनी प्रतिबंधों का प्रावधान होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 November 2020


bhopal,China weakens BRICS

आर.के. सिन्हा दुनिया भर में आतंकवाद से लड़ने के मामले में भारत को छोड़कर शेष ब्रिक्स देशों की लुंजपुंज नीति इसकी उपयोगिता पर ही सवाल खड़े करती है। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को वर्चुअल रूप से संबोधित करते हुए दुनियाभर में आतंकवाद के बढ़ते खतरों पर चिंता जताते हुए संकेतों में ही सही, चीन और पाकिस्तान को आड़े हाथों लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये दोनों देश दुनिया में आतंकवाद फैलाने में मदद करते हैं और उसे खाद-पानी देते रहते हैं। चीन तो ब्रिक्स का सदस्य ही है। भारतीय प्रधानमंत्री जब अपनी बात रख रहे थे, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहे थे। कहीं न कहीं वे सोच रहे होंगे कि मोदी जी का इशारा उन्हीं की तरफ है। हैरानी इस बात की है कि भारत को छोड़कर ब्रिक्स का कोई भी अन्य देश पाकिस्तान या चीन के खिलाफ शिखर सम्मेलन में नहीं बोला। किसी ने भी चीन से यह सवाल नहीं पूछा कि वह क्यों आतंकवाद की फैक्ट्री पाकिस्तान का साथ देता है या ब्रिक्स के साथी देश भारत की सरहद पर जंग के हालात पैदा कर रहा है? ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संघ है। इसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। ब्रिक्स की स्थापना 2009 में हुई थी। इसे 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले "ब्रिक" ही कहा जाता था। रूस को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश ही हैं जिनकी अर्थव्यवस्था विश्व भर में आज के दिन सबसे तेजी से बढ़ रही है। क्या आतंकवाद के मसले पर सभी ब्रिक्स देशों को चीन और पाकिस्तान के खिलाफ समवेत स्वर से बोलना नहीं चाहिए था? क्या ब्रिक्स को चीन की निंदा नहीं करनी चाहिए थी कि वह ब्रिक्स के ही एक सदस्य देश भारत की सीमा पर जंग के हालात पैदा कर रहा है? दुनिया की 40 फीसद से अधिक आबादी ब्रिक्स देशों में ही रहती है। कहने को तो ब्रिक्स के सदस्य देश वित्त, व्यापार, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, संचार, श्रम आदि मसलों पर परस्पर सहयोग का वादा करते रहते हैं। पर चीन ब्रिक्स आंदोलन को लगातार कमजोर कर रहा है। चीन भारत के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहा है। चीन के इस रवैये पर रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका चुप लगाये रहते हैं। जिस रूस से भारत के पुराने और एतिहासिक कूटनीतिक संबंध है वह भी चीन के खिलाफ एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं है। इस मामले में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की भी बोलती बंद ही रहती है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से संबंध भारत के दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी और ब्राजील से फुटबॉल के चलते प्रगाढ़ सबंध हैं। गांधी जी 1893 से लेकर 1915 तक दक्षिण अफ्रीका में ही रहे और मूल नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह करते रहे। 1915 में वह भारत लौटे। बापू ने 7 जून,1893 को दक्षिण अफ्रीका में ही "सविनय अवज्ञा" का पहली बार इस्तेमाल किया था। दक्षिण अफ्रीका के जननेता नेल्सन मंडेला उनसे प्रेरणा लेते रहे। दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान गांधीजी को कई बार गिरफ्तार किया गया। लेकिन, सच की लड़ाई लड़कर जीतने वाले उसी नेल्सन मंडेला का वही दक्षिण अफ्रीका आज सच के साथ खड़ा नहीं होता। वह चीन को कोसता तक नहीं कि चीन की नीतियों के कारण ब्रिक्स कमजोर हो रहा है। उधर, भारत के करोड़ों फुटबॉल प्रेमी ब्राजील की फुटबॉल टीम और उसके सितारों को चीयर करते रहे हैं। भारतीय फुटबॉल प्रेमियों की ब्राजील को लेकर निष्ठा शुरू से रही है। हालांकि लैटिन अमेरिकी स्पेनिश भाषी ब्राजील देश भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, पर हमारे फुटबॉल प्रेमी ब्राजील में ही भारत की छाप देखते हैं। पेले, रोमोरियो से लेकर रोनोल्डो जैसे ब्राजील के खिलाड़ियों ने भारत में अपनी खास जगह बनाई हुई है। पर ब्राजील भी भारत का साथ नहीं देता। याद नहीं आता कि कभी इन देशों ने भारत के हक में आवाज बुलंद की हो। अव्वल दर्जे का दुष्ट कौन चीन तो अव्वल दर्जे का बेशर्म देश है। उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कहते हैं, 'आतंकवाद सभी देशों के लिए एक आम चुनौती है। पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई में जबरदस्त प्रयास और बलिदान किया है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसका सम्मान करना चाहिए और पहचान भी की जानी चाहिए। चीन सभी तरह के आतंकवाद का विरोध करता भी रहा है। लेकिन, चीन अपने स्वार्थ में अब बदला-बदला सा नजर आ रहा है। दरअसल सारी दुनिया को पता है कि जब समूची विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर सख्त कदम उठाने के लिए दबाव बनाती रही है, तब दुष्ट चीन पाकिस्तान को बेशर्मी बचाता रहा है। दरअसल पाकिस्तान दुनियाभर में आतंकवाद की फैक्ट्री के रूप में अपने को स्थापित करके बदनाम हो चुका है। दुनिया में कहीं भी कोई आतंकवाद की घटना हो, उसमें किसी पाकिस्तानी का हाथ अवश्य होता है। जिस देश ने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को संरक्षण प्रदान किया उस देश पर दुनिया यकीन किस आधार पर करेगी? लादेन वहां पर पूरे कुनबे के साथ पुर्णतः सुरक्षित माहौल में मस्ती कर रहा था। उसी पाकिस्तान में हाफिज सईद और अजहर महमूद जैसे आतंकी पल रहे हैं। इन्हें पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई से ही तो संरक्षण और धन मिलता है। इस तरह के आतंकवादी पाकिस्तान और उसके आका चीन के खिलाफ ब्रिक्स एक स्तर से बोलने में डरता क्यों है? क्या आतंकवाद सिर्फ भारत का मसला है? कोरोना महामारी के चलते ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसबार वर्चुअली आयोजित हुआ। ब्रिक्स सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान मोदी जी ने आतंकवाद के मुद्दे पर बिना नाम लिए पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया। पाकिस्तान का नाम लेने की जरूरत भी नहीं थी। उसके बारे में सबको पता है। उसके विपरीत भारत की संस्कृति में पूरे विश्व को एक परिवार की तरह माना गया है। पीस कीपिंग में सबसे ज्यादा सैनिक भारत ने ही खोए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकवाद आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में खड़ी है। इसे हम हाल के समय में फ्रांस से लेकर स्वीडन तक में देख रहे हैं। भारत तो आतंकवाद के कारण अपने दो प्रधानमंत्रियों को भी खो चुका है। वक्त की मांग है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि आतंकवादियों को समर्थन और सहायता देने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए। तभी तो इस समस्या का संगठित तरीके से मुकाबला किया जा सकता है। बेशक, ब्रिक्स दुनिया से आतंकवाद को खत्म करने के स्तर पर एक बड़ी मुहिम चला सकता था। पर अभीतक उसके कदम इस लिहाज से तेज रफ्तार से नहीं बढ़े हैं। यह चिंतनीय है कि संसार का इतना महत्वपूर्ण संगठन आतंकवाद से लड़ने में अपनी जरूरी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 20 November 2020


bhopal,Gimmick on Hafiz Saeed

डॉ. वेदप्रताप वैदिक पाकिस्तान की जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद को 10 साल की जेल की सजा हो गई है। वह पहले से ही लाहौर में 11 साल की जेल काट रहा है। अब ये दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। ये सजाएं पाकिस्तान की ही अदालतों ने दी हैं। क्यों दी हैं? क्योंकि पेरिस के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कोष संगठन ने पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद कर रखा है। उसने पाकिस्तान का नाम अपनी भूरी सूची में डाल रखा है, क्योंकि उसने सईद जैसे आतंकवादियों को अभीतक छुट्टा छोड़ रखा था। हाफिज सईद की गिरफ्तारी पर अमेरिका ने लगभग 75 करोड़ रु. का इनाम 2008 में घोषित किया था लेकिन वह 10-11 साल तक पाकिस्तान में खुला घूमता रहा। किसी सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि वह उसे गिरफ्तार करती। दुनिया के मालदार मुल्कों के आगे पाकिस्तान के नेता भीख का कटोरा फैलाते रहे लेकिन मुफ्त के 75 करोड़ रु. लेना उन्होंने ठीक नहीं समझा। क्यों नहीं समझा? इसीलिए कि हाफिज सईद तो उन्हीं का खड़ा किया गया पुतला था। जब मेरे-जैसा घनघोर राष्ट्रवादी भारतीय पत्रकार उसके घर में बे-रोक-टोक जा सकता था तो पाकिस्तान की पुलिस क्यों नहीं जा सकती थी? अमेरिका ने जो 75 करोड़ रु. का पुरस्कार रखा था, वह भी किसी ढोंग से कम नहीं था। यदि वह उसामा बिन लादेन को उसके गुप्त ठिकाने में घुसकर मार सकता था तो सईद को पकड़ना उसके लिए कौन-सी बड़ी बात थी? लेकिन सईद तो भारत में आतंक फैला रहा था। अमेरिका को उससे कोई सीधा खतरा नहीं था। अब जबकि खुद पाकिस्तान की सरकार का हुक्का-पानी खतरे में पड़ा तो देखिए, उसने आनन-फानन सईद को अंदर कर दिया। सईद की यह गिरफ्तारी भी दुनिया को एक ढोंग ही मालूम पड़ रही है। सईद और उसके साथी जेल में जरूर रहेंगे लेकिन इमरान-सरकार के दामाद की तरह रहेंगे। अब उनके खाने-पीने, दवा-दारु और आने-जाने का खर्चा भी पाकिस्तान सरकार ही उठाएगी। उन्हें राजनीतिक कैदियों की सारी सुविधाएं मिलेंगी। आंदोलनकारी कैदी के रूप में मैं खुद कई बार जेल काट चुका हूं। जेल-जीवन के आनंद का क्या कहना? भारत में आतंकवाद फैलाकर इन तथाकथित जिहादियों ने, पाकिस्तानी फौज और सरकार की जो सेवा की है, उसका पारितोषिक अब उन्हें जेल में मिलेगा। ज्यों ही पाकिस्तान भूरी से सफेद सूची में आया कि ये आतंकवादी रिहा हो जाएंगे। पाकिस्तानी आतंकवादियों के कारण पाकिस्तान सारी दुनिया में 'नापाकिस्तान' बन गया है और भारत और अफगानिस्तान से ज्यादा निर्दोष मुसलमान पाकिस्तान में मारे गए हैं। पाकिस्तान यदि जिन्ना के सपनों को साकार करना चाहता है और शांतिसंपन्न राष्ट्र बनना चाहता है तो उसे इन गिरफ्तारियों की नौटंकी से आगे निकलकर आतंकवाद की नीति का परित्याग करना चाहिए। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 20 November 2020


bhopal,Chhath Mahaparva, festival,inspire rivers, become pollution free

योगेश कुमार गोयल पंच पर्व महोत्सव दीवाली के बाद प्रतिवर्ष प्रकृति की पूजा का महापर्व ‘छठ’ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 20 नवम्बर को मनाया जा रहा है। बुधवार से इस पूजा की शुरुआत हो चुकी है। सूर्य को एकमात्र ऐसा भगवान माना जाता है, जो वास्तव में हर किसी को दिखाई देते हैं और छठ पर्व पर सूर्य भगवान की ही पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय उत्सव की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है और इस दौरान श्रद्धालु 36 घंटे का कठिन व्रत रखते हैं। छठ पूजा की शुरुआत चतुर्थी के दिन ‘नहाय खाय’ से होती है। अगले दिन ‘खरना’ होता है, तीसरे दिन छठ पर्व का प्रसाद तैयार किया जाता है और स्नान कर अस्त होते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। सप्तमी को चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य की पूजा-आराधना के साथ इस महापर्व का समापन होता है। चूंकि सूर्योपासना का यह महापर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, इसीलिए इसे छठ कहा जाता है। सही मायने में यह आस्था और निष्ठा का अनुपम लोकपर्व है। उत्तर भारत और विशेषकर पर बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सूर्योपासना का यह महापर्व सूर्य, उनकी पत्नी उषा और प्रत्यूषा, प्रकृति, जल, वायु और सूर्य की बहन छठी मैया को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठी मैया संतानों की रक्षा करती हैं और उनको लंबी आयु प्रदान करती हैं। कहा जाता है कि छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से वह प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख-समृद्धि, रोगमुक्ति, सम्पन्नता और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। उषा तथा प्रत्यूषा को सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत माना गया है, इसीलिए छठ पर्व में सूर्य तथा छठी मैया के साथ इन दोनों शक्तियों की भी आराधना की जाती है। प्रातःकाल सूर्य की पहली किरण (उषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्ध्य देकर दोनों को नमन किया जाता है। पुराणों में पष्ठी देवी का एक नाम कात्यायनी भी है, जिनकी पूजा नवरात्र में षष्ठी को होती है। षष्ठी देवी को ही छठ मैया कहा गया है, जो निःसंतानों को संतान देती हैं और संतानों की रक्षा कर उनको दीर्घायु बनाती हैं। छठ पर्व के प्रसाद में प्रायः ठेकुआ और चावल के लड्डू बनाए जाते हैं। बांस की टोकरी में प्रसाद तथा अनेक प्रकार के मौसमी फल सजाकर इस टोकरी की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं सूर्य को अर्ध्य देने तथा पूजा के लिए तालाब, नदी अथवा घाट पर जाकर स्नान कर डूबते सूर्य की पूजा करती हैं और अगले दिन सूर्योदय के समय सूर्य को अर्ध्य देकर पूजा करने के पश्चात् प्रसाद बांटकर छठ पूजा का समापन होता है। पर्यावरणविदों के अनुसार यह पर्व सबसे ज्यादा पर्यावरण अनुकूल हिन्दू त्यौहार है, जो नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने का प्रेरणा देता है। छठ पूजा के अवसर पर नदियों, तालाबों तथा अन्य जलाशयों के किनारे पूजा की जाती है, जिससे लोगों को ऐसे जलस्रोतों के आसपास साफ-सफाई रखने की प्रेरणा मिलती है। दरअसल धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठ पूजा साफ-सुथरी नदी, तालाबों या अन्य जलस्रोतों के किनारे ही की जाती है, इसीलिए पूजा से पहले इन जलस्रोतों के आसपास पूरी साफ-सफाई करने का विधान है। छठ व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथानुसार प्राचीन काल में प्रियव्रत नामक एक राजा थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। इससे वे बेहद दुखी और चिंतित रहा करते थे। एक दिन राजा की महर्षि कश्यप से भेंट होने पर उन्होंने अपना दुख महर्षि कश्यप के समक्ष व्यक्त किया। महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए उन्हें यज्ञ करने को कहा। राजा ने यज्ञ कराया, जिसके बाद महारानी मालिनी ने एक पुत्र को तो जन्म दिया लेकिन शिशु मृत ही पैदा हुआ। दुखी राजा ने मृत शिशु को श्मशान ले जाकर पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने का भी निश्चय किया। तभी ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना ने प्रकट होकर राजा से कहा कि हे राजन्! मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण षष्ठी कहलाती हूं, आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी मेरी पूजा के लिए प्रेरित करें। राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। मान्यता है कि उसी के बाद छठ पूजा की परम्परा शुरू हुई। इस पर्व की शुरुआत को लेकर कुछ मान्यताएं महाभारत काल से भी जुड़ी हैं। पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी आयु के लिए नियमित रूप से सूर्य की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पाण्डव जब अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे, तब श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार द्रौपदी ने छठ व्रत रखा और छठी मैया के आशीर्वाद से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होने पर पाण्डवों को राजपाट वापस मिला। सूर्यपुत्र कर्ण तो भगवान सूर्य के परम भक्त थे, जो प्रतिदिन घंटों तक कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्ध्य दिया करते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान् योद्धा बने थे। माना जाता है कि सर्वप्रथम महाबली कर्ण ने ही सूर्यदेव की पूजा शुरू की थी और आज भी छठ पर्व में सूर्य को अर्ध्य देने का विशेष महत्व है। एक मान्यता यह भी है कि देवमाता अदिति ने प्रथम देवासुर संग्राम में असुरों से देवताओं के हार जाने पर तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। छठी मैया ने उनकी आराधना से प्रसन्न होकर उन्हें सर्वगुण सम्पन्न तेजस्वी पुत्र को जन्म देने का वरदान दिया, जिसके बाद अदिति ने त्रिदेव रूप आदित्य भगवान को जन्म दिया, जिन्होंने देवताओं को असुरों पर विजय दिलाई। कहा जाता है कि तभी से छठ पर्व मनाए जाने का चलन शुरू हो गया। ऐसी मान्यता है कि लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्यदेव ने ही की थी। सूर्य को ज्योतिष विधा में सभी ग्रहों का अधिपति माना गया है। इसीलिए मान्यता है कि यदि समस्त ग्रहों को प्रसन्न करने के बजाय केवल सूर्यदेव की ही आराधना की जाए तो कई लाभ मिल सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 November 2020


bhopal,Curb on love jihad is necessary

प्रमोद भार्गव देश के कई नगरों में बड़े विवाद का कारण बन रहे लव जिहाद पर प्रतिबंध के लिए कठोर कानूनी उपाय जरूरी हैं। मध्य प्रदेश समेत उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, कर्नाटक की राज्य सरकारों ने इस दृष्टि से कानून के प्रारूप की तैयारी शुरू कर दी है। इस नजरिए से मप्र सरकार 'मध्य प्रदेश धर्म स्वातंत्रय (संशोधन) विधेयक 2020’ आगामी विधानसभा सत्र में लाएगी। इस बावत गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि इस विधेयक में लव जिहाद के दोषी को 5 साल की सजा के प्रावधान के साथ मामला गैर जमानती धाराओं में दर्ज होगा। अभीतक धर्म परिवर्तन कराने वाले को ही दोषी माना जाता है, नए कानून में जबर्दस्ती या अन्य हथकंडे अपनाकर धर्म परिवर्तन कर शादी करने वाले के माता-पिता, भाई-बहन और अन्य सहयोगियों को भी आरोपी बनाया जाएगा। लव जिहाद की मध्य प्रदेश समेत देश में बढ़ती घटनाओं के चलते इस तरह का कानून लाना जरूरी हो गया है। दरअसल लव जिहाद और धर्मांतरण अब देश में आतंकवाद के प्रच्छन्न रूप में सामने आ रहे हैं। इसलिए इनसे निपटना किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए आवश्यक है। धर्मांतरण को लेकर दुनिया में सबसे बेहतर कानून म्यांमार का है। वहां वर्ष 2000 में ही इस सिलसिले में कठोर कानून अस्तित्व में आ गया था। यहां धर्म परिवर्तन पर ही प्रतिबंध है। इसमें दो अलग-अलग धर्म के स्त्री-पुरुष बिना धर्म परिवर्तन किए विवाह कर सकते हैं। इसमें भी शादी के बाद होने वाली संतान की धर्म की स्वतंत्रता मर्जी से चुनने का अधिकार है। भिन्न धर्म के पति-पत्नी को अपनी-अपनी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार रीति-रिवाज के पालन की भी छूट है। सही मायनों में यही धार्मिक स्वतंत्रता और अंतर धार्मिक विवाह है। क्योंकि जब भिन्न धर्मावलंबी प्रेम का परवान चढ़कर वैवाहिक गठबंधन की दहलीज पर पैर रखते हैं, तब उनके मनोभाव परस्पर केवल प्रेम से जुड़े होते हैं, न कि किसी धार्मिक मान्यता की बाध्यता से? हिंदु, सिख, जैन व बौद्ध युगल यथास्थिति में रहते हुए ही विवाह के बंधन में बंध जाते हैं किंतु इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता है। वहां यदि लड़की हिंदू है तो उसे हर हाल में इस्लाम की स्वीकारोक्ति के बाद ही निकाह की अनुमति मिलती है। इसलिए ऐसे विवाह को हम अंतरधार्मिक विवाह कहकर उदारता भी नहींं दिखा सकते? दरअसल अंतरधार्मिक विवाह वह कहलाएगा, जिसमें विवाह करने वाले दंपत्ति की स्वतंत्र धार्मिकता प्रचलन में रहे और वह परिवार समेत समाज में भी मंजूर हो? लेकिन मुसलमानों में ऐसा कतई देखने में नहीं आता है। बल्लभगढ़ का निकिता तोमर की सरेराह हुई हत्या इसका ताजा उदाहरण है। खासतौर से हिंदु मुस्लिमों के बीच होने वाले विवाह प्रेम की पवित्रता से जुड़े होते तब तो इन्हें ठीक माना जा सकता था, किंतु अब इनमें धर्म परिवर्तन का “षड्यंत्र, प्रलोभन और बहला फुसलाकर जबरन शादी कर लेने के मामले सामने आ रहे हैं। इसलिए हिंदु समाज ही नहीं केरल की कैथोलिक चर्च भी ऐसे प्रेम को लव जिहाद कहकर ईसाई समाज को चेतावनी दे रहा है। 19 जनवरी 2020 को सर्वोच्च सिरो मालाबार कैथोलिक चर्च ने प्रति रविवार को होने वाली प्रार्थना सभा में एक परिपत्र जारी कर कहा कि ईसाई लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाकर उनका धर्मांतरण कर उन्हें आतंकी संगठन इस्लामी स्टेट (आईएस) का सदस्य तक बनाया जा रहा है। लखनऊ में तो मोहम्मद कातिल पत्रकारिता की आड़ में लव जिहाद का खेल खेलता रहा। चिनहट की रहने वाली जब एक युवती इससे पत्रकारिता के गुर सीखने आई तो इसने कॉफी में नशीला पदार्थ पिलाकर दुराचार किया। वीडियो फिल्म बनाई और फिर शादी कर लेने को कहा, जबकि उसकी पहली पत्नी भी हिंदु है और उसके दो बच्चे हैं। अब इस युवती की शिकायत पर इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। उत्तर प्रदेश के ही मेरठ में 23 जुलाई 2020 को एक बेहद व खौफनाक मामला सामने आया था। यहां के शाकिब नाम के मुस्लिम युवक ने अमन बनकर एक बीकॉम युवती को अपने कथित लव जिहाद में फंसाया। शादी के नाम पर उससे 25 लाख रुपए भी ठग लिए। इसके बाद जब ईद के दिन युवती को असलियत पता चली तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जब इस फरेबी मोहब्बत का पर्दाफाश हो गया तो शाकिब ने अपने परिजनों व मित्रों के साथ मिलकर युवती की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी। कानपुर में इसी तरह के एक जबरन धर्म परिवर्तन के मामले में एसआईटी की जांच में पाकिस्तानी फंडिंग की बात सामने आई है। साफ है लव जिहाद से जुड़े ऐसे मामले न केवल जबरन धर्म परिवर्तन, बल्कि मासूम हिंदू युवतियों की हत्या और आतंकवाद के भी पर्याय बन रहे हैं। ऐसे ही एक मामले के परिप्रेक्ष्य में 30 अक्टूबर 2020 को हलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा था, 'विवाह से धर्म परिवर्तन का कोई सरोकार नहीं है। जब धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को जिस धर्म को वह अपनाने जा रहा है, उस धर्म के मूल सिद्धांतों के बारे में ही कोई जानकारी है, न उसकी मान्यताओं और विश्वासों के प्रति कोई आस्था है, तो फिर धर्म परिवर्तन का क्या औचित्य?’ दरअसल धर्म परिवर्तन के बाद विवाह करने वाले एक जोड़े ने न्यायालय से संरक्षण की मांग की थी। न्यायामूर्ति एमसी त्रिपाठी ने 2014 के नूरजहां बेगम मामले का हवाला देकर इस याचिका को खारिज कर दिया था। ऐसी पांच याचिकाएं थीं जिनमें न्यायालय से पूछा गया था कि क्या सिर्फ विवाह के लिए धर्म परिवर्तन हो सकता है? इन मामलों में भोली-भाली हिंदू लड़कियों ने मुस्लिम लड़कों के बरगलाने पर इस्लाम कबूल कर लिया था। जबकि इन लड़कियों को इस धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि कोई भी राज्य सरकार चाहे तो धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बना सकती है। इसमें जबरन धर्म बदलने और जबरन शादी करने को लेकर कानूनी प्रावधान हो सकते हैं। कोई भी व्यक्ति धर्म के प्रलोभन में आकर धर्म नहीं बदल सकता है। ओडीशा में 1967 से ही कपटपूर्वक धर्मांतरण प्रतिबंधित है। इस कानून के मुताबिक प्रलोभन, ताकत या किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करके व्यक्ति का धर्मांतरण नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार से यदि धर्म परिवर्तन किया जाता है तो धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति को एक साल की सजा और 50 हजार के जुर्माने का प्रावधान है। 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने विवाह केवल वैवाहिक लक्ष्य पूर्ति के लिए धर्म परिवर्तन करने की मंशा पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव प्रदेश सरकार को दिया था। हमारे तथाकथित उदारवादी लोग धार्मिक स्वतंत्रता के बहाने कपटपूर्ण लव जिहाद को भी जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। ऐसी इकतरफा पक्षधरता इस्लामिक धर्मांधता को बढ़ाने वाली है। जबकि ये लव जिहादी हिंदू स्त्री अस्मिता की जड़ पर प्रहार करते हुए उसके मन और शरीर से खिलवाड़ कर उसे मौत देने तक का काम कर रहे हैं। साफ है, धार्मिक स्वतंत्रता की ओट में जो प्रेम लव जिहाद के रूप में फलता है, वह हरेक प्रेम निश्चल नहीं होता है। बहरहाल धर्मनिरपेक्षता बहु सांस्कृतिक स्वरूप और अंतर धार्मिकता के बहाने लव जिहाद जैसी विक्रति पर आवरण डालना देश हित में कतई नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 19 November 2020


bhopal,Troops stay in Kabul

डॉ. वेदप्रताप वैदिक अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की है कि वह अपनी सेना के 2500 जवानों को अफगानिस्तान से वापस बुलवाएगा। यह काम क्रिसमस के पहले ही संपन्न हो जाएगा। जिस अफगानिस्तान में अमेरिका के एक लाख जवान थे, वहां सिर्फ 2 हजार ही रह जाएं तो उस देश का क्या होगा ? ट्रंप ने अमेरिकी जनता को वादा किया था कि वे अमेरिकी फौजों को वहां से वापस बुलवाकर रहेंगे क्योंकि अमेरिका को हर साल उनपर 4 बिलियन डाॅलर खर्च करना पड़ता है, सैकड़ों अमेरिकी फौजी मर चुके हैं और वहां टिके रहने से अमेरिका को कोई फायदा नहीं है। 2002 से अभीतक अमेरिका उस देश में 19 बिलियन डाॅलर से ज्यादा पैसा बहा चुका है। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी फौजों को काबुल में टिकाए रखने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि अब तो सोवियत संघ का कोई खतरा नहीं है, पाकिस्तान से पहले-जैसी घनिष्टता नहीं है और ट्रंप के अमेरिका को दूसरों की बजाय खुद पर ध्यान देना जरूरी है। ट्रंप की तरह ओबामा ने भी अपने चुनाव-अभियान के दौरान फौजी वापसी का नारा दिया था लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इस मामले में काफी ढील दे दी थी लेकिन ट्रंप ने फौजों की वापसी तेज करने के लिए कूटनीतिक तैयारी भी पूरी की थी। उन्होंने जलमई खलीलजाद के जरिए तालिबान और काबुल की गनी सरकार के बीच संवाद कायम करवाया और इस संवाद में भारत और पाकिस्तान को भी जोड़ा गया। माना गया कि काबुल सरकार और तालिबान के बीच समझौता हो गया है लेकिन वह कागज पर ही अटका हुआ है। अमल में वह कहीं दिखाई नहीं पड़ता। आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं। इस समय नाटो देशों के 12 हजार सैनिक अफगानिस्तान में हैं। अफगान फौजियों की संख्या अभी लगभग पौने दो लाख है जबकि उसके-जैसे लड़ाकू देश को काबू में रखने के लिए करीब 5 लाख फौजी चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि बाइडन-प्रशासन वहां अपने, नाटो और अन्य देशों के 5 लाख फौजी कम से कम दो साल के लिए संयुक्तराष्ट्र की निगरानी में भिजवा दे तो अफगानिस्तान में पूर्ण शांति कायम हो सकती है। ट्रंप को अभी अपना वादा पूरा करने दें (25 दिसंबर तक)। 20 जनवरी 2021 को बाइडन जैसे ही शपथ लें, काबुल में वे अपनी फौजें डटा दें। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान पहली बार काबुल पहुंचे हैं लेकिन तालिबान को काबू करने की उनकी हैसियत 'ना' के बराबर है। बाइडन खुद अमेरिकी फौजों की वापसी के पक्ष में बयान दे चुके हैं लेकिन उनकी वापसी ऐसी होनी चाहिए कि अफगानिस्तान में उनकी दुबारा वापसी न करना पड़े। यदि अफगानिस्तान आतंक का गढ़ बना रहेगा तो अमेरिका सहित भारत-जैसे देश भी हिंसा के शिकार होते रहेंगे। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 19 November 2020


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सियाराम पांडेय 'शांत' वैदिक काल से चला आ रहा भगवान सूर्य की आराधना-उपासना का लोकपर्व सूर्यषष्ठी यानी छठ बुधवार से आरंभ हो गया। 36 घंटे की कठिन साधना का यह पर्व 21 नवंबर की सूर्योदय तक चलेगा। इसबार यह पर्व कोविड नियमावली के तहत मनाया जाएगा, जिसमें छठव्रती महिलाओं यानी परवैतिनों को छठ घाटों पर नहाने की अनुमति नहीं है। घाट पर जाने वालों को मास्क जरूर लगाना होगा। वृद्धों-बच्चों के छठ घाटों पर जाने की सख्त मनाही है। इस पर्व की शुरुआत कब हुई पहली पूजा किसने की- यह सवाल आम है। कुछ विद्वान जहां छठ माता को भगवान सूर्य की गायत्री और सावित्री शक्ति मानते हैं। इसे गायत्री उपासना का पर्व करार देते हैं, कुछ विद्वान इसे षोडश लोकमातृकाओं में एक देवसेना के रूप में अभिहित करते हैं। 'गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया। देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः।' बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल समेत देश के विभिन्न शहरों में नदियों और तालाबों के किनारे अस्त होते सूर्य और उगते सूर्य को जल देकर सामाप्त होने वाला यह पर्व बुधवार से नहाय-खाय से शुरू हुआ। जिसमें लौकी दाल और चावल बनता है। उसके अगले दिन खरना होता है जिसमें खीर और पूरी बनती है। छठ करने वाली महिलाएं और पुरुष खरना की खीर खाकर व्रत की शुरुआत करते हैं। दो दिन बाद सुबह का अर्घ्य देने के पश्चात ही अन्न और जल ग्रहण करते हैं। सूर्य को अर्घ्य 20 नवम्बर की शाम और 21 की सुबह दिया जायेगा। महापर्व छठ को लेकर घर से घाट तक तैयारियां जोरों पर है। व्रती घर की साफ-सफाई के साथ व्रत के लिए पूजन सामग्री खरीदने में जुट गए हैं। कोई व्रती अपने घर में नहाय-खाय के लिए चावल चुनने में लगी हैं तो कोई छत पर गेहूं सुखाने में लगी हैं। छठ व्रतियों के लिए तालाबों और नदियों के घाटों को साफ-सुथरा और सजाने के काम में विभिन्न इलाकों की छठ पूजा समिति और स्वयं सेवक भी लगे हुए हैं। मुंबई, दिल्ली, गुजरात व कोलकाता आदि महानगरों से बड़ी संख्या में परदेसी घर को लौट रहे हैं। इससे ट्रेनों और बसों में भीड़ बढ़ गई है। छठ व्रत का मुख्य प्रसाद ठेकुआ है। यह गेहूं का आटा, गुड़ और देशी घी से बनाया जाता है। प्रसाद को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। ऋतु फल में नारियल, केला, पपीता, सेब, अनार, कंद, सुथनी, गागल, ईख, सिघाड़ा, शरीफा, कंदा, संतरा, अनन्नास, नींबू, पत्तेदार हल्दी, पत्तेदार अदरक, कोहड़ा, मूली, पान, सुपारी, मेवा आदि का साम‌र्थ्य के अनुसार गाय के दूध के साथ अ‌र्घ्य दिया जाता है। यह दान बांस के दऊरा, कलसुप नहीं मिलने पर पीतल के कठवत या किसी पात्र में दिया जा सकता है। नहाय-खाय के दूसरे दिन सभी व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं। सुबह से व्रत के साथ इसी दिन गेहूं आदि को धोकर सुखाया जाता है। दिनभर व्रत के बाद शाम को पूजा करने के बाद व्रती खरना करते हैं। इस दिन गुड़ की बनी हुई चावल की खीर और घी में तैयार रोटी व्रती ग्रहण करेंगे। कई जगहों पर खरना प्रसाद के रूप में अरवा चावल, दाल, सब्जी आदि भगवान भाष्कर को भोग लगाया जाता है। इसके अलावा केला, पानी सिघाड़ा आदि भी प्रसाद के रूप में भगवान आदित्य को भोग लगाया जाता है। खरना का प्रसाद सबसे पहले व्रती खुद बंद कमरे में ग्रहण करते हैं। खरना का प्रसाद मिट्टी के नये चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया जाता है। इस व्रत की खासियत यह है कि इस पर्व को करने के लिए किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती है और न ही मंत्रोचारण की जरूरत है। राजनीतिक दल भी इस त्योहार का राजनीतिक लाभ लेने की भरपूर कोशिश करते हैं। इसबार तो बिहार चुनाव में भी छठ व्रत को बिना किसी विघ्न के कराने के दावे किए गए थे। यह व्रत देश में सुख-समृद्धि लाए। देश के प्राणीमात्र का कल्याण हो, इतनी कामना हर देशवासी को है। कब हुई शुरुआत 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया था। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी। छठ के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी हुई है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान कराकर रक्षा की थी। इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। कार्तिक से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी 'देवसेना' नाम से भी पूजा जाता है। इस देवसेना को सूर्य की बहन के रूप में निरूपित किया जाता है। कहने को तो यह बिहार के लोगों का प्रमुख लोकपर्व है लेकिन सच तो यह है कि अब इस पर्व की व्याप्ति देश के हर उस शहर में हो गई है जहां बिहार के लोग रहते हैं। बिहार,झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों का यह प्रमुख लोकपर्व दिल्ली और महाराष्ट्र में भी, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी अपना ठीक-ठाक प्रभाव दिखाने लगा है। इस पर्व के दौरान वैदिक आर्य संस्कृति की झलक को सहजता से देखा-समझा जा सकता है। ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन का वर्णन मिलता है। यह पर्व मूलत: प्रकृति पर्व है। प्रकृति को मान-सम्मान का पर्व है। शुचिता और पवित्रता का पर्व है। त्याग, तितीक्षा और तपस्या का पर्व है। अब तो विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी इस पर्व में रुचि लेने लगे हैं। इस पर्व की खास विशेषता है कि इसमें मूर्ति पूजा की अपेक्षा प्रकृति की पूजा और आराधना को ही अहमियत दी गई है। छठ पूजा विशेषत: सूर्य, उषा, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी यानी षष्ठी को समर्पित है। सूर्योपासना का वर्णन ऋग्वेद, विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में विस्तार से मिलता है। चारों वेदों, उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों में भी सूर्य की उपासना-वंदना का जिक्र मिलता है। ऐसी मान्यता है कि मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के लोकपर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था जो अभी तक बदस्तूर चला आ रहा है। उत्तर वैदिक काल के अन्तिम चरण में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना विसित होने लगी। बाद में यह सूर्य की मूर्ति पूजा के रूप में परिवर्तित हो गई। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर भगवान सूर्य के मंदिर भी बने। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इसका प्रभाव विशेष पाया था। छठ पर्व के उद्भव की संभवत: यही बड़ी वजह थी। ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम देव माता अदिति ने छठ पूजा की थी। प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम से जानी गईं और छठ का चलन भी शुरू हो गया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 18 November 2020


bhopal,Chhath Puja, Mahaparva ,public faith

सियाराम पांडेय 'शांत' वैदिक काल से चला आ रहा भगवान सूर्य की आराधना-उपासना का लोकपर्व सूर्यषष्ठी यानी छठ बुधवार से आरंभ हो गया। 36 घंटे की कठिन साधना का यह पर्व 21 नवंबर की सूर्योदय तक चलेगा। इसबार यह पर्व कोविड नियमावली के तहत मनाया जाएगा, जिसमें छठव्रती महिलाओं यानी परवैतिनों को छठ घाटों पर नहाने की अनुमति नहीं है। घाट पर जाने वालों को मास्क जरूर लगाना होगा। वृद्धों-बच्चों के छठ घाटों पर जाने की सख्त मनाही है। इस पर्व की शुरुआत कब हुई पहली पूजा किसने की- यह सवाल आम है। कुछ विद्वान जहां छठ माता को भगवान सूर्य की गायत्री और सावित्री शक्ति मानते हैं। इसे गायत्री उपासना का पर्व करार देते हैं, कुछ विद्वान इसे षोडश लोकमातृकाओं में एक देवसेना के रूप में अभिहित करते हैं। 'गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया। देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः।' बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल समेत देश के विभिन्न शहरों में नदियों और तालाबों के किनारे अस्त होते सूर्य और उगते सूर्य को जल देकर सामाप्त होने वाला यह पर्व बुधवार से नहाय-खाय से शुरू हुआ। जिसमें लौकी दाल और चावल बनता है। उसके अगले दिन खरना होता है जिसमें खीर और पूरी बनती है। छठ करने वाली महिलाएं और पुरुष खरना की खीर खाकर व्रत की शुरुआत करते हैं। दो दिन बाद सुबह का अर्घ्य देने के पश्चात ही अन्न और जल ग्रहण करते हैं। सूर्य को अर्घ्य 20 नवम्बर की शाम और 21 की सुबह दिया जायेगा। महापर्व छठ को लेकर घर से घाट तक तैयारियां जोरों पर है। व्रती घर की साफ-सफाई के साथ व्रत के लिए पूजन सामग्री खरीदने में जुट गए हैं। कोई व्रती अपने घर में नहाय-खाय के लिए चावल चुनने में लगी हैं तो कोई छत पर गेहूं सुखाने में लगी हैं। छठ व्रतियों के लिए तालाबों और नदियों के घाटों को साफ-सुथरा और सजाने के काम में विभिन्न इलाकों की छठ पूजा समिति और स्वयं सेवक भी लगे हुए हैं। मुंबई, दिल्ली, गुजरात व कोलकाता आदि महानगरों से बड़ी संख्या में परदेसी घर को लौट रहे हैं। इससे ट्रेनों और बसों में भीड़ बढ़ गई है। छठ व्रत का मुख्य प्रसाद ठेकुआ है। यह गेहूं का आटा, गुड़ और देशी घी से बनाया जाता है। प्रसाद को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। ऋतु फल में नारियल, केला, पपीता, सेब, अनार, कंद, सुथनी, गागल, ईख, सिघाड़ा, शरीफा, कंदा, संतरा, अनन्नास, नींबू, पत्तेदार हल्दी, पत्तेदार अदरक, कोहड़ा, मूली, पान, सुपारी, मेवा आदि का साम‌र्थ्य के अनुसार गाय के दूध के साथ अ‌र्घ्य दिया जाता है। यह दान बांस के दऊरा, कलसुप नहीं मिलने पर पीतल के कठवत या किसी पात्र में दिया जा सकता है। नहाय-खाय के दूसरे दिन सभी व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं। सुबह से व्रत के साथ इसी दिन गेहूं आदि को धोकर सुखाया जाता है। दिनभर व्रत के बाद शाम को पूजा करने के बाद व्रती खरना करते हैं। इस दिन गुड़ की बनी हुई चावल की खीर और घी में तैयार रोटी व्रती ग्रहण करेंगे। कई जगहों पर खरना प्रसाद के रूप में अरवा चावल, दाल, सब्जी आदि भगवान भाष्कर को भोग लगाया जाता है। इसके अलावा केला, पानी सिघाड़ा आदि भी प्रसाद के रूप में भगवान आदित्य को भोग लगाया जाता है। खरना का प्रसाद सबसे पहले व्रती खुद बंद कमरे में ग्रहण करते हैं। खरना का प्रसाद मिट्टी के नये चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया जाता है। इस व्रत की खासियत यह है कि इस पर्व को करने के लिए किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती है और न ही मंत्रोचारण की जरूरत है। राजनीतिक दल भी इस त्योहार का राजनीतिक लाभ लेने की भरपूर कोशिश करते हैं। इसबार तो बिहार चुनाव में भी छठ व्रत को बिना किसी विघ्न के कराने के दावे किए गए थे। यह व्रत देश में सुख-समृद्धि लाए। देश के प्राणीमात्र का कल्याण हो, इतनी कामना हर देशवासी को है। कब हुई शुरुआत 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया था। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी। छठ के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी हुई है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान कराकर रक्षा की थी। इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। कार्तिक से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी 'देवसेना' नाम से भी पूजा जाता है। इस देवसेना को सूर्य की बहन के रूप में निरूपित किया जाता है। कहने को तो यह बिहार के लोगों का प्रमुख लोकपर्व है लेकिन सच तो यह है कि अब इस पर्व की व्याप्ति देश के हर उस शहर में हो गई है जहां बिहार के लोग रहते हैं। बिहार,झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों का यह प्रमुख लोकपर्व दिल्ली और महाराष्ट्र में भी, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी अपना ठीक-ठाक प्रभाव दिखाने लगा है। इस पर्व के दौरान वैदिक आर्य संस्कृति की झलक को सहजता से देखा-समझा जा सकता है। ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन का वर्णन मिलता है। यह पर्व मूलत: प्रकृति पर्व है। प्रकृति को मान-सम्मान का पर्व है। शुचिता और पवित्रता का पर्व है। त्याग, तितीक्षा और तपस्या का पर्व है। अब तो विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी इस पर्व में रुचि लेने लगे हैं। इस पर्व की खास विशेषता है कि इसमें मूर्ति पूजा की अपेक्षा प्रकृति की पूजा और आराधना को ही अहमियत दी गई है। छठ पूजा विशेषत: सूर्य, उषा, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी यानी षष्ठी को समर्पित है। सूर्योपासना का वर्णन ऋग्वेद, विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में विस्तार से मिलता है। चारों वेदों, उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों में भी सूर्य की उपासना-वंदना का जिक्र मिलता है। ऐसी मान्यता है कि मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के लोकपर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था जो अभी तक बदस्तूर चला आ रहा है। उत्तर वैदिक काल के अन्तिम चरण में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना विसित होने लगी। बाद में यह सूर्य की मूर्ति पूजा के रूप में परिवर्तित हो गई। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर भगवान सूर्य के मंदिर भी बने। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इसका प्रभाव विशेष पाया था। छठ पर्व के उद्भव की संभवत: यही बड़ी वजह थी। ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम देव माता अदिति ने छठ पूजा की थी। प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम से जानी गईं और छठ का चलन भी शुरू हो गया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 18 November 2020


bhopal,Chhath Puja, Mahaparva ,public faith

सियाराम पांडेय 'शांत' वैदिक काल से चला आ रहा भगवान सूर्य की आराधना-उपासना का लोकपर्व सूर्यषष्ठी यानी छठ बुधवार से आरंभ हो गया। 36 घंटे की कठिन साधना का यह पर्व 21 नवंबर की सूर्योदय तक चलेगा। इसबार यह पर्व कोविड नियमावली के तहत मनाया जाएगा, जिसमें छठव्रती महिलाओं यानी परवैतिनों को छठ घाटों पर नहाने की अनुमति नहीं है। घाट पर जाने वालों को मास्क जरूर लगाना होगा। वृद्धों-बच्चों के छठ घाटों पर जाने की सख्त मनाही है। इस पर्व की शुरुआत कब हुई पहली पूजा किसने की- यह सवाल आम है। कुछ विद्वान जहां छठ माता को भगवान सूर्य की गायत्री और सावित्री शक्ति मानते हैं। इसे गायत्री उपासना का पर्व करार देते हैं, कुछ विद्वान इसे षोडश लोकमातृकाओं में एक देवसेना के रूप में अभिहित करते हैं। 'गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया। देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः।' बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल समेत देश के विभिन्न शहरों में नदियों और तालाबों के किनारे अस्त होते सूर्य और उगते सूर्य को जल देकर सामाप्त होने वाला यह पर्व बुधवार से नहाय-खाय से शुरू हुआ। जिसमें लौकी दाल और चावल बनता है। उसके अगले दिन खरना होता है जिसमें खीर और पूरी बनती है। छठ करने वाली महिलाएं और पुरुष खरना की खीर खाकर व्रत की शुरुआत करते हैं। दो दिन बाद सुबह का अर्घ्य देने के पश्चात ही अन्न और जल ग्रहण करते हैं। सूर्य को अर्घ्य 20 नवम्बर की शाम और 21 की सुबह दिया जायेगा। महापर्व छठ को लेकर घर से घाट तक तैयारियां जोरों पर है। व्रती घर की साफ-सफाई के साथ व्रत के लिए पूजन सामग्री खरीदने में जुट गए हैं। कोई व्रती अपने घर में नहाय-खाय के लिए चावल चुनने में लगी हैं तो कोई छत पर गेहूं सुखाने में लगी हैं। छठ व्रतियों के लिए तालाबों और नदियों के घाटों को साफ-सुथरा और सजाने के काम में विभिन्न इलाकों की छठ पूजा समिति और स्वयं सेवक भी लगे हुए हैं। मुंबई, दिल्ली, गुजरात व कोलकाता आदि महानगरों से बड़ी संख्या में परदेसी घर को लौट रहे हैं। इससे ट्रेनों और बसों में भीड़ बढ़ गई है। छठ व्रत का मुख्य प्रसाद ठेकुआ है। यह गेहूं का आटा, गुड़ और देशी घी से बनाया जाता है। प्रसाद को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। ऋतु फल में नारियल, केला, पपीता, सेब, अनार, कंद, सुथनी, गागल, ईख, सिघाड़ा, शरीफा, कंदा, संतरा, अनन्नास, नींबू, पत्तेदार हल्दी, पत्तेदार अदरक, कोहड़ा, मूली, पान, सुपारी, मेवा आदि का साम‌र्थ्य के अनुसार गाय के दूध के साथ अ‌र्घ्य दिया जाता है। यह दान बांस के दऊरा, कलसुप नहीं मिलने पर पीतल के कठवत या किसी पात्र में दिया जा सकता है। नहाय-खाय के दूसरे दिन सभी व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं। सुबह से व्रत के साथ इसी दिन गेहूं आदि को धोकर सुखाया जाता है। दिनभर व्रत के बाद शाम को पूजा करने के बाद व्रती खरना करते हैं। इस दिन गुड़ की बनी हुई चावल की खीर और घी में तैयार रोटी व्रती ग्रहण करेंगे। कई जगहों पर खरना प्रसाद के रूप में अरवा चावल, दाल, सब्जी आदि भगवान भाष्कर को भोग लगाया जाता है। इसके अलावा केला, पानी सिघाड़ा आदि भी प्रसाद के रूप में भगवान आदित्य को भोग लगाया जाता है। खरना का प्रसाद सबसे पहले व्रती खुद बंद कमरे में ग्रहण करते हैं। खरना का प्रसाद मिट्टी के नये चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया जाता है। इस व्रत की खासियत यह है कि इस पर्व को करने के लिए किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती है और न ही मंत्रोचारण की जरूरत है। राजनीतिक दल भी इस त्योहार का राजनीतिक लाभ लेने की भरपूर कोशिश करते हैं। इसबार तो बिहार चुनाव में भी छठ व्रत को बिना किसी विघ्न के कराने के दावे किए गए थे। यह व्रत देश में सुख-समृद्धि लाए। देश के प्राणीमात्र का कल्याण हो, इतनी कामना हर देशवासी को है। कब हुई शुरुआत 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया था। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी। छठ के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी हुई है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान कराकर रक्षा की थी। इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। कार्तिक से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी 'देवसेना' नाम से भी पूजा जाता है। इस देवसेना को सूर्य की बहन के रूप में निरूपित किया जाता है। कहने को तो यह बिहार के लोगों का प्रमुख लोकपर्व है लेकिन सच तो यह है कि अब इस पर्व की व्याप्ति देश के हर उस शहर में हो गई है जहां बिहार के लोग रहते हैं। बिहार,झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों का यह प्रमुख लोकपर्व दिल्ली और महाराष्ट्र में भी, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी अपना ठीक-ठाक प्रभाव दिखाने लगा है। इस पर्व के दौरान वैदिक आर्य संस्कृति की झलक को सहजता से देखा-समझा जा सकता है। ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन का वर्णन मिलता है। यह पर्व मूलत: प्रकृति पर्व है। प्रकृति को मान-सम्मान का पर्व है। शुचिता और पवित्रता का पर्व है। त्याग, तितीक्षा और तपस्या का पर्व है। अब तो विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी इस पर्व में रुचि लेने लगे हैं। इस पर्व की खास विशेषता है कि इसमें मूर्ति पूजा की अपेक्षा प्रकृति की पूजा और आराधना को ही अहमियत दी गई है। छठ पूजा विशेषत: सूर्य, उषा, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी यानी षष्ठी को समर्पित है। सूर्योपासना का वर्णन ऋग्वेद, विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में विस्तार से मिलता है। चारों वेदों, उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों में भी सूर्य की उपासना-वंदना का जिक्र मिलता है। ऐसी मान्यता है कि मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के लोकपर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था जो अभी तक बदस्तूर चला आ रहा है। उत्तर वैदिक काल के अन्तिम चरण में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना विसित होने लगी। बाद में यह सूर्य की मूर्ति पूजा के रूप में परिवर्तित हो गई। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर भगवान सूर्य के मंदिर भी बने। पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इसका प्रभाव विशेष पाया था। छठ पर्व के उद्भव की संभवत: यही बड़ी वजह थी। ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम देव माता अदिति ने छठ पूजा की थी। प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम से जानी गईं और छठ का चलन भी शुरू हो गया। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  

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Dakhal News 18 November 2020


bhopal,Recep: China

डॉ. वेदप्रताप वैदिक दुनिया के सबसे बड़े साझा बाजार (रिसेप) की घोषणा वियतनाम में हो गई है। इसमें 15 देश शामिल होंगे और अगले दो वर्ष में यह चालू हो जाएगा। साझा बाजार का अर्थ यह हुआ कि इन सारे देशों का माल-ताल एक-दूसरे के यहां मुक्त रूप से बेचा और खरीदा जा सकेगा। उसपर तटकर या अन्य रोक-टोक नहीं लगेगी। ऐसी व्यवस्था यूरोपीय संघ में है लेकिन ऐसा एशिया में पहली बार हो रहा है। इस बाजार में दुनिया का 30 प्रतिशत व्यापार होगा। इस संगठन में चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और द. कोरिया के अलावा एसियान संगठन के 10 राष्ट्र शामिल होंगे। 2008 में इसका विचार सामने आया था। इसे पकने में 12 साल लग गए लेकिन 2017 में ट्रंप के अमेरिका ने इस संगठन का बहिष्कार कर दिया और भारत इसका सहयोगी होते हुए भी इससे बाहर रहना चाहता है। भारत ने पिछले साल ही इससे बाहर रहने की घोषणा कर दी थी। इसके दो कारण थे। एक तो यह कि भारत को डर था कि उसका बाजार इतना बड़ा है कि उसपर कब्जा करने के लिए चीन किसी भी हद तक जा सकता है। उसका अमेरिकी बाजार आजकल सांसत में है। इसीलिए वह अपने सस्ते माल से भारतीय बाजारों को पाट डालेगा। इससे भारत के व्यापार-धंधे ठप्प हो जाएंगे। दूसरा यह कि 'एसियान' के ज्यादातर देशों के साथ भारत का मुक्त-व्यापार समझौता है और उसके कारण भारत का निर्यात कम है और आयात बहुत ज्यादा है। पिछले साल एसियान देशों के साथ भारत का निर्यात 37.47 बिलियन डाॅलर का था जबकि आयात 59.32 बिलियन डाॅलर का रहा। चीन के साथ भी घोर व्यापारिक असंतुलन पहले से ही बना हुआ है। अब यदि यह साझा बाजार लागू हो गया तो मानकर चलिए कि कुछ ही वर्षों में यह चीनी बाजार बन जाएगा। इसीलिए भारत का संकोच स्वाभाविक और सामयिक है। लेकिन भारत के बिना यह साझा बाजार अधूरा ही रहेगा। इसीलिए इस संगठन ने घोषणा की है कि उसके द्वार भारत के लिए सदा खुले रहेंगे। वह जब चाहे, अंदर आ जाए। मेरी राय है कि देर-सबेर भारत को इस 'क्षेत्रीय विशाल आर्थिक भागीदारी' (रिसेप) संगठन में जरूर शामिल होना चाहिए लेकिन अपनी शर्तों पर। वह चाहे तो चीन की चौधराहट को चुनौती दे सकता है। भारत को चाहिए कि वह दक्षिण एशिया के देशों में इसी तरह का एक संगठन (साझा बाजार) 'रिसेप' के पहले ही खड़ा कर दे लेकिन कैसे करे? यदि दक्षेस (सार्क) देशों का साझा बाजार हम खड़ा कर सकें तो न सिर्फ 10 करोड़ लोगों को तुरंत रोजगार मिल सकता है बल्कि यह इलाका दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों के रूप में विकसित हो सकता है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 16 November 2020


bhopal, Meaning of being Nitish Kumar.

बिक्रम उपाध्याय वर्तमान राजनीतिक भारत में संभवतः नीतीश कुमार अकेले ऐसे नेता हैं, जो पिछले ढाई दशक से लगातार सत्ता के साथ जुड़े हुए हैं। पिछले 15 साल से लगातार बिहार सरकार के मुखिया तो हैं ही, उसके पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठित केंद्र की राजग सरकार में भी मंत्री रहे हैं। यानी 1997 से लेकर आजतक सत्ता की देवी का आशीर्वाद अनवरत उन्हें मिल रहा है। बड़ी बात सिर्फ यह नहीं कि उनके नतृत्व के लोग हामी रहे हैं। बड़ी बात यह भी है कि उस पार्टी के मुखिया के रूप में उन्होंने अपना सिक्का जमाए रखा, जिस पार्टी का वजूद बिहार के बाहर कभी मजबूती से महसूस भी नहीं किया गया। इतनी बड़ी कामयाबी केवल भाग्य या जोड़तोड़ से नहीं मिल सकती। इस कामयाबी के लिए नीतीश बाबू का व्यक्तित्व और उनकी निर्णय क्षमता का भी बहुत बड़ा योगदान है। नीतीश कुमार निर्णय में जितने कठोर हैं, व्यवहार में उतने ही समावेशी। जब उनपर चुनाव के दौरान अहंकारी होने का आरोप लगा तो उन्होंने हाथ जोड़कर पत्रकारों से कहा- कृपया मुझे अभिमानी मत कहिए। सुशासन बाबू का टैग उन्हें यूं ही नहीं मिला। उसके लिए नीतीश कुमार ने भाव और प्रभाव रहित राजनीति और लोकनीति पर चलते हुए अपना बहुत कुछ दांव पर भी लगाया है। नीतीश कुमार को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनकी पार्टी अब भाजपा के सामने छोटे भाई की भूमिका में आ गई है। वे आज भी उतने ही विश्वास और ठसक के साथ सरकार बनाते दिखे जैसे पिछले चुनाव में राजद को ज्यादा सीटें मिलने के बाद भी मुख्यमंत्री बनते समय दिखे थे। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा बारंबार इस निश्चय की घोषणा कि नीतीश कुमार ही अगले 5 वर्ष के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहेंगे, तो फिर किसी के मन में कोई शंका या संदेह आने की गुंजाइश भी नहीं रहती। नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। इतिहास गवाह है कि 1995 में 324 सीट वाले बिहार विधानसभा में जनता दल यूनाइटेड को केवल 7 सीटें मिली थीं। उसके बाद नीतीश कुमार ने किस तरह बिहार की राजनीति में अपने आपको अपरिहार्य बना दिया, यह अब सबके सामने है। 1 मार्च 1951 को बिहार के बख्तियारपुर में एक साधारण परिवार में जन्में नीतीश कुमार ने अपनी सूझबूझ और जन स्वीकारोक्ति के बल पर एक अपने को असाधारण राजनेता सिद्ध कर दिया है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से सोशल इंजीनियरिंग तक का नीतीश कुमार का सफर कई मोड़ों से होकर गुजरा है। 1974 से लेकर 1977 तक चले जेपी आंदोलन में तपने और जनता के लिए लड़ने के लिए तैयार होने का समय था। नीतीश कुछ उन नये राजनेताओं में सम्मिलित थे जिन्हें जयप्रकाश बाबू के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में सक्रिय भूमिका मिली थी। नीतीश की सफल चुनावी राजनीति 1985 में शुरू हुई, जब वे पहली बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गये। पहले लोकदल और फिर जनता दल में भी उन्हें महत्वपूर्ण पद दिए गए। लेकिन जनता दल में आपसी मनमुटाव के चलने नीतीश ने जार्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन कर लिया और अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान कायम कर ली। जार्ज फर्नांडीस कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन में भाजपा के साथ आए और इस तरह से नीतीश कुमार का भी भाजपा के साथ एक औपचारिक संबंध स्थापित हो गया। राजनीति में नीतीश कुमार का कद बढ़ता गया वे जल्दी ही नौंवी लोकसभा के सदस्य भी चुन लिए गए। 1990 में उन्हें पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कृषि राज्यमंत्री बनाया गया। वे लगातार कई वर्षों तक बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। वाजपेयी सरकार में जार्ज फर्नांडीस के साथ साथ नीतीश कुमार भी कैबिनेट मंत्री बने। वहां उन्होंने रेल और भूतल परिवहन मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। नीतीश कुमार की रूचि और दखल बिहार की राजनीति में ज्यादा थी। जनता लालू यादव और उनकी परिवार के सरकार से तंग आ चुकी थी। प्रदेश के एक बदलाव का बयार चल रहा था। वैसे में नीतीश कुमार जनता की आकांक्षा बन कर उभरे और 2005 में बनने वाली नई सरकार का नेतृत्व संभाला। तब से वह लगातार मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हालांकि वह पहली बार वर्ष 2000 में ही मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन उन्हें सिर्फ सात दिनों में ही त्यागपत्र देना पड़ गया। नीतीश भले ही सत्ता में पिछले ढाई दशक से बने हुए हैं, लेकिन जब भी नैतिकता की बात आई तो उन्होंने इस्तीफा देने में जरा भी संकोच नहीं किया। 2014 के आम चुनाव में जब उनकी पार्टी लोकसभा में कोई बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाई तो नीतीश कुमार ने स्वयं खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और अपनी जगह दलित वर्ग के नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री का पद सौंप दिया था। लेकिन पार्टी और सरकार में उथल-पुथल के बाद उन्हें फरवरी 2015 में फिर से नेतृत्व के लिए आगे आना पड़ा। इसी साल विधानसभा चुनाव हुए और नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल से गठबंधन कर चुनाव लड़ा और फिर बहुमत पाकर मुख्यमंत्री बने। लेकिन जब लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी मनमानी करते नजर आए तो नीतीश ने तुरंत उनके दूरी बनाने का फैसला किया और फिर से भाजपा के साथ सरकार का गठन कर लिया। नीतीश कुमार यदि बिहार की राजनीति में अजातशत्रु बने हुए हैं तो उसके पीछे एनडीए सरकार का काम और उनका स्पष्ट दृष्टिकोण का भी योगदान है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार अब बीमारू राज्य से बाहर आ चुका है। गरीबी दर लगातार घट रही है। 2004-05 में जहां गरीबी दर 54.4 प्रतिशत थी, वही अब घटकर 33.74 प्रतिशत हो गई है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय और व्यय दोनों बढ़ी है। इज ऑफ डूइंग बिजनेस में भी बिहार 2015 में बिहार का स्कोर 2015 में 16.4 से बढ़कर वर्तमान में 81.91 हो गया है। नीतीश कुमार जानते हैं कि आगे चुनौतियां बड़ी हैं। केवल राजनीतिक फ्रंट पर ही नहीं, सरकार के प्रदर्शन में भी। अपने कामकाज के भरोसे राजनीति करने वाले नीतीश आगे भी उसी पर निर्भर रहने वाले हैं। बिहार के विकास की जिम्मेदारी तो है ही साथ ही सामाजिक सामंजस्य और विरोधियों की कसौटी पर भी उन्हें खड़ा होना है। शराबबंदी का उनका फैसला महिलाओं ने सराहा और उसका परिणाम वोट में भी मिला। लेकिन नशा मुक्ति के साथ साथ रोजगार और औद्योगिकीकरण भी बड़े मुद्दे हैं। जिस पर नीतीश कुमार को कुछ बड़ा करके दिखाना है। बिहार की जनता नीतीश कुमार के साथ है, परिस्थितियां भी अनुकूल है। आगे का रास्ता नीतीश कुमार को तय करना है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 November 2020


bhopal,Children sacrificing borewells

योगेश कुमार गोयल एक और मासूम बच्चे ने पिछले दिनों बोरवेल के अंदर दम तोड़ दिया। घटना मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के सैतपुरा गांव की है, जहां बोरवेल में गिरे चार वर्षीय मासूम प्रह्लाद को चार दिनों की जद्दोजहद के बाद अंततः मृत ही बाहर निकाला जा सका। सैतपुरा गांव के हरकिशन कुशवाहा का चार वर्षीय पुत्र प्रहलाद परिजनों के साथ खेत पर गया था, जहां परिजनों द्वारा घटना से पांच दिन पूर्व ही खेत में 200 फुट गहरा 9 इंच चौड़ा बोर कराया गया था। प्रहलाद खेलते-खेलते बोर के पास चला गया और अचानक उस गहरे बोर में जा गिरा। पता चलते ही परिजनों द्वारा आनन-फानन में प्रशासन को सूचित किया गया, जिसके बाद हालांकि बचाव दल में शामिल एसडीआरएफ, एनडीआरएफ तथा अन्य विशेषज्ञों की टीम द्वारा करीब 90 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया लेकिन मासूम को बचाया नहीं जा सका और इस प्रकार खुला बोरवेल एक और मासूम को जिंदा निगल गया। थोड़े-थोड़े अंतराल पर लगातार सामने आते ऐसे दर्दनाक हादसे काफी चिंताजनक हैं लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे हादसों पर पूर्णविराम लगाने के लिए कहीं कोई कारगर प्रयास नहीं दिखता। बोरवेल हादसे पिछले कुछ वर्षों से जागरुकता के बावजूद निरन्तर सामने आ रहे हैं किन्तु इनसे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं दिखता। ऐसे मामलों में अक्सर सेना-एनडीआरएफ की बड़ी विफलताओं को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं कि अंतरिक्ष तक में अपनी धाक दिखाने में सफल हो रहे भारत के पास चीन तथा कुछ अन्य देशों जैसी वो स्वचालित तकनीकें क्यों नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल कर ऐसे मामलों में बच्चों को अपेक्षाकृत काफी जल्दी बोरवेल से बाहर निकालने में मदद मिल सके। सवाल यह भी हैं कि आखिर बार-बार होते ऐसे दर्दनाक हादसों के बावजूद देश में बोरवेल और ट्यूबवैल के गड्ढे कब तक इसी प्रकार खुले छोड़े जाते रहेंगे और कबतब मासूम जानें इनमें फंसकर इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी। आखिर कबतक मासूमों की जिंदगी से ऐसा खिलवाड़ होता रहेगा? कोई भी बड़ा हादसा होने के बाद प्रशासन द्वारा बोरवेल खुला छोड़ने वालों के खिलाफ अभियान चलाकर सख्ती की बातें तो दोहरायी जाती हैं लेकिन बार-बार सामने आते ऐसे हादसे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सख्ती की ये सब बातें कोई घटना सामने आने पर लोगों के उपजे आक्रोश के शांत होने तक ही बरकरार रहती हैं। ऐसे हादसों के लिए बोरवेल खुला छोड़ने वाले खेत मालिक के साथ-साथ ग्राम पंचायत और स्थानीय प्रशासन भी बराबर के दोषी होते हैं। पिछले साल मध्य प्रदेश के देवास जिले में खातेगांव कस्बे के उमरिया गांव में हीरालाल नामक व्यक्ति को अपने खेत में सूखा बोरवेल खुला छोड़ देने के अपराध में जिला सत्र न्यायालय ने दो वर्ष सश्रम कारावास तथा 20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि लोग बोरवेल कराकर उन्हें इस प्रकार खुला छोड़ देते हैं, जिससे उनमें बच्चों के गिरने की घटनाएं हो जाती हैं और समाज में बढ़ रही लापरवाही के ऐसे मामलों में सजा देने से ही लोगों को सबक मिल सकेगा। अगर मध्य प्रदेश में जिला अदालत के उसी फैसले की तरह ऐसे सभी मामलों में त्वरित न्याय प्रक्रिया के जरिये दोषियों को कड़ी सजा मिले, तभी लोग खुले बोरवेल बंद करने को लेकर सक्रिय होंगे अन्यथा बोरवेल इसी प्रकार मासूमों की जिंदगी छीनते रहेंगे और हम ऐसी मासूम मौतों पर घडि़याली आंसू बहाने तक ही अपनी भूमिका का निर्वहन करते रहेंगे। अबतक अनेक मासूम जिंदगियां बोरवेल में समाकर जिंदगी की जंग हार चुकी हैं किन्तु विडम्बना है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद कभी ऐसे प्रयास नहीं किए गए, जिससे ऐसे मामलों पर अंकुश लग सके। विडम्बना है कि देश में प्रतिवर्ष औसतन 50 बच्चे बेकार पड़े खुले बोरवेलों में गिर जाते हैं, जिनमें से बहुत से बच्चे इन्हीं बोरवेलों में जिंदगी की अंतिम सांसें लेते हैं। ऐसे हादसे हर बार किसी परिवार को जीवन भर का असहनीय दुख देने के साथ-साथ समाज को भी बुरी तरह झकझोर जाते हैं। भूगर्भ जल विभाग के अनुमान के अनुसार देशभर में करीब 2.70 करोड़ बोरवेल हैं लेकिन सक्रिय बोरवेलों की संख्या, अनुपयोगी बोरवेलों की संख्या तथा उनके मालिक का राष्ट्रीय स्तर का कोई डाटाबेस मौजूद नहीं है। बोरवेलों में बच्चों के गिरने की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में ऐसे हादसों पर संज्ञान लेते हुए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। 2013 में कई दिशा-निर्देशों में सुधार करते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, जिनके अनुसार गांवों में बोरवेल की खुदाई सरपंच तथा कृषि विभाग के अधिकारियों की निगरानी में करानी अनिवार्य है जबकि शहरों में यह कार्य ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट, स्वास्थ्य विभाग तथा नगर निगम इंजीनियर की देखरेख में होना जरूरी है। अदालत के निर्देशानुसार बोरवेल खुदवाने के कम से कम 15 दिन पहले डी.एम., ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट, स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम को सूचना देना अनिवार्य है। बोरवेल की खुदाई से पहले उस जगह पर चेतावनी बोर्ड लगाया जाना और उसके खतरे के बारे में लोगों को सचेत किया जाना आवश्यक है। इसके अलावा ऐसी जगह को कंटीले तारों से घेरने और उसके आसपास कंक्रीट की दीवार खड़ी करने के साथ गड्ढ़ों के मुंह को लोहे के ढक्कन से ढंकना भी अनिवार्य है लेकिन इन दिशा-निर्देशों का कहीं पालन होता नहीं दिखता। दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि बोरवेल की खुदाई के बाद अगर कोई गड्ढा है तो उसे कंक्रीट से भर दिया जाए लेकिन ऐसा न किया जाना हादसों का सबब बनता है। ऐसे हादसों में न केवल मासूमों की जान जाती है बल्कि रेस्क्यू ऑपरेशनों पर अथाह धन, समय और श्रम भी नष्ट होता है। प्रायः होता यही है कि तेजी से गिरते भू-जल स्तर के कारण नलकूपों को चालू रखने के लिए कई बार उन्हें एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित करना पड़ता है और पानी कम होने पर जिस जगह से नलकूप हटाया जाता है, वहां लापरवाही के चलते बोरवेल खुला छोड़ दिया जाता है। कहीं बोरिंग के लिए खोदे गए गड्ढ़ों या सूख चुके कुओं को बोरी, पॉलीथीन या लकड़ी के फट्टों से ढांप दिया जाता है तो कहीं इन्हें पूरी तरह से खुला छोड़ दिया जाता है और अनजाने में ही कोई ऐसी अप्रिय घटना घट जाती है, जो किसी परिवार को जिंदगी भर का असहनीय दर्द दे जाती है। न केवल सरकार बल्कि समाज को भी ऐसी लापरवाहियों को लेकर चेतना होगा ताकि भविष्य में फिर ऐसे दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति न हो। देश में ऐसी स्वचालित तकनीकों की भी व्यवस्था करनी होगी, जो ऐसी विकट परिस्थितियों में तुरंत राहत प्रदान करने में सक्षम हों। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 16 November 2020


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नरक चतुर्दशी (14 नवम्बर) पर विशेष श्वेता गोयल दीवाली के पांच महापर्वों की श्रृंखला में दूसरा पर्व है 'नरक चतुर्दशी', जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। 'रूप चतुर्दशी', 'काल चतुर्दशी' 'नरक चौदस', 'छोटी दीपावली' इत्यादि विभिन्न नामों से जाना जाने वाला यह पर्व हालांकि सदैव दीवाली से एकदिन पहले ही मनाया जाता रहा है किन्तु इस वर्ष चतुर्दशी तथा अमावस्या एक ही दिन होने के कारण यह पर्व दीवाली के साथ उसी दिन मनाया जा रहा है।  जैसा इस पर्व के नाम से आभास होता है कि इसका संबंध भी किसी न किसी रूप में नरक अथवा मृत्यु से है। यम को मृत्यु का देवता और संयम का अधिष्ठाता देव माना गया है। इसीलिए इस दिन यमराज और धर्मराज चित्रगुप्त का पूजन करते हुए उनसे प्रार्थना की जाती है कि उनकी दयादृष्टि से हमें नरक के भय से मुक्ति मिले। इस पर्व को लेकर मान्यता यही है कि इस अवसर पर यमराज का पूजन करने और व्रत रखने से नरक की प्राप्ति नहीं होती। यह पर्व मनाए जाने के संबंध में एक मान्यता नरकासुर नामक अधर्मी राक्षस के वध से भी जुड़ी है। द्वापर युग में नरकासुर के आतंक से देवताओं के अलावा धरती पर भी तमाम सम्राट थर-थर कांपते थे। ताकत के नशे में चूर नरकासुर अपनी शक्तियों का दुरूपयोग करते हुए स्त्रियों पर अत्याचार करता था। उसने 16000 मानव, देव एवं गंधर्व कन्याओं को बंदी बना रखा था। उससे मुक्ति दिलाने के लिए तमाम देवों और ऋषि-मुनियों ने योगेश्वर श्रीकृष्ण से अनुरोध किया। उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का संहार कर देवताओं के साथ-साथ समस्त पृथ्वी लोकवासियों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई और उसके बंदीगृह से 16000 कन्याओं को मुक्त कराकर उन्हें यथोचित सम्मान दिया। नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में सभी लोकों में खुशियां मनाते हुए यह पर्व मनाया गया। माना जाता है कि तभी से नरक चतुर्दशी पर्व मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई। चैत्र मास की पूर्णिमा को हनुमान जयंती मनाई जाती है और दीवाली से एकदिन पहले 'नरक चतुर्दशी' वाले दिन भी 'हनुमान जयंती' मनाई जाती है। मान्यता है कि रामभक्त हनुमान का जन्म इसी दिन हुआ था। वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगते हुए इसी दिन तीनों लोकों सहित बलि के शरीर को भी अपने तीन पगों में नाप लिया था। धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा दीवाली के दिन दीपक जलाए जाने के संबंध में एक मान्यता यह भी है कि इन दिनों में वामन भगवान ने अपने तीन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी, पाताल लोक, ब्रह्माण्ड व महादानवीर दैत्यराज बलि के शरीर को नाप लिया था और इन तीन पगों की महत्ता के कारण ही लोग यम यातना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से तीन दिनों तक दीपक जलाते हैं तथा सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं। यह भी कहा जाता है कि बलि की दानवीरता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने बाद में पाताल लोक का शासन बलि को ही सौंपते हुए उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी याद में पृथ्वीवासी लगातार तीन दिनों तक हर वर्ष उनके लिए दीपदान करेंगे। नरक चतुर्दशी का संबंध स्वच्छता से भी है। इस दिन लोग अपने घरों का कूड़ा-कचरा बाहर निकालते हैं। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व तेल एवं उबटन लगाकर स्नान करने से पुण्य मिलता है। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना गया है और सायंकाल के समय यम के लिए दीपदान किया जाता है। आशय यही है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का आशय आलस्य का त्याग करने से है और इसका सीधा संदेश यही है कि संयम और नियम से रहने से उनका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा और उनकी अपनी साधना ही उनकी रक्षा करेगी। (लेखिका शिक्षिका हैं।)

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Dakhal News 13 November 2020


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प्रमोद भार्गव दीपावली प्रकाश पर्व है। यानी अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है। आदिकाल से चली आ रही सांस्कृतिक यात्रा का यह त्योहार सामाजिक जीवन की प्रसन्नता और मंगल का प्रतीक रहा है। इस कालखण्ड में मानव ने मिट्टी, पत्थर, काठ, मोम और धातुओं के स्वरूप में हजारों तरह के शिल्प में दीपक गढ़े हैं। शुरूआत में दीवाली की मुख्य भावना दीप दान से जुड़़ी थी। प्रकाश के इस दान को पुण्य का सबसे बड़ा कर्म माना जाता था। दीपों के कलात्मक आकार में मनुष्य की कल्पना व संवेदनशील उंगलियों का इतिहास भी अंकित है। इस जगत में जीवन जीने के लिए प्रत्येक प्राणी को उजाले की जरूरत पड़़ती है। बिना उजाले के वह कोई कार्य सुरुचिपूर्ण ढंग से संपन्न नहीं कर पाता है। वैसे तो सबसे अधिक महत्वपूर्ण व उपयोगी प्रकाश सूर्य का है। इसके प्रकाश में ही अन्य सभी प्रकार के प्रकाश समाविष्ट रहते हैं। इसीलिए दीवाली को प्रकाश का पर्व कहा जाता है। कहा भी गया है- शुभं करोति कल्याण आरोग्यं सुख संपदम्। शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपज्योतिः नमोस्तुते।। शुरूआती दौर में सीपियों का दीपक के रूप में उपयोग किया जाता था। इसमें रोशनी पैदा करने के लिए चर्बी डाली जाती थी और घास या कपास की बत्ती होती थी। इसके बाद पत्थर और काठ के दीपक अस्तित्व में आए। तत्पश्चात मिट्टी के दिए बनाए जाने लगे। कुम्हार के चाक की खोज के बाद तो मिट्टी के दीए अनूठे व आकर्षक शिल्पों मेंं अवतरित होने लगे और ये घर-घर आलोक-स्तंभ के रूप में स्थापित हो गए। धातुओं की खोज और उन्हें मनुष्य के लिए उपयोगी बनाए जाने के बाद बड़े लोगों के घरों व महलों की शोभा धातु के दिए बनने लगे। जो वैभव का प्रतीक भी थे। स्वर्ण, कांसा, तांबा, पीतल और लोहे के दीयों का प्रचलन शुरू हुआ। इसमें पीतल के दीपकों को बेहद लोकप्रियता मिली। रामायण और महाभारत में भी 'रत्नदीपों’ का उल्लेख देखने को मिलता है। कालांतर में एकमुखी से बहुमुखी दीपक बनाए जाने लगे। इनकी मूठ भी कलात्मक और पकड़ने में सुविधाजनक बनायी जाने लगी। सत्रह-अठारहवीं सदी में दीपकों को अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व अप्सराओं के रूप में ढाला जाने लगा। इस समय 'मयूरा धूप दीपक’ का चलन खूब था। इसकी आकृति नाचते हुए मोर की तरह होती है। इसके पंजों के ऊपर बत्ती रखने के लिए पांच कटोरे बने होते हैं। मोर के ऊपर बनी छेदों में अगरबत्तियां लगाई जाती हैं। राजे-रजवाड़े के कालखंड में छत से लटके दीपों का प्रचलन खूब था। ये परी, पशु, पक्षी और देवी-देवताओं की आकृतियों से सजे रहते थे। सांकल से लटके हंस और कबूतरों के पंजों पर तीन से पांच दीपक बनाए जाते थे। मुगलों के समय दीपकों में नायाब परिवर्तन आए। इस समय गोल लटकने वाले कलात्मक दीपक ज्यादा संख्या में बने इसके अलावा आठ कोनों वाले, गुम्बदाकार व ऐसे ही अन्य प्रकार के दीपक बनाए जाने लगे। इन दीपकों में से रोशनी बाहर झांकती थी। जब दीपक सैंकड़़ों आकार-प्रकारों में सामने आ गए तो इनकी सुचारू रूप से उपयोगिता के लिए 'दीपशास्त्र’ भी लिख दिया गया। जिसमें दीपक जलाने के लिए गाय के घी को सबसे ज्यादा उपयोगी बताया गया। घी के विकल्प के रूप में सरसों के तेल का विकल्प दिया गया। कपास से कई प्रकार की बत्तियां बनाने के तरीके भी दीपशास्त्र में सुझाए गए हैं। दीपावली पर देश में घी और सरसों के तेल से ही दीपक प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। सोलहवीं सदी में तो संगीत के एक राग के रूप में 'दीपक-राग’ की भी महत्ता व उपलब्धि है। इस संदर्भ में जनश्रुति है कि संगीत सम्राट तानसेन द्वारा दीपक राग के गाए जाने पर मुगल सम्राट अकबर के दरबार में बिना जलाए दीप जल उठे थे। दीपक-राग के गाने के बाद ही तानसेन को 'संगीत सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उज्जैन के हरसिद्धि मंदिर परिसर में दीपों के स्तंभ बने हुए हैं, जिनपर सैंकड़ों दीप एक साथ रखकर जलाए जाते हैं। प्राचीन भारतीय परंपरा में दीपक के दान से बड़ा महत्व जुड़ा है। महाभारत के 'दान-धर्म-पर्व’ में दीपदान के फल की महत्ता दैत्य ऋषि शुक्राचार्य ने दैत्यराज बलि को इस प्रकार समझाई है- कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति। ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा।। अर्थात, दीपकों का दान करने वाला व्यक्ति अपने वंश को तेजस्वी व समृद्धशाली बनाने वाला होता है और अंत में वह आलोकमयी लोकों को गमन करता है। रामायणकाल से पूर्व दीपावली का संबंध बलि कथा के संदर्भ में ही मान्य तथा प्रचलन में था। कार्तिक शुक्ल प्र्रतिपदा को ''बलि प्रतिपदा’’ भी कहते हैं। इस दिन बलि महाराज की अर्चना भी की जाती है। राजा बलि अपने राज्य में चतुर्दशी से तीन दिन चलते हैं और तीनों दिन दीपदान भी करते हैं। बलि के इस दीपदान से ही इस उत्सव को दीपावली कहा गया है। हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा में अपने वंश की समृद्धि के लिए ही प्रतिदिन गंगा की संध्या आरती के समय बड़़ी संख्या में दीपदान किए जाते हैं। ऐसा ही वाराणसी के गंगा घाट पर होता है। प्राचीन भारत में मनुष्य के सभ्य व संस्कारजन्य होने के अनुक्रम में दीपक का महत्व हर एक महत्वपूर्ण उद्देश्य से जुड़ता चला गया। प्रयोजन के अनुसार ही इनका नामांकन हुआ दीपावली पर जो दीप आकाश में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर टांगा जाने लगा उसे 'आशा-दीप’, स्वयंवर के समय जलाए जाने वाले दीप को 'साक्षी-दीप’ पूजा वाले दीप को 'अर्चना-दीप’ साधना के समय रोशन किए जाने वाले दीप को 'आरती-दीप’ मंदिरों के गर्भगृह में अनवरत जलने वाले दीप को 'नंदा-दीप’ की संज्ञा दी गई। मंदिरों के प्रवेश द्वार और नगरों के प्रमुख मार्गों पर बनाए जाने वाले दीपकों को 'दीप-स्तंभ’ का स्वरूप दिया गया, जिन पर सैंकड़ों दीपक एक साथ प्रकाशमान करने की व्यवस्था की गई। बहरहाल वर्तमान में भले ही दीपकों का स्थान मोमबत्ती और विद्युत बल्वों ने ले लिया हो लेकिन प्रकृति से आत्मा का तादात्म्य स्थापित करने वाली भावना के प्रतीक के रूप में जो दीपक जलाए जाते हैं, वे आज भी मिट्टी, पीतल अथवा तांबे के हैं। घी से जज्वलमान यही दीपक हमारे अंतर्मन की कलुषता को धोता है। दीपावली पर कैसे जलाएं दीपक पूजन के समय देवी-देवताओं के सम्मुख दीप उनके तत्व के आधार पर जलाए जाते हैं। देवी मां भगवती के लिए तिल के तेल का दीपक तथा मौली की बाती उत्तम मानी गई है। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए देशी घी का दीपक जलाना चाहिए। वहीं शत्रु का दमन करने के लिए सरसों व चमेली का तेल सर्वोत्तम माने गए हैं। देवताओं के अनुकूल बत्तियों को जलाने का भी योग है। भगवान सूर्य नारायण की पूजा एक या सात बत्तियों से करने का विशेष महत्व है। वहीं माता भगवती को नौ बत्तियों का दीपक अर्पित करना सर्वोत्तम कहा गया है। हनुमान जी एवं शंकरजी की प्रसन्नता के लिए पांच बत्तियों का दीपक जलाने का विधान है। इससे इन देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।  अनुष्ठान में पांच धातुओं सोना, चांदी, कांसा, तांबा और लोहे के दीपक प्रज्ज्वलित करने का महत्व है। दीपक जलाते समय उसके नीचे सप्तधान्य (सात प्रकार का अनाज) रखने से सब प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यदि दीपक जलाते समय उसके नीचे गेहूँ रखें तो धन-धान्य की वृद्धि होगी, यदि चावल रखें तो महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी। इसी प्रकार यदि उसके नीचे काले तिल या उड़द रखें तो स्वयं माँ काली, भैरव, शनि, दस दिक्पाल, क्षेत्रपाल हमारी रक्षा करेंगे, इसलिए दीपक के नीचे किसी न किसी अनाज को रखा जाना चाहिए। साथ में जलते दीपक के अन्दर अगर गुलाब की पंखुड़ी या लौंग रखें तो जीवन अनेक प्रकार की सुगंधियों से भर उठता। विभिन्न धातुओं के दीपकों का महत्व सोने के दीपक को वेदी के मध्य भाग में गेहूँ का आसन देकर और चारों तरफ लाल कमल या गुलाब के फूल की पंखुड़ियां बिखेर कर स्थापित करें। इसमें गाय का शुद्ध घी डालें तथा बत्ती लंबी बनाएं और इसका मुख पूर्व की ओर करें। सोने के दीपक में गाय का शुद्ध घी डालते हैं तो घर में हर प्रकार की उन्नति तथा विकास होता है। इससे धन तथा बुद्धि में निरंतर वृद्धि होती है। बुद्धि सभी बुरी वृत्तियों से सावधान करती रहेगी तथा धन पवित्र स्रोतों से प्राप्त होगा। पूजन में चांदी के दीपक को चावलों का आसन देकर सफेद गुलाब या अन्य सफेद फूलों की पंखुड़ियों को चारों तरफ बिखेर कर पूर्व दिशा में स्थापित करें। इसमें शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। चांदी का दीपक जलाने से घर में सात्विक धन की वृद्धि होती। तांबे के दीपक को लाल मसूर की दाल का आसन देकर और चारों तरफ लाल फूलों की पंखुड़ियों को बिखेर कर दक्षिण दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें और बत्ती लंबी जलाएं। तांबे के दीपक में तिल का तेल डालने से मनोबल में वृद्धि होगी तथा अनिष्टों का नाश होगा। कांसे के दीपक को चने की दाल का आसन देकर तथा चारों तरफ पीले फूलों की पंखुड़ि़यां बिखेर कर उत्तर दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें। कांसे का दीपक जलाने से धन की स्थिरता बनी रहती है। अर्थात जीवन पर्यन्त धन बना रहता है। लोहे के दीपक को उड़़द दाल का आसन देकर चारों तरफ काले या गहरे नीले रंग के पुष्पों की पंखुड़ियां बिखेर कर पश्चिम दिशा में स्थापित करें। इसमें सरसों का तेल डालेंं। लोहे के दीपक में सरसों के तेल की ज्योति जलाने से अनिष्ट तथा दुर्घटनाओं से बचाव हो जाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 13 November 2020


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आर.के. सिन्हा बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मिली सफलता ने सिद्ध कर दिया कि बिहार की 12 करोड़ प्रबुद्ध जनता लालू-राब़ड़ी देवी के जंगलराज में वापस जाने को तैयार नहीं। उस दौर की दहशत अभी भी औसत मेहनतकश बिहारी के जेहन में जीवित है। बिहार के मतदाताओं को लगा कि लालू-राबड़ी राज के पंद्रह सालों की अराजकता की तुलना में नीतीश कुमार-भाजपा अपने शासन के पंद्रह सालों में बिहार की रसातल में गई तस्वीर बहुत हद तक बदलने में सफल रहे। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि मतदाताओं ने इस चुनाव में केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों के प्रति भी गहरा विश्वास जताया। मोदी जी ने इस चुनाव की बाजी पलटने का असली काम किया। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म करने और राममंदिर निर्माण का सपना पूरा होने के चलते भी जनता ने एनडीए को खुलकर समर्थन दिया। बिहार के मतदाताओं ने जनता दल यू उम्मीदवारों की अपेक्षा भाजपा उम्मीदवारों को ज्यादा समर्थन दिया और भाजपा को जद यू के मुकाबले कहीं ज्यादा सीटें मिलीं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मतदाताओं ने मोदी जी के ऊपर आस्था व्यक्त की। इसके साथ ही नतीजों ने तमाम एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत साबित कर दिया। सभी एक्जिट पोल चुनावों में महागठबंधन को विजयी दिखा रहे थे। अब इन पोल तैयार करने वालों को सोचना होगा कि उनसे चूक कहां और किस स्तर पर हुई? मैंने इस बात का अपने स्तर पर विश्लेषण किया है। हुआ यह कि राजद समर्थक ज्यादा उतावले और उद्दंड ढंग से पेश आ रहे थे और इस बात पर पूरी तरह निश्चित थे कि तेजस्वी जी तो मुख्यमंत्री बनने ही वाले हैं, उनके ऐसा मानने में कोई हर्ज भी नहीं था। लेकिन, वे यही बात सबसे मनवाने के लिये उतावले थे। जिन्होंने एक्जिट पोल में यह कहा कि मैंने तीर छाप (जद यू) को वोट दिया है उनसे झगड़ा किया और कुछ मामलों में उनका पीछा कर घर में घुसकर मारपीट तक की। इसकी प्रतिक्रिया हुई और एनडीए समर्थक वोटरों ने चुपचाप अपना वोट देकर घर का रास्ता नापा। इससे एग्जिट पोल सही ढंग से नहीं हो पाया। बहरहाल, नीतीश कुमार एकबार फिर बिहार की सत्ता संभालेंगे। प्रधानमंत्री ने बुधवार शाम भाजपा कार्यालय में हजारों कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि नीतीश जी ही एनडीए के मुख्यमंत्री होंगेI यह जीत सरकार के संकल्पों की जीत है। वोटरों की चिंता करनेवाले नीतीश कुमार को ही जनता ने फिर से चुना। भविष्यवाणी और आकाशवाणी में बहुत अंतर होता है। जनता ने विकासशील प्रदेश को विकसित बनाने का स्वप्न देखनेवाले दूरदर्शी नेतृत्व के हाथों में सूबे की कमान सौंपने का फैसला लिया है। जनता को नीतीश जी और मोदी जी की डबल इंजन की सरकार वास्तव में पसंद आ गई। नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में नीतीश कुमार के कामों को आधी आबादी ने स्वीकारा। दलित, पिछड़े, वंचितों ने भी पूरा साथ दिया। सबका साथ, सबका विश्वास, सबका विकास। विकास विश्वास के इसी रास्ते बिहार को आगे बढ़ना है। यही बिहार की जनता ने तय कर दिया। अब कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कह रहे हैं कि तेजस्वी यादव ने कांग्रेस को 70 सीटें देकर सबसे बड़ी ग़लती की थी। मेरा कहना है कि तेजस्वी तो लालू जी के मार्गदर्शन पर ही एक-एक कदम चल रहे थे। उन्होंने कांग्रेस को मात्र वैसी ही सीटें दीं जहाँ से राजद के जीत की कोई सम्भावना नहीं थी। अतः यह लालू जी ने कांग्रेस पर कोई उपकार नहीं किया, यह उनकी सोची-समझी रणनीतिक चाल थी। इसीलिए, कांग्रेस को 70 में महज़ 19 सीटों पर जीत मिली और बहुमत से पीछे रह जाने में यह भी एक अहम कारण बना। कांग्रेस 2015 के विधानसभा चुनाव परिणाम को भी नहीं दोहरा पाई। तब कांग्रेस 41 सीटों पर लड़ी थी और उसने 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों का गहराई से अध्ययन के दौरान पटना के गांधी मैदान में 5 जून,1974 को हुई लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की विशाल रैली की याद आ जाती है। मैं भी एक पत्रकार और आन्दोलनकारी की हैसियत से मंच पर बैठा था। मंच पर लालू यादव और नीतीश कुमार भी मौजूद थे। ये दोनों आगे चलकर सोशल जस्टिस की राजनीति करने वालों के प्रमुख नेता बने। बिहार विधानसभा के हालिया चुनाव में तो अपने ऊपर लगे करप्शन के दर्जनों आरोपों के साबित होने के बाद जेल की सजा काट रहे लालू चुनावी कैंपेन में तो नहीं थे, पर पर्दे के पीछे सबकुछ वही कर रहे थे। महागठबंधन के नेता उनका नाम भर ले रहे थे। नीतीश कुमार जी तो एनडीए की कैंपेन की अगुवाई कर रहे ही थे। जेपी ने उस 5 जून,1974 की रैली में "संपूर्ण क्रांति" का आहवान किया था। यानि राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तनI आजाद भारत ने जनता की भागीदारी के लिहाज से इतनी बड़ी रैली कभी देश के किसी भाग में शायद ही देखी हो। तब लालू और नीतीश कुमार भी नौजवान थे। लालू 1977 में महज 28 साल की उम्र में सांसद बन गए थे। लालू आगे चलकर 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। अफसोस कि गांधी मैदान के आंदोलन से निकले लालू की सारी राजनीति दिखावे भर की निकली। यह बिल्कुल नहीं था कि राज्य का पूरा पिछड़ा समाज लालू में गांधी की तस्वीर देख रहा था, लेकिन लालू यादव में उसको अपना तारणहार जरूर नजर आ रहा था। लालू को मैं उनके छात्र जीवन से जानता था। वे उस समय फटेहाल जरूर थे पर उनकी वाकपटुता, बुद्धि, चतुर चाल और राजनीतिक सूझबूझ के सभी कायल थे। उनमें अपार संभावनायें थीं। लेकिन, वे पशुपालन विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के जाल में ऐसे फंस गये कि उन्होंने अपना और अपने पूरे परिवार और समर्थकों का कैरियर चौपट कर डाला। लालू ने सत्ता पर काबिज होते ही मैथिली की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता रद्ध कर दी थी। उनका मानना था कि इस भाषा का इस्तेमाल अधिकतर मैथिल ब्राह्मण ही करते हैं जो बिलकुल गलत धारणा थी। क्योंकि, मैथिली तो पूरे उत्तर बिहार की मुख्य भाषा है। उसके बाद पटना का गॉल्फ कोर्स यह कहकर बंद करवा दिया कि यह तो अमीरों का खेल है। विद्यालयों की जगह "चरवाहा-विद्यालय" खोलने शुरू कर दिये, जो भी उनकी चाटुकारिता करे, चाहे वह कितना ही भ्रष्ट, कुकर्मी, अपराधी, माफिया क्यों न हो, उन्हें अपना आदमी कहकर संरक्षण देना शुरू कर दिया। बिहार लालू राज के दौरान जंगलराज में तब्दील होता गया। राज्य से प्रतिभा पलायन तेज हो गया। गावों में नौजवानों का रहना असुरक्षित हो गया। लोग देश के जिन स्थानों में जो कुछ काम मिला वहां भागकर जाने लगे। सरकारी नौकरियों में अपनों को ही चुन-चुनकर तरजीह मिलने लगी। ब्यूरोक्रेसी पर लालू का पूरा कब्जा हो चुका था। वे थानेदारों और छोटे मजिस्ट्रेटों को सीधे आदेश देने लगे। उद्योग-धंधे तबाह होने लगे। अधिकांश उद्योगपतियों ने बिहार छोड़ दिया। अपहरण और फिरौती उद्योग तेजी से जमने लगे। बिहार के एकछत्र नेता ने राज्य का कोई भला नहीं किया। पता नहीं एक मेधावी राजनीतिज्ञ, पूर्णतः नकारात्मक प्रशासक कैसे हो गया। एकबार बिहार में एक अच्छे आवासीय विद्यालय खोलने की मेरी इच्छा हुई। मैं लालू जी के पास गया और अपनी इच्छा बताई, उन्होंने छूटते कहा, "रविन्दर भाई! चरवाहा विद्यालय खोलब त हम मदद करब।" लालू के विपरीत नीतीश कुमार ने बिहार और बिहारी समाज के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा शक्ति और जज्बा अवश्य दिखाया। उनकी सोच सदा सकारात्मक रही। वे कमिटेड और ईमानदार रहे। जंगलराज के बाद उन्होंने असंभव प्रतीत होने वाला कार्य कर दिखाया। बिहार को बेहतर शासन दिया। इसीलिये वे सुशासन बाबू कहलाए। इसबार के विधानसभा चुनाव में एक तरह से नीतीश और लालू ही आमने-सामने थे। तेजस्वी तो महागठबंधन का चेहरा मात्र थे। साफ है कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार में संभावना देखी। लालू क्या कर बैठेंगे, जनता को भरोसा न रहा। इसलिए उन्होंने नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को फिर से सत्ता सौंप दी। नीतीश कुमार को भी अब पूरी तरह से बिहार को विकास के रास्ते पर लेकर जाना होगा। बिहार का औद्योगिक विकास करना होगा। बिहार में निजी क्षेत्र का निवेश लाना होगा। औद्योगिक विकास के लिये निवेशकों को कुशल कामगार (स्किल्ड वर्कर) की जरूरत होती है। कोरोना महामारी में लाखों कुशल कामगार बिहार के अपने गांवों में लौटे हैं। उन सबकी कुशलता का विवरण इकट्ठा कर निवेशकों को आकर्षित करना होगा क्योंकि बिना बाहरी निवेश के बिहार का चौतरफा विकास मुमकिन नहीं है। बिहार के अधिकतर घर अभी भी सीवर से नहीं जुड़े हैं, इस तरफ भी बड़े स्तर पर काम करना होगा। गांव छोड़िए, शहरी घरों में टैप वाटर तक नहीं आता है। अब इस दिन-प्रतिदिन की जिन्दगी से जुड़ी गंभीर समस्या पर भी विचार करने की जरूरत है। पटना के अलावा एक भी सही एयरपोर्ट नहीं है। अब दरभंगा शुरू हुआ है। एक भी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट नहीं है। मतलब यह कि नीतीश कुमार के सामने बड़ी चुनौती है। उन्हें राज्य का हर स्तर पर विकास करना है। बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों से युवराज से शहंशाह बनने की चाहत रखनेवाले थोड़े बेचैन जरूर होंगे। परंतु उन्हें यह भी जानना चाहिए कि लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भी अहम भूमिका होती है। उनके लिए यह समय चिंतन और आत्मविश्लेषण का है। पिछली विधानसभा से बेहतर प्रदर्शन के लिये एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाना उनके भविष्य को सुधार सकता है। वे यदि जनता में अपनी साख अपने काम के बल पर बनायें तभी जनता उनपर भरोसा करेगी। बिहार की तरक्की कैसे हो, बिहारवासियों का भविष्य कैसे सुरक्षित हो, बस सबको यही सोचना है। चुनाव के दौरान जो कुछ भी कटुता उत्पन्न हुई हो, उसे भूल जाना है और सबको मिलजुलकर बिहार को आगे बढ़ाना है। अब बिहार को भी देश के विकसित राज्यों के साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। बिहार में रोजगार के बड़े अवसर पैदा करने होंगे। यह मात्र सरकारी नौकरियों से पूरा हो ही नहीं सकता। उद्योग-धंधे बढ़ाते हुए बिहार से पलायन रोकना होगा। बिहार देश के ज्ञान की राजधानी है। बिहारी अपने विलक्षण ज्ञान, मेहनत और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हीं बिहारियों को अपने राज्य बिहार में ही कामकाज, स्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिले, यही तो नीतीश जी के नेतृत्व में बिहार सरकार को करना होगा। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 13 November 2020


mumbai, Kangana Ranaut, visited Kuldevi ,along with her family

अभिनेत्री कंगना रनौत आए दिन किसी न किसी वजह से चर्चा में रहती हैं। हाल ही में कंगना रनौत अपने भाई अक्षत की शादी में सम्मिलित हुई और अपनी भाभी का स्वागत किया। वहीं अब भाई की शादी संपन्न होने के बाद कंगना अपने पूरे परिवार के साथ अपनी कुलदेवी मां अम्बिका के दर्शन के लिए पहुंची और पूजा की। कंगना ने मंदिर में दर्शन की कुछ तस्वीरें ट्विटर पर फैंस के साथ साझा की है।   तस्वीरों में कंगना के साथ उनके माता-पिता व भाई अक्षत एवं भाभी भी नजर आ रही है। पूजा के दौरान कंगना ने ब्लैक एंड ग्रीन कलर के सूट में काफी खूबसूरत नजर आई। इसके साथ ही कंगना ने हैवी ज्वैलरी कैरी की हुई थी। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों को काफी पसंद किया जा रहा है। भाई की शादी में कंगना रनौत का लुक काफी चर्चा में रहा हैं। वहीं वर्कफ्रंट की बात करें तो कंगना की कई फिल्में कतार में हैं, जिसमें तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमत्री एवं अभिनेत्री जयललिता की बायोपिक थलाइवी, धाकड़ और तेजस शामिल हैं।  

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Dakhal News 13 November 2020


mumbai, Kangana Ranaut, visited Kuldevi ,along with her family

अभिनेत्री कंगना रनौत आए दिन किसी न किसी वजह से चर्चा में रहती हैं। हाल ही में कंगना रनौत अपने भाई अक्षत की शादी में सम्मिलित हुई और अपनी भाभी का स्वागत किया। वहीं अब भाई की शादी संपन्न होने के बाद कंगना अपने पूरे परिवार के साथ अपनी कुलदेवी मां अम्बिका के दर्शन के लिए पहुंची और पूजा की। कंगना ने मंदिर में दर्शन की कुछ तस्वीरें ट्विटर पर फैंस के साथ साझा की है।   तस्वीरों में कंगना के साथ उनके माता-पिता व भाई अक्षत एवं भाभी भी नजर आ रही है। पूजा के दौरान कंगना ने ब्लैक एंड ग्रीन कलर के सूट में काफी खूबसूरत नजर आई। इसके साथ ही कंगना ने हैवी ज्वैलरी कैरी की हुई थी। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों को काफी पसंद किया जा रहा है। भाई की शादी में कंगना रनौत का लुक काफी चर्चा में रहा हैं। वहीं वर्कफ्रंट की बात करें तो कंगना की कई फिल्में कतार में हैं, जिसमें तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमत्री एवं अभिनेत्री जयललिता की बायोपिक थलाइवी, धाकड़ और तेजस शामिल हैं।  

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Dakhal News 13 November 2020


bhopal, Azad

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस (11 नवम्बर) पर विशेष गिरीश्वर मिश्र मौलाना अबुल कलाम आजाद ने देश के प्रथम शिक्षा मंत्री के रूप में संस्कृति और सभ्यता के व्यापक सन्दर्भ में समग्र भारत के लिए शिक्षा का स्वप्न देखा था। उनकी जन्मतिथि को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में स्मरण करते हुए हमारी दृष्टि आधुनिक भारत में शिक्षा के आरंभिक ढाँचे पर जाती है। मूलत: इस्लामी पृष्ठभूमि में शिक्षा-दीक्षा के बावजूद मौलाना भारत और आधुनिक पश्चिमी ज्ञान परम्परा से भलीभांति परिचित थे। स्वातंत्र्य आन्दोलन में उन्होंने अविभाजित भारत की तरफदारी की थी और यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और भारतीयता के गौरव बोध को भी उन्होंने अनेक अवसरों पर व्यक्त किया था। विभाजन की पीड़ा उन्हें सालती थी। इसे वह राजनैतिक हार मानते थे पर वे सांस्कृतिक हार के लिए तैयार न थे। एक कवि, विद्वान, पत्रकार और राजनेता मौलाना भारत की अंतरिम सरकार में 1947 में शिक्षा मंत्री बने और देश के भविष्य-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़ गए। नेहरू जी के नेतृत्व में 1958 तक शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी निभाई। स्वतन्त्र भारत में शिक्षा का आयोजन कैसे किया जाय इसके लिए तथ्यों पर आधारित विचार करने के लिए विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग, प्राथमिक शिक्षा पर खेर समिति और माध्यमिक शिक्षा आयोग का काम उन्होंने शुरू कराया। इनके द्वारा तमाम तथ्य जुटाए गए और भारत के लिए शैक्षिक नीति के विकास के लिए आधार तैयार हुआ। साथ ही आवश्यक व्यवस्थाओं का निर्माण और संस्थाओं की स्थापना का काम भी शुरू हुआ। मौलाना के सामने प्रमुख सवाल था कि व्यापक लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के साथ शिक्षा कैसे दी जाय? इसके लिए क्या कदम उठाए जाय? मौलाना शिक्षा को एशिया की सबसे बड़ी चुनौती मानते थे और उनकी दृष्टि में अंतरराष्ट्रीय शान्ति के लिए यह बेहद जरूरी आवश्यकता थी। वे 'सामाजिक शिक्षा' के जबरदस्त पक्षधर थे जिसके तहत नागरिक अधिकार और कर्तव्य की शिक्षा और आम जनता में एक तरह की शिक्षित मानसिकता का व्यापक पैमाने पर विकास हो सके। वे साहस, उदार नजरिया, सहिष्णुता और एकता पर बल देते थे और ऐसी समाज व्यवस्था को स्थापित करने के लिए प्रतिश्रुत थे जिसमें सामाजिक न्याय, सहयोग, उदार मानसिकता और तर्क बुद्धि से काम किया जाता हो। इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने अच्छी शिक्षा को संपत्ति और संसाधनों से ज्यादा महत्त्व दिया। इसके बावजूद कि स्वयं मौलाना को औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी वे एक परिपक्व दृष्टि से संपन्न थे और स्वतन्त्र भारत के लिए एक उदार और समावेशी शिक्षा की वकालत की। भारत में विभिन्न संस्कृतियों और जीवन शैलियों के विकास के इतिहास को देखते हुए वह विविधता में एकता पर बल दे रहे थे। वस्तुत: 'एकं सद विप्रा: बहुधा वदन्ति' के विचार को पहचानते हुए वे सत्य के प्रति बहुलता की दृष्टि के हिमायती थे। सामान्य और सामाजिक शिक्षा के उपक्रम में इस बात को सतत स्मरण रखना जरूरी है। इस काम में शिक्षक की ख़ास भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आजाद की शैक्षिक दृष्टि उनके जीवन-दर्शन से जुड़ी थी। उनके लिए शिक्षा से मानवीय क्षमताओं का विकास होता है और मानवीय जीवन जीना संभव हो पाता है। वे मानते थे कि शिक्षा हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे पूरा करना सरकार का अनिवार्य कर्तव्य है। शिक्षा देने का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों और उनके माध्यम से पूरे समाज में मूल्यों और आदर्शों को स्थापित करना है। आजाद यह भी मानते थे कि सद्य: स्वतन्त्र हुए देश के लिए सामाजिक शिक्षा की व्यवस्था बहुत जरूरी है। इसके अंतर्गत साक्षरता, नागरिक के अधिकार-कर्तव्य की जानकारी और आमजन में शिक्षित मानसिकता का विकास हो सके इसके लिए उन्होंने विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया था। इसी तरह राष्ट्रीय विकास को ध्यान में रखते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा के विकास के लिए उन्होंने कई कदम उठाए। राष्ट्रीय एकता और सर्वधर्म समभाव के विकास को पाठ्यचर्या स्थान देने के लिए प्रयास किया। वे वैश्विक स्तर पर एकता और समझदारी के लिए शिक्षा में व्यापक दृष्टि को प्रोत्साहित कर रहे थे। मौलाना शिक्षा के लोकतंत्रीकरण में विश्वास करते थे। माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा तक सबको पहुंचाना चाहते थे और प्रौढ़ शिक्षा और स्त्री शिक्षा पर भी बल दिया। जाति तथा वर्ग के शोषण से मुक्ति के लिए वे शिक्षा के अवसरों की समानता को बेहद जरूरी मानते थे। राज्य की भाषा, हिन्दी और अंग्रेजी के साथ त्रिभाषा के सूत्र को भी उन्होंने समर्थन दिया था। वे पूरे देश में मजबूत प्राथमिक शिक्षा चाहते थे। देश की जरूरतों को देखते हुए गांधीवादी मूल्यों के विकास, अध्यापक-प्रशिक्षण, पुस्तकालयों का विस्तार, हिंदी तथा अन्य भाषाओं का विकास, दिव्यांगों और अनुसूचित तथा जनजाति के विद्यार्थियों के लिए सहायता, युवक कल्याण और शारीरिक शिक्षा आदि तमाम क्षेत्रों में आधारभूत व्यवस्था शुरू करने का काम उनकी देखरेख में आरम्भ हुआ। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् को पुनर्संगठित कर अनेक तकनीकी संस्थाओं के आरम्भ का मार्ग प्रशस्त किया। अध्यापकों में सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना के विकास के साथ उनकी स्थिति को सुधारने की चिंता भी उन्हें थी। शिक्षक-प्रशिक्षण पर भी जोर दिया। उनके विचार व्यापक थे पर उनका कार्यान्वयन संसाधनों की अनुपलब्धता व राजनैतिक इच्छाशक्ति अभाव में समुचित ढंग से नहीं हो सका। शुरू में पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को जगह नहीं मिली और मौलाना के जोर देने पर ध्यान गया पर पर्याप्त संसाधन नहीं मिले। मौलाना ने पुरानी विरासत और लालफीताशाही वाले सरकारी तौर तरीके को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की थी। धीरे-धीरे संसाधन में सुधार हुआ है पर शिक्षा अभी भी देश की वरीयता नहीं बन सकी है और कई मोर्चों पर बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। अब देश के सामने एक नई शिक्षा नीति पेश हुई है जिसमें संरचना, प्रक्रिया और लक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण संकल्प लिए गए हैं। आज विद्यार्थियों की संख्या, अभिरुचियों और सम्भावनाओं को लेकर चुनौतियों की जटिलता ज्यादा है पर एक आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के निर्माण के लिए भारतीय समाज और संस्कृति की आकांक्षाओं का आदर करते हुए जरूरी बदलाव के साथ शिक्षा को जीवनदान देना ही होगा। शिक्षा का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। (लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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Dakhal News 10 November 2020


bhopal,Prime Minister, special Diwali gift, Kashi

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 614 करोड़ रुपये की 30 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। उन्होंने जिन परियोजनाओं का उद्घाटन किया उनमें सारनाथ लाइट एंड साउंड शो, लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल रामनगर का उन्नयन, सीवरेज संबंधित कार्य, गायों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का प्रबंध, बहुउद्देशीय बीज भंडार गृह, 100 मीट्रिक टन कृषि उपज क्षमता वाले गोदाम, आईपीडीएस चरण-2, संपूर्णानंद स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिये एक आवास, वाराणसी शहर के स्मार्ट लाइटिंग कार्य, 105 आंगनवाड़ी केंद्र और 102 गौ आश्रय केंद्र शामिल हैं। इसके अतिरिक्त दशाश्वमेध घाट और खिड़किया घाट का पुनर्विकास, पीएसी पुलिस बल के लिए बैरक, काशी के कुछ वार्डों का पुनर्विकास, बेनियाबाग में पार्क के पुनर्विकास के साथ पार्किंग सुविधा, गिरिजा देवी संस्कृत शंकुल में बहुउद्देश्यीय हॉल के उन्नयन सहित शहर में सड़कों की मरम्मत और पर्यटन स्थलों के विकास परियोजनाओं का शिलान्यास भी किया। यह सब प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये किया। इसके बावजूद वे अपने लोगों से अपने मन की बात कहने, उनसे संवाद स्थापित करने में पीछे नहीं रहे। इसी साल फरवरी माह में उन्होंने चंदौली में काशी-महाकाल एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई थी। वाराणसी में 1254 करोड़ की लागत की 50 परियोजनाओं का उद्घाटन और 1200 करोड़ की लागत की विभिन्न विकास योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण भी किया था। वर्ष 2018 में उन्होंने वाराणसी को 2400 करोड़ रुपये की सौगात दी थी। रामनगर स्थित पहले वाटर वेज टर्मिनल का उद्घाटन किया था। वर्ष 2014 से अबतक वाराणसी का सम्यक विकास ही उनका अभीष्ठ रहा है। विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण भी उनकी विकास परिकल्पना का ही अंग है। इसबार उन्होंने वाराणसी को जो दीपावली गिफ्ट दिया, वह लोगों को खूब भा रहा है। आजादी के आंदोलन में स्वदेशी अपनाओ का नारा दिया गया था। इस आंदोलन के तहत विदेशी सामानों की देशभर में होली जलाई गई थी। यह और बात है कि आजादी के बाद भारत में स्वदेशी आंदोलन कमजोर पड़ गया था। 'निजभाषा उन्नति अहै सब धर्मन को मूल' कहने वालों की भी तादाद घट गई और इसका असर यह हुआ कि देश पाश्चात्य भाषा, संस्कृति और उत्पादों के मकड़जाल में फंस गया। हालात यह है कि चीन सुई-धागे से लेकर लक्ष्मी-गणेश और झालर-बत्ती तक का उत्पादन करता रहा और भारत के कारीगर, कामगार बेरोजगार होते रहे। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल इस समस्या को जाना-समझा बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लोकल फॉर वोकल का नारा दिया। उन्हें पता है कि त्योहारी मौसम में ज्यादा खरीदारी होती है। इस लिहाज से अपने संसदीय क्षेत्र में लोगों से लोकल फॉर दीवाली को प्रमोट करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय उत्पादों को खरीदने, उसका इस्तेमाल करने, उसका प्रचार करने, अच्छाई बताने से न केवल स्थानीय पहचान मजबूत होगी बल्कि स्थानीय उत्पादकों की दिवाली भी और रोशन हो जाएगी। उन्होंने देशवासियों से स्थानीय उत्पादों के प्रति मुखर होने, स्थानीय उत्पादों के साथ दीपावली मनाने का आग्रह किया है। उन्होंने इससे जहां पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में नई चेतना के जागरण की बात की है, वहीं यह भी सुस्पष्ट करने की कोशिश की है कि लोकल के लिए वोकल बनने का अर्थ सिर्फ दीये खरीदना नहीं है, बल्कि हर स्थानीय चीज को खरीदना है। ऐसी चीज जो अपने देश में नहीं बन सकती, वही बाहर से ली जाए लेकिन जो चीज देश में बन सकती है, उसके लिए विदेशी उत्पादोंपर निर्भरता ठीक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका ऐसा विदेशी सामानों को गंगा में बहा देने का नहीं है बल्कि देश के उद्यमियों की अंगुली थामने, उनकी हौसलाअफजाई करने का है। प्रधानमंत्री काशी से संवाद करें और बाबा विश्वनाथ और मां गंगा की बात न करें, ऐसा मुमकिन नहीं है। उन्होंने कहा है कि महादेव के आशीर्वाद से काशी कभी थमती नहीं है। मां गंगा की तरह लगातार आगे बढ़ती रहती है। कोरोना के कठिन काल में भी काशी आगे बढ़ती रही। इस बहाने अपनी उपलब्धियां गिनाने में भी वे पीछे नहीं रहे। कहा कि काशी में घाटों की तस्वीर बदल रही है। गांव में रहने वाले लोगों को, गांव की ज़मीन, गांव के घर का, कानूनी अधिकार देने के लिए 'स्वामित्व योजना' शुरू की गई है। उन्होंने इस बात का भी दावा किया है कि बाबतपुर एयरपोर्ट पर 2 पैसेंजर बोर्डिंग ब्रिज का लोकार्पण होने के बाद इन सुविधाओं का और विस्तार होगा। 6 वर्ष पहले जहां बनारस से हर दिन 12 उड़ानें हुआ करती थीं, आज यहां से उड़ानों की तादाद 50 के आस-पास हो गई है। काशी का बड़ा क्षेत्र अब बिजली के तारों के जाल की समस्या से मुक्त हो रहा है। तारों को अंडरग्राउंड करने का एक और चरण पूरा हो चुका है। इससे अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति उनके जुड़ाव और लगाव का भी बोध होता है। काशीवासी वोकल के प्रति कितने लोकल हो पाएंगे, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन स्वदेशी को आगे बढ़ाने का यह प्रयोग देशी उत्पादों और कारीगरों को मजबूती जरूर देगा, इसमें कोई शक नहीं है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 10 November 2020


bhopal,Prime Minister, special Diwali gift, Kashi

सियाराम पांडेय 'शांत' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 614 करोड़ रुपये की 30 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। उन्होंने जिन परियोजनाओं का उद्घाटन किया उनमें सारनाथ लाइट एंड साउंड शो, लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल रामनगर का उन्नयन, सीवरेज संबंधित कार्य, गायों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का प्रबंध, बहुउद्देशीय बीज भंडार गृह, 100 मीट्रिक टन कृषि उपज क्षमता वाले गोदाम, आईपीडीएस चरण-2, संपूर्णानंद स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिये एक आवास, वाराणसी शहर के स्मार्ट लाइटिंग कार्य, 105 आंगनवाड़ी केंद्र और 102 गौ आश्रय केंद्र शामिल हैं। इसके अतिरिक्त दशाश्वमेध घाट और खिड़किया घाट का पुनर्विकास, पीएसी पुलिस बल के लिए बैरक, काशी के कुछ वार्डों का पुनर्विकास, बेनियाबाग में पार्क के पुनर्विकास के साथ पार्किंग सुविधा, गिरिजा देवी संस्कृत शंकुल में बहुउद्देश्यीय हॉल के उन्नयन सहित शहर में सड़कों की मरम्मत और पर्यटन स्थलों के विकास परियोजनाओं का शिलान्यास भी किया। यह सब प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये किया। इसके बावजूद वे अपने लोगों से अपने मन की बात कहने, उनसे संवाद स्थापित करने में पीछे नहीं रहे। इसी साल फरवरी माह में उन्होंने चंदौली में काशी-महाकाल एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई थी। वाराणसी में 1254 करोड़ की लागत की 50 परियोजनाओं का उद्घाटन और 1200 करोड़ की लागत की विभिन्न विकास योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण भी किया था। वर्ष 2018 में उन्होंने वाराणसी को 2400 करोड़ रुपये की सौगात दी थी। रामनगर स्थित पहले वाटर वेज टर्मिनल का उद्घाटन किया था। वर्ष 2014 से अबतक वाराणसी का सम्यक विकास ही उनका अभीष्ठ रहा है। विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण भी उनकी विकास परिकल्पना का ही अंग है। इसबार उन्होंने वाराणसी को जो दीपावली गिफ्ट दिया, वह लोगों को खूब भा रहा है। आजादी के आंदोलन में स्वदेशी अपनाओ का नारा दिया गया था। इस आंदोलन के तहत विदेशी सामानों की देशभर में होली जलाई गई थी। यह और बात है कि आजादी के बाद भारत में स्वदेशी आंदोलन कमजोर पड़ गया था। 'निजभाषा उन्नति अहै सब धर्मन को मूल' कहने वालों की भी तादाद घट गई और इसका असर यह हुआ कि देश पाश्चात्य भाषा, संस्कृति और उत्पादों के मकड़जाल में फंस गया। हालात यह है कि चीन सुई-धागे से लेकर लक्ष्मी-गणेश और झालर-बत्ती तक का उत्पादन करता रहा और भारत के कारीगर, कामगार बेरोजगार होते रहे। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल इस समस्या को जाना-समझा बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लोकल फॉर वोकल का नारा दिया। उन्हें पता है कि त्योहारी मौसम में ज्यादा खरीदारी होती है। इस लिहाज से अपने संसदीय क्षेत्र में लोगों से लोकल फॉर दीवाली को प्रमोट करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय उत्पादों को खरीदने, उसका इस्तेमाल करने, उसका प्रचार करने, अच्छाई बताने से न केवल स्थानीय पहचान मजबूत होगी बल्कि स्थानीय उत्पादकों की दिवाली भी और रोशन हो जाएगी। उन्होंने देशवासियों से स्थानीय उत्पादों के प्रति मुखर होने, स्थानीय उत्पादों के साथ दीपावली मनाने का आग्रह किया है। उन्होंने इससे जहां पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में नई चेतना के जागरण की बात की है, वहीं यह भी सुस्पष्ट करने की कोशिश की है कि लोकल के लिए वोकल बनने का अर्थ सिर्फ दीये खरीदना नहीं है, बल्कि हर स्थानीय चीज को खरीदना है। ऐसी चीज जो अपने देश में नहीं बन सकती, वही बाहर से ली जाए लेकिन जो चीज देश में बन सकती है, उसके लिए विदेशी उत्पादोंपर निर्भरता ठीक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका ऐसा विदेशी सामानों को गंगा में बहा देने का नहीं है बल्कि देश के उद्यमियों की अंगुली थामने, उनकी हौसलाअफजाई करने का है। प्रधानमंत्री काशी से संवाद करें और बाबा विश्वनाथ और मां गंगा की बात न करें, ऐसा मुमकिन नहीं है। उन्होंने कहा है कि महादेव के आशीर्वाद से काशी कभी थमती नहीं है। मां गंगा की तरह लगातार आगे बढ़ती रहती है। कोरोना के कठिन काल में भी काशी आगे बढ़ती रही। इस बहाने अपनी उपलब्धियां गिनाने में भी वे पीछे नहीं रहे। कहा कि काशी में घाटों की तस्वीर बदल रही है। गांव में रहने वाले लोगों को, गांव की ज़मीन, गांव के घर का, कानूनी अधिकार देने के लिए 'स्वामित्व योजना' शुरू की गई है। उन्होंने इस बात का भी दावा किया है कि बाबतपुर एयरपोर्ट पर 2 पैसेंजर बोर्डिंग ब्रिज का लोकार्पण होने के बाद इन सुविधाओं का और विस्तार होगा। 6 वर्ष पहले जहां बनारस से हर दिन 12 उड़ानें हुआ करती थीं, आज यहां से उड़ानों की तादाद 50 के आस-पास हो गई है। काशी का बड़ा क्षेत्र अब बिजली के तारों के जाल की समस्या से मुक्त हो रहा है। तारों को अंडरग्राउंड करने का एक और चरण पूरा हो चुका है। इससे अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति उनके जुड़ाव और लगाव का भी बोध होता है। काशीवासी वोकल के प्रति कितने लोकल हो पाएंगे, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन स्वदेशी को आगे बढ़ाने का यह प्रयोग देशी उत्पादों और कारीगरों को मजबूती जरूर देगा, इसमें कोई शक नहीं है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 10 November 2020


bhopal,It was also Diwali

श्वेता गोयल दीपान्विता, दीपमालिका, कौमुदी महोत्सव, जागरण पर्व में आधुनिक काल की फिल्मों ने भले ही दीवाली के प्रसंग को भुला दिया है लेकिन पुरानी फिल्मों में बताया गया दीपक का महत्व आज भी उसी प्रकार से समाज को आलोकित किए हुए है, जैसा उन दिनों में हुआ करता था। सामाजिक, राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत दृष्टिकोणों से दीवाली की अद्वितीय, अलौकिक व आनंददायी मान्यताएं फिल्मों में उन दिनों से स्थापित होती रही हैं, जब भारतीय फिल्म निर्माताओं का देश एवं समाज के प्रति दृष्टिकोण व्यावसायिक कम और रचनात्मक ज्यादा होता था। दीये की हमराह बनी बाती और तेल का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रहा है। धर्मशास्त्रों ने दीये की महिमा को शुभ, आस्था का प्रतीक, उज्ज्वल, अंधकार विनाशक, जीवन का प्रतीक एवं सामंजस्य का प्रतीक माना है। भारतीय फिल्मों में दीये के इर्द-गिर्द कई गीतों की मालाओं को बड़ी खूबसूरती से पिरोकर दीवाली की पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत किया गया है। इन गीतों में संदेश, दर्शन, जीवन स्वर, सबकुछ निहित है, जो हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का हिस्सा रहा है। दीवाली के फिल्मी प्रसंग और गीत हमारे अपने परिवेश की प्रतिछाया हुआ करते थे। फिर भी दीये की यह संस्कृति और दीयों की महिमा का गुणगान हमारी फिल्मों से न जाने कहां और क्यों गायब हो गया? उन दिनों फिल्म 'नजराना' के नायक राजकपूर ने गाया था- इक वो भी दीवाली थी, इक ये भी दीवाली है। उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है। फिल्म 'संबंध' में दीपक की महिमा का गुणगान सुनकर व्यक्ति के मन ने आवाज दी- जगमगाते दीयों मत जलो, मुझसे रूठी है मेरी दीवाली। ये खुशी ले के मैं क्या करूं, मेरी है अबतक रात काली।। फिल्म 'एकबार मुस्करा दो' में बुझे मन की आवाज थी- सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, कि बुझते दीये को ना तुम याद करना।। मजरूह के लिखे फिल्म 'धरती कहे पुकार के' के गीत में नायिका निवेदिता ने खुशी के मौके पर दीये को याद करते हुए कहा- दीये जलाए प्यार के चलो इसी खुशी में, बरस बिता के आई है ये शाम जिंदगी में। व्ही शांताराम ने दीये की दास्तान अपनी फिल्म 'तूफान और दिशा' में कुछ यूं व्यक्त की- निर्धन की लड़ाई बलवान की, ये कहानी है दीये और तूफान की। फिल्म 'आकाशदीप' की नायिका माला सिन्हा ने प्रेम के अंकुरण का स्वरूप दीपक को मानते हुए कहा था- दिल का दीया जला के गया, ये कौन मेरी तन्हाई में। दोस्ती और वफा की बात चली तो 'नमक हराम' के नायक राजेश खन्ना कह उठे- दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं। बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं।। दीवाली का उत्साह, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों के बीच फिल्म 'जुगनू' का नायक गा उठा- छोटे-छोटे, नन्हे-नन्हे, प्यारे-प्यारे से दीप, दीवाली के झूले ...। आस्थावान नारी के हाथों में पूजा के लिए प्रस्तुत होता दीया जब भारतीय नारी के आंचल की छांव में टिमटिमाता आगे बढ़ा तो शकील बदायूंनी के गीतों के साथ फिल्म 'सन ऑफ इंडिया' की नायिका कुमकुम कह उठी- दीया न बुझे रे आज हमारा। पुरानी फिल्मों में दीवाली और दीयों की महिमा का गुणगान करते गीतों की लड़ियों ने समाज से फिल्मों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखने का आग्रह किया था लेकिन अब दीवाली के पावन पर्व पर दीये का गुणगान करने वाला मंगलगान तो दूर की बात, फिल्मों से दीवाली के प्रसंग ही लगभग गायब से हो गए हैं। फिल्मकार कभी रचनात्मक दृष्टिकोण देकर सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की कोशिश किया करते थे लेकिन अब फिल्मी बाजार से यह प्रयास बाहर हो गया दिखता है। (लेखिका शिक्षिका हैं।)

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Dakhal News 9 November 2020


bhopal,So that , needy does not die, harsh winter

योगेश सोनी देश व दुनिया में राजनीतिक समीकरणों के बदलने के साथ मौसम भी बदल रहा है। हमारी विशेषता यह है कि हम किसी भी घटना व बदलते परिवेश के लिए हर वक्त तैयार रहते है लेकिन हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि इसबार सर्दी से किसी जरूरतमंद की जान न जाए। इसके लिए हमें सरकार व नेता से उम्मीद नहीं करनी और न ही उनपर निर्भर रहना है। केंद्र व राज्य सरकारें इस तरह की योजनाओं के लिए हर बार अथक प्रयास करते हुए गरीबों के लिए तमाम सुविधाओं की व्यवस्था करती है लेकिन इसके बाद भी हर साल ठंड से देशभर में बड़ी संख्या में लोगों की असमय मौत होती है। इसका कारण यह है कि या तो वो सरकार की सुविधाएं उनतक पहुंच नहीं पाती या फिर ऐसे लोग सुविधाओं तक नहीं पहुंच पाते। देश में सर्दी ने दस्तक दे दी है। विभिन्न समाचार माध्यमों की सुर्खियां बदलने वाली है। हर रोज अखबार व चैनलों पर यह दिखाई व सुनाई देने ही वाला है कि कड़ाके की सर्दी से इतने लोगों की मौत, शासन लापरवाह व प्रशासन मौन आदि। लेकिन इसबार हम ऐसी खबरों को देखना नहीं चाहते। कोरोनाकाल से उपजी स्थिति के कारण यह संकट और भी गहरा हो सकता है। इससे निपटने एक रास्ता यह है कि इसबार आपको स्वयं को ही नेता, सरकार या गरीबों का मसीहा मानते हुए इस काम को अंजाम देना होगा। अपने पुराने या प्रयोग में न आने वाले कपड़े किसी को न तो बेचें और न फेकें। उन कपड़ों को राह चलते या किसी जरूरतमंद या किसी एनजीओ को दे दें। जिन लोगों के पास कार है वे पुराने कपड़े अपनी कार में रखें व जहां भी रास्ते या अन्य स्थान पर किसी को ठंड से ठिठुरता दिखे तो उसे दें। इसके अलावा जो लोग बाकी साधनों का इस्तेमाल करते हैं वे अपनी सुविधा के मुताबिक कपड़ों का वितरण कर सकते हैं। कई जगह देखा जाता है कि लोग पुराने कपड़े के बदले विभिन्न तरह के कांच और स्टील के बर्तन या अन्य छोटी-मोटी चीजें खरीदते हैं। वे ऐसा न करें व अपने मन से छोटा-सा लालच निकालते हुए किसी गरीब को कपड़े देने का प्रयास करें। जिन वस्तुओं को वो लेते हैं उनकी कीमत कपड़ों की कीमत की अपेक्षा बेहद कम होती है। गली-मोहल्ले में घूमने वाले इस तरह के फेरीवाले घरों से कपड़ा इकट्ठा कर उसे आगे बेच देते हैं। ऐसा करने से बेहतर है कि गरीब या जरूरतमंदों को कपड़े दिए जाएं। क्योंकि आपके दिये कपड़े से किसी की जान बच सकती है। आपके आसपास ही आसानी से वे लोग मिल जाते हैं जिन्हें हम इस तरह के कपड़े दे सकते हैं। अक्सर कुछ लोगों को देखा है जो रात में अपने साथ कपड़े लेकर घूमते हैं जहां भी उन्हें जरूरतमंद लोग मिलते हैं, उन्हें कपड़े या कम्बल देकर चले जाते हैं। अधिकतर लोग ऐसे कामों के लिए अपनी व्यस्तता का हवाला देते हैं जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें दो राय नहीं कि आज हर किसी के पास समय की बेहद कमी है लेकिन मात्र कुछ समय निकालकर किसी की जान बचती है तो हमें यह जरूर करना चाहिए। अधिकतर लोगों ने अपने समय का वर्गीकरण इस तरह कर रखा है कि उनके पास किसी अन्य चीजों के लिए समय ही नहीं है या यूं कहें कि इस व्यस्तता भरे जीवन में लोगों के पास अपने लिए भी समय नहीं बचा। खासतौर पर महानगरों में तो सूकून, चैन या आराम नाम की चीजें ही लोगों के जीवन से गायब हो गई हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी की ठंड से मौत होने की खबर पढ़कर या शेयर कर दुख जताने से बेहतर है कि आपके छोटे से प्रयास से यदि किसी की जान बच जाए तो निश्चित तौर पर स्वयं को भी अच्छा लगेगा। हम अधिकतर काम सरकार पर छोड़ देते हैं लेकिन कुछ स्वयं करें तो देश की दशा बदल सकती है। हमें अपने मन में एक छोटा-सा प्रण यह करना होगा कि हमारे आसपास भूख या ठंड से किसी की मौत न हो। बहरहाल, गरीबों को ठंड से बचाने के लिए सरकार के साथ हर क्षेत्र की संबंधित एनजीओ व जनता को भी पहल करते हुए गरीब व जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। आंकड़ों व खबरों पर गुस्सा निकालने की बजाय सब साथ काम करें। हम तीर्थस्थलों पर जाते हैं लेकिन यदि किसी की जिंदगी बचाकर या यूं कहें कि किसी को नई जिंदगी देकर उससे ज्यादा पुण्य यहीं कमा लें तो गलत नहीं होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 November 2020


bhopal,A very special festival, Ayodhya this time

सियाराम पांडेय 'शांत' 11 से 13 नवंबर अयोध्या के लिए बेहद खास है। वह इसलिए कि इन तीन दिनों तक रामनगरी में दीपोत्सव की धूम रहेगी। कोरोना प्रोटोकॉल का ध्यान रखते हुए लोग भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या में अपनी आस्था के दीप जलाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह इस कार्यक्रम में वर्चुअली शिरकत करेंगे। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ इसबार भी दीप जलाने अयोध्या जाएंगे। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद अयोध्या में भव्य दीपोत्सव मनाने का आरंभ हुआ। इस साल योगी सरकार चौथा भव्य दीपोत्सव मनाने जा रही है। अभीतक के तीन दीपोत्सव में अयोध्या में राम की पैड़ी पर तो लाखों की तादाद में दीपक जले लेकिन दीपोत्सव से रामजन्मभूमि परिसर उपेक्षित रहा। रामलला के अस्थायी मंदिर में पुजारी द्वारा जलाया गया दीप ही हर साल टिमटिमाता नजर आता है लेकिन इसबार अयोध्या की दीपावली इसलिए भी अहमियत रखती है क्योंकि 492 साल बाद भगवान श्रीराम की जन्मभूमि दीपों से जगमगाएगी। कतिपय प्रतिबंधों की वजह से पहले ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं था लेकिन अब राममंदिर मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ गया है और वहां रामलला के मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन और शिलान्यास भी हो गया है। इस लिहाज से देखा जाए तो इसबार की दीपावली अयोध्या के लिए बेहद खास है जब रामजन्मभूमि परिसर में भी दीपोत्सव की जगमग देखने को मिलेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा है कि करीब पांच शताब्दी की लम्बी प्रतीक्षा के बाद श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास हो जाने के पश्चात अयोध्या में आयोजित 'दीपोत्सव-2020' का विशेष महत्व है। वैसे भी योगी सरकार हर दीपोत्सव में अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ देती है। इसबार योगी सरकार की योजना 5 लाख 51 हजार दीपक जलाए जाने की है। पिछले साल अयोध्या में 4 लाख दीपक जलाए गए थे। हर साल गिनीज बुक में अयोध्या का दीपोत्सव दर्ज होता रहा है, इसबार भी कुछ ऐसा ही करने की तैयारी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस आयोजन को विश्वस्तरीय बनाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री की मानें तो अयोध्या को विश्वस्तरीय पर्यटक स्थल के रूप में स्थापित किया जाएगा और वह इस दिशा में साल-दर-साल आगे बढ़ भी रहे हैं। राममंदिर मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय 9 नवंबर, 2019 को आया था। इस निर्णय तिथि के एक साल पूर्ण होने पर रामादल ट्रस्ट की ओर से विशेष पूजा अनुष्ठान का आयोजन किया है। इस अवसर पर सरयू तट पर अयोध्या का दुग्धभिषेक किया जाना है। यह पहला अवसर होगा जब कोई अयोध्या का दुग्धाभिषेक करेगा। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबी उम्र की कामना के साथ अयोध्या के हर चौराहे पर 108 बत्तियों वाले दीपक जलाए जाएंगे। श्रद्धालु और संत 9 नवंबर को सरयू तट पर बाल्मीकि रामायण रचित सुंदरकांड के साथ हनुमान चालीसा का भी पाठ करेंगे। दूसरी ओर अवध विश्वविद्यालय द्वारा दीपोत्सव के मद्देनजर भव्य और आकर्षक झाांकियां निकाली जाएगी। पर्यटन विभाग ने सरयू घाटों, राम की पैड़ी और अस्थायी वीआई चबूतरे के निर्माण को अंतिम रूप देना आरंभ कर दिया है। दीपोत्सव में आने वालों को सेनेटाइजर और मॉस्क उपलब्ध कराए जाएंगे। भगवान राम और दीपोत्सव का युगों पुराना रिश्ता है। त्रेता युग में रावण वध के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे तब अयोध्या दीपों से सजाई गई थी। कहते हैं कि इसी के बाद पूरे देश में दीपावली मनाई जाने लगी। भगवान राम की तरह अयोध्या के किसी अन्य राजा का दीप जलाकर स्वागत किया गया हो, ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। अयोध्या में भी हर दीपावली को लोग अपने घरों में दीप जलाते रहे। दालान, खलिहान और ओसारे में दीप जलाते रहे। यम का दिया। दलिद्दर का दीप जलाते-निकालते रहे लेकिन दीप जलाने के वास्तविक निहितार्थ से दूर रहे। महर्षि वेदव्यास ने लिखा है कि दीपक की ज्योति ही परब्रह्म है। दीप ज्योति ही जनार्दन अर्थात ईश्वर है। दीप हमारे पापों को नष्ट करता है। ऐसी हे दीप ज्योति! आपको नमस्कार है। 'दीप ज्योति परब्रह्म, दीप ज्योतिर्जनार्दनः, दीपो हरति मे पापं, दीप ज्योतिर्नमोस्तुते।' अयोध्या के दीपोत्सव में हर साल नवोन्मेष हो रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इसबार दीपोत्सव में मिट्टी तथा गोबर से निर्मित दीयों के प्रज्ज्वलन के निर्देश दिए हैं। दीपक प्रकाश का प्रतिनिधि है। ज्ञान और विज्ञान का प्रतिनिधि है। दीपक से समाज को प्रेरणा लेनी चाहिए। दीपक खुद जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। इस बहाने वह खुद को जानने की प्रेरणा देता है। त्याग और बलिदान समाजसेवा की पहली शर्त है। दीपक जैसा जीवन जीना होगा। दीपोत्सव पर जलने वाले दीपक सामान्य नहीं हैं। यह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के राज्य के दीप हैं। यह उस राजा के स्वागत में जलेंगे जिसने अपने सिद्धांतों और आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। प्रजा के हित को सर्वोपरि समझा। दीप जलाते वक्त अपने आराध्य से प्रार्थना की जानी चाहिए कि वह हमें सन्मार्ग पर चलाए। अयोध्या में दीपों का जलना सामान्य घटना नहीं है। ये दीपक आस्था और विश्वास के हैं। आदर्शों और सिद्धांतों के हैं। त्याग और बलिदान के हैं। संसार के कल्याण के लिए हर क्षण तैयार रहने वाली जनभावना के हैं। दीपों को हवा के थपेड़े भी झेलने पड़ते हैं लेकिेन वे उनसे अंतिम क्षण तक संघर्ष करते हैं और हम इंसानों को प्रेरणा देते हैं- प्रबल प्रतिकार करो। दीपक हमें अपना दीपक खुद बनने की प्रेरणा देते हैं। दीपावली हमें पुरुषार्थ और परमार्थ का दीया जलाने का संदेश देती है। इन दीपों को प्रतीकात्मकता और औपचारिकता से मत जोड़िए। सरकार को चाहिए कि वह दीपोत्सव को जनजागृति का विषय बनाए। इस बहाने सामूहिकता की भावना को विकसित करे। रामनगरी में दीपोत्सव का यही उद्देश्य भी है।  (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 9 November 2020


bhopal,Bihar Vis Election: The end of all good

सियाराम पांडेय 'शांत' बिहार में विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का प्रचार थम गया है। दो चरणों के मतदान हो चुके हैं। तीसरे चरण का मतदान 7 नवंबर को होना है। राजनीतिक दलों ने अपनी तरकश के बचे-खुचे तीर भी बाहर निकाल दिए हैं। अब जो कुछ भी करना है, मतदाताओं को ही करना है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो अपनी जनसभा में यहां तक कह दिया कि 'यह उनका आखिरी चुनाव है। अंत भला तो सब भला।'  नीतीश कुमार पहला चुनाव में 1977 में लड़े थे। तब से आजतक उन्होंने केंद्र और राज्य की तमाम जिम्मेदारियों का वहन किया है। राजनीतिक हलकों में इसे उनके भावनात्मक कार्ड के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी ओर इससे इस बात के भी कयास लगाए जाने लगे हैं कि क्या नीतीश कुमार राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने वाले हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जहां बिहार में इस चुनाव में मोदी वोटिंग मशीन न चलने की बात कह रहे हैं। खुद को सच का सिपाही बता रहे हैं, वहीं लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा है कि इसबार बिहार में भाजपा-लोजपा गठबंधन की सरकार बनेगी। चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष नतमस्तक होने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10 नवंबर के बाद तेजस्वी यादव के समक्ष नतमस्तक होते नजर आएंगे। तेजस्वी खेमे के लोग भी यही कह रहे हैं कि इसबार नीतीश को नहीं आना है। रही बात सच के सिपाही होने की तो इसबार चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में हर तीसरा प्रत्याशी अपराधी भी है और करोड़पति भी, वह चाहे जिस किसी भी दल से संबद्ध क्यों न हो। यह उनके चुनावी शपथपत्र से स्पष्ट है। इसबार सबसे अधिक 98 करोड़पति दागियों को राजद ने टिकट दिया है। कांग्रेस ने भी 45 दागियों को चुनाव मैदान में उतारा है। 2015 के विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस ने 23 क्रिमिनल करोड़पतियों पर ही यकीन किया था लेकिन इसबार उसने इस संख्या में दोगुना इजाद कर दिया है। सच के सिपाही अपराधियों और करोड़पतियों को टिकट देते हैं और बात गरीबों की करते हैं। भाजपा और जदयू में भी दागियों की संख्या कम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बिहार के लोगों के नाम एक भावुक खत लिखा है कि बिहार के विकास के लिए मुझे नीतीश कुमार की जरूरत है। पता नहीं, मतदाता इस खत को कितना महत्व देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो बात चुनाव प्रचार के अंतिम दिन कही है, उसे अगर वे पहले कहते तो शायद ज्यादा फायदे में रहते लेकिन जब जागे तभी सबेरा। बिहार की जनता किस पर भरोसा करेगी, वह चिराग को आलोकित होते देखेगी या तेजस्वी के तेज में बढ़ोत्तरी करेगी। सुशासन को अहमियत देगी या जंगलराज की आधारशिला रखेगी, यह तो दस नवंबर को तय होगा लेकिन नेताओं की भावुक अपीलों ने मतदाताओं को सोचने को विवश तो किया ही है। बिहार विधानसभा के चुनाव में लोजपा के 134 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, इनमें से 93 का भाग्‍य ईवीएम में कैद हो चुका है। तीसरे चरण में 7 नवंबर को पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, पूर्णियां, अररिया, किशनगंज और कटिहार जिले की 78 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होने हैं। बिहार विधानसभा के तीसरे चरण में भाजपा 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वर्ष 2015 के चुनाव में भाजपा के खाते में 19 सीटें इन इलाकों से आई थीं। वहीं वर्ष 2010 के चुनाव में इन 35 सीटों में से भाजपा के खाते में 27 सीटें आई थीं। उस समय भाजपा के खाते में कुल 91 सीटें आई थी। इस चुनाव में भी भाजपा की कोशिश 2010 से भी अधिक बेहतर प्रदर्शन करने की है। यदि उसे मिथिलांचल व सीमांचल का समर्थन मिला तो बिहार में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। अभीतक का इतिहास तो यही रहा है कि इन इलाकों में जिस दल का अधिक दबदबा होता है, बिहार में उसी दल की सरकार बनती रही है। यही वजह है कि भाजपा ने तीसरे चरण के लिए पूरा दमखम लगा दिया है। तीसरे और अंतिम चरण में भाजपा ने आठ उम्मीदवारों को पहली बार मौका दिया है। बगहा, बथनाहा (सु), और रक्सौल के मौजूदा विधायकों की जगह नये चेहरों पर पार्टी ने दांव लगाया है। भाजपा ने कुल 35 उम्मीदवारों में 10 सवर्ण व 10 वैश्य हैं। तीन यादव, तीन कुर्मी व कुशवाहा और पांच अनुसूचित जाति तो चार ईबीसी के उम्मीदवारों को टिकट पार्टी ने दिया है। इस चरण में छह महिलाओं को भी टिकट मिला है। तीसरे चरण में सरकार के 11 मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष की किस्मत का फैसला होना है। 15 साल बाद लोक जनशक्ति पार्टी बिहार में अकेले चुनाव लड़ रही है। बिहार की 40 सुरक्षित सीटों के सापेक्ष लोक जनशक्ति पार्टी ने इसबार अपने 25 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे लेकिन दो सीटों फुलवारीशरीफ और मखदुमपुर में प्रत्याशियों के नामांकन पत्र निरस्त हो जाने की वजह से 23 सुरक्षित सीटों पर पार्टी चुनाव मैदान में है। तीसरे चरण में आठ सुरक्षित सीटों पर मतदान होना है, उसमें त्रिवेणीगंज, रानीगंज, मनिहारी, सिंघेश्वर, सोनबरसा, सिमरी बख्तियारपुर, बोचहां, सकरा और कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र की सीटें शामिल हैं। रोसड़ सुरक्षित सीट से उनके चचेरे भाई कृष्णराज पासवान चुनाव मैदान में हैं जबकि सिकंदरा विधानसभा सुरक्षित सीट से लोजपा के रविशंकर पासवान प्रत्याशी हैं। चिराग पासवान की पार्टी बिहार में जितनी मजबूती से चुनाव लड़ेगी, नीतीश कुमार की पार्टी को उतना ही नुकसान होगा। वैसे इस बार बिहार में जीत-हार किसी भी पार्टी की हो लेकिन हार-जीत की मूल कारण महिलाएं ही होंगी। जिस तरह महिलाओं ने पिछले दो चरणों के चुनाव में पुरुषों से अधिक मतदान किया है, उससे इतना तो तय है ही, इसबार हार-जीत महिला मतदाता ही तय करेंगी। 3 नवंबर को हुए दूसरे चरण के मतदान को लेकर हुए सर्वे से पता चलता है कि 94 विधानसभा क्षेत्र में कुल 55.70 प्रतिशत वोट पड़े। इनमें महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों की तुलना में करीब छह प्रतिशत अधिक रहा है। सत्ता के प्रति आक्रोश होता है और यह हर चुनाव में देखा जाता है। कम या ज्यादा, इस बात को नकारा नहीं जा सकता लेकिन जनता काम भी देखती है। वह तेल भी देखती है और उसकी धार भी देखती है। इसबार भी कुछ इसी तरह के धमाकेदार नतीजे की उम्मीद है। हर दल की नजर तीसरे चरण की वोटिंग और मतदाताओं के मिजाज की है। इस चरण में पड़ने वाले जिलों के मतदाता जिस पर मेहरबान होंगे, बिहार की सत्ता उसी के हाथों में होगी, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है। आत्मनिर्भर बिहार की परिकल्पना की मजबूती के लिए भी बिहार को रीढ़ वाली सरकार की जरूरत है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 6 November 2020


bhopal,Bihar Vis Election: The end of all good

सियाराम पांडेय 'शांत' बिहार में विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का प्रचार थम गया है। दो चरणों के मतदान हो चुके हैं। तीसरे चरण का मतदान 7 नवंबर को होना है। राजनीतिक दलों ने अपनी तरकश के बचे-खुचे तीर भी बाहर निकाल दिए हैं। अब जो कुछ भी करना है, मतदाताओं को ही करना है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो अपनी जनसभा में यहां तक कह दिया कि 'यह उनका आखिरी चुनाव है। अंत भला तो सब भला।'  नीतीश कुमार पहला चुनाव में 1977 में लड़े थे। तब से आजतक उन्होंने केंद्र और राज्य की तमाम जिम्मेदारियों का वहन किया है। राजनीतिक हलकों में इसे उनके भावनात्मक कार्ड के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी ओर इससे इस बात के भी कयास लगाए जाने लगे हैं कि क्या नीतीश कुमार राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने वाले हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जहां बिहार में इस चुनाव में मोदी वोटिंग मशीन न चलने की बात कह रहे हैं। खुद को सच का सिपाही बता रहे हैं, वहीं लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा है कि इसबार बिहार में भाजपा-लोजपा गठबंधन की सरकार बनेगी। चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष नतमस्तक होने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10 नवंबर के बाद तेजस्वी यादव के समक्ष नतमस्तक होते नजर आएंगे। तेजस्वी खेमे के लोग भी यही कह रहे हैं कि इसबार नीतीश को नहीं आना है। रही बात सच के सिपाही होने की तो इसबार चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में हर तीसरा प्रत्याशी अपराधी भी है और करोड़पति भी, वह चाहे जिस किसी भी दल से संबद्ध क्यों न हो। यह उनके चुनावी शपथपत्र से स्पष्ट है। इसबार सबसे अधिक 98 करोड़पति दागियों को राजद ने टिकट दिया है। कांग्रेस ने भी 45 दागियों को चुनाव मैदान में उतारा है। 2015 के विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस ने 23 क्रिमिनल करोड़पतियों पर ही यकीन किया था लेकिन इसबार उसने इस संख्या में दोगुना इजाद कर दिया है। सच के सिपाही अपराधियों और करोड़पतियों को टिकट देते हैं और बात गरीबों की करते हैं। भाजपा और जदयू में भी दागियों की संख्या कम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बिहार के लोगों के नाम एक भावुक खत लिखा है कि बिहार के विकास के लिए मुझे नीतीश कुमार की जरूरत है। पता नहीं, मतदाता इस खत को कितना महत्व देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो बात चुनाव प्रचार के अंतिम दिन कही है, उसे अगर वे पहले कहते तो शायद ज्यादा फायदे में रहते लेकिन जब जागे तभी सबेरा। बिहार की जनता किस पर भरोसा करेगी, वह चिराग को आलोकित होते देखेगी या तेजस्वी के तेज में बढ़ोत्तरी करेगी। सुशासन को अहमियत देगी या जंगलराज की आधारशिला रखेगी, यह तो दस नवंबर को तय होगा लेकिन नेताओं की भावुक अपीलों ने मतदाताओं को सोचने को विवश तो किया ही है। बिहार विधानसभा के चुनाव में लोजपा के 134 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, इनमें से 93 का भाग्‍य ईवीएम में कैद हो चुका है। तीसरे चरण में 7 नवंबर को पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, पूर्णियां, अररिया, किशनगंज और कटिहार जिले की 78 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होने हैं। बिहार विधानसभा के तीसरे चरण में भाजपा 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वर्ष 2015 के चुनाव में भाजपा के खाते में 19 सीटें इन इलाकों से आई थीं। वहीं वर्ष 2010 के चुनाव में इन 35 सीटों में से भाजपा के खाते में 27 सीटें आई थीं। उस समय भाजपा के खाते में कुल 91 सीटें आई थी। इस चुनाव में भी भाजपा की कोशिश 2010 से भी अधिक बेहतर प्रदर्शन करने की है। यदि उसे मिथिलांचल व सीमांचल का समर्थन मिला तो बिहार में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। अभीतक का इतिहास तो यही रहा है कि इन इलाकों में जिस दल का अधिक दबदबा होता है, बिहार में उसी दल की सरकार बनती रही है। यही वजह है कि भाजपा ने तीसरे चरण के लिए पूरा दमखम लगा दिया है। तीसरे और अंतिम चरण में भाजपा ने आठ उम्मीदवारों को पहली बार मौका दिया है। बगहा, बथनाहा (सु), और रक्सौल के मौजूदा विधायकों की जगह नये चेहरों पर पार्टी ने दांव लगाया है। भाजपा ने कुल 35 उम्मीदवारों में 10 सवर्ण व 10 वैश्य हैं। तीन यादव, तीन कुर्मी व कुशवाहा और पांच अनुसूचित जाति तो चार ईबीसी के उम्मीदवारों को टिकट पार्टी ने दिया है। इस चरण में छह महिलाओं को भी टिकट मिला है। तीसरे चरण में सरकार के 11 मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष की किस्मत का फैसला होना है। 15 साल बाद लोक जनशक्ति पार्टी बिहार में अकेले चुनाव लड़ रही है। बिहार की 40 सुरक्षित सीटों के सापेक्ष लोक जनशक्ति पार्टी ने इसबार अपने 25 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे लेकिन दो सीटों फुलवारीशरीफ और मखदुमपुर में प्रत्याशियों के नामांकन पत्र निरस्त हो जाने की वजह से 23 सुरक्षित सीटों पर पार्टी चुनाव मैदान में है। तीसरे चरण में आठ सुरक्षित सीटों पर मतदान होना है, उसमें त्रिवेणीगंज, रानीगंज, मनिहारी, सिंघेश्वर, सोनबरसा, सिमरी बख्तियारपुर, बोचहां, सकरा और कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र की सीटें शामिल हैं। रोसड़ सुरक्षित सीट से उनके चचेरे भाई कृष्णराज पासवान चुनाव मैदान में हैं जबकि सिकंदरा विधानसभा सुरक्षित सीट से लोजपा के रविशंकर पासवान प्रत्याशी हैं। चिराग पासवान की पार्टी बिहार में जितनी मजबूती से चुनाव लड़ेगी, नीतीश कुमार की पार्टी को उतना ही नुकसान होगा। वैसे इस बार बिहार में जीत-हार किसी भी पार्टी की हो लेकिन हार-जीत की मूल कारण महिलाएं ही होंगी। जिस तरह महिलाओं ने पिछले दो चरणों के चुनाव में पुरुषों से अधिक मतदान किया है, उससे इतना तो तय है ही, इसबार हार-जीत महिला मतदाता ही तय करेंगी। 3 नवंबर को हुए दूसरे चरण के मतदान को लेकर हुए सर्वे से पता चलता है कि 94 विधानसभा क्षेत्र में कुल 55.70 प्रतिशत वोट पड़े। इनमें महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों की तुलना में करीब छह प्रतिशत अधिक रहा है। सत्ता के प्रति आक्रोश होता है और यह हर चुनाव में देखा जाता है। कम या ज्यादा, इस बात को नकारा नहीं जा सकता लेकिन जनता काम भी देखती है। वह तेल भी देखती है और उसकी धार भी देखती है। इसबार भी कुछ इसी तरह के धमाकेदार नतीजे की उम्मीद है। हर दल की नजर तीसरे चरण की वोटिंग और मतदाताओं के मिजाज की है। इस चरण में पड़ने वाले जिलों के मतदाता जिस पर मेहरबान होंगे, बिहार की सत्ता उसी के हाथों में होगी, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है। आत्मनिर्भर बिहार की परिकल्पना की मजबूती के लिए भी बिहार को रीढ़ वाली सरकार की जरूरत है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 6 November 2020


bhopal, Ban on firecrackers

प्रमोद भार्गव राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय समेत दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों से यह सवाल पूछा था कि क्यों न 7 नवंबर से 30 नवंबर तक पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इस सवाल के साथ ही दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान सरकारों ने पटाखों के चलाने पर रोक लगा दी। साथ ही मप्र, छत्तीसगढ़ और उप्र सरकारों ने चीनी पटाखों समेत अन्य विदेशी पटाखे बेचने पर रोक लगा दी। होली पर्व के बाद यह दूसरा अवसर है कि चीनी वस्तुओं का बड़ी मात्रा में बहिष्कार हो रहा है। चीनी पटाखों पर रोक इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि इनमें क्लोराइड और परक्लोराइड जैसे रसायन होते हैं जो अत्यंत खतरनाक और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। इनमें जरा-सी रगड़ से विस्फोट हो जाता है। इसलिए भारत में इन रसायनों से बने पटाखों के आयात पर प्रतिबंध तो है लेकिन अनजाने में ये पटाखे आयात कर लिए जाते हैं। यह सही है कि देश की राजधानी दिल्ली दुनिया के अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। यहां की हवा वैसे तो पूरे साल प्रदूषित रहती है लेकिन सर्दियों में अधिकतम प्रदूषित हो जाती है। लिहाजा प्रदूषण के उत्सर्जक कारणों की पड़ताल कर उनपर नियंत्रण जरूरी है, जिससे दिल्ली रहने लायक बनी रहे। इसीलिए दिवाली के समय पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने से सकारात्मक बदलाव आता है। हम जानते हैं कि बच्चे आतिशबाजी के प्रति अधिक उत्साही होते हैं और उसे चलाकर आनंदित भी होते हैं। जबकि यही बच्चे वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से अपना स्वास्थ्य भी खराब कर लेते हैं। खतरनाक पटाखों की चपेट में आकर अनेक बच्चे आंखों की रोशनी और हाथों की अंगुलियां तक खो देते हैं। बावजूद समाज के एक बड़े हिस्से को पटाखा मुक्त दिवाली रास नहीं आती है। इसीलिए इस आदेश के बाद यह बहस चल पड़ी है कि क्या दिल्ली-एनसीआर में खतरनाक स्तर 2.5 पीपीएम पर प्रदूषण पहुंचने का आधार क्या केवल पटाखे हैं। सच तो यह है कि इस मौसम में हवा को प्रदूषित करने वाले कारणों में बारूद से निकलने वाला धुआं एक कारण जरूर है लेकिन दूसरे कारणों में दिल्ली की सड़कों पर वे कारें भी हैं, जिनकी बिक्री कोरोना काल में भी उछाल पर है। नए भवनों की बढ़ती संख्या भी दिल्ली में प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाया जाना भी दिल्ली की हवा को खराब करता है। इस कारण दिल्ली के वायुमंडल में पीएम 2.5 का स्तर बढ़कर 1200 से ऊपर चला जाता है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर वायु का स्तर 10 पीएम से कम होना चाहिए। पीएम वायु में घुले-मिले ऐसे सूक्ष्म कण हैं, जो सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर अनेक बिमारियों का कारण बनते हैं। वायु के ताप और आपेक्षिक आद्रता का संतुलन गड़बड़ा जाने से हवा प्रदूषण के दायरे में आने लगती है। यदि वायु में 18 डिग्री सेल्सियस ताप और 50 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता हो तो वायु का अनुभव सुखद लगता है। लेकिन इन दोनों में से किसी एक में वृद्धि, वायु को खतरनाक रूप में बदलने का काम करने लग जाती है। 'राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मूल्यांकन कार्यक्रम' ((एनएसीएमपी) के मातहत 'केंद्रीय प्रदूषण मंडल' ((सीपीबी) वायु में विद्यमान ताप और आद्रता के घटकों को नापकर यह जानकारी देता है कि देश के किस शहर में वायु की शुद्धता अथवा प्रदूषण की क्या स्थिति है। नापने की इस विधि को 'पार्टिकुलेट मैटर' मसलन 'कणीय पदार्थ' कहते हैं। प्रदूषित वायु में विलीन हो जाने वाले ये पदार्थ हैं, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड। सीपीबी द्वारा तय मापदंडों के मुताबिक उस वायु को अधिकतम शुद्ध माना जाता है, जिसमें प्रदूषकों का स्तर मानक मान के स्तर से 50 प्रतिशत से कम हो। इस लिहाज से दिल्ली समेत भारत के जो अन्य शहर प्रदूषण की चपेट में हैं, उनके वायुमंडल में सल्फर डाईऑक्साइड का प्रदूषण कम हुआ है, जबकि नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का स्तर कुछ बड़ा है। सीपीबी ने उन शहरों को अधिक प्रदूषित माना है, जिनमें वायु प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानक से डेढ़ गुना अधिक है। यदि प्रदूषण का स्तर मानक के तय मानदंड से डेढ़ गुना के बीच हो तो उसे उच्च प्रदूषण कहा जाता है। यदि प्रदूषण मानक स्तर के 50 प्रतिशत से कम हो तो उसे निम्न स्तर का प्रदूषण कहा जाता है। वायुमंडल को प्रदूषित करने वाले कणीय पदार्थ, कई पदार्थों के मिश्रण होते हैं। इनमें धातु, खनिज, धुएं, राख और धूल के कण शामिल होते हैं। इन कणों का आकार भिन्न-भिन्न होता है। इसीलिए इन्हें वगीकृत करके अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी के कणीय पदार्थों को पीएम-10 कहते हैं। इन कणों का आकार 10 माइक्रॉन से कम होता है। दूसरी श्रेणी में 2.5 श्रेणी के कणीय पदार्थ आते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्रॉन से कम होता है। ये कण शुष्क व द्रव्य दोनों रूपों में होते हैं। वायुमंडल में तैर रहे दोनों ही आकारों के कण मुंह और नाक के जरिए श्वांस नली में आसानी से प्रविष्ट हो जाते हैं। ये फेफड़ों तथा हृदय को प्रभावित करके कई तरह के रोगों के जनक बन जाते हैं। आजकल नाइट्रोजन डाईऑक्साइड देश के नगरों में वायु प्रदूषण का बड़ा कारक बन रही है। औद्योगिक विकास, बढ़ता शहरीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति, आधुनिक विकास के ऐसे नमूने हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को एक साथ प्रदूषित करते हुए समूचे जीव-जगत को संकटग्रस्त बना रहे हैं। यही वजह है कि आदमी भी दिल्ली की प्रदूषित वायु की गिरफ्त में है। क्योंकि यहां वायुमंडल में वायु प्रदूषण की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक हो गई है। दिल्ली-एनसीआर में एक तरफ प्राकृतिक संपदा का दोहन बढ़ा हैं तो दूसरी तरफ औद्योगिक कचरे में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। लिहाजा दिल्ली में जब शीत ऋृतु दस्तक देती है तो वायुमण्डल में आर्द्रता छा जाती है। यह नमी धूल और धुएं के बारीक कणों को वायुमण्डल में विलय होने से रोक देती है। नतीजतन दिल्ली के ऊपर एकाएक कोहरा आच्छादित हो जाता है। वातावरण का यह निर्माण क्यों होता है, मौसम विज्ञानियों के पास इसका कोई स्पष्ट तार्किक उत्तर नहीं है। वे इसकी तात्कालिक वजह पंजाब एवं हरियाणा में खेतों में जलाए जाने वाले फसल के डंठलों और दिवाली के वक्त चलाए जाने वाले पटाखों को बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। अलबत्ता इसकी मुख्य वजह हवा में लगातार प्रदूषक तत्वों का बढ़ना है। दरअसल मौसम गरम होने पर जो धूल और धुंए के कण आसमान में कुछ ऊपर उठ जाते हैं, वे सर्दी बढ़ने के साथ-साथ नीचे खिसक आते हैं। दिल्ली में बढ़ते वाहन और उनके सह उत्पाद प्रदूषित धुंआ और सड़क से उड़ती धूल अंधियारे की इस परत को और गहरा बना देते हैं। इस प्रदूषण के लिए बढ़ते वाहन कितने दोषी हैं, इस तथ्य की पुष्टि दिल्ली में 'कार मुक्त दिवस' मनाने पर हुई थी। इसका नतीजा यह निकला कि उस थोड़े समय में वायु प्रदूषण करीब 26 पतिशत कम हो गया था। इस परिणाम से पता चलता है कि दिल्ली में अगर कारों को नियंत्रित कर दिया जाए तो बढ़ते प्रदूषण से स्थाई रूप से छुटकारा पाया जा सकता है। दिवाली पर रोशनी के साथ ही आतिशबाजी छोड़कर जो खुशियां मनाई जाती है, उनके सांस्कृतिक पक्ष पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अकेले दिल्ली में पटाखों का 1000 करोड़ रुपए का कारोबार होता है जो कि देश में होने वाले कुल पटाखों के व्यापार का 25 फीसदी हिस्सा है। इससे छोटे-बड़े हजारों थोक व खेरीज व्यापारियों और पटाखा उत्पादक मजदूरों की सालभर की रोजी-रोटी चलती है। इसा लिहाज से इस प्रतिबंध के व्यावहारिक पक्ष पर भी गौर करने की जरूरत है। यह अच्छी बात है कि राज्य सरकारों ने चीनी पटाखों के प्रयोग पर रोक लगा दी है। इससे स्वदेशी पटाखा उद्योग को हर साल जो 2 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होता है, उससे यह उद्योग बचा रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 6 November 2020


bhopal, How to celebrate Diwali this time?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक इसबार दिवाली कैसे मनाई जाए, यह बहस सारे देश में चल पड़ी है। पश्चिम एशिया के देशों ने ईद मनाने में सावधानियां बरतीं और गोरों के देश क्रिसमिस पर उहापोह में हैं। दिवाली बस एक सप्ताह में ही आ रही है लेकिन उसके पहले ही देश में धुआंधार हो गया है। दिल्ली शहर का हाल यह है कि लोग कोरोना से भी ज्यादा प्रदूषण से डर रहे हैं। मुखपट्टी लगाकर भी लोग घर से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं क्योंकि हवा कितनी ही छनकर नाक के अंदर आएगी, वह होगी तो गंदी ही। अब कोरोना का कोप भी दुबारा फैल रहा है। इसके अलावा इस दिवाली पर लक्ष्मी जी की कृपा भी कम ही है तो क्या किया जाए? दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने 7 नवंबर से 30 नवंबर तक पटाखेबाजी पर रोक लगा दी है। ऐसी रोक प. बंगाल में पहले से लगी हुई है। देश के लगभग 100 शहरों में ऐसी रोक की तैयारी है। मैं कहता हूं कि देश के सभी शहरों और गांवों में ऐसी रोक क्यों नहीं लगा दी जाए? यदि एक साल पटाखे नहीं छुड़ाएंगे तो क्या बिगड़ जाएगा? दिवाली तो हर साल आएगी। जो संकट इस साल आया है, बस वह इसी साल का सिरदर्द है। अंधाधुंध बिजली जलाने की बजाय यदि आप घर पर एक-दो दिये या बल्व जला लें तो क्या वह काफी नहीं होगा? यदि आप ऐसा करें तो क्या होगा? हमारी जनता सरकारों से भी आगे निकल जाएगी। अपनी मनःस्थिति में हम उल्लास रखें लेकिन परिस्थिति उदास रहती है तो वैसी रहने दें। यदि मनःस्थिति उल्लासपूर्ण रखने की आपकी आदत पड़ जाए तो रोज ही आपकी दिवाली है। दिवाली के मौके पर लोग दूसरे के घर मिठाइयां और तले हुए नमकीन भेजते हैं। इनकी बजाय आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के यहां फल, मेवे, काढ़े के मसाले और भुने हुए नमकीन भेजें तो सबको स्वास्थ्य लाभ भी होगा। इसबार आप कुछ भी नहीं भेजें तो भी कोई बुरा नहीं मानेगा, क्योंकि सभी कड़की में हैं और एक-दूसरे के घर आने-जाने में भी खतरा है। जहां तक लक्ष्मीजी की पूजा का सवाल है, वह भी बिना किसी पंडित-पुरोहित और बिना धूमधाम घर में ही संपन्न हो सकती है। मंदिरों और एक-दूसरे के घरों में भीड़ लगाए बिना सारा क्रिया-कर्म पूर्ण किया जा सकता है। दिवाली के दूसरे दिन अन्नकूट और भाईदूज के सिलसिलों में भी इसबार भीड़ से बचने का प्रयास किया जाए तो बेहतर रहेगा। हम भारतीय लोग दिवाली के मौके पर ऐसा आचरण कर सकते हैं, जो क्रिसमस पर दुनिया के ईसाई राष्ट्रों के लिए भी अनुकरणीय बन सकता है। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 6 November 2020


bhopal, meaning ,success of Delhi, Virtual Book Fair

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिए कि गूगल गुरु के जमाने में भी लोग किताबों को पढने-पढ़ाने में रुचि रखते हैं। दूसरी यह कि कोरोना ने आपसी जुड़ाव का नया प्लेटफार्म तैयार कर दिया है और यह प्लेटफार्म वर्चुअल दुनिया का है। इस वर्चुअल प्लेटफार्म से भी लोग बड़ी सक्रियता से जुड़ने लगे हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण है, पिछले दिनों आयोजित दिल्ली के वार्षिक पुस्तक मेले के 26 वें संस्करण का। आयोजकों का दावा है कि इस वर्चुअल प्लेटफार्म से 103 देशों के दो लाख से भी ज्यादा अध्येताओं ने हिस्सा लिया। फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले से भी अधिक लोगों ने इस मेले में वर्चुअल रूप से हिस्सा लेते हुए न केवल पुस्तक मेले की विभिन्न गतिविधियों से जुड़े अपितु दुनिया भर के पुस्तक प्रेमियों ने जमकर खरीदारी की। पुस्तक मेले की सफलता को इससे भी समझा जा सकता है कि प्रतिभागियों की मांग को देखते हुए मेले की अवधि एक दिन यानी एक नवंबर की आधी रात तक बढ़ाने का निर्णय करना पड़ा। वर्चुअल मेले में 100 से ज्यादा प्रतिभागियों ने डिजिटल प्लेटफार्म पर 9 हजार से अधिक पुस्तकें प्रकाशित कर जारी की। जाने-माने लेखकों से वर्चुअल प्लेटफार्म पर रुबरु होने का मौका मिला। दरअसल कोरोना ने एक ओर जहां काफी कुछ हिलाकर रख दिया है वहीं लोगों के सामने नए अवसर भी प्रस्तुत किए हैं। एकबार तो लगने लगा था कि अब मेला-प्रदर्शनियों का दौर खत्म होने जा रहा है क्योंकि लंबे लॉकडाउन और उसके बाद युरोप में कोरोना के दूसरे दौर और हमारे देश व अमेरिका आदि में नित नए कोरोना संक्रमितों के मिलने से हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं। लगभग दस माह के लंबे समय के बावजूद कोरोना की काली छाया पूरी दुनिया पर है। कोरोना ने सबकुछ हिलाकर रख दिया है। सामाजिकता, मेल-मिलाप, संपर्कों के तरीके, खानपान, यायावरी और तो और सामाजिक धार्मिक पारिवारिक गतिविधियों को भी थाम दिया है। ऐसे में सामाजिक- मनोवैज्ञानिक अध्येताओं के सामने नए सामाजिक ताने-बाने की संरचना का गुरुतर दायित्व और आ गया है। खैर इसपर चर्चा फिर कभी। अभी तो यह कि दुनिया के लोगों का आज भी पुस्तकों के प्रति प्रेम और रुचि वास्तव में शुभ संकेत माना जाना चाहिए। जिस तरह से गूगल गुरु ने सबकुछ शार्टकट करना शुरू कर दिया है वह अपने आपमें गंभीर चिंता का विषय है। गूगल गुरु से आप ऊपरी जानकारी तो ले सकते हैं पर उस जानकारी में कितनी सच्चाई है और कितनी समग्रता है, यह विचारणीय है। ऐसे में दिल्ली पुस्तक मेले की सफलता शुभ संकेत ही माना जाना चाहिए। दरअसल आज भी पुस्तकप्रेमियों की कोई कमी नहीं है। लोगों की पढ़ने-पढ़ाने की आदत है। खासबात यह कि लिखे हुए पर लोगों का विश्वास है। हमारे यहां तो पुस्तक को साक्षात मां सरस्वती का अवतार माना जाता है। पुस्तक को ईश्वरीय अवतार माना जाता है। आज की पीढ़ी की तो कहा नहीं जा सकता पर पुरानी पीढ़ी के लोग तो आज भी पुस्तक के पांव लग जाने पर उसे सिर के लगाने की परंपरा देखने को मिल जाएगी। अपवित्र स्थान पर पुस्तक को रखने तक की मनाही हमारे समाज में रहती आई है। पुस्तक को सिर पर रखकर यात्रा निकालना हमारी परंपरा में रहा है। टीवी चैनलों पर चौबीसों घंटों समाचारों के बावजूद लोग बेसब्री से सुबह के अखबार की प्रतीक्षा करते हैं। यह यही तो दर्शाता है कि लोगों का लिखे पर अधिक विश्वास है। हालांकि अब डिजिटल दुनिया का दौर भी अधिक चल निकला है। डिजिटल लाइब्रेरी से लेकर डिजिटल एडिशन धड़ल्ले से आने लगे हैं। इसमें दो राय नहीं कि टीवी चैनलों की आडियो-विजुअल के बावजूद लोग प्रिंट मीडिया के डिजिटल प्लेटफार्म को अधिक विश्वसनीय मानते हैं। इससे डिजिटल मीडिया की भी अधिक जिम्मेदारी हो जाती है। दिल्ली पुस्तक मेले की सफलता नई राह खोलने वाली है। एक तो किताबों के संसार के प्रति लोगों की उतनी ही रुचि होना, सक्रिय होना और भागीदारी से साफ हो जाता है कि लोग अच्छा पढ़ना चाहते हैं। इसके साथ ही वर्चुअल दुनिया कारोबार में जिस तेजी से भागीदार बन रही है और जिस तरह से वीसी, वेबिनार आदि ने अपनी जगह बनाई है और बना रहे हैं यह भविष्य का संकेत है। इसे समझना होगा। लोग पढ़ना चाहते हैं, सुनना चाहते हैं और यही दुनिया को संस्कारित और ज्ञान की दृष्टि से समृद्ध करने में सहायक हो सकेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 3 November 2020


bhopal, Prayer in the temple?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक मथुरा के एक मंदिर में नमाज़ पढ़ने के अपराध में पुलिस चार नौजवानों को गिरफ्तार करने में जुटी हुई है। उन चार में से दो मुसलमान हैं और दो हिंदू। चारों नौजवान दिल्ली की खुदाई-खिदमतगार संस्था के सदस्य हैं। इस नाम की संस्था आजादी के पहले सीमांत गांधी बादशाह खान ने स्वराज्य लाने के लिए स्थापित की थी। अब इस संस्था को दिल्ली का गांधी शांति प्रतिष्ठान और नेशनल एलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट चलाते हैं। इस संस्था के प्रमुख फैजल खान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और उसके तीन अन्य साथी अभी फरार हैं। इन चारों नौजवानों के खिलाफ मंदिर के पुजारियों ने पुलिस में यह रपट लिखवाई है कि इन लोगों ने उनसे पूछे बिना मंदिर के प्रांगण में नमाज़ पढ़ी और उसके फोटो इंटरनेट पर प्रसारित कर दिए। इसका उद्देश्य हिंदुओं की भावना को ठेस पहुंचाना और देश में साप्रदायिक तनाव पैदा करना रहा है। इन चारों नवयुवकों का कहना है कि दोपहर को वे जब मंदिर में थे, नमाज़ का वक्त होने लगा तो उन्होंने पुजारियों से अनुमति लेकर नमाज़ पढ़ ली थी। उस समय वहां कोई भीड़-भाड़ भी नहीं थी। उन्होंने मूर्तियों के सामने जाकर तो नमाज़ नहीं पढ़ी? उन्होंने हिंदू देवताओं के लिए कोई अपमानजनक शब्द नहीं कहे। यदि उन्हें अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने नमाज़ कैसे पढ़ ली? सबसे बड़ी बात यह कि जिस फैसल खान को गिरफ्तार किया गया है, वह रामचरित मानस की चौपाइयां धाराप्रवाह गाकर सुना रहा था। चारों नौजवान मथुरा-वृंदावन किसलिए गए थे? चौरासी कोस की ब्रज-परिक्रमा करने गए थे। ऐसे में हिंदूद्रोह का आरोप लगाएंगे तो अमीर खुसरो, रसखान, ताजबीबी, आलम और नज़ीर जैसे कृष्णभक्तों का क्या होगा। कृष्ण के घुंघराले बालों के बारे में देखिए ताजबीबी ने क्या कहा है- लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के। काफ़िर है, वे जो बंदे नहीं इस लाम के।। मैंने लंदन के एक गिरजे में अब से 51 साल पहले आरएसएस की शाखा लगते हुए देखी है। एकबार न्यूयार्क में कई पठान उद्योगपतियों ने मेरे साथ मिलकर हवन में आहुतियां दी थीं। बगदाद के पीर गैलानी की दरगाह में बैठकर मैंने वेदमंत्रों का पाठ किया है और 1983 में पेशावर की बड़ी मस्जिद में नमाज़े-तरावी पढ़ते हुए बुरहानुद्दीन रब्बानी (जो बाद में अफगान राष्ट्रपति बने) ने मुझे अपने साथ बिठाकर 'संध्या' करने दी थी। लंदन के 'साइनेगॉग' (यहूदी मंदिर) में भी सभी यहूदियों ने मेरा स्वागत किया था। किसी ने जाकर थाने में मेरे खिलाफ रपट नहीं लिखवाई थी।  (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 3 November 2020


bhopal.,Who supports ,those who ,strangled innocent ,people in France?

आर.के. सिन्हा यह सरासर ज्यादती ही कही जाएगी कि भारत से हजारों मील दूर फ्रांस में सरकार और कठमुल्लों के बीच चल रही तनातनी के खिलाफ भारत के मुसलमानों का एक वर्ग भी आगबबूला हो उठे। यहाँ के कठमुल्ले भी मुंबई, भोपाल, सहारनपुर वगैरह शहरों में फ्रांस के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं। गंभीर यह है कि ये प्रदर्शनकारी गला काटने वाले आतंकियों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए हैं। सच में ये गजब के लोग हैं। फ्रांस में मासूमों को मारा जा रहा है और भारत में ये विक्षिप्त लोग आंदोलन कर रहे हैं, वह भी कातिलों के हक में। इस मसले पर कोई बहस नहीं हो सकती कि पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाना सही नहीं है। पर क्या इसका जवाब मासूम लोगों की गर्दन काट कर ही दिया जाए? गौर करें कि भोपाल में कांग्रेस विधायक के नेतृत्व में फ्रांस के खिलाफ रैली निकाली गई, वहीं मुंबई की गलियों को फ्रांसिसी राष्ट्रपति के पोस्टरों से पाट दिया गया। साफ है कि रैली और प्रदर्शन करने वाले खूनखराबा करने वालों का खुलेआम साथ दे रहे हैं। क्या यह किसी सभ्य समाज में स्वीकार किया जा सकता है? क्या इसी को कहते हैं उदार इस्लाम का असली सामाजिक स्वरूप? अच्छी बात है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन सनकी लोगों पर सख्त एक्शन लेने का वादा किया है जो भोपाल की रैली में मौजूद थे। इससे पहले भारत सरकार ने फ्रांस की हालिया घटनाओं पर रोष जताते हुए साफ कर दिया था कि भारत आतंकवाद के खिलाफ जंग में फ्रांस के साथ खड़ा है। फ्रांस के गिरिजाघर में हुए हमले पर प्रधाननंत्री नरेन्द्र मोदी यह पहले ही कह चुके हैं। सारी दुनिया को यह तो पता है ही कि भूमध्यसागरीय शहर नीस में गिरिजाघर में एक सिरफिरे कठमुल्ले हमलावर द्वारा चाकू से किए गए हमले में तीन निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने ठीक ही कहा- ''फ्रांस में एक गिरिजाघर में हुए हमले सहित हाल के दिनों में वहां हुई आतंकवादी घटनाओं की मैं कड़े शब्दों में निंदा करता हूं।'' उन्होंने कहा, ''पीड़ित परिवारों और फ्रांस की जनता के प्रति हमारी गहरी संवेदनाएं हैं।" कहना न होगा कि भारत का स्टैंड साबित करता है कि भारत आतंकवाद के मसले पर किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है। चूंकि भारत दशकों से आतंकवाद से बार-बार लहूलुहाल होता रहा है इसलिए उसका इस्लामी चरमपंथ पर फ्रांस का साथ देना अति स्वाभाविक है। भारत को मित्र देश फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुअल मैक्रों का इस आड़े वक्त में साथ देना ही चाहिए था। आखिर फ्रांस भी तो पिछले कुछ वर्षों से बर्बर आतंकवादी हमले झेल रहा है। वहां बेरहमी से अनेकों मासूमों को मारा गया है। फ्रांस की घटनाओं से पूरा विश्व स्तब्ध है। अब जरा देखिए कि भारत में प्रदर्शन करने वाले जाहिल लोग यह मांग करने लग रहे हैं कि भारत, फ्रांस से बेहद आधुनिक और शक्तिशाली राफेल विमानों की अगली खेप न ले। जब भारत के दो शत्रु देश क्रमश: चीन और पाकिस्तान भारत को युद्ध की धमकियां दे रहे हैं तब ये सड़कछाप प्रदर्शनकारी भारत से अपनी सीमाओं की रक्षा को ताक पर रखने की मांग कर रहे हैं। तो ये पाकिस्तान और चीन के हित की बात कर रहे हैं I ये देश के दुश्मन ही तो हैं। आपको पता है कि फ्रांस से 36 राफेल विमानों की पहली खेप भारत आ चुकी है। निश्चित रूप से राफेल लड़ाकू विमानों का भारत में आना हमारे सैन्य इतिहास में नए युग का श्रीगणेश है। इन बहुआयामी विमानों से वायुसेना की क्षमताओं में क्रांतिकारी बदलाव आएंगे। राफेल विमान का उड़ान के दौरान प्रदर्शन श्रेष्ठ रहा है। इसमें लगे हथियार, राडार एवं अन्य सेंसर तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्धक क्षमताएं लाजवाब माने जाते हैं। कहना न होगा राफेल के आने से भारतीय वायुसेना को बहुत ताकत मिली है। लेकिन, ये कठमुल्ले भारत की ताकत कम करने के पक्ष में हैं। यह देशद्रोह का प्रदर्शन नहीं है तो क्या है। कुछ सिरफिरों को छोड़ भारत की 130 करोड़ जनता यह कैसे स्वीकारेगी? फ्रांस की घटनाओं को लेकर दुनिया भर के देशों का आतंकवाद पर रुख साफ होने वाला है। अब पता चल जाएगा कि कौन-सा देश या समाज आतंकवाद का साथ देता है और कौन इससे लड़ता है। भारत के अभीतक के स्टैंड से फ्रांस संतुष्ट है। प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद भारत में फ्रांस के राजदूत एमेनुअल लिनेन ने भारत का आभार जताया और कहा कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ जंग में एक-दूसरे का सहयोग कर सकते हैं। भारत के भरोसे का मित्र फ्रांस दरअसल भारत- फ्रांस के बीच घनिष्ठ संबंध इसलिए स्थापित हुए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच निजी मित्रवत संबंध बन चुके हैं। मोदी विगत मार्च, 2018 में फ्रांस की यात्रा पर गए थे। तब फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा था कि भारत और फ्रांस ने आतंकवाद और कट्टरता से निपटने के लिए मिलकर काम करने का फैसला किया है। रक्षा के क्षेत्र में भी भारत और फ्रांस के रिश्ते चट्टान की तरह हैं। फ्रांस भारत के सबसे भरोसे का रक्षा साझेदारों में से एक देश है। दोनों देशों के रक्षा उपकरणों और उत्पादन में संबंध भी मजबूत हुये हैं। याद रखा जाए कि रक्षा क्षेत्र में फ्रांस भारत की मेक इन इंडिया योजना का समर्थन करता रहा है। बच न पाएं अस्थिरता फैलाने वाले भारत-फ्रांस के इतने घनिष्ठ संबंध के आलोक में भारत को उन तत्वों पर सख्ती दिखानी होगी जो भारत में मजहब के नाम पर हिंसा और अस्थिरता फैलाने की चेष्टा कर रहे हैं। यह मान कर चलिए कि यदि कठमुल्लों की लगाम नहीं कसी गई तो भारत के लिए भी बड़ा संकट मंडराने लगेगा। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि क्या भोपाल के इकबाल मैदान में कुछ ही घंटों में जुटी भीड़ का आयोजक कांग्रेस के विधायक आरिफ मसूद को अपने प्रदेश और राष्ट्रीय नेताओं का भी समर्थन हासिल था या नहीं? कोरोना काल में बिना इजाजत इस तरह की रैली कैसे निकाली गई? साफ है कि रैली के आयोजक और उसमें शामिल लोगों पर कस कर चाबुक चले। राहुल और सोनिया स्पष्ट करें कि आरिफ मसूर के प्रदर्शन से वे सहमत हैं अथवा नहीं? मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सही कहा है 'मध्य प्रदेश शांति का टापू है। इसकी शांति को भंग करने वालों से हम पूरी सख्ती से निपटेंगे। किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कोई भी हो।' इस बीच, फ्रांस में अध्यापक की उसके ही मुस्लिम छात्र द्वारा की गयी हत्या पर शायर मुनव्वर राणा द्वारा इस हत्या को औचित्यपूर्ण ठहराने के संबंध में दिया गया बयान, निंदनीय, शर्मनाक और असंवैधानिक है। किसी भी प्रकार से मानव हत्या के अपराध को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता है, जो वे खुलेआम कर रहे हैं। आस्था से हुआ आहत भाव कितना भी गंभीर हो, पर उसकी प्रतिक्रिया में की गयी किसी मनुष्य की हत्या हिंसक और बर्बर आपराधिक कृत्य ही है। यह जो नहीं समझ पा रहा है वह इंसान तो नहीं ही है, बाकी जो कुछ भी कह लें आप। अगर आहत भाव पर ऐसी हत्याओं का बचाव किया जाएगा और उनको औचित्यपूर्ण ठहराया जाएगा तो आहत होने पर हत्या या हिंसा की हर घटना औचित्यपूर्ण ठहराई जाने लगेगी। फिर कानून के शासन का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। यह सच है कि इस्लाम को सबसे ज़्यादा नुकसान खुद कट्टरपंथी मुसलमान पहुंचा रहे हैं। ये अंधकार से निकलना नहीं चाहते। फ्रांस की घटनाओं पर सड़कों पर उतरे मुसलमान कब बेहतर शिक्षा, सेहत और रोजगार जैसे सवालों पर प्रदर्शन करेंगे। पाकिस्तान में जन्मे और कनाडा में रह रहे विद्वान, लेखक और विचारक तारिक पतेह ठीक ही कहते हैं। सारी समस्या उन अनपढ़ कठमुल्लों की वजह से है जो "अल्ला के इस्लाम को मुल्ला के इस्लाम" में बदलने पर आमादा हैं। इनसे सबको सावधान रहना होगा। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 3 November 2020


bhopal, Sea Plane: Thrill of Travel with Time Saving

योगेश कुमार गोयल लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात की साबरमती नदी से केवडिया-साबरमती रिवरफ्रंट सी-प्लेन सेवा की शुरुआत कर दी गई। इस सी-प्लेन सेवा की बड़ी विशेषता यह है कि यह देश की पहली ऐसी सी-प्लेन सेवा है, जो पानी और जमीन दोनों जगहों से उड़ान भर सकती है और इसे पानी के साथ-साथ जमीन पर भी लैंड कराया जा सकता है। इस सी-प्लेन सेवा के माध्यम से अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट को नर्मदा जिले के केवडिया में स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को आपस में जोड़ा गया है। सी-प्लेन प्रोजेक्ट को प्रधानमंत्री मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जाता रहा है। दरअसल जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने वहां सी-प्लेन शुरू करने की योजना बनाई थी। प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर इस पायलट प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया गया और उन्होंने स्वयं सी-प्लेन के जरिये साबरमती नदी से केवडिया डैम तक का 220 किलोमीटर का सफर 45 मिनट में तय किया। अब यह सी-प्लेन सेवा पर्यटकों के लिए प्रतिदिन अहमदाबाद से केवडिया और केवडिया से अहमदाबाद के बीच उपलब्ध होगी। सी-प्लेन की उड़ानें स्पाइसजेट की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी ‘स्पाइस शटल’ द्वारा संचालित की जा रही हैं। शुरुआत में स्पाइसजेट द्वारा अहमदाबाद-केवडिया मार्ग पर दो दैनिक उड़ानें संचालित की जा रही हैं। आने वाले समय में पर्यटकों की संख्या के आधार पर इन उड़ानों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। स्पाइसजेट द्वारा इन उड़ानों के लिए 15 सीटर ट्विन ओटर 300 विमानों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ट्विन ओटर 300 सबसे सुरक्षित और सबसे लोकप्रिय सी-प्लेन है, जो दुनियाभर में सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले विमानों में से एक है। साबरमती नदी से केवडिया डैम तक चलने वाले ये दोनों सी-प्लेन कनाडा से गुजरात आए हैं। इन दोनों ही फ्लाइटों में दो विदेशी पायलट और दो क्रू-मेंबर रहेंगे, जो अगले छह महीनों तक गुजरात में ही रहकर यहां के पायलटों को ट्रेनिंग देंगे। सी-प्लेन की पहली उड़ान प्रतिदिन अहमदाबाद से सुबह 10.15 बजे शुरू होगी, जो 10.45 बजे केवडिया पहुंचेगी और केवडिया से पहली उड़ान 11.45 बजे शुरू होगी, जो 12.15 बजे अहमदाबाद पहुंचेगी। सी-प्लेन की दूसरी उड़ान अहमदाबाद से रोजाना 12.45 पर उड़ान भरकर दोपहर 1.15 बजे केवडिया पहुंचेगी और वहां से दोपहर 3.15 बजे वापसी की उड़ान भरकर 3.45 पर अहमदाबाद पहुंचेगी। अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ्रंट को नर्मदा जिले के केवडिया में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से सीधे जोड़ने वाली इस सी-प्लेन सेवा से गुजरात में पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलेगा। दुनियाभर से पर्यटक सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुनियाभर में सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ को देखने के लिए केवडिया जाते हैं। अहमदाबाद से केवडिया के बीच की दूरी करीब दो सौ किलोमीटर है, जिसे तय करने में लोगों को अभीतक 4-5 घंटे का समय लगता था लेकिन सी-प्लेन की शुरुआत होने के बाद यह दूरी तय करने में अब करीब 45 मिनट का ही समय लगेगा। इस सेवा का लाभ उठाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को एक ओर का 1500 रुपये किराया चुकाना होगा अर्थात् समय की बचत के साथ सी-प्लेन से दोनों तरफ का रोमांचक सफर तीन हजार रुपये में किया जा सकेगा। सी-प्लेन में एकबार में दो पायलट और दो क्रू मेम्बर सहित कुल 19 लोग सवार हो सकते हैं। सी-प्लेन अपनी विश्वसनीयता, शानदार डिजाइन, शॉर्ट टेक-ऑफ और लैंडिंग क्षमताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इन्हें ऐसी कारगर उड़ान मशीनें कहा जाता है, जो नई जगहों पर और विपरीत भौगोलिक क्षेत्रों में सुगमतापूर्वक जाने में मददगार होती हैं। इनमें पानी से उतरने और टेक-ऑफ करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिससे ऐसे क्षेत्रों तक पहुंच काफी सुगम हो जाती है, जहां लैंडिंग स्ट्रिप्स या रनवे नहीं होते। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि ये महज 300 मीटर के छोटे से रनवे से भी उड़ान भर सकते हैं और इसी विशेषता के कारण 300 मीटर की लंबाई वाले किसी भी तालाब या जलाशय का इस्तेमाल हवाई पट्टी के रूप में किया जा सकता है। छोटे फिक्स्ड विंग वाला यह विमान जलाशयों के अलावा पथरीली उबड़-खाबड़ जमीन और घास पर भी उतर सकता है। काफी सुरक्षित माने जाने वाले सी-प्लेन का दुनियाभर में सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। इनका अब तक का कोई दुर्घटना इतिहास नहीं है, इसीलिए दुनियाभर में अपने गंतव्य तक उड़ान अनुभव के लिए यह सर्वाधिक मांग वाला विमान है। सी-प्लेन एंफीबियस श्रेणी का प्लेन होता है, जो कई मायनों में खास है। यह वजन में बेहद हल्का होता है, इसके लिए बहुत लंबे रनवे की जरूरत नहीं पड़ती और यह कम ईंधन में भी उड़ान भर सकता है। स्पाइसजेट द्वारा चलाया जा रहा सी-प्लेन वास्तव में 3377 किलोग्राम वजनी ट्विन ओटर 300 सी-प्लेन है, जिसमें एक बार में 1419 लीटर तक पेट्रोल भरा जा सकता है और इसकी एक घंटे की उड़ान के दौरान करीब 272 लीटर पैट्रोल की ही खपत होती है। इसमें बेहतर प्रदर्शन करने वाला एक ट्विन टर्बोप्रोप प्रैट एंड व्हीट्नी पीटी 6ए-27 इंजन दिया गया है। यह 8 से 12 फुट की ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए एक बेहद रोमांचक और यादगार यात्रा का अनुभव कराता है। गुजरात सरकार द्वारा केन्द्र सरकार के निर्देश पर राज्य की पांच नदियों के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में जिस सी-प्लेन प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई है, उसके साबरमती नदी से केवडिया डैम तक का उद्घाटन तो प्रधानमंत्री द्वारा कर दिया गया है। अब अन्य चारों नदियों में भी सी-प्लेन का संचालन शुरू करने के अलावा इन नदियों में छोटे जहाज चलाने की योजना पर भी कार्य शुरू किया जाएगा। दरअसल गुजरात में नर्मदा, साबरमती, तापी, अंबिका और पूर्णा जैसी बड़ी नदियों में पूरे साल पानी भरा रहता है, इसीलिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में अब इनका उपयोग जलमार्ग के रूप में करते हुए सफर को आसान बनाने के अलावा छोटे जहाजों की मदद से माल ढुलाई का काम किए जाने की भी योजना है, जिससे सड़कों पर बढ़ते यातायात को कम करने में भी मदद मिल सके। बहरहाल, साबरमती नदी से केवडिया डैम तक देश में पहली सी-प्लेन सेवा की शुरुआत होने के बाद अब देश के कई दूसरे शहरों के बीच भी ऐसी ही सी प्लेन सेवाएं शुरू होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं, जिससे देशभर में पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलेगा और समुद्री मार्गों से कनेक्टिविटी बढ़ने से पर्यटन के अलावा व्यापारिक गतिविधियों को भी इससे बढ़ावा मिलेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 November 2020


bhopal,Pak had done, Pulwama terror attack

प्रमोद भार्गव 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले का सच आखिरकार पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्री फवाद चौधरी ने पाक की भरी संसद में उगल दिया। घमंड में इतराते चौधरी ने कहा कि 'पुलवामा हमला प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व में किया गया था। यह पाक की बड़ी कामयाबी थी।' जबकि आर्थिक प्रतिबंधों से बचने के लिए पाकिस्तान की इमरान सरकार इस आतंकी हमले से इनकार करती रही थी। अब इस स्वीकारोक्ति ने जता दिया है कि पाक आतंकवाद को खुला संरक्षण दे रहा है। इस स्वीकारोक्ति के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवाधिकारों के संरक्षक देशों का दायित्व बनता है कि वे अब पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैया अपनाते हुए आतंक पर लगाम लगाने के लिए आगे आएं। कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर 14 फरवरी 2019 को धोखे से हमला किया गया था, जिसमें 44 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद भारत ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक करते हुए पाक सीमा में स्थित कई आतंकी शिविरों पर हमला बोलकर भारतीय सैनिकों की शहादत का बदला लिया। इस शिविर का संचालन वही मसूद अजहर का साला मौलाना यूसुफ कर रहा था, जिसने भारतीय संसद पर हमला बोला था। इस हमले से देश की जनता आग-बबूला थी। परिणामस्वरूप मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर भारतीयों की छाती को ठंडा किया। भारत में आतंक के लंबे दौर में यह पहला मौका था, जब पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों को भारतीय सेना ने ध्वस्त किया था। इस हमले के बाद भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का लड़ाकू विमान पाक सीमा में गिर गया था और उन्हें पाक सेना ने हिरासत में ले लिया था। इस हमले और अभिनंदन के पकड़ में आने के बाद पाक को अहसास हो रहा था कि भारत इस करतूत का बदला लेगा। इसीलिए पाकिस्तान के सांसद अयाज सादिक ने दावा किया है कि अभिनंदन के सिलसिले में आयोजित बैठक में पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के पैर कांप रहे थे। इस बैठक में इमरान खान भी मौजूद थे। शाह ने कहा था कि 'हमने अभिनंदन को नहीं छोड़ा तो भारत पाकिस्तान पर हमला कर देगा। इस भय के वशीभूत होकर ही एक मार्च 2019 को अभिनंदन को छोड़ दिया गया था। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश विपक्ष के नेताओं ने कुछ इस तरह से की थी, जिससे भारत की वैश्विक स्तर पर किरकिरी हो। इनमें राहुल गांधी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल प्रमुख थे। राहुल ने पाकिस्तान को सबसे भरोसेमंद देश बताया तो केजरीवाल और ममता ने सर्जिकल स्ट्राइक में मारे गए आतंकियों की बतौर प्रमाण संख्या पूछी। पुलवामा हमले पर ये लोग पाकिस्तान की भाषा बोल रहे थे। अब ये नेता अपने किए पर देश और जनता के प्रति शर्मिंदगी जताएं। हालांकि नरेंद्र मोदी ने पाक द्वारा सच स्वीकारने के बाद सरदार पटेल की 145वीं जयंती पर गुजरात के केवाड़िया में नेताओं को करारा तमाचा जड़ा है। मोदी ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए पुलवामा हमले पर पहली बार कहा कि 'पाकिस्तान ने अपनी संसद में इस हमले का सच मंजूर कर लिया है। इस घटना में राजनीतिक लाभ तलाशने वाले विपक्षी नेताओं के चेहरे बेनकाब हो गए हैं। फवाद चौधरी ने इस हमले में व्याप्त पाक की भूमिका स्वीकार कर ली है। दो दशक के भीतर यह पहला मौका था, जब पाक की सीमा में घुसकर आतंकियों को ठिकाने लगाया गया था। अन्यथा 15 दिसंबर 2001 को जैशे-मोहम्मद के पांच आतंकियों ने संसद पर हमला बोला था। उस दिन एक सफेद एंबेडसर कार में आए इन आतंकवादियों ने 45 मिनट में लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर को गोलियों से छलनी किया। हमलावरों से मुकाबले में अपने प्राणों की परवाह किए बिना सीआरपीएफ के पांच जवान शहीद हुए। एक महिला सिपाही और दो सुरक्षा गार्ड भी दायित्व की वेदी पर बलिदान कर गए। अन्य 16 जवान घायल हुए। इस हमले का मास्टर माइंड अफजल गुरु था, जिसे बाद में 20 अक्टूबर 2006 को फांसी दे दी गई। इस हमले ने देश को बुरी तरह झकझोरा। 26 नवंबर 2008 को मुंबई के ताज होटल समेत 10 आतंकियों ने चार ठिकानों पर हमले किए। इन हमलों में देशी-विदेशी 166 लोग मारे गए। तीन दिनों तक महानगर आतंकियों का बंधक बना रहा। बमुश्किल सैन्य व सुरक्षाबलों की कार्रवाई ने नौ आतंकियों को मार गिराया और एक नाबालिग अजमल कसाब को जीवित पकड़ा। कसाब को 21 नवंबर 2012 को फांसी दे दी गई। उस समय भी जनता की भावना उग्र आक्रोश के रूप में दिखी, किंतु मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार कोई जवाबी करिश्मा नहीं दिखा पाए।  इसी तरह 18 सितंबर 2016 को उरी में स्थित थलसेना के स्थानीय मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में 18 सैनिक शहीद हुए। हालांकि जवाबी कार्यवाही में चार आतंकियों को तत्काल मार गिराया गया था। नरेंद्र मोदी ने साहस दिखाया और अपने कार्यकाल में 29 सितंबर 2016 को पहली सर्जिकल स्ट्राइक की। थलसेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में करीब 20 किमी भीतर घुसकर जैशे-मोहम्मद के कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में जब 44 जवान शहीद हो गए तो देश आगबबूला हो उठा। 20 साल बाद देश पर यह बड़ा आतंकी हमला था। 12 मिराज विमानों ने ग्वालियर और बरेली से उड़ान भरी और बालाकोट, चकोटी व मुजफ्फराबाद में मौजूद जैश के आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दिया। इसमें 325 आतंकी और 25 से 27 प्रशिक्षु आतंकी मारे गए। इनमें चकोटी एवं मुजफ्फराबाद तो पीओके में हैं, किंतु बालाकोट पाकिस्तान के पख्तूख्वा प्रांत में है। 1971 के बाद यह पहला अवसर है कि भारत ने पाक की जमीन पर जबरदस्त बमबारी की और बिना कोई नुकसान उठाए युद्धक विमान और सैनिक सकुशल लौट आए। पाक को करारा सबक सिखाने की दृष्टि से सेना ने न केवल नियंत्रण रेखा पार की, बल्कि लक्ष्य साधने के लिए पाकिस्तान की मूल सीमा लांघने में भी कोई संकोच नहीं किया। इस प्रतिक्रिया से यह भी पैगाम गया है कि भारत अब लक्ष्य प्राप्ति के लिए कोई भी जोखिम उठाने को तैयार है। इस हमले के बाद भारत के पक्ष में विश्व समुदाय खड़ा हुआ जबकि पाक फिलहाल अलग-थलग पड़ता चला गया। मुस्लिम राष्ट्रों का भी उसे साथ नहीं मिला। जाहिर है, मोदी ने अनेक देशों की यात्राएं करके जो द्विपक्षीय कूटनीतिक संबंध बनाए थे, वे फलीभूत हुए थे। इसीलिए कहीं से भी समर्थन नहीं मिल पाने की वजह से एक तो पाक बौखला रहा है, दूसरा उसका मनोबल भी टूट रहा है। चीन से उसे बड़ी उम्मीद थी लेकिन चीन केवल परस्पर शांति बनाए रखने की अपील करके बच निकला था। इस समय पाक-पोषित आतंकवाद से अनेक मुस्लिम देशों सहित यूरोपीय देश भी पीड़ित हैं। फवाद चौधरी के बयान के बाद भारतीय विपक्ष समेत आतंक पीड़ित देशों को जरूरत है कि वे पाक पोषित आतंकवाद के विरुद्ध आवाज उठाएं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आतंकवाद के विरुद्ध केंदित हो। पाकिस्तान इस समय आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़ बना हुआ है। वहीं दुनिया में फैले आतंकवाद की सबसे ज्यादा पैरवी करता है। इसी वजह से फ्रांस में हुए आतंकी हमले पर इमरान खान के मुख से निष्ठुर आतंकियों के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकला। इसके उलट इस धार्मिक कट्टरता से लड़ने की फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने जो प्रतिबद्धता जताई उसका भी एक तरह से मखौल उड़ाया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 1 November 2020


bhopal, There is no deliberate, split between left and right

हृदयनारायण दीक्षित भारतीय राजनीति लोकमंगल का उपकरण है। सभी दल अपनी विचारधारा को देशहित का साधन बताते हैं। विचार आधारित राजनीति मतदाता के लिए सुविधाजनक होती है। भिन्न-भिन्न दल अपनी विचारधारा के आधार पर कार्यकर्ता गढ़ते हैं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोकमत बनाते हैं। यह एक आदर्श स्थिति है लेकिन भारतीय राजनीति में मार्क्सवादी दल व राष्ट्रवादी भाजपा ही कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते हैं। वे विचार आधारित लोकमत बनाने का काम करते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस स्वतंत्रता पूर्व विचार आधारित कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर चलाती थी। राष्ट्रवाद उसका विचार था। बहुत पहले समाजवादी दल भी विचार आधारित प्रशिक्षण देते थे। धीरे-धीरे विचार आधारित राजनीति घटी। जाति, पंथ और मजहब राजनीति के उपकरण बने। अब मार्क्सवादी और भाजपा ही अपने कार्यकर्ताओं को विचार आधारित प्रशिक्षण देने वाली पार्टियाँ बची हैं। सामान्य बोलचाल में भारतीय जनता पार्टी को दक्षिणपंथी व मार्क्सवादी समूहों को वामपंथी कहा जाता है। लेकिन वामपंथ और दक्षिणपंथ सुविचारित और व्यवस्थित विभाजन नहीं है। दक्षिणपंथ और वामपंथ दलअसल एक सांयोगिक घटना का परिणाम है। सन् 1797 में फ्रांस की क्रांति के समय नेशनल असेम्बली दो भागों में बंट गयी थी। सम्राट लुई-16 ने बैठक बुलाई। फ्रांसीसी संसद में परम्परागत राजव्यवस्था को हटाकर लोकतंत्र लाने वाले व रूढ़ियों को न मानने वाले बांई तरफ बैठे थे। परम्परा और रूढ़ि के आग्रही दाये बैठे। यह सुविचारित और व्यवस्थित विभाजन नहीं था। मोटे तौर पर वामपंथ का विकास कार्ल मार्क्स के व्यवस्थित विचार से हुआ था। माना जाता है कि यह राजशाही और पूँजीवादी तंत्र के शासन के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक विचारधारा है। इस विचारधारा में सामाजिक वर्गों की कल्पना की गयी है। वर्ग संघर्ष को विकास का आधार बताया गया है। सर्वहारा की तानाशाही मार्क्सवाद की दृष्टि में आदर्श राजव्यवस्था है। ऐसी समाज व्यवस्था के लिए हिंसा को भी उचित ठहराया गया है। वे लोकतंत्र नहीं मानते। भारत के माओवादी रक्तपात करते हैं। 20वीं सदी में चीन में माउत्से तुंग ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा था। रूस में लेनिन और जोसेफ स्टालिन ने भी वामपंथ के आधार पर भारी नरसंहार किये थे। यह फ्रांस की राजक्रांति के बाद की बात है। वामपंथ दक्षिणपंथ की कोई सुव्यवस्थित परिभाषा नहीं है। माना जाता है कि दक्षिणपंथी समाज की ऐतिहासिकता भाषा परम्परा और सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर आदर्श समाज गढ़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे समाज में वर्गीकरण या श्रेणीकरण नहीं होता। वामपंथी शोषण मुक्त समाज का दावा करते हैं। फ्रांस की राजक्रांति के समय की परिभाषा आधुनिक राजनीति में लागू नहीं होती। इस परिभाषा के अधीन भारत की कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियाॅं दक्षिणपंथी कही जाती हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों के शासन में गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाएँ चलती रही। स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू वामपंथी रुझान के वरिष्ठ नेता थे। श्रीमती इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। क्या कांग्रेस को दक्षिणपंथी कहा जा सकता था। वह वामपंथी इसलिए नहीं है कि उसका चरित्र स्वाधीनता संग्राम के समय से ही राष्ट्रवादी है। भारतीय जनता पार्टी घोषित राष्ट्रवादी है। समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान और विकास के लिए संकल्पबद्ध है। गरीब महिलाओं को निःशुल्क गैस कनेक्शन देना और बिजली कनेक्शन भी पहुंचाना दक्षिणपंथी कैसे हो सकता है? गरीबों के समर्थन में किये जा रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्य राष्ट्र सर्वपारिता से जुडे़ हैं। इनमें गरीब कल्याण की भी सर्वोपारिता है। क्या इन्हें वामपंथी कहा जा सकता है? दक्षिणपंथ और वामपंथ का विभाजन ही अपने आप में गलत है। इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी व कन्जरवेटिव पार्टी प्रमुख दल है। लेबर को वामपंथी और कन्जरवेटिव पार्टी को दक्षिणपंथी कहा जाता है लेकिन दोनों पार्टियाॅं अपने काम में अपने-अपने ढंग से गरीब समर्थक हैं। परिवर्तनवादी भी हैं। केवल परिवर्तनवादी विचार ही वामपंथ नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समाज व्यवस्थाएं आदर्श नहीं होती। इसी तरह राजव्यवस्था या राजनैतिक विचारधाराएं भी आदर्श नहीं होती। समाज, राजनीति और राजव्यवस्थाओं में संशोधन की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। सोद्देश्य परिवर्तन सबकी इच्छा होती है। दुनिया की सभी सरकारें सोद्देश्य परिवर्तन के लिए प्रयास करती हैं। जड़ता पंथ-मजहब आधारित राजनीति में है। वह अपने प्रत्येक कर्म, विचार व ध्येय को मध्यकालीन पंथिक आग्रहों से जोड़ती है। वह आधुनिकता की भी विरोधी है। उनकी राजनीति के कारण सारी दुनिया में रक्तपात है। उनके संगठन सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य नहीं मानते। वे मध्यकाल की वापसी चाहते हैं। वे मजहबी धारणाओं के अलावा कोई भी विचार स्वीकार नहीं करते। युद्ध करते हैं। निर्दोषों का रक्तपात भी करते हैं। आतंकवाद ऐसी ही राजनैतिक विचारधारा का विस्तार है। दक्षिणपंथ वामपंथ काल वाह्य धारणाएं हैं। व्यर्थ हैं। सोद्देश्य सामाजिक परिवर्तन के लिए सबको काम करना चाहिए। सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध भी संघर्ष की आवश्यकता है। मैं अनेक समाचार पत्रों में लिखता हूँ। हमारे लेखन की प्रशंसा और आलोचना होती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पत्रकार मित्रों ने मेरे लेखन की प्रशंसा करते हुए कहा कि दक्षिणपंथी खेमे में आप सर्वाधिक प्रतिष्ठित लिखते हैं। यद्यपि यह मेरे लेखन की प्रशंसा थी, लेकिन मुझे दक्षिणपंथी कहा गया। मैंने उन्हें बताया कि हमारे लेखन में जातिभेद, वर्गभेद और रूढ़ियों पर आक्रमकता रहती है। मैं वर्तमान समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कर्म और लेखन के माध्यम से संघर्षरत हूँ। बावजूद इसके मैं दक्षिणपंथी क्यों हुआ? मित्रों ने हंसते हुए कहा कि क्या फिर आप वामपंथी हैं। मैंने कहा “मैं वामपंथी नहीं हो सकता। वामपंथी मान्यताओं में हिंसा है। वे भारतीय सांस्कृति और परम्परा को लेकर भी आक्रामक हैं।” मित्रों ने कहा कि आप वामपंथी नहीं हैं और दक्षिणपंथी भी नहीं हैं तो फिर आप हैं क्या? मैंने पूछा क्या किसी राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता का दक्षिण या वामपंथी होना जरूरी है? क्या तीसरा विकल्प नहीं है। मैंने स्वयं उत्तर दिया कि न बांये चलना, न दायें चलना, सीधे गति करना आगे बढ़ना, लोगों को आगे बढ़ने में सहायता करना यही मार्ग भारतीय परम्परा में सर्वमान्य रहा है। यह परिवर्तनकामी भी है। महाभारत की कथा में यक्ष ने युधिष्ठिर से यही पूछा था “मार्ग क्या है- कः पंथा।” युधिष्ठिर ने बहुत सोच-समझकर उत्तर दिया- “वेद वचन भिन्न-भिन्न हैं। ऋषि अनेक हैं। तर्क से कोई बात नहीं बनती। धर्म तत्व छुपा हुआ है, इसलिए महापुरुषों द्वारा अपनाया गया पंथ ही श्रेष्ठ है। युधिष्ठिर के उत्तर में वामपंथ या दक्षिणपंथ नहीं है। पूर्वजों ने अपने अनुभव के आधार पर जो मार्ग चुना है वही हमारा मार्ग है। क्या यह कथन पुराना होने के कारण दक्षिणपंथी है। इस कथन में आगे बढ़ने का संकल्प है। ऋग्वेद के ऋषि ने भी गतिशील रहने के लिए प्रार्थना की थी, ’’संगच्छध्वं संवदध्वं सं वोमनासि जानंताम्’’ हम साथ-साथ चलें। साथ-साथ वार्तालाप करते चलें। साथ-साथ मन मिलाकर चलें। ऐसा ही हमारे पूर्वज करते आये हैं। परस्पर विचार-विमर्श करते हुए प्रस्थान। चरैवेति। चरैवेति।  (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 1 November 2020


bhopal, There is no deliberate, split between left and right

हृदयनारायण दीक्षित भारतीय राजनीति लोकमंगल का उपकरण है। सभी दल अपनी विचारधारा को देशहित का साधन बताते हैं। विचार आधारित राजनीति मतदाता के लिए सुविधाजनक होती है। भिन्न-भिन्न दल अपनी विचारधारा के आधार पर कार्यकर्ता गढ़ते हैं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोकमत बनाते हैं। यह एक आदर्श स्थिति है लेकिन भारतीय राजनीति में मार्क्सवादी दल व राष्ट्रवादी भाजपा ही कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते हैं। वे विचार आधारित लोकमत बनाने का काम करते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस स्वतंत्रता पूर्व विचार आधारित कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर चलाती थी। राष्ट्रवाद उसका विचार था। बहुत पहले समाजवादी दल भी विचार आधारित प्रशिक्षण देते थे। धीरे-धीरे विचार आधारित राजनीति घटी। जाति, पंथ और मजहब राजनीति के उपकरण बने। अब मार्क्सवादी और भाजपा ही अपने कार्यकर्ताओं को विचार आधारित प्रशिक्षण देने वाली पार्टियाँ बची हैं। सामान्य बोलचाल में भारतीय जनता पार्टी को दक्षिणपंथी व मार्क्सवादी समूहों को वामपंथी कहा जाता है। लेकिन वामपंथ और दक्षिणपंथ सुविचारित और व्यवस्थित विभाजन नहीं है। दक्षिणपंथ और वामपंथ दलअसल एक सांयोगिक घटना का परिणाम है। सन् 1797 में फ्रांस की क्रांति के समय नेशनल असेम्बली दो भागों में बंट गयी थी। सम्राट लुई-16 ने बैठक बुलाई। फ्रांसीसी संसद में परम्परागत राजव्यवस्था को हटाकर लोकतंत्र लाने वाले व रूढ़ियों को न मानने वाले बांई तरफ बैठे थे। परम्परा और रूढ़ि के आग्रही दाये बैठे। यह सुविचारित और व्यवस्थित विभाजन नहीं था। मोटे तौर पर वामपंथ का विकास कार्ल मार्क्स के व्यवस्थित विचार से हुआ था। माना जाता है कि यह राजशाही और पूँजीवादी तंत्र के शासन के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक विचारधारा है। इस विचारधारा में सामाजिक वर्गों की कल्पना की गयी है। वर्ग संघर्ष को विकास का आधार बताया गया है। सर्वहारा की तानाशाही मार्क्सवाद की दृष्टि में आदर्श राजव्यवस्था है। ऐसी समाज व्यवस्था के लिए हिंसा को भी उचित ठहराया गया है। वे लोकतंत्र नहीं मानते। भारत के माओवादी रक्तपात करते हैं। 20वीं सदी में चीन में माउत्से तुंग ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा था। रूस में लेनिन और जोसेफ स्टालिन ने भी वामपंथ के आधार पर भारी नरसंहार किये थे। यह फ्रांस की राजक्रांति के बाद की बात है। वामपंथ दक्षिणपंथ की कोई सुव्यवस्थित परिभाषा नहीं है। माना जाता है कि दक्षिणपंथी समाज की ऐतिहासिकता भाषा परम्परा और सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर आदर्श समाज गढ़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे समाज में वर्गीकरण या श्रेणीकरण नहीं होता। वामपंथी शोषण मुक्त समाज का दावा करते हैं। फ्रांस की राजक्रांति के समय की परिभाषा आधुनिक राजनीति में लागू नहीं होती। इस परिभाषा के अधीन भारत की कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियाॅं दक्षिणपंथी कही जाती हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों के शासन में गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाएँ चलती रही। स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू वामपंथी रुझान के वरिष्ठ नेता थे। श्रीमती इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। क्या कांग्रेस को दक्षिणपंथी कहा जा सकता था। वह वामपंथी इसलिए नहीं है कि उसका चरित्र स्वाधीनता संग्राम के समय से ही राष्ट्रवादी है। भारतीय जनता पार्टी घोषित राष्ट्रवादी है। समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान और विकास के लिए संकल्पबद्ध है। गरीब महिलाओं को निःशुल्क गैस कनेक्शन देना और बिजली कनेक्शन भी पहुंचाना दक्षिणपंथी कैसे हो सकता है? गरीबों के समर्थन में किये जा रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्य राष्ट्र सर्वपारिता से जुडे़ हैं। इनमें गरीब कल्याण की भी सर्वोपारिता है। क्या इन्हें वामपंथी कहा जा सकता है? दक्षिणपंथ और वामपंथ का विभाजन ही अपने आप में गलत है। इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी व कन्जरवेटिव पार्टी प्रमुख दल है। लेबर को वामपंथी और कन्जरवेटिव पार्टी को दक्षिणपंथी कहा जाता है लेकिन दोनों पार्टियाॅं अपने काम में अपने-अपने ढंग से गरीब समर्थक हैं। परिवर्तनवादी भी हैं। केवल परिवर्तनवादी विचार ही वामपंथ नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समाज व्यवस्थाएं आदर्श नहीं होती। इसी तरह राजव्यवस्था या राजनैतिक विचारधाराएं भी आदर्श नहीं होती। समाज, राजनीति और राजव्यवस्थाओं में संशोधन की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। सोद्देश्य परिवर्तन सबकी इच्छा होती है। दुनिया की सभी सरकारें सोद्देश्य परिवर्तन के लिए प्रयास करती हैं। जड़ता पंथ-मजहब आधारित राजनीति में है। वह अपने प्रत्येक कर्म, विचार व ध्येय को मध्यकालीन पंथिक आग्रहों से जोड़ती है। वह आधुनिकता की भी विरोधी है। उनकी राजनीति के कारण सारी दुनिया में रक्तपात है। उनके संगठन सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य नहीं मानते। वे मध्यकाल की वापसी चाहते हैं। वे मजहबी धारणाओं के अलावा कोई भी विचार स्वीकार नहीं करते। युद्ध करते हैं। निर्दोषों का रक्तपात भी करते हैं। आतंकवाद ऐसी ही राजनैतिक विचारधारा का विस्तार है। दक्षिणपंथ वामपंथ काल वाह्य धारणाएं हैं। व्यर्थ हैं। सोद्देश्य सामाजिक परिवर्तन के लिए सबको काम करना चाहिए। सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध भी संघर्ष की आवश्यकता है। मैं अनेक समाचार पत्रों में लिखता हूँ। हमारे लेखन की प्रशंसा और आलोचना होती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पत्रकार मित्रों ने मेरे लेखन की प्रशंसा करते हुए कहा कि दक्षिणपंथी खेमे में आप सर्वाधिक प्रतिष्ठित लिखते हैं। यद्यपि यह मेरे लेखन की प्रशंसा थी, लेकिन मुझे दक्षिणपंथी कहा गया। मैंने उन्हें बताया कि हमारे लेखन में जातिभेद, वर्गभेद और रूढ़ियों पर आक्रमकता रहती है। मैं वर्तमान समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कर्म और लेखन के माध्यम से संघर्षरत हूँ। बावजूद इसके मैं दक्षिणपंथी क्यों हुआ? मित्रों ने हंसते हुए कहा कि क्या फिर आप वामपंथी हैं। मैंने कहा “मैं वामपंथी नहीं हो सकता। वामपंथी मान्यताओं में हिंसा है। वे भारतीय सांस्कृति और परम्परा को लेकर भी आक्रामक हैं।” मित्रों ने कहा कि आप वामपंथी नहीं हैं और दक्षिणपंथी भी नहीं हैं तो फिर आप हैं क्या? मैंने पूछा क्या किसी राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता का दक्षिण या वामपंथी होना जरूरी है? क्या तीसरा विकल्प नहीं है। मैंने स्वयं उत्तर दिया कि न बांये चलना, न दायें चलना, सीधे गति करना आगे बढ़ना, लोगों को आगे बढ़ने में सहायता करना यही मार्ग भारतीय परम्परा में सर्वमान्य रहा है। यह परिवर्तनकामी भी है। महाभारत की कथा में यक्ष ने युधिष्ठिर से यही पूछा था “मार्ग क्या है- कः पंथा।” युधिष्ठिर ने बहुत सोच-समझकर उत्तर दिया- “वेद वचन भिन्न-भिन्न हैं। ऋषि अनेक हैं। तर्क से कोई बात नहीं बनती। धर्म तत्व छुपा हुआ है, इसलिए महापुरुषों द्वारा अपनाया गया पंथ ही श्रेष्ठ है। युधिष्ठिर के उत्तर में वामपंथ या दक्षिणपंथ नहीं है। पूर्वजों ने अपने अनुभव के आधार पर जो मार्ग चुना है वही हमारा मार्ग है। क्या यह कथन पुराना होने के कारण दक्षिणपंथी है। इस कथन में आगे बढ़ने का संकल्प है। ऋग्वेद के ऋषि ने भी गतिशील रहने के लिए प्रार्थना की थी, ’’संगच्छध्वं संवदध्वं सं वोमनासि जानंताम्’’ हम साथ-साथ चलें। साथ-साथ वार्तालाप करते चलें। साथ-साथ मन मिलाकर चलें। ऐसा ही हमारे पूर्वज करते आये हैं। परस्पर विचार-विमर्श करते हुए प्रस्थान। चरैवेति। चरैवेति।  (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 1 November 2020


bhopal, Imran and Erdogan are adding fuel to the fire

बिक्रम उपाध्याय फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन के बयान से उठे बवाल को पाकिस्तान और तुर्की खूब हवा दे रहे हैं। इस्लामाबाद और इस्तांबुल में इस बात की होड़ लगी है कि कौन कितना आग में घी डाल सकता है। इमरान खान और इर्दोगन मुसलमानों में यह संदेश पहुंचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि मैक्रोन ने इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्म्द की शान में गुस्ताखी की है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के समर्थन में खड़े ये दोनों नेता पूरी दुनिया के लिए खतरे का सबब बन सकते हैं। कई देशों में पहले से ही इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद का जहर फैला हुआ है, वैसे में पाकिस्तान और तुर्की के भड़काऊ रवैये की जितना हो सके आलोचना की जानी चाहिए। इस्लाम की तौहीन करने वालों को सजा देने का जो कैंपेन शुरू हुआ है, उसमें उस अतिवादी और आतंकवादी का मानवता विरोधी कृत्य छिप गया है, जिसने एक फ्रांसिसी शिक्षक का गला इसलिए काट दिया था कि उस शिक्षक ने मोहम्मद साहब के कार्टून पर क्लाॅस रूम में कुछ व्याख्यान दिए थे। पूरी दुनिया में कम से 18 ऐसे मजहब हैं, जिनके मानने वालों में करोड़ों लोग शामिल हैं। परंतु पूरी दुनिया में केवल एक इस्लाम ही ऐसा मजहब है, जिसमें अल्लाह या पैगंबर पर कोई सवाल करने वालों की हत्या करने का फतवा जारी कर दिया जाता है। बाकी कोई ऐसा मजहब नहीं है जहां संस्थागत तरीके से किसी को मारने का ऐलान किया जाता हो। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन ने इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही नफरत और हिंसा के मामले में एक ही बात कही है कि इस्लाम को लेकर दुनिया पर खतरा है। हो सकता है कि मैक्रोन की इस बात में पूरी सच्चाई ना हो, लेकिन इस बात पर भी कोई शंका नहीं है कि कई अन्य देशों की तरह फ्रांस भी ऐसा देश है, जो इस्लामिक आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित है। फ्रांस ने पिछले 10 सालों में न जाने कितने हमले झेले हैं। 8 अक्टूबर 2004 को पेरिस स्थित इंडोनेशिया के दूतावास पर बम धमाका। इस धमाके को अंजाम दिया फ्रांसिसी इस्लामिक आर्मी ने। इस धमाके में एक व्यक्ति की जान गई। 1 दिसंबर 2007 को फ्रांस और स्पेन में सक्रिय अलगाववादी संगठन ईटीए ने स्पेन के दो सिविल गार्ड की गोली मार कर हत्या कर दी। 16 मार्च 2010 को इसी ईटीए के अतिवादियों ने फ्रांसिसी पुलिस वालों की हत्या कर दी। 2012 के 11 मार्च से 22 मार्च के बीच में मोहम्मद मेराह नाम के संगठन ने तीन फ्रेंच पैराटुपर और तीन स्कूली बच्चों समेत 7 लोगों की हत्या कर दी। 25 मई 2013 को एक इस्लामिक सिरफिरे ने फ्रांस के एक सैनिक के पेट में चाकू घोंप दिया। 20 दिसंबर 2014 को भी एक व्यक्ति ने अल्लाहू अकबर का नारा लगाते हुए एक पुलिस वाले को चाकू मार दिया। फिर जनवरी 2015 का वह हादसा। जब चार्ली अबे के कार्यालय में घुंसकर एक मुस्लिम आतंकवादी ने नरसंहार शुरू कर दिया। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इसी हादसे के बाद पता चला कि फ्रांस में अलकायदा और आईएसआईएस ने कितनी जड़े जमा रखी हैं। फ्रांस ने आतंकवादियों के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई की, लेकिन उसके एक महीने बाद ही फरवरी 2015 में फिर से एक मुस्लिम अतिवादी ने तीन सुरक्षा गार्डों को चाकू मार कर घायल कर दिया। 19 अप्रैल 2015 को एक अल्जीरियन जेहादी ने चर्च पर हमला करने की कोशिश की। इसमें एक महिला की जान भी चली गई। 21 अगस्त 2015 को भी एम्सटर्डम से पेरिस जा रही एक ट्रेन पर हमला कर नरसंहार की कोशिश की गई। लेकिन संयोग था कि हमलावर सिर्फ 3 लोगों को घायल कर पाया और उसे यात्रियों ने धर दबोचा। 13-14 नवंबर 2015 को पेरिस हमले को कौन भूल सकता है। फुटबाल मैच के बीच भयानक आतंकवादी हमला हुआ। क्लब, बार और मैदान पर कोहराम मच गया। आईएसआईएस ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। इस हमले में 90 फ्रांसिसी मारे गए थे। फ्रांस ने इस घटना के बाद आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया था, सीरिया पर हमले भी किए, लेकिन फ्रांस अभी भी आतंकवाद की चपेट से बाहर नहीं निकला। फ्रांस, इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं को लगभग हर महीने झेल रहा है। इसलिए मैक्रोन का यह कहना कि इस्लाम के नाम पर जो हो रहा है उससे दुनिया को खतरा उत्पन्न हो गया है, गलत नहीं है। खुद को और अपने हर नागरिक को बचाने और आतंकवादियों को खत्म करने का पूरा अधिकार मैक्रोन के पास है। जिस विचारधारा को लेकर फ्रांस में हमले हो रहे हैं उसका प्रतिकार और उस विचारधारा की आलोचना करना भी मैक्रोन का अधिकार है। लेकिन इस्लामिस्ट जेहाद के खिलाफ बोलने के बजाय पाकिस्तान और तुर्की फ्रांस को ही इस्लामीफोबिया के लिए जिम्मेदार ठहराने में लगे हैं। कोई मैक्रोन का सिर चाहता है तो कोई फ्रांस के सामानों का बहिष्कार चाहता है। फ्रांस और राष्ट्रपति मैक्रोन के विरोध पीछे केवल उनका बयान नहीं है, बल्कि वह कानून है, जिसको दिसंबर में लाने की घोषणा मैक्रोन ने की है। फ्रांस 1905 के उस कानून में बदलाव करने जा रहा है, जिसके तहत चर्च और मस्जिद समेत उन तमाम मजहबी संगठनों के वित्तीय पोषण पर रोक लग सकती है, जिन्हें विदेशों से धन प्राप्त होता है। इस कानून के बाद फ्रांस में मुस्लिम संगठनों के उन मदरसों पर रोक लग सकती है, जो निजी तौर पर मुस्लिम बच्चों को कुरान और हदीस की शिक्षा दे रहे हैं। उन इमामों और मुल्लों पर भी प्रतिबंध लग सकता है जो विदेशों से आकर स्थानीय इमामों को ट्रेनिंग आदि देते हैं। मैक्रोन की इस घोषणा से फ्रांस के मौलवियों और इमामों में भी बेचैनी है और मैक्रोन के इस प्रयास को मुस्लिम बच्चों के खिलाफ बता रहे हैं। लेकिन मैक्रोन ने ऐलानिया तौर पर कहा है कि वह फ्रांस में रह रहे मुसलमानों को बाहरी इस्लामिक दुनिया के प्रभाव से मुक्त कर के दम लेंगे। तुर्की और पाकिस्तान की बेचैनी का एक कारण यह भी है कि फ्रांस में जाकर बसने वाले मुसलमानों में एक बड़ी संख्या इन दोनों देशों के नागरिकों की भी है। वैसे फ्रांस में मुस्लिम शरणार्थियों का बड़े पैमाने पर आगमन 1960 और 1970 के दशक में ही हो गया था, लेकिन उस समय ज्यादातर मुस्लिम फ्रांस में रोजी रोटी के लिए गए थे। उनमें महिलाओं की संख्या काफी कम थी। फ्रांस में जाकर नौकरी करने वालों मुसलमानों में मुख्य रूप से अल्जीरिया और उत्तरी अफ्रीका के लोग थे। लेकिन 1976 में फ्रांस ने एक कानून पास कर प्रवासी मुसलमानों को न सिर्फ फ्रांस की नागरिकता दे दी, बल्कि उनके होम कंट्री से परिवार को लाने और वहां बसाने का भी अधिकार दे दिया। उन्हें यह पता नहीं था कि एक दिन उनके कदम उनके लिए ही खतरा बन जाएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार सीरिया में आईएसआईएस के लिए लड़ने वालों में लगभग 900 ऐसे भी थे जो फ्रांस से गए थे। 2019 में इराक के एक कोर्ट ने चार फ्रेंच नागरिकों को आईएसआईएस के लिए लड़ने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी। अल्जीरिया, मोरक्को और ट्यूनिशिया के मुसलमानों के साथ साथ बड़े पैमाने पर सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रवासी भी इन गतिविधियों में शामिल होने लगे हैं। फ्रांस हालांकि एक सेकुलर देश है। 1905 में ही एक कानून के जरिए शासन प्रशासन में चर्च की दखल को खत्म कर दिया गया, लेकिन फ्रांस की सरकारों ने मुसलमानों के प्रति बेहद उदार रवैया अपनाया। फ्रांस में कानून के विपरीत जाकर मुस्लिम काउंसिल की स्थापना की गई। फ्रांस की मस्जिदों के इमाम आर्म्स जेहाद की वकालत करने लगे हैं। कैथोलिक स्कूलों के साथ साथ इस्लामिक स्कूलों की स्थापना को भी मंजूरी दे दी गई। फ्रांस में इस समय 2300 मस्जिदें हैं और लगभग 250 और मस्जिदें बनाई जा रही हैं। फ्रेंच मुस्लिम काउंसिल की मांग है कि मस्जिदों की संख्या अभी के मुकाबले दुगनी होनी चाहिए। अब जबकि फ्रांस को इस बात के साक्ष्य मिल गए हैं कि मस्जिदों से ही अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है तो कुछ मस्जिदों को बंद करने का आदेश दिया जा रहा है। लगभग 20 मस्जिदें बंद कर दी गई हैं। फ्रांस को इस बात का बहुत देर से अहसास हुआ कि उनकी धरती का इस्तेमाल पूरी दुनिया में आतंकवाद फेलाने के लिए किया जा रहा है। फ्रेंच इंटेलिजेंस लगभग 15 हजार अपने मुस्लिम नागरिकों और शरणार्थियों पर नजर रखे हुए है जिनकी भूमिका संदिग्ध है। आतंकवाद की घटनाओं में शामिल मुसलमानों से फ्रांस की जेलें भर गई हैं। जब अक्टूबर 2020 में एक जेहादी ने शिक्षक का सर कलम कर दिया तब जाकर मैक्रोन ने इस्लामिक अलगाववाद के खिलाफ मोर्चा खोला। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 October 2020


bhopal, Imran and Erdogan are adding fuel to the fire

बिक्रम उपाध्याय फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन के बयान से उठे बवाल को पाकिस्तान और तुर्की खूब हवा दे रहे हैं। इस्लामाबाद और इस्तांबुल में इस बात की होड़ लगी है कि कौन कितना आग में घी डाल सकता है। इमरान खान और इर्दोगन मुसलमानों में यह संदेश पहुंचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि मैक्रोन ने इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्म्द की शान में गुस्ताखी की है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के समर्थन में खड़े ये दोनों नेता पूरी दुनिया के लिए खतरे का सबब बन सकते हैं। कई देशों में पहले से ही इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद का जहर फैला हुआ है, वैसे में पाकिस्तान और तुर्की के भड़काऊ रवैये की जितना हो सके आलोचना की जानी चाहिए। इस्लाम की तौहीन करने वालों को सजा देने का जो कैंपेन शुरू हुआ है, उसमें उस अतिवादी और आतंकवादी का मानवता विरोधी कृत्य छिप गया है, जिसने एक फ्रांसिसी शिक्षक का गला इसलिए काट दिया था कि उस शिक्षक ने मोहम्मद साहब के कार्टून पर क्लाॅस रूम में कुछ व्याख्यान दिए थे। पूरी दुनिया में कम से 18 ऐसे मजहब हैं, जिनके मानने वालों में करोड़ों लोग शामिल हैं। परंतु पूरी दुनिया में केवल एक इस्लाम ही ऐसा मजहब है, जिसमें अल्लाह या पैगंबर पर कोई सवाल करने वालों की हत्या करने का फतवा जारी कर दिया जाता है। बाकी कोई ऐसा मजहब नहीं है जहां संस्थागत तरीके से किसी को मारने का ऐलान किया जाता हो। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन ने इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही नफरत और हिंसा के मामले में एक ही बात कही है कि इस्लाम को लेकर दुनिया पर खतरा है। हो सकता है कि मैक्रोन की इस बात में पूरी सच्चाई ना हो, लेकिन इस बात पर भी कोई शंका नहीं है कि कई अन्य देशों की तरह फ्रांस भी ऐसा देश है, जो इस्लामिक आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित है। फ्रांस ने पिछले 10 सालों में न जाने कितने हमले झेले हैं। 8 अक्टूबर 2004 को पेरिस स्थित इंडोनेशिया के दूतावास पर बम धमाका। इस धमाके को अंजाम दिया फ्रांसिसी इस्लामिक आर्मी ने। इस धमाके में एक व्यक्ति की जान गई। 1 दिसंबर 2007 को फ्रांस और स्पेन में सक्रिय अलगाववादी संगठन ईटीए ने स्पेन के दो सिविल गार्ड की गोली मार कर हत्या कर दी। 16 मार्च 2010 को इसी ईटीए के अतिवादियों ने फ्रांसिसी पुलिस वालों की हत्या कर दी। 2012 के 11 मार्च से 22 मार्च के बीच में मोहम्मद मेराह नाम के संगठन ने तीन फ्रेंच पैराटुपर और तीन स्कूली बच्चों समेत 7 लोगों की हत्या कर दी। 25 मई 2013 को एक इस्लामिक सिरफिरे ने फ्रांस के एक सैनिक के पेट में चाकू घोंप दिया। 20 दिसंबर 2014 को भी एक व्यक्ति ने अल्लाहू अकबर का नारा लगाते हुए एक पुलिस वाले को चाकू मार दिया। फिर जनवरी 2015 का वह हादसा। जब चार्ली अबे के कार्यालय में घुंसकर एक मुस्लिम आतंकवादी ने नरसंहार शुरू कर दिया। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इसी हादसे के बाद पता चला कि फ्रांस में अलकायदा और आईएसआईएस ने कितनी जड़े जमा रखी हैं। फ्रांस ने आतंकवादियों के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई की, लेकिन उसके एक महीने बाद ही फरवरी 2015 में फिर से एक मुस्लिम अतिवादी ने तीन सुरक्षा गार्डों को चाकू मार कर घायल कर दिया। 19 अप्रैल 2015 को एक अल्जीरियन जेहादी ने चर्च पर हमला करने की कोशिश की। इसमें एक महिला की जान भी चली गई। 21 अगस्त 2015 को भी एम्सटर्डम से पेरिस जा रही एक ट्रेन पर हमला कर नरसंहार की कोशिश की गई। लेकिन संयोग था कि हमलावर सिर्फ 3 लोगों को घायल कर पाया और उसे यात्रियों ने धर दबोचा। 13-14 नवंबर 2015 को पेरिस हमले को कौन भूल सकता है। फुटबाल मैच के बीच भयानक आतंकवादी हमला हुआ। क्लब, बार और मैदान पर कोहराम मच गया। आईएसआईएस ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। इस हमले में 90 फ्रांसिसी मारे गए थे। फ्रांस ने इस घटना के बाद आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया था, सीरिया पर हमले भी किए, लेकिन फ्रांस अभी भी आतंकवाद की चपेट से बाहर नहीं निकला। फ्रांस, इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं को लगभग हर महीने झेल रहा है। इसलिए मैक्रोन का यह कहना कि इस्लाम के नाम पर जो हो रहा है उससे दुनिया को खतरा उत्पन्न हो गया है, गलत नहीं है। खुद को और अपने हर नागरिक को बचाने और आतंकवादियों को खत्म करने का पूरा अधिकार मैक्रोन के पास है। जिस विचारधारा को लेकर फ्रांस में हमले हो रहे हैं उसका प्रतिकार और उस विचारधारा की आलोचना करना भी मैक्रोन का अधिकार है। लेकिन इस्लामिस्ट जेहाद के खिलाफ बोलने के बजाय पाकिस्तान और तुर्की फ्रांस को ही इस्लामीफोबिया के लिए जिम्मेदार ठहराने में लगे हैं। कोई मैक्रोन का सिर चाहता है तो कोई फ्रांस के सामानों का बहिष्कार चाहता है। फ्रांस और राष्ट्रपति मैक्रोन के विरोध पीछे केवल उनका बयान नहीं है, बल्कि वह कानून है, जिसको दिसंबर में लाने की घोषणा मैक्रोन ने की है। फ्रांस 1905 के उस कानून में बदलाव करने जा रहा है, जिसके तहत चर्च और मस्जिद समेत उन तमाम मजहबी संगठनों के वित्तीय पोषण पर रोक लग सकती है, जिन्हें विदेशों से धन प्राप्त होता है। इस कानून के बाद फ्रांस में मुस्लिम संगठनों के उन मदरसों पर रोक लग सकती है, जो निजी तौर पर मुस्लिम बच्चों को कुरान और हदीस की शिक्षा दे रहे हैं। उन इमामों और मुल्लों पर भी प्रतिबंध लग सकता है जो विदेशों से आकर स्थानीय इमामों को ट्रेनिंग आदि देते हैं। मैक्रोन की इस घोषणा से फ्रांस के मौलवियों और इमामों में भी बेचैनी है और मैक्रोन के इस प्रयास को मुस्लिम बच्चों के खिलाफ बता रहे हैं। लेकिन मैक्रोन ने ऐलानिया तौर पर कहा है कि वह फ्रांस में रह रहे मुसलमानों को बाहरी इस्लामिक दुनिया के प्रभाव से मुक्त कर के दम लेंगे। तुर्की और पाकिस्तान की बेचैनी का एक कारण यह भी है कि फ्रांस में जाकर बसने वाले मुसलमानों में एक बड़ी संख्या इन दोनों देशों के नागरिकों की भी है। वैसे फ्रांस में मुस्लिम शरणार्थियों का बड़े पैमाने पर आगमन 1960 और 1970 के दशक में ही हो गया था, लेकिन उस समय ज्यादातर मुस्लिम फ्रांस में रोजी रोटी के लिए गए थे। उनमें महिलाओं की संख्या काफी कम थी। फ्रांस में जाकर नौकरी करने वालों मुसलमानों में मुख्य रूप से अल्जीरिया और उत्तरी अफ्रीका के लोग थे। लेकिन 1976 में फ्रांस ने एक कानून पास कर प्रवासी मुसलमानों को न सिर्फ फ्रांस की नागरिकता दे दी, बल्कि उनके होम कंट्री से परिवार को लाने और वहां बसाने का भी अधिकार दे दिया। उन्हें यह पता नहीं था कि एक दिन उनके कदम उनके लिए ही खतरा बन जाएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार सीरिया में आईएसआईएस के लिए लड़ने वालों में लगभग 900 ऐसे भी थे जो फ्रांस से गए थे। 2019 में इराक के एक कोर्ट ने चार फ्रेंच नागरिकों को आईएसआईएस के लिए लड़ने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी। अल्जीरिया, मोरक्को और ट्यूनिशिया के मुसलमानों के साथ साथ बड़े पैमाने पर सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रवासी भी इन गतिविधियों में शामिल होने लगे हैं। फ्रांस हालांकि एक सेकुलर देश है। 1905 में ही एक कानून के जरिए शासन प्रशासन में चर्च की दखल को खत्म कर दिया गया, लेकिन फ्रांस की सरकारों ने मुसलमानों के प्रति बेहद उदार रवैया अपनाया। फ्रांस में कानून के विपरीत जाकर मुस्लिम काउंसिल की स्थापना की गई। फ्रांस की मस्जिदों के इमाम आर्म्स जेहाद की वकालत करने लगे हैं। कैथोलिक स्कूलों के साथ साथ इस्लामिक स्कूलों की स्थापना को भी मंजूरी दे दी गई। फ्रांस में इस समय 2300 मस्जिदें हैं और लगभग 250 और मस्जिदें बनाई जा रही हैं। फ्रेंच मुस्लिम काउंसिल की मांग है कि मस्जिदों की संख्या अभी के मुकाबले दुगनी होनी चाहिए। अब जबकि फ्रांस को इस बात के साक्ष्य मिल गए हैं कि मस्जिदों से ही अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है तो कुछ मस्जिदों को बंद करने का आदेश दिया जा रहा है। लगभग 20 मस्जिदें बंद कर दी गई हैं। फ्रांस को इस बात का बहुत देर से अहसास हुआ कि उनकी धरती का इस्तेमाल पूरी दुनिया में आतंकवाद फेलाने के लिए किया जा रहा है। फ्रेंच इंटेलिजेंस लगभग 15 हजार अपने मुस्लिम नागरिकों और शरणार्थियों पर नजर रखे हुए है जिनकी भूमिका संदिग्ध है। आतंकवाद की घटनाओं में शामिल मुसलमानों से फ्रांस की जेलें भर गई हैं। जब अक्टूबर 2020 में एक जेहादी ने शिक्षक का सर कलम कर दिया तब जाकर मैक्रोन ने इस्लामिक अलगाववाद के खिलाफ मोर्चा खोला। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 29 October 2020


bhopal, Imran and Erdogan are adding fuel to the fire

बिक्रम उपाध्याय फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन के बयान से उठे बवाल को पाकिस्तान और तुर्की खूब हवा दे रहे हैं। इस्लामाबाद और इस्तांबुल में इस बात की होड़ लगी है कि कौन कितना आग में घी डाल सकता है। इमरान खान और इर्दोगन मुसलमानों में यह संदेश पहुंचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि मैक्रोन ने इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्म्द की शान में गुस्ताखी की है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के समर्थन में खड़े ये दोनों नेता पूरी दुनिया के लिए खतरे का सबब बन सकते हैं। कई देशों में पहले से ही इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद का जहर फैला हुआ है, वैसे में पाकिस्तान और तुर्की के भड़काऊ रवैये की जितना हो सके आलोचना की जानी चाहिए। इस्लाम की तौहीन करने वालों को सजा देने का जो कैंपेन शुरू हुआ है, उसमें उस अतिवादी और आतंकवादी का मानवता विरोधी कृत्य छिप गया है, जिसने एक फ्रांसिसी शिक्षक का गला इसलिए काट दिया था कि उस शिक्षक ने मोहम्मद साहब के कार्टून पर क्लाॅस रूम में कुछ व्याख्यान दिए थे। पूरी दुनिया में कम से 18 ऐसे मजहब हैं, जिनके मानने वालों में करोड़ों लोग शामिल हैं। परंतु पूरी दुनिया में केवल एक इस्लाम ही ऐसा मजहब है, जिसमें अल्लाह या पैगंबर पर कोई सवाल करने वालों की हत्या करने का फतवा जारी कर दिया जाता है। बाकी कोई ऐसा मजहब नहीं है जहां संस्थागत तरीके से किसी को मारने का ऐलान किया जाता हो। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन ने इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही नफरत और हिंसा के मामले में एक ही बात कही है कि इस्लाम को लेकर दुनिया पर खतरा है। हो सकता है कि मैक्रोन की इस बात में पूरी सच्चाई ना हो, लेकिन इस बात पर भी कोई शंका नहीं है कि कई अन्य देशों की तरह फ्रांस भी ऐसा देश है, जो इस्लामिक आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित है। फ्रांस ने पिछले 10 सालों में न जाने कितने हमले झेले हैं। 8 अक्टूबर 2004 को पेरिस स्थित इंडोनेशिया के दूतावास पर बम धमाका। इस धमाके को अंजाम दिया फ्रांसिसी इस्लामिक आर्मी ने। इस धमाके में एक व्यक्ति की जान गई। 1 दिसंबर 2007 को फ्रांस और स्पेन में सक्रिय अलगाववादी संगठन ईटीए ने स्पेन के दो सिविल गार्ड की गोली मार कर हत्या कर दी। 16 मार्च 2010 को इसी ईटीए के अतिवादियों ने फ्रांसिसी पुलिस वालों की हत्या कर दी। 2012 के 11 मार्च से 22 मार्च के बीच में मोहम्मद मेराह नाम के संगठन ने तीन फ्रेंच पैराटुपर और तीन स्कूली बच्चों समेत 7 लोगों की हत्या कर दी। 25 मई 2013 को एक इस्लामिक सिरफिरे ने फ्रांस के एक सैनिक के पेट में चाकू घोंप दिया। 20 दिसंबर 2014 को भी एक व्यक्ति ने अल्लाहू अकबर का नारा लगाते हुए एक पुलिस वाले को चाकू मार दिया। फिर जनवरी 2015 का वह हादसा। जब चार्ली अबे के कार्यालय में घुंसकर एक मुस्लिम आतंकवादी ने नरसंहार शुरू कर दिया। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इसी हादसे के बाद पता चला कि फ्रांस में अलकायदा और आईएसआईएस ने कितनी जड़े जमा रखी हैं। फ्रांस ने आतंकवादियों के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई की, लेकिन उसके एक महीने बाद ही फरवरी 2015 में फिर से एक मुस्लिम अतिवादी ने तीन सुरक्षा गार्डों को चाकू मार कर घायल कर दिया। 19 अप्रैल 2015 को एक अल्जीरियन जेहादी ने चर्च पर हमला करने की कोशिश की। इसमें एक महिला की जान भी चली गई। 21 अगस्त 2015 को भी एम्सटर्डम से पेरिस जा रही एक ट्रेन पर हमला कर नरसंहार की कोशिश की गई। लेकिन संयोग था कि हमलावर सिर्फ 3 लोगों को घायल कर पाया और उसे यात्रियों ने धर दबोचा। 13-14 नवंबर 2015 को पेरिस हमले को कौन भूल सकता है। फुटबाल मैच के बीच भयानक आतंकवादी हमला हुआ। क्लब, बार और मैदान पर कोहराम मच गया। आईएसआईएस ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। इस हमले में 90 फ्रांसिसी मारे गए थे। फ्रांस ने इस घटना के बाद आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया था, सीरिया पर हमले भी किए, लेकिन फ्रांस अभी भी आतंकवाद की चपेट से बाहर नहीं निकला। फ्रांस, इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं को लगभग हर महीने झेल रहा है। इसलिए मैक्रोन का यह कहना कि इस्लाम के नाम पर जो हो रहा है उससे दुनिया को खतरा उत्पन्न हो गया है, गलत नहीं है। खुद को और अपने हर नागरिक को बचाने और आतंकवादियों को खत्म करने का पूरा अधिकार मैक्रोन के पास है। जिस विचारधारा को लेकर फ्रांस में हमले हो रहे हैं उसका प्रतिकार और उस विचारधारा की आलोचना करना भी मैक्रोन का अधिकार है। लेकिन इस्लामिस्ट जेहाद के खिलाफ बोलने के बजाय पाकिस्तान और तुर्की फ्रांस को ही इस्लामीफोबिया के लिए जिम्मेदार ठहराने में लगे हैं। कोई मैक्रोन का सिर चाहता है तो कोई फ्रांस के सामानों का बहिष्कार चाहता है। फ्रांस और राष्ट्रपति मैक्रोन के विरोध पीछे केवल उनका बयान नहीं है, बल्कि वह कानून है, जिसको दिसंबर में लाने की घोषणा मैक्रोन ने की है। फ्रांस 1905 के उस कानून में बदलाव करने जा रहा है, जिसके तहत चर्च और मस्जिद समेत उन तमाम मजहबी संगठनों के वित्तीय पोषण पर रोक लग सकती है, जिन्हें विदेशों से धन प्राप्त होता है। इस कानून के बाद फ्रांस में मुस्लिम संगठनों के उन मदरसों पर रोक लग सकती है, जो निजी तौर पर मुस्लिम बच्चों को कुरान और हदीस की शिक्षा दे रहे हैं। उन इमामों और मुल्लों पर भी प्रतिबंध लग सकता है जो विदेशों से आकर स्थानीय इमामों को ट्रेनिंग आदि देते हैं। मैक्रोन की इस घोषणा से फ्रांस के मौलवियों और इमामों में भी बेचैनी है और मैक्रोन के इस प्रयास को मुस्लिम बच्चों के खिलाफ बता रहे हैं। लेकिन मैक्रोन ने ऐलानिया तौर पर कहा है कि वह फ्रांस में रह रहे मुसलमानों को बाहरी इस्लामिक दुनिया के प्रभाव से मुक्त कर के दम लेंगे। तुर्की और पाकिस्तान की बेचैनी का एक कारण यह भी है कि फ्रांस में जाकर बसने वाले मुसलमानों में एक बड़ी संख्या इन दोनों देशों के नागरिकों की भी है। वैसे फ्रांस में मुस्लिम शरणार्थियों का बड़े पैमाने पर आगमन 1960 और 1970 के दशक में ही हो गया था, लेकिन उस समय ज्यादातर मुस्लिम फ्रांस में रोजी रोटी के लिए गए थे। उनमें महिलाओं की संख्या काफी कम थी। फ्रांस में जाकर नौकरी करने वालों मुसलमानों में मुख्य रूप से अल्जीरिया और उत्तरी अफ्रीका के लोग थे। लेकिन 1976 में फ्रांस ने एक कानून पास कर प्रवासी मुसलमानों को न सिर्फ फ्रांस की नागरिकता दे दी, बल्कि उनके होम कंट्री से परिवार को लाने और वहां बसाने का भी अधिकार दे दिया। उन्हें यह पता नहीं था कि एक दिन उनके कदम उनके लिए ही खतरा बन जाएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार सीरिया में आईएसआईएस के लिए लड़ने वालों में लगभग 900 ऐसे भी थे जो फ्रांस से गए थे। 2019 में इराक के एक कोर्ट ने चार फ्रेंच नागरिकों को आईएसआईएस के लिए लड़ने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी। अल्जीरिया, मोरक्को और ट्यूनिशिया के मुसलमानों के साथ साथ बड़े पैमाने पर सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रवासी भी इन गतिविधियों में शामिल होने लगे हैं। फ्रांस हालांकि एक सेकुलर देश है। 1905 में ही एक कानून के जरिए शासन प्रशासन में चर्च की दखल को खत्म कर दिया गया, लेकिन फ्रांस की सरकारों ने मुसलमानों के प्रति बेहद उदार रवैया अपनाया। फ्रांस में कानून के विपरीत जाकर मुस्लिम काउंसिल की स्थापना की गई। फ्रांस की मस्जिदों के इमाम आर्म्स जेहाद की वकालत करने लगे हैं। कैथोलिक स्कूलों के साथ साथ इस्लामिक स्कूलों की स्थापना को भी मंजूरी दे दी गई। फ्रांस में इस समय 2300 मस्जिदें हैं और लगभग 250 और मस्जिदें बनाई जा रही हैं। फ्रेंच मुस्लिम काउंसिल की मांग है कि मस्जिदों की संख्या अभी के मुकाबले दुगनी होनी चाहिए। अब जबकि फ्रांस को इस बात के साक्ष्य मिल गए हैं कि मस्जिदों से ही अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है तो कुछ मस्जिदों को बंद करने का आदेश दिया जा रहा है। लगभग 20 मस्जिदें बंद कर दी गई हैं। फ्रांस को इस बात का बहुत देर से अहसास हुआ कि उनकी धरती का इस्तेमाल पूरी दुनिया में आतंकवाद फेलाने के लिए किया जा रहा है। फ्रेंच इंटेलिजेंस लगभग 15 हजार अपने मुस्लिम नागरिकों और शरणार्थियों पर नजर रखे हुए है जिनकी भूमिका संदिग्ध है। आतंकवाद की घटनाओं में शामिल मुसलमानों से फ्रांस की जेलें भर गई हैं। जब अक्टूबर 2020 में एक जेहादी ने शिक्षक का सर कलम कर दिया तब जाकर मैक्रोन ने इस्लामिक अलगाववाद के खिलाफ मोर्चा खोला। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 29 October 2020


bhopal, Inhuman practice of manual scavenging

प्रियंका सौरव किसी मनुष्य के मलमूत्र की साफ-सफाई के लिए व्यक्ति विशेष को नियुक्त करने की व्यवस्था सर्वथा अमानवीय है। इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए। इसके बावजूद यह व्यवस्था न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी जड़ें जमाए रही। अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर चर्चा हो रही है तो यह जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। महात्मा गांधी ने 1917 में इस कुप्रथा का विरोध करते हुए व्यवस्था दी थी कि साबरमती आश्रम में रहने वाले सदस्य अपने शौचालय को खुद ही साफ करेंगे। इसके बाद महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया था और इसे खत्म करने की मांग की थी। ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के सुझाव दिए थे। मैला ढोने के हालातों की जांच के लिए बनी एक अन्य समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था। हम देशभर में सफाई के लिए सेप्टिक टैंक और नालियों में मानव प्रवेश के कारण हुई मौत की ख़बरें सुनते हैं। ऐसी दुखद घटनाओं को समाप्त करने के उद्देश्य से आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने गैर-सरकारी संगठनों से इसके उपयुक्त समाधान की तलाश के लिए एक प्रौद्योगिकी चुनौती शुरू की है। जिससे देश में सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई में मानव हस्तक्षेप की जगह नवीनतम तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सके। सेप्टिक टैंक और नालियों की सफाई करने वालों के अलावा मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) भी इस काम में लगे लोगों के लिए अभिशाप बन गई है। मैनुअल स्कैवेंजिंग का तात्पर्य किसी भी तरीके से मैन्युअल रूप से सफाई करने, शुष्क शौचालयों और सीवरों से मानव उत्सर्जन ले जाने, निपटाने या संभालने के अभ्यास से है। 28 साल पहले कानून के माध्यम से इसपर प्रतिबंध लगाने एवं तकनीकी प्रगति के बावजूद, मानव अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता पैदा करने वाली, मैनुअल स्कैवेंजिंग भारत में बनी हुई है। 2015 में जारी सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 18 मिलियन मैनुअल मैला ढोने वाले घर थे। अधिकांश सेप्टिक टैंक मैन्युअल रूप से भारतीय शहरों में खाली किए जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के 80% सीवेज क्लीनर विभिन्न संक्रामक रोगों के कारण 60 की उम्र से पहले मौत के शिकार हो जाते हैं। ये दुर्घटनाएँ शहरी इलाकों में अधिक हैं। देश के 8000 शहरी क्षेत्र हैं और 6 लाख गाँव के बड़े हिस्से में सीवेज प्लांट नहीं है। मैनुअल स्केवेंजिंग मुख्य रूप से जाति व्यवस्था से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। इस सबसे अमानवीय पेशे को खत्म करने के लिए समाज द्वारा समर्थन का अभाव भी इसके बने रहने के पीछे एक कारण है। इनके बारे में सटीक सर्वे भी नहीं हो पा रहा है क्योंकि डेटा स्व-रोजगार लेने के लिए मैनुअल मैला ढोने वालों की जानकारी सामाजिक अभिशाप की वजह से सामने नहीं आ पाती। इसके लिए सरकारी पहल की सख्त जरूरत है। 1993 में संसद द्वारा ड्राई स्केवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिंस (निषेध) अधिनियम को पारित किया गया था, जिसके तहत एक व्यक्ति को मैनुअल स्कैवेंजिंग करने के लिए एक वर्ष तक का कारावास और 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। मैनुअल स्कैवेंजर्स (एसआरएमएस) के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना, समयबद्ध तरीके से एक उत्तराधिकारी योजना (स्केवेंजर्स और उनके आश्रितों की मुक्ति और पुनर्वास के लिए राष्ट्रीय योजना), 2007 में वैकल्पिक स्कैवेंजरों और उनके आश्रितों को वैकल्पिक व्यवसायों में पुनर्वासित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। मैनुअल स्कैवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 के रूप में रोजगार का निषेध 2013 से प्रभावी हुआ। यह अधिनियम मैनुअल स्केवेंजर्स के रूप में रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। अधिनियम में कहा गया है कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी करेगा और अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के बारे में शिकायतों की जांच करेगा। प्रावधान के तहत, किसी भी व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकरण या एजेंसी को सीवरों और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफाई के लिए लोगों को संलग्न या नियोजित नहीं करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने प्रैक्टिस को रोकने और नियंत्रित करने और अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए 2014 में कई दिशा-निर्देश जारी किए। सेप्टिक टैंकों की मशीनीकृत सफाई निर्धारित मानदंड है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 राज्यों ने ही सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध के कानून को अपनाया है और किसी ने भी इसे पूरी तरह लागू नहीं किया है। श्रम मंत्रालय के ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति कानून’ को भी सिर्फ 6 राज्यों ने लागू किया है। इसलिए अब आगे ऐसा न करके एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो आय सृजन का विस्तार करने या ऋण प्रदान करने से आगे बढ़े, जिससे मुक्त मैनुअल मैला ढोने वालों की अगली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित किया जा सके। स्वच्छ भारत अभियान जैसे ऑपरेशन में इस पहलू पर ध्यान देना आवश्यक है। मेनहोल में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के लिए तकनीकी उन्नति का सहारा लिया जाये। ऐसे कार्यों में लगे लगे लोगों के कलंक और भेदभाव से इतर आजीविका को सुरक्षित करने के लिए पूर्व या मुक्त मैनुअल मैला ढोने वालों के लिए तरीका ढूँढा जाये। इनके पुनर्वास के लिए बजट समर्थन और उच्च आवंटन का प्रभावी उपयोग एवं प्रबंध किया जाये। मेनहोल में आखिर क्यों उतरना पड़ता है, इस स्थिति के लिए जिम्मेदार लोगों को पकड़ा जाये और उनपर जुर्माना लगाया जाये। स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण भारत में लाखों सेप्टिक टैंक बनाए जा रहे हैं। इनको आधुनिक तकनीक पर बनाया जाये ताकि भविष्य में मानव हस्तक्षेप की कम जरूरत पड़े। हमें मैला प्रथा के मूल कारणों पर प्रहार करने की आवश्यकता है। इसलिए अब स्मार्ट शहरों को नियमावली को ध्यान में रखते हुए योजना बनाई जानी चाहिए। महिलाओं को कौशल विकास और आजीविका प्रशिक्षण प्रदान करके भेदभाव मुक्त, सुरक्षित और वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए। सामुदायिक जागरूकता और स्थानीय प्रशासन की संवेदनशीलता के माध्यम से अनुकूल वातावरण बनाएं जाने की भी जरूरत है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 28 October 2020


bhopal,What relationship , pakistan

आर.के. सिन्हा पाकिस्तान के विपक्ष का भारत से भी कोई संबध है? भले इस तरह की बात न हो क्योंकि भारत का किसी अन्य मुल्क के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का इरादा कभी रहा नहीं। पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की खासमखास कैबिनेट मंत्री शिरिन मजारी को यही लगता है। विगत 26 अक्तूबर को उन्होंने पाकिस्तान की संसद में आरोप लगाया कि पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का भारत से संबंध है। दरअसल पाकिस्तान में सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने मिलकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का गठन किया है। यह पीडीएम मोर्चा इमरान सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है और उनके इस्तीफे की खुलकर माँग कर रहा है। मानवाधिकार मामलों की पाकिस्तानी मंत्री मजारी कहती हैं कि जब (अजीत) डोभाल भारत से जंग की धमकी दे रहे हैं, उसी समय ही पीडीएम के कुछ नेता बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने लगे हैं और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की चाहत है कि पाकिस्तानी सेना में विद्रोह हो जाए। इसे दिवा स्वपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। मजारी ने अपने ट्वीट में यहां तक कहा कि "क्या भारत के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल और पीडीएम का एक जैसी बातें करना मात्र संयोग है।" मजारी का भारत को इस विवाद में घसीटना साबित करता है कि पाकिस्तान में आतंरिक स्थितियां बेकाबू, बेहद विस्फोटक और इमरान सरकार के प्रतिकूल हो चुकी हैं। पीडीएम अब पूरे पाकिस्तान में इमरान सरकार की हरकतों को उजागर कर रहा है। मजारी का इन खराब हालातों में भारत को लाने के पीछे मोटा-मोटी उद्देश्य यही है कि पाकिस्तानी विपक्ष के साथ-साथ भारत को भी बदनाम किया जा सके। दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के एक हालिया बयान से दुश्मन मुल्कों की नींद उड़ी हुई है। डोभाल ने उत्तराखंड के हरिद्वार में बीते दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि किसी की इच्छा पर नहीं, बल्कि भारत अपनी जरूरत या खतरे को देखकर युद्ध करेगा। अजित डोभाल के बयान से दुश्मन मुल्क पूरी तरह सहम गए हैं। विजयादशमी के मौके पर अजित डोभाल ने कहा-'हम वहीं लड़ेंगे जहां से हमें खतरा आ रहा है। हम उस खतरे का मुकाबला वहीं जाकर करेंगे। हम युद्ध तो करेंगे पर अपनी जमीन पर भी कर सकते हैं और बाहर भी करेंगे। लेकिन, यह हमें अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं परमार्थ के लिए करना पड़ेगा।' डोभाल के बयान से पाकिस्तानी हुक्मरानों की तो रातों की नींद उड़ गई है। मजारी के बयान से पाकिस्तान सरकार की इस चिंता को समझा जा सकता है। इस बीच, पाकिस्तान के शहर पेशावर में पिछले मंगलवार को भयानक बम विस्फोट हो गया है। इसमें लगभग 10 लोगों के मारे जाने और बहुत से लोगों के घायल होने की भी खबर है। विस्फोट को रिमोट से नियंत्रित किया गया था और घटना में जिस बम का इस्तेमाल किया गया, वह देसी बताया गया है। हमले में खासतौर पर पाक-पुलिस को निशाना बनाया गया था। मतलब साफ है कि पाकिस्तान बेहद बुरे संकट के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ कोविड-19 का असर और दूसरी तरफ पीडीएम का आंदोलन। पीडीएम के एक बड़े नेता का बलूचिस्तान की आजादी की मांग करना सच में किसी सामान्य घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इमरान खान बलूचिस्तान सूबे में विद्रोह की आहट को समझ ही नहीं पाए या समझकर भी आँखें मूंदकर बैठे रहे। बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी नाम का संगठन किसी सूरत में पाकिस्तान से अपने बलूचिस्तान को अलग कराना चाहता है। उसे सूबे की बहुमत जनता का आशीर्वाद हासिल है। इसके लिए यह संगठन अब हिंसक रास्ते पर भी चल पड़ा है। उसे पीडीएम के नेता की मांग से बल भी मिलेगा। आपको याद होगा कि इसी ने कुछ हफ्ते पहले कराची के स्टॉक एक्सचेंज बिल्डिंग में भी एक आतंकी हमले को अंजाम दिया था। स्टॉक एक्सचेंज में हुए आतंकी हमले में करीब दस लोगों की जानें गई थी। हमलावरों ने वहां ग्रेनेड से हमला किया था। तब से इमरान खान अपने देश की संसद में बेशर्मी से दावा कर रहे हैं कि कराची में आतंकी घटना के पीछे भारत का हाथ है। अब उनकी एक मंत्री मजारी भी अपने देश के विपक्ष और भारत के बीच संबंध स्थापित करवा रही हैं। इमरान को अपने देश के विपक्ष की मांगों और उनके आंदोलन को गंभीरता से लेने की जरूरत है न कि भारत पर मिथ्या आरोप लगाकर जनता को गुमराह करने की। इमरान खान विपक्षी पार्टियों की एकजुटता पर हमला करते हुए उन्हें "डाकुओं की एकता" तक कह रहे हैं। हालांकि इमरान सरकार विपक्ष को यथा संभव डरा-धमका रही हैI लेकिन, विपक्ष सरकार की धमकियों से घबरा नहीं रहा है और इमरान खान पर उसके हमले कम नहीं हो रहे हैं बल्कि हर दिन बढ़ते जा रहे हैं। इमरान खान अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर खासतौर पर हमले बोल रहे हैं। नवाज शरीफ को पाकिस्तान के कठमुल्ले भी भारत का ही आदमी बताते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि नवाज शरीफ ने 2008 के मुंबई हमलों के लिए परवेज मुशर्रफ को जिम्मेदार बताया था। इमरान खान तो यहां तक कह गए थे कि 2008 में भारत ने मुंबई में खुद हमला करवाया था। देख लें इमरान का घटियापन। मुंबई में हुए उस खूनी हमले को 12 साल से ज्यादा हो रहे हैं, पर पाकिस्तान अबतक उस कत्लेआम के गुनाहगारों को सजा तक दिलवा नहीं पाया है। वैसे वहां उन हमलों के आरोपियों पर नाम भर के लिये केस चल रहे हैं। इमरान खान से जरा यह भी पूछा जाना चाहिए कि मुंबई हमला भारत ने करवाया तो उसके आरोपियों के खिलाफ पाकिस्तान में केस क्यों चल रहा है? वे यह भी बता दें कि अजमल कसाब कौन था और कहाँ का रहने वाला था? चूंकि इमरान खान सच के साथ कभी खड़े नहीं होते इसलिए शायद उन्हें अशांत बलूचिस्तान की स्थिति की वजह समझ नहीं आ रही है। वहां बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी चुन-चुनकर पाकिस्तानी पंजाबियों को मार रही है। सवाल यह है कि पंजाबियों को बलूचिस्तान में किस कारण से निशाना बनाया जा रहा है? क्या यह भी भारत ही करवा रहा है। पाकिस्तान के हालात को लेकर पिछले दिनों यह भी आशंका जताई जा रही थी कि वहां सेना जल्द ही इमरान सरकार का तख्ता पलट देगी। इस तरह की राय रखने वाले पाकिस्तान की जमीनी हकीकत से शायद वाकिफ नहीं हैं। वहां अभी भी सेना ही सत्ता पर काबिज है। इमरान खान को तो सेना ने जनता को मूर्ख बनाने के लिए कठपुतली प्रधानमंत्री बनवा दिया था। फिलहाल एक बात मानकर चलिए कि वहां आतंरिक हालात जैसे-जैसे बिगड़ेंगे वैसे-वैसे इमरान खान, मजारी और सरकार के अन्य प्रमुख नेता भारत को ही दोष देते रहेंगे। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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Dakhal News 28 October 2020


bhopal, The specter of pollution on childhood

योगेश कुमार गोयल प्रदूषण ऐसी वैश्विक समस्या बन चुका है, जिससे दुनियाभर में अनेक तरह की खतरनाक बीमारियां जन्म ले रही हैं। इन बीमारियों की चपेट में आकर लाखों लोग हर साल असमय काल के गाल में समा रहे हैं। भारत में भी वायु प्रदूषण का प्रभाव खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। देश में और खासकर उत्तर भारत में पराली जलाने तथा कई अन्य इंसानी कारकों के कारण वायु प्रदूषण का स्तर इन दिनों खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। कमोबेश सर्दियों की शुरूआत के समय हर साल वायु प्रदूषण के कारण ऐसे ही चिंताजनक हालात देखने को मिलते हैं। हाल ही में आई वायु प्रदूषण की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण जहां पूरी दुनिया में 4.76 लाख बच्चों की मौत हुई, वहीं अकेले भारत में एक महीने से भी कम आयु के 1.16 लाख नवजातों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हो गई। हालांकि नवजात शिशुओं की अधिकांश मौतें जन्म के समय कम वजन और समय से पहले जन्म से संबंधित जटिलताओं के कारण हुई लेकिन वायु प्रदूषण अब नवजातों की मौतों का दूसरा सबसे बड़ा खतरा बन रहा है, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन ‘हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट’ (एचईआई) द्वारा 21 अक्तूबर को दुनिया पर वायु प्रदूषण के असर को लेकर रिपोर्ट जारी की गई है, जिसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है। ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ नामक इस वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक देश में बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण के लंबे समय के प्रभाव के कारण 2019 में स्ट्रोक, दिल के दौरे, डायबिटीज, फेफड़े के कैंसर, फेफड़ों की बीमारियों और नवजात रोगों के कारण ये मौतें हुई। रिपोर्ट के अनुसार इनमें आधी से भी ज्यादा मौतों का संबंध बाहरी पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व से है जबकि बाकी मौतें कोयला, लकड़ी और गोबर से बने ठोस ईंधन के कारण होने वाले वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण अब मौत के लिए सबसे बड़े खतरे वाला कारक बन गया है। नए विश्लेषण में अनुमान जताया गया है कि नवजातों में 21 फीसदी मौत का कारण घर और आसपास का वायु प्रदूषण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2018 में ‘एयर पोल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी, जिसमें कहा गया था कि वर्ष 2016 में दुनियाभर में वायु प्रदूषण के कारण पांच वर्ष से कम आयु के छह लाख बच्चों की मृत्यु हुई थी और उनमें से एक लाख से भी अधिक बच्चे भारत के थे। वायु प्रदूषण के कारण नवजात शिशुओं की सर्वाधिक मौतें अफ्रीका तथा एशिया में होती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में करीब नब्बे फीसदी बच्चे, जिनकी कुल संख्या लगभग 1.8 अरब है, ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है। भारत जैसे विकासशील देशों में तो स्थिति और भी खराब है, जहां करीब 98 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक प्रदूषित माहौल में रहते हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भी विश्वभर में करीब दो अरब बच्चे खतरनाक वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें से 62 करोड़ दक्षिण एशियाई देशों में हैं। वायु प्रदूषण से बच्चों के मस्तिष्क और दूसरे अंगों पर भी प्रभाव पड़ता है। जून 2018 में यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि भारत में लगभग सभी स्थानों पर वायु प्रदूषण निर्धारित सीमा से अधिक है, जिससे बच्चे सांस, दमा तथा फेफड़ों से संबंधित बीमारियों और अल्प विकसित मस्तिष्क के शिकार हो रहे हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु में से दस फीसदी से अधिक की मौत वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाली सांस संबंधी बीमारियों के कारण होती हैं। एचईआई (हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट) के अध्यक्ष डैन ग्रीनबाम का कहना है कि किसी नवजात का स्वास्थ्य किसी भी समाज के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होता है और इन नए साक्ष्यों से दक्षिण एशिया और अफ्रीका में नवजातों को होने वाले अधिक खतरे का पता चलता है। ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ रिपोर्ट के मुताबिक गर्भ में पल रहे शिशुओं पर भी वायु प्रदूषण का घातक असर पड़ता है। इससे समय से पूर्व प्रसव या फिर कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं और ये दोनों ही शिशुओं में मृत्यु के प्रमुख कारण हैं। अत्यधिक प्रदूषण में पलने वाले बच्चे अगर बच भी जाते हैं, तब भी उनका बचपन अनेक रोगों से घिरा रहता है। वायु प्रदूषण से नवजातों की मौतों में से दो तिहाई मौतों का कारण घरों के अंदर का प्रदूषण है। विश्व स्तर पर वाहनों से उत्सर्जित गैसों और पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन पर तो बहुत चर्चा होती है लेकिन घरों के अंदर के प्रदूषण के स्रोतों पर अक्सर कोई चर्चा नहीं होती। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों के मुताबिक खाना पकाने, साफ-सफाई तथा घर के अन्य सामान्य कामकाजों के दौरान पार्टिकुलेट मैटर और वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउंड्स (वीओसी) उत्पन्न होते हैं, जो प्रदूषण के कारक बनते हैं। पार्टिकुलेट मैटर खाना पकाने और साफ-सफाई के दौरान उत्पन्न होते हैं जबकि शैम्पू, परफ्यूम, रसोई और सफाई वाले घोल वीओसी के प्रमुख स्रोत हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस प्रकार के तत्व विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा कैंसरकारक भी होते हैं। घरों में वायु प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभावों का सबसे बड़ा कारण आजकल अधिकांश घरों में विभिन्न घरेलू कार्यों में तरह-तरह के रसायनों का बढ़ता उपयोग माना जा रहा है। ऐसे ही रसायनयुक्त पदार्थों के बढ़ते चलन के कारण घरों के अंदर फॉर्मेल्डीहाइड, बेंजीन, एल्कोहल, कीटोन जैसे कैंसरजनक हानिकारक रसायनों की सांद्रता बढ़ जा रही है, जिनका बच्चों के स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ता है। विभिन्न अध्ययनों में ये तथ्य सामने आ चुका है कि घरों के भीतर का प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। बहरहाल, वायु प्रदूषण के बच्चों पर पड़ते दुष्प्रभावों और हर साल वायु प्रदूषण के कारण हो रही लाखों बच्चों की मौतों को लेकर पूरी दुनिया को अब संजीदगी से विचार मंथन करने और ऐसे उपाय किए जाने की आवश्यकता है, जिससे मासूम बचपन प्रदूषण का इस कदर शिकार न बने। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 October 2020


bhopal, Political corruption in Ravan Dahan too

सियाराम पांडेय 'शांत' त्योहार पहले भी मनाए जाते थे। आज भी मनाए जाते हैं और आगे भी मनाए जाते रहेंगे। इसकी वजह यह है कि भारत उत्सवधर्मी देश है। उमंग और उल्लास में जीने वाला देश है। जल्दी से जल्दी दुखों और परेशानियों से बाहर निकलना जानता है। भारत सकारात्मकता में यकीन रखता है। इस देश में त्योहार पहले उत्साह और सादगी से मनाए जाते थे। अब त्योहारों पर बाजार का रंग चढ़ गया है। बाजार नवोन्मेष चाहता है। नवोन्मेष में संदेश हो सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि वह यथार्थ भी हो। नवोन्मेष में बनावटीपन और खिलंदड़पन भी होता है। ऐसे में त्योहार इस प्रवृत्ति के अपवाद कैसे हो सकते हैं? अब हर त्योहार नवोन्मेष के साथ मनता है। त्योहार बाद में आता है, उसके मनाने की योजना पहले बन जाती है। हर कोई एक-दूसरे से अलग और बेहतर ढंग से त्योहार मनाना चाहता है। दशहरा का त्योहार भी इसबार कुछ इसी तरह के नवोन्मेष के बीच मनाया गया। पहले रावण, कुंर्भकर्ण और मेघनाद के पुतले जलते थे। बाद के वर्षों में इन पुतलों का आकार बढ़ता गया। उसकी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई बढ़ती गई, बिल्कुल आदमी के अहंकार की तरह। रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण की जगह बुराइयों के नाम दिए जाने लगे। समस्याओं के नाम दिए जाने लगे। बाद में इनके बहाने संदेशों की राजनीति होने लगी और इस साल तो गजब ही हो गया। पंजाब में कुछ लोगों ने रावण के पुतले के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुखौटा लगाकर उसे फूंक दिया। कुंभकर्ण और मेघनाद की जगह ली मुकेश अंबानी और गौतम अडानी ने। दशहरा वाले दिन एक तरफ जहां नरेंद्र मोदी को रावण साबित कर, उनका पुतला जलाने की कोशिश हो रही थी, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के साथ अपने मन की बात साझा कर रहे थे। उन्हें त्योहार मनाने का फलसफा बता रहे थे। विषम परिस्थितियों में भी उल्लास और हौसले के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे थे। 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की भावभूमि से देश को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की उस छवि की खुद कल्पना कर रहे थे और देश को सरदार पटेल की वह छवि दिखा रहे थे जिसमें लौहपुरुष राजे-रजवाड़ों से बात कर रहे थे, पूज्य बापू के जन-आंदोलन का प्रबंधन कर रहे थे और इसके साथ ही, अंग्रेजों से भी लड़ रहे थे। नरेंद्र मोदी अपने मन की बात कार्यक्रम में लौहपुरुष के 'सेंस ऑफ ह्यूमर' का जिक्र कर देशवासियों को नसीहत दे रहे थे कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, अपने 'सेंस ऑफ ह्यूमर' को जिंदा रखिये, यह हमें सहज तो रखेगा ही, समस्याओं के समाधान में भी हमारी मदद करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों को अपनी वाणी, व्यवहार और कर्म से हर पल उन सब चीजों को आगे बढ़ाने की बात कर रहे थे जो हमें 'एक' करने, देश के एक भाग में रहने वाले लोगों के मन में दूसरे कोने में रहने वाले नागरिक के लिए सहजता और अपनत्व का भाव पैदा करने की सलाह दे रहे थे, वहीं कुछ लोग पंजाब में उनका पुतला रावण के रूप में जला रहे थे। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाएगा? वहीं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष इसे सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे। वे प्रधानमंत्री को किसानों की बात सुनने की अपील कर रहे थे और तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब के किसानों के गुस्से को खतरनाक बता रहे थे। राहुल गांधी ने यहां तक कहा कि पंजाब में किसानों ने दशहरे के अवसर पर प्रधानमंत्री के पुतले जलाकर अपने गुस्से का इजहार किया और यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। वे पंजाब में किसान आंदोलन और तेज होने की भी धमकी दे रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कार्यक्रम में पुलवामा के स्लेट और पेंसिल का जिक्र कर देश को यह बताने की कोशिश की है कि देश के शैक्षणिक विकास में पुलवामा की अहमियत क्या है? उसका योगदान क्या है? वे देश को यह बताने-जताने की कोशिश कर रहे थे कि जम्मू-कश्मीर को आतंक पट्टी के रूप में देखने वालों को उसे शिक्षण पट्टी के रूप में भी देखना चाहिए। उन्होंने कहा है कि कश्मीर घाटी, पूरे देश की करीब 90 फ़ीसदी लकड़ी की पट्टी की मांग को पूरा करती है और उसमें बहुत बड़ी हिस्सेदारी पुलवामा की है। एक समय हम विदेशों से पेंसिल के लिए लकड़ी मंगवाते थे लेकिन अब हमारा पुलवामा, इस क्षेत्र से, देश को आत्मनिर्भर बना रहा है। दशहरा पर्व असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है लेकिन ये संकटों पर धैर्य की जीत का पर्व भी है। हम जिस तरह से आज कोरोना काल में संयम के साथ जी रहे हैं और मर्यादा के साथ पर्व मना रहे हैं इसलिए कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हमारी जीत सुनिश्चित है। आगे आने वाले ईद ,शरद पूर्णिमा, वाल्मीकि जयंती, धनतेरस, भाईदूज, गुरुनानक देव की जयंती और छठ जैसे पर्व में भी हमें कोरोना के संकटकाल में इसी संयम और मर्यादा से काम लेना है। उन्होंने देशवासियों से अपील की है कि वे त्योहार मनाते समय सीमाओं पर तैनात सैनिकों तथा रोजमर्रा के जीवन में उनकी मदद करने वाले कामगारों को भी अपनी खुशियों में शामिल करें और दीवाली पर एक दीपक उनके नाम का भी जलाएं। ऐसे में पंजाब में रावण के यप में प्रधानमंत्री का पुतला जलाया जाना कितना उचित है, इसे लेकर देश में राजनीतिक बहस-मुबाहिसों का दौर शुरू हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने इस घटना को राहुल गांधी द्वारा निर्देशित शर्मनाक नाटक करार दिया है। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा है कि ऐसा नाटक अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि नेहरू-गांधी राजवंश ने कभी प्रधानमंत्री कार्यालय का सम्मान नहीं किया। वर्ष 2004 से 2014 तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के अधिकार को संस्थागत तौर पर कमज़ोर करते हुए देखा गया। वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा है कि निराशा और बेशर्मी का मेल खतरनाक है। कांग्रेस के पास दोनों है। जहां पार्टी में राहुल गांधी घृणा, क्रोध, झूठ और आक्रामकता की राजनीति दिखाते हैं वहीं उनकी मां सोनिया गांधी शालीनता और लोकतंत्र की सिर्फ बयानबाजी करके इसका पूरक बनती हैं। ये कांग्रेस पार्टी के दोयम दर्जे को दिखाता है। इस वंश को एक व्यक्ति से अधिक नफरत है जो गरीबी में पैदा हुआ और देश का प्रधानमंत्री बना। यह भारत देश में ही संभव है कि यहां लोकतंत्र के नाम पर,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रधानमंत्री को कुछ भी कहा जा सकता है। मौजूदा समय देश को हतोत्साहित करने का नहीं, कदम-कदम पर उसे प्रेरित करने, उसका मनोबल बनाए रखने का है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वास्तविकता को जानते हैं। देश में रावण की तलाश तो यह देश कर लेगा लेकिन अभी समय कोरोना के इस आपातकाल में अपने और अपने परिवार को सुरखित रखते हुए व्यापार, व्यवसाय, शिक्षा और स्वास्थ्य की गाड़ी को पटरी पर लाना है। यह समय राजनीतिक विभ्रम में फंसने का नहीं, बल्कि वह करने का है जिससे धर्म और जाति के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वालों का चूल्हा बुझे। मौजूदा समय सोच-समझकर आगे बढ़ने और किसी के झांसे में न आने का है। रावण दहन का मतलब है कि हम अपने मन के बुरे भावों को विनष्ट करेंगे। रावण दहन में राजनीतिक कलुषता तो किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। काश, हम इस युगसत्य को समझ पाते। त्योहार को त्योहार की तरह मनाते। उसमें अनावश्यक राजनीति का घालमेल तो न करते। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 27 October 2020


bhopal, Rein in both extremists

डॉ. वेदप्रताप वैदिक फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों को लेकर जो हत्याकांड पिछले दिनों हुआ, उसका धुऑं अब सारी दुनिया में फैल रहा है। सेमुएल पेटी नामक एक फ्रांसीसी अध्यापक की हत्या अब्दुल्ला अजारोव नामक युवक ने इसलिए कर दी थी कि उस अध्यापक ने अपनी कक्षा में छात्रों को मोहम्मद साहब के कार्टून दिखा दिए थे। अब्दुल्ला की भी फ्रांसीसी पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी। अब यह मामला इतना तूल पकड़ रहा है कि फ्रांस समेत यूरोपीय राष्ट्रों में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारी-भरकम प्रदर्शन हो रहे हैं और इस्लामी उग्रवादियों पर तरह-तरह के प्रतिबंधों की मांग की जा रही है। उधर दुनिया के कई इस्लामी राष्ट्र हैं, जो फ्रांस पर बुरी तरह से बरस रहे हैं और अभिव्यक्ति की इस स्वच्छंदता की भर्त्सना कर रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब एरदोगन ने कहा है कि फ्रांस के राष्ट्रपति अपनी दिमागी जांच कराएं। (कहीं वे पागल तो नहीं हो गए हैं) क्योंकि वे कहते हैं कि इस्लाम फ्रांस के भविष्य को चौपट करनेवाला है। उन्होंने फ्रांसीसी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील कर दी है। ऐसी ही अपीलें मलेशिया- जैसे अन्य मुस्लिम राष्ट्र भी कर रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने जरा बेहतर प्रतिक्रिया की है। उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमेनुएल मेक्रो से कहा है कि उन्हें इस्लाम-द्रोह फैलाने की बजाय इस दुखद मौके पर ऐसी वाणी बोलनी चाहिए थी, जिससे लोगों के घावों पर मरहम लगता और आतंकवादी कोई भी होता, चाहे वह मुस्लिम या गोरा नस्लवादी या नाजी होता, भड़कता नहीं। उनके बयान आग में तेल का काम कर रहे हैं। एक तरफ मुस्लिम नेताओं और संगठनों के ऐसे बयान आ रहे हैं और दूसरी तरफ यूरोप के शहरों में पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों के पोस्टर बना-बनाकर दीवारों पर चिपकाए जा रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ देशों के फ्रांसीसी नागरिकों पर भी जानलेवा हमले शीघ्र ही सुनने में आएं। ये दोनों तेवर मुझे अतिवादी लगते हैं। यदि मुसलमान लोग पैगंबर के चित्र या कार्टून बनाने के विरुद्ध हैं तो उनका सम्मान करने में आपका क्या बिगड़ रहा है ? पैगंबर के कार्टून बनाने से क्या यूरोपीय लोगों को मोक्ष मिल रहा है? यही सवाल उन मुसलमानों से पूछा जा सकता है जो हिंदू मूर्तियों और मंदिरों को तोड़ते हैं? आप बुतपरस्ती मत कीजिए लेकिन क्या बुतशिकन होना जरूरी है? मुसलमान भाइयों से मैं यह भी कहता हूं कि यदि कुछ उग्रवादी लोग कुछ कार्टून या चित्र बना देते हैं तो उससे क्या इस्लाम का पौधा मुरझा जाएगा? क्या इस्लाम छुई-मुई का पेड़ है? इस्लाम ने अंधकार में डूबे अरब जगत में क्रांतिकारी प्रकाश फैलाया है। उसे ठंडा न पड़ने दें। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 27 October 2020


bhopal, India should not become someone

डॉ. वेदप्रताप वैदिक अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर 26-27 अक्तूबर को दिल्ली में हमारे विदेश और रक्षा मंत्री से मिलकर एक समझौता करेंगे, जिसका नाम है- 'बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता' (बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट)। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चल रही चीन की दादागीरी को पछाड़ना है। यह उसी तरह का सामरिक समझौता है, जैसे कि 2016 और 2018 में दोनों देशों के बीच हुए थे। इस समझौते के तहत भारत को अमेरिका ऐसी तकनीकी मदद करेगा, जिससे वह लद्दाख क्षेत्र में अपने प्रक्षेपास्त्रों और ड्रोनों की मार को बेहतर बना सकेगा। यह समझौता इसी वक्त क्यों किया जा रहा है? अब जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में मुश्किल से एक हफ्ता बचा है, यह समझौता करना खतरे से खाली नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप जीतेंगे या बाइडन, इसका कुछ पता नहीं है। सरकार पलटने पर इस तरह के समझौते भी खटाई में पड़ जाते हैं जैसे कि 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने पेरिस जलवायु समझौते की घोषणा कर दी। उस समय अमेरिका में ओबामा की सरकार थी। उस सरकार के उलटते ही डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को उस पेरिस समझौते से बाहर कर लिया। ट्रंप घनघोर राष्ट्रवादी और यथार्थवादी हैं। उन्होंने भारत के साथ सिर्फ उन्हीं मामलों में सहयोग किया है, जिनसे उनके देश को फायदा हो। भारत-अमेरिका व्यापार की समस्याएं ज्यों की त्यों है, भारतीयों को कार्य-वीजा की परेशानी बनी हुई है, रूसी प्रक्षेपास्त्र खरीद पर प्रतिबंधों का अड़ंगा अभीतक हटा नहीं है लेकिन ट्रंप-प्रशासन चाहता है कि चीन की घेराबंदी का सिपाहसालार भारत बन जाए। तोक्यो में हुई चौगुटे (अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, भारत) की बैठक में भारत ने अपने कदम बहुत ही फूंक-फूंककर रखे हैं। अब भी भारत को चीन से निपटने के लिए अमेरिकी मोहरा बनने से बचना होगा। चीन को घेरने के हिसाब से ये दोनों अमेरिकी मंत्री श्रीलंका और मालदीव भी जानेवाले हैं। उन्होंने तिब्बत पर भी शोर मचाना शुरू कर दिया है। यदि ट्रंप दुबारा राष्ट्रपति बन गए तो उनका कोई भरोसा नहीं कि वे क्या करेंगे? हो सकता है कि वे फिर चीन से गलबहियां मिला लें। भारत की सामरिक मजबूती जिन तरीकों से हो सकती है, सरकार उन्हें जरूर करे लेकिन वह यह भी ध्यान रखे कि भारत का चरित्र ऐसा है कि वह किसी नाटो, सीटो, सेंटो या वारसा-पैक्ट जैसे सैन्य-गुट का सदस्य कदापि नहीं बन सकता। (लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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Dakhal News 24 October 2020


bhopal,Dussehra

योगेश कुमार गोयल दशहरा अर्थात् विजयादशमी राष्ट्रीय त्योहार है, जो देशभर में धूमधाम से साथ मनाया जाता है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाए जाने के तौर-तरीकों में काफी भिन्नता देखी जाती है। कुछ स्थानों पर मनाया जाने वाला दशहरा रीति-रिवाजों अथवा परम्पराओं के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुका है। आइए देखते हैं, देश के विभिन्न क्षेत्रों में कैसे मनाया जाता है विजय और शौर्य का राष्ट्रीय पर्व दशहरा। कुल्लू का दशहरा देशभर में ही नहीं वरन् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बना चुका है। इस आयोजन को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग कुल्लू में एकत्रित होते हैं। विदेशों में ख्याति अर्जित कर चुका दशहरे का यह आयोजन देशभर के अन्य स्थानों के आयोजन से पूरी तरह भिन्न है। कुल्लू के दशहरे में न तो रामलीलाएं होती हैं और न ही रावण इत्यादि के पुतले जलाए जाते हैं बल्कि इस अवसर पर कुल्लू के विशाल मैदान में रघुनाथ जी का दरबार लगता है और कुल्लू घाटी के लोग अपने-अपने देवी-देवताओं के रथ सजाकर पैदल ही मैदान में रघुनाथ जी के दरबार में पहुंचते हैं। दशहरे के दिन रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है। यहां के इस आयोजन के बारे में मान्यता है कि कुल्लू के देवी-देवता रावण के अत्याचारों से बहुत त्रस्त थे और रघुनाथ जी ने रावण का वध करके इन देवी-देवताओं पर बहुत बड़ा उपकार किया था, इसलिए रघुनाथ जी के प्रति अपना आभार प्रकट करने के लिए इस दिन यहां के सभी देवी-देवता रघुनाथ जी के दरबार में उपस्थित होते हैं। विशेष बात यह है कि जिस दिन देशभर में दशहरा मनाए जाने के साथ ही इस उत्सव का समापन होता है, उसी दिन कुल्लू के दशहरे की शुरुआत होती है और यह आयोजन सात दिनों तक चलता है। अंतिम दिन जानवरों की बलि दी जाती थी लेकिन बलि देने की प्रथा अब सांकेतिक कर दी गई है। इस आयोजन के बारे में मान्यता है कि इसकी शुरूआत 17वीं शताब्दी में राजा जगतसिंह ने की थी। दशहरे के आयोजन पर पंजाब के अमृतसर में खास उत्साह देखा जाता है। यहां रामलीला के दिनों में ढोलक की थाप पर हनुमान का रूप धरे बच्चों की टोलियां नाचती-गाती नजर जाती हैं और शहर का पूरा वातावरण हनुमानमय प्रतीत होता है। पंजाबी वेशभूषा में लाल कपड़े पहने और हाथ में छोटी-छोटी गदाएं लिए बच्चों की ये वानर सेनाएं अद्भुत नजारा पेश करती हैं। दरअसल माना जाता है कि अश्वमेध यज्ञ के दौरान जब श्रीराम द्वारा छोड़े गए यज्ञ के घोड़ों को लव-कुश ने पकड़ लिया था तो अमृतसर की ही पावन धरती पर घोड़ों को लव-कुश से छुड़ाने के लिए श्रीराम ने हनुमान को यहां भेजा था। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, काशी, लखनऊ इत्यादि क्षेत्रों में दशहरे की विशेष धूम देखी जाती है। यहां होने वाली रामलीलाओं का स्वरूप तो भगवान श्रीराम की जीवनलीला पर ही आधारित है और दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण व मेघनाद के विशालकाय पुतले भी जलाए जाते हैं किन्तु काशी में मनाई जाने वाली कृष्णलीला, शिवलीला, विष्णुलीला के साथ-साथ दशहरे के मौके पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं का भी अपना विशेष महत्व है। हाथी पर सवार होकर काशी नरेश खुद दशहरे के मेले में शामिल होते रहे हैं। बिहार में यह त्यौहार रामलीलाओं और रावण वध के साथ-साथ दुर्गा पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। नौ दिनों की दुर्गा पूजा के बाद दशहरे वाले दिन लोग एक ओर जहां नदियों अथवा तालाबों में दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं, वहीं सायंकाल में रावण वध का आयोजन भी बड़ी धूमधाम से होता है और जगह-जगह बड़े-बड़े मेले लगते हैं। हरियाणा में दशहरे को वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आरंभ के रूप में माना जाता है। व्यापारी इसी दिन से नए बही-खाते बनाते हैं। किसी बर्तन में मिट्टी में जौ बोए जाते हैं, जो दशहरे के दिन तक उगकर काफी बड़े हो जाते हैं। दशहरे के दिन घर के बड़ों को ये ज्वारे भेंटकर बच्चे उनसे आशीर्वाद लेते हैं। ज्वारे पूजा स्थल पर भी रखे जाते हैं। शाम को रामलीला में पुतलों का दहन होता है और जमकर आतिशबाजी होती है। पश्चिम बंगाल में दशहरे के अवसर पर नवरात्रों की धूम देखी जाती है। यहां दुर्गापूजा का विशेष महत्व है। नवरात्रों के समापन पर लोगों की टोलियां दशहरे के दिन दुर्गा की विशाल प्रतिमाएं बड़े उत्साह के साथ नदी-तालाबों में विसर्जित करती हैं। राजस्थान में दशहरे के पर्व को ‘वीरों का पर्व’ भी कहा जाता है। इस अवसर पर यहां शस्त्र पूजा भी होती है तथा शमी के वृक्षों का भी पूजन किया जाता है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी शमी के वृक्षों की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर इन वृक्षों ने उन्हें रावण जैसे महाबलशाली राक्षसों पर विजयी होने का वरदान दिया था। शाम को होने वाले पुतला दहन समारोहों में लोग उत्साह के साथ भाग लेते हैं। राजस्थान में हाड़ोती में मनाए जाने वाले दशहरे का स्वरूप तो बिल्कुल भिन्न है। यहां मिट्टी के रावण को लाठियों से पीटा जाता है। शाम के समय लोग रावण जी चौक में एकत्रित होते हैं और मिट्टी से बने रावण के पुतले पर पहले तो पूरी ताकत के साथ एक-एक पत्थर फेंककर मारते हैं, उसके बाद श्रीराम की पूजा की जाती है और तत्पश्चात् लाठियों से रावण के पुतले को पीटा जाता है। इस बारे में लोगों की यही धारणा है कि ऐसा करने से लोगों को बीमारियां नहीं होती और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि 13वीं सदी से दशहरे का आयोजन यहां इसी तरह हो रहा है। महाराष्ट्र में इस दिन शस्त्रों की पूजा होती है। गणेशोत्व की भांति दुर्गोत्सव भी बहुत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। दशहरे के दिन शाम को पुतलों का दहन करने से पहले लोग जमकर आतिशबाजी का मजा लेते हैं और पुतलों के दहन के बाद राम की पूजा करते हैं। इस अवसर पर यहां एक अलग परम्परा प्रचलित है। रावण दहन के बाद लोग मित्रों व रिश्तेदारों को सोना पत्ती (शमी नामक वृक्ष की पत्तियां) देकर उनसे गले मिलते हैं। इस संबंध में कहा जाता है कि रावण के वध के बाद जब विभीषण को लंका का राजा बनाया गया था तो उसने वहां का सारा सोना लोगों में बांट दिया था। यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने अपने हथियार अज्ञातवास के दौरान शमी वृक्ष के नीचे ही छिपाए थे। गुजरात में दशहरे से पहले आयोजित किया जाने वाला नवरात्रि उत्सव यहां का सबसे रंगीला पर्व माना जाता है। रंग-बिरंगी पोशाक पहने लोग मुख्य चौक पर एकत्रित होते हैं और वहां सामूहिक गीत-संगीत के कार्यक्रम चलते हैं। नवरात्रों की सभी नौ रातों को रास और गरबा नृत्य के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जगह-जगह पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं तथा दशहरे की शाम को पुतलों को आतिशबाजी के साथ जलाया जाता है। नवरात्रों के दौरान यहां एक अन्य परम्परा भी प्रचलित है। मिट्टी के घड़ों में छिद्र करके उसमें दीये जलाकर इन मटकों को लोग अपने-अपने मोहल्ले के मुख्य चौराहों पर लटका देते हैं। दक्षिण भारत में रामायण अलग-अलग नाम से प्रचलित है। तमिलनाडु में रामकथा का नाम ‘कम्ब रामायण’ के नाम से जाना जाता है, आंध्र प्रदेश में रंगनाथ रामायण और कर्नाटक में पम्पा रामायण। इन राज्यों में लकड़ी और चिकनी मिट्टी से बनी गुडि़यों को महिलाएं घर के विशिष्ट स्थान पर सजाती हैं। गुडि़यों के बीच एक कलश रखा जाता है, जो शक्ति व उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों तक इसकी पूजा होती है और दसवें दिन दशहरे की पूजा के बाद गुडि़यों को कपड़े में लपेटकर रख दिया जाता है और अगले वर्ष इन्हें फिर से उपयोग किया जाता है। दशहरे पर इन गुडि़यों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। तमिलनाडु में रामकथा को पुतलियों के नृत्य के जरिये प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘बोम्बलाट्टम नृत्य’ के नाम से जाना जाता है। पुतलियों का यह नृत्य दूर-दूर तक काफी प्रसिद्धि लिए हुए है। केरल में रामकथा का प्रस्तुतीकरण कत्थकली नृत्य के माध्यम से होता है और इस नृत्य के लिए वहां कई अलग-अलग नृत्य नाटक लिखे गए हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 24 October 2020


bhopal,Dussehra

योगेश कुमार गोयल दशहरा अर्थात् विजयादशमी राष्ट्रीय त्योहार है, जो देशभर में धूमधाम से साथ मनाया जाता है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाए जाने के तौर-तरीकों में काफी भिन्नता देखी जाती है। कुछ स्थानों पर मनाया जाने वाला दशहरा रीति-रिवाजों अथवा परम्पराओं के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुका है। आइए देखते हैं, देश के विभिन्न क्षेत्रों में कैसे मनाया जाता है विजय और शौर्य का राष्ट्रीय पर्व दशहरा। कुल्लू का दशहरा देशभर में ही नहीं वरन् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बना चुका है। इस आयोजन को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग कुल्लू में एकत्रित होते हैं। विदेशों में ख्याति अर्जित कर चुका दशहरे का यह आयोजन देशभर के अन्य स्थानों के आयोजन से पूरी तरह भिन्न है। कुल्लू के दशहरे में न तो रामलीलाएं होती हैं और न ही रावण इत्यादि के पुतले जलाए जाते हैं बल्कि इस अवसर पर कुल्लू के विशाल मैदान में रघुनाथ जी का दरबार लगता है और कुल्लू घाटी के लोग अपने-अपने देवी-देवताओं के रथ सजाकर पैदल ही मैदान में रघुनाथ जी के दरबार में पहुंचते हैं। दशहरे के दिन रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है। यहां के इस आयोजन के बारे में मान्यता है कि कुल्लू के देवी-देवता रावण के अत्याचारों से बहुत त्रस्त थे और रघुनाथ जी ने रावण का वध करके इन देवी-देवताओं पर बहुत बड़ा उपकार किया था, इसलिए रघुनाथ जी के प्रति अपना आभार प्रकट करने के लिए इस दिन यहां के सभी देवी-देवता रघुनाथ जी के दरबार में उपस्थित होते हैं। विशेष बात यह है कि जिस दिन देशभर में दशहरा मनाए जाने के साथ ही इस उत्सव का समापन होता है, उसी दिन कुल्लू के दशहरे की शुरुआत होती है और यह आयोजन सात दिनों तक चलता है। अंतिम दिन जानवरों की बलि दी जाती थी लेकिन बलि देने की प्रथा अब सांकेतिक कर दी गई है। इस आयोजन के बारे में मान्यता है कि इसकी शुरूआत 17वीं शताब्दी में राजा जगतसिंह ने की थी। दशहरे के आयोजन पर पंजाब के अमृतसर में खास उत्साह देखा जाता है। यहां रामलीला के दिनों में ढोलक की थाप पर हनुमान का रूप धरे बच्चों की टोलियां नाचती-गाती नजर जाती हैं और शहर का पूरा वातावरण हनुमानमय प्रतीत होता है। पंजाबी वेशभूषा में लाल कपड़े पहने और हाथ में छोटी-छोटी गदाएं लिए बच्चों की ये वानर सेनाएं अद्भुत नजारा पेश करती हैं। दरअसल माना जाता है कि अश्वमेध यज्ञ के दौरान जब श्रीराम द्वारा छोड़े गए यज्ञ के घोड़ों को लव-कुश ने पकड़ लिया था तो अमृतसर की ही पावन धरती पर घोड़ों को लव-कुश से छुड़ाने के लिए श्रीराम ने हनुमान को यहां भेजा था। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, काशी, लखनऊ इत्यादि क्षेत्रों में दशहरे की विशेष धूम देखी जाती है। यहां होने वाली रामलीलाओं का स्वरूप तो भगवान श्रीराम की जीवनलीला पर ही आधारित है और दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण व मेघनाद के विशालकाय पुतले भी जलाए जाते हैं किन्तु काशी में मनाई जाने वाली कृष्णलीला, शिवलीला, विष्णुलीला के साथ-साथ दशहरे के मौके पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं का भी अपना विशेष महत्व है। हाथी पर सवार होकर काशी नरेश खुद दशहरे के मेले में शामिल होते रहे हैं। बिहार में यह त्यौहार रामलीलाओं और रावण वध के साथ-साथ दुर्गा पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। नौ दिनों की दुर्गा पूजा के बाद दशहरे वाले दिन लोग एक ओर जहां नदियों अथवा तालाबों में दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं, वहीं सायंकाल में रावण वध का आयोजन भी बड़ी धूमधाम से होता है और जगह-जगह बड़े-बड़े मेले लगते हैं। हरियाणा में दशहरे को वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आरंभ के रूप में माना जाता है। व्यापारी इसी दिन से नए बही-खाते बनाते हैं। किसी बर्तन में मिट्टी में जौ बोए जाते हैं, जो दशहरे के दिन तक उगकर काफी बड़े हो जाते हैं। दशहरे के दिन घर के बड़ों को ये ज्वारे भेंटकर बच्चे उनसे आशीर्वाद लेते हैं। ज्वारे पूजा स्थल पर भी रखे जाते हैं। शाम को रामलीला में पुतलों का दहन होता है और जमकर आतिशबाजी होती है। पश्चिम बंगाल में दशहरे के अवसर पर नवरात्रों की धूम देखी जाती है। यहां दुर्गापूजा का विशेष महत्व है। नवरात्रों के समापन पर लोगों की टोलियां दशहरे के दिन दुर्गा की विशाल प्रतिमाएं बड़े उत्साह के साथ नदी-तालाबों में विसर्जित करती हैं। राजस्थान में दशहरे के पर्व को ‘वीरों का पर्व’ भी कहा जाता है। इस अवसर पर यहां शस्त्र पूजा भी होती है तथा शमी के वृक्षों का भी पूजन किया जाता है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी शमी के वृक्षों की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर इन वृक्षों ने उन्हें रावण जैसे महाबलशाली राक्षसों पर विजयी होने का वरदान दिया था। शाम को होने वाले पुतला दहन समारोहों में लोग उत्साह के साथ भाग लेते हैं। राजस्थान में हाड़ोती में मनाए जाने वाले दशहरे का स्वरूप तो बिल्कुल भिन्न है। यहां मिट्टी के रावण को लाठियों से पीटा जाता है। शाम के समय लोग रावण जी चौक में एकत्रित होते हैं और मिट्टी से बने रावण के पुतले पर पहले तो पूरी ताकत के साथ एक-एक पत्थर फेंककर मारते हैं, उसके बाद श्रीराम की पूजा की जाती है और तत्पश्चात् लाठियों से रावण के पुतले को पीटा जाता है। इस बारे में लोगों की यही धारणा है कि ऐसा करने से लोगों को बीमारियां नहीं होती और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि 13वीं सदी से दशहरे का आयोजन यहां इसी तरह हो रहा है। महाराष्ट्र में इस दिन शस्त्रों की पूजा होती है। गणेशोत्व की भांति दुर्गोत्सव भी बहुत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। दशहरे के दिन शाम को पुतलों का दहन करने से पहले लोग जमकर आतिशबाजी का मजा लेते हैं और पुतलों के दहन के बाद राम की पूजा करते हैं। इस अवसर पर यहां एक अलग परम्परा प्रचलित है। रावण दहन के बाद लोग मित्रों व रिश्तेदारों को सोना पत्ती (शमी नामक वृक्ष की पत्तियां) देकर उनसे गले मिलते हैं। इस संबंध में कहा जाता है कि रावण के वध के बाद जब विभीषण को लंका का राजा बनाया गया था तो उसने वहां का सारा सोना लोगों में बांट दिया था। यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने अपने हथियार अज्ञातवास के दौरान शमी वृक्ष के नीचे ही छिपाए थे। गुजरात में दशहरे से पहले आयोजित किया जाने वाला नवरात्रि उत्सव यहां का सबसे रंगीला पर्व माना जाता है। रंग-बिरंगी पोशाक पहने लोग मुख्य चौक पर एकत्रित होते हैं और वहां सामूहिक गीत-संगीत के कार्यक्रम चलते हैं। नवरात्रों की सभी नौ रातों को रास और गरबा नृत्य के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जगह-जगह पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं तथा दशहरे की शाम को पुतलों को आतिशबाजी के साथ जलाया जाता है। नवरात्रों के दौरान यहां एक अन्य परम्परा भी प्रचलित है। मिट्टी के घड़ों में छिद्र करके उसमें दीये जलाकर इन मटकों को लोग अपने-अपने मोहल्ले के मुख्य चौराहों पर लटका देते हैं। दक्षिण भारत में रामायण अलग-अलग नाम से प्रचलित है। तमिलनाडु में रामकथा का नाम ‘कम्ब रामायण’ के नाम से जाना जाता है, आंध्र प्रदेश में रंगनाथ रामायण और कर्नाटक में पम्पा रामायण। इन राज्यों में लकड़ी और चिकनी मिट्टी से बनी गुडि़यों को महिलाएं घर के विशिष्ट स्थान पर सजाती हैं। गुडि़यों के बीच एक कलश रखा जाता है, जो शक्ति व उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों तक इसकी पूजा होती है और दसवें दिन दशहरे की पूजा के बाद गुडि़यों को कपड़े में लपेटकर रख दिया जाता है और अगले वर्ष इन्हें फिर से उपयोग किया जाता है। दशहरे पर इन गुडि़यों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। तमिलनाडु में रामकथा को पुतलियों के नृत्य के जरिये प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘बोम्बलाट्टम नृत्य’ के नाम से जाना जाता है। पुतलियों का यह नृत्य दूर-दूर तक काफी प्रसिद्धि लिए हुए है। केरल में रामकथा का प्रस्तुतीकरण कत्थकली नृत्य के माध्यम से होता है और इस नृत्य के लिए वहां कई अलग-अलग नृत्य नाटक लिखे गए हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 24 October 2020


bhopal, Mute ramlila in masks

रमेश सर्राफ धमोरा राजस्थान में झुंझुनू जिले के बिसाऊ कस्बे की बिना संवाद बोले सम्पन्न होनेवाली मूक रामलीला दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। इस रामलीला की खासियत यह है कि जहां सभी जगह रामलीलाएं नवरात्र स्थापना के साथ शुरू होकर दशहरे अथवा उसके अगले दिन राम के राज्याभिषेक प्रसंग के मंचन के साथ पूरी हो जाती है। बिसाऊ की रामलीला का मंचन पूरे एक पखवाड़े होता है। रामलीला में सातवें दिन लंका के पुतले का दहन किया जाता है। बाद में कुम्भकरण, मेघनाद के पुतलों का दहन होता है। दशहरे की बजाय पूर्णिमा के एकदिन पहले (चतुर्दशी) को रावण के पुतले का दहन किया जाता है। भरत मिलाप प्रसंग के साथ पूर्णिमा को रामलीला का समापन होता है। प्रतिदिन कलाकार मुखौटे लगाकर मैदान में नर्तन करते हुए शाम चार बजे से रात आठ बजे तक रामलीला का मंचन करते हैं। जहां सभी जगह रामलीला मे रावण अपनी तेज ओर डरावनी आवाज मे दहाड़ता है। बिसाऊ की मूक रामलीला का रावण बोलता नहीं बल्कि खामोशी के साथ मूक बनकर अपना अभिनय करता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की मधुर आवाज भी इस रामलीला मे सुनाई नहीं पड़ती है। बिसाऊ की मूक रामलीला सभी रामलीलाओं से अलग है। इसके मंचन के दौरान सभी पात्र बिन बोले (मूक बनकर) ही पूरी बात कह जाते हैं। यही नहीं इनके सभी पात्र अपने मुखौटों से अपनी पहचान दर्शाते हैं। यही कारण है कि इसको मूक रामलीला के नाम से जाना जाता है। यहां की रामलीला साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में भी जानी जाती है। रामलीला का मंचन ढोल-नगाड़ो पर होता है, जिनको स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा बजाया जाता है। यहां एक भी लाउडस्पीकर नहीं लगाया जाता है। यहां की रामलीला के लिये स्टेज नहीं लगाया जाता है बल्कि मुख्य बाजार में सड़क पर मिट्टी बिछाकर उत्तर दिशा में लकड़ी से बनी अयोध्या व दक्षिण दिशा में लंका तथा बीच में पंचवटी आश्रम बनाया जाता है। ऊपर पतों की बंदरवार बांधी जाती है। उत्तर व दक्षिण में दो दरवाजे बनाये जातें हैं। जिनपर लगे परदों पर रामायण की चौपाईयां लिखी होती हैं। रामलीला मंचन के दौरान एक पंडित जी रामायण की चैपाइयां बोलते रहते हैं। रामलीला में राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व सीता के मुकुट चांदी के बने होते हैं। ये पात्र मुखौटे नहीं लगाते हैं। रामलीला में अन्य पात्रों के अलावा दो विदूषक भी होते हैं जो लोगों का मनोरंजन करते हैं। कलाकार त्रिलोकचंद शर्मा की ओर से बनाए जाने वाले रावण, कुम्भकरण व मेघनाद के पुतले भी आकर्षण का केन्द्र होते हैं। बगैर संवाद बोले स्वरूपों के मुखौटे लगाकर लंबे मैदान में लीला का मंचन किया जाता है। कागज, गत्ते, रंगों से मुखौटे व हथियार बनाए जाते हैं। बालू मिट्टी पर ढोल तासों की आवाज पर युवा कलाकार नाच कूदकर अभिनय करते हैं। रामलीला की तैयारियां दो माह पूर्व से रामलीला हवेली शुरू होने लगती है। जिसमें स्वरूपों के मुखौटे बनाने, ड्रेस सिलाई, तीर-कमान, गदा, तलवारें आदि तैयार करवाये जाते हैं। रामलीला के पात्रों की पोशाक भी अलग तरह की होती है। अन्य रामलीला की तरह शाही एवं चमक दमक वाली पोशाक न होकर साधारण पोशाक होती है। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की पीली धोती, वनवास में पीला कच्छा व अंगरखा, सिर पर लम्बे बाल एवं मुकुट होता है। मुख पर सलमा-सितारे चिपकाकर बेल-बूंटे बनाए जाते हैं। हनुमान, बाली-सुग्रीव, नल-नील, जटायू एवं जामवन्त आदि की पोशाकें भी अलग-अलग रंग की होती हैं। सुन्दर मुखौटा तथा हाथ में घोटा होता है। रावण की सेना काले रंग की पोशाक में होती है। हाथ में तलवार लिए युद्ध को तैयार रहती है। मुखौटा भी लगाया हुआ होता है। आखिरी चार दिनों में कुम्भकरण, मेधनाथ, एवं रावण के पुतलों का दहन किया जाता है। फिर भरत मिलाप के दिन पूरे नगर में श्रीराम दरबार की शोभायात्रा निकाली जाती है। यहां रामलीला की शुरुआत जमुना नामक एक साध्वी द्वारा 185 वर्षों पूर्व की गयी बताते हैं। जो गांव के पास रामाणा जोहड़ में साधना करती थीं। साध्वी वहीं छोटे-छोटे बच्चों को लेकर उनसे मूकाभिनय करवाती थी। तभी से इस रामलीला की शुरुआत मानी जाती है। श्री रामलीला प्रबंध समिति इसकी व्यवस्था करती है और प्रवासी भामाशाह व कस्बेवासी रामलीला का खर्च उठाते हैं। बिसाऊ की रामलीला के प्रति स्थानीय लोगों समेत आसपास के गांवों के लोगों में भी काफी उत्सुकता रहती है। रामलीला को देखने के लिए दूर-दूर से आने वाले दर्शकों की भीड़ रहती है। रामलीला का मंचन आसोज शुक्ल की एकम से पूर्णिमा तक होती है। रामजन्म से राज्याभिषेक तक के प्रसंग मंचित किए जाते हैं। बिसाऊ कस्बे में होने वाली विश्व प्रसिद्ध मूक रामलीला में मुख्य बाजार स्थित दंगल में उतरने से पहले कलाकारों को तैयार होने में करीब तीन घंटे लगते हैं। रामादल के पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन एवं सीता के अलावा नारद ही एकमात्र ऐसे पात्र हैं जिनका चेहरा दिखाई देता है। इसके अलावा रावण दल हो या महाराजा सुग्रीव की सेना सभी पात्र चेहरे में ढंके रहते हैं। करीब साढ़े पांच बजे से रामलीला शुरू होने से पहले रामादल के स्वरूपों को तैयार होने के लिए दो बजे ही रामलीला हवेली पहुंचना पड़ता है। इन पात्रों के चेहरे पर चमकीले तारों से श्री, स्वास्तिक, अष्टकमल, मोर पंख, मोर, श्रीफल आदि की आकृति बनाने के लिए गोंद का इस्तेमाल किया जाता है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष पंडित सुनील शास्त्री ने बताया दंगल में इन पात्रों के चमकते चेहरों का राज ये सितारे व तारे हैं जो दिल्ली से विशेष रूप से मंगवाए जाते हैं। रामलीला के पुराने कलाकार वर्तमान कलाकारों का चेहरा श्रृंगारित करते हैं। यह श्रृंगार अन्य शहरों व कस्बों में होने वाली मंचीय रामलीला से अलग दिखाई देता है। राजस्थान में झुंझुनू जिले के बिसाऊ कस्बे में गत 185 वर्षो से अनवरत जारी मूक रामलीला को दुनिया के मानचित्र में लाने के लिए पूरे कस्बेवासी एकजुट हुए। राजस्थान की धरोहर एवं बिसाऊ कस्बे के गौरव मूक रामलीला को अगर राजस्थान सरकार व पर्यटन विभाग संरक्षण देकर विश्व के पर्यटन मानचित्र में शामिल करे तो बिसाऊ कस्बा प्रदेश का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 24 October 2020


bhopal,Corona: Negligence and Befree Not Proper

योगेश कुमार गोयल दुनियाभर में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा चार करोड़ को पार कर चुका है। दूसरी ओर राहत की खबर यह सामने आई कि भारत में कोरोना संक्रमण का पहला दौर बीत चुका है और बीते तीन सप्ताह के दौरान कोरोना के नए मामलों और इससे होने वाली मौतों में कमी आई है। स्वस्थ होने वालों की दर बढ़कर 88.03 फीसदी हो गई है और देश में सक्रिय मरीजों की संख्या अब 8 लाख से कम है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि कोरोना का असली प्रभाव आना बाकी है और अब नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल ने सर्दियों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आने की बात कहकर विशेषज्ञों की इस आशंका की पुष्टि कर दी है। दरअसल महामारी की पहली लहर थमने के बाद यूरोप में कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ गया है, जहां अबतक 63 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और दुनिया के हर 100 संक्रमितों में से 34 व्यक्ति यूरोपीय देशों के ही हैं। ब्रिटेन में सर्दी शुरू होते ही 40 फीसदी मामले बढ़ गए हैं। यही वजह है कि कोरोना से निपटने के प्रयासों के लिए बने विशेषज्ञ पैनल के प्रमुख वीके पॉल भारत में भी सर्दियों में संक्रमण की दूसरी लहर आने की आशंका जताते हुए कह रहे हैं कि देश बेहतर स्थिति में है लेकिन अभी हमें लंबा रास्ता तय करना है। भारत में त्योहारी सीजन की शुरुआत हो चुकी है। जिस प्रकार देशभर में कोरोना को लेकर लापरवाही और बेफिक्री का माहौल देखा जा रहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को त्योहारी मौसम में लोगों से वायरस के प्रति लापरवाही न बरतने की अपील करने के लिए राष्ट्र को सम्बोधित करना पड़ा। उनका सीधा और स्पष्ट संदेश था कि जबतक दवाई नहीं, तबतक ढिलाई नहीं। देशवासियों को चेताते हुए उन्होंने कहा कि सावधानी का परिचय न देने के वैसे ही खतरनाक परिणाम हो सकते हैं, जैसे कई यूरोपीय देशों और अमेरिका में देखने को मिल रहे हैं, जहां कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने सिर उठा लिया है और इसीलिए प्रतिबंधात्मक उपाय वहां फिर से लागू करने पड़ रहे हैं। कोरोना को लेकर प्रधानमंत्री को एकबार फिर जनता को इसीलिए सचेत करने के लिए सामने आना पड़ा क्योंकि विभिन्न सरकारी एजेंसियां चेतावनियां दे रही हैं कि अगर पूरी एहतियात नहीं बरती गई तो कोरोना की दूसरी लहर सर्दियों में आ सकती है, जो पहली लहर से ज्यादा भयावह होगी। प्रधानमंत्री ने अपने 12 मिनट के सम्बोधन में लोगों को भीड़ से बचने और दो गज की दूरी अपनाने की हिदायतें दोहरायी लेकिन उनके इस सम्बोधन के बाद सरकारी तंत्र पर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़े हुए हैं। मसलन, क्या कोरोना संक्रमण रोकने के लिए जारी किए जाने वाले तमाम दिशा-निर्देश केवल आम जनता के लिए ही हैं? प्रधानमंत्री को कोरोना प्रोटोकॉल की लगातार धज्जियां उड़ाते रहे राजनीतिक लोगों की जमात के लिए भी कुछ सख्त शब्द बोलने चाहिए थे। एक तरफ जहां अपने परिजनों के अंतिम संस्कार या वैवाहिक आयोजनों में गिनती के लोगों को शामिल होने की छूट है, वहीं तमाम राजनीतिक दल विभिन्न आयोजनों में सैंकड़ों-हजारों लोगों की भीड़ जुटाते देखे जाते रहे हैं। आम जनता पर कोरोना प्रोटोकॉल का जरा भी उल्लंघन होने पर कानून का डंडा बरस पड़ता है, उन्हें हर कदम पर जुर्माना भरना पड़ता है लेकिन राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को हर बंदिशों से छूट है, उनपर किसी का कोई जोर नहीं। देश में इस समय अजीब माहौल है। एक ओर कोरोना से बचने के लिए बार-बार दो गज की दूरी अपनाने की सलाह दी जाती रही है, वहीं तमाम रेलगाड़ियां, बसें तथा सार्वजनिक यातायात के अन्य साधन बिना सार्वजनिक दूरी का पालन कराए यात्रियों की पूरी क्षमता के साथ दौड़ रहे हैं। आखिर ऐसे में कोई दो गज की दूरी के सिद्धांत को अपनाए भी तो कैसे? बिहार तथा मध्य प्रदेश में चुनावी दौरे में जिस तरह सभी राजनीतिक दलों द्वारा मनमानी भीड़ जुटाई जा रही है, क्या ऐसे में कहीं से भी ऐसा लगता है कि हम उस कोरोना संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं, जिसके लिए प्रधानमंत्री आमजन को एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं। जिस समय लोग लॉकडाउन के दौर में घरों में बंद थे, उस दौरान भी रह-रहकर ऐसे दृश्य सामने आते रहे, जब राजनेता खुलकर कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते देखे गए। आम लोग अगर घर से बाहर बगैर मास्क के घूमते दिख जाएं तो फौरन उनपर पांच सौ रुपये का जुर्माना ठोक दिया जाता है लेकिन राजनेता अगर बिना मास्क लगाए हजारों लोगों की भीड़ भी एकत्रित कर लेते हैं तो उनपर कोई कार्रवाई नहीं, ऐसा क्यों? आखिर कोरोना प्रोटोकॉल आम और खास सभी के लिए समान है, फिर राजनेताओं को इससे छूट क्यों? ऐसे में बेहद जरूरी है कि प्रधानमंत्री नेताओं की उस जमात को भी कड़ा संदेश दें, जो खुद को कानून से ऊपर समझकर कोरोना प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाते रहे हैं। फिलहाल त्योहारी सीजन में जिस प्रकार लोग कोरोना से पूरी तरह बेफिक्र होकर बगैर मास्क के सार्वजनिक स्थानों पर घूमने लगे हैं, वह आने वाले दिनों में वाकई काफी खतरनाक साबित हो सकता है। विशेषज्ञों की तमाम चेतावनियों पर गौर करने के बाद हमें समझ लेना चाहिए कि जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती, तबतक कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए मास्क का इस्तेमाल सबसे प्रभावी उपाय है। सर्दियों में कोरोना का संक्रमण तेजी से बढ़ने की जिस तरह की रिपोर्टें आ रही हैं, ऐसे में बेहद जरूरी है कि हम लापरवाही बरतकर अपने साथ-साथ दूसरों को भी मुश्किल में डालने से परहेज करें क्योंकि यदि हमने सामाजिक दूरी और मास्क पहनने जैसी हिदायतों को दरकिनार किया तो संक्रमण का स्तर काफी ऊपर जा सकता है और हालात बिगड़ सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

Dakhal News

Dakhal News 22 October 2020


bhopal,Skin care in winter

शहनाज हुसैन नवरात्रि को सर्दियों का प्रारम्भ माना जाता है। अक्तूबर के पहले सप्ताह में ऊंची हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं पर सीजन की पहली बर्फबारी रिकॉर्ड की गई है। इस बर्फबारी के बाद पहाड़ों के साथ-साथ मैदानी इलाकों में भी ठण्ड का आगाज हो गया। वातावरण में अचानक बदलाव से त्वचा, सिर, होठों तथा नाखून बुरी तरह प्रभावित होते हैं। सर्द ऋतु की तेज हवाओं से त्वचा शुष्क तथा पपड़ीदार होने के साथ ही होठों का फटना भी शुरू हो जाता है। सर्दियों के आरम्भ में मौसम में आर्द्रता की कमी से त्वचा में खिंचाव आना शुरू हो जाता है। जैसे ही वातावरण में आर्द्रता कम होना शुरू होती है वैसे ही शुष्क तथा फोड़े-फुन्सी से ग्रसित त्वचा के लिए परेशानियों का सबब शुरू हो जाता है। सर्दियों के मौसम में हमारी त्वचा को दोहरी मार झेलनी पड़ती है क्योंकि पहले तो वातावरण में नमी की कमी तथा ठण्डी हवाओं से त्वचा रूखी-सूखी हो जाती है तो दूसरी और ठण्ड की मार से बचने के लिए हम गर्म पानी से नहाते हैं और घर में हॉट एयर कंडीशनर, अंगीठी, हॉट रॉड, हीटर आदि का जमकर प्रयोग करते हैं, जिससे घर के वातावरण में भी नमी की कमी हो जाती है। यह सभी विद्युत उपकरण हमारे घर के वातावरण और शरीर में नमी की कमी कर देते हैं। इससे हमारी त्वचा सूखकर फटने लगती है। इस सीजन में संवेदनशील त्वचा के लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं जिसमें त्वचा से खून बहना शुरू हो जाता है तथा इन्फेक्शन कई नई बीमा