Patrakar Vandana Singh
आर.के. सिन्हा
देश के आठ पूर्वोतर राज्यों के सभी स्कूलों के दसवीं कक्षा तक में पढ़ने वाले बच्चों को हिन्दी अनिवार्य रूप से पढ़ाने पर वहां की राज्य सरकारें राजी हो गईं हैं। 22 हजार हिन्दी अध्यापकों की भर्ती की जा रही है तथा नौ आदिवासी जातियों ने अपनी बोलियों की लिपि देवनागरी को स्वीकार कर लिया है। क्या इन जानकारियों में आपको कहीं हिन्दी थोपने के संकेत मिलते हैं? लेकिन, कांग्रेस तो कम से कम यही मानती है। कांग्रेस के नेता यह कहते हैं कि सरकार महंगाई तथा बेरोजगारी जैसे गंभीर मसलों पर बात करने की बजाय हिन्दी को गैर-हिन्दी भाषियों पर थोपने की चेष्टा कर रही है।
दरअसल विगत दिनों केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उपर्युक्त जानकारियां देश के साथ साझा की थीं। उसके बाद कांग्रेस के नेता जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी मैदान में उतर आए। जयराम रमेश ने ज्ञान दिया कि ‘हिन्दी राजभाषा है न कि राष्ट्रभाषा।’ एक तरह से वे और उनके मित्र अभिषेक मनु सिंघवी हिन्दी के खिलाफ वक्तव्य देते हुए महात्मा गांधी, सरदार पटेल, भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अपमान करने लगे। देश की ये सभी महान शख्सियतें गैर हिन्दी भाषी होने पर भी हिन्दी के प्रसार-प्रचार के लिए सक्रिय रहीं। ये सभी हिन्दी की ताकत को जानते थे। क्या कांग्रेस के इन नेताओं को इतना भी नहीं पता कि भगत सिंह तो हिन्दी के ही पत्रकार थे। पंजाब से संबंध रखने वाले भगत सिंह की मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। इसके बावजूद वे कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के कानपुर से छपने वाले अखबार ‘प्रताप’ में पत्रकार के रूप में काम करते रहे थे। प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल की सलाह पर भगत सिंह विद्यार्थी जी से मिले। वे ‘प्रताप’ में बलवंत सिंह के नाम से लिखते थे, जो खासतौर पर नौजवानों के बीच खासे लोकप्रिय थे। भगत सिंह पंजाबी पत्रिका किरती के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे।
देखिए संविधान में बहुत सोच-विचार कर हिन्दी की स्वीकृति दी गई क्योंकि इसकी सर्वत्र राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता आज के 75 वर्ष पूर्व भी थी। जब अनुच्छेद 343 में देवनागरी में लिखी हिन्दी को सर्वसम्मति से मान्यता मिली तो वह ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ ही मानी गई। बाद में चलकर ‘कोई राजभाषा’ ‘कोई सरकारी भाषा’ और ‘कोई आधिकारिक भाषा’ कहने लगा। सरदार पटेल ने दिनांक 13 अक्टूबर 1949 को अपने महत्वपूर्ण संदेश हिन्दी के लिए ‘राष्ट्र भाषा’ का प्रयोग ही किया है। जयराम रमेश यह याद रखें कि हिन्दी भारत के करोड़ों लोगों की प्राण और आत्मा है। हिन्दी प्रेम और सौहार्द की भाषा है। ये सबको जोड़ती है। इसका बार-बार अनादर करना बंद करें। वे जब हिन्दी को लेकर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं तो वे हिन्दी भाषियों को निराश करते हैं।
उम्मीद के मुताबिक अमित शाह की जानकारी के बाद तमिलनाडु में भी हिन्दी का राजनीतिक विरोध शुरू हो गया है। पर यह विरोध जमीन पर नहीं है। दक्षिणी राज्यों में अब हिन्दी का विरोध रत्ती भर नहीं रहा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन आज जो कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार हिन्दी को गैर-हिन्दी भाषी राज्यों पर थोपने की कोशिश कर रही है, वे तब कुछ नहीं बोले थे जब तमिलभाषी एचसीएल टेक्नोलॉजीस के खरबपति फाउंडर चेयरमैन शिव नाडार ने कुछ समय पहले एक स्कूल के कार्यक्रम में कहा था-“हिन्दी पढ़ने वाले छात्रों को अपने करियर को चमकाने में लाभ ही मिलेगा।” वे भारत के सबसे सफल कारोबारी माने जाते हैं और पूरे देश में लाखों पेशेवर उनकी कंपनी में काम करते हैं। हिन्दी का विरोध करने वालों को शिव नाडार जैसे सफल उद्यमी से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने 1960 के दशक में तमिलनाडु में हुए हिन्दी विरोधी आंदोलन को स्वयं देखा था।
बहरहाल, तमिलनाडु को लेकर यह कहना होगा कि वहां हिन्दी फिल्मों को देखने के लिए जनता जिस तरह से सिनेमाघरों में उमड़ती है, वहां के सियासी नेता के हिन्दी विरोध की बातें नासमझी ही मानी जाएगी। जिस तमिलनाडु के नेता हिन्दी का विरोध करते हैं, वहां आयुष्मान खुराना, ऱणवीर सिंह, आमिर खान और अक्षय कुमार की फिल्में खूब देखी जाती हैं।
महात्मा गांधी से ज्यादा इस देश को कोई नहीं जान-समझ सकता। गांधीजी का विचार था कि दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार जरूरी है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि जब वे पेशावर और उसके आसपास जाकर जनता के बीच अपनी बात रखते हैं तो वे अपनी हिन्दी में उर्दू तथा अरबी के कुछ शब्दों को जोड़ लेते हैं। जब वे दक्षिण भारतीय राज्यों में जाते हैं तो वे संस्कृत के शब्दों को शामिल कर लेते हैं। इससे वे अपने श्रोताओं को अपनी बात बेहतर तरीके से समझाने में सफल हो जाते हैं।
अभिषेक मनु सिंघवी का हिन्दी की बात करने पर भड़कना इसलिए और कष्टप्रद है क्योंकि उनके पूज्य स्वर्गीय पिता और चोटी के विधिवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी जीवनपर्यंत हिन्दी के पक्ष में बोलते-लिखते रहे। जानेमाने कवि, लेखक, भाषाविद एवं संविधान विशेषज्ञ और प्रसिद्ध न्यायविद लक्ष्मीमल सिंघवी ने हिन्दी के वैश्वीकरण और हिन्दी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और ईमानदार प्रयास किए थे। वे भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिन्दी के प्रणेता और हिन्दी-भाषियों के लिए प्रेरणास्रोत थे। जैन धर्म के इतिहास और संस्कृति के जानकार के रूप में मशहूर लक्ष्मीमल सिंघवी ने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें से अनेकों हिन्दी में हैं। अफसोस कि उनके पुत्र अभिषेक मनु सिंघवी अब हिंदी का जिक्र आते ही भड़कने लगे हैँ।
अगर बात हिन्दी को लेकर चल रही राजनीति से हटकर करें तो पूर्वोत्तर राज्यों की जनता लगातार हिन्दी से जुड़ रही है। वह हिन्दी पढ़-सीख रही है। अब आप पूर्वोत्तर राज्यों का दौरा कर लीजिए। आपको वहां हिन्दी जानने-समझने वाले सब जगह मिल जाएंगे। देखिए हिन्दी तो अब सारे देश के आम-खास की भाषा बन ही चुकी है। कोई चाहे या न चाहे। इस पर किसी को संदेह नहीं होगा। जो कांग्रेस महंगाई तथा बेरोजगारी पर सरकार को घेर रही है, वह इन बिन्दुओं पर कोई बड़ा आँदोलन क्यों नहीं खड़ा करती। बेशक, महंगाई और बेरोजगारी गंभीर मसले हैं। देश को इनका हल निकालना होगा। कांग्रेस को यह भी तो बताना होगा कि उसने अपने शासन काल में क्या किया? पर इसका यह मतलब तो नहीं होता कि अन्य विषयों पर काम ही न हो।
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
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