मीडिया


bhopal, Published

हम आज भी अंग्रेज़ी हुकूमत के नियमों से फ़िल्म प्रमाणन प्रक्रिया करते हैं, सौ वर्षों की सिनेमाई यात्रा का पूरा विवरण पेश करती है पुस्तक ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’, पुस्तक में देश के जाने माने फ़िल्मकारों और फ़िल्म पत्रकारों के साक्षात्कार हैं समाहित   फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर देश भर में माहौल हमेशा से गरम रहा है. 1918 में अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा फ़िल्मों की सामग्री को परीक्षण करने के इरादे से आरम्भ की गई नीति आज 21वीं सदी में ओटीटी प्लेटफ़ोर्म के ज़माने में भी प्रासंगिक है. एक दर्शक फ़िल्म में क्या देखे? इसे तय करने की एक संस्था आज़ाद भारत में भी बनाई गई जिसे केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड का नाम दिया गया.   इसी क्रम में कई कमेटियाँ बनी जिसने इस बोर्ड के क्रियान्वयन और तरीक़ों में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी सुझाव भी दिए. यह सब कितना सफल हुआ और क्या बदलाव हुए पुस्तक फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष बताती है. डॉ मनीष जैसल द्वारा लिखी गई यह किताब संभवत: हिंदी में इस विषय पर लिखी गई पहली किताब है जो फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्षों का पूरा लेखा जोखा पेश करती है.   दुनिया भर में फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर बने मॉडल में भारत में कौन सा सबसे उपर्युक्त होना चाहिए पुस्तक में दिए सुझावों से जाना और समझा जा सकता है. कभी पद्मावती जसी फ़िल्मों को लेकर विवाद होता है तो कभी उड़ता पंजाब के सीन कट हो जाने से मीडिया में हेडलाइन बनने लगती है. लेकिन इसके पीछे के तर्कों और इससे बचाव को लेकर सरकारें क्या क्या उपाय सोचती और उसे करने का प्रयास करती है पुस्तक कई उदाहरणों के साथ सामने लाती है. देश के शिक्षाविद, फ़िल्मकार,पत्रकारों, लेखकों आदि से किए गए साक्षात्कार फ़िल्म सेन्सरशिप के भविष्य को लेकर एक राह दिखते हैं. जिन पर अमल किया जाये तो संभवत: इस दिशा में सकारात्मक कार्य हो सकता है.   महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से फ़िल्म स्टडीज़ में पीएचडी डॉ जैसल ने काशीपुर के ज्ञानार्थी मीडिया कोलेज में भी अपनी सेवाएँ बतौर सहायक प्रोफ़ेसर और मीडिया प्रभारी दे चुके हैं. सीएसआरयू हरियाणा में सेवाएँ देने बाद वर्तमान में नेहरु मेमोरियल लाइब्रेरी नई दिल्ली के सहयोज से पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा पर पुस्तक लिख रहे डॉ मनीष ने मशहूर फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली पर भी पुस्तक लिखी है, जो काफ़ी चर्चित रही.   बुक बजुका प्रकाशन कानपुर द्वारा इनकी तीनों किताबें प्रकाशित हुई हैं. प्रकाशक ने बताया कि सिनेमा पर लिखने वाले बहुत काम लोग हैं ऐसे में भारतीय सिनेमा और सेन्सरशिप पर लिखी गई इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय संदर्भों के साथ अमेरिका यूरोप और एशिया के कई प्रमुख देशों के फ़िल्म सेन्सरशिप की विस्तृत चर्चा की है. वहीं प्रमुख फ़िल्मकारों और पत्रकारों से संवाद पुस्तक को और भी तथ्य परक बनाती है. फ़िल्म समीक्षक, लेखक और स्वतंत्र पत्रकार की भूमिका का बराबर निर्वहन कर रहे पुस्तक के लेखक डॉ मनीष जैसल ने सभी फ़िल्म रसिक, फ़िल्मी दर्शकों और पाठकों से पुस्तक को पढ़ने और उस पर टिप्पणी की अपील की है. वर्तमान में लेखक मंदसौर विश्वविद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर हैं. फ़िल्म मेकिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे टेक्निकल विषय पर विशेष रुचि भी है. स्क्रीन राईटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया, आइचौकडॉटइन, अमर उजाला, हिंदुस्तान, भास्कर, न्यूजलांड्री जैसे पोर्टल में लगातार इनकी फ़िल्म समीक्षाए और लेख प्रकाशित होते रहते हैं. दो भागों में प्रकाशित ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’ को प्राप्त करने के लिए आप mjaisal2@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते है

Dakhal News

Dakhal News 4 August 2020


bhopal, important comment , Yashwant, Corona

ये खबर मेरे जैसों के लिए है जो कोरोना को हलके में लेते हैं. इधर उधर फुदकते रहते हैं. विजय विनीत जी बनारस के दबंग और मुखर पत्रकारों में से एक हैं. आम जन के दुखों, जनता से जुड़ी खबरों को लेकर शासन प्रशासन से टकराना इनकी फितरत है. इन्हें जब कोरोना का संक्रमण हुआ तो तनिक भी अंदाजा न था कि मरते मरते बचेंगे. यूं कहें कि ये मर ही गए थे, बस अपनी जीवटता और कुछ डाक्टरों की जिद के चलते जी गए. कृपया सावधान रहें. घर में रहें. बहुत जरूरी हो तो ही निकलें. कोरोना का कोई इमान धर्म नहीं है. कब किसे कहां पकड़ ले और मार डाले, कुछ कहा नहीं जा सकता. विजय विनीत जी ने अपनी स्टोरी विस्तार से लिखी है, पढ़िए पढ़ाइए और बहुत जरूरी न हो तो चुपचाप घर में बैठे रहिए. मुझे भी कुछ फीडबैक हैं. गर्दन, कंधे व हाथ के दर्द के कारण मैं फिजियोथिरेपी कराने जिस डाक्टर के पास जाता था, उनकी पत्नी एक सरकारी अस्पताल (ईपीएफ वाले) में हेड नर्स हैं. उनके फिजियोथिरेपिस्ट पति बता रहे थे कि वाइफ जहां काम करती हैं वहां के अस्पताल में तैनात मेडिकल स्टाफ में अघोषित तौर पर ये सहमति है कि जिन कोरोना मरीजों की हालत बिगड़ गई हो उसे छूना-छेड़ना नहीं है. उसे मरने के लिए छोड़ देना है क्योंकि उन्हें ठीक करने की लंबी कवायद में मेडिकल स्टाफ संक्रमित हो सकता है. उनने बताया कि कोरोना संक्रमित कई मरीजों को बचाया जा सकता था लेकिन मेडिकल स्टाफ के बीच एक मूक सहमति के चलते कोई मरीज के पास जाकर उसे बचाने की कवायद में खुद संक्रमित होने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ. मैं तो सुनकर दंग रह गया. मतलब जब हालत खराब हो और मदद की जरूरत हो तब मरने के लिए छोड़ दीजिए. जब माइल्ड लक्षण हों तो बस खाना वगैरह भिजवा कर अकेले पड़े पड़े डिप्रेशन में जाने के लिए छोड़ दीजिए. आप ठीक हो जाएं या मर जाएं, ये आपका भाग्य है. वैसे भी कोरोना पेशेंट के लिए आजकल अस्पतालों में न बेड है, न गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आक्सीजन सिलेंडर. जो कुछ हैं भी तो वो बड़े व वीवीआईपी के लिए आरक्षित-सुरक्षित हैं. ज्यादा बड़े वीवीआईपी तो मैक्स व मेदांता जैसे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. ग़ज़ब है ये देश. ग़ज़ब है इस देश के हुक्मरां जिन्होंने अपनों की जेबें तो खूब भरी-भरवाईं लेकिन देश की जनता के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया न करा सके. हर कोई विजय विनीत जी जैसा भाग्यशाली नहीं है कि उन्हें मुश्किल वक्त में कुछ जिद्दी डाक्टर मिल जाएं. हर कोई विजय विनीत जैसा इच्छा शक्ति रखने वाला भी नहीं है. विजय विनीत की कहानी हमें डराती है. विजय विनीत की कहानी हमें बताती है फिलहाल तो सारी सत्ताओं से बड़ी मौत की सत्ता है जो अदृश्य होकर यहां वहां जहां तहां विराजमान है. कौन इसकी गिरफ्त चपेट में आएगा, न मालूम. ऐसे में जरूरी है कि हम आप यथासंभव प्रीकाशन रखें. जीवन-मृत्यु को उदात्तता से समझने-बूझने की प्रक्रिया शुरू कर दें ताकि मौत आए भी तो उसके साथ जाने में कोई मलाल शेष न रहे. हालांकि ये भी जान लीजिए कि मरता वही है जो दिमागी से रूप से मरने के लिए तैयार हो जाए. विजय विनीत जैसी कहानियां बताती हैं कि जिनमें जिजीविषा है, वो मौत को मात देकर उठ खड़े होते हैं. तो, समझिए बूझिए सब कुछ, पर जिजीविषा तगड़ी वाली बनाकर रखिए. जैजै भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 4 August 2020


bhopal, CM Shivraj ,pays tribute ,Kishore Kumar , birth anniversary

भोपाल। सदाबहार गायक, अभिनेता किशोर कुमार की आज मंगलवार को जंयती है। बॉलीवुड की फिल्मों में कई शानदार गानों को अपनी आवाज देने वाले किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था और उनका निधन 13 अक्टूबर को 1987 में हुआ। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। बॉलीवुड में कई सिंगर्स आए और गए लेकिन किशोर कुमार की आवाज का जादू आज भी बरकरार है। किशोर कुमार अभिन्न प्रतिभा के धनी थे। इसके अलावा वो व्यवहार से मजाकिया और मस्तमौला किस्म के इंसान थे। अब किशोर कुमार तो हमारे बीच नहीं पर उनकी यादें आज भी जिंदा हैं।   किशोर कुमार की जयंती पर आज उन्हें हर कोई याद कर रहा है। आम आदमी से लेकर राजनेता तक उन्हें याद कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किशोर कुमार को जयंती पर स्मरण कर उन्हें नमन किया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा ‘जिंदगी के हर पल को जिंदादिली के साथ जीने वाले, महान गायक, अभिनेता स्व. किशोर कुमार की जयंती पर नमन। वह बहुत शान से 'किशोर कुमार खंडवे वाले' कहते हुए अपना परिचय देते थे। अपनी जड़ों से इतना प्रेम करने और सदा जुड़े रहने वाले अपने रत्न को मध्यप्रदेश कभी विस्मृत न कर सकेगा।   भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने संदेश में कहा ‘चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना...हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, संगीतकार, निर्माता-निर्देशक और साथ में एक उम्दा पाश्र्व गायक श्री किशोर कुमार जी की जयंती पर सादर नमन...।   गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपने ट्वीट में कहा ‘मप्र की माटी के सपूत किशोर कुमार जितने अच्छे गायक थे, उतने ही जिंदादिल इंसान। उनकी गाने की शैली अद्वितीय थी।

Dakhal News

Dakhal News 4 August 2020


bhopal, Jitesh and Rahul, startup , Benares , order order

एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिव्री शुल्क के किराने का सामान उपलब्ध वाराणसी : कोरोना महामारी के ऐसे मुश्किल समय में वाराणसी में रहने वाले लोगों के लिए एक ख़ुशखबरी है। अब ग्राहकों को घर बैठे एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिवरी शुल्क के किराने का सामान ऑर्डर फ़रमाइए द्वारा घर पर डिलिवर करवाया जाएगा। ग्राहकों को बस व्हाट्सएप या कॉल करके अपना ऑर्डर देना होगा और चंद मिनटों में उनके घर सामान पहुँचाया जाएगा। ऑर्डर फ़रमाइए के संस्थापक श्री जितेश पांडेय और राहुल अग्रहरी हैं। जितेश पांडेय ने बताया कि ‘जिस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री जी का कहना है कि हमें आपदा को अवसर में बदलना है तो इसी बात से प्रेरणा लेते हुए हमने इस कंपनी की शुरुआत की। अभी हम ऑर्डर फ़ोन और वट्सऐप द्वारा ले रहे हैं और जल्द ही हम इसकी ऐप भी लॉंच करेंगे’। राहुल अग्रहरी का कहना है ‘ऑर्डर फ़रमाइए के द्वारा हम लोगों की समस्या का निवारण करना चाहते हैं। हम जानते हैं कि इस वैश्विक बीमारी के समय में लोग अपने घरों से बहुत कम निकलना चाहते हैं क्यूँकि सबके मन में डर बैठा हुआ है। हम लगातार प्रयास कर रहे हैं कि लोगों की ज़रूरतों का सामान उचित तरीके से सेनेटाइज़ करके उनको उपलब्ध करवाया जा सके जिससे लोगों को किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े’।

Dakhal News

Dakhal News 30 July 2020


bhopal, Why did Amitabh, Shivraj, Sikra ,get corona despite ,social distancing

तो क्या सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के बाद भी होगा कोरोना! दुनिया को ज्ञान देने वाले अमिताभ, शिवराज, सिकेरा जैसों ने क्या कोरोना से बचने के लिए एहतियात नहीं बरती थी! उठने वाले तमाम सवाल वाजिब भी हैं। तर्कपूर्ण सवालों के पीछे कोरोना से बचाव की जिज्ञासा और भय है। लेकिन सियासी प्रतिद्वंद्विता में बीमार का मज़ाक उड़ाने की मंशा बेहूदगी लगती है। ये सच है कि ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो ना सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग का खूब पालन कर रहे थे बल्कि दूसरों को भी जागरुक कर रहे थे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और चर्चित पुलिस अफसर नवनीत सिकेरा समेत दर्जनों ऐसे लोग कोरोना से संक्रिमित हो चुके हैं। अब इन दो बातों में एक बात तो सही होगी ही। या तो ये कि जितनी भी एहतियात कर लो फिर भी आप इस संक्रमण का शिकार हो सकते हैं। दूसरी बात कि अमिताभ और शिवराज जैसी देश दुनिया की तमाम खास हस्तियों ने सोशल डिस्टेंसिंग और तमाम एहतियातों को बरतने में लापरवाहियां कीं। ये लोग दुनियां को कोविड से बचने का ज्ञान देते रहे किंतु खुद ही जागरूक नहीं थे ! कोरोना के भय, मुसीबतों और इस पर डिबेट में ऐसी बातें भी चर्चा का विषय बनी हैं। इस संजीदा और बुरे वक्त में संक्रमित बड़ी.हस्तियों का मजाक उड़ाने वालों की भी कमी नहीं है। आम इंसान ही नहीं खास लोग भी कोरोना पीड़ित ख़ास लोगों का मज़ाक उड़ा रहे हैं। राजनीति कर रहे हैं। कोरोना पीड़ित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सवाल पूछा है कि क्या आपने सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं रखा था ! दिग्विजय के अलावा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी खोने वाले कमलनाथ ने भी ट्वीट करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर तंज़ कसा है। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले कोरोना काल में ही मध्यप्रदेश के सियासी घटनाक्रम में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार चली गयी थी और यहां भाजपा की सरकार बनी जिसमें शिवराज सिंह चौहान पुनः मुख्यमंत्री बनाये गये। कांग्रेस ने आरोप लगाये थे कि भाजपा ने खरीद-फरोख्त कर उनके विधायकों को तोड़ कर सरकार गिरवायी। जाहिर सी बात है कि सूबे के कांग्रेसी दिग्गजों को अपनी सरकार के गिरने का मलाल होगा ही। ये कुंठा कहिए या प्रतिशोध की भावना कहिए, अब कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का मज़ाक उड़ा रहे हैं। महामारी से जूझ रहे देश के संकटकाल में गंदी सायासत का आलम ये है कि संक्रमितों का उपहास उड़ा जा रहा है। बिहार भाजपा कार्यालय और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कुछ पदाधिकारियों को कोरोना होने पर व्यंग्य किये गये। इसके अतिरिक्त एक मीडियों समूह के कार्यालय से लेकर बिग बी के बंगले जलसा में संक्रमण फैलने को भी कुछ लोगों ने मजाक में लिया। हांलाकि कोई वर्ग, कोई क्षेत्र और पेशा कोविड के कहर से छूटा नहीं है। लेकिन जब जागरूकता की बात करने वाले और लापरवाही पर एतराज करने वाले इसका शिकार होते हैं तो ऐसे लोगों को सोशल मीडिया में खूब निशाने पर लिया जाता है। सिंगर कनिका कपूर और मरकज के जमातियों का भी जिक्र होता है। तर्क दिया जाता है कि कोरोना काल के शुरुआती दौर में कनिका और जमातियों के संक्रमित होने पर उन्हें लापरवाह बताया गया था। और अब ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो कहते थे कि ये वायरस लापरवाही करने से क़ाबिज होता है। नवेद शिकोह

Dakhal News

Dakhal News 30 July 2020


bhopal, construction , Ram temple,  politics of

अजय कुमार, लखनऊ लखनऊ। पांच अगस्त को अयोध्या में प्रभु राम की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन के साथ ही हिन्दुस्तान की सियासत का एक महत्वपूर्ण पन्ना बंद हो जाएगा। तीन दशकों से भी अधिक से समय से देश की सियासत जिस ‘मंडल-कमंडल’ के इर्दगिर्द घूम रही थी, वह अब इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। मंडल यानी पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बना आयोग और कमंडल मतलब आयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा चलाया गया अभियान। मंडल-कमंडल की सियासत ने अगड़े-पिछड़े के नाम पर हिन्दुओं में बड़ी फूट डाली थी और इसके लिए संविधान को मोहरा बनाया गया था। दरअसल, 1931 की जनगणना के हिसाब से देश में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जनसंख्या 52 फीसदी और अनुसूचित जाति (एससी) की 16 एवं व अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 7.5 प्रतिशत थी। एससी और एसटी वर्ग को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता था, जबकि पिछड़ा समाज के लोग अपने लिए भी आरक्षण चाहते थे। इसकी वजह थी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 (4), जो कहता है कि सरकार पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है। बहरहाल, जब तत्कालीन केन्द्र सरकार पर पिछड़ों को आरक्षण के लिए काफी दबाव पड़ने लगा तो प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग गठित कर दिया। 1978 में बने बी पी मंडल आयोग ने 12 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट मोरारजी सरकार को सौंपते हुए जनसंख्या के हिसाब से ओबीसी को 52 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन इन सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। जब मंडल आयोग ने सिफारिश की थी तब मोरारजी देसाई की ही सरकार थी, जो आपसी खींचतान के चलते अपना कार्यकाल पूरा किए बिना गिर गई थी। मोरार जी की सरकार गिरने के बाद हुए लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने लेकिन बोफोर्स घोटाले के कारण जनता में भरोसा खो दिया और एकजुट विपक्ष ने उन्हें चुनाव में पटखनी दे दी। तत्पश्चात वी पी सिंह संयुक्त मोर्चे के प्रधानमंत्री बने। मोर्चे में देवी लाल, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे जो अपने आप को पिछड़ों का नेता कहते थे और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होते हुए देखना चाहते थे। प्रधानमंत्री वीपी सिंह के सामने हालात यह बन गए कि अगर मंडल कमीशन लागू नहीं किया तो उक्त नेता उनकी सरकार गिरा देंगे। इसी दबाव के बीच वीपी सिंह ने 7 अगस्त 1990 को मंडल कमीशन की रिपोर्ट की धूल झाड़ी और 13 अगस्त 1990 को इसे लागू कर दिया। लेकिन इसके कुछ दिनों के बाद इन नेताओं ने वीपी की सरकार गिरा कर ही चैन लिया। उधर, मंडल कमीशन लागू होते ही 12 सितंबर 1990 को दिल्ली में बीजेपी की मीटिंग बुला ली गई। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के तुरंत बाद ही भाजपा ने कमंडल अर्थात अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनवाने की लड़ाई अपने हाथों में ले ली। भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा शुरू करने का एलान कर दिया। आडवाणी की इस यात्रा को मंडल की काट के रूप में देखा गया। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से देशभर में सवर्णों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। यह ऐसा दौर था जब उत्तर भारत की जाट, पटेल, मराठा जैसी बड़ी किसान जातियां सवर्णों के साथ विरोध प्रदर्शन में भाग ले रही थी तो दूसरी तरफ ‘आओ अयोध्या चलें’ वाले कमंडल के नारों के साथ जयकारे लगा रही थी। इसी बीच मंडल कमीशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को अपने फैसले में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण न करने की बात कहकर 52 फीसदी ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण तक सीमित कर दिया व एक लाख रुपये से ज्यादा आय वालों को क्रीमीलेयर की श्रेणी में डाल दिया, जो आज तक बदस्तूर जारी है। उधर, अन्य सियासी घटनाक्रम में एक तरफ लालू यादव व मुलायम सिंह यादव कमंडल का विरोध करते हुए मुसलमानों के नेता बन गए थे तो दूसरीं तरफ इन नेताओं ने यादवों को आरक्षण दिलवाकर उनका भी विश्वास जीत लिया। लेकिन समय के साथ मंडल की आग धीमी पड़ती गई और बीजेपी अयोध्या मुद्दे को गरमाती रही। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद हिन्दुओं में जो खाई पैदा हो गई थी, उसे कमंडल की राजनीति ने पूरी तरह से पाट दिया और पूरा हिन्दू समाज एकजुट होकर मंदिर निर्माण के पक्ष में खड़ा हो गया। इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और बीजेपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बहरहाल, पांच अगस्त को भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन के साथ बीजेपी की कमंडल की सियासत भी खत्म हो जाएगी। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि मंदिर निर्माण के साथ ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच की खाई भी खत्म हो जाएगी क्योंकि मंदिर के साथ मस्जिद का भी निर्माण हो रहा है। यह काफी सौहार्दपूर्ण स्थिति है।   ऐसा लगता है कि अयोध्या में श्री राम मंदिर के भव्य निर्माण के साथ ही देश में सांप्रदायिक समरसता का भी नया युग प्रारम्भ हो जाएगा। तीन दशकों से जन्मभूमि विवाद के कारण देश के सांप्रदायिक सद्भाव को गहरी चोट पहुंच रही थी। गत वर्ष नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवाद के समाधान के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों पक्षों ने जिस सहिष्णु मानसिकता के साथ सारे पूर्वाग्रह त्यागकर इसे स्वीकार किया, उसने पूरी दुनिया को चौंकाया जबकि दशकों से इसे मुद्दा बनाकर वोटबैंक राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को निराश किया। इससे यह धारणा भी पुष्ट हो गई कि मंदिर-मजिस्द के नाम पर राजनीति दल और कारोबारी मानसिकता के संगठन स्वार्थ सिद्ध कर रहे थे, दोनों पक्षों के आम लोगों की विवाद बढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी। लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Dakhal News

Dakhal News 28 July 2020


bhopal, Corona swallows, education business, owner and the master

  एक बड़े कॉलेज के मैनेजिंग डायरेक्टर से बात हुई। हालचाल पूछा तो बोले- हाल तो बेहाल हैं। कोरोना के चलते हॉस्टल खाली हैं। छात्र गायब हैं, छात्रों ने फीस नहीं दी है। एडमिशन का समय है, लेकिन नए छात्र रजिस्ट्रेशन भी नहीं करवा रहे हैं। कमाई पूरी तरह ठप है। कहां से दें अध्यापकों और बाकी कर्मचारियों का का वेतन। बोले-भाई साहब ऐसा ही चलता रहा तो 70 फीसदी प्राइवेट कॉलेज बंद हो जाएंगे। प्राइवेट कॉलेज के अध्यापक आत्महत्या पर मजबूर हो जाएंगे।   कुछ दिन पहले एक मित्र का फोन आया था। कस्बाई इलाके में इंटर तक प्राइवेट स्कूल चलाते हैं। छात्रों ने स्कूल में आना बंद कर दिया तो अभिभावकों ने फीस भी बंद कर दी। अध्यापक से लेकर चपरासी तक पैदल हो गए। मुझसे कहा-सर मीडिया में ये बात उठवाइए, बेलआउट पैकेज तो स्कूल और कॉलेजों को मिलना चाहिए।     मेरे बहुत ही घनिष्ठ मित्र एजुकेशन के बिजनेस में हैं । उनके लाखों रुपये तमाम मेडिकल कॉलेजों में फंसे हैं। कॉलेज पैसे नहीं दे पा रहे हैं और इस पेशे में इतना बैक अप नहीं होता कि वो बहुत दिनों तक अपने पास से कर्मचारियों को वेतन दे पाएं।   गाजियाबाद के एक डेंटल कॉलेज की हालत ये है कि वहां चार महीने से स्टाफ को वेतन नहीं मिला है। मैनेजमेंट ने कह दिया है कि आप चाहे आएं या न आएं आपकी मर्जी। हम तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं हैं। कॉलेज में फीस नहीं आ रही है। नीट का इम्तिहान भी आगे बढ़ गया है, जाने कब इम्तिहान होगा, कब नतीजे आएंगे और कब छात्र कॉलेज पहुंचेंगे। नए एडमिशन हो नहीं रहे हैं, कॉलेज में पैसे कहां से आएं। तमाम प्राइवेट स्कूल-कॉलेजों की हालत खस्ता है। प्राइवेट कॉलेज के कई अध्यापक अब सब्जी और फल बेच रहे हैं। ऐसी खबरें रोज आ रही हैं।   उन अभिभावकों की भी हालत खराब है, जो प्राइवेट नौकरी में रहते हुए छंटनी के शिकार हो गए या फिर बिजनेस में थे और कोराना काल के लॉकडाउन में उनके बिजनेस की रीढ़ ही टूट गई। जिंदगी में दो जून की रोटी के लाले पड़ गए तो बच्चों की फीस का इंतजाम कहां से करें..? ये लोग और आर्थिक दुष्चक्र में फंसे कॉलेज मालिक हर रोज एक नई सुबह का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अंधेरा छंटने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोरोना से बच भी गए तो इस अंधेरे से बचने का उनके पास रास्ता क्या है..?   ये हालत उन मेडिकल, इंजीनियरिंग और सामान्य प्राइवेट कॉलेजों की है, जिनमें फीस अपेक्षाकृत कम है, जो बहुत मशहूर नहीं हैं। जो ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में हैं। जो बड़े शहरों में फाइव स्टार स्कूल और कॉलेज हैं, वहां ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चों की 4-4 घंटे तक ऑनलाइन क्लास चल रही है। बच्चे पस्त हो जा रहे हैं, गार्जियन के सामने नए-नए बहाने बना रहे हैं। बच्चे अवसाद के शिकार भी हो रहे हैं।   ऐसे स्कूलों में फीस न देने का कोई रास्ता नहीं है। कोई मुरव्वत नहीं, फीस नहीं तो नाम कट। अब जहां-तहां से इंतजाम करके लोग फीस भर रहे हैं। यही नहीं तमाम स्कूल तो तय सीमा से ज्यादा फीस ले रहे हैं। वाहन बंद हैं, लेकिन उसकी फीस भी ली जा रही है। स्कूल प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि कोरोना काल में अभिभावक संगठित नहीं हो सकते तो इनकी पहले भी चांदी थी, अब भी चांदी है।   मेरे पुत्र भी एक फाइव स्टार प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं। कर तो रहे हैं बीए ऑनर्स, लेकिन फीस देते वक्त मुझे इंजीनियरिंग और मेडिकल में बेटे को पढ़ाने का गौरव महसूस होता है। सैमेस्टर की फीस जमा करने के लिए यूनिवर्सिटी सिर्फ 2 दिन का वक्त देती है। वो भी बिना पूर्व सूचना के। फीस में एक दिन की भी देरी हुई तो लेट पेमेंट के नाम पर करीब हजार रुपये का चूना। ज्यादा देर हो गई तो दोगुनी फीस भी देनी पड़ सकती है।   उन तमाम मध्यमवर्गीय, निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है, जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं। सबकी ऑनलाइन क्लास एक ही वक्त चलनी है। घर में पहले एक स्मार्ट फोन था तो अब जरूरत उससे ज्यादा की है। स्मार्ट फोन पर ऑनलाइन क्लास तो सजा ही है, सही मायने में तो लैपटॉप चाहिए। लेकिन 3-4 बच्चों के लिए 3-4 लैपटॉप का इंतजाम अभिभावक कैसे करेंगे..? अभी एक खबर आई है कि एक आदमी ने अपनी गाय बेचकर बच्चे के लिए मोबाइल खरीदा ताकि बेटा ऑनलाइन पढ़ाई कर ले। अब वो शख्स हर महीने मोबाइल डाटा रिचार्ज करने का पैसा कहां से लाएगा, भगवान जाने।   मेरठ में मेरे एक परिचित के तीन बच्चे हैं, तीनों की क्लास एक ही वक्त शुरू हो जाती है, अड़ोस-पड़ोस से मोबाइल मांगकर लाते हैं। घर में एक लैपटॉप है, उसको लेकर झगड़ा मचता है। मेरी एक पूर्व साथी ने कॉल करके बोला- सर ये स्कूल वाले तो बच्चों की जान ले लेंगे। गाइडलाइन है कि 8वीं तक के छात्रों की ऑनलाइन क्लास डेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन स्कूल वाले तो 3 से 4 घंटे तक बेटी को पीस रहे हैं। बेटी शायद दूसरी या तीसरी क्लास में पढ़ रही है।   कोरोना काल में अभिभावक की हालत ये है कि जैसे बच्चा पैदा करना अपराध हो गया है। वहां मुश्किल और भी ज्यादा जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी में हैं। उन्हें अपने काम पर जाना है और बच्चे को ऑनलाइन क्लास भी अटेंड करनी है। माता-पिता की गैरमौजूदगी में इंटरनेट पर बच्चा अपनी क्लास के अलावा क्या-क्या देख सकता है, खतरा आप समझ सकते हैं। वो भी बच्चे को किसके भरोसे छोड़कर जाएं..? अब जरा सरकारी स्कूलों का हाल भी सुनिए। यूपी के प्राइमरी टीचर्स को राशन कार्ड पर मुफ्त राशन बंटवाने की जिम्मेदारी दी गई है। मेरी एक मित्र प्राइमरी स्कूल में अध्यापक है। एक दिन फोन पर बता रही थी-मुफ्त राशन उन्हीं को मिल रहा है, जिनके पास राशन कार्ड है, लेकिन जो वाकई जरूरतमंद हैं, उनमें से ज्यादातर के पास न तो राशन कार्ड हैं और न ही उन्हें राशन मिल रहा है। स्कूल भी चल रहा है, ऑनलाइन पढ़ाना है। अब अगर घर में स्मार्ट मोबाइल फोन की हैसियत होती तो वो सरकारी स्कूलों में क्यों पढ़ते। मेरी मित्र बता रही थी कि 40 बच्चों की क्लास में बमुश्किल दो बच्चों के घर मोबाइल फोन है। पढ़ाई भगवान भरोसे है।   आजतक न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से। विकास मिश्र

Dakhal News

Dakhal News 28 July 2020


bhopal, revised media policy,being implemented, destruction of Corona!

नवेद शिकोह कोराना के मुश्किल दौर में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संशोशित ‘मीडिया नीति 2020’ एक अगस्त से लागू होने जा रही है। ये देश के हजझारों मझौले अखबारों को महा कोरोना बन कर डराने लगी है। हिन्दी पट्टी के सार्वाधिक अखबारों वाले उत्तर प्रदेश में इसका सबसे अधिक खौफ है। इस सूबे से प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया के सदस्य संशोधित नीति के खिलाफ बगावती तेवर दिखा रहे है। मंझोले अखबारों पर लटकटी तलवार से प्रदेश की राजधानी के लगभग एक हजार राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों में सैकड़ों पत्रकारों की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए यहां पत्रकार मीडिया संगठनों के नेताओं पर दबाव बना रहे हैं कि वो संशोधित मीडिया नीति के खिलाफ आवाज उठायें। इस संशोधित नीति के तहत पच्चीस से पैतालिस हजार के बीच प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को आर.एन.आई. या एबीसी की जटिल जांच करानी होगी। इस जांच में मंहगी वेब प्रिंटिंग मशीन, न्यूज प्रिंट(अखबारी क़ागज) और इंक इत्यादि की डिटेल, कार्यालय स्टॉफ, पीएफ, प्रसार डिस्ट्रीब्यूशन के सेंटर आदि का विवरण देना होगा। कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्रों के लिए ऐसी अग्नि परीक्षा देना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता के लिए पच्चीस हजार से अधिक प्रसार होना ज़रूरी है। यदि मंझोले अखबार जांच से बचने के लिए अपने अखबारों का प्रसार पच्चीस हजार से कम करके लघु समाचार पत्र के दायरे में आ जाते हैं तो ऐसे अखबारों के सैकड़ों पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता समाप्त हो जायेगी। इसलिए यूपी के मीडिया संगठनों पर प्रकाशक और पत्रकार ये भी दबाव बना रहे हैं कि वे योगी सरकार से प्रेस मान्यता के मानकों को संशोधित करवाना का आग्रह करें। ताकि संशोधित मीडिया नीति के तहत जांच से बचने के लिए मझोले वर्ग से लघु समाचार पत्र के दायरे में आने वाले समाचार पत्रों के पत्रकारों की मुख्यालय मान्यता बच जाये।   इन तमाम घबराहट, बगावत, सियासत और विरोध के बीच प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य अशोक नवरत्न और रज़ा रिज़वी केंद्र सरकार के सूचना एंव प्रसारण मंत्रकालय के फैसले के खिलाफ प्रकाशकों और पत्रकारों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कुछ मीडिया संगठनों ने भी संशोधित नीति का विरोध करना शुरु कर दिया है। इसे छोटे अखबारों को खत्म करने की साजिश बताया जा रहा हैं। चर्चा ये भी है कि देश के चंद बड़े अखबारों ने स्थानीय अखबारों को खत्म करने के लिए ऐसी साजिश रची है। सोशल मीडिया पर प्रकाशकों और कलमकारों का विरोध मुखर हो रहा है- हर क्षेत्र की बड़ी ताकतें होती हैं। ऐसी शक्तियां अपने क्षेत्र की संघर्षशील प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहतीं। जैसा कि उभरते हुए फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की आत्महत्या की वजह के पीछे फिल्म उद्योग की बड़ी ताकतों को शक की निगाहों से देखा जा रहा है। ताकत की ताकत से दोस्ती होती है। बड़ी मीडिया इंडस्ट्रीज की हर सरकार से दोस्ती रही है। दोस्त दोस्त के काम भी आता है। इन दिनों कोरोना काल की तबाही में तबाह होती हर इंडस्ट्री की तरह मीडिया की अखबारी खर्चीली ब्रॉड इंडस्ट्री बुरी तरह आर्थिक मंदी का शिकार है। कई संस्करण बंद कर दिए, पेज भी कम कर लिए। छंटनी कर ली। वेतन आधा कर दिया। कांट्रेक्ट पर काम कर रहे मीडियाकर्मियों का रिनिवल बंद कर दिया। कॉस्ट कटिंग और छट्नी की तलवाल भी चला दी, लेकिन फिर भी कमाई के मुख्य द्वारा लगभग बंद हैं। वजह साफ है। मीडिया में सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन ही अर्निंग के दो रास्ते होते हैं। कोरोना की चपेट में ये आधे हो गये हैं। सरकार आने वाले समय में विज्ञापन जैसे खर्चों का खर्च और भी कम कर सकती है। गैर सरकारी विज्ञापन आधे से भी कम हो गया है। कार्पोरेट के कामर्शियल विज्ञापनों से लेकर वर्गीकृत विज्ञापन बेहद कम हो गये हैं।अब कैसे अपने बड़े खर्च पूरे करें ! कैसे विज्ञापन का स्त्रोत बढ़ायें ! इस फिक्र में बड़े ब्रॉड अखबारों को एक रास्ता सूझा होगा ! विज्ञापनों के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे लोकल अखबारों के हिस्से में चला जाता है। ये खत्म हो जायें या लघु वर्ग में पंहुचकर इनकी विज्ञापन दरें बेहद कम हो जायें तो सरकारी विज्ञापन के अधिकांश बजट पर बड़े अखबारों का कब्जा हो जायेगा। ये डूबते को तिनके का सहारा होगा। शायद इसी लिए ही देश के बड़े मीडिया समूहों के दबाव में इस कोरोना काल के तूफान में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संशोधित मीडिया पॉलिसी लागू कर रहा है।नहीं तो ऐसे वक्त में जब पीआई बी में नियमित अखबार जमा होने का सिलसिला तक चार महीने से रुका है। आर एन आई ने तीन महीने विलम्ब से एनुअल रिटर्न का सिलसिला शुरू किया। देश में सबकुछ अस्त-वयस्त है। पुराने जरूरी रुटीन काम तक बंद है। सूचना मंत्रालय के अधीन कार्यालय में ही कोरोना संक्रमण से बचाव के मद्देनजर शेडयूल वाइज थोड़े-थोड़े कर्मचारी बुलाये जाते हैं। ऐसे में देश के सैकड़ों अखबारों और सैकड़ों कर्मचारियों को फील्ड में निकल कर इकट्ठा होने का नया काम देने वाली नई संशोधित मीडिया पॉलिसी को हड़बड़ी में लागू करने का क्या अर्थ है ! नियमानुसार मीडिया पॉलिसी संशोधन से पहले प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया की सहमति लेना जरुरी होती है, किंतु कौंसिल के सदस्य आरोप लगा रहे हैं कि इस संबंध में उनसे परामर्श के लिए कोई बैठक तक नहीं हुई। उत्तर प्रदेश से कौंसिल के सदस्य सवाल उठा रहे हैं कि कोरोना काल में कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्र जो पहले ही आर्थिक तंगी से बेहाल हैं ऐसे में उनपर जांच थोपने का क्या अर्थ है। ऐसे में देश के कोरोना काल में मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के प्रकाशकों को एक नया कोरोना डराने लगा है। कोविड 19 वाले कोरोना वायरस की चपेट वाले तीन फीसद को जान का खतरा और 97% को ठीक होने की उम्मीद होती है। लेकिन यहां अखबार के प्रकाशकों को जिस नये कोरोना का डर सता रहा है उसमें 97% को खत्म हो जाने का डर है।   पब्लिशर्स को डराने वाले कोरोना संशोधित मीडिया पॉलिसी के अंतर्गत मंझोले वर्ग के प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को निर्देश दिया गया है कि इन्हें आर.एन.आई या ए बी सी की जटिल जांच की अग्नि परीक्षा से ग़ुजरना होगा। तब ही मध्यम वर्गीय प्रसार संख्या वर्ग में सरकारी विज्ञापन की दर बर्करार रहेगा, अन्यथा इनकी डीएवीपी की मान्यता समाप्त कर दी जायेगी। जांच ना कराने की स्थिति में प्रकाशकों के पास एक मौका है। वो पच्चीस हजार के ऊपर के प्रसार का दावा छोड़कर पच्चीस हजार के अंदर प्रसार का ही दावा करें। यानी लघु समाचार के वर्ग में आकर वो कम विज्ञापन दरों में ही संतोष करे, अन्यथा जांच करायें। जो ज्यादातार प्रकाशकों के लिए मुम्किन ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए प्रकाशक कह रहे हैं कि जांच का ये कोरोना हमें मार देगा !

Dakhal News

Dakhal News 28 July 2020


bhopal, Anchor Deepti Yadav,new flight ,Corona era ,

सूर्या समाचार सहित कई न्यूज़ चैनलों में बतौर एंकर और प्रोड्यूसर काम करने वाली दीप्ति यादव इन दिनों अपने पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेढ़क’ से वापसी कर चुकी है और पूरी तरह सक्रिय है। 9 जुलाई को लांच हुए इस पॉडकास्ट चैनल की लोकप्रियता को देखते हुए इसे स्पॉटीफाई सहित 6 प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया है। इस चैनल के जरिये दीप्ति यादव युवा कवियों और लेखकों की रचनाओं और कहानियों को बिल्कुल अलग अंदाज में पेश करती हैं। इसके अलावा वह खुद की कविताओं को भी बेहद रोचक तरीके से पेश करती हैं। इस तरह यह प्लेटफॉर्म गलियों और मोहल्लों के युवा लेखकों को प्रमोट करने का एक माध्यम बनता जा रहा है। उनके पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेंढक’ का नाम जितना दिलचस्प है उतना ही दिलचस्प है इस चैनल का हर एक एपिसोड का कंटेंट। फिलहाल दीप्ति यादव खुद इसका कंटेंट भी लिख रही है, एडिटिंग भी कर रही है, आवाज़ भी दे रही है और सबसे खास बात इसके हर एपिसोड में एक मेंढक भी आता है जिसकी आवाज़ भी खुद दीप्ति ही दे रही हैं। हमेशा एंकर के रूप में दिखने वाली दीप्ति इन दिनों कविताएं भी लिख रही है और कवि सम्मेलनों में अपने एंकर और रेडियो जॉकी अंदाज़ को समावेशित कर बेहतरीन प्रस्तुति भी दे रही है। एक वॉइस ओवर आर्टिस्ट के तौर पर अब तक कई सारे कमर्शियल ऐड का चुकी है फ़िलहाल कुछ कार्टून कैरेक्टर के वॉइस ओवर के लिए भी कई कंपनियों से उनकी बात चल रही है। पॉडकास्ट एक नए तरीके का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जिसमें खुद का रेडियो चैनल बना कर अपनी रचनात्मकता को नया आयाम दिया जा सकता है। इसे आवाज की दुनिया का टिकटॉक कहा जा सकता है। यूपी के उन्नाव जैसे छोटे शहर से निकली और कानपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने वाली दीप्ति रेडियो से भी बेहद प्यार है और इसी रेडियो को उन्होंने पॉडकास्ट में बेहतर उतारा है। उनके पॉडकास्ट चैनल की तारीफ ‘भाभी जी घर पर हैं’ के टिल्लू यानी सलीम ज़ैदी भी कर चुके है। 2019 में सूर्या समाचार में कार्यरत दीप्ति यादव ने स्वास्थ्य कारणों के चलते चँनेल से इस्तीफा दिया था। लॉकडाउन के दौर में जब मीडिया सेक्टर में जबर्दस्त छंटनी का दौर चल रहा है, दीप्ति ने दिखाया है कि अगर आपके अंदर रचनात्मकता और आईडिया है तो आपके पास विकल्पों की कमी नही है। सोशल मीडिया के इस जमाने में खुद को साबित करने के लिए किसी बड़े बैनर की जरूरत नही और न ही किसी एकलव्य की तरह किसी को अंगूठा काट के देने की विवशता झेलनी पड़ती है। आप भी उनके इस प्लेटफॉर्म से जुड़ सकते हैं और सुझाव भी दे सकते हैं.. आपका स्वागत है.

Dakhal News

Dakhal News 23 July 2020


bhopal, Keep , Indian media, silly joke,shamiana!

एक बादशाह ने रफूगर रखा हुआ था, जिसका काम कपड़ा रफू करना नहीं, बातें रफू करना था. एक दिन बादशाह दरबार लगाकर शिकार की कहानी सुना रहे थे, जोश में आकर बोले – एकबार तो ऐसा हुआ मैंने आधे किलोमीटर से निशाना लगाकर जो एक हिरन को तीर मारा तो तीर सनसनाता हुआ हिरन की बाईं आंख में लगकर दाएं कान से होता हुआ पिछले पैर के दाएं खुर में जा लगा. जनता ने कोई दाद नहीं दी. वो इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे. इधर बादशाह भी समझ गया ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी छोड़ दी.. और अपने रफूगर की तरफ देखने लगा… रफूगर उठा और कहने लगा.. हज़रात मैं इस वाक़ये का चश्मदीद गवाह हूँ, दरसल बादशाह सलामत एक पहाड़ी के ऊपर खड़े थे हिरन काफी नीचे था, हवा भी मुआफ़िक चल रही थी वरना तीर आधा किलोमीटर कहाँ जाता है… जहां तक बात है ‘आंख’ , ‘कान’ और ‘खुर’ की, तो अर्ज़ करदूँ जिस वक्त तीर लगा था उस वक़्त हिरन दाएं खुर से दायाँ कान खुजला रहा था,… इतना सुनते ही जनता जनार्दन ने दाद के लिए तालियां बजाना शुरू कर दीं… अगले दिन रफूगर बोरिया बिस्तरा उठाकर जाने लगा… बादशाह ने परेशान होकर पूछा– कहाँ चले? रफूगर बोला- बादशाह सलामत मैं छोटी मोटी तुरपाई कर लेता हूँ, शामियाना सिलवाना हो तो इंडियन मीडिया को रख लीजिए!

Dakhal News

Dakhal News 23 July 2020


bhopal, Supreme Court, angry, Prashant Bhushan , tweet

Pushya Mitra : अगर यह अवमानना है तो सोचता हूँ, थोड़ी सी सविनय अवमानना मैं भी कर लूं। खबर है कि इस ट्वीट के लिये प्रशांत भूषण जी पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा हुआ है। Vijay Shankar Singh : सीजेआई जस्टिस बोबड़े की एक फोटो एक महंगी मोटर बाइक पर खूब चर्चित हुयी और उसी का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट कर दिया। अब उस ट्वीट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की नोटिस जारी कर दी है। यह भी खबर थी कि वह बाइक एक भाजपा नेता की थी, और जस्टिस बोबडे बिना हेलमेट के उस बाइक पर बैठे थे। न्यायमूर्ति अरुण मिश्र अवमानना पीठ के अध्यक्ष हैं। यह मामला वह सुनेंगे। प्रशांत भूषण का ट्वीट इस प्रकार है,CJI rides a 50 Lakh motorcycle belonging to a BJP leader at Raj Bhavan Nagpur, without a mask or helmet, at a time when he keeps the SC in Lockdown mode denying citizens their fundamental right to access Justice! इस ट्वीट में कौन से तथ्य मिथ्या हैं ? बाइक बीजेपी के नेता की है, सीजेआई, न तो मास्क लगाए हैं, और न हैलमेट। लॉक डाउन चल भी रहा था और अदालतें बंद भी थीं। फिर यह खुन्नस है या सच मे अदालत की तौहीन अब यह जब अदालत तय करे तो पता चले ! Jitendra Narayan : केवल प्रशांत भूषण पर ही क्यों? हम सब पर भी चलाओ अवमानना का केस…देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप मे आपकी हरकतें निंदनीय है और मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा के खिलाफ है…आपके दिए कई फैसले भी पूर्णतः पक्षपातपूर्ण और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है!

Dakhal News

Dakhal News 22 July 2020


bhopal, car of criminals , shot journalist, head, front daughters

Vikas Mishra : गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी पर गोली चलाने वाले पकड़े गए हैं। पुलिस ने 9 बदमाशों को गिरफ्तार किया है। आमतौर पर बदमाशों के पैर में गोली मारकर गिरफ्तार करने वाली यूपी पुलिस ने इन अपराधियों को ‘रक्तहीन’ तरीके से गिरफ्तार किया है। पत्रकार विक्रम जोशी की भानजी के साथ कुछ बदमाश छेड़खानी कर रहे थे। इसकी रिपोर्ट लिखवाने वे गाजियाबाद के विजय नगर थाने गए थे। पुलिस ने रिपोर्ट तो नहीं लिखी। अलबत्ता रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश से खुन्नस खाए बदमाशों ने विक्रम जोशी पर ताबड़तोड़ गोलीबारी कर दी। एक गोली उनके सिर में लगी हुई है। अस्पताल में उनकी हालत गंभीर है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वो जल्द ही विक्रम जोशी को पूर्ण स्वस्थ करें। जिस वक्त बदमाशों ने विक्रम जोशी को गोली मारी, उस वक्त वे अपनी दो बेटियों के साथ टहलने निकले थे। बेटियां चिल्ला रही थीं, लेकिन अपराधियों पर खून सवार था। अब इन अपराधियों को अदालत, हवालात या जेल ले जाते वक्त अगर पुलिस की गाड़ी पलट जाए तो अपराधी जरूर पुलिस से पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश करेंगे। पुलिस पर गोली भी चलाएंगे। ऐसे में अगर पुलिस ‘आत्मरक्षार्थ’ उन्हें गोलियों से भून डालती है तो मैं व्यक्तिगत रूप से पुलिस का समर्थन करूंगा। यही नहीं, 24 घंटे बाद गिन लीजिएगा, मुझे यकीन है कि इस पोस्ट के कमेंट बॉक्स में आकर कम से कम 100 लोग इस बात का समर्थन करेंगे, जिनमें से ज्यादातर पत्रकार साथी होंगे। अगर पुलिस ऐसा कर पाई तो शायद अपना पाप भी धो सके। मुझे और मेरे तमाम पत्रकार साथियों को उम्मीद है कि बारिश के इस मौसम में गाजियाबाद पुलिस की गाड़ी जरूर फिसलेगी। नहीं फिसली तो भी पुलिस को ‘आत्मरक्षार्थ’ गोली चलाने का मौका जरूर मिलेगा। आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से।

Dakhal News

Dakhal News 22 July 2020


bhopal, Journalist Vikram Joshi could not be saved

पत्रकार साथी विक्रम जोशी की इलाज के दौरान डेथ हो गई है। उनके भाई अनिकेत द्वारा ये जानकारी दी गई है। अनिकेत के अनुसार उन्हें आज सुबह 4 बजे इस बारे में बताया गया। भगवान विक्रम भाई की आत्मा को शांति दे। इस कठिन वक़्त में हम उनके परिवार के साथ खड़े हैं। विक्रम भाई को शहीद का दर्जा मिलना चाहिए। आरोपियों को मुठभेड़ में मारा जाना चाहिए। थाना प्रभारी पर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए जिसने पत्रकार द्वारा लिखित कंप्लेन दिए जाने के बावजूद आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। उधर, इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर दुख और क्षोभ व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 50 लाख रुपये की तात्कालिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में हेमंत तिवारी ने कहा कि की विगत एक वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमले, सरकारी उत्पीड़न, फर्जी मुकदमे लगाने की दर्जनों घटनाएं हुईं और हर बार शासन के वरिष्ठ अधिकारियों से बात हुई, पत्र लिखे गए लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि संवेदनशीलता नही दिखी । उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इस बार भी नकारात्मक रवैया अपनाती है तो पूरे प्रदेश पत्रकारों से संग्रह कराकर पीड़ित परिवार का सहयोग किया जाएगा ।परसों आपराधिक तत्वों ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की गोली मार दी थी जिनकी कल रात मौत हो गई है। जोशी को विजय नगर इलाके में स्कूटी सवार बदमाशों ने सोमवार को सिर में गोली मारी थी। इस सिलसिले में कल तक नौ लोगों को गिरफ्तार और चौकी इंचार्ज को निलंबित किया गया था।   विजयनगर बाईपास निवासी विक्रम जोशी एक समाचार पत्र से जुड़े थे। सोमवार रात वह माता कॉलोनी निवासी बहन के घर गए थे। रात करीब 10:30 बजे वहां से आते समय कुछ बदमाशों ने उन पर हमला बोल दिया। एक बदमाश ने तमंचा सिर से सटाकर विक्रम को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर हमलावर फरार हो गए। परिजनों के मुताबिक विक्रम जोशी के परिवार की एक लड़की के साथ छेड़छाड़ हुई थी। इस संबंध में थाने में नामजद शिकायत की गई थी। पुलिस द्वारा कार्रवाई न करने पर आरोपी पीड़ित पक्ष को लगातार धमकी दे रहे थे। विक्रम इस मामले की पुलिस में पैरवी कर रहे थे। इसी बात को लेकर आरोपियों ने उन्हें गोली मार दी।

Dakhal News

Dakhal News 22 July 2020


bhopal,Miscreants shot journalist, head ,Ghaziabad , opposing molestation

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में बदमाश इतने बेखौफ हो गए हैं कि वह पत्रकारों पर भी गोली चलाने लगे हैं। गाजियाबाद में पत्रकार ने अपनी भांजी के छेड़ने की तहरीर पुलिस को दी थी। पुलिस ने ना उसमें कार्यवाही की और ना ही किसी की गिरफ्तारी की। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने पत्रकार को गोली मार दी। पत्रकार जिंदगी और मौत से अस्पताल में लड़ रहा है। गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी का कसूर बस इतना था अपनी भांजी को लगातार छेड़ने वालों के खिलाफ थाने में तहरीर दी थी। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने बीती रात विक्रम को गोली मार दी। विक्रम के सिर में गोली लगी है। वह गंभीर हालत में यशोदा अस्पताल में भर्ती है। पुलिस का कहना है कि आरोपियों पर कार्रवाई की जाएगी। सवाल ये है कि अगर पुलिस पहले ही आरोपियों पर कार्रवाई कर देती तो शायद विक्रम आज अस्पताल में भर्ती ना होता। गाजियाबाद में बदमाश लगातार हावी हो रहे हैं और पुलिस हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। बदमाश अब पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाने लगे हैं। जब पत्रकार ने तहरीर दी थी तो फिर आरोपी कैसे खुलेआम घूमते रहे? पुलिस लापरवाही का नतीजा है कि बदमाशों ने इस तरह की दुस्साहसिक वारदात को अंजाम दे डाला। फिलहाल पत्रकार साथी विक्रम जोशी की तबियत नाज़ुक बनी हुई है।

Dakhal News

Dakhal News 21 July 2020


bhopal,New phase of films on third screen

–रवि राय– दो महीने पहले तक मोबाइल पर मैंने कोई फ़िल्म नहीं देखी थी। लॉकडाउन के दौरान सिनेमाहाल बन्द हो गए। मित्रों की राय पर नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और सोनी लिव डाउनलोड किया। पता चला कि यहां एक अलग फिल्मी दुनिया बसी हुई है। मिर्ज़ापुर, पाताल लोक, रंगबाज़, द फैमिली मैन, आर्या, स्पेशल ऑप्स, असुर, बेताल, डेल्ही क्राइम , माधुरी टाकीज़, ब्रीद, ब्रीद इनटू द शैडो, अपहरण आदि कई फिल्में देख डालीं। आठ से बारह एपिसोड्स की इन फिल्मों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पंकज त्रिपाठी, मनोज बाजपेयी, माधवन, अमित साध, केके मेनन से लेकर सुष्मिता सेन, कल्कि, शेफाली शाह जैसे स्थापित कलाकार छाए हुए हैं। कोविड 19 के वर्तमान प्रकोप को देखते हुए यह तो स्पष्ट है कि सिनेमाहाल निकट भविष्य में खुलने वाले नहीं हैं।खुले भी तो कोरोना के डर से दर्शकों का टोटा ही रहेगा।ऐसी स्थिति में मोबाइल पर फ़िल्म देखने का यह दौर क्या ऐसे ही चलता रहेगा ? ज़ाहिर बात तो यही है कि कोरोना से पहले जब आम दर्शक के पास दोनों विकल्प थे, मोबाइल पर फ़िल्म देखना आम नहीं था।उच्च एवं मध्यवर्ग के दर्शकों के लिए हज़ार दो हज़ार के खर्च में परिवार के साथ हॉल में सीट पर बैठ कर फ़िल्म देखने का मज़ा ही कुछ और था।मगर फ़िल्म की असली कमाई टिकट खिड़की पर टूट पड़नेवाले सेकेंड क्लास, फर्स्ट क्लास, डीसी के दर्शकों से ही होती रही है। जैसे भी हो सिनेमा दर्शकों से हुई कमाई को ही बॉक्स ऑफिस का नाम दिया गया यानी सिनेमा की आमदनी। शुरुआती दिनों में सौ करोड़ को सफल और इससे भी अधिक की कमाई को सुपर-डुपर हिट कहा गया।सलमान, शाहरुख, आमिर आदि की कई फिल्में तो पांच से छह सौ करोड़ या इससे भी आगे तक चली गईं। वर्ष 2016 में आमिर खान की ब्लॉक बस्टर फ़िल्म ‘दंगल’ ने दो हज़ार करोड़ के वैश्विक आंकड़े के साथ सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। आमिर की ही पीके (2014) ने 832 करोड़,प्रभास की बाहुबली 2 (2016) ने 650 करोड़, सलमान की बजरंगी भाई जान (2015) ने 626 करोड़,सलमान की सुल्तान (2016) ने 584 करोड़, आमिर खान की धूम3 (2013) ने 542 करोड़ की कुल कमाई की। मूल प्रश्न तो यही है कि क्या मोबाइल एप्प से फिल्मों की लागत भर की कमाई भी हो सकेगी ?इसके उत्तर के लिए मोबाइल पर फिल्मों के बारे में थोड़ा गहरे उतरना पड़ेगा। ऑडियो विजुअल मनोरंजन क्षेत्र में सिनेमा स्क्रीन के बाद टेलीविजन को सेकेंड स्क्रीन की पहचान मिली । इसी क्रम में मोबाइल को अब थर्ड स्क्रीन कहा जाने लगा है। थर्ड स्क्रीन पर मनोरंजन या अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने वाले एप्प्स को OTT कहते हैं यानी कि OVER THE TOP प्लेटफार्म। भारत में NETFLIX, AMAZON PRIME, VOOT, ZEE5, VIU, MAX, SONY LIV, ALT BALAJI आदि तमाम प्लेटफॉर्म ने तो खुद अपनी फिल्मों का प्रोडक्शन शुरू कर दिया है।अभी सामान्यतः इनका शुल्क डेढ़ से दो सौ रुपये मासिक है। यह सुविधा विज्ञापनयुक्त होती है और विकल्प यह है कि यदि आप विज्ञापनमुक्त स्ट्रीम चाहते हैं तो अधिक दाम देना होगा।इसे प्रीमियम सर्विस कहा गया है। सिनेमा से OTT का तो अभी मुकाबला ही नहीं है पर केबल या डिश टीवी बिजनेस में OTT ने सेंध लगा दी है। KPMG की रिपोर्ट है कि वित्तवर्ष 2019 में केबल और सेटेलाइट के कुल 19.7 करोड़ यूज़र्स में लगभग डेढ़ करोड़ यूज़र्स कम हुए। इस गिरावट की वजह ग्राहकों द्वारा केबल का नवीनीकरण न कराना, नए टैरिफ रेट में बढ़ोत्तरी और OTT पर बेहतर फिल्मों की उपलब्धता रही। इस वक्त भारत में करीब चालीस OTT प्रोवाइडर्स हैं। वर्ष 2018 में OTT से 2150 करोड़ की कुल कमाई हुई जो 2019 में 3500 करोड़ हो गई। इस वर्ष यह आराम से 5000 करोड़ तक पहुंचेगी । KPMG का आकलन है कि OTT का मार्केट वर्ष 2023 तक 13800 करोड़ तक पहुंच जाएगा । Ernst &Young ने कहा है कि वर्तमान वर्ष में भारत में 50 करोड़ एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोनधारक OTT प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएंगे। अब OTT की आमदनी का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। OTT का बढ़ता चलन देखते हुए कई स्मार्ट टीवी अब इनबिल्ट OTT चैनल्स भी दे रहे हैं। विगत दिनों में अमिताभ और आयुष्मान खुराना की गुलाबो सिताबो तथा अभिषेक बच्चन की ब्रीद इनटू द शैडो OTT पर रिलीज हुई। अगले कुछ दिनों में OTT पर आने वाली प्रमुख फिल्में हैं- सुशांत सिंह राजपूत की दिल बेचारा,विद्या बालन की शकुंतला देवी, अक्षय कुमार की लक्ष्मी बॉम्ब, अजय देवगन की भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया, संजय दत्त, पूजा व आलिया भट्ट की सड़क 2, अभिषेक की द बिग बुल,विद्युत जामवाल की खुदा हाफ़िज़। इसके अतिरिक्त गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल, टोरबाज,लूडो, क्लास ऑफ ’83, रात अकेली है, डॉली किट्टी और वो, चमकते सितारे, काली खुही ,बॉम्बे रोज, भाग बीनी भाग, बॉम्बे बेगम्स ,मसाबा मसाबा, AK vs AK, गिन्नी वेड्स सनी, त्रिभंगा- टेढ़ी-मेढ़ी क्रेजी, अ सूटेबल बॉय, मिसमैच, सीरियस मेन भी थर्ड स्क्रीन पर उपलब्ध होंगी। कुल मिला कर भारत में फिल्मों का सीन तो यही बनता दिख रहा है कि अब अच्छी कहानी, पटकथा, फ़िल्म की स्पीड, अदाकारी और टेक्निकल सुपिरियारिटी के दम पर ही फिल्में चलेंगी। स्टारडम और प्रचार के बल पर फिल्में हिट कराने का दौर नहीं रहा।गुलाबो सिताबो या ब्रीद इनटू द शैडो का हाल सामने है।अब वह समय गया जब टिकट खरीद कर हाल में बैठ गए तो फ़िल्म अच्छी हो या खराब, देखनी ही है।बाद में हाल से बाहर भले ही झींकते हुए निकलें। OTT में फिल्म की शुरुआत में संक्षिप्त रिव्यू मौजूद है।फिर अगर कुछ देर देखने पर भी फ़िल्म मन माफिक नहीं लगी तो बन्द करिये दूसरी देखिये। क्यों अपना वक्त खराब करें ? सबसे बड़ी बात, फ़िल्म रिलीज़ के दिन ही आपके एंड्रॉइड मोबाइल पर हर फिल्म मौजूद है। अपनी सुविधानुसार जब चाहें देखें। OTT प्लेटफॉर्म पर यह तो रही सिर्फ फिल्मों की बात। खबरिया , किड्स, कुकरी , हेल्थ और रिलिजियस चैनल्स भी यहां आ गए हैं। ऑडियो स्ट्रीमिंग,VoIP कॉल, कम्युनिकेशन मैसेजिंग आदि भी OTT में ही शामिल हैं।अब पैसा फेंक तमाशा देख नहीं , पैसा फेंक और पैसावसूल तमाशा देख ! लेखक रवि राय गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के रिटायर्ड अधिकारी हैं. बैंकिंग करियर से पहले दैनिक जागरण, गोरखपुर के प्रारंभिक पत्रकारों में से रहे हैं और साहित्य के अनुरागी हैं.

Dakhal News

Dakhal News 21 July 2020


bhopal,Kanpuria editor ,earnestly helping ,Bhopal journalists, infected by Corona!

भोपाल : कोरोना संक्रमण में भी खुद को देश में नम्बर-1 बताने वाले अखबार के सम्पादक अस्पताल में भर्ती कोरोना पॉजिटिव स्टाफ से खबरें मंगा रहे हैं। जिन निगेटिव कर्मचारियों को ऑफिस बुला रहे थे, वे भी आ गए पॉज़िटिव! कनपुरिया सम्पादक सारी हदें पार कर जान लेने पर आमादा हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उत्तर प्रदेश से आये एक कनपुरिया सम्पादक इन दिनों खासी चर्चा में हैं। चर्चा है अखबार प्रेम को लेकर। अब इसके लिये पत्रकार चाहे कोरोना पॉजिटिव होकर मर ही क्यों न जाएं। दरअसल पिछले हफ्ते इस अखबार के कुछ पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हुए तो सम्पादक जी ने उन्हे छुट्टी नहीं दी। नतीजा पॉजिटिव पत्रकारों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पर संपादक जी लगातार दबाव बना रहे हैं कि नहीं दफ्तर आओ। वर्क फ्रॉम होम कुछ नहीं होता। दिलचस्प बात ये है कि कनपुरिया संपादक फोन पर दबाव बनाकर जिन कर्मचारियों को जबरन ऑफिस बुलाने धमका रहे थे, उन कर्मचारियों की रिपोर्ट भी पॉजीटिव आ गई। बस चले तो पूरा पॉजिटिव को भी अस्पताल से ऑफिस बुला लेंगे औऱ खुद घर मे दुबके बैठे हैं। तो साहब आलम ये है कि संपादक जी का पत्रकारों से प्रेम पत्रकारों पर ही भारी पड़ रहा है। मीडिया में खासकर प्रिंट मीडिया में कोरोना पॉजिटिव पत्रकारों के साथ ऐसे व्यवहार की खबरें आम होती जा रही हैं।।इस अखबार के मालिकान तो राज्यसभा सदस्य भी हैं।

Dakhal News

Dakhal News 17 July 2020


bhopal, Journalist organization welcomed Pyare Mian

IJU welcomes daily owner’s arrest in MP New Delhi : Welcoming the arrest of owner of Afkar daily Pyare Miyan, accused of raping four minor girls and running a sex racket in Madhya Pradesh, the Indian Journalists Union demanded strictest action be taken against him as other than his heinous crimes he had sullied the profession of journalism. Further, the Union demanded the SIT investigate the matter thoroughly in the backdrop of rumours he had a ‘quid pro quo relationship with those in power’. Miyan, who was absconding carried a reward of Rs 30,000 on his head, and was arrested in Srinagar, J&K on Wednesday following a group of minor girls in capital Bhopal being found by police in a disoriented condition on the city outskirts. Investigations reveal Miyan brought out Afkar, solely for ‘government advertisements and to get access to politicians, police and bureaucrats.’ SP (South) Sai Krishna Thota told The Indian Express that Miyan had travelled abroad with minor girls in past few years, though he passed these off as treatment/business-related. He was dealing in property and owns several properties in Bhopal and Indore and the district administration demolished a wedding hall built illegally by him and a flat among others. His flat, which the police broke into, resembles a dance bar with expensive liquor bottles and child pornography, sex toys etc. Miyan’s 21-year-old woman accomplice, a driver, a manager were taken into custody. In a statement, IJU President and former Member, Press Council of India Geetartha Pathak and Secretary General and IFJ Vice President Sabina Inderjit, regretted the media was getting a bad name because of crooks like Miyan. They welcomed cancellation of his accreditation and withdrawal of government quarter allotment in Professors’ Colony from where he ran his office. Noting Miyan’s activities suggest he had support of those in power the IJU insisted a thorough probe and all, including the powerful, be brought to book. Recalling, a similar case of Brajesh Thakur, who claimed to be a journalist and ran a sex racket in a girls’ shelter home in Muzaffarpur, Bihar, the Union called upon its members and journalist fraternity to uphold ethical standards and expose those who were misusing the profession for personal gains and power.

Dakhal News

Dakhal News 17 July 2020


bhopal, media dragons,frying , making dragon, gangster Vikas

अपराध के ‘रक्तबीजों’ को सींचता कौन है! हमारे देश का मीडिया अजब-गजब है। एक मुद्दे को चबाते हुए पचा नहीं पाता कि उसकी उल्टी कर दूसरे की तरफ लपक पड़ता है। ड्रैगन को बैगन बनाकर भून ही रहा था कि बीच में गैंगस्टर विकास दुबे आ गया..। प्राइम टाइम में सीधे श्मशान से अपने-अपने पैकेज के रैपर खोलने ही जा रहे थे कि..’सदी के महानायक’ कोरोना के साथ लीलावती अस्पताल पधार गए। कोरोना अब तेरी खैर नहीं, इसे ‘जंजीर’ में बाँधकर ‘शोले’ से जला देंगे बिग बी..से लेकर रेखा के रोमांस का ‘सिलसिला’ भी घुल गया। एंकर मोहतरमा रिपोर्टर से चीख-चीखकर पूछ रहीं थी..कि अब कोरोना की अगली स्ट्रैटजी क्या हो सकती है।   बंदरों के समान उस्तरे से अपनी ही नाक उतार रहे इन छिछोरों ने परदे पर गत्ते की तलवार भाँजने वाले लखटकिया (अरबटकिया) अभिनेता को सदी का महानायक घोषित कर दिया तो महात्मा गांधी, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चंद्रशेखर और सरहद पर प्राण देने वाले परमवीर योद्घा क्या हैं..! समझ में नहीं आता कि ब्रैकिंग सूचनाओं की यह सँडांध श्रोताओं/दर्शकों/पाठकों को किस नरक-कुंड में धकेलने को आमादा है।   बहरहाल लेख का विषय यह नहीं बल्कि सिस्टम की सँडांध का है, जहाँँ विकास दुबे जैसे अपराधी पनपते हैं और मरने के बाद भी उनके रक्तबीज से बहुगुणित संख्या में पजाते रहते हैं।   अपने देश में नेता-गैंगस्टर-पुलिस के घालमेल की तुलना आप शराब-सोडा-कबाब से कर सकते हैं। नेता और अपराधी शराब में सोडे की तरह एक दूसरे में घुले हैं..। जो आज गैंगस्टर है कल नेता हो सकता है।   दोनों की युति से चुनावी रथ का पहिया आगे बढ़ता है। पुलिस को इस काकटेल में स्नैक्स समझिए कभी-कभी कबाब की हड्डियां जायका खराब कर देती है..मुश्किल तभी होती है..।   विकास दुबे मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, अतीक अहमद जैसे रसूख को प्राप्त कर पाता कि कच्ची उमर में ही फँस गया..और जो तय है वही हुआ।   राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण की ओर बढ़ते हुए विकास दुबे के मार्फत अपराध की राजनीति को भी समझते चलें..।   सोशल मीडिया मेंं गैंगस्टर की जाति को लेकर उबाल है। जिसका मूलस्वर यह कि ठाकुर जाति के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुन-चुनकर ब्राह्मण बाहुबलियों को निपटा रहे हैं। इन संदेशों की छुपी मंशा यह है कि उन्हें मुसलमान बाहुबलियों का संहार करना चाहिए.. ठाकुर-बाम्हन तो मिल-पटकर रह भी लेंगे।   इसलिए बार-बार याद दिलाया जा रहा कि बिहार में डीएम की हत्या करने का आरोपी शहाबुद्दीन सही सलामत है, न उसका घर धंसाया, न मुठभेड़ हुई। अतीक और मुख्तार के जेल में रहने के बावजूद उनका कालासाम्राज्य वैसे ही चल रहा है।   अपने यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं स्वच्छंदता भी है सो सामाजिक समरसता जाए चूल्हे-भाड़ में जिसको जो मन पड़ेगा..लिखेगा. जहर घुलता है तो और घुले।   पिछले छह दशकों से अपराधी-पुलिस का साझा सहकार चलता रहा है, एक दूसरे का पूरक बनकर एक जैसी कार्यपद्धति अख्तियार करते हुए।   यह मैं नहीं कहता, साठ के दशक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में कुछ इसी तरह की तल्ख टिप्पणी की है – “मैं जिम्मेदारीपूर्वक सभी अर्थों के साथ कहता हूँ, पूरे देश में एक भी कानून विहीन समूह नहीं हैं जिसके अपराध का रिकार्ड अपराधियों के संगठित गिरोह पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो”   इस टिप्पणी को सरलीकृत करके आमतौर पर उल्लेख किया जाता है कि भारत में पुलिस अपराधियों के संगठित गिरोह से ज्यादा कुछ भी नहीं।   पुलिस तंत्र ऐसा स्वमेव बना या बनने के लिए विवश किया गया इसकी कहानी अँग्रेजों के समय से शुरू होती है। तब उसकी एक मात्र भूमिका स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपराधी बताकर दमन करने की थी। इसी पुलिस की लाठी से शेर-ए-पंजाब लाला लाजपतराय की हत्या हुई थी।   वोहरा, रुस्तम जी समेत पुलिस तंत्र में सुधार के लिए बने तमाम आयोगों और समितियों की सिफारिशों और संतुस्तियों के बाद भी पुलिस के प्रायः सभी मूल कानून और संहिताएं अँग्रेजों के जमाने की हैं।     आजाद भारत का सत्ता समूह गुलाम भारत के जमाने की पुलिस चाहता है ताकि विरोधियों को अपराधी बताकर उसी तरह दमन किया जाता रहे जैसा कि अँग्रेजों के जमाने में था।   विपक्ष जब सत्ता समूह बनकर आता है तो चूँकि उसे भी बदला भँजाना होता है इसलिए वह भी वैसा ही पुलिस तंत्र चाहता है..जो विरोधियों के लिए दमनकारी हो।   बहुत पहले एक नाट्यकृति पढ़ी थी। लेखक और नाटक का नाम विस्मृत है पर तथ्य और कथ्य आज भी याद है। नाटक रावण और मारीच पर केंद्रित था। रावण को सत्ताधारी दल का नेता और मारीच को स्थानीय गुंडा बताया गया था। रावण उसे राम (विपक्षी दल के नेता)को मारने की सुपारी देता है।   विपक्षी दल के नेता के गुणों से प्रभावित गुंडा जब सुपारी लेने से मना करता है तब सत्ताधारी दल का नेता धमकाता है..कोई मरे या न मरे पर तेरा मरना तो तय है..इसलिए बेहतर है कि तू मेरे दुश्मन को मारते हुए मर या फिर मेरी पुलिस से मुठभेड़ में मरने के लिए तैय्यार रह।   यह नाटक साठ सत्तर दशक का है। अपराध राजनीति में प्रवेश ही पा रहा था..। राजनीति में पूँजीपतियों के धनबल, गैंगस्टरों के बाहुबल के बीच गठबंधन होना शुरू हो चुका था। इधर जयप्रकाश नारायण ने जितने भी दुर्दांत दस्युओं का आत्मसमर्पण करवाया था उनमेंसे ज्यादातर राजनीति में अपने भविष्य की तलाश में लग गए थे।   मुंबई में हाजी मस्तान, वरदाराजन मुदलियार और करीमलाला जैसे स्मगलर अपराध में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रतीक बनकर उभर रहे थे। चुनावी फायदों के लिए विभिन्न दलों के नेता आधीरात कंबल ओढ़कर इनके ठिकाने आने लगे थे।   उत्तरप्रदेश और बिहार में हरिशंकर तिवारी और सूरजदेव सिंह जैसे कई बड़े सफेदपोश राजनीति की छतरी ओढ़ चुके थे। समाजवादी डकैतों को सोशल जस्टिस के लिए बीहड़ पर उतरे बागी बताने लगे थे..।   सन् सत्तर-पचहत्तर के आसपास राजनीतिक लोकतंत्र में अपराध की विषबेल का लिपटना शुरू हो चुका था..। इसके बाद मामला तेज रफ्तार से आगे बढ़ा।   नब्बे के आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रायः सभी तरह के अपराधी उद्योगपति बनने की होड़ में जुट गए, रियल स्टेट और ठेकेदारी इनके कब्जे में आती गई।   राजनीति में अकूत धन की ताकत का निवेश चमत्कारी साबित होने लगा। और जब देखा कि बड़े-बड़े कतली गिरोहबाज विधायक, सांसद और मंत्री हैं, वही पुलिस उनको सैल्यूट कर रही है तो राजनीति अपराधियों के लिए सुरक्षित स्वर्ग बनता गया। विकास दुबे तो बड़ा कतली गैंगस्टर था, उसकी ख्वाहिश भी बड़ी थी। आज तो मोहल्ले का गुंडा भी पार्षदी अपनी जेब में रखता है।   इतिहास में अपराधियों की राजनीति में प्रवेश की इतनी फूलप्रूफ योजनाओं के दृष्टांतों के चलते आखिर विकास दुबे चूक कहाँ गया..?   शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रघुराज प्रताप सिंह, अमरमणि त्रिपाठी, ब्रजेश सिंह जैसों की तरह सांसदी, विधायकी भोगने की जगह सीधे ऊपर भेज दिया गया।   दरअसल नेता-पुलिस-माफिया के गठजोड़ का खेल साँप-सीढ़ी जैसे होता है। सभी एक दूसरे के कंधे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनमें छोटे से लेकर बड़े, सभी साइज के स्वार्थ होते हैं। विकास दुबे पुलिस की आपसी अदावत औ छोटे स्वार्थ की भेंट चढ़ गया।   अपराध जगत कांटे से काँटा निकालने के लिए जाना जाता है। कभी अपराधी अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने के लिए पुलिस को हथियार बनाते हैं।   जैसे कि मुंबई का एनकाउंटरर पुलिस काँप दया नायक था(इस आरोप में जेल में भी रहा)। तो कभी पुलिस ही आपसी अदावत के चलते अपने पुलिस सहकर्मी को निपटाने के लिए गैंगस्टर की मदद लेती है।   कभी -कभी पुलिस और गैंगस्टर समझ भी नहीं पाते कि वे किसके मोहरे के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। बिल्कुल फिल्मी कथानक..नहीं यूँ कहें कि सही कथानक फिल्मों के लिए..। विकास दुबे इसी कथानक का एक मोहरा बनकर पिट गया।   कहानी बड़ी साफ है..। चौबेपुर के दरोगा विनीत तिवारी की उस परिक्षेत्र के डीएसपी देवेंद्र मिश्रा से अदावत थी। विनीत तिवारी विकास दुबे का खबरी और कानूनी मददगार था। विनीत ने विकास के दिमाग में यह बैठाया कि देवेन्द्र मिश्रा तुम्हारा दुश्मन है और तुम्हें बर्बाद कर देगा।   देवेंद्र मिश्रा वाकई विकास दुबे को बर्बाद करना चाहता था यह कहानी स्पष्ट नहीं, पर विकास ऐसा ही मानकर चल रहा था।   जिस विकास दुबे ने थाने में घुसकर एक राज्यमंत्री को गोली मारी हो, रसूख के चलते जल्दी ही अदालत से रिहा होकर फिर माफियागिरी में जुट गया हो, उसकी ताकत को जानते हुए मूरख से मूरख पुलिस अधिकारी भी सात आठ सिपाहियों के साथ मुठभेड़ करने नहीं जाएगा, यह जानते हुए कि सामने गैंग के रूप में समूची पलटन है।   यह भी संभव है कि देवेंद्र मिश्रा को यह फर्जी इनपुट दिया गया हो कि वह आज विकास दुबे को आसानी से पकड़ सकता है। कुलमिलाकर डबलक्रास जैसी स्थिति है।   अब इस घटना के प्रमुख किरदार विनीत तिवारी की तफसील से जाँच की जाए तो एक यह नया सूत्र सामने आ सकता है कि विनीत तिवारी को यह सब करने के लिए उस प्रतिद्वंद्वी ने प्रेरित किया हो जिसे विकास दुबे के बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व से खतरा रहा हो।   गाँव की प्रधानी और जिला पंचायत में विकास दुबे परिवार का कब्जा था, निश्चित ही विकास की यह ख्वाहिश रही होगी कि वह भी अन्य गैंगस्टरों की भाँति विधायक-सांसद बने।   इस कहानी की बुनियाद में भावी चुनाव की विधायकी और सांसदी का मुद्दा जुड़ा निकले तो यह कोई हैरत की बात नहीं।   उज्जैन में सरेंडर कर चुके विकास दुबे को यूपी पुलिस ने कैसे मारा..तरीका सही था या गलत यह पुलिस तंत्र व न्यायजगत के बीच बहस का विषय है लेकिन इस घटना ने यूपी की राजनीति को एक ट्विस्ट जरूर दिया है।   विकास की मौत के बाद राजनीति साँप की तरह पलट रही है। जातीय ध्रुवीकरण की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। कानपुर इलाके की वह पट्टी दबंग ब्राह्मणों के लिए जानी जाती है..विकास दुबे की रूह का चुनावी इस्तेमाल होगा।   यूपी में विधानसभा के चुनाव सामने हैं और भाजपा सपा दो के बीच मुकाबला। भाजपा सरकार पर विकास दुबे के मारने का आरोप है। संभव है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को वैसे ही टेकओवर करे जैसे कि मिर्जापुर जीतने के लिए फूलनदेवी का किया था। बात फिलहाल थमने वाली नहीं.. क्योंकि राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भाँति कुटिल होती है। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Dakhal News

Dakhal News 17 July 2020


bhopal, Modi government, engaged, teaching a lesson,news agency PTI, fined crores

केंद्र की मोदी सरकार ने समाचार एजेंसी पीटीआई को सबक सिखाने का काम शुरू कर दिया है. चीनी राजदूत के इंटरव्यू से नाराज मोदी सरकार ने इस न्यूज एजेंसी पर 84.4 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. पीटीआई से कहा गया है कि उसने वर्ष 1984 से उस सरकारी बिल्डिंग के किराए का भुगतान नहीं किया है जिससे इसका कामकाज संचालित होता है. ज्ञात हो कि पीटीआई का ये आफिस संसद मार्ग पर स्थित है. पीटीआई पर लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 84.48 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इसी लीज के तहत पीटीआई को दिल्ली में संसद मार्ग कार्यालय के लिए भूमि आवंटित की गई थी. ज्ञात हो कि केंद्र सरकार चीनी राजदूत सन सुन वेइदोन का इंटरव्यू पीटीआई द्वारा लिए जाने के जवाब में पीटीआई को दंडित कर रही है. पीटीआई को 84.48 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस जारी किया गया है. भुगतान के लिए 7 अगस्त का टाइम दिया गया है. न देने पर 10 प्रतिशत ब्याज लगेगा. किसी भी स्पष्टीकरण के लिए पीटीआई को एक सप्ताह का समय दिया गया है. कहा गया है कि पीटीआई ने 1984 के बाद से जमीन के किराए का भुगतान नहीं किया है. बेसमेंट के एक कार्यालय में बदलाव कर भूमि-आवंटन की शर्तों का दुरुपयोग किया है. लीज के अनुसार बेसमेंट का उपयोग केवल स्टोर के मकसद से करना था.

Dakhal News

Dakhal News 14 July 2020


bhopal, Brain stroke,senior journalist, Rajat Amarnath

एक दुखी करने वाली खबर है. दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ को ब्रेन स्ट्रोक का सामना करना पड़ा है. इसके चलते उनके शरीर का बायां हिस्सा पैरलाइज हो गया है. डाक्टरों का कहना है कि रजत अमरनाथ को समय से अस्पताल लाने और ब्रेन स्ट्रोक तत्काल डायग्नोज होने के चलते इलाज अतिशीघ्र शुरू कर दिया गया जिससे उनकी जान बच गई. रजत अमरनाथ को बोलने में अभी भी तकलीफ है. डाक्टरों ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी है. साथ ही तनाव न लेने को कहा है. कुछ साल पहले रजत अमरनाथ को दो बार हार्ट अटैक से भी गुजरना पड़ा था. ज्ञात हो कि रजत अमरनाथ किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहे हैं. वे तत्कालीन स्टार न्यूज समेत कई न्यूज चैनलों में बड़े पदों पर रहे हैं. दिल्ली के दरियागंज के निवासी रजत अमरनाथ जीवन में दूसरों की मदद करने का काम लगातार करते रहे हैं. जब जब भड़ास पर किसी के लिए मदद की अपील छपी तो रजत अमरनाथ ने उस अपील पर फौरन पहल करते हुए यथोचित मदद पहुंचाई. साथ ही ये ताकीद भी की कि उनका नाम न किसी को बताया जाए और न प्रकाशित किया जाए. रजत अमरनाथ के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना उनके मित्रों-परिचितों ने की है.

Dakhal News

Dakhal News 14 July 2020


bhopal, official bungalow, rapist journalist ,Pyare Mian , vacated

भोपाल : जिस पत्रकार महोदय को राज्य सरकार मान्यता दिए हुए थी, उसे सरकारी बंगला मिला हुआ था, वही पत्रकार बच्चियों के यौन शोषण में लिप्त था. ऐसा घटिया पत्रकार समाज में अभी तक सम्मान पाता रहा है. लेकिन पोल खुलने के बाद अब इनसे सब लोग हाथ खींचने लगे हैं. प्रदेश सरकार ने बलात्कारी प्यारे मियां की सरकारी मान्यता निरस्त कर दी है. उनसे सरकारी बंगला खाली कराने का आदेश दे दिया गया है. प्यारे मियां के शासकीय आवास को खाली कराने औऱ अधिमान्यता समाप्त करने के निर्देश खुद मुख्यमंत्री ने दिए हैं. पत्रकारिता के नाम पर गलत एवं अनैतिक कार्यों में संलिप्त था प्यारे मियां। ऐसे लोग ही पत्रकारिता को बदनाम करते हैं. भोपाल में नाबालिग बेटियों के यौन शोषण के मामले पर मुख्यमंत्री ने अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि इस मामले में जो भी शामिल है, उसमें से किसी को नहीं छोड़ा जाएगा. प्यारे मियां को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए हैं. ऐसी सूचना है कि प्यारे मियां को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. प्यारे मियां के बारे में एक अपुष्ट जानकारी मिली है कि ये भोपाल के ख्यातनाम गुंडे हैं। बताया जाता है कि सारे अखबार मालिक इनके आगे नतमस्तक रहते हैं। चर्चा है कि बच्चियों के यौन शोषण के मामले में भोपाल के एक बड़े अखबार मालिक के रिलेटिव भी शामिल थे, लेकिन पुलिस ने बचा लिया।

Dakhal News

Dakhal News 14 July 2020


bhopal,

लाकडाउन के बाद से बडे अखबारी समूहों में जहां बडे पैमाने पर छंटनी हो रही है , वहीं दैनिक अमृत विचार छंटनी का शिकार हुए बेरोजगार पत्रकारों – गैर पत्रकारों का सहारा बनता जा रहा है। बड़े अखबारों में लगातार स्टाफ कम करने का क्रम जारी है। ये समूह 35 से 40 प्रतिशत तक स्टाफ घटाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जिलों के ब्यूरो आफिस बंद किये जा रहे या कार्यरत कर्मचारियों की संख्या कम कर दी गयी है। तहसीलों के आफिस बंद कर दिये गए हैं। इससे बडे पैमाने पर कोरोना जन्य संकट कालीन स्थित में मीडियाकर्मी , खासकर पत्रकारों के सामने आजीविका का बडा संकट उत्पन्न हो गया है। इसमें कई युवा पत्रकार भी हैं। हालत यह है कि तीस-पैंतीस हजार रुपये वेतन पाने पत्रकार पंद्रह-बीस हजार रुपये की नौकरी को भटक रहे हैं।   दैनिक जागरण, मुरादाबाद से छंटनी के शिकार डिप्टी चीफ सब एडिटर आशुतोष मिश्र ने अमृत विचार, मुरादाबाद में सिटी इंचार्ज के रूप में ज्वाइन किया है। दैनिक जागरण, मुरादाबाद के डिजाइनर रिजवान अहमद ने भी अमृत विचार , मुरादाबाद ज्वाइन किया है। हिंदुस्तान, नोएडा से छटनी कर दिए गए मनीष मिश्रा ने अमृत विचार, मुरादाबाद में सीनियर सब एडिटर के पद पर ज्वाइन किया है। वह मुरादाबाद में दैनिक जागरण और अमर उजाला में भी सेवारत रह चुके हैं। हिंदुस्तुान, नोएडा से छंटनी के शिकार हुए युवा पत्रकार पीयूष द्विवेदी भी अमृत विचार, बरेली आ गए हैं। वह दैनिक जागरण, बरेली से एक वर्ष पहले ही हिंदुस्तान गए थे और छंटनी की जद में आ गए। वह अमृत विचार, बरेली में सिटी प्रभारी के रूप सेवायें देंगे।   दैनिक जागरण, बरेली से छंटनी अभियान में बाहर कर दिये गए सर्कुलेशन मैनेजर त्रिनाथ शुक्ला ने अमृत विचार, बरेली में सर्कुलेशन मैनेजर के पद पर ज्वाइन किया है। वह दैनिक जागरण में सिटी सेल्स हेड थे और उससे पहले अमर उजाला, लखनऊ, टाइम्स आफ इंडिया, बिजिनेस स्टैंटर्ड, पायनियर, राजस्थान पत्रिका और आउटलुक में काम कर चुके हैं। दैनिक अमृत विचार लखनऊ, बरेली और मुरादाबाद से प्रकाशित है। समूह संपादक शंभू दयाल वाजपेयी के अनुसार प्रबंधन की योजना अखबार का चौथा संस्करण हल्द्वानी (नैनीताल) से भी शुरू करने की योजना है। नोएडा संस्करण भी प्रबंधन की योजना में है। अमृत विचार वेबसाइट और यूट्यूब चैनेल भी है। डिजिटल में एक दर्जन से अधिेक पूर्ण कालिक पत्रकार कार्यरत हैं। बरेली में अखबार का प्रकाशन शुरू हुए आठ महीने हुए हैं। पांच महीने पहले मुरादाबाद संस्करण शुरू हुआ। बेहतर कंटेंट, सभी रंगीन और अच्छा कागज व छपाई होने से अखबार ने कम समय में ही पाठकों में अपनी पहचान बनायी और तेजी से बढ़ रहा है। 14 -16 पेज के अखबार के साथ रविवार को चार पेज की मैगजीन भी है।

Dakhal News

Dakhal News 13 July 2020


bhopal,senior journalist, from Mumbai, joined Aam Aadmi Party

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार द्विजेन्द्र तिवारी आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं। पिछले दिनों ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य व प्रवक्ता प्रीति शर्मा मेनन ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया। समझा जाता है कि महाराष्ट्र में अपनी उपस्थिति दमदार करने के लिए आम आदमी पार्टी अपना विस्तार कर रही है और इस उद्देश्य से तिवारी को पार्टी में शामिल किया गया। तिवारी का पत्रकारिता में लंबा अनुभव रहा है। मुंबई में जनसत्ता के तेजतर्रार राजनीतिक संवाददाता के रूप में उनकी छवि रही है। इसके बाद नवभारत, मुंबई के स्थानीय संपादक और हमारा महानगर के संपादक के रूप में उन्होंने मुंबई की पत्रकारिता में अपना एक अलग मुकाम बनाया। तिवारी ने लगभग 30 साल मुंबई में राजनीतिक रिपोर्टिंग की और कई राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध रहे हैं। स्व.बाल ठाकरे, स्वर्गीय विलासराव देशमुख और शरद पवार जैसे नेताओं से लिए गए उनके इंटरव्यू काफी चर्चित रहे हैं। मुंबई में सबसे पहले बने हिंदी पत्रकार संघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसके बाद महाराष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था मंत्रालय एवं विधि मंडल वार्ताहर संघ की कार्यकारिणी में भी वे तीन बार सदस्य रहे हैं। राजनीतिक पत्रकारिता में तिवारी का लंबा अनुभव देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि उनके अनुभवों से महाराष्ट्र में आगामी चुनावों में आम आदमी पार्टी को लाभ मिल सकता है। विशेषकर आगामी मुंबई महानगरपालिका चुनाव में मुंबई के उत्तर भारतीय समाज के बीच एक मजबूत संदेश जाएगा।

Dakhal News

Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Thoothu stunned, hear the story ,Ayyashi , elderly journalist

पत्रकार बिरादरी का नाम बदनाम कर दिया भोपाल के प्यारे मियां नामक पत्रकार ने। ये प्यारे मियाँ नामक पत्रकार एक अखबार निकालता है। अखबार का नाम ‘अफ़कार’ है। इस अखबार का मालिक प्यारे मियां भोपाल के पुराने पत्रकारों में से एक है। इसकी उम्र 68 साल है। पढ़ें इस कमीने का कारनामा- सिर्फ नाबालिग लड़कियां (14 से 15 साल की) ही होती थी निशाने पर। बालिग होते ही कट्टे की नोक पर कुछ पैसा देकर उनकी करवा देता था शादी। 6 नाबालिग बच्चियों के यौनशोषण से जुड़ा है मामला। आरोपियों में राजधानी भोपाल के 5 बड़े नाम आ रहे हैं सामने। चाइल्ड हेल्प लाइन की टीम कर रही है नाबालिग बच्चियों की काउंसलिंग। देर रात बालाओं के साथ डांस करते पकड़े गए रसूखदार। रातीबड थाना क्षेत्र के फ़ार्महाउस में बना रखा था डांस बार।

Dakhal News

Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Anand Swaroop Varma, use of Hindi translation ,many happy birthday wishes

आज जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और मेरे प्रिय लेखक-अनुवादक आनंद स्वरूप वर्मा का जन्मदिन है. मुझे 2009 से 2011 के बीच उनके साथ काम करने का मौका मिला जो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ. खासकर, हिंदी में लेखन और अनुवाद सीखने का बहुत खूब अवसर साबित हुआ वह समय. आज तक उनसे हमेशा कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है. एक किस्सा तो अनुवाद करने वाले सभी लोगों को सुनना ही चाहिए. 15 सितंबर 2009 इराकी पत्रकार मुंतसर अल जैदी जेल से रिहा हुए. उन्हें जेल होने की वजह बहुत क्रांतिकारी है. इराक को तबाह करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की 14 दिसंबर 2008 को इराक में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जैदी ने उन पर अपने जूते फैंके थे. इसके बाद जैदी को गिरफ्तार कर लिया गया था और लगभग एक साल बाद उन्हें रिहा किया गया. जेल से बाहर आने के तुरंत बाद जैदी ने ब्रिटिश अखबार द गर्डियन पर “वाई आई थ्र्यू द शू” नाम से लेख लिखा. इस लेख को, जिसके पहले दो वाक्य हैं, “मैं आजाद हूं. लेकिन मेरा मुल्क अब भी युद्ध बंदी है”, सभी को पढ़ना चाहिए. अब उस प्रसंग पर आता हूं. जैदी के इस लेख का अनुवाद बहुतों ने हिंदी में किया. वर्मा जी ने भी सोचा कि समकालीन तीसरी दुनिया के उस माह के अंक में यह जाना चाहिए. उन्होंने अनुवाद किया और पढ़ कर सुनाया तो लगा कि जैदी ने ही लिखा है. इस बीच जितने अनुवाद पढ़े थे, वे अच्छे भले ही थे लेकिन एक तरह की कृत्रितमा थी उनमें. फिर वर्मा जी ने बताया कि क्योंकि लेखक महत्वपूर्ण हैं और अरब के हैं, इसलिए उन्होंने कोशिश कि है कि जरूरी स्थानों पर ऊर्दू के शब्द हों. फिर मैं समझा कि यही छोटा सा ट्विस्ट (twist) उस अनुवाद को शानदार बना दे रहा था. उस अनुवाद से मुझे सबक मिला कि अच्छे अनुवाद के लिए जरूरी है कि अनुवादक लेखक के बैकग्राउंड को समझे, उसके हावभाव पर गौर करे, लेखक किस संदर्भ में लिख रहा है उस संदर्भ को विजुअलाइज करे. अनुवाद सिर्फ एक भाषा से दूसरी भाषा में साहित्य को प्रकट करना नहीं बल्कि अच्छा अनुवादक उस संस्कृति और परिवेश को भी अनुवाद कर रहा होता है जिससे लेखक आया है. वर्मा जी के अनुवाद अनुवाद कला का सर्वोत्तम रूप हैं. मेरे पास उनके द्वारा अनूदित कई किताबें हैं. कुछ के नाम हैं : औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, वेनेजुएला की क्रांति, नेपाली समरगाथा, आज की अफ्रीकी कहानियां, खून की पंखुडियां. इन सभी में अनुवाद का गजब कौशल देखने को मिलता है. अनुवाद में वर्मी जी ने जैसे प्रयोग किए हैं वे शायद ही किसी ने. और यही वजह है कि उनका एक भी अनुवाद कृत्रिम नहीं लगता. हम लोग अक्सर लेखन में प्रयोग की बात करते हैं लेकिन अनुवाद में होने वाले प्रयोगों पर ध्यान नहीं देते. वैसे भी हिंदी में अनुवाद को इतना सस्ता काम माना जाता है कि इसके कलात्मक पक्ष पर लोगों का ध्यान ही नहीं जाता. जो लोग करते हैं वे भी सिर्फ करते हैं. ना महत्व देते हैं, ना अपने काम को सुधारना ही चाहते हैं. कुछ तो लेखक पर एहसान करने के भाव से अनुवाद करते हैं और मूल पर हावी हो जाना चाहते हैं और ऐसे-ऐसे बोझिल शब्द डाल देते हैं कि सिर दर्द करने लगता है. लेकिन वर्मा जी के किसी भी अनुवाद में ऐसा दोष नहीं दिखता. वह एक शानदार अनुवादक हैं. अगर हम यूरोप या अमेरिका होते तो अनुवाद के रूप में वह ग्रेगोरी राबासा होते और कोई गैब्रियल गार्सिया मार्केज कहता, “आनंद स्वरूप वर्मा का अनुवाद मेरी मूल रचना से उत्कृष्ट है.” पत्रकार और अनुवादक विष्णु शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क- simplyvishnu2004@yahoo.co.in

Dakhal News

Dakhal News 11 July 2020


bhopal, Shivraj , helplessCM ,forced government , Madhya Pradesh!

“मध्यप्रदेश मंत्रिपरिषद में विभागों के बँटवारे में वैसे ही स्थिति है जैसे रोटी के एक टुकड़े को बंदर-बिल्ली-कुत्ते और कौव्वे के बीच बाँटना” मध्यप्रदेश सरकार की स्थिति आज वैसे ही है जैसे कोई नटी आसमान में तने रस्से पर बाँस लेकर संतुलन साधे चीटी की गति से आगे बढ़ रही हो। प्रदेश की जनता मेले के तमाशबीनों की भाँति अवाक और हतप्रभ है। 21 मार्च को भाजपा की ‘लाए-जोरे’ की सरकार बनने के बाद पंच परमेश्वरों को मंत्री बनाने में पखवाड़े भर लग गए। फिर अगले विस्तार के लिए राज्यसभा चुनाव का उबाऊ इंतजार। 20 जून को चुनाव के बाद मंत्रिमंडल के पूर्ण विस्तार में 12 दिन लगे वह भी दिल्ली के बारह फेरे के बाद। अब विभागों के बँटवारे में वैसे ही स्थिति है जैसे रोटी के एक टुकड़े को बंदर-बिल्ली-कुत्ते और कौव्वे के बीच बाँटना। विस्तार के बाद से हल्ला है कि मंत्रिपरिषद में ‘लायन शेयर’ ज्योतिरादित्य सिंधिया ले गए और विभागों के बँटवारे में उनकी नजर अपने समर्थकों को मलाईदार विभाग दिलाने में है। अब सत्ता सेवा रह भी कहां गई..! वह तो मालपुआ है और कोरोना के संकट काल में यह पौष्टिकता कौन नहीं चाहेगा। सिंधियाजी ने शिवराज जी के ‘टाइगर अभी जिंदा है’ के चर्चित डायलॉग को भी हड़पने की कोशिश की है। जंगल की व्यवस्था में टाईगर की अपनी टेरेटरी होती है। वह दूसरे के बर्दाश्त नहीं करता। इस डायलॉग के निहतार्थ को अच्छे से समझ लेना चाहिए, वजह मध्यप्रदेश के सियासी जंगल की एक ही टेरेटरी में दो टाईगर आ चुके हैं। बहरहाल गठजोड़ की सरकार में यह स्वाभाविक है..। हम लोकतंत्र की नैतिकता और मर्यादा का भले ही कितना ढोल पीटें उसकी पोल में सभी धतकरम चलते रहते हैं। यह कोई आज से नहीं.. जमाने से चलता चला आ रहा है। हमने हरियाणा में भजनलाल-वंशीलाल-देवीलाल-रामलाल का दौर भी देखा है। रात किसी दल में सोते, सुबह होते ही किसी दूसरे दल की दालान में कुल्ला मुखारी कर रहे होते। अब इसी बार हरियाणा में यदि देवीलाल के पंती ने भाजपा सरकार को समर्थन नहीं दिया होता तो..बलात्कार और धोखाधड़ी के नामाजादिक आरोपी गोपाल कांड़ा के लिए दरवाजा खुला था। मध्यप्रदेश में लोकतंत्र का गला चपाने की बात करने वाली कांग्रेस का तो ट्रैक रिकॉर्ड ही दूसरे दलों की सरकार की अकाल हत्या का रहा है..सो हम लोक-फोकतंत्र की बात करने की बजाय बात करेंगे कि मध्यप्रदेश में क्या हो रहा है और आगे का अनुमान क्या है। जो लोग सरकार को लेकर सिंधिया जी के अपरहैंड और उनकी मनमर्जी की बात कर रहे हैं उनको यह अच्छे से समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस सरकार को गिराने को लेकर उनका भाजपा के साथ यही ‘एमओयू’ हुआ था। जो कांग्रेस का मंत्रिपरिषद त्याग कर आए थे उन्हें तो मंत्री बनना ही था और उनको भी मंत्री बनाना था जो इसी की लालसा के चलते कांग्रेस छोड़ी। सो इसलिए यह अनहोनी नहीं कि कांग्रेस से आए लोगों को थोक के भाव मंत्री बना दिया गया। मुझे यह भी मिथ्या लगता है कि मलाईदार विभागों को लेकर सिंधिया जी का कोई पेंच है..। यदि पेंच है तो भाजपा के भीतर ही है और वह अबतक एक छत्र रहे शिवराज सिंह चौहान को कसने के लिए। इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि पहली किश्त में जब पाँच मंत्री बनाए गए तब एक भी उनकी पसंद के नहीं थे। पूर्ण विस्तार में सिर्फ़ सागर के भूपेन्द्र सिंह को उनके खाते का माना गया। भूपेन्द्र सिंह भले ही शिवराज जी के खाते के माने गए हों लेकिन उन्हें मंत्री बनने देने का ज्यादा योगदान गोविंद सिंह राजपूत को है जिन्हें सुर्खी से उपचुनाव लड़ना है। राजपूत के कहने पर सिंधिया जी ने भूपेन्द्र की पैरोकारी की ताकि उनके पट्ठे राजपूत का पथ प्रशस्त हो सके। राजपूत और भूपेन्द्र राजनीति में दुश्मनों की हद तक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। भूपेन्द्र फुरसत में बैठते तो राजपूत का बंटाधार करते ऐसा मान लिया गया था। सो शिवराज जी अपने ही मंत्रिपरिषद में सदा सर्वथा अकेले हैं..और शेरी भोपाली का यह शेर कि- पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफरकिससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे। मंत्रिपरिषद के गठन के दिनों मैं भी भोपाल में फँसा था, करोना की वजह से। 1 जुलाई की रात की बेसब्री देखी..यह लगभग वैसे ही थी जैसे कि दूसरे दिन लाटरी का बम्पर ड्रा निकलने वाला हो। 2 जुलाई को शपथ के बाद मेरे एक पत्रकार मित्र की जुबानी टिप्पणी थी कि ‘यह लचर नेतृत्व(संगठन), लाचार मुख्यमंत्री वाली मजबूर सरकार है। ऐसे-ऐसे मंत्रियों के चेहरे और घर बैठने को कह दिए गए कद्दावरों को देखकर साफ कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार बौनों ने आदमकदों की सीआर(गोपनीय चरित्रावली) लिखी है। भाजपा कार्यालय के बाहर एक बागी तेवर वाले पके हुए नेता की एक लाइन की टिप्पणी थी ‘आधी छोड़़ सारी को धावै, आधी मिलै न सारी पावै’। इस टिप्पणी की व्याख्या आप उमा भारती के वक्तव्य से समझ सकते हैं- इस सौदेबाज़ी से बेहतर होता कि मध्यावधि चुनाव कराकर नया जनादेश लेकर आते। पस्त कांग्रेस किसी भी कीमत पर दुबारा न जीतती। उमा भारती की तरह कई वरिष्ठ नेताओं को अंदेशा है कि यह मंत्रिमंडल और सरकार दशकों की मेहनत से अर्जित किए गए भाजपा के जनाधार को खो देगी..क्योंकि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, परफॉर्मेंस और जनाधार वाले नेताओं की गंभीर उपेक्षा की गई है। उपचुनाव को साधने के लिए चंबल-ग्वालियर के कंधे पर एक जुआँ रख दिया गया है..और दूसरा खाली। सत्ता की बैलगाड़ी कभी भी चरमराकर ध्वस्त हो सकती है। मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व को लेकर मालवा, महाकोशल से लेकर विंध्य तक में उबाल है। लावा जब तक बाहर नहीं आता पता ही नहीं चलता कि जमीन के भीतर ज्वालामुखी धधक रहा है। महाकोशल के दिग्गज भाजपा नेता अजय विश्नोई की यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि संगठन और सरकार अपने विधायक और कार्यकर्ताओं को साध सकती है जनता को नहीं। सबसे ज्यादा उपेक्षा विन्ध्य व महाकोशल की हुई है। निवृत्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ महाकोशल से थे। कांग्रेस की सरकार में इस क्षेत्र का अच्छा खासा रसूख था। भाजपा ने इसे एक झटके में शून्य कर दिया। महाकोशल जन्मजात भाजपाई नहीं है। जबलपुर भले ही आरएसएस की शक्तिपीठ रहा हो लेकिन भाजपा को खाता खोलने में 1990 तक इंतजार करना पड़ा। महाकोशल की तासीर भी विंध्य की तरह कांग्रेसी और समाजवादी रही है। कार्यकर्ताओं ने बड़ी मेहनत से इसे भाजपा का अभेद्य गढ बनाया। महाकोशल के लोग आज भी यह नहीं भूले हैं कि 1956 में गठित मध्यप्रदेश की राजधानी जबलपुर को न बनाकर उसके साथ कैसा छल किया गया। आज प्रदेश के इस महानगर व जिले का प्रतिनिधित्व मंत्रिपरिषद में शून्य है। कार्यकर्ता से ज्यादा यहां की जनता उपेक्षित और असम्मानित महसूस कर रही है। विंध्य की बात तो और भी विकट है। आज प्रदेश में भाजपा की जो सरकार है उसकी इमारत विंध्य के बुनियाद पर टिकी है। विंध्य जिसे हम अब बघेलखण्ड तक ही सीमित मानकर चलते हैं, में 2018 के चुनाव में 30 में से 24 सीटें मिलीं। रीवा-शहड़ोल-सिंगरौली में तो कांग्रेस का खाता ही नहीं खुल सका..वह प्रतिनिधित्व शून्य है। उमरिया और सतना जिले से जिन मीना सिंह और रामखेलावन पटेल को मंत्री बनाया गया उन्हें पड़ोस के जिले के लोग भी अच्छी तरह से नहीं जानते। आजादी के बाद से 2018 तक इस क्षेत्र के प्रतिनिधित्व की ऐसी भीषण अवहेलना कभी नहीं हुई। विंध्य कभी विंध्यप्रदेश रहा है। इसकी अपनी अलग राजनीतिक पहचान भोपाल से दिल्ली तक रही। श्रेष्ठ नेताओं की एक भव्य परंपरा रही। पंडित शंभूनाथ शुक्ल, गोविंदनारायण सिंह यमुना शास्त्री, अर्जुन सिंह, श्रीनिवास तिवारी, बैरिस्टर गुलशेर अहमद, कृष्णपाल सिंह, चंद्रप्रताप तिवारी, शत्रुघ्न सिंह तिवारी, रामकिशोर शुक्ल, मुनिप्रसाद शुक्ल, रामानंद सिंह, जगन्नाथ सिंह, राजेंद्र कुमार सिंह, अजय सिंह राहुल से लेकर राजेंद्र शुक्ल तक व कई अन्य नेता भी। इन नेताओं ने अपनी राजनीतिक मेधा से भोपाल और दिल्ली तक विंध्य के प्रतिनिधित्व की धाक जमाई..। इसके बरक्स जब आज की स्थिति देखते हैं तो यहां के नेतृत्व को अपाहिज बना देने की साजिश साफ नजर आती है। यह कैसी विडंबना है..10 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रीवा जिले के गुढ़ बदवार में बने दुनिया के विशालतम समझे जाने वाले सोलर पार्क को लोकार्पित करेंगे और इस सोलरपार्क के योजनाकार राजेन्द्र शुक्ल महज एक विधायक की हैसियत में रहेंगे। यह तो आयोजकों का बडप्पन है कि उनको लोकार्पण समारोह में जगह दी वरना वो तो महज रीवा विधानसभा के सदस्य मात्र हैं..और यह सोलरपार्क गुढ़ विधानसभा में है। ऊर्जा के क्षेत्र में बतौर मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने जो काम किया उसकी सराहना खुले मंच से नरेन्द्र मोदी स्वयं कई बार कर चुके हैं। मंत्रिपरिषद में सत्ता की सौदेबाजी के चलते प्रदेश के एक होनहार नेता की मेधा, क्षमता की बलि दे दी गई। जनता के बीच सही संदेश नहीं गया। विंध्य कभी जनसंघ और भाजपा का नहीं रहा।1990 के बाद यहां के कार्यकर्ताओं ने अपने खून पसीने से सींचकर इसे भाजपा का बाग बनाया। जनता में उम्मीदें जगीं और तब से लेकर अब तक हर चुनाव में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले आगे बढ़कर भाजपा का साथ दिया। लेकिन मिला क्या…! सबके सामने है..। भाजपा के उस बुजुर्गवार का कहना सही ही है-“आधी छोड़ सारी को धावै आधी मिलै न सारी पावै”। कांग्रेस भाजपा के इसी विरोधाभास से मुदित है। उपचुनाव के उसके सर्वे में जीत ही जीत नजर आ रही है। ‘गद्दारों को हराओ’ के हुंकार के साथ उसका रथ चंबल-ग्वालियर में उतर चुका है। भाजपा की राह आसान नहीं… उसके पास ‘मोदी’ नाम के करिश्मे के सिवाय कुछ शेष नहीं बचा है। लोकसभा चुनाव में सिंधिया अपने ही एक सिपहसलार से हार चुके हैं। उन्हें हराने वाले केपी सिंह भाजपा में ही हैं। विधानसभा में जो-जो भी कांग्रेस से हारे हैं बदले समीकरण में वे उनकी जीत के लिए जाजम नहीं बिछाएंगे…काँटे ही बोएंगे। उनके भविष्य का सवाल है। दलबदलुओं का एक बार सिक्का जमा तो अपनी जवानी होम करने वाले वो भाजपाई पल भर में खरे से खोटे हो जाएंगे। वे और उनके समर्थक ऐसा कैसे होने देंगे। जनता के बीच में ऐसे असहाय भाजपाइयों के प्रति सहानुभूति और ऊपर से कांंग्रेस का ‘गद्दारों को हराओं’ वाला आक्रामक नारा इस उपचुनाव को सहज नहीं रहने देगा। कांग्रेस इन उप चुनावों में तन-मन-धन सभी झोंक देगी। भविष्य की एक और कल्पित तस्वीर सामने है, ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर। भाजपा यदि इन उप चुनावों में जीत जाती है तो सिंधिया का कद “लार्जर दैन लाइफ” हो जाएगा। उनके गुट के मंत्रियों के लिए अभी भी भाजपा नहीं महाराज ही अभीष्ट हैं..। कल सरकार बनी रही तो सत्ता के दो स्वाभाविक केंद्र बन जाएंगे.. वैसे अभी भी कमोबेश स्थिति ऐसे ही है। यदि उप चुनावों में भाजपा सफल नहीं रहती तो तय है कि वह भविष्यवाणी चरितार्थ होगी कि- छब्बीस जनवरी को कमलनाथ ही झंडा फहराएंगे। लगता है भाजपा अपने ही बुने जाल में उलझ चुकी है। बौने कद के योजनाकारों ने आदमकदों को घर बैठाकर घरफूँक तमाशा देखने की तैय्यारी कर ली है..। क्योंकि दोनों ही स्थितियों का असर भविष्य निर्धारित करेगा। मध्यप्रदेश भाजपा का अजेय किला समझा जाता था..। कभी कभार के चुनावों में बुर्ज के कंगूरे..या झाड़फनूस भले ही हिले हों पर किला अबतक सलामत ही बचा रहा। यह आगे भी सलामत बचा रहेगा.. एक अकेले शिवराज के बूते इसे आसान नहीं और वह तब, जब- पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल का विश्लेषण. संपर्कः 8225812813

Dakhal News

Dakhal News 9 July 2020


raipur, See who won , Press Club ,Mahasamund election

रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रेस क्लब महासमुंद के दो वर्षीय कार्यकाल के लिए नई कार्यकारिणी का गठन किया गया। अध्यक्ष आनंदराम साहू (नईदुनिया), उपाध्यक्ष संजय महंती (आज की जनधारा), महासचिव रवि विदानी (सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़) बहुमत से निर्वाचित हुए। वहीं एकल नामांकन होने से कोषाध्यक्ष देवीचंद राठी (चैनल इंडिया), सहसचिव संजय यादव (हरिभूमि)और प्रचार एवं संगठन सचिव प्रभात महंती (स्वतंत्र पत्रकार) निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। मिनी स्टेडियम रोड महासमुन्द स्थित प्रेस क्लब के सांस्कृतिक भवन में निर्वाचन अधिकारी शकील लोहानी ने चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ की। अध्यक्ष पद के लिए आनंदराम साहू और रत्‍‌नेश सोनी, उपाध्यक्ष के लिए संजय महंती, दिनेश पाटकर तथा महासचिव के लिए रवि विदानी और विपिन दुबे ने नामांकन दाखिल किया। मतदान के तत्काल बाद मतगणना हुई। जिसमें अध्यक्ष के लिए आनंदराम साहू को 18 और रत्‍‌नेश सोनी को 9 वोट मिले। इस तरह आनंदराम साहू नौ मतों के अंतर से लगातार दूसरी बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए। वर्ष 2018 में हुए कांटे की टक्कर में आनंदराम साहू महज एक वोट के अंतर से अध्यक्ष चुने गए थे। उपाध्यक्ष पद के लिए संजय महंती को 15 और दिनेश पाटकर को 12 मत मिले। महासचिव पद के लिए रवि विदानी को 14 और विपिन दुबे को 13 वोट मिले। विजयी प्रत्याशियों को निर्वाचन अधिकारी ने संरक्षकों व सदस्यों की उपस्थिति में निर्वाचन प्रमाण पत्र सौंपा। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को उपस्थित सभी सदस्यों ने बधाई देते हुए प्रेस क्लब की उत्तरोत्तर प्रगति के लिए कार्य करने प्रेरित किया। कुल 28 सदस्यों में 27 सदस्यों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। उल्लेखनीय है कि 22 मार्च को प्रेस क्लब का चुनाव निर्धारित था। इस बीच कोरोना वायरस संक्रमण के कारण जनता कर्फ्यू और बाद में लॉकडाउन हो जाने से चुनाव स्थगित हो गया था। अनलाक के बाद प्रशासन से 23 जून को निर्वाचन के लिए विधिवत अनुमति ली गई थी। कार्यकारिणी का गठनचुनाव होने के बाद सांस्कृतिक सचिव और चार कार्यकारिणी सदस्यों का मनोनयन के आधार पर पदपूर्ति का विशेषाधिकार अध्यक्ष को प्रदान किया गया। अध्यक्ष आनंदराम साहू ने सांस्कृतिक सचिव ललित मानिकपुरी(नवभारत), कार्यकारिणी सदस्यों में प्रज्ञा चौहान(स्वदेश), दिनेश पाटकर(दैनिक भास्कर), जसवंत पवार(आवाम दामिनी), अजय पांडेय (स्वतंत्र पत्रकार) को मनोनीत किया है।

Dakhal News

Dakhal News 5 July 2020


bhopal,Deadly attack , journalist , increasing

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू प्रतिबंधों के बावजूद अपराध बढ़ते जा रहे हैं। यहां दो दिन पहले दो इंजीयिरिंग के छात्रों की शराबियों ने पैसे नहीं देने पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी थी। अब एक पत्रकार पर शराबियों ने मामलू बात पर जानलेवा हमला कर दिया। बताया गया है कि उन्होंने देर रात शराबियों को घर के पास बैठकर शराब पीने से रोका, जिसके चलते उन्होंने हमला किया। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच कर रही है।   भोपाल के अयोध्या बायपास स्थित अभिनव होम्स में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार धनंजय प्रताप सिंह शनिवार की रात करीब साढ़े 10 बजे से अपने आफिस से घर पहुंचे थे। इस दौरान पड़ोसी ने उन्हें घर के पास कुछ लोगों के शराब पीकर हंगामा करने की जानकारी दी। उन्होंने देखा कि कॉलोनी में बनी टंकी पर बैठकर तीन युवक शराब पीकर अभी भी हंगामा कर रहे हैं। धनंजय ने उन्हें वहां से जाने के लिए कहा तो शराबियों ने उन पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया। तब तक वहां पड़ोसी भी पहुंच गए तो शराबी वहां से भाग गए। उन्होंने रात में ही अयोध्या नगर थाना पुलिस को जानकारी दी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मामले की जानकारी ली और उन्हें थाने पहुंचकर प्रकरण दर्ज कराने को कहा।    इस घटना को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं संज्ञान में लिया है। उन्होंने रविवार को ट्वीट करके कहा है कि जिन्होंने पत्रकार धनंजय प्रताप सिंह जी के साथ ये हरकत की है, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस एवं प्रशासन को मैंने कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दे दिए हैं। मैं धनंजय प्रताप जी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ। बता दें कि मुख्यमंत्री ने शनिवार को दोपहर में डीजीपी समेत सभी पुलिस अधिकारियों को प्रदेश से अपराधियों और को क्रश करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि अगर कोई अपराध होता है तो टीआई नहीं बल्कि अफसर जिम्मेदार होंगे। उनके दिल्ली रवाना होते ही रात में यह घटना सामने आ गई।   वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने घटना को लेकर शिवराज सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट के माध्यम से कहा है कि कल ही मुख्यमंत्री ने कानून व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा की और अधिकारियों को कड़ी कार्यवाही के निर्देश दिये और आज यह घटना ख़ुद सवाल खड़े कर रही है? इस घटना के आरोपितों पर कड़ी कार्यवाही हो और धनंजय प्रताप सिंह को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए।   बता दें कि बीते गुरुवार की रात ही भोपाल के छोला मंदिर थाना क्षेत्र में बदमाशों ने दो दिन पहले 21 साल के इंजीनियर छात्र समेत दो की हत्या कर दी थी। हमलावरों में 2 बदमाश और तीन नाबालिग के नाम सामने आए थे। जांच में सामने आया था कि आरोपितों ने शराब के लिए पैसे नहीं मिलने के कारण हमला किया था। फिलहाल, आरोपितों को दूसरे दिन ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।

Dakhal News

Dakhal News 5 July 2020


bhopal,Media organizations, angry over ,Prasar Bharati ,threatening ,news agency PTI

IJU Concern Over Prasar Bharati Threat To PTI The Indian Journalists Union expresses profound concern over government’s latest attempt to rein in the media, this time the biggest news agency PTI through the so-called ‘autonomous’ public service broadcaster Prasar Bharati. It is learnt that the Prasar Bharati has written to PTI saying that its conduct has made it “no longer tenable’ to patronise the news agency, after it quoted the Chinese Ambassador in India, following an earlier interview with the Indian Ambassador in Beijing, on the ongoing India-China stand-off. The Prasar Bharati has reportedly accused the PTI of its coverage ‘disseminated widely to its domestic subscribers and prominently shared with foreign entities’, of being “detrimental to national interest while undermining India’s territorial integrity”. To justify its proposed action of reviewing its subscription, which amounts to a “huge fees”, the Prasar Bharati now recalls that it has often alerted the PTI on ‘editorial lapses resulting in dissemination of wrong news harming public interest.’ In a statement, the IJU President Geetartha Pathak and Secretary General Sabina Inderjit said that though Prasar Bharati was set up as an autonomous body, it is no secret that it functions as the Government’s mouth piece and its action against the PTI smacks of the known growing intolerance there is towards ethical and independent journalism. An embedded media has no place in a democracy, even in the times of a conflict, as going on between India and China, believes the IJU. Prasar Bharati needs to remember that citizens’ right to information and the journalists’ right to report facts are non-negotiable and that its attempt to threaten the PTI will be seen as yet another attempt by the government to treat country’s media as a hand maid. Prasar Bharati must review its decision, demanded the IJU. (Sabina Inderjit)Secretary General

Dakhal News

Dakhal News 1 July 2020


bhopal, Government threat to PTI

डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई-भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन करके हमें किसी खबर को जबर्दस्ती देने के लिए या रोकने के लिए आदेश या निर्देश दे। अब तो प्रसार भारती ने लिखकर पीटीआई को धमकाया है कि उसे सरकार जो 9.15 करोड़ रु. की वार्षिक फीस देती है, उसे वह बंद कर सकती है। यह राशि पीटीआई को विभिन्न सरकारी संस्थान जैसे आकाशवाणी, दूरदर्शन, विभिन्न मंत्रालय, हमारे दूतावास आदि, जो उसकी समाचार-सेवाएं लेते हैं, वे देते हैं। यह धमकी वैसी ही है, जैसी कि आपात्काल के दौरान इंदिरा सरकार ने हिंदी की समाचार समितियों- ‘हिंदुस्थान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ को दी थी। मैंने ‘हिंदुस्थान समाचार’ के निदेशक के रुप में इस धमकी को रद्द कर दिया था। मैं अकेला पड़ गया। मेरे अलावा सबने घुटने टेक दिए और इन दोनों एजेंसियों को उस समय पीटीआई में मिला दिया गया। क्या पीटीआई को दी गई यह धमकी कुछ वैसी ही नहीं है ? मैं पीटीआई के पत्रकारों से कहूंगा कि वे डरें नहीं। डटे रहें। 1986 में बोफोर्स कांड पर जब जिनीवा से चित्रा सुब्रह्मण्यम ने घोटाले की खबर भेजी तो ‘भाषा’ ने उसे सबसे पहले जारी कर दिया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके अफसरों की हिम्मत नहीं हुई कि वे मुझे फोन करके उसे रुकवा दें। अब पीटीआई ने क्या गलती की है ? सरकारी चिट्ठी में उस पर आरोप लगाया गया है कि उसने नई दिल्ली स्थित चीनी राजदूत सुन वीदोंग और पेइचिंग स्थित भारतीय राजदूत विक्रम मिसरी से जो भेंट-वार्ताएं प्रसारित की हैं, वे राष्ट्रविरोधी हैं और वे चीनी रवैए का प्रचार करती हैं। उनसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य का खंडन होता है। हमारे राजदूत ने कह दिया कि चीन गलवान घाटी में हमारी जमीन खाली करे जबकि मोदी ने कहा था कि चीन हमारी जमीन पर घुसा ही नहीं है। इसी तरह चीनी राजदूत ने भारत को चीनी-जमीन पर से अपना कब्जा हटाने की बात कही है। यही बात चीनी विदेश मंत्री ने हमारे विदेश मंत्री से कही थी। मेरी समझ में नहीं आता कि इसमें पत्रकारिता की दृष्टि से राष्ट्रविरोधी काम क्या हुआ है? यह पत्रकारिता का कमाल है कि वह दुश्मन से भी उसके दिल की बात उगलवा लेती है। जो काम नेता और राजदूत के भी बस का नहीं होता, उसे पत्रकार पलक झपकते ही कर डालते हैं। उन पर राष्ट्रविरोधी होने की तोहमत लगाकर प्रसार भारती अपनी प्रतिष्ठा को ही ठेस लगा रही है। मैं समझता हूं कि सरकार को चाहिए कि प्रसार भारती के मुखिया अफसर को वह फटकार लगाए और उसे खेद प्रकट करने के लिए कहे। लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक देश के जाने माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

Dakhal News

Dakhal News 1 July 2020


bhopal,picture published, indian Express , shows , social justice , Chief Justice.

जो इस देश का मुख्य न्यायाधीश हो, उससे कम से कम ये अपेक्षा तो की ही जाती है कि वह जब तक पद पर रहे तब तक किसी खास पार्टी के पक्ष में अपने खड़े होने का दिखावा या प्रदर्शन न करे. पर वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़ ने शर्म-लिहाज ताक पर रख दिया है. इस तस्वीर में दिख रहा है कि स्टैंड पर खड़ी एक शानदार मोटरसाइकिल, जिसे एक भाजपा नेता के पुत्र का बताया जाता है, पर बिना मास्क लगाए मुख्य न्यायाधीश महोदय बैठे हुए हैं और खास स्टाइल में तस्वीर क्लिक करा रहे हैं. तस्वीर क्लिक हुई है तभी तो इंडियन एक्सप्रेस में छपी है. यह सब कुछ जो माहौल बनाता है उससे देश के मुख्य न्यायाधीश पद की गरिमा गिरती है.

Dakhal News

Dakhal News 29 June 2020


ratlam,Famous litterateur, Suresh Anand dies

रतलाम। हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर,  गांधीवादी प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुरेश आनन्द गुप्ता का शनिवार शाम देवलोगमन हो गया है। उनका अंतिम संस्कार रविवार को प्रात:  जवाहर नगर स्थित मुक्तिधाम पर किया गया। उनके एक मात्र पुत्र इंगित गुप्ता ने मुखाग्नि दी।    बताया गया है कि वे विगत कुछ माह से बीमार थे, वे जाने माने साहित्यकार थे, जिन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी तथा लगभग डेढ़ हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख,कविताएं प्रकाशित हो चुकी है।    उनके पुत्र इंगित ने बताया कि उन्हें साहित्यालंकार सहित दर्जनों उपाधियों से सम्मानित भी किया गया। आकाशवाणी , दूरदर्शन पर उनकी रचनाएं प्रसारित हो चुकी है । ग्वालियर में पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी , जगदीश तोमर , शैवाल सत्यार्थी , स्व भवानी प्रसाद मिश्र, कवि नीरज, शैल चतुर्वेदी जैसे अनेक साहित्यकारों के साथ रह चुके हैं। ' छन छन कर आती है धूप , मेरे पर्दे से मेरे कमरे में , लड़ा बैठी आंखे मेरी दीवारों से उनका चर्चित गीत रहा है। उनके तीखे व्यंग्य किसी तीर के वार से कम नही रहे है । ' मैं हिंदुस्तान को हिन्दुस्तान देखना चाहता हूं , जिसने भी उठाई आंख उसे भेदना जानता हूँ , क्या हुआ मेरे पास तलबार नहीं है , मैं कलम में ही बारूद भरना चाहता हूँ  काव्य के ऊर्जावान साहित्यकार आनन्द जी के निधन की खबर मिलते ही उनके चाहने वाले उनके निवास पर पहुंच गए थे। 

Dakhal News

Dakhal News 28 June 2020


bhopal,Indira Gandhi, Narendra Modi ,Ram Bahadur Rai ,article

विषय : पत्रकार-बुद्धिजीवी राम बहादुर राय Communal & Prejudice Mind श्रीमान संपादक जी राजस्थान पत्रिका समूह के प्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक पत्रिका में अत्यंत वरिष्ठ और सम्मानीय पत्रकार के लेख पर मेरी यह प्रतिक्रिया आप धैर्य धारण कर अवश्य पढ़ लीजिए। शायद कुछ बातें आपको बहुत पसंद आए! पत्रिका अखबार के दिनांक 25 जून के अंक में “दूसरे आपातकाल की कोई आशंका नहीं” शीर्षक से वरिष्ठ, सम्मानित पत्रकार और बुद्धिजीवी राम बहादुर राय का लेख इंदिरा गांधी के आपातकाल के संबंध में निष्पक्ष और यथार्थवादी विवेचन नहीं है। श्री रामबहादुर राय को भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की स्मृति में बनाए गए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का चेयरमैन मोदी राज में बनाया गया। श्री रामबहादुर राय का जन्म गाजीपुर में जुलाई 1946 में हुआ। उन्होंने देश के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकाशन संस्थानों में सक्रिय रहकर पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन कड़वा सच यह भी है कि ये हमेशा कांग्रेस के विरोध में रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी से संबंधित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन के विस्तार में लगे रहे। उस संगठन के यह सचिव भी रहे हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदू शब्द हटाए जाने के संबंध में 1965 में इन्होंने विरोध आंदोलन में भाग लिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में छात्र परिषदों के चुनाव पर रोक के संबंध में उग्र आंदोलन किया था। इंदिरा गांधी को काले झंडे दिखाए थे। साथ ही श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के दिनों में यह 16 महीने जेल में भी रहे। इस तरह इंदिरा गांधी के प्रति इनका आक्रोश, इनकी नफरत और पूर्वाग्रह को अच्छी तरह समझा जा सकता है। श्री राय का चरित्र और स्वभाव और मूल चिंतन कट्टर हिंदू वाद है। यह इमरजेंसी की आलोचना करते हैं और श्रीमती गांधी पर व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे हैं जो कुछ हद तक तो सही है परंतु इमरजेंसी में जो रेल रोको आंदोलन करके पूरे देश की अर्थव्यवस्था और जन सुविधा को तहस-नहस कर दिया गया था; पूरे देश में उग्र आंदोलन चल रहे थे, उसके संबंध में इन पत्रकार महोदय ने पूरी तरह चुप्पी साध ली। इमरजेंसी की घोषणा आजादी के संदर्भ में बहुत ही निंदनीय थी लेकिन जिस तरह कोरोना का एक पहलू बहुत अच्छा है वैसे ही इमरजेंसी में भी बहुत सारे अच्छे काम हुए थे। इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत ईमानदारी, निष्ठा, निडरता, देशभक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता। भारत एक महाशक्ति बन चुका है, जैसा संदेश देना उनकी विशेषता है! इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता, सिवाय चंद पूर्वाग्रही लोगों के! भूतपूर्व राजा महाराजाओं के सरकारी प्रीवि पर्स समाप्त करना और बैंकों का राष्ट्रीयकरण व बांग्लादेश का निर्माण तो उनके अमर ऐतिहासिक कदम है, उपलब्धियां हैं! इंदिरा गांधी और आपातकाल की निंदा करने के बाद राम बहादुर राय वर्तमान शासन काल और मोदी की प्रशंसा में लेख लिखे हैं। इस लेख से उनकी कर्तव्य निष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता और निर्भीक पत्रकारिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है और बड़े आश्चर्य की बात है कि पद्मश्री प्राप्त ऐसा तेजतर्रार और उच्च शिक्षा प्राप्त पत्रकार/लेखक उस शासन तंत्र की तारीफ कर रहा है जिसके शासनकाल में देश की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई है। डीजल पेट्रोल के दामों में भयानक वृद्धि की गई है जिससे पूरा देश विचलित है!! कोराना महामारी का इतना भयानक प्रचार-प्रसार हो गया। हिंदू मुसलमानों के बीच में जो नफरत और भेदभाव अंग्रेजों के शासन काल में भी नहीं हो सका; वह सन 2014 के बाद अब देखने को मिल रहा है। संपन्न तथा सत्तापक्ष से जुड़े लोगों को छोड़कर, एक अघोषित आपातकाल जैसा चल रहा है! अब तो देश की रक्षा के संबंध में प्रश्न पूछने वाले टीवी पत्रकारों और विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं को, नागरिकों को, कभी भी देशद्रोही/ गद्दार /और सेना का अपमान करने जैसा, आरोप लगाकर निम्न स्तरीय दुष्प्रचार किया जाता है। ये इस शासनकाल में आम बात हो गई है। श्री राम बहादुर राय अपने चिंतन में शायद कट्टर सांप्रदायिकता और कट्टर राष्ट्रवाद को बहुत सही मानते होंगे। आतंकवाद की समाप्ति और विकास के नाम पर पूरे कश्मीर राज्य के टुकड़े करके लगभग 6 महीने तक के लिए पूरे राज्य को जेल खाने में बदल दिया गया। उसके संबंध में ये पत्रकार महोदय जिन्हें पद्मश्री भी दी गई है, एक शब्द भी नहीं लिखते! व्यक्तिगत पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत राग द्वेष की दृष्टि से, देश के अपने समय के अभूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संबंध में एकपक्षीय दूषित विचार रखना, स्वस्थ निष्पक्ष निर्भीक पत्रकारिता नहीं है। संपादक जी आप अगर निष्पक्ष निर्भीक और स्वस्थ पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं और इतना साहस भी रखते हैं (हालांकि इसकी आशा कम ही है) तो आप से निवेदन है कि हो सके तो श्री राम बहादुर राय तक मेरी यह प्रतिक्रिया अवश्य पहुंचा दें! बड़ा आभारी होऊंगा! श्रीकांत चौधरीभूतपूर्व शिक्षक एवं न्यायाधीशव्यंग्य लेखकएमए, एलएलबी (असली डिग्री धारी)दमोह (मध्य प्रदेश)shrikant2011dmo@gmail.com

Dakhal News

Dakhal News 27 June 2020


bhopal,Career in journalism

  प्रमोद भार्गव आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से पत्रकारिता जुड़ गई है। इसीलिए पत्रकारिता में विविधता को प्रस्तुत करने के लिए बहु आयाम भी विकसित हो गए हैं। इन्हें हम अभिव्यक्ति के रूप में मुद्रित और दृश्य व श्रव्य के रूप में प्रसारण से जुड़े संचार के अनेक माध्यमों के जरिए सुन व देख सकते हैं। सभी माध्यमों की आसान या कहें मुट्ठी में उपलब्धता के चलते इसकी पहुंच दूरांचलों के उन दुर्गम इलाकों में भी हो गई है, जहां आज भी सुगम रास्ते नहीं हैं। जबतक समाचार मुद्रित स्वरूप में उपलब्ध थे, तब यह जरूरी था कि इनका लाभ बिना पढ़ी-लिखी एक बड़ी आबादी नहीं उठा पा रही है और इस कारण वह देश के हालात, जनकल्याणकारी योजनाएं और जागरुकता से वंचित हैं। परंतु अब मुट्ठी में बंद मोबाइल ने इस कमी को पूरा कर दिया है। यदि आपके पास स्मार्टफोन है और उसमें इंटरनेट की सुविधा है तो फिर देश का नागरिक सीमाओं के भीतर कहीं भी बैठा हो, वह ई-पेपर से लेकर समाचार चैनलों के जरिए समाचार की भूख की पूर्ति कर सकता है। फेसबुक, वाट्सअप, इंस्ट्राग्राम व अन्य अनेक सोशल साइट्स पर वह अपनी समस्या भी टूटी-फूटी भाषा अथवा चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है। सोशल प्लेटफॉर्म पर आंख गढ़ाए बैठे पत्रकार इसे देखते ही उठा लेंगे और आम आदमी की यह पोस्ट खबर बन जाएगी। आजकल बाढ़ग्रस्त इलाकों में जहां पत्रकार की पहुंच संभव नहीं हो पाती है, वहां के समाचार धड़ल्ले से सोशल प्लेटफार्मों से ही उठाए जा रहे हैं। भारत में आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना माना जाता है। इसकी शुरुआत 30 मई 1826 को हिंदी में प्रकाशित साप्तहिक समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड से हुई थी। किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित होने वाला यह देश का पहला समाचार-पत्र है। उदंत मार्तण्ड का अर्थ उगता सूर्य है। पत्रकार और पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में यह शब्द अत्यंत सार्थक हैं क्योंकि पत्रकार या लेखक वह रोशनी है जो देश के नागरिकों में उस ज्ञान की जानकारी भरती है जो नागरिक को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत बनाए रखने का काम करती है। प्रत्येक मंगलवार को छपने वाले इस अखबार के मालिक, मुद्रक व संपादक पंडित कुमार शुक्ला थे। इसमें खड़ी बोली और ब्रजभाषा का उपयोग होता था। अखंड या बृहत्तर भारत में सूचना संप्रेषण की शुरुआत नारद मुनि से मानी जाती है। नारद मुनि समाज में व्याप्त विसंगति या किसी आक्रांता शासक की मनमानी की सूचना ब्रह्मलोक में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को पहुंचाने का काम करते थे और फिर ये शक्तिशाली ईश्वरीय अवधारणा से जुड़े देव समस्या के समाधान के प्रति सचेत हो जाते थे। रामायण काल में सूचना के वाहक के रूप में यही काम रामभक्त हनुमान ने किया था। मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त आरएमपी सिंह ने इस कालखंड की पत्रकारिता को बड़े ही सहज रूप में अति सुंदर शिल्प के साथ अपनी पुस्तक रामचरित मानस में संवाद संप्रेषण में अभिव्यक्त किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में यह पुस्तक इसलिए अनूठी है क्योंकि पत्रकारिता के लगभग सभी आयामों को स्पर्श करते हुए हरेक पहलू को इस पुस्तक में आधुनिक संदर्भ में व्याख्यायित किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो आज अनेक रूपों में है, स्वतंत्रता के पहले वह रेडियो और बाद में दूरदर्शन के माध्यमों में ही दिखाई देता था। किंतु यही माध्यम महाभारत काल में धृतराष्ट्र और संजय के वार्तालाप में इस ढंग से दर्शाया है कि कोई पत्रकार उपग्रह से जुड़े कैमरे के जरिए कुरुक्षेत्र में चल रहे महाभारत युद्ध का लाइव वृत्तांत सुना रहा हो। मेरी दृष्टि में यही कल्पना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और उसमें भी लाइव प्रसारण का आधार स्रोत है। अब एक युवा जो पत्रकार बनने की जिज्ञासा रखता है, वह पत्रकारिता का समग्र अध्ययन करे कहां, सार्थक प्रायोगिक प्रशिक्षण कहां से ले तो इस जिज्ञासा शमण का सर्वश्रेष्ठ स्थान है भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय! यह मध्य प्रदेश का ही नहीं एशिया का सबसे पहला पत्रकारिता विवि है, जिसकी नींव 1990 में रखी गई थी। आज इस विवि से प्रशिक्षित होकर निकले पत्रकार प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचार चैनलों में श्रेष्ठतम सेवाएं दे रहे हैं। विवि के कुलपति संजय द्विवेदी कहते हैं, `हमारी कोशिश है कि यह विवि भारतीय भाषाई पत्रकारिता के प्रशिक्षण के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो। इसके लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।' उनकी यह परिकल्पना इसलिए अहम् है क्योंकि आज हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं से प्रशिक्षण देने वाले विवि तो देशभर में खुल गए हैं लेकिन भारतीय भाषाओं में इनका अभाव खलता है। दरअसल, जितनी आज महत्वपूर्ण व राष्ट्रव्यापी पत्रकारिता हिंदी व अंग्रेजी की है उतनी ही महत्वपूर्ण देश की अन्य भाषाओं की भी है। इन भाषाओं में भी बड़े-बड़े समाचार पत्र व पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और लगभग संविधान की अनुसूची में दर्ज प्रत्येक भाषा में टीवी समाचार चैनल हैं। जब देश में बड़ी राजनीतिक घटना या दुर्घटना घटती है तो हम देखते हैं कि हिंदी व अंग्रेजी के चैनल, भाषाई चैनलों से ही खबर उठाकर प्रसारित करते हैं। इसीलिए जरूरी है कि भाषाई पत्रकार भी पत्रकारिता के गुणों से संपूर्ण रूप में दक्ष हों और दायित्व को लेकर संविधान के नैतिक मानदंडों के प्रति स्वनियंत्रित हों। स्वनियंत्रण की नैतिकता ही किसी पत्रकार को इस क्षेत्र में लंबी पारी खेलने का अधिकारी बनाने का रास्ता खोलती है। स्वनियमन का प्रशिक्षण कोई विद्यार्थी आदर्श रूप में वहीं से ग्रहण कर सकता है जहां के परिवेश में नैतिक मूल्य आचरण में शुमार हों। स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता के माध्यम से मुख्य भूमिका निभाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी न केवल समर्थ पत्रकार व लेखक थे बल्कि कर्मवीर नामक पत्र निकालकर उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध कलम चलाकर जनमानस को भी स्वतंत्रता के लिए खड़ा करने में अहम् भूमिका निभाई। गोया यह नाम ही आदर्श आचरण का प्रतिरूप है। यह विवि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खबर से आगे भी क्या संभव है, इस धारणा को विकसित करता है। यानी मौलिक सोच को कैसे फीचर लेखन का आयाम दिया जाए, इस समझ को विद्यार्थी के मन में विकसित करता है। इस लेखन में विचार भी अंगीकार होता है। यही वह समझ है जो नवोदित पत्रकार में संपादकीय लिखने की क्षमता विकसित करती है। इसलिए यहां के प्राध्यापक रामदीन त्यागी कहते हैं संचार माध्यमों के व्यापक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप और कर्तव्य के प्रति सचेत बने रहने के लिए हमें अत्यंत कर्मठ और लगनशील युवा पत्रकारों को गढ़ने की जरूरत है, जिससे वे राष्ट्रीय सरोकरों से जुड़े रहते हुए अपनी भाषा में आकर्षक ढंग से समाचार अभिव्यक्त करने की दक्षता इस परिसर से प्राप्त कर सकें। वर्तमान में इस विवि में प्रवेश की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। यहां मीडिया और आईटी पाठ्यक्रमों को पढ़ने की स्नातक व स्नातकोत्तर सुविधाएं हैं। इन क्षेत्रों में कैरियर के अभिलाषी छात्र-छात्राएं भोपाल स्थित विवि के अलावा इसी विवि के रीवा और खंडवा परिसरों में भी पढ़ने के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। प्रवेश की सुविधा ऑनलाइन के जरिए विवि की वेबसाइट पर जाकर भी सीधे आवेदन फॉर्म भर सकते हैं।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News

Dakhal News 27 June 2020


bhopal,JP Nadda,huge amount ,Chinese institutions , Rajiv Gandhi Foundation

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरुवार को मध्यप्रदेश की वर्चुअल रैली को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कांगेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की विभिन्न संस्थाओं ने मोटी रकम मुहैया कराई है। इस फाउंडेशन के चेयरपर्सन सोनिया गांधी हैं और इससे कई कांग्रेस के नेता जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि चीन और कांग्रेस के बीच गुपचुप रिश्ता है।   भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने वर्चुअल रैली को संबोधित करते हुए कहा कि आज ही मैंने टेलीविजन में देखा और दंग हूं कि राजीव गांधी फाउंडेशन को 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और चाइनीज एंबेसी ने तीन हजार यूएस डॉलर मुहैया कराए हैं। इस फाउंडेशन को इतनी मोटी रकम क्यों दी गयी। देश जानना चाहता है कि फाउंडेशन को इतना पैसा किस उद्देश्य से दिया गया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि ये वही लोग हैं जो चीन से फंड लेकर उसके पक्ष में माहौल बनाते हैं, स्टडी कराई जाती है। सभी राजनीतिक दल के लोगों ने मोदी जी से कहा कि वह सभी देशहित में एक साथ खड़े हैं। एक परिवार ने विरोध किया। कांग्रेस पार्टी के हाथी के दांत है खाने और दिखाने के अलग हैं।   उन्होंने कहा कि गलवान घाटी में हुयी घटना पर भी कांग्रेस ने राजनीति की। ये वही कांग्रेस है, जिसने 2017 के अगस्त माह में जब चीन और भारत आमने सामने थे, तब राहुल गांधी चीन के राजदूत के साथ गुपचुप मुलाकात कर रहे थे और अब ये लोग चीन के मामले में सवाल उठा रहे हैं। तीन हजार यूएस डालर लेने वाले मुखर नहीं हो सकते हैं। ये अपने स्वार्थ के जाल में स्वयं उलझे हुये हैं। नड्डा ने गांधी-नेहरु परिवार पर निशाना साधते हुए कि एक ही परिवार, जिसे जनता ने वर्तमान में नकार दिया है, वह संपूर्ण विपक्ष नहीं हो सकता है। उन्होंने इस परिवार की नीयत और नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसकी ही गलती के कारण 43 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि चली गयी। जब गलवान घाटी को लेकर सभी राजनैतिक दल केंद्र की मोदी सरकार के साथ हैं, वहीं एक परिवार सवाल खड़े कर रहा हैं।   भाजपा अध्यक्ष ने वर्चुअल रैली में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि मैं मध्य प्रदेश को बधाई देना चाहता हूं कि कोराना संकट में 3 करोड़ फूड पैकेट्स, 30 लाख राशन किट और लगभग 5 करोड़ लोगों को फूड द निडी कार्यक्रम में और लगभग 70 लाख लोगों को फेस कवर पहुंचाने का काम मध्य प्रदेश की इकाई ने किया है। उन्होंने कहा कि मार्च में शक्तिशाली देश असहाय महसूस कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी जी ने तुरन्त डिसीजन लेकर लॉकडाउन लगाकर लोगों को नया जीवन दान दिया। आज एक हजार कोविड के डेडिकेटेड अस्पताल हैं। दुनिया में 6 मौतें प्रति लाख हो रही हैं, जबकि हमारे देश में एक मौत प्रति लाख हो रही है।   उन्होंने कहा कि हम कोरोना संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। बीते मार्च में बड़े-बड़े देश अपने आप को लाचार, असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन भारत मोदी जी के नेतृत्व में कोरोना संकट से लडऩे के लिए तैयार हुआ। आज देश अनलॉक हो रहा है, लेकिन कई राजनीतिक पार्टियां आज भी लॉकडाउन में हैं। मुझे खुशी है कि भाजपा ने डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोगों के साथ जुडऩे की शुरुआत की है।   नड्डा ने कहा कि मुझे कोरोना काल में आपसे संवाद करने का मौका मिला। ये 45वी वर्चुअल रैली है। इस समय वर्चुअल रैली में 33 लाख लोग हमसे जुड़े हुए हैं। छह साल में प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में वह काम हुए जो 6 दशकों में भी नहीं हो सके थे। बता दें कि मध्यप्रदेश भाजपा की ओर से आयोजित इस वर्चुअल रैली को राज्य में लाखों लोगों ने सुना। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिल्ली से अत्याधुनिक तकनीकी की मदद से संबोधित किया और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा और अन्य भाजपा नेताओं ने इसे भोपाल में संबोधित किया और सुना भी।

Dakhal News

Dakhal News 25 June 2020


gwalior, Alok Tomar, younger brother, Anurag Tomar, also died , cancer

ग्वालियर। देश के जाने माने पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर के छोटे भाई अनुराग तोमर का भी गत दिनों यहां कैंसर के कारण असामयिक निधन हो गया। अनुराग केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे और अरूणाचल प्रदेश में तैनात थे। हाल में उनको कैंसर होने की जानकारी मिली जिसके बाद कुछ महीनों तक ग्वालियर में ही उनका उपचार चलता रहा लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। ज्ञात हो कि वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर का निधन कैंसर के चलते हुआ। आलोक तोमर की कई राउंड कीमियोथिरेपी हुई थी पर उन्हें बचाया न जा सका था।

Dakhal News

Dakhal News 24 June 2020


bhopal,Is this letter of UP STF real or fake?

वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर पर दो पन्ने का एक लेटर शेयर फारवर्ड किया जा रहा है जिसे यूपी एसटीएफ का बताया गया है. इस लेटर में चाइनीज एप्प हटाने के निर्देश हैं. आखिर में पुलिस महानिरीक्षक एसटीएफ लखनऊ का नाम लिखा गया है. पर यहां किसी के नाम से कोई हस्ताक्षर नहीं है.   हस्ताक्षर विहीन इस लेटर का लुक एंड फील भी प्रथम नजर में यह बता देता है कि यह आफिसियल लेटर नहीं है. लेटर में न तो यूपी पुलिस का लोगो है न ही कोई लेटर पैड है. न ही कोई पत्र क्रमांक संख्या है और न ही पत्र किसी को संबोधित है. पत्र की प्रतिलिपि भी किसी को नहीं है.   साथ ही ये भी सोचने की बात है कि जब भारत सरकार, यूपी सरकार ने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया तो अचानक यूपी एसटीएफ कैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े मामले में किसी एक देश का एप्प जोड़ने या हटाने को लेकर आदेश जारी कर देगी? हां ये हो सकता है कि अनआफिसियली ये लेटर जारी किया गया हो लेकिन अनधिकृत पत्र को कैसे असली व सरकारी मानकर खबर का प्रकाशन किया जा सकता है? आजतक, हिंदुस्तान समेत कई बड़े-छोटे मीडिया वालों ने इस लेटर के आधार पर खबर का प्रकाशन कर दिया. बताया जाता है कि कुछ जगहों से इस खबर को वरिष्ठों के निर्देश के बाद हटा लिया गया. देखें छोटे बड़े कई पोर्टलों पर छपी इस खबर का स्क्रीनशाट-

Dakhal News

Dakhal News 20 June 2020


bhopal, Vishwas Garde Bhau is being deceived like this!

प्रख्यात पत्रकार लक्ष्मण नारायण गर्दे के पौत्र विश्वास गर्दे ‘भाऊ’ की शल्य चिकित्सा और फिर निधन के दुख के बीच रविवार को बनारस से लखनऊ लौट रहा था तो रास्ते में फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबर आई। मुझे नहीं मालूम कि टेलीविजन और फिल्म की चकाचौंध भरी दुनिया में वह किस तरह का अवसाद और अकेलापन था जिसके कारण सुशान्त ने आत्महत्या जैसे पलायन का मार्ग चुना लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मैंने भाऊ को लगातार अकेला होते जाने को देखा है।   सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर और लक्ष्मण नारायण गर्दे- बनारस में दो प्रसिद्ध और समकालीन मराठीभाषी पत्रकार तो थे ही, आपस में रिश्तेदार भी थे। पराड़कर जी की भतीजी का विवाह गर्दे जी के पुत्र से हुआ। भाऊ के पिता गर्दे जी के पुत्र और माता पराड़कर जी की भतीजी थीं। इस तरह भाऊ मेरे भाई थे। करीब डेढ़-दो दशक पूर्व हम जब भी भाऊ के घर जाते, अक्सर वे घर पर नहीं होते। उनके यार-दोस्तों का एक बड़ा दायरा था। वे जब भी आते, कुछ लोगों के साथ ही आते। उनके बहुत सारे दोस्तों के नाम हमें भी याद थे।   भाऊ का अर्थ भाई होता है और वे पूरे मोहल्ले में घर के बड़े भाई की तरह ही लोकप्रिय थे। ज्यादातर लोग उन्हें भाऊ कहते और कुछ लोग भाऊ को किसी नाम-उपनाम की तरह समझते हुए उसमें आदर से भैया भी जोड़ देते। इस प्रकार वे बहुत सारे लोगों के भाऊ भैया हो जाते जबकि दोनो का अर्थ एक ही है। भाऊ सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते। किसी के घर विवाह हो या कोई अस्पताल में हो, भाऊ उसमें शामिल मिलते। वे पत्थरगली, रतनफाटक, जतनबर, दूधकटरा, बीबी हटिया, गायघाट, ब्रह्माघाट, दुर्गाघाट, दूध विनायक और आसपास के क्षेत्रों के अघोषित सभासद की तरह थे। हालांकि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं रही लेकिन उनकी सामाजिक सहभागिता से अक्सर ये भ्रम होता कि वे किसी ऐसे लाभ के लिए ही ऐसा कर रहे हैं। भाऊ पक्के महाल के इन इलाकों में पत्रकारों के सबसे बड़े सूत्र थे। दिग्गज पत्रकार के परिवार से होने के कारण ज्यादातर समाचार पत्रों के संवाददाताओं के पास उनके नंबर होते और भाऊ उनके लिए हमेशा उपलब्ध रहते। इन मराठी बाहुल्य क्षेत्रों में मराठियों से जुड़े आयोजन की खबर तो भाऊ के बिना पूरी ही नहीं होती। गणेशोत्सव के दौरान तो उनकी खूब मांग रहती थी। भाऊ कभी स्वतः पत्रकार नहीं बन सके लेकिन वे बनारस की पत्रकारिता में लंबे समय तक अपरिहार्य रहे। यहां तक की कोई पराड़कर जी, गर्दे जी या रणभेरी आदि से जुड़े टीवी कार्यक्रमों का निर्माण कर रहा होता तो वह भाऊ की ही शरण में होता। हालांकि इन सब का कभी कोई क्रेडिट उन्हें नहीं मिला लेकिन भाऊ मदद करके ही खुश हो लेते। ये जरूर हुआ कि इन सारी चीजों का असर उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ता गया। सामाजिक कार्यों में ऐसा मन रमता रहा कि न कहीं नौकरी कर सके और न विवाह। चार बहनों के विवाह और उनके परिवारों की खुशी में अपनी खुशी देखी लेकिन बहनों के बाद माता-पिता के देखभाल की जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं। फिर यह भी हुआ कि माता-पिता की देखभाल के कारण उनका सामाजिक दायरा कम होता चला गया और परिवार में पूरा वक्त बीतने लगा। फिर मां भी चल बसी और पिता को स्मृतिलोप के बाद संभाल पाना कठिन से कठिनतर होता चला गया लेकिन यहीं भाऊ ने समाज का बदला हुआ रूप भी देखा। जो भाऊ हमेशा दूसरों के कामों में बढ़चढ़कर शामिल होते थे, जो हमेशा यार-दोस्तों से घिरे रहते थे, जिनका पता मोहल्ले में कोई भी बता सकता था, जिनका नाम ज्यादातर लोगों की जुबान पर होता था, उनका हालचाल लेने वाला भी कोई नहीं बचा। वे लगातार अकेले होते चले गए। ऐसा समय भी आया कि मई के मध्य जब भाऊ बीमार पड़े और बेसुध रहने लगे तो उनका हालचाल लेने वाला तक कोई नहीं था। यह लाकडाउन का समय था और कोरोना के भय से लोग अपनों तक से दूर थे। भाऊ कई दिनों तक इलाज को तरसते रहे। अन्ततः योगेश सप्तर्षि, पूर्व सभासद घनश्याम और पत्रकार मनोज को खबर मिली तो उन्होंने जैसे-तैसे पास के एक अस्पताल में उन्हें दाखिल कराया। बाद में उन्हें एक निजी अस्पताल लाया गया लेकिन उनकी हालत बिगड़ चुकी थी। इस बीच सूचना पाकर उनकी बहनें और उनके पति भी वहां आ सके। लेकिन भाऊ को बचाया नहीं जा सका। 62 वर्ष की उम्र में भाऊ चल बसे लेकिन उनके निधन के बहुत पहले ही उनके उस विश्वास का अन्त भी हो गया था जो परपीड़ा और परहित को अपना समझने के दौरान उनके मन में कहीं न कहीं फल-फूल रहा था!  

Dakhal News

Dakhal News 20 June 2020


bhopal, Prime Minister, tweeting, death, film actor ,silent ,martyrdom soldiers

कम से कम अभी तक शहीद जवानों के नाम और तस्वीरें साझा होनी चाहिए थी। देरी हो रही है। क्यों देरी हुई पता नहीं। फ़िल्म अभिनेता की मौत पर ट्विट करने वाले प्रधानमंत्री चुप हैं। शायद उनके समर्थक बताने में लगे होंगे कि कोई बात नहीं, अभी कोई चुनाव होगा आप ही जीतेंगे। जवाब मिल जाएगा। लेकिन शहादत को सलाम करने में देरी कैसी? यही नहीं, पूरा दिन बीत गया संख्या बताने में। रक्षा कवर करने वाले पत्रकारों ने उसी वक्त संख्या को लेकर ट्विट करना शुरू कर दिया था मगर सरकारी बयान में संख्या तीन ही रही। रात दस बजे तक। यही नहीं आधिकारिक तौर पर उनके नाम नहीं बताए गए। ख़ैर यह बात चटखारे के लिए नहीं है। यह बात है कि हम कब हालात की संवेदनशीलता को समझेंगे। कब तक सूत्रों के सहारे से खबरों को प्लांट कर तीर मारा जाएगा। इससे आप चुनाव जीत सकते हैं । सच्चाई को हरा नहीं सकते। सतीश आचार्य का यह कार्टून उचित ही पूछ रहा है। आप बनने को तो हर चीज़ बन जाते हैं, प्रधानमंत्री कब बनेंगे। मीडिया मैनेजमेंट और तमाशे से कूटनीति में टी आ पी का जोश आता है लेकिन झूला झूलने से भव्यता आती होगी, कूटनीति इससे तय नहीं होती। प्रधानमंत्री को जनता ने दो वरदान दिए हैं। एक चुनाव में विजय और दूसरा पराजित और दंडवत् मीडिया। स्वीकार करें प्रधानमंत्री जी। कोई इवेंट की योजना बन रही हो तब तो कोई बात नहीं। उसके तमाशे में ऐसे सवाल धूल बन कर उड़ जाएँगे। बैंड बाजा बारात आपके पास है तो तमाशा करने की कला भी आपके ही पास होगी। आई टी सेल शहादत के सम्मान में जुटा होता तो आज पूछ रहा होता कि शहीदों के नाम क्या हैं ? उनकी संख्या क्या है? सीमा पर चीनी सैनिकों का जमघट बनने कैसे दिया गया? लेकिन इस सवालों की कोई क़ीमत नहीं है। मुझे यक़ीन है कि लोग राहुल गांधी पर ग़ुस्सा निकाल रहे होंगे, जो कोरोना की तरह इस बार भी चीन को लेकर अपना सर ओखली में डाल पूछ रहे थे। देश झूला नहीं है। प्रधानमंत्री जी। कोविड -19 से लड़ने की हमारी तैयारियाँ फुस्स हो चुकी हैं फिर भी आप कह रहे हैं कि हमारी तैयारियों का अध्ययन किया जाएगा। ऐसा आत्म विश्वास अच्छी यूनिवर्सिटी बनाने, अस्पताल बनाने और रोज़गार पैदा करने में होता तो क्या ही बात थी । लेकिन इसमें आपकी गलती नहीं है। राहुल गांधी की है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 17 June 2020


bhopal,Yogi remains intact within the government

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था किसी भी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए और यह तब संभव है जब सरकार की गंगोत्री यानि मंत्रिमंडल में शामिल लोग साफ-सुथरे हों। उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने हाल में आटा की आपूर्ति का ठेका दिलाने के लिए हुई 9 करोड़ 79 लाख रुपये की धोखाधड़ी के जिस मामले में कार्रवाई की है उसमें पशुधन राज्य मंत्री रजनीश दीक्षित के निजी सचिव को गिरफ्तार किये जाने से सरकार के अंदरूनी हालातों की झलक मिल गई है।   कैसे हो गया दिया तले अंधेरामुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने पदभार संभालते ही भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टोलरेंस की नीति की घोषणा की थी। लेकिन तब दिया तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ हो गई थी जब उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों का निजी स्टॉफ काम कराने के लिए डील करते हुए स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ लिया गया। इसके बाद अपने मंत्रिमंडल के पहले पुनर्गठन में योगी ने कुछ मंत्रियों की छुटटी कर दी और कुछ के पर कतर दिये जो बेहद प्रभावशाली थे। मुख्यमंत्री के क्यों बंधे हैं हाथमुख्यमंत्री के इस कठोर रुख से कुछ दिनों तक उनके सहयोगियों में खौफ रहा लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक कायम नही रह सकी। इसके कारणों पर विचार करते हुए यह बात भी सामने आती है कि मुख्यमंत्री के हाथ ऊपरी हस्तक्षेप के चलते पूरी तरह खुले हुए नही हैं। कई दागी मंत्रियों को हटाने में वे इस कारण नाकामयाब हो गये थे क्योंकि उन्हें शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त था। पटरी से उतरी प्राथमिकताएंदरअसल मुख्यमंत्री के सामने यह स्पष्ट है कि जन समर्थन जुटाने में विकास, स्वच्छ शासन-प्रशासन और प्रभावी कानून व्यवस्था जैसे मुददे ज्यादा महत्व नही रखते। इसलिए उन्होंने भावनात्मक एजेंडे को आगे बढ़ाया। बसपा का बहुजन फार्मूला बेहद कारगर था लेकिन सत्ता पाने और उसे मुटठी में बनाये रखने की अधीरता में मायावती ने अपना भावनात्मक एजेंडा दरकिनार कर दिया और शासन की स्वाभाविक प्राथमिकताओं में बढ़त लेकर सिक्का जमाने की कोशिश की जिसमें वे बुरी तरह फेल रहीं। मायावती के इस हश्र से योगी ने कहीं न कहीं सबक सीखा है इसलिए उन्होंने ट्रैक बदला और गुड गवर्नेन्स के फेर में पड़ने के बजाय जिलों के नाम बदलकर उन्होंने भावनात्मक मुददों पर आगे बढ़ने की शुरूआत की। संकीर्ण राजनीति को लेकर उनकी आलोचना भी हुई, यहां तक कि केंद्रीय नेतृत्व को भी उनके तौर-तरीके रास नही आये लेकिन वे टस से मस नही हुए। आज हालत यह है कि उनके कटटरवादी रवैये को बड़ी जन स्वीकृति मिल चुकी है और उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी व्यक्तिगत स्थिति इतनी मजबूत कर ली है कि लखनऊ में मोदी नही योगी चाहिए के पोस्टर तक लग गये हैं। कैलकुलेटिव योगी की कूटनीतिपर योगी संत होकर भी बहुत ही कैलकुलेटिव हैं। उन्होंने अपनी मंजिल तय कर रखी है। जिसकी ओर आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ने की निपुणता दिखा रहे हैं। वे नही चाहते कि केंद्रीय नेतृत्व के प्रतिद्वंदी के रूप में उनकी छवि बने और उनका पहले कौर में ही बिस्मिल्लाह हो जाये। इसकी बजाय उन्हें फिलहाल अनुयायी बने रहकर अपनी जड़ें मजबूत करते जाने की रणनीति पर भरोसा है। खबर है कि उत्तर प्रदेश में प्रशासन के बड़े पदों पर नियुक्तियां दिल्ली के निर्देशों पर होती हैं। इसलिए कई भ्रष्ट अफसर ऊपर के लोगों के कृपा पात्र होने के कारण प्राइज पोस्टिंग हासिल करने में सफल हो रहे हैं। योगी इसका कोई प्रतिरोध नही करना चाहते। मंत्रियों के मामले मे भी उन्होंने इसी तरह टकराव से बचने की नीति अपना रखी है। भ्रष्टाचार को लेकर संघ भी क्यों नही है दो-टूकसंघ को भी भ्रष्टाचार रोकने और विकास के मामले में बहुत दिलचस्पी नही है, भले ही संघ प्रमुख कहते हों कि उनका काम व्यक्ति और समाज का निर्माण करना हैं। इसी कारण संघ मंत्रियों और अधिकारियों को लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों पर कान नही धर रहा। संघ समाज के उस पुराने मॉडल को पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है जो उसका आदर्श है। उसे जो चाहिए योगी कर रहे हैं। इसलिए योगी संघ के और ज्यादा प्रिय बनते जा रहे हैं और वे यही चाहते हैं। रहस्य जानना नहीं रहा मुश्किलबहरहाल मंत्री का निजी स्टॉफ अपने बॉस की बिना जानकारी के गड़बड़ियां करे यह संभव नहीं है। इसलिए अपने निजी सचिव के कारनामें के छीटों से पशुधन राज्य मंत्री खुद को बचाना चाहें तो यह मुश्किल है। आम धारणा यह है कि अकेले पशुधन राज्य मंत्री ही नहीं ज्यादातर मंत्री इस सरकार में खुला खेल फर्रुखाबादी खेल रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामले में खुद निष्कलंक होते हुए भी योगी व्यापक रूप से इस मोर्चे पर निर्णायक क्यों नही होना चाहते इसका रहस्य जाहिर है कि अबूझ नही है। लेखक केपी सिंह जालौन के वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क- 9415187850

Dakhal News

Dakhal News 17 June 2020


bhopal,Bharu

प्रख्यात पत्रकार लक्ष्मण नारायण गर्दे के पौत्र विश्वास गर्दे का वाराणसी में शनिवार की सुबह अन्ततः निधन हो गया था। वे पिछले एक पखवारे से मौत से संघर्ष कर रहे थे। शुक्रवार को उन्हें निजी चिकित्सालय से स्थानीय शिवप्रसाद गुप्त जिला चिकित्सालय में लाया गया था।   वे परिवारीजनों और मित्रों में भाऊ के नाम से लोकप्रिय थे। मिलनसार और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले भाऊ का पिछले दिनों महमूरगंज स्थित एक निजी चिकित्सालय में आंत का आपरेशन किया गया था। तबसे वे सघन चिकित्सा कक्ष में थे। उनके रक्त में संक्रमण भी था। भाऊ वाराणसी के पत्थर गली स्थित अपने पैतृक निवास में पिता पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे के साथ रहते थे। पिता भी अस्वस्थ हैं। लाकडाउन के दौरान भाऊ की तबीयत बिगड़ने पर पहले उन्हें मच्छोदरी के बिडला अस्पताल में दाखिल कराया गया था। शनिवार की भोर उन्होंने अन्तिम सांस ली।लक्ष्मण नारायण गर्दे हिन्दी पत्रकारिता के आधारस्तम्भ पत्रकारों में रहे हैं। भारतमित्र, नवजीवन, वेंकटेश्वर समाचार और हिंदी बंगवासी के संपादकीय दायित्वों का निर्वाह करने वाले गर्दे जी ने मराठीभाषी होते हुए हिन्दी की अप्रतिम सेवा की। वे गांधी और तिलक के करीब रहे, सरल गीता लिखी। कल्याण के अंकों का संपादन भी किया।

Dakhal News

Dakhal News 13 June 2020


bhopal,Contractor appeasement of Muslim politics

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और करोड़ो की सम्पति की मालिक मायावती तमाम ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो दलित परिवार में जन्म लेने के कारण हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। मायावती ने कभी दलित होने को अभिशाप नहीं समझा। बल्कि अपनी सूझबूझ से माया ने दलित परिवार में जन्म लेने को भी एक सुनहरे मौके में बदल दिया। दलित चिंतक और नेता मान्यवर काशीराम को जब मायावती में अपनी ‘सियासी परछाई’ दिखाई दी तो उन्हें इस बात की तसल्ली हो गई कि जिस दलित मिशन को वह(काशीराम) बढ़ती उम्र के कारण मुकाम तक नहीं पहुंचा पाए हैं, उसे मायावती वह मुकाम दिलाएंगी,ताकि दलित समाज में शान से जी सके। इसी लिए काशीराम ने अपने जीतेजी उस मायावती को दलितों की आवाज बना दिया जो एक आईएएस अधिकारी बनकर देश-दुनिया को यह बताना चाहती थी कि दलितों में भी काबलियत की कमी नहीं है। बस उन्हें मौके की तलाश है।   काशीराम ने मायावती को सियासी जामा पहनाया तो माया ने अपनी काबलियत के बल पर मजबूत दलित वोट बैंक तैयार कर दिया। इसी वोट बैंक के सहारे माया ने चार बार उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। माया ने कभी एतराज नहीं किया कि उन्हें लोग दलित की बेटी कहते हैं। राजठाठ से रहले वाली मायावती को चिढ़ तो तब होती थी,जब लोग उन्हें दौलत की बेटी कहते थे। हां, जब माया को सियासी रूप से यह लगने लग कि सिर्फ दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती हैं तो माया ने अन्य जातियों के मतदाताओं को लुभाने के लिए भी खूब पैतरेबाजी की। उनके द्वारा बनाई गई भाई-चारा कमेटी को कौन भूल सकता है। कभी वैश्य-ब्राहमणों पर डोरे डाले तो कभी क्षत्रिय वोटरों को लुभाया। सत्ता हासिल करने के लिए मायावती ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाया’ का नारा भी खूब उछाला, लेकिन माया को सबसे अधिक दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सियासत रास आई। यूपी के सियासी गलियारों में हमेशा इस बात की चर्चा होती रहती है कि समाजवादी पार्टी यादव-मुस्लिम तो बसपा दलित-मुस्लिम वोट बैंक के सहारे ही सियासत में सम्मानजनक स्थान हासिल कर पाए थे। उत्तर प्रदेश में मायावती पिछले तीन दशकों से दलित वोटरों की अकेली ‘ठेकेदार’ बनी हुई हैं। उन्हें कहीें से कोई विशेष चुनौती नहीं मिली। बीते कुछ वर्षो में अगर मायावती को किसी ने थोड़ा-बहुत परेशान किया है तो वह हैं भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर रावण। रावण अपने आप को मायावती का भतीजा भी बताता है और उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश भी करता रहता हैं। दलित ही नहीं, माया की तरह मुस्लिम वोट बैंक पर भी रावण गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं। इसी लिए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जब कुछ मुसलमानों ने संघर्ष का बिगुल बजाया तो रावण भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल दिया। तब्लीगी जमात पर जब कोरोना फैलाने का आरोप लगा तब भी रावण ने इसके विरोध में हंगामा किया। बहरहाल, यह किसी ने नहीं सोचा था कि मायावती हों या फिर भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर रावण दोनों मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत के चलते अपने कोर दलित वोटरों के साथ होने वाले अत्याचार से भी आंखें मंूद सकते हैं। अगर ऐसा न होता तो माया और रावण जौनपुर और आजमगढ़ में कुछ मुस्लिमों द्वारा दलितों के घर जलाए जाने और दलित बेटियों के साथ अभद्रता के मामले मेें चुप्पी नहीं साधे रहते। खैर, दलितों पर अत्याचार की खबरों से चन्द्रशेखर रावण और मायावती की जुबान पर लगा ‘मजबूरी का ताला’, भले नहीं खुला हो, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना का पता चलते ही आनन-फानन में उक्त घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून(एनएसए) और गैंगेस्टर एक्ट लगाने में देरी नहीं की। इस बीच इतना जरूर हुआ की जब माया को लगा की कहीं योगी दलित सियासत में बाजी मार नहीं ले जाएं तो उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बयान जरूर जारी कर दिया कि उक्त घटना में लिप्त लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। मायावती ने ट्वीट किया, यूपी में चाहे आजमगढ़, कानपुर या अन्य किसी भी जिले में खासकर दलित बहन-बेटी के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो या फिर अन्य किसी भी जाति व धर्म की बहन-बेटी के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो, उसकी जितनी भी निंदा की जाये, वह कम है,बहरहाल, जब तक माया का ट्वीट आया तब तक योगी सरकार बदमाशों पर एनएसए और गैंगेस्टर एक्ट लगाने का आदेश दे चुकी थी। वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में दलितों पर हो रहे अत्याचार तथा अपराध के मामले में बेहद सख्त हैं। जौनपुर में दलितों के साथ मारपीट के बाद घर जलाने के आरोपतियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की गई तो आजमगढ़ में भी दलित बालिकाओं के साथ छेड़छाड़ करने के मामले में एक दर्जन लोगों को अंदर भेजने के साथ एनएसए लगाया गया है। दर्जन भर से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका था। लब्बोलुआब यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ अराजक तत्वों द्वारा अनुसूचित जाति के परिवारों पर जुल्म ढाए जाने की घटना तो निंदनीय है हीं, उससे अधिक दुखद यह है कि जो राजनीतिक दल दशकों से अनुसूचित जातियों का दशको तक भावनात्मक शोषण करते रहे, वह नेता दलितों के घर फूंके जाने और उनकी बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किए जाने पर इसलिए सधे लहजें में प्रतिक्रिया दे रहे थे कि कहीं पीड़ित दलितों के पक्ष में उनकी दी गई बयानबाजी से मुस्लिम वोटर नाराज न हो जाएं। दलितों के साथ इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है कि जिन दलों और नेताओं पर बार-बार विश्वास करके उन लोगांे(दलितों ने) ने सत्ता की सीढ़िया चढ़ने में मदद पहुंचाई, वे दल इतने घटिया स्तर की वोटबैंक राजनीति कर रहे हैं कि दलितों की जान-माल और बहू-बेटियों की इज्जत पर हमलों का डंके की चोट पर विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। पीड़ित दलित परिवार के लोगों को इस बात का जरूर संतोष हुआ होगा कि मुख्यमंत्री ने उन पीड़ितों की भरपूर सहायता की,लेकिन यह बात मायावती को कैसे रास आ सकती थी,इस लिए उन्होंने नया शिगूफा छोड़ दिया। बसपा प्रमुख ने कहा कि आजमगढ़ में दलित बेटी के साथ हुए उत्पीड़न के मामले में कार्रवाई को लेकर यूपी के मुख्यमंत्री देर आए पर दुरुस्त आए, यह अच्छी बात है. लेकिन बहन-बेटियों के मामले में कार्रवाई आगे भी तुरन्त व समय से होनी चाहिये तो यह बेहतर होगा। आजमगढ़ और जौनपुर में दलितों पर अत्याचार और उसको लेकर माया की पहले चुप्पी और फजीहत पर मायावती ने घटना में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भले कर दी हो,लेकिन मायावती का असली चेहरा और मकसद तो सब समझ ही गए। इसीलिए जानकार तो यही कह रहे हैं कि मुसीबत की घड़ी में दलित वोट बैंक की सियासत करने वाले नेता चुप रहे, इस बात का मलाल पीड़ितों और दलित चिंतकों को उतना नहीं हुआ होगा, जितना यह देखकर हो रहा होगा कि ट्विटर पर लगातार सक्रिय मायावती ने उसी बीच ट्वीट कर जेएनयू और जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी की रैंक बेहतर होने पर उक्त संस्थाओं को बधाई दी लेकिन, जौनपुर में अनुसूचित वर्ग के लोगों के घर जलाने के प्रकरण पर सहानुभूति जताने के लिए मायावती की जुबान से दो शब्द निकले में काफी समय लग गया। ऐसे मसलों पर अक्सर कूच का एलान करने वाले भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को भी आजमगढ़ व जौनपुर के अपने समाज की पीड़ा का अहसास नहीं हुआ। अक्सर मुखर रहने वाले इन नेताओं की खामोशी ने अनुसूचित जातियों से उनके वोटबैंक की सियासत के चलते मायावती और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के रवैये को लेकर सवाल उठने लगें है। माया-रावण के इस कृत्य से दुखी रिटायर्ड आइपीएस और पूर्व डीजीपी बृजलाल ने ट्वीट कर मायावती और चंद्रशेखर पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा सुश्री मायावती आपने सियासी मंच पर दशकांे खुद को दलित की बेटी कहकर सत्ता का मजा लिया है। आज आजमगढ़ की दलित बेटियां आपको पुकार रही है। और आप चुप है। गेस्ट हाउस कांड की पीड़ा से कम यह दर्द नहीं है। बहनजी। आजमगढ़ में मुस्लिम लड़कों ने दलितों को बेरहमी से पीटा, जो कि अपनी बालिकाओं से की जा रही छेड़छाड़ का विरोध कर रहे थे। इनती संवेदनशील घटना पर मायावती और प्रो. दिलीप मंडल चुप्पी साधे हैं। बृजलाल ने भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को भी कठघरें में खड़ा किया। उन्होंने लिखा दलित वर्ग कह रहनुमाई की नुमाइश करने वाले बहुरूपिए भीम आर्मी चीफ जौनपुर व आजमगढ़ की लोमहर्ष घटना पर खामोश हो? जौनपुर-आजमगढ़ की घटनाओं पर बसपा सुप्रीमों मायावती की चुप्पी और दबाव पड़ने पर उक्त घटना की आलोचना के कई मायने हैं। दरअसल, मायावती मुस्लिम-दलित गठजोड़ के सहारे 2022 में फिर से सत्ता हासिक करने का सपना देख रही हैं। इसी क्रम में बीते वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश के 19 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को हासिल करने के लिए टिकटों के बंटवारे में उनकी बड़ी हिस्सेदारी तय की गई थी मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकने के लिए ही उन्होंने गत लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से भी गठबंधन किया था। इसी तरह भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर भी इसी समीकरण के सहारे खुद को बसपा का विकल्प बनाने की कोशिश में लगे है। इसी लिए चन्द्रशेखर ने पहले नागरिकता सुरक्षा कानून और फिर कोरोना संक्रमण के दौर में तब्लीगी जमात का खुला समर्थन कर मुस्लिमों में पकड़ बनाने की कोशिश की । जौनपुर और आजमगढ़ की घटनाओं को लेकर बसपा सुप्रीमों मायावती और भीम आर्मी के चन्द्रशेखर रावण की ही नहीं कांगे्रस की महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका वाड्रा और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादवकी चुप्पी भी सताती रही। अगर यूपी में किसी को छींक भी आ जाए तो प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी को कोसने-काटने लगती हैं, लेकिन मुस्लिम वोटों के सहारे यूपी में पैर जमाने की मंशा के चलते प्रियंका इस मुद्दे पर मुंह सिले बैठी हैं। बात-बात पर मोदी-योगी सरकार के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाने वाली प्रियंका के लिए संभवत: दलित बेटियों का सम्मान मायने नहीं रखता होगा। वर्ना दंगाइयों के घर जाकर मातम मनाने वाली प्रियंका वाड्रा यों शांत नहीं रहती। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का विश्लेषण

Dakhal News

Dakhal News 13 June 2020


bhopal, Formation , new committee ,journalist welfare schemes

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पत्रकार कल्याण योजनाओं के लिए नौ सदस्यीय नई कमेटी की घोषणा कर दी है. मंत्रालय द्वारा जारी सूचना के अनुसार गैर सरकारी सदस्यों का कार्यकाल एक जून 2020 से 31 मई 2022 तक रहेगा. कमेटी की बैठक तिमाही हुआ करेगी. बैठक में पत्रकारों से जुड़ी कल्याण योजनाओं पर विचार करने और वित्तीय सहायता देने के लिए मामलों पर विचार किया जाएगा. अगर कोई तुरंत मदद का मामला आता है तो उसके लिए आपात बैठक बुलाई जा सकती है. इस कमेटी में मंत्रालय की ओर से सूचना सचिव, पीआईबी के महानिदेशक और मंत्रालय के संयुक्त सचिव के अलावा छह पत्रकार हैं. देखें छह पत्रकारों के नाम- राज किशोर तिवारी एबीपी गंगा संदीप ठाकुर लोकमत समूह सर्जना शर्मा सन्मार्ग हिंदी दैनिक अमित कुमार न्यूज24 चैनल उमेश्वर कुमार स्वतंत्र पत्रकार   गणेश बिष्ट फोटोजर्नलिस्ट हिंदुस्थान समाचार एजेंसी

Dakhal News

Dakhal News 10 June 2020


bhopal,  nude game , headline management ,today

  आज के कई अखबारों में चीन के पीछे हटने की खबर है। दैनिक जागरण का शीर्षक है, “रंग लाई भारतीय कूटनीति, पूर्वी लद्दाख में कई जगहों से ढाई किलोमीटर पीछे हटा चीन। नई दिल्ली डेटलाइन से जयप्रकाश रंजन की खबर इस प्रकार है, “पूर्वी लद्दाख एलएसी पर जारी गतिरोध को खत्‍म करने के लिए भारतीय कूटनीति का बड़ा असर सामने आया है। पूर्वी लद्दाख में चीन के सैनिकों ने कई बिंदुओं को छोड़ा है। सरकार के शीर्ष सूत्रों ने बताया कि गलवन क्षेत्र में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने पैट्रोलिंग प्वाइंट 15 और हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से ढाई किलोमीटर पीछे हटी है जबकि भारत ने अपने सैनिकों को कुछ पीछे हटाया है। इससे पहले चार जून को भी ऐसी रिपोर्ट आई थी कि चीनी सेना दो किलोमीटर पीछे हट गई है। चीन ने उक्‍त कदम छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बैठक से पहले उठाए थे।” हिन्दी अखबारों में यह खबर दैनिक हिन्दुस्तान में भी है। सूत्रों के हवाले से दी गई इस खबर में नहीं बताया गया है कि चीन कब कितना अंदर आया था या कितने बिन्दुओं पर कब्जा कर लिया था लेकिन दिल्ली में सूत्रों ने बता दिया कि चीनी सैनिकों ने कई बिन्दुओं को छोड़ दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि खबर खुद ही कह रही है कि उसकी सत्यता की कोई गारंटी नहीं है। यह स्थिति तब है जब रक्षा मंत्री ट्वीटर पर कह चुके हैं कि वे संसद में जवाब देंगे और कल राहुल गांधी के ट्वीट का जवाब उन्होंने नहीं दिया। अंग्रेजी में यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू में लीड छपी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। एक्सप्रेस और हिन्दू में बाईलाइन भी। पर सब सूत्रों के हवाले से है। निश्चित रूप से यह उच्च स्तर का प्लांटेशन है। इसकी पोल द टेलीग्राफ ने खोली है, अंदर के पन्ने पर राहुल गांधी के सवाल के साथ छापा है जो उनने कल ट्वीट किया था और लिखा है कि जवाब अनाम सूत्रों के हवाले से है। यह एएनआई की खबर है। मुझे लगता है कि पीटीआई अभी भी सरकारी दबाव में नहीं आता है। खिलाफ खबरें तो रहती ही हैं प्लांटेशन एएनआई और बाईलाइन के जरिए हो रहा है। अखबारों में खबरें पहले भी प्लांट होती थीं। पर ऐसे एक ही खबर कई अखबारों में बाईलाइन और लीड भी छप जाए ऐसा बहुत कम होता था। अमूमन रिपोर्टर भी बुरा मानते थे कि उन्हें एक्सक्लूसिव कह दी गई खबर दूसरे अखबारों को भी दे दी गई। पहले ज्यादा अखबारों में छपवाने वाली खबर एजेंसी के जरिए लीक या प्लांट की जाती थी। तब एजेंसी की साख होती ही थी खबर वैसी ही बनाई जाती थी। इसके अलावा, एक अखबार में कोई खास खबर छपे तो दूसरे अखबार भी छापते थे। अब लाल लाल आंख दिखाने की सलाह और सूत्रों का कहना कि सेना पीछे चली गई – मानने वाली खबर नहीं है। इसलिए प्लांट करने वाले को भी पता है। सबको दे दी गई। और रिपोर्टर की हैसियत नहीं है कि बुरा मान जाए। अगली बार फिर ऐसा प्लांटेशन छापेगा। मैं फिर बताउंगा। दैनिक जागरण की आज की खबर में आगे लिखा है, “सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख के एलएसी के पास चीनी सैनिकों के जमावड़े में बीते छह जून, 2020 को हुई बातचीत से पहले ही कुछ कमी हुई थी। चीन कुछ चुनिंदा जगहों से धीरे धीरे अपनी सेनाओं की संख्या कम कर रहा है। बताया जाता है कि विदेश मंत्रालय के स्तर पर हुई बातचीत में बनी सहमति को सीमा पर पहुंचने से हालात को सामान्य बनाने में काफी मदद मिली है। इन दोनों बैठकों में पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी शिनफिंग के बीच दो अनौपचारिक बातचीतों में हर हाल में सीमा पर शांति बहाली बनाए रखने के मिले निर्देश का जिक्र किया गया था।“ ना सूत्रों के नाम ना वार्ताकारों के नाम। कूटनीति रंग ला रही है का दावा पर कूटनीति है किसकी यह नहीं बताएंगे।   वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह का विश्लेषण.

Dakhal News

Dakhal News 10 June 2020


up, media persons , rampage demonstration, against oppression

फ़तेहपुर । जिला पत्रकार संघ/एशोसिएशन के अध्यक्ष अजय भदौरिया व अन्य वरिष्ठ पत्रकारों के खिलाफ जिला प्रशासन दमनकारी नीति अपनाए हुए हैं. कुछ समय पूर्व इन पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मुकद्दमे दर्ज करवाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने का प्रयास किया. जिला प्रशासन के इस रवैए के खिलाफ लगभग पच्चीस दिन पूर्व पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल व मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अध्यक्ष समेत अन्य पत्रकारों पर दर्ज कराए गये फर्जी मुकद्दमों को स्पंज कर पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराते हुए दोषी अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही की मांग की थी. किन्तु लम्बे समयांतराल बीतने के बाद भी शासन द्वारा मामले पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया. इसके विरोध में जिले के एक दर्जन से अधिक स्थानों पर पत्रकारों ने 30 मई (हिन्दी पत्रकारिता) दिवस को काला दिवस के रूप में मनाया था. न्याय न मिलने पर 7 जून को जिलाधिकारी की सरकार विरोधी नीतियों के खिलाफ जल सत्याग्रह आंदोलन करने का आह्वान किया गया. इसको सफल बनाने के लिए एसोशिएशन ऑफ इंडियन जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष व जिला पत्रकार संघ के अध्यक्ष अजय भदौरिया के नेतृत्व में यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन फ़तेहपुर के जिलाध्यक्ष विवेक मिश्र के साथ जिले के लगभग पन्द्रह अलग अलग स्थानों में सैकडो की संख्या में एकत्र होकर पत्रकारों ने गंगा, यमुना आदि नदियों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए जल सत्याग्रह के आंदोलन को सफल बनाया. इस मौके पर जिलाधिकारी की निरंकुश कार्यशैली के खिलाफ पत्रकारों ने जमकर नारेबाजी की और सरकार से ऐसे अधिकारी को हटाकर उसके खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग की. गौरतलब है कि जिले भर के पत्रकारों ने रविवार को जिला पत्रकार संघ/एसोशियेसन के बैनर तले जल सत्याग्रह आंदोलन किया. जिला मुख्यालय के पत्रकारों ने हुसेनगंज के भृगुधाम के बलखण्ड़ी गंगा घाट पर प्रेम शंकर अवस्थी व अजय भदौरिया, विवेक मिश्र के नेतृत्व में गंगा नदी में सुबह दस बजे से बारह बजे तक पानी के अंदर रहकर आंदोलन को सफल बनाया. इसी प्रकार बिंदकी व जाफरगंज के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार अरुण द्विवेदी वह श्याम तिवारी की अगुवाई में बक्सर के गंगा घाट पर पहुंचकर जिला प्रशासन की द्वेषपूर्ण कार्यशैली के खिलाफ प्रदर्शन किया. वहीं चौडगरा के पत्रकारों ने गंगा नदी के गुनीर गंगा घाट पर जल सत्याग्रह आंदोलन को गति दिया. इसी प्रकार बकेवर के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र त्रिपाठी के नेतृत्व में पक्का तालाब में पहुंचकर जिला प्रशासन के खिलाफ जल सत्याग्रह को सफल बनाने की मुहिम को आगे बढाया. जहानाबाद में डॉ जौहर रज़ा व संतोष त्रिपाठी की अगुवाई में रिंद नदी में जिला प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सत्य की जीत के लिए जल सत्याग्रह आंदोलन कर आंदोलन को मजबूती प्रदान की. उधर अमौली व जाफरगंज के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार विमलेश त्रिवेदी के नेतृत्व में रुस्तमपुर घाट पर यमुना नदी में जल सत्याग्रह कर सरकार से ऐसे अधिकारी को हटाने की मुहिम को गति देने का सार्थक प्रयास किया। इसी प्रकार बहुआ के पत्रकारों ने मो. शाहिद वह प्रदीप सिंह की अगुवाई में कोर्राकनक यमुना नदी में जल सत्याग्रह के कार्यक्रम को गति दी। वहीं गाजीपुर के पत्रकारों ने प्रथम चंद्र की अगुवाई में यमुना नदी के औगासी घाट पर जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर कार्यक्रम को सफल बनाया। असोथर के पत्रकारों ने यमुना नदी में गौरव सिंह व फूलचंद्र के नेतृत्व में यमुना के ब्रह्मकुंड घाट पर जिला प्रशासन की क्रूर कार्यशैली के खिलाफ जल सत्याग्रह कर आंदोलन को मजबूती प्रदान की। खागा मुख्यालय व किशनपुर के पत्रकारों ने किशनपुर यमुना नदी में दमदार प्रदर्शन कर जिला प्रशासन की दमनकारी नीति की जमकर आलोचना करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाया. खखरेरू के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार अशोक सिंह के नेतृत्व में यमुना नदी के कोट घाट पर जल सत्याग्रह को सफल बनाने का कार्य किया. धाता के पत्रकारों ने ज्ञान सिंह वह विवेक सिंह की अगुवाई में रानीपुर यमुना घाट पर जल सत्याग्रह को सफल बनाया. इसके साथ ही प्रेम नगर के पत्रकारों ने मंडवा गंगा घाट पर कार्यक्रम कर संगठन को मजबूती प्रदान की. इसी प्रकार हथगाम व छिउलहा के पत्रकारों ने कोतला गंगा घाट पर प्रदर्शन किया.   जिले के लगभग डेढ़ दर्जन स्थानो में पानी के अंदर घुसकर पत्रकारों ने अर्धनग्न प्रदर्शन किया. इकट्ठे पूरे जनपद के पत्रकारों के प्रदर्शन से जिले में हड़कम्प मचा रहा. लोग जिला प्रशासन की कार्यशैली पर तरह-तरह की चर्चाएं करते रहे. पत्रकारों के सामूहिक प्रदर्शन की जानकारी लगातार जनपद से लेकर मुख्यालय लखनऊ की खुफिया टीम भी जानकारी लेती रहीं.

Dakhal News

Dakhal News 9 June 2020


bhopal,Journalist Ankur ,raised voice, Sanjha Lokswamy, CM

वरिष्ठ पत्रकार व प्रेस क्लब कार्यकारिणी सदस्य अंकुर जायसवाल ने आज मुख्यमंत्री के सामने संझा लोकस्वामी, जीतू सोनी और अमित सोनी के संबंध में अपनी बात रखी। श्री जायसवाल ने बताया कि आज अभय प्रशाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त होने के बाद जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेन्दोला, तुलसी सिलवाट के साथ जा रहे थे तभी उन्होंने संझा लोकस्वामी के संबंध में मुख्यमंत्री से सवाल किया कि हनी ट्रैप मामले की सच्चाई छापने पर संझा लोकस्वामी कार्यालय को जमींदोज किया तथा लोकस्वामी के मालिक व वरिष्ठ पत्रकार जीतू सोनी और उनके पुत्र अमित सोनी सहित पूरे परिवार पर झूठे प्रकरण दर्ज किए गए।   यह सारी कार्रवाई कमलनाथ सरकार के शासनकाल में की गई है आप इस संबंध में उचित कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री ने अंकुर जायसवाल से कहा कि इस संबंध में वे उचित कार्रवाई करेंगे हो सका तो पूरे मामले की जांच करवाएंगे।

Dakhal News

Dakhal News 9 June 2020


bhopal, Three news reports, Playboy game, Media Group, owner dies

कोरोना काल में देश ही नहीं बल्कि विदेश के मीडिया हाउस भी ध्वस्त हो रहे हैं. अमेरिकी मैगजीन ‘प्लेब्वॉय’ के खेल खत्म होने की खबर आ रही है. इस चर्चित मैग्जीन का प्रिंट एडिशन बंद कर दिया गया है. करीब 25 संपादकीयकर्मियों को हटा दिया है. इस मैग्जीन का प्रकाशन 66 साल बाद बीते मार्च महीने में बंद किया गया. यहां कार्यरत कर्मियों की छंटनी अब की गई है. जिन लोगों को हटाया गया है वे डिजिटल आपरेशन से जुड़े थे. एक दुखद खबर मातृभूमि ग्रुप से आ रही है. इस ग्रुप के प्रबंध निदेशक वीरेंद्र कुमार की मौत हो गई है. वीरेंद्र कुमार पीटीआई के निदेशक मंडल में भी शामिल थे. मलयालम लेखक-पत्रकार वीरेंद्र कुमार केरल से राज्यसभा सदस्य थे. 84 साल के वीरेंद्र का निधन कोझिकोड में हुआ. वे मलयालम दैनिक समाचार पत्र मातृभूमि समूह के प्रबंध निदेशक थे. उनका अंतिम संस्कार वायनाड में किया गया. बताया जाता है कि हार्ट अटैक के कारण उनकी मौत हुई.   इस बीच खबर है कि खेल पत्रकार अयाज मेमन ने 1 प्ले स्पोर्ट्स के साथ नई पारी की शुरुआत की है. वे भारत के लिए कंसल्टिंग एडिटर-इन-चीफ बनाए गए हैं.

Dakhal News

Dakhal News 1 June 2020


bhopal, Punjab Kesari journalist KK Sharma dies

पंजाब केसरी के वरिष्ठ पत्रकार केके शर्मा के निधन की सूचना है। केके शर्मा को गम्भीर हालत में संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। केके शर्मा के पुत्र अश्विनी शर्मा भी पत्रकार हैं जो हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत हैं। पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव अपने संस्मरण में फेसबुक पर लिखते हैं- दिल्ली में पंजाब केसरी अखबार में एक के के शर्मा जी हुआ करते थे. यूं तो वह मेरे एक अभिन्न मित्र के बहुत जिगरी थे मगर जब से मैं उनसे मिला, उनके बेहद मिलनसार स्वभाव के चलते वे मेरे भी बेहद अच्छे मित्र हो गए थे. जिंदगी को ठहाके मार कर जीने वाले जिंदादिल और मस्तमौला इंसान शर्मा जी काफी तेज तर्रार पत्रकार भी थे.   एक आवाज पर दोस्तों की मदद के लिए आ जाने वाले और अपनी जान पर खेल जाने वाले शर्मा जी दिल्ली में मेरे रहने तक मेरे करीबी और प्रिय लोगों में से एक थे. पूरी-पूरी रात तक दोस्तों के साथ दारूबाजी की महफिलों का दौर जमाने और अपने उग्र स्वभाव के कारण मुसीबत में फंस जाने पर दिल्ली में भी मुझे न जाने कितनी बार अपने दोस्तों का सहारा लेना पड़ता था …ऐसे मौकों में से कुछ में शर्मा जी भी खुद मेरे लिए आधी-आधी रात को उठकर अपने घर या दफ्तर से कई- कई किलोमीटर दूर बस एक फोन करने पर भागे चले आए थे … और फिर चाहे पूरी रात जगकर उन्हें मेरे लिए दिल्ली पुलिस या सरकार के बड़े से बड़े नेता- अधिकारी को फोन करके जगाना पड़ा हो … या मीडिया में अपने दोस्तों को मेरे लिए आधी रात के बाद भी किसी समय बुलाना पड़ा हो, वह सब उन्होंने मेरे एक फोन पर करके दिखाया है. दिल्ली में मेरे कई ऐसे मित्र थे, जो इसी तरह मेरी दोस्ती पर जान लुटाते थे. उनमें से शर्मा जी का स्थान निसंदेह बेहद अहम था. दिल्ली क्या छूटा, माथे पर हर समय तिलक लगाकर चलने वाले मृदुभाषी और मेरे अजीज मित्र शर्मा जी से भी मेरा वास्ता लखनऊ में आकर कम होते- होते फिर खत्म ही हो गया. आज बरसों बाद एक खबर पढ़ी कि बीमारी से शर्मा जी का निधन हो गया तो दिल दुखी हो गया और उनसे दोस्ती के पल व मुझ पर किए उनके एहसान याद आ गए. ईश्वर शर्मा जी की आत्मा को शांति दे. मेरी तरफ से शर्मा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि एवम् आखिरी नमन.

Dakhal News

Dakhal News 31 May 2020


bhopal,Admission started, Makhanlal Chaturvedi University,Media and IT courses

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय द्विवेदी ने सभी विभागाध्यक्षों एवं प्राध्यापकों के साथ बुधवार को ऑनलाइन बैठक की, जिसमें पूर्व में संचालित सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद पाठ्यक्रमों एवं प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है। मीडिया और आईटी के क्षेत्र में करियर बनाने की चाह रखने वाले विद्यार्थी विश्वविद्यालय के भोपाल, रीवा एवं खंडवा परिसर में प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। एमपी ऑनलाइन की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। आवेदन की अंतिम तिथि 31 जुलाई है। बैठक में कुलपति प्रो. द्विवेदी ने कहा कि लॉकडाउन के कारण विद्यार्थी पाठ्यक्रमों की जानकारी के लिए परिसर में नहीं आ सकते, इसलिए विद्यार्थियों को अधिक से अधिक जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रवेश की सूचना के लिए भी सबको मिलकर प्रयास करने चाहिए ताकि प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँच सके। उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय में मीडिया, कम्प्यूटर, आईटी और प्रबंधन के रोजगारोन्मुखी स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम संचालित होते हैं। मीडिया के प्रमुख स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम हैं : एमए (पत्रकारिता), एमए (डिजिटल जर्नलिज्म), एमए-एपीआर (विज्ञापन एवं जनसंपर्क), एमए-बीजे (ब्राडकास्ट पत्रकारिता), एमए-एमसी (जनसंचार), एमएससी-ईएम (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया), एमएससी-एमआर (मीडिया शोध), एमएससी-एफपी (फिल्म प्रोडक्शन), एमएससी-एनएम (नवीन मीडिया)। विश्वविद्यालय में मीडिया प्रबंधन का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एमबीए (मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट) है। एमफिल (मीडिया अध्ययन) में भी प्रवेश के लिए आवेदन आमंत्रित हैं। पत्रकारिता में स्नातक पाठ्यक्रम हैं : बीए-एमसी (जनसंचार), बीएससी-ईएम (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया), बीएससी-एमएम (मल्टी मीडिया), बीबीए-ई-कॉमर्स, बीए-जर्नलिज्म एंड क्रिएटिव राइटिंग, बीटेक-प्रिंटिंग एंड पैकेजिंग। इस वर्ष बैचलर ऑफ लाइब्रेरी एंड इंफोर्मेशन साइंसेज में भी प्रवेश हेतु आवेदन आमंत्रित हैं। कम्प्यूटर एवं आईटी के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय की पहचान मीडिया पाठ्यक्रमों के साथ ही कंप्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में भी है। विश्वविद्यालय की ओर से बीसीए, एमसीए के साथ-साथ एमएससी-इंफोर्मेशन एंड सायबर सिक्युरिटी जैसे नवीनतम विद्या के पाठ्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं। कोरोना संक्रमण एवं लॉकलाउन के समय में विद्यार्थियों के हित को ध्यान में रखकर विश्वविद्यालय द्वारा संचालित इन सभी पाठ्यक्रमों के लिए ऑनलाइन आवेदन मंगाया जा रहा है। किसी प्रकार की जानकारी के लिए दूरभाष नंबर- 0755-2553523 पर संपर्क किया जा सकता है।

Dakhal News

Dakhal News 29 May 2020


bhopal,BJP prepares ,panchayat elections ,amid epidemic in UP

अजय कुमार, लखनऊ कोरोना महामारी के चलते दुनिया भले ही ठहर गई, लेकिन केन्द्र और राज्यों की सरकारें लाकडाउन के चलते हुए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए फिर से हाथ-पैर मारने लगी हैं। एक तरफ योगी सरकार प्रदेश को पटरी पर लाने में लगी है तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में लगी है। इसी लिए लॉकडाउन-4 में ढिलाई मिलने के दूसरे ही दिन से भारतीय जनता पार्टी ने विधान परिषद और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया। प्रदेश भाजपा आलाकमान ने मंडल एवं जिला स्तर के अपने पदाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग व ब्रिजकॉल जैसे संचार सुविधाओं के जरिए पंचायत चुनाव के लिये टोलियां तैयार करने को कहा है। उत्तर प्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अक्टूबर में प्रस्तावित हैं। पंचायत चुनाव लडने के इच्छुक कार्यकर्ताओं से निरंतर सेवा कार्यों में जुटे रहने को कहा गया है तो दूसरी तरफ इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि पंचायत चुनाव के समय परिवारवाद से बचा रहा जाए। इसी लिए पंचायत चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वालों को खुद और अपने परिवार के लिए टिकट मांगने की मनाही कर दी गई है। पंचायत चुनाव प्रभारी महामंत्री विजय बहादुर पाठक का कहना है कि वैसे तो अभी पार्टी कोरोना संक्रमण से बने विकट हालात से निपटने में जुटी है। साथ ही राजनीतिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जा रही है। इस बार गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य लेकर भाजपा पूरी ताकत से पंचायत चुनाव में उतरेगी। कल्याणकारी योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में अनुकूल माहौल है। बूथ व सेक्टर स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता का लाभ भी मिलेगा। गौरतलब हो, कोरोना संक्रमण आरंभ होने से पहले ही पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र सिंह, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, कमल रानी व रमाशंकर पटेल को कोर कमेटी में शामिल करके क्षेत्रवार दायित्व भी दिए गए थे। इसी क्रम में मंडल व जिलों से ऐसे प्रमुख कार्यकर्ताओं के नाम मांगे गए थे, जो कि पंचायत चुनावों के जानकार हों। जिलाध्यक्षों के साथ तीन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की प्रशिक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित हो चुकी हैैं। सूत्रों का कहना है कि भाजपा जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत चुनाव पर विशेष फोकस करेगी। खैर, बात आगामी अक्तूबर में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव की करें तो अबकी पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण का गणित काफी बदला-बदला नजर आएगा। इस बार आरक्षण का फिर से निर्धारण किया जाएगा। इस नए निर्धारण से प्रदेश में पंचायतों के आरक्षण की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। वर्ष 2015 में हुए पिछले पंचायत चुनाव में जो पंचायत जिस वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी, इस बार वह उस वर्ग के लिए आरक्षित नहीं होगी। चक्रानुक्रम से पंचायत का आरक्षण परिवर्तित हो जाएगा। मान लीजिए कि अगर इस वक्त किसी ग्राम पंचायत का प्रधान अनुसूचित जाति वर्ग से है तो अब इस बार के चुनाव में उस ग्राम पंचायत का प्रधान पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकता है।चुनावों के लिए नए चक्रानुक्रम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, अनारक्षित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग महिला, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति महिला के वर्गों में नए सिरे से आरक्षण तय किया जाएगा। प्रदेश का पंचायती राज विभाग आरक्षण में बदलाव की यह कवायद जुलाई-अगस्त में पूरी करेगा क्योंकि नए आरक्षण का निर्धारण चुनाव से तीन महीने पहले किया जाता है। अनुमान है कि पिछले 5 वर्षों में करीब 250 से 300 ग्राम पंचायतें शहरी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक रूप से शामिल की गई हैं। इस हिसाब से इतनी पंचायतें कम हो जाएंगी। इनका ब्योरा राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर विकास विभाग से मांगा है। राज्य निर्वाचन आयोग भी नगर विकास विभाग की इस कवायद के पूरे होने का इंतजार कर रहा है। उसके बाद ही आयोग आगामी चुनाव के लिए ग्राम पंचायतों की वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का अभियान शुरू करेगा जिसमें बूथ लेबल आफिसर घर-घर जाकर पंचायतों के वोटरों की जानकारी संकलित करेंगे।   इस बार पंचायत चुनाव को पूर्वी गंभीरता से लड़ने को तैयार बीेजेपी ने पंचायत चुनाव अभियान में पूर्व मंत्रियों, पूर्व विधायकों व सांसदों को भी जोड़ने का मन बना लिया है। पार्टी पंचायत चुनाव को आगामी विधानसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास मानकर मैदान में उतरेगी। उधर, शिक्षक व स्नातक क्षेत्र की 11 सीटों पर होने वाले विधान परिषद चुनाव में घोषित प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं व कार्यकर्ताओं से ऑनलाइन संपर्क व संवाद जारी है।   अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 25 May 2020


bhopal, Kejriwal government, Delhi, removed advertisement,laborers

दिल्ली की महान केजरीवाल सरकार कभी कभी महानता की चरमसीमा भी लांघ जाती है. इस सरकार ने दिल्ली में फंसे मजदूरों के श्रमिक एक्सप्रेस से जाने के बारे में जरूरी जानकारी देने के लिए विज्ञापन निकाला पर ये विज्ञापन हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में न होकर अंग्रेजी में है. अरविंद केजरीवाल के पास शायद डाटा हो कि कितने मजदूर अंग्रेजी पढ़ते हैं. पर ये सच है कि बहुत सारे लोग ये देखकर हंस रहे हैं कि मजदूरों के लिए विज्ञापन, अंग्रजी में, अंग्रजी समाचारपत्र में.   अब दिल्ली के मजदूर ये विज्ञापन नहीं पढ़ रहे हैं तो इसमें भला दिल्ली सरकार का क्या दोष हो सकता है…

Dakhal News

Dakhal News 25 May 2020


bhopal, Post-Karona media

जयराम शुक्ल करोना के लाकडाउन ने जिंदगी को नया अनुभव दिया है, अच्छा भी बुरा भी। जो जहां जिस वृत्ति या कार्यक्षेत्र में है उसे कई सबक मिल रहे और काफी कुछ सीखने को भी। मेरा मानना है ये जो सबक और सीख है यही उत्तर करोना काल की धुरी बनेगी। करोना भविष्य में कालगणना का एक मानक पैमाना बनने वाला है। हमारे पंचाग की कालगणना सृष्टि के आरंभ से प्रारंभ हुई जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के युगाब्ध, सहस्त्राब्ध हैं। सभी धर्मों/पंथों ने अपने हिसाब से कलैंडर बनाए। हमारे धर्म में शक और विक्रमी संवत शुरू होता है। क्रिस्चियन्स अपनी कालगणना क्राइस्ट के जन्म से शुरू करते हैं, जिसे हम बी,सी, ए,सी यानी कि ईसा पूर्व, ईसा बाद के वर्षों के साथ गिनते हैं। मुसलमानों का कैलेंडर हिजरी है, यानी कि हजरत मोहम्मद के पहले और बाद के वर्ष। अन्य धर्मों और पंथों के अपने-अपने कैलेन्डर होंगे। लेकिन अब एक नया वैश्विक कैलेन्डर प्रारंभ होगा, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय से ऊपर उठकर। करोना का पूर्व व उत्तर काल। इसे हम ईसाई कैलेंडर के तर्ज पर बिफोर करोना यानी बी.सी और आफ्टर करोना यानी ए.सी कहेंगे। करोना ने मानवता को जाति,धर्म,संप्रदाय, नस्ल,रंग,ढंग भूगोल इतिहास के कुँओं से निकालकर समतल में ला खड़ा कर दिया। उसने कांगो-सूडान को भी अमेरिका-इंग्लैंड की बराबरी में ला दिया। करोना ने वसुधैव को कुटुम्बकम में बदल दिया। इसके त्रास से सर्वे भवंतु सुखिनः,सर्वे संतु निरामयः के समवेत स्वर उठने लगे हैं। इस परिस्थिति को आंकने और देखने का एक नजरिया यह भी है..। करोना ने सोचने, विचारने और महसूस करने के लिए इफरात वक्त दिया है। वक्त थमता नहीं अपने निकलने का रास्ता ढूँढ़ लेता है। अपन मीडियावी दुनिया के आदमी हैं इसलिए पहले इसकी बात करते हैं। इस करोना काल में लिखना, पढ़ना और रचना वैसे ही है जैसे अभावों के बीच तिलक जैसों ने मंडाले जेल लिखा रचा। पहली बार लगा कि छुट्टी भी एक सजा होती है। आराम और अवकाश अब चिढ़ाने वाले हैं। मीडिया का रूपरंग.. ढंग सब बदल गया। वर्क फ्राम होम का पहला विचार यहीं से शुरू होता है। इन दिनों घर बैठे जूम एप के जरिए बेवीनार संगोष्ठी में हिस्सा ले रहे हैं। तोक्षकभी कभारचैनल वाला स्काइप के जरिए जोड़कर लाइव कमेंट ले लेता है। बिस्तर में लेटे-बैठे यह सब मन बहलाऊ अंदाज में हो रहा है। इसे आप मीडिया के काम का करोनाई अंदाज भी कह सकते हैं। 24×7 वाले मीडिया को हर क्षण की खबर चाहिए। आँधी-तूफान, बाढ़-बूड़ा, महामारी, प्रलय कुछ भी हो पर इनके बीच से ही खबरें निकालनी पड़ेगी। मेरा अनुमान है कि कल्पित प्रलय के समय भी आखिरी व्यक्ति मीडियावाला ही रहेगा जो उफनाते समंदर की कश्ती पर बैठकर अपने चैनल के लिए लाइव दे रहा होगा। इसके बावजूद विरोधाभास भरी त्रासदी यह कि जो मीड़िया चौबीसों घंटे दुनिया भर की खबरे उगल रहा है उस मीडिया में मीडिया और मीडियावालों की खबरें कहीं नहीं आतीं। सड़क, मैदान, अस्पतालों और क्वारंटाइन होम्स से जो खबरें निकाल कर आपतक पहुँचा रहे हैं क्या वे करोना संक्रमण से बचे होंगे.? जी नहीं कुल करोना संक्रमितों में से कुछ हजार लोग मीडिया के भी हैं। लेकिन इन अभागों की खबरें हम तक नहीं पहुँचतीं। जो अखबार यह दावा करते हैं कि हम खबरें बाँटते हैं करोना नहीं, क्या उनसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने किसी कर्मचारी करोना संक्रमण की खबरें दे या दिखाएं ? इसलिए उन अभागों को भी उसी श्रेणी में मानकर चलिए जिस श्रेणी में जान हथेली में लिए सड़कों पर मंजिल नापने वाले श्रमिक। सही बात यह कि कई चैनलों और अखबारों के मीडियाकर्मी संक्रमण की जद में हैं..मीडिया समूह के प्रबंधन ने उनसे दूरी बना ली है..साफ साफ कहें तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। मीडिया में नौकरी से वो लोग भी निकाले जा रहे हैं जो संक्रमित नहीं हुए। 22 मार्च के बाद से अबतक पूरे देशभर के मीडिया समूहों ने लगभग 20 से 25 प्रतिशत कर्मचारियों की छँटनी कर दी। ऊँची तनख्वाह वाले पत्रकारों की सैलरी में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा चुकी है। संपादक श्रेणी के ऐसे पत्रकारों की बड़ी संख्या है जिन्हें कहीं दूसरी नौकरी ढूँढने के लिए कह दिया गया है। कुलमिलाकर मीड़ियाजगत में वैसे ही हाहाकार है जैसे कि सड़क पर मजदूरों का, फर्क इतना है कि मजदूरों की व्यथा सामने आती है और मीडियावालों की व्यथा उनका मीडिया प्रतिष्ठान ही हजम कर जाता है। भूखे सड़क पर वो मजदूर भी हैं और भूखे अपने घरों में ये विपत्ति के मारे मीडियाकर्मी भी। भोपाल के एक मित्र ने सूचना दी कि यहां दो दर्जन से ज्यादा ऐसे पत्रकार हैं जिनकी नौकरी इस करोना काल में चली गई। इनमें से कई प्रतिभाशाली उदयीमान पत्रकार हैं वे चाहते तो दूसरी नौकरी भी कर सकते थे लेकिन जुनून के चलते पत्रकारिता को अपना करियर बनाया। इनमें से प्रायः के पास माकान का किराया देने की कूबत नहीं बची। कई के घर का चूल्हा एनजीओ या सरकार द्वारा बाँटे गए राशन से जलता है। कुछ दिन बाद चूल्हे का ईंधन भी खतम हो जाएगा। भोपाल, इंदौर जैसे प्रादेशिक महानगरों में दूसरे प्रांत से आकर काम करने वाले मीडयाकर्मियों की बड़ी संख्या है। जो दस साल पहले आए थे उनकी गिरस्ती तो कैसे भी जमी है पर जो इस बीच आए उनका तो भगवान ही मालिक..। संस्थानों ने किनाराकशी की और सरकार को ये कभी सुहाए नहीं सो उनपर कृपा का प्रश्न ही नहीं उठता। भोपाल-इंदौर जैसी ही व्यथा देशभर के उन शहरों की है जहां मीडिया उद्योग फला-फूला और उनके मालिकों ने उसकी कमाई की बदौलत माल-सेज, उद्योग और कालोनियाँ खड़ी कीं। देशभर सिर्फ़ एक मीडिया बेवसाइट है..भड़ास फार मीडिया.. जो देशभर के पत्रकारों के दुखदर्द की कथा सुनाती रहती है। इन दिनों पत्रकारों की विपदा से जुड़े एक से एक दुखद किस्से सुनने को मिलते हैं, आप भी उसके लिंक को खोलकर पढ़ें कभी। हिंदी की पत्रकारिता तो आरंभ से ही दुख-दिरिद्रता से भरी रही है। हिंदी के जो स्वतंत्र पत्रकार हैं, स्तंभ व आलेख लिखते हैं वह स्वातःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा नहीं.. अपितु खुद के जिंदा रहने के सबूत के लिए लिखते हैं.. हिंदी पत्रकारिता का विचार पक्ष ‘थैंक्यू सर्विस’ में चलता है। इस श्रेणी में प्रायः भूतपूर्व संपादक प्रजाति के लोग होते हैं जिनका खाना खर्चा बीबी-बच्चे उठाते हैं, सो इनका तो कैसे भी चल जाता है। चिंता का विषय हिंदी पत्रकारिता की नई पौध को लेकर है..जिसके ख्वाबों-खयालों की दुनिया को इस करोना ने पलक झपकते ही बदलकर धर दिया। उत्तर करोना काल की मीड़िया का अक्श स्पष्ट होने लगा है। प्रिंट मीड़िया का दायरा जिस गति से सिकुड़ रहा है..हालात ठीक होने के बाद भी वह अपने पुराने रूप में आएगा मुश्किल ही लगता है। इन दो महीनों ने पाठकीय आदत बदल दी है। अब बिना अखबार की सुबह असहज नहीं लगती। प्रिंट कापियाँ सिर्फ बड़े अखबारों की ही निकल रही हैं। मध्यम दर्जे के अखबार फाइल काँपियों तक सिमट गए। पुल आउट पत्रिकाएं और विशेषांक शीघ्र ही इतिहास में दर्ज हो जाएंगे। पृष्ठ संख्या आधे से भी कम हो गई। इनका भी पूरा फोकस अब डिजिटल अखबार निकालने पर है। कागज, स्याही और मैनपावर की कमी ने पहले ही लघु अखबारों को डिजिटल में बदल रखा था। जिनका सर्कुलेशन वाट्सएप ग्रुप्स और एफबी प्लेटफार्म तक सीमित हो गया। अखबारों के समक्ष विग्यापन का घोर संकट है। विग्यापन की शेयरिंग दिनोंदिन घट रही है। डिजिटल मीडिया का दायरा सात समंदरों से भी व्यापक है। विग्यापन की हिस्सेदारी का लायनशेयर अब इनके पास है। विदेश का डिजिटल मीडिया भी देसीरूप धरके प्रवेश कर चुका है। वह तकनीकी तौरपर ज्यादा दक्ष और पेशेवर है। डिजिटल मीडिया में जाने वाले मेनस्ट्रीम के अखबारों के समक्ष यह बड़ी चुनौती होगी। खबरे शीघ्रगामी तो हुई हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता नहीं रही। आने वाले समय में पाठक का सबसे ज्यादा पराक्रम इसी पर खर्च होगा कि वह जो पढ़ रहा है वह सत्य है कि नहीं। सत्य की परख करने वाले तंत्र का मीडिया में वर्चस्व बढ़ेगा।   कुल मिलाकर जब हम करोना संकट से निवृत्त होंगे तब तक जो पत्रकार हैं उनमें पचास फीसद वृत्ति से पत्रकार नहीं रह जाएंगे। मध्यम और लघु अखबार अपने पन्ने डिजिटली छापेंगे और वाट्सएप में पढ़ाएंगे। बड़े समूह के कुछ अखबार बचेंगे लेकिन उनकी वो धाक नहीं रहेगी..जिसकी बदौलत अबतक सत्ता के साथ अपना रसूख दिखाते आए हैं। करोना समदर्शी है..वह राजा और रंक में भेद नहीं करता। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 22 May 2020


bhopal,Sharad Joshi, remembers,satirical demise , reputation for corruption

जन्मदिन पर शरद जोशी जी को स्मरण करते हुए! शरद जोशी ने कोई पैतीस साल पहले हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे व्यंग्य निबंध रचा था। तब यह व्यंग्य था, लोगों को गुदगुदाने वाला। भ्रष्टाचारियों के सीने में नश्तर की तरह चुभने वाला। अब यह व्यंग्य, व्यंग्य नहीं रहा। यथार्थ के दस्तावेज में बदल चुका है। भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही व्यंग्य की मौत हो गई। समाज की विद्रूपताओं की चीर-फाड़ करने के लिए व्यंग्य का जन्म हुआ था। परसाईजी ने व्यंग्य को शूद्रों की जाति में रखते हुए लिखा था व्यंग्य चरित्र से स्वीपर है। वह समाज में फैली सड़ांध में फिनाइल डालकर उसके कीटाणुओं को नाश करने का काम करता है। जोशी-परसाई युग में सदाचार, लोकलाज व सामाजिक मर्यादा के मुकाबले विषमताओं, विद्रूपताओं और भ्रष्टाचार का आकार बेहद छोटा था। व्यंग्य उन पर प्रहार करता था। लोग सोचने-विचारने के लिए विवश होते थे। भ्रष्टाचार का स्वरुप इतना व्यापक नहीं था। व्यंग्य कब विद्रूपता के मुंह में समा गया पता ही नहीं चला। वेद पुराणों में भगवान का यह कहते हुए उल्लेख है कि हम भक्तन के भक्त हमारे। जोशी जी ने भ्रष्टाचार के लिए यही भाव लिया था। आज के दौर के बारे में सोचते हुए लगता है कि हमारे अग्रज साहित्यकार कितने बड़े भविष्यवक्ता थे। भ्रष्टाचार, सचमुच भगवान की तरह सर्वव्यापी है, कण-कण में, क्षण-क्षण में। कभी एक व्यंगकार ने लिखा था कि भगवान की परिभाषा और उनकी महिमा जो कि वेद-पुराणों में वर्णित है सब हूबहू भ्रष्टाचार के साथ भी लागू होती है।… बिन पग चलै,सुनै बिन काना कर बिनु कर्म करै विधि नाना। बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी़..़़ आदि-आदि। मंदिर में, धर्माचार्यों के बीच भगवान की पूजा हो न हो, भ्रष्टाचारजी पूरे विधि-विधान से पूजे जाते हैं। आसाराम,नित्यानंद, निर्मलबाबा से लेकर धर्माचार्यों की लंबी कतार है जिन्होंने मंत्रोच्चार और पूरे कर्मकांड के साथ भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा की है और हम वहां शीश नवाने पहुंचते हैं। भगवान को माता लक्ष्मी प्रिय है तो भ्रष्टाचारजी को भी लक्ष्मीमैया अतिप्रिय। रूप बदलने, नए-नए नवाचार और अवतार में भी भ्रष्टाचार का कोई सानी नहीं। आज के दौर में परसाई जी-शरद जोशी जी होते तो भ्रष्टाचार को लेकर और क्या नया लिखते! उनके जमाने में एक-दो भोलाराम यदाकदा मिलते जिनके जीव पेंशन की फाइलों में फड़फड़ाते। आज हर रिटायर्ड आदमी भोलाराम है, फर्क इतना कि वह परिस्थितियों से समझौता करते हुए परसेंट देने पर राजी है। परसेंट की यह कड़ी नीचे से ऊपर तक उसी तरह जाती है जैसे राजीव गांधी का सौ रुपया नीचे तक दस पैसा बनकर पहुंचता है। पिछले कुछ दिनों से भ्रष्टाचार पर भारी बहस चल रही है। भ्रष्टाचारी भी भ्रष्टाचार पर गंभीर बहस छेड़े हुए हैं। चैनलों ने इसे प्रहसन का विषय बना दिया। टीवी चैनलों में कभी-कभी बहस इतनी तल्ख हो जाती है कि मोहल्लों में औरतों के बीच होने वाले झगड़ों का दृश्य उपस्थित हो जाता है। एक कहती है..तू रांड तो दूसरी जवाब देती है तू रंडी़.. एक ने कहा तुम्हारी पार्टी भ्रष्ट तो दूसरा तड़ से जवाब देता है, तुम्हारी तो महाभ्रष्ट है। टीवी शो में एक पार्टी के प्रतिभागी ने कहा, फलांजी से बस इतनी गलती हो गई कि उन्होंने आपकी वाली पार्टी में जाकर प्रशिक्षण नहीं लिया था। वे लाखों करोडों गटक लेते हैं और पता भी नहीं चलता। भ्रष्टाचार अब बुद्घिविलास का विषय बन चुका है। चमड़ी इतनी मोटी हो गई कि व्यंग्य की कौन कहे गालियां तक जज्ब हो जाती हैं। एक नया फार्मूला है खुद को ईमानदार दिखाना है तो दूसरों को जोर-जोर से बेईमान कहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी कर्मकांडी हो गई है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ईमानदारी की अलख जगाने वाले नए पंडों के रूप में अवतरित हुए हैं। संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरू की मुक्ति के लिए अभियान चलाने वाले और उद्योगपतियों के खिलाफ याचिका में फोकट का इन्टरविनर बनने वाले पिता-पुत्र की जोड़ी शांति भूषण और प्रशान्त भूषण टीम नैतिकता की आचार संहिता तय करती है। मंचीय कवियों का गिरोह चलाने वाले मसखरे कविकुलश्रेष्ठ इमानदारी की रुबाइयाँ लिखते हैं।योग सिखाने के लिए निर्मल बाबा की तर्ज पर करोड़ों की फीस वसूलने वाले बाबा रामदेव राष्ट्रवाद व नैतिकता का पाठ सिखाते हैं। रंगमंच पर यही सब नाटक चल रहा है। सड़े से मुद्दों पर कैण्डल मार्च निकालने वाले भ्रष्टाचार से लड़ने चंदे के पैसे से दिल्ली तो कूंच कर सकते हैं पर अपने गांव के उस सरपंच के खिलाफ बोलने से मुंह फेर लेते हैं जो गरीबों का राशन और मनरेगा की मजदूरी में हेरफेर कर दो साल के भीतर ही बुलेरो और पजेरो जैसी गाड़ियों की सवारी करने लगता है। इसके खिलाफ हम इसलिए कुछ नहीं बोल पाते क्योंकि यह हमारा अपना बेटा, भाई, भतीजा और नात-रिश्तेदार हो सकता है। जब शहर के भ्रष्टाचार की बात करनी होती है तो ये दिल्ली के भ्रष्टाचार पर बहस करते हैं, अपने गांव व शहर की बात करने से लजाते हैं, भ्रष्टाचारी कौन है? यह चिमनी लेकर खोजने का विषय नहीं है। समाज में भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले लोग कौन हैं? यह अलग से बताने की बात नहीं है, हम सबने मिलकर भ्रष्टाचार को अपने आचरण में जगह दी है। जिस दिन कोई पिता अपने बेटे को इसलिए तिरष्कृत कर देगा कि उसके भ्रष्टाचार की कमाई से बनी रोटी का एक टुकड़ा भी स्वीकार नहीं करेगा, कोई बेटा बाप की काली कमाई के साथ बाप को भी त्यागने का साहस दिखाएगा, परिवार और समाज में भ्रष्टाचार करने वालों का सार्वजनिक बहिष्कार होने लगेगा, उस दिन से ही भ्रष्टाचार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। क्योंकि भ्रष्टाचार कानून से ज्यादा आचरण का विषय है। कत्ल करने वाले को फांसी दिए जाने का प्रावधान है लेकिन कत्ल का सिलसिला नहीं रुका है। कत्ल भी हो रहे हैं और फांसी भी। भ्रष्टाचारियों को कानून की सजा देने मात्र से भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं। क्या कोई अपने घर से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़नें की शुरुआत करने को तैयार हैं?   लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 22 May 2020


bhopal,Sanjay Dwivedi ,appointed , Chancellor in charge, Makhanlal Chaturvedi University

भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है। प्रो. द्विवेदी 10 वर्ष से अधिक समय से विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। वहीं, विश्वविद्यालय में प्रभारी कुलसचिव की जिम्मेदारी मडिया प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अविनाश वाजपेयी को सौंपी गई है। इससे पूर्व वे विश्वविद्यालय में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रहे थे।गौरतलब है कि प्रो. संजय द्विवेदी लंबे समय तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। उन्हें प्रिंट, बेव और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य करने का अनुभव है। उन्होंने कई अखबारों, टीवी चैनलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। मुंबई, रायपुर, बिलासपुर और भोपाल में लगभग 14 साल सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद प्रो. द्विवेदी शिक्षा के क्षेत्र में आए और फरवरी-2009 में वे माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े। विश्वविद्यालय में उन्होंने विभागाध्यक्ष एवं कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों कार्य किया। वे विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर लेखन करते हैं। उन्होंने अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियों एवं मीडिया से संबंधित संगठनों में सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।

Dakhal News

Dakhal News 21 May 2020


Indore ,gets five star rating , Kacharam-free cities, Bhopal also slipped

भोपाल। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने नई दिल्ली में मंगलवार को स्वच्छता सर्वेक्षण के अंतर्गत कचरामुक्त शहरों की स्टार रेटिंग के परिणाम घोषित किए। इसमें लगातार तीन बार देश के सबसे स्वच्छ शहर रहे मध्यप्रदेश के इंदौर को पांच स्टार रेटिंग मिली है, जबकि पिछले साल कचरामुक्त शहरों में इंदौर को सेवन स्टार रेटिंग दी गई थी। वहीं, प्रदेश की राजधानी भोपाल को थ्री स्टार रेटिंग दी गई है।केन्द्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा घोषित किये गये स्टार रेटिंग के परिणामों में इंदौर को हालांकि पिछले साल की तरह सेवन स्टार रेटिंग तो नहीं मिली है, जिसका स्थानीय प्रशासन और नागरिकों द्वारा दावा किया गया था, लेकिन मध्यप्रदेश का यह शहर देश के कचरा मुख्त उन छह शहरों के साथ शीर्ष पर बना हुआ है, जिन्हें पांच स्टार रेटिंग मिली है। इनमें छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर, गुजरात के राजकोट और सूरत, कर्नाटक का मैसूर और महाराष्ट्र का नवी मुंबई शामिल है। इंदौर के अलावा मध्यप्रदेश के 10 शहरों को थ्री स्टार रेटिंग मिली है। इनमें भोपाल भी शामिल है, जो कि एक बार देश का दूसरा सबसे स्वच्छ शहर रह चुका है। भोपाल के अलावा बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, कांटाफोड़, कटनी, खरगोन, ओंकारेश्वर, पीथमपुर, सिगरौली और उज्जैन को भी थ्री स्टार रेटिंग मिली है। वहीं, प्रदेश के सात शहरों को एक स्टार रेटिंग दी गई है। इनमें ग्वालियर, सरदारपुर, हातोद, महेश्वर, खंडवा, शाहगंज और बदनावर है। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के 18 नगरों को कचरामुक्त शहरों में रेटिंग मिली है। इनमें इंदौर पांच स्टार रेटिंग मिलने वाला प्रदेश का एकमात्र शहर है। 

Dakhal News

Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Zee news, two dozen media workers, Corona positive!

बड़ी खबर जी न्यूज से आ रही है। यहां 4 लोगों के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद बाकी सभी का कोरोना टेस्ट कराया गया। सूचना है कि कुल 52 लोगों का टेस्ट कराया गया जिनमें से 28 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इस रिपोर्ट के आते ही पूरे जी ग्रुप में हड़कंप मच गया है। बताया जाता है कि सीईओ पुरुषोत्तम वैष्णव नए हालात पर मीटिंग ले रहे हैं। ये मीटिंग ज़ूम पर ऑनलाइन आयोजित है। बताया जा रहा है कि पूरे ऑफिस को सील कर सैनिटाइज किया जा रहा है। ज़ी न्यूज़ का संचालन इसी ग्रुप के एक अन्य चैनल wion की बिल्डिंग से होगा।   ज़ी न्यूज़ ऑफिस में नोएडा अथारिटी के लोग और डॉक्टर्स की टीमें घुस चुकी है। अब पूरे ग्रुप के मीडियाकर्मियों का टेस्ट किया जा रहा है।

Dakhal News

Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Life between corona

अमरीक देशव्यापी लॉकडाउन से पहले कर्फ्यू लगाने वाला पंजाब पहला राज्य था। सूबे ने इतना लंबा कर्फ्यू अतीत में कभी नहीं झेला। और न ऐसे नागवार हालात झेले जो अब दरपेश हैं। यक्ष प्रश्न है कि कर्फ्यू तो हट जाएगा लेकिन सामान्य जनजीवन आखिर पटरी पर कैसे आएगा? 55 दिन की कर्फ्यू अवधि ने राज्य में जिंदगी से लेकर कारोबार तक, सब कुछ एकबारगी स्थगित कर दिया था। लुधियाना, अमृतसर, जालंधर महानगरों सहित अन्य कई शहरों की दिन-रात चलने वाली जिन फैक्ट्रियों अथवा औद्योगिक इकाइयों के गेट पर कभी ताले नहीं लगे थे, वहां एकाएक पूरी तरह सन्नाटा पसर गया। लाखों श्रमिक एक झटके में बेरोजगार हो गए और रोटी के लिए बेतहाशा बेजार। हर वर्ग की कमर टूट गई। लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए। कोरोना-काल के कर्फ्यू ने पंजाबियों को बेशुमार जख्म भी दिए हैं। लाखों लोग भूख से बेहाल हुए तो हजारों अवसादग्रस्त। जिन्हें कोरोना तो क्या, मामूली खांसी-बुखार ने भी नहीं जकड़ा-वे स्थायी तनाव के गंभीर रोगी हो गए। तिस पर डॉक्टरों की अमानवीय बेरुखी। सरकार के कड़े आदेशों और सख्ती के बावजूद प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी आमतौर पर बंद ही रहीं। ब्लड प्रेशर और शुगर तक चैक नहीं किए गए। डॉक्टर मरीज को छूने तक से साफ इंकार करते रहे। मेडिकल हॉल के दुकानदार बाकायदा डॉक्टरों की भूमिका में आ गए। चिकित्सा जगत की उपेक्षा का नागवार नतीजा था कि कर्फ्यू के इन 55 दिनों में 2000 से ज्यादा लोग हृदय रोग, कैंसर, लीवर, किडनी और मधुमेह की बीमारियों से चल बसे। राज्य के स्वास्थ्य विभाग भी मानता है कि इससे पहले कभी इतनी अवधि में बीमारियों से लोगों ने दम नहीं तोड़ा। ईएनटी, आंखों और दांतों की बीमारियों के इलाज करने वाले क्लीनिक और अस्पताल एक दिन के लिए भी नहीं खुले। मनोचिकित्सक तो मानो भूल ही गए कि समाज के एक बड़े तबके को इन दिनों उनकी कितनी जरूरत है। गोया अवाम की जिंदगी बेमूल्य हो गई। अमीर और गरीब एक कतार में आ गए। पंजाब में सवा सौ से ज्यादा मौतें कोरोना वायरस से हुईं हैं। संक्रमितों की संख्या हजारों में रही और वे एकांतवास में ठीक होकर घरों को लौट आए। लेकिन कोरोना मरीज होने के ठप्पा उन्हें निरंतर यातना दे रहा है। पंजाब के हर इलाके से उनके सामाजिक बहिष्कार की खबरें हैं। सामाजिक दूरी का संकल्प कोरोना वायरस से ठीक हुए मरीजों के लिए सामाजिक नफरत में तब्दील हो गया है। जालंधर और आसपास के इलाकों में इस पत्रकार ने कोरोना से ठीक होकर सही-सलामत लौटे कुछ मरीजों से मुलाकात में पाया कि वे मृत्यु के डर से तो निकल आए हैं लेकिन रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों की घोर उपेक्षा उन्हें मनोरोगी बना रही है। दिनेश कुमार (बदला हुआ नाम) लगभग एक महीना एकांतवास में रहे। इलाज चला। अस्पताल में तो किसी ने क्या मिलने आना था, घर लौटे तो अपनों ने भी किनारा कर लिया। पत्नी और बच्चों के सिवा कोई बात नहीं करता। जबकि घर में माता पिता और दो भाई तथा उनके परिवार हैं। वह फफकते हुए कहते हैं, “कोरोना से ठीक हो कर घर लौटा तो उम्मीद थी कि सब खुश होंगे और तगड़े उत्साह के साथ मुझे गले लगाएंगे। लेकिन कोई मत्थे लगने तक को तैयार नहीं हुआ। जैसे ही मैं लौटा, मेरा भाई अपनी बीवी और बच्चों के साथ ससुराल चला गया। यह कहकर कि या तो यह यहां रहेगा या हम।” नवांशहर शहर के नसीब सिंह भी कोरोना को पछाड़कर सेहतमंद होकर अपनी लंबी-चौड़ी कोठी में लौटे तो बेटों ने उनका सामान पिछवाड़े के सर्वेंट क्वार्टर में रखा हुआ था और उनसे कहा गया कि अब वे वहीं रहेंगे। पिछले साल उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। सारी जायदाद वह अपने दो बेटों के नाम कर चुके हैं। यह पत्रकार जब सर्वेंट क्वार्टर में कोठी के मालिक रहे नसीब सिंह से बात कर रहा था तो बारिश आ रही थी और सर्वेंट क्वार्टर की छत से पानी चू रहा था। फर्श पर गंदगी का ढेर था और नसीब सिंह का लिबास बेहद मैला था। उन्होंने बताया कि जो नौकर आज से एक महीना पहले उनके आगे पीछे सेवा-टहल के लिए भागते-दौड़ते रहते थे, अब उनका निवास बना दिए गए सर्वेंट क्वार्टर में झांकने तक को तैयार नहीं और न कपड़े धोने को। खाने की थाली भी बाहर रख दी जाती है। एक पानी की सुराही भर दी जाती है। रूआंसे होकर नसीब सिंह कहते हैं, “मुझे कोरोना हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर। अब डॉक्टरों ने मुझे पूरी तरह फिट घोषित कर दिया है। बकायदा इसका सर्टिफिकेट भी दिया है। लेकिन बच्चे मुझे अभी रोगी मानते हैं। मुझसे कौड़ियों जैसा सुलूक किया जा रहा है। मैं करोड़ों का साहिबे-जायदाद रहा हूं और इस बीमारी ने मुझे एकदम कंगाल बना दिया। बेटों को पास बुलाकर मैं उनसे बात करना चाहता हूं कि अगर उनकी यही मर्जी है तो मुझे वृद्ध आश्रम में दाखिल करवा दें लेकिन कोई पास खड़ा होने तक को तैयार नहीं। मुझसे मेरा फोन भी ले लिया गया है।” दिनेश कुमार और नसीब सिंह जैसी बदतर हालत ठीक हुए बेशुमार कोरोना मरीजों की है। लुधियाना में कोरोना वायरस से मरे एसीपी के परिजनों का पड़ोसियों ने आपत्तिजनक बहिष्कार किया और उस प्रकरण में स्थानीय पुलिस को दखल देनी पड़ी। उनके भांजे को ‘कोरोना फैमिली’ कहा गया और उस गली में जाने से रोका गया, जहां उनका अपना घर है। चार ऐसे मामले चर्चा में आए कि संक्रमण से मरे लोगों के शव उनके परिजनों ने लेने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस-प्रशासन और सेहत महकमे को मृतकों के संस्कार और अंतिम रस में अदा करनी पड़ीं। किसी को श्मशान घाट के माली ने मुखाग्नि दी तो किसी को सफाईकर्मी ने। जबकि यह लोग भरे पूरे और संपन्न परिवार से थे। ‘कोरोना फैमिली’ पंजाब में इन दिनों प्रचलित नया गालीनुमा मुहावरा है और यह किन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बताने की जरूरत नहीं। इस कथन के पीछे छिपी दुर्भावना व नफरत बेहद पीड़ादायक है। बल्कि यातना है। जालंधर के ही नीरज कुमार को उनके करीबी दोस्तों ने उन्हें ‘कोरोना कुमार’ कहना शुरू किया तो वह गंभीर अवसाद रोगी बन गए। अब खुदकुशी की मानसिकता का शिकार हैं। वायरस से ठीक हुए एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि पड़ोसियों ने एकजुट होकर फैसला किया कि कभी हमारे घर नहीं आएंगे। वह कहते हैं, “लॉकडाउन और कर्फ्यू खुलते ही हम यह इलाका छोड़कर कहीं और घर खरीद लेंगे। दुकान का ठिकाना भी बदलना पड़ेगा।” लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच पंजाब में बड़े पैमाने पर श्रमिकों का सामूहिक पलायन हो रहा है। उनकी भीड़ और दशा देख कर लगता है कि 1947 का विभाजनकाल मई, 2020 में लौट आया है। जो श्रमिक घर वापसी के लिए प्रतीक्षारत हैं या फिलवक्त जा नहीं पा रहे उन्हें उनके मकान मालिक जबरन घरों-खोलियों से निकाल रहे हैं। उनसे मारपीट और छीना-झपटी रोजमर्रा का किस्सा है। यह हर शहर में हो रहा है। कहने को 55 दिन कर्फ्यू रहा लेकिन मजदूरों से अलग किस्म की हिंसा होती रही और हो रही है। जाने वाले प्रवासी श्रमिकों में से बहुतेरे ऐसे हैं जो मन और देह पर जख्म लेकर जा रहे हैं। लॉकडाउन और कर्फ्यू ने समाज का सारा ताना-बाना बदल दिया है। सामाजिक दूरियों ने दिलों की दूरियां भी बढ़ाईं हैं। इस बीच कई रिश्ते टूटे। बार-बार विवाह स्थगित होने से उपजे तनाव ने एक लड़की को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। कम से कम 10 आत्महत्याएं कोरोना वायरस की दहशत की देन हैं।   इस रिपोर्ताज के लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 19 May 2020


bhopal, The path to online education is not easy!

वैश्विक महामारी कोविड-19 ने दुनिया की रफ़्तार पर ब्रेक लगा दिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी कई सालों पीछे कर दिया है। विश्व के अधिकांश देशों में लॉक डाउन है या फिर कर्फ़्यू जैसे हालात है। केवल जरूरी सामान व सेवाएं ही सुचारू रूप से संचालित हो रही है। भारत में भी इस महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। देश पूरी तरह से लॉक डाउन के कारण ठप्प पड़ा है। मानों लगता है, अब मानवीय सभ्यता अपनी आख़िरी सांसें गिन रही हो। ऐसे में भले ही आज संकट की घड़ी मानव सभ्यता पर आन पड़ी हो, लेकिन मानवीय जीवटता इतनी बलवती है कि वह इस संकट से हार नहीं मानेगी यह तो निश्चित है। ऐसे में सवाल उठता है शिक्षण संस्थानों का क्या होगा? जो कहीं न कहीं आता तो है जरूरी सेवाओं में, लेकिन जब सोशल डिस्टनसिंग बनाकर रखना है। फ़िर शिक्षण संस्थानों पर ताला लगना स्वाभाविक है। इन सब के बीच हमारी व्यवस्था ने बच्चों का भविष्य और समय बर्बाद न हो इसके लिए ऑनलाइन क्लासेज आदि का इंतज़ामात करा दिया है। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था पर यूं तो हमेशा से ही सवाल उठते आ रहे है। वह शिक्षा ऑनलाइन होकर कैसे बेहतर विकल्प बन सकती बड़ा सवाल यह भी है। लॉकडाउन के वक्त शिक्षा में सकारात्मक बदलाव हुए है। आज देश ऑनलाइन शिक्षा की ओर आगे बढ़ रहा है । वैसे भी जब तक बहुत आवश्यक न हो हम बदलाव को स्वीकारते नही है । लेकिन इस महामारी ने, न केवल हमारी दिनचर्या में परिवर्तन किए बल्कि आज सामाजिक, सांस्कृतिक, रीति रिवाजों में भी बदलाव आ गए है । जिसकी तस्वीर आए दिनों हम देख रहे है । जन्म , शादी समारोह और मृत्यु ये तीन कर्म को भारतीय संस्कृति में बहुत ही धूमधाम से मनाए जाता था, लेकिन इस एक वायरस ने इन सब पर ग्रहण लगा दिया है । इस भागती ज़िन्दगी में लोगो के पास स्वयं के लिए भी समय नही था आज वह अपने परिवार के साथ समय बिता रहे है । अपने हुनर को तराश रहे है । इस लॉकडाउन में भले ही लोगो से मिलना जुलना बन्द हो गया हो। लेकिन संवाद का एक नया रूप हमारे सामने आया है । जिसका असर शिक्षण संस्थाओं पर भी दिखाई दे रहा है। आज से करीब साढ़े पांच दशक पहले सन 1964 में कनाड़ा के प्रसिद्ध दार्शनिक मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि संस्कृति की सीमाएं खत्म हो रही हैं , और पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो रही है । 1997 में वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पत्रकार फ्रैंसिस केन्कोर्स ने ‘ द डेथ ऑफ डिस्टेंस ‘ सिद्धान्त दिया था। जिसमें कहा गया कि दुनिया की दूरियों का अंत हो गया है। लेकिन उन महान दार्शनिकों ने तो कभी वैश्विक महामारी की कल्पना नहीं की होगी और न ही कभी वैश्विक लॉक डाउन के बारे में सोचा होगा । कोरोना महामारी ने आज दुनिया भर में लोगो को अपने अपने घरों में कैद कर दिया है। लोग डर और भय के माहौल में जी रहे है, और दुनिया में हो रहे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे है । देखा जाए तो प्रत्येक चुनौती अपने साथ नए अवसरों को लेकर आती है । आज जरूरत है उन अवसरों को समझने और उनका लाभ उठाने की । शिक्षण संस्थानों ने भी ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया है । इसमें सरकार ने भी व्यापक पहल की है। जिसके तहत मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा लॉक डाउन के दौरान शिक्षा व्यवस्था गतिशील रह सकें, इसके लिए 11 अप्रैल 2020 को “भारत पढ़ें ऑनलाइन” की शुरुआत की। यह कार्यक्रम ऑनलाइन शिक्षा पारिस्थिकी तंत्र में सुधार और निगरानी के लिए लांच किया गया। इसके अलावा सरकार ने “युक्ति पोर्टल” भी लांच किया। सरकारी तंत्र द्वारा उठाया गया यह प्रयास अलहदा है। पर सवाल यह उठता है कि क्या ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण और समाज कल्याण के लक्ष्यों की पूर्ति कर पायेगी ? माना कि इस नई शिक्षा नीति में चुनोतियाँ बहुत है । लेकिन इस ओर एक व्यापक पहल आने वाले समय मे शिक्षा के स्तर में सुधार की दिशा में एक नया कदम है। एक बात यह भी है। इन सब के दरमियान देखें तो भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश में ऑनलाइन शिक्षा में कई चुनौतियां है। शैक्षणिक संस्थानों , कालेजों के पाठ्यक्रम में भिन्नता इसमें बहुत बड़ा रोड़ा है । जो ऑनलाइन शिक्षा के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है । देश मे समान पाठ्यक्रम पर लम्बी बहस बरसों से होती आई है , लेकिन इस पर एक राय कभी नही बन पाई । तो वही भारत में इंटरनेट की स्पीड भी ऑनलाइन क्लासेस में एक बड़ी समस्या रही है। ब्राडबैंड स्पीड विश्लेषण कम्पनी ऊकला की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2019 में भारत में मोबाइल इंटरनेट स्पीड में 128 वें स्थान पर रहा । भारत में लॉकडाउन के दौरान इंटरनेट स्पीड 11.18 एमबीपीएस ओर अपलोड स्पीड 4.38 एमबीपीएस रही । ऑनलाइन क्लासेस के समय इंटरनेट स्पीड का कम ज्यादा होना समस्या पैदा करता है । गांवों में यह समस्या कई गुना बढ़ जाती है । गांव में अधिकांश विद्यार्थियों के पास ऑनलाइन पढ़ने के लिए न ही संसाधन उपलब्ध है और असमय बिजली कटौती एक गंभीर चुनौती है । ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा के सपने को सही रूप में साकार कर पाना दूर की कौड़ी नजर आती है । ऑनलाइन शिक्षा के कई नुकसान है तो वही इसके फायदों की बात की जाए तो यह शिक्षा पर होने वाले खर्चो को कई गुना कम कर सकता है। वही देश विदेश में उच्च संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने का मार्ग भी सुगम कराता है । लेकिन ऑनलाइन शिक्षा के सुचारू संचालन भारत जैसे विशालकाय देश में एक ओर जहां फायदे का सौदा है तो वही तकनीकी रूप से इसमें होने वाली समस्याएं व चुनोतियाँ भी कम नही है । अभी लॉक डाउन की स्थिति में यह व्यवस्था भले भी बहुत आसान व फायदेमंद नजर आ रही हो । लेकिन इसके सभी पहलुओं को समझ कर ही आगामी समय मे इस पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत जैसे देश मे गुरुकुल की परम्परा रही है । जहां छात्र ओर शिक्षक एक साथ उपस्थित होकर विद्या अध्ययन करते थे ।। जहां गुरु छात्र के चेहरे के भाव देखकर समझ जाते थे कि शिष्य को कहा समस्या आ रही है । गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में जहां संस्कार ,संस्कृति , ओर शिष्टाचार की शिक्षा दी जाती थी। क्या ऑनलाइन शिक्षा में यह सब संभव हो सकेगा ? सवाल कई है लेकिन इन सवालों के जवाब मौजूदा वक़्त में संभव नही है । कोरोना काल के बाद आने वाला समय ही देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा को तय करेगा । तब तक देश के भविष्य से यही अपील है कि ऑनलाइन पढ़ते जाइए, क्योंकि समय अनमोल है, उसे व्यर्थ न जाने दें।   सोनम लववंशीखंडवामध्य प्रदेश

Dakhal News

Dakhal News 15 May 2020


bhopal, When difficult times come, Rajesh Joshi, find many mediums,expression.

अनिश्चितता में हम रोज़ कुछ निश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार, जरूरी व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने में सक्रिय है तो आम जनता और कुछ संस्थाएं सड़क पर बदहवास चले जा रहे हैं लोगों के लिए खाना या पानी उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ दूर के लिए कोई सवारी मिल जाने से निश्चिन्तता नहीं मिलेगी। जरा राहत मिल जाएगी। उसकी निश्चिन्तता घर की पहुंच है। दरअसल यह कोशिशें ही इस समय का सच है। हमारे समय के सवालों का जवाब। लेखक अनु सिंह चौधरी ने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर कहा कि, “हमारे भीतर ये सवाल गूंजता है कि जो भी हम कर रहे हैं इसका मानी क्या है? इस बीमारी के बारे में कहीं कोई जवाब नहीं है। तब इतिहास और साहित्य के पन्ने को पलट कर देखना एक उम्मीद, एक हौसले के लिए कि कैसे हमारे पूर्वज़ों ने बड़ी त्रासदियों का सामना किया है। कहानियों, किस्सों या काल्पनिक कथाओं के जरिए अपने समय को देखा है। उम्मीद या नाउम्मीदी कोई तो रास्ता वहां से निकलेगा…” कई भाषाओं एवं बोलियों में न केवल महामारियों बल्कि अन्य प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र हुआ है। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, कमलाकान्त त्रिपाठी, विलियम शेक्सपीयर, अल्बैर कामू, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ जैसे कई साहित्यकारों ने अपने समय की आपदाओं को अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाया है। “लेकिन जब कठिन समय आते हैं तो अभिव्यक्ति के कई माध्यम ढूँढने होते हैं।” राजेश जोशी ने यह बात लाइव बातचीत के दौरान कही। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर उन्होंने कहा, “यह महान दृश्य है चल रहा मनुष्य है – हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्ति आज के समय में बिलकुल बदल जाती है। पैदल चलते हुए मनुष्यों का दृश्य महान दृश्य नहीं हृदय विदारक और दुखी कर देने वाले दृश्य हैं। इस समय उम्मीद देने वाला दृश्य उन डॉक्टर, स्वास्थकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों, एक्टिविष्ट को देखना है जो जीवन को बचाने में रात दिन लगे हुए हैं।“ राजकमल प्रकाशन समूह के साथ फ़ेसबुक लाइव के जरिए राजेश जोशी ने अपनी कई नई कविताएं और कुछ पुरानी कविताओं का पाठ किया। राजेश जोशी ने अपनी कविताओं को जीवन को बचाने में लगे लोगों को समर्पित किया- “उल्लंघन / कभी जान बूझकर / कभी अनजाने में / बंद दरवाज़े मुझे बचपन से ही पसंद नहीं रहे / एक पांव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा / व्याकरण के नियम जानना मैंने कभी जरूरी नहीं समझा / इसी कारण मुझे कभी दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी / और किसी व्यापारी के हाथ मोर का पंख देकर उसे खरीदा नहीं / बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी / और उससे भी ज़्यादा मुश्किल था हर पल उसकी हिफ़ाजत करना..”   प्रस्तुति- सुमन परमार

Dakhal News

Dakhal News 15 May 2020


bhopal, Politicians misuse ,entrepreneurial defamation, court , intimidate  media

नई दिल्ली : नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया (एनयूजेआई) ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें कहा गया है कि ताकतवर राजनेता और कॉरपोट जगत के लोग ‘मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया को डराने-धमकाने के लिए करते हैं। कोर्ट ने कहा है कि रिपोर्टिंग में मात्र कुछ गलतियां अभियोजन पक्ष को यह अधिकार नहीं देती कि उसे अपराधी ठहराया जा सके। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन ने अपने फैसले में कहा है कि शक्तिशाली राजनेता और कॉर्पोरेट्स मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया के खिलाफ ’डराने-धमकाने के हथियार’ के रूप में कर रहे हैं। एनयूजे (आई) के अध्यक्ष रास बिहारी और महासचिव प्रसन्ना मोहंती ने एक संयुक्त बयान में कहा कि एनयूजे (आई) मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करता है। यह निर्णय पूरे कॉर्पोरेट जगत और राजनेताओं के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। कोर्ट का यह फैसला उन लोगों को सबक सिखाने वाला साबित होगा जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दबाव डालकर और भय का वातावरण पैदा करके प्रेस की स्वतंत्रता को दबाते हैं। उन्होंने बताया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को और मजबूत करते हुए न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उच्च न्यायपालिका द्वारा एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह एक रिकॉर्ड का विषय है कि पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करना कॉर्पोरेट निकायों और शक्तिशाली राजनेताओं का एक साधन बन गई है। इन राजनेताओं की जेबें गहरी हैं और जिनके हाथों में लंबे समय तक मीडिया हाउसेज को बांधे रखने के लिए अच्छे संसाधन मौजूद हैं। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा कि हमेशा गलती का एक मार्जिन हो सकता है। तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर प्रत्येक मामले में मीडिया को इस बचाव का लाभ उठाने का हक है। रिपोर्टिंग में मात्र गलतियां अभियोजन के आरोपों को सही नहीं ठहरा सकते।

Dakhal News

Dakhal News 12 May 2020


bhopal, PMO refuses, benefits of extinguishing lights , lighting lamps

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 05 अप्रैल 2020 को 09.00 बजे लाइट बुझाने तथा दिया आदि जलाने के संबंध में भाषण के बारे में सूचना देने से मना कर दिया है. नूतन ने पीएमओ को पीएमओ अभिलेखों के अनुसार इन निर्देशों को निर्गत करने से संबंधित तर्क एवं कारण एवं इससे संभावित लाभ की जानकारी मांगी थी. साथ ही उन्होंने पूछा था कि ये निर्देश अनिवार्य हैं या मात्र सुझाव हैं, और यदि ये अनिवार्य निर्देश हैं तो इनके उल्लंघन कर क्या दंड प्राविधानित है. नूतन ने इस संबंध में पीएमओ अथवा भारत सरकार द्वारा निर्गत सरकारी आदेश तथा पीएमओ की पत्रावली की प्रति भी मांगी थी. पीएमओ के जन सूचना अधिकारी प्रवीण कुमार ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि मांगी गयी जानकारी आरटीआई एक्ट की धारा 2(एफ) में सूचना के अंतर्गत नहीं आता है.   नूतन ने इससे असहमत होते हुए इस संबंध में प्रथम अपील प्रस्तुत किया है.

Dakhal News

Dakhal News 12 May 2020


bhopal, Writers and literature lovers, paid tribute, story writer, Shashibhushan Dwivedi

कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की असामयिक मृत्यु से हिन्दी जगत एवं साहित्य प्रेमियों के बीच गहरा शोक व्याप्त है। कल शाम ह्दयगति रूकने से 45 वर्ष के शशिभूषण द्विवेदी की मृत्यु हो गई। कोरोना काल के इस अमानवीय समय ने हमें हमारे शोक में नितांत अकेला कर दिया है। सामाजिक दूरी बनाए रखने की हमारी विवशता में हम गले मिलकर एक-दूसरे से अपना ग़म भी नहीं बाँट पा रहे। लेकिन, आभासी दुनिया के माध्यम से लोगों ने शशिभूषण द्विवेदी को याद कर उनके साथ के अपने संस्मरणों को साझा कर, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। लेखक ममता कालिया ने कहा, “उनकी हर कहानी के अंदर उत्तर आधुनिक चेतना देखने को मिलती है। उनकी कहानी ‘छुट्टी का दिन’ बहुत मार्मिक कहानी है। उनकी कहानियों से उनके व्यक्तित्व को अलग नहीं किया जा सकता, अपनी हर कहानी में वे दिखाई देते हैं। राजनीतिक बातों को प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करना उनकी ख़ासियत थी।“ उन्होंने कहा, “कोरोना काल में जब हम अपने अपने घरों में रहने को मजबूर हैं ऐसे में आभासी माध्यम में साथ जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी को याद करना खुद के दुखों को कम करने का एहसास मात्र है।“ ममता कालिया ने लाइव बात करते हुए शशिभूषण द्विवेदी की कहानी का पाठ भी किया। कहानीकार चंदन पांडेय ने शशिभूषण द्विवेदी को एक दोस्त और एक समकालीन कथाकार के रूप में याद करते हुए कहा कि, “वे एक बेबाक लेखक थे। उनकी कहानियों की ख़ासियत थी कि वे इतिहास को उसी दौर में, उसी नज़रिये से देखते हुए उसे वर्तमान की कहानी बना देते थे। ‘विप्लव’, ‘ब्रह्महत्या’, ‘खेल’ उनकी कुछ महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। सोशल मीडिया पर लोग कल शाम शशिभूषण द्विवेदी के निधन की ख़बर आने के बाद से लगातार उन्हें ही याद कर रहे हैं। जितने साहित्य की दुनिया के लोग याद कर रहे हैं, उतने ही उससे बाहर के विस्तृत हिंदी समाज के लोगों ने उनके किस्से साझा किए। आलोचक अमितेश कुमार ने आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी के साथ बिताए बहुत सारे पलों को याद किया। उन्होंने कहा कि वो जीवन के मुश्किल क्षणों में भी हास्य का रस निकाल लाते थे। अमितेश ने कहा, “अभी तो हम इंतज़ार में थे कि हमें उनकी कई और रचनाओं को पढ़ने का मौका मिलेगा। लेकिन, जैसे उनकी कहानियों में शिल्प अचानक समाप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही वे अचानक हमारे बीच से चले गए।   अमितेश ने लाइव बातचीत में कहा, “जीवन में कठिनाई और तनाव के बीच सकारात्मकता ढूँढ़ निकाल लाने वाले व्यक्ति के तौर पर शशिभूषण द्विवेदी बहुत याद आएंगे। अपने दोस्तों और उभरते लेखकों, साहित्यकारों के लिए वे एक बेबाक और स्पष्ट आलोचक थे जिनकी कही बातों ने बहुतों को कुछ नया सिखाया था।“ लॉकडाउन में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा वाट्सएप्प से रोज़ साझा की जा रही पुस्तिका आज लेखक शशिभूषण द्विवेदी को समर्पित रही। पुस्किता में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी कहानियों को साझा किया गया है।

Dakhal News

Dakhal News 10 May 2020


bhopal, For six years, anonymous senior journalist ,writer Meenu Rani Dubey

प्रयागराज की वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका मीनू रानी दुबे के निधन से इस प्रदेश में महिला पत्रकारों के एक युग का अंत तो गया. मीनू ने उस समय पत्रकारिता में कदम रखा था जब प्रयागराज में एक भी महिला पत्रकार नहीं थी. उनका इस पेशे में आना एक कौतूहल से काम नहीं था. उन्होंने 1982 में तत्कालीन महिला मैगज़ीन मनोरमा में बतौर उप संपादक काम शुरू किया और बाद में वह इसकी सहयोगी संपादक बनीं. मैं इससे पहले 1979 से देशदूत (दैनिक अख़बार) के लिए खेल की न्यूज़ कवर करने लगा था. उस समय एलएलबी तृतीय वर्ष का छात्र था. डॉ राम नरेश त्रिपाठी इस अख़बार के चीफ रिपोर्टर थे. देशदूत स्व. नरेंद्र मोहन के चचेरे भाई वीरेंद्र कुमार का था. कुछ ही महीनों बाद दोनों में हिस्सेदारी का समझौता हुआ और देशदूत दैनिक जागरण हो गया. उसी साल अगस्त में तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास ने जागरण का लोकार्पण किया. यहाँ मुझे स्पोर्ट्स के अलावा डेस्क पर भी काम करने को कहा गया. इसी दौरान मेरा मीनू रानी से परिचय हुआ. उल्लेखनीय है कि गत चार मई को त्रिपोलिया (प्रयागराज) स्थित घर पर गिरने से गंभीर रूप से घायल होने के कारण मीनू रानी का निधन हो गया था. मीनू रानी बहुत प्रतिभावान थीं. उन्हें सामयिक तथा रुचिकर व पठनीय विषयों की गहरी समझ थी और मैगज़ीन के दो अंक बाद वाले अंक में क्या-क्या सामग्री जा सकती है, वह पहले से ही तैयारी में जुट जाती थीं. डेस्क पर काम करने के साथ ही वह फील्ड में जाकर महिला सन्दर्भ पर रिपोर्टिंग भी करती थीं और शुद्ध रूप से रचनात्मक रिपोर्टिंग में ही प्रतिमान स्थापित किया. मनोरमा उस समय देश की नंबर वन महिला मैगज़ीन हुआ करती थी और दक्षिणी राज्यों में भी हिंदी भाषी परिवारों में वह पढ़ी जाती थी. उसकी लोकप्रियता के बराबर कोई अन्य मैगज़ीन नहीं पहुँच पायी. प्रयागराज के सभी नामी साहित्यकारों महादेवी वर्मा, उपेंद्र नाथ अश्क, डॉ राम कुमार वर्मा, जगदीश गुप्त, अमर कांत आदि उन्हें बहुत स्नेह देते थे. शहर के पत्रकारों के हर आयोजन और कार्यक्रम में मीनू रानी अनिवार्य रूप से की उपस्थित रहती थीं. उन्होंने इतने आलेख, इंटरव्यू, प्रसंग, संस्मरण लिखे जिनकी कोई संख्या उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कभी पत्रकारों से सामान्य चर्चा में भी इसका कभी उल्लेख नहीं किया. हो सकता है इसलिए कि ऐसा कहने से अहंकार का भाव लक्षित होता. मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की साहित्यिक गतिविधियों में उन्हें भाग लेते देखता था. डेलीगेसी की मैगज़ीन में उनके लेख छपा करते थे. छात्र-छात्रों की गोष्ठियों में उन्हें विचार रखने के लिया बुलाया जाता था. मुझसे अक्सर वह यूनिवर्सिटी में ही इन सबकी चर्चा करती थीं. एक बार यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी हाल में उन्होंने कोई मैगज़ीन अपने गाँधी झोले से निकाली और मुझे पन्ने पलटकर दिखाते हुए बोली, देखिये इंद्र कांत जी मेरा लेख छपा है. मैंने सरसरी तौर पर देखा और उन्हें बधाई दी तो वह खुश हो गयीं. प्रबंधन की आपसी लड़ाई के कारण मनोरमा मैगज़ीन बंद हो गयी तो वह स्वतंत्र रूप से अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख देती रहीं. 1980 के आस पास प्रयागराज में उनके अलावा कोई महिला पत्रकार नहीं थी. हाँ लेखिकाएं कई थीं. बाद में नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका अख़बार में संध्या सिंघल, सुनीता द्विवेदी (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की पत्नी और सुप्रीम कोर्ट के जज स्व एसएन द्विवेदी की पुत्रवधू और हाई कोर्ट के जस्टिस धवन की बहन) आयीं. सुनीता द्विवेदी डेस्क के अलावा रिपोर्टिंग का भी काम कर लेती थीं और उनके लेख भी छपते थे. अब चैनलों की बाढ़ आने के बाद महिला पत्रकारों की भी बाढ़ आ गयी है. इनमें स्क्रिप्ट पढ़ते हुए एंकरिंग की तो क्षमता दिखती है लेकिन लेखन में नहीं, क्योंकि वैचारिक शून्यता है. पांच छह साल से गुमनाम थीं इधर पांच-छह साल से वह गुमनाम जैसी हो गयी थीं. पत्रकारों से उनकी मुलाकात नहीं होती थी और अपने को घर तक सीमित कर लिया था. एक साल पहले मेरी उनकी मुलाकात इलहाबाद ब्लॉक वर्क्स (प्रिंटिंग प्रेस ) में हुई थी, मेरा वहां के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज मित्तल से 40 साल पुराना सम्बन्ध है. वह मनोज के पास बैठी थीं. मुझे देखती ही पूछी…अरे ..इंद्र कांत जी आप यहाँ कैसे.?.. मनोज ने कहा कि भाई साहब तो हमेशा यहाँ आते रहते हैं..वह बताई कि वह भी यहाँ अक्सर आती हें. मैंने एक बात देखी जिससे मैं कुछ क्षण विचलित भी हुआ..मीनू रानी बहुत कमजोर हो गयी थीं और चेहरे पर चिंतन और चमक गायब थी. मैंने पूछा…मीनू जी आप इतनी कमजोर क्यों हो गयी? स्वास्थ्य को क्या गया है? वह पल भर खामोश रहीं, फिर रोने लगीं और पल्लू से आंसू पोछते हुए kaha, मै ठीक भी हूँ और नहीं भी. मैंने कहा, हुआ क्या है? वह बोली, कुछ नहीं. फिर पूछा, आप कुछ बताएं, हो सकता है मै कुछ मदद कर सकूँ. …बोलीं..नहीं नहीं सब ठीक है. आप अपना हाल बताएं , स्वास्थ्य कैसा है? कुछ देर बाद वह सामान्य हुईं. मनोज से कुछ देर बात हुई फिर मैं मीनू रानी को अपना ख्याल रखने की बात कहकर चला गया. उनके शारीरिक हालत को देख मुझे लगा कि कुछ न कुछ प्रॉब्लम है जरूर. इस मुलाकात के दो महीने बाद अपने एक लेख के बारे में कुछ जानकारी लेने के लिए उन्हें फ़ोन किया तो वह उत्साह के साथ बात करती रहीं, खुश मिजाज लग रही थीं और पूरी जानकारी दीं. लगभग आधा घंटे तक मेरी उनकी बात हुई. उसके बाद फिर बात नहीं हो सकी. एक लेखिका और पत्रकार के रूप में मीनू रानी जितना रचनात्मक योगदान समाज को दे सकती थीं, उतना उन्होंने दिया. वह अपने पीछे आदर्श और सकारात्मक पत्रकारिता ऐसा अध्याय छोड़ गयी, जो भविष्य में किसी अन्य महिला पत्रकार के वश की बात नहीं जो इसे दोहरा सके.   लेखक इंद्र कांत मिश्र प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. 

Dakhal News

Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Amit Shah, broke silence,no malice,pread rumors about my health

Amit Shah : पिछले कई दिनों से कुछ मित्रों ने सोशल मिडिया के माध्यम से मेरे स्वास्थ्य के बारे में कई मनगढ़ंत अफवाए फैलाई हैं। यहाँ तक कि कई लोगों ने मेरी मृत्यु के लिए भी ट्वीट कर दुआ मांगी है। देश इस समय कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा और देश के गृह मंत्री के नाते देर रात तक अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैंने इस सब पर ध्यान नहीं दिया। जब यह मेरे संज्ञान में आया तो मैंने सोचा कि यह सभी लोग अपनी काल्पनिक सोच का आनंद लेते रहें, इसलिये मैंने कोई स्पष्टता नहीं की। परन्तु मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओ और मेरे शुभचिंतकों ने विगत दो दिनों से काफी चिंता व्यक्त की और उनकी चिंता को मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता। इसलिए मैं आज स्पष्ट करना चाहता हूँ, कि मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ और मुझे कोई बीमारी नहीं है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ऐसा मानना है कि इस तरह की अफवाह स्वास्थ्य को और अधिक मज़बूत करती हैं। इसलिए मैं ऐसे सभी लोगों से आशा करता हूँ कि वो यह व्यर्थ की बातें छोड़ कर मुझे मेरा कार्य करने देंगे और स्वयं भी अपने काम करेंगे। मेरे शुभचिन्तक और पार्टी के सभी कार्यकर्ताओ का मेरे हालचाल पूछने और मेरी चिंता करने के लिए उनका आभार व्यक्त हूँ।   और जिन लोगों ने यह अफवाएं फैलाई है उनके प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना या द्वेष नहीं है। आपका भी धन्यवाद्।   देश के गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह की एफबी वॉल से.  

Dakhal News

Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Senior journalist of Kadambini Shasibhushan Dwivedi is no more

दुखद सूचना हिंदुस्तान ग्रुप की मैगजीन कादम्बिनी से आ रही है। यहां कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी का निधन हो गया है। फेसबुक पर महेंद्र अवधेश श्रीवास्तव लिखते हैं- भाई शशि भूषण द्विवेदी नहीं रहे। एक बेबाक-बिंदास टिप्पणीकार के रूप में इसी फेसबुक के जरिये मैंने उन्हें जाना। समझने-परखने का प्रयास किया, अपना कोई कद-पहचान न होते हुए भी। मिलने की बहुत इच्छा थी। सोचा था कि कभी किसी पुस्तक मेले में दर्शन का सौभाग्य मिला, तो उन्हें प्रणाम करूंगा। लेकिन, जिम्मेदारियों और बेबसी ने इस कदर जकड़ा कि पिछले दो-तीन पुस्तक मेले मुझसे छूट गए। शशि जी जब कुछ कहते थे, तो लगता कि जैसे कोई अपने बीच का आदमी बोला। मैं उनकी हर पोस्ट को पढ़ता और लाइक करता, लेकिन कमेंट नहीं करता। डर सा लगता था। सादर नमन मेरे भाई। विधाता आपकी आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें। अरुण शीतांश की टिप्पणी पढ़ें- Shashi Bhooshan Dwivedi से मेरी मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में हरे प्रकाश उपाध्याय के साथ हुई थी, प्र ले सं का राष्ट्रीय सम्मेलन में। वहां हमलोग साथ में खाना-वाना खाए।विष्णु नागर ने कादम्बिनी पत्रिका में कविता प्रकाशित की थी तो उसकी चर्चा की। फोन पर बातचीत हमेशा होती रहती थी।विश्वास नहीं हो रहा है आज नहीं हैं। उनको रिक्शा पकड़ा कर गेस्ट हाउस लौट आया था। उस क्षण की बहुत याद आ रही है।मन बहुत दुःखी है। ये जाने की उमर नहीं थी। बहुत प्यारे इंसान थे। लग रहा है यह झूठी ख़बर है। उन्होंने अपना फ्लैट लिया। उसके बाद बात नहीं हो सकी।मैं तो लगातार सबको फोन कर रहा हूं जब से कोरोना काल की शुरुआत हुई है। अब इन्हीं से बात होने वाली थी कि….! नमन!! अजित प्रियदर्शी की प्रतिक्रिया- नयी सदी के चर्चित और अपने तरह के अनोखे कथाकार Shashi Bhooshan Dwivedi का इतनी जल्दी जाना हतप्रभ कर गया। वे जितने अच्छे कथाकार थे, उतने ही अच्छे इंसान। दोटूक, बेबाक, जि़न्दादिल इंसान की गवाही देते थे उनके पोस्ट। दिल्ली के आत्ममुग्ध और अहमन्य साहित्यिक परिदृश्य के बाहर था उनका व्यक्तित्व। किसी साहित्यिक प्रकरण की जानकारी लेने के लिए उन्होंने एक बार फोन किया था।उनसे दिलचस्प संवाद याद है। उनके परिवार को यह कठिन दुख सकने की शक्ति मिले। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि! कश्यप किशोर मिश्र का कमेंट- “अतीत झूठा होता है अतीत में ठीक ठीक वापसी संभव नहीं।” “मरना ही सबकुछ नहीं होता सही समय पर मरना जरूरी होता है।” बीते चार घंटे पहले शशिभूषण जी के एकाएक न रहने की खबर पढ़ी। बड़ी देर तक दिमाग में कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। कुछ सोचा ही नहीं जा रहा था। सिर्फ यहां वहां उनके नहीं रहने की खबर देख रहा था पढ़ रहा था। आज के दौर में, साहित्य और साहित्यकार “सुपर मार्केट” के प्रोडक्ट की तरह हैं उनके बीच शशिभूषण जी पुराने वक्त के कस्बाई या छोटे शहरों की एक परचून की दूकान की तरह थे। बिना किसी तड़क भड़क के बिना किसी चमकदार पैकिंग के, बिना किसी डिस्काउंट आफर के बेहद सहज तरीके से सिर्फ जरूरत भर की बात जरूरत भर की पुड़िया में बांध देते थे। विनीत कुमार नें शशिभूषण जी को याद करते हुए कहा कि “फोन पर बात करते हुए वो अपने साथ एक जंगल लेकर काल करते थे।” मेरे ख्याल में वो खुद में एक जंगल बन गये थे। भरी – पुरी आबादी के बीच एक पुरानी हवेली की मानिंद थे जिसमें समय के साथ साथ पौधों लतरों झाड़ झंखाड़ का एक जंगल उग आया हो। बीच आबादी एक मकान अपनें पैदा किये जंगल के साथ अपनी गति से जी रहा हो। ऐसी हवेलियां अपना जंगल लिए खत्म होती हैं या इनके जंगल इन्हें लिए दिए खत्म होते हैं। ऐसा ही हुआ भी। शशिभूषण जी के साथ साथ उनके परिवेश और व्यक्तित्व के सायबान तले फैला फूला जंगल भी सहसा ही खत्म हो गया।

Dakhal News

Dakhal News 8 May 2020


bhopal, Google added new meeting feature in Gmail

कोरोना के चलते दुनिया भर के देशों में लॉक डाउन के चलते कई किस्म की नई जरूरतें पैदा हुई हैं जिसे भुनाते हुए कई कंपनियों ने अपने अपने प्रोडक्ट/फीचर लांच किए हैं. इसमें जूम एप्प सर्वाधिक चर्चा में है जिसमें अलग अलग जगहों पर घर में बैठे लोग एक साथ चैट, मीटिंग, कांफ्रेंस कर सकते हैं. सबसे खास ये कि इस चैट मीटिंग कांफ्रेंस के वीडियो को सेव कर बाद में इसे किसी भी भी प्लेटफार्म (यूट्यूब, फेसबुक आदि) पर अपलोड भी कर सकते हैं. जूम के इस अविष्कार से सबसे बड़ा फायदा मीडिया वालों को हुआ जो घर बैठे दूसरे लोगों से कनेक्ट कर डिबेट परिचर्चा शो आदि कर पा रहे हैं. इस एप्प से कारपोरेट कंपनीज को भी काफी फायदा हो रहा है जो वर्क फ्राम होम के चलते अपने इंप्लाइज से इस एप्प के जरिए कनेक्ट हो पा रहे हैं. वाट्सअप ने भी एक साथ आठ लोगों के वीडियो चैट की सुविधा दी है. अभी तक चार लोग ही एक साथ चैट कर सकते थे. ताजा डेवलपमेंट जीमेल का है. गूगल की मेल कंपनी जीमेल ने मीटिंग का नया फीचर पेश कर दिया है. जब आप जीमेल खोलेंगे तो जिस तरफ इनबाक्स, स्टार्ड, सेंट, ड्राफ्ट, स्पैम आदि लिखा होता है, उसी के नीचे Meet करके एक फीचर लिखा आएगा. इस ‘मीट’ के नीचे दो फीचर लिखे आते हैं. स्टार्ट ए मीटिंग और ज्वाइन ए मीटिंग. स्टार्ट ए मीटिंग वाले फीचर में आप किसी नई मीटिंग की शुरुआत कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में एक कोड जनरेट होगा जिसे आप मीटिंग में शामिल होने वाले अन्य व्यक्तियों को भेजेंगे और वो लोग उस कोड के जरिए आपकी मीटिंग में जुड़ जाएंगे, ज्वाइन ए मीटिंग पर क्लिक कर कोड डालते हुए. कोलकाता से श्वेता सिंह की रिपोर्ट.  

Dakhal News

Dakhal News 8 May 2020


bhopal, God bless Amit Shah

अमित शाह के बारे में बहुत बातें हो रही हैं. उनके स्वास्थ्य और निस्तेज (अच्छी हिंदी में कहे तो बुझे हुए) चेहरे को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. कुछ लोग उन्हें बोन कैंसर से पीड़ित बता रहे हैं तो कुछ अन्य बीमारियों से. लेकिन मीडिया में उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई अपडेट नहीं है. अमित शाह ठीक उसी समय गायब हुए थे जब उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन गायब हुए थे. इंडियन मीडिया ने बगदादी की तरह किम को 20 से अधिक बार मार डाला लेकिन किम वापस आ गए, हर तानाशाह की तरह.   इंडियन मीडिया के पास मिसाइल रहता तो खुद ही किम को मार देतें ये बोल हमारा मजा खराब करने क्यों वापस आया तू? जा अब मर!! खैर, अमित शाह जब गायब थे तब मीडिया ने यह स्टोरी गढ़ी कि परदे के पीछे कोरोना से जंग की कमान अमित शाह के हाथ में था. अब जब अमित शाह वापस आये हैं तो मीडिया में आई उनकी फोटो ज़ूम कर देखा जा रहा है, लोग उनके पतले हाथों को देख तंज़ कस रहे हैं कि मांस कहाँ गया? आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई नहीं दे रही है जैसे वे गले को मोटा करते हुए बोलते थे “आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए.. पहले सीएबी आने जा रहा है, सीएबी आने के बाद एनआरसी आएगा. एनआरसी सिर्फ बंगाल के लिए नहीं आएगा, पूरे देश के लिए आएगा. ” लेकिन मामला उल्टा हो गया एनआरसी से पहले दुबले पतले अमित शाह आ गए. अब अमित शाह से लड़ने में मजा नहीं आ रहा है. कहाँ हट्टे -कट्टे अमित शाह और कहाँ माचिस की तीली सा अमित शाह. मैं बहुत निराश हूँ! क्या ये बात छुपाई नहीं जा सकती थी. जैसे बीमारी छुपा ली गई, जैसे उस हॉस्पिटल और डॉक्टर को छुपा लिया गया जिन्होंने रात के अंधेरे में अमित शाह का इलाज किया. उन लोगों को बोल दिया रहा होगा कि कोई जानकारी लीक नहीं होना चाहिए. अगर किसी ने किया तो लोया को याद कर लो. लेकिन मजा खुद अमित शाह ने खराब कर दिया. मेरी अमित शाह को एक सलाह है, जैसे हर तानाशाह अपना बॉडी डबल रखते हैं, वैसे ही उन्हें भी रख लेना चाहिए, जब लोग ज्यादा सवाल करने लगे तो एएनआई के कैमरामैन को बुलाकर हट्टे कट्टे बॉडी डबल की फ़ोटो खींच मीडिया में जारी कर दें. बाकी काम मीडिया कर देगा कि फलां फलां मिशन पर हैं अमित शाह. ये दुबला पतला अमित शाह हमें एकदम पसंद नहीं. तानाशाहों का परचम बुलंद रहे! विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से!

Dakhal News

Dakhal News 8 May 2020


bhopal, newspapers , relief package, government send money , media persons

अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के लिए संघर्षरत अखबार कर्मियों की यूनियन न्‍यूजपेपर इम्‍प्‍लाइज यूनियन आफ इंडिया (न्‍यूइंडिया) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अखबार मालिकों की संस्‍था आईएनएस की राहत पैकेज की मांग का विरोध करते हुए मजीठिया वेजबोर्ड लागू करवाने की लड़ाई में नौकरियां गवा चुके हजारों अखबारकर्मियों को सीधे तौर पर आर्थिक मदद की मांग की है। ज्ञात रहे कि ऐसे हजारों अखबार कर्मी नाैकरी छीन जाने के कारण रोजी रोटी को मोहताज हैं। इस संबंध में न्‍यूइंडिया द्वारा लिखा पत्र इस प्रकार से है: अखबार कर्मचारियों के लिए 11 नवंबर 2011 को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा संवैधानिक घोषित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू ना करके देश के संविधान और संसद का मखौल उड़ाने वाले अखबार मालिकों के संगठन आईएनएस की हजारों करोड़ के राहत पैकेज की मांग का हम देश भर के पत्रकार और अखबार कर्मचारी कड़ा विरोध करते हैं। आईएनएस एक ऐसी संस्‍था है जो खुद को देश के संविधान, सर्वोच्‍च न्‍यायालय और संसद से बड़ा समझती है। इसका जीता जागता उदाहरण अखबारों में कार्यारत पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा वैध और उचित घोषित किए गए मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू ना करना और वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छीन लेना है। महोदय, देश के लगभग सभी समाचारपत्रों की पिछली बैलेंसशीटें हर साल होने वाले करोड़ों रुपये के मुनाफे को दर्शाती हैं। वहीं देश भर के श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड की रिकवरी और उत्‍पीड़न के हजारों लंबित मामले साफ दर्शाते हैं कि किस तरह से अखबार प्रबंधन अपने कर्मचारियों का हक मार कर बैठे हैं और पत्रकारों, पत्रकारिता और रोजगार के नाम पर अपनी तिजोरियां ही भरते आए हैं। लिहाजा कोराना संकट में हजारों करोड़ के घाटे की बात करके आईएनएस राहत पैकेज की जो बात कर रहा है, यह सिर्फ अखबार मालिकों की तिजोरियां भरने का ही प्रपंच है। इससे अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं होने वाला। यहां गौरतलब है कि लॉकडाउन में भी अखबारों की प्रिंटिंग का काम नहीं रोका गया है और अखबारों के प्रसार में मामूली फर्क पड़ा है। महंगाई के दौर में जहां हर वस्‍तु के दाम उसकी लागत के अनुसार वसूले जाते हैं तो वहीं बड़े बड़े अखबार घराने अखबार का दाम इसलिए नहीं बढ़ाते ताकि छोटे अखबार आगे ना बढ़ पाएं। उनकी इस चालाकी को घाटे का नाम नहीं दिया जा सकता है। यहां एक समाचारपत्र द हिंदू का उदाहरण सबके सामने है, जिसकी कीमत 10 रुपये हैं जबकि बाकी अखबार अभी भी इससे आधी से कम कीमत में बेचे जा रहे हैं, इसका खामियाजा देश की जनता की खून पसीने की कमाई को लूटा कर नहीं भरा जा सकता। महोदय, यहां यह बात भी आपके ध्‍यान में लाना जरूरी है कि आईएनएस से जुड़े अधिकतर अखबारों ने केंद्र सरकार की उस अपील का भी सम्‍मान नहीं किया है जिसके तहत कर्मचारियों का वेतन ना काटने को कहा गया था। करीब सभी अखबारों ने जानबूझ कर अपने कर्मचारियों से पूरा काम लेने के बावजूद उनका आधे के करीब वेतन काट लिया है ताकि सरकार को घाटे का यकीन दिलाकर राहत पैकेज का ड्रामा रचा जा सके। वेतन काटे जाने को लेकर कुछ यूनियनें माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दखिल कर चुकी हैं। महोदय, असल में राहत के हकदार तो वे अखबार कर्मचारी हैं, जो पिछले पांच से छह सालों से मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके चलते अपनी नौकरियां तक गंवा चुके हैं। इनके परिवारों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना मुश्किल हो रहा है। केंद्र सरकार से मांग की जाती है कि राज्‍यों के माध्‍यम से श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड और अवैध तौर पर तबादले और अन्‍य कारणों से नौकरी से निकाले जाने की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मचारियों की पहचान करके उन्‍हें आर्थिक तौर पर सहायता मुहैया करवाई जाए।   साथ ही कोरोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को आर्थिक मदद जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से इस आशय का शपथपत्र देते हैं कि उन्‍होंने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड या इसके कारण कर्मचारी को नौकरी से निकालने का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की यूनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को राहत दी जाए।

Dakhal News

Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Punjab Kesari journalist dies of cancer

जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार एलएल शर्मा ने जानकारी दी है कि पंजाब केसरी के पत्रकार कमल शर्मा का निधन हो गया है. कमल शर्मा कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.   दुःखद सूचना. हमारे युवा साथी पत्रकार श्री कमल शर्मा पंजाब केसरी का आज सुबह निधन हो गया. वे पिछले कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.-एलएल शर्मा

Dakhal News

Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Hurt by SP leader, making dirty allegations , character, women journalist

सुसाइड नोट के आधार पर लोहता पुलिस ने सपा नेता शमीम को किया गिरफ्तार वाराणसी। काशी की पत्रकार बिरादरी की एक तेज तर्रार बहुचर्चित महिला पत्रकार रिजवाना तबस्सुम ने रविवार की रात आत्महत्या कर ली। आरोप है कि एक सपा नेता ने रिजवाना पर झूठा इल्जाम लगाया था। दोनों के बीच रात करीब एक बजे विवाद हुआ। बाद में दो लाइन का सुसाइड नोट लिखकर रिजवाना फांसी पर झूल गई। इस घटना से बनारस के पत्रकार मर्माहत और सकते में हैं। रिजवाना की कई स्टोरीज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी हैं। विज्ञान में स्नातक रिजवाना तबस्सुम (28 साल) का रविवार की रात अपने आवास पर कमरे में फांसी लगाकर जान देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। बतौर स्वतंत्र पत्रकार अपने लेखन से परिवार का खर्च चलाने वाली रिजवाना तब्बसुम ने फंदे पर झूलने पहले लिखे सुसाइड नोट में सपा नेता शमीम नोमानी को जिम्मेदार ठहराया है। शमीम लोहता का रहने वाला है। वो समाजवादी पार्टी में कार्यकारिणी का सदस्य रहा है। रिजवाना की उससे दोस्ती थी। लाकडाउन में वो शमीम के साथ मिलकर गरीबों को राशन वितरित कर रही थी। पत्रकार रिजवाना तबस्सुम द वायर, न्यूज क्लिक, जनज्वार, द प्रिंट, एशिया लाइव, बीबीसी समेत तमाम पत्रिकाओं और न्यूज वेबसाइटों के लिए समसामयिक मुद्दों कवर करती थी। रविवार की रात 9.27 बजे रिजवाना ने न्यूज क्लिक को आखिरी रिपोर्ट भेजी थी। परिजनों के मुताबिक रात करीब एक बजे सपा नेता शमीम नोमानी ने उसे फोन किया था। उसने रिजवाना पर तमाम झूठे इल्जाम लगाए। शमीम ने उस पर कई लोगों के साथ नाजायज संबंध होने के झूठे आरोप जड़ दिए। रिजवाना इस इल्जाम को बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने चार शब्दों का सुसाइड नोट लिखा-शमीम नोमानी जिम्मेदार है। इस नोट को उसने अपने बिस्तर के पास लगे बोर्ड पर पिनअप किया। बाद में अपनी चुनरी निकाली और फांसी का फंदा लगाकर झूल गई। लोहता थाना क्षेत्र के हरपालपुर की रहने वाली फ्रीलान्सर रिजवाना तबस्सुम की आत्महत्या की खबर सोमवार की सुबह जब परिजनों को लगी तो उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दी। मौत की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे सदर सीओ अभिषेक पाण्डेय ने सुसाइड नोट के आधार पर सपा नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया। सीओ अभिषेक पाण्डेय ने बताया कि रिजवाना की खोजी रपटों के वो भी कायल थे। ग्रामीण जनजीवन में किसानों और गरीबों की बदरंग जिंदगी से जुड़े मुद्दों को रिजवाना काफी अहमियत देती थी। सुसाइड नोट के आधार पर सीओ ने तत्काल समीम नोमानी के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए प्रेरित करना) के तहत मुकदमा दर्ज करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। नोमानी समाजवादी पार्टी की जिला कार्यकारिणी का सदस्य है। आगामी विधानसभा चुनाव में वो सपा से टिकट का दावेदार था। बनारस के लोहता थाने में बंद शमीम अभी भी रिजवाना का चरित्र हनन करने से बाज नहीं आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि शमीम की रिजवाना से दोस्ती थी। वो उससे शादी करना चाहता था, लेकिन रिजवाना अपने करियर पर ध्यान दे रही थी। शमीम का उसके दूसरे दोस्तों से बात करना काफी नागवार लगता था। काफी होनहार थी रिजवाना तेजतर्रार और प्रतिभाशाली युवा रिजवाना की मौत से बनारस के पत्रकार बेहद दुखी हैं। लाकडाउन के दौरान रिजवाना ने कई न्यूज वेबसाइटों के लिए यादगार स्टोरियां लिखीं। इन दिनों वो अपने करियर पर ज्यादा ध्यान दे रही थी।   पत्रकार रिजवाना हमेशा सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हुई थी। जिसके लिए उसे कई प्रतिष्ठित संस्थानों की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका था। रिजवाना अपने पांच भाई बहनों में दूसरे नंबर की थी। इनकी मौत से उसके पिता अजीजुल हकीम, मांग अख्तरजहां, बड़े भाई मोहम्मद अकरम, छोटी बहन नुसरत जहां, इशरत जहां, छोटे भाई मोहम्मद आजम व मोहम्मद असलम का रो-रोकर बुरा हाल है।

Dakhal News

Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Mahanayak has opened contracts

समरेंद्र सिंह जनता को कोठे पर बिठा कर पैसे मिले या फिर ठेके पर – सरकारों को बस पैसे से मतलब है…. हजारों साल बाद जो महानायक पैदा हुआ है उसने ठेके खुलवा दिए हैं. उसके इशारे पर विचारधारा की बंदिशें टूट गई हैं. जैसे सबको बस इसी इशारे का इंतजार हो. कुछ अपवादों को छोड़ कर सभी प्रदेश सरकारों ने ठेके खोल दिए हैं. सबने ऐसा क्यों किया है, यह सभी समझ रहे हैं. सरकारों को पैसे की जरूरत है. पैसे कहां से आएंगे? जनता से ही आएंगे. हर बार ऐसा ही होता है. जब भी संकट आता है, सरकार जनता से पैसे लेती है. चाहे वो दान की शक्ल में हो या फिर टैक्स कलेक्शन के नाम पर हो. जनता से पैसे उगाहने के बाद सरकार उस पैसे का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के हवाले कर देती है. इतना ही नहीं जनता ने जहां-जहां पैसा निवेश करके रखा होता है, सरकार उस पैसे को भी पूंजीपतियों को दे देती है. पूंजीपति जनता के पैसे का एक हिस्सा दबा कर अपने पास रख लेते हैं. दूसरे खातों में साइफनऑफ कर देते हैं. बाकी पैसे काम धंधे में लगा देते हैं. फिर जनता के एक तबके को रोजगार के नाम पर थोड़े-थोड़े पैसे मिलने लगते हैं. सेठ उनके श्रम से मुनाफा कमाने लगते हैं और सरकार को उसका हिस्सा देने लगते हैं. जनता को उसके श्रम की जो भी कीमत मिलती है, उसमें से वो एक हिस्सा आड़े वक्त के लिए बचाकर रखती है. मगर विडंबना देखिए जब भी संकट आता है, उसकी पूंजी घट जाती है. चाहे उसने वो पैसे जमीन में लगाए हों, प्रोपर्टी बाजार में लगाए हों या शेयर बाजार में लगाए हों. सबकुछ घट जाता है. उनके अलावा पीएफ के तौर पर या नकदी और गहने के तौर पर जो कुछ भी होता है, सरकार धीमे-धीमे उनसे वह भी बिकवा देती है. मतलब आम लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता. वो पहले से अधिक गुलाम हो जाते हैं. इन आम लोगों का वो तबका जो सबसे निचली पायदान पर है, उसके लिए तो संकट और भी बड़ा है. उसके पास अपने श्रम के अलावा कुछ शेष नहीं होता. वो हर रोज मेहनत करके जो दो-चार सौ रुपये कमाता है, सरकार और शराब के व्यापारी उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खींच लेते हैं. सोख लेते हैं. वो शराब पीता है. घर में मारपीट करता है. घर में मारपीट मध्य वर्ग के लोग भी करते हैं. और घर में कोई भी मारपीट करे, बच्चों के दूध और किताबों के पैसे की दारू पी जाए, दवा के पैसे की दारू पी जाए… सरकार को इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता है. उसे बस पूंजी चाहिए. वो चाहे कैसे भी आए. गौर से देखिएगा तो लगेगा कि इस दौर की सरकारों ने अपना हाल “सड़क” फिल्म की “महारानी” है और “अग्निपथ” फिल्म के “रऊफ लाला” जैसा बना लिया है. इन सरकारों का मकसद बस पैसे कमाना है, चाहे पैसे जनता को कोठे पर बिठा कर मिलें या फिर ठेके पर बिठा कर मिलें. और ऐसा करने के बाद भी ये निकम्मी और क्रूर सरकारें नैतिकता का ढोल पीट सकती हैं. ये बेशर्म और वहशी नेता नैतिकता का ढोल पीट सकते हैं. और हां, सरकार किसी की भी हो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. गांधी का नाम लेने वाले और राम का नाम लेने वाले – इस मामले में दोनों एक हैं. पूरे नंगे.   (जिन्होंने भी अपने प्रदेश में ठेके बंद रखने का फैसला लिया है, उन सभी को मेरा सलाम।)

Dakhal News

Dakhal News 5 May 2020


bhopal,Independent journalist, Rizwana Tabassum ,commits suicide

यह खबर मेरे लिए ज़िन्दगी की अनबूझ पहेली है…. स्वतंत्र पत्रकार रिजवाना तबस्सुम नहीं रही। अभी एशिया विल के संवाददाता विकास कुमार से इस घटना की जानकारी हो सकी….उनकी पोस्ट में जो कारण है वह ज़िक्र नहीं करूंगा लेकिन बीते रविवार 3 मई को ही तो मेरी इनसे बात हुई थी फोन व व्हाट्सएप पर….बाँदा में तिंदवारी तहसील के भिरौड़ा गांव में दो दिन पहले हार्ट अटैक से किसान की मृत्य पर खबर को लेकर। हाल ही गत सप्ताह इन्होंने बाँदा से 19 फर्जी तब्लीगी जमाती मस्ज़िद से पकड़ने को लेकर भी रिपोर्ट लिखी थी। विकास भाई कहिये यह झूठ है जो आप पोस्ट किए ,कहिये झूठ है यह अविश्वसनीय हैं मेरे लिए। रिजवाना जो कुछ देश मे घटित हो रहा है उससे आहत ज़रूर थी पर इतनी अवसाद में नही थी। कल ही जब मैंने व्हाट्सएप पर बात की तो चलते हुए उनके खुशी के संकेत पर उन्होंने रोजा में होने की बात भी बतलाई थी। क्या हो गया है ये अविश्वसनीय और हृदयविदारक घटना है रिजवाना ने खुदकुशी कर ली! हमारे आसपास जैसा वातावरण बन चुका है व्यक्ति के अंतस को समझकर भी समझ पाना बेहद मुश्किल हो चुका है लेकिन यह भयावह और कोलाहल भरा माहौल है। रिजवाना तबस्सुम द वायर,जनज्वार और भी अन्य वेबसाइट के लिए बेबाकी से लिखती रही है गौरतलब है यह बुंदेलखंड से प्रसारित खबर लहरिया की पत्रकारिता भी करती रही है। आज सुबह रिजवाना नहीं रही….आत्महत्या कर लिया!   यह कैसा रमजान का रोजा था रिजवाना?

Dakhal News

Dakhal News 5 May 2020


bhopal,How easy, Irfan, Ajay Brahmatmaj

लॉकडाउन में 39 दिन से लगातार राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव पेज से साहित्यिक और वैचारिक चर्चाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी सिलसिले में गुरुवार का दिन वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी, लेखक रेखा सेठी, फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और इतिहासकार पुष्पेश पंत के सानिध्य में व्यतीत हुआ। राजकमल प्रकाशन समूह के आभासी मंच से ‘हासिल-बेहासिल से परे : इरफ़ान एक इंसान’ सत्र में इरफ़ान के व्यक्तित्व और फ़िल्मों से जुड़े कई किस्से साझा किए फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने। 29 अप्रैल की सुबह इरफ़ान ख़ान हमें छोड़ कर चले गए लेकिन उनकी याद हमारे साथ, हमारे मानस में अमिट है। फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान को याद करते हुए फ़ेसबुक लाइव के मंच से बताया कि “मुझे हमेशा लगता रहा है कि इरफ़ान हिन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री में मिसफिट थे। लेकिन, उन्हें यह भी पता था कि फ़िल्में ही ऐसा माध्यम है जो उनकी अभिव्यक्ति को एक विस्तार और गहराई दे सकता था इसलिए वे लगातार फ़िल्में करते रहे।“ इरफ़ान के जीवन की सरलता और सहजता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “ज़िन्दगी की छोटी चीज़ों का उन्हें बहुत शौक था। पतंगबाज़ी करना और खाने का शोक उन्हें नए व्यंजनों की ओर आकर्षित करता था। उन्हें खेती करना बहुत पसंद था। जब भी उन्हें समय मिलता तो वे शहर छोड़कर गाँव चले जाते थे।“ साहित्य के साथ इरफ़ान के रिश्ते को इसी से आंका जाता सकता है कि उनकी बहुत सारी फ़िल्में साहित्यिक रचनाओं पर आधारित हैं। इस विषय पर अपनी बात रखते हुए अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “थियेटर की पृष्ठभूमि से आने वाले इरफ़ान के जीवन में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान था। कई ऐसी साहित्यिक रचनाएं हैं जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी और वे चाहते थे कि कोई इसपर फ़िल्म बनाएं। वे खुशी से इन फ़िल्मों में काम करना पसंद करते। उदय प्रकाश उनके सबसे पसंदीदा लेखकों में से थे। उनकी रचनाओं के नाट्य रूपांतरण में उन्होंने काम भी किया था।“ इरफ़ान अपनी फ़िल्मों के किरदार पर बहुत मेहनत करते थे। पान सिंह तोमर, अशोक गांगूली या इलाहाबाद के छात्र नेता का किरदार, यह सभी इस बात का प्रमाण है कि वे अपने दर्शकों को उस स्थान की प्रमाणिकता से अभिभूत कर देते थे। अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “इरफ़ान के जीवन में उनकी पत्नी सुतपा का रोल बहुत महत्वपूर्ण है। एनएसडी के समय से दोनों दोस्त थे और सुतपा ने राजस्थान की मिट्टी से गढ़े इरफ़ान के व्यक्तित्व को निखारने और संवारने में अपना बहुत कुछ अर्पित किया है।“ अलगाव की स्थिति स्थाई नहीं होनी चाहिए – अशोक वाजपेयी अप्रैल का महीना समाप्त होने वाला है। 40 दिन से भी अधिक दिनों से हम एकांतवास में हैं। लेकिन आभासी दुनिया के जरिए हम दूसरे से जुड़े हुए हैं। गुरुवार की शाम राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने लोगों के साथ एकांतवास में जीवन एवं लॉकडाउन के बाद के समय की चिंताओं पर अपने विचार व्यक्त किए। आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर अशोक वाजपेयी ने कहा, “इन दिनों इतना एकांत है कि कविता लिखना भी कठिन लगता हैं। हालांकि यह एक रास्ता भी है इस एकांत को किसी तरह सहने का। यही मानकार मैंने कुछ कविताएं लिखीं हैं।“ अशोक वाजपेयी ने कहा कि यह कविताएं लाचार एकांत में लिखी गई नोटबुक है। लाइव सेशन में उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया– “घरों पर दरवाज़ों पर कोई दस्तक नहीं देता / पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता/ अथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य/ हलके से हठियाता है / हर दरवाज़े हर खिड़की को / मंगल आघात पृथ्वी का/ इस समय यकायक / बहुत सारी जगह है खुली और खाली/ पर जगह नहीं है संग-साथ की/ मेल-जोल की/ बहस और शोर की / पर फिर भी जगह है/ शब्द की/ कविता की/ मंगलवाचन की…” लॉकडाउन का हमारे साहित्य और ललित कलाओं पर किस तरह का और कितना असर होगा इसपर अपने मत व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कि श्रोता या दर्शक संगीत या नृत्य कला की रचना प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। लेकिन, आने वाले समय में अगर यह बदल गया तो यह कलाएं कैसे अपने को विकसित करेंगी? साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि, वो बिना कार्यक्रमों के जीवन यापन कैसे करेंगी? उनके लिए आर्थिक मॉडल विकसित कर उन्हें सहायता देना हमारी जिम्मेदारी है। जरूरत है इस संबंध में एकजुट विचार के क्रियान्वयन की। साहित्य में भी ई-बुक्स का चलन बढ़ सकता है।“ उन्होंने यह भी कहा, “कोरोना महामारी ने सामाजिकता की नई परिभाषा को विकसित किया है। लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन महामारी का यह असामान्य समय व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के संबंध को नई तरह से देखेगा। जब हम एक दूसरे से दूर- दूर रहेंगे, एक दूसरे को बीमारी के कारण की तरह देखने लगेंगे…तो दरार की संभावनाएं बढ़ जाएगीं। यह भय का माहौल पैदा करेगा। हमारा सामाजिक जीवन इससे बहुत प्रभावित होगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह अलगाव स्थायी न हो।“ लॉकडाउन है लेकिन हमारी ज़ुबानों पर ताला नहीं लगा है। इसलिए हमें अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का पूरा उपयोग करना चाहिए। हम, इस समय के गवाह हैं। साहित्यिक विमर्श के कार्यक्रम के तहत राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के मंच से रेखा सेठी ने स्त्री कविता पर बातचीत की। लाइव जुड़कर बहुत ही विस्तृत रूप में स्त्रियों पर आधारित कविताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि, “स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता की कविताएं सिर्फ़ स्त्रियों ने नहीं लिखे हैं, बल्कि हिन्दी साहित्य में बहुत ऐसे कवि हैं जिन्होंने हाशिए पर खड़ी स्त्री को अपनी कविता का केन्द्र बनाया है।“ उन्होंने बातचीत में कहा कि “जब स्त्रियों ने अपने मानक को बदलकर अपने आप को पुरूष की नज़र से नहीं, एक स्त्री की नज़र से देखना शुरू किया, अपनी बात को संप्रेषित करना शुरू किया तो वहीं बदलाव की नई नींव पड़ी।“   स्त्री कविता पर रेखा सेठी की दो महत्वपूर्ण किताब – स्त्री कविता: पक्ष और परिपेक्ष्य तथा स्त्री कविता: पहचान औऱ द्वन्द राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

Dakhal News

Dakhal News 5 May 2020


bhopal, Corona tragedy is over, Sir Ration is over. Ask for money from home

वाराणसी। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में लाकडाउन में राशन खत्म होने से परेशान छात्र ने जब प्रशासन के सक्षम अधिकारी को फोन करके कहा कि सर राशन खत्म हो गया है तो जवाब मिला घर से पैसे मंगा लो। यही नहीं, अधिकारी ने कहा कि सभी को मदद करना संभव नहीं है, केवल 1 फीसदी लोगों को मदद करने के लिए ही योजना है। छात्र ने कहा कुछ कीजिए सर हमे घर ही भिजवा दीजिए तो फोन काट दिया गया। दरअसल लाकडाउन के चलते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान संस्थान के छात्र रोशन पाण्डेय, विवेक उपाध्याय, सूर्यकान्त द्विवेदी और उनके साथी बनारस में ही फंस गए हैं। मूलतः बिहार के विभिन्न जिलों के निवासी इन छात्रों का कहना है कि उनके पास रखा अनाज पिछले एक महीने से जारी लाक डाउन के चलते खत्म हो गया है, पैसे की भी दिक्कत है। ऐसे में पिछले चार दिनों से वो जिला प्रशासन के अधिकारियों से सम्पर्क कर रहे हैं लेकिन उन्हें आगे का मोबाइल नंबर थमा कर टाला जा रहा है। उनकी समस्या को बाईपास किया जा रहा है। फोन करने पर फोन तक नहीं उठाया जा रहा है। आज खाद्य आपूर्ति विभाग के एक अधिकारी से जब उन्होंने मोबाइल से बात कर खाने में आ रही तकलीफ़ का जिक्र किया तो अधिकारी महोदय ने घर से पैसे मंगवाने की सलाह दे डाली। छात्रों का कहना है उन्हें तुंरत मदद की ज़रूरत है। प्रशासनिक अधिकारियों के रवैए से नाराज़ छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ट्वीट कर अपनी समस्या से अवगत कराया है।   बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

Dakhal News

Dakhal News 1 May 2020


bhopal, A train departed silently 1225 workers returning to their country

जिस वक्त यह खबर भड़ास4मीडिया पर अपलोड हो रही है, 1225 यात्रियों को लेकर एक स्पेशल ट्रेन पटरियों पर धड़ाधड़ दौड़ रही होगी. ये ट्रेन आज सुबह पांच बजे लिंगमपल्ली से चली है और रात ग्यारह बजे हटिया पहुंच जाएगी. इस ट्रेन का संचालन इस कदर गोपनीय रखा गया कि ट्रेन के टीटी को कल रात बारह बजे यानि ट्रेन चलते से ठीक पांच घंटे पहले बताया गया कि आपकी इस ट्रेन में ड्यूटी है, समय से पहुंच जाएं. इस स्पेशल ट्रेन का नंबर है 02704. बताया जाता है कि तेलंगाना सरकार के अनुरोध पर और रेल मंत्रालय के निर्देशानुसार लिंगमपल्ली (हैदराबाद) से हटिया (झारखंड) तक ये विशेष ट्रेन चलाई गई. ये स्पेशल ट्रेन गिस लिंगमपल्ली स्टेशन से चली है, वह सिकंदराबाद में पड़ता है. सिंकदराबाद आंध्रप्रदेश में है. इस ट्रेन के जरिए मजदूरों को उनके होम टाउन भेजा जा रहा है. इस ट्रेन के संचालन को लेकर जो सरकुलर जारी हुआ वह भड़ास के पास है. इसे नीचे दिया जा रहा है. इस ट्रेन के कुछ वीडियो फुटेज भी भड़ास के पास है जिसे आप नीचे देख सकते हैं.   इन 1225 मजदूरों के लिए आज मजदूर दिवस वाकई सुखद और ऐतिहासिक रहा. ये लोग आज के एक मई को कभी न भूलेंगे.

Dakhal News

Dakhal News 1 May 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

Dakhal News

Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

Dakhal News

Dakhal News 27 April 2020


bhopal, this period,retrenchment, your job is left , media

कैसे मीडिया इंडस्ट्री के लिए काल बना कोरोना वायरस – पार्ट (2) पिछली पोस्ट पर जो भी प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उनमें से सिर्फ दो जिक्र लायक हैं. पहली प्रतिक्रिया में किसी ने कहा है कि सभी सेक्टरों का हाल ऐसा ही है. दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया एक मझौले अखबार के संपादक महोदय की है. उन्होंने मीडियाकर्मियों की मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति के लिए बड़े मीडिया संस्थानों को जिम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक यह नैतिक भ्रष्टाचार का मसला है. हर साल सैकड़ों करोड़ का मुनाफा कमाने वाले मीडिया संस्थान क्या दो-तीन महीने भी अपने कर्मचारियों का ख्याल नहीं रख सकते? वो चाहते तो अपने कर्मचारियों का ख्याल रख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने की जगह अवसर का फायदा उठना सही समझा. वो खर्च कम करने के लिए छंटनी कर रहे हैं. वेतन में कटौती कर रहे हैं और लोगों को छुट्टियों पर भेज रहे हैं. पहली प्रतिक्रिया, जिसमें कहा गया है कि सभी उद्योग धंधे संकट से जूझ रहे हैं, इस दौर की एक कड़वी सच्चाई है. पिछले पोस्ट में मैंने इसका जिक्र किया था कि इस साल देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ निगेटिव रहने का अनुमान है. इस सीरीज में हम मीडिया पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए मोटे तौर पर बात इसी पर केंद्रित रखेंगे. लेकिन जब भी जरूरत महसूस होगी हम अर्थव्यवस्था के कुछ बुनियादी बदलावों की चर्चा भी करते रहेंगे. जहां तक संपादक महोदय की प्रतिक्रिया का सवाल है, वह एक आधी-अधूरी सच्चाई है. मसला इतना सीधा-सपाट नहीं हैं. चुनौती वाकई बड़ी है. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मीडिया इंडस्ट्री बीते कुछ साल से संकट से जूझ रही थी. नोटबंदी और आर्थिक मंदी की वजह से उसका मुनाफा पहले ही घटा हुआ था. लिहाजा संपादक जी की प्रतिक्रिया पर भी हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी मीडिया इंडस्ट्री में कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति पर गौर कर लेते हैं. उसके लिए सबसे पहले देश और दुनिया में मीडियाकर्मियों की छंटनी और वेतन कटौती से जुड़ी कुछ बड़ी घोषणाओं पर एक सरसरी नजर डालते हैं. पश्चिमी देश: 1) दुनिया के सबसे ताकतवर मीडिया समूह में से एक – डिजनी के चोटी के अधिकारियों ने 20-50 प्रतिशत तक वेतन कटौती का फैसला लिया. यह बड़ा फैसला है. 2) फॉक्स न्यूज को नियंत्रित करने वाली कंपनी फॉक्स कॉर्प ने 700 एक्जीक्यूटिव्स की तनख्वाह में कम से कम 15 प्रतिशत की कटौती की है. ऊपर के पदों पर यह कटौती और भी ज्यादा है. 3) लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स के सीईओ ने 30 प्रतिशत का सेलेरी कट लिया है. बोर्ड अफसरों की वेतन में 20 प्रतिशत कटौती हुई है. जबकि मैनेजर और संपादकों के वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती की गई है. 4) फॉर्चून मैगजीन ने 35 कर्मचारियों की छंटनी की है. सीईओ का वेतन 50 प्रतिशत कटा है. बाकी कर्मचारियों की तनख्वाह 30 प्रतिशत घटायी गई है. 5) ब्रिटेन के टेलीग्राफ मीडिया ग्रुप ने गैर संपादकीय विभाग के कर्मचारियों के काम का दिन घटा दिया है. अब उन्हें सप्ताह में सिर्फ 4 दिन का ही रोजगार मिलेगा. लिहाजा उनका वेतन 20 प्रतिशत काट दिया गया है. ये विकसित देशों के कुछ बड़े और सम्मानित मीडिया संस्थानों की मौजूदा स्थिति है. खबरों के मुताबिक ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या बहुत ज्यादा है जिन्होंने छंटनी की है, कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजा है या फिर वेतन में कटौती की है. कुछ संस्थानों ने इनमें से दो या फिर सभी तीन कदम उठाए हैं. ये शुरुआती आंकड़े हैं. विस्तृत लिस्ट के लिए आप इन दो लिंक्स में से किसी एक पर क्लिक कर सकते हैं: https://www.forbes.com/sites/noahkirsch/2020/04/06/tracker-media-layoffs-furloughs-and-pay-cuts/ भारत: 1) देश में सच्ची पत्रकारिता की मशाल जिंदा रखने का दावा इंडियन एक्सप्रेस समूह करता है. ये समूह हर साल लाखों रुपये गोयनका अवार्ड के नाम पर बांटता है. इस समूह ने वेतन कटौती का फैसला सबसे पहले लिया. यहां अस्थाई तौर पर कर्मचारियों के वेतन में 10 से 30 प्रतिशत की कटौती की गई है. 2) देश का सबसे बड़ा और ताकतवर अंग्रेजी मीडिया समूह टाइम्स ऑफ इंडिया है. विज्ञापन और अन्य तरीकों से इसको जितने पैसे मिलते हैं, उतना पैसा कोई और मीडिया समूह नहीं कमाता है. इस समूह ने अपनी संडे मैगजीन के सभी कर्मचारियों को एक झटके में नौकरी से निकाल दिया. जैसे वो कर्मचारी नहीं शत्रु हों. बाकी जगह भी कटौती का प्रस्ताव है. 3) हिंदुस्तान टाइम्स के टॉप मैनेजमेंट ने खुद ही 25 प्रतिशत वेतन कटौती का प्रस्ताव दिया है. 4) एनडीटीवी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में 10 से 40 प्रतिशत तक की कटौती का फैसला लिया है. ये स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनी है, इसलिए इसे अपने फैसलों के बारे में सेबी को बताना होता है. सेबी को कंपनी ने बताया है कि यह फैसला पहले क्वार्टर के लिए है. उसके बाद इस पर फिर से विचार होगा. 5) मीडिया ग्रुप क्विंट तो इस समय वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. उसने अपने आधे कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया है. 50 हजार से ऊपर जिनकी भी तनख्वाह है उसमें 50 प्रतिशत की कटौती की है. लेकिन इसमें एक ख्याल रखा गया है कि 50 हजार से ऊपर की तनख्वाह वालों को कटौती के बाद भी कम से कम 50 हजार रुपये मिलते रहें. दो लाख रुपये से ऊपर वेतन वाले सभी कर्मचारियों को उनकी सीटूसी का सिर्फ 25 प्रतिशत ही भुगतान होगा. यह फैसला हालात सामान्य होने पर वापस ले लिया जाएगा. 6) न्यूज नेशन ने अपनी अंग्रेजी वेबसाइट पर तैनात 16 कर्मचारियों की पूरी टीम को एक झटके में विदा कर दिया है. वहां अन्य भी जगह पर छंटनी और कटौती की तलवार लटक रही है. 7) इंडिया न्यूज समूह में बीते कई महीने से कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिल रही थी. यह हाल कोरोना वायरस से पहले का था. अब वहां क्या होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. 8) पत्रिका समूह ने अपने यहां पर कर्मचारियों की तनख्वाह ही रोक दी है. एक खबर के मुताबिक सभी को सिर्फ 15-15 हजार रुपये का ही भुगतान किया गया. 9) हरिभूमि अखबार में 30 प्रतिशत तक कटौती की गई है. अधिक जानकारी के लिए आप इन लिंक्स पर क्लिक कर सकते हैं: https://www.exchange4media.com/coronavirus-news/media-houses-sanction-layoffs-pay-cuts-amid-covid-19-crisis-103948.html https://www.coverageindia.com/2020/04/30-50.html ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले जानते हैं कि कोई भी संस्थान ऐसा नहीं है जो अछूता है. सभी जगह से छंटनी, छुट्टी पर भेजे जाने और वेतन कटौती की खबरें आ रही हैं. जिनकी नौकरियां बची हैं, उन्हें यह अहसास कराया जा रहा है कि वो खुशकिस्मत हैं. इसलिए ज्यादा चू-चपड़ नहीं करें, वरना उन्हें भी छांटा जा सकता है. कुछ मीडिया संस्थानों ने मार्च में ही ये फैसला लागू कर दिया है. कुछ इसे अप्रैल महीने से लागू कर रहे हैं. जो बचे हैं संकट जारी रहा तो वो भी ऐसा करने पर मजबूर हो जाएंगे. ज्यादातार मीडिया संस्थान इसे अस्थाई निर्णय बता रहे हैं. मगर कुछ ने ऐसा कोई इशारा नहीं किया है. मतलब वहां यह फैसला स्थाई भी हो सकता है. अतीत में ऐसे कई उदाहरण हमारे पास मौजूद हैं. कुछ बुनियादी सवाल- आखिर मीडिया कंपनियां वेतन कटौती और छंटनी क्यों कर रही हैं? जैसा कि एक मझौले अखबार के संपादक ने कहा है… क्या ये महज नैतिक भ्रष्टाचार का मामला है? या फिर संकट सच में बड़ा है? और संकट बड़ा है तो कितना बड़ा है? इससे मीडिया की संरचना पर क्या फर्क पड़ेगा? मीडिया के कौन-कौन से धड़े सबसे अधिक प्रभावित होंगे? मतलब प्रिंट, टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया में किस-किस तरह के बदलाव होंगे? इससे मीडिया की आजादी पर क्या असर पड़ेगा? पत्रकारों की स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा? मीडिया पर स्टेट कंट्रोल बढ़ेगा या घटेगा? स्टेट कंट्रोल का अर्थ क्या है? कॉरपोरेट-पॉलिटिकल नेक्सस किस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी (फ्रीडम ऑफ स्पीच) नियंत्रित करता है? जब भी कोई मंदी या आर्थिक रुकावट आती है तो उससे मीडिया और पत्रकारों की आजादी पर किस तरह का फर्क पड़ता है? ये कुछ बुनियादी सवाल हैं. इन सवालों पर हम आने वाले दिनों में एक के बाद एक चर्चा करेंगे. लेकिन इन बुनियादी सवालों पर चर्चा करने के साथ हम कुछ और सवालों पर भी चर्चा करेंगे. मसलन इन बदलावों से मीडिया के फ्रंट लाइन पर किस तरह का असर होगा? वो पत्रकार जो जमीन पर काम कर रहे हैं, अपनी जान दांव पर लगा कर काम कर रहे हैं, उनकी सेहत पर कितना असर पड़ेगा? वो पत्रकार जो ईमानदार हैं और किसी तरह दो जून की रोटी कमा रहे हैं, वो कैसे जिंदा रहेंगे और अपनी जिम्मेदारियां को पूरा करेंगे? यहां एक बात हम सभी को ध्यान रखनी चाहिए कि आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलेगा. कोरोना वायरस का कहर जब थमेगा तो दुनिया पहले जैसे नहीं रहेगी. हम और हमारी दुनिया सीखेगी, उदार होगी इसकी संभावना कम है. आशंका ज्यादा इस बात है कि जो अधिकार, जो आजादी लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई थी, वो अधिकार छीने जा सकते हैं, वो आजादी कम हो सकती है. यह एक बहुत बड़ा सच है कि जो आर्थिक तौर पर गुलाम है, वो सियासी तौर पर आजाद नहीं हो सकता. और हमारे यहां मीडिया को ठीक उसी तरह विकसित किया गया, जैसे किसी गुलाम को खिला-पिला कर किसी युद्ध के लिए तैयार किया जाता है. (जारी) एनडीटीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे बेबाक पत्रकार समरेंद्र सिंह का विश्लेषण! 

Dakhal News

Dakhal News 27 April 2020


bhopal, How Corona Virus Part 1 Called for Media Industry

समरेंद्र सिंह किसी भी व्यवस्था में पूंजी का खास महत्व होता है, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में इसका महत्व अत्याधिक है. अमेरिकी प्रोफेसर डेविड हार्वे के मुताबिक जिस प्रकार हमारे शरीर को संचालित करने के लिए खून का संतुलित और निरंतर प्रवाह जरूरी है, ठीक वैसे ही पूंजीवादी व्यवस्था में “पूंजी का प्रवाह” महत्वपूर्ण है. पूंजी का प्रवाह जब भी रुकता है, व्यवस्था चरमराने लगती है. कोविड-19 ने ये प्रवाह बहुत हद तक रोक दिया है. पूरी दुनिया की व्यवस्था गड़बड़ा गई है. बड़ी-बड़ी कंपनियों की भी हालत खराब है. सब सरकार से पैकेज की आस लगाए बैठे हैं. यह हाल तो अभी का है. महामारी कुछ महीने और चली तो जो व्यवस्थाएं पूरी तरह पूंजीवादी हैं, वहां अराजक स्थिति हो सकती है. इसलिए दुनिया भर में इस पर शोध हो रहे हैं कि असर कितना होगा और दुनिया का सत्ता समीकरण किस हद तक परिवर्तित होगा. इसी सच्चाई को केंद्र में रख कर मैंने मीडिया पर यह सीरीज लिखने का फैसला लिया है. इसका मकसद जहां तक संभव हो सके सभी तथ्यों को एक जगह पर रखना है.ताकि जिसे ठीक लगे वो भविष्य में उनका इस्तेमाल कर सके. विश्व में मीडिया के दो मॉडल मौजूद हैं. सरकारी मीडिया और निजी क्षेत्र का मीडिया यानी स्वतंत्र मीडिया. कुछ दिन पहले मीडिया मोनेटाइजेशन पर हुए एक सेमीनार में किसी ने पूछा कि दूरदर्शन को कैसे मोनेटाइज किया जाए यानी ऐसा बना दिया जाए जिससे दूरदर्शन मुनाफा कमाने लगे? मैंने कहा कि दूरदर्शन को मोनेटाइज नहीं करना चाहिए. दूरदर्शन को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और उसके आर्थिक हितों का ख्याल सरकार को रखना चाहिए. हम सभी अपने श्रम से अर्जित धन का ज्यादातर हिस्सा बुनियादी जरूरतों पर खर्च करते हैं. सरकार से संदर्भ में भी यह बात लागू होती है. उसे तो टैक्स से होने वाली आमदनी को जनता और शासन की जरूरतों पर ही खर्च करना चाहिए. संवाद तंत्र, सूचना तंत्र किसी भी शासन तंत्र की एक बुनियादी जरूरत है. मोनेटाइज करने के लिए, मुनाफा कमाने के लिए या फिर स्वतंत्र संचालन योग्य पूंजी अर्जित करने के लिए सरकारी मीडिया को भी बाजार की शर्तों का पालन करना होगा. जब बाजार की शर्तों का पालन होगा तो सरकार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों से समझौता करना पड़ेगा. ऐसा करने से उसका चरित्र बदल जाएगा. चरित्र बदलने का अर्थ है कि उसका औचित्य खत्म हो जाएगा. उसकी सार्थकता खत्म हो जाएगी. जब चरित्र बदल जाए और सार्थकता खत्म हो जाए तो फिर होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. कोई भी सरकार अपना मीडिया तंत्र एक खास मकसद से विकसित करती है. यह सरकार के लिए जनता तक पहुंचने का महज जरिया मात्र नहीं है. यह सरकार का प्रोपैगेंडा तंत्र भी है. इसे समझने के लिए आपको मौजूदा समय पर गौर करना होगा. दूरदर्शन पर रामायण, रामायण उत्तरकथा, महाभारत, चाणक्य, हमलोग जैसे सीरियल यूं ही नहीं दिखाए जा रहे हैं. यह सरकारी प्रोपैगेंडा है. सरकार अपने मीडिया के जरिए अपनी जरूरत के मुताबिक जनता का मानस तैयार करती है. यही नहीं इसके माध्यम के यह अपने लोगों को संरक्षण देती है. उन्हें वो जमीन मुहैया कराती है जिससे वो उसके पक्ष में लड़ सकें. और जब तक सरकार का यह मकसद पूरा होता रहेगा, सरकारी मीडिया पर बहुत असर नहीं पड़ेगा. वहां तैनात लोग थोड़े-बहुत एडजस्टमेंट यानी समायोजन के बाद अपना काम करते रहेंगे. इसके उलट निजी क्षेत्र में मूल-चूल परिवर्तन होगा. लाखों लोग अभी ही बेरोजगार हो चुके हैं. लाखों और बेरोजगार होंगे. जब यह महामारी खत्म होगी तो हम देखेंगे कि बहुतेरे मीडिया संस्थान बंद हो चुके हैं. और जो बचेंगे उनकी भी कमर टूट चुकी होगी. इस समय सबसे खराब स्थिति पारंपरिक मीडिया संस्थानों की है. वहां हाहाकार मचा है. बीते डेढ़ महीने से सिनेमा सेक्टर में काम ठप है. फिल्म प्रोडक्शन बंद है. इवेंट्स बंद हैं. आउटडोर मीडिया का बाजार ठप्प पड़ा है. होर्डिंग, बैनर को कोई पूछ नहीं रहा. अखबारों की छपाई न के बराबर हो रही है. मीडियाकर्मी जान जोखिम में डालकर लोगों तक खबर पहुंचाने में जुटे हैं, लेकिन उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है. वो हर तरफ से मार झेल रहे हैं. जान भी संकट में है और आर्थिक तौर पर भी कमजोर हो रहे हैं. सच कहें तो खबरों के बाजार से जुड़े मीडियाकर्मियों के लिए तो यह एक डरावने सपने जैसा है और यह सपना अभी शुरू ही हुआ है. दूसरी तरफ न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या बढ़ गई है. आजतक जैसे चैनल 33 करोड़ दर्शक बटोरने का दावा कर रहे हैं. कॉमस्कोर डेटा के मुताबिक डिजिटल मीडिया पर अब 60 प्रतिशत ज्यादा दर्शक हैं. ये नंबर उत्साहित करने वाले हैं. हर कोई टीवी देख रहा है. मोबाइल स्क्रीन से चिपका हुआ है. ऑनलाइन गेम खेल रहा है. ओटीटी प्लैफॉर्म्स पर फिल्म या फिर सीरियल देख रहा है. खबर पढ़ रहा है. मतलब टीवी और ऑनलाइन माध्यमों पर हम सभी ज्यादा से ज्यादा समय बिता रहे हैं. सामान्य समय होता तो विज्ञापन बाजार के जुड़े लोगों के लिए इससे अधिक सुखद स्थिति कोई और नहीं हो सकती थी. लेकिन यह आपातकाल है. इतना दर्शक बटोरने के बाद भी रेवेन्यू गिर गया है. यह गिरावट मामूली नहीं है. 40-50 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है. ऐसा क्यों हुआ है – ये समझने के लिए आपको कोरोना वायरस की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को देखना होगा. दुनिया की तमाम रेटिंग और फंडिंग एजेंसियों ने जो आंकड़े दिए हैं उनके मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से इस साल भारत की अर्थव्यवस्था विकास दर 0.8 प्रतिशत तक गिर सकती है. साल की शुरुआत में आरबीआई ने 2020-21 वित्तीय वर्ष में 6 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया था, उसने बीते महीने इसे घटा कर 5.5 प्रतिशत कर दिया था. आईएमएफ ने 5.8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान घटा कर 1.9 प्रतिशत, विश्व बैंक ने 5 से 1.5 प्रतिशत, मूडी ने 5.4 से 2.5 और फिंच ने 5.6 से 0.8 प्रतिशत कर दिया है. 6 प्रतिशत ग्रोथ रेट की तुलना में 0.8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान डराता है. असली तस्वीर तीसरे क्वार्टर में उभरेगी. अगर यह लॉकडाउन मई के आखिर तक चला तो इस साल ग्रोथ निगेटिव हो सकती है. कुछ जानकारों के मुताबिक अगर सर्दियों में भी कोरोना वायरस का कहर जारी रहा तो 8-10 प्रतिशत निगेटिव ग्रोथ की आशंका है. रोजगार के लिहाज से यह एक खतरनाक स्थिति है. आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 1.2 करोड़ श्रमिक तैयार हो रहे हैं. जबकि सिर्फ 55 लाख रोजगार सृजन हो रहा है. यही नहीं शोध के मुताबिक भारतीय संदर्भ में 5 प्रतिशत ग्रोथ रेट के लिए अतिरिक्त वर्क फोर्स की जरूरत नहीं होती है. मतलब उससे कम ग्रोथ रहने पर रोजगार सृजन नहीं होता है. निगेटिव ग्रोथ का मतलब है कि इस साल जो वर्क फोर्स तैयार होगी, उसमें से चुनिंदा खुशकिस्मत लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी को काम नहीं मिलेगा और पिछले साल जितनी संख्या में लोग काम कर रहे थे, उस संख्या में भी गिरावट आ जाएगी. मतलब करोड़ों लोग बेरोजगार होंगे. इसके नतीजे बहुत बुरे होंगे. सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी. अपराध बढ़ेगा. तनाव बढ़ेगा तो मौत के आंकड़े बढ़ेंगे. मतलब नुकसान चौतरफा होगा. मीडिया इंडस्ट्री के लिए तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी. (… जारी)   एनडीटीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे बेबाक पत्रकार समरेंद्र सिंह का विश्लेषण! 

Dakhal News

Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Humble tribute to two Delhi journalists

नई दिल्ली। वैश्विक महामारी करोना संक्रमण के इस लॉकडाउन की घड़ी में आज राष्ट्रीय राजधानी के पत्रकार बिरादरी से दो अत्यंत दुखद सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। वरिष्ठ हिंदी पत्रकार प्रमोद कुमार जी की पत्नी नीलिमा जी का निधन हुआ है। वह स्वयं भी यूनीवार्ता में पत्रकार थीं। उन्होंने अपने कैरियर के दौरान कई ब्रेकिंग खबरें अपने पत्रकारिता के जीवन में दी है। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रही थीं। दूसरी मृत्यु हिंदी दैनिक पंजाब केसरी से अपना कैरियर कैमरामैन के रूप में शुरू करने के बाद फ़ोकस न्यूज के संपादक के सम्मानित पद पर पहुंचे चंद्रशेखर अग्रवाल जी की हुई है। चंद्रशेखर जी एक होनहार पत्रकार थे और लगातार संसद से लेकर तमाम राजनीतिक गलियारों में उनका आना-जाना था। उनका हंसता मुस्कराता चेहरा बार-बार सामने आ रहा है। उन्होंने मेरे साथ लंबे समय तक कार्य किया था। चंद्रशेखर जी की उम्र अधिक नहीं थी। वह लगातार मधुमेह (शुंगर) की बीमारी से जूझ रहे थे और अंततः मधुमेह बहुत बढ़ जाने के कारण उनका निधन कल शाम को हो गया। ‘दिल्ली पत्रकार संघ’ दोनों पत्रकार साथियों के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सर्वविदित है कि कोरोना महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन के तहत अंत्येष्टि में सभी पत्रकारों का शामिल होना संभव नहीं था। बिहार का राष्ट्रीय राजधानी के तमाम पत्रकारों ने अपने शोक संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। इस दुख एवं शोक की घड़ी में ‘डीजेए’ के तमाम सदस्यों एवं पदाधिकारियों की ओर से महासचिव केपी मलिक ने उनके परिवार को सहानुभूति एवं संवेदनाएं अर्पित करते हुए भगवान से उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की। के पी मलिक महासचिव

Dakhal News

Dakhal News 25 April 2020


bhopal, Investigation report , 48 journalists, Lucknow ,corona positive

यूपी में लखनऊ के पत्रकारों के कोरोना टेस्ट का रुझान आना शुरू हो गया है। पहली लिस्ट में 48 पत्रकारों का नाम है जिसमें एक को छोड़ बाकी सबका रिजल्ट निगेटिव है। लिस्ट में एक पत्रकार का जांच नतीजा पॉज़िटिव आया है। बताया जा रहा कि जिनका टेस्ट रिजल्ट पॉजिटिव आया है वो पत्रकार नहीं बल्कि केबल ऑपरेटर हैं, यानि हैं मीडिया फील्ड से जुड़े ही।   देखें लिस्ट की एक झलक-

Dakhal News

Dakhal News 25 April 2020


bhopal,Supreme Court, bans ,Arnab

अर्नब गोस्वामी के ऊपर हुई सभी FIR में किसी भी तरह की कार्रवाई पर सुप्रीम शाखा ने फिलहाल 2 हफ्ते की रोक लगाई। कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी को अपनी अर्ज़ी में संशोधन कर सभी FIR को एक साथ जोड़े जाने की प्रार्थना करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि एक ही मामले की जांच कई जगह नहीं हो सकती।   सुप्रीम कोर्ट का आदेश अर्नब गोस्वामी को दो हफ़्ते का प्रोटेक्शननागपुर में दर्ज FIR के सिवा बाक़ी सभी पर स्टे अर्नब पर प्रोग्राम्स में किसी क़िस्म की रोक के सुप्रीम कोर्ट ख़िलाफ़ (प्रेस आजाद रहे , जस्टिस चंद्रचूड़) अर्नब निचली अदालतों में एंटीसिपेटरी बेल / प्रोटेक्शन ट्राई करें , जाँच में सहयोग करें महाराष्ट्र पुलिस अर्नब गोस्वामी के चैनल और स्टाफ़ की किसी संभावित हमले से सुरक्षा करें

Dakhal News

Dakhal News 25 April 2020


bhopal, attack is reprehensible, arnab , name of journalism , very shameful

Amitaabh Srivastava : रिपब्लिक चैनल के संपादक अरनब गोस्वामी पर हमला निंदनीय है। पिछले कुछ समय से पत्रकारिता के नाम पर वो जो कुछ भी कर रहे हैं, वह बहुत शर्मनाक है। अरनब गोस्वामी और उनके जैसे कुछ एंकर दरअसल पिछले कुछ समय से मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर स्वस्थ और स्वच्छ पत्रकारिता को कलंकित ही कर रहे हैं लेकिन उस सबका जवाब किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा नहीं हो सकती। अरनब ने पालघर में साधुओं की पीट-पीटकर हत्या के बाद अपने कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन पर हमला इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार को इस मामले में कड़ी जांच-पड़ताल और कार्रवाई करनी चाहिए। उम्मीद के मुताबिक बीजेपी और उसके समर्थक अरनब गोस्वामी के समर्थन में बोल रहे हैं और इस हमले की निंदा के बहाने कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं।   मेरी राय में कांग्रेस को भी बड़प्पन दिखाते हुए इस हमले की निंदा करनी चाहिए‌। अरनब गोस्वामी पत्रकारीय अभिव्यक्ति की आज़ादी के आदर्श नहीं है , न ही उन्हें इस हमले के बहाने हीरो बनने का मौक़ा देना चाहिए।   वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 23 April 2020


bhopal, Who will raise voice ,media persons , victims of lockdown

भारत के कनाडाई नागरिक अक्षय कुमार ने जब 25 करोड़ दान देने का एलान किया तो तुमने उन्हें सदी का सबसे बड़ा दानदाता घोषित किया। सिल्वर स्क्रीन के दबंग और बॉक्स ऑफिस के सुल्तान सलमान खान ने जब फिल्मनगरी के दिहाड़ी मजदूरों का पेट भरने की घोषणा की तो तुम्हारे शब्दों में सलमान से बड़ा कोई दलायु, कृपालु नहीं था। और जब कsssकsssकsss किंग यानी शाहरुख खान ने अपने ऑफिस को 14 दिनों के एकांतवासियों के लिए क्वारंटिन भवन बना दिया…तो तुम्हारे शब्दों में उसकी महिमा और भी शोभायमान हो गई। अमिताभ बच्चन की वीआर फैमिली के सदस्य बनने में भी तुम्हीं सबसे आगे थे। उद्योगपतियों की दानराशियों के आकर्षक ग्राफिक्स से लेकर, उनके ट्विट, वीडियो संदेश के बॉक्स आइटम बनाने में अपनी कल्पनाशीलता और ऊर्जा का उपयोग करने में तुमने ही सबसे अधिक पसीने बहाये। इसके बावजूद तुम बेगाने की शादी के अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे। क्योंकि तुम्हारी ड्यूटी थी, जैसेकि सीमा पर सैनिक, अस्पताल में डॉक्टर, चौराहे पर खाकीवर्दी या कि घर घर सिलेंडर और हरी सब्जियां पहुंचाने वालों ने रोजमर्रा की जिंदगी और ज़िद नहीं छोड़ी थी। इतना ही नहीं, अपने-अपने गांव, घर जाने के उतावले हुए सड़कों पर पैदल रेंगने वाले दिहाड़ी मिल्खा सिंहों के हुजूम को भी तुमने सदी का सबसे ‘रिच विजुअल’ समझा और उसे कभी लाइव काटा तो कभी म्यूजिक के साथ मोंटाज में सजाया तो कभी उस पर राष्ट्रीय बहसें कर लीं और तब तक लूप में चकरघिन्नी की तकह घुमाते रहे जब तक कि उसके बारे में सत्ताधारियों के अनमोल वचन नहीं आ गए। यकीन मानिये उतने पर भी तुम बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे। क्योंकि तुम्हारी कलम को खून के आंसू बहाने की लत है। तुम्हारे कलेजे को चट्टानी काया बनने का बड़ा शौक है। तुम्हारी फितरत को संवेदना से एकतरफा मोहब्बत करने की आदत है। याद करो तुमने ही चलाया न इस वक्त की सबसे बड़ी खबर है–प्रधानमंत्री ने कारोबारी जगत के स्वामियों से अपील की है कि कोरोना संकट को देखते हुए किसी कर्मचारी की सैलरी ना काटे। तुमने ही इस बयान को सत्तर साल का सबसे संवेदनशील बयान बताया था न! स्क्रीन पर दनादन चलाया था न! और तो और जब प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन के चलते किसी भी कर्मचारी की नौकरी ना जाये तो तुमने ही इसे सदी का सबसे मसीहाई स्टेटमेंट कहा था न! और सबके सब लट्टू हो गये थे। उत्साह इतना कि नौ मिनट के बदले नब्बे मिनट तक दीया जलाते रहे। जोश इतना कि ताली, थाली तो क्या बंदूक, पिस्तौल सब चलाने लगे। उन्होंने कहा लोग अपने अपने घरों में रहे लेकिन खून इतना खौला कि गली में जुलूस निकालने लगे। इन सब तस्वीरों को खूब चलाया न तुमने। यह दर्शाया न कि प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर इस देश की जनता को भी हनुमान जैसी भूली बिसरी ताकत याद आने लगती है। लेकिन क्या कभी फॉलोअप किया कि प्रधानमंत्री के सैलरी और नौकरी वाले बयान और अपील का किस-किस बिजनेस घराने ने पालन किया? क्या कभी इस मुद्दे पर बहस कराई कि जब प्रधानमंत्री समाज में सभी को मिलकर रहने की अपील करते हैं तो लोगों पर उसका असर क्यों नहीं होता है? क्यों तमाशा वाले बयान को भक्त जल्दी लपक लेते है और उनके सामाजिक सन्देश को गोलगप्पे की तरह उड़ा देते हैं। क्या कभी इस मुद्दे पर मेहमानों से बयानबाजी करवाई कि ताली, थाली के बदले बंदूक क्यों चलाई गई? क्या कभी इस सवाल की प्लेट को स्क्रीन पर फायर किया कि सरकार और रिजर्व बैंक के राहत एलान के बावजूद उद्योग, कारखाने के मालिक अपने-अपने कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं ले रहे? क्यों कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं? क्यों मालिक कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं? मैं जानता हूं इन सवालों को आप नहीं उठायेंगे। आप यह भी नहीं पूछेंगे कि जिस वक्त प्रधानसेवक लिट्टी चोखा खा रहे थे और और जब देश ट्रंपमय हो रहा था तब उसकी तस्वीर न्यूज मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में अवतारी पुरुष की तरह छाई हुई थी उस वक्त कोरोना किस किस देश में कितनी दहशत मचा रहा था और अपने देश में उससे बचाव के लिए क्या-क्या किया जा रहा था? आप कम से कम यह भी नहीं लिखेंगे कि होली से पहले ही देश में एक दिन का जनता कर्फ्यू क्यों नहीं लग जाना चाहिये था? और तो और यह कि जनता कर्फ्यू के एक दिन बाद ही संपूर्ण लॉकडाउन क्यों हो गया…? जब लॉकडाउन करना ही था तो जनता कर्फ्यू क्यों? आप के पास यह सवाल भी नहीं होगा कि ताली, थाली बचाने और दीया जलाने से देश को क्या मिला? जबकि आप इस तरह के सवालों पर पहले खूब बहसें करते रहे हैं। पीएम की अपीलों के बाद सिवाय अनुशासनहीनता की तस्वीरों और लाखों लाख की संख्या में वीडियो के आदान प्रदान के कारण इंटरनेट की फिजूल डेटाखर्ची के सिवा और क्या मिला? इन आयोजनों में दिखी अनुशासनहीनता की तस्वीरों को आप किस पंथ या संप्रदाय से जोड़ेंगे? मैं समझता हूं आप ये सब नहीं पूछेंगे क्योंकि जेनुइन सवाल को इन दिनों सरकार विरोधी माना जाता है। और सरकार विरोधी छवि होने पर दर्शक और पाठक कम होते हैं और विज्ञापन गिरने का खतरा बढ़ता है। खैर छोड़िये…ये सवाल बहुतों के लिए शायद छोटा मुंह बड़ी बात हो। लेकिन चलिये अपने बारे में या अपने हित को लेकर खुद से ही कुछ सवाल पूछ लीजिये। मीडिया जगत पढ़ा लिखा तबका है इसलिये यहां ‘दिहाड़ी मजदूर’ शब्द का इस्तेमाल शायद बहुत लोगों को अच्छा न लगे, उनके लिए चलिये ‘ठेका कर्मचारी’ कह लेते हैं। कोरोना के बाद हजारों की संख्या में पत्रकार बंधु घर से काम कर रहे हैं। लेकिन जो बेरोजगार हैं, किसी संस्थान से संबद्ध नहीं हैं…फ्रीलांस से घर चला रहे थे, क्या फिल्म इंडस्ट्री की तरह किसी संगठन या नामचीन हस्ती ने उनकी मदद के लिए एलान किया? जिस सरकार की योजनाओं और बयानों पर जान न्योछावर करते रहे, सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए प्रचार प्रसार करते रहे, उस सरकार की तरफ से किसी योजना या पैकेज का ऐलान हुआ? कितने बेरोजगार या फ्रीलांस पत्रकारों को मदद मिली? है कोई आंकड़ा? शायद नहीं। अपने रिसर्च विभाग को इस काम में लगाइए। जब तक कोई आंकड़ा निकले तब तक यह विचार कर लीजिए कि इस खबर को चलायेगा या छापेगा कौन? सोशल मीडिया पर भी लिखेंगे तो लोग आप ही को हिकारत की नज़रों से देखेंगे और दया भावना में कहेंगे – कितना ‘गिरा’ हुआ है? बहुत से लोग इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश भी करार देंगे और कन्नी काट लेंगे। लेकिन जो ‘उठे’ हुये हैं…चलिये उन्हीं के बारे में बात कर लेते हैं। मीडिया ने ही प्रधानमंत्री के उस बयान को प्रमुखता से चलाया न कि उन्होंने कारोबारी जगत से कहा है कि किसी की नौकरी न जाये! लेकिन अब कोरोना और ल़ॉकडाउन के चलते कई मीडिया हाउसों में छंटनी और बंदी शुरू हो गई, उसके बारे में क्या किसी ने सोचा या सवाल उठाया…? हर दूसरे तीसरे दिन सुनने को मिलता है फलां मीडिया संस्थान में इतने फीसदी स्टाफ कम किये जा रहे हैं या कर दिये गये। इसको लेकर किसी ने प्रधानमंत्री से कहा? शायद इसकी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मेंढ़क खुद को बड़े बुद्धिमान समझते हैं और उन्हें तराजू पर एकजुट रखा नहीं जा सकता।   -एक मीडियाकर्मी

Dakhal News

Dakhal News 23 April 2020


bhopal, Rajkamal Publishing Group,sharing literary works, through WhatsApp

नई दिल्ली। कोरोना महामारी के इस अंधेरे समय में राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से लगातार यह कोशिश है कि लॉकडाउन में लोग अपने-आप को अकेला महसूस न करें। कोरोना महामारी में हमारी लड़ाई दो तरफा है शारीरिक और मानसिक। घर पर रहकर अपना पूरा ध्यान रखते हुए, हम इस लड़ाई में समाज और देश के हित में सहायक कदम उठा रहे हैं। वहीं मानसिक रूप से अपने को मजबूत करना भी हमारी ज़िम्मेदारी है। इसी प्रयास के तहत राजकमल प्रकाशन के साथ Stay At Home With Rajkamal कार्यक्रम के अंतर्गत साहित्यकारों, रंगकर्मियों, अभिनेताओं और गीतकारों से रोज़ फ़ेसबुक लाइव के जरिए मुलाक़ात होती है। इस सार्थक पहल के बाद अब राजकमल प्रकाशन लेकर आया है ‘पाठ-पुनर्पाठ’ पुस्तिका। इसके तहत राजकमल प्रकाशन के आधिकारिक वाट्सएप्प नंबर से रोज़ कहानियाँ, कविताएं और लेख पाठकों से साझा किए जाएंगे। रोज़ अलग-अलग साहित्यिक कृतियों को एक जगह पीडीएफ में तैयार कर उसे पाठकों से साझा किया जाएगा। 18 अप्रैल की रात पहली पुस्तिका साझा की गई। आगे, 3 मई 2020 तक प्रतिदिन यह पुस्तिका पाठकों से साझा की जाएगी। इस पहल के बारे में बताते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, “सभी के लिए मानसिक खुराक उपलब्ध रहे, यह अपना सामाजिक दायित्व मानते हुए अब हम ‘पाठ-पुनर्पाठ’ पुस्तिकाओं की यह श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। ईबुक और ऑडियोबुक डाउनलोड करने की सुविधा सबके लिए सुगम नहीं है। इसलिए हम अब व्हाट्सएप्प पर सबके लिए नि:शुल्क रचनाएँ नियमित उपलब्ध कराने जा रहे हैं। जब तक लॉक डाउन है, आप घर में हैं लेकिन अकेले नहीं हैं। राजकमल प्रकाशन समूह आपके साथ है। भरोसा रखें।“ इस पुस्तिका को पाठक वाट्सएप्प से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए राजकमल प्रकाशन समूह के व्हाट्सएप्प नम्बर 98108 02875 को फोन में सुरक्षित कर, उसी नम्बर पर अपना नाम लिखकर मैसेज भेज दें। आपको नियमित नि:शुल्क पुस्तिका मिलने लगेगी। राजकमल प्रकाशन समूह अपनी पूरी प्रतिबद्धता के साथ लॉकडाउन के इस समय में पाठकों के लिए हमेशा कुछ नया करने की कोशिश कर रहा है। 22 मार्च से लगातार चल रहे लाइव कार्यक्रमों के जरिए समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर लेखक और साहित्यप्रेमी लोगों से किताब और कला की बातें करते हैं। 90 से ज्यादा लेखक और साहित्य प्रेमी लाइव कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं।   प्रेस रिलीज

Dakhal News

Dakhal News 21 April 2020


bhopal, Media Vigil, turned out, show mirror,corporate media

कॉरपोरेट मीडिया को आईना दिखाने निकला मीडिया विजिल तो कॉरपोरेट का बाप निकला। ऐसी मनमानी तो एक से एक घाघ मीडिया घराने नहीं करते। मै मशहूर चिंतक आनंद स्वरूप वर्मा का एक लेख खोज रहा था। जब बहुत देर तक खोजने के बाद भी उनका लेख नहीं मिला तो मैंने पड़ताल की। पता चला मीडिया वीजिल के मालिकों ने हर उस स्तंभकार का नाम उड़ा दिया है जो उनको मालिक की तरह नहीं साथी को तरह देख रहे थे। दरअसल मालिक कहलाने की भूख बड़ी कमाल होती है। किसी भी उम्र में किसी को भी लग जाती है। और जब लग जाती है तो उसकी तमाम प्रगतिशीलता के ढोंग बहुत घिनौने तरीके से बेपर्दा होने लगते हैं। मीडिया विजिल इसका ताजा उदाहरण है। संपादकीय दायित्वों और ट्रस्ट से अभिषेक श्रीवास्तव इस्तीफे के बाद मीडिया विजिल शुद्ध रूप से पारिवारिक मालिकाना हक वाली एक संपत्ति है। जिस कॉरपोरेट टीवी को गालियां देकर मीडिया वजिल के संचालकों ने मालिक होने का दर्जा हासिल किया वो पहली फुरसत में कॉरपोरेट से बड़े कॉरपोरेट हो चुका है। लेकिन ये तो किसी के बौद्धिक श्रम पर डकैती का मामला है। अकेले Anand Swaroop Verma ही नहीं मीडिया विजिल की यात्रा के स्तंभ रहे कई स्तंभकारों के योगदान पर ये संस्थान डाका मारकर बैठ गया है। Abhishek Srivastava से लेकर Nityanand Gayen और तमाम लेखकों का नाम और योगदान दोनों को मीडिया विजिल बेशर्मी के साथ निगल गया है। इनके नाम शातिराना तरीके से उड़ा दिए गए हैं। यह आपराधिक सोच है और इसके लिए उच्च कोटि की निर्लज्जता चाहिए। नाम देना न देना सस्थान और लेखक के बीच का समझौता होता है। लेकिन एक बार बाइलाइन दे देने के बाद व्यवस्थागत बदलाव के कारण नाम हटा देना बेहयाई है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। जहां तक मुझे जानकारी है मीडिया वीजिल के फंडर्स ने शर्त रखी थी कि सभी लेखों पर संस्थान का अधिकार होगा। आनंद स्वरूप वर्मा और अभिषेक श्रीवास्तव जैसे लेखक इसके लिए हरगिज़ तैयार न होते। ये लोग लेखन को समाज की चीज मानते रहे हैं, खुद को उसका मालिक नहीं। यही बात मीडिया विजिल के नए मालिकों को खल रही होगी। इसलिए उनके नाम और काम दोनों को खारिज करके पूर्ण कॉरपोरेट मालिक बनने का खयाल उनके दिमाग में आया होगा। उन्हें अच्छी तरह पता है कि ये लोग किसी तरह का दावा नहीं करने वाले। मीडिया विजिल ने लेखकों की शराफत का फ़ूहड़ तरीके से मजाक उड़ाया है। अब मीडिया विजिल के लिए ना कॉमेंट्स फ्री रहे हैं और ना ही फैक्ट्स सैक्रेड।   टीवी पत्रकार नवीन कुमार की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 21 April 2020


bhopal,Corona, will die , world

भारत को कोरोना से कौन बचा रहा है बहुत से लोगो बहुत से कारण दे रहे है कोई लॉकडाउन को वजह बता रहा है कोई भारतीयों की इम्युनिटी या बीसीजी के टीके को वजह बता रहा है लेकिन किसी के पास इसको साबित करने के लिए पर्याप्त डाटा और लाजिक नही है तो आखिकार इस देश को कोरोना से बचा कौन रहा है? भारत को कोरोना के कहर से भारत का दिनोदिन बढ़ता तापमान बचा रहा है जब मैंने विश्व के टॉप 10 तापमान वाले देशो का कोरोना के डाटा का विश्लेषण किया तो हैरान करने वाले रिजल्ट सामने आए, सभी उच्च तापमान वाले देशों में कोरोना वायरस की ग्रोथ बहुत धीरे है लीबिया विश्व का सबसे ज्यादा गर्म देश है वँहा आज के आंकड़ों के अनुसार केवल 49 केस दर्ज किए गए है और केवल एक मौत हुई है पूर्ण लॉकडाउन भी नही किया है और युद्ध प्रभावित गरीब देश होने के बाद भी टेस्टिंग 103 /मिलियन हो रही है लीबिया को तापमान बचा रहा है क्योंकि वँहा सरकार के नाम पर कुछ नही है ऐसा ही कुछ हालात सोमालिया, इथोपिया और जाम्बिया के है। सऊदी अरब विश्व का दूसरा गर्म देश है मिडिल ईस्ट के इस देश मे 8500 केसों में से 92 मौते हुई है और टेस्ट4900 /M हो रहे है सऊदी अरब में तानाशाही होने के बाद भी पूर्ण लाकडाउन् नही है इसलिए यँहा भी तापमान ही वायरस को रोक रहा है। मेक्सिको एक दक्षिणी अमेरिका का देश है वो तापमान की सूची में भारत से दो पायदान नीचे है और वँहा करीब 8000 केसों में 650 मौते हुई है एक समय दिवालिया हो चुके इस देश मे भी टेस्टिंग दर 381/M है यहाँ भी फूल लाकडाउन् नही है ड्रग और माफिया से भरे इस देश की सरकार सबसे ज्यादा लापरवाह है इसलिए इसे भी तापमान ही बचा रहा है। भारत विश्व का आठवां सबसे गर्म देश है भारत में टोटल लाकडाउन् है और 16300 से ज्यादा केस और 521 मौत हो चुकी है लेकिन विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की दम भरने वाली सरकार केवल 270/M की दर से टेस्टिंग कर रही है जाहिर है इतनी लापरवाही के बाद भी केवल तापमान इस देश को बचा रहा है। जिस भारतीय उपमहाद्वीप विश्व की 20 फीसद आबादी रहती है वँहा 1000 से ज्यादा मौते नही हुई है और पाकिस्तान जैसे बदहाल देश मे भी फूल लाकडाउन् नही होने बाद भी मौत का आंकड़ा 150 तक ही पहुंचा है और टेस्टिंग दर 446/M है ऐसे में इस पूरे साउथ एशिया को तापमान ही बचा रहा है। मैंने इस विश्लेषण में अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और एशिया के सारे गर्म देशो का डाटा विश्लेषण किया है इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं डाटावाणी यह बात बता चुका था पोस्ट लिखते लिखते आज तक पर खबर आ गई कि अमेरिका में कोरोना कड़ी धूप से मर रहा है अतः डाटा विश्लेषण पर मेडिकल रिसर्च की मुहर भी लग गई है। अगर 20 मई के बाद भारत मे भी कोरोना मर जाए तो आश्चर्य मत कीजियेगा क्योंकि जब रोहिणी तपेगी तो उसकी आग से तपकर एक नया भारत उदय होगा लेकिन इसका श्रेय किसी एक आदमी और सरकार बिलकुल मत दीजियेगा अगर श्रेय देना ही तो केवल और केवल सूर्य देवता को दीजियेगा उन्ही के ताप से हमें कोरोना जैसे राक्षस से मुक्ति मिलेगी। ऊँ भास्कराय नमः!   युवा डेटा एनालिस्ट अपूर्व भारद्वाज की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 21 April 2020


bhopal, Why are not talking ,Muslims clearly

हिंदी की एक प्रतिष्ठित वेब साइट (सत्यहिंदी.काम) में मुरादाबाद में हुए उस पागलपन को लेकर आलेख प्रकाशित हुआ है जिसमें वहां के एक मोहल्ले में इंदौर की टाटपट्टी बाखल की तरह ही स्वास्थ्य और पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया गया।लेखक इक़बाल रिज़वी ने तकलीफ़ ज़ाहिर की है कि इस समय मुसलमानों को ‘सॉफ़्ट टारगेट’ बनाकर पागलों की तरह व्यवहार करने पर मज़बूर किया जा रहा है ! लेखक ने आरोप लगाया है कि जमात’ की आड़ में मुसलमानों का बुरा हाल किया जा रहा है और इससे प्रशासन के प्रति जो अविश्वास भाव उनमें बढ़ रहा है उसने यह हालात कर दिए हैं कि मुरादाबाद जैसा पागलपन सामने आ रहा है।आलेख में यह भी कहा गया है कि एक सुनियोजित झूठ को इतनी बार पूछा जा रहा है कि मुसलमान ‘बैकफुट’ पर आ गए हैं।’ मुसलमानों की देश के प्रति निष्ठा को लेकर इस समय जो कुछ भी चल रहा है उससे कई नए सवाल खड़े होते है : पहला तो यह कि आज़ादी के बाद के तमाम सालों में (साम्प्रदायिक दंगों की घटनाओं और कश्मीर को छोड़कर) इस तरह का आचरण या पागलपन मुस्लिम बस्तियों की ओर से क्या पहली बार प्रकट हो रहा है या पहले के भी ऐसे कोई उदाहरण हैं जिन पर कि राष्ट्रीय स्तर की बहसें भी हो चुकीं हैं ? मुसलमान बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने या मलेरिया की दवा का छिड़काव करने या शहर को ‘नम्बर वन’ बनाने के लिए इन्हीं इलाक़ों में ‘अगर’ स्वास्थ्य या सफ़ाईकर्मी पहले भी गए हैं तो क्या तब भी ऐसी ही घटनाएं हुईं हैं ? अगर हुईं हैं तो उनका पैटर्न क्या था ?अगर ऐसा पहली बार हो रहा है तो क्या उसके कारणों में जाने की जानबूझकर कोशिश नहीं की गई ? दूसरा सवाल यह है कि हमलों को लेकर चल रही तमाम बहसों में मुसलमान समाज के उन्हीं लोगों की ज़्यादा भागीदारी क्यों हो रही है जो दूध को दूध और पानी को पानी कहने से हकलाते हैं ?तीसरा सवाल यह है कि जो कैमरे स्टूडियो के अंदर लगे हैं वे हमलावरों के घरों के अंदर पहुँचकर उनसे उनके पागलपन का असली कारण क्यों नहीं पूछ रहे हैं ? इंदौर की टाटपट्टी बाखल के मुसलमानों के पश्चाताप से भी दुनिया को रूबरू करवाना चाहिए था। अंत में यह कि देश का समूचा हिंदू समाज अगर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल नहीं है तो समूची मुसलमान क़ौम कैसे तबलीगी जमात, टाटपट्टी बाखल और मुरादाबाद हो सकती है ? हम क्या ऐसा मानने को तैयार हो सकते हैं कि कोरोना की महामारी का आक्रमण अगर साल-छह महीने के बाद तब होता जब नागरिकता क़ानून और एन सी आर को लेकर मुस्लिमों की शंकाओं के घाव भर गए होते तो इस तरह की घटनाएं बिलकुल नहीं होतीं ?शाहीनबाग़ चल रहा था तभी कोरोना हो गया और तभी तबलीगी जमात का जमावड़ा भी हो गया। क्या कुछ अजीब सा नहीं लगता ? हुआ यह है कि जो एक और अवसर मुसलमानों को देश की मुख्यधारा के साथ एकाकार करने का मिला था उसे उन्होंने अपनी ही क़ौम के कुछ कट्टरपंथी सिरफिरों के कारण गंवा दिया।और फिर उसे बहुसंख्यक समाज के कुछ अनुदारवादियों ने लपक कर हथिया लिया और मीडिया के एक वर्ग ने भी उसे अपने एजेंडे का हथियार बना लिया। एक जो अंतिम सवाल ‘थर्ड पार्टी’ की तरफ़ से भी पूछने का बनता है वह यह है कि इतनी बड़ी आबादी की नीयत और राष्ट्रीयता पर अगर देश के अधिकांश लोगों का ही यक़ीन गड़बड़ा रहा है तो फिर यह भी बताया जाना चाहिए कि उसका क्या इलाज किया जाए ?साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताया जा रहा है कि मुसलमानों से क्या करने को या कहाँ जाने को कहा जाए ?और यह आदेश देश के संविधान की तरफ़ से कौन देगा ? और अगर मुसलमान फिर भी यही कहते हैं कि हिंद की ज़मीन ही उनका ख़ुदा है तो उसके बाद किस तरह के दस्तावेज़ों की उनसे मांग की जानी चाहिए ? अगर इन सभी सवालों के जवाब उपलब्ध हैं तो उन्हें बिना किसी विलम्ब के सार्वजनिक किया जाना चाहिए कम से उस बड़ी जनसंख्या और उनके बच्चों का ख़याल करके जो दोनों तरफ़ की उत्तेजक भीड़ के बीच मौन और निःशस्त्र खड़ी हुई है।   लेखक श्रवण गर्ग देश के जाने-माने संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 19 April 2020


bhopal, Chief Minister , many states, started visiting Bihar, labor shortage

कोलकाता। अपने राज्यों में मजदूरों की कमी से उबरने के लिए पंजाब, तेलंगाना और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री बिहार फोन लगा कर मजदूरों को मनाने की अपील कर रहे हैं। अधिकतर राज्यों में कृषि और तमाम उद्योग धंधों में प्रवासी मजदूरों की कमी महसूस की जा रही है। लॉकडाउन के बाद मजदूर या तो अपने गांव लौट चुके हैं या कुछ अब तक अलग-अलग जगहों में फंसे हुए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार लॉकडाउन का हवाला देकर भले ही दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के लोगों को वापस लाने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं। मगर उद्योग धंधों में अन्य राज्यों के मजदूरों की कमी महसूस की जा रही है। इस कारण कई मुख्यमंत्री मजदूरों की खुशामद कर अपने यहां बुला रहे हैं। इससे पहले लॉकडाउन से घबराये प्रवासी मजदूरों की तकलीफ की सुनवाई नहीं हो रही थी। मदद की उम्मीद खो चुके मजदूर पैदल ही अपने गांवों की ओर चल पड़े। इन लोगों ने घर वापसी की जब-जब आवाज उठाने की कोशिश की तब पुलिस और प्रशासन ने धमकाकर और लाठियां बरसाकर इन पर काबू पा लिया। अब मंदी का असर दिखते ही सबको मजदूरों का ख्याल आया है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिहार फोन लगाकर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से कहा है कि वो मजदूरों से अपील करें कि जो मजदूर जहां हैं वो वहीं रहे, वहां की सरकारें उनका ख्याल रखेंगी। इधर तेलंगाना के मुख्य सचिव सोमेश कुमार ने उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को फोन कर कहा कि वे मजदूरों को तेलंगाना की चावल मिलों में वापस काम पर लौटने को राजी करें। उन्होंने मजदूरों को वापस लाने के लिए तेलंगाना से बस भेजने की भी पेशकश की है। मुख्य सचिव ने भरोसा दिलाया कि तेलंगाना में मजदूरों की हर जरूरत का ख्याल रखा जायेगा। अब भी देश के कई शहरों में बिहार के लोग फंसे पड़े हैं। कहीं से मजदूर तो कहीं से छात्र अपनी घर वापसी के लिए मुख्यमंत्री से गुहार लगा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। राजस्थान के कोटा में फंसे छात्रों को निकालने के लिए यूपी की योगी सरकार ने दो सौ भेजी हैं, वहीं इस कदम को नाइंसाफी करार देते हुए नीतिश कुमार ने कहा कि यह लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन है। ऐसा किया जाना गलत है।  राज्य सरकार हो या फिर केंद्र सरकार सभी दावा कर रही हैं कि स्थिति नियंत्रण में है। हम दूसरे देशों के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं। मगर लॉकडाउन की वजह से मजदूरों और गरीबों का जीना मुश्किल हो गया है। नौकरी गंवा चुके मजदूर भूखमरी से लड़ रहे हैं। राहत का सामान भी हर किसी को नहीं मिल रहा। दूरदर्शन पर पांच-पांच सौ रुपये पाकर धन्य हो रही कुछेक महिलाओं के वीडियो भी लगातार वाइरल हो रहे हैं। मगर उनमें से कोई भी गरीब और मोहताज नजर नहीं आ रही। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि सरकार किन्हें राहत पहुंचा रही है, गरीब तो अब भी राहत का इंतजार कर रहे हैं। सरकार जल्दी न जागी तो जिन लोगों को आज वह मोहताज समझ रही है, कल प्रवासी मजदूरों और बेरोजगारों की यही फौज अपने हक के लिए उनकी नींद हराम करने से नहीं चूकेगी।   कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार श्वेता सिंह का विश्लेषण

Dakhal News

Dakhal News 19 April 2020


bhopal, Chancellor , Makhanlal Chaturvedi University, Deepak Tiwari resigns

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम जनसंपर्क विभाग के सचिव पी. नरहरि को सौंपा है।   दरअसल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री इस विश्वविद्यालय की महापरिषद के अध्यक्ष होते हैं, इसलिए प्राय: जब भी इस तरह से किसी भी कुलपति द्वारा अपना इस्तीफा भेजा जाता है तो वह मुख्‍यमंत्री को संबोधित करते हुए ही दिया जाता है। अपने दिए इस्‍तीफे के पत्र में दीपक तिवारी ने लिखा है वे कुलपति पद से अपना इस्तीफा प्रस्तुत कर रहे हैं, उनका कार्यकाल बहुत अच्‍छा रहा है और वे इससे बेहद संतुष्‍ट हैं। शनिवार रात दिए इस त्‍याग पत्र के पहले उन्‍होंने छात्रों और विश्वविद्यालय के स्टाफ के नाम भी एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने बतौर कुलपति के अपने अनुभव को साझा किया है।   उल्‍लेखनीय है कि उनका बतौर कुलपति कार्यकाल एक साल 2 महीने का रहा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद दीपक तिवारी को 24 फरवरी,2019 में पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था। उन्होंने वरिष्‍ठ पत्रकार जगदीश उपासने की जगह ली थी, जिन्होंने भाजपा की सरकार जाने के बाद कुलपति पद से इस्तीफा दिया था।   उल्लेखनीय है कि दीपक तिवारी के कुलपति बनने के बाद माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय चर्चा और विवादों में बना रहा है। विश्वविद्यालय की एक फैकल्टी की जातिवादी टिप्पणियों के बाद यहां छात्रों ने आंदोलन तक किया और इसके बाद 23 छात्रों का विश्वविद्यालय से निष्कासन किया गया था लेकिन जब छात्र आंदोलन तेज हुआ तो सभी का निष्कासन वापस लेना पड़ा था। इसके बाद उक्‍त फैकल्टी की सेवाएं भी विश्‍वविद्यायल ने वापस ले ली थी।

Dakhal News

Dakhal News 19 April 2020


bhopal,Google announced funding , journalists news publ

Journalism Emergency Relief Fund! जी हां, इसी नाम से गूगल ने एक रिलीफ फंड तैरा किया है. मकसद है छोटी-छोटी मीडिया संस्थाओं को डूबने और हजारों पत्रकारों को बेरोजगार होने से बचाना. न्यूज पब्लिशर्स की आर्थिक मदद के संबंध में गूगल ने ऐलान किया है. गूगल का कहना है कि कोरोना और लॉकडाउन संकट से प्रभावित छोटे-मीडियम न्यूज पब्लिशर्स व लोकल न्यूजरूम की आर्थिक मदद की जाएगी. जो मदद के इच्छुक हैं वे अप्लाई कर सकते हैं. गूगल फंड के लिए वो पब्लिशर्स अप्लाई कर सकते हैं जहां 2 से लेकर 100 तक फुल टाइम जर्नलिस्ट हैं. पब्लिकेशन की डिजिटल प्रेजेंस कम से कम 12 महीने की होनी चाहिए. गूगल न्यूज के वाइस प्रेसिडेंट रिचर्ड ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर छोटे-मीडियम न्यूज पब्लिशर्स को पैसे दिए जाएंगे. इसी मकसद के लिए गूगल ने जर्नलिज्म इमरजेंसी रिलीफ फंड बनाया है. गूगल ने ये नहीं बताया है कि कितने पैसे इस काम के लिए खर्चे जाएंगे. गूगल की फंडिंग पाने के लिए न्यूज पब्लिकेशन्स दो हफ्तों में आवेदन करें. आखिरी तारीख 29 अप्रैल है. आवेदन के लिए इस वेबसाइट का यूज करें- https://newsinitiative.withgoogle.com/ जिन लोकल पब्लिशर्स के पास 100 से ज्यादा फुल टाइम जर्नलिस्ट हैं वो भी इसके लिए आवेदन कर सकती है. हालांकि इस तरह के आवेदन को गूगल अपने तरीके से जांच कर फिर फैसला लेगा कि फंड करना है या नहीं. गूगल की तरफ से एक मिलियन डॉलर दो संस्थाओं इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट्स और कोलंबिया जर्नलिस्म स्कूल डार्ट सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड ट्रॉमा को दिए जाएंगे. ये संस्थाएं जर्नलिस्ट्स को सपोर्ट करती हैं. ज्ञात हो कि गूगल पहले भी गूगल न्यूज इनिशिएटिव के तहत 6.5 मिलियन डॉलर देने का ऐलान कर चुका है जो फैक्ट चेकर्स और कोरोना वायरस से जुड़े गलत इनफॉर्मेशन रोकने का काम करने वाले नॉन प्रॉफिट्स ऑर्गाइजेशन्स के लिए हैं.   गूगल के अलावा फेसबुक ने भी कहा है कि लोकल न्यूज ऑर्गनाइजेशन को कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौर में सपोर्ट करने के लिए 100 मिलियन डॉलर की मदद दी जाएगी. इनमें 25 मिलियन डॉलर लोकल कवरेज के लिए है, जबकि 75 मिलियन डॉलर मार्केटिंग के लिए है.

Dakhal News

Dakhal News 16 April 2020


bhopal, Photo journalists ,angry ,father duty, brutal assault on son

हमलावरों ने हमले के पहले कहा कि तुम्हारा पिता दिनभर इधर-उधर घूम कर काम कर रहा है, इससे मोहल्ले में कोरोनावायरस का खतरा बढ़ रहा है… नवभारत के फोटो ग्राफर गोपी डे के पुत्र शुभम डे के साथ जो घटना घटित हुई वह बेहद निंदनीय और चिंताजनक है. कल शाम को इस युवक पर कुछ लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया. बुरी तरह घायल हुए शुभम डे को सिम्स में भर्ती कर दिया गया है. वहां उसका उपचार चल रहा है. इस हमले का कोई व्यक्तिगत कारण नहीं है, बल्कि यह हमला इसलिए हुआ है कि पीड़ित बच्चे का पिता श्री गोपी डे नवभारत प्रेस में प्रेस फोटोग्राफर है. दिन भर घूम घूम कर अपनी ड्यूटी किया करता है. इसलिए उससे कोरोना का संक्रमण फैलाने की मूर्खतापूर्ण आशंका जताते हुए मोहल्ले के बदमाश और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने श्री गोपी डे के पुत्र पर प्राणघातक हमला कर दिया.   सरकण्डा पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया है और उन पर गैर-जमानती धाराओं के तहत अपराध भी पंजीबद्ध कर लिया है.

Dakhal News

Dakhal News 16 April 2020


bhopal, Dalit landscape , Corona crisis

2011 की आर्थिक एवं जाति जनगणना के अनुसार भारत के कुल परिवारों में से 4.42 करोड़ परिवार अनुसूचित जाति (दलित) से सम्बन्ध रखते हैं. इन परिवारों में से केवल 23% अच्छे मकानों में, 2% रहने योग्य मकानों में और 12% जीर्ण शीर्ण मकानों में रहते हैं. इन परिवारों में से 24% परिवार घास फूस, पालीथीन और मिटटी के मकानों में रहते हैं. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अधिकतर दलितों के पास रहने योग्य घर भी नहीं है. काफी दलितों के घरों की ज़मीन भी उनकी अपनी नहीं है. यह भी सर्विदित है कि शहरों की मलिन बस्तियों तथा झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले अधिकतर दलित एवं आदिवासी ही हैं. यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इतने छोटे मकानों और झोंपड़ियों में कई कई लोगों के एक साथ रहने से कोरोना की रोकथाम के लिए फिज़िकल डिस्टेंसिंग कैसे संभव है. महाराष्ट्र का धार्वी स्लम इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है जहाँ बड़ी तेजी से संक्रमण के मामले आ रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में यदि ऐसी ही परिस्थिति रही तो इससे मरने वालों की संख्या का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. उपरोक्त जनगणना के अनुसार केवल 3.95% दलित परिवारों के पास सरकारी नौकरी है. केवल 0.93% के पास राजकीय क्षेत्र तथा केवल 2.47% के पास निजी क्षेत्र का रोज़गार है. इससे स्पष्ट है कि दलित परिवार बेरोज़गारी का सबसे बड़ा शिकार हैं. वास्तव में आरक्षण के 70 साल लागू रहने पर भी सरकारी नौकरियों में दलित परिवारों का प्रतिनिधित्व केवल 3.95% ही क्यों है? क्या आरक्षण को लागू करने में हद दर्जे की बेईमानी नहीं बरती गयी है? क्या मेरिट के नाम पर दलित वर्गों के साथ खुला धोखा नहीं किया गया है और दलितों को उनके संवैधानिक अधिकार (हिस्सेदारी) से वंचित नहीं किया गया है? यदि दलितों में मेरिट की कमी वाले वाले झूठे तर्क को मान भी लिया जाए तो फिर दलितों में इतने वर्षों में मेरिट पैदा न होने देने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इसी जनगणना में यह उभर कर आया है कि देश में दलित परिवारों में से केवल 83.55% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. केवल 11.74% परिवारों की मासिक आय 5,000 से 10,000 के बीच है और केवल 4.67% परिवारों की आय 10,000 से अधिक है. सरकारी नौकरी से केवल 3.56% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गरीबी की रेखा के नीचे दलितों का प्रतिश्त बहुत अधिक है जिस कारण दलित ही कुपोषण का सबसे अधिक शिकार हैं. इसी प्रकार उपरोक्त जनगणना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 56% परिवार भूमिहीन हैं. इन में से भूमिहीन दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से भी अधिक हो सकता है. दलितों की भूमिहीनता की दशा उन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है जिस कारण वे भूमिधारी जातियों पर पूरी तरह से आश्रित रहते हैं. इसी प्रकार देहात क्षेत्र में 51% परिवार हाथ का श्रम करने वाले हैं जिन में से दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से अधिक हो सकता है. जनगणना के अनुसार दलित परिवारों में से केवल 18.45% के पास असिंचित, 17.41% के पास सिंचित तथा 6.98% के पास अन्य भूमि है. इससे स्पष्ट है की दलितों की भूमिहीनता लगभग 91% है. दलित मजदूरों की कृषि मजदूरी पर सब से अधिक निर्भरता है. जनगणना के अनुसार देहात क्षेत्र में केवल 30% परिवारों को ही कृषि में रोज़गार मिल पाता है जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन में कितने दलितों को कृषि से रोज़गार मिल पाता होगा. यही कारण है कि गाँव से शहरों को ओर पलायन करने वालों में सबसे अधिक दलित ही हैं. हाल में कोरोना संकट के समय शहरों से गाँव की ओर उल्टा पलायन करने वालों में भी बहुसंख्यक दलित ही हैं. दलितों की भूमिहीनता और हाथ की मजदूरी की विवशता उनकी सब से बड़ी कमज़ोरी है. इसी कारण वे न तो कृषि मजदूरी की ऊँची दर की मांग कर सकते हैं और न ही अपने ऊपर प्रतिदिन होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न का मजबूती से विरोध ही कर पाते हैं. अतः दलितों के लिए ज़मीन और रोज़गार उन की सब से बड़ी ज़रुरत है परन्तु इस के लिए मोदी सरकार का कोई भी एजेंडा नहीं है. इस के विपरीत मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण करके दलितों को भूमिहीन बना रही है और कृषि क्षेत्र में कोई भी निवेश न करके इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों को कम कर रही है. अन्य क्षेत्रों में भी सरकार रोज़गार पैदा करने में बुरी तरह से विफल रही है. सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण दलितों को आरक्षण के माध्यम से मिलने वाले रोज़गार के अवसर भी लगातार कम हो रहे हैं. इसके विपरीत ठेकेदारी प्रथा से दलितों एवं अन्य मज़दूरों का खुला शोषण हो रहा है. मोदी सरकार ने श्रम कानूनों का शिथिलीकरण करके मजदूरों को श्रम कनूनों से मिलने वाली सुरक्षा को ख़त्म कर दिया है. इससे मजदूरों का खुला शोषण हो रहा है जिसका सबसे बड़ा शिकार दलित परिवार हैं. अमेरिका में वर्तमान कोरोना महामारी के अध्ययन से पाया गया है कि वहां पर संक्रमित/मृतक व्यक्तियों में गोरे लोगों की अपेक्षा काले लोगों की संख्या अधिक है. इसके चार मुख्य कारण बताये गए हैं: अधिक खराब सेहत और कम स्वास्थ्य सुविधाओं की उप्लब्धता एवं भेदभाव, अधिकतर काले अमरीकन लोगों का आवश्यक सेवाओं में लगे होना, अपर्याप्त जानकारी एवं छोटे घर. भारत में दलितों के मामले में तो इन सभी कारकों के इलावा सबसे बड़ा कारक सामाजिक भेदभाव है. इसी लिए यह स्वाभाविक है कि हमारे देश में भी काले अमरीकनों की तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर दलित एवं आदिवासी ही कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित होने की सम्भावना है. वर्तमान कोरोना संकट से जो रोज़गार बंद हो गए हैं उसकी सबसे अधिक मार दलितों/ आदिवासियों पर ही पड़ने वाली है. हाल के अनुमान के अनुसार कोरोना की मार के फलस्वरूप भारत में लगभग 40 करोड़ लोगों के बेरोज़गारी का शिकार होने की सम्भावना है जिनमें अधिकतर दलित ही होंगे. इसके साथ ही आगे आने वाली जो मंदी है उसका भी सबसे बुरा प्रभाव दलितों एवं अन्य गरीब तबकों पर ही पड़ने वाला है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान संकट के दौरान सरकार द्वारा राहत सम्बन्धी जो घोषणाएं की भी गयी हैं वे बिलकुल अपर्याप्त हैं और ऊंट के मुंह में जीरा के सामान ही हैं. इन योजनाओं में पात्रता को लेकर इतनी शर्तें लगा दी जाती हैं कि उनका लाभ आम आदमी को मिलना असंभव हो जा रहा है. उत्तर कोरोना काल में दलितों की दुर्दशा और भी बिगड़ने वाली है क्योंकि उसमें भयानक आर्थिक मंदी के कारण रोज़गार बिलकुल घट जाने वाले हैं. चूँकि दलितों के पास उत्पादन का अपना कोई साधन जैसे ज़मीन तथा व्यापर कारोबार आदि नहीं है, अतः मंदी के दुष्परिणामों का सबसे अधिक प्रभाव दलितों पर ही पड़ने वाला है. इसके लिए ज़रूरी है कि भोजन तथा शिक्षा के अधिकार की तरह रोज़गार को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये और बेरोज़गारी भत्ते की व्यवस्था लागू की जाये. इसके साथ ही स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये ताकि गरीब लोगों को भी स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सके. इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे विकास के वर्तमान पूंजीवादी माडल के स्थान पर जनवादी समाजवादी कल्याणकारी राज्य के माडल को अपनाया जाये. यह उल्लेखनीय है कि डा. आंबेडकर राजकीय समाजवाद (जनवादी समाजवाद) के प्रबल समर्थक और पूंजीवाद के कट्टर विरोधी थे. उन्होंने तो दलित रेलवे मजदूरों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा था कि “दलितों के दो बड़े दुश्मन हैं, एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूँजीवाद.” वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के बहुत बड़े पक्षधर थे. डॉ आंबेडकर के मस्तिष्क में समाजवाद की रूप-रेखा बहुत स्पष्ट थी। भारत के सामाजिक रूपान्तरण और आर्थिक विकास के लिए वे इसे अपरिहार्य मानते थे। उन्होंने भारत के भावी संविधान के अपने प्रारूप में इस रूप-रेखा को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत भी किया था जो कि “स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज अर्थात राज्य एवं अल्पसंख्यक” नामक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। वे सभी प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों, बीमा, कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण एवं सामूहिक खेती के पक्षधर थे. वे कृषि को राजकीय उद्योग का दर्जा दिए जाने के पक्ष में थे. डा. आंबेडकर तो संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाना चाहते थे परन्तु यह उनके वश में नहीं था. वर्तमान कोरोना संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक भारत सहित अधिकतर देशों में विकास का जो पूँजीवाद माडल रहा है उसने शोषण एवं असमानता को ही बढ़ावा दिया है. यह आम जन की बुनियादी समस्यायों को हल करने में बुरी तरह से विफल रहा है. जबसे राजनीति का कारपोरेटीकरण एवं फाइनेंस कैपिटल का महत्त्व बढ़ा है, तब से लोकतंत्र की जगह अधिनायिकवाद और दक्षिणपंथ का पलड़ा भारी हुआ है. इस संकट से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि इस संकट का सामना केवल समाजवादी देश जैसे क्यूबा, चीन एवं वियतनाम आदि ही कर सके हैं. उनकी ही व्यवस्था मानव जाति के जीवन की रक्षा करने में सक्षम है। वरना आपने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को तो सुना ही होगा जिसमें वह कहते हैं कि लगभग ढाई लाख अमरीकनों को तो कोरोना से मरना ही होगा और इसमें वह कुछ नहीं कर सकते। पूंजीवाद के सर्वोच्च माडल की यह त्रासद पुकार है जो दिखा रही है कि मुनाफे पर पलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था पूर्णतया खोखली है। इसलिए दलितों के हितों की रक्षा भी जनवादी समाजवादी राज्य व्यवस्था में ही सम्भव है। बाबा साहब की परिकल्पना तभी साकार होगी जब दलित, पूंजीपतियों की सेवा में लगे बसपा, अठवाले, रामविलास जैसे लोगों से अलग होकर, रेडिकल एजेंडा (भूमि आवंटन, रोज़गार, स्वास्थ्य सुरक्षा, शिक्षा, एवं सामाजिक सम्मान आदि) पर आधारित जन राजनीति के साथ जुड़ेंगे। यही राजनीति एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगी जिसमें उत्तर कोरोना काल की चुनौतियों का जवाब होगा। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इसी दिशा में जनवादी समाजवादी राजनीति का एक प्रयास है।   -एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.), राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

Dakhal News

Dakhal News 14 April 2020


bhopal, Corona, wreak havoc, India, September

Soumitra Roy : लॉक डाउन कुछ समय के बाद तो खत्म हो ही जायेगा। लेकिन उसके बाद क्या? क्या आपने प्लान बनाया? किसका इंतज़ार है? अगर आपको यह लगता है कि लॉक डाउन खुलते ही बागों में बहार आ जायेगी तो आप बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। कोरोना के जन्मदाता चीन में कल 97 मरीज़ सामने आए हैं। मतलब संकट फिर गहरा रहा है। भारत में आईसीएमआर ने अपनी स्टडी में कह दिया है  कि कोरोना सितंबर में सबसे ज़्यादा सितम ढहायेगा। तो समझे पूरा साल गया। भूल जाइए दशहरा, दीवाली को। देश के कॉरपोरेट्स ने कह दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में 9 महीने तक का वक़्त लग सकता है। उधर विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया इकनोमिक फोकस रिपोर्ट में भारत सहित 8 देशों को तबाही की चेतावनी दी है। बैंक का कहना है कि अगर जल्दी लॉक डाउन खुला तो भी भारत की विकास दर 2020-21 में 1.2-2.8% के बीच रहेगी। 2022 में ही भारत 5% की विकास दर हासिल कर सकेगा, वह भी तब जबकि सरकार सब संभाल ले। अगर लॉक डाउन लंबा चलता है तो हालात और भी खराब हो सकते हैं। तो अभी से किफ़ायत की आदत डाल लीजिये। सिर्फ ज़रूरी चीजों पर ही खर्च कीजिये, पैसा बचाइए और रोजगार को मजबूत कीजिये। लॉक डाउन खुलने के बाद देश में भयंकर बेरोज़गारी का आलम बन सकता है। यानी अभी तेज़, तूफानी लहरों के बीच भंवर भी है। अगले 2 साल में अगर मोदी सरकार अर्थव्यवस्था की कश्ती को बचा ले जाती है तो 2024 उनका है। वरना जनता आती है।   पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट सौमित्र राय की एफबी वॉल से.

Dakhal News

Dakhal News 14 April 2020


bhopal, travel business company, fired 800 people, governments kept quiet

एक बुरी खबर…लॉकडाउन में जब आप घरों में क़ैद हैं, ऐसे में गुड़गांव में अमेरिकन कंपनी फेयर पोर्टल (Fareportal) ने अपने 800 कर्मचारियों को कंपनी से निकाल दिया है। इसी कंपनी ने गुड़गांव के अलावा पुणे में भी कर्मचारियों को निकाला है। यह कंपनी ट्रेवल बिजनेस यानी फ्लाइट और होटल बुकिंग की बहुत बड़ी अमेरिकी कंपनी है। कर्मचारियों को निकाले जाने का सिलसिला कई दिनों से चल रहा है और मजाल है कि केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार या उसके श्रम विभाग गुड़गांव ने इस पर कोई ऐतराज किया हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश को नौकरियां जाने का आश्वासन दे रहे थे, ऐसे समय में केंद्र सरकार भी #फेयरपोर्टल के इस घटनाक्रम पर चुप है। कर्मचारियों का कहना है कि गुड़गांव की मल्टीनैशनल कंपनियों (एमएनसी) में अभी ये शुरुआत भर है। जल्द ही कुछ और कंपनियां भी इसी रास्ते पर चलेंगी। कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट ने बिना कोई नोटिस दिए फोन पर कर्मचारियों को अलग-अलग समय देते हुए दफ्तर बुलाया और उसने इस्तीफा देने को कहा। हर कर्मचारी से कहा गया कि अगर उन्हें वेतन चाहिए तो इस्तीफा देना होगा। अन्यथा वेतन भी रुक जाएगा। कर्मचारियों को मार्च का वेतन चाहिए था, उन्होॆने इस्तीफा लिख दिया। जो नए कर्मचारी थे यानी जिनको लगभग एक साल पूरा होने को था, उन्हें बर्खास्त करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी धारा 10ए का इस्तेमाल किया गया। इसके तहत कंपनी कभी भी उन्हें बर्खास्त कर सकती है। बर्खास्त कर्मचारियों को अभी तक मार्च का वेतन भी नहीं दिया गया। कंपनी से बर्खास्त की गई एक महिला कर्मचारी ने बताया कि उसके पास रखा पिछला सारा पैसा खत्म हो गया। अब उसके पास परिवार के साथ नेपाल लौटने तक के लिए पैसे नहीं हैं। तमाम कर्मचारियों का लगभग यही हाल है। हटाए गए कर्मचारियों में 8 और 10 साल तक सेवा देने वाले भी शामिल हैं। लेकिन ऐसे कर्मचारियों के मामले में किसी भी सेवाशर्त को लागू नहीं किया गया। सूत्रों का कहना है कि सबसे ज्यादा 500 कर्मचारी गुड़गांव दफ्तर से हटाए गए हैं। इसी तरह पुणे से 300 कर्मचारी हटाए गए हैं। पुणे में काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी पुराने हैं। चार साल तक काम कर चुके एक टिकटिंग एग्जेक्यूटिव राजू प्रसाद ने बताया कि उसे और उसके कुछ साथियों को बर्खास्तगी का लेटर ईमेल पर मिला है। आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल आफ ट्रेड यूनियनंस ने फेयरपोर्टल के कर्मचारियों को हटाए जाने के खिलाफ हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि कोरोना आपदा के दौरान कंपनी की यह हरकत कानून का खुला उल्लंघन है। इससे कर्मचारियों की दिक्कत बढ़ेगी। मुख्यमंत्री से इस मामले में फौरन दखल देने और कार्रवाई की मांग करते हुए कहा गया है कि इससे पहले हालात नाजुक हों, हरियाणा सरकार को फौरन ऐक्शन लेना चाहिए। इसी तरह का पत्र महाराष्ट्र सरकार को भी लिखा गया है। फेयरपोर्टल ने अपने पुराने कर्मचारियों को जो पत्र भेजा है, उसमें उन्हें हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई है। कई अधिकारी स्तर के कर्मचारियों ने कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट विनय कांची को संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने अपना मोबाइल बंद कर रखा है। इसी तरह कई और अफसरों से संपर्क की कोशिश भी बेकार गई। निकाले गए कर्मचारियों का कहना है कि सहानुभूति के तौर पर भी कोई अधिकारी बात नहीं कर रहा है। अपने काम से काम का मतलब रखने वाले कर्मचारियों को अब कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि वे किस तरफ जाए। अभी तक किसी ने पुलिस में कोई रिपोर्ट तक नहीं दर्ज कराई है। गुड़गांव के श्रम विभाग, डीएम, पुलिस कमिश्नर से लेकर डिविजनल कमिश्नर तक इस घटना की जानकारी हो चुकी है, लेकिन कर्मचारियों के आंसू पोंछने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। देश का टीवी मीडिया जब हिंदू-मुसलमानों को लड़ाने और देश को बांटने की कोशिश में लगा हुआ है, उसकी नजर इन कर्मचारियों की बर्खास्तगी पर नहीं गई। एक कर्मचारी ने बताया कि उन लोगों ने तमाम चैनलों को जानकारी दी लेकिन कहीं से कोई हमारी कहानी सुनने नहीं पहुंचा। इस मीडिया के पास मुसलमानों को टारगेट करके फर्जी खबरें दिखाने का समय तो है लेकिन हमारा दर्द सुनने के लिए कोई समय नहीं है। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि टीवी मीडिया देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम मनोहर लाल खट्टर से इस संबंध में सवाल करेगा लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। लॉकडाउन की घोषणा किए जाते समय मोदी ने आश्वासन दिया था कि किसी की नौकरी पर संकट नहीं आएगा लेकिन न सिर्फ मोदी बल्कि खट्टर के आश्वासन भी फर्जी साबित हुए। गुड़गांव का निकम्मा श्रम विभाग इस मामले में कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज तो करवा ही सकता है। क्योंकि कंपनी ने नोटिस देकर कर्मचारियों को बर्खास्त करने जैसा मामूली कदम भी नहीं उठाया है। इसी तरह श्रम विभाग डीएम को इस कंपनी के बैंक खाते फ्रीज करने, चल-अचल संपत्ति कुर्क करने के लिए सुझाव दे सकता था। इसी तरह डीएम भी श्रम विभाग का सुझाव मिले बिना ये सारे कदम बतौर जिला मैजिस्ट्रेट ये सारे कदम खुद से उठा सकते थे।

Dakhal News

Dakhal News 12 April 2020


bhopal, Lockdown expected , continue, across  country,April 30

जरूरी अपडेट: उच्च पदस्थ सरकारी सूत्रों के अनुसार लॉक डाउन 30 अप्रैल तक जारी रहेगा। इसके बाद मई से लॉक डाउन चरणबद्ध तरीके से खोला जाएगा। प्रस्तावित तारीखें-धर्म स्थल: 5 मईफल-सब्जियों की दुकानें: 7 मईमॉल, सिनेमा हॉल: मई तीसरा हफ्ताट्रेन-फ्लाइट: 15 मईअन्तर्राष्ट्रीय उड़ानें: जुलाई 30 ये प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने आया प्रस्तावित प्लान है। मोदीजी 12 अप्रैल को देश के सामने अपनी योजना का खुलासा कर सकते हैं। न्यूज़ सोर्स- रेडिफ डॉट कॉम

Dakhal News

Dakhal News 12 April 2020


INS shed crocodile tears on Sonia Gandhi

वेजबोर्ड लागू करने को लेकर बेशर्मी और ढिठाई से बोला झूठ कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के केंद्र सरकार को सरकारी विज्ञापनों पर रोक के सुझाव पर तिलमिलाया अखबार मालिकों का संगठन आईएनएस घड़ियाली आंसू बहा रहा है। आईएनएस ने विपक्षी नेता के सुझाव के खिलाफ जारी बयान में बेशर्मी की हदें लांघते हुए ऐसा ना करने के पीछे प्रिंट मीडिया की विश्‍वसनीयता के अलावा वेजबोर्ड लागू होने का बेतुका और सरासर झूठा हवाला दिया है। सच्‍चाई तो यह है कि आईएनएस से जुड़ा लगभग हर अखबार मालिक अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन दिए जाने के खिलाफ कोरोना वायरस की तरह हर उस कर्मचारी को शिकार बनाता जा रहा है या बना चुका है, जिसने भी मजीठिया वेजबोर्ड के तहत संशोधित वेतन की मांग की है। लगभग किसी भी समाचारपत्र संस्‍थान ने वर्ष 2011 से अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद लागू नहीं किया है। इस वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छिन ली गई हैं। वेजबोर्ड के तहत वेतन की रिकवरी से जुड़े हजारों विवाद सुप्रीम कोर्ट होते हुए अब श्रम न्‍यायालयों में लंबित चल रहे हैं। इस सबके बावजूद आईएनएस ने जिस ढिठाई से अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड के तहत वेतन देने का हवाला देकर सोनिया गांधी के सरकारी विज्ञापन बंद किए जाने के सुझाव का विरोध किया है वो इनकी बेशर्मी से झूठ बोलने की आदत और धनलोलुपता को ही दर्शाता है। न्‍यूजपेपर इम्‍पलाइज युनियन ऑफ इंडिया(एनईयूआई) का अध्‍यक्ष होने के नाते मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से मांग/आग्रह करता हूं कि कारोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को सरकारी विज्ञापन जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से प्रस्‍ताव पारित करके इस आशय का शपथपत्र देता है कि उसने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड से जुड़ा का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की युनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को सरकारी विज्ञापन जारी किए जाएं और वेजबोर्ड लागू ना करने वाले समाचारपत्र संस्‍थानों को सरकारी विज्ञापन देना पूरी तरह बंद किया जाए। ऐसी ही व्‍यवस्‍था राज्‍य सरकारों को भी करने के निर्देश जारी किए जाएं। रविंद्र अग्रवाल वरिष्‍ठ पत्रकार एवं अध्‍यक्ष, एनयूईआई

Dakhal News

Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Spinal problems may increase during work from home.

कोविड-19 की विश्वव्यापी महामारी और देशभर में लॉकडाउन के कारण अधिकांश कामकाजी लोगों को घर से ही काम करने की सलाह दी गई है। हालांकि, इस स्थिति में सोशल डिस्टेंसिंग बहुत जरूरी है, लेकिन लोगों को वर्क फ्रॉम होम के दौरान रीढ़ की समस्याओं को लेकर भी सावधान रहने की आवश्यकता है। एक हालिया अध्ध्यन के अनुसार, 30-40 साल की आयु वर्ग में हर पांचवा भारतीय किसी न किसी प्रकार की रीढ़ की समस्या से पीड़ित है। पिछले एक दशक में, इस समस्या की चपेट में आई युवा आबादी की संख्या में 60 प्रतिशत वृद्धि देखी गई है। रीढ़ की हड्डी की समस्या पहले बुजुर्गों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन आज गतिहीन जीवनशैली और गलत मुद्रा में बैठने के कारण युवा भी इस समस्या का शिकार हो रहे हैं, जो एक चिंता का विषय है। मुंबई स्थित मुंबई स्पाइन स्कोलियोसिस एंड डिस्क रिप्लेसमेंट सेंटर के डॉ. अरविंद कुलकर्णी ने बताया कि, “गतिहीन जीवनशैली, गलत मुद्रा में बैठना, लेट कर लैपटॉप पर काम करना और उठने-बैठने के गलत तरीकों के कारण घर से काम कर रहे लोगों में रीढ़ की समस्याएं विकसित हो सकती हैं। ये सभी फैक्टर रीढ़ और पीठ की मांसपेशियों पर तेज दबाव बनाते हैं। सभी काम झुककर करने से रीढ़ के लीगामेंट्स में ज्यादा खिचाव आजाता है, जिससे पीठ में तेज दर्द के साथ अन्य गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि, एक स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली के साथ इन समस्याओं से बचा जा सकता है। ऐसे में रोज एक्सरसाइज करना, सही तरीके से उठना-बैठना, सही तरीके से झुकना और शरीर को सीधा रखना आदि स्वस्थ रीढ़ के लिए जरूरी है।” आमतौर पर, जो लोग पीठ के निचले हिस्से के दर्द से परेशान रहते हैं, उनमें से 95 प्रतिशत लोगों को लक्षण के पहले महीने में किसी खास टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती है। टूटी रीढ़ जैसी कुछ समस्याएं हैं जो किसी गंभीर समस्या का संकेत देते हैं। ऐसे में पीड़ित के लिए तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी होता है। डॉ. कुलकर्णी ने आगे बताया कि, “वर्क फ्रॉम होम के साथ हमें घर के भी कई काम करने पड़ते हैं। ऐसे में अचानक झटके से उठना, ज्यादा झुकना, गलत तरीके से सामान उठाना, लेटकर लैपटॉप चलाना, लगातार एक ही मुद्रा में काम करना आदि आदतों से दूरी बनाना जरूरी है। काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें और यदि काम ज्यादा है तो किसी से मदद मांग लें। रोजाना एक्सरसाइज और वॉक करें, लेकिन इस दौरान बॉडी स्ट्रेच पर ज्यादा ध्यान दें। एक पोषणयुक्त डाइट लें, जिसमें प्रोटीन, सलाद, फल और हरी सब्जियां भरपूर मात्रा में मौजूद हों। शरीर में विटामिन डी की कमी न हो इसलिए रोज थोड़ी देर धूप में बैठना जरूरी है। यदि आप पेनकिलर दवाएं ले रहे हैं तो ‘आईब्युप्रोफेन’ वाली दवाइयां बिल्कुल न लें क्योंकि ये हमें कमजोर बनाती हैं जिससे हमारा शरीर घातक कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं रख पाता है।”

Dakhal News

Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Lockdown and alcoholic beggars!

Yashwant Singh : भारत में असली ज़रूरतमंद को तलाशना भी एक बड़ा दिमागी गेम है। लोकडौन के नाम पर कुछ बवंडर किस्म के अल्कोहलिक नगद मदद के लिए गुहार लगा रहे, घर में अन्न राशन न होने का दावा कर के। किसी सज्जन पुरुष के फोन करने पर पर्याप्त रो-गा भी देते हैं ताकि नौटंकी में कोई कमी न रहे। मित्रों ने उनकी हजार पांच सौ नगद भेजने की मांग अनसुनी कर उसकी जगह पर्याप्त अन्न राशन भिजवा दिया है। खुद को फ़क़ीर बताने वाले ऐसे अल्कोहलिकों से सावधान रहें। नगद की जगह अन्न ही भिजवाएं। ये साले पियक्कड़ कई दिन दारू न मिलने पर आखिरी दांव भयंकर इमोशनल वाला ही खेलते हैं! जिनके बारे में बात कर रहा हूं वो पूर्व परिचित है। उसके नाटक मैं बारह पंद्रह साल से जानता हूँ। वो मेरी मित्र मंडली के लोगों को इमोशमल ब्लैकमेल कर रहा था। फिर भी उस तक अन्न राशन के अलावा बोतल भर पीने के लिए लोगों ने मदद पहुंचा दी है। मालूम हो कि लॉक डाउन में जगह जगह ब्लैक में दारू बिक रही है। एल्कोहलिक किस्म के प्राणी ब्लैक वाली दारू खरीदने का सामर्थ्य न होने के चलते भांति भांति तरीकों के बहानों से लोगों से पैसे मांग रहे हैं।

Dakhal News

Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Tabligi Jama Coronas hotspot and mask issue in news headlines

तबलीगी जमात के जलसे में शामिल अधिकतर लोगों के कोरोना संक्रमित होने से पूरे देश में कोहराम मच गया है। निजामुद्दीन को संक्रमण का केंद्र माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल लोगों से अब अन्य 20 राज्यों में भी कोरोना का संक्रमण फैलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म होता जा रहा है। निजामुद्दीन केंद्र के कोविड-19 मामलों से देश में खतरे की घंटी बज गयी है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के पुख्ता इंतजाम के दावे भी किये जा रहे हैं। आइए देखते हैं अंग्रेजी औऱ हिंदी अखबारों ने किन खबरों को कितनी अहमियत दी है। द हिंदू में सौरभ त्रिवेदी और निखिल एम.बाबू की रिपोर्ट जिसका शीर्षक हिंदी मे कुछ इस प्रकार होगा- तबलीगी जमात के अधिकारियों पर कानून तोड़ने का आरोप। इस खबर में बताया गया है कि निजामुद्दीन थाने में मरकज के प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद व अन्य पर केस दर्ज किया गया। इस खबर में बताया गया है कि चार सौ से अधिक लोगों को कोविड 19 के लक्षण देख कर अस्पताल में दाखिल कराया गया और तकरीबन एक हजार लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है। अधिकारियों को डर है कि जो लोग यहां से दूसरे शहरों में अपने घरों में जा पहुंचे हैं, वो सभी न जाने कितने और लोगों को संक्रमित किया होगा। इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है। इनके खिलाफ आईपीसी के तहत बीमारी फैलाने के लिए लापरवाही बरतने, घातक व नुकसानदेरह काम करने, दूसरे की जान जोखिम में डालने, सरकारी आदेश के उल्लंघन और आपराधिक षडयंत्र के अलावा महामारी एक्ट 1897 के तहत केस दर्ज हुआ है। इसी अखबार में जेकॉब कोशी की बाइलाइन से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका शीर्षक है- मास्क के इस्तेमाल पर स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर में मतभेद। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच मास्क पहनने और न पहनने को लेकर मतभेद सामने आये हैं। द हिंदू में ही शोभना के.नायर और जेबराज की रिपोर्ट का शीर्षक है- जबरन रोके गये मजदूर, अब भूखमरी से लड़ रहे। इस रिपोर्ट में प्रवासी मजदूरों के दर्द और तकलीफ को बयां किया गया है। इस खबर में बताया गया है कि विश्व में कोरोना वायरस का सामना कर रहे अधिकतर देशों ने घर में रहें, सुरक्षित रहें पर अमल करने की कोशिश की है। भारत में भी लॉकडाउन जारी कर हर नागरिक को घरों में रहने की हिदायत दी जा रही है। सीमाओं को भी सील किया जा चुका है ताकि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। ऐसे हालात में बिना काम और पैसों की किल्लत से परेशान मजदूरों और गरीबों को भूखमरी का सामना करना पड़ रहा है। सच तो यही है कि सरकार भले ही कितने भी दावे कर ले मगर गरीबों के रहने खाने का भरपूर प्रबंध नहीं हो पाया है। द इंडियन एक्सप्रेस में अबंतिका घोष की जो रिपोर्ट छपी है उसका शीर्षक है- आईसीएमआर ने माना भारत में अब भी संक्रमण कम है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तबलीगी जमात से देश भर में संक्रमण फैलने की आशंका के बाद भी आईसीएमआर को अब भी यकीन है कि विश्व में जिस तेजी से कोरोना का कहर बढ़ रहा है उसके मुकाबले भारत में संक्रमण अब भी कम है। सरकार के बाद भारत की प्रमुख संस्थाओं से इस तरह के बयान जारी कर यकीनन जनता के डर को कम करने की कवायद ही की जा रही है। इसी अखबार में सौम्या लखानी और सौरभ रायबर्मन की रिपोर्ट छपी है। इस खबर में लिखा है कि निजामुद्दीन केंद्र को खाली कराया गया है औऱ केजरीवाल ने मामले बढ़ने पर चेताया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इसे गैरजिम्मेदाराना करार दिया है। इसी बीच आप के विधायक अमानतुल्ला खान ने दिल्ली पुलिस को कटघरें में खड़ा कर सवाल दाग दिया कि उनके सूचना देने के बाद भी आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाया गया। देश कोरोना के कहर से जूझ रहा है। मगर केंद्र और राज्य सरकारें अब आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुट गयी हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की जगह दूसरे पर ही दोष मढ़ने में व्यस्त हो गया है। द हिंदू में एक चौंकाने वाली खबर आत्री मित्रा के नाम से प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है- 24 घंटों में तीन मौतें, एक मरीज जनरल वार्ड मे था। हावड़ा के अस्पताल में कोरोना वायरस से पीड़ित 48 वर्षीय महिला की मौत के बाद काफी हंगामा मचा है। महिला की मौत के बाद अस्पताल के 29 कर्मचारियों को क्वारंटाइन में रखा गया है। आरोप है कि महिला को जनरल वार्ड में रखा गया था। इसी बीच कोरोना के दो मरीजों की मौत की खबर आयी है जिसमें एक हावड़ा के 52 वर्षीय व्यक्ति और कोलकाता के एक 62 वर्षीय व्यक्ति शामिल हैं। पिछले चौबीस घंटों में कोरोना से तीन लोगों की मृत्यु के बाद से पश्चिम बंगाल में कोरोना से मरने वालों की संख्या पांच हो गयी है जबकि 37 लोग कोरोना से संक्रमित पाये गये हैं। हिंदी अखबारों में आज सबसे पहले अमर उजाला की बात करते हैं जिसकी लीड खबर का शीर्षक है- देश भर में खौफ का वायरस, 74 और जमाती संक्रमित। इस खबर में बताया गया है कि देश में कोरोना वायरस के मरीज लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। निजामुद्दीन मे आयोजित तबलीगी जमात का जलसा देश में कोरोना के संक्रमण का बड़ा स्त्रोत बन चुका है। जलसे में देश के 20 राज्यों के साथ-साथ 16 देश के जमाती भी शामिल हुए थे। इसके अलावा रूटिन खबरें छपी हैं जिसमें कोरोना के मरीजों के लगातार बढ़ते मामलों का जिक्र किया गया है। दिल्ली में तीसरे दिन भी 23 नए रोगी मिलने की पुष्टि हुई है। इसी बीच एक खबर और भी छपी है जिसका शीर्षक है- तब्लीगी कार्यक्रमों के लिए नहीं मिलेगा पर्यटक वीजा। हिंदुस्तान ने दूसरे अखबारों की तरह निजामुद्दीन की खबर को ही लीड बनाया है जिसमें बताया गया है कि मरकज ने 20 राज्यों को मुश्किल में डाला है। हालांकि पटना संस्करण में कुछ एक्सक्लूसिव खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। इस खबर का शीर्षक है- 85 लाख उज्ज्वला लाभार्थी आज से खाते में पाएंगे गैस की राशि। राहत की खबर बताते हुए हिंदुस्तान में लिखा है कि पटना में रसोई गैस सिलेंडर 65 रुपये सस्ता कर दिया गया है। इस खबर के अनुसार बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में एक अप्रैल से कमी की गयी है। पटना में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 65 रुपये घटा दिया गया है। इन सबके साथ ही सरकार कितनी तेजी से हालात नियंत्रित कर रही है। इसका पक्ष रखते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बारे में भी एक खबर छापी गयी है जिसका शीर्षक है- स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेटंर में सरकारी कर्मी तैनात हों– सीएम। हिंदुस्तान ने लिखा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि गांवों के स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेंटर में लोगों के ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था रखें। इन केंद्रों पर सरकारी कर्मचारी को प्रभारी बनाकर बेहतर ढंग से काम कराएं। जाहिर है अखबारों में इन खबरों से यही संदेश दिये जाने की कोशिश की जा रही है कि कोरोना के कोहराम से लड़ने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। सरकार की तरफ से कोताही नहीं बरती जा रही है। नवभारत टाइम्स ने भी निजामुद्दीन की खबर को ही लीड लिया है। मगर एंकर में आर्थिक पहलू का जिक्र करते हुए सिंगल कॉलम में छोटी सी खबर प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है- छोटी बचत की ब्याज दरों में बड़ी कटौती। जबकि कोरोना का कहर झेल रही जनता की जेब पर सरकार के इस कदम से कितना भारी बोझ बढ़ेगा। इसका ब्यौरा देते हुए इस खबर को प्रमुखता दी जानी चाहिए थी। इसी खबर के साथ नवभारत में एक खबर और छापी गयी है जिसमें बताया गया है कि भीषण मंदी का साया है पर भारत-चीन बच सकते हैं। पाठकों को राहत देने के मकसद से ही इस खबर को छाप दिया गया है जिससे लोग आश्वस्त रहें कि उनकी मुश्किलें ज्यादा नहीं बढ़ेंगी। दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपी एंकर स्टोरी ने ध्यान आकर्षित किया है । इस खबर में बताया गया है कि न्यूयार्क इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोध के अनुसार बीसीजी का टीका कोरोना की ढाल बन सकता है। इस खबर की मानें तो जिन देशों में बीसीजी का टीका नहीं लगा, वहां कोरोना का खतरा ज्यादा है। अमेरिकी शोध संस्थान ने विश्व भर में फैले कोरोना संक्रमण की वर्तमान स्थिति के आधार पर भविष्य की स्थित का आंकलन किया है। इसके परिणाम भारत सहित उन देशों के लिए सुखद हैं, जहां सालों से बीसीजी ( बैसिलस कैलमेट-गुएरिन ) का टीका लगता आया है। इसी खबर की बगल में सिंगल कॉलम में एक खबर छपी है। यह खबर है पीएम मोदी की मां हीराबेन के बारे में जिन्होंने 25,000 रुपये की मदद की है। पीएम केयर्स फंड में हीराबेन ने बचत के पैसे दान किए हैं। मोदी ने ट्वीट कर कहा यह मां का आशीष है। हैरत की बात है कि टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया में छाए रहने वाले पीएम मोदी की मां की यह खबर हाशिए पर रही। यह भी कोई विशेष रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। शायद यही की पीएम अपने सगे संबंधियों ही नहीं मां से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से नहीं छपवाते। पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

Dakhal News

Dakhal News 2 April 2020


bhopal, Read these lead news, Telegraph , light in your brain too!

देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत जानिए… नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अप्रैल को दिया जलाने का अनुरोध किया है। ज्यादा अच्छा हो जो हम देश में स्वास्थ्य के इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करें ताकि टोने टोटके की जरूरत ही न पड़े। दिमाग में ज्ञान की बत्ती जलाना जरूरी है। इतने बड़े देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए जो स्वास्थ्य सुविधा होनी चाहिए, वो बिलकुल भी नहीं है, ये एक कटु सत्य है। बाकी अखबार जब मोदी जी के गुणगान में लगे हैं तो टेलीग्राफ ने हेल्थ सेक्टर के बारे में बात कर सोचने को मजबूर किया है। आज के द टेलीग्राफ अखबार में छपी लीड खबर देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़मीनी हकीकत बयां कर रही है। जी.एस.मुदुर की बाइलाइन से छपी रिपोर्ट में लिखा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में सबसे आगे खड़े स्वास्थ्य कर्मियों के पास व्यक्तिगत सुरक्षा किट-पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) तक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि डॉक्टरों में भी यह संक्रमण तेजी से फैल रहा है। सरकार के ढुलमुल रवैये से स्वास्थ्य सेवा में जुटा समुदाय बेहद परेशान है। कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों, नर्सों और तमाम दूसरे सहयोगी कर्मचारियों में भी संक्रमण फैलने का खौफ बढ़ता ही जा रहा। वे ड्यूटी तो निभा रहे हैं मगर वे सभी यह सोचकर परेशान हैं कि उनकी वजह से उनका परिवार भी संक्रमित हो सकता है। इस खबर की माने तो देश भर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ के पास मास्क और आवश्यक किट की कमी होने की वजह से वे सभी कोरोना से संक्रमित होते जा रहे हैं। कुछ डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें नियमित रूप से नए मास्क नहीं मिल रहे हें। कोरोना से बचाने वाली कंप्लीट पीपीई किट सबको नहीं मिल पा रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, गृह मंत्रालय से भी सही आंकड़े न मिलने पर स्वास्थ्य सेवा समुदाय सोशल मीडिया और अपने संपर्कों से दस्तावेज इक्ट्ठा कर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कितने लोगों को संक्रमित किया है। रिपोर्ट में एम्स के वरिष्ठ डाक्टर का कहना है कि जिन्हें कोरोना वायरस की ड्यूटी नहीं दी गयी थी ऐसे डॉक्टर भी कोरोना की गिरफ्त में हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के चार डॉक्टरों और कुछ नर्सों ने अपना इस्तीफा भेजा था। उल्टा इन डाक्टरों को उत्तरी दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन की तरफ से सख्त कार्रवाई की सूचना भेज दी गयी। म्युनिसिपल की तरफ से भेजे गये संदेश में साफ कहा गया कि इन डाक्टरों और नर्सों के इस्तीफों को स्वीकार नहीं किया जायेगा और इनके नाम मेडिकल काउंसिल या नर्सिंग काउंसिल को भेज कर इनके खिलाफ अनशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी। टेलीग्राफ की इस रिपोर्ट में नयी दिल्ली एम्स के रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के महासचिव श्रीनिवास राजकुमार के हवाले से बताया गया है कि पूरे देश में कोरोना वायरस से लड़ रहे डाक्टरों और नर्सों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिनसे वह खुद इस बीमारी से बच सकें। राजकुमार ने बताया कि मास्क और तमाम सुरक्षित संसाधनों की कमी की वजह से डॉक्टरों और नर्सों में ही नहीं स्वास्थ्य सेवा में जुटे सभी लोगों में डर का माहौल है। पोस्टग्रेजुएकट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महेश देवनानी ने अपने ट्वीटर हैंडल पर देश भर में कोरोना वायरस से संक्रमित स्वास्थ्य समुदाय से जुड़े लोगों के बारे में तमाम जानकारियां इक्ट्ठा की हैं। इसमें दिल्ली, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित डाक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों की जानकारी मौजूद है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ अस्पतालों में मुहैया किये गये सुरक्षा संसाधनों और मास्क की क्वालिटी इतनी खराब हैं कि इस्तेमाल करते वक्त ही वह खराब हो जा रहे। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि स्वास्थ्य समुदाय नहीं चाहता कि इलाज कर रहे डाक्टर और नर्स खुद इस बीमारी से संक्रमित हो जायें। अगर ऐसा होता है तो वो जिन स्वास्थय कर्मियों के संपर्क में आएं उनका भी पता लगाना होगा। इस प्रकार से यह कड़ी बढ़ती ही जाएगी और हालात को संभालना काफी मुश्किल हो जाएगा। टेलीग्राफ की इस खबर से आसानी से समझा जा सकता है कि कोरोना से जंग लड़ रहे डाक्टरों और दूसरे मेडिकल स्टाफ संसाधनों की कमी की वजह से इस वायरस की चपेट में आने का जोखिम उठा रहे हैं। मगर सरकार अपनी पीठ थपथपाते नहीं थक रही कि स्वास्थ्य सुविधाओं में कहीं कोई कमी नहीं है। कोलकाता की पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

Dakhal News

Dakhal News 4 April 2020


bhopal, Why not  insurance, journalists coverage, Corona period

भारत सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संस्था प्रेस एसोसियेशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि कोरोना वायरस के खतरे के तहत अस्पतालों में जुटे डॉक्टर्स, नर्स और अन्य मेडिकल सेवा के लिए जिस तरह पचास लाख के इंश्योरेंस की घोषणा की गई वैसे ही पत्रकारों के लिए भी इंश्योरेंस की घोषणा की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने कोरोना की विषम परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवा में जुटे मेडिकल सेवा के लिए पचास लाख रुपए इंश्योरेंस की घोषणा की है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में प्रेस एसोसिएशन ने अनुरोध किया है कि मेडिकल सेवा के साथ उस लिस्ट में पत्रकारों को भी जोडा जाए। प्रधानमंत्री को याद दिलाया गया कि मीडिया के कामकाज को जरूरी सेवाओं में शामिल कर उनके कामकाज का उन्होंने खुद अभिवादन किया है। प्रेस एसोसिएशन ने कहा कि पत्रकारों के लिए भी इंश्योरेंस सेवा लागू होने से ग्राउंड ज़ीरो से पल पल की खबरें देश को पहुंचा रहे, राष्ट्र सेवा में जुटे पत्रकारों और उनके परिजनों को लगेगा कि केंद्र सरकार को उनकी भी उतनी ही चिंता है।

Dakhal News

Dakhal News 4 April 2020


bhopal, Tabligi Jama Corona

तबलीगी जमात के जलसे में शामिल अधिकतर लोगों के कोरोना संक्रमित होने से पूरे देश में कोहराम मच गया है। निजामुद्दीन को संक्रमण का केंद्र माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल लोगों से अब अन्य 20 राज्यों में भी कोरोना का संक्रमण फैलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म होता जा रहा है। निजामुद्दीन केंद्र के कोविड-19 मामलों से देश में खतरे की घंटी बज गयी है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के पुख्ता इंतजाम के दावे भी किये जा रहे हैं। आइए देखते हैं अंग्रेजी औऱ हिंदी अखबारों ने किन खबरों को कितनी अहमियत दी है। द हिंदू में सौरभ त्रिवेदी और निखिल एम.बाबू की रिपोर्ट जिसका शीर्षक हिंदी मे कुछ इस प्रकार होगा- तबलीगी जमात के अधिकारियों पर कानून तोड़ने का आरोप। इस खबर में बताया गया है कि निजामुद्दीन थाने में मरकज के प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद व अन्य पर केस दर्ज किया गया। इस खबर में बताया गया है कि चार सौ से अधिक लोगों को कोविड 19 के लक्षण देख कर अस्पताल में दाखिल कराया गया और तकरीबन एक हजार लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है। अधिकारियों को डर है कि जो लोग यहां से दूसरे शहरों में अपने घरों में जा पहुंचे हैं, वो सभी न जाने कितने और लोगों को संक्रमित किया होगा। इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है। इनके खिलाफ आईपीसी के तहत बीमारी फैलाने के लिए लापरवाही बरतने, घातक व नुकसानदेरह काम करने, दूसरे की जान जोखिम में डालने, सरकारी आदेश के उल्लंघन और आपराधिक षडयंत्र के अलावा महामारी एक्ट 1897 के तहत केस दर्ज हुआ है। इसी अखबार में जेकॉब कोशी की बाइलाइन से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका शीर्षक है- मास्क के इस्तेमाल पर स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर में मतभेद। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच मास्क पहनने और न पहनने को लेकर मतभेद सामने आये हैं। द हिंदू में ही शोभना के.नायर और जेबराज की रिपोर्ट का शीर्षक है- जबरन रोके गये मजदूर, अब भूखमरी से लड़ रहे। इस रिपोर्ट में प्रवासी मजदूरों के दर्द और तकलीफ को बयां किया गया है। इस खबर में बताया गया है कि विश्व में कोरोना वायरस का सामना कर रहे अधिकतर देशों ने घर में रहें, सुरक्षित रहें पर अमल करने की कोशिश की है। भारत में भी लॉकडाउन जारी कर हर नागरिक को घरों में रहने की हिदायत दी जा रही है। सीमाओं को भी सील किया जा चुका है ताकि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। ऐसे हालात में बिना काम और पैसों की किल्लत से परेशान मजदूरों और गरीबों को भूखमरी का सामना करना पड़ रहा है। सच तो यही है कि सरकार भले ही कितने भी दावे कर ले मगर गरीबों के रहने खाने का भरपूर प्रबंध नहीं हो पाया है। द इंडियन एक्सप्रेस में अबंतिका घोष की जो रिपोर्ट छपी है उसका शीर्षक है- आईसीएमआर ने माना भारत में अब भी संक्रमण कम है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तबलीगी जमात से देश भर में संक्रमण फैलने की आशंका के बाद भी आईसीएमआर को अब भी यकीन है कि विश्व में जिस तेजी से कोरोना का कहर बढ़ रहा है उसके मुकाबले भारत में संक्रमण अब भी कम है। सरकार के बाद भारत की प्रमुख संस्थाओं से इस तरह के बयान जारी कर यकीनन जनता के डर को कम करने की कवायद ही की जा रही है। इसी अखबार में सौम्या लखानी और सौरभ रायबर्मन की रिपोर्ट छपी है। इस खबर में लिखा है कि निजामुद्दीन केंद्र को खाली कराया गया है औऱ केजरीवाल ने मामले बढ़ने पर चेताया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इसे गैरजिम्मेदाराना करार दिया है। इसी बीच आप के विधायक अमानतुल्ला खान ने दिल्ली पुलिस को कटघरें में खड़ा कर सवाल दाग दिया कि उनके सूचना देने के बाद भी आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाया गया। देश कोरोना के कहर से जूझ रहा है। मगर केंद्र और राज्य सरकारें अब आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुट गयी हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की जगह दूसरे पर ही दोष मढ़ने में व्यस्त हो गया है। द हिंदू में एक चौंकाने वाली खबर आत्री मित्रा के नाम से प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है- 24 घंटों में तीन मौतें, एक मरीज जनरल वार्ड मे था। हावड़ा के अस्पताल में कोरोना वायरस से पीड़ित 48 वर्षीय महिला की मौत के बाद काफी हंगामा मचा है। महिला की मौत के बाद अस्पताल के 29 कर्मचारियों को क्वारंटाइन में रखा गया है। आरोप है कि महिला को जनरल वार्ड में रखा गया था। इसी बीच कोरोना के दो मरीजों की मौत की खबर आयी है जिसमें एक हावड़ा के 52 वर्षीय व्यक्ति और कोलकाता के एक 62 वर्षीय व्यक्ति शामिल हैं। पिछले चौबीस घंटों में कोरोना से तीन लोगों की मृत्यु के बाद से पश्चिम बंगाल में कोरोना से मरने वालों की संख्या पांच हो गयी है जबकि 37 लोग कोरोना से संक्रमित पाये गये हैं। हिंदी अखबारों में आज सबसे पहले अमर उजाला की बात करते हैं जिसकी लीड खबर का शीर्षक है- देश भर में खौफ का वायरस, 74 और जमाती संक्रमित। इस खबर में बताया गया है कि देश में कोरोना वायरस के मरीज लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। निजामुद्दीन मे आयोजित तबलीगी जमात का जलसा देश में कोरोना के संक्रमण का बड़ा स्त्रोत बन चुका है। जलसे में देश के 20 राज्यों के साथ-साथ 16 देश के जमाती भी शामिल हुए थे। इसके अलावा रूटिन खबरें छपी हैं जिसमें कोरोना के मरीजों के लगातार बढ़ते मामलों का जिक्र किया गया है। दिल्ली में तीसरे दिन भी 23 नए रोगी मिलने की पुष्टि हुई है। इसी बीच एक खबर और भी छपी है जिसका शीर्षक है- तब्लीगी कार्यक्रमों के लिए नहीं मिलेगा पर्यटक वीजा। हिंदुस्तान ने दूसरे अखबारों की तरह निजामुद्दीन की खबर को ही लीड बनाया है जिसमें बताया गया है कि मरकज ने 20 राज्यों को मुश्किल में डाला है। हालांकि पटना संस्करण में कुछ एक्सक्लूसिव खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। इस खबर का शीर्षक है- 85 लाख उज्ज्वला लाभार्थी आज से खाते में पाएंगे गैस की राशि। राहत की खबर बताते हुए हिंदुस्तान में लिखा है कि पटना में रसोई गैस सिलेंडर 65 रुपये सस्ता कर दिया गया है। इस खबर के अनुसार बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में एक अप्रैल से कमी की गयी है। पटना में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 65 रुपये घटा दिया गया है। इन सबके साथ ही सरकार कितनी तेजी से हालात नियंत्रित कर रही है। इसका पक्ष रखते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बारे में भी एक खबर छापी गयी है जिसका शीर्षक है- स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेटंर में सरकारी कर्मी तैनात हों– सीएम। हिंदुस्तान ने लिखा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि गांवों के स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेंटर में लोगों के ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था रखें। इन केंद्रों पर सरकारी कर्मचारी को प्रभारी बनाकर बेहतर ढंग से काम कराएं। जाहिर है अखबारों में इन खबरों से यही संदेश दिये जाने की कोशिश की जा रही है कि कोरोना के कोहराम से लड़ने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। सरकार की तरफ से कोताही नहीं बरती जा रही है। नवभारत टाइम्स ने भी निजामुद्दीन की खबर को ही लीड लिया है। मगर एंकर में आर्थिक पहलू का जिक्र करते हुए सिंगल कॉलम में छोटी सी खबर प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है- छोटी बचत की ब्याज दरों में बड़ी कटौती। जबकि कोरोना का कहर झेल रही जनता की जेब पर सरकार के इस कदम से कितना भारी बोझ बढ़ेगा। इसका ब्यौरा देते हुए इस खबर को प्रमुखता दी जानी चाहिए थी। इसी खबर के साथ नवभारत में एक खबर और छापी गयी है जिसमें बताया गया है कि भीषण मंदी का साया है पर भारत-चीन बच सकते हैं। पाठकों को राहत देने के मकसद से ही इस खबर को छाप दिया गया है जिससे लोग आश्वस्त रहें कि उनकी मुश्किलें ज्यादा नहीं बढ़ेंगी। दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपी एंकर स्टोरी ने ध्यान आकर्षित किया है । इस खबर में बताया गया है कि न्यूयार्क इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोध के अनुसार बीसीजी का टीका कोरोना की ढाल बन सकता है। इस खबर की मानें तो जिन देशों में बीसीजी का टीका नहीं लगा, वहां कोरोना का खतरा ज्यादा है। अमेरिकी शोध संस्थान ने विश्व भर में फैले कोरोना संक्रमण की वर्तमान स्थिति के आधार पर भविष्य की स्थित का आंकलन किया है। इसके परिणाम भारत सहित उन देशों के लिए सुखद हैं, जहां सालों से बीसीजी ( बैसिलस कैलमेट-गुएरिन ) का टीका लगता आया है। इसी खबर की बगल में सिंगल कॉलम में एक खबर छपी है। यह खबर है पीएम मोदी की मां हीराबेन के बारे में जिन्होंने 25,000 रुपये की मदद की है। पीएम केयर्स फंड में हीराबेन ने बचत के पैसे दान किए हैं। मोदी ने ट्वीट कर कहा यह मां का आशीष है। हैरत की बात है कि टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया में छाए रहने वाले पीएम मोदी की मां की यह खबर हाशिए पर रही। यह भी कोई विशेष रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। शायद यही की पीएम अपने सगे संबंधियों ही नहीं मां से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से नहीं छपवाते। पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

Dakhal News

Dakhal News 2 April 2020


bhopal, Poster of Sonia Gandhi missing in Rae Bareli

अजय कुमार, लखनऊ लखनऊ। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में 26 मार्च की रात ‘लापता सांसद’ के पोस्टर लगाए गए। रविवार की सुबह जब लोगों की नजर इन पोस्टरों पर पड़ी तो चर्चा शुरू हो गई। इन पोस्टरों में सोनिया गांधी के संकट की इस घड़ी में अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर होने पर सवाल उठाए गए। पोस्टर के शीर्षक में ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा नजर आ रहा है। इतना ही नहीं पोस्टर में सबसे अमीर सांसदों में से एक कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा चुनाव क्षेत्र में कोई वित्तीय सहायता नहीं देने पर भी सवाल उठाया गया। पोस्टर में आगे लिखा है, ‘तुम्हारा हाथ, न जाने हमारा साथ,’ ‘सबसे बुरी भूल, तुमको किया कबूल’ भी लिखा नजर आ रहा था। गौरतलब हो इस तरह के पोस्टर चिपकाए जाने से एक दिन 27 मार्च को ही सोनिया गांधी ने रायबरेली के जिला मजिस्ट्रेट को एक पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में कोरोनो वायरस का मुकाबला करने के लिए एमपीएलएडी योजना के तहत सभी निधियां देने का वादा किया था। बहरहाल, इस पोस्टर में किसी का नाम नहीं है और प्रिंटर का नाम भी नहीं दिया गया है जो कि अनिवार्य होता है। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का कहना था कि इन पोस्टरों के सहारे कुछ लोगों ने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की मानसिकता को दर्शाया है, जो इस संकट के समय का उपयोग राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं। सोनिया गांधी हमेशा अपने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ी रही हैं और दो दिन पहले ही उन्होंने कोरोना संकट के लिए अपना सारा फंड दे दिया। जनता सच्चाई जानती है और इस निम्न स्तर की राजनीति से गुमराह नहीं होगी। कांग्रेस जिलाध्यक्ष पंकज कुमार ने पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की और जिला प्रशासन से इस पर ध्यान देने को कहा है।

Dakhal News

Dakhal News 2 April 2020


bhopal, The noise in the media on the corona will now cease to be shown

क्या मीडिया में लॉकडाउन की परेशानी का शोर अब थम जाएगा…. मेरा मानना है कि कोरोना पर मीडिया में शोर अब थम जाएगा। जो दिखाना था दिखा लिया गया। अब मजदूरों के पलायन की चर्चा रुक जाएगी। राहत सामग्री बंटने की खबरें दिखेंगी और अब सब ठीक बताया जाएगा। इसका कारण यह है कि सरकार ऐसे ही काम करती है। जमीन पर काम करने से ज्यादा अखबारों में और अखबार वाले खुशी-खुशी सेवा करते हैं। निश्चित रूप से खबरों का चयन संपादकीय विवेक और प्राथमिकता का मामला है और पहले पन्ने पर खबर नहीं होने का मतलब नहीं है कि खबर अखबार में ही नहीं है और पाठक को जानकारी ही नहीं है। फिर भी संपादक अपने अखबार में किस और कैसी खबर को प्राथमिकता देगा यह पहले से तय हो और उसकी भविष्यवाणी की जा सके तो अखबार की खबरों का क्या भरोसा? आइए आपको बताऊं कि आज अखबारों में क्या है। सबसे पहले द टेलीग्राफ का पहला पन्ना देखिए। पहली फोटो एक व्यक्ति के जख्मी पैरों की है। कैप्शन में बताया गया है यह इलाहाबाद की सीमा पर आराम कर रहे एक दिहाड़ी मजदूर के पैर हैं जो जाहिर है, लॉक डाउन के बाद पैदल चलने से जख्मी हो गए हैं। अखबार में एक और फोटो बरेली में पैदल जा रहे लोगों पर कीटनाशकों का छिड़काव किए जाने की खबर के साथ है। मुझे लगता है कि आज के लिए ये दोनों खबरें सबसे महत्वपूर्ण हैं। पर मीडिया क्या बता रहा है? पैदल निकले प्रवासी मजदूरों को रास्ते में मना लिया गया है। वे सरकारी व्यवस्था में हैं। उन्हें ठीक से खाना मिल रहा है और रास्ते पर कोई नहीं है। सरकार यही बताना चाहेगी और अखबार यही बता रहे हैं। या चुप हैं। वरना ये दो खबरें सभी अखबारों में पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। पैदल चलने वाले मजदूर के जख्मी पैर की फोटो हिन्दी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें किसी में नहीं है। पैदल जा रहे मजदूरों पर कीटनाशक छिड़कने की खबर (फोटो के साथ, पहले पन्ने पर) अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका में है। अमर उजाला की पूरी खबर कोरोना से संबंधित है और प्रवासी मजदूर सड़क पर हैं, उनके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ इससे ज्यादा प्रमुखता मरीजों और मरने वालों की संख्या को दी गई है। प्रवासियों की स्थिति बताना सरकारी व्यवस्था की पोल खोलना है पर जो मौतें हो रही हैं वह सरकारी इंतजामों के बावजूद हो रही है – इसका अंतर आप समझ सकते हैं। यही नहीं, कोरोना से संबंधित कोई भी खबर छापना मना है। पर दैनिक जागरण में खबर है, 23 डिग्री सेल्सियस पर मरे आधे कोरोना वायरस। वाराणसी डेटलाइन से हिमांशु अस्थाना की बाईलाइन वाली खबर में यही बताने की कोशिश की गई है कि कोरोना तो बस गया समझो। गर्मी आई नहीं कि वायरस मरने लगे। अगर यह खबर वाकई गंभीर है तो सभी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से क्यों नहीं होनी चाहिए। और सरकार को ही क्यों नहीं जारी करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि खबर बिल्कुल हवा हवाई है। बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और दिल्ली स्थित आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के डॉ. प्रमोद कुमार ने अपने लैब में शोध से यह निष्कर्ष निकाला है। दैनिक भास्कर (पटना) में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। अब आप इसका जो मतलब लगाना चाहें लगाइए। मैं इसे माहौल बनाना कहता हूं। वह इसलिए भी कि एक तरफ अगर जरूरी खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं तो दूसरी तरफ लॉक डाउन नहीं बढ़ेगा को पूरी प्राथमिकता दी गई है। दैनिक जागरण में यह सेकेंड लीड है जबकि तब्लीगी मरकज में शामिल छह लोगों की तेलंगाना में मौत लीड है। इसका उपशीर्षक है, लॉक डाउन के दौरान निजामुद्दीन में आयोजन में शामिल हुए थे। अमर उजाला ने इसे सात कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है। और इसके साथ ऐसी तस्वीर है कि आप कपड़े देखकर इनका धर्म जान लेंगे। लगभग ऐसा ही नवोदय टाइम्स और नवभारत टाइम्स में भी है। हिन्दुस्तान में इसे लीड के साथ छापा गया है और लीड है, लॉकडाउन बढ़ाने का इरादा नहीं। यहां समझने वाली बात यह है कि जब लॉकडाउन बगैर किसी पूर्व सूचना या योजना के लगाया गया तो दोबारा पूर्व सूचना दी जाएगी यह कहां जरूरी है. जब लगाने की जरूरत पहले तय नहीं हो पाई तो बढ़ाने की जरूरत पहले कैसे तय हो सकती है। वैसे भी लाकडाउन की घोषणा किसी ने की और कोई दूसरा कह रहा है कि इसे बढ़ाया नहीं जाएगा। ऐसे में इसे कितना महत्व देना है यह समझना मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद यह राजस्थान पत्रिका में भी लीड है। ऐसा नहीं है कि खबरों का जो महत्व मैं बता रहा हूं वह कोई बहुत महान और गंभीर पत्रकारों को ही समझ में आएगा। इसके बावजूद अलग तरह की खबरों को महत्व देना और असली खबरों को महत्व नहीं देना कुछ संकेत तो देता ही है। हो सकता है मैं गलत होऊं पर पत्रकारिता चल ऐसे ही रही है। राजस्थान पत्रिका में आज पहले पन्ने पर एक खबर है, पैदल घर लौटने की कवायद में 29 कामगार सड़कों पर जान गंवा चुके हैं। क्या यह सामान्य है? या यह सूचना नजरअंदाज करने लायक है पर किसी अखबार में टॉप पर नहीं है। राजस्थान पत्रिका में भी नहीं। इसके साथ यह भी उल्लेखनीय है कि दैनिक हिन्दुस्तान ने पहले पन्ने पर लगभग आधे पेज के साथ सिर्फ एक फोटो छापी है। इसका कैप्शन है, नई दिल्ली के आनंद विहार में बस अड्डे पर सोमवार को लॉकडाउन का पालन कराने के लिए तैनात बीएसएफकर्मी। इससे आपको यह भरोसा होगा कि दिल्ली में अब सब ठीक है और दिल्ली छोड़कर जाना चाहने वाले अब सब संतुष्ट हैं। इसमें यह नहीं पूछेंगे कि केजरीवाल ने इनके घरों की बिजली और पानी के कनेक्शन कटवाए थे उसका क्या हुआ? जुड़ गए या कटे ही नहीं थे? सड़क पर पैदल चलते प्रवासियों के साथ बस पकड़ने आनंद विहार पर जुटी भीड़ को देखकर दुनिया भर में लॉक डाउन नाकाम होने की चर्चा उड़ी तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया गया। भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाए और आम आदमी पार्टी ने अपना भरपूर बचाव किया। कल द टेलीग्राफ में इस आशय की एक खबर भी थी। हिन्दी के पाठकों के लिए मैंने उसका अनुवाद कर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। इसके बावजूद, बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने आरोप लगाया है कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने सुनियोजित तरीकों से बसों में ढूंसकर 50 हजार से अधिक बिहारियों को एक साथ दिल्ली से निकला। दैनिक भास्कर ने पटना संस्करण में इस आरोप को पहले पन्ने पर छापा है लेकिन इस खबर में यह नहीं बताया गया कि वे बिहार पहुंचे कि नहीं और पहुंचे तो सब अपने घर गए या उन्हें एक जगह रखा गया है या रास्ते में कहीं रोक लिया गया। सरकारी प्रचार जैसी एक और खबर आज के दैनिक जागरण में है। इसका शीर्षक है, लॉकडाउन का असर: अब तक थमा है कोरोना वायरस का प्रसार। अमर उजाला में खबर है, एक दिन में 227 और मरीज, सात की मौत। इसका फ्लैग शीर्षक है, 1200 पार हुआ मरीजों का आंकड़ा … देश भर में अब तक 32 की मौत, दिल्ली में 25 और मिले। जबकि दैनिक जागरण की खबर है, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के अनुसार, भारत में कोरोना के मरीजों की संख्या 100 से 1000 पहुंचने में 12 दिन लगे हैं। इसकी तुलना दुनिया के दूसरे विकसित देशों से करें, तो वहां 12 दिनों में संख्या 100 से बढ़कर आठ हजार तक पहुंच गई थी। उन्होंने कहा, इसे आगे बनाए रखने को सौ फीसद अलर्ट रहने व सरकार के निर्देशों का कड़ाई से पालन करने की जरूरत है। लव अग्रवाल ने कोरोना के प्रसार की गति कम होने का श्रेय लॉकडाउन और दूसरे एहतियाती उपायों को देते हुए कहा कि जिन देशों ने समय पर एहतियाती कदम नहीं उठाए, उन देशों में यह बेकाबू होता गया। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों कबरें सही हैं। खेल प्रस्तुति का है।

Dakhal News

Dakhal News 31 March 2020


bhopal, Positive Journalist!

Pushya Mitra : इस वक़्त आप पॉजिटिव पत्रकार कैसे हो सकते हैं? कुछ टिप्स- हर समस्या की वजह विपक्ष और जनता में, गरीबों में, दलितों में, अल्पसंख्यकों में ढूँढिये। राहुल गांधी, केजरीवाल, लालू, नेहरू और पाकिस्तान में ढूँढिये। चीन में ढूँढिये। फिर भी काम न चल रहा हो तो नीतीश जैसों में भी ढूंढ लीजिये। भाजपा, मोदी और उनके लोगों में मत ढूँढिये। सरकार की विफलता की बात मत कीजिये, यह वक़्त सरकार की आलोचना करने का नहीं है। बेचारी हतोत्साहित हो जाएगी। चुप रहकर देखिये, मोदी जी ने किया है, ठीक ही किया होगा। ऐसा लग रहा हो तो राष्ट्र के लिये थोड़ी कुर्बानी दीजिये। कुछ दिन ऐसा करके देखिये। आपको लोग पॉजिटिव मानने लगेंगे। Samarendra Singh : संधी लौंडों को मौका मिल गया है। चौके-छक्के मार रहे हैं। ब्रज में देसी-विदेशी गोपियों संग होली खेल रहे थे तो कोरोना नहीं फैला? 19-20 मार्च तक तिरुपति बालाजी और बाबा जगन्नाथ से लेकर सभी मंदिर खुले थे और भजन कीर्तन जारी था मगर वहां भी कोरोना नहीं फैला! बस 13-15 मार्च को निजामुद्दीन में ही फैला है! इन संधी लौंडों और पंडों को मुल्लों ने और मीडिया ने एक और अवसर दिया है राजनीति करने का अगले कुछ दिन इसी के नाम। जय कोरोना!     निज़ामुद्दीन में लोग छिपे होते हैं। लेकिन वैष्णो देवी में लोग फँसे होते है। शब्दों के बारीक हेरफेर से न्यूज़ में नफ़रत की खेती होती है। विवेक राव

Dakhal News

Dakhal News 31 March 2020


bhopal,  FIR , Corona infected journalist ,former CM, press conference

भोपाल।  मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल पुलिस ने कोरोना वायरस संक्रमित एक पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया है। उक्‍त पत्रकार कोराना (कोविड-19) से संक्रमित था इसके बाद भी वे पूर्व सीएम कमलनाथ की आहूत पत्रकार वार्ता में शामिल होने पहुंच गए थे, जबकि चिकित्‍सकों द्वारा  इस पत्रकार की बेटी के लंदन से वापस लौटने पर कोरोना संक्रमित पाए जाने पर पूरे परिवार को घर में पृथक रहने की सलाह दी गई थी।    उल्‍लेखनीय है कि पूर्व मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने अपने पद से त्‍याग देने के पूर्व पत्रकारों को  20 मार्च को मुख्यमंत्री निवास में प्रेसवार्ता में शामिल होने के लिए बुलाया था। जिसमें कि लगभग सभी प्रमुख मीडिया संस्‍थानों के 200 से अधिक पत्रकार शामिल हुए थे। पत्रकारों से हुई बातचीत के बाद पत्रकार की बेटी और दो दिन बाद स्वयं पत्रकार के कोराना (कोविड-19) के संक्रमण की पुष्टि हुई थी।  वर्तमान में पिता और पुत्री दोनों इलाज के लिए भोपाल के एम्स में भर्ती हैं।    भोपाल पुलिस के प्रवक्ता ने बताया कि शहर के श्यामला हिल्स पुलिस थाने में इस पत्रकार के खिलाफ भादंवि की धारा 188 (सरकारी सेवक के कानूनी आदेश की अवहेलना), धारा 269 (उपेक्षापूर्ण कार्य जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य हो), धारा 270 (परिद्वेषपूर्ण कार्य, जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य हो) के तहत मामला दर्ज किया गया है।  उनका यह भी कहना था कि कोरोना वायरस महामारी से संबंधित सरकार के प्रतिबंधात्मक आदेश का उल्लंघन करने पर पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है ।    इस घटना के बाद प्रदेश की राजधानी में रह रहे अनेक पत्रकारों ने स्‍वयं को होम कोरंटाइन कर लिया है, वहीं कई प्रशासनिक अधिकारी व पूर्व मंत्री एवं विधायक जोकि इस पत्रकार वार्ता में मौजूद थे, उन्‍होंने भी एतिहातन अपने को 14 दिन के लिए परिवार से अलग कर लिया है, जबकि कई लोग इस बीच अपनी कोरोना जांच करा चुके हैं, जिसमें कि अब तक सभी की रिपोर्ट नेगेटिव आई है।    वहीं, पूर्व मंत्री सचिन यादव ने शनिवार को इस बारे में ट्वीट कर जानकारी दी है। साथ ही उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों और अन्य लोगों से भी सावधानी बरतने का आग्रह किया हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा ‘20 मार्च को कमलनाथ जी की आयोजित प्रेसवार्ता में मौजूद एक पत्रकार साथी कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं, इसीलिए सावधानी के तौर पर मैं सेल्फ़-आइसोलेशन में हूँ एवं पत्रकार साथियों से भी अनुरोध है अपना ख्याल रखें। मैं सरकार के सभी आवश्यक निर्देशों का पालन कर रहा हूँ और आप भी करें’।    इसी तरह से कमलनाथ की प्रेस वार्ता में मौजूद ग्वालियर से कांग्रेस विधायक प्रवीण पाठक ने भी सावधानी के तौर पर पहले ही खुद को होम आइसोलेट कर लिया है। वहीं पूर्व पशुपालन मंत्री और भितरवार से कांग्रेस विधायक लाखन सिंह ने भी अपना मेडिकल चेकअप करवाया है । हालांकि डॉक्टर ने सब सामान्य बताया है।    उधर,  प्रशासन ने भी तत्काल पत्रकार और उनके परिवार समेत इनके संपर्क में आए लोगों से होम क्वारेंटाइन की अपील की थी । अब तक ज्‍यादातर की जांच हो चुकी है।  शेष की जांच कराई जा रही है। बतादें कि आरोपी पत्रकार की 26 वर्षीय बेटी लंदन में कानून की पढ़ाई कर रही है1  18 मार्च को उसके लंदन से भोपाल आने पर परिवार को घर में पृथक (होम क्वारेंटाइन) की सलाह दी गई थी लेकिन उसके आने के दो दिन बाद ही, 20 मार्च को ये पत्रकार मुख्यमंत्री निवास पत्रकार प्रेसवार्ता में शामिल होने पहुंच गए थे ।   

Dakhal News

Dakhal News 28 March 2020


 Publication , newspapers, Maharashtra ,closed till 31 March

देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई सहित पूरे महाराष्ट्र में पहली बार ऐसा हुआ है कि समाचार पत्रों का प्रकाशन लगातार हफ्ते भर से ज्यादा दिनों के लिए स्थगित रखना पड़ा हो। नई जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अखबारों को अब 31 मार्च तक के लिए बंद कर दिया गया है। बताते हैं कि पिछले रविवार को मुम्बई सहित आसपास में समाचार पत्रों की प्रिंटिंग पूर्व की तरह हुई लेकिन कोरोना वायरस के खौफ और जनता कर्फ्यू के कारण समाचार पत्र विक्रेताओं ने समाचार पत्रों को बांटने के लिए नहीं खरीदा। इसके बाद प्रिंटिंग पेपर वापस अखबार प्रबंधन के लोगों ने मंगा लिया। उसके बाद रविवार की रात से मुम्बई की लाइफलाइन लोकल ट्रेन बंद हो गयी जिसे देखते हुए अखबारों का प्रकाशन नहीं हुआ। सोमवार को समाचार पत्र विक्रेताओं के संगठन बृहनमुंबई वृतपत्र विक्रेता संघ ने दोपहर 12 बजे उद्योगमंत्री सुभाष देसाई से मुलाकात की जिसमे सभी संगठन के प्रतिनिधियों ने इस चर्चा में हिस्सा लिया। इस चर्चा में दिनोदिन बढ़ रहे कोरोना वायरस के संक्रमण से सुरक्षा को देखते हुए तय किया गया कि 24 मार्च और 25 मार्च को समाचार पत्रों का वितरण नहीं किया जाएगा। उसके बाद अगली परिस्थिति की समीक्षा कर अगला निर्णय 26 मार्च से लिया जाएगा। आज 25 मार्च को फिर समाचार पत्र विक्रेताओं के संगठन के पदाधिकारियों की बैठक हुई जिसमें तय हुआ कि 31 मार्च तक पूरे राज्य में समाचार पत्रों की विक्री नही की जाएगी और 29 मार्च को संगठन की फिर बैठक होगी जिसमें स्थिति की समीक्षा कर आगे की रणनीति तय की जाएगी। उधर, सोमवार देर शाम महाराष्ट्र सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में कर्फ्यू लगा दिया है। राज्य में कर्फ्यू और ऊपर से लोकल ट्रेन बन्द और 14 अप्रैल तक राष्ट्र व्यापी लॉक डाउन।जब तक लोकल चालू नहीं होगी तब तक ज्यादातर प्रिंट मीडिया के कर्मी घर पर रहेंगे। ऐसे में महाराष्ट्र में अखबारों का प्रकाशन कब शुरू होगा कोई नहीं जानता। आपको बता दें की ऐसा पहली बार हुआ है जब इतने लंबे समय तक मुम्बई में लोकल ट्रेन और समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद रहेगा। कुछ अखबार ऑनलाइन एडिशन अपडेट कर रहे हैं और रिपोर्टरों को बोलकर खबर मंगा रहे हैं। उधर राज्य सरकार और महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने एक आदेश जारी किया है कि राज्य में कोरोना वायरस से सुरक्षा के लिए सभी निजी कंपनियों को बंद किया जा रहा है। सरकारी परिपत्रक में कहा गया है कि न तो कर्मचारी को हटाना है और न ही उनका वेतन काटना है। कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर है।   शशिकांत सिंहपत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट

Dakhal News

Dakhal News 25 March 2020


bhoapl, Corona test result , senior journalist, came positive

भोपाल। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी श्री सुधीर कुमार डेहरिया ने बताया कि विगत दिनों कोरोना संक्रमण पॉजिटिव पाई गई लड़की के पिता का कोरोना संक्रमण सेम्पल भी पॉजिटिव आया है। सीएचएमओ डेहरिया ने बताया कि के.के. सक्सेना के संपर्क में आये प्रत्येक व्यक्ति को 14 दिन तक होम आइसोलेशन में रहने की आवश्यकता है। 6 से 7 दिनों में सर्दी, खासी, बुखार आने पर तुरन्त कंट्रोल रूम से संपर्क करने की हिदायत दी जा रही है। लड़की के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार मिलने जुलने वाले 10 व्यक्तियों के सैंपल जांच हेतु भेजे गए थे। उनमें से 9 लोगो के टेस्ट नेगेटिव आए है , उनकी माताजी, भाई, घर मे काम करने वाले लोगो की रिपोर्ट नेगेटिव आइ है।   केवल उनके पिताजी का टेस्ट पॉजिटिव आया है जिन्हे इलाज हेतु एम्स हॉस्पिटल में भर्ती कराया जा रहा है।श्री डेहरिया ने आमजन से अपील की है कि किसी को पेनिक होने या घबराने की आवश्यकता नहीं है लड़की और पिताजी भी नार्मल है दोनों का इलाज एम्स में चल रहा है। साथ ही साथ कोरोना पॉजिटिव आए व्यक्ति से क्लोज कॉन्टैक्ट मे आए व्यक्तियों को स्वयं को 14 दिन तक होम क्वारेन्टाईन करने की हिदायत भी दी गई है।

Dakhal News

Dakhal News 25 March 2020


bhopal,  Through letter, Digvijay Singh, scandal on Scindia, auctioned ,mandate of MP

भोपाल। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बनने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मंगलवार को पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कटाक्ष करते हुए लिखा है कि सिंधिया मध्य प्रदेश के जनादेश को नीलाम कर गए। दिग्विजय सिंह ने यह पत्र सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है।  उन्होंने लिखा है कि पिछले दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ी और कांग्रेस की सरकार गिर गई। यह बेहद दुखद घटनाक्रम है जिसने न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं बल्कि उन सभी नागरिकों की आशाओं पर पानी फेर दिया, जो कांग्रेस की विचारधारा में यकीन रखते हैं। मुझे बेहद दुख है कि सिंधिया उस वक्त भाजपा में गए, जब वह खुलकर आरएसएस के असली एजेंडा को लागू करने के लिए देश को बांट रही है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि सिंधिया को कांग्रेस में उचित पद और सम्मान मिलने की संभावना समाप्त हो गई थी, इसलिए वह भाजपा में चले गए, लेकिन यह गलत है।सिंधिया गैर जिम्मेदार व्यक्ति को बनाना चाहते थे उपमुख्यमंत्रीदिग्विजय सिंह ने पत्र में आगे लिखा कि कांग्रेस ने सिंधिया को 2013 में प्रदेश अध्यक्ष बनाने का ऑफर दिया था, लेकिन तब वे केन्द्र में मंत्री बने रहे। फिर 2018 में चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपने समर्थक तुलसी सिलावट के नाम की पेशकश कर दी। कमलनाथ सिलावट को उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। सिलावट न सिर्फ भाजपा में ऐसे वक्त में जब राज्य में कोरोना वायरस की महामारी से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्री के नाते उन्हीं की थी। सिंधिया ऐसे गैर जिम्मेदार व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जो कांग्रेस की विचारधारा के प्रति बेईमान निकला।स्पेस छीनने के आरोप निराधारदिग्विजय सिंह ने पत्र में लिखा है कि सिंधिया के वैचारिक विश्वासघात को सम्माननीय बनाने के लिये सहानुभूति की आड़ लेने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि कमलनाथ और दिग्विजय ने पार्टी में उनका स्पेस छीन लिया था। इसीलिए पार्टी में वह घुटन महसूस कर रहे थे। यह आरोप निराधार हैं। ऐसा कहने वाले लोग पार्टी का इतिहास नहीं जानते हैं। वे भूलते हैं कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से मजबूत नेताओं की सामूहिक पार्टी रही है। मेरे 10 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ला, शंकरदयाल शर्मा, माधवराव सिंधिया, मोतीलाल वोरा, कमलनाथ, श्रीनिवास तिवारी जैसे सम्मानित और बड़े जनाधार वाले नेता कांग्रेस पार्टी में थे। इन सभी को मेरी ओर से सदैव मान सम्मान मिला था। सभी मिलकर कांग्रेस को मजबूत भी करते थे। यही कारण है कि 1993 के बाद 1998 में कांग्रेस को दोबारा जनादेश मिला था।सिंधिया की तरह सत्ता का लोभ मेरी राजनीति का ध्येय नहींउन्होंने आगे लिखा है कि घर को बचाने के लिए घर में आग लगा देना समझदारी नहीं। सिंधिया देश में कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च नेताओं में से थे। वह एआईसीसी के महामंत्री के पद पर नियुक्त हुए थे। वे भी प्रियंका गांधी के साथ उत्तरप्रदेश के प्रभारी बनाए गये थे। पार्टी से उन्हें बहुत कुछ मिला था। पार्टी को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम समझना कितना उचित है। 2003 में जब मेरे नेतृत्व में पार्टी मध्यप्रदेश में चुनाव हार गई थी, तब मैंने प्रण लिया था कि दस वर्ष तक मैं कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करूंगा। सिंधिया की तरह सत्ता का लोभ ही मेरी राजनीति का ध्येय होता, तो कांग्रेस के शासन वाले इन वर्षों में मैं सत्ता से दूर नहीं रहता, लेकिन राजनीति में जनसेवा का रास्ता हमेशा सत्ता की गली से नहीं गुजरता है।राजमाता मुझे जनसंघ में ले जाना चाहती थींदिग्विजय ने पत्र में आगे लिखा है कि मैंने 1971 में कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी तो ये एक वैचारिक निर्णय था। राजमाता सिंधिया मुझे जनसंघ में ले जाना चाहती थी, लेकिन उस विचारधारा से मैं एकमत नहीं था और 1971 में मैं कांग्रेस में शामिल हो गया। स्वर्गीय माधव राव सिंधिया को कांग्रेस पार्टी में किसी प्रकार की शिकायत का कभी भी मौका नहीं दिया था। उनके दुखद निधन के पश्चात ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में और गांधी परिवार में बहुत प्यार और सम्मान मिला। उनके क्षेत्र के सभी निर्णय उन्हीं की सहमति से होते थे। ये कहना गलत है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं देना चाहती थी, इसीलिये वे भाजपा में चले गए। जहां तक मेरी जानकारी है, किसी ने इसका विरोध नहीं किया था। कांग्रेस के पास दो राज्य सभा सीट जीतने के लिए जरूरी विधायक संख्या थी। इसलिए मुद्दा सिर्फ सीट का नहीं था। मुद्दा केंद्र सरकार में मंत्री पद का था, जो सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही दे सकते थे। मोदी-शाह की इस जोड़ी ने पिछले 6 साल में इसी धनबल और प्रलोभन के आधार पर उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में सत्ता पर कब्जा किया है। मध्य प्रदेश के जनादेश की नीलामी सिंधिया स्वयं करने निकल पड़े, तो मोदी-शाह तो हाजिर थे ही, लेकिन अपने घर की नीलामी को सम्मान का सौदा नहीं कहा जाता।

Dakhal News

Dakhal News 24 March 2020


bhopal,  Digvijay Twitter, status changed ,Shivraj changed ,Chief Minister

भोपाल। शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार की रात चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मुख्यमंत्री बनते ही उनका ट्विटर स्टेटस भी बदला गया। मुख्यमंत्री बनने से पहले तक वह कामन मैन थे, लेकिन अब वे चीफ मिनिस्टर आफ मप्र हो गए हैं। वहीं, उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने तंज कसा है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने धनबल और छलबल से प्रदेश की कमान उन्हें सौंपी है। वक्त आने पर जनता इसका जवाब देगी। शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सोमवार को देर रात ही अपना ट्विटर हैंडल पर स्टेटस बदल दिया। पहले उन्होंने अपने ट्विटर स्टेटस में “द कॉमन मैन ऑफ मध्यप्रदेश” लिखा था। अब उन्होंने ट्विटर स्टेटस को “द चीफ मिनिस्टर ऑफ मध्यप्रदेश” कर लिया है।इधर शिवराज के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद दिग्विजय सिंह ने सोमवार देर रात ट्वीट कर तंज कसते हुए लिखा मामा का मुक्ति के लिये मप्र की जनता ने कांग्रेस को जनादेश दिया था। भ्रष्ट शासन को बदलने के लिए कांग्रेस में जनता ने विश्वास दिखाया था, लेकिन भाजपा ने धनबल और छलबल से फिर मामा को प्रदेश की कमान सौंप दी। जनता यह सब देख रही है और वक्त आने पर वह जवाब देगी।

Dakhal News

Dakhal News 24 March 2020


bhopal, Due, Yogi Sarkar , Maprap Committee,  senior journalist, was saved!

जब बारह लाख के सरकारी फंड से मिल गया एक गरीब पत्रकार को जीवन… करीब पच्चीस वर्षों से अधिक समय से आधा दर्जन से ज्यादा जाने पहचाने अखबारों से जुड़े लिक्खाड़ और ईमानदार पत्रकार राकेश मिश्रा की प्रेस मान्यता खत्म हो गई थी। ये जिस ‘प्रभात अखबार में काम कर रहे थे उसका प्रसार कम होने के तकनीकी कारणों से इनकी प्रेस मान्यता बरकरार नहीं रह पायी। ऐसे में पत्रकार मनोज मिश्रा ने इस जुझारू पत्रकार को अपने अखबार से मान्यता दिलवा दी। दुर्भाग्य से पत्रकार राकेश मिश्रा को मेजर ब्रेन स्ट्रोक पड़ा और डाक्टरों ने साफ कह दिया कि इनके बचने की उम्मीद 95% नहीं है। फिर उन्हें पीजीआई ले जाया गया जहां ये पूरे दो महीने वैंटीलेटर पर रहे। उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति अपने अथक प्रयासों से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए पीजीआई में निशुल्क इलाज करवाने का जीओ बहुत पहले ही करवा चुकी थी। इसलिए राकेश मिश्रा का बारह लाख के सरकारी खर्चे पर बेहतरीन इलाज हुआ। इस तरह एक ईमानदार और गरीब पत्रकर की ज़िन्दगी बच गई। एक पत्रकार मित्र का जीवन बचाने के लिए धन्यवाद योगी सरकार। शुक्रिया उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति।   लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार नवेद शिकोह की रिपोर्ट.

Dakhal News

Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Patil Putappa was ideal during his lifetime

मनोहर यडवट्टि   बेंगलुरु, 18 मार्च (हि.स.)। वयोवृद्ध पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य पुट्टप्पा सिदालिंगप्पा पाटिल (पापु) अपने सभी पाठकों, प्रशंसकों के लिए सभी क्षेत्रों में महान शख्सियत और अद्वितीय व्यक्तित्व के साथ अपने जीवनकाल में आदर्श रहे। वह सार्वजनिक भाषणों और अपने प्रकाशनों में लिखे गए लेखों से संबंधित विषयों पर एक बहुमुखी संचारक होने के लिए अपने विचारों के लिए जाने जाते थे।   वह कन्नड़ वॉचडॉग समिति के पहले अध्यक्ष और सीमा सलाहकार समिति के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। पुट्टप्पा साप्ताहिक 'प्रपंच' के संस्थापक संपादक थे और उन्होंने पहले कन्नड़ दैनिक समाचार पत्र 'नवयुग' का भी संपादन किया। उन्होंने विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में कॉलम भी लिखे। उन्होंने तत्कालीन बॉम्बे से प्रकाशित कई अंग्रेजी पत्रिकाओं में योगदान दिया था। पुट्टप्पा ने कन्नड़ भाषा में कई किताबें लिखी हैं, जिनमें कवि लेखकरु, नीवु नागबेकु, कर्नाटक संगीता कलारतनारु इत्यादि हैं। पाटिल पुटप्पा को कई पुरस्कार मिले हैं। इसमें नाडोज पुरस्कार, वुडे पुरस्कार और नृपतुंगा पुरस्कार शामिल हैं।   अविभाजित धारवाड़ जिले में 14 जनवरी,1921 को हावेरी तालुक के कुराराबोंडा में जन्मे पुट्टप्पा ने अपनी प्राथमिक शिक्षा हलगेरी गांव में पूर्ण की और उच्च शिक्षा ब्याडगी, हावेरी और धारवाड़ में की। उन्होंने अपनी कानून की डिग्री बेलगावी लॉ कॉलेज से पूरी कर बॉम्बे में वकालत शुरू की। हालांकि, पत्रकारिता में उनकी गहरी रुचि को देखते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें पत्रकारिता में बने रहने का सुझाव दिया।   उन्होंने कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण के लिए चल रहे आंदोलन पर लिखकर फ्री प्रेस जर्नल और बॉम्बे क्रॉनिकल में योगदान देना शुरू किया। फिर फ्री प्रेस जर्नल के तत्कालीन सम्पादक के. सदानंद ने उन्हें फ्री प्रेस जर्नल ज्वाइन करने की पेशकश की। हालांकि उन्होंने हुबली से एक नए अखबार में काम करने का फैसला किया। उनकी वर्ष 1930 के दौरान हुई गिरफ्तारी ने उन्हें बदल दिया और फिर तब से वह जीवन भर खादी के कपड़े पहनने वाले व्यक्ति बन गए। वह जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित थे, जिन्होंने बाद में हुबली का दौरा किया था।   वर्ष 1934 में महात्मा गांधी ब्याडगी की यात्रा पर आए और इस युवा स्वयंसेवक पाटिल पुटप्पा की पीठ थपथपाई। संयोग से उन्होंने 1934 में पहले आम चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए भी प्रचार किया। संभवतः वह 1949 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता पाठ्यक्रम को आगे बढ़ाने वाले पहले कन्नडिगा रहे। अपने छात्र दिनों के दौरान उन्होंने विल डुरंट, रॉबर्ट हचिंस, न्यायमूर्ति फेलिक्स फ्रैंकफर्टर, अल्बर्ट आइंस्टीन और कई अन्य लोगों की मेजबानी की। उन्होंने एक ब्रिटिश रूढ़िवादी राजनेता सर एंथनी एडेन का साक्षात्कार लिया था। मार्च 1954 के दौरान घर वापस लौटने पर उन्होंने 'प्रपंच' नामक कन्नड़ साप्ताहिक शुरू किया।    फिर 1956 में उन्होंने पहला कन्नड़ डाइजेस्ट 'संगम' और 1959 में कन्नड़ अखबार विश्ववाणी प्रकाशित करना शुरू किया। 1961 में वह कर्नाटक विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य बने, जबकि उन्हें 1962 में राज्यसभा के लिए चुना गया। वह राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा कन्नडिगों और राज्य के हितों के विपरीत किसी भी कदम के खिलाफ आवाज उठाते थे। किसान आंदोलन के साथ-साथ भाषा आंदोलन आर. गुंडूराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को खत्म करने में एक उत्प्रेरक बना था और इस तरह रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ था। पाटिल पुट्टप्पा कन्नड़ और अंग्रेजी में अपने शानदार लेखन की तरह एक शक्तिशाली वक्ता थे।   1967 में वे धारवाड़ स्थित कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के अध्यक्ष बने। साल 1915 में कन्नड़ साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जो कन्नड़ साहित्य परिषद के अस्तित्व में आने से पहले और अंत तक उसी स्थिति में बनी रही। वह देश की सत्ता की राजनीति में नेहरू और इंदिरा गांधी परिवार की पारिवारिक तानाशाही के खिलाफ मुखर थे।   कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के पूर्व महासचिव शंकर हलगट्टी कहते हैं कि चाहे कोई सहमत हो या असहमत, कन्नड़ और कन्नड़ भूमि के हितों से संबंधित सभी मुद्दों में पाटिल पुट्टप्पा का अपना एक तरीका था। कन्नड़ के कारण उसकी अखंडता और प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के बारे में कोई कभी सोच भी नहीं सकता। हालांकि वह आगे बढ़ने में हमेशा अकेले व्यक्ति बन गए थे।

Dakhal News

Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Law and order in Noida is not bad night life safe

नोएडा में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लाागू करने और करोड़ों रुपये खर्चने के बावजूद लॉ एंड आर्डर में सुधार नहीं दिख रहा है. यहां की नाइट लाइफ उतनी ही अनसेफ है जितनी पहले थी. लगातार घटनाएं घटित हो रही हैं पर पुलिस महकमा कान में तेल डाले सोया पड़ा है. अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शनिवार रात बाइक सवार बदमाशों ने BMW कार लूट ली. कार चला रहा युवक पेशाब करने के लिए रुका हुआ था. पीड़ित युवक नोएडा सेक्टर 137 स्थित टियरा सोसायटी का रहने वाला है. बताया जाता है कि पीड़ित ने पुलिस कंट्रोल रूम में सौ नंबर पर काल किया लेकिन कुछ नहीं हुआ. आखिरकार उसे देर रात भटकते हुए खुद ही फेज 2 थाने पर जाना पड़ा. पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. नवभारत टाइम्स की महिला मीडियाकर्मी का रात में कार सवार शोहदों द्वारा पीछा करने की घटना हो ही चुकी है. इसके पहले एक मैनेजर गौरव चंदेल की गोली मार कर हत्या करने के बाद बदमाश कार व मोबाइल लैपटाप आदि लेकर भागे थे.   तमाम हो हल्ले और पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के बाद भी हालात में सुधार नहीं है. पुलिस वालों की संख्या बढ़ाई गई. पुलिस अफसर भी ढेर सारे आए. पर जमीनी हालात जस का तस है.   सूत्रों का कहना है कि नोएडा में पुलिस अब निश्चिंतता की मोड में है. योगी सरकार ने बदमाशों को मारने तक की छूट दे रखी है लेकिन थानेदार खुद को अभयदान पाए और संरक्षित मान कर आराम फरमा रहे हैं. घटनाएं होती जा रही हैं लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही न किसी को दंडित किया जा रहा. रात में सड़क पर पुलिस टीमें जितनी सक्रिय दिखनी चाहिए, उतनी हैं नहीं. नोएडा पुलिस अपना ध्यान उगाही और कमाई से थोड़ा-सा हटाकर कानून-व्यवस्था पर लगा दे तो स्थिति बदल सकती है.

Dakhal News

Dakhal News 17 March 2020


bhopal, Law and order in Noida is not bad night life safe

नोएडा में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लाागू करने और करोड़ों रुपये खर्चने के बावजूद लॉ एंड आर्डर में सुधार नहीं दिख रहा है. यहां की नाइट लाइफ उतनी ही अनसेफ है जितनी पहले थी. लगातार घटनाएं घटित हो रही हैं पर पुलिस महकमा कान में तेल डाले सोया पड़ा है. अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शनिवार रात बाइक सवार बदमाशों ने BMW कार लूट ली. कार चला रहा युवक पेशाब करने के लिए रुका हुआ था. पीड़ित युवक नोएडा सेक्टर 137 स्थित टियरा सोसायटी का रहने वाला है. बताया जाता है कि पीड़ित ने पुलिस कंट्रोल रूम में सौ नंबर पर काल किया लेकिन कुछ नहीं हुआ. आखिरकार उसे देर रात भटकते हुए खुद ही फेज 2 थाने पर जाना पड़ा. पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. नवभारत टाइम्स की महिला मीडियाकर्मी का रात में कार सवार शोहदों द्वारा पीछा करने की घटना हो ही चुकी है. इसके पहले एक मैनेजर गौरव चंदेल की गोली मार कर हत्या करने के बाद बदमाश कार व मोबाइल लैपटाप आदि लेकर भागे थे.   तमाम हो हल्ले और पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के बाद भी हालात में सुधार नहीं है. पुलिस वालों की संख्या बढ़ाई गई. पुलिस अफसर भी ढेर सारे आए. पर जमीनी हालात जस का तस है.   सूत्रों का कहना है कि नोएडा में पुलिस अब निश्चिंतता की मोड में है. योगी सरकार ने बदमाशों को मारने तक की छूट दे रखी है लेकिन थानेदार खुद को अभयदान पाए और संरक्षित मान कर आराम फरमा रहे हैं. घटनाएं होती जा रही हैं लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही न किसी को दंडित किया जा रहा. रात में सड़क पर पुलिस टीमें जितनी सक्रिय दिखनी चाहिए, उतनी हैं नहीं. नोएडा पुलिस अपना ध्यान उगाही और कमाई से थोड़ा-सा हटाकर कानून-व्यवस्था पर लगा दे तो स्थिति बदल सकती है.

Dakhal News

Dakhal News 17 March 2020


bhopal,  240 year, old feud, Gwalior and Raghogarh gharana

मध्यप्रदेश में जो सियासी घमासान मचा और कमलनाथ सरकार संकट में आ गई उसमें दो किरदारों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर, जहां भाजपा का कमल थाम लिया, वहीं पार्टी में ही उनके लगातार प्रतिद्वंदी रहे दिग्विजय सिंह राज्यसभा में जाने में जहां सफल रहे, वहीं इस पूरे मामले का ठिकरा भी उन्हीं पर फोड़ा जा रहा है। अगर इतिहास उठाकर देखा जाये तो ग्वालियर और राघोगढ़ की यह टसल 240 साल पुरानी हैं। उस दौरान अंग्रेजों ने समझौता भी कराया था, लेकिन कांग्रेस आलाकमान इस मामले मेें भी असफल साबित हुआ। अब दिग्गी का कहना है कि अतिमहत्वकांक्षा के चलते ज्योतिरादित्य भाजपा में गये, वहीं राहुल गांधी ने उन्हें अपना पुराना दोस्त बताया तो सिंधिया ने भी हुंकार भरी कि उनके परिवार को जब भी ललकारा गया तो चुप नहीं बैठे। प्रदेश की राजनीति में हमेशा दिग्गी और ज्योतिरादित्य की पटरी कभी नहीं बैठी और यही कारण है कि सिंधिया न तो प्रदेश अध्यक्ष बन सके और न ही मुख्यमंत्री। मध्यप्रदेश में जो राजनीतिक संकट आया और अच्छी भली चल रही कमलनाथ सरकार एकाएक ढहने के कगार पर पहुंच गई है और अब कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता है। भाजपा भी सिंधिया की बगावत को गुटबाजी से जोड़ते हुए मिस्टर बंटाढार यानी दिग्गी को इसका जिम्मेदार बताती है, वहीं राजनैतिक विशेषज्ञ और जनता में भी यहीं चर्चा है कि दिग्गी ने ही सरकार को डूबों दिया, हालांकि दिग्गी इन आरोपी की स्पष्ट खंडन करते हैं। अगर इतिहास के पन्नों को खंगाला जाये तो पता चलेगा कि इन दोनों घरानों के बीच अदावत नई नहीं है, बल्कि 240 साल पुरानी हैं। 1677 में राघोगढ़ को दिग्गी के पुरखे लालसिंह खिंची ने बसाया था और 1705 में राघोगढ़ का किला बना, उधर औरंगजेब की मौत के बाद मुगलों को खदेड़ते हुए मराठा जब आगे बढ़े तो इंदौर में होलकर घराने और ग्वालियर में सिंधिया घराने ने अपनी रियासत कायम करते हुए आस-पास के छोटे और बड़े राजाओं को भी उसका हिस्सा बनाया, लेकिन राघोगढ़ से सिंधियाओं की ठनी और महादजी सिंधिया ने 1780 में दिग्विजय सिंह के पूर्वज राजा बलवंत सिंह और उनके बेटे जयसिंह को बंदी बना लिया। नतीजतन 38 सालों तक दोनों राज घरानों में टसल चलती रही और 1818 में ठाकुर शेर सिंह ने राघोगढ़ को बर्बाद किया, ताकि सिंधियाओं के लिए उसकी कोई कीमत न बचे, जब राजा जयसिंह की मौत हुई, तब अंग्रेजों की मध्यस्थता से ग्वालियर और राघोगढ़ के बीच एक समझौता भी हुआ, जिसमें राघोगढ़ वालों को एक किला और आसपास की जमीनें मिली और तब 1.4 लाख रुपये सालाना का लगान तय किया गया और राघोगढ़ से कहा गया कि सालाना अगर 55 हजार रुपये से ज्यादा लगान की वसूली होती है तो यह राशि ग्वालियर दरबार में जमा करनी होगी और यदि 55 हजार से कम लगान मिला तो ग्वालियर रियासत राघोगढ़ की मदद करेगा, लेकिन राघोगढ़ वाले कम लगान वसूलते रहे, जिसके चलते ग्वालियर दरबार ने दी जाने वाली मदद रोक दी और सारी संपत्ती भी जब्त कर ली। 1843 में अंग्रेजों ने फिर समझौता करवाया, जिसमें राघोगढ़ को ग्वालियर रियासत के अधीन लगान वसूलने की छूट दी गई। 1780 में शुरू हुई यह जंग आज 2020 तक बदस्तूर जारी है यानी 240 साल का इतिहास गवाह है, जो ग्वालियर और राघोगढ़ की अदावत को जाहिर करता है। यही कारण है कि कभी भी सिंधिया परिवार से दिग्गी परिवार की पटरी नहीं बैठी। मजे की बात यह है कि अंग्रेजों ने तो इन दोनों घरानों में दो बार समझौता करवाया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान कभी भी समझौता कराने में सफल नहीं हो पाया। पूर्व के दो विधानसभा चुनावों में भी प्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपने की मांग उठती रही और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की भी मांग होती रही, लेकिन हर बार दिल्ली दरबार से दिग्गी सहित अन्य प्रदेश के दिग्गजों जिनमें कमलनाथ, सुरेश पचौरी व अन्य गुट शामिल रहे, ने कभी भी सिंधिया को उम्मीदवार घोषित नहीं होने दिया। यहां तक की पिछले विधानसभा चुनाव में भी उन्हें प्रचार-प्रसार का प्रमुख तो बनाया और फिर लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश भिजवा दिया, जबकि भाजपा को विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा खतरा सिंधिया के चहरे से ही था और उसने अपना प्रमुख चुनावी नारा भी यही दिया था कि… बहुत हुआ महाराज… हमारे तो शिवराज। अब वहीं ज्योतिरादित्य कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा का कमल थाम चुके है और कल भोपाल में उनका जोरदार स्वागत हुआ और पहले जहां शिवराज ने अंग्रेजों का साथ देकर रानी झांसी को मरवाने का जिम्मेदार गद्धार बताते हुए सिंधिया पर आरोप लगाये थे, वहीं कल उन्होंने अपने घर उनके सम्मान में रात्रि भोज आयोजित किया, जहां उनकी पत्नी साधना सिंह ने अपने हाथों से शिवराज, सिंधिया, तोमर सहित अन्य भाजपा नेताओं को भोजन परोसा। मध्यप्रदेश की राजनीति में हमेशा से तीन गुट प्रमुख रहे और विधानसभा से लेकर लोकसभा की टिकटे भी इनकी पसंद से बटती रही, लेकिन अब कमलनाथ और दिग्गी के ही दो प्रमुख गुट बच गये हैं। भोपाल आये सिंधिया ने भी कम तेवर नहीं दिखाये और पुरानी बातों को याद करते हुये कहा कि सिंधिया परिवार का खुन सहित चुनाव करता है और जब-जब इस परिवार को ललकारा गया उसका माकूल जवाब भी दिया, हालांकि भाजपा में शामिल होते ही, जहां सिंधिया भाजपा के लिए गद्धार से देशभक्त बन गये तो कांग्रेसी उन्हें गद्धार की उपमा देने में पीछे नहीं रहे और इंदौर से भोपाल तक उनका विरोध भी किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सिंधिया का साथ छोडऩा कांग्रेस के लिए नुकसान दायक है और भाजपा के लिए फायदेमंद, क्योंकि उन्हीं की बदौलत 15 माह पुरानी कमलनाथ सरकार को गिराकर अब भाजपा अपनी सरकार बना सकती है और प्रदेश में भी कर्नाटक की तर्ज पर रणनीति चल रही है। प्रोटोकॉल ने तय किया एक महाराजा तो दूसरा राजा यह भी जानकारी बहुत कम लोगों को होंगी की आखिरकार सिंधिया को महाराजा और दिग्गी को राजा क्यों कहा जाता है? दरअसल ऐतिहासिक परम्परा के मुताबिक प्रदेश के इन दोनों राज घरानों के बीच एक प्रोटोकॉल तय किया गया था, जिसमें यह तय हुआ कि सिंधिया हमेशा महाराज कहलायेंगे और राघोगढ़ वाले राजा। यही कारण है कि अतीत से लेकर अब तक सिंधिया को राजनैतिक क्षेत्र में भी सभी कार्यकर्ताओं से लेकर नेता महाराज ही कह कर संबोधित करते है और इसी तरह दिग्गी को राजा बोला जाता है। लंका विजय के बाद विभीषण का हुआ था राज्याभिषेक भोपाल आये ज्योतिरादित्य का स्वागत जहां भाजपा ने धूमधाम से किया वहीं शिवराज सिंह चौहान की जुबान फिसल गई।पहले जहां विधानसभा चुनाव में विरोधी के रूप में सिंधिया को गद्धार तक कह दिया था, तो कल विभीषण बोल गये। अब सोशल मीडिया पर भी लोग चुटकी ले रहे हैं कि अगर सिंधिया को शिवराज विभीषण बता रहे है तो इसका मतलब यह हुआ कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी बजाये सिंधिया बन सकते है, जब राम ने लंका विजय की तब उन्होंने विभीषण का ही राज्याभिषेक किया और अयोध्या लौटे। 4 हजार करोड़ से ज्यादा कीमती है जय विलास पैलेस अभी भाजपा में आये ज्योतिरादित्य पर जहां केंद्र सरकार के साथ डील करने के आरोप लग रहे है, वहीं यह भी कहा जा रहा है कि महल सहित उससे जुड़ी अरबों की संपत्तियों को बचाने के लिए उन्हें भाजपा का दामन थामना पड़ा। कल ही मुख्यमंत्री ने सिंधिया के खिलाफ चल रहे ईओडब्ल्यू के एक पुराने केस को फिर से खुलवा भी दिया, जिसमें जमीन घोटालों क आरोप उन पर लगे हैं। सिंधिया का ग्वालियर स्थित जयविलास पैलेस 150 साल पुराना है, जिसमें 400 कमरें है और दरबार हाल में अत्यंत बेशकीमती झूमर टंगे है। इस पूरे महर की कीमत 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा आकी जाती है, क्योंकि इसमें कई एंटिंक सामान मौजूद है। 40 कमरों का तो म्यूजियम ही है। 1874 में बने इसी पैलेस में सिंधिया परिवार रहता आया है और अभी ज्योतिरादित्य भी इसी जयविलास पैलेस में रहते हैं। इसके डायनिंग हाल में चांदी की ट्रेन से खाना परोसा जाता है।   लेखक राजेश ज्वेल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

Dakhal News

Dakhal News 17 March 2020


bhopal,  Read ,four well-read posts , Corona focused , Corona

पोस्ट 1- जैसे नियमित व्यायाम नहीं करने से मांसपेशियां शिथिल पड़ जाती हैं, वैसे ही बुद्धि भी नियमित व्यायाम नहीं करने से रूढ़ हो जाती है। बुद्धि को प्रश्नों और जिज्ञासाओं से चुनौती मिलती है। बुद्धि के परिमार्जन के लिए विमुक्ति का वह अनुभव आवश्यक है। किंतु इक्कीसवीं सदी के आरम्भिक बीस सालों में, ऐसा मालूम होता है, हमने बुद्धि के बजाय जड़ता का अभ्यास अधिक किया है। उसी के परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं, जब एक वैश्विक महामारी मुंह बाए खड़ी है और हमारी बुद्धि उसे उसके वैश्विक और मानवीय आयामों में देखने में समर्थ ही नहीं हो पा रही है। हमारे औज़ार भोथरे साबित हो रहे हैं। बुद्धि की जड़ता से ही इस तरह की बातें कही जाती हैं कि आज संसार हाथ मिलाने के बजाय नमस्कार करने को विवश हो गया है, यह भारतीय संस्कृति का गौरव है। जैसे कि विषाणु भारतीयों को संक्रमित करने से बख़्श देगा? या यह कि केंद्र सरकार ने मेरी कॉलर ट्यून कैसे बदल दी, यह मेरी निजता में हनन है! कोई मुझे फ़ोन लगाए तो खांसने-खंखारने की आवाज़ उसे क्यूँ सुनाई देती है? जैसे कि यह संसार एक जलसाघर है, जिसमें आपकी अभिरुचि से बड़ा कोई चिंतन मनुष्य के सामने नहीं? या आपकी राजनीतिक निष्ठा ही सर्वोपरि है? बौद्धिक जड़ता की मिसाल तब मिली जब उन्होंने कहा, यह विषाणु चीन को ईश्वर का शाप है, क्योंकि उसने शिनशियांग में अत्याचार किए थे। फिर वैसा कहने वाले स्वयं विषाणु से संक्रमित हो गए। यक़ीनन, उनके ईश्वर उनसे भी बहुत ज़्यादा प्रसन्न नहीं मालूम होते थे। एक जड़ता ने कहा, तुम्हारा धर्मस्थल तो रिक्त हो गया, हमारे धर्मस्थल में देखो, कैसा रंग-गुलाल है। दूसरी जड़ता ने कहा, डैमोक्रेट्स होते तो बीमारी नहीं फैलती, रिपब्लिकन्स और उनका मंदबुद्धि नेता इस आपातकाल के लिए ज़िम्मेदार है। तीसरी जड़ता बोली, चमकी बुख़ार से इतने बच्चे मर गए, तब तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। शायद बीमारियों के भी स्टेटस होते हैं। चौथी जड़ता बड़े आत्मविश्वास से बोली, यह रोग किसी ज्वर से अधिक नहीं, किंतु नक़ाबों की बिक्री के लिए झूठ रचा गया! जब मनुष्य की बुद्धि, जो कि इस सृष्टि का सबसे बड़ा कौतूहल है, किसी वस्तु या घटना का आमने-सामने, उन्मुक्त साक्षात् नहीं करके उसे किसी चश्मे से देखने की अभ्यस्त हो जाती है, तब वो इस तरह की बातें करती है। यह बुद्धि स्वयं को किन्हीं जातीय-सामुदायिक-राजनीतिक पहचानों के अनुक्रम में देखने की इतनी आदी हो चुकी होती है कि एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्वयं को पाकर सहसा किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है। उसकी स्थिति उस विदूषक की तरह हो जाती है, जिसे एक शोकसभा में व्याख्यान देने के लिए खड़ा कर दिया गया है, किंतु उसको केवल लोगों को हंसाना ही आता है। अब वह क्या कहेगा, कैसे कहेगा, चुप ही क्यूं न रह जाएगा? किंतु विषाणु तो समस्त भ्रमों से मुक्त है। वह आपको जानता तक नहीं। आप उसके लिए एक माध्यम हैं। लिविंग सेल्स का एक संगठन, जो उसके प्रसार के लिए उपयोगी है। जैसे मनुष्य प्रोटीन की प्राप्ति के लिए नि:शंक होकर पशुओं की हत्या करता है और उनके शुभ का एकबारगी चिंतन नहीं करता, उसी तरह यह विषाणु अपने री-प्रोडक्शन के लिए आपके जैविक-तंत्र का विघटन करेगा। वह प्रकृति के नियमों के अधीन है। और प्रकृति स्वयंसिद्ध है! और, अलबत्ता, प्रखर बुद्धि वाले की जान बख़्शी नहीं जाएगी, फिर भी मनुष्य को अपनी बुद्धि का अभ्यास करते रहना चाहिए। क्योंकि वह मनुष्य है। क्योंकि उसका समूचा इतिहास ही अपनी बुद्धि के परिमार्जन का रहा है। यही उसका अभिमान भी है। अब इतनी लम्बी यात्रा करने के बाद वह पीछे नहीं हट सकता। इंटरनेट पर स्वयं को जड़बुद्धि की तरह प्रस्तुत करके वह संतोष से नहीं भर सकता। वैश्विक महामारी सम्मुख हो या न हो, केवल ये ही प्रश्न पूछे जाने जैसे हैं- क्या सच में ही कहीं पर कोई ईश्वर है? जिस भूखण्ड पर मेरा जन्म हुआ, क्या मैंने उसका सचेत चयन किया था? जिन रीतियों का मेरे पुरखे पालन करते रहे, क्यों वो मेरे माध्यम से स्वयं को जिलाए रखेंगी? मैं कौन हूं? जन्म से पूर्व मैं कहां था, मृत्यु के बाद कहां जाऊंगा? इस धरती पर मेरे होने का क्या प्रयोजन है? हमें अब भी धर्म, जाति, राष्ट्र, समुदाय, राजनीति के चश्मे से देखकर स्वयं को “एम्बैरेस” नहीं करना चाहिए। वुहान से विकसे विषाणु के समक्ष यह, आख़िरकार, मनुष्य की अस्मिता का प्रश्न भी है! पोस्ट 2- कोरोना वायरस का केंद्र पश्चिम दिशा में खिसक रहा है. चीन कह रहा है कि हम सबसे बुरा दौर देख चुके हैं! किंतु अब यूरोप दुनिया में कोरोना का एपिसेंटर बन चुका है. वुहान से वेनिस तक की यात्रा पूरी कर ली गई है! इटली में हज़ार मृत्युओं के बाद कम्प्लीट लॉकडाउन की स्थिति है और लोगों ने ख़ुद को अपने-अपने घरों में क़ैद कर लिया है. अमेरिका ने 50 मौतों के बाद नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दी है. भारत में अभी खाता खुला ही है, किंतु जैसे-जैसे संख्या बढ़ेगी, सामूहिक सम्भ्रम और वाइड स्प्रेड पैनिक का दृश्य निर्मित होगा. कोरोना के बारे में तमाम मालूमात हासिल करने के बाद दुनिया के लोग इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि अगर हम स्वयं को सबसे अलग कर लेंगे और घरों में क़ैद हो जाएंगे तो हम संक्रमण से सुरक्षित रहेंगे. तकनीकी रूप से यह तर्क ठीक मालूम होता है, किंतु अगर आधुनिक मनुष्य की समस्याएं इतनी ही सरल होतीं तो बात क्या थी. युवल नोआ हरारी का कहना है कि अगर आप फिर से पाषाण युग में जाने को तैयार हैं तो स्वयं को बंद कर लीजिए. किंतु आधुनिक वैश्वीकृत मनुष्य को तो घर से निकलना ही होगा. इटली में उन्होंने चौदह दिनों का क्वारेन्ताइन तय कर लिया है. कि चौदह दिन हम घर से नहीं निकलेंगे. वहां सड़कों पर भुतहा सन्नाटा व्याप्त हो गया है. इससे सरकार यह मान सकती है कि संक्रमितों की संख्या अब एक बिंदु पर आकर फ्रीज़ हो जाना चाहिए. पहले आपात स्थिति से निबटें. चौदह दिन के निर्वासन के बाद शेष की समस्या सुनी जाएगी. अगर भारत भी इस डगर पर चला तो यह निश्चय है कि सेवा क्षेत्र में “वर्क फ्रॉम होम” की कार्य संस्कृति सुदृढ़ होने जा रही है. पहले ही इसका व्यवहार असंगठित रूप से किया जा रहा था. लैपटॉप और इंटरनेट से घर बैठे काम करने वाला एम्प्लायी ड्राइव करके दफ़्तर जाने और ख़ुद को वायरस के लिए एक्सपोज़ करने की तैयारी नहीं ही दिखाएगा. मरण तो रोज़ कुआ खोदकर पानी पीने वाले दिहाड़ी मज़दूर का है. कोरोना पर वैश्विक चिंता के केंद्र में केवल लोक-स्वास्थ्य ही नहीं है. धड़कते दिल से दुनिया अर्थव्यवस्था पर नज़र जमाए है और उसे धीरे धीरे ध्वस्त होते देख रही है. पहले ही ग्लोबल इकोनॉमी बहुत अच्छी हालत में नहीं थी. 2020 को सुधार का साल होना था, किंतु यह 2008 के बाद सबसे बड़ी चुनौती की तरह सामने आया है. कौन जाने, यह भूमण्डलीकरण के तीस साल के इतिहास का सबसे बड़ा संकट सिद्ध हो. जब लोग ख़ुद को हफ्ता-पखवाड़े के लिए घर में क़ैद करने की तैयारी करेंगे तो वो “सीज-मेंटेलिटी” में सरक जाएंगे. पुराने वक़्तों में जब शहर की घेराबंदी होती थी तो अवाम चौमासे की रसद लेकर क़िले में चली जाती थी. मौजूदा दौर में यह सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनने जा रहा है. लोग तालाबंदी करेंगे तो जमाख़ोरी को बढ़ावा मिलेगा. जितना मैं भारत देश को समझता हूँ, जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी पहले ही शुरू हो चुकी होगी. ज़रूरत की चीज़ों के दाम तेज़ी से बढ़ेंगे. बाज़ार में अप्रत्याशित मांग का सामना फ़र्ज़ी क़िल्लत से होगा. वॉर प्राफ़िटीयरिंग की तर्ज़ पर आपदा से मुनाफ़ा कमाने वाली ताक़तें सक्रिय हो चुकी होंगी. क्या सरकार इसके प्रति सजग है? अनेक मित्रों ने चिंता जताई है कि कोरोना पर इतना हाहाकार क्यूँ? वो कह रहे हैं कि जिस देश में दंगों, सड़क हादसों, बुख़ार से लाखों लोग मर जाते हैं, उसमें विदेशी विषाणु पर हायतौबा क्यूँ मचाई जा रही है. पता नहीं वो महामारी शब्द का अर्थ समझते हैं या नहीं. कोई भी आपदा अपने स्वरूप में बाहरी संकट प्रस्तुत करती है, जबकि महामारियां एक जटिल, अंदरूनी, साभ्यतिक मसला हैं और संक्रमण की प्रविधि आणविक विस्फोट से कम नहीं होती. मनुष्य का मनोविज्ञान यह है कि नगर में हादसा हो तो वह अपने परिजनों की कुशलक्षेम के लिए अकुलाता है. वो सकुशल घर लौट आएं तो निश्चिंत हो जाता है. फिर वह भले ही कितनी चिंता औरों के लिए जताता रहे, उसका दायरा मैं और मेरा परिवार तक सीमित रहता है. संक्रामक महामारियां इस निश्चिंतता में सेंध लगाती हैं. यह चार दिन चलकर रुकने वाला दंगा या बलवा नहीं है, यह नित्यप्रति अपने प्राणों की रक्षा करने की चुनौती है. इससे पहले आख़िरी बार कब एक वैश्विक महामारी ने दुनिया को अपनी गिरफ़्त में लिया था? बीसवीं सदी के आरम्भ का स्पैनिश फ़्लू? इक्कीसवी सदी का स्वाइन फ़्लू? यक़ीन मानिए, नॉवल-कोरोनावायरस इनसे आगे की चीज़ है. आज ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा, यह विषाणु ऊष्ण मौसम में भी पनप सकता है. तिस पर किसी ने अंदेशा जताया, तब तो हो ना हो यह एक मैन्युफ़ैक्चर्ड वायरस है, इसका कार्य-व्यवहार सर्वथा नया और अप्रत्याशित है. तो क्या चीन के पीले दैत्य ने दुनिया को एक घोर संकट में धकेल दिया है? यह तो समय ही बताएगा. किंतु तब तक सतर्कता की लाठी थामकर ही सबने इस डगर पर चलना है! पोस्ट 3- कोरोना वायरस पर युवल नोआ हरारी ने सर्वथा भिन्न दृष्टि प्रस्तुत की है। हरारी ने कहा है कि अगर आप सोचते हैं स्वयं को सबसे अलग-थलग करके इससे बच जाएंगे, तो यह आपकी भारी भूल है। चौदहवीं सदी में, जब न रेलगाड़ियां थीं, न हवाई जहाज़, एशिया से शुरू हुआ प्लेग यूरोप तक फैल गया था और इसने साढ़े सात करोड़ लोगों की जान ले ली थी। इसे इतिहास में ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है। जब साल 1330-1350 में यह स्थिति थी, तो आज इक्कीसवीं सदी की भूमण्डलीकृत दुनिया में भूल ही जाइये कि आप सबसे कटकर बच जाएंगे। हरारी का कहना है कि वास्तव में ज़रूरत इससे ठीक विपरीत की है। हमें बंद होने की नहीं, अधिक से अधिक खुलने की आवश्यकता है। मनुष्यता को स्वयं को एक जाति मानना ही होगा, पूरी दुनिया को मिलकर इसका हल खोजना होगा, एक-दूसरे से निरंतर संवाद करना होगा, तभी इसका बेहतर ढंग से सामना किया जा सकता है। सरकारों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है। निश्चय ही, जब हरारी यह कह रहे थे, तो वे इस पर विश्वास नहीं कर रहे थे। कोई भी नहीं कर सकता। यह राजनीति की अग्निपरीक्षा है, और राजनीति ऐसी परीक्षाओं में विफल रहती है। आज दुनिया अनेक राष्ट्रों में बंटी हुई है, उन सभी की अपनी-अपनी सरकारें हैं, उन सरकारों के अपने निजी हित और न्यस्त स्वार्थ हैं। मानव-संयोजन में ये सरकारें अत्यंत विफल सिद्ध होती हैं, वास्तव में वे विघटन की दृष्टि से सोचती हैं और मनुष्यता के निकृष्ट आयामों का आह्वान करके अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं। आज तो उलटे संरक्षणवादी प्रवृत्तियां प्रबल हो चुकी हैं, और सभी राष्ट्र अपना हित पहले सोचते हैं। इंडिया फ़र्स्ट और अमेरिका फ़र्स्ट के इस दौर में यह वैश्विक संकट सामने आया है, जबकि राजनेता अपनी सरकार बचाने की फ़िराक़ में रहते हैं और कोई भी आपदा सामने आने पर उनकी पहली प्रतिक्रिया उसके वजूद से इनकार करने की होती है। ईरान में यही हुआ है। कोरोना वायरस का पता चलने के बावजूद वहां की सरकार लम्बे समय तक चुप रही। और अब वहां हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। इटली में वे युवाओं को बचाने के लिए बूढ़ों को मर जाने दे रहे हैं। यह नात्सी-विचार की वापसी है, जिसमें ऑश्वित्ज़ के रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर सिलेक्शन-प्रक्रिया के दौरान कहा जाता था कि बूढ़ों को गैस चेम्बर में भेज दो और नौजवानों को काम पर लगाओ। उपयोगिता का सिद्धांत ऐसे ही काम करता है। उपयोगिता के सिद्धांत के कारण ही चीन, जो कि इस पूरी बीमारी की जड़ है, से यह ख़बर आई थी कि कोरोना संक्रमण से ग्रस्त मनुष्यों को मार देने की तैयारी की जा रही है, ताकि रोग आगे न फैले। और फिर, जैविक-हथियारों के प्रयोग की कॉन्स्पिरेसी थ्योरी तो है ही। दुनिया की सरकारें अंदरूनी मोर्चों पर प्रतिद्वंद्वी से राजनीतिक लड़ाइयों में मुब्तिला रहती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसके भू-राजनीतिक हितों से संचालित गुट होते हैं। अमेरिका चीन से आने वाली किसी भी ख़बर पर भरोसा नहीं करता। ग्लोबल वॉर्मिंग को वह उसकी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने की साज़िश बतलाता है और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं कॉर्बन उत्सर्जन की अनिवार्यता के इस तर्क में उसका साथ देती हैं। 16 साल की क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट ग्रेटा थुनबर्ग ने कोरोना वायरस के चलते सभी सार्वजनिक प्रतिरोधों को निरस्त करके डिजिटल स्ट्राइक की बात कही है। उसने यह भी कहा है कि आज हमें विज्ञान के साथ मिलकर खड़े होना है। किंतु राजनीति स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय-हितों की बात करती है, वह सार्वभौमिक हितों की बात करके चुनाव नहीं जीतती। राजनीति का सम्बंध विज्ञान से नहीं विभ्रम से है। तब वैश्विक महामारियों का सामना करने में भूमण्डलीकरण के साथ ही आधुनिक राष्ट्र-राज्यों का स्वरूप भी एक बाधा बन जाता है। राजनीति से ऐसे अवसर पर कोई उम्मीद रखना बेकार है। धर्म की तब बात ही क्या करें। ईश्वर, जो कि कहीं नहीं है, की परिकल्पना मनबहलाव के लिए ठीक है, किंतु आपदाओं में वह मनुष्य की कोई मदद नहीं कर सकता। अतीत में उसने कभी नहीं की है और आगे भी नहीं करेगा। इस विराट सृष्टि में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे मनुष्य का सामान्य-बोध ही इकलौती उम्मीद है। इंटरनेट इसमें उसकी मदद कर सकता है, बशर्ते उसका उपयोग विवेक से किया जाए। मनुष्यता को तोड़ने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए उसे बरता जाए। धर्म और राष्ट्र, जाति और समुदाय काल्पनिक परिघटनाएं हैं, मनुष्य ही वास्तविक है। उसका हित ही सर्वोपरि होना चाहिए। मनुष्यता का इतिहास महामारियों का इतिहास रहा है। इतिहास में रोगों ने इतने लोगों की जान ली है, जितनी किसी और विपदा ने नहीं ली- दोनों विश्वयुद्धों ने भी नहीं। हैजा और चेचक, कोढ़ और तपेदिक, प्लेग और बुख़ार, सिफ़लिस और एड्स, भांति-भांति के फ़्लू, और हाल के सालों में उभरकर सामने आए इबोला, ज़ीका और अब कोरोना जैसे विषाणु- सर्वनाश की जितनी भी थ्योरियां प्रचलित हैं, उनमें अभी तक सबसे कारगर ये रोग और महामारियां ही साबित हुए हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग और आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस के ख़तरे भविष्य के गर्भ में हैं। एलीयन्स अभी तक धरती पर आए नहीं हैं। ज्वालामुखी लम्बे समय से सुषुप्त हैं। धरती से डायनोसोरों का ख़ात्मा कर देने वाले एस्टेरॉइड की जोड़ का अंतरिक्ष-पिण्ड फिर लौटकर नहीं आया है, पांच बार प्रलय होने के बावजूद। अभी तक के ज्ञात-इतिहास में महामारियां ही मनुष्य की सबसे बड़ी हत्यारिनी साबित हुई हैं। हमारे सामने एपिडेमिक और पेन्डिमिक का भेद है। संक्रामक रोग और वैश्विक महामारी। एक तरफ़ इबोला है, जो इतनी तेज़ी से मनुष्य की हत्या करता है कि रोग को लम्बी दूरी तक फैलने का अवसर ही नहीं मिलता। दूसरी तरफ़ मीज़ल्स हैं, जिनकी संक्रामक-क्षमता अत्यंत व्यापक है, किंतु इनका वैक्सीन सरलता से उपलब्ध है। और फिर कोरोना जैसे वायरस हैं, जो परस्पर-सम्पर्क से प्रसारित होते हैं, उजागर होने में समय लेते हैं और अनुकूल स्थिति प्राप्त होने पर दस प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से रोगियों का ख़ात्मा करते हैं। ग्लोबल अवेयरनेस सिस्टम ही इससे बचाव में काम आ सकता है। शुक्र है कि हमारे पास सूचना-प्रौद्योगिकी है, इसका विवेकपूर्वक उपयोग कीजिये। और आपकी सरकारें क्या कह रही हैं, इससे ज़्यादा विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी किए जा रहे अधिकृत प्रतिवेदनों और अपडेट्स पर भरोसा कीजिये। पोस्ट 4- कोरोना वायरस को लेकर आज की तारीख़ के दो अपडेट हैं- एक ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है। दूसरा ये कि इसके कारण इटली एक कम्प्लीट लॉकडाउन में चला गया है। अगर हम कोरोना वायरस को एक वैश्विक महामारी की तरह देखते हैं और उससे चिंतित हैं तो हमें चीन नहीं इटली की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। चीन में वह स्थानीय बीमारी थी, इटली में वह वैश्विक रोग है। मेरे सामने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 11 मार्च की रिपोर्ट है, जो बतला रही है कि कोरोना वायरस से चीन में अब तक 3162 मौतें हुई हैं और इसके बाद इटली का नम्बर आता है, जहां अब तक इससे 631 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। यह एक दिन पुराना आंकड़ा है। 12 मार्च की रिपोर्ट इटली में मृत्युओं का आंकड़ा 31 प्रतिशत की नाटकीय बढ़ोतरी के साथ 827 बतला रही है। यह विनाश की चक्रवृद्धि गति है। यह किसी भी ग़ैर-चीनी, ग़ैर-एशियाई देश के लिए बहुत बड़ा आंकड़ा है। तीसरे नम्बर पर ईरान है, जहां 290 मृत्युएं हुई हैं। जब पहले-पहल हमने कोरोना वायरस का नाम सुना था, तो इसे वुहान-विषाणु कहकर पुकारा था। यह चीन के एक प्रांत में फैल रहा था। हमने इसके लिए चीन की खानपान की आदतों को दोषी ठहराया था। मेरी टाइमलाइन पर 31 जनवरी को लिखी गई पोस्ट है, जिसे ख़ूब पढ़ा गया। किंतु हमें स्वीकार करना होगा कि 31 जनवरी को हममें से कोई भी यह सोच नहीं रहा था कि यह महामारी इतनी तेज़ी से फैलेगी। हम स्वयं को सुरक्षित मान रहे थे। कल विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव ने कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित करते हुए जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने कहा है कि आज की तारीख़ में दुनिया के 118 देशों के 1 लाख 25 हज़ार लोग इस विषाणु से ग्रस्त हैं। अच्छी ख़बर यह है कि अभी भी 77 देश ऐसे हैं, जहां से कोरोना के संक्रमण की कोई सूचना अभी तक नहीं मिली है। किंतु वे कब तक इससे बचे रहेंगे? अगर वे वैश्वीकरण के समक्ष लाचार हैं तो देर-अबेर यह विषाणु उन्हें जकड़ लेगा। अगर यह विषाणु पहले ही वहां पहुंच चुका है तो कौन जाने इसे कितने लोगों तक सीमित रखने में सफलता मिलेगी। जब मैंने देखा कि इटली में 827 लोग कोरोना वायरस से दम तोड़ चुके हैं, जो कि चीन में हुई मृत्युओं का एक-चौथाई है, तो भूमण्डलीकरण के इस अंधेरे पहलू ने मुझको निराशा से भर दिया। कोरोना से अब जाकर मैं सर्वाधिक चिंतित हुआ हूं। ये सच है कि इटली शीत-प्रधान देश है, भारत वैसा नहीं है, फिर भी यह दु:खद है कि जो बीमारी एक गांव से दूसरे गांव नहीं पहुंचना चाहिए थी, वो आज वैश्वीकरण की कृपा से दुनिया में फैल रही है और कोई इसे रोक नहीं पा रहा है। हम वैश्वीकरण के सामने लाचार हो चुके हैं। वैश्वीकरण का एक आयाम ग्लोबल मार्केट भी है और आज पूरी दुनिया के बाज़ार में आप शॉक-वेव्ज़ महसूस कर सकते हैं। महामारी अपने साथ महामंदी को लेकर आएगी। मृत्युबोध, नैराश्य, व्यामोह और असहायता- जो कि आधुनिक मनुष्य के चार बुनियादी गुण हैं- (अगर आप भारतीय हैं तो इसमें पांचवां गुण जोड़ लीजिये- मसखरी) – इस महामारी के सामने मुंह बाए खड़े होने पर अपनी पूरी आदिम त्वरा से उभरकर सामने आ रहे हैं। प्राणघातक विषाणु चीन से इटली कैसे पहुंचा? द गार्डियन बतलाता है जनवरी के अंत में इटली में कोराना वायरस के तीन मामले पाए गए थे। इनमें से दो चीनी पर्यटक थे, जो चीन-देश से अपने साथ यह तोहफ़ा लेकर यूरोप पहुंचे थे। रोकथाम की जो कोशिशें इटली में तब की जा सकती थीं, की गईं, किंतु फ़रवरी के महीने में उत्तरी इटली में रोग चुपचाप फैलता रहा। 18 फ़रवरी को इटली के कोन्डोंग्या में 38 वर्ष के एक स्वस्थ व्यक्ति में कोराना के लक्षण दिखलाई दिए। उसका चीन से कोई वास्ता नहीं था। आज उसे इतालवी मीडिया के द्वारा पेशेंट-वन कहकर पुकारा जा रहा है। वह 36 घंटे बिना इलाज के रहा। इससे भी बढ़कर, वह इस अवधि में सार्वजनिक सम्पर्क में रहा और अनजाने ही अपने से मिलने वाले लोगों को संक्रमित करता रहा। आज एक महीने से भी कम समय के बाद इटली में 10 हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हैं और 800 से अधिक की मृत्यु हो चुकी है। चीन से कहीं अधिक ठंडा मुल्क होने के कारण वहां पर कोरोना का स्ट्राइक रेट 10 फ़ीसद की घातक दर को छू रहा है। मात्र दो टूरिस्टों ने चीन से हज़ारों किलोमीटर दूर मौजूद यूरोप को सहसा एक वैश्विक महामारी के सामने एक्सपोज़ कर दिया। भारत देश में यह विषाणु 30 जनवरी को पहुंचा। बतलाने की आवश्यकता नहीं- चीन से। केरल में वुहान विश्वविद्यालय के एक छात्र के साथ इसकी आमद हुई। केरल के बाहर पहला मामला दूसरी मार्च को पाया गया। यह, ज़ाहिर है, इटली से लौटे एक व्यक्ति में था। फिर जयपुर, हैदराबाद और बेंगलुरु में मामले सामने आए। दुनिया में जिन तीन देशों में कोरोना का प्रकोप सबसे अधिक है- चीन, इटली और ईरान- अब वे शेष विश्व के लिए कोरोना के निर्यातक बन चुके हैं। एक से दो, दस से हज़ार, हज़ार से असंख्य की यह मल्टीप्लाइंग चेन-रिएक्शन है। आज दुनिया की आबादी 7.7 अरब है और सवा लाख संक्रमित लोग आबादी का बड़ा छोटा प्रतिशत हैं, किंतु महज़ तीन माह पूर्व तक यह केवल चीन-देश के एक प्रांत की फेफड़ाजनित बीमारी भर थी। वैश्विक सम्पर्क के इस कालखण्ड में आणविक विस्फोट की तरह इसका प्रसार हो सकता है। मुसीबत यह है कि जब आप घबड़ाकर तालाबंदी पर आमादा हो जाते हैं, जैसे कि इटली में हुआ है, तो इससे ग्लोबल इकोनॉमी, जो कि अत्यंत क्षणभंगुर परिघटना है, तीव्रगति से विषाद में चली जाती है। और सेवा क्षेत्र का फुगावा फूटने लगता है। हज़ार तरह की कॉन्स्पिरेसी थ्योरियां भी चलन में हैं। यह कि चीन-देश जैविक हथियारों का प्रयोग कर रहा था और उसके विफल रहने का यह दुष्परिणाम है। यह कि यह सब झूठ है (ग्लोबल वॉर्मिंग की तरह?) और इसके पीछे मास्क और सेनिटाइज़र का बाज़ार है। यह कि ज़ुकाम-नज़ला जितने लोगों को मारता हे, कोरोना की भी वही मारक क्षमता है। किंतु इटली के आंकड़े मुझको चिंतित कर रहे हैं। खेल-आयोजनों पर इसकी मार दिखने लगी है। शायद जब भारत में आईपीएल पर इसकी मार पड़ेगी, तभी जाकर यहां के लोगों को इसकी गम्भीरता का अहसास होगा। चीज़ों को समझने के भारत के अपने मानदण्ड हैं।   जब हमें भोजपुरी गीतों, सस्ते चुटकुलों, गंदे खानपान-रहनसहन पर गर्व और त्योहार की हुड़दंग से फ़ुरसत मिले, तब शायद हम सतर्कता को गम्भीरता से लेंगे। हर चीज़ में मसखरी भली बात नहीं है। चुटकुला-प्रधान देश अगर महामारी को लेकर थोड़ा-सा अधिक सचेत हो जाएगा तो दुनिया में उसकी नाक नहीं कट जावैगी।

Dakhal News