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दीपक कुमार त्यागी
रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया पर हर पल तीसरे विश्वयुद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। इस विवाद को लेकर दो धड़ों में विभाजित दुनिया एकबार फिर अचानक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ी हो गयी है। दुनिया में आज हालात ऐसे बन गये हैं कि ताकतवर देशों के हुक्मरानों ने अगर युद्ध के लिए उकसाने और युद्ध को बढ़ावा देने वाला रवैया तत्काल नहीं त्यागा तो स्थिति भयावह हो सकती है।
आज समय की मांग है कि दुनिया में अपनी चौधराहट चलाने वाले चंद ताकतवर देश रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्द से जल्द रोकने के लिए बातचीत के माध्यम से तत्काल प्रभावी सकारात्मक कदम उठाएं। क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध लंबे समय तक चलने की स्थिति में युद्ध का दायरा रूस-यूक्रेन के साथ अन्य देशों की भागीदारी के चलते बढ़ने की प्रबल आशंका है। इसलिए इस ज्वलंत मसले से जुड़े सभी पक्षों को समय रहते यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि आपसी बातचीत से ही समाधान संभव है।
रूस-यूक्रेन विवाद का निष्पक्ष आकलन करें तो कुछ माह पूर्व से लड़ने पर आमादा बैठे रूस-यूक्रेन के बीच हालात को बिगाड़ने में बहुत सारे देशों की नकारात्मक भूमिका रही है। जिस तरह रूस-यूक्रेन के हुक्मरानों की जिद ने एक-दूसरे के ऊपर युद्ध थोपा है, उसे दुनिया के चौधरी बनने वाले पश्चिमी देशों, नाटो व अमेरिका ने भड़का कर युद्ध में तब्दील करने का कार्य किया है। आज की परिस्थितियों में दुनिया के शांतिप्रिय देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए यह चंद देश अब भी धरातल पर सकारात्मक पहल नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसके विपरीत यह देश अब भी हथियार देने की बात करके युद्ध को भड़काने का कार्य कर रहे हैं।
हालांकि इस तरह के हालात से स्पष्ट है कि चंद देशों के हुक्मरानों का लक्ष्य युद्ध भड़का कर हथियारों के व्यापार से अपनी तिजोरी भरने का ही रहता है। देखा जाये तो इन देशों के बड़बोले हुक्मरानों की हर तरह की मदद करने के आश्वासन के झांसे में रूस-यूक्रेन का युद्ध शुरू हुआ है। अब इन देशों के हुक्मरान युद्ध में झुलसते देश को तमाशबीन की तरह देख रहे हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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