मीडिया


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- प्रो. संजय द्विवेदी      एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, लेकिन एक मीडिया शिक्षक होने के नाते मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष भारत में मीडिया शिक्षा के 100 वर्ष पूरे हुए थे। वर्ष 1920 में थियोसोफिकल सोसायटी के तत्वावधान में मद्रास राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में डॉक्टर एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम शुरू किया था। लगभग एक दशक बाद वर्ष 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में शुरू किया गया। इस क्रम में पंजाब विश्वविद्यालय, जो उस वक्त के लाहौर में हुआ करता था, पहला विश्वविद्यालय था, जिसने अपने यहां पत्रकारिता विभाग की स्थापना की। भारत में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थापक  कहे जाने वाले प्रोफेसर पीपी सिंह ने वर्ष 1941 में इस विभाग की स्थापना की थी। अगर हम स्वतंत्र भारत की बात करें, तो सबसे पहले मद्रास विश्वविद्यालय ने वर्ष 1947 में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की स्थापना की।     इसके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय, मैसूर के महाराजा कॉलेज, उस्मानिया यूनिवर्सिटी एवं नागपुर यूनिवर्सिटी ने मीडिया शिक्षा से जुड़े कई कोर्स शुरू किए। 17 अगस्त, 1965 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय जन संचार संस्थान की स्थापना की, जो आज मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पूरे एशिया में सबसे अग्रणी संस्थान है।  आज भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एवं जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से मीडिया शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं। भारत में मीडिया शिक्षा का इतिहास 100 वर्ष जरूर पूर्ण कर चुका है, परंतु यह अभी तक इस उलझन से मुक्त नहीं हो पाया है कि यह तकनीकी है या वैचारिक। तकनीकी एवं वैचारिकी का द्वंद्व मीडिया शिक्षा की उपेक्षा के लिए जहां उत्तरदायी है, वहां सरकारी उपेक्षा और मीडिया संस्थानों का सक्रिय सहयोग न होना भी मीडिया शिक्षा के इतिहास की तस्वीर को धुंधली प्रस्तुत करने को विवश करता है।     भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. ई. ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं।  पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है?     दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।     मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आज मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे। आज मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो।     न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।     एक वक्त था जब पत्रकारिता का मतलब प्रिंट मीडिया होता था। अस्सी के दशक में रिलीज हुई अमेरिकी फिल्म Ghostbusters (घोस्टबस्टर्स) में सेक्रेटरी जब वैज्ञानिक से पूछती है कि ‘क्या वे पढ़ना पसंद करते हैं? तो वैज्ञानिक कहता है ‘प्रिंट इज डेड’। इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था, परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर जिस तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उसे देखकर ये लगता है कि ये सवाल आज की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से हमें ये सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2008 में अमेरिकी लेखक जेफ गोमेज ने ‘प्रिंट इज डेड’ पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के खत्म होने की अवधारणा को जन्म दिया था। उस वक्त इस किताब का रिव्यू करते हुए एंटोनी चिथम ने लिखा था कि, “यह किताब उन सब लोगों के लिए ‘वेकअप कॉल’ की तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं, किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है।” वहीं एक अन्य लेखक रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने का, समय के अनुसार एक चार्ट ही बना डाला। इस चार्ट में जो बात मुख्य रूप से कही गई थी, उसके अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व से अखबारों के प्रिंट संस्करण खत्म हो जाएंगे।         मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। (लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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Dakhal News 15 May 2021


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उर्मिलेश-   एक हिंदी-पत्रकार के तौर पर अपने लगभग चालीस वर्ष के अनुभव और देश-विदेश के अपने भ्रमण से अर्जित समझ के आधार पर पिछले कुछ वर्षो से यह बात मैं लगातार कहता आ रहा हूं. उसे आज फिर दोहराऊंगा. इस महामारी में भी नये सिरे से इसे कहने की जरुरत है. हमारा साफ शब्दों में कहना है कि अब उत्तर भारत के हिंदी-भाषी इलाकों के गरीबों और उत्पीड़ित समाज के लोगों को अपने बच्चों को शुरू से ही अंग्रेजी में शिक्षित करने का प्रबंध करना चाहिए. खर्च में कटौती करना पडे तो भी बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कोई समझौता नही कीजिये. सामाजिक, धार्मिक या सामुदायिक संगठनों को गांव-गांव ऐसे स्कूल खोलने चाहिए, जहां बच्चों को शुरु से ही अंग्रेजी में शिक्षित किया जा सके. बेशक, वे एक भाषा के तौर पर हिंदी भी पढें-समझें!   अपने को आपका हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से भी यह सुनिश्चित कराइये कि वे सरकार में आने पर आपके बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह अंग्रेजी में शिक्षा का प्रबंध करेंगे. हर चुनाव में आम लोग अपने नेताओं पर इसके लिए दबाव बनायें. याद रखिये, हर प्रमुख नेता(वह चाहे जिस जाति या धर्म का हो!) का बेटा अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ा होता है या पढ़ रहा होता है.   इस महामारी(कोविड-19) के बाद जब हालात कुछ संभलेंगे तो अच्छी नौकरियां अंग्रेजी वालों को मिलेंगी और मजदूरी का काम हिंदी वालों को. अंग्रेजी के बगैर होम-डिलीवरी वाली कंपनियों की साधारण नौकरी भी नहीं मिलेगी. मामला सिर्फ नौकरी का नही है. सूचना, ज्ञान और विज्ञान की दुनिया से बेहतर परिचय के लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान ज़रूरी है. हिंदी में पढ़कर आपके बच्चे सूचना के लिए हिंदी उन अखबारों को पढ़ने और, टीवीपुरम् के कथित न्यूज़ चैनलों को देखने के लिए अभिशप्त होंगे, जिनका न्यूज़ की दुनिया से अब कोई वास्ता नहीं, वे सब एक अमानवीय सोच, एक जनविरोधी राजनीतिक धारा और कारपोरेट प्रोपगेन्डा के संगठित मंच भर हैं.   आपके बच्चे अगर फर्राटेदारअंग्रेजी नहीँ जानेंगे तो देश-विदेश के अपेक्षाकृत अच्छे मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेंगे. घटिया प्रोपगेन्डा के घटिया मंच उनके दिमाग में घटिया विचार इंजेक्ट करेंगे.   अब इस महामारी में ही देख लीजिये. हर जरूरी चीज का नाम अंग्रेजी में है: टीका का नाम सब भूल चुके हैं. अब उसे ‘हिंदी’, ‘हिंदू’ और ‘हिन्दुस्थान’ वाले भी ‘वैक्सीन’ कहते हैं. देश के हिंदी अखबारों में भी ‘वैक्सीन’ और ‘वैक्सीनेशन’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं. इसे वे ‘अप-मार्केट’ की भाषा ‘हिंग्लिश’ कहते हैं. फिर आपके बच्चे ऐसी घटिया भाषा क्यों बोलें? वे सीधे अंग्रेजी ही क्यों न बोलें? महामारी के बारे में हिंदी अखबारों में सार्थक और ज़रूरी खबरें बहुत कम छप रही हैं. हिंदी के न्यूज़ चैनल इतना सब सामने होता देखकर भी सरकारी भोंपू बने हुए हैं—पूरे के पूरे टीवीपुरम्! उनमें काम करने वाले भी ज्यादातर कुछ ही समुदायों के होते हैं.   विदेश के अंग्रेजी अखबार-न्यूज चैनल ही आज भारत का सच बताते दिख रहे हैं. अगर देश में यह काम कोई कर रहा है तो वे भारत की अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट हैं. इनमें कुछ दो भाषाओं मे भी हैं. देश के कुछेक अंग्रेजी चैनलों के कुछेक एंकर और विश्लेषक भी अच्छे कार्यक्रम पेश कर रहे हैं. वेबसाइटों की पहुंच अभी हमारे यहां ज़्यादा नहीं है.   लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि ज्ञान-विज्ञान का बड़ा खजाना अंग्रेजी मे है. हमारी सरकारों ने बीते 73 वर्षो में हिंदी को इस लायक बनाया ही नहीं. सरकारों के असल संचालक अंग्रेजी में सोचते और करते रहे, नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों की गरीब और उत्पीड़ित जनता खो हिंदी के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहे!   आज गरीबों के बच्चे हिंदी में क्यों पढें? क्या तर्क हैहिंदी-वादियो के पास? क्या सिर्फ मजदूरी करने के लिए हिंदी में पढ़ें? रिक्शा या टेम्पो चलाने के लिए? या कुछ ‘शक्तिशाली लोगों’ के इशारे पर काम करने वाली दंगाइयो की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ?   इसलिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के उत्पीड़ित समाजों के लोगों, अब आप अपने बच्चों को वैज्ञानिक, प्रोफेसर, रिसर्चर, समाज विज्ञानी, न्यायविद्, लेखक, आईआईटियन, कम्प्यूटर विज्ञानी और अंतरिक्ष विज्ञानी बनाने के लिए अंग्रेजी को उनकी शिक्षा का माध्यम बनाइये. पढ-लिखकर वे स्वयं भी बदलेंगे और अपने समाजों में बदलाव का प्रेरक भी बनेंगे.   इस बारे में हिंदी क्षेत्र के कुछ बुजुर्ग होते नेताओं या कुछ आत्ममुग्ध हिंदी लेखकों-बुद्धिजीवियों की फ़ालतू और बासी दलीलो से कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है. यही न कि वो आपसे कहने आयेंगे कि आप अपनी प्यारी हिंदी छोड़कर अपने बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षा क्यों दिलाने लगे? आप पूछियेगा उनसे, उनमें कितनों के बच्चे निगम या पंचायत संचालित हिंदी वाले स्कूलों में पढ़ते हैं? फिर वे आपको बेवजह हिंदी-भक्त क्यों बनाये रखना चाहते हैं?सोचिये और बदलिये, वरना बहुत देर हो जायेगी!

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Dakhal News 8 May 2021


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उर्मिलेश-   एक हिंदी-पत्रकार के तौर पर अपने लगभग चालीस वर्ष के अनुभव और देश-विदेश के अपने भ्रमण से अर्जित समझ के आधार पर पिछले कुछ वर्षो से यह बात मैं लगातार कहता आ रहा हूं. उसे आज फिर दोहराऊंगा. इस महामारी में भी नये सिरे से इसे कहने की जरुरत है. हमारा साफ शब्दों में कहना है कि अब उत्तर भारत के हिंदी-भाषी इलाकों के गरीबों और उत्पीड़ित समाज के लोगों को अपने बच्चों को शुरू से ही अंग्रेजी में शिक्षित करने का प्रबंध करना चाहिए. खर्च में कटौती करना पडे तो भी बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कोई समझौता नही कीजिये. सामाजिक, धार्मिक या सामुदायिक संगठनों को गांव-गांव ऐसे स्कूल खोलने चाहिए, जहां बच्चों को शुरु से ही अंग्रेजी में शिक्षित किया जा सके. बेशक, वे एक भाषा के तौर पर हिंदी भी पढें-समझें!   अपने को आपका हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से भी यह सुनिश्चित कराइये कि वे सरकार में आने पर आपके बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह अंग्रेजी में शिक्षा का प्रबंध करेंगे. हर चुनाव में आम लोग अपने नेताओं पर इसके लिए दबाव बनायें. याद रखिये, हर प्रमुख नेता(वह चाहे जिस जाति या धर्म का हो!) का बेटा अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ा होता है या पढ़ रहा होता है.   इस महामारी(कोविड-19) के बाद जब हालात कुछ संभलेंगे तो अच्छी नौकरियां अंग्रेजी वालों को मिलेंगी और मजदूरी का काम हिंदी वालों को. अंग्रेजी के बगैर होम-डिलीवरी वाली कंपनियों की साधारण नौकरी भी नहीं मिलेगी. मामला सिर्फ नौकरी का नही है. सूचना, ज्ञान और विज्ञान की दुनिया से बेहतर परिचय के लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान ज़रूरी है. हिंदी में पढ़कर आपके बच्चे सूचना के लिए हिंदी उन अखबारों को पढ़ने और, टीवीपुरम् के कथित न्यूज़ चैनलों को देखने के लिए अभिशप्त होंगे, जिनका न्यूज़ की दुनिया से अब कोई वास्ता नहीं, वे सब एक अमानवीय सोच, एक जनविरोधी राजनीतिक धारा और कारपोरेट प्रोपगेन्डा के संगठित मंच भर हैं.   आपके बच्चे अगर फर्राटेदारअंग्रेजी नहीँ जानेंगे तो देश-विदेश के अपेक्षाकृत अच्छे मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेंगे. घटिया प्रोपगेन्डा के घटिया मंच उनके दिमाग में घटिया विचार इंजेक्ट करेंगे.   अब इस महामारी में ही देख लीजिये. हर जरूरी चीज का नाम अंग्रेजी में है: टीका का नाम सब भूल चुके हैं. अब उसे ‘हिंदी’, ‘हिंदू’ और ‘हिन्दुस्थान’ वाले भी ‘वैक्सीन’ कहते हैं. देश के हिंदी अखबारों में भी ‘वैक्सीन’ और ‘वैक्सीनेशन’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं. इसे वे ‘अप-मार्केट’ की भाषा ‘हिंग्लिश’ कहते हैं. फिर आपके बच्चे ऐसी घटिया भाषा क्यों बोलें? वे सीधे अंग्रेजी ही क्यों न बोलें? महामारी के बारे में हिंदी अखबारों में सार्थक और ज़रूरी खबरें बहुत कम छप रही हैं. हिंदी के न्यूज़ चैनल इतना सब सामने होता देखकर भी सरकारी भोंपू बने हुए हैं—पूरे के पूरे टीवीपुरम्! उनमें काम करने वाले भी ज्यादातर कुछ ही समुदायों के होते हैं.   विदेश के अंग्रेजी अखबार-न्यूज चैनल ही आज भारत का सच बताते दिख रहे हैं. अगर देश में यह काम कोई कर रहा है तो वे भारत की अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट हैं. इनमें कुछ दो भाषाओं मे भी हैं. देश के कुछेक अंग्रेजी चैनलों के कुछेक एंकर और विश्लेषक भी अच्छे कार्यक्रम पेश कर रहे हैं. वेबसाइटों की पहुंच अभी हमारे यहां ज़्यादा नहीं है.   लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि ज्ञान-विज्ञान का बड़ा खजाना अंग्रेजी मे है. हमारी सरकारों ने बीते 73 वर्षो में हिंदी को इस लायक बनाया ही नहीं. सरकारों के असल संचालक अंग्रेजी में सोचते और करते रहे, नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों की गरीब और उत्पीड़ित जनता खो हिंदी के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहे!   आज गरीबों के बच्चे हिंदी में क्यों पढें? क्या तर्क हैहिंदी-वादियो के पास? क्या सिर्फ मजदूरी करने के लिए हिंदी में पढ़ें? रिक्शा या टेम्पो चलाने के लिए? या कुछ ‘शक्तिशाली लोगों’ के इशारे पर काम करने वाली दंगाइयो की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ?   इसलिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के उत्पीड़ित समाजों के लोगों, अब आप अपने बच्चों को वैज्ञानिक, प्रोफेसर, रिसर्चर, समाज विज्ञानी, न्यायविद्, लेखक, आईआईटियन, कम्प्यूटर विज्ञानी और अंतरिक्ष विज्ञानी बनाने के लिए अंग्रेजी को उनकी शिक्षा का माध्यम बनाइये. पढ-लिखकर वे स्वयं भी बदलेंगे और अपने समाजों में बदलाव का प्रेरक भी बनेंगे.   इस बारे में हिंदी क्षेत्र के कुछ बुजुर्ग होते नेताओं या कुछ आत्ममुग्ध हिंदी लेखकों-बुद्धिजीवियों की फ़ालतू और बासी दलीलो से कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है. यही न कि वो आपसे कहने आयेंगे कि आप अपनी प्यारी हिंदी छोड़कर अपने बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षा क्यों दिलाने लगे? आप पूछियेगा उनसे, उनमें कितनों के बच्चे निगम या पंचायत संचालित हिंदी वाले स्कूलों में पढ़ते हैं? फिर वे आपको बेवजह हिंदी-भक्त क्यों बनाये रखना चाहते हैं?सोचिये और बदलिये, वरना बहुत देर हो जायेगी!

Dakhal News

Dakhal News 8 May 2021


bhopal,circumstances are better,  good jobs ,English people, Hindi people,wages

उर्मिलेश-   एक हिंदी-पत्रकार के तौर पर अपने लगभग चालीस वर्ष के अनुभव और देश-विदेश के अपने भ्रमण से अर्जित समझ के आधार पर पिछले कुछ वर्षो से यह बात मैं लगातार कहता आ रहा हूं. उसे आज फिर दोहराऊंगा. इस महामारी में भी नये सिरे से इसे कहने की जरुरत है. हमारा साफ शब्दों में कहना है कि अब उत्तर भारत के हिंदी-भाषी इलाकों के गरीबों और उत्पीड़ित समाज के लोगों को अपने बच्चों को शुरू से ही अंग्रेजी में शिक्षित करने का प्रबंध करना चाहिए. खर्च में कटौती करना पडे तो भी बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कोई समझौता नही कीजिये. सामाजिक, धार्मिक या सामुदायिक संगठनों को गांव-गांव ऐसे स्कूल खोलने चाहिए, जहां बच्चों को शुरु से ही अंग्रेजी में शिक्षित किया जा सके. बेशक, वे एक भाषा के तौर पर हिंदी भी पढें-समझें!   अपने को आपका हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से भी यह सुनिश्चित कराइये कि वे सरकार में आने पर आपके बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह अंग्रेजी में शिक्षा का प्रबंध करेंगे. हर चुनाव में आम लोग अपने नेताओं पर इसके लिए दबाव बनायें. याद रखिये, हर प्रमुख नेता(वह चाहे जिस जाति या धर्म का हो!) का बेटा अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ा होता है या पढ़ रहा होता है.   इस महामारी(कोविड-19) के बाद जब हालात कुछ संभलेंगे तो अच्छी नौकरियां अंग्रेजी वालों को मिलेंगी और मजदूरी का काम हिंदी वालों को. अंग्रेजी के बगैर होम-डिलीवरी वाली कंपनियों की साधारण नौकरी भी नहीं मिलेगी. मामला सिर्फ नौकरी का नही है. सूचना, ज्ञान और विज्ञान की दुनिया से बेहतर परिचय के लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान ज़रूरी है. हिंदी में पढ़कर आपके बच्चे सूचना के लिए हिंदी उन अखबारों को पढ़ने और, टीवीपुरम् के कथित न्यूज़ चैनलों को देखने के लिए अभिशप्त होंगे, जिनका न्यूज़ की दुनिया से अब कोई वास्ता नहीं, वे सब एक अमानवीय सोच, एक जनविरोधी राजनीतिक धारा और कारपोरेट प्रोपगेन्डा के संगठित मंच भर हैं.   आपके बच्चे अगर फर्राटेदारअंग्रेजी नहीँ जानेंगे तो देश-विदेश के अपेक्षाकृत अच्छे मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेंगे. घटिया प्रोपगेन्डा के घटिया मंच उनके दिमाग में घटिया विचार इंजेक्ट करेंगे.   अब इस महामारी में ही देख लीजिये. हर जरूरी चीज का नाम अंग्रेजी में है: टीका का नाम सब भूल चुके हैं. अब उसे ‘हिंदी’, ‘हिंदू’ और ‘हिन्दुस्थान’ वाले भी ‘वैक्सीन’ कहते हैं. देश के हिंदी अखबारों में भी ‘वैक्सीन’ और ‘वैक्सीनेशन’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं. इसे वे ‘अप-मार्केट’ की भाषा ‘हिंग्लिश’ कहते हैं. फिर आपके बच्चे ऐसी घटिया भाषा क्यों बोलें? वे सीधे अंग्रेजी ही क्यों न बोलें? महामारी के बारे में हिंदी अखबारों में सार्थक और ज़रूरी खबरें बहुत कम छप रही हैं. हिंदी के न्यूज़ चैनल इतना सब सामने होता देखकर भी सरकारी भोंपू बने हुए हैं—पूरे के पूरे टीवीपुरम्! उनमें काम करने वाले भी ज्यादातर कुछ ही समुदायों के होते हैं.   विदेश के अंग्रेजी अखबार-न्यूज चैनल ही आज भारत का सच बताते दिख रहे हैं. अगर देश में यह काम कोई कर रहा है तो वे भारत की अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट हैं. इनमें कुछ दो भाषाओं मे भी हैं. देश के कुछेक अंग्रेजी चैनलों के कुछेक एंकर और विश्लेषक भी अच्छे कार्यक्रम पेश कर रहे हैं. वेबसाइटों की पहुंच अभी हमारे यहां ज़्यादा नहीं है.   लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि ज्ञान-विज्ञान का बड़ा खजाना अंग्रेजी मे है. हमारी सरकारों ने बीते 73 वर्षो में हिंदी को इस लायक बनाया ही नहीं. सरकारों के असल संचालक अंग्रेजी में सोचते और करते रहे, नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों की गरीब और उत्पीड़ित जनता खो हिंदी के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहे!   आज गरीबों के बच्चे हिंदी में क्यों पढें? क्या तर्क हैहिंदी-वादियो के पास? क्या सिर्फ मजदूरी करने के लिए हिंदी में पढ़ें? रिक्शा या टेम्पो चलाने के लिए? या कुछ ‘शक्तिशाली लोगों’ के इशारे पर काम करने वाली दंगाइयो की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ?   इसलिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के उत्पीड़ित समाजों के लोगों, अब आप अपने बच्चों को वैज्ञानिक, प्रोफेसर, रिसर्चर, समाज विज्ञानी, न्यायविद्, लेखक, आईआईटियन, कम्प्यूटर विज्ञानी और अंतरिक्ष विज्ञानी बनाने के लिए अंग्रेजी को उनकी शिक्षा का माध्यम बनाइये. पढ-लिखकर वे स्वयं भी बदलेंगे और अपने समाजों में बदलाव का प्रेरक भी बनेंगे.   इस बारे में हिंदी क्षेत्र के कुछ बुजुर्ग होते नेताओं या कुछ आत्ममुग्ध हिंदी लेखकों-बुद्धिजीवियों की फ़ालतू और बासी दलीलो से कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है. यही न कि वो आपसे कहने आयेंगे कि आप अपनी प्यारी हिंदी छोड़कर अपने बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षा क्यों दिलाने लगे? आप पूछियेगा उनसे, उनमें कितनों के बच्चे निगम या पंचायत संचालित हिंदी वाले स्कूलों में पढ़ते हैं? फिर वे आपको बेवजह हिंदी-भक्त क्यों बनाये रखना चाहते हैं?सोचिये और बदलिये, वरना बहुत देर हो जायेगी!

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Dakhal News 8 May 2021


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उर्मिलेश-   एक हिंदी-पत्रकार के तौर पर अपने लगभग चालीस वर्ष के अनुभव और देश-विदेश के अपने भ्रमण से अर्जित समझ के आधार पर पिछले कुछ वर्षो से यह बात मैं लगातार कहता आ रहा हूं. उसे आज फिर दोहराऊंगा. इस महामारी में भी नये सिरे से इसे कहने की जरुरत है. हमारा साफ शब्दों में कहना है कि अब उत्तर भारत के हिंदी-भाषी इलाकों के गरीबों और उत्पीड़ित समाज के लोगों को अपने बच्चों को शुरू से ही अंग्रेजी में शिक्षित करने का प्रबंध करना चाहिए. खर्च में कटौती करना पडे तो भी बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कोई समझौता नही कीजिये. सामाजिक, धार्मिक या सामुदायिक संगठनों को गांव-गांव ऐसे स्कूल खोलने चाहिए, जहां बच्चों को शुरु से ही अंग्रेजी में शिक्षित किया जा सके. बेशक, वे एक भाषा के तौर पर हिंदी भी पढें-समझें!   अपने को आपका हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से भी यह सुनिश्चित कराइये कि वे सरकार में आने पर आपके बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह अंग्रेजी में शिक्षा का प्रबंध करेंगे. हर चुनाव में आम लोग अपने नेताओं पर इसके लिए दबाव बनायें. याद रखिये, हर प्रमुख नेता(वह चाहे जिस जाति या धर्म का हो!) का बेटा अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ा होता है या पढ़ रहा होता है.   इस महामारी(कोविड-19) के बाद जब हालात कुछ संभलेंगे तो अच्छी नौकरियां अंग्रेजी वालों को मिलेंगी और मजदूरी का काम हिंदी वालों को. अंग्रेजी के बगैर होम-डिलीवरी वाली कंपनियों की साधारण नौकरी भी नहीं मिलेगी. मामला सिर्फ नौकरी का नही है. सूचना, ज्ञान और विज्ञान की दुनिया से बेहतर परिचय के लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान ज़रूरी है. हिंदी में पढ़कर आपके बच्चे सूचना के लिए हिंदी उन अखबारों को पढ़ने और, टीवीपुरम् के कथित न्यूज़ चैनलों को देखने के लिए अभिशप्त होंगे, जिनका न्यूज़ की दुनिया से अब कोई वास्ता नहीं, वे सब एक अमानवीय सोच, एक जनविरोधी राजनीतिक धारा और कारपोरेट प्रोपगेन्डा के संगठित मंच भर हैं.   आपके बच्चे अगर फर्राटेदारअंग्रेजी नहीँ जानेंगे तो देश-विदेश के अपेक्षाकृत अच्छे मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेंगे. घटिया प्रोपगेन्डा के घटिया मंच उनके दिमाग में घटिया विचार इंजेक्ट करेंगे.   अब इस महामारी में ही देख लीजिये. हर जरूरी चीज का नाम अंग्रेजी में है: टीका का नाम सब भूल चुके हैं. अब उसे ‘हिंदी’, ‘हिंदू’ और ‘हिन्दुस्थान’ वाले भी ‘वैक्सीन’ कहते हैं. देश के हिंदी अखबारों में भी ‘वैक्सीन’ और ‘वैक्सीनेशन’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं. इसे वे ‘अप-मार्केट’ की भाषा ‘हिंग्लिश’ कहते हैं. फिर आपके बच्चे ऐसी घटिया भाषा क्यों बोलें? वे सीधे अंग्रेजी ही क्यों न बोलें? महामारी के बारे में हिंदी अखबारों में सार्थक और ज़रूरी खबरें बहुत कम छप रही हैं. हिंदी के न्यूज़ चैनल इतना सब सामने होता देखकर भी सरकारी भोंपू बने हुए हैं—पूरे के पूरे टीवीपुरम्! उनमें काम करने वाले भी ज्यादातर कुछ ही समुदायों के होते हैं.   विदेश के अंग्रेजी अखबार-न्यूज चैनल ही आज भारत का सच बताते दिख रहे हैं. अगर देश में यह काम कोई कर रहा है तो वे भारत की अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट हैं. इनमें कुछ दो भाषाओं मे भी हैं. देश के कुछेक अंग्रेजी चैनलों के कुछेक एंकर और विश्लेषक भी अच्छे कार्यक्रम पेश कर रहे हैं. वेबसाइटों की पहुंच अभी हमारे यहां ज़्यादा नहीं है.   लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि ज्ञान-विज्ञान का बड़ा खजाना अंग्रेजी मे है. हमारी सरकारों ने बीते 73 वर्षो में हिंदी को इस लायक बनाया ही नहीं. सरकारों के असल संचालक अंग्रेजी में सोचते और करते रहे, नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों की गरीब और उत्पीड़ित जनता खो हिंदी के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहे!   आज गरीबों के बच्चे हिंदी में क्यों पढें? क्या तर्क हैहिंदी-वादियो के पास? क्या सिर्फ मजदूरी करने के लिए हिंदी में पढ़ें? रिक्शा या टेम्पो चलाने के लिए? या कुछ ‘शक्तिशाली लोगों’ के इशारे पर काम करने वाली दंगाइयो की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ?   इसलिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के उत्पीड़ित समाजों के लोगों, अब आप अपने बच्चों को वैज्ञानिक, प्रोफेसर, रिसर्चर, समाज विज्ञानी, न्यायविद्, लेखक, आईआईटियन, कम्प्यूटर विज्ञानी और अंतरिक्ष विज्ञानी बनाने के लिए अंग्रेजी को उनकी शिक्षा का माध्यम बनाइये. पढ-लिखकर वे स्वयं भी बदलेंगे और अपने समाजों में बदलाव का प्रेरक भी बनेंगे.   इस बारे में हिंदी क्षेत्र के कुछ बुजुर्ग होते नेताओं या कुछ आत्ममुग्ध हिंदी लेखकों-बुद्धिजीवियों की फ़ालतू और बासी दलीलो से कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है. यही न कि वो आपसे कहने आयेंगे कि आप अपनी प्यारी हिंदी छोड़कर अपने बच्चों को अंग्रेजी में शिक्षा क्यों दिलाने लगे? आप पूछियेगा उनसे, उनमें कितनों के बच्चे निगम या पंचायत संचालित हिंदी वाले स्कूलों में पढ़ते हैं? फिर वे आपको बेवजह हिंदी-भक्त क्यों बनाये रखना चाहते हैं?सोचिये और बदलिये, वरना बहुत देर हो जायेगी!

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Dakhal News 8 May 2021


delhi,Aaj Tak anchor ,Rohit Sardana, passed away

बहुत ही दुखद खबर है। आजतक के चर्चित एंकर और राइट विंग पत्रकार रोहित सरदाना की मौत हो गई है।   बताया जा रहा है कि रोहित कोरोना से संक्रमित थे। मेट्रो अस्पताल नोएडा में भर्ती थे। डाक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था। अचानक इसी दौरान इन्हें हार्ट अटैक आ गया और बचाया न जा सका।   रोहित के निधन की सूचना मिलते ही आजतक में मातम फैल गया है। किसी को इस मौत को लेकर यक़ीन नहीं हो रहा है।       कुछ प्रतिक्रियाएं देखें-   सुधीर चौधरी- अब से थोड़ी देर पहले @capt_ivane का फ़ोन आया। उसने जो कहा सुनकर मेरे हाथ काँपने लगे। हमारे मित्र और सहयोगी रोहित सरदाना की मृत्यु की ख़बर थी। ये वाइरस हमारे इतने क़रीब से किसी को उठा ले जाएगा ये कल्पना नहीं की थी। इसके लिए मैं तैयार नहीं था। ये भगवान की नाइंसाफ़ी है.. ॐ शान्ति!   साक्षी जोशी- आज तक के एंकर रोहित सरदाना के निधन की खबर ने अंदर तक हिला दिया है। ये अत्यंत ही दुखद समाचार है। अब तक विश्वास नहीं हो पा रहा है। ये किसकी नज़र लग गई हमारे देश को। बस अभी निशब्द हूँ।   चित्रा त्रिपाठी- हँसता-खेलता परिवार, दो छोटी बेटियाँ. उनके लिए इस दंगल को हारना नहीं था @sardanarohit जी.आज सुबह चार बजे नोएडा के निजी अस्पताल में ICU में आपको ले ज़ाया गया और दिन चढ़ने के साथ ये बहुत बुरी खबर. कुछ कहने को अब बचा ही नहीं.   राणा यशवंत- रोहित तुम सदमा दे गए यार! बहुत क़ाबू करने के बावजूद ऐसा लग रहा है कि शरीर काँप रहा है। ये ईश्वर की बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी है!! ऊपर अगर कोई दुनिया है तो तुमको वहाँ सबसे शानदार जगह मिले। तुम ज़बरदस्त इंसान थे। इससे ज़्यादा अभी कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूँ। उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़!!

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Dakhal News 30 April 2021


delhi,Aaj Tak anchor ,Rohit Sardana, passed away

बहुत ही दुखद खबर है। आजतक के चर्चित एंकर और राइट विंग पत्रकार रोहित सरदाना की मौत हो गई है।   बताया जा रहा है कि रोहित कोरोना से संक्रमित थे। मेट्रो अस्पताल नोएडा में भर्ती थे। डाक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था। अचानक इसी दौरान इन्हें हार्ट अटैक आ गया और बचाया न जा सका।   रोहित के निधन की सूचना मिलते ही आजतक में मातम फैल गया है। किसी को इस मौत को लेकर यक़ीन नहीं हो रहा है।       कुछ प्रतिक्रियाएं देखें-   सुधीर चौधरी- अब से थोड़ी देर पहले @capt_ivane का फ़ोन आया। उसने जो कहा सुनकर मेरे हाथ काँपने लगे। हमारे मित्र और सहयोगी रोहित सरदाना की मृत्यु की ख़बर थी। ये वाइरस हमारे इतने क़रीब से किसी को उठा ले जाएगा ये कल्पना नहीं की थी। इसके लिए मैं तैयार नहीं था। ये भगवान की नाइंसाफ़ी है.. ॐ शान्ति!   साक्षी जोशी- आज तक के एंकर रोहित सरदाना के निधन की खबर ने अंदर तक हिला दिया है। ये अत्यंत ही दुखद समाचार है। अब तक विश्वास नहीं हो पा रहा है। ये किसकी नज़र लग गई हमारे देश को। बस अभी निशब्द हूँ।   चित्रा त्रिपाठी- हँसता-खेलता परिवार, दो छोटी बेटियाँ. उनके लिए इस दंगल को हारना नहीं था @sardanarohit जी.आज सुबह चार बजे नोएडा के निजी अस्पताल में ICU में आपको ले ज़ाया गया और दिन चढ़ने के साथ ये बहुत बुरी खबर. कुछ कहने को अब बचा ही नहीं.   राणा यशवंत- रोहित तुम सदमा दे गए यार! बहुत क़ाबू करने के बावजूद ऐसा लग रहा है कि शरीर काँप रहा है। ये ईश्वर की बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी है!! ऊपर अगर कोई दुनिया है तो तुमको वहाँ सबसे शानदार जगह मिले। तुम ज़बरदस्त इंसान थे। इससे ज़्यादा अभी कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूँ। उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़!!

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Dakhal News 30 April 2021


bhopal, Islam, Hindutva and Christianity,Who changes whom!

संगम पांडेय-   अल बरूनी से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक ने यह माना है कि इस्लाम और हिंदुत्व एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि उनमें कोई तुलना संभव नहीं। लेकिन इस्लाम की तुलना ईसाइयत के साथ संभव है। क्योंकि दोनों में ही एक किताब, एक पैगंबर, धर्मांतरण, ईशनिंदा आदि एक जैसे कांसेप्ट मौजूद होने के साथ-साथ दोनों का ऐतिहासिक स्रोत भी एक ही है। पर इस्लामी समाजों में जहाँ ये कांसेप्ट हड़कंप का सबब बन जाते हैं वहीं ईसाई समाजों में इनका अक्सर उल्लंघन होता है और किसी को खास परवाह नहीं होती, जिसकी वजह है व्यक्ति की आजादी के सवाल को सबसे ऊपर रखना।   दारियो फो के नाटक ‘कॉमिकल मिस्ट्री’ और टीवी शो ‘फर्स्ट मिरेकल ऑफ इन्फैंट जीसस’ को वेटिकन द्वारा सबसे भयंकर ब्लाशफेमी करार देने के बावजूद कई दशकों तक उनके प्रदर्शन वहाँ होते रहे। वहीं एक जमाने में धरती को ब्रह्मांड का केंद्र मानने की बाइबिल की धारणा से उलट राय व्यक्त करने पर गैलीलियो को जिस चर्च ने हाउस अरेस्ट की सजा सुनाई थी उसी चर्च ने अभी कुछ साल पहले कबूल किया कि ईश्वर जादूगर नहीं है और ‘बिग बैंग’ और ‘थ्योरी ऑफ ईवोल्यूशन’ दोनों ही अपनी जगह सही हैं।   चर्च बदलते वक्त के मुताबिक अपनी नैतिकताओं में संशोधन या नवीकरण भी करती रहती है। सन 2009 में उसने ज्यादा धन को भी एक बुराई करार दिया था, जो शायद 1990 के बाद की आर्थिक प्रवृत्तियों के मद्देनजर ही होगा। इसी तरह धर्मांतरण को लेकर भी ईसाइयत इस्लाम की तरह उच्छेदवादी नहीं है। उसमें परंपराएँ छोड़ने और नाम बदलने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ यीशु का भक्त और चर्च का अनुयायी होना ही इसके लिए काफी है। जबकि मुझे याद है इंडोनेशिया में (सुकर्ण पुत्री) मेगावती (जो पहले से ही मुसलमान थीं) के खिलाफ आवाजें उठी थीं कि सिर्फ इस्लाम अपनाने से काम नहीं चलेगा, नाम भी बदलो।     यूरोप के उदाहरण से पता चलता है कि धर्म ही समाजों को नहीं बदलते बल्कि समाज भी धर्म को बदल देते हैं। और यह सिर्फ ईसाइयत के हवाले से ही अहम नहीं है, बल्कि यूरोप में एक मुल्क अल्बानिया भी है जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। लेकिन वह देश उसी तरह समानता और व्यक्ति स्वातंत्र्य के नियमों को मानता है जैसे कि ज्यादातर अन्य यूरोपीय देश। यहाँ तक कि एक वक्त पर अनवर होजा ने वहाँ कम्युनिस्ट क्रांति भी कर दी थी, जो कि किसी मुस्लिम देश के लिए असंभव सी लगने वाली बात है। और न सिर्फ इतना बल्कि होजा ने अल्बानिया को एक नास्तिक राज्य भी घोषित कर दिया था।   यूरोप की तुलना में एशिया की प्रवृत्ति लकीर के फकीर की है। उदाहरण के लिए हिंदुत्व को ही लें। करीब ढाई सौ साल पहले तक हिंदुओं को इस बात का ठोस अहसास तक नहीं था कि वे कोई कौम हैं। अब ये अहसास आया है तो बजाय इसके कि वे हिंदुत्व की खामियों के मुतल्लिक सुधार का कोई डॉक्ट्राइन प्रस्तावित करें, वे सारा गौरव अतीत में तलाश लेने पर आमादा हैं। हो सकता है यह प्रवृत्ति उन्होंने इस्लाम से उधार ली हो या हो सकता है उनकी अपनी हो; क्योंकि खुद गाँधी वर्णाश्रम को हिंदुत्व के लिए अनिवार्य मानते थे, जिनकी इस धारणा की अच्छी चीरफाड़ अंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में की है। फेसबुक पर इस प्रश्न को पर मैं खुद दो बार अनफ्रेंड किया जा चुका हूँ।   दरअसल सेकुलर दृष्टिकोण जिस रीजनिंग से पैदा होता है उसकी हालत अपने यहाँ सुभानअल्ला किस्म की है। खुद को सेकुलर मानने वाले यहाँ के बुद्धिजीवी जिन नेहरू पर फिदा हैं वे नेहरू अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं कि ‘(अफगानों या तुर्कों के भारत पर आक्रमण को) मुस्लिम आक्रमण या मुस्लिम हुकूमत लिखना उसी तरह गलत है जैसे भारत में ब्रिटिश के आने को ईसाइयों का आना और उनकी हुकूमत को ईसाई हुकूमत कहा जाना।’   विश्लेषण के इस घटिया तरीके में दो भिन्न वास्तविकताओं को खींच-खाँचकर एक खोखली तुलना में फिट कर दिया जाता है। ऐसा वही लिख सकता है जो नहीं जानता कि इस्लाम में स्टेट और रिलीजन मजहबी एजेंडे के अंतर्गत मिक्स कर दिए जाते हैं, जिसके लिए धिम्मी, जजिया, शरिया आदि कई विधियों का प्रावधान है, जिस वजह से हमलावर के अफगान या तुर्क होने का फर्क मुस्लिम पहचान के मुकाबले अंततः एक बहुत कमतर किस्म का फर्क रह जाता है। साथ ही ऐसी खोखली तुलना वह कर सकता है जो नहीं जानता कि सोलहवीं शताब्दी में कैसे ब्रिटेन ने वेटिकन से नाता तोड़कर प्रोटेस्टेंटवाद का साथ दिया था, जिसके बाद कैथोलिज्म के रूढ़िवाद को वहाँ काफी संदेह और हिकारत से देखा जाता था।   स्पष्ट ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मंतव्य मुस्लिम विस्तारवाद के मंतव्यों से बिल्कुल अलग थे, और मैग्ना कार्टा के बाद ब्रिटेन की यही आधुनिकता कालांतर में उसका वैश्विक साम्राज्य बना पाने में बड़ी सहायक वजह बनी। जो भी हो भारत के सेकुलर बुद्धिजीवी इसी नेहरू-पद्धति के तर्कों से आज तक काम चला रहे हैं। प्रसंगवश याद आया कि अंबेडकर निजी बातचीत में नेहरू को ‘चौथी कक्षा का लड़का’ कहा करते थे। ऐसा धनंजय कीर ने अंबेडकर की जीवनी में लिखा है।   यह भी लिखा है कि एक बार गाँधी से अंबेडकर के विरोध को देखते हुए जमनालाल बजाज ने उन्हें सलाह दी कि ‘कुछ समय के लिए खुद के मत को दूर रख आप नेहरू के आदर्श का अनुसरण क्यों नहीं करते?’ अंबेडकर ने जवाब दिया- ‘तात्कालिक यश के लिए खुद की विवेक-बुद्धि की बलि देने वाला इंसान मैं नहीं हूँ।’

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Dakhal News 13 April 2021


bhopal, Pradeep Bhai

राजेश अग्रवाल- हंसमुख, मृदुभाषी लेकिन समय-समय पर कटाक्ष कर आईना भी दिखाने वाले प्रदीप आर्य pradeep arya भाई का आज दोपहर करीब तीन बजे कोरोना संक्रमण के चलते निधन हो गया। खबर सुनकर व्यथित हूं। करीब तीन दशक का साथी रहा। हमने साथ-साथ लोकस्वर से काम शुरू किया और करीब 10 साल देशबन्धु में साथ रहे। रिपोर्टिंग और सम्पादन में निपुण होते हुए भी उनका एकमात्र लगाव कार्टून की ओर रहा। 90 के दशक में जब उन्होंने कार्टून बनाना शुरू किया तो जाहिर है, धार की कमी थी। मेरी आलोचना के शिकार हुआ करते थे। कई मौके आये जब किसी विषय पर बनाये गये कार्टून को बार-बार सुधारने कहा, फिर पेज पर जगह दी जा सकी। अपनी आलोचना का कभी बुरा नहीं माना और हमेशा खुद को परिष्कृत करते रहे। उन्हें तनख्वाह रिपोर्टिंग और डेस्क की मिलती थी पर पहचान कार्टून की वजह से थी। इन दिनों न केवल स्थानीय विषयों पर बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके कार्टून देखकर मैं हैरान होता रहा। कोरोना संक्रमण पर तो उन्होंने कई शानदार कार्टून बनाये। कुछ दिन पहले ही तेज धार, गहरी चोट वाले कार्टून तैयार करने पर मैंने उसे बधाई दी थी।   सब साथी देशबन्धु छोड़कर अपनी-अपनी अलग राह निकल गये लेकिन उन्होंने वहां करीब 30 साल काम किया। बीते साल ही उन्होंने इस अख़बार से विदाई ली थी। कहा था- मायूसी के साथ छोड़ा, वजह की बात रहने दें। खैर, उनके मित्र दूसरे अख़बारों में बैठे हुए हैं। जो कभी साथ काम करते थे। इन दिनों रोजाना लोकस्वर में उनका कार्टून छप रहा था। सम्पादकीय पन्ने पर अब आपको उनके रेखाचित्र नहीं दिखेंगे। करीबी दोस्तों को पता है कि वे युवावस्था से ही आंख की बीमारी से जूझते रहे। बड़ी, फिर और बड़ी लैंस का चश्मा लगता रहा। वे काम करते-करते हर घंटे, आधे घंटे में चश्मा उतारकर आंखों से निकले पानी को पोंछते थे। आंखों की हिफाजत के लिये कई बार उन्हें चेन्नई, चंडीगढ़ जाकर भर्ती होना पड़ा। पर इस शारीरिक पीड़ा को उन्होंने कभी रोड़ा नहीं माना। खुशमिजाजी कम नहीं हुई। आंखें कमजोर थी मगर दृष्टि बड़ी तीखी थी। इसका प्रतिबिम्ब उनके कार्टून में दिखाई देता है। अपनी स्कूटर में अक्सर प्रदीप को घुमाने ले जाने वाले सहकर्मी, हमारे व्यंग्य कार मित्र अतुल खरे कह रहे थे कि खबर सुनकर स्तब्ध हूं। लग रहा है जैसे मेरे जिस्म का एक हिस्सा मुझसे अलग हो गया। विडम्बना ही कहूंगा कि मेरे घर से सिर्फ 50 कदम के भीतर वह आरबी अस्पताल है जहां प्रदीप ने अंतिम सांसें लीं, मगर न मैं उसका चेहरा देख पाया, न कांधा दे सका। मना किया गया। आपदा ही कुछ ऐसी है। प्रदीप भाई के परिवार को साहस, संबल मिले। हम सदा साथ हैं। दैनिक अखबारों में नियमित छपने वाले बिलासपुर के पहले कार्टूनिस्ट को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। प्रदीप के साथ बरसों काम किये वरिष्ठ पत्रकार राजेश अग्रवाल की फेसबुक वाल से।

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Dakhal News 13 April 2021


bhopal, Announcement ,end of

ईशमधु तलवार- ज्ञानरंजन जी का अभी-अभी फोन आया। बताया कि “पहल” का आने वाला 125 वां अंक, आखिरी अंक होगा! सुनकर अच्छा नहीं लगा, लेकिन क्या करें! हिंदी साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका का इस तरह अवसान होना मन को दुखी कर गया। ज्ञानजी ने बताया कि संसाधनों की भी दिक्कत नहीं थी, लेकिन स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा। ज्ञानजी हमेशा स्वस्थ बने रहें, यही शुभकामना।

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Dakhal News 2 April 2021


bhopal, Announcement ,end of

ईशमधु तलवार- ज्ञानरंजन जी का अभी-अभी फोन आया। बताया कि “पहल” का आने वाला 125 वां अंक, आखिरी अंक होगा! सुनकर अच्छा नहीं लगा, लेकिन क्या करें! हिंदी साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका का इस तरह अवसान होना मन को दुखी कर गया। ज्ञानजी ने बताया कि संसाधनों की भी दिक्कत नहीं थी, लेकिन स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा। ज्ञानजी हमेशा स्वस्थ बने रहें, यही शुभकामना।

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Dakhal News 2 April 2021


bhopal, Security was snatched ,from Amitabh Thakur,Avneesh Awasthi was questioned!

अमिताभ ठाकुर- अभी-अभी ज्ञात हुआ कि केंद्र सरकार के निर्देशों पर UPGovt द्वारा दिसंबर 2016 से मुझे प्रदत्त सुरक्षा कल 01/04 रात्रि को यकबयक @CPLucknow @lucknowpolice के आदेशों से हटा दिया गया. बताया गया कि “ऊपर” से आदेश था- “संवेदनशील मामला है, तत्काल सुरक्षा हटाई जाये”.   ज्ञात हो कि ताकतवर नौकरशाह अवनीश अवस्थी पर कल ही अमिताभ ठाकुर ने सवाल उठाए थे। आज सुरक्षा वापसी का आदेश हो गया। इससे पहले अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर पारंपरिक तरीक़े से विदाई किए जाने की माँग की थी। कहा जा सकता है कि जबरन रिटायर किए जाने के बाद भी अमिताभ के तेवर ढीले नहीं पड़े हैं। वे अब भी सत्ता सिस्टम पर सवाल उठाकर उनकी आँखों की किरकिरी बने हुए हैं।

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Dakhal News 2 April 2021


bhopal,4 Resigns Declined ,Output After Interfering, HR Editorial

न्यूज़ 24 में आउटपुट में 4 रिजाइन एक साथ गिरने से हलचल बढ़ गई है. अचानक 4 रिजाइन गिरने का कारण एचआर को बताया जा रहा है. सूत्रों से पता चला है कि सत्या ओझा आजकल आउटपुट में हर चीज में दखलंदाजी कर रहे थे. प्रोड्यूसर्स को काम सिखा रहे थे. हर रोज बढ़ती दखलंदाजी से नाराज होकर हिमांशु कौशिक, सरोज झा, वीरेश राव और उत्कर्ष तिवारी ने रिजाइन दे दिया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि सत्या ओझा का भाई आउटपुट में ही है जो न्यूज रूम की बातों को अपने भाई तक पहुँचाता है. बताया जा रहा है कि न्यूज़24 में जबसे अजय आज़ाद की टीम आई है तब से खूब तानाशाही चल रही है. ऊपर से यहाँ के एचआर ने भी परेशान कर रखा है. इसी सबको देखते हुए प्रोडक्शन के 4 सीनियर लोगों ने एक साथ रिजाइन दे दिया.

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Dakhal News 11 March 2021


bhopal, Shadow came out, my head, Awadhesh Bajaj

अवधेश बजाज हे गुरुदेव मैंने चौदह महीने पहले ही आपसे ये कहा था कि आपको कुछ नहीं होगा पर आप तो हार मान बैठे। मुझे आज ऐसा लग रहा है कि जैसे छह साल पहले मेरे पिता का साया मेरे सिर से उठा था वैसा ही साया आज उठ गया है।पत्रकारिता के संक्रमण काल में आप एक आशा की किरण थे। आपने हजारों हजार मेरे जैसे अवधेश बजाज पैदा किये होंगे। गुरुदेव मैं नि:शब्द हूं, स्तब्ध हूं। विश्वास नहीं हो रहा है कि अभी 7 फरवरी को आपसे बात हुई थी। आप 8 तारीख को मेरे कार्यक्रम में आने वाले थे। मैं सिर्फ इंतजार ही करता रहा गुरुदेव….. मेरी स्मृति में आप मेरे पिता श्री बनवारी बजाज के संघर्ष के साथी, मेरे अभिभावक, मेरे गुरू की तरह हमेशा मेरी स्मृतियों में रहेंगे। कमल दीक्षित   7 जनवरी 2020 को आपके लिए फेसबुक पर किया गया पोस्ट……. मैं आपका मानस पुत्र हूं आपको कुछ नहीं होगा आदरणीय कमल दीक्षित जी कुछ समय से बीमार हैं लेकिन पिछले एक सप्ताह से उनकी स्थिति गंभीर हो गयी है। कल मैं उनसे मिला मिलकर मन बहुत दुखी एवं द्रवित है क्योंकि मैं स्वयं को उनका मानस पुत्र मानता हूं। भगवान उन्हें स्वस्थ करे इसकी कामना करता हूं और उन्हें भी आश्वस्त कराना चाहता हूं कि गुरुदेव आपको कुछ नहीं होगा। दीक्षितजी के बारे में उद्गार व्यक्त करना मैं आसान नहीं समझता। क्योंकि इसके लिए मुझे खुद को कई प्रवृत्ति के मनुष्यों में परिवर्तित करना होगा। मुझे वह शिल्पी बनना होगा, जो शब्दों के गढऩे वाले हुनर के धनी दीक्षितजी के लिए एक-एक उत्कृष्ट अक्षर की रचना कर सके। उनके व्यक्तित्व को परिभाषित करने हेतु मात्र यही विकल्प बचता है कि मैं कलम में सियाही की जगह उनके प्रति अपनी अगाध श्रद्धा उड़ेलूं। कागज के स्थान पर अपने हृदय को बिछा दूं। शब्दों की पवित्रता के लिए के लिए वेदों की ऋचाओं से कुछ उधार की प्रार्थना करूं। वाक्य विन्यास की दीर्घायु के लिए मां के हृदय से निकले आशीर्वाद जैसे किसी तत्व की खोज करूं। क्या मुझ सरीखे किसी सामान्य इंसान के लिए यह संभव है! क्योंकि बहुत अच्छे असाधारण तत्व का मेरे जीवन में केवल एक पक्ष है। वह यह कि मुझे पत्रकारिता के जीवन की आरंभिक पायदान पर श्री दीक्षितजी का आशीर्वाद मिला। उनके सान्निध्य का ममतामयी आंचल हासिल हुआ। उनकी कृपाओं का पितृतुल्य साया मेरे ऊपर पड़ा। सन् 1985-86 का वह समय हमेशा याद आता है। सुबह की ओस जैसी पवित्रताओं में लिपटी हुई यादों के साथ। पिताजी ने मुझे पत्रकारिता जगत की ओर जाने का मार्ग दिखाया और दीक्षितजी ने वह रास्ता खोला, जिस पर चलकर वास्तविक पत्रकार बना जाता है। मेरा पत्रकार बनना दिवंगत पिताजी की अभिलाषा थी। मेरी उत्सुकता थी। ये दो भाव शिला की तरह तब तब निर्जीव ही पड़े रहे, जब तक दीक्षितजी के चरणों का उनसे स्पर्श नहीं हुआ। दीक्षितजी उस समय नवभारत के इंदौर संस्करण के संपादक हुआ करते थे। उन्होंने प्रयास किये, किंतु दुर्भाग्यवश इस अखबार में मेरा प्रवेश नहीं हो सका। मेरे युवा मन के लिए यह किसी बड़ी लडख़ड़ाहट साबित होता, यदि दीक्षितजी ने अपने व्यक्तित्व का सहारा देकर मुझे थाम न लिया होता। उन्होंने मेरे लिए नवभारत समाचार सेवा में स्थान बनाया। भोपाल में आवास की समस्या मेरे मुंह-बायें खड़ी थी। इसका पता चलते ही दीक्षितजी ने मेरे लिए दिवंगत रामगोपाल माहेश्वरी के आवास में प्रबंध कराया। उनसे हुए प्रत्येक वार्तालाप में मैं यह देखकर दंग रह जाता था कि आशा का संचार करने के कितने अनगिनत एवं विश्वसनीय स्रोत उनके सहचर बने हुए थे। वह सम्पूर्ण मनुष्य बनकर मेरे पथ प्रदर्शक बने रहे। मुझ सरीखे नये चेहरे को आगे बढ़ाने के लिए वह किसी अभिभावक की भूमिका में सक्रिय रहे। मेरे अंदर के बिखरे-बिखरे लेखक का रेजा-रेजा उन्होंने किसी कुशल कारीगर की तरह सहेजा और उसे एक मुकम्मल शक्ल प्रदान करने तक लगातार इसके लिए प्रयास करते रहे। सिखाने की प्रक्रिया में वह किसी सीनियर की तरह कभी-भी पेश नहीं आये। इसकी जगह उनके भीतर का वह गुरू सामने आया, जो स्वयं को मोमबत्ती की तरह जलाते हुए दूसरों के अंधेरे को हरने का कर्म करता है। आज यह सब लिखते समय मैं भावातिरेक से खुद को बचाने का पूरा प्रयास कर रहा हूं। भावावेश में व्यक्ति बहक जाता है। मैं इस लेखन के समय यह गुस्ताखी कतई नहीं कर सकता। हरेक शब्द की मैं पूरी क्रूरता से समीक्षा कर रहा हूं। उन्हें सुनार की भट्टी की आग में पिघलाने में मुझे किंचित मात्र भी पीड़ा महसूस नहीं हो रही। शब्दों की तलाश मुझे किसी हीरे की खदान में जमीन का बेदर्दी से सीना खोदते शख्स की तरह ही वसुंधरा की पीड़ा से विरत रख रही है। समुंदर के भीतर किसी सीप का पूरी निर्दयता से सीना चीरने वाले की ही तरह मैं भी निर्मिमेष भाव से शब्द रूपी मोती चुन रहा हूं। वजह केवल यह कि मामला गुरू दक्षिणा का है। मेरे गुरू ने शब्दों की जिस लहलहाती फसल का बीज मेरे भीतर बोया था, उन्हीं शब्दों को उनके लिए लिखना किसी गुरू दक्षिणा की पावन प्रक्रिया से भला अलग हो सकता है! इसलिए मैं अपने विचारों को कागज पर लाने से पहले सोने की तरह तपा रहा हूं। हीरे की तरह तराश रहा हूं। मोती की तरह तलाश रहा हूं। दीक्षितजी की दृष्टि में मैं यदि इनमें से किसी एक भी प्रयास में सफल रहा तो इसे अपने जीवन को धन्य करने वाले आशीर्वाद की तरह मानूंगा।

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Dakhal News 11 March 2021


delhi, Literature can not , tied to nationality

दिल्ली । ‘साहित्य भारतीय भाषाओं में लिखा गया हो या भारतीय भूमि में या भारतीय संवेदनाओं के साथ लिखा गया हो, उसे भारतीय साहित्य के अंतर्गत परिगणित किया जाना चाहिए । भारतीय साहित्य को समझने के लिए भारत को समझना आवश्यक है । भारत एक नक्शा नहीं संस्कृति है अर्थात् भारत को एक भौगोलिक क्षेत्र के बजाए सांस्कृतिक क्षेत्र की तरह देखा जाना चाहिए ।’ हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग की हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान में सुप्रसिद्ध आलोचक और इग्नू के समकुलपति प्रो. सत्यकाम ने उक्त विचार व्यक्त किए । उन्होंने ‘भारतीय साहित्य की अवधारणा’ विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय साहित्य का सबसे बड़ा गुण लोकतांत्रिक होना है।   भारतीय साहित्य जन-जन का विश्वास ग्रहण करता है । उसमें एक वर्ग या समुदाय का नहीं बल्कि समस्त समाज का चित्रण मिलता है । इससे पूर्व उन्होंने बल्गेरिया विश्वविद्यालय के अपने अनुभव को एक कहानी के रूप में साझा करते हुए कहा कि साहित्य को राष्ट्रीयता के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। साहित्य मानवतावाद, वैश्विकता और वसुधैव कुटुंबकम् की विराट अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार भारतीय साहित्य एक ही है जो अनेक भाषाओं में लिखा जाता है किंतु कुछ आलोचकों द्वारा भारतीय साहित्य को अनेक कहना भारतीय साहित्य और उसकी भारतीयता को कमजोर करने का प्रयास है।   भारत में हजारों जातियां, संस्कृतियां, सभ्यताएं, धारणाएं और भाषाएं हैं । नई शिक्षा नीति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसमें जो भाषा की विविधता है और विद्यालयी स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने की बात बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की संकल्पना राजनीतिक या भौगोलिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक है और भारतीय साहित्य को समझने से पूर्व इस सांस्कृतिक संकल्पना को समझना जरूरी है । अपनी बात स्पष्ट करने के लिए उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए संजय द्वारा व्यक्त भारत की परिभाषा उद्धृत करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य एक है और विविधताओं के साथ है क्योंकि हम उन विविधताओं के बीच ही जीते हैं । रवींद्रनाथ ठाकुर का कथन उद्धृत करते हुए उन्होंने भारतीयों के आध्यात्मिक के साथ-साथ भौतिक होने पर बल दिया।   प्राचीन काल से साहित्य, दर्शन, कला और विज्ञान में कोई फर्क नहीं रहा । इन सभी क्षेत्रों में होने वाली रचनाएं (शून्य का आविष्कार आदि) हमारे भौतिक होने का प्रमाण है । भारतीय साहित्य मनुष्यता की खोज है। साहित्य के इतिहास पर बात करते हुए उन्होंने भक्तिकाल के साहित्य को जन-साहित्य कहा है जो आध्यात्मिकता, भौतिकता तथा सामूहिक भावना को सुंदर व्यक्त करता है । प्रो. सत्यकाम ने मीजो कविता के पाठ से अपने व्याख्यान का समापन किया जिसका हाल ही में उन्होंने अनुवाद किया था।   प्रश्नोत्तरी सत्र में ‘दक्षिण भारत हिंदी के प्रति उत्कट विरोध भारतीय एकता की पुष्टि पर सवाल उठाते हैं’ को महत्वपूर्ण प्रश्न मानते हुए उन्होंने कहा तमिल सबसे प्राचीन भाषा है और भारत की कोई भी भाषा कमतर नहीं है । विरोध केवल राजनीतिक है । उसका कोई भी सामाजिक या सांस्कृतिक संदर्भ नहीं है । लेकिन हिंदी वालों को तमिल साहित्य पढ़ना-लिखना चाहिए और उनके मनोविज्ञान को समझने की भी ज़रूरत है तो उनमें भी हिंदी के प्रति सद्भावना उत्पन्न होगी । सभी प्रश्नों के विस्तार से उत्तर देते हुए उन्होंने विद्यार्थियों के मन में उत्पन्न जिज्ञासाएं शांत की । इस सत्र का संयोजन साहित्य सभा की उपाध्यक्ष गायत्री द्वारा किया गया।   वेबिनार के प्रारंभ में विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. विमलेंदु तीर्थंकर ने प्रो. सत्यकाम का स्वागत करते हुए उनके व्यक्तित्व की सरलता और सहजता को रेखांकित किया। उन्होंने प्रेमचंद द्वारा हिंदी साहित्य सभा की प्रथम अध्यक्षता को याद करते हुए इसके गौरवशाली इतिहास से भी श्रोताओं का परिचय कराया । प्राध्यापक नौशाद अली ने वक्ता का परिचय देते हुए करोनाकाल में उनके नव-परिवर्तन शैक्षिणिक कार्य, रिकॉर्डेड व्याख्यानों को विद्यार्थियों तक पहुंचाने की सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विभाग प्रभारी डॉ. पल्लव ने कहा कि ऐसे व्याख्यान न केवल विद्यार्थियों के लिए बल्कि प्राध्यापकों एवं सामान्य पाठकों के लिए भी लाभदायक हैं। उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों (झारखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गोवा आदि) से जुड़ने वाले साहित्य प्रेमियों का आभार व्यक्त किया। आयोजन का संयोजन प्राध्यापक डॉ धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने किया। वेबिनार में विभाग के वरिष्ठ अध्यापको डॉ अभय रंजन, डॉ हरींद्र कुमार सहित अन्य विश्वविद्यालयों के प्रध्यापक, शोधार्थी और छात्र भी उपस्थित थे ।   दिशा ग्रोवर(कोषाध्यक्ष)हिंदी साहित्य सभा, हिंदू कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली – 110007

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Dakhal News 1 March 2021


bhopal, The Telegraph newspaper, has coined , new English word

Sanjaya Kumar Singh-   बंगाल ड्रैगथन… द टेलीग्राफ अखबार में आज चुनाव की खबर लीड है और मुख्य शीर्षक पश्चिम बंगाल का चुनाव आठ चरण में कराए जाने पर केंद्रित है। एक लाइन और कुछ ही शब्दों का छोटा सा शीर्षक रखने की अपनी खास शैली को बनाए रखते हुए अखबार ने आज अंग्रेजी का एक नया शब्द गढ़ा है – ड्रैगेथन। यह अंग्रेजी के दो शब्दों – ड्रैग और मैराथन को मिलाकर बनाया गया है। ड्रैग मतलब होता है घसीटना और लंबी दौड़ की प्रतियोगिता या विशेष आयोजन को मैराथन कहते हैं। बंगाल में चुनाव को लंबे समय तक घसीटने की इस घोषणा को अखबार ने बंगाल ड्रैगथन कहा है। और बेशक सही तुलना है।     इस मुख्य शीर्षक के साथ उपशीर्षक है, राज्य अलग दिखाई दे रहा है क्योंकि सबसे लंबा चुनाव होगा। बंगाल का अखबार बंगाल के साथ किए गए भेदभाव (या विशेष पैकेज, राहत, लाभ आप जो मानिए) को विशेष बता रहा है। बंगाल ड्रैगेथन 27 मार्च से 29 अप्रैल तक चलेगा, मतगणना 2 मई को है – यही खबर है। वरना आम चुनाव भी इतना लंबा कहां चलता है और यह भी नई बीमारी है। बहुत हाल तक आम चुनाव इससे बहुत कम समय में हो जाते थे। अखबार ने अपनी इस खबर के साथ अखबार ने प्रमुखता से बताया है कि किस राज्य में कितनी सीट है और कितने चरण में चुनाव होंगे।   इसके साथ यह भी बताया गया है कि मतदान का दिन कौन सा है। पश्चिम बंगाल में आठ दिन मतदान है तो असम में तीन दिन , तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में सिर्फ एक दिन 6 अप्रैल को और मतगणना 2 मई यानी इतवार को होगी। एक नजर में सब कुछ – कोई आरोप, कोई शिकायत भी नहीं।

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Dakhal News 1 March 2021


bhopal, When will ,find out , missing journalist ,Nalin Chauhan

संत समीर- मुझे लग रहा था कि बात हल्की-फुल्की होगी, जल्दी सुलझ जाएगी, इसलिए इस मसले पर अब तक कोई पोस्ट नहीं लिखी, लेकिन अब लग रहा है कि मामला गम्भीर है। बीते दिनों इण्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार मित्र श्यामलाल यादव जी का फ़ोन आया तो चिन्ता और बढ़ी। पुलिस विभाग की ओर से तो ख़ैर पहले ही फ़ोन आ गया था। दिल्ली के सूचना और प्रचार निदेशालय के उपनिदेशक नलिन चौहान क़रीब दो महीने पहले 10 दिसम्बर से लापता हैं या जानबूझकर कहीं गए हैं, कुछ भी अन्दाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है। नवम्बर में उनका पूरा परिवार कोरोना-ग्रस्त हुआ था। लोगों ने ले जाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया तो वहीं से उन्होंने मुझे फ़ोन किया था। मैंने कुछ चिकित्सकीय सुझाव दिए थे और अच्छी बात थी कि वे जल्दी ही स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर भी आ गए थे। जहाँ तक मुझे याद है, 8 दिसम्बर को नलिन जी ने फिर से मुझे फ़ोन किया था और लिखने की एक बड़ी योजना पर मेरे साथ मिलकर काम करना चाहते थे। हमने हफ़्ते भर के भीतर आमने-सामने बैठकर चर्चा करने का भी तय कर लिया था, लेकिन 10 दिसम्बर को एक पारिवारिक समारोह के दौरान जाने क्या हुआ कि शाम को फ़ोन घर पर ही छोड़कर टहलते हुए बाहर निकले और अब तक वापस नहीं लौटे। घर के भीतर आपस में कोई कहा-सुनी हुई थी या घर के बाहर अपहरण जैसी कोई घटना हुई, कुछ भी कहना मुश्किल है। मैं यही मानकर चलता हूँ कि हल्की-फुल्की कोई नाराज़गी होगी और वे जल्दी ही वापस आ जाएँगे, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो नलिन जी को तलाशने की हमें कुछ बड़ी कोशिश करने की ज़रूरत है। नलिन जी बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं, दुनिया-जहान की चिन्ता करते हैं। ऐसे लोगों के आसपास होने से हमारे जैसे लोगों को भी हौसला मिलता है। नलिन जी, अगर आप सचमुच किसी नाराज़गी की वजह से अपनों से दूर गए हों और इस पोस्ट को पढ़ रहे हों, तो ध्यान रखिए कि परिवार के बाहर भी आपके अपने हैं। मुझे लगता है कि आप एक अच्छे परिवार के मुखिया हैं, फिर भी अगर परिवार से नाराज़गी हो तो परिवार को भी छोड़िए और सामने आइए। हम सब तो हैं ही। परिवार समर्थ है अपने हिसाब से रह लेगा, आपके सोच-विचार की ज़रूरत समाज को ज़्यादा है।

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Dakhal News 14 February 2021


bhopal, When will ,find out , missing journalist ,Nalin Chauhan

संत समीर- मुझे लग रहा था कि बात हल्की-फुल्की होगी, जल्दी सुलझ जाएगी, इसलिए इस मसले पर अब तक कोई पोस्ट नहीं लिखी, लेकिन अब लग रहा है कि मामला गम्भीर है। बीते दिनों इण्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार मित्र श्यामलाल यादव जी का फ़ोन आया तो चिन्ता और बढ़ी। पुलिस विभाग की ओर से तो ख़ैर पहले ही फ़ोन आ गया था। दिल्ली के सूचना और प्रचार निदेशालय के उपनिदेशक नलिन चौहान क़रीब दो महीने पहले 10 दिसम्बर से लापता हैं या जानबूझकर कहीं गए हैं, कुछ भी अन्दाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है। नवम्बर में उनका पूरा परिवार कोरोना-ग्रस्त हुआ था। लोगों ने ले जाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया तो वहीं से उन्होंने मुझे फ़ोन किया था। मैंने कुछ चिकित्सकीय सुझाव दिए थे और अच्छी बात थी कि वे जल्दी ही स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर भी आ गए थे। जहाँ तक मुझे याद है, 8 दिसम्बर को नलिन जी ने फिर से मुझे फ़ोन किया था और लिखने की एक बड़ी योजना पर मेरे साथ मिलकर काम करना चाहते थे। हमने हफ़्ते भर के भीतर आमने-सामने बैठकर चर्चा करने का भी तय कर लिया था, लेकिन 10 दिसम्बर को एक पारिवारिक समारोह के दौरान जाने क्या हुआ कि शाम को फ़ोन घर पर ही छोड़कर टहलते हुए बाहर निकले और अब तक वापस नहीं लौटे। घर के भीतर आपस में कोई कहा-सुनी हुई थी या घर के बाहर अपहरण जैसी कोई घटना हुई, कुछ भी कहना मुश्किल है। मैं यही मानकर चलता हूँ कि हल्की-फुल्की कोई नाराज़गी होगी और वे जल्दी ही वापस आ जाएँगे, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो नलिन जी को तलाशने की हमें कुछ बड़ी कोशिश करने की ज़रूरत है। नलिन जी बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं, दुनिया-जहान की चिन्ता करते हैं। ऐसे लोगों के आसपास होने से हमारे जैसे लोगों को भी हौसला मिलता है। नलिन जी, अगर आप सचमुच किसी नाराज़गी की वजह से अपनों से दूर गए हों और इस पोस्ट को पढ़ रहे हों, तो ध्यान रखिए कि परिवार के बाहर भी आपके अपने हैं। मुझे लगता है कि आप एक अच्छे परिवार के मुखिया हैं, फिर भी अगर परिवार से नाराज़गी हो तो परिवार को भी छोड़िए और सामने आइए। हम सब तो हैं ही। परिवार समर्थ है अपने हिसाब से रह लेगा, आपके सोच-विचार की ज़रूरत समाज को ज़्यादा है।

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Dakhal News 14 February 2021


bhopal, When will ,find out , missing journalist ,Nalin Chauhan

संत समीर- मुझे लग रहा था कि बात हल्की-फुल्की होगी, जल्दी सुलझ जाएगी, इसलिए इस मसले पर अब तक कोई पोस्ट नहीं लिखी, लेकिन अब लग रहा है कि मामला गम्भीर है। बीते दिनों इण्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार मित्र श्यामलाल यादव जी का फ़ोन आया तो चिन्ता और बढ़ी। पुलिस विभाग की ओर से तो ख़ैर पहले ही फ़ोन आ गया था। दिल्ली के सूचना और प्रचार निदेशालय के उपनिदेशक नलिन चौहान क़रीब दो महीने पहले 10 दिसम्बर से लापता हैं या जानबूझकर कहीं गए हैं, कुछ भी अन्दाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है। नवम्बर में उनका पूरा परिवार कोरोना-ग्रस्त हुआ था। लोगों ने ले जाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया तो वहीं से उन्होंने मुझे फ़ोन किया था। मैंने कुछ चिकित्सकीय सुझाव दिए थे और अच्छी बात थी कि वे जल्दी ही स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर भी आ गए थे। जहाँ तक मुझे याद है, 8 दिसम्बर को नलिन जी ने फिर से मुझे फ़ोन किया था और लिखने की एक बड़ी योजना पर मेरे साथ मिलकर काम करना चाहते थे। हमने हफ़्ते भर के भीतर आमने-सामने बैठकर चर्चा करने का भी तय कर लिया था, लेकिन 10 दिसम्बर को एक पारिवारिक समारोह के दौरान जाने क्या हुआ कि शाम को फ़ोन घर पर ही छोड़कर टहलते हुए बाहर निकले और अब तक वापस नहीं लौटे। घर के भीतर आपस में कोई कहा-सुनी हुई थी या घर के बाहर अपहरण जैसी कोई घटना हुई, कुछ भी कहना मुश्किल है। मैं यही मानकर चलता हूँ कि हल्की-फुल्की कोई नाराज़गी होगी और वे जल्दी ही वापस आ जाएँगे, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो नलिन जी को तलाशने की हमें कुछ बड़ी कोशिश करने की ज़रूरत है। नलिन जी बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं, दुनिया-जहान की चिन्ता करते हैं। ऐसे लोगों के आसपास होने से हमारे जैसे लोगों को भी हौसला मिलता है। नलिन जी, अगर आप सचमुच किसी नाराज़गी की वजह से अपनों से दूर गए हों और इस पोस्ट को पढ़ रहे हों, तो ध्यान रखिए कि परिवार के बाहर भी आपके अपने हैं। मुझे लगता है कि आप एक अच्छे परिवार के मुखिया हैं, फिर भी अगर परिवार से नाराज़गी हो तो परिवार को भी छोड़िए और सामने आइए। हम सब तो हैं ही। परिवार समर्थ है अपने हिसाब से रह लेगा, आपके सोच-विचार की ज़रूरत समाज को ज़्यादा है।

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Dakhal News 14 February 2021


bhopal, Supreme Court ,again overturned

अविनाश पांडेय समर- सुप्रीम कोर्ट फिर पलटी मार गया। शाहीन बाग आंदोलन की रिव्यू पेटीशन ख़ारिज करते हुए बोला कि आंदोलनकारियों के पास कभी भी कहीं भी विरोध का अधिकार नहीं है! कमाल है कि पिछले महीने ही किसान आंदोलन पर एकदम उल्टी लाइन लेते हुए प्रदर्शन ख़त्म कराने से इंकार कर दिया था! वह भी तब जब किसान बाहर से आये हैं, शाहीन बाग वाले दिल्ली के ही हैं। माने चेहरा देख के फ़ैसला होगा अब? वह भी बड़ी बेंच का फ़ैसला बदल के? सर्वोच्च न्यायालय की 3 सदस्यीय खंड पीठ ने हिम्मत लाल शाह बनाम कमिश्नर दिल्ली पुलिस मामले (1973 AIR 87) में 5 सदस्यीय माने बड़ी- खंड पीठ के फैसले का अद्भुत पुनर्पाठ कर दिया था! उस फैसले में अदालत ने साफ़ कहा था कि ‘बेशक नागरिक जहाँ उनका मन करे ऐसी किसी भी जगह पर यूनियन बना के नहीं बैठ सकते- इसका यह मतलब भी नहीं है कि सरकार कानून बना कर सारे सार्वजनिक रास्तों पर शांतिपूर्ण ढंग से इकठ्ठा होने का अधिकार ख़त्म नहीं कर सकती.” (अनुवाद मेरा) अब देखिये कि जस्टिस संजय किशन कौल के नेतृत्व में तीन सदस्यीय खंडपीठ ने इसका क्या पाठ कर डाला! “हम ये बात पूरी तरह से साफ़ करना चाहते हैं कि सार्वजनिक रास्ते और जगहें इस तरह से और अनंतकाल के लिए कब्जा नहीं की जा सकतीं। लोकतंत्र और असहमति साथ साथ चलते हैं पर प्रदर्शन चिन्हित जगहों में ही होने चाहिए’ (अनुवाद मेरा।) सबसे पहले तो 3 सदस्यीय खंडपीठ अपने से बड़ी 5 सदस्यीय खंडपीठ का फैसला बदल दे यह न्यायिक रूप से गलत है. फिर उसका पुनर्पाठ गलत करे यह और भी ज़्यादा! जो फैसला यह कह रहा है कि जनता कहीं भी प्रदर्शन नहीं कर सकती पर सरकार उसे हर सार्वजनिक जगह में प्रदर्शन करने से रोक भी नहीं सकती!

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Dakhal News 14 February 2021


bhopal, Internet shutdown, economy

योगेश कुमार गोयल 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के बाद हरियाणा के कई जिलों सहित सिंघु, गाजीपुर तथा टीकरी बॉर्डर पर सरकार के निर्देशों पर इंटरनेट सेवा बाधित की गई थी, जो विभिन्न स्थानों पर करीब दस दिनों तक जारी रही। हरियाणा में दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017 के नियम 2 के तहत क्षेत्र में शांति बनाए रखने और सार्वजनिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद करने के आदेश दिए गए थे। इंटरनेट आज न केवल आम जनजीवन का अभिन्न अंग बन चुका है बल्कि इसपर पाबंदी के कारण हरियाणा में कोरोना वैक्सीन कार्यक्रम भी प्रभावित हुआ। इंटरनेट सुविधा पर पाबंदी के कारण छात्रों की ऑनलाइन कक्षाएं बंद हो गई थी, इंटरनेट पर आधारित व्यवसाय ठप हो गए थे। विभिन्न सेवाओं और योजनाओं के माध्यम से एक ओर जहां सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ के सपने दिखा रही है, अधिकांश सेवाओं को इंटरनेट आधारित किया जा रहा है, वहीं बार-बार होते इंटरनेट शटडाउन के चलते जहां लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है और देश को इसका बड़ा आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में जिस तरह इंटरनेट शटडाउन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और लोगों को बार-बार नेटबंदी का शिकार होना पड़ रहा है, उससे भारत की छवि पूरी दुनिया में प्रभावित हो रही है। ब्रिटेन के डिजिटल प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी रिसर्च ग्रुप ‘टॉप-10 वीपीएन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष भारत में कुल 75 बार इंटरनेट शटडाउन किया गया। कुल 8927 घंटे तक इंटरनेट पर लगी पाबंदी से जहां 1.3 करोड़ उपभोक्ता प्रभावित हुए, वहीं इससे देश को करीब 2.8 बिलियन डॉलर (204.89 अरब रुपये) का नुकसान हुआ। इंटरनेट पर जो पाबंदियां 2019 में लगाई गई थी, वे 2020 में भी जारी रहीं और भारत को 2019 की तुलना में गत वर्ष इंटरनेट बंद होने से दोगुना नुकसान हुआ। फेसबुक की पारदर्शिता रिपोर्ट में बताया गया था कि जुलाई 2019 से दिसम्बर 2019 के बीच तो भारत दुनिया में सर्वाधिक इंटरनेट व्यवधान वाला देश रहा था। ‘शीर्ष 10 वीपीएन’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते वर्ष विश्वभर में कुल इंटरनेट शटडाउन 27165 घंटे का रहा, जो उससे पिछले साल से 49 प्रतिशत ज्यादा था। इसके अलावा इंटरनेट मीडिया शटडाउन 5552 घंटे रहा। ब्रिटिश संस्था द्वारा इंटरनेट पर पाबंदियां लगाने वाले कुल 21 देशों की जानकारियों की समीक्षा करने पर पाया गया कि भारत में इसका जितना असर हुआ, वह अन्य 20 देशों के सम्मिलित नुकसान के दोगुने से भी ज्यादा है और नुकसान के मामले में 21 देशों की इस सूची में शीर्ष पर आ गया है। वर्ष 2020 में 1655 घंटों तक इंटरनेट ब्लैकआउट रहा तथा 7272 घंटों की बैंडविथ प्रभावित हुई, जो किसी भी अन्य देश की तुलना में सर्वाधिक है। रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनियाभर में नेटबंदी से होने वाले कुल 4.01 अरब डॉलर के नुकसान के तीन चौथाई हिस्से का भागीदार बना है। इंटरनेट शटडाउन के मामले में भारत के बाद दूसरे स्थान पर बेलारूस और तीसरे पर यमन रहा। बेलारूस में कुल 218 घंटों की नेटबंदी से 336.4 मिलियन डॉलर नुकसान का अनुमान है। रिपोर्ट में ‘इंटरनेट शटडाउन’ को परिभाषित करते हुए इसे ‘किसी विशेष आबादी के लिए या किसी एक स्थान पर इंटरनेट या इलैक्ट्रॉनिक संचार को इरादतन भंग करना’ बताया गया है और इस ब्रिटिश संस्था के अनुसार ऐसा ‘सूचना के प्रवाह पर नियंत्रण’ कायम करने के लिए किया जाता है। उल्लेखनीय है कि भारत में सरकार द्वारा इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग कानूनों का सहारा लिया जाता है, जिनमें कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (सीआरपीसी) 1973, इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 तथा टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज रूल्स 2017 शामिल हैं। पहले सूचना के प्रचार-प्रसार सहित इंटरनेट शटडाउन का अधिकार इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 तथा धारा-144 के तहत सरकार व प्रशासन को दिया गया था लेकिन टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज रूल्स 2017 के अस्तित्व में आने के बाद इंटरनेट शटडाउन का फैसला अब अधिकांशतः इसी प्रावधान के तहत लिया जाने लगा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2016 में एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जो इंटरनेट को मानवाधिकार की श्रेणी में शामिल करता है और सरकारों द्वारा इंटरनेट पर रोक लगाने को सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन बताता है लेकिन यह प्रस्ताव किसी भी देश के लिए बाध्यकारी नहीं है। इंटरनेट शटडाउन किए जाने पर सरकार और प्रशासन द्वारा सदैव एक ही तर्क दिया जाता है कि किसी विवाद या बवाल की स्थिति में हालात बेकाबू होने से रोकने तथा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अफवाहों, गलत संदेशों, खबरों, तथ्यों व फर्जी तस्वीरों के प्रचार-प्रसार के जरिये विरोध की चिंगारी दूसरे राज्यों तक न भड़कने देने के उद्देश्य से ऐसा करने पर विवश होना पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के जरिये कुछ लोगों द्वारा झूठे संदेश और फर्जी वीडियो वायरल कर माहौल खराब करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन उनपर शिकंजा कसने के लिए इंटरनेट पर पाबंदी लगाने के अलावा प्रशासन के पास और भी तमाम तरीके होते हैं। विश्वभर में कई रिसर्चरों का दावा है कि इंटरनेट बंद करने के बाद भी हिंसा तथा प्रदर्शनों को रोकने में इससे कोई बड़ी सफलता नहीं मिलती है, हां, लोगों का काम-धंधा अवश्य चौपट हो जाता है और व्यक्तिगत नुकसान के साथ सरकार को भी बड़ी आर्थिक चपत लगती है। इंटरनेट पर बार-बार पाबंदियां लगाए जाने का देश को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। सरकार द्वारा इंटरनेट के जरिये अफवाहों और भ्रामक तथा भड़काऊ खबरों का प्रसार रोकने के लिए इंटरनेट शटडाउन किया जाता है लेकिन इससे लोगों की जिंदगी थम सी जाती है क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी को चलाए रखने से जुड़ा हर कार्य अब इंटरनेट पर निर्भर जो हो गया है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि एक ओर जहां सरकार हर सुविधा के डिजिटलीकरण पर विशेष बल दे रही है और बहुत सारी सेवाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं, वहीं आन्दोलनों को दबाने के उद्देश्य से नेटबंदी किए जाने के कारण लोगों के आम जनजीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। किसी को अपना आधार कार्ड बनवाना या ठीक कराना हो, किसी सरकारी सेवा का लाभ लेना हो, ऑनलाइन शॉपिंग करनी हो, खाने का ऑर्डर करना हो या फिर ऑनलाइन कैब, टैक्सी, रेल अथवा हवाई टिकट बुक करनी हो, बिना इंटरनेट के इन सभी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाना असंभव है। इंटरनेट शटडाउन के चलते एक ओर जहां ऐसे क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ता है, वहीं सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाना भी लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। नेटबंदी की स्थिति में कोई अपनी फीस, बिजली व पानी के बिल, बैंक की ईएमआई इत्यादि समय से नहीं भर पाता तो बहुत से युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने तथा इंटरनेट का उपयोग कर उनकी तैयारी करने में खासी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। एक अनुमान के अनुसार देश में आज 480 मिलियन से भी ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स हैं, जिनमें से अधिकांश इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। आज हमें जीवन के हर कदम पर इंटरनेट की जरूरत पड़ती है क्योंकि आज का सारा सिस्टम काफी हद तक कम्प्यूटर और इंटरनेट की दुनिया से जुड़ चुका है। सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने कुछ समय पूर्व बताया था कि देश में इंटरनेट शटडाउन के कारण हर घंटे करीब ढाई करोड़ रुपये का नुकसान होता है। ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर’ (एसएलएफसी) भी चिंता जताते हुए कह चुका है कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में हम ‘डिजिटल डार्कनेस’ की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट शटडाउन से लोगों की जिंदगी किस कदर प्रभावित होती है और देश की अर्थव्यवस्था को इसके कारण कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसे में जरूरत है कुछ ऐसे विकल्प तलाशे जाने की, जिससे पूरी तरह इंटरनेट शटडाउन करने की जरूरत न पड़े। मसलन, प्रभावित इलाकों में पूरी तरह इंटरनेट बंद करने के बजाय फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम इत्यादि सोशल साइटों पर अस्थायी पाबंदी लगाई जा सकती है, जिससे विषम परिस्थितियों में भी इंटरनेट का इस्तेमाल कर लोग अपने जरूरी काम कर सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2021


bhopal, Internet shutdown, economy

योगेश कुमार गोयल 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के बाद हरियाणा के कई जिलों सहित सिंघु, गाजीपुर तथा टीकरी बॉर्डर पर सरकार के निर्देशों पर इंटरनेट सेवा बाधित की गई थी, जो विभिन्न स्थानों पर करीब दस दिनों तक जारी रही। हरियाणा में दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017 के नियम 2 के तहत क्षेत्र में शांति बनाए रखने और सार्वजनिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद करने के आदेश दिए गए थे। इंटरनेट आज न केवल आम जनजीवन का अभिन्न अंग बन चुका है बल्कि इसपर पाबंदी के कारण हरियाणा में कोरोना वैक्सीन कार्यक्रम भी प्रभावित हुआ। इंटरनेट सुविधा पर पाबंदी के कारण छात्रों की ऑनलाइन कक्षाएं बंद हो गई थी, इंटरनेट पर आधारित व्यवसाय ठप हो गए थे। विभिन्न सेवाओं और योजनाओं के माध्यम से एक ओर जहां सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ के सपने दिखा रही है, अधिकांश सेवाओं को इंटरनेट आधारित किया जा रहा है, वहीं बार-बार होते इंटरनेट शटडाउन के चलते जहां लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है और देश को इसका बड़ा आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में जिस तरह इंटरनेट शटडाउन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और लोगों को बार-बार नेटबंदी का शिकार होना पड़ रहा है, उससे भारत की छवि पूरी दुनिया में प्रभावित हो रही है। ब्रिटेन के डिजिटल प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी रिसर्च ग्रुप ‘टॉप-10 वीपीएन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष भारत में कुल 75 बार इंटरनेट शटडाउन किया गया। कुल 8927 घंटे तक इंटरनेट पर लगी पाबंदी से जहां 1.3 करोड़ उपभोक्ता प्रभावित हुए, वहीं इससे देश को करीब 2.8 बिलियन डॉलर (204.89 अरब रुपये) का नुकसान हुआ। इंटरनेट पर जो पाबंदियां 2019 में लगाई गई थी, वे 2020 में भी जारी रहीं और भारत को 2019 की तुलना में गत वर्ष इंटरनेट बंद होने से दोगुना नुकसान हुआ। फेसबुक की पारदर्शिता रिपोर्ट में बताया गया था कि जुलाई 2019 से दिसम्बर 2019 के बीच तो भारत दुनिया में सर्वाधिक इंटरनेट व्यवधान वाला देश रहा था। ‘शीर्ष 10 वीपीएन’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते वर्ष विश्वभर में कुल इंटरनेट शटडाउन 27165 घंटे का रहा, जो उससे पिछले साल से 49 प्रतिशत ज्यादा था। इसके अलावा इंटरनेट मीडिया शटडाउन 5552 घंटे रहा। ब्रिटिश संस्था द्वारा इंटरनेट पर पाबंदियां लगाने वाले कुल 21 देशों की जानकारियों की समीक्षा करने पर पाया गया कि भारत में इसका जितना असर हुआ, वह अन्य 20 देशों के सम्मिलित नुकसान के दोगुने से भी ज्यादा है और नुकसान के मामले में 21 देशों की इस सूची में शीर्ष पर आ गया है। वर्ष 2020 में 1655 घंटों तक इंटरनेट ब्लैकआउट रहा तथा 7272 घंटों की बैंडविथ प्रभावित हुई, जो किसी भी अन्य देश की तुलना में सर्वाधिक है। रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनियाभर में नेटबंदी से होने वाले कुल 4.01 अरब डॉलर के नुकसान के तीन चौथाई हिस्से का भागीदार बना है। इंटरनेट शटडाउन के मामले में भारत के बाद दूसरे स्थान पर बेलारूस और तीसरे पर यमन रहा। बेलारूस में कुल 218 घंटों की नेटबंदी से 336.4 मिलियन डॉलर नुकसान का अनुमान है। रिपोर्ट में ‘इंटरनेट शटडाउन’ को परिभाषित करते हुए इसे ‘किसी विशेष आबादी के लिए या किसी एक स्थान पर इंटरनेट या इलैक्ट्रॉनिक संचार को इरादतन भंग करना’ बताया गया है और इस ब्रिटिश संस्था के अनुसार ऐसा ‘सूचना के प्रवाह पर नियंत्रण’ कायम करने के लिए किया जाता है। उल्लेखनीय है कि भारत में सरकार द्वारा इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग कानूनों का सहारा लिया जाता है, जिनमें कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (सीआरपीसी) 1973, इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 तथा टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज रूल्स 2017 शामिल हैं। पहले सूचना के प्रचार-प्रसार सहित इंटरनेट शटडाउन का अधिकार इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 तथा धारा-144 के तहत सरकार व प्रशासन को दिया गया था लेकिन टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज रूल्स 2017 के अस्तित्व में आने के बाद इंटरनेट शटडाउन का फैसला अब अधिकांशतः इसी प्रावधान के तहत लिया जाने लगा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2016 में एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जो इंटरनेट को मानवाधिकार की श्रेणी में शामिल करता है और सरकारों द्वारा इंटरनेट पर रोक लगाने को सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन बताता है लेकिन यह प्रस्ताव किसी भी देश के लिए बाध्यकारी नहीं है। इंटरनेट शटडाउन किए जाने पर सरकार और प्रशासन द्वारा सदैव एक ही तर्क दिया जाता है कि किसी विवाद या बवाल की स्थिति में हालात बेकाबू होने से रोकने तथा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अफवाहों, गलत संदेशों, खबरों, तथ्यों व फर्जी तस्वीरों के प्रचार-प्रसार के जरिये विरोध की चिंगारी दूसरे राज्यों तक न भड़कने देने के उद्देश्य से ऐसा करने पर विवश होना पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के जरिये कुछ लोगों द्वारा झूठे संदेश और फर्जी वीडियो वायरल कर माहौल खराब करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन उनपर शिकंजा कसने के लिए इंटरनेट पर पाबंदी लगाने के अलावा प्रशासन के पास और भी तमाम तरीके होते हैं। विश्वभर में कई रिसर्चरों का दावा है कि इंटरनेट बंद करने के बाद भी हिंसा तथा प्रदर्शनों को रोकने में इससे कोई बड़ी सफलता नहीं मिलती है, हां, लोगों का काम-धंधा अवश्य चौपट हो जाता है और व्यक्तिगत नुकसान के साथ सरकार को भी बड़ी आर्थिक चपत लगती है। इंटरनेट पर बार-बार पाबंदियां लगाए जाने का देश को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। सरकार द्वारा इंटरनेट के जरिये अफवाहों और भ्रामक तथा भड़काऊ खबरों का प्रसार रोकने के लिए इंटरनेट शटडाउन किया जाता है लेकिन इससे लोगों की जिंदगी थम सी जाती है क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी को चलाए रखने से जुड़ा हर कार्य अब इंटरनेट पर निर्भर जो हो गया है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि एक ओर जहां सरकार हर सुविधा के डिजिटलीकरण पर विशेष बल दे रही है और बहुत सारी सेवाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं, वहीं आन्दोलनों को दबाने के उद्देश्य से नेटबंदी किए जाने के कारण लोगों के आम जनजीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। किसी को अपना आधार कार्ड बनवाना या ठीक कराना हो, किसी सरकारी सेवा का लाभ लेना हो, ऑनलाइन शॉपिंग करनी हो, खाने का ऑर्डर करना हो या फिर ऑनलाइन कैब, टैक्सी, रेल अथवा हवाई टिकट बुक करनी हो, बिना इंटरनेट के इन सभी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाना असंभव है। इंटरनेट शटडाउन के चलते एक ओर जहां ऐसे क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ता है, वहीं सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाना भी लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। नेटबंदी की स्थिति में कोई अपनी फीस, बिजली व पानी के बिल, बैंक की ईएमआई इत्यादि समय से नहीं भर पाता तो बहुत से युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने तथा इंटरनेट का उपयोग कर उनकी तैयारी करने में खासी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। एक अनुमान के अनुसार देश में आज 480 मिलियन से भी ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स हैं, जिनमें से अधिकांश इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। आज हमें जीवन के हर कदम पर इंटरनेट की जरूरत पड़ती है क्योंकि आज का सारा सिस्टम काफी हद तक कम्प्यूटर और इंटरनेट की दुनिया से जुड़ चुका है। सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने कुछ समय पूर्व बताया था कि देश में इंटरनेट शटडाउन के कारण हर घंटे करीब ढाई करोड़ रुपये का नुकसान होता है। ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर’ (एसएलएफसी) भी चिंता जताते हुए कह चुका है कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में हम ‘डिजिटल डार्कनेस’ की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट शटडाउन से लोगों की जिंदगी किस कदर प्रभावित होती है और देश की अर्थव्यवस्था को इसके कारण कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसे में जरूरत है कुछ ऐसे विकल्प तलाशे जाने की, जिससे पूरी तरह इंटरनेट शटडाउन करने की जरूरत न पड़े। मसलन, प्रभावित इलाकों में पूरी तरह इंटरनेट बंद करने के बजाय फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम इत्यादि सोशल साइटों पर अस्थायी पाबंदी लगाई जा सकती है, जिससे विषम परिस्थितियों में भी इंटरनेट का इस्तेमाल कर लोग अपने जरूरी काम कर सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2021


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समरेंद्र सिंह- इस देश में किसान एक ताकतवर लॉबी है। ये अकेली ऐसी लॉबी है जो वर्ग रहित है। मतलब सैकड़ों एकड़ वाला, उन खेतों में मजदूरी करने वाला और एक-दो बीघे पट्टे पर लेकर खेती करने वाला – सब किसान हैं। जमीन के मालिक और मजदूर सब किसान हैं। इसलिए किसान लॉबी की ताकत अधिक है। किसी और क्षेत्र के कर्मचारियों से बहुत अधिक। औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों से तो इनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती है। फैक्ट्री मजदूर तो लावारिश प्रजाति हैं। किसान इतनी ताकतवर लॉबी है कि इनसे सरकार डरती है। वोट के लिए इनके कर्जे माफ करती है। गरीबों के लिए दिए जाने वाले पैसे का सीधा भुगतान नहीं करती है। बल्कि वो भुगतान किसानों को होता है। कुछ क्षेत्र के किसानों को। फिर भी तस्वीर ऐसी खींची जाती है कि सारे देश में किसानों का भला हो रहा है। गरीबों के हिस्से का सारा फायदा वो थोड़े से लोग उठा ले जाते हैं जिनके पास बड़ी जोत है। ये एक बात हुई। अब दूसरी बात देखिए। गांव से लेकर शहरों तक, लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पढ़ा रहे हैं। ABC के चक्कर में बच्चे कखग भूलते जा रहे हैं। जमीन से रिश्ता टूटता जा रहा है। वो खेती करने के लायक नहीं हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सारा ढांचा कर्मचारी तैयार करने के लिए है। सरकारी तंत्र में काम करने वालों के अलावा हम इंजीनियर, डॉक्टर, एकाउंटेंट, सेक्रेटरी, वकील, टीचर जैसे अनेक लोग तैयार करते हैं। किसान नहीं तैयार करते। क्योंकि खेती और किसानी के लिए मिट्टी में उतरना होगा। गोबर उठाना होगा। पशुओँ से और पौधों से बात करनी होगी। उनके रंग बदलने का अर्थ समझना होगा। उनकी आवाज का अर्थ समझना होगा। मौसम का मिजाज समझना होगा। ये अर्थ आसान नहीं है। मेरे दोस्तों के बीच में बहुत से लोग खेती करना चाहते हैं। लेकिन ये उनका पहला विकल्प नहीं है। कुछ 40-50 साल की दहलीज पार करके खेती करना चाहते हैं। ये उनकी मजबूरी है या फिर शौक। विकल्प के अभाव में कुछ लोग खेती की तरफ मुड़े हैं। ये खुद को व्यस्त रखने का, उलझाए रखने का अच्छा तरीका हो सकता है, लेकिन व्यवसाय नहीं हो सकता। यहां यह भी बात ध्यान रखने लायक है कि ये सभी लोग इसलिए उधर मुड़ सके हैं क्योंकि उनके पास जमीन है। मेरे पास भी जमीन है। मैं भी जा सकता हूं। लेकिन ऐसे खुशकिस्मत लोग कितने हैं? दरअसल आजाद हिंदुस्तान के पास एक मौका था कि वो विकास की अपनी राह चुन सके और एक नया मॉडल तैयार कर सके। वह मौका छोड़ कर आसान राह चुनी गई। 1990 के दशक में उस राह पर तेजी से दौड़ने का फैसला लिया गया। सारा तंत्र उसी आधार पर विकसित हुआ। हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुले। उनमें भर्ती के लिए हजारों की संख्या में कोचिंग इंस्टीट्यूट बने। इंजीनियरिंग कॉलेजों से कई गुना अधिक आईटीआई खोले गए। हर साल इन जगहों से पढ़ कर निकलने वालों की संख्या लाखों में है।2-4 लाख नहीं बल्कि 25-30 लाख है। मतलब हमने कृषि आधारित नहीं बल्कि उद्योग आधारित ढांचा विकसित किया। अब अचानक कोई आकर कर कहे कि राह बदल लो और राह बदलने का मंत्र MSP को जारी रखना है तो यह बात समझी नहीं जा सकती। लाखों-करोड़ों लोगों द्वारा दिए गए टैक्स की राशि गरीबों की बेहतरी पर तो खर्च की जा सकती है, लेकिन एक सड़े-गले ढांचे को और शोषण के सिस्टम को बचाने में खर्च नहीं की जा सकती है। वर्तमान दौर का हमारा खेती का मॉडल ऐसा ही है। इसमें कुछ लोगों के पास बड़ी जोत है और ये बड़ी जोत वाले किसान खेतीहर मजदूरों का शोषण करते हैं। उनके हिस्से का पैसा इन्हें चाहिए मगर उनके श्रम का भुगतान भी नहीं करना चाहते। मैं उदारीकरण के पक्ष में नहीं था और मैं आज भी नहीं हूं। लेकिन एमएसपी को ऐसे प्रस्तुत करना कि विद्रूप उदारीकरण दूर हो जाएगी, एक मूर्खता भरी बात है। एमएसपी की व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और जल्दी खत्म होनी चाहिए। एक बात और इस देश में कोई किसी पर एहसान नहीं कर रहा। ना किसान और ना ही जवान। सब अपना-अपना काम कर रहे हैं। मेरे घर का चूल्हा किसी अन्नदाता की वजह से नहीं जलता है। इसलिए जलता है कि क्योंकि मैं और मेरे घर के लोग काम करते हैं। अन्न का सौदा करने वाला किस बात का अन्नदाता! ये जो आधुनिक ट्रैक्टर हैं, ये भी उसी उदारीकरण की देन है। हार्वेस्टर भी उसी की देन है। गायों के बछड़े और भैंसों के पाड़े ट्रैक्टरों की वजह से मार दिए जाते हैं। उदारीकरण भी चाहिए, ट्रैक्टर और हार्वेस्टर चाहिए, विदेशी कंपनियों के बीज चाहिए मगर सरकार ऐसी चाहिए जो माल खरीदे। इस सभी किसानों ने अपने लायक बच्चों को घर से खदेड़ दिया है। गांव के मजदूरों को काम देना बंद कर दिया है। बोआई-कठाई का हिस्सा देना भारी लगता है। मगर उन गरीबों के हिस्से की रकम इन्हें चाहिए। ये सब सवर्ण और कुछ पिछड़ी प्रभावी जातियों के किसान देश की छाती पर मूंग दल रहे हैं। किसान शब्द सभी किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। ये सिर्फ बड़ी जमीन के प्रभावी किसानों का प्रतिनिधित्व करता है। किसान आंदोलन के बारे में कई लोगों ने मुझसे मेरी राय पूछी है। आंदोलन मुझे अच्छे लगते हैं। मैं चाहता हूं कि हर रोज हर पल आंदोलन होते रहें। ये आंदोलन बहुत जरूरी हैं। इससे सत्ता में बैठे लोगों में ये खौफ बना रहता है कि अगर उन्होंने ठीक से काम नहीं किया तो उनके खिलाफ आवाज बुलंद होगी। उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंका जाएगा। इस लिहाज से ये आंदोलन बहुत अच्छा है। किसानों ने अपना टेंट गाड़ दिया है और उसकी कील सरकार की छाती पर ठोंक दी है। अब सरकार फंस गई है। करे तो क्या करे! लेकिन सरकार तो सरकार होती है। उससे जीतना आसान नहीं है। वह भी तब जब बात जिद पर आ जाए। इसलिए कुछ मुद्दों पर गंभीरता से सोचना चाहिए। (1) क्या मसला सिर्फ एमएसपी और तीन कानूनों का है?(2) क्या तीनों कानून वापस हो जाए तो उससे जीत मिल जाएगी?(3) कानून वापस लेने के बाद सरकार कोटा सिस्टम लगा दे तब क्या होगा? जिस राज्य में PDS के अनाज की जितनी जरूरत है, उसकी खरीद वहीं से होगी और कमी होने पर पड़ोसी राज्य से खरीद होगी – तब क्या होगा?(4) क्या सरकारों के लिए ये संभव है कि वो सभी किसानों के अनाज की खरीद कर सके और वो सारा अनाज अगर खरीद लिया जाएगा तो उसका होगा क्या?(5) और अगर यही करना है तो फिर WTO का क्या होगा? क्या भारत उससे बाहर आने के लिए तैयार है? क्या भारत के सभी दल इस बात के लिए तैयार हैं कि हमारे देश को WTO से बाहर आ जाना चाहिए?(6) यह संभव नहीं है कि कोई देश WTO में बना रहे और उसके लाभ ले मगर उसके हिसाब से भुगतान करने को तैयार नहीं हो। तो क्या सभी सियासी दल इस पर एकमत हैं?(7) अगर WTO से बाहर आने पर रजामंदी है तो फिर उस ढांचे का क्या होगा जो हमने उदारीकरण के हिसाब से खड़ा किया है?(8) आज हमारे देश में 4000 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। 16000 आईटीआई हैं। उनमें लाखों बच्चे पढ़ाई करते हैं। हर साल 10-14 लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। लाखों तकनीकी श्रमिक तैयार होते हैं। उनका क्या होगा? क्या उन्हें नौकरी हमारी सरकार दे सकेगी?(9) हम अमेरिका में सबसे अधिक निर्यात करते हैं। ब्रिटेन में भी हमारा निर्यात सकारात्मक है। यूरोप में भी बड़ा निर्यात करते हैं। हमारे देश में उनका निवेश भी काफी ज्यादा है। हमारे यहां से हर साल लाखों लोग यूरोप और अमेरिकी देशों में काम करने जाते हैं। नागरिकता लेते हैं। उन सब का क्या होगा? सवाल बहुतेरे हैं। इन सब पर बात होनी चाहिए। आंदोलन अच्छा है। आंदोलन होते रहने चाहिए। लेकिन आंदोलन से जुड़े सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। बात रास्ता बदलने की है। यह देश 73 साल एक रास्ते पर चला है। देश का एक धड़ा अब रास्ता बदलना चाहता है। लिहाजा ये बात होनी ही चाहिए कि ये रास्ता छोड़ने के बाद हम किस रास्ते पर चलेंगे? वह धड़ा हमें किस रास्ते पर ले जाना चाहता है?

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Dakhal News 29 January 2021


bhopal,Discussion about, Rajdeep Sardesai

Sheetal P Singh-   राजदीप सरदेसाई ने इंडिया टुडे ग्रुप से स्तीफा दिया (ऐसी ख़बरें आ रही हैं, पुष्टि का इंतज़ार है)!   26 जनवरी को दिल्ली की घटनाओं पर उनके एक ट्वीट से विवाद हुआ था जिसे उन्होंने हटाकर बदल दिया था। एक किसान की ट्रैक्टर पलटने से हुई मृत्यु के बारे में यह ट्वीट था जिसके साथ के लोग आरोप लगा रहे थे कि वह दिल्ली पुलिस की गोली से मरा है । कारवां नामके पोर्टल/पत्रिका में भी यही दावा किया गया था और बताया गया था कि संबंधित थाने के लोगों ने सीसीटीवी फ़ुटेज हटा दिये हैं।   बाद में उत्तर प्रदेश में हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से उक्त किसान की दुर्घटना में मृत्यु होना बताया गया ।   राजदीप सरदेसाई के इंडिया टुडे से हटने के बाद इस ग्रुप में पूरी तरह सरकार प्रशंसकों / एंकरों / पत्रकारों का बाहुल्य सुनिश्चित हो गया है । वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह की एफबी वॉल से

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Dakhal News 29 January 2021


bhopal, Rajdeep Sardesai, Mrinal Pandey,d several journalists

शशि थरूर, राजदीप, मृणाल पांडेय के खिलाफ नोएडा सेक्टर 20 में fir दर्ज। मिसलीडिंग और आपत्तिजनक कंटेंट शेयर करने में मामला दर्ज     नोएडा – सेक्टर 20 कोतवाली में सांसद शशि थरूर, राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडेय समेत कई पत्रकारों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है। इन सभी पर दिल्ली में किसान आंदोलन में हिसा भड़काने का आरोप लगाया गया है। इन पर आपत्तिजनक कंटेंट शेयर करने का आरोप लगाते हुए मुक़दमा दर्ज किया गया है। राजदीप सरदेसाई व अन्य के खिलाफ हुई एफआईआर में आपत्तिजनक व भ्रामक खबर फैलाने का आरोप लगाया गया है।         पढ़िएपुलिसप्रेसरिलीज़–   दिनांक 26 जनवरी 2021 को दिल्ली में हुई हिंसा से आहत होकर श्री अर्पित मिश्रा निवासी नोएडा के द्वारा थाना सेक्टर 20 , पुलिस कमिश्नरेट , नोएडा पर एक अभियोग संख्या 76/21 धारा 153a , 153b , 295a 298 ,504 ,506 ,505 ,124a ,34 ,120 बी भा द वि व 66 आईटी एक्ट पंजीकृत कराया गया है | इनके द्वारा 1. शशि थरूर सांसद कांग्रेस 2. राजदीप सरदेसाई पत्रकार ३. मृणाल पांडे पत्रकार ४. परेशनाथ पत्रकार ५. अनंतनाथ पत्रकार ६. विनोद के जोसेफ पत्रकार एवं कुछ अज्ञात व्यक्तियों को दिल्ली में हुई हिंसा के लिए दोषी माना गया हैं । वादी द्वारा यह भी आरोप लगाया गया हैं की इन लोगों के द्वारा जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण तरीके से जनता को गुमराह करने वाले , जातीय व सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले तथा उकसाने वाले कार्य व खबरें प्रसारित की गयी हैं ।   वादी के द्वारा पंजीकृत कराए गए अभियोग की विवेचना व अग्रिम विधिक कार्यवाही की जा रही है।

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Dakhal News 29 January 2021


bhopal,New terms of whatsapp

रंजना मिश्रा इस नए साल में व्हाट्सएप ने अपना एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है, जिसमें उपयोगकर्ताओं से व्हाट्सएप की न्यू टर्म्स एंड प्राइवेसी पॉलिसी में बदलावों को स्वीकार करने के लिए कहा गया है। 8 फरवरी 2021 तक ऐसा न करने पर उपयोगकर्ता के व्हाट्सएप अकाउंट को हटा दिया जाएगा। इस नोटिफिकेशन के मुताबिक अब व्हाट्सएप लोगों के डेटा को फेसबुक के साथ शेयर करेगा। व्हाट्सएप और फेसबुक एक ही कंपनी के हैं और यहां डेटा का मतलब है, लोगों के फोन नंबर, लोगों के कांटेक्ट और व्हाट्सएप स्टेटस जैसी तमाम जानकारियां। ये डेटा व्हाट्सएप अब फेसबुक के साथ शेयर करेगा और यदि किसी को ये शर्त स्वीकार न हो तो वह अपने व्हाट्सएप अकाउंट को डिलीट कर सकता है। वर्ष 2021 की शुरुआत में ही व्हाट्सएप ने ये नई शर्तें लागू कर दी हैं किंतु 2009 में जब व्हाट्सएप लांच हुआ था तो उसने अपनी सारी सेवाएं फ्री में देने का लालच दिया था। उसने लोगों के मैसेजेज और डेटा को प्राइवेट रखने का वादा किया था। अब दुनिया का हर तीसरा व्यक्ति व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर रहा है। व्हाट्सएप पर करोड़ों लोगों के इस डेटा भंडार से फेसबुक का बिजनेस और बढ़ेगा तथा फेसबुक का और विस्तार होगा। भारत में करीब 40 करोड़ लोग अपने पर्सनल और प्रोफेशनल जीवन में व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं। अब तो अदालतों और पुलिस के नोटिस तक व्हाट्सएप में भेजे जा रहे हैं और कानून ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। लोगों की अनुमति मिलने के बाद उनके मोबाइल फोन नंबर, उनके एड्रेस बुक के सभी कांटेक्ट व्हाट्सएप के पास होंगे। लोगों का स्टेटस मैसेज भी व्हाट्सएप देख पाएगा। उनके बैंक बैलेंस की जानकारी भी व्हाट्सएप के पास होगी। व्हाट्सएप पेमेंट सर्विस की मदद से कोई व्यक्ति अपना पैसा जहां भी खर्च करेगा उसकी एक-एक जानकारी व्हाट्सएप के पास होगी। अब व्हाट्सएप की पेमेंट सर्विस आ चुकी है। आगे चलकर देश की बड़ी कंपनियां पेमेंट के लिए व्हाट्सएप का ही इस्तेमाल करेंगी और तब व्हाट्सएप के पास लोगों की फाइनेंस व बैंकों से जुड़ी सारी महत्वपूर्ण जानकारियां होंगी। व्हाट्सएप के पास लोगों के घर और ऑफिस तक का पता होगा क्योंकि किसी भी व्यक्ति के मोबाइल से उसके लोकेशन का पता चल जाएगा। कोई भी व्यक्ति कहां शॉपिंग करता है, कहां पार्टी करता है, कहां छुट्टियां बिताता है, किस रेस्टोरेंट या होटल में खाना खाने जाता है, कौन-सा मोबाइल फोन इस्तेमाल करता है तथा उसके दोस्तों आदि की पूरी जानकारी व्हाट्सएप के पास होगी। किसी भी व्यक्ति के फोटोज़ और वीडियोज़ को व्हाट्सएप ज्यादा समय तक अपने सर्वर पर रख पाएगा। किसी व्यक्ति के मैसेजेज़ को सीधे पढ़ा नहीं जाएगा, यह वादा व्हाट्सएप अभी भी कर रहा है किंतु कोई व्यक्ति किससे बातें करता है, किसे मैसेज भेजता है, किस व्हाट्सएप ग्रुप में ज्यादा एक्टिव है, इस बात की जानकारी अभीतक केवल उस व्यक्ति को पता होती थी किंतु अब व्हाट्सएप भी इस बात का पता लगा सकता है। अब व्हाट्सएप बिजनेस अकाउंट पर भी नजर रखेगा। उनके जरिए लोगों तक पहुंचने वाले डेटा को रिकॉर्ड करेगा और उन सभी जानकारियों की मदद से लोगों की प्रोफाइल बनाई जाएगी। व्हाट्सएप से यह सारा डेटा फेसबुक के पास जाएगा। फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियों ने करोड़ों लोगों के डेटा को एकत्र करने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए हुए हैं। फेसबुक इस डेटा को दूसरी कंपनियों के साथ शेयर करके उनसे पैसा कमाएगा। देश और दुनिया में ऐसी कई कंपनियां हैं जो लोगों के बारे में, उनकी आदतों के बारे में और उनकी सोच के बारे में जानना चाहती हैं। कोई व्यक्ति क्या खरीदना चाहता है, क्या सर्च कर रहा है, इस आधार पर डेटा ट्रैकिंग की मदद से उससे संबंधित विज्ञापन उसे डिजिटल वर्ल्ड में दिखाए जाते हैं। कंपनियां इस मनोविज्ञान को लेकर चलती हैं कि यदि एक ही विज्ञापन किसी को बार-बार दिखाया जाएगा तो एक न एक दिन वह व्यक्ति उसे खरीद ही लेगा। तात्पर्य यह है कि व्हाट्सएप अब फ्री मैसेजिंग सर्विस नहीं रहा। कोई भी एप यदि फ्री सर्विस देने का वादा करता है तो यह झूठ ही है क्योंकि हम इन एपों को फ्री सर्विस के बदले में अपना बहुमूल्य डेटा दे रहे हैं, फायदे में तो ये कंपनियां ही रहती हैं। डेटा को दुनिया में नया ऑयल माना जाता है। यह एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसकी मांग लगातार बढ़ रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए वर्ष 2014 में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने 1 लाख 39 हजार रुपए में व्हाट्सएप को खरीदा था, तब ऐसा समझा जा रहा था कि फेसबुक ने इस डील पर बहुत अधिक पैसा खर्च कर दिया है, किंतु मार्क जुकरबर्ग के पास इस डील से पैसा कमाने की एक दूरदर्शी योजना थी। जुकरबर्ग व्हाट्सएप को खरीदने के दो वर्षों के बाद ही इसके डेटा को बेचकर पैसा कमाना चाहते थे, तब इसका विरोध करते हुए व्हाट्सएप के संस्थापकों ने इस कंपनी से इस्तीफा दे दिया था। फेसबुक की 99% कमाई डिजिटल विज्ञापनों से होती है और वर्ष 2019 में फेसबुक की कमाई 5 लाख 21हजार करोड़ रुपए थी। व्हाट्सएप से दुनिया के 200 करोड़ लोगों का डेटा मिलने के बाद फेसबुक का बिजनेस दिन दूना रात चौगुना तरक्की कर रहा है। फेसबुक का नेटवर्क 10 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला सोशल मीडिया एप फेसबुक है, लोग अपनी पर्सनल जानकारी या डेटा फेसबुक पर शेयर करते हैं और फेसबुक इस डेटा को दूसरे एप्स के साथ शेयर कर सकता है। इस तरह से यदि व्हाट्सएप का डेटा फेसबुक में शेयर होगा तो व्यक्ति की सारी प्राइवेसी समाप्त हो जाएगी। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 15 January 2021


bhopal,careful! Will Whatsapp, become dishonest?

ऋतुपर्ण दवे इण्टरनेट, संचार क्रान्ति में वरदान तो जरूर साबित हुआ और देखते ही देखते मानव जीवन की अहम जरूरत बन भी गया। हकीकत भी यही है कि ‘दुनिया मेरी मुट्ठी में’ का असल सपना इण्टरनेट ने ही पूरा किया। लेकिन अब बड़ा सच यह भी है कि इस सेवा का जरिया बने यूजर्स से ही कमाई कर रहे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स चोरी-छिपे न केवल सायबर डकैती करते हैं बल्कि यूजर्स डेटा को ही अपने पास स्टोर करने की कोशिशें करते रहते हैं। यह न केवल निजता का उल्लंघन है बल्कि भविष्य में हर किसी की हैसियत को नापने का जरिया भी। दरअसल अभी आम लोगों को इस बारे में वाकई में ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन यदि इसपर रोक नहीं लगी और कानून नहीं बना तो आपके एक-एक हिसाब-किताब यहाँ तक कि लेन-देन तक की सारी जानकारियाँ विदेशों में बैठे ऐसे सोशल मीडिया प्रोवाइडर के पास होगी जो अन एडिटेड इसे सोशल मीडिया में सारा कंटेंट जस का तस परोस देते हैं। वहीं वैध इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिन्ट, जिम्मेदार संपादक से लेकर कंटेंट एडिटर, कॉपी एडिटर की लंबी-चौड़ी और लगातार काम करने वाली टीम होती है। इसके द्वारा एक-एक शब्द को परखा और समझा जाता है तब जाकर सामग्री प्रकाशित या प्रसारित की जाती है। हाल ही में वाट्सएप के द्वारा निजी डेटा के नाम पर जो इजाजत का प्रपंच रचा जा रहा है, वह देखने में तो महज चंद शब्दों का साधारण सा नोटिफिकेशन दिखता है लेकिन उसकी असल गहराई किसी साजिश से कम नहीं है। इससे सात समंदर पार दूर विदेश में बैठा वह सर्विस प्रोवाइडर जिसे यहाँ न उपयोगकर्ता जानता है न देखा है, उसे आपकी हर एक गतिविधि यहाँ तक कि मूवमेण्ट की भी जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐक्टिव होते ही हो जाएगी जो रिकॉर्ड होती रहेगी। मसलन आपने मॉल में कितने की खरीददारी की, आपकी मूवमेण्ट कहाँ-कहाँ थी, चूंकि भारत में वाट्सएप पेमेंट सेवा भी शुरू है तो लेन-देन तक यानी सारा कुछ जो आपके परिवारवालों को भी नहीं पता होता है, उस सोशल मीडिया सर्वर के जरिए वहाँ इकट्ठा होता रहेगी। झूठ और सच की महापाठशाला यानी वाट्सएप यूनिवर्सिटी भविष्य में उसी का काल बनेगी जो अभी मस्ती या सही, गलत सूचना के लिए इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। सच तो यह है कि इण्टरनेट ही तो वो दुनिया है जहां असल साम्यवाद है। सब बराबर हैं। किसी का रुतबा और पैसा यहां नहीं चलता। इसके लिए सारे यूजर समान हैं। किसी से भेदभाव भी नहीं है। सबको समान रूप से पल प्रतिपल इण्टरनेट ही तो अपडेट रखता है। लेकिन उसी इण्टरनेट की आड़ में निजी डेटा खंगालने का विदेशी खेल ठीक नहीं। अब वाट्सएप भारत सहित यूरोप से बाहर रहने वालों में लोकप्रिय इस इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप के उपयोग के लिए अपनी निजी पॉलिसी और शर्तों में बदलाव करने जा रहा है। 8 फरवरी के बाद वॉट्सएप इस्तेमाल तभी कर पाएंगे जब इन्हें स्वीकारेंगे वरना एकाउण्ट डिलीट हो जाएगा। यानी वाट्सएप द्वारा जबरन इजाजत ली जा रही है। अबतक यह देखा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इस तरह के अड़ियल रवैया नहीं अपनाते हैं और स्वीकार या अस्वीकार का ऑप्शन देते हैं। दरअसल फेसबुक ने 2014 में वाट्सएप को खरीदते ही कई बार पॉलिसी में बदलाव किए हैं। सितंबर 2016 से अपने उपयोगकर्ताओं का डेटा फेसबुक से शेयर भी कर रहा है। वाट्सएप की हालिया नई प्राइवेसी पॉलिसी और शर्तों की बारीकियों पर नजर डालें तो दिखता है कि यह हमारे आईटी कानूनों के अनुरूप कहीं से भी वाजिब नहीं है। यहाँ गौर करना होगा कि वाट्सएप भी अलग-अलग देशों में वहाँ के कानूनों के अनुरूप अपनी निजता की पॉलिसी बनाता है। मसलन जिन देशों में प्राइवेसी और निजता से जुड़े बेहद कड़े कानून मौजूद हैं वहाँ उनका पालन इनकी मजबूरी होती है। जैसे यूरोपीय क्षेत्र, ब्राज़ील और अमेरिका, तीनों के लिए अलग-अलग नीतियाँ हैं। यूरोपीय संघ यानी यूरोपियन यूनियन और यूरोपीय क्षेत्रों के तहत आने वाले देशों के लिए अलग तो ब्राज़ील के लिए अलग। वहीं अमेरिका के उपयोगकर्ताओं के लिए वहाँ के स्थानीय स्थानीय कानूनों के तहत अलग-अलग प्राइवेसी पॉलिसियाँ व शर्ते हैं। शायद इसीलिए तमाम विकसित देशों की इसपर गंभीरता दिखती है क्योंकि वे अपने नागरिकों की निजता को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। यही कारण है कि देश के कानूनों से इतर ऐसे ऐप्स को वहाँ के प्ले स्टोर्स में जगह तक नहीं मिलती। हालांकि हमारे देश में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल लंबित है परन्तु उससे पहले ही वॉट्सएप का यह फरमान निश्चित रूप से परेशानी में तो डाल ही रहा है। इसकी वजह यह है कि बिल के पास होने तक वाट्सएप लोगों के निजी डेटा को न केवल इकट्ठा कर चुका होगा बल्कि जहाँ फायदा होगा वहाँ तक भी पहुँचा चुका होगा। ऐसे में इस बिल की प्रासंगिकता से कुछ खास हासिल होगा, लगता नहीं है। भारतीयों के डेटा का बाहर कैसा उपयोग होगा इसको लेकर भी अनिश्चितता का माहौल है। साफ है कि इस बारे में कोई कानून नहीं है और जरूरत है सबसे पहले प्राइवेसी और निजी डेटा प्रोटेक्शन की। दरअसल हमारे देश में अभी भी अंग्रेजों के बनाए कानूनों की भरमार है। वक्त के साथ इन्हीं में बदलाव कर काम चलाने की हमारी आदत गई नहीं है। जबकि इक्कीसवीं सदी, तकनीकी और संचार क्रान्ति का जमाना है। सारा कुछ मुट्ठी में और एक क्लिक में होने के दावे का नया दौर। ऐसे में कोई पलक झपकते हमारी निजता को ही कब्जा ले, यह कहाँ की बात हुई? निजता चाहे वह डेटा में हो या अन्य तरीकों में, सुरक्षा बेहद जरूरी है। गौर करना होगा कि हमारे सुप्रीम कोर्ट ने भी 2017 में पुट्टुस्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के प्रकरण में ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था निजता का अधिकार हर भारतीय का मौलिक अधिकार है। तभी अदालत ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 यानी जीवन के अधिकार से जोड़ा था। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला दिया और 1954 तथा 1962 में दिए गए फैसलों को पलटते हुए यह फैसला दिया था क्योंकि पुराने दोनों फैसलों में निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। वाट्सएप की नीयत पर शक होना लाजिमी है। 2016 में अमेरिकी चुनाव के वक्त फेसबुक का कैंब्रिज एनालिटिका स्कैंडल लोग भूले नहीं हैं। जबकि 2019 में इसराइली कंपनी पेगासस ने इसी वॉटसएप के जरिए हजारों भारतीयों की जासूसी की थी। इधर भारत में भी फेसबुक की भूमिका पर जब-तब सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में फेसबुक की मिल्कियत वॉट्सएप द्वारा खुलेआम फेसबुक और इससे जुड़ी कंपनियों से उपयोगकर्ताओं का डेटा साझा करने की बात समझनी होगी। हालांकि सफाई में वाट्सएप का कहना है कि नई प्राइवेसी पॉलिसी से इसपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि आप अपने परिवार या दोस्तों से कैसे बात करते हैं। लेकिन यह भी तो सच है कि जानकारी, संपर्क, हंसी-ठिठोली और मनमाफिक असली-नकली सूचनाओं को बिना रुकावट भेजने का प्लेटफॉर्म बना वाट्सएप का इस्तेमाल बहुत सारी व्यापारिक गतिविधियों के बढ़ावे के लिए भी हो रहा है। इसमें कई संवेदनशील जानकारियाँ भी होती होंगी। स्वाभाविक है कि यह देश की सीमाओं के बाहर न जाएँ।  साफ लग रहा है कि हमारे यहाँ प्राइवेसी से सम्बन्धित कानूनों की कमी है, यही वजह है कि वॉट्सएप और ऐसे ही प्लेटफॉर्म्स के लिए भारत जैसा विशाल देश आसान निशाना होते हैं। शायद हो भी यही रहा है। वॉट्सएप के ताजा नोटिफिकेशन से जहाँ विशेषज्ञों की चिंताएँ बढ़ी होंगी वहीं सरकार भी जरूर चिन्तित होगी। इस सबके बावजूद इतनी बारीकियों से बेखबर एक औसत भारतीय को भी सजग होना होगा ताकि वह ऐसे झाँसे में आने से बचे। इसके लिए बिना समय गंवाए तत्काल मिल जुलकर कोई कदम उठाया जाए जो हमेशा के लिए ऐसे विवादों को ही समाप्त कर दे ताकि भारत में सायबर दायरों की आड़ में पैठ बनाते विदेशी प्लेटफॉर्म अपनी हदों में ही रहे। हाँ, यहाँ हमारे दुश्मन ही सही चीन से नसीहत लेनी होगी जिसने शायद इसी वजह से ही विदेशी प्लेटफॉर्म्स को देश में घुसने ही नहीं दिया, सारा कुछ खुद का बनाया इस्तेमाल करता है। यकीनन चिंताएं सबकी बढ़ी हैं और एक यूज़र के तौर पर हमको, आपको सबको इससे चिंतित होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 12 January 2021


bhopal,SOT Diary Part One  Community-verified icon

कभी ट्रेन में इस वक़्त फ़र्स्ट एसी में मयखाना सज जाया करता था। टिकट तो होता थर्ड या सेकंड एसी का पर रेल विभाग के पियक्कड़ों के सौजन्य से आँखों ही आँखों में इशारा हो जाता। फिर अपन सब की महफ़िल फ़र्स्ट क्लॉस वाली शुरू हो जाती। जो भी आता जाता झांकता मुस्कराता उसे लखेद कर पिला दिया जाता। हालाँकि अपन सब उतने भी असभ्य नहीं जितना इतिहासकारों ने वर्णित किया है। कर्टसी के तहत पहले पूछा जाता- लोगे गुरु एक पैग! कोच अटेंडेंट से लेकर ज़्यादातर स्टाफ़ सेवा में लग जाता। टीटी साहब सबसे आख़िर में शरीक होते। डिब्बा डब्बा चेक चाक कर नौकरी बजाने के बाद।   जगह जगह स्टेशनों पर जंता को इत्तला एडवांस में कर दिया जाता कि बाबा फ़लाँ नम्बर की फ़लाँ ट्रेन से वाया फ़लाँ शहर फ़लाँ वक्त पर गुजर रहे हैं। जंता लोग वेज-नोनवेज बीयर दारू लेकर खड़े मिलते।   ट्रेन में या जीवन में, जो भी प्रेम से मिला हम उसी संग चीयर्स कर लिए।   एक दफे एक डिप्टी एसपी के साथ ट्रेन में जो पियक्कड़ी शुरू हुई तो सिलसिला ट्रेन के मंज़िल तक पहुँचने से बस एक स्टेशन पहले टूटा। स्टेशन आते जाते, ब्लैक डॉग के अद्धे गिरते जाते। क्रम यूँ बना रहता कि कोई किसी पर अहसान न लाद सके। किसी एक टेशन पर जय हिंद मारते हुए पुलिसकर्मी मदिरा लेकर आते तो अगले टेशन पर पत्रकार साथी अद्धा समर्पित कर देते।       आज बस चाय चिप्स है तो अतीत की नशीली रेल यात्राएँ दिलो दिमाग़ में छुकछुक कर गईं!   #dryyear21   #पियक्कड़_डायरी   भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.  

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Dakhal News 11 January 2021


bhopal,If you do not agree, your WhatsApp , deleted by February 8!

गिरीशमालवीय– क्या आपने व्हाट्सएप की नयी टर्म्स और प्राइवेसी पॉलिसी को ध्यान से पढ़ा? मंगलवार शाम से WhatsApp ने भारतीय व्हाट्सएप यूजर्स को अपनी टर्म्स और प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर अपडेट भेजना शुरू किया है…….वॉट्सऐप ने यूजर्स को नई पॉलिसी को एक्सेप्ट करने के लिए 8 फरवरी 2021 तक का समय दिया है. तब तक पॉलिसी को यूजर्स को एक्सेप्ट करना होगा वरना अकाउंट डिलीट करना होगा. निया बहुत तेजी से बदली है आज विश्व मे व्हाट्सएप के यूजर की संख्या 200 करोड़ को भी पार कर गयी है यह सूचना क्रांति का युग है यह ई कॉमर्स का युग है रेडियो को जन जन तक पहुंचने में लगभग 50 बरस लगे थे, टीवी को लगभग 25 साल, इन्टरनेट को 15 साल और फेसबुक व्हाट्सएप जैसी सोशल साइट्स/ एप्प कुछ ही सालो में दुनिया मे छा गयी है प्रश्न यह उठता है कि हम पर इसका क्या प्रभाव हो रहा है इसे हम ठीक से समझ भी पा रहे हैं आज कोई भी एप्प हम इंस्टाल करते हैं और उसकी टर्म ओर कंडीशन को बिना ठीक से पढ़े एक्सेप्ट कर लेते हैं चूंकि व्हाट्सएप अब अधिकांश भारतीय लोगो के जीवन का एक हिस्सा हो गया है तो एक बार जरा इन सब बातों पर ठिठक कर विचार करने की जरूरत है वॉट्सएप अब आपके स्टेटस पढ़ने जा रहा है वॉट्सएप आपकी लोकेशन भी एक्सेस करेगा। अब अगर आप फोटो, वीडियो फॉरवर्ड करते हैं, तो वे वॉट्सएप के सर्वर पर अधिक समय तक स्टोर रहेंगे। एन्ड टू एन्ड इन्क्रिप्शन वाली बात अब खत्म ही समझिए वॉट्सएप ने कहा है कि वह ऐसा आपको फॉरवर्ड करने में मदद के लिए कर रहा है। लेकिन इसका मतलब है कि उसके पास जानकारी होगी कि फलां फोटो बहुत फॉरवर्ड हो रहा है। ऐसा वह फेक न्यूज को ट्रैक करने के लिए कर रहा है, पर असलियत में यह बात इतनी सरल नही है वॉट्सएप अब बिजनेस अकाउंट पर भी नजर रखेगा। इनसे शेयर होने वाले सारे कैटलॉग का एक्सेस उसके पास होगा। वॉट्सएप ने पहली बार कहा है कि वह आपके हर ऑनलाइन ट्रांजैक्शन का डेटा लेगा। यानी बैंक का नाम, कितनी राशि और डिलीवरी का स्थान आदि ट्रैक होगी। यही नहीं, फेसबुक-इंस्टाग्राम भी आपके फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन जान जाएंगे। ध्यान दीजिए कि कुछ ही महीनों में खुद की पेमेंट सर्विस शुरू कर रहा है दरअसल व्हाट्सएप का अधिपत्य अब फ़ेसबुक के पास ही है फ़ेसबुक ने व्हाट्सऐप को 2014 में 19 अरब डॉलर में खरीद लिया था अक्टूबर 2020 में फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा था कि कंपनी मैसेंजर चैट, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को मर्ज करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं. ताकि वे एक तरीके से जुड़े इंटरऑपरेबल सिस्टम की तरह काम करना शुरू कर सकें. यह नीति एक तरह की आर्टिफिशियल इंटलीजेंस को सपोर्ट करने को लायी जा रही है, वॉट्सऐप की पुरानी प्राइवेसी पॉलिसी में आपके पास ये आजादी थी कि अपने वॉट्सऐप अकाउंट की जानकारी को फ़ेसबुक के साथ साझा होने से रोक सकते थे, लेकिन नई पॉलिसी में इस बात की गुंजाइश खत्म हो गई है आप कहेंगे कि इनसे हमको क्या फर्क पड़ेगा ? जैसा कि मैने ऊपर लिखा है इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत सूचना क्रांति से हुई है और यह ई कॉमर्स का युग है‘आज जो सूचनाओ ओर डेटा को नियंत्रण में रख रहा हैं, वही दुनिया के व्यापार और व्यवहार को नियंत्रित करेगा’यही इस वर्तमान ई-कॉमर्स जगत का आधारभूत सिध्दांत है. हमने अब तक बीसवी शताब्दी की शुरुआत में हमने केपेटेलिज्म को देखा है शताब्दी के अंत तक आते आते वह क्रोनी कैपटलिज्म परिवर्तित हो गया लेकिन यह शताब्दी एक नए तरह के पूंजीवाद को देख रही है जिसे सर्विलांस कैपिटलिज़्म कहा जा रहा है यह भयावह निगरानी पूंजीवाद हमारे चारों तरफ व्याप्त है इसकी भयानकता को समझने में बड़े बड़े बुद्धिजीवी भी चूक कर रहे हैं हम आर्टिफिशियल इंटलीजेंस की दुनिया मे प्रवेश कर चुके हैं ओर जब बिग डेटा के सहारे AI यानी आर्टिफिशियल इंटलीजेंस सूचनाओं के अंबार में से पैटर्न तलाशता है तो कई अचंभित करने वाली बातें सामने आती हैं। 2012 में एक अमेरिकी कस्टमर को एक बड़े अमेरिकी रिटेल विक्रेता द्वारा भेजे गए संदेश ने एक बड़े विवाद को जन्म दियादरअसल AI की सहायता से उस बड़े विक्रेता ने एक कस्टमर को होने वाले बच्चे के जन्म का बधाई संदेश भेज दिया था। बिग डेटा की सहायता से साइट ने ऑनलाइन सर्च और खरीदारी रुझान के आधार पर बच्चे के जन्म का अंदाजा लगाकर संदेश भेजा था। जबकि वह कस्टमर 12 साल की एक नाबालिग लड़की थी और उसके मां-बाप को गर्भावस्था के बारे में कोई खबर नहीं थी। यानी अब कुछ भी सम्भव है व्हाट्सएप द्वारा आपको यूजर पॉलिसी का टर्म्स एन्ड एग्रीमेंट पर एक्सेप्ट करने को कहना एक चेतावनी ही है आप चाहे तो इस पोस्ट को नजरअंदाज भी कर सकते हैं

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Dakhal News 8 January 2021


bhopal,Indian Journalism Festival , 19, 20 and 21 February

इंदौर । स्टेट प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठा आयोजन भारतीय पत्रकारिता महोत्सव का आयोजन 19, 20 एवं 21 फरवरी 2021 को इंदौर में आयोजित किया जाएगा।   मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को स्थानीय ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित संक्षिप्त समारोह में महोत्सव के लोगो का विमोचन किया। इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, सांसद शंकर लालवानी, संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर, जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट, शहर अध्यक्ष गौरव रणदिवे विशेष रूप से उपस्थित थे। स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने बताया कि मूर्धन्य सम्पादक माणिकचंद वाजपेयी ‘मामाजी’, राजेन्द्र माथुर, राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी एवं शरद जोशी की स्मृति में तीन दिवसीय आयोजन में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, वेब, कार्टून एवं फोटोग्राफी को लेकर विभिन्न सत्र आयोजित किए जाएंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आयोजन की सफलता के लिए शुभकामना दी। इस अवसर पर मुख्यमंत्री को महोत्सव का निमंत्रण भी भेंट किया गया। प्रारम्भ में स्टेट प्रेस क्लब के कमल कस्तूरी, आकाश चौकसे, डॉ. अर्पण जैन, शीतल रॉय, सोनाली यादव, रवि चावला, रूपेश व्यास, विजय गुंजाल पुष्पराज सिंह, राकेश द्विवेदी, सत्यजीत शिवणेकर, पंकज क्षीरसागर, प्रवीण धनोतिया आदि उपस्थित रहें। अंत में अजय भट्ट ने आभार माना।

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Dakhal News 8 January 2021


bhopal,Virat Kohli ,setting the record for Virat

योगेश कुमार गोयल अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की हाल ही में जारी टेस्ट बल्लेबाजों की रैंकिंग में टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने अपना दूसरा स्थान बरकरार रखा है। पिछले दिनों भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) द्वारा दशक का सर्वश्रेष्ठ पुरुष क्रिकेटर चुना गया। उन्हें दशक के सर्वश्रेष्ठ पुरुष क्रिकेटर के लिए सर गारफील्ड सोबर्स पुरस्कार से नवाजा गया है। दशक के सर्वश्रेष्ठ वनडे क्रिकेटर की दौड़ में विराट कोहली के अलावा श्रीलंका के लसिथ मलिंगा और कुमार संगाकारा, आस्ट्रेलिया के मिचेल स्टार्क, दक्षिण अफ्रीका के एबी डीविलियर्स, रोहित शर्मा तथा महेन्द्र सिंह धोनी शामिल थे। दशक के आईसीसी पुरस्कारों में पिछले 10 वर्षों के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों को चुना गया, जिसमें पहली बार प्रशंसकों को भी मत देने का अधिकार दिया गया था। विराट कोहली चार पुरस्कारों की दौड़ में शामिल थे, जिनमें आईसीसी का दशक का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर के अलावा दशक का सर्वश्रेष्ठ टेस्ट, वनडे और टी-20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर शामिल थे। विराट कोहली को जहां दशक का सर्वश्रेष्ठ पुरुष क्रिकेटर के अलावा दशक का सर्वश्रेष्ठ वन-डे पुरुष क्रिकेटर भी चुना गया, वहीं आस्ट्रेलिया के दिग्गज बल्लेबाज स्टीव स्मिथ को दशक का सर्वश्रेष्ठ टेस्ट और अफगानी स्पिनर राशिद खान को सर्वश्रेष्ठ टी-20 खिलाड़ी चुना गया। आईसीसी द्वारा दशक की टेस्ट, वनडे और टी-20 की जिन टीमों का चयन किया गया, स्टार बल्लेबाज कोहली इन तीनों फार्मेट में शामिल होने वाले एकमात्र क्रिकेटर रहे। विराट को दशक की टेस्ट टीम का कप्तान भी बनाया गया। पिछले 10 वर्षों में विराट कोहली ने 20 हजार से भी ज्यादा रन बनाए हैं और इस दौरान 66 अंतर्राष्ट्रीय शतक तथा 94 अर्धशतक भी जड़े हैं। 70 से अधिक पारी खेलते हुए उनका सर्वाधिक औसत 56.97 का रिकॉर्ड भी रहा। वन-डे में उन्होंने एक दशक में 39 शतक और 48 अर्धशतक जड़े तथा 112 कैच लपके। 10 वर्षों की अवधि में उन्होंने टेस्ट, टी-20 तथा वनडे में 56.97 के औसत से कुल 20396 रन बनाए और इस दशक में वनडे में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाले एकमात्र खिलाड़ी भी बने, जो उन्होंने 61.83 के औसत से बनाए। वनडे मैचों में कोहली ने 12040 रन, टेस्ट क्रिकेट में 7318 रन और टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों में इन दस वर्षों में 2928 रन बनाए और सभी प्रारूपों में मिलाकर उनका औसत 50 से अधिक का रहा। विराट ने अपने कैरियर का पहला रन धोनी की कप्तानी में बनाया और अपना दस हजारवां रन भी उन्होंने धोनी की मौजूदगी में बनाया था। जब विराट के कैरियर की शुरूआत हुई थी, उस समय क्रिकेट में धोनी और सहवाग की तूती बोलती थी लेकिन विराट ने कुछ ही समय में अपने प्रदर्शन से हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि एकदिन यही विराट अपने नाम के अनुरूप क्रिकेट में विराट कीर्तिमान स्थापित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का इतना बड़ा सितारा बन जाएगा। अंडर-19 क्रिकेट टीम हो या सीनियर टीम, विराट ने हर जगह अपने बल्ले से ऐसे जलवे दिखाए हैं कि खेलप्रेमी उनके दीवाने हो गए। कहना गलत नहीं होगा कि अपने जोश, जुनून, तेज गति से रन बनाने की भूख और कड़ी मेहनत के बलबूते पर विराट आज जिस पायदान पर खड़े हैं, वहां विराट ने तमाम भारतीय खिलाड़ियों को पीछे छोड़ दिया है। एक ओर जहां सचिन ने विराट की निरंतरता और जुनून के साथ उनकी बल्लेबाजी को बेमिसाल बताया है, वहीं वीरेन्द्र सहवाग का कहना है कि विराट ने निरंतरता को नए आयाम दिए हैं और यह ‘सॉफ्टवेयर’ हर वक्त अपडेट होता रहा है। ऑस्ट्रेलिया के विख्यात क्रिकेटर टॉम मूडी का तो यहां तक कहना है कि विराट इस शिखर पर अकेले हैं, जहां न पहले कोई था और न बाद में कोई होगा। बांग्लादेश के स्टार बल्लेबाज तमीम इकबाल तो विराट की तारीफ करते हुए यह तक कह गए कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय कप्तान विराट कोहली इंसान नहीं हैं क्योंकि जैसे ही वह बल्लेबाजी के लिए उतरते हैं तो ऐसा लगता है कि वह हर मैच में शतक बनाएंगे। तमीम कहते हैं कि विराट जिस तरह अपने खेल पर कार्य करते हैं, वह अविश्वसनीय है। वह कहते हैं कि पिछले 12-13 वर्षों में उन्होंने सभी महान खिलाड़ियों को खेलते देखा है किन्तु ऐसा व्यक्ति नहीं देखा, जिसने विराट जैसा दबदबा बनाया हो। 5 नवम्बर 1988 को दिल्ली में जन्मे विराट का जीवन इतना आसान नहीं रहा। जिस दिन वह दिल्ली की ओर से कर्नाटक के खिलाफ रणजी मैच खेल रहे थे, उस दिन उनके पिता का देहांत हो गया था। दुखों का इतना बड़ा पहाड़ टूटने पर भी विराट ने टूटने के बजाय न केवल वह मैच पूरा किया बल्कि वह मैच अपने पिता के नाम समर्पित कर दिया था। 2008 में विराट ने एकदिवसीय मैचों में पदार्पण किया था और 2011 में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। 2011 में ही वो विश्वकप की विजेता टीम का हिस्सा भी बने और उसी दौरान अपने पदार्पण मैच में शतक जड़कर विराट ने दिखा दिया था कि उनके हौसले कितने बुलंद हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 4 January 2021


bhopal, Agitating farmers ,also launched ,YouTube channel

रवीश कुमार- DD किसान बनाम किसान एकता मोर्चा का यू ट्यूब चैनल… 26 मई 2015 को मोदी सरकार ने जनता के पैसे से किसानों के लिए एक न्यूज़ चैनल लाँच किया। पाँच साल बाद दिसंबर 2020 में किसानों ने अपना यू ट्यूब चैनल लाँच कर दिया। ये सामान्य घटना नहीं है। सरकार के बनाए किसान चैनल की किसानों की सबसे बड़ी लड़ाई में कोई भूमिका नहीं दिखती। मुझे नहीं मालूम इस चैनल को कितने किसान देखते होंगे, जो भी देखते होंगे नहीं बता सकते हैं कि किसानों के आंदोलन की एक तस्वीर भी चली है या नहीं? DD किसान किसानों के बीच अनुपस्थित है। अगर उपस्थित होता तो किसान गोदी मीडिया की तरह उसका नाम लेते। गोदी मीडिया उनके जीवन में काफ़ी ठीक से मौजूद था तभी उसके अख़बारों और चैनलों में जब किसानों ने खुद को नहीं देखा तो हिल गए। जिस अख़बार को वे वर्षों से पैसे देकर ख़रीदते थे उस अख़बार ने दगा दे दिया। चैनलों ने उन्हें ग़ायब कर दिया और आतंकवादी कह दिया। आज किसानों को यू ट्यूब चैनल लाँच करना पड़ा है। देखना है कि इस यू ट्यूब चैनल को कितने लोग सब्स्क्राइब करते हैं? क्या किसान इसके सब्सक्रिप्शन की संख्या से कोरपोरेट और सरकार के गुलाम गोदी मीडिया को टक्कर दे पाएँगे? भारत का किसान गोदी मीडिया से लड़ने लगा है। इस गोदी मीडिया ने गाँवों को हिन्दू मुसलमान में बाँट दिया क्या किसान गोदी मीडिया को परास्त कर पाएँगे? किसानों ने यह चुनौती उठा ली है यह भी कम बड़ी बात नहीं है। अरबों रुपये के न्यूज़ चैनलों के होते हुए भारत का किसान अपना चैनल लाँच कर रहा है। ये बात दुनिया को मत बताइयेगा। वरना आपको शर्मिंदा होना पड़ेगा। देखें चैनल और सब्सक्राइब करें- https://youtu.be/ipMC9N8Io0w

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Dakhal News 21 December 2020


bhopal, Cyber ​​Terrorist, Precaution and alertness, way to avoid

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा अपराध की दुनिया में अब साइबर टेरेरिस्टों का प्रवेश हो गया है। इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के चलते साइबर बुलिंग द्वारा यह टेरेरिस्ट लोगों को आसानी से शिकार बना रहे हैं। देश में साइबर बुलिंग के मामलों में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। दिल्ली पुलिस के ही आंकड़े देखें तो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में इस साल दस फीसदी की इसमें बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यह स्थिति केवल दर्ज मामलों की है। इनसे कई गुणा मामले ऐसे हैं जो किसी न किसी कारण पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं। यह केवल दिल्ली की ही स्थिति नहीं अपितु समूचे देश की है। कोरोना के चलते इंटरनेट का उपयोग बढ़ने के साथ ही साइबर टेरेरिस्टों का आंतक और बढ़ने लगा है। खासतौर से सोशल मीडिया माध्यमों पर साइबर टेरेरिस्ट अधिक सक्रिय हैं। ई-मेल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर साइबर टेरेरिस्ट अति सक्रिय हैं। बच्चे ऐसे तत्वों के सॉफ्ट टारगेट हैं। तो लालची, डरपोक किस्म के लोग इनके झांसे में जल्दी आ जाते हैं। साइबर बुलिंग का मतलब है ई-मेल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि सोशल साइट्स पर संपर्क साधकर धमकाने, ब्लैकमेल करने, गाली-गलौच करने, मानसिक रूप से प्रताड़ित कर अपना हित साधना। लोगों को लॉटरी आदि का लालच देकर, अश्लील फोटो डालने या सार्वजनिक करने की धमकी देकर, ब्लैकमेल कर रुपए ऐंठने से लेकर मानसिक तौर पर परेशान करने तक सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं। साइबर टेरेरिस्ट ई-मेल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि पर संदेश भेजकर, संपर्क बनाकर गोपनीय जानकारी प्राप्त करते हैं और उसका उपयोग संबंधित के खिलाफ करते हैं। चूंकि कोरोना काल में बच्चे पढ़ाई के चलते ऑनलाईन क्लासों से जुड़ रहे हैं तो बच्चों में इंटरनेट का उपयोग बढ़ा है। ऐसे में बच्चों को आसानी से साइबर टेरेरिस्ट निशाना बना रहे हैं। उनसे परिवार, माता-पिता आदि की जानकारी प्राप्त कर उन्हें डरा-धमका कर तनाव में ला रहे हैं। इसी तरह से हनी ट्रैप के मामले भी इसी तरह संचालित हो रहे हैं। लोगों को लॉटरी का भय दिखाकर, इंश्योरेंस पॉलिसी में अधिक बोनस दिलाने, कहीं से पैसा आने और उस राशि को आपके खाते में डालने का झांसा देकर खाते की जानकारी लेकर ठगना आम है। इसी तरह महिलाओं-युवतियों के अश्लील फोटो सोशल साइट्स पर सार्वजनिक करने की धमकी देकर ब्लैकमेल करना आम होता जा रहा है। इसी तरह से आपके एटीएम कार्ड की वैधता खत्म होने या उसे रिन्यू करने या उससे लेन-देन की राशि को बढ़ाने, अपग्रेड करने का झांसा देकर नंबर प्राप्त कर खाते से धनराशि उड़ाना तो आम होता जा रहा है। दरअसल साइबर टेरेरिस्ट इंटरनेट व कम्प्यूटर के अच्छे जानकार होते हैं। ये आपकी मेल को हैक कर, सोशल मीडिया पर आपके नाम से गलत व भ्रामक सूचना अपलोड कर ठगी करने आदि में एक्सपर्ट होते हैं। लोग इनके झांसे में आसानी से आ जाते हैं। हालांकि बैंकों, इंश्योंरेस कंपनियों आदि द्वारा बार-बार समझाया जाता है कि बैंक किसी से मोबाइल, वाट्सएप आदि पर किसी तरह की जानकारी नहीं लेते। इसी तरह से बार-बार कहा जाता है कि अनजानी साइट पर जाने, अनजाने लिंक को ओपन करने से जितना बचा जाए, वहीं सबसे बड़ी सुरक्षा है। कभी भी सोशल साइट्स और ईमेल पर अनजाने लोगों को व्यक्तिगत जानकारी साझा नहीं करें। यहां तक कि सोशल साइट्स पर जानकारों से भी जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतना आवश्यक है। दूसरी बात, थोड़े से लालच में अपनी कड़ी मेहनत से कमाई पूंजी को लुटाने का मतलब नहीं है। जब आपने लॉटरी ली ही नहीं तो आपकी लॉटरी कहां से निकलेगी। जब आपको कोई जानता नहीं तो लॉटरी के लिए आपका ही चयन क्यों करेगा। जब आप किसी को जानते ही नहीं तो वह आपके खाते में राशि क्यों ट्रासंफर करवाएगा। इसी तरह जब कोई आपको जानता नहीं तो आपके साथ साझा कारोबार क्यों कर करेगा, यह सब समझने की बात है। हमारे लालच या भय के कारण इन्हें प्रोत्साहन मिलता है और यह इसका गलत फायदा उठाते हैं। होना तो यह चाहिए कि जब इस तरह की कोई घटना आपके साथ हो रही हो तो तत्काल पुलिस की सहायता लेनी चाहिए। डरना या ब्लैकमेल से टेंशन में आना, इसका कोई निदान नहीं है। दूसरी ओर यह समझना चाहिए कि जो आपको ब्लैकमेल कर ठग रहा है, उसके लालच का कोई अंत नहीं है। ऐसे में बिना किसी सामाजिक भय के खुलकर सामने आते हुए पुलिस का सहयोग लेने में नहीं हिचकिचाना चाहिए। इस तरह की घटना होने लगे तो पुलिस के साइबर थाने या अपने निकट के थाने में पुलिस से संपर्क साधकर जानकारी देनी चाहिए। बच्चों और महिलाओं को भी सजग करते हुए उन्हें साइबर टेरेरिस्टों की गिरफ्त में आने से बचाने के लिए सजग करना चाहिए। साइबर टेरेरिस्टों के चंगुल में आ भी जाए तो हताश होने के स्थान पर पुलिस का सहयोग लेने में किसी तरह का संकोच नहीं करना चाहिए। नहीं तो साइबर टेरेरिस्टों के हौसले बढ़ते जाते हैं। बच्चों व महिलाओं को भी साइबर टेरेरिस्टों की संभावित गतिविधियों के बारे में सजग करना होगा ताकि वे किसी तरह की जानकारी साझा नहीं करें। वहीं भयभीत न होकर इस तरह की घटना होने की स्थिति में तत्काल जानकारी देने का साहस जुटा सकें। नए जमाने के इन साइबर टेरेरिस्टों से बचने के लिए हमें ही अधिक सजग और सशक्त होना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 15 December 2020


bhopal,Remaining memory, Manglesh Dabral, lanterns given,mountain

मुकुंद देवभूमि उत्तराखंड में जन्मे मंगलेश डबराल विश्व साहित्य को अपनी अनमोल कृतियां दे गए। पहाड़ पर लालटेन-उनका कविता संग्रह उनके जन्मभूमि प्रेम के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। उनके निधन पर विश्व के कवियों को आभासी मंच प्रदान करने वाले पोर्टल कविता कोश का ट्वीट मंगलेश डबराल को समझने के लिए मुकम्मल है- 'मंगलेश डबराल केवल एक कवि नहीं, भारतीय साहित्य के लिए पूरी किताब थे, साहित्य को ईमानदार साहित्यकार बहुत कम मिलते हैं, वो शायद आधुनिक साहित्य में आखिरी ईमानदार लेखक थे! युवा साहित्यकारों को उनसे साहित्य के साथ-साथ यह भी सीखना चाहिए कलम ईमानदार कैसे रहें...।' -पोर्टल कविता कोश का ट्वीट मंगलेश डबराल गाजियाबाद के वसुंधरा में जनसत्ता सोसाइटी के फ्लैट में 2012 से पत्नी संयुक्ता डबराल और बेटी अलमा के साथ रह रहे थे। 4 दिसम्बर की रात उन्हें बेटी और भांजे प्रमोद ने वसुंधरा के अस्पताल से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की आईसीयू में रेफर कराया था। बेटा मोहित गुरुग्राम की एक कंपनी में स्क्रिप्ट राइटर हैं। वह पत्नी और बेटी के साथ वहीं ही रहते हैं। 27 नवम्बर को तबीयत खराब होने पर उन्हें वसुंधरा स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोविड-19 की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। एम्स में 5 दिसम्बर को उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया। वहां बुधवार शाम करीब 6:30 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 7:10 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। मंगलेश डबराल के निधन की सूचना से जनसत्ता सोसाइटी में उनके पड़ोसी और पूर्व सहकर्मी असरार खान कहते हैं, अब कौन पूछेगा मियां कैसे हो? असरार कहते हैं, उनका जाना खल गया। मंगलेश डबराल ने आखिरी बार बेटी और पत्नी से वीडियो कॉल कर कहा था कि वह अब थक चुके हैं। वह घर आना चाहते हैं। काफलपानी की पगडंडियां: 16 मई,1948 को टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में जन्मे मंगलेश डबराल की शिक्षा -दीक्षा देहरादून में हुई। वह भोपाल में कला परिषद (भारत भवन) की पत्रिका पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। लखनऊ और इलाहाबाद से छपने वाले दैनिक अमृत प्रभात में भी रहे।  उनके खाते में  जनसत्ता का रविवारी बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्हें जनसत्ता दिल्ली के यशस्वी साहित्य संपादक के रूप में याद किया जाएगा।  वह हिंदी पैट्रियाट और प्रतिपक्ष में भी रहे।  फिलवक्त वह नेशनल बुक ट्रस्ट से संबद्ध थे। उनके पांच कविता संग्रह-पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नए युग में शत्रु शामिल हैं। सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2000), पहल सम्मान, ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982), श्रीकांत वर्मा पुरस्कार (1989)।  इनके अलावा अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से विभूषित। टूटते दायरे: वह ख्यातिलब्ध अनुवादक के रूप में भी जाने जाएंगे। उनकी कविताओं के अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्पानी, पोल्स्की और बल्गारी भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के अतिरिक्त वह साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति पर नियमित लिखते रहे। उनकी रचनाओं में सामंती बोध और पूंजीवादी छल-छद्म का प्रतिकार दिखता है। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म और भाषा पारदर्शी है। उन्होंने नागार्जुन, निर्मल वर्मा, महाश्वेता देवी, यूआर अनंतमूर्ति, कुर्रतुल ऐन हैदर और गुरुदयाल सिंह पर केंद्रित वृत्तचित्रों का पटकथा लेखन भी किया है। स्मृतियों में:  मंगलेश डबराल की दो कविताएं कविता कोश में स्मृति एक और स्मृति दो शीर्षक से दर्ज हैं। उन्होंने लिखा है- खिड़की की सलाखों से बाहर आती हुई लालटेन की रौशनी / पीले फूलों जैसी /हवा में हारमोनियम से उठते प्राचीन स्वर /छोटे-छोटे बारीक बादलों की तरह चमकते हुए /शाम एक गुमसुम बच्ची की तरह छज्जे पर आकर बैठ गई है /जंगल से घास-लकड़ी लेकर आती औरतें आंगन से गुजरती हुईं /अपने नंगे पैरों की थाप छोड़ देती हैं/ इस बीच बहुत-सा समय बीत गया/ कई बारिशें हुईं और सूख गईं/ बार-बार बर्फ गिरी और पिघल गई /पत्थर अपनी जगह से खिसक कर कहीं और चले गए/ वे पेड़ जो आंगन में फल देते थे और ज्यादा ऊंचाइयों पर पहुंच गए/ लोग भी कूच कर गए नई शरणगाहों की ओर /अपने घरों के किवाड़ बंद करते हुए / एक मिटे हुए दृश्य के भीतर से तब भी आती रहती है पीले फूलों जैसी लालटेन की रोशनी/ एक हारमोनियम के बादलों जैसे उठते हुए स्वर/ और आंगन में जंगल से घास-लकड़ी लाती स्त्रियों के पैरों की थाप। वह एक दृश्य था जिसमें एक पुराना घर था /जो बहुत से मनुष्यों के सांस लेने से बना था /उस दृश्य में फूल खिलते तारे चमकते पानी बहता/ और समय किसी पहाड़ी चोटी से धूप की तरह /एक-एक कदम उतरता हुआ दिखाई देता/ अब वहां वह दृश्य नहीं है बल्कि उसका एक खंडहर है /तुम लंबे समय से वहां लौटना चाहते रहे हो जहां उस दृश्य का खंडहर न हो /लेकिन अच्छी तरह जानते हो कि यह संभव नहीं है/ और हर लौटना सिर्फ एक उजड़ी हुई जगह में जाना है /एक अवशेष, एक अतीत और एक इतिहास में /एक दृश्य के अनस्तित्व में/ इसलिए तुम पीछे नहीं बल्कि आगे जाते हो/ अंधेरे में किसी कल्पित उजाले के सहारे रास्ता टटोलते हुए/ किसी दूसरी जगह और किसी दूसरे समय की ओर /स्मृति ही दूसरा समय है जहां सहसा तुम्हें दिख जाता है /वह दृश्य उसका घर जहां लोगों की सांसें भरी हुई होती हैं /और फूल खिलते हैं तारे चमकते हैं पानी बहता है /और धूप एक चोटी से उतरती हुई दिखती है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 10 December 2020


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मुकुंद देवभूमि उत्तराखंड में जन्मे मंगलेश डबराल विश्व साहित्य को अपनी अनमोल कृतियां दे गए। पहाड़ पर लालटेन-उनका कविता संग्रह उनके जन्मभूमि प्रेम के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। उनके निधन पर विश्व के कवियों को आभासी मंच प्रदान करने वाले पोर्टल कविता कोश का ट्वीट मंगलेश डबराल को समझने के लिए मुकम्मल है- 'मंगलेश डबराल केवल एक कवि नहीं, भारतीय साहित्य के लिए पूरी किताब थे, साहित्य को ईमानदार साहित्यकार बहुत कम मिलते हैं, वो शायद आधुनिक साहित्य में आखिरी ईमानदार लेखक थे! युवा साहित्यकारों को उनसे साहित्य के साथ-साथ यह भी सीखना चाहिए कलम ईमानदार कैसे रहें...।' -पोर्टल कविता कोश का ट्वीट मंगलेश डबराल गाजियाबाद के वसुंधरा में जनसत्ता सोसाइटी के फ्लैट में 2012 से पत्नी संयुक्ता डबराल और बेटी अलमा के साथ रह रहे थे। 4 दिसम्बर की रात उन्हें बेटी और भांजे प्रमोद ने वसुंधरा के अस्पताल से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की आईसीयू में रेफर कराया था। बेटा मोहित गुरुग्राम की एक कंपनी में स्क्रिप्ट राइटर हैं। वह पत्नी और बेटी के साथ वहीं ही रहते हैं। 27 नवम्बर को तबीयत खराब होने पर उन्हें वसुंधरा स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोविड-19 की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। एम्स में 5 दिसम्बर को उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया। वहां बुधवार शाम करीब 6:30 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 7:10 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। मंगलेश डबराल के निधन की सूचना से जनसत्ता सोसाइटी में उनके पड़ोसी और पूर्व सहकर्मी असरार खान कहते हैं, अब कौन पूछेगा मियां कैसे हो? असरार कहते हैं, उनका जाना खल गया। मंगलेश डबराल ने आखिरी बार बेटी और पत्नी से वीडियो कॉल कर कहा था कि वह अब थक चुके हैं। वह घर आना चाहते हैं। काफलपानी की पगडंडियां: 16 मई,1948 को टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में जन्मे मंगलेश डबराल की शिक्षा -दीक्षा देहरादून में हुई। वह भोपाल में कला परिषद (भारत भवन) की पत्रिका पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। लखनऊ और इलाहाबाद से छपने वाले दैनिक अमृत प्रभात में भी रहे।  उनके खाते में  जनसत्ता का रविवारी बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्हें जनसत्ता दिल्ली के यशस्वी साहित्य संपादक के रूप में याद किया जाएगा।  वह हिंदी पैट्रियाट और प्रतिपक्ष में भी रहे।  फिलवक्त वह नेशनल बुक ट्रस्ट से संबद्ध थे। उनके पांच कविता संग्रह-पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नए युग में शत्रु शामिल हैं। सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2000), पहल सम्मान, ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982), श्रीकांत वर्मा पुरस्कार (1989)।  इनके अलावा अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से विभूषित। टूटते दायरे: वह ख्यातिलब्ध अनुवादक के रूप में भी जाने जाएंगे। उनकी कविताओं के अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्पानी, पोल्स्की और बल्गारी भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के अतिरिक्त वह साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति पर नियमित लिखते रहे। उनकी रचनाओं में सामंती बोध और पूंजीवादी छल-छद्म का प्रतिकार दिखता है। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म और भाषा पारदर्शी है। उन्होंने नागार्जुन, निर्मल वर्मा, महाश्वेता देवी, यूआर अनंतमूर्ति, कुर्रतुल ऐन हैदर और गुरुदयाल सिंह पर केंद्रित वृत्तचित्रों का पटकथा लेखन भी किया है। स्मृतियों में:  मंगलेश डबराल की दो कविताएं कविता कोश में स्मृति एक और स्मृति दो शीर्षक से दर्ज हैं। उन्होंने लिखा है- खिड़की की सलाखों से बाहर आती हुई लालटेन की रौशनी / पीले फूलों जैसी /हवा में हारमोनियम से उठते प्राचीन स्वर /छोटे-छोटे बारीक बादलों की तरह चमकते हुए /शाम एक गुमसुम बच्ची की तरह छज्जे पर आकर बैठ गई है /जंगल से घास-लकड़ी लेकर आती औरतें आंगन से गुजरती हुईं /अपने नंगे पैरों की थाप छोड़ देती हैं/ इस बीच बहुत-सा समय बीत गया/ कई बारिशें हुईं और सूख गईं/ बार-बार बर्फ गिरी और पिघल गई /पत्थर अपनी जगह से खिसक कर कहीं और चले गए/ वे पेड़ जो आंगन में फल देते थे और ज्यादा ऊंचाइयों पर पहुंच गए/ लोग भी कूच कर गए नई शरणगाहों की ओर /अपने घरों के किवाड़ बंद करते हुए / एक मिटे हुए दृश्य के भीतर से तब भी आती रहती है पीले फूलों जैसी लालटेन की रोशनी/ एक हारमोनियम के बादलों जैसे उठते हुए स्वर/ और आंगन में जंगल से घास-लकड़ी लाती स्त्रियों के पैरों की थाप। वह एक दृश्य था जिसमें एक पुराना घर था /जो बहुत से मनुष्यों के सांस लेने से बना था /उस दृश्य में फूल खिलते तारे चमकते पानी बहता/ और समय किसी पहाड़ी चोटी से धूप की तरह /एक-एक कदम उतरता हुआ दिखाई देता/ अब वहां वह दृश्य नहीं है बल्कि उसका एक खंडहर है /तुम लंबे समय से वहां लौटना चाहते रहे हो जहां उस दृश्य का खंडहर न हो /लेकिन अच्छी तरह जानते हो कि यह संभव नहीं है/ और हर लौटना सिर्फ एक उजड़ी हुई जगह में जाना है /एक अवशेष, एक अतीत और एक इतिहास में /एक दृश्य के अनस्तित्व में/ इसलिए तुम पीछे नहीं बल्कि आगे जाते हो/ अंधेरे में किसी कल्पित उजाले के सहारे रास्ता टटोलते हुए/ किसी दूसरी जगह और किसी दूसरे समय की ओर /स्मृति ही दूसरा समय है जहां सहसा तुम्हें दिख जाता है /वह दृश्य उसका घर जहां लोगों की सांसें भरी हुई होती हैं /और फूल खिलते हैं तारे चमकते हैं पानी बहता है /और धूप एक चोटी से उतरती हुई दिखती है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 10 December 2020


bhopal, After the water, grain occupies ,e market, be ready ,pay the price

जीवन का मूलभूत अधिकार और कर्तव्य दोनों हैं भोजन… भारतीय संविधान में मूलभूत अधिकार और कर्तव्य दोनों का विस्तार से वर्णन है। आज सत्तर साल बाद देश की जनता और नेता दोनों ही कर्त्तव्यों को लगभग भूल ही गए हैं सिर्फ हमें अधिकार ही याद रहते हैं। अब हम जीवन की बात करते हैं। ये पूरी मानव जाति के लिए है। मूलभूत मतलब सबसे पहले यानि जब हम अस्तित्व में आते हैं। उसके बने रहने के लिए आवश्यक वस्तु। पृथ्वी पर करोड़ों साल के जीवन के विकास के क्रम आज मानव के रूप में सबसे विकसित जीवन के रूप में हम हैं। होमोसैंपियंस से लेकर अभी तक मानव जाति के पास आज तक का सबसे विकसित मस्तिष्क है। आदिमानव की तुलना में आज हमारे पास सबसे परिष्कृत संसाधन मौजूद हैं। कभी ध्यान दिया है कि जीवन की विकट परिस्थितियों में जब जीवन पर ही संकट हो तो कौन सी ऐसी चीजें हैं जिनके सहारे हम बचे रहेंगे। रुपया पैसा, कपड़ा लत्ता, हीरे मोती, घर मकान, घोड़ा गाड़ी, डीजल पेट्रोल, पढ़ाई लिखाई, आधुनिक सुविधाजनक मशीनें या ऐसा कुछ भी। या जल वायु और भोजन। फिर से सोचिए कि अगर अत्याधुनिक विकास से मिले सुविधाजनक सारे संसाधन हों और जल वायु और भोज्य पदार्थ न हों तो जीवन चलेगा क्या? नहीं न। अब सोचिए जल वायु और भोजन हों लेकिन अन्य संसाधन न हों तो जीवन बचेगा क्या? हां बिल्कुल।   तो ये लड़ाई जीवन की इसी मूलभूत आवश्यकता के लिए है। भोजन नहीं होगा तो आप एक आध महीना जी सकते हैं। जल नहीं होगा तो कुछ दिन और वायु नहीं तो कुछ मिनट बस। पृथ्वी पर कुछ लोग अभी भी विश्वविजेता बनने का सपना पाले हैं जैसे इतिहास में समय समय पर कुछ महानुभाव करने की कोशिश करते रहे हैं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश अथवा शासक के लिए ये अब संभव नहीं। महाशक्ति के लिए भी नहीं।   अब पहले जैसे युद्ध भी संभव नहीं। तो इसके लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही आर्थिक तौर तरीकों से ये उपक्रम किया जा रहा है। इसके लिए यूएनओ, डब्लूटीओ, डब्लूएचओ, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं के जरिए अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिशें की जा रही हैं। इनके जरिए दुनिया के देशों की सरकारों पर दबाव बनाकर अपनी योजनाओं को लागू करवाने की कवायद चल रही है। इसमें मल्टीनेशनल कंपनियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जो सभी देशों में कारोबार करने के बहाने घुसी हुई हैं।   जीवन के मूलभूत आवश्यक तत्व पेयजल संसाधनों पर इन कंपनियों का किसी न रूप में कब्जा हो चुका है जहां नहीं है वहां सरकारों के जरिए है। जहां नहीं है वहां करने की लगातार कोशिश हो रही है। गौर करियेगा शहरों में चाहे बोतल बंद पानी हो या नगर निगम की सप्लाई सब हम लोग खरीद ही रहे हैं। गांवों में भी भूमिगत जल लगातार प्रदूषित हो रहा है और वहां भी बोतलों में या पाइप सप्लाई के जरिए कब्जा हो रहा है।   अब बारी है भोजन की। होटल रेस्टोरेंट और पैकेज्ड प्रोसेस्ड फूड पर कब्जा हो चुका है। इनकी आप कीमत देते हैं जिसमें टैक्स शामिल हैं। अब निशाने पर हैं अनाज और फल सब्जी। अभी भी कच्चा अनाज वह फल सब्जी जो पैकेट में मिल रहा है वो अधिक कीमत में है और टैक्स शामिल है। अब खेत खलिहान तक कंपनियां और सरकार पहुंचना चाहती हैं। शुरू में लुभावनी स्कीमों से किसानों को भरमाया जाएगा फिर बाद में जब चंगुल में फंस जाएंगे तो खेत से ही पैकेट में अनाज फल सब्जी आएंगे और आपको मनमानी कीमत में बेचे जाएंगे। इसमें सरकार को टैक्स मिलेगा। यानि जल के बाद ये जीवन की दूसरी बड़ी मूलभूत आवश्यकता के लिए आपको मुंहमांगी कीमत देनी होगी और सरकार को टैक्स जाएगा।   आने वाले दो तीन दशकों में जल पूरी तरह नियंत्रण में होगा और भोजन भी। फिर यदि आप संकर्षण हुए तो आपको जीने के लिए या तो मुंहमांगी कीमत देनी होगी या अक्षम हुए तो आप सरकार के रहमो करम पर होंगे। पोलिटिकल पार्टियां आपको वोट के एवज में अनाज पानी देने के वादे करेंगी जिसका चलन शुरू भी हो गया है।   गनीमत है कि वायु अपनी प्रकृति के कारण इनके नियंत्रण में नहीं। अन्यथा सबसे पहले इसी पर नियंत्रण किया जाता और आप जीने के लिए इनकी गुलामी करने को मजबूर होते। हालांकि इसके भी प्रयास शुरू हैं। आधुनिक विकास के नाम पर वायू को इतना प्रदूषित कर दिया जाएगा कि आपको जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्व शुद्ध वायु को बोतलों में या अन्य तरीके से खरीदना होगा। संपन्न लोगों के यहां लाखों रुपए कीमत वाले शुद्ध मिनरल्स वाले पानी के प्लांट और शुद्ध अॉक्सीजन के प्लांट लगाने रहे हैं। शुद्ध अनाज फल सब्जी के अरबों रुपए के बाजार सज चुके हैं आर्गेनिक के नाम पर।   ये आप पर है कि इस वास्तविकता को समझें और स्वयं इस पर निर्णय करें कि कम से कम जीवन की मूलभूत आवश्यकता वाले तत्व जल वायु और भोजन कंपनियों और सरकारों के नियंत्रण में नहीं जाने देंगे। अभी जो लोग किसी भी विचारधारा या भावना से प्रेरित हों वो अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूर सोचें क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में हम प्रौढ़ लोग कितना जीयेंगे बीस तीस साल वो भी कैसे ये भविष्य के गर्त में है लेकिन बीस तीस साल बाद हमारे बच्चों लिए जीवन का गंभीर संकट खड़ा होने वाला है और तब आने वाली पीढ़ी हमें हमारी मूर्खता के लिए माफ नहीं करेगी। जीवन की मूलभूत आवश्यकता के अपने अधिकार और इस पाने के लिए अपने कर्त्तव्य के पालन से मत चूकिए। लेखक राजीव तिवारी बाबा आध्यात्मिक चिंतक और सरोकारी पत्रकार हैं

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Dakhal News 9 December 2020


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असद ज़ैदी- मंगलेश डबराल के ताज़ा हाल को जानने की दोस्तों की ख़्वाहिश के सिलसिले में यह पोस्ट लिखता हूं। उनकी स्थिति को डॉक्टर गंभीर लेकिन स्थिर (‘critical but stable’) बता रहे हैं। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। चिकित्सा की भाषा में फेफड़ों को नुक़सान पहुंचाने वाली उनकी व्याधि को कोरोना-प्रेरित ARDS (Corona induced acute respiratory distress syndrome) कहा गया है। सभी स्रोतों से मिली जानकारी और अपनी समझ से मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि AIIMS में प्रिय कवि के उपचार में पूरा ध्यान, जानकारी और समझदारी बरती जा रही है। कोशिश में कोई कमी नहीं है। उनके आत्मीयजन और क़रीबी लोग इस बात से भी वाक़िफ़ हैं कि हज़ारों हाथ मंगलेश के लिए दुआ में उठे हैं और असंख्य लोगों के दिलों में उनके लिए जगह है। कविवर तक भी इसकी भनक पहुंची थी और इससे उन्हें बल मिला।

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Dakhal News 7 December 2020


bhopal,Rahul Gandhi ,will not be able, meet you

अपूर्व भारद्वाज- पेट्रोल के भाव 100 को छूने जा रहे है गैस सिलेंडर के भाव दिनोदिन बढ़ते जा रहे है महँगाई अपने चरम पर है लेकिन क्या आपने कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता को सिलेंडर लेकर या बैलगाड़ी के साथ सड़को पर प्रदर्शन करते देखा है नहीं ना..तो फिर आगे पढ़िए… कोरोना काल के दौरान निजी अस्पताल और चेरिटेबल हास्पिटल ने भारत की जनता को खूब लुटा सामान्य ओपीडी की फीस में 200 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है यह मैं नही कह रहा हूँ भारत सरकार की रिपोर्ट कह रही है लेकिन क्या आपने किसी वरिष्ठ कांग्रेसी को इन अस्पतालों के सामने धरना देते हुए देखा है क्या??..नहीं ना..तो फिर आगे पढिये… किसानों का आंदोलन अपने चरम पर है काले कानून को लेकर किसान सड़को पर है क्या आपने राहुल गाँधी या किसी और बड़े नेता को सड़कों पर बैठकर किसानों का साथ देते हुए देखा है क्या ?? नही ना.. तो फिर आगे पढिये… बीजेपी (जनसंघ) लगभग 60 साल से विपक्ष की राजनीति कर चुकी है इसलिए उनसे बेहतर विपक्ष की राजनीति इस देश मे क्या पूरे विश्व मे कोई नही कर सकता है क्या आपने इन 6 सालो में ट्विटर औऱ फेसबुक को छोड़कर कांग्रेसियों को असली विपक्ष की राजनीति करते हुए देखा है?? नही ना.. तो फिर आखरी पैरा जरूर पढिये.. मैं पिछले 10 दिनों से महाराष्ट्र में था बहुत से किसानों से बातचीत की एक गाँव मे किसान बिल के नुकसान समझाए..कुछ किसान तो इसे फायदे का सौदा समझ रहे थे लेकिन मैंने समझाया तो वो समझे भी और तो और अपने सरपंच तक को बुला लाए मैंने उन्हें केवल 1 घँटे में हर बात समझा दी वो बोले यह तो एक तरह की गुलामी है इससे तो रही सही किसानी समाप्त हो जायेगी यह बात इतनी आसानी से हमे लोकल एनसीपी, कांग्रेसी कार्यकर्ता क्यो नही समझाते .. राहुल चाहते तो एक फोन से शरद पंवार को इसके लिए समझा सकते थे शरद पंवार की सहकारी संस्थाओं का जाल पूरे महाराष्ट्र में है वो लोग मुझसे बेहतर किसानों को समझते है राहुल चाहते तो महाराष्ट्र का किसान, पंजाब और हरियाणा के किसानों के साथ खड़ा होता… और यह सरकार अभी तक घुटनों पर होती और काले कानून वापिस हो चुके होते.. अगर आप अब भी कांग्रेस की लगातार हार की वजह नही समझ रहे है तो अब आगे मत पढिये ..क्योंकि मेरे पास लिखने लायक कुछ नही बचा है मेरे पास केवल शून्य है जिसमें देर सबेर कांग्रेस को विलीन हो जाना है…

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Dakhal News 7 December 2020


bhopal,Defamation proceedings, against the activist ,who published , news in newspaper

शशिकांत सिंह- कोई ठीकठाक वकील करने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जाने की अगर आपकी औकात है तो आप न्याय पा सकते हैं. निचली अदालतों के अन्याय से राहत सुप्रीम कोर्ट ही दे सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट पहुंचना सबके वश की बात नहीं है. पर एक एक्टिविस्ट को सौभाग्य से एक ठीकठाक वकील मिल गए और लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले गए तो इनको फौरन राहत मिल गई.   सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिविस्ट के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई पर रोक लगा दी है. एक्टिविस्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने अनावेदकों को भी नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया है. इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है. कहानी होशंगाबाद निवासी एक्टिविस्ट संजय कुमार की है. इनके मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और न्यायाधीश कृष्ण मुरारी की बेंच के समक्ष हुई. एक्टिविस्ट संजय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एसके गंगेले पेश हुए. गंगेले साहब हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति हैं. गंगेले ने मजबूती से संजय का पक्ष रखा. सीनियर वकील एसके गंगेले ने ने दलील दी कि अपीलेट कोर्ट के आदेश को बहाल रखने वाला हाई कोर्ट का आदेश चुनौती के योग्य है. एक वकील और व्यवसायी के बीच हुए झगड़े की खबर अखबारों तक पहुंचाना कोई जुर्म नहीं था. एक्टिविस्ट ने खबर अखबार तक पहुंचाने में सूत्र की भूमिका निभाई थी. ऐसा करना गलत नहीं है. यह एक समृद्ध परम्परा है. ऐसा करके एक्टिविस्ट ने वकील की कोई मानहानि नहीं की है. लिहाजा, याचिकाकर्ता एक्टिविस्ट के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई पर रोक अपेक्षित है. हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता एक्टिविस्ट संजय कुमार का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता मोहनलाल शर्मा ने अवगत कराया कि वकील के परिवाद को अदालत ने खारिज कर दिया था. इसके बाद उसकी ओर से अपील दायर की गई. अपीलेट कोर्ट ने एक्टिविस्ट संजय से माफी मांगने के लिए कहा. लेकिन एक्टिविस्ट ने माफी नहीं मांगी. इसीलिए अपीलेट कोर्ट ने उसके खिलाफ मानहानि की कार्रवाई का आदेश पारित कर दिया. इसके खिलाफ हाई कोर्ट आने पर राहत नहीं मिली. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमद्रष्टया मामला दुर्भावना का पाया. इसी के साथ स्थगनादेश पारित कर दिया.

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Dakhal News 30 November 2020


bhopal, Trump can ,bomb Iran ,on the go!

–डॉ. वेदप्रताप वैदिक– ईरान और बाइडन की दुविधा… ईरान के परमाणु-वैज्ञानिक मोहसिन फख्रीजाद की हत्या एक ऐसी घटना है, जो ईरान-इस्राइल संबंधों में तो भयंकर तनाव पैदा करेगी ही, यह बाइडन-प्रशासन के रवैए को भी प्रभावित कर सकती है। फख्रीजाद ईरान के परमाणु-बम कार्यक्रम के अग्रगण्य वैज्ञानिक थे। उनका नाम लेकर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें काफी खतरनाक आदमी बताया था। ईरानी सरकार का दावा है कि तेहरान के पास आबसर्द नाम के गांव में इस वैज्ञानिक की हत्या इस्राइली जासूसों ने की है।   इसके पहले इसी साल जनवरी में बगदाद में ईरान के लोकप्रिय जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या अमेरिकी फौजियों ने कर दी थी। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनई ने कहा है कि ईरान इस हत्या का बदला लेकर रहेगा। यों भी पिछले 10 साल में ईरान के छह वैज्ञानिकों की हत्या हुई है। उसमें इस्राइल का हाथ बताया गया था। हत्या की इस ताजा वारदात में अमेरिका का भी हाथ बताया जा रहा है, क्योंकि ट्रंप के विदेश मंत्री माइक पोंपिओ पिछले हफ्ते ही इस्राइल गए थे और वहां उन्होंने सउदी सुल्तान और नेतन्याहू के साथ भेंट की थी। ईरानी सरकार को शंका है कि ट्रंप-प्रशासन अगली 20 जनवरी को सत्ता छोड़ने के पहले कुछ ऐसी तिकड़म कर देना चाहता है, जिसके कारण बाइडेन-प्रशासन चाहते हुए भी ईरान के साथ तोड़े गए परमाणु समझौते को पुनर्जीवित न कर सके। ओबामा-प्रशासन और यूरोपीय देशों ने ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया था, उसे ट्रंप ने भंग कर दिया था और ईरान पर से हटे प्रतिबंध को दुबारा थोप दिया था। अब ईरान गुस्से में आकर यदि अमेरिका के किसी बड़े शहर में कोई जबर्दस्त हिंसा करवा देता है तो बाइडन-प्रशासन को ईरान से दूरी बनाए रखना उसकी मजबूरी होगी। यह दुविधा ईरानी नेता अच्छी तरह समझ रहे होंगे। यह तो गनीमत है कि ट्रंप ने अपनी घोषणा के मुताबिक अभी तक ईरान पर बम नहीं बरसाए हैं। अपनी हार के बावजूद हीरो बनने के फेर में यदि ट्रंप ईरान पर जाते-जाते हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं है। वैसे भी उन्होंने पश्चिम एशिया के ईरान-विरोधी राष्ट्रों इस्राइल, सउदी अरब, जोर्डन, यूएई और बहरीन आदि को एक जाजम पर बिठाने में सफलता अर्जित की है। बाइडन-प्रशासन की दुविधा यह है कि वह इस इस्राइली हमले की खुली भर्त्सना नहीं कर सकता लेकिन वह किसी को भी दोष दिए बिना इस हत्या की निंदा तो कर ही सकता है। ईरान और बाइडन-प्रशासन को इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रखना होगा।

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Dakhal News 30 November 2020


bhopal,Watchmen allowed, local train, but not ,media persons

-शशिकांत सिंह- महाराष्ट्र में मीडियाकर्मियों को लोकल ट्रेन में जाने की इजाजत नहीं है। लोकल ट्रेन में सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को यात्रा की इजाजत है जो मंत्रालय से मान्यता प्राप्त हैं। अब जाहिर सी बात है कि मान्यता ज्यादातर उन्ही पत्रकारों को मिलता है जो पोलिटिकल बीट कवर करते हैं। इनकी संख्या नाम मात्र है। महाराष्ट्र में उन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की संख्या ज्यादा है जो क्राइम बीट, इंटरटेनमेंट बीट, सोशल तथा अन्य बीट को कवर करते हैं। इन्हें लोकल ट्रेन में यात्रा की इजाजत नहीं है। यहां तक कि जो रेलवे बीट को कवर करते हैं खुद उन्हें भी लोकल ट्रेन में जाने की इजाजत नहीं है। न्यूज़ पेपर प्रिंटिंग, इलेक्ट्रॉनिक टीवी, वेब न्यूज़ के मीडियाकर्मियों और इनसे जुड़े ज्यादातर पत्रकारों को लोकल ट्रेन में यात्रा की इजाजत नहीं है।  लोकल ट्रेन में वाचमैनों को यूनिफार्म पहनकर यात्रा की इजाजत है। वाचमैनों को लोकल में यात्रा के लिए आईकार्ड दिखाकर सीजन टिकट या नार्मल टिकट भी आसानी से मिल जा रहा है लेकिन बिना मान्यता प्राप्त पत्रकारों को लोकल का टिकट देने की जगह काउंटर पर बैठने वालों से जलालत झेलनी पड़ रही है। वाचमैनों के अलावा बैंकों के कर्मचारी और बैंकों के बाहर खड़े होकर क्रेडिट कार्ड बेचने वालों को भी लोकल में जाने की इजाजत है। सरकारी कर्मचारी, स्कूल कर्मचारी, मनपा कर्मचारी, अस्पताल कर्मचारी सबको लोकल ट्रेन में जाने की इजाजत है और इन्हें आवश्यक सेवा में माना जाता है लेकिन महाराष्ट्र के मीडियाकर्मियों को आवश्यक सेवा में शामिल नहीं माना जा रहा है। अचरज की बात यह है कि महाराष्ट्र में दर्जनों पत्रकार संगठन हैं लेकिन ज्यादातर इस मामले पर चुप हैं। एक दो संगठन ने इस मुद्दे पर लेटरबाजी और ट्वीट भी राज्य सरकार व रेलमंत्री को किया लेकिन न राज्य सरकार उनकी सुन रही है न रेल मंत्रालय। रेलवे के ज्यादातर पीआरओ की हालत है कि रेलवे के किसी बड़े अधिकारी की पत्नी किसी कार्यक्रम का फीता काटेंगी तो वो खबर भेज देंगे लेकिन सभी मीडियाकर्मियों को लोकल ट्रेन में जाने की इजाजत कब मिलेगी इस पर उनका कहना होता है कि यह सब राज्य सरकार को तय करना है कि सभी मीडियाकर्मियों को लोकल में कब से यात्रा की अनुमति मिलेगी। लोकल में यात्रा की अनुमति न मिलने से अधिकांश मीडियाकर्मी बेचारे सैकड़ों रुपये और 5 से 6 घंटे बर्बाद कर कार्यालय जाने को मजबूर होते हैं। राज्य सरकार और रेल मंत्रालय से निवेदन है कि इस ओर जल्द ध्यान दें। शशिकांत सिंह वॉइस प्रेसिडेंटन्यूज़ पेपर एम्प्लॉयज यूनियन ऑफ इंडिया

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Dakhal News 24 November 2020


bhopal,Journalism being ,done keeping ,TRP ratings, Javadekar

आईआईएमसी के 2020-21 शैक्षणिक सत्र का शुभारंभ नई दिल्ली । भारतीय जन संचार संस्थान के शैक्षणिक सत्र 2020-21 का सोमवार को ऑनलाइन माध्यम से उद्घाटन करते हुए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर ने पत्रकारिता के छात्रों को सलाह दी कि वे अनावश्यक सनसनी और टीआरपी केंद्रित पत्रकारिता के जाल में फंसने की बजाय, स्वस्थ पत्रकारिता के गुर सीखें और समाज में जो कुछ अच्छा काम हो रहा है उसे भी समाचार मानकर लोगों तक पहुंचाएं। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल तकनीक के माध्यम से शिक्षा में हो रहे व्यापक बदलाव का हम सभी को स्वागत करना चाहिए और उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक श्री के. सतीश नम्बूदिरिपाड सहित आईआईएमसी के सभी केंद्रों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। श्री जावड़ेकर ने कहा कि पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है, दुरुपयोग का साधन नहीं। आपकी स्टोरी में यदि दम है, तो उसके लिए किसी नाटक अथवा सनसनी की जरुरत नहीं है। समाज में अच्छी खबरें इतनी हैं, परन्तु दुर्भाग्य से उन्हें कोई दिखाता नहीं है। रचनात्मक पत्रकारिता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जब से सरकार ने खाद की नीम कोटिंग शुरू की, तब से खाद की कालाबाजारी रुकी है। रेलवे का कोई गेट अब ‘अनमैन’ नहीं रहा, इसलिए दुर्घटनाएं बंद हो गई हैं। स्वच्छता की दृष्टि से भी रेलवे में बहुत सुधार हुआ है। पांच हजार रेलवे स्टेशन आज वाई-फाई से जुड़े हैं। करीब 100 नए एयरपोर्ट देश में शुरू हुए हैं, जिनका लाभ लाखों लोग ले रहे हैं। क्या ये सभी खबरें नहीं हैं? करीब दो लाख गांवों तक फाइबर कनेक्टिविटी पहुंची है, जिससे वहां के जीवन में बदलाव आया है। फ्री डिश के माध्यम से अब 104 चैनल और 50 एजुकेशनल चैनल निशुल्क देखे जा सकते हैं। देश में 300 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन चल रहे हैं। कभी जाकर देखिए इनसे कितने स्थानीय कलाकारों को अवसर मिल रहा है और उनसे समाज जीवन में कैसा बदलाव आया है। ढाई करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना में मकान मिले हैं, बारह करोड़ लोगों को टॉयलेट्स मिले हैं, उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन मिले हैं, चालीस करोड़ लोगों के बैंक खाते खुले हैं, पचास करोड़ लोगों को पांच लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है। क्या ये सब खबरें नहीं हैं? ‘हर घर नल से जल’ का सपना अब आजादी के 70 साल बाद पूरा होने जा रहा है। प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच चुकी है। आज चार—पांच सौ योजनाओं की सब्सिडी और मदद लोगों को डीबीटी के माध्यम से सीधे मिल रही है। इससे एक लाख 75 हजार रुपए की चोरी रुकी है। क्या ये न्यूज नहीं है? दूसरी घटनाएं भी न्यूज हैं, परन्तु ये भी न्यूज है, यह हमें समझना चाहिए। समाज को आगे बढाने की दिशा में योगदान ही पत्रकारिता का धर्म है। श्री जावड़ेकर ने कहा कि पत्रकारिता का पहला मंत्र यह है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली सारी घटनाएं खबर हैं, जो ठीक से लोगों तक पहुंचानी हैं। मीडिया की आजादी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आयाम है। इसे संभालकर रखना है। परंतु यह आजादी जिम्मेदारी के साथ आती है। इसलिए हम सभी को जिम्मेदार भी होना है। पत्रकार के रूप में आप सभी पक्ष-विपक्ष को सुनें, परंतु समाज को अच्छी दिशा में ले जाने के लिए ही हमारी पत्रकारिता काम करें। टीआरपी रेटिंग को ध्यान में रखकर जो पत्रकारिता हो रही है, वह सही रास्ता नहीं है। 50 हजार घरों में लगा मीटर 22 करोड़ दर्शकों की राय नहीं हो सकता। हम इसका दायरा बढाएंगे, ताकि इस बात का पता चल सके कि सही मायने में लोग क्या देखते हैं और क्या देखना चाहते हैं। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि एक शिक्षक के लिए उसके विद्यार्थियों से प्रिय कोई चीज नहीं होती। विद्यार्थियों की सफलता ही किसी संस्थान, उसके शिक्षकों और उसके प्रबंधकों की सफलता है। हमारी पूरी कोशिश है कि हम विद्यार्थियों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान कर सकें। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि हम चाहते हैं कि दुनिया के सफलतम लोगों से हमारे विद्यार्थी संवाद कर पाएं। उनसे वह गुण और जिजीविषा सीख पाएं, जिससे कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका में आता है। सिर्फ पत्रकार तैयार करना हमारा लक्ष्य नहीं है, हम चाहते हैं कि हम ग्लोबल लीडर्स पैदा करें, जो आने वाले दस वर्षों में पत्रकारिता और जनसंचार की दुनिया में सबसे बड़े और वैश्विक स्तर के नाम बनें। सत्रारंभ के प्रथम दिन अपर महानिदेशक श्री के. सतीश नम्बूदिरिपाड ने विद्यार्थियों को आईआईएमसी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसके बाद सभी संकाय सदस्यों का विद्यार्थियों से परिचय हुआ। कार्यक्रम का संचालन प्रो. सुरभि दहिया ने किया।

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Dakhal News 24 November 2020


bhopal,IIMC session, begins from Monday, Prakash Javadekar will start

23 नवंबर से 27 नवंबर तक आयोजित होगा कार्यक्रम नई दिल्ली, 20 नवंबर । भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) का सत्रारंभ समारोह 23 नवंबर से 27 नवंबर तक आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम का शुभारंभ सोमवार, 23 नवंबर को सुबह 10.30 बजे केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर करेंगे। कोरोना के कारण इस वर्ष पांच दिवसीय सत्रारंभ समारोह ऑनलाइन आयोजित किया जा रहा है। आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि इस पांच दिवसीय आयोजन में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री श्री वी. मुरलीधरन, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता श्री सुभाष घई, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मीडिया निदेशक एवं प्रेसीडेंट श्री उमेश उपाध्याय, पटकथा लेखक और स्तंभकार सुश्री अद्धैता काला, दूरदर्शन के महानिदेशक श्री मयंक अग्रवाल, हांगकांग बैपटिस्ट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर दया थुस्सु, अमेरिका की हार्टफर्ड यूनिसर्विटी के प्रोफेसर संदीप मुप्पिदी जैसी जानी-मानी हस्तियां नए विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करेंगी। इसके अलावा हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक श्री सुकुमार रंगनाथन, एक्सचेंज फॉर मीडिया ग्रुप के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा, ऑर्गेनाइजर के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा, सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, चेन्नई के निदेशक डॉ. जे.के. बजाज, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रो. सिद्धार्थ शेखर सिंह, उद्यमी आदित्य झा, माइक्रोसॉफ्ट इंडिया के डायरेक्टर, लोकेलाइजेशन श्री बालेंदु शर्मा दाधीच, गुडऐज़ के प्रमोटर श्री माधवेंद्र पुरी दास, रिलायंस के कम्युनिकेशन चीफ श्री रोहित बंसल, ईयरशॉट डॉट इन के फाउंडर श्री अभिजीत मजूमदार, न्यूज़जेप्ल्स के फाउंडर श्री शलभ उपाध्याय, एसोसिएटेड प्रेस टीवी की साउथ एशिया हेड सुश्री विनीता दीपक एवं नेटवर्क 18 के मैनेजिंग एडिटर श्री ब्रजेश सिंह भी समारोह में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम के समापन सत्र में आईआईएमसी के पूर्व छात्र नए विद्यार्थियों से रूबरू होंगे। इन पूर्व छात्रों में आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर श्री सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ नेशन के कंसल्टिंग एडिटर श्री दीपक चौरसिया एवं कौन बनेगा करोड़पति के इस सीज़न की पहली करोड़पति श्रीमती नाज़िया नसीम शामिल हैं। कार्यक्रम का प्रसारण आईआईएमसी के फेसबुक पेज पर किया जाएगा। भारतीय जन संचार संस्थान अपने नए विद्यार्थियों के स्वागत और उन्हें मीडिया, जनसंचार, विज्ञापन एवं जनसंपर्क के क्षेत्र में करियर हेतु मार्गदर्शन दिलाने के लिए प्रतिवर्ष सत्रारंभ कार्यक्रम का आयोजन करता है।

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Dakhal News 20 November 2020


bhopal, New Board , News Broadcasters Association, formed, see list

सैटेलाइट न्यूज चैनल चलाने वालों की संस्था न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन उर्फ एनबीए का नया बोर्ड गठित कर दिया गया है. इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा को सर्वसम्मति से एनबीए का चेयरमैन और न्यूज24 की मालकिन अनुराधा प्रसाद को वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया है. टाइम्स नेटवर्क के सीईओ एमके आनंद कोषाध्यक्ष बनाए गए. एनबीए बोर्ड में अविनाश पांडेय (सीईओ एबीपी नेटवर्क), राहुल जोशी (एमडी, टीवी18 ब्रॉडकास्ट), कली पुरी (एमडी, टीवी टुडे नेटवर्क), सोनिया सिंह (एडिटोरियल डायरेक्टर-एनडीटीवी), सुधीर चौधरी (सीईओ-क्लस्टर1-जी मीडिया), आई वेंकट (डायरेक्टर-इनाडु टेलिविजन), एमवी श्रेयम्स कुमार (एमडी, मातृभूमि प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग)

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Dakhal News 20 November 2020


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सैटेलाइट न्यूज चैनल चलाने वालों की संस्था न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन उर्फ एनबीए का नया बोर्ड गठित कर दिया गया है. इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा को सर्वसम्मति से एनबीए का चेयरमैन और न्यूज24 की मालकिन अनुराधा प्रसाद को वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया है. टाइम्स नेटवर्क के सीईओ एमके आनंद कोषाध्यक्ष बनाए गए. एनबीए बोर्ड में अविनाश पांडेय (सीईओ एबीपी नेटवर्क), राहुल जोशी (एमडी, टीवी18 ब्रॉडकास्ट), कली पुरी (एमडी, टीवी टुडे नेटवर्क), सोनिया सिंह (एडिटोरियल डायरेक्टर-एनडीटीवी), सुधीर चौधरी (सीईओ-क्लस्टर1-जी मीडिया), आई वेंकट (डायरेक्टर-इनाडु टेलिविजन), एमवी श्रेयम्स कुमार (एमडी, मातृभूमि प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग)

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Dakhal News 20 November 2020


bhopal, Dainik Bhaskar, created history, appointing female resident editor

-अभिषेक उपाध्याय- ये हमारे वक़्त की सबसे शानदार खबर है। हमारी प्यारी दोस्त उपमिता वाजपेयी उपमिता दैनिक भास्कर की पहली महिला रेजिडेंट एडिटर (भोपाल एडिशन) नियुक्त हुई है। उपमिता अद्भुत फील्ड रिपोर्टर रही है। हर चैलेंजिंग असाइनमेंट पर टकराती रही है। डिफेंस की ऐसी शानदार रिपोर्टर आपको ढूंढे नही मिलेगी। आपको इस फील्ड में महिला संपादक भी ढूंढे नही मिलेगी। उपमिता ने आज अद्भुत लकीर खींची है। इस लकीर की उम्र दराज़ हो। -पूनम कौशल- मैंने एक लंबे अंतराल के बाद पत्रकारिता में वापसी की. बीच में फ्रीलांस करती रही थी. एक महिला के लिए दोबारा रेगुलर जॉब में आना मुश्किल होता है. ब्रेक के बाद पहली नौकरी में कुछ मुश्किलें देखी भीं. फिर दैनिक भास्कर से जुड़ी. यहां उपमिता वाजपेयी मेरी रिपोर्टिंग मैनेजर रहीं. उन्होंने मेरे लिए इस मुश्किल जॉब को बेहद आसान कर दिया. कोविड के इस मुश्किल वक्त में उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि काम के साथ-साथ मैं अपने बच्चों पर भी पूरा ध्यान दूं. कभी लगा ही नहीं वो बॉस है, हमेशा यही लगा कि मेरी एक फैमिली मेंबर हैं जिनसे बेझिझक कुछ भी कह सकती हूं. अभी पता चला है कि वो अब भोपाल में दैनिक भास्कर की पहली महिला रेज़िडेंट एडिटर होंगी. उपमिता एक शानदार डिफेंस रिपोर्टर रही हैं. एक रीचएबल मैनेजर तो वो है हीं. लेकिन अब दैनिक भास्कर की रेज़िडेंट ए़डिटर बनकर उन्होंने बहुत लंबी लकीर खींच दी है. ये पत्रकारिता में सक्रिय हम जैसी लड़कियों के लिए बड़ा दिन है. उम्मीद है Upmita Vajpai Mishra का यही जज़्बा और जुझारूपन बरकरार रहेगा. This is just a beginning. A long Journey Awaits ♥️

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Dakhal News 18 November 2020


bhopal, Dainik Bhaskar, created history, appointing female resident editor

-अभिषेक उपाध्याय- ये हमारे वक़्त की सबसे शानदार खबर है। हमारी प्यारी दोस्त उपमिता वाजपेयी उपमिता दैनिक भास्कर की पहली महिला रेजिडेंट एडिटर (भोपाल एडिशन) नियुक्त हुई है। उपमिता अद्भुत फील्ड रिपोर्टर रही है। हर चैलेंजिंग असाइनमेंट पर टकराती रही है। डिफेंस की ऐसी शानदार रिपोर्टर आपको ढूंढे नही मिलेगी। आपको इस फील्ड में महिला संपादक भी ढूंढे नही मिलेगी। उपमिता ने आज अद्भुत लकीर खींची है। इस लकीर की उम्र दराज़ हो। -पूनम कौशल- मैंने एक लंबे अंतराल के बाद पत्रकारिता में वापसी की. बीच में फ्रीलांस करती रही थी. एक महिला के लिए दोबारा रेगुलर जॉब में आना मुश्किल होता है. ब्रेक के बाद पहली नौकरी में कुछ मुश्किलें देखी भीं. फिर दैनिक भास्कर से जुड़ी. यहां उपमिता वाजपेयी मेरी रिपोर्टिंग मैनेजर रहीं. उन्होंने मेरे लिए इस मुश्किल जॉब को बेहद आसान कर दिया. कोविड के इस मुश्किल वक्त में उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि काम के साथ-साथ मैं अपने बच्चों पर भी पूरा ध्यान दूं. कभी लगा ही नहीं वो बॉस है, हमेशा यही लगा कि मेरी एक फैमिली मेंबर हैं जिनसे बेझिझक कुछ भी कह सकती हूं. अभी पता चला है कि वो अब भोपाल में दैनिक भास्कर की पहली महिला रेज़िडेंट एडिटर होंगी. उपमिता एक शानदार डिफेंस रिपोर्टर रही हैं. एक रीचएबल मैनेजर तो वो है हीं. लेकिन अब दैनिक भास्कर की रेज़िडेंट ए़डिटर बनकर उन्होंने बहुत लंबी लकीर खींच दी है. ये पत्रकारिता में सक्रिय हम जैसी लड़कियों के लिए बड़ा दिन है. उम्मीद है Upmita Vajpai Mishra का यही जज़्बा और जुझारूपन बरकरार रहेगा. This is just a beginning. A long Journey Awaits ♥️

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Dakhal News 18 November 2020


bhopal,When I got stuck in Shashishekhar

–Yograj Singh–   शशिशेखर ने हिन्दुस्तान को बर्बाद कर दिया, इसे फिर से खड़ा करने में 10 साल और लगेंगे   भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं है, यह कहावत चरितार्थ जरूर होती है। सन् 2000 की बात है, दैनिक जागरण से हिन्दुस्तान में छलांग लगाई। वहां पहुंचने का रास्ता भी बेढंगा ही है, अजय जी ने संदेश भिजवाया कि हमसे आकर मिलो। उनसे एक-दो बार मिला भी, पर इसी बीच केवल तिवारी ने कहा कि वहां तो लंबा समय लगेगा, आपको मैं संतोष तिवारी से मिलवाता हूं। संतोष तिवारी से मिला और एक हफ्ते में ऑफर दे दिया गया। उस समय हिन्दुस्तान अखबार लॉटरी वाला माना जाता था। 24 साल की उम्र थी, समझ सकते हैं कि काम करने का कितना उत्साह रहा होगा। दिल्ली में चार सेंटर खोले गए थे। हमें पूर्वी दिल्ली में काम करने के लिए बोला गया। पूर्वी दिल्ली में हालात यह थे कि कुछ रिपोर्टरों की खबर खुद ही लिखनी पड़ती थी और खबर कम पड़ने पर अपना खोजी दिमाग इस्तेमाल करके पेज को पूरा करते थे। कभी-कभार चारों सेंटर का काम भी हमारे पास ही आ जाता। मैं अधिक दिन सेंटर पर नहीं टिक सका, मेरा बुलावा हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस के लिए आ गया। उन दिनों वहां की यूनियन बहुत मजबूत थी, किसी को बैठने नहीं देते थे। मेरे जाने पर हालांकि किसी ने कोई विरोध नहीं किया। पुराने सभी दिग्गज लोग थे, मुझे बहुत प्यार करते थे। 12-14 पेज का अखबार उन दिनों निकलता था, उसमें से 10-11 पेज पर मेरा ही काम होता था। हेडिंग लगाना, खबर को काटना, पेज को तैयार करना होता था। हिन्दुस्तान टाइम्स कमाता था, हिन्दुस्तान खाता था, इस तरह की कानाफूसी हुआ करती थी, इससे काम करने की ललक और बलवती हो जाती थी, मकसद सिर्फ एक था कि हिन्दुस्तान क्यों नहीं कमा सकता।   प्रमोद जोशी जी उन दिनों संपादक रात्रि थे, हालांकि उस समय उनके अनुभव का उपयोग बहुत कम ही होता था। उनकी उतनी चलती नहीं थी। लेकिन हम सबकी सुनते थे, कांट्रेक्ट और वेज बोर्ड के बीच एक माध्यम थे। धीरे-धीरे वेज बोर्ड के बहुत सारे लोग सेवानिवृत्त हुए, अधिकांश लोगों ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट भी ले लिया। नए लोग आने शुरू हुए, अखबार का रंग-रूप बदला, जिसमें एक अहम कड़ी के रूप में मैं शामिल रहा, लेकिन दिखाने के लिए नहीं, काम को जमीन पर उतारने के लिए। अखबार भी कमाऊ बन गया। मृणाल जी संपादक थीं, प्रमोद जोशी अब अखबार की रीढ़ बन चुके थे। लेकिन इस बीच कुछ गडबड़ियां भी हुईं। जिन लोगों की बदौलत अखबार निरंतर बढ़ रहा था, उन्हें मजबूत नहीं किया गया, बाहर के लोगों को लाकर अनाप-शनाप पैसे दिए जाने लगे। आगरा, मेरठ, देहरादून संस्करण की शुरुआत हुई। दिल्ली-एनसीआर संस्करण के अलावा इन संस्करणों के लिए भी बहुत कार्य किया। कुछ समय पश्चात मृणाल जी के जाने की खबरें सुनाई देने लगी और एक दिन उन्हें प्रथम तल से नीचे छोड़ने के बाद मन बहुत खिन्न हुआ। सैलरी तो हमें बहुत नहीं मिलती थी, लेकिन मृणाल जी जो सम्मान करती थी, उसी सम्मान के लिए हम जी-जान से काम करते थे।   शशिशेखर आ गया, लोग कहते थे कि यह काम करने वाले लोगों को पसंद करता है। पर मेरा शशिशेखर के साथ का जो अनुभव है, उसके मुताबिक वह जो बात करता है, उसके ठीक उलटा काम करता है। हिन्दुस्तान टाइम्स ही नहीं, पूरी प्रिंट मीडिया में अभी भी कोई बराबरी करने को तैयार हो तो मैं उससे प्रतियोगिता करने को तैयार हूं। शशिशेखर ने जब देखा कि संस्करण टाइम पर नहीं जा रहा है तो उसने मुझे बुलाकर कुछ लॉलीपॉप दिया और मैं उसके लॉलीपॉप में फंस गया। जी तोड़ मेहनत करके सभी संस्करणों को टाइम पर छुड़वा देता था। तमाम साथियों के साथ प्रदीप तिवारी और पवनेश कौशिक इसके साक्षी हैं। लेकिन जब इनकिरीमेंट की बारी आई तो मेरा पैसा सबसे कम बढ़ा। स्वभाव के मुताबिक मैं गुस्से में आ गया और पत्र लेकर शशिशेखर के चेम्बर में चला गया। वहां गुस्से में कुछ बातें भी कहीं, लेकिन उसने और कुछ न कहने की बजाय सिर्फ यह बोला कि योगराज जी हमसे चूक हुई है, हम इसमें सुधार करेंगे। मैं चला आया, उसके बाद काफी दिन तक इंतजार किया, लेकिन सुधार तो नहीं हुआ। इसके बाद शशिशेखर ने ड्रामे की शुरुआत की, जब वह हटा पाने में नाकामयाब रहा तो उसने मेरा ट्रांसफर भागलपुर कर दिया। मैं भागलपुर चला भी जाता, लेकिन मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। मैंने कुछ समय पश्चात सीधे एच.आर. को अपना त्याग पत्र दे आया।   आप सोच रहे होंगे इतनी लंबी कहानी बताने का क्या अर्थ है? दरअसल इतनी मेहनत जिस अखबार के लिए की हो, जिस अखबार को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय दिया हो, ऐसे में हिन्दुस्तान अखबार को गिरता देखकर पुरानी बातें याद आ गईं। हिन्दुस्तान अखबार तो काफी पहले से बर्बाद हो चुका था, ऐसे में कोरोना महामारी का बहाना और मिल गया। बहुत लोगों की वहां से छंटनी भी हुई। बनी हुई चीज को बिगड़ने में समय लगता है। शशिशेखर ने हिन्दुस्तान को बर्बाद कर दिया, अब इसको फिर से खड़ा करने में दस साल और लगेंगे।   बात तकरीबन 2006-2007 की है, लेकिन थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है। हिन्दुस्तान में कार्य करते हुए मन में कुछ उदासी थी। इसी दौरान दैनिक भास्कर का बिजनेस भास्कर लांच होने आया। सुदेश गौड़ जी दिल्ली के लिए भर्तियां कर रहे थे, उन्होंने मुझे बुलाया, बिठाकर चाय पिलाई और बिजनेस भास्कर में नौकरी करने का पत्र दे दिया। पैसा भी हिन्दुस्तान की अपेक्षा पांच हजार अधिक था। मैंने हिन्दुस्तान से छुट्टी लेकर एक सप्ताह में उनकी टीम भी बनवा दी। पर इस एक सप्ताह के दौरान ऑफिस आने-जाने में समय अधिक लगता था और कठिनाई भी होती थी। मेरे पास कोई वाहन तो था नहीं, कार्यालय से वापसी के समय जो परेशानी हुई, उससे मैं निराश हुआ और वहां काम न करने का मन बना लिया। सुदेश गौड़ जी को मना किया या नहीं, यह तो याद नहीं, लेकिन बिजनेस भास्कर जाना बंद कर दिया।   हिन्दुस्तान अखबार में बने रहने की मुख्य वजह गाजियाबाद से नई दिल्ली के लिए चलने वाली लोकल ट्रेन थी। जून-2013 में आखिरकार हिन्दुस्तान छोड़ना ही पड़ा। इस दौरान मेरे गुरुजी और पुराने साथी राकेश घंसोलिया ने मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया बुलवाया और अमन नैयर जी से मिलवाया। अमन नैयर जी ने एक ही बार में मेरे बॉयोडाटा पर पद और पैसा दोनों मार्क करके भेज दिया। इसके बावजूद नवभारत के लिए मेरा क्यों नहीं हो पाया, इसका क्षोभ जरूर रहेगा और वजह क्या रही या किसकी वजह से मेरा पत्र अटका, यह संदेह बरकरार है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया यानी नवभारत में काम न कर पाना मेरे मन में एक बोझ सा है।   इसके बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव में चार-पांच विधानसभाओं के लिए खूब खबरें लिखी। इसमें भी सारा कार्य मेरा लेकिन धन ज्यादा मेरा साथी कमाता था। पर इसका कोई मलाल नहीं है क्योंकि धन कहां से आएगा, इसकी कला मैं नहीं जानता हूं, साथ वाले व्यक्ति को ही पता था। नौकरी गई तो वसुंधरा का मकान भी बेच दिया। इस समय मैं वसुंधरा सेक्टर-2 में किराए के मकान में रहता था। इसी दौरान वार्ता लोक में रह रहे सुनील पांडेय जी से भेंट हुई। कुछ समय पश्चात उन्होंने मुझे आरएसएएस समर्थित संगठन भारतीय किसान संघ की पत्रिका किसान कुल को निकालने हेतु किसान संघ लेकर चले गए। दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर किसान संघ का कार्यालय था। यहां पैसा तो कामचलाऊ ही था, लेकिन मन को बड़ी संतुष्टि रहती थी।   …जारी…. पत्रकार योगराज सिंह की एफबी वॉल से

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Dakhal News 18 November 2020


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–अशोक कुमार साहू– रायपुर।छत्तीसगढ़ के जिला महासमुन्द में एसपी बंगला के पीछे स्थित है हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी। यहां परसकोल रोड, दीनदयाल नगर में शोकसभा आयोजित था। यहाँ का नजारा गमगीन करने वाला था। लेकिन, यह क्या.. यहां तो उपस्थित लोगों ने तालियां बजाना शुरू कर दिया। मैंने अपने जीवन में अनेक सुख-दुख के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है। लेकिन, शोक सभा में तालियों की गड़गड़ाहट कहीं नहीं सुनी थी। 6 नवम्बर 2020 का दिन मेरे जीवन का अविस्मरणीय दिन बन गया। जब शोक सभा के पिन ड्राप साइलेंट के बीच यकायक तालियां बजने लगी। सैकड़ों लोग शोक सभा मे पुष्पांजलि अर्पित करने पहुंचे थे। जहां वे श्रद्धांजलि देने के पहले गर्व के साथ ताली बजा रहे थे। आइये आपको भी उस ऐतिहासिक घटना की आंखों देखी हाल सुनाते हैं। ऐसे हुआ शोक सभा का आयोजन जैसे कि पहले ही खबर दी जा चुकी है कि, प्रेस क्लब महासमुन्द अध्यक्ष आनंदराम साहू की माता देवकी देवी साहू का 29 अक्टूबर को देहावसान हो गया। उनकी आत्मा की शांति के लिए 6 नवम्बर को शोक/श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। उनके निवास के समीप स्थित ‘मातृ छाया’ सांस्कृतिक मंच में कार्यक्रम आयोजित हुआ। जहां परिजन, मित्र मंडली, जनप्रतिनिधियों, पत्रकार साथियों के अलावा कॉलोनी और प्रेस क्लब परिवार के लोग बड़ी संख्या में एकत्रित हुए थे। शोक सभा का संचालन शिक्षक महेंद्र कुमार पटेल कर रहे थे। उन्होंने शोक संतप्त परिवार द्वारा यह तीन संकल्प लेने की सार्वजनिक उदघोषणा की:- मन : मातृ स्वरूपा बेटी को समर्पित राष्ट्रीय कार्यक्रम “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” को फलीभूत करते हुए आनंद राम साहू का परिवार 28 दिन आयु के उस मासूम बच्ची, मातृ स्वरूपा “काव्या यादव माता- स्व.भुनेश्वरी यादव, पिता-परमेश्वर (गोलू) यादव” को पढ़ाने-बढ़ाने का संकल्प लिए हैं। जिन्होंने जन्म लेने (8 अक्टूबर) के तीसरे दिन ही (10 अक्टूबर 2020 को ) अपनी मां को खो दिया है। पहली से बारहवीं कक्षा तक की उसकी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का दायित्व साहू परिवार उठाएगा। इस पर होने वाले संपूर्ण व्यय की व्यवस्था माता देवकी देवी साहू की कृषि भूमि से होगी। तन : मानव समाज को समर्पित माता देवकी देवी की अंतिम इच्छा देहदान करने की थी। जिसका अनुशरण और पूर्ति करते हुए उनके सुपुत्र आनंदराम साहू पिता स्व. परसराम ने दृढ़ निश्चय के साथ ‘देहदान’ और ‘नेत्रदान’ का संकल्प लिया। उन्होंने कहा है कि मेरे देहावसान के बाद निकटस्थ मेडिकल कॉलेज अस्पताल में देहदान करके उनके परिजन इस संकल्प को पूरा करेंगे। उन्होंने यह भी संकल्प दोहराया कि उनके नेत्र को जरूरतमंद को दान करेंगे, जिससे कि कोई बदकिस्मत भी उनकी आंखों से इस दुनिया को देख सकेंगे। धन : जरूरतमंद पड़ोसियों को समर्पित माता देवकी देवी साहू की स्मृतियों को चिर स्थाई बनाये रखने के लिए परसकोल जनकल्याण समिति, दीनदयाल नगर महासमुन्द को एक लाख, ग्यारह हजार, एक सौ ग्यारह रुपये स्वेच्छानुदान उन्होंने दिया। जिससे कि उनके पिता स्व. परस राम साहू की स्मृति में शुरू हुआ सांस्कृतिक मंच निर्माण का अधूरा कार्य पूरा हो सके। और ‘कॉलोनी परिवार’ इस मंच का सुख-दुःख के कार्यक्रम में निःशुल्क उपयोग कर सकें। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि का साक्षात्कारशोक सभा में इन तीनों संकल्पों (मन-तन-धन समर्पण) की उद्घोषणा के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। शोकसभा की मर्यादाओं पर ये तीन संकल्प भारी पड़े। और लोग अपने हाथों को रोक नहीं सके। उपस्थित लोगों में से अनेक के आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। और देव स्वरूप माता देवकी देवी को यही अश्रुपूरित श्रद्धांजलि थी। मैंने पहली बार अश्रुपूरित श्रद्धांजलि का बहुत करीब से साक्षात्कार किया। बड़ी संख्या में पहुंचे थे लोगकोरोना काल में भी इस शोक सभा मे महासमुन्द क्षेत्र के लोकसभा सदस्य (सांसद) चुन्नीलाल साहू, महासमुन्द विधायक व छत्तीसगढ़ शासन में संसदीय सचिव विनोद सेवन लाल चंद्राकर, पूर्व विधायक डॉ विमल चोपड़ा, कांग्रेस जिलाध्यक्ष डॉ रश्मि चंद्राकर सहित अनेक जनप्रतिनिधि, विभिन्न समाज प्रमुख, वरिष्ठ पत्रकार और गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में पहुंचे थे। जीवन विद्या के प्रबोधक गेंदलाल कोकड़िया ने जीवन यात्रा पर सारगर्भित प्रकाश डाला। लाफिनकला गांव से आए भजन कीर्तन मंडली के लोक कलाकारों ने संगीतमय भक्ति प्रवाह से श्रद्धालुओं को जीवन दर्शन का मार्गदर्शन कराया।

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Dakhal News 9 November 2020


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के. विक्रम राव जानेमाने पत्रकार को घर में घुसकर पुलिस पकड़कर थाने अथवा जेल ले जाये, यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं माना जायेगा? उत्तर निर्भर करता है घटनाक्रम के तथ्यों और विवरण पर। साधारण मुजरिम को पकड़ने और ऐसे पत्रकार को कैद करने में अंतर स्पष्ट करना होगा। क्या वह भगोड़ा हो जाता? पकड़ के बाहर हो जाता? देश छोड़ देता? लापता हो जाता? उसकी संपत्ति क्या जब्त नहीं की जा सकती? उसका मुचलका अथवा जमानत देने वाला कोई न मिलता? क्या वह पेशेवर अपराधी है? मुलजिम और मुजरिम में अन्तर साफ समझना होगा। बिना उपरोक्त तथ्यों पर ध्यान दिये और संभावित कारणों पर विचार किये रायगढ़ (मुम्बई) पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को सागरतटीय वर्ली के सत्रहवीं मंजिल वाले उनके फ्लैट से सूर्योदय के पूर्व घर में घुसकर (4 नवम्बर) गिरफ्तार कर लिया। इसी प्रश्न के मद्देनजर बम्बई हाईकोर्ट की दो-सदस्यीय खण्डपीठ ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी की जमानत पर सुनवाई शुरू की। उद्धव ठाकरे सरकार के वकील की जिद के बावजूद हाईकोर्ट ने अर्णब को जेल नहीं भेजा। 4 नवम्बर को रायगढ़ की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट महोदया ने मुम्बई पुलिस की मांग को ठुकरा दिया था कि उन्हें पुलिस हिरासत में भेजा जाये। मजिस्ट्रेट ने न्यायिक हिरासत में ही रखा। पुलिस हिरासत तथा न्यायिक हिरासत (जेल) के तेरह महीनों का मुझे दुर्दान्त अनुभव है। तब आपातकाल में पुलिस हिरासत (1975-76) में तीस दिनों तक पुलिस शारीरिक यातनायें देकर सरकारी गवाह बनाने तथा झूठे गुनाह कबूल करने का प्रयास मेरे साथ करती रही थी। अर्णब को कैद करने का कारण था कि दो वर्ष पूर्व गोस्वामी ने एक गृह सज्जाकार के 83 लाख का काम कराया तथा इसका भुगतान नहीं किया। मानसिक आघात से उस सज्जाकार ने आत्महत्या कर ली। पत्र में उस संतप्त सज्जाकार ने आत्महत्या का कारण यह दिया कि बकाया राशि न मिलने पर वह जान दे रहा है। किस्सा यहीं से शुरू होता है। पुलिस द्वारा 2018 में दर्ज मुकदमे को महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार ने (2018 में) ही बन्द कर दिया था। गौरतलब है कि शिवसेना दो वर्ष पूर्व भाजपा के साथ सरकार में थी और आज कांग्रेस के साथ सत्ता पर बैठी है। मुम्बई पुलिस आयुक्त परमवीर सिंह भी गत दस माह (29 फरवरी 2020) पदासीन हैं। वे मुठभेड़ विशेषज्ञ रहे। यूं तो वे सीधे आदेश लेते हैं मुख्यमंत्री उद्धव बाल ठाकरे से मगर मातहत हैं राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार) की पार्टी के गृहमंत्री अनिल वसंतराव देशमुख के। मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण आदेशों को पुलिस आयुक्त ने जारी किया था कि ''अति आवश्यक कार्य के अलावा इस कोरोना काल में कोई भी मुम्बईवासी अपने आवास से दो किलोमीटर दूर तक न जायें।'' पवार-पार्टी के गृहमंत्री के विरोध पर यह निर्देश निरस्त कर डाला गया। कुछ ही दिनों बाद गृहमंत्री अनिल देशमुख ने दस पुलिस उपायुक्तों का तबादला कर दिया। खिन्न उद्धव ठाकरे ने 72 घण्टे में यह आदेश भी रद्द कर डाला। अर्थात् दो घटक दलों- शिवसेना तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार) की कलह खुलकर उभर आयी। इसी राजनीतिक दिशाहीनता का नतीजा रहा जिससे सरकार और मीडिया के बीच टकराव बढ़ा। निवर्तमान भाजपा मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस सहृदय रहे तो मीडियाजनों से समर्थन मिलता रहा। इसलिये भी उनकी सरकार चंद दिनों में ही पलट दी गयी। कट्टर हिन्दू पार्टी शिवसेना के सरताज उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के कारण मुम्बई की मीडिया भी बंट गयी। समर्थक और आलोचक खेमों में। इसमें रिपब्लिक-टीवी के अर्णब मुखर्जी विरोध में ज्यादा आक्रामक रहे। उन्हें पटरी पर लाने के हेतु शासनतंत्र जुट गया। एक मुकदमा दो वर्ष पूर्व दर्ज हुआ था अर्णब के विरुद्ध। उनपर किसी का उधार न लौटाने का आरोप लगा। मगर देवेन्द्र फड़नवीस के राज में यह देनदारी वाली रपट समाप्त कर दी गयी। जब ठाकरे से कलह बढ़ी तो पुरानी फाइलें पलटी गयीं। फिलहाल यहां इस वारदात से निष्पक्ष मीडिया के संदर्भ में कुछ अति महत्वपूर्ण सिद्धांत गौरतलब बन गये। सर्वप्रथम यह कि क्या पुराने कानूनी तौर बन्द कर दिये गये मुकदमे की दोबारा जांच की जा सकती है? इसी सवाल को इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (आईएफडब्ल्यूजे) के राष्ट्रीय विधि परामर्शदाता तथा उच्चतम न्यायालय में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अश्विनी कुमार दुबे ने रिपब्लिक टीवी को पेश की। प्रश्न था कि क्या बिना अदालत के आदेश के पुलिस किसी बन्द मुकदमे को खोलकर दोबारा जांच चालू कर सकती है? फिर मसला यह है कि शिवसेना का गत चार दशकों से मीडिया के हनन और भेदभाव का रुख रहा। बाल ठाकरे अपने दैनिक ''सामना'' द्वारा निष्पक्ष दैनिक (मराठी और हिन्दी) ''महानगर'' को खत्म करने में जुटे रहे। प्रतिष्ठित संपादक निखिल वागले तो शिवसेना के घोर विरोधी रहे। उनपर तथा उनके साथी युवराज रोहित तथा प्रमोद निर्गुडकर पर अक्सर घातक हमले होते रहे। इसी ''सामना'' दैनिक में सांसद और संपादक संजय राउत लिख चुके हैं कि भारतीय मुसलमानों को मताधिकार से वंचित कर दिया जाये। आज इसी संजय राउत का खुलेआम समर्थन सोनिया-कांग्रेस तथा पवार-कांग्रेस व शिवसेना को मिल रहा है। 'अर्णब काण्ड'' इन घटकों की टकराहट का शिकार है। मसलन महाराष्ट्र में रिपब्लिक टीवी को खत्म करना सरकार की प्राथमिकता है। अत: इस पृष्ठभूमि में प्रश्न ये है कि कानून की प्रक्रिया के तहत संपादक को दण्डित करने का प्रावधान क्यों नहीं अपनाया गया? उनके घर में तड़के घुसकर पकड़ ले जाना, धक्का-मुक्की करना, परिवार को आघात पहुंचाना, एक स्कूल को जेल घोषित कर अर्णब गोस्वामी को रात बिताने हेतु विवश करने के बजाये उन्हें पुलिस समन देकर पूछताछ कर सकती थी। पत्रकार के साथ एक अपराधी-सा व्यवहार करना अनुचित है। मुख्य दण्डाधिकारी (महिला) ने पुलिस की मांग खारिज कर दी कि अर्णब को पुलिस की हिरासत में दो सप्ताह दे दिया जाये। उन्होंने न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दिया जहां वे कोर्ट के संरक्षण में रहेंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 6 November 2020


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नई दिल्ली। खुद की तिजोरी भरने वाले मीडिया मालिकों को अपने अधीन काम करने वाले कर्मियों का तनिक खयाल नहीं रहता। ये सरकारी नियमों के तहत मिलने वाले वेतन व अन्य देय को भी देने में कतराते हैं। ऐसे ही एक मामले में एक पत्रकार ने अपने मालिकों को कोर्ट में तलब कराया है। कोर्ट ने सम्मन जारी करते हुए सबको तलब किया है।   मामला श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय का है। ये 1 जनवरी 2006 से लेकर 30 जून 2016 तक एनएनएस ऑनलाईन प्राइवेट लिमिटेड नामक मीडिया कंपनी में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्यरत रहे। पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय ने मजीठिया वेतनमान न मिलने की शिकायत श्रम विभाग में की। उनका आरोप है कि जबसे वे एनएनएस ऑनलाईन प्रा लि में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्य कर रहे हैं, तबसे उनको कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार कोई लाभ नहीं दिया। श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय की शिकायत पर श्रम अधिकारी ए के बिरूली एवं इंस्पेक्टर मनीश कुमार ठाकुर ने एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन को शोकॉज नोटिस जारी कर दिया। इस शोकाज नोटिस में मीडिया प्रबंधन का पक्ष मांगा गया। साथ ही जरूरी दस्तावेज के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। प्रबंधन ठेंगा दिखाते हुए किसी सुनवाई पर उपस्थित नहीं हुआ। न ही कोई प्रत्युत्तर दिया। इस तरह एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन ने श्रम विभाग, इसके अधिकारियों और दिल्ली सरकार की अवहेलना की। श्रम इंस्पेक्टर मनीष कुमार ठाकुर ने जवाब न देने वाले मीडिया प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट में आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की। न्यायालय ने दस्तावेजों को देखने के बाद आरोपी नंबर एक राजेश गुप्ता (डायरेक्टर एवं मालिक) एवं पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ सम्मन जारी किया है।

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Dakhal News 1 November 2020


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बिहार के मधुबनी जिले के मधवापुर प्रखंड मुख्यालय के रामपुर गांव निवासी ई. कुमार प्रभात रंजन ने भारतीय जनसंचार संस्थान द्वारा आयोजित आईआईएमसी एंट्रेंस एक्जाम में ऑल इंडिया स्तर पर रेडियो एवं टीवी जर्नलिज्म में 19 वां रैंक तथा हिंदी जर्नलिज्म में 21 वां रैंक प्राप्त कर अपने परिवार, समाज व जिले का मान बढ़ाया है।   दो भाई व एक बहन में सबसे छोटे व पेशे से सिविल इंजीनियर छात्र ई. कुमार प्रभात रंजन के पिता गांधी मिश्र गगन वरिष्ठ पत्रकार हैं तो वहीं माता निभा देवी शिक्षिका हैं। पत्रकारिता पृष्ठभूमि से आनेवाले प्रभात के परिवार में कई जानेमाने पत्रकार हैं जहाँ उनके बड़े चाचा जगदीश मिश्र, छोटे चाचा संतोष मिश्र व बड़े भाई कुमार आशुतोष रंजन भी पत्रकार हैं। जबकि आईआईएमसी जैसे नामचीन संस्थान की परीक्षा में सफलता का परचम लहराने के साथ ही प्रभात की इस उपलब्धि से उनका गाँव गौरवान्वित है व उनके जाननेवालों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है। अब छात्र ई. कुमार प्रभात रंजन आगे एशिया के सर्वोत्कृष्ट पत्रकारिता संस्थान से मास कॉम की पढ़ाई पूरी करेंगे। प्रभात ने अपनी इस सफलता का श्रेय नॉलेज फर्स्ट के संचालक सुधीर कुमार झा सहित अपने पारिवारिक अभिभावकों को दिया है। कुमार प्रभात रंजन की इस सफलता पर पिता व माता सहित पशुपति मिश्र, शुभकला देवी, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश मिश्र, संतोष कुमार मिश्र, अनिल कुमार मिश्र, राजेश कुमार मिश्र, मुकेश कुमार मिश्र, आशा झा, कुमार आशुतोष रंजन निखिल, निधि गांधी, चित्रार्थ रंजन मिश्र, हार्दिक रंजन मिश्र, रचित रंजन मिश्र, रिद्धि कुमारी, उषा देवी, रीता देवी, प्रीति कुमारी व अन्य शुभेच्छुओं ने खुशी प्रकट करते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना ईश्वर से की है।

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Dakhal News 1 November 2020


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आगरा । लॉकडाउन में मीडिया जगत में तमाम लोगों की नौकरी चली गई। अमर उजाला आगरा के एक युवा पत्रकार ने इस दरम्यान बड़ा साहस दिखाकर समाज के सामने मिसाल पेश की है। अमर उजाला आगरा में सिटी डेस्क इंजार्च रहे अविनाश चौधरी की अमर उजाला संपादक से नहीं बनी। काम के पक्के अविनाश को चाटुकारिता पसंद नहीं थी। इसके कारण संपादक ने अपनी हठधर्मिता दिखाते हुए अविनाश का ट्रांसफर रोहतक कर दिया। यह बात युवा पत्रकार को अखर गयी। मीडिया जगत में 15 साल से अधिक समय तक क्राइम समेत कई प्रमुख बीट पर काम कर चुके अविनाश ने पत्रकारिता को गुडबाय करने के बाद नई मंजिल की तलाश शुरू की। हालांकि इस बीच कई संस्थानों ने उनसे जुड़ने के लिए संपर्क किया। अविनाश ने मीडिया लाइन की दयनीय स्थिति को देखते हुए नया कुछ करने का इरादा किया। अविनाश ने एक नया काम शुरू करने के लिए सबसे पहले अपने आवास को बेच दिया। खुद के परिवार को किराये के मकान में रखा। इसके बाद अपनी 15 साल की गाढ़ी कमाई और जमापूंजी को लगाकर आगरा दयालबाग डीम्ड विवि के महज सौ मीटर की दूरी पर एक जमीन खरीदी। उन्होंने खरीदी गई जमीन पर बैंक से लोन लिया। लोन से जमीन पर चार माह के लॉकडाउन पीरियड में लगातार काम कराते हुए तीन मंजिला 24 कमरे का महिला छात्रावास तैयार करा दिया। इस हॉस्टल की आधुनिकता को देखकर आगरा पत्रकार जगत में अविनाश के दृढसंकल्प की सराहना हो रही है। अविनाश अब आगरा के पत्रकारों के लिए नजीर बन गए हैं। अविनाश का इस बारे में कहना है कि जिस नौकरी को हमने 15 साल का समय दिया, घर परिवार से बढ़कर समझा, उस नौकरी में केवल चापलूसों की ही दुनिया सुरक्षित है। मेरे पास परिवार है, उन्हें पालना है। परिजनों के चेहरे को देख मैंने हौसले को जिंदा रखा। जिस भी पत्रकार साथी की नौकरी जा रही है, उनसे केवल यह कहना चाहूंगा कि नौकरी रहे या न रहे, हौसले को अपने मरने न दीजिए, हौसला जिंदा रखिए।

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Dakhal News 27 October 2020


bhopal, When you ,run away ,media, you will get,same amount of dirt!

-Ashwini Kumar Srivastava- मुझे मीडिया की नौकरी छोड़े हुए अब दस साल से ज्यादा हो चुके हैं मगर अब भी अपने मीडिया के साथियों के संपर्क में रहता हूं। जैसे मैं तब मीडिया में वर्क प्लेस की गुटबाजी, राजनीति आदि गंदगियों के लेकर दुखी रहता था, वैसे ही आज भी मैं अपने ज्यादातर साथियों को दुखी पाता हूं। मीडिया के मेरे ज्यादातर साथी मुझसे बराबर यह अफसोस जताते हैं कि अगर मीडिया को छोड़कर वह कहीं और होते तो उन्हें एक बेहतर वर्कप्लेस मिल जाता। जबकि मेरा अनुभव अब मुझे यह स्पष्ट कर चुका है कि आदर्श वर्क प्लेस भी राम राज्य की तरह की कल्पना ही है। जिसका सपना देखने से कोई फायदा नहीं है। हकीकत में तो रावण राज की लंका जैसा माहौल ही हर वर्क प्लेस में नसीब होना है। मुझे याद है कि मैं जब पहली नौकरी में आया था, तब से लेकर अपना बिजनेस शुरू करने तक मैंने कई बार अपनी मनपसंद जगह ढूंढने के लिए कम्पनियां बदलीं। कम्पनी बार- बार बदलने का यह फायदा जरूर मिला कि चंद ही बरसों में कई गुना सेलरी और कई छलांगे मारकर सम्मानजनक पद हासिल हो गया। लेकिन उसके बाद यह भी पता चल गया कि लगभग हर कंपनी में गुटबाजी भयंकर तरीके से हर तरफ हावी है इसलिए सिर्फ मेहनत, ईमानदारी, लगन अथवा योग्यता के बल पर यहां टिक पाना तकरीबन असम्भव है। फिर अपना बिजनेस शुरू किया तो सोचा कि अब यहां तो किसी भी कीमत पर गुटबाजी की गंदगी कर्मचारियों में नहीं फैलने दूंगा। लेकिन पार्टनरशिप में बिजनेस शुरू करने के कारण लगातार गुटबाज कर्मचारियों को हटाते रहने के बावजूद यह गंदगी साफ नहीं कर पाया। क्योंकि कर्मचारी चाहे लाख बदल लूं, मगर जो आपकी ही तरह मालिक समझा जा रहा है यानी आपका पार्टनर, यदि वह गुटबाज है तो हर कर्मचारी उसी की छत्रछाया में जाने की फिराक में रहेगा या खुद पार्टनर ही हर कर्मचारी को अपनी तरह नाकारा और गुटबाज बनाने में लगा रहेगा। हालांकि किसी पार्टनरशिप के बिना जो लोग अकेले ही कोई बड़ा बिजनेस संभाल रहे हैं, वे भी अपने कर्मचारियों के बीच गुटबाजी को शायद ही रोक पाते होंगे। क्योंकि हर कम्पनी के मालिक को अपने दिशा- निर्देशों, नियमों आदि का पालन करवाने के लिए अपने ठीक नीचे ताकतवर पदों पर लोगों को तैनात करना ही होता है। जाहिर है, शीशे की तरह पारदर्शी नजर आने वाली गंगा में अगर गोमुख से निकलने के बाद कहीं आगे जाकर मसलन हरिद्वार से ही हर शहर की गंदगी भी मिलने लगे तो कानपुर पहुंचते-पहुंचते तो उसका पानी काला या मटमैला तो हो ही जाएगा। इसीलिए कम्पनियां भी मालिक के अच्छे होने के बावजूद अक्सर अपने कर्मचारियों के लिए आदर्श वर्क प्लेस नहीं तैयार कर पातीं। क्योंकि किसी एक के अच्छे और सच्चे होने से भी आदर्श संस्थान नहीं खड़ा किया जा सकता। लिहाजा अब अपने पूर्व साथियों को मैं यही राय देता हूं कि जहां हो जैसे हो , उसी में खुश रहना सीख लो। गुटबाजी आदि की गन्दगी हर जगह है और पर्याप्त मात्रा में है। मीडिया में रहकर कम्पनी बदलने या मीडिया छोड़कर किसी और क्षेत्र में कम से कम इसलिए तो मत जाओ कि जहां हो , वहां की गन्दगी से कोफ्त हो रही है। बाकी तरक्की या और ताकतवर पद अथवा बढ़िया सेलरी के लिए जहां छलांग मारनी हो मार लो। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता जैसा दिव्य ज्ञान देने वाले महापुरुष की भावनाओं को समझो और बजाय आदर्श समाज या वर्क प्लेस तलाशने के, अपनी कामयाबी की डगर तलाशो। पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव का विश्लेषण.

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Dakhal News 27 October 2020


bhopal, IIMC

आईआई एम सी की प्रवेश परीक्षा संपन्न, परिणाम अगले हफ्ते नई दिल्ली । भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा 8 पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए रविवार को प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। इस वर्ष प्रवेश परीक्षा को कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को दी गई थी। यह पहला मौका है जब परीक्षा एनटीए द्वारा आयोजित करवाई गई है। इससे पूर्व आईआईएमसी द्वारा स्वयं परीक्षाओं का आयोजन किया जाता था।   कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष प्रवेश परीक्षा ऑनलाइन आयोजित की गई। एनटीए द्वारा 4 बैचों में सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। आईआईएमसी के 6 परिसरों में संचालित होने वाले 8 पाठ्यक्रमों की 476 सीटों के लिए इस वर्ष लगभग 4600 विद्यार्थियों ने आवेदन किया था। इनमें से 3773 विद्यार्थी परीक्षा में शामिल हुए। प्रवेश परीक्षा का परिणाम अगले हफ्ते आईआईएमसी की वेबसाइट पर घोषित किया जाएगा। कोरोना महामारी की वजह से इस वर्ष सत्र नवंबर के पहले हफ्ते से शुरू होगा।

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal, Why not TRP free news?

रंजना मिश्रा आम दर्शक तो टीवी पर केवल सच्ची और साफ-सुथरी खबरें ही देखना चाहते हैं, किंतु टीआरपी की होड़ ने आज न्यूज़ चैनलों की पत्रकारिता को इतने निचले स्तर पर ला दिया है कि अब अधिकतर न्यूज़ चैनलों पर सही न्यूज़ की जगह फेक न्यूज़ और डिबेट के रूप में हो-हल्ला ही देखने-सुनने को मिलता है। सभी चैनल यह दावा करते हैं कि हम ही नंबर वन हैं। अभी हाल ही में देश के दो बड़े न्यूज़ चैनलों पर टीआरपी से छेड़छाड़ के आरोप लगे हैं। टीआरपी की इस होड़ ने न्यूज़ चैनलों की पत्रकारिता का स्तर इतना अधिक गिरा दिया है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया से आम लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है। हर हफ्ते गुरुवार के दिन टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट जारी करने वाली संस्था बार्क (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) ने यह घोषणा कर दी है कि अगले 8 से 12 हफ्ते तक अलग-अलग न्यूज़ चैनलों के टीआरपी के आंकड़े जारी नहीं किए जाएंगे। इनमें हिंदी न्यूज़ चैनल, इंग्लिश न्यूज़ चैनल, बिजनेस न्यूज़ चैनल और क्षेत्रीय भाषाओं के सभी न्यूज़ चैनल शामिल हैं। बार्क का कहना है कि इस दौरान उनकी तकनीकी टीम टीआरपी मापने के मौजूदा मानदंडों की समीक्षा करेगी और जिन घरों में टीआरपी मापने वाले मीटर लगे हैं, वहां हो रही किसी भी प्रकार की धांधली और छेड़छाड़ को रोकने की कोशिश करेगी। कुछ न्यूज़ चैनलों द्वारा किए गए कथित टीआरपी घोटाले के कारण दो से तीन महीनों के लिए टीआरपी को रोक दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि दो से तीन महीनों तक न्यूज़ चैनलों की टीआरपी की गतिविधियों को रोककर मीडिया को साफ-सुथरा करने की जो कोशिश की जा रही है, क्या वो सच में कामयाब होगी? जिस चैनल की टीआरपी जितनी ज्यादा होती है उसे उतने ही ज्यादा और महंगे विज्ञापन मिलते हैं। टेलीविजन के सभी चैनलों के मुकाबले न्यूज़ चैनलों की भागीदारी बहुत कम है, किंतु दर्शकों पर इनका प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। देश के केवल 44 हजार घरों में ही टीआरपी मापने के मीटर लगे हैं, तो सवाल यह भी है कि केवल इतने घरों में लगे टीआरपी मापने के मीटर पूरे देश की टीआरपी कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? घोटाले के आरोपों के मुताबिक इन घरों में से कुछ घरों को कुछ रुपए देकर टीआरपी के आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई है। आजकल अधिकतर न्यूज़ चैनल डिबेट दिखाते हैं, क्योंकि डिबेट में टीवी का दर्शक उस न्यूज़ चैनल पर अपना ज्यादा समय खर्च करता है और जिससे उसकी टीआरपी बढ़ जाती है। आजकल ग्राउंड रिपोर्ट न्यूज़ चैनलों से धीरे-धीरे गायब ही होती जा रही है, क्योंकि अब कोई न्यूज़ चैनल ग्राउंड रिपोर्टिंग में मेहनत और पैसा खर्च करना नहीं चाहता और ना ही अपने रिपोर्टरों को बाहर भेजना चाहता है। अब सवाल यह है कि टीआरपी मापने की जो व्यवस्था फिलहाल लागू है, वो क्या वास्तव में सही है? क्या यह व्यवस्था सच्ची और साफ-सुथरी खबरें दिखाने वाले न्यूज़ चैनलों के लिए उपयोगी है? जवाब है नहीं। यदि ये न्यूज़ चैनल डिबेट करना बंद कर दें, मनोरंजक खबरें देने की बजाय सच्ची और साफ-सुथरी खबरें दिखाना शुरू कर दें तो उनकी टीआरपी निश्चित ही बहुत नीचे आ जाएगी। जिससे विज्ञापनदाता उन चैनलों को विज्ञापन देना बंद कर देंगे और विज्ञापन न मिलने के कारण, उन चैनलों को अपने रिपोर्टरों को तनख्वाह देना भी मुश्किल हो जाएगा और इस कारण उन न्यूज़ चैनलों को फिर से डिबेट और सस्ती खबरों को दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। डिबेट और सस्ती, मनोरंजक खबरें चैनल की टीआरपी को बढ़ा देंगे, जिससे आगे लोगों को यह भरोसा हो जाएगा कि यही मॉडल सही है। न्यूज़ चैनलों के न्यूज़ रूम में बैठे प्रोग्राम एडिटर और पत्रकारों के दिमाग में न्यूज़ बनाते समय केवल एक ही बात ध्यान में रहती है कि कौन-सा प्रोग्राम और न्यूज़ ज्यादा टीआरपी लाएगा। अब आवश्यकता है कि टीआरपी की इस अंधी दौड़ को छोड़कर, न्यूज़ चैनलों का उद्देश्य, दर्शकों तक जरूरी खबरें और सूचनाएं पहुंचाना होना चाहिए, न कि मनमर्जी की खबरें दिखाना। यह खबरें रिसर्च और ग्राउंड रिपोर्टिंग पर आधारित होनी चाहिए, यही पत्रकारिता का सच्चा धर्म है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal,Do not spoil , environment by working ,more in the office

-जे सुशील- ज़िंदगी में नौकरी सबकुछ नहीं होता है नौकरी मिल जाए तो छुट्टी लेते रहना चाहिए. मैं जब नौकरी करता था तो शुरू शुरू में हीरो बना. छुट्टी नहीं लेता था. मुझे लगता था कि इससे मुझे लोग हीरो समझेंगे कि बहुत काम करता है. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. हमारे दफ्तर में साल की करीब तीस पैंतीस छुट्टियां होती थीं. मैं लेता नहीं था छुट्टी. लगता था काम बहुत करूंगा तो लोग पसंद करेंगे. दो साल में बहुत छुट्टी जमा हो गई. फिर एक बार जाकर संपादक से कहा कि मेरी इतनी छुट्टियां बची हुई हैं क्या अब ले लूं तो उन्होंने कहा नियम के अनुसार छुट्टियां तीस मार्च को खतम हो जाती हैं. तो आपकी चालीस छुट्टियां पिछले दो साल की खत्म हैं. मैं बड़ा दुखी हुआ. मैंने बहस की तो उन्होंंने कहा कि आपकी गलती है. हमने तो आपसे कहा नहीं था कि छुट्टियां न लें. आपकी छुट्टी है लेना ही चाहिए. नहीं ली तो आपकी गलती है. उस दिन के बाद मैंने तय कर लिया कि एक एक छुट्टी ज़रूर लेना है दफ्तर में. मैंने उस दिन के बाद मेडिकल वाली छुट्टियां भी ली. थोड़ी भी तबियत खराब रही या मूड नहीं हुआ तो छु्ट्टी ले ली. सालाना छुट्टियां बचा कर लेने लगा. इससे मेरा जीवन बेहतर हो गया. मैं किताब पढ़ने लगा. आर्ट करने लगा. दफ्तर में कई लोग दिन रात काम करते थे. लेकिन काम की कोई बखत नहीं थी. आगे वही बढ़ रहे थे तो जो मक्खन लगा रहे थे. कई लोग थे मेरे दफ्तर में जो सुबह आठ बजे आते और रात के आठ बजे जाते. मैं उनको गरियाता रहता था कि तुम लोग माहौल खराब कर रहे हो. मैं अपने अनुभव के बाद कभी भी समय से अधिक नहीं रूका और सार्वजनिक रूप से कहता रहा कि जो आदमी बिना किसी ब्रेकिंग न्यूज़ के दफ्तर में रूक रहा है समझो वो कामचोर है या नाकारा जो आठ घंटे में अपना काम पूरा नहीं कर पाता है. इससे मक्खनबाज़ों को बहुत दिक्कत हुई और उन्होंने मेरे खिलाफ शिकायतें की कि मैं माहौल खराब कर रहा हूं. लेकिन किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं. मैं इसी तरह से आठ घंटे की शिफ्ट में जितने ब्रेक अलाउड हैं वो भी लेता था. मैं जानता हूं बहुत लोग सीट पर चिपक कर बैठते हैं और दर्शाते हैं कि वो बहुत महान काम कर रहे हैं. मान लीजिए बात. चार पांच साल के बाद कमर में दर्द होगा तो संपादक बोलेगा कि आपकी गलती है. हमारे यहां एक वरिष्ठ थे. उनको डेंगू हुआ. छुट्टियां खत्म हो गईं. बीमारी ने उनके पैरों को कमजोर कर दिया था. हमारे यहां संपादक को अधिकार था कि छुट्टियां बढ़ा दे. संपादक ने बढ़ा दीं. एचआर खच्चर था. उसने पैसे काट लिए. बाद में पैसे वापस हुए क्योंकि संपादक अच्छा था. कहने का मतलब है कि आपको नौकरी में जो अधिकार मिले हैं छुट्टी के वो ज़रूर लीजिए. छुट्टी लेकर आप अहसान नहीं कर रहे हैं. छुट्टी लेंगे तो तरोताजा काम करते रहेंगे तो दफ्तर खुश रहेगा. जो छुट्टी नहीं लेते हैं दफ्तरों में वो मूल रूप से इनसेक्योर और नकारा लोग होते हैं जो कामचोरी करते हैं. हीरो बनने के लिए काम करना चाहिए. छुट्टी कैंसल कर के क्यों हीरो बनना. जब ज़रूरत होती थी तो मैं छुट्टियां कैंसल कर के भी काम पर लौटा हूं. तो ऐसा नहीं है कि दफ्तर में ज़रूरत हो तो मैं टांग पर टांग चढ़ा कर बैठा हूं लेकिन जबरदस्ती दफ्तर जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. एक और महानुभाव थे. जब भी किसी व्यक्ति का निधन होता तो ये आदमी छुट्टी हो तो दफ्तर पहुंच जाता और तीन लोगों से फोन पर बाइट लेकर स्टोरी कर देता और एवज में छुट्टी ले लेता. ये सिलसिला चार पांच बार चला फिर किसी ने संपादक को कहा कि जो काम ये घर से आकर करते हैं वो तो यहां दफ्तर में जो बैठा है वो कर सकता है तो इन्हें बेवजह इस आसान काम की छुट्टी क्यों दी जा रही है. बाइलाइन चाहिए तो घर से कर के भेज दें. संपादक को समझ में आई बात और उनको मना किया गया कि आप दफ्तर आएंगे बिना बुलाए छुट्टी के दिन तो उसकी छुट्टी नहीं मिलेगी. बंदे ने आना तो बंद कर ही दिया फोन वाले इंटरव्यू भी बंद हो गए. यही सब है. सोचा बता दें. छुट्टी की महिमा अपरंपार है. लेते रहना चाहिए. आदमी का जनम नौकरी करने के लिए नहीं हुआ है जीने के लिए हुआ है. नौकरी कर के आज तक कोई महान नहीं हुआ है. बाकी इमेज बनाना हो तो अलग बात है. मोदी जी बिना छुट्टी लिए ही लाल हुए जा रहे हैं. हम भी पीएम होंगे तो कभी छुट्टी नहीं लेंगे. वैसे छुट्टी मनमोहन सिंह भी नहीं लेते थे लेकिन बोलते नहीं थे इस बारे में. खैर आजकल तो बोलना छोड़ो फोटो अपलोड करने का भी चलन है.

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Dakhal News 15 October 2020


bhopal, The roots are very deep in TRP

-श्रवण गर्ग- क्या चिंता केवल यहीं तक सीमित कर ली जाए कि कुछ टीवी चैनलों ने विज्ञापनों के ज़रिए धन कमाने के उद्देश्य से ही अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उस बड़े फ़र्जीवाड़े को अंजाम दिया होगा जिसका कि हाल ही में मुंबई पुलिस ने भांडाफोड़ किया है ? या फिर जब बात निकल ही गई है तो उसे दूर तक भी ले जाया जाना चाहिए ? मामला काफ़ी बड़ा है और उसकी जड़ें भी काफ़ी गहरी हैं। यह केवल चैनलों द्वारा अपनी टीआरपी( टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट )बढ़ाने तक सीमित नहीं है। पूछा जा सकता है कि इस भयावह कोरोना काल में जब दुनियाभर में राष्ट्राध्यक्षों की लोकप्रियता में सेंध लगी पड़ी है, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे चतुर खिलाड़ी भी अपने से एक अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी से ‘विश्वसनीय’ ओपीनियन पोल्स में बारह प्रतिशत से पीछे चल रहे हैं, हमारे यहाँ के जाने-माने मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा करवाए जाने वाले सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी को 66 और राहुल गांधी को केवल आठ प्रतिशत लोगों की पसंद बतलाए जाने का आधार आख़िर क्या है ? मोदी का पलड़ा निश्चित ही भारी होना चाहिए, पर क्या उनके और राहुल के बीच लोकप्रियता का गड्ढा भी अर्नब के ‘रिपब्लिक’ और दूसरे चैनलों के बीच की टीआरपी के फ़र्क़ की तरह ही संदेहास्पद नहीं माना जाए? इस बात का पता कहाँ के पुलिस कमिश्नर लगाएँगे कि प्रभावशाली राजनीतिक सत्ताधारियों की लोकप्रियता को जाँचने के मीटर देश में किस तरह के लोगों के घरों में लगे हुए हैं ? जनता को भ्रम में डाला जा रहा है कि टीआरपी का फ़र्जीवाड़ा केवल विज्ञापनों के चालीस हज़ार करोड़ के बड़े बाज़ार में अपनी कमाई को बढ़ाने तक ही सीमित है। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। दांव पर और कुछ इससे भी बड़ा लगा हुआ है। इसका सम्बंध देश और राज्यों में सूचना तंत्र पर क़ब्ज़े के ज़रिए राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने से भी हो सकता है।देशभर में अनुमानतः जो बीस करोड़ टीवी सेट्स घरों में लगे हुए हैं और उनके ज़रिए जनता को जो कुछ भी चौबीसों घंटे दिखाया जा सकता है, वह एक ख़ास क़िस्म का व्यक्तिवादी प्रचार और किसी विचारधारा को दर्शकों के मस्तिष्क में बैठाने का उपक्रम भी हो सकता है।वह विज्ञापनों से होनेवाली आमदनी से कहीं बड़ा और किसी सुनियोजित राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा हो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्या कोई बता सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले में मुंबई पुलिस को बदनाम करने के लिए हज़ारों (पचास हज़ार ?) फ़ेक अकाउंट सोशल मीडिया पर रातों-रात कैसे उपस्थित हो गए और इतने महीनों तक सक्रिय भी कैसे रहे? इतने बड़े फ़र्जीवाड़े के सामने आने के बाद सत्ता के गलियारों से अभी तक भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने क्यों नहीं आई? सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी अकाउंट क्या देश की किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती या दल के ख़िलाफ़ इसी तरह से रातों-रात प्रकट और सक्रिय होकर ‘लाइव’ रह सकते हैं ? निश्चित ही इतने बड़े काम को बिना किसी संगठित गिरोह की मदद के अंजाम नहीं दिया जा सकता। चुनावों के समय तो ये पचास हज़ार अकाउंट पचास लाख और पाँच करोड़ भी हो सकते हैं !हुए भी हों तो क्या पता ! ‘रिपब्लिक’ या गिरफ़्त में आ गए कुछ और चैनल तो टीवी स्क्रीन के पीछे जो बड़ा खेल चलता है, उसके सामने कुछ भी नहीं हैं। वह खेल और भी बड़ा है और उसके खिलाड़ी भी बड़े हैं। उसके ‘वार रूम्स’ भी अलग से हैं। सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्मों पर नामी हस्तियों के लिए जिस तरह से ‘फ़र्ज़ी’ फ़ॉलोअर्स और ‘लाइक्स’ की ख़रीदी की जाती है, वे चैनलों के फ़र्जीवाड़े से कितनी अलग हैं ? एक प्रसिद्ध गायक (रैपर) द्वारा यू ट्यूब पर अपना रिकार्ड बनाने के लिए फ़ेक ‘लाइक्स’ और ‘फ़ॉलोइंग’ ख़रीदने के लिए बहत्तर लाख रुपए किसी कम्पनी को दिए जाने की हाल की कथित स्वीकारोक्ति, क्या हमें कहीं से भी नहीं चौंकाती ? ऐसी तो देश में हज़ारों हस्तियाँ होंगी, जिनके सोशल मीडिया अकाउंट बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही संचालित करती हैं और इसी तरह से उनके लिए ‘नक़ली फ़ालोअर्स’ की फ़ौज भी तैयार की जाती है। सवाल यह भी है कि एक ख़ास क़िस्म की विचारधारा, दल विशेष या व्यक्तियों को लेकर सच्ची-झूठी ‘खबरों’ की शक्ल में अख़बारों तथा पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्लांट’ की जाने की सूचनाएँ और उपलब्धियाँ दो-तीन या ज़्यादा चैनलों द्वारा टीआरपी बढ़ाने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों से कितनी भिन्न हैं ? सरकारें अपने विकास कार्यों की संदेहास्पद उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती हैं और मीडिया संस्थानों में उन्हें लपकने के लिए होड़ मची रहती है।राज्यों में मीडिया (पर नियंत्रण) के लिए विज्ञापनों का बड़ा बजट होता है, जिस पर पूरी निगरानी ‘ऊपर’ से की जाती है। लिखे, छपे, बोले और दिखाए जाने वाले प्रत्येक शब्द और दृश्य की कड़ी मॉनीटरिंग होती है और उसी से विज्ञापनों की शक्ल में बाँटी जाने वाली राशि तय होती है। बताया जाता है कि ‘ सुशासन बाबू ‘ के बिहार में सूचना और जन-सम्पर्क विभाग का जो बजट वर्ष 2014-15 में लगभग 84 करोड़ था, वह पाँच सालों (2018-19) में बढ़कर 133 करोड़ रुपए से ऊपर हो गया।चालू चुनावी साल का बजट कितना है अभी पता चलना बाक़ी है।अनुमानित तौर पर इतनी बड़ी राशि का साठ से सत्तर प्रतिशत प्रचार-प्रसार माध्यमों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर खर्च होता है।हाल में सरकार की ‘उपलब्धियों’ का नया वीडियो भी जारी हुआ है और वह ख़ूब प्रचार पा रहा है। कोई भी चैनल या प्रचार माध्यम, जिनमें अख़बार भी शामिल है, कभी यह नहीं बताता या स्वीकार करता कि पिछले साल भर, महीने या सप्ताह के दौरान कितनी अपुष्ट और प्रायोजित खबरें प्रसारित-प्रकाशित की गईं, कितने लोगों और समुदायों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई गई, साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने में क्या भूमिका निभाई गई ! तब्लीगी जमात को लेकर जो दुष्प्रचार किया गया, वह तो अदालत के द्वारा बेनक़ाब हो भी चुका है।दिल्ली के दंगों में मीडिया की भूमिका का भी आगे-पीछे खुलासा हो जाएगा। एक चैनल पर बहस के बाद एक राजनीतिक दल से जुड़े प्रवक्ता की मौत ने क्या एंकरों की भाषा, ज़ुबान और आत्माएँ बदल दी हैं या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है ? कोरोना सहित बड़े-बड़े मुद्दों को दबाकर महीनों तक केवल एक अभिनेत्री और उसके परिवार को निशाने पर लेने का उद्देश्य क्या हक़ीक़त में भी सिर्फ़ अपनी टीआरपी बढ़ाना था या फिर उसके कोई राजनीतिक निहितार्थ भी थे? ‘रिपब्लिक‘ चैनल या अर्नब जैसे ‘पत्रकार/एंकर’ कभी भी अकेले नहीं पड़ने वाले हैं ! न ही मुंबई पुलिस द्वारा पर्दाफ़ाश किए गए किसी भी फ़र्ज़ीवाड़े में किसी को भी कभी कोई सजा होने वाली है।मारने वालों से बचाने वाले के हाथ काफ़ी लम्बे और बड़े हैं। देश के जाने माने पत्रकार श्रवण गर्ग की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 15 October 2020


bhopal,Ravish Kumar, jumps on all ,other channels , soon , gets a chance!

-समरेंद्र सिंह- आत्मश्लाघा में डूबा हुआ कोई भी जीव.. रवीश कुमार बन जाता है! रवीश कुमार को मौका मिलना चाहिए फिर वो बाकी सारे चैनलों पर कूद पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि सारे चैनल मिल कर उनके खिलाफ साजिश करते हैं। एनडीटीवी और उनके कार्यक्रम प्राइम टाइम की टीआरपी साजिश के तहत ही कम की गई है। और चैनलों की इस साजिश में मोदी सरकार भी शामिल है। उन्हें ये भी लगता है कि वो रोज रोज ऐतिहासिक भाषण देते हैं और इतना ऐतिहासिक कि सारी पब्लिक बस उन्हें ही देखती और सुनती है। मगर साजिशन सौ में दो नंबर दिए जाते हैं। यहां सवाल उठता है कि उनकी टीआरपी तो मनमोहन सरकार में भी रसातल में थी। तो क्या मनमोहन सिंह भी एनडीटीवी के पीछे पड़े थे? एनडीटीवी तो मनमोहन सिंह का अपना चैनल था। प्रणव रॉय के मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से बहुत अच्छे संबंध थे। उस दौर में राष्ट्रपति भी उनके अपने ही थे। राष्ट्रपति भवन में एनडीटीवी का जलसा होता था और उस जलसे में सारे कांग्रेसी नेता शामिल होते थे। तो क्या एनडीटीवी की चरण वंदना से खुश होने की जगह सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह नाराज रहते थे? इतने नाराज कि उन्होंने एनडीटीवी की टीआरपी गिरवा दी थी? दरअसल एनडीटीवी में कुछ अपवादों को छोड़ कर सारे के सारे शेखचिल्ली हैं। लेढ़ा और ढकलेट हैं। टीवी क्या होता है उन्हें पता ही नहीं, न्यूज भी नहीं पता। बस भाषण देना जानते हैं इसलिए सब के सब भाषण देते हैं। कोई स्टूडियो में भाषण देता है कोई सड़क से मोबाइल के जरिए भाषण देता है। खबर कोई नहीं करता। खबर द वायर वाले करें, क्विंट वाले करें। इंडियन एक्सप्रेस करे और द हिंदू करे। कोई भी कर ले, मगर ये खबर नहीं करेंगे। बस दूसरों की खबरों पर भाषण देंगे। फिर भी रवीश कुमार को लगता है कि इनकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी से भी अधिक है और पब्लिक सिर्फ इनके कार्यक्रम प्राइम टाइम का इंतजार करती है। अरे भई, यहां तो खुद बीजेपी वाले अपने युगपुरुष नरेंद्र मोदी के भाषण से उकता गए हैं। एक ही बात कितने दिन सुनें और क्यों सुनें? कोई आदमी मिठाई भी रोज रोज खाएगा तो उकता जाएगा या फिर डायबिटीज से मर जाएगा। रवीश कुमार को ये भी लगता है कि इनके जलवों में माधुरी दीक्षित और सलमान खान से अधिक जादू है। और पब्लिक इनके पीछे पागल है। इनकी अदाओं के देखने के लिए इनके चैनल की स्क्रीन से चिपकी रहती है। अगर दूसरे चैनल वाले और सरकार साजिश नहीं रचती तो ये हर रोज नया इतिहास रच देते। सरकारें बनाते और गिराते। आत्मश्लाघा में डूबा हुआ जीव ऐसा ही होता है। वो रवीश कुमार हो जाता है। उसे हर जगह मैं ही मैं दिखता है।

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, If JP were today, how many people, would have supported him?

-श्रवण गर्ग- लोक नायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की आज पुण्यतिथि है और तीन दिन बाद ग्यारह अक्टूबर को उनकी जयंती ।सोचा जा सकता है कि वे आज अगर हमारे बीच होते तो क्या कर रहे होते ! 1974 के ‘बिहार आंदोलन’ में जो अपेक्षाकृत छोटे-छोटे नेता थे, आज वे ही बिहार और केंद्र की सत्ताओं में बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियाँ हैं। कल्पना की जा सकती है कि जेपी अगर आज होते और 1974 जैसा ही कोई आह्वान करते (‘सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है ‘) तो कितने नेता अपने वर्तमान शासकों को छोड़कर उनके साथ सड़कों पर संघर्ष करने का साहस जुटा पाते ! ऐसा कर पाना शायद उस जमाने में काफ़ी आसान रहा होगा ! चौबीस मार्च, 1977 को मैं उस समय दिल्ली के राजघाट पर उपस्थित था, जब एक व्हील चेयर पर बैठे हुए अस्वस्थ जेपी को गांधी समाधि पर जनता पार्टी के नव-निर्वाचित सांसदों को शपथ दिलवाने के लिए लाया गया था। वर्तमान की मोदी सरकार में शामिल कुछ हस्तियाँ भी तब वहाँ प्रथम बार निर्वाचित सांसदों के रूप में मौजूद थीं। जेपी के पैर पर पट्टा चढ़ा हुआ था।आग्रह किया जा रहा था कि उनके पैरों को न छुआ जाए। वह दृश्य आज भी याद आता है, जब भीड़ के बीच से निकल कर उनके समीप पहुँचने के बाद मैंने उन्हें प्रणाम किया तो वे हलके से मुस्कुराए और मैं स्वयं को रोक नहीं पाया … उनके पैरों के पास पहुँचकर हल्के से स्पर्श कर ही लिया।उन्होंने मना भी नहीं किया। जेपी ने (और शायद दादा कृपलानी ने भी) सांसदों को यही शपथ दिलवाई थी कि वे गांधी का कार्य करेंगे और अपने आप को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करेंगे।राजघाट पर हज़ारों लोगों की उपस्थिति थी।अभिनेता देव आनंद भी वहाँ पहुँचे थे।प्रशंसकों ने उन्हें अपने पैर ज़मीन पर रखने ही नहीं दिए।अपने कंधों पर ही उन्हें बैठाकर पूरे समय घुमाते रहे।शत्रुघ्न सिन्हा भी शायद वहाँ थे। अदभुत दृश्य था। राजघाट की शपथ के बाद के दिनों में दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में जे पी की उपस्थिति में ही सत्ता के बँटवारे को लेकर बैठकों का जो दौर चला उसका अपना अलग ही इतिहास है। राजघाट की आशाभरी सुबह के कोई ढाई वर्षों के बाद आज के ही दिन जेपी ने देह त्याग कर दिया।वे भी तब उतने ही निराश रहे होंगे जैसे कि आज़ादी प्राप्ति के बाद गांधी जी रहे होंगे। कांग्रेस, बापू को और जनता पार्टी जेपी को जी नहीं पाईं। जेपी के निधन तक उनका जनता पार्टी का प्रयोग उन्हें धोखा दे चुका था। याद पड़ता है कि जेपी को सबसे पहले राजगीर(बिहार) में 1967 के सर्वोदय सम्मेलन में दूर से देखने का अवसर मिला था।तब तक उनके बारे में केवल सुन-पढ़ ही रखा था।जेपी की देखरेख में ही सम्मेलन की सारी तैयारियाँ हुईं थीं।दलाई लामा भी उसमें आए थे।संत विनोबा भावे तो उपस्थित थे ही, पर जेपी के विराट स्वरूप को पहली बार नज़दीक से देखने का मौक़ा अप्रैल 1972 में मुरैना के जौरा में हुए चम्बल घाटी के दस्युओं के आत्म-समर्पण और फिर उसके अगले माह बुंदेलखंड के दस्युओं के छतरपुर के निकट हुए दूसरे आत्म समर्पण में मिला था। उनका जो स्नेह उस दौरान प्राप्त हुआ, वही बाद में मुझे 1974 में बिहार आंदोलन की रिपोर्टिंग के लिए पटना ले गया।तब मैं दिल्ली में प्रभाष जोशी जी और अनुपम मिश्र के साथ ‘सर्वोदय साप्ताहिक’ के लिए काम करता था। पटना गया था केवल कुछ ही दिनों के लिए पर जे पी ने अपने पास ही रोक लिया उनके कामों में मदद के लिए। पटना में तब जेपी के कदम कुआ स्थित निवास स्थान पर केवल एक ही कमी खटकती थी और वह थी प्रभावती जी की अनुपस्थिति की। वे 15 अप्रैल, 1973 को जेपी को अकेला छोड़कर चली गईं थीं। जे पी और प्रभावती जी के साथ केवल दो ही यात्राओं की याद पड़ती है।पहली तो तब की जब अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी के विमान में दोनों को लेने लिए दिल्ली से पटना गया था और वहाँ से हम तीनों बुंदेलखंड के दस्युओं के आत्म समर्पण के लिए खजुराहो के हवाई अड्डे पर पहुँचे थे। दूसरी बार (शायद) उसी वर्ष किसी समय जेपी और प्रभावती जी के साथ रेल मार्ग द्वारा दिल्ली से राजस्थान में चूरू की यात्रा और वहाँ से वापसी। चूरू में तब अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी की पुस्तक ‘अग्नि परीक्षा’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। जेपी के मित्र प्रभुदयाल जी डाबरीवाला लोक नायक को आग्रह करके चूरू ले गए थे, जिससे कि वहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित हो सके। जेपी ने कहलवाया कि मुझे उनके साथ चूरू की यात्रा करनी है और मैं तुरंत तैयार हो गया। चूरू की वह शाम भूले नहीं भूलती है, जब जे पी ने पूछा था उनके साथ टहलने हेतु जाने के लिए … और मैं भाव-विभोर हो चूरू के एकांत में उस महान दम्पति के साथ घूमने चल पड़ा था।तब दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र बाँटे जा रहे थे। मैंने उनसे इस दौरान किए गए कई सवालों के बीच यह भी पूछ लिया था कि:’ क्या सरकार आपको स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती ?’ जेपी शायद कुछ क्षण रुके थे फिर धीमे से सिर्फ़ इतना भर कहा कि :’हो सकता है, शायद ऐसा ही हो।’ मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने तब जेपी से कितने सवाल किए होंगे और उन्होंने क्या जवाब दिए होंगे।क्योंकि मैं तो उस समय अपने इतने निकट उनकी आत्मीय उपस्थिति के आभा मण्डल में ही पूरी तरह से खो गया था।जिस तरह से गांधी नोआख़ली में दंगों को शांत करवाकर चुपचाप दिल्ली लौट आए थे, वैसे ही जेपी भी चूरू से लौट आए। मुझे अच्छे से याद है कि हम दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर चूरू जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े थे। जेपी थे, प्रभावती जी थीं, उनके सहायक गुलाब थे और मैं था।शायद प्रभुदयाल जी भी रहे हों। लम्बे प्लेटफ़ार्म पर काफ़ी लोगों की उपस्थिति के बावजूद कोई जेपी को बहुत विश्वास के साथ पहचान नहीं पा रहा था।उनकी तरफ़ लोग देख ज़रूर रहे थे।हो सकता है कि किसी को उनके वहाँ इस तरह से उपस्थित होने का अनुमान ही नहीं रहा होगा। पर जेपी के चेहरे पर किसी भी तरह की अपेक्षा या उपेक्षा का भाव नहीं था।वे निर्विकार थे।बेचैनी मुझे ही अधिक थी कि ऐसा कैसे हो रहा है ! याद पड़ता है कि सर्वोदय दर्शन के सुप्रसिद्ध भाष्यकार दादा धर्माधिकारी ने एक बार जेपी को संत और विनोबा को राजनेता निरूपित किया था।ऐसा सच भी रहा हो ! स्मृतियाँ तो कई और भी हैं पर फिर कभी। जेपी की स्मृति को प्रणाम ।

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, China has shown ,right to impart knowledge , Indian media!

-अंकित माथुर-   ताइवान के विदेश मंत्री जोसेफ वू ने बुधवार को भारत स्थित चीनी मिशन द्वारा भारतीय मीडिया को जारी की गई मीडिया अड्वाइज़री के विषय में प्रतिक्रिया देते हुए चीनी मिशन को “भाड़ में जाने” (Get Lost) की नसीहत दे डाली। 10 अक्टूबर को ताइवान के राष्ट्रीय दिवस से पहले, दिल्ली में चीनी मिशन ने भारतीय मीडिया को लिखा और ताइवान को “राष्ट्र” के रूप में संदर्भित अथवा संबोधित नहीं करने का आह्वान किया। पत्र में चीनी मिशन ने कहा, हम अपने भारतीय मीडिया मित्रों को याद दिलाना चाहेंगे कि दुनिया में एक चीन है और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार पूरी चीन की एकमात्र वैध सरकार है। ताइवान चीन का एक अटूट व अभिन्न हिस्सा है। चीन के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले सभी देशों को वन-चाइना नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करना चाहिए, जो कि भारत सरकार लंबे समय से करती आ रही है। चीन का मानना है कि भारतीय मीडिया ताइवान के सवाल पर भारत सरकार की आधिकारिक स्थिति पर ही रिपोर्टिंग करे। भारतीय मीडिया को ताइवान को “देश” या “रिपब्लिक ऑफ चाइना” के रूप में रिपोर्ट नहीं करने के लिए हिदायत दी गई है। चीन द्वारा दी गई अडवाइज़री में स्पष्ट किया गया है, कि राष्ट्रपति के रूप में या ताइवान अध्यक्ष त्साई इंग-वेन के रूप में कोई भी संबोधन भारत या विश्व की आम जनता के अंदर चीन की ताइवान के प्रति नीति को लेकर गलत संकेत भेज सकता है। इस अड्वाइज़री के बाद भारतीय मीडिया में अव्यक्त रोष अवश्य है। परंतु मुखर होकर दिखाई नहीं दे रहा। पत्रकार अंकित माथुर की रिपोर्ट  

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal,Senior journalist dies from Corona

भोपाल। गंजबासौदा (विदिशा) के वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव का बीती रात निधन हो गया है। कोरोना संक्रमण के बाद उनका राजधानी के अस्पताल में उपचार चल रहा था। श्री यादव पत्रकारिता और वन्य प्राणी संरक्षण के कार्य में दशकों से साधक की तरह जुटे रहे । श्री यादव को सरोकारों की पत्रकारिता के लिए देश दुनिया में पहचाना गया है। वन्य प्राणियों और वन संपदा के संरक्षण के लिए श्री यादव ने कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया है। अपने सम्पादकीय उच्च स्तर और विचार की गुणवत्ता के कारण इन डाक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मान और पुरस्कार से नवाजा गया है। मूलतः गंजबसौदा निवासी अनिलजी ने पत्रकारिता के साथ अन्तर्राष्टीय स्तर पर पर्यावरण व जीव बचाव की चिंता को रेखांकित करते रहे। इनका असमय चला जाना अपूरणीय क्षति है। परमपिता परमात्मा दिवंगत आत्मा को श्रीचरणो में स्थान दे।

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal,Navodaya Vidyalaya ,alumni donated ,16 Samsung smart phones

कोरोना काल ने डिजिटलाइजेशन को इस कदर बढ़ाया कि पढ़ाई-लिखाई भी अब आनलाइन होने लगी है. इससे बड़ा संकट उन छात्रों के समक्ष आ गया है जो गरीब घरों से हैं. खासकर नवोदय विद्यालय में पढ़ने वाले ज्यादातर होनहार छात्रों का बैकग्राउंड ऐसा नहीं होता कि उनके परिजन उन्हें मोबाइल फोन दे सकें. इसी कष्ट को देखते हुए नवोदय विद्यालय से पढ़कर अलग अलग क्षेत्रों में नाम रोशन कर रहे पूर्व छात्रों ने एक पहल की. इनने स्मार्ट फोन खरीदे और नवोदय विद्यालय में पढ़ रहे गरीब बच्चों में वितरित कर दिया. खबर यूपी के जिला गाजीपुर से है. जवाहर नवोदय विद्यालय गाजीपुर से पढ़े पूर्व छात्रों ने वर्तमान में पढ़ रहे छात्रों को 16 स्मार्ट फोन की सहायता दी. इससे अब ये छात्र आनलाईन अध्ययन अच्छे ढंग से कर सकेंगे. जवाहर नवोदय विद्यालय गाजीपुर के परिसर में आनलाईन पढ़ाई में आ रही परेशानी को देखते हुए यहीं के पूर्व छात्रों ने आज दिनांक 04/10/2020 को अपने अनुज छात्रों के संकट का हल कर दिया. इन पूर्व छात्रों ने 16 स्मार्ट फोन का वितरण किया. प्राचार्य महोदय डा. इकरामुद्दीन सिद्दीकी ने पूर्व छात्रों की इस दानवीरता की प्रशंसा की और उन्हें नेक काम के लिए धन्यवाद दिया. इस कार्य में श्रीमती निर्मला कश्यप सक्रिय रहीं। इनके निर्देशन में पूर्व छात्र संजय, आनन्द, डा0 अनिल, शिवबचन, विवेक, उपेन्द्र, अजहर एवं जितेन्द्र ने अन्य छात्रों से सहयोग लेकर 16 सैमसंग स्मार्ट फोन विद्यालय को प्रदान किया। इसको आज प्राचार्य की अध्यक्षता में छात्र एवं छात्राओं में वितरित किया गया। ये स्मार्ट फोन उन्हीं बच्चों को दिया गया जो फोन न होने के अभाव में अभी तक आन लाईन अध्ययन नहीं कर पा रहे थे। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षक वीपी दूबे, श्री सतीश कुमार पाण्डेय, श्री मनीष कुमार जायसवाल, श्री एसके मिश्रा, श्रीमती निर्मला कश्यप, श्रीमती सुशीला देवी, श्री कमल कुमार, एसके बिन्द, श्री उमेश कुमार श्रीवास्तव समाजसेवी गाजीपुर एवं अन्य छात्र तथा अभिभावकगण उपस्थित थे।

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal, Lata Mangeshkar , poem of nature written,inscription of Khushbu

-श्रवण गर्ग– लता जी पर मैंने कोई बीस-इक्कीस वर्ष पहले एक आलेख लिखा था ।अवसर था इंदौर में ‘माई मंगेशकर सभागृह ‘के निर्माण का ।उसमें मैंने लता जी के साथ उसके भी सोलह वर्ष पूर्व(1983) इंदौर की एक होटल में तब उनके साथ हुई भेंटवार्ता का ज़िक्र किया था ।उस आलेख का शीर्षक दिया था ‘ख़ुशबू के शिलालेख पर लिखी हुई प्रकृति की कविता’।आलेख की शुरुआत कुछ इस तरह से की थी :’लता एक ऐसी अनुभूति हैं जैसे कि आप पैरों में चंदन का लेप करके गुलाब के फूलों पर चल रहे हों और प्रकृति की किसी कविता को सुन रहे हों।’ अपने बचपन के शहर इंदौर की उनकी यह आख़िरी सार्वजनिक यात्रा थी।(वे बाद में कोई पंद्रह साल पहले स्व.भय्यू महाराज के आमंत्रण पर उनके आश्रम की निजी आध्यात्मिक यात्रा पर इंदौर आयीं थीं)।इंदौर और उसका प्रसिद्ध सराफा बाज़ार उनकी यादों में हमेशा बसा रहता है जिसका कि वे मुंबई में भी ज़िक्र करती रहतीं हैं। वर्ष 1983 की इस मुलाक़ात के बाद लता जी से फ़ोन पर कोई बारह-तेरह साल पहले बात हुई थी।तब मैंने ‘दैनिक भास्कर’ के एक आयोजन में समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था और उन्होंने अपने ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए असमर्थता व्यक्त कर दी थी।उनकी 1983 की इंदौर यात्रा कई मायनों में अविस्मरणीय कही जा सकती है।मैं तब ‘नई दुनिया’ हिंदी दैनिक को छोड़ देने के बाद अंग्रेज़ी दैनिक ‘फ़्री प्रेस जर्नल’ के साथ काम कर रहा था। लता जी तब इंदौर के एकमात्र अच्छे होटल श्रीमाया में वे ठहरी हुईं थीं। मैं उनके साथ जिस समय चर्चा कर रहा था ,उनके नाम के साथ जुड़कर होने जा रहे लता मंगेशकर समारोह का तब के बहुत बड़े कांग्रेस नेता स्व.सुरेश सेठ विरोध कर रहे थे। सेठ साहब का विरोध लता जी के प्रति नहीं बल्कि समारोह के आयोजक समाचार पत्र (नई दुनिया) के प्रति था।सेठ साहब का विरोध अपनी चरम सीमा पर था।होटल के बाहर काफ़ी हलचल थी ।ख़ासा पुलिस बंदोबस्त था।अर्जुन सिंह तब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।सेठ साहब(शायद) उनकी सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी थे। बहरहाल, श्रीमाया होटल के अपने छोटे से कमरे में प्रशंसकों से घिरी हुईं स्वर साम्राज्ञी के चेहरे पर बाहर जो कुछ चल रहा था उसके प्रति कोई विक्षोभ नहीं था।मन अंदर से निश्चित ही दुखी हो रहा होगा।मैं सवाल पूछता गया और वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ जवाब देती रहीं।वे जब तक जवाब देतीं ,सोचना पड़ता था कि अगला प्रश्न क्या पूछा जाए।लता जी को जैसे पहले से ही पता चल जाता था कि आगे क्या पूछा जाने वाला है।वे जानतीं थीं कि दुनिया भर के पत्रकार एक जैसे ही सवाल पूछते हैं।प्रत्येक साक्षात्कार का पहला सवाल भी यही होता है कि आपको यहाँ (इंदौर) आकर कैसा लग रहा है ? इतने वर्षों के बाद सोचता हूँ कि इंदौर की बेटी को उसके शहर में आकर कैसा लगा होगा ,क्या यह भी कोई पूछने की बात थी ? शायद इसलिए थी कि उन्हें अपने ही गृह-नगर में इस तरह के विरोध की उम्मीद नहीं रही होगी।और निश्चित ही डरते-डरते पूछा गया आख़िरी सवाल भी वही था जो उनसे लाखों बार पूछा गया होगा :’आप पर आरोप लगता रहता है कि आप नयी गायिकाओं को आगे बढ़ने का मौक़ा नहीं देतीं ?’ चेहरे पर कोई शिकन नहीं।हरेक सवाल का जवाब वैसे ही दे दिया जैसे किसी ने निवेदन कर दिया हो कि अपनी पसंद का कोई गाना या भजन गुनगुना दीजिए।और फिर एक खिलखिलाहट ,पवित्र मुस्कान जिसके सामने आगे के तमाम प्रश्न बिना पूछे ही ख़त्म हो जाते हैं। भारत के ख्यातिप्राप्त क्रांतिकारी कवि, साहित्यकार और अपने जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका ‘कर्मवीर’ के सम्पादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी से मैं उनके निधन (30 जनवरी,1968) के पहले खंडवा में जाकर मिला था।वे उन दिनों वहाँ एक अस्पताल में भर्ती थे।बातों ही बातों में उन्होंने लता जी का ज़िक्र किया ।उनका कहना था कि ‘ईथर वेव्ज़’ के रूप में लता(जी) आज हमारे चारों ओर उपस्थित हैं। उनके कहने का आशय था कि हमारे हृदय में अगर रेडियो की तरह कोई रिसीवर हो तो हम चौबीसों घंटे हर स्थान पर सुनते रह सकते हैं।स्वर साम्राज्ञी के प्रति इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता था ! थोड़े दिनों बाद उक्त वार्ता मैंने माखनलाल जी के अभिन्न सहयोगी रहे प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार स्व. रामचंद्र जी बिल्लोरे को इंदौर में सुनाई।वे तब इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। डॉ.बिल्लोरे ने लता जी के प्रति माखनलाल जी के स्नेह और सम्मान का एक और प्रसंग याद करके मुझे बताया : ‘दादा (माखनलाल जी) के बैठक कक्ष में दीवार पर दो तस्वीरें लगी हुईं थीं ।इनमें एक महात्मा गांधी की थी और दूसरी किसी अन्य महापुरुष की थी।एक स्थान ख़ाली था।दादा से पूछा गया कि ख़ाली स्थान पर वे किसकी तस्वीर लगाएँगे तो उन्होंने जवाब दिया था कि लता मंगेशकर की।’ मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार विजय तेंडुलकर ने लता जी के बारे में एक बार कहा था :’लड़की एक रोज़ गाती है ।गाती रहती है-अनवरत।यह जगत व्यावहारिकता पर चलता है ,तेरे गीतों से किसी का पेट नहीं भरता। फिर भी लोग सुनते ही जा रहे हैं पागलों की तरह।’ और लताजी गाए ही जा रही हैं-बिना रुके ,बिना थके।और लोग सुनते ही जा रहे हैं ,पागलों की तरह। लता जी को उनके जन्मदिन पर कोटिशः प्रणाम। श्रवण गर्ग देश के वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं.

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Dakhal News 30 September 2020


mumbai, RK Sinha, punishing media persons ,

इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार में हाहाकार मचा हुआ है। सैकड़ों कर्मचारी निकाले जा चुके हैं और बचे कर्मचारी वेतन के लिए विलाप कर रहे हैं। हिन्दुस्थान समाचार के चेयरमैन आरके सिन्हा ने पत्रकारों को पिछले चार महीने की सैलरी नहीं दी है। उनको दूसरी बार भाजपा द्वारा राज्यसभा न भेजे जाने के कारण वो नाराज हैं। यह नाराजगी वो हिन्दुस्थान समाचार के कर्मचारियों पर निकाल रहे हैं। सिन्हा इन दिनों संघ से इतने नाराज हैं कि उनके बड़े पदाधिकारियों को भी इग्नोर कर रहे हैं। संपादकीय टीम व संघ सिन्हा से सैलरी के लिए गिड़गिड़ा रहा है, इसके बाद भी सिन्हा अपने देहरादून की कोठी में सपरिवार आनंद ले रहे हैं। हिन्दुस्थान के कर्मचारी अपने बच्चों के दूध के पैसे नहीं जुटा पा रहे हैं। मकान का किराया नहीं दे पा रहे हैं। फीस, कॉपी, दवा नहीं जुटा पा रहे हैं। इसके बावजूद संस्थान के शीर्ष पदाधिकारियों पर कोई असर नहीं है। आखिर जब चार महीने का वेतन न मिला हो तो कर्मचारी कैसे जिन्दा हैं, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वहीं सिन्हा का कहना है कि उन्होंने संस्थान को बहुत कुछ दिया, संघ की खूब सेवा की। पर उन्हें बदले में न राज्यसभा मिली और न राज्यपाल बनाए गए। इन दिनों सिन्हा के सुर बदले हैं। वो बिहार राजनीति में भाजपा से इतर अपना नया ठिकाना तलाश रहे हैं। हालांकि पार्टी विरोधी गतिविधि वो लोकसभा चुनाव में भी कर चुके हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। सिन्हा का राजनैतिक रसूख इतना है कि उनकी सिक्योरिटी कंपनी दिन प्रतिदिन कमाई दोगुनी कर रही है। हर सरकारी जगह पर उनकी सिक्योरिटी एजेंसी को मौका दिया जा रहा। वहीं पत्रकार बंधु रोड पर आने को मजबूर हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि अब वेतन पाने के लिए केवल आमरण अनशन ही बचा है। हिन्दुस्थान समाचार के हालात अब लावारिश जैसे हैं। क्योंकि अब कर्मचारियों की पीड़ा का निदान तो दूर कोई महसूस करने वाला भी नहीं है। (छोटा कर्मचारी हूँ। इसलिए विनम्र निवेदन है कि पहचान गुप्त रखी जाए) एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Dakhal News 30 September 2020


bhopal, Has India become a police state?

एस आर दारापुरीआईपीएस (सेवानिवृत्त) लेखक, स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल ज़िब्लाट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई: व्हाट हिस्ट्री रिवीलज़ फ़ॉर फ्यूचर” में कहा है कि “डेमोक्रेसी तख्तापलट के साथ मर सकती हैं- या वे धीरे-धीरे मर सकती हैं। यह एक भ्रामक रूप में धीरे धीरे होता है, एक तानाशाह नेता के चुनाव के साथ, सरकारी सत्ता का दुरुपयोग और विपक्ष का पूर्ण दमन। ये सभी कदम दुनिया भर में उठाए जा रहे हैं- कम से कम डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव के साथ- और हमें समझना चाहिए कि हम इसे कैसे रोक सकते हैं। ” अब अगर हम अपने देश को देखें तो यह उतना ही सत्य प्रतीत होता है जितना कि अमेरिका में। क्या उपरोक्त सभी घटनाएँ भारत में नहीं हो रही हैं? एक तानाशाह नेता और विपक्ष के पूर्ण दमन के रूप में मोदी के चुनाव के अलावा, सरकारी सत्ता का दुरुपयोग बहुत स्पष्ट है। सरकारी शक्तियों के बीच पुलिस किसी भी सरकार के हाथों में सबसे शक्तिशाली साधन है। वास्तव में इसे राज्य की शक्ति का डंडा कहा जाता है। सामान्य तौर पर, पुलिस को कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराध को रोकने, अपराध की जांच करने और अपने अधिकारों के प्रयोग करने वाले लोगों की रक्षा करने के लिए एक उपकरण कहा जाता है। लेकिन यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि अक्सर राज्य द्वारा पुलिस को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ताकि विपक्ष और नागरिकों को दबाया जा सके, जो सरकार की नीतियों और कार्यों के साथ इत्तफाक नहीं रखते हैं। इस लिए सरकार पुलिस को अधिक से अधिक शक्तियां देना चाहती है। इसलिए धीरे धीरे लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने सत्ता पक्ष यानी पुलिस के सहारे एक अधिनायकवादी संगठन में बदल जाती है। राज्य के अन्य संस्थान भी एक सत्तावादी मोड में बदल दिये जाते हैं। अंत में लोकतांत्रिक राज्य एक पुलिस राज्य बन जाता है।   अब अगर हम अपने देश को देखें तो हमें पता चलता है कि 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से राज्य अधिक से अधिक तानाशाही होता जा रहा है। हर भाजपा शासित राज्य में पुलिस को अधिक से अधिक शक्तियां दी गई हैं और न केवल अपराधियों या कानून तोड़ने वालों के साथ बल्कि असंतुष्टों और राजनीतिक विरोधियों के साथ कठोर व्यवहार करने के लिए खुली छूट दी गयी है। सामान्य दंड वाले प्रावधानों के साथ यूएपीए और एनएसए जैसे कठोर कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि यूएपीए और एनएसए के तहत बहुत बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को बुक किया गया है। भीमा कोरेगांव मामला इसका एक भयानक उदाहरण है। गुजरात और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां पुलिस का दमन सबसे क्रूर है। उत्तर प्रदेश में योगी ने पुलिस को “ऑपरेशन ठोक दो” यानी अपराधियों पर कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हाथ दिया है। राज्य ने 5000 से अधिक मुठभेड़ों को अंजाम दिया है जिसमें 100 से अधिक लोग मारे गए हैं और बहुत बड़ी संख्या में टांग या पैरों में गोली मारी गयी है। निस्संदेह मारे गए और घायलों की अधिकतम संख्या मुसलमानों के बाद दलितों और सबसे पिछड़े वर्ग के लोगों की है। राज्य नीति के रूप में किए गए मुठभेड़ों के गुजरात मॉडल का ईमानदारी से पालन किया जा रहा है, यहां तक ​​कि कभी-कभी उत्तर प्रदेश में उससे अधिक भी। एक बहुत बड़ी संख्या में व्यक्तियों को एनएसए के तहत जेल में रखा गया है। आपातकाल के दौरान संख्या इससे कम हो सकती है। यहाँ भी मुसलमानों और दलितों का अनुपात मुठभेड़ों की तरह ही अधिक है। वर्तमान में हम कोरोना संकट का सामना कर रहे हैं। कोविड-19 संक्रमण के कारण न केवल लोगों की मौत हो रही है, बल्कि वे महामारी को नियंत्रित करने के नाम पर राज्य द्वारा दमन का सामना भी कर रहे हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि एक कानून “महामारी रोग अधिनियम, 1897 के रूप में जाना जाता है जो कि विभिन्न महामारियों के दौरान अब तक इस्तेमाल किया गया है। इस अधिनियम में केवल 4 धाराएं थीं। इस अधिनियम के तहत जारी किए गए सरकारी आदेशों के उल्लंघन के लिए, धारा 3 में एक माह की जेल की अधिकतम सजा और रुo 200 जुर्माना था. लेकिन मार्च में मोदी सरकार ने कोरोना वारियर्ज़ को साधारण चोट पहुँचाने के लिए इसमें 3 महीने से 5 साल तक की कैद की अधिकतम सजा और 50,000 से 2 लाख रुo तक का जुर्माना होने का संशोधन किया है। गंभीर चोट के मामले में 6 महीने से 7 साल तक की कैद और 2 लाख से 5 लाख रुपये का जुर्माना। इसके अलावा संपत्ति को नुकसान की कीमत की दुगनी लागत पर वसूली का प्रावधान है। इससे आप देख सकते हैं कि ब्रिटिश और पिछली सरकारें बहुत मामूली सजा से महामारी के खतरे से निपट सकती थीं लेकिन मोदी सरकार ने इसे बहुत कठोर दंड के रूप में बढ़ाया है। इसका उद्देश्य आम आदमी को आतंकित करना है। मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि हमें संकट को अवसर में बदलना चाहिए। लेकिन कोरोना महामारी से लड़ने के उपायों को बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करने के बजाय, उनकी सरकार ने जनता को आतंकित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया है। पुलिस द्वारा सताए जा रहे प्रवासी मजदूरों के दृश्य राज्य के आतंक और दुखी नागरिकों के प्रति अमानवीयता के उदाहरण हैं। इसी तरह दिसंबर में उत्तर प्रदेश में सीएए / एनआरसी प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी हजारों की संख्या में हुई, जिसमें 21 लोग मारे गए लेकिन पुलिस ने इससे इनकार करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनकारियों की आपसी गोलीबारी से हुयी हैं. इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि असंतोष की आवाज को कुचलने के लिए पुलिस की ताकत का कैसे इस्तेमाल किया गया है। फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में पुलिस न केवल हमलावरों से मिली रही, बल्कि अब उसने पीड़ितों को ही आरोपी बना दिया है। सीएए / एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ यूएपीए का कड़ा कानून इस्तेमाल किया गया है। यहां तक ​​कि सीपीएम के सीताराम येचुरी, स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, डॉ. अपूर्व नंद और फिल्म निर्माता राहुल रॉय जैसे राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को भी चार्जशीट में रखा गया है। इसी तरह बड़ी संख्या में छात्र नेताओं और जामिया मिलिया और जेएनयू के सांस्कृतिक कर्मियों को झूठे आधार पर गिरफ्तार किया गया है। उमर खालिद की हालिया गिरफ्तारी राज्य की शक्ति के दुरुपयोग का एक क्रूर उदाहरण है। ऊपरोक्त से यह देखा जा सकता है कि मोदी सरकार के तहत भारत तेजी से पुलिस स्टेट बन रहा है। सामान्य कानूनों को और अधिक कठोर बनाया जा रहा है। राजद्रोह, यूएपीए और एनएसए जैसे काले कानूनों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार रक्षकों और विपक्षी नेताओं को झूठे आरोपों में फंसाया जा रहा है। दुर्भाग्य से अदालतें भी आम आदमी के बचाव में नहीं आ रही हैं जैसा कि अपेक्षित है। विरोधियों या असंतुष्टों को दंडित करने के लिए पुलिस और अन्य पुलिस एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसलिए यह उचित समय है कि जो लोग लोकतंत्र और कानून के राज में विश्वास करते हैं, उन्हें तानाशाही के हमले के खिलाफ खड़े होने के लिए हाथ मिलाना चाहिए और हमारे देश को पुलिस स्टेट नहीं बनने देना चाहिए। अब चूंकि यह हिंदुत्ववादी ताकतों की राजनीतिक रणनीति का नतीजा है, अतः इसका प्रतिकार भी राजनीतिक स्तर से ही करना होगा जिसके लिए एक बहुवर्गीय पार्टी की ज़रुरत है क्योंकि वर्तमान विपक्ष इसको रोकने में असमर्थ दिखाई दे रहा है। एस आर दारापुरीआईपीएस (सेवानिवृत्त)राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

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Dakhal News 28 September 2020


bhopal,Proverbs , pseudo intellectuals, foreign media

डॉ. अजय खेमरिया   भारत में बेनकाब हो चुके सेक्युलरिस्ट उदारवादियों का विदेशी नेक्सस वैश्विक जगत में भी सबको नजर आने लगा है। टाइम पत्रिका के ताजा अंक में विश्व की 100 ताकतवर शख्सियत के साथ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जगह देना और साथ में शाहीन बाग धरने पर बैठी 82 वर्षीय महिला को इस सूची में शामिल किया जाना, बहुत कुछ स्पष्ट कर रहा है। वैसे भी अमेरिका और पश्चिमी मीडिया के लिए भारत के हिन्दू तत्व और दर्शन सदैव उसी अनुपात में हिकारत भरे रहे हैं जैसा भारत के वाम बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग प्रस्तुत करता आया है। टाइम की सूची में यूं तो जिनपिंग, ट्रम्प, मर्केल सहित अन्य राष्ट्रों के प्रमुख भी शामिल हैं लेकिन जिस वैशिष्ट्य के साथ हमारे प्रधानमंत्री को छापा गया है, उससे दो बातें स्पष्ट होती हैं- प्रथम यह कि मोदी के बगैर विदेशी मीडिया का भी गुजारा नहीं होता है। दूसरा भारत को समझने और रिपोर्टिंग के लिए वामपंथी ही उनके पास अकेले स्रोत हैं।   "टाइम" ही नहीं बीबीसी, दी इकोनॉमिस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाल स्ट्रीट जनरल, वाशिंगटन पोस्ट, गल्फ न्यूज, एफ़वी, डीपीए, रॉयटर्स, एपी, गार्डियन जैसे बड़े मीडिया हाउस का भारतीय एजेंडा देश के उन्हीं बुद्धिजीवियों द्वारा निर्धारित और प्रसारित होता है, जिनकी पहचान पिछले कुछ वर्षों में टुकड़े-टुकड़े, अवॉर्ड वापसी के रूप में सार्वजनिक हो चुकी है। मई 2014 के बाद से सरकारी धन और स्वाभाविक शासक दल की सुविधाओं पर टिके रहने वाला यह बड़ा बौद्धिक गिरोह भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के प्रति लोगों को भड़काने में भी जुटा हुआ है। सुविधाओं से सराबोर लुटियंस से बेदखली ने इस गिरोह को इतना परेशान कर दिया है कि आज भारत के विरुद्ध खड़े होने में भी इन्हें संकोच नहीं है। वस्तुतः हिंदुत्व और बाद में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लंबा प्रायोजित अभियान चलाने के बावजूद जनता द्वारा मोदी को राज दिए जाने के संसदीय घटनाक्रम ने इस वर्ग की कमर तोड़ दी है। 2014 के बाद 2019 की मोदी की ऐतिहासिक जीत तो किसी पक्षाघात से कम नहीं है। ध्यान से देखा जाए तो भारतीय उदारवादियों ने बेशर्मी की सीमा लांघकर दुनिया में भारत और हिंदुत्व को लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिन्दू नेशनलिस्ट, हिन्दू तालिबान, हिन्दू रेडिकल, हिन्दू मर्डरर जैसी शब्दावलियों को सर्वप्रथम किसी विदेशी मीडिया ने नहीं बल्कि भारतीय वाम बुद्धिजीवियों ने ईजाद किया है।   टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर 2012, 2015, 2019 में भी स्टोरी प्रकाशित की और सबकी इबारत में हिन्दू शब्द अवश्य आया है। बीजेपी के लिए हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाता है। मानों हिन्दू और हिंदुत्व कोई नाजिज्म का स्रोत हो। ताजा अंक में पत्रिका के संपादक कार्ल विक लिखते हैं- "लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि इससे केवल यही मालूम पड़ता है कि किसे अधिक वोट मिले हैं। भारत की 130 करोड़ आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध रहते हैं, 80 प्रतिशत हिन्दू हैं। अबतक सभी प्रधानमंत्री हिन्दू ही हुए। मोदी ऐसे शासन कर रहे हैं जैसे और कोई उनके लिए महत्व नहीं रखता। मुसलमान मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी के निशाने पर है।" पत्रिका आगे लिखती है "नरेंद्र मोदी सशक्तीकरण के वादे के साथ सत्ता में आये। उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा ने न केवल उत्कृष्टता को बल्कि बहुलतावाद विशेषकर भारत के मुसलमानों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। दुनिया का सबसे जीवित लोकतंत्र अंधेरे में घिर गया है।"   सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचन प्रक्रिया से दो बार चुनकर आये मोदी को निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के बाद भी खारिज किया जाएगा? लोकतंत्र का झंडा लेकर घूमने वाले अमेरिकी मीडिया के लिए भारत में निष्पक्ष चुनाव की स्वीकार्यता कोई महत्व नहीं रखती है?क्या यह निष्कर्ष हमारे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर ठीक वैसा ही आक्षेप नहीं है जो अवॉर्ड वापसी गैंग पिछले 6 वर्षों से स्थानीय विमर्श में लगाता आ रहा है। कभी ईवीएम, कभी वोट परसेंट, कभी चुनावी मुद्दों की विकृत व्याख्या और हिन्दू ध्रुवीकरण जैसे कुतर्कों को खड़ा कर मोदी सरकार की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न यहां भी लगाये जाते हैं। केवल बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाना कुत्सित मानसिकता को प्रमाणित नहीं करता है? क्या अमेरिका, इंग्लैंड या यूरोप में गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे हैं? चेक रिपब्लिक और फ्रांस को छोड़ कितने देशों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर रखा है।   बुनियादी सवाल यही है कि क्यों भारत के सिर पर सेक्यूलरिज्म को थोपकर इसकी सुविधाजनक व्याख्या के आधार पर हमारे चुने हुए प्रधानमंत्री को लांछित किया जाए। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि विदेशी मीडिया के पास क्या कोई अध्ययन और शोध मौजूद है जो यह प्रमाणित करता हो कि मोदी और बीजेपी मुसलमानों को निशाने पर ले रहे हैं? सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास मोदी सरकार का दर्शन रहा है। सरकार की फ्लैगशिप स्कीमों में प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, जनधन, हर घर शौचालय, सुकन्या, किसान सम्मान निधि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रा लोन में किसी हितग्राही को केवल मुसलमान होने पर बाहर किया गया हो, ऐसा कोई उदाहरण आजतक सामने नहीं आया। प्रायोजित खबरें अक्सर तथ्य की जगह कथ्य का प्रतिबिम्ब होती है।   टाइम ने दुनिया के 100 ताकतवर शख्सियत में शाहीन बाग की 82 वर्षीय दादी बिलकिस बानो को जगह दी है। इसकी इबारत लिखाई गई है- राणा अयूब से। जी हां वही राणा अयूब जो सार्वजनिक तौर पर मोदी और अमित शाह के विरुद्ध झूठ का प्रोपेगंडा चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में बेपर्दा हो चुकी हैं। "गुजरात फाइल्स"-एनाटॉमी ऑफ ए कवरअप 'कूटरचना में इन्ही राणा अयूब ने हरेन पांड्या की हत्या की मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी और फिर एक जेबी एनजीओ से सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से जांच के लिए जनहित याचिका दायर कराई। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात फाइल्स को फर्जी, मनगढ़ंत, काल्पनिक बताकर खारिज कर दिया। दिल्ली दंगों के दौरान दो साल पुराना कोई वीडियो ट्वीट कर नफरत फैलाने के मामले में भी इन मोहतरमा का दामन दागदार रहा है। पत्रिका का बिलकिस को 100 ताकतवर शख्सियत में रखा जाना और राणा अयूब से ही उसके बारे में लिखवाना टुकड़े-टुकड़े गैंग और पश्चिमी मीडिया के गठबन्धन को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं।   सभी जानते हैं कि शाहीन बाग का धरना अवैध था उस धरने में भारत के विरुद्ध षडयंत्र रचे गए। शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे छात्र नेताओं ने भारत के चिकिन नेक काटने, ट्रम्प के दौरे पर अराजकता फैलाने से लेकर दिल्ली दंगों तक की पृष्ठभूमि तैयार की। नागरिकता संशोधन कानून का सबन्ध भारत के किसी मुसलमान से नही है, यह सर्वविदित तथ्य है। एनआरसी का प्रारूप तब और आज भी सामने नहीं था, लेकिन देश भर में झूठ और नफरत फैलाकर मोदी-अमित शाह के साथ भारत को बदनाम किया गया। इसी नकली और प्रायोजित धरना-प्रदर्शन की आइकॉन के रूप में राणा अयूब के जरिये टाइम ने बिलकिस को मोदी के समानान्तर जगह देकर अपनी चालाकी को खुद ही प्रमाणित कर दिया।   राणा के हवाले से बिलकिस को लेकर लिखा गया है कि "वो ऐसे देश में प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं जहाँ मोदी शासन बहुमत की राजनीति द्वारा महिलाओं और अल्पसंख्यक की आवाज को बाहर कर रही है।" सवाल यह है कि तीन तलाक के नारकीय दंश से मुक्ति दिलाने वाले मोदी राज में महिलाओं और अल्पसंख्यक के उत्पीड़न का प्रमाणिक साक्ष्य किसी के पास उपलब्ध है? सिवाय अतिरंजित मॉब लिंचिंग की घटनाओं के जो 130 करोड़ के देश में स्थानीय कानून की न्यूनता का नतीजा है जो अखलाक के साथ पालपुर में भी घटित होती है। लेकिन शोर केवल अल्पसंख्यक और उसमें भी मुसलमानों को लेकर खड़ा किया जाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 26 September 2020


bhopal,Disillusioned with Harivansh!

रवि प्रकाश- आप पत्रकारिता में हमारे हीरो थे। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ते थे। ईमानदार थे। शानदार पत्रकारिता करते थे। ‘जनता’ और ‘सरकार’ में आप हमेशा जनता के पक्ष में खड़े हुए। आपको इतना मज़बूर (?) पहले कभी नहीं देखा। अब आप अच्छे मौसम वैज्ञानिक हैं। आपको दीर्घ जीवन और सुंदर स्वास्थ्य की शुभकामनाएँ सर। आप और तरक़्क़ी करें। हमारे बॉस रहते हुए आपने हर शिकायत पर दोनों पक्षों को साथ बैठाकर हमारी बातें सुनी। हर फ़ैसला न्यायोचित किया। आज आपने एक पक्ष को सुना ही नहीं, जबकि उसको सुनना आपकी जवाबदेही थी। आप ऐसा कैसे कर गए सर? यक़ीन नहीं हो रहा कि आपने लोकतंत्र के बुनियादी नियमों की अवहेलना की। क़रीब दस साल पहले एक बड़े अख़बार के मालिक से रुबरू था। इंटरव्यू के वास्ते। उन्होंने पूछा कि आप क्या बनना चाहते हैं। जवाब में मैंने आपका नाम लिया। वे झल्ला गए। उन्होने मुझे डिप्टी एडिटर की नौकरी तो दे दी, लेकिन वह साथ कम दिनों का रहा। क्योंकि, हम आपकी तरह बनना चाहते थे। लेकिन आज…! एक बार झारखंड के एक मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को लाने के लिए सरकारी हेलिकॉप्टर भेजा। आपने पहले पन्ने पर खबर छापी। बाद में उसी पार्टी के एक और मुख्यमंत्री हर सप्ताहांत पर सरकारी हेलिकॉप्टर से ‘घर’ जाते रहे। आपका अख़बार चुप रहा। हमें तभी समझना चाहिए था। आपके बहुत एहसान हैं। हम मिडिल क्लास लोग एहसान नहीं भूलते। कैसे भूलेंगे कि पहली बार संपादक आपने ही बनाया था। लेकिन, यह भी नहीं भूल सकते कि आपके अख़बार ने बिहार में उस मुख्यमंत्री की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की, जिसने बाद में आपको राज्यसभा भेजकर उपकृत किया। आपकी कहानियाँ हममें जोश भरती थीं। हम लोग गिफ़्ट नहीं लेते थे। (कलम-डायरी छोड़कर) यह हमारी आचार संहिता थी। लेकिन, आपकी नाक के नीचे से एक सज्जन सूचना आयोग चले गए। आपने फिर भी उन्हें दफ़्तर में बैठने की छूट दी। जबकि आपको उन पर कार्रवाई करनी थी। यह आपकी आचार संहिता के विपरीत कृत्य था। बाद में आप खुद राज्यसभा गए। यह आपकी आचार संहिता के खिलाफ बात थी। ख़ैर, आपके प्रति मन में बहुत आदर है। लेकिन, आज आपने संसदीय नियमों को ताक पर रखा। भारत के इतिहास में अब आप गलत वजहों के लिए याद किए जाएँगे सर। शायद आपको भी इसका भान हो। संसद की कार्यवाही की रिकार्डिंग फिर से देखिएगा। आप नज़रें ‘झुकाकर’ बिल से संबंधित दस्तावेज़ पढ़ते रहे। सामने देखा भी नहीं और उसे ध्वनिमत से पारित कर दिया। संसदीय इतिहास में ‘पाल’ ‘बरुआ’ और ‘त्रिपाठी’ जैसे लोग भी हुए हैं। आप भी अब उसी क़तार में खड़े हैं। आपको वहाँ देखकर ठीक नहीं लग रहा है सर। हो सके तो हमारे हीरो बने रहने की वजहें तलाशिए। शुभ रात्रि सर।

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Editor Manoj Binwal ,dies from Corona

बेहद दुखदायी ख़बर मिल रही है। दैनिक भास्कर से जुड़े रहे और वर्तमान में प्रजातंत्र अखबार इंदौर में कार्यरत पत्रकार मनोज बिनवाल का कोरोना के कारण निधन हो गया है। मनोज का इलाज एक सुपर स्पेशिएलटी हास्पिटल में चल रहा था। मनोज के निधन से मीडियाकर्मी स्तब्ध हैं। सभी ने ईश्वर से कामना की, दुखी शोक संतप्त परिवार को दुख सहने की शक्तिप्रदान करें!   दैनिक भास्कर के डीबी संस्करण के मध्यप्रदेश में  संपादक रहे मनोज बिनवाल का कोरोना उपचार के दौरान निधन से अब वो मीडियाकर्मी भी कोरोना से सतर्क हो गए हैं जो इसे हल्के में ले रहे थे और लगातार बाहर निकल रहे थे। श्री बिनवाल ने हाल ही में प्रजातन्त्र अखबार जॉइन किया था. वे गुजरात, राजस्थान में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्हें चरक अस्पताल में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद भर्ती किया गया था. मृत्यु से दो दिन पहले  कोविड केयर सुपर हास्पिलिटी सेंटर में दाखिल किया गया था. बताया जा रहा है कि बिनवाल के माता-पिता भी संक्रमित हैं  

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Jaya worried, about which plate, cinema has become,drain of intoxication

-निरंजन परिहार अगर वह किसी हिंदी सिनेमा का कोई सीन होता, और वे इतने ही दमदार तरीके से बोलतीं, तो लोग हर डायलॉग पर तालियां बजाते, वाह वाह करते और खुश हो जाते। क्योंकि वे अभिनय बहुत अच्छा कर लेती हैं। जीवन भर किया भी तो वहीं है। सो, जया बच्चन सुपर हिट हो जाती। लेकिन बात थी जमाने की परवाह न करनेवाले सिनेमा में नशे को कारोबार की, और जगह थी संसद, जहां पर जो कह दिया, वही दर्ज हो जाता है इतिहास में। संसद में फिल्मों की तरह रीटेक के अवसर नहीं होते। यह वे जानती थीं। इसीलिए जमकर बोलीं। लेकिन बोलने पर बवाल मच गया। क्योंकि जिंदगी कोई सिनेमा नहीं है, जहां पटकथा के पात्रों को पढ़े पढ़ाए डायलॉग पर जीना होता है। यहां तो लोग खुलकर खेलते हैं, बोलते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर गालियां तक परोस देते हैं, जो कि जया बच्चन को सोशल मीडिया पर मिल भी खूब रही हैं। जया बच्चन ने संसद में कहा कि बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश चल रही है। कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं, उसमें ही छेद करते हैं। ये गलत बात है। मनोरंजन उद्योग के लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से बदनाम किय़ा जा रहा है। उनकी तकलीफ यही थी कि बॉलीवुड को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। जया बच्चन के कहने का अर्थ यही था कि सिनेमा के निष्पाप लोगों को अचानक गुनाहगार साबित किया जा रहा है। लेकिन संसद में यह कहते वक्त जया बच्चन शायद यह भूल गई थी कि सिनेमा के कलाकारों को तो अपनी बदनामी की असल में कोई चिंता ही नहीं होती। अगर होती, तो क्या वे फिल्में हिट करवाने के लिए खुद को बदनाम करने के नुस्खे ढूंढते ? खुद ही खुद के खिलाफ षड़यंत्र फैलाते ? और खुद ही खुद की इज्जत की भद्द पिटवाने की कारस्तानियां करते ? सो, ऐसे फिल्मवालों की क्या तो इज्जत और क्या ही उनकी बदनामी की चिंता। संसद में जया जब सोशल मीडिया के उलाहने दे रही थीं, तो उन्हें इस बात का कतई अंदेशा नहीं था कि वही सोशल मीडिया उनके लिए सनसनाता जबाव लेकर बाहर तैयार खडा मिलेगा। कंगना रणौत ने सोशल मीडिया पर ही उनसे पूछा – ‘जयाजी, क्‍या आप तब भी यही कहतीं अगर मेरी जगह पर आपकी बेटी श्‍वेता को किशोरावस्था में पीटा गया होता, ड्रग्‍स दिए गए होते और शोषण होता। क्‍या आप तब भी यही कहतीं अगर अभिषेक एक दिन फांसी से झूलते पाए जाते? थोड़ी हमदर्दी हमसे भी दिखाइए।‘ जाहिर है कंगना के इस सवाल का सीधा, सरल, सहज और सामान्य सा जवाब माननीय सांसद महोदया के पास हो ही नहीं सकता। कंगना के बाद तो बॉलीवुड सहित देश भर में जया बच्चन के विरोध और समर्थन में जो स्वर उठने लगे, उनमें उनके प्रति आभार के मुकाबले गालियां और गोलियां बहुत ज्यादा हैं। जया बच्चन के खिलाफ यह गुबार इसलिए भड़क रहा है, क्योंकि सिनेमा जगत में ड्रग्स की असलियत से अच्छी तरह वाकिफ होने के बावजूद जया बच्चन संसद में जो बोली, उसमें कितना सच था और कितना झूठ, यह वे खुद भी जानती है। यह सच है कि ‘सिलसिला’, ‘शोले’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘जंजीर’ और ऐसी ही ढेर सारी फिल्मों में गजब का अभिनय करने वाली जया बच्चन आजकल बडे पर्दे पर कुछ खास नहीं कर पा रही हैं, लेकिन संसद में वे अभिनय जैसा ही कुछ करने में जबरदस्त कामयाब रही हैं। उन्हें सिनेमा के संसार की उड़ रही इज्जत की चिंता है। लेकिन सिनेमा खुद अपनी इज्जत की परवाह न करते हुए कोकीन, स्मैक और हेरोइन के धुएं में अपनी इज्जत उडाने को हर पल बेताब दिखता है और ड्रग्स की पार्टियां करता है। जया बच्चन चाहे कहे कुछ भी, लेकिन जानती वे भी हैं कि सिनेमा के संसार में सबसे ज्यादा नशेड़ी बसते हैं, और अक्सर वहीं से, किसी न किसी कलाकार के नशीले धुंए में धंसे होने की गंध आती रहती है। फिर भी वही सिनेमा, जया बच्चन की नजरों में दूध का धुला है, किसी हवन की आहुति से प्रज्वलित ज्वाला सा पवित्र है और सूरज की किरणों से निकली चमक सा पावन है। उसे कैसे कोई बदनाम करने की जुर्रत कर सकता है। सो, जया ने कहा, बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश चल रही है। कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं, उसमें ही छेद करते हैं। ये गलत बात है। कायदे से देखें, तो बीजेपी के सांसद रविकिशन ने तो ऐसा कुछ कहा भी नहीं था, जिस पर जया बच्चन इतना बवाल मचाती। उल्टे जया बच्चन को तो रविकिशन समर्थन करना चाहिए था। क्योंकि उन्होंने तो पाकिस्तान और चीन से ड्रग्स की तस्करी रोकने और फिल्म उद्योग में इसके सेवन को लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की जांच का मुद्दा उठाया था और इस दिशा में कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन वे तो भड़क उठीं। उसके उलट आश्चर्यजनक रूप से अमिताभ बच्चन चुप हैं। एकदम चुप। वे अकसर कई ज्वलंत विषयों पर ब्लॉग लिखते हैं। लेकिन फिल्म जगत में बहुत दिनों से हो रहे बवाल पर कुछ नहीं बोले। माना जा रहा है कि अमिताभ की बात उनकी पत्नी जया बच्चन ने कह दी है। वह भी सीधे संसद में। इसीलिए जया के साथ अमिताभ भी निशाने पर है। सोशल मीडिया में दोनों को लेकर जबरदस्त विरोध के स्वर सुलग रहे हैं। हर छोटे – बड़े मामले पर भी मुखर होकर अपना मत व्यक्त करनेवाले अमिताभ का राम मंदिर के शिलान्यास पर कुछ नहीं बोलना भी सोशल मीडिया में मुद्दा बना हुआ है और जया बच्चन का तो विरोध हो ही रहा है। जय़ा के जवाब में रवि किशन ने कहा है कि जिस थाली में जहर हो उसमें छेद करना ही पड़ेगा। और भी बहुत कुछ कहा जा रहा है। तो. अब शायद अमिताभ भी सोच रहे होंगे कि कभी कभी किसी मुद्दे पर न बोलना, बोलने के मुकाबले बहुत बेहतर होता है। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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Dakhal News 17 September 2020


bhopal, Take much money, you want, but soften ,your attitude, towards the government

-अमरीक- गुरशरण सिंह हमारे दौर के योद्धा थे। एक विलक्षण सांस्कृतिक महा-लोकनायक। एक ऐसी मशाल जो मनुष्य विरोधी हर अंधेरे को चीरने के लिए सदैव तत्पर रहती है। उन्होंने लोक चेतना के लिए जो किया और जैसा जीवन जिया, उसे पीढ़ियां-दर-पीढ़ियां यकीनन याद रखेंगी। उस विरली-निराली एक शख्सियत के कई मकबूल नाम थे। गुरशरण सिंह..भाजी..बाबा…भाई मन्ना सिंह…। आकड़ों और (विश्व स्तरीय) रिकॉर्डों का संकलन करने वाली नामी-गिरामी संस्थाओ तथा व्यवस्थाओं की जानकारी में हो या नहीं, लेकिन यह तथ्य ऐतिहासिक ओर बेहद जिक्रेखास है कि गुरशरण सिंह ऐसे नाटककार-संस्कृति कर्मी रहे जिन्होने अपने सूबे (पंजाब) के एक- एक गांव, कसबे और शहर में जाकर नाटक किए। बेशक ज्यादा तादाद नुक्कड़ नाटकों की रही। उन्हें नुक्कड़ नाटकों का अनथक व क्रांतिकारी रहनुमा बेवज़ह नहीं कहा जाता। भारत, उत्तर भारत, पंजाब का सियासी व सामाजिक इतिहास और गुरशरण सिंह का रंगकर्म-सफरनामा साथ-साथ चले है। जिस भी घटना ने देश और पंजाब की दशा-दिशा पर अहम असर छोड़ा, उन्होंने बाकायदा उस पर नाटक लिखा और किया। उनमें से कई घटनाएं आज भले ही विस्मृत है पर उन पर भाजी के लिखे नाटक जिंदा है। पंजाब में एक काला दौर ऐसा रहा है जब लोग अखबारों की खबरों और विश्लेषणों पर कम, गुरशरण सिंह के नाटकों और तर्कों पर ज्यादा भरोसा करते थे। खालिस्तानी-सरकारी आतंकवाद के उस खौफनाक दौर में गुरशरणजी ने जो महान काम किया, उसकी मिसाल समूची दुनिया में शायद दूसरी नहीं। उस काली आंधी में जब सूबे की ज्यादातर कलमें खामोश थीं और संस्कृतिकर्मी खौफजदा होकर घरों में आराम कुर्सियों पर बैठ गए थे तो इस बुजुर्ग बाबा ने खिलाफ वक्त को यूं ही बगल से नहीं गुजरने दिया। चौतरफा खूनखराबा और आपाधापी के बीच, ऐन जमीनी स्तर पर जाकर अमन और सद्भाव के लिए सशक्त काम किया। अपनी कला के जरिए अवाम को बड़ी बारीकी से समझाया-बताया कि हिन्दू-सिख एकता कायम रहेगी तो पंजाब बचेगा,देश बचेगा, वर्ना कुछ नहीं बचेगा।   आंतकवाद के काले दौर में कट्टरपंथी मरजीवड़े आतंकी तो गुरशरण सिंह के मुखर खिलाफ थे ही- हुकुमत तथा गैर वामपंथी सियासत भी उनके मुखालिफ थी। वजह भी शीशे की मानिंद साफ थी। उनके उस दौर के नाटको में संत जनरैल सिंह भिंडरावाला, संत हरचन्द सिंह लौंगोवाल, जत्थेदार,गुरूचरणसिंह तोहड़ा, जत्थेदार तलवंडी , सुरजीत सिंह बरनाला, और प्रकाश सिंह बादल के साथ-साथ इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह, दरबारा सिंह, राजीव गांधी और कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बकायदा पात्र होते थे। सबके सब खलनायक की भूमिकाओ में होते थे। प्रसंगवश, भाजी का एक नाटक है ‘हिटलिस्ट’। इस नुक्कड़ नाटक का मंचन एक बार अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास किया गया।’संत जी’ इसमें पात्र बनाये गये थे। उन दिनो संत जी की दहशत समूचे पंजाब में बेतहाशा दनदना रही थी और उनकी बदनाम, जालिम तथा जानलेवा ‘हिटलिस्ट’ के किस्से खासजनों तथा आम लोगों को खूब थर्राते थे। चलते नाटक के बीच गुरशरण सिंह जी को धमकी दी गई, नाटक फौरन बंद करने का फरमान सुनाया गया और सूचित किया गया कि आज के बाद उनका नाम हत्यारी हिटलिस्ट में शुमार हो। लेकिन न नाटक रुका और न जान से मार दिये जाने की धमकी फौरी तौर असर दिखा पाई, उल्टे भाजी का बुलंद और अडिग जवाब था कि हथियारों के बूते उन्हें खौफजदा करने की कोशिश न की जाए। हथियार उन्हें भी चलाने-उठाने आते हैं। कोई गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए, एक हिटलिस्ट अवाम के भीतर भी आकार ले रही है और उनमें उन सब के नाम शिखर पर हैं जो धर्म और राजनीति के नाम पर निहत्थे व बेगुनाह लोगों पर जुल्म कर रहे हैं। खैर, इस घटना के बाद गुरशरण सिंह को सरकारी एजेंसियों के जबरदस्त दबाव के चलते अमृतसर छोड़कर चंडीगढ़ चले जाना पड़ा। हालाकि उनके प्रशंसकों का एक बड़ा तबका भी चाहता व मानता था कि भाजी को जुनूनी आतंकियो का आसान शिकार कतई नहीं बनना चाहिए। इसी मानिंद गुरशरण सिंह के एक और मशहूर नाटक में बादल, बरनाला और कैप्टन पात्र थे। उसके एक मंचन के दौरान बतौर मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला भी दर्शक-दीर्घा में थे। खुद को पात्र और वह भी खलनायक के तौर पर देखकर वह नाराज होकर उठकर चले गए, पर गुरशरण सिंह ने इस सबकी कोई परवाह नहीं की। यही बरनाला जी मुख्यमंत्री थे और एक नाट्य उत्सव में मुख्य अतिथि थे। वहीं भाजी ने भी नाटक प्रस्तुत करना था। मुख्यमंत्री को बावक्त आता न पाकर उन्होने रोष स्वरूप बहिष्कार कर दिया और नाट्यशाला से बाहर आकर नाटक किया। वह बेखौफ तार्किक प्रतिरोध से लबालब से भरे हुए थे। सोलह सितम्बर 1929 को जन्मे गुरशरण सिंह ने बतौर इंजीनियर लंबा अरसा भाखड़ा डैम में बिताया। वहां वह अक्सर श्रमिक हितों को लेकर लैक डैम के प्रबंधतंत्र से टकराया करते थे। उसी सिलसिले में उन्होने कुछ निर्णायक हड़तालों और आंदोलनो की मजबूत अगुवाई भी बखूबी की। भाजी के भीतर सक्रिय नाटककार ने भाखड़ा डैम पर जन्म लिया। वह श्रमिकों और कर्मचारियों के बीच अर्थपूर्ण नाटक प्रस्तुत करते तो बहुधा प्रबंधन और शिखर अफसरशाही को उनके तीखे तेवर रास न आते। मगर गुरशरण पूरी जिद और लोक समर्पण की भावना से जुटे एवं अड़े रहते। जून, 1975 के बर्बर आपातकाल का उन्होंने हर लिहाज से पुरजोर से विरोध किया था। आपातकाल के जोरदार विरोध में नाटक किए तथा कई सेमीनार आयोजित किए। बौखलाई सरकार ने कई तरह की धमकियां देकर उन्नीस सितम्बर 1975 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। बेशक इस इंकलाबी संस्कृतिकर्मी की सरकार विरोधी सांस्कृतिक गतिविधियां नहीं ही रूकीं। वह निरन्तर अलख जगाते रहे।   जून-84 और नवम्बर-84 ने पंजाबियों और पंजाब को बहुतेरे जख़्म दिये हैं। उस अवधि में भी गुरशरण सिंह पंजाब और पंजाबियत की गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति बनकर सामने आए। खालिस्तानी और राज्य आतंकवाद के प्रबलविरोधी गुरशरण ने आपरेशन ब्लू स्टार का भी अपने तई जबरदस्त विरोध किया और गाँव कस्बों तथा शहरो में जाकर नुक्कड़ नाटक करके तत्कालीन पंजाब संकट की असली परतों से अवाम को रू-ब-रू करवाया। यही काम उन्होंने नवंबर-84 के भयावह सिख विरोधी कत्लेआम के बाद किया। तब उन्होंने ने दिल्ली, कानपुर, हरियाणा व अन्य हिंसाग्रस्त इलाकों में जाकर नुक्कड़ नाटक किया। उनके हर नाटक में यह खुला संदेश है कि व्यवस्था न बदली और हम खामोश रहे तो बार-बार जून-84 और नवंबर-84 होंगे। 1969-71 की नक्सलबाड़ी लहर के साथ भाजी की खुली और सक्रिय सहानुभूति थी। उस लहर ने पंजाब में दस्तक दी तो उन्होने उसके पक्ष में सांस्कृतिक मोर्चा संभाला। पंजाबी के कतिपय नामवर लेखक, कवि व नाटककार नक्सलबाड़ी लहर की देन है। अवतार सिंह पाश, सुरजीत पातर, लालसिंह दिल, अमरजीत चंदन, संतराम उदासी, मित्रसेन मीत, वरियामसिंह संधू, अत्तरजीत,त्रिलोचन तथा अजमेर सिंह औलख आदि कुछ खास नाम है। इन सबका गुरूशरण सिंह से लगाव जगजाहिर है। बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि पाश का पहला चर्चित कविता संग्रह और वरियामसिंह संधू का पहला कहानी संग्रह गुरशरणजी ने ही छापा था। कितने ही लेखक व नाटककार उनके संरक्षण में परिपक्व हुए और आम पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने बलराज साहनी प्रकाशन की स्थापना की थी, जिसका मूल मकसद अच्छा जनवादी और प्रगतिशील साहित्य बेहद कम कीमत पर साहित्यप्रेमियों तक पहुंचाना था। अपनी इस मुहिम को उन्होंने ताउम्र जारी रखा। लोक मुद्दों और लोक साहित्य-संस्कृति पर आधारित कुछ पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन भी गुरशरण सिंह ने समय-समय पर किया। बलराज साहनी उनके गहरे दोस्त थे तो मशहूर फक्कड़ हिन्दी कवि कुमार विकल भी बहुत करीबी दोस्तो में शुमार थे। उन्होंने प्रेमचंद से लेकर असगर वजाहत तक की कहानियों पर आधारित पंजाबी में कालजयी नाटक लिखे। कई पंजाबी उपन्यासों में गुरशरणजी नायक के तौर पर जनहित में लड़ाइयां लड़ते दिखते हैं। केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक मित्रसेन मीत ने तो अपने तीन उपन्यासों में उन्हे नायक बनाया है। तीनों उपन्यास हिन्दी में एक ही जिल्द में ’रामराज्य ’ के नाम से अनुदित होकर संकलित है। बेशुमार कहानियों और नाटको में भी गुरशरण सिंह ने अपने बड़े कद के साथ, पात्र बनकर उपस्थित हैं। उन पर ढेरों कविताएं और गीत भी है। ऐसा विरल सम्मान और स्नेह पंजाबी में शायद ही किसी और को हासिल हो। गुरशरण सिंह की अपार लोकप्रियता की ही मिसाल है कि पंजाब में सैकड़ों, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें उनके कई नाटकों के दृश्य और संवाद हूबहू बखूबी याद हैं। इन नाटको में ‘बाबा बोलदा है’, ‘टोया’, ‘हिटलिस्ट’, ‘कुर्सीवाला-मंजीवाला’, ‘जंगीराम दी हवेली’, ‘ऐह लहू किस दा है’, ‘धमक नगारे दी’, ‘कुर्सी मोर्चा ते हवा दे विच लटकदे लोग’, ‘नवां जनम’ आदि प्रमुख हैं। ये वे नाटक हैं जिनका मंचन उन्होने पंजाब के चप्पे-चप्पे में किया है। एक गांव में किये जा रहे नाटक को आस-पास के कई गांवों के लोग, हजारों की संख्या में एकजुट होकर देखते थे। उन्होने दूरदर्शन के लिए धारावाहिक भी बनाया था-’भाई मन्ना सिंह’। इस धारावाहिक में पंजाब के संताप से जुड़ी कहानियो की नाटकीय प्रस्तुति होती थी। इस धारावाहिक ने उन्हें और ज्यादा मकबूल किया और उनका एक और नाम भाई मन्ना सिंह पड़ गया। देश के कई अन्य इलाको में भी वह भाई मन्ना सिंह के नाम से खासे मशहूर हैं। गौरतलब है कि धारावाहिक के लिए भाजी ने किसी किस्म का विचारधारात्मक समझौता नहीं किया था और पंजाब की बाबत् एक सही समझ शेष देश को देने की कोशिश की थी। यह काम उन सरीखा शख्स ही कर सकता था। गुरशरण सिंह ने प्रगतिशील इंकलाबी संगठनों को एक मंच पर लाने की कई बार कोशिश की। प्रमुख संगठन हर बार शहीद भगत सिंह शहादत दिवस पर उनके पुश्तैनी गांव खटकर कलां में बदस्तुर जुटते। इसी मानिंद हमख्याल लोग आए बरस जालंधर स्थित देशभगत यादगार हाल में होने वाले ‘मेला गदरी बाबयां’ इकठ्ठा होते। उन्होंने एक बेमिसाल काम सुदूर देशों मे नुक्कड़ नाटक करने का किया। यही वजह है कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग जानते-मानते हैं। पंजाबी-हिन्दी के साथ-साथ गुरशरणसिंह ने अंग्रेजी में भी नाटक किये। विमर्श और संवाद का कोई भी मौका वे छोड़ते नहीं थे। विद्यार्थी तथा युवा संगठनो में भी उन्होंने खूब काम किया। विद्यार्थियों और युवाओं को वह अपनी असली ताकत मानते थे। महिला व बाल सरोकार भी उनकी चिन्ताओं में शिद्दत से शुमार थे। इन पंक्तियों के लेखक ने बतौर पत्रकार गुरशरणसिंह के कई इंटरव्यू लिये। एक बार उनसे पूछा कि मूलवाद और प्रगतिशीलता विरोधी ताकतों से लड़ने का ऐसा जज्बा पहले-पहल कब पनपा? एक वाकया उन्होंने सुनाया। 1947 में बँटवारे के वक्त वह करीब सत्रह साल के थे। अमृतसर के हाल बाजार से एक जुलूस निकल रहा था। अलफ नंगी औरतों का। वे मुसलिम परिवारों से थी और घोड़ों पर सवार, तलवारों-बरछों से लैस जुनूनी लोग उन्हे घेरे चल रहे थे- शर्मनाक तरीके से उन्हें अपमानित करते हुए। किशोर गुरशरण यह सब देखकर दहल गए और तभी प्रण लिया कि आज के बाद हर तरह की धार्मिक कट्टरता के खिलाफ काम करेगें। ताउम्र उन्होंने किया भी। चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने आतंकवादियों से खुली बातचीत की कवायद शुरू की। साप्ताहिक सण्डे-मेल के लिए इस मुद्दे पर मैने गुरशरण जी का लम्बा साक्षात्कार लिया। रोष में उन्होंने कहा था कि आतंकी संगठनों से भारत सरकार को जरूर बात करनी चाहिए, लेकिन बातचीत में उन समूहों को भी शामिल करना चाहिए, जिन्हें आंतकवादियो ने निशाने पर लिया। तत्कालीन केंद्र सरकार की शर्त थी कि आमने-सामने संवाद से पहले आतंकवादियों को हथियार छोड़ने होंगे और भारतीय संविधान में आस्था रखनी होगी। गुरशरण सिंह का दो टूक कहना था कि यह शर्त दरअसल एक सरकारी मजाक है। खालिस्तानी आंतकवादियों से बातचीत तो करनी ही इसलिये है कि वे हथियार छोड़ दें और भारतीय संविधान को मान लें। भाजी का कहना एकदम सही था। बाद में वह सरकारी कवायद एकदम मजाक बनकर रह गई थी। वह पंजाब के रेशे-रेशे से वाकिफ थे। एक बार उन्होंने न छापने की शर्त पर मुझे बताया था कि एक आला सरकारी एजेंसी के बड़े अधिकारी उनसे मिलने आए और पेशकश की कि जितना चाहे (सरकारी) पैसा ले लीजिए, आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम तेज कीजिए पर सरकार के प्रति अपना रवैया नर्म कर लीजिए। गुरशरण सिंह ने सख्ती से इंकार करते हुए उक्त अधिकारियों को चलता किया तथा खूब खरी-खोटी सुनाई। भाजी ने जितना काम खालिस्तानी आतंकवाद पर किया, ठीक उतना ही सरकारी आतंकवाद के खिलाफ भी। उनका साफ मानना था कि व्यवस्था की विसंगतियां धार्मिक कट्टरतावाद और साम्प्रदायिक हिंसा को बल देती है। उन्होंने फर्जी मुठभेड़ों का भी जबरदस्त विरोध किया। जहां संत भिंडरावाला और कतिपय सियासतदानों को उन्होने नाटकों का खलनायक बनाया वहीं सूबे के तत्कालीन डीजीपी रिबेरो, केपीएस गिल व राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे सरीखे मुठभेड़ विशेषज्ञों को भी नहीं छोड़ा । अब जिस्मानी तौर पर भाजी गुरशरण सिंह नही हैं पर उनका नाम जिन्दा है और सदैव जिंदा रहेंगे। और सदा जिंदा रहेंगे उनके विचार। उनके आलोचक सही ही कहते हैं कि उनके समूचे कृतित्व में कला-सौंदर्य कम बल्कि चिंतन-विचार ज्यादा है। वह हमेशा इसी पर अडिग रहे कि कला कला के लिए नहीं, अवाम और उसके बेहतरी के लिए होती है। तो सदा रहेगी गुरशरण सिंह की रोशनी……! लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Dakhal News

Dakhal News 17 September 2020


bhopal Garde ji

आलोक पराड़कर- हिंदी पत्रकारिता के आधार स्तंभ पत्रकारों में से एक तथा मराठी भाषी होते हुए भी कोलकाता और वाराणसी में पत्र-पत्रिकाओं के संपादन का मानदंड स्थापित करने वाले लक्ष्मण नारायण गर्दे के छोटे पुत्र पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे का मंगलवार को पूर्वाहन पत्थर गली स्थित पैतृक निवास में निधन हो गया।   अभी दो माह पूर्व ही पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे के पुत्र विश्वास गर्दे भाऊ का निधन हुआ था। 92 वर्ष पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे स्मृति लोप के शिकार थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। विश्वास ही उनकी देखभाल करते थे। उनके निधन के बाद बेटियों ने यह दायित्व संभाला था। अपने पिता की तरह पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे ने पत्रकारिता की राह नहीं चुनी बल्कि डाक विभाग में नौकरी की लेकिन वे एक कुशल चित्रकार थे। नागरी प्रचारिणी सभा, पराड़कर स्मृति भवन सहित कई स्थानों पर उनके बनाए प्रसिद्ध व्यक्तियों के चित्र लगे हुए हैं। वे गर्दे जीके छोटे पुत्र थे। बड़े पुत्र का वर्षों पहले निधन हो गया था। बाबूराव विष्णु पराड़कर के समकालीन और रिश्तेदार लक्ष्मण नारायण गर्दे ने मराठीभाषी होते हुए भी हिन्दी की अप्रतिम सेवा की है। भारतमित्र, नवजीवन, वेंकटेश्वर समाचार और हिंदी बंगवासी के संपादकीय दायित्वों का निर्वाह करने वाले गर्दे जी ने श्रीकृष्ण संदेश और नवनीत जैसी पत्रिकाएं भी निकाली। उन्होंने महात्मा गांधी की पुस्तक का अनुवाद किया। उनकी सरल गीता पुस्तक भी काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने कल्याण के अंकों का संपादन भी किया।

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Dakhal News 11 September 2020


bhopal, Home Ministry, refuses to give list , people with Y category security

जहाँ गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने कंगना रानौत को दी गयी वाई श्रेणी सुरक्षा का जोरशोर से प्रचार-प्रसार किया है, वहीं कुछ दिन पहले ही इस मंत्रालय ने सुरक्षा दिये गए लोगों के नाम सार्वजनिक करने का जोरदार विरोध किया था. लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर ने एक्स, वाई, जेड तथा जेड प्लस सुरक्षा प्रदत्त लोगों की सूची तथा अन्य संबंधित सूचना मांगी थी. गृह मंत्रालय ने मात्र सुरक्षा प्रदत्त लोगों की कुल संख्या बताई किन्तु उन्होंने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(जी) में सूचना जिसे प्रकट करने से किसी के जीवन या सुरक्षा को खतरा हो तथा 8(1)(जे) में व्यक्तिगत सूचना के नाम पर सुरक्षा दिए गए लोगों के नाम सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया. गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने भी वही बात कही जिससे सहमत होते हुए सूचना आयुक्त वाई के सिन्हा ने कहा कि सुरक्षा प्राप्त लोगों के नाम सार्वजनिक करने से सुरक्षा देने का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा तथा इन लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है. नूतन ने कंगना का नाम सार्वजनिक करने तथा पूरी सूची को सामने लाने से मना करने की स्थिति को आपत्तिजनक बताया है. MHA declares Kangana Y security, denies info on other’s security While Ministry of Home Affairs, Government of India has announced grant of Y Category security to Kangana Ranaut with much fanfare, only few days ago, it had vehemently opposed providing names of those granted security cover. Lucknow based activist Dr Nutan Thakur had sought list of persons who have been provided various security covers like X, Y, Z, Z plus etc and other related information. MHA only provided total number of persons with different security categories, but opposed providing names of protectees under sections 8(1)(g), related with information, the disclosure of which would endanger the life or physical safety of any person and 8(1)(j), related with personal information. MHA took the same stand before Central Information Commission as well. Information Commissioner Y K Sinha agreed to it saying that revelation of names of the protectees or other details will militate against the very objective of providing security cover and may constitute a threat to the safety and security of the protectee. As per Nutan, making public Kangana’s grant of protection while opposing declaration of the list of other protectees is clearly objectionable.

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Dakhal News 11 September 2020


bhopal, Pro. KG Suresh,new vice-chancellor , Makhanlal Chaturvedi National Journalism University

भोपाल। प्रो. के.जी. सुरेश माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍व विद्यालय भोपाल के नए कुलपति बनाए गए हैं। उनकी नियुक्ति के संबंध में सोमवार को आदेश जारी कर दिये गए हैं। जारी आदेश के अनुसार प्रो. केजी सुरेश का कार्यकाल चार वर्ष का रहेगा। प्रोफेसर के.जी. सुरेश आईआईएमसी के महानिदेशक भी रह चुके हैं।   विदित हो कि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के नए कुलपति की तलाश लंबे समय से चल रही थी। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद कुलपति दीपक तिवारी ने इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद प्रो. संजय द्विवेदी को प्रभारी कुलपति बनाया गया था। लेकिन इस बीच प्रभारी कुलपति प्रो संजय द्विवेदी को आईआईएमसी का महानिदेशक बनाया दिया गया है। जिसके बाद से यह पद खाली हो गया था। 

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Dakhal News 7 September 2020


mumbai, Film journalist ,Shyam Sharma ,dies from Corona

दुखद खबर मुंबई से आ रही है. फ़िल्म पत्रकार श्याम शर्मा का कोरोना से निधन हो गया है. फ़िल्म पत्रकार श्याम शर्मा मायापुरी फ़िल्म पत्रिका से जुड़े थे. कई फिल्मी सितारों का किया उनका इंटरव्यू काफी मशहूर हुआ था. मायापुरी फ़िल्म पत्रिका में वे फिल्मों की समीक्षा भी लिखते थे. उनके निधन पर फ़िल्म पत्रकारों की संस्था चेम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट ने गहरा दुख जताया है. मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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Dakhal News 5 September 2020


bhopal, Corona bomb, explodes ,Dainik Bhaskar Bhopal

दैनिक भास्कर के मुख्यालय भोपाल में इस बार कोरोना बम का विस्फोट हुआ है। बताया जा रहा है कि भास्कर के भोपाल ऑफिस में धड़ाधड़ लोग कोरोना पॉजिटिव आ रहे हैं। भास्कर के नेशनल न्यूज रूम, भोपाल में सबसे पहले बिक्रम प्रताप कोरोना पॉजिटिव हुए। बिक्रम ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से बताया है कि वो भोपाल एम्स में फिलहाल भर्ती हैं और उनका इलाज चल रहा है। बिक्रम के बाद नेशनल न्यूज रुम के ही कृष्ण मोहन तिवारी भी पॉजिटिव आए हैं। बताया जा रहा है कि इस फ्लोर पर कई लोग बीमार हैं। कुछ लोगों ने अपना टेस्ट कराया है जिनकी रिपोर्ट आनी बाकी है। ज्यादातर लोगों को अब वर्क फ्रॉम होम भेजा जा रहा है। एचआर डिपार्टमेंट के भी कुछ लोग पॉजिटीव आए हैं लेकिन मामला छुपाया जा रहा है। वहीं भास्कर के डिजिटल विंग में गौरव पांडे और सत्य प्रकाश पॉजिटिव आए हैं। इस फ्लोर पर भी कई लोग बीमार हैं और टेस्ट करा कर आए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भोपाल ऑफिस में कोरोना फैलाने के लिए यहां के संपादक पूरी तरह जिम्मेदार हैं। भास्कर डिजिटल एडिटर प्रसून मिश्रा किसी जल्लाद से कम नहीं है। पिछले दिनों हितेश कुशवाहा नाम के पत्रकार का इस्तीफा पत्र भी भड़ास ने छापा था जिसमें प्रसून के उत्पीड़न के चलते हितेश ने इस्तीफा दे दिया था। जहां दुनिया भर के डॉट कॉम वर्क फ्रॉम होम सिस्टम से चल रहे हैं वहीं प्रसून मिश्रा लोगों को जबरदस्ती ऑफिस बुलाते हैं। नौकरी से निकालने की धमकी देकर लोगों को जबरिया ऑफिस बुलाया जाता है जबकि घर से आराम से काम हो सकता है। प्रसून मिश्रा के उत्पीड़न से यहां के ज्यादातर कर्मचारी त्रस्त हैं लेकिन कोई नौकरी की वजह से आवाज नहीं उठा पा रहा।   भास्कर के एक पूर्व पत्रकार ने बताया कि प्रूसन मिश्रा कर्मचारियों के उत्पीड़न के लिए कुख्यात आदमी है। किसी की एक छोटी सी गलती पर भी प्रसून एक एक घंटा डांटता है और व्यक्तिगत स्तर पर आकर कर्मचारियों की हद से भी ज्यादा बेइज्जती करता है। डिजिटल के पहले प्रसून नेशनल न्यूज रूम भोपाल का ही एडीटर था। उसके यहां से जाने के बाद कर्मचारियों ने आपस में चॉकलेट बांट कर जश्न मनाया था। एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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Dakhal News 3 September 2020


bhopal, TRP,Big bang , Republic India, number one chair, Aaj Tak

यशवन्त–   आजतक को पटखनी देकर नम्बर एक की कुर्सी पर पहुंचे रिपब्लिक भारत चैनल ने नया धमाका कर दिया। पूरे साढ़े तीन अंक की वृद्धि कर आजतक से बहुत ज्यादा आगे निकल गया है।   ऐसा पहली बार हुआ है जब आजतक के अलावा किसी चैनल की टीआरपी 20 अंक के पार पहुंची हो। ऐसा पहली बार हुआ है जब आजतक किसी दूसरे चैनल से चार से ज्यादा अंकों से पिछड़ कर नम्बर दो पर रहा हो।   सुशांत कांड ने हिंदी न्यूज़ चैनलों की दुनिया में बड़ा उलटफेर करा दिया है। सर्वकालिक नम्बर वन आजतक अब रिपब्लिक भारत के सामने घुटने टेक चुका है।   सबसे बुरा हाल हुआ है ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ का। ये क्रमशः सातवें और छठें स्थान पर सिसक रहे हैं।   देखें आज रिलीज हुई टीआरपी-   Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:NCCS 15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 34   Republic Bharat 20.1 up 3.5   Aaj Tak 16.0 up 1.4   India TV 12.8 up 0.8   TV9 Bharatvarsh 10.4 dn 0.8   News18 India 9.2 dn 0.9   ABP News 8.0 dn 1.3   Zee News 7.6 dn 1.0   News Nation 5.5 dn 0.8   Tez 3.9 dn 0.6   News 24 3.5 dn 0.3   NDTV India 1.8 same   India News 1.1 same   TG: NCCS AB Male 22+   Republic Bharat 20.6 up 3.7   Aaj Tak 15.6 up 1.3   India TV 13.3 up 0.5   TV9 Bharatvarsh 9.9 dn 0.9   News18 India 8.7 dn 1.1   Zee News 8.1 dn 1.1   ABP News 7.8 dn 1.4   News Nation 5.9 dn 0.6   News 24 3.6 dn 0.2   Tez 3.0 dn 0.3 NDTV India 2.1 same

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Dakhal News 3 September 2020


bhopal, Social media is becoming a threat to democracy?

देश में इस समय सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म्स-फ़ेसबुक और व्हाट्सएप -आदि पर नागरिकों के जीवन में कथित तौर पर घृणा फैलाने और सत्ता-समर्थक शक्तियों से साँठ-गाँठ करके लोकतंत्र को कमज़ोर करने सम्बन्धी आरोपों को लेकर बहस भी चल रही है और चिंता भी व्यक्त की जा रही हैं। पर बात की शुरुआत किसी और देश में सोशल मीडिया की भूमिका से करते हैं: खबर हमसे ज़्यादा दूर नहीं और लगभग एकतंत्रीय शासन व्यवस्था वाले देश कम्बोडिया से जुड़ी है। प्रसिद्ध अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की वेब साइट द्वारा जारी इस खबर का सम्बंध एक बौद्ध भिक्षु लुओन सोवाथ से है, जिन्होंने अपने जीवन के कई दशक कम्बोडियाई नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा की लड़ाई में गुज़ार दिए थे। अचानक ही सरकार समर्थक कर्मचारियों की मदद से बौद्ध भिक्षु के जीवन के सम्बंध में फ़ेसबुक के पेजों पर अश्लील क़िस्म के वीडियो पोस्ट कर दिए गए और उनके चरित्र को लेकर घृणित मीडिया मुहीम देश में चलने लगी। उसके बाद सरकारी नियंत्रण वाली एक परिषद द्वारा बौद्ध धर्म में वर्णित ब्रह्मचर्य के अनुशासन के नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में लुओन सोवाथ को बौद्ध भिक्षु की पदवी से वंचित कर दिया गया। उनके खिलाफ इस प्रकार से दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने गिरफ़्तारी की आशंका से कहीं और शरण लेने के लिए चुपचाप देश ही छोड़ दिया। सबकुछ केवल चार दिनों में हो गया। फ़ेस बुक सरीखे सोशल मीडिया प्लेटफार्म के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर तमाम प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं में जो चिंता ज़ाहिर की जा रही है, उसका कम्बोडिया केवल छोटा सा उदाहरण है।हम अपने यहाँ अभी केवल इतने खुलासे भर से ही घबरा गए हैं कि एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर साम्प्रदायिक वैमनस्य उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रसारित की जा रही पोस्ट्स को किस तरह बिना किसी नियंत्रण के प्रोत्साहित किया जाता है। अभी यह पता चलना शेष है कि देश की प्रजातांत्रिक सम्पन्नता को एक छद्म एकतंत्र की आदत में बदल देने के काम में मीडिया और सोशल मीडिया के संगठित गिरोह कितनी गहराई तक सक्रिय हैं। कोरोना ने नागरिकों की जीवन पद्धति में सरकारों की सेंधमारी के लिए अधिकृत रूप से दरवाज़े खोल दिए हैं और इस काम में सोशल मीडिया का दुनिया भर में ज़बरदस्त तरीक़े से उपयोग-दुरुपयोग किया जा रहा है। महामारी के इलाज का कोई सार्थक और अत्यंत ही विश्वसनीय वैक्सीन नहीं खोज पाने या उसमें विलम्ब होने का एक अन्य पहलू भी है ! अलावा इसके कि महामारी का दुश्चक्र लगातार व्यापक होता जाएगा और संक्रमण के साथ-साथ मरनेवालों की संख्या बढ़ती जाएगी, नागरिक अब अधिक से अधिक तादाद में अपने जीवन-यापन के लिए सरकारों की कृपा पर निर्भर होते जाएँगे। पर इसके बदले में उन्हें ‘अवैध’ रूप से जमा किए गए हथियारों की तरह अपने ‘वैध’अधिकारों का ही समर्पण करना पड़ेगा। सरकारें अगर इस तरह की भयंकर आपातकालीन परिस्थितयों में भी अपने राजनीतिक आत्मविश्वास और अर्थव्यवस्थाओं को चरमराकर बिखरने से बचाने में कामयाब हो जातीं हैं, तो माना जाना चाहिए कि उन्होंने एक महामारी में भी अपनी सत्ताओं को मजबूत करने के अवसर तलाश लिए हैं। चीन के बारे में ऐसा ही कहा जा रहा है। महामारी ने चीन के राष्ट्राध्यक्ष को और ज़्यादा ताकतवर बना दिया है। रूस में भी ऐसी ही स्थिति है। दोनों ही देशों में सभी तरह का मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है। रूस में तो पुतिन के धुर विरोधी नेता नेवेल्नी को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का ज़बरदस्त तरीक़े से उपयोग किया गया। रूस के बारे में तो यह भी सर्वज्ञात है कि उसने ट्रम्प को पिछली बार विजयी बनाने के लिए फ़ेसबुक का किस तरह से राजनीतिक इस्तेमाल किया था। नागरिकों को धीमे-धीमे फैलने वाले ज़हर की तरह इस बात का कभी पता ही नहीं चल पाता है कि जिस सोशल मीडिया का उपयोग वे नागरिक आज़ादी के सबसे प्रभावी और अहिंसक हथियार के रूप में कर रहे थे वही देखते-देखते एकतंत्रीय व्यवस्थाओं के समर्थक के विकल्प के रूप में अपनी भूमिका-परिवर्तित कर लेता है।(उल्लेखनीय है कि महामारी के दौर में जब दुनिया के तमाम उद्योग-धंधों में मंदी छाई हुई है, सोशल मीडिया संस्थानों के मुनाफ़े ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ गए हैं।अख़बारों में प्रकाशित खबरों पर यक़ीन किया जाए तो चालीस करोड़ भारतीय व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं ।अब व्हाट्सएप चाहता है कि उसके पैसों का भुगतान किया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार की स्वीकृति चाहिए। इसीलिए व्हाट्सएप की नब्ज पर भाजपा की पकड़ है।) ऊपर उल्लेखित भूमिका का सम्बंध अफ़्रीका के डेढ़ करोड़ की आबादी वाले उस छोटे से देश ट्यूनिशिया से है, जो एक दशक पूर्व सारी दुनिया में चर्चित हो गया था। सोशल मीडिया के कारण उत्पन्न अहिंसक जन-क्रांति ने वहाँ न सिर्फ़ लोकतंत्र की स्थापना की बल्कि मिस्र सहित कई अन्य देशों के नागरिकों को भी प्रेरित किया। ट्यूनिशिया में अब कैसी स्थिति है ? बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी, ख़राब अर्थव्यवस्था के चलते लोग देश में तानाशाही व्यवस्था की वापसी की कामना कर रहे हैं। वहाँ की वर्तमान व्यवस्था ने उन्हें लोकतंत्र से थका दिया है। ट्यूनिशिया के नागरिकों की मनोदशा का विश्लेषण यही हो सकता है कि जिस सोशल मीडिया ने उन्हें ‘अरब क्रांति’ का जन्मदाता बनने के लिए प्रेरित किया था वही अब उन्हें तानाशाही की ओर धकेलने के लिए भी प्रेरित कर रहा होगा या इसके विपरित चाहने के लिए प्रोत्साहित भी नहीं कर रहा होगा। नागरिकों को अगर पूरे ही समय उनके आर्थिक अभावों , व्याप्त भ्रष्टाचार और जीवन जीने के उपायों से ही लड़ते रहने के लिए बाध्य कर दिया जाए और सोशल मीडिया के अधिष्ठाता अपने मुनाफ़े के लिए राजनीतिक सत्ताओं से साँठ-गाँठ कर लें तो उन्हें (लोगों को) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं, मानवाधिकार और संवैधानिक संस्थाओं का स्वेच्छा से त्याग कर एकाधिकारवादी सत्ताओं का समर्थन करने के लिए अहिंसक तरीक़ों से भी राज़ी-ख़ुशी मनाया जा सकता है।और ऐसा हो भी रहा है! लेखक श्रवण गर्ग देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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Dakhal News 31 August 2020


bhopal, Meaning of closure of Kadambini and Nandan

कादम्बिनी वह पत्रिका है जिसे हम पढ़ते हुए बड़े हए हैं। कादम्बिनी आपको रोचक अनुभवों, यात्रा वृतांतों, साहित्यिक कृतियों व जीवनशैली से जुड़े कभी उत्सुकता, कभी आश्चर्य तो कभी सुकून देने वाले सफर पर ले जाती है। कादम्बिनी के अंत में एक चित्र पर कहानी लिखने की प्रतियोगिता आपके बिम्ब निर्माण व कल्पना को सशक्त करती थी तो शब्द के अर्थ व प्रयोग का स्तम्भ शब्द ज्ञान को।   आरम्भ के दिनों में लघु आकार की सर्वप्रिय पत्रिका थी। मेरे यहां अखबार देने वाले महोदय कहते थे कि इसे आप तक पहुंचाने हेतु कुछ अतिरिक्त श्रम व समय व्यय करना पड़ता है। इसके लिए मैं आज भी उनका आभार व्यक्त करता हूँ।   मेरी जानकारी में 1998 या उससे भी पूर्व के संस्करण मेरे घर की अलमारियों, दराजों और एक पुराने अखबारों व पत्रिकाओं से भरे वर्षों से बन्द एक छोटे से कमरे में बिखरे हुएं हैं।   ना जाने कितनी बार मैंने चाय पीते हुए इसकी शब्द पहेलियों को हल करने व सोते समय पीछे दिए चित्र पर शीर्षक देने या कहानी लिखने के प्रयास किए।   सन् १९६० में शुरू हुई कादम्बिनी पत्रिका हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की एक सामाजिक व साहित्यिक पत्रिका थी जो नई दिल्ली से प्रकाशित होती थी। यह विगत पांच दशक से निरंतर हिंदी जगत में एक विशिष्ट स्थान बनाए रखी। संस्कृति, साहित्य, कला, सेहत जैसे विषयों पर सुरुचिपूर्ण सामग्री की प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने इसे एक अलहदा पहचान दी। पत्रिका में संवेदना, यात्रावृत्तांत, अनुभवपरक लेख, स्वस्थ मनोरंजन, सहित भाषागत आलेख व बौद्धिक प्रतियोगिताएं रहती थीं। जीवनशैली संदर्भित इसके लेख खासा लोकप्रिय रहे। किशोर, बुजुर्ग, विद्यार्थी, नौकरीपेशा, महिला सहित अन्य सभी लोगों के लिए इसमें उपयोगी सूचनाएं लोगों को लाभान्वित करतीं थीं।   पत्रिकाओं के प्रकाशन बन्द होने की श्रृंखला में प्रसिध्द बाल पत्रिका नंदन भी बन्द होने की दुःखद घोषणा हो चुकी है।   बाल पत्रिका नंदन पिछले ४० वर्षो से प्रति मास प्रकाशित होती है। इस पत्रिका की शुरुआत १९६४ में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की स्मृति में हुई थी। नंदन का पहला अंक पंडित नेहरू को ही समर्पित था। नंदन की विषयवस्तु पौराणिक, परीकथाओं, पहेली, अंतर ढूढों आदि पर आधारित होता था। समय के साथ एवं अपने बाल पाठको की बदलती रुचि को ध्यान रख कर नंदन ने प्रासंगिक विषयों एवम महापुरुषों के जीवनवृत्त भी प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया। आज तक नंदन में प्रकाशित हो चुकीं १०,००० से भी ज्यादा कहानियों ने लोगों को प्रेरणा, सूचना तथा शिक्षा दी। पत्रिका में सुशील कालरा द्वारा बनाई कॉमिक चित्रकथा चीटू-नीटू एक अलग ही पहचान बनाने में सफल रहे।   आज जबकि ऐसी पत्रिकाओं के प्रकाशन की और भी अधिक आवश्यकता है। इसका बन्द हो जाना ना सिर्फ मेरी तकिया की ऊंचाई को कुछ कम कर देगा बल्कि मेरे उस वैचारिक सफर को भी रोक देगा जिस पर मैं जब चाहे इसके पृष्ठों के साथ निकल पड़ता था।   सक्षम द्विवेदी, हिंदी कंटेंट राइटर, डिज़ाइन बॉक्सड क्रिएटिव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। चंडीगढ़।

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Dakhal News 29 August 2020


bhopal, Bring government job insurance policy

केंद्र सरकार को चाहिए कि वह नौकरी करने वालों की नौकरी सुरक्षित रखने के लिए नौकरी बीमा पॉलिसी बनाये। इसमें सरकार और नौकरी करने वालों दोनों को फायदा है। इसमें सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा कंपनी को भारी धनराशि प्रीमियम के रूप में मिलेगी और जो नौकरी कर रहे हैं उन्हें भी नौकरी खोने के बाद परिवार का खर्च चलाने में आर्थिक मदद मिलेगी। इसके लिए सरकार स्वाथ्य बीमा योजना की तर्ज पर हर महीने एक निर्धारित प्रीमियम राशि उन लोगों से ले जो कहीं भी निजी संस्थान में नौकरी कर रहे हैं। उसके बाद अगर प्रीमियम राशि देने वाले किसी भी व्यक्ति को उसके नियोक्ता नौकरी से निलंबित करते हैं तो निलंबन की अवधि तक उस व्यक्ति का जो अंतिम माह का वेतन होगा उसका 25 प्रतिशत हर महीने सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा कंपनी दे और अगर प्रीमियम देने वाले व्यक्ति को नियोक्ता टर्मिनेट करते हैं तो उस व्यक्ति को उसके अंतिम वेतन का पचास प्रतिशत या 75 प्रतिशत हर महीने सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा पॉलिसी कंपनी दे। पूरा वेतन हर महीने बीमा कंपनी ना दे। इसकी वजह ये है कि अगर पूरा वेतन बीमा कंपनी देगी तो नौकरी छोड़ने वालों की बाढ़ लग जायेगी। स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होने पर बीमा कंपनी कोई धनराशि न दे। साथ ही सभी राज्य और केंद्र सरकार एक काम और करे। एक नियम बनाये कि कोई भी नियोक्ता अगर किसी भी कर्मचारी को नौकरी पर रखता है तो उसकी नियुक्ति पत्र की एक प्रति नौकरी करने वाले, उसकी बीमा कंपनी, पीएफ ऑफिस और लेबर विभाग को जरूर दे। आज होता ये है कि आज बड़ी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र नहीं देती या उनसे साइन कराकर दोनों प्रति रख लेती हैं। अगर कर्मचारियों का नियुक्ति पत्र लेबर विभाग में या पीएफ ऑफिस में होगा तो कंपनियां कर्मचारी को उसका नियुक्ति पत्र आराम से देंगी। अगर कोई कंपनी लेबर विभाग को बिना नियुक्ति पत्र भेजे किसी कर्मचारी की नियुक्ति करतीं हैं तो सरकार उस कंपनी पर भारी जुर्माना लगाए। साथ ही सभी कंपनियों के लिए स्टैंडिंग आर्डर बनाना अनिवार्य कर दे और उसकी एक प्रति लेबर विभाग तथा एक प्रति कर्मचारी को नियुक्ति के समय ही देना अनिवार्य हो। आज ज्यादात्तर कंपनियां स्टैंडिंग आर्डर की जगह मॉडल स्टैंडिंग आर्डर का इस्तेमाल कर रही हैं। साथ ही श्रमिकों की भलाई के लिए सरकार एक नियम और बनाये कि जिन कंपनियों में 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं उन्हें आरटीआई के दायरे में लाएं। शशिकांत सिंहपत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

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Dakhal News 29 August 2020


bhopal, make a career, media,  profile on Linkedin!

इस समय मीडिया इंडस्ट्री में काफी लोग बेरोजगार हुए हैं। खासकर हिंदी मीडिया में। लिंकडीन नौकरियों के लिए अच्छा सोर्स है। यहां कमसे कम पता तो चलते रहता है। वो बात अलग है काम बने या न बने। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बिल्कुल भी किसी का काम नहीं बनता है। अगर आप अभी तक लिंकडीन पर प्रोफाइल नहीं बनाए हैं और मीडिया में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको बिल्कुल बना लेना चाहिए। बहुत सारे मीडिया हाउस लिंकडीन के जरिए ही वैकेंसी निकाल रहे हैं और ज्वाइनिंग प्रोसेस बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही जिन लोगों के लिंकडीन पर फालोवर्स कम हैं या वह ज्यादा एक्टिव नहीं रहते हैं। उन्हें समय पर नौकरियों के बारे में पता नहीं चल पाता है। इसलिए, मैं हर JD को लिंकडीन पर पोस्ट, रिशेयर करते रहता हूं। ताकि जरूरतमंद तक हर जानकारी आसानी से पहुंच सके, और वह किसी पर नौकरियों के लिए निर्भर न रहें। लेकिन इसके साथ ही हम लोग WhatsApp पर Media Jobs ग्रुप भी चलाते हैं। अभी ग्रुप के चार पार्ट हैं। सभी ग्रुप में मेनस्ट्रीम मीडिया इंडस्ट्री के सीनियर्स और कुछ HR जुड़े हुए हैं। जो ग्रुप में JD शेयर करते रहते हैं। मीडिया जाब्स ग्रुप का मसकद स्पष्ट है। जरूरतमंद लोगों तक निस्वार्थ भाव से नौकरियों के संबंध में सूचना/जानकारी पहुंचाना। जिन लोगों को लगे कि उनके जुगाड़/सोर्स/यार दोस्त काम नहीं आ रहे हैं। वह सोशल मीडिया, जाब्स पोर्टल, जाब्स ऐप पर हमेशा एक्टिव न रहने के कारण नौकरियों से अपडेट नहीं रह पाते हैं। वह लोग मुझे DM करके ग्रुप से जुड़ने के लिए कह सकते हैं। कृपया कमेंट न करें। ग्रुप में मीडिया से संबंधित नौकरियों की सूचना को बिना देरी के शेयर किया जाता है। सिर्फ हिंदी मीडिया के ही नहीं। बल्कि रीजनल लैंग्वेज़। जैसे भोजपुरी, मराठी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, उड़िया के भी पत्रकार (न्यूज़ प्रोड्यूसर, एंकर, रिपोर्टर), कंटेंट राइटर्स/कापी एडिटर/प्रूफ रीडर/ट्रांसलेटर/वीडियो एडिटर/ग्राफिक डिजाइनर/इंटर्न/पत्रकारिता के छात्र जुड़ सकते हैं।‌ लेकिन ध्यान रहे, कृपया वही लोग हमारे ग्रुप से जुड़े जो वाकई नौकरी को लेकर खुद परेशान हैं या खुद नौकरी करते हुए जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ भाव से मदद करना चाहते हैं। हमारा मकसद खराब करने वाले लोग ग्रुप से कतई न जुड़ें। युवा पत्रकार सिद्धार्थ चौरसिया की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 26 August 2020


bhopal, Upendra Rai ,admitted in hospital ,due to deteriorating health!

सहारा मीडिया के सीईओ और एडिटर इन चीफ उपेंद्र राय के बारे में खबर आ रही है कि वे दिल्ली में बसंतकुंज इलाके में स्थित फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराए गए हैं. लगातार चार दिनों से उनका बुखार कम नहीं हो रहा है. 104 डिग्री तक बुखार रहने के कारण उन्हें चार दिनों बाद फोर्टिस हास्पिटल में ले जाया गया.   बताया जा रहा है कि गहन जांच पड़ताल के बाद सामने आया है कि उन्हें एक किस्म का टाइफाइड है. लगातार पत्रकारीय कार्य करने, सहारा मीडिया के लिए हर मोर्चे पर चौतरफा सक्रिय रहने, आराम बिलकुल न करने के चलते शरीर ने अचानक साथ देना बंद कर दिया. बुखार आने के कारण शक हुआ कि कहीं उन्हें कोरोना का संक्रमण तो नहीं. लेकिन कोविड टेस्ट में वे निगेटिव आए. इसके बाद हर किस्म का परीक्षण कराया गया जिसमें टाइफाइड के लक्षण दिखे.   डाक्टरों ने उन्हें अभी भी अपनी निगरानी में अस्पताल में रखा हुआ है. पिछले पांच दिनों से वे हर किस्म के कामकाज से दूर हैं. यहां तक कि वे मोबाइल व वाट्सअप पर भी रिस्पांड नहीं कर रहे.   उल्लेखनीय है कि सहारा मीडिया की जिम्मेदारी संभालने के बाद उपेंद्र राय ने रिकार्डतोड़ इंटरव्यू व शोज किए. इसके लिए उन्हें सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय का प्रशंसा पत्र भी मिला. इस साल फरवरी से अगस्त तक के बीच हस्तक्षेप शो के कुल सौ एपिसोड किए. 45 परसनल इंटरव्यू किए. जिनके इंटरव्यू किए गए उनमें ज्यादातर कैबिनेट मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर और गवर्नर थे. बताया जा रहा है कि अभी हफ्ते भर तक उपेंद्र राय अस्पताल में रह सकते हैं या वहां से मुक्ति मिलने के बाद घर पर आराम करेंगे.

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Dakhal News 26 August 2020


bhopal,After shock, Aaj Tak ,walked through, Republic India!

-दयाशंकर शुक्ल सागर- देखिए टीवी के न्यूज चैनल कैसे काम करते हैं. रिपब्लिक भारत पिछले डेढ महीने से सिर्फ और सिर्फ सुशांत डेथ मिस्ट्री चला रहा है. और TRP के खेल यानी हफ़्ते की रेटिंग में कभी वह दूसरे तो कभी तीसरे नम्बर पर रहने लगा. लेकिन इस हफ्ते वह देश का नम्बर-1 चैनल बन गया. पिछले18 साल से नम्बर-1 पर चल रहा है ‘आज तक’ दूसरे नम्बर पर आ गया. अब आज तक दो दिन से सिर्फ और सिर्फ सुशांत डेथ मिस्ट्री चला रहा है. बाकी सारे चैनल भी यही कर रहे हैं.इसलिए टीवी देखने से बेहतर है अमेजन या नेटफिल्कस पर चले जाइए. वहां आपको ज्यादा बेहर मर्डर मिस्ट्री देखने को मिल जाएगी. वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 24 August 2020


bhopal,Hear story ,Hemant Sharma, returning corona

हेमंत शर्मा– लौट आया कोविड से मुठभेड़ करके…. तो हो गयी अपनी भी मुठभेड कोविड से। भयानक। हाहाकारी और लगभग जानलेवा। बस यूं समझिए कि तीन रोज तक मौत से सीधा आमना-सामना था और मैं बस ज़िन्दगी और मौत के पाले को छूकर लौट आया। बीस रोज तक अस्पताल में कोविड से लड़ा। कभी थका ,कभी जीतता दीखता तो कभी हारता नज़र आया। सुबह कोरोना को पराजित करने की उम्मीद जगती। रात होते होते टूटती नज़र आती। यह ‘टग आफ वार‘ था। हर रोज़ डाक्टरों की टीम नई रणनीति बनाती मगर ये वाईरस उन्हें गच्चा दे जाता। ये एकदम चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु सी स्थिति थी। लंबे समय तक गाड़ी सातवें व्यूह पर अटकी रही। कई बार तो लगा कि ये सातवां व्यूह वाकई अभेद्य होता है। मगर डॉक्टर भी नए नए अस्त्रों से युद्ध में जुटे हुए थे। यह कोरोना वाईरस रहस्यमय तो है ही साथ ही षड्यन्त्रकारी और धूर्त भी है। एक बार लगेगा कि आप ठीक हो रहे हैं। आप काफी हद तक निश्चिंत होने लगते हैं। मगर यह आठवें, नवें और दसवें दिन पूरी ताक़त से व्यूहरचना करके फिर वापिस आता है और शरीर के सभी अंगों पर एक साथ हमला करता है। आपकी तैयारी, मेडिकल प्रबन्धन और जिजीविषा अगर नही टूटी तो आप लड़ लेंगे। वरना….सामने प्लास्टिक बैग आपका इन्तज़ार कर रहा होता है । कहानी लम्बी डरावनी और रोमांचक है। बस यूं समझिए की मित्रों की दुआएँ, आत्मबल और परिजनों की पुण्याई से ही मैं इसे हरा सका। पूरी ताक़त से जूझा, लड़ा और वापस आ गया। परेशान हुआ पर पराजित नही। इसे आप मेरा दूसरा जन्म भी मान सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि अब किसी और की उम्र पर तो नही जी रहा हूँ! मुझे पता है उन्नीस रोज से मैं यह लड़ाई अस्पताल में अकेले नही लड़ रहा था।आप सब मेरे साथ थे।इसलिए मुझे लगता है यह बचा हुआ दूसरा जीवन आप सबके हिस्से का है।मेरी कोशिश होगी कि अब वैसा ही जिया जाय। मित्रों,कोरोना से लड़ना सिर्फ़ चिकित्सकीय प्रबन्धन है और कुछ नही। प्रबन्धन कमजोर हुआ।या आपकी जिजीविषा घटी तो कोरोना जीतेगा। वरना आप उसे पटक देगें। यह मेरा भोगा हुआ यथार्थ है। कोविड शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों पर एक साथ हमला करता है लीवर ,किडनी ,फेफड़ों , दिल और पैक्रियाज को एक साथ निशाना बनाता है। फेफड़ों में सूजन आती है।दम फूलने लगता है। हार्ट की आर्टरी भी सूजने लगती है जिससे हार्ट के चोक होने का ख़तरा बराबर बना रहता है। उधर पैक्रियाज पर हमले से इंसुलिन कम बनती है। इसलिए शरीर में शुगर का स्तर उछाल मारता है। फेफड़ों में सूजन से सॉंस में दिक़्क़त होती है। इन्हे ठीक करने के चक्कर में लीवर और किडनी के एंजाइम इधर उधर भागने लगते है। डॉक्टर इन्हीं चीजों का प्रबन्धन करते हैं। चार रोज़ अस्पताल में भर्ती रहने के बाद मैं कोविड से उबर रहा था। सारे पैरामीटर ठीक थे। केवल निमोनिया के कारण सॉंस लेने में दिक़्क़त थी। सीटी स्कैन की रिपोर्ट बता रही थी कि फेफड़ों में बीस प्रतिशत संक्रमण है। तभी आठवें रोज़ रात में वाईरस ने पूरी ताक़त से दुबारा हमला किया। खून में आक्सीजन का लेवल गिरने लगा। रक्तचाप नीचे की तरफ़ आने लगा। दम घुटने लगा था। डॉक्टरों के हाथ पॉंव फूलने लगे। फ़ौरन फेफड़ों का दुबारा सीटी स्कैन हुआ। इस दौरान मै श्लथ था। डूब उतरा रहा था। पर समझ बनी हुई थी। मैंने डाक्टरों की बातचीत सुनी। संक्रमण ८४ प्रतिशत हो गया था। सिर्फ़ १६ प्रतिशत फेफड़ों पर सॉंस ले रहा था। माहौल बेहद डरावना था। सीटी स्कैन के कक्ष से ही मुझे आई सी यू में ले जाने का फ़ैसला हुआ। यह दूसरी दुनिया थी। आईसीयू जीवन का वह दोराहा होता है जहॉं से एक रास्ता मार्चुरी में जाता है और दूसरा आपके स्वजनों की पुण्याई से खींच कर आपको वापस लाता है। यहॉं एक क्षण में दरवाज़े का रूख बदल जाता है। डॉक्टर विमर्श कर रहे थे। तभी मेरी चिकित्सा में लगे डॉ शुक्ला ने कहा, आई सी यू से अभी बचना चाहिए। आईसीयू जनित समस्याएँ पीछे पड़ सकती है।डॉ शुक्ला कोविड के मास्टर हो गए है। हर रोज़ इटली ,यूके स्पेन में वेवनार के ज़रिए वहॉं के डॉक्टरों के सम्पर्क में रहते है।मेरे प्रति उनमें आत्मीयता का भाव भी है। आईसीयू में जाने न जाने पर डॉ महेश शर्मा का फ़ैसला था कि इनके कक्ष को ही आईसीयू बना दिया जाय। इसके बाद मेरी चेतनता पर असर होने लगा था। मुझे अब कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मुझे लगा कि मैं एक अन्धे गहरे कुएँ में डूबता जा रहा हूँ। शायद यह मेरा मृत्यु से साक्षात्कार था। मुझे अपने सारे दिंवगत मित्र और परिजन दिखने लगे थे। लगा सब छूट रहा है। पर अभी काम बहुत बाक़ी है। गृहस्थी कच्ची है। मित्रों का बृहत्तर परिवार मेरे भरोसे है। काम सिमटा नहीं है। थोड़ा समय मिलता तो सब चीज़ें पटरी पर ला देता। फिर जीवन जिस उत्सवधर्मिता से जिया है। उसमें यह कोरोना मौत तो ‘डिज़र्ब ‘ नहीं करता। अकेलेपन और प्लास्टिक बैग में। नहीं यह कैसे हो सकता है ? काशी यानी महाश्मशान का रहने वाला हूँ जहॉं मृत्यु उत्सव है। मृत्यु के देवता महाकाल का गण हूँ। इतनी छूट तो वो मुझे देगें। अगर नहीं देंगे तो आज उनसे भी मुठभेड़ होगी क्योंकि अब मेरे पास खोने के लिए क्या है? राम ,कृष्ण और शिव भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्न है। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है। कृष्ण की उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी है। तीनों से अपना घरोपा रहा है। काशी से कैलाश तक शिव का गण रहा हूँ। कृष्ण चरित पर सबसे बड़ा आख्यान कृष्ण की आत्मकथा पिता ने लिखी। वे बड़े भारी कृष्ण भक्त थे इसलिए इनसे भी अपना घरेलू नाता बना और राम की जन्मभूमि आन्दोलन में अपना भी योगदान रहा है। दो किताबें लिखी। सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को जन्मभूमि देने का जो फ़ैसला लिया उसमें इन किताबो की भी भूमिका है। पर इस बार मुझे इन तीनों ने झटका दिया। ऐसा क्यों हुआ यह समझ से परे है। शायद इसे ही भवितव्यता कहते है। पहली बार कोरोना से जंग लड़ते इन तीनों के प्रति मेरे मन में सवाल खड़े हुए। इन तीनों ने मेरी आस्था को डिगाया ही नही लम्बे समय से चली आ रही मेरी आस्था, धार्मिक परम्परा और सिलसिले को तहस नहस कर दिया। मैं गए तीस वर्षों से सावन के आख़िरी सोमवार को बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाज़िरी लगाता हूँ।पर इस बार उन्होंने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की।कि मैं वहॉं नहीं जा सका। मैं आज़ादी के बाद अयोध्या रामजन्मभूमि से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण मौक़ों पर मैं अयोध्या में मौजूद रहा हूँ।पर इस बार भूमिपूजन के ऐतिहासिक मौक़े पर मर्यादा पुरूषोतम् ने मुझे जाने से रोका। होश सम्भालने के बाद गए साल तक जन्माष्टमी की झॉकी खुद से सजाता रहा। साईकिल पर लाद कर झॉंवा उनकी झॉंकी के लिए लाता था।लेकिन इसबार लीलाधर ने मुझे अस्पताल के एकांत में बिस्तर पर पटक दिया था। मैं अपने अकेलेपन और कमरे की दीवारों से पूछ रहा था मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? एक तरफ़ कोविड वाईरस से थका देने वाली जंग दूसरी तरफ़ इष्टदेवों का यह व्यवहार। तीसरे किसी परिजन और मित्र से दस रोज से देखा देखी नही। तीनों परिस्थितियॉं मृत्यु से भी ज़्यादा भयावह थी। यह सोच ही रहा था कि लगा, अरे सावन का अन्तिम सोमवार तो कल ही है। तीस साल से मैं इस रोज़ काशी विश्वनाथ केमंगला आरती में जाता रहा हूँ।यह सिलसिला अबकी टूटेगा। “क्या भोलेनाथ क्या बिगाड़ा है मैनें ? इसबार आप नहीं जाने देंगे।पुराना सेवक हूँ आपका। यह अन्याय क्यों भाई। हे विश्वनाथ यह जान लिजिए ईश्वर का अस्तित्व हमारी आस्था और विश्वास पर टिका है। ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना-अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।” सोचा आज इनसे सीधी बात कर ही लूँ। इतवार की रात बैचैन थी। कल सावन का आख़िरी सोमवार है।जीवन में इन्हीं परंपराओ को संस्कारों की अनमोल थाती की तरह सहेजकर रखा हुआ है।मेरे मन में रोग से डर और तकलीफ़ तो थी। पर बनारस न जाने का ग़ुस्सा ज़्यादा था। नाक में आक्सीजन ,उँगली में मानिटर का क्लम्पू, हाथ में केन्नडूला…. न जाने कब तंन्द्रा में आ गया। जीवन की अनिश्चितताओं और संसार की क्षणभंगुरता पर विचार के दौरान धुएँ सी एक आकृति उभरी। अरे यह तो अपने भंगड भिक्षुक भोलेनाथ है। वे गम्भीर आवाज़ में बोले “क्यों परेशान हो बालक।” डर की चरम सीमा पर मनुष्य निडर हो जाता है।मैंने सोचा मौत के मुहाने पर तो हूँ ही । अब और क्या बिगड़ेगा।तो आज बाबा से अपना सीधा संवाद हो जाय।मैंने पूछा “मेरा अपराध क्या है प्रभु? जाना था अन्तिम सोमवार में आपके दर्शन के लिए और आपने मुझे अस्पताल पहुँचा दिया।”“यह काल की गति है वत्स।”“पर मैं तो महाकाल से बात कर रहा हूँ।हे महाकाल मैं आपका पुराना भक्त हूँ। आपके सारे ज्योतिर्लिंगों का दर्शन कर चुका हूँ। आपके त्रिशूल पर टिकी काशी कीं पंचकोश परिक्रमा भी किया है। आपकी सेवा में कैलाश तक जा चुका। किताब लिख दी। अब तो अंग्रेज़ी में छप गयी।ताकि विधर्मी लोग भी आपका प्रताप जान ले। गुरूदेव अब जान ही लेंगे क्या?” मैं बड़बड़ा रहा था। वे मुस्करा रहे थे।तुम जानते हो।“यह काल की गति है। इसे कोई नहीं रोक सकता।”“पर आप तो काल के देवता हैं“। ऐसा लग रहा था मानो मेरे भीतर नचिकेता की शक्ति आ गई है। अभी कुछ ऐसा पूछ लूंगा कि महादेव भी निरूत्तर हो जाएंगे। “ठीक कहते हो पर हमारे काम बँटे है। ब्रह्मा, सृष्टि विष्णु पालन और मैं संहार करता हूँ।मैं इस वक्त संहार में निकला हूँ।” “प्रभु आप जगत के स्वामी है। आप कुछ भी कर सकते है। बेशक आपने सृष्टि के लिए एक विधान बनाया है। पर आप भी उस विधान से बंधे हुए है। विधाता भी विधान से उपर नहीं हो सकता।” “सच है विधान से ऊपर कोई नहीं हो सकता।लेकिन मनुष्य प्रकृति को कैसे जीत सकता हैं। यहॉं तो ऐसा लग रहा है कि लोग प्रकृति और काल को जीत रहे है। अपनी अलग सृष्टि बनाने में लगे है।“ वे क्रोधित होने लगे।मैंने कहा, “हे रूद्र ,आपकी छवि रौद्र है। नील लोहित शंकर नील लोहित। वह आपकी क्रोध मूर्ति थी। आप विनाशक, संहारक और उच्छेदक है। क्रोध न करे। क्रोध स्वभाव नहीं अभाव है। जहॉं शान्ति और संतोष का अभाव हुआ वहॉं क्रोध उत्पन्न हुआ। आपने क्रोध में काम के भस्म किया पर उसे भी फिर ज़िन्दा करना पड़ा भले अंनग होकर ही।“ मुझे लगा वे मेरी बात सुनने के मूड में है।इसलिए मेरी हिम्मत बढ़ी। “हे गंगाधर चाहे आप कैलाश के राजभवन में रहे या वाराणसी के महाश्मशान में। हिमालय के वैभव और काशी की दरिद्रता दोनो में आपका समभाव है। बाक़ी देव हैं आप महादेव। देवों के भी देव। राम के भी ईश्वर। तो हे रामेश्वर क्रोध में संहार का संकल्प न लें।” वह मुस्कुराए। “मेरे ज़िम्मे संहार का काम है।सृष्टि के संतुलन के लिए सृजन के साथ संहार ज़रूरी है।” “तो प्रभु एक सौ पैंतीस करोड़ में मैं ही मिला आपको। इस जिपिंगवा को क्यो नहीं पकड़ते। उसी ने सब गड़बड़ की है।” मैं निर्दोष मन से प्रश्न कर रहा था।वे बोले, “वही तो इस वक्त हमारे संतुलन का निमित्त है। पर अंत तो उसका भी है। “ “आप ठीक कह रहे है। पर इस वक्त आपके यहॉं सब ठीक नहीं चल रहा है। जिनकी यहॉं ज़रूरत है वो वहॉं जा रहे है। जो यहॉं पाप के बोझ से दबे है। उन्हें कोई नहीं पूछ रहा है। आपके यहॉं भी लालफ़ीताशाही की जकड़न दिख रही है। आपके भैंसे वाले सज्जन जो लोगों का वारंट काटते हैं, आज कल ले देकर लोगों की फ़ाईलों को इधर उधर कर देते हैं जिनका नंबर नहीं है उनका नम्बर पहले लगा देते है और जिनका नम्बर होता है। जो धरती पर बोझ है वह अपनी फ़ाइलों को ग़ायब करा धरती पर मज़ा ले रहे हैं?” महाकाल मुस्कराए, “तो आपकी पत्रकारिता हमारे दफ़्तर तक पहुँच चुकी है।” “इसे आप कंटेम्ट मत समझ लिजिएगा महादेव। ऐसी धारणा बन रही है” इस बात को टाल वे गम्भीर हुए। पूछा, “पर इस वक्त तुम क्यों परेशान हो। तुम बनारस नहीं जा पा रहे हो। इसलिए मैं स्वयं आ गया हूँ। मनुष्य खुद ईश्वर तक नहीं पहुंचता है, बल्कि जब वह तैयार हो जाता है तो ईश्वर खुद उस तक पहुंच जाते हैं।”मुझे लगा सचमुच यह मेरा यह सौभाग्य है। मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा।“अगर आपका इतना स्नेह है। तो इस मुसीबत में मैं अस्पताल में क्यों प्रभु।”“इसे ही विधि का विधान कहते है। वत्स जीवन मिलता नहीं, उसे निर्मित करना होता है। जन्म मिलता है, जीवन तो खुद से बनाना होता है।आप जैसा बनाएँगे। वैसे प्रतिफल मिलेगें।”“पर मैंने तो वैसा कुछ नहीं किया है।कि यह रद्दी प्रतिफल मुझे मिले। “ “मृत्यु शाश्वत है वत्स। मनुष्य पैदा होते ही मरना शुरू हो जाता है।तुम जिसको जन्म-दिन कहते हो। वह मृत्यु की घड़ी है, शुरुआत है मृत्यु की। सत्तर वर्ष बाद वह मरेगा, सौ वर्ष बाद मरेगा, मरना आकस्मिक नहीं है कि अचानक आ जाता है, रोज-रोज हम मरते जाते हैं, धीमे-धीमे मरते जाते हैं। मरने की लंबी क्रिया है, जन्म से लेकर मृत्यु तक हम मरते हैं। रोज मरते जाते हैं, थोड़ा-थोड़ा मरते जाते हैं। इसी मरने की लंबी क्रिया को हम जीवन समझ लेते हैं।” मैं भी डटा रहा, “पर मेरे साथ आप ठीक नहीं कर रहे है। जिस काशी में आप चिता भस्म लगा मज़ा लेते हैं। उसी मिट्टी में जन्म लेने और पलने का मुझे सौभाग्य है। यह आपने ही दिया है ।दुनिया में जातिवाद ,परिवारवाद, क्षेत्रवाद फैला है।क्षेत्र के लिहाज से भी आप मेरा ध्यान नहीं रख रहे है। मैं आपका झन्डा उठाए घूमता हूँ। फिर मैं कैसे घुटते दम के साथ नितातं अकेले अस्पताल में हूँ। आपने खबर तक नहीं ली ।” “ये जो सफ़ेद कपड़े पहन कर आपकी देखभाल कर रहे है। इस वक्त वही हमारे प्रतिनिधि है। फिर अगर आप मेरे पास नही आ पा रहे है तो मै तो आपके पास आया।”महादेव की ये बात सुनकर मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा।उन्होने पूछा, “क्या चाहते हो?” ” हे गल भुजंग भस्म अंग! अब तो पहले कोरोना से मुक्ति दिलवाए । कोविड निगेटिव होऊँ ।” “अरे निगेटिविटी बहुत ख़राब प्रवृति है।तुम्हें उससे बचना चाहिए।वर्तामान में दुनिया का यही संकट है चौतरफ़ा निगेटिविटी फैली है। ““नहीं भोलेनाथ दुनिया की सारी निगेटिविटी को आपने गरल के तौर पर अपने कण्ठ में रखा हैं ,नीलकण्ठ।” “ हॉं मैंने उसे गले मे रखा है ।पर उसे गले से नीचे नहीं उतरने दिया है।तभी से यह मुहावरा है कि गले की नीचे नहीं उतर रहा है। “ “तो क्या मैं जान दे दूँ।” “नहीं फ़िलहाल आप मंगला आरती में शामिल हो।” इतना कहते ही वे ग़ायब हुए। और मैं मंगला आरती कीतैयारियों में खुद को पा रहा था। अद्भुत दृश्य! अद्भुत दर्शन! मंगला आरती यानी बाबा भोले नाथ को जगाकर ,नहला – धुलाकर उनका श्रृंगार और आरती। दो घंटे की इस पूरी प्रक्रिया में मेरा और उनका आमना सामना रहा बीच में कोई नहीं। अनवरत गंगा की जलधार और दुग्ध धार। बाबा गदगद। यह भोलेपन का चरम नहीं तो और क्या है! इतनी ताक़तवर सत्ता और केवल जल से प्रसन्न! श्रृंगार का ये दृश्य भी आस्था के असीम संसार सा निराला है। श्रृंगार में लगे हुए पुजारी भॉंग धतूरा और न जाने किस किस चीज़ का भोग लगा रहे है। अब मेरी तल्लीनता मेरे फेफड़ों से निकल उनके भोग और जल प्रेम में उलझ चुकी है। सोचने में डूब गया हूं कि इस देव की यूएसपी क्या है? क्यों कोई दूसरा देवता ऐसा नहीं है? ऐसे अनुपम सामंजस्य और अद्भुत समन्वय वाला शिव ही क्यों है ?शिव अर्धनारीश्वर होकर भी काम विजेता हैं। वे गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त हैं। हलाहल पान करने के कारण नीलकण्ठ होकर भी विष से अलिप्त हैं। ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी होकर भी उनसे विलग हैं। उग्र होते हुए भी सौम्य हैं। अकिंचन होते हुए भी सर्वेश्वर हैं। भंगड भिक्षुक होकर भी देवाधिदेव महादेव हैं। यह शिव विरोधाभासों के अनंत महासागर हैं। पर ये विरोधाभास एक दूसरे के विरूद्ध न होकर, पूरक हैं। भयंकर विषधर नाग और सौम्य चन्द्रमा दोनों ही उनके आभूषण हैं। मस्तक में प्रलयकालीन अग्नि और सिर पर परम शीतल गंगाधारा शिव के अनुपम श्रृंगार है। उनके यहां वृषभ और सिंह व मयूर एवं सर्प अपना सहज वैर भाव भुलाकर साथ-साथ खेलते हैं। इतने विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय वाला शिव का व्यक्तित्व जीवन शैली के अनंत अमृत से ओतप्रोत है। शिवत्व का दूसरा अर्थ ही दुनिया को सह-अस्तित्व का अनुपम संदेश देना है। रावण शिव तांडव के मंत्रों में शिव की जटाओं में गंगा और मस्तक पर प्रचंड अग्नि की ज्वालाओं का वर्णन करता है। अग्नि और जल के सह अस्तित्व का यही शिवत्व युगों युगों से मानव संतति की प्रेरणा और मार्गदर्शन की नींव बना हुआ है। मंगला की आरती , रूद्राष्टक की ध्वनियाँ ,मंदिर की घंटियों से टकराते हुए आत्मा के तहखानों में उतर गए। दो घंटे की उपासना के बाद मैं तो बाहर आ गया पर मन वहीं छूट गया। अपनी अस्तित्व के कतरे-कतरे को सार्थक करता हुआ। सुबह के पॉंच बज गए। कमरे में नर्स प्रकट हुंई। अरे मैं तो शायद अपने अवचेतन से बात कर रहा था। फिर रोज़ की जॉंच पड़ताल शुरू। रक्त सैम्पल लिए जाने लगे। ईसीजी ,एक्स रे का दौर शुरू। ….जारी…. हेमंत शर्मा लंबे समय तक जनसत्ता अखबार के लिए लखनऊ में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत रहे। फिर इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर रहे। इन दिनों टीवी9भारतवर्ष न्यूज़ चैनल का संचालन कर रहे हैं।

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Dakhal News 24 August 2020


bhopal, Recording TRPs is paid for watching TV!

-विवेक सत्य मित्रम- बात पुरानी है। जब टीआरपी का पैमाना टैम हुआ करता था, और मैं एक चैनल का संपादकीय प्रमुख, तब टैम से जुड़े अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में खुलासा किया था कि राजधानी दिल्ली में टीआरपी मापने वाले सबसे ज़्यादा बक्से सीलमपुर में लगाए गए है़ं! और दूसरे शहरों में भी कमोबेश ऐसे ही इलाक़ों में ज़्यादा बक्से लगे हैं। अगर बार्क वालों ने इन बक्सों की लोकेशन से छेड़छाड़ नहीं की हो तो इस हफ़्ते टीआरपी में नंबर वन होने पर आजतक की खुल्लमखुल्ला बेइज्ज़ती करने वाले रिपब्लिक भारत को कल ही सीलमपुर जैसे सभी इलाक़ों में मिठाई बांट देनी चाहिए ताकि अगले हफ़्ते भी वो चिल्ला सकें न्यूज़रूम में! बाक़ी आपके लिए (ग़ैरचैनलवालों के लिए) ये जान लेने में कोई हर्ज़ नहीं है कि इस देश के नेशनल न्यूज़ चैनलों की औक़ात तय करने वाले लोगों का सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक (शैक्षिक पढ़ा जाए) परिवेश कैसा है? और, ये भी कि टीवी व्यूइंग पैटर्न डेटा कलेक्शन के लिए उन्हें टीवी देखने के पैसे दिए जाते हैं! अब आपके लिए समझना आसान होगा कि हर चैनल पर जो चिल्लमचिल्ली होती है उसका टारगेट ऑडिएंस कौन है? PS: इस पोस्ट का मकसद केवल तथ्य रखना है, इसे किसी ख़ास क्लास के विरूद्ध ना माना जाए। बाक़ी आपकी श्रद्धा! कई न्यूज़ चैनलों में कार्यरत रहे और वर्तमान में बतौर एंटरप्रेन्योर सक्रिय विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 21 August 2020


bhopal, Non-payment ,wages violation , workers

मुंबई : श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान करने में देरी या वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त जीवन के उनके अधिकार का उल्लंघन है। यह बात बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को कही। जस्टिस उज्जल भुयान और एन आर बोरकर की पीठ ने यह बात उस समय कही जब एक कंपनी को आदेश दिया कि वह लॉकडाउन के दौरान वेतन का भुगतान करे। रायगढ़ में एक इस्पात कारखाने के लगभग 150 श्रमिकों ने अपनी यूनियन के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कोरोनोवायरस महामारी को देखते हुए सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए कारखाने को दिशा-निर्देश देने की भी मांग की। कंपनी ने वरिष्ठ वकील गायत्री सिंह के माध्यम से दायर याचिका में कहा कि मार्च, अप्रैल और मई में मजदूरों को आधे से कम मजदूरी का भुगतान किया गया था। इसके अलावा, लॉकडाउन से पहले कंपनी ने उन्हें दिसंबर, जनवरी और फरवरी के लिए मजदूरी का भुगतान नहीं किया। हालांकि उन्हें लॉकडाउन लागू होने के बाद मार्च में काम बंद रखने के लिए कहा गया था, लेकिन बाद में कारखाना फिर से खुल गया। याचिका में कहा गया है कि महामारी के मद्देनजर सुरक्षा उपायों को लागू नहीं किया गया और न ही सार्वजनिक परिवहन के अभाव के बावजूद कारखाने से श्रमिकों को आने जाने के लिए कोई व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप, कई मजदूर काम को फिर से करने में असमर्थ हैं। याचिका में कहा गया है कि श्रमिकों और फैक्ट्री मालिकों के बीच विवाद के कारण भुगतान में देरी हुई। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि इस साल मई में हाईकोर्ट ने कारखाने के मालिकों को निर्देश दिया था कि तालाबंदी से पहले के महीनों के लिए श्रमिकों को उनका बकाया भुगतान करें, लेकिन कोई भुगतान नहीं किया गया था। फैक्ट्री मालिकों ने हालांकि आरोपों का खंडन किया और कहा कि यूनियन उनके साथ एक अनौपचारिक समझौता की थी, जिसके तहत श्रमिकों को किश्तों में उनके बकाये का भुगतान किया गया था। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं को अनौपचारिक समझौता के आधार पर उनके वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता है। शशिकांत सिंहपत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal,News photo agency,

World Photography Day : Photojournalists launch News Photo Agency Shall provide large pool of pics for ‘pay and use’ model With an aim to revolutionise the world of photo journalists, an innovative photo agency, News Graph has been launched. The agency has been conceptualised by veteran photo journalists. This platform has been designed in a unique way where both photo journalists and media houses can be mutually benefitted. News Graph began its journey on February 3, 2018 in Chandigarh. After initial success, the founder converted it into Newsgraph Infotainment Media LLP on World Photography Day August 19, 2020. Now this platform is open for all upcoming and senior photo journalists across the country. This will provide a ready platform where photo journalists can learn and earn. By associating with this agency, photo journalists can have multiple benefits. The agency will allow them to create their own profile and photo gallery which will be showcased to all reputed media houses and various other organisations. If their photograph gets chosen for publication, then they shall get paid. The agency will help the photo journalists to earn a decent amount if they can share their exclusive pictures. In an interesting feature, the agency will give cash awards to the best picture of the day or month. Besides, News Graph will provide all relevant information related to photo journalists. A team of experts will help them through webinars and exclusive events. At the same time, the agency will help the media houses who are reeling under economic crisis as it will reduce their dependency on other agencies. The editor of Newsgraph Pankaj Sharma said that our visual database will bring forth the talent of photo journalists. The founder of the agency Anil Thakur said that an excellent platform has been created where media houses and photo journalists can draw innumerable benefits. प्रेस रिलीज

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal, Crisis on Sushant, Shiv Sena, Supreme Court, CBI and Government!

-निरंजन परिहार महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार विपक्ष के साथ अपनों के भी निशाने पर है। सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है। इस मामले में बीजेपी तो शुरू से ही शिवसेना पर हमलावर रही, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद कांग्रेस और एनसीपी के नेता भी शिवसेना के रुख पर खुलकर बोल रहे हैं। इस केस की जांच के मामले में शिवसेना पर शुरू से ही उंगली उठती रही है। कांग्रेस और एनसीपी महाराष्ट्र सरकार में शिवसेना की सहयोगी पार्टियां है और इनके नेताओं व मंत्रियों द्वारा इस मामले में बयानों की वजह से सरकार की एकता में फूट साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस के तेजतर्रार नेता संजय निरूपम, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री असलम शेख और एनसीपी के शरद पवार, पार्थ पवार सहित गृह मंत्री अनिल देशमुख के बयानों सहित बिहार कांग्रेस के नेताओं के बयान इस मामले में शिवसेना पर हमले के रूप में देखे जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर सीबीआई जांच से शिवसेना परेशान क्यों हैं। सरकार में शामिल अपनों के ही हमलावर रुख को देखकर माना जा रहा है कि सरकार हिल रही है। शिवसेना शुरू से ही सुशांत सिह मामले में शक के दायरे में दिखती रही। उसके नेताओं के बयान भी जैसे किसी के बचाव की मुद्रा वाले ही हमेशा लगे और यह भी साफ लगता रहा कि किसी न किसी को तो इस मामले में बचाने की कोशिश हो रही है। हालांकि शुरू से ही महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री का नाम सुना जाता रहा, लेकिन मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य ठाकरे ने जब एक बयान में कहा था कि वे सड़क छाप राजनीति नहीं करते, उनका नाम यूं ही घसीटा जा रहा है, तो सभी को लोगों को लगा कि जिस मंत्री का नाम लिया जा रहा है, वह आदित्य ठाकरे ही हो सकते हैं। लेकिन 14 जून को हुई वारदात को दो महीने से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद एफआईआऱ दर्ज नहीं होना, मुंबई पुलिस की भूमिका स्पष्ट न होने और शिवसेना के नेताओं की अनाप शनाप बयानबाजी ने इस मामले की जांच पर शक पैदा कर दिया। इसके अलावा बिहार पुलिस की टीम को जांच न करने देना और एक पटना पुलिस के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को जांच के लिए मुंबई आने पर कोरोंटाइन कर दिए जाने से शिवसेना और सरकार की इस मामले में सपष्ट संदेहास्पद भूमिका सामने आई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 अगस्त की सुबह सीबीआई को जांच सौंपे जाने के बाद अब महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार पर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले चौतरफा हमले शुरू हो गए हैं। कांग्रेस पार्टी के नेता संजय निरुपम ने कहा कि मुंबई पुलिस इस मामले को नाहक प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करे और सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जांच सीबीआई को सौंप दे। निरुपम ने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस की क्षमता पर किसी को शक नहीं है। लेकिन इस मामले की जांच में ढिलाई बरती जा रही थी, यह दिख भी रहा था। मगर इस ढिलाई का कारण तो सरकार ही जानती है। महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस के कोटे से मंत्री असलम शेख ने भी एएनआई से बातचीत में सीबीई जांच का स्वागत करते हुए कहा कि अगर इस मामले में केंद्र चाहता है कि जांच सीबीआई करे, तो होने देना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे एनसीपी के नेता पार्थ पवार ने भी ट्वीट करके कहा – सत्यमेव जयते। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस पर लेकर उठ रहे सवालों पर 13 अगस्त को ही शरद पवार ने भी कहा था कि सीबीआई जांच कराए जाने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी कहा है कि वे सुशांत सिंह राजपूत मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हैं। देशमुख ने यह भी कहा कि सीबीआई को जो भी सहयोग की आवश्यकता होगी, वो दी जाएगी। अभिनेता सुशांत सिंह केस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है, लेकिन इस केस में शिवसेना अपनी भूमिका पर अड़ी हुई है। यह उसके नेताओं के बयानों से साफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा कि सीबीआई को जांच सौंपने की कोई जरूरत नहीं थी। राऊत ने कहा कि मुंबई पुलिस जांच के लिए पूरी तरह सक्षम है। मगर बिहार चुनाव की वजह से मामले में राजनीति हो रही है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है, तो शिवसेना सन्न है क्योंकि सरकार गिरने की बातें भी सुनने को मिल रही है। सरकार में शामिल तीनों दलों में मतभेद भी लगातार बढ़ रहे हैं। ताजा बयानबाजी के संकेत भी साफ हैं। उधर, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसके स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है कि दोस्तों जल्दी ही सुनेंगे महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है। शिवसेना का रक्षात्मक रुख, उसके साथ सरकार में शामिल कांग्रेस व एनसीपी के सीधे हमले और संबित पात्रा के बयानों के अलावा महाराष्ट्र भाजपा के दो बड़े नेताओं प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल और हर मामले में बहुत आक्रामक तेवर दिखानेवाले विपक्ष के नेता देवेंद्र पडणवीस की रहस्यमयी चुप्पी किसी बड़ी राजनीतिक उथल पुथल के साफ सकेत दे रही है। शिवसेना शायद इसीलिए सुशांत सिंह की मौत का केस सीबीआई को सौंपे जाने से ज्यादा परेशान हैं। (लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal, Why did stock, Hong Kong newspaper ,Apple Daily

–रवीश कुमार– हांगकांग में लोकतंत्र की लड़ाई चल रही है। चीन के आधिपत्य के ख़िलाफ़ हांगकांग की जनता महीनों से प्रदर्शन कर रही है। अब चीन ने एक नया सुरक्षा क़ानून बनाया है जिसके ख़िलाफ़ फिर से प्रदर्शन होने लगे है। इन प्रदर्शनों को कवर करने वाले अख़बार एप्पल डेली के मालिक ज़िम्मी लाई को पुलिस दफ़्तर से गिरफ्तार कर ले गई। हथकड़ी पहना कर। इस गिरफ़्तारी के अगले दिन अख़बार की हेडिंग था “Apple daily must fight on” लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली जनता अख़बार के समर्थन में आ गई। लोग ढाई बजे रात को ही लाइन में लग गए कि इस अख़बार की कॉपी ख़रीदनी है। किसी ने कई कापियाँ ख़रीदी। अख़बार का सर्कुलेशन एक लाख से पाँच लाख हो गया। इसके बाद लोग एप्प डेली का कंपनी के शेयर ख़रीदने लगे। शेयरों के दाम हज़ार प्रतिशत तक बढ़ गए। ज़िम्मी लाई को ज़मानत पर रिहा किया गया है। यह ख़बर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के देश में झूठ मानी जाएगी। यहाँ प्रेस का दमन जनता की भागीदारी से हुआ है। तो विरोध कौन करे। बस जनता को ईमानदारी से एलान कर देना चाहिए कि हमें प्रेस की ज़रूरत ही नहीं है। अब देर हो गई है। जनता मर्ज़ी चाहे ट्रेंड करा लें या मीम बन कर वायरल हो जाए अब कोई फ़ायदा नहीं। यह सवाल अलग से है। ख़ुद को विश्व गुरु कहलाने की चाह रखने वाले भारत के प्रधानमंत्री हांगकांग या कहीं भी लोकतंत्र के दमन पर एक शब्द नहीं बोलते हैं। ट्रंप और अमरीका ने हांककांग में चीन के दमन और सुरक्षा कानून पर खुल कर बोला है। भारत के प्रधानमंत्री बेलारूस और हांगकांग पर बोलेंगे ? रूस की संसद ने पुतीन को 2036 तक पद पर बनाए रखने का क़ानून पास किया है। क्या भारत के प्रधानमंत्री या विपक्षों नेता इस पर कुछ बोलेंगे ? लोकतंत्र का मामला आंतरिक मामला नहीं होता है। मानवीय मूल्यों की रक्षा मामला है। मानवीय मूल्य सार्वभौम होते हैं। कभी सोचिएगा। लोड मत लीजिएगा।जो ख़त्म हो चुका है उसके सूखे बीज से माला बना गले में हार डाल लीजिएगा। नाचिएगा। ख़ुशी से । आपने जिस चीज़ को ख़त्म करने में इतनी मेहनत की है उसका जश्न तो मनाइये। Ndtv के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Death spokesperson ,alleged media compulsions!

एक राजनीतिक दल के ऊर्जावान प्रवक्ता की एक टीवी चैनल की उत्तेजक डिबेट में भाग लेने के बाद कथित मौत को लेकर टी आर पी बढ़ाने वाले कार्यक्रमों की प्रतिस्पर्धा पर चिंता व्यक्त की जा रही है। एक सभ्य समाज में ऐसा होना स्वाभाविक भी है। पर इस तरह की बहसों के पीछे काम कर रहे प्रभावशाली लोग और जो प्रभावित हो रहे हैं वे भी अच्छे से जानते हैं कि शोक की अवधि समाप्त होते ही जो कुछ चल रहा है, उसे मीडिया की व्यावसायिक मज़बूरी मानकर स्वीकार कर लिया जाएगा। मीडिया उद्योग को नज़दीक से जानने वाले लोग भी अब मानते जा रहे हैं कि बहसों के ज़रिए जो कुछ भी बेचा जा रहा है, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही बची है, जितनी कि उनमें हिस्सा लेने वाले प्रवक्ताओं/प्रतिनिधियों के दलों/संस्थानों की जनता के बीच स्थापित है। सत्ता की राजनीति में बने रहने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों ने समाज को जाति और वर्गों के साम्प्रदायिक घोंसलों में सफलतापूर्वक बांटने के बाद अब मीडिया के उस टुकड़े को भी अपनी झोली में समेट लिया है, जिसका जनता की आकांक्षाओं का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व कर पाने का साहस तो काफ़ी पहले ही कमज़ोर हो चुका था। अब तो केवल इतना भर हो रहा है कि ‘आपातकाल’ ने जिस मीडिया के ऊपरी धवल वस्त्रों में छेद करने का काम पूरा कर दिया था, आज उसे लगभग निर्वस्त्र-सा किया जा रहा है। उस जमाने में (अपवादों को छोड़ दें तो )जो काम प्रिंट मीडिया का केवल एक वर्ग ही दबावों में कर रहा था, वही आज कुछ अपवादों के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा तबका स्वेच्छा से कर रहा है। यही कारण है कि एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता की किसी उत्तेजक बहस के कारण कथित मौत दर्शकों की आत्माओं पर भी कोई प्रहार नहीं करती और मीडिया के संगठनों की ओर से भी कोई खेद नहीं व्यक्त किया जाता। समझदार दर्शक तो समझने भी लगे हैं कि टीवी की बहसों में प्रायोजित तरीक़े से जो कुछ भी परोसा जाता है, वह केवल कठपुतली का खेल है, जिसकी असली रस्सी तो कैमरों के पीछे ही बनी रहने वाली कई अंगुलियाँ संचालित करतीं हैं। एंकर तो केवल समझाई गई स्क्रिप्ट को ही अभिनेताओं की तरह पढ़ने काम अपने-अपने अन्दाज़ में करते हैं। पर कई बार वह अन्दाज़ भी घातक हो जाता है। हो यह गया है कि जैसे अब किसी तथाकथित साधु, पादरी, ब्रह्मचारी या धर्मगुरु के किसी महिला या पुरुष के साथ बंद कमरों में पकड़े जाने पर समाज में ज़्यादा आश्चर्य नहीं प्रकट किया जाता या नैतिक-अनैतिक को लेकर कोई हाहाकार नहीं मचता, वैसे ही मीडिया के आसानी से भेदे जा सकने वाले दुर्गों और सत्ता की राजनीति के बीच चलने वाले सहवास को भी ‘नाजायज़ पत्रकारिता ‘के कलंक से आज़ाद कर दिया गया है। एक राजनीतिक प्रवक्ता की मौत को कारण बनाकर अब यह उम्मीद करना कि मूल मुद्दों पर जनता का ध्यान आकर्षित करने से ज़्यादा उनसे भटकाने के लिए प्रायोजित होने वाली बहसों का चरित्र बदल जाएगा, एंकरों के तेवरों में परिवर्तन हो जाएगा या राजनीतिक दल उनमें भाग लेना ही बंद कर देंगे वह बेमायने है।ऐसा इसलिए कि जो कुछ भी अभी चल रहा है, उसे क़ायम रखना मीडिया बाज़ार की सत्ताओं की राजनीतिक मजबूरी और व्यावसायिक ज़रूरत बन गया है। मीडिया उद्योग भी नशे की दवाओं की तरह ही उत्पादित की जाने वाली खबरों और बहसों को बेचने के परस्पर प्रतिस्पर्धी संगठनों में परिवर्तित होता जा रहा है। दर्शकों और देश का भला चाहने वाले कुछ लोग अभी हैं जो लगातार सलाहें दे रहे हैं कि जनता द्वारा चैनलों को देखना बंद कर देना चाहिए। पर वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि फिर देखने के लिए नया क्या है और कहाँ उपलब्ध है ? यह वैसा ही है जैसे सरकारें तो बच्चों से उनके खेलने के असली मैदान छीनती रही और उनके अभिभावक उन्हें वीडियो गेम्स खेलने के लिए भी मना करते रहें। ये भले लोग जिस मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बता रहे हैं उसे ही इस समय असली मीडिया होने की मान्यता हासिल है। जो गोदी मीडिया नहीं है वह फ़िल्म उद्योग की उन लो बजट समांतर फ़िल्मों की तरह रह गया है, जिन्हें बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिल सकते हैं देश में बॉक्स ऑफ़िस वाली सफलता नहीं। एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अख़बारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक सप्रयास नहीं किया जाए )आम तौर पर अभी भी नहीं होता। यानी कि काली स्याही से छपकर बंटने वाले अख़बार चैनलों के ‘घातक’ शब्दों के मुक़ाबले अभी भी ज़्यादा प्रभावकारी और विश्वसनीय बने हुए हैं। उन्हें लिखने या पढ़ने के बाद व्यक्ति भावुक हो सकता है, उसकी आँखों में आंसू आ सकते हैं पर उसकी मौत नहीं होती।यह बात अलग से बहस की है कि जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं उसमें मौत केवल अख़बारों को ही दी जानी बची है पर वह इतनी जल्दी और आसानी से होगी नहीं।चैनल्स तो खैर ज़िंदा रखे ही जाने वाले हैं।उनमें बहसें भी इसी तरह जारी रहेंगी। सिर्फ़ प्रवक्ताओं के चेहरे बदलते रहेंगे।एंकरों सहित बाक़ी सब कुछ वैसा ही रहने वाला है । लेखक श्रवण गर्ग देश के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Senior journalist ,Pramod Singh died , liver cancer

अखबारों के डेस्क किंग प्रमोद सिंह नहीं रहे… लखनऊ के बड़े-बड़े पत्रकारों की खबरों को सजाने से लेकर नवोदित पत्रकारों को ख़बर का शिल्प सिखाने वाले अखबारी डेक्स वर्क के बाजीगर प्रमोद सिंह नहीं रहे। ये मौजूदा समय में दैनिक प्रभात के लखनऊ एडीशन के स्थानीय संपादक थे।   पिछले 6 महीने से वो लीवर कैंसर से पीड़ित थे। चौथे स्टेज में कैंसर ट्रेस होने के बाद कोरोना काल के कारण परिजनों को उनके इलाज में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा।   कल रविवार उन्होंने आंखिरी सांस ली। कोरोना से बचाव की एहतियात के चलते कम लोगों की उपस्थिति में आज इनका अंतिम संस्कार लखनऊ के गोमतीनगर स्थित बैकुण्ठ धाम में कर दिया गया। 65 वर्षीय प्रमोद सिंह ने करीब तीन दशक से लखनऊ के करीब आधा दर्जन बड़े अखबारों में डेक्स पर काम किया। दैनिक जागरण, पायनियर, स्वतंत्र भारत, कुबेर टाइम्स इत्यादि अखबारों में वो सब एडीटर, सीनियर सब, चीफ सब जैसे अखबारी डेस्क के ओहदों की सीढ़िया चढ़ते हुए स्थानीय संपादक के पद पर पंहुचे थे। उन्होंने माधवकांतमिश्रा, विनोद शुक्ला, प्रमोद जोशी, नवीन जोशी, ज्ञानेंद शर्मा, घनश्याम पंकज, गुरुदेव नारायण जैसे बड़े संपादको और दिग्गज पत्रकारों के साथ काम किया था।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Sand mafia, Madhya Pradesh ,threatens, kill litterateur, Uday Prakash

देश और दुनिया वैश्विक महामारी कोरोनावायरस से लड़ने और लोग अपनी जान बचाने की मुहिम में लगे हैं, वहीं मध्य प्रदेश में रेत माफिया लोगों की जान लेने पर तुले हैं। लॉकडाउन के दौरान राज्य में पूरी तरह रेत माफिया का राज रहा। राज्य में पिछले 4 महीने के दौरान उप जिलाधिकारी, एसडीओपी, तहसीलदार, थानाध्यक्ष, सब इंसपेक्टर से लेकर सिपाही तक रेत माफिया के हमले के शिकार हो चुके हैं। ताजा घटनाक्रम में विश्व के जाने माने और भारत में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले साहित्यकार उदय प्रकाश को ट्रक से कुचलकर मार देने की धमकी मिली है। उदय प्रकाश की गलती यह थी कि उन्होंने सड़क और उनके घर की बाउंड्री तोड़ रही रेत से भरी ट्रकों को रोकने की कोशिश की। रेत से लदे वाहनों ने उनके घर के बाहर से गुजरने वाली निजी सड़क की हालत बदतर कर दी है, जिसके सुधार के लिए उन्होंने स्थानीय प्रशासन से अनुरोध किया था। मंगलवार को उन्होंने रेत माफियाओं के वाहनों को रोका तो खनिज विभाग सहित माफिया के तमाम गुर्गे भी पहुंच गए। माफिया के गुर्गे उदय प्रकाश को धमकियां देने लगे। इस बीच एक युवा ने उन्हें ट्रक से कुचलकर मार देने की धमकी दी। उदय प्रकाश ने इस मसले पर कहा, “मैंने रेत से भरे ट्रकों की आवाजाही पर विरोध जताया, इसलिए माफिया के लोगों ने मुझे धमकी दी। अभी मैंने पुलिस में शिकायत नहीं की है।” उदय प्रकाश सामान्यतया राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के वैशाली इलाके में रहते हैं। कोरोनावायरस के प्रसार के पहले वह अपने पैतृक आवास अनूपपुर पहुंचे। उसके बाद हुए लॉकडाउन से वह गांव में ही फंस गए। वह सोन नदी के किनारे गांव में सुकून महसूस करते हैं। उनके मकान से सटे सोन नदी बहती है। वहीं से खनन माफिया बालू निकालते हैं। उदय प्रकाश का कहना है कि उनके घर के सामने बनी सड़क उनकी पुश्तैनी जमीन है। उन्होंने तत्कालीन जिला कलेक्टर अजय शर्मा को पत्र लिखकर वह जमीन जिला प्रशासन को सड़क के लिए दे दी थी, जिससे स्थानीय निवासियों की सुचारु आवाजाही सुनिश्चित हो सके। स्थानीय लोग रेत माफिया के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे उदय प्रकाश के साथ हैं, लेकिन राजनीति और अपराध जगत के कॉक्टेल के कारण वे विवश हैं। पहले भी मिल चुकी है परिवार को मारने की धमकी मई 2018 में रेत माफियाओं ने उदय प्रकाश के बेटे शांतनु और उनकी पत्नी कुमकुम को रिवॉल्वर दिखाते हुए गोली मार देने की धमकी दी थी। उस समय अनूपपुर के एसपी सुनील जैन ने कहा था कि पहले क्या हुआ, मैं नहीं बता सकता, मैं उस वक्त ट्रेनिंग पर था। सोन नदी में अवैध खनन होने की शिकायत बिल्कुल गलत है। उस समय उदय प्रकाश के परिवार के खिलाफ मिली धमकियों को लेकर साहित्य जगत के लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए थे। 2018 में मिली धमकियों के बाद जब उदय प्रकाश का परिवार प्रशासन को शिकायत की तो माफिया ने उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज करा दी। इस समय उदय प्रकाश के खिलाफ 4 मुकदमें दर्ज हैं, जो अपराधियों ने उनके खिलाफ दर्ज कराए हैं। साहित्य जगत की वैश्विक हस्ती उदय प्रकाश को भारत की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून, नेता व माफियाओं के गठजोड़ ने मुकदमों में उलझा रखा है। मध्य प्रदेश में रेत माफियाओं का राज   मध्य प्रदेश में रेत माफियाओं पर कोई कानून नहीं चलता। जानकारों का कहना है कि इसमें स्थानीय नेताओं से लेकर प्रदेश के आला नेताओं का माफियाओं के साथ गठजोड़ काम करता है, जिसके चलते अधिकारी पूरी तरह बेबस नजर आते हैं और जो भी अधिकारी या पुसिल विभाग का व्यक्ति माफिया का विरोध करता है, उसे मारने पीटने से लेकर हत्या तक कर देने की घटनाएं सामने आ जाती हैं। कुछ घटनाओं से मध्य प्रदेश में माफिया राज के बारे में समझा जा सकता है। मध्य प्रदेश के कटनी में 11 अगस्त 2020 को रेत माफिया पर ग्रामीणों ने लाठी डंडों से हमला कर दिया, जिसकी वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई। कटनी के बरही थाना क्षेत्र के नदावन गांव के केशव तिवारी ने रेत निकाल रहे माफिया का विरोध किया। रेत माफिया भी वहां पहुंच गया। रेत माफिया के लोगों ने तिवारी पर हमला कर दिया। उसके बाद गांव के लोग भी उग्र हो गए और रेत माफिया व उसके साथियों को दौड़ा दौड़ाकर पीटने लगे। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में विजयपुर के गढ़ी चेकपोस्ट पर 17 जुलाई 2020 को रेत माफिया ने पुसिलकर्मियों पर हमला कर दिया। असिस्टेंट सब इंसपेक्टर राजेन्द्र जादौन को धमकाते हुए चांटा मारा और धक्का देकर जमीन पर पटक दिया। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामला सामने आया, जिसमें पुलिसकर्मी रेत माफिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। विजयपुर के गोहटा रोड पर ट्रैक्टर ट्रॉली पकड़ने पर 15 से ज्यादा रेत माफिया ने 26 जून 2020 को सहायक कलेक्टर और प्रभारी एसडीएम नवजीवन विजय और तहसीलदार अशोक गोबड़िया के साथ हाथापाई की। रेत माफिया अधिकारियों को धमकाते हुए रेत के ट्रैक्टर-ट्रॉली ले गए। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में 28 जून 2020 को रेत माफिया ने अपने बेटे के साथ रेत के अवैध भंडारण के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचे वन रक्षक देवशरण और श्रमिक राम नरेश यादव के साथ मारपीट की। वन रक्षक को आरोपियों ने जमकर पीटा और उसकी वर्दी फाड़ डाली। देवास में एसडीओपी ने 29 जून 2020 को दो पुलिस जवानों के साथ रेत से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली रोकने की कोशिश की। आरोपी ने एसडीओपी के ड्राइवर पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया। इस बीच माफिया ने अन्य साथियों को भी बुला लिया। उसके बाद सभी ने पुलिस जवानों पर हमला कर दिया, जिसमें एसडीओपी के ड्राइवर और पुलिसकर्मी संदीप जाट घाटल हो गए। गढ़ी चेकपोस्ट पर रेत माफिया ने मई 2020 को दो कांस्टेबल को बुरी तरह पीटा। सिपाहियों ने तत्कालीन थाना प्रभारी सतीश साहू से इसकी शिकायत की, लेकिन रेत माफिया पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 3 दिन बाद दोनों कांस्टेबल को लाइन हाजिर कर दिया गया। बैतूल जिला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर शाहपुर थाना क्षेत्र में ग्राम गुवाड़ी के पास 19 मई, 2020 को रात साढ़े 11 बजे अवैध रेत खनन कर रहे माफिया के गुर्गों ने राजस्व और पुसिल की टीम पर जानलेवा हमला किया। वाहनों पर पथराव में 2 पटवारी, तहसीलदार के वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो गए और तहसीलदार नरेंद्र ठाकुर और थाहपुर थाना प्रभारी प्रशिक्षु डीएसपी देवनारायण यादव को मामूली चोटें आईं। लॉकडाउन के दौरान नरसिंहपुर जिले में रात के अंधेरे में नर्मदा के साथ उसकी सहायक नदियों में अप्रैल 2020 में रेत का खनन हुआ। रेत माफिया इसका भंडारण कर रहे थे, जिससे मॉनसून शुरू होने पर महंगे दाम पर रेत बेची जा सके। स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत की। इसके बारे में जिले के खनिज अधिकारी रमेश पटेल ने कहा कि लॉकडाउन और कोरोना संकट को लेकर पुलिस बल अभी अन्य कामों में लगा है। सुरक्षा बल की कमी है। रेत खनन की शिकायतें आई हैं, लेकिन फोर्स मिलने के बाद ही कार्रवाई की जा सकती है। व्यावरा शहर की अजनार नदी के किनारे मोहनीपुरा गांव के पास अवैध रेत ले जाने वाले ट्रैक्टरों को पकड़ने गई राजस्व टीम पर मार्च 2020 में हमला हुआ। तहसीलदार की मौजूदगी में कार्रवाई करने पहुंचे आरआई ओपी चौधरी पर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की गई, जिसे आस पास खड़े पटवारियों ने किसी तरह रोका। माफिया सरकारी कर्मियों से ट्रैक्टर छीनकर ले गए।  

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Dakhal News 12 August 2020


bhopal, Rahat Indorei: End of an era of Ghazal

जनाब राहत इंदौरी का जाना ग़ज़ल के एक युग का जाना है। 1 जनवरी 1950 को इंदौर में उनका जन्म हुआ था। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक 1369 हिजरी थी और तारीख 12 रबी उल अव्वल थी। उन्होंने 1969-70 के दौरान शायरी शुरू की थी। वह जोश मलीहाबादी, साहिर लुधियानवी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद फ़राज़ और हबीब जालिब की परंपरा के शायर थे। सचबयानी के उतने ही कायल। हुकूमत किसी भी रहनुमा की हो, राहत इंदौरी की ग़ज़ल ने उसे नहीं बख्शा। उन्होंने 1986 में कराची में एक शेर पढ़ा और पाकिस्तान के नेशनल स्टेडियम में हजारों लोग खड़े होकर पांच मिनट तक ताली बजाते रहे। उसी शेर को कुछ अर्से बाद दिल्ली के लाल किले के मुशायरे में पढ़ा, तब भी उसी तरह की शोरअंगेजी हुई। शेर था: ‘अब के जो फ़ैसला होगा वो यहीं पे होगा/हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली…।’ यह शेर पाकिस्तान और हिंदुस्तान के अवाम के मुश्तरका गम को बखूबी बयान करता है। उनका एक और शेर है: ‘ मेरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे/मेरे भाई मेरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले…।’ यह शेर भी गौरतलब है: ‘हम ऐसे फूल कहां रोज़-रोज़ खिलते हैं/सियह गुलाब बड़ी मुश्किलों से मिलते हैं…।’   राहत इंदौरी दुनिया भर में घूमे लेकिन मन हिंदुस्तान और अपने घर ही रमा। उनकी शरीके-हयात सीमा जी ने कहीं एक इंटरव्यू में कहा था कि वह एक बार एक महीने अमेरिका रहकर लौटे तो सीधे रसोई में पहुंच गए और कहने लगे-“घर का खाना लाओ, इससे अच्छा खाना पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता।” उनका एक शेर है: ‘फुर्सतें चाट रही हैं मेरी हस्ती का लहू/मुंतज़िर हूं कि कोई मुझको बुलाने आए…।’ उनकी तीन संतानें हैं–शिब्ली, फैसल और सतलज। बेहतरीन ग़ज़लकार और गीतकार के साथ-साथ वह उम्दा चित्रकार भी थे। मुसव्विरी में भी उनके जज्बात खूब-खूब उभरते थे। जिन्होंने उनकी चित्रकारिता देखी है वे बताते हैं कि ब्रश और रंगों से भी वह नायाब ग़ज़ल रचते थे। राहत साहब ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि चित्रकारी की प्रेरणा उन्हें गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर से हासिल हुई। पेंटिंग सीखने की बकायदा शुरुआत उन्होंने इंदौर के ज्योति स्टूडियो (ज्योति आर्ट्स) से की, जिस के संचालक छगनलाल मालवीय थे। इंदौर के गांधी रोड पर हाईकोर्ट के पास यह स्टूडियो था। उन दिनों ज्यादातर सिनेमा के बैनर और होर्डिंग का काम यहां होता था। इसी स्टूडियो के पास सिख मोहल्ला था, जहां किवदंती गायिका लता मंगेशकर जी का जन्म हुआ। प्रसंगवश, राहत साहब ने नायाब गीत भी लिखे और उनमें कुछ को लता जी ने स्वर दिया। राहत इंदौरी नौवीं जमात में थे। उनके नूतन हायर सेकेंडरी स्कूल में मुशायरा हुआ। जांनिसार अख्तर की खिदमत उनके हवाले थी। वह उनसे ऑटोग्राफ लेने गए तो कहा कि मैं भी शेर कहना चाहता हूं, इसके लिए मुझे क्या करना होगा। अख्तर साहब का जवाब था कि पहले कम से कम-से-कम पांच हजार शेर याद करो। राहत साहब ने कहां की इतने तो मुझे अभी याद हैं। जनाब जांनिसार ने सिर पर हाथ रखा और कहा कि तो फिर अगला शेर जो होगा वह तुम्हारा खुद का होगा। ऑटोग्राफ देने के बाद अख्तर साहिब ने अपनी ग़ज़ल का एक शेर लिखना शुरू किया: ‘हम से भागा न करो दूर, ग़जालों की तरह…।’ राहत साहब के मुंह से बेसाख्ता दूसरा मिसरा निकला: ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहनेवालों की तरह…।’ वह ताउम्र जांनिसार अख्तर का बेहद एहेतराम करते रहे लेकिन शायरी में उनके उस्ताद कैसर इंदौरी साहब थे। उनकी शागिर्दी में आने के बाद राहत साहब ने अपना नाम ‘राहत कैसरी’ रख लिया था। उनके पहले मज्मूआ ‘धूप-धूप’ राहत कैसरी नाम से छाया हुआ था। बाद में अपने उस्ताद की सलाह पर ही उन्होंने अपना नाम राहत इंदौरी कर लिया। शुरुआती मुशायरों में उन्हें ‘इंदौरी’ होने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। खासतौर पर जो मुशायरे दिल्ली, लखनऊ और भोपाल में होते थे। उनका गोशानशीन उस्तादों और उनके नामनिहाद शागिर्दों को जवाब होता था: ‘जो हंस रहा है मेरे शेरों पे वही इक दिन/क़ुतुबफरोश से मेरी किताब मांगेगा..।’ शुरुआती दिनों का ही उनका एक शेर है: ‘मैं नूर बन के ज़माने में फैल जाऊंगा/तुम आफ्ताब में कीड़े निकालते रहना..।’ राहत इंदौरी वस्तुतः सियासी शायर थे। इन दिनों के मुशायरों में भी अक्सर वह विपरीत हवा पर शेर कहते थे। उनके ये अल्फ़ाज़ जिक्र-ए-खास हैं: ‘जिन चराग़ों से तअस्सुब का धुआं उठता है/ उन चराग़ो को बुझा दो तो उजाले होंगे..।’ इस शेर के जरिए वह सीधा फिरकापरस्त सियासत पर कटाक्ष करते हैं। उनके बेशुमार प्रशंसकों का एक पसंदीदा शेर है : ‘ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन/यह पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है?’ कोरोना उनके जिस्मानी अंत की वजह बना और कोरोनाकाल में हिजरत ने दुनिया भर में इतिहास बनाया। बहुत पहले उन्होंने लिखा था: ‘तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं/अगर हमारी तरह चार दिन सफ़र में रहो…।’ जनाब इंदौरी के यह अल्फ़ाज़ भी रोशनी की मानिंद हैं: ‘रिवायतों की सफें तोड़कर बढ़ो वर्ना, जो तुमसे आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे..।’। जिस प्रगतिशील रिवायत से उनकी शायरी थी, उसी में यह लिखना संभव था: ‘हम अपने शहर में महफूज भी हैं, खुश भी हैं/ये सच नहीं है, मगर ऐतबार करना है..।’ इसी कलम से यह भी निकला: ‘मुझे ख़बर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद/मेरी निगाह के आगे तो सब धुआं है मियां..।’ यह भी लिखा: ‘महंगी कालीनें लेकर क्या कीजिएगा/अपना घर भी इक दिन जलनेवाला है…।’ और यह भी कि: ‘गुजिश्ति साल के ज़ख्मों हरे-भरे रहना/जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा..।’   बहरहाल, अब आप जिस्मानी तौर पर नहीं हैं राहत इंदौरी साहब लेकिन आपका यह शेर आपके चाहने वालों के अंतर-कोनों में जरूर है: ‘घर की तामीर चाहे जैसी हो/उसमें रोने की कुछ जगह रखना..!’ आमीन!! लेखक अमरीक पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 12 August 2020


bhopal, Journalist Bindiya Bhatt, becomes

फिल्मी दुनिया में खबरें तो बहुत होती हैं लेकिन TV वाले सारी खबरें कवर नहीं कर पाते। बॉलीवुड स्टार्स से जुड़ी ऐसी बहुत सी खबरें होती हैं जो लोग टीवी चैनल्स की जगह on the go देखना पसंद करते हैं। आज इस डिजिटल वर्ल्ड में लोग इनफार्मेशन से भरे हुए वीडियोस देखना चाहते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ उनकी नॉलेज भी बढ़ाएं। तो ऐसा ही एक नया Youtube channel लॉन्च हुआ है जिसका नाम है ‘फिल्म सर्किल’। ये यूट्यूब चैनल बॉलीवुड से रिलेटेड महत्वपूर्ण ख़बरों को तो कवर करता ही है साथ ही उन सारी खबरों को कवर कर रहा है जिसे TV चैनल समय की कमी के चलते छोड़ देते हैं. इस चैनल का फेस हैं तेजतर्रार जर्नलिस्ट बिंदिया भट्ट। बिंदिया भट्ट ‘फिल्म सर्किल’ यूट्यूब चैनल में आपको ‘फिल्मी बिंदिया’ के नाम से होस्ट के रूप में नज़र आएंगी। बिंदिया को मीडिया में 14 साल का एक्सपीरियंस हैं। BAG फिल्म्स & मीडिया लिमिटेड, News24, दैनिक भास्कर, न्यूज़ नेशन और माइक्रोसॉफ्ट न्यूज़ जैसी संस्थानों के लिए वो काम कर चुकी हैं। बिंदिया ने अपना ये Youtube चैनल अपने दो मित्रों के साथ, यानि एक छोटी सी टीम के साथ मिल-जुलकर शुरू किया है। बिंदिया के साथ उनकी टीम उनके लोग ‘फिल्म सर्किल’ चैनल का प्रोडक्शन संभाल रहे हैं। यह चैनल 7 जुलाई को लॉन्च किया गया था। इस चैनल पर कई रोचक और दर्शनीय वीडियोज अपलोड हो चुके हैं। आपको बता दें कि आत्मनिर्भरता की ओर बिंदिया का यह एक छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास है। इसलिए आप सहयोग करें। नीचे दिए गए लिंक पर जाकर इस चैनल को सब्सक्राइब करें, अपने पसंदीदा वीडियोज को देखें और शेयर करें…

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Dakhal News 8 August 2020


bhopal, Because the one who died was a journalist…

पिछले 24 घंटे से मन बड़ा विचलित हुआ पड़ा है। हालांकि पहले विचलन कुछ अजीब सा होता था। घंटों, दिनों या कभी-कभी हफ़्तों तक मन नहीं लगता था, दिमाग झुंझलाया रहता था। मगर अब वक्त की ठोकरें कहें या मस्तिष्क की परिपक्वता, मन अब विचलन के साथ दैनिकचर्या का सामंजस्य बिठाने के तरीके सीख गया है। विचलन का कारण वही है जिससे कमोबेश कल से बनारस और आसपास के पत्रकारिता जगत के अलावा तमाम लोग विचलित हैं… राकेश चतुर्वेदी सर का असमय जाना। आज सुबह तो कलेजा मुंह को ही आ गया जब आंखें खुलते ही फेसबुक पर जन्मदिन का नोटिफिकेशन आया, उनमें एक विजय का भी था। विजय उपाध्याय… वही लड़का जो कम समय में तमाम सफ़र करते हुए एक सम्मानित अखबार तक पहुंचा और फिर अचानक एक दिन अनंत के सफ़र पर चल पड़ा। तमाम बातें थीं जो मन में सुबह से ही घुमड़ रही थीं। आखिर एक पत्रकार क्या है… समाजसेवी नहीं है, क्योंकि समाज को समय नहीं दे पाता। नौकरी से जो थोड़ा-मोड़ा समय मिलता है उसमें अपनी तमाम दुश्वारियों को दरकिनार कर सबसे ज्यादा हंसना चाहता है। खुद को larger then life दिखाना चाहता है। वह नौकरशाह भी नहीं है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के समय वो जिंदगी से सबक सीखने में अपना समय ‘नष्ट’ कर चुका होता है, बाद में अपने से कम उम्र या बेहद कम मेधा वाले अफसरों को सर या भाई साहब कहने को अभिशप्त होता है। वो कारोबारी नहीं है, नेता नहीं है, शिक्षक नहीं, वकील नहीं, डॉक्टर नहीं, पुलिस नहीं…समाज का नजरिया उसे एक सामान्य नौकरीपेशा बनने नहीं देता। तो कुल मिलाकर वो एक ऐसी अभिशप्त आत्मा का जीवन जीता है, जिसके पास न अपना कोई बड़ा बैंक बैलेंस होता है, न कारोबार, न नौकरी की निश्चिंतता। और तो और अगर कुर्सी पर नहीं रहा तो अंत समय में चार कंधे साथ होंगे या नहीं इसमें भी संदेह है। बच्चों के, परिवार के बड़े सपने उसे डराते हैं। ‘मुझे कुछ हो गया तो इनका क्या होगा’ की फिक्र कई लोगों की सच हो भी चुकी है। साथी अफसोस जताते हैं, जो सक्षम हैं वो मदद का ढांढस बंधाते हैं, कुछ अफसरों के यहां तक की दौड़ लगाते हैं और वहां बड़े ही विनम्र तरीके से ये बताकर लौट आते हैं कि जो गया उसका परिवार बड़ी ही परेशानी में है। अगर प्रशासन मदद कर देता तो उसका यशोगान होता आदि आदि… फेहरिस्त लंबी है ऐसे जाने वालों की। राकेश सर से पहले विजय, मंसूर चचा, गंगेश सर, सागर, सुशील चचा जैसे कई रहे जो असमय काल के गाल समा गए। कारण अलग अलग हो सकते हैं मगर नियति एक सी दिखी है अब तक। दो-चार दिनों की श्रद्धांजलियों का दौर, कुछ हफ़्तों की दौड़भाग। जो खुशकिस्मत थे उन्हें संस्थान और प्रशासन से सहयोग मिला। कुछ ऐसे भी थे जो अपने बाद बेटे और परिवार के लिए संघर्ष की थाती ही छोड़ पाए… समाज के किसी भी तबके से न जुड़ के भी हम पत्रकार हर तबके की सोच विकसित कर लेते हैं। हम एक नेता, एक नौकरशाह, एक समाजसेवी, एक डॉक्टर, एक वकील, एक पुलिस वाले, एक कारोबारी और ऐसे ही न जाने कितने एक-एक की तरह एक ही समय में सोच सकते हैं। लेकिन यह सब विकसित करने में हम अपने विकास को कहीं पीछे, बहुत पीछे छोड़ देते हैं। 30 साल से ज्यादा पत्रकारिता और 15 साल से ज्यादा संपादकी कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार को एक फ्लैट खरीदने के लिए मैंने पाई पाई जुटाते देखा है, एक अति वरिष्ठ को बार बार वही टुटही स्कूटर बनवाते देखा है, दशकों के क्राइम रिपोर्टर को अपने प्लॉट पर मिट्टी गिरवाने के लिए पिता से पैसे मांगते भी देखा है। आखिर क्यों ऐसा है। आखिर क्या वजह है कि इनके मरने पर अफसोस करने वाला सबसे पहले यही कहता है कि बेचारे का घर कैसे चलेगा !!! जबकि अखबारों के मालिकान या दिल्ली में बैठे जिल्ले-इलाहियों के बारे में ऐसी बातें नहीं होतीं !!! अफसोस होता है कभी कभी कि मैंने जीवन के अमूल्य डेढ़ दशक इस काम को दे दिए। अफसोस होता है जब पलट कर देखता हूं और सोचता हूं कि मुझे आज भी इस काम से उतना ही प्यार है। खैर, अफसोस बहुत से हैं। बस कामना है कि राकेश सर, विजय या मंसूर चचा जैसे अफसोस न करने पड़ें जिंदगी में आगे। आवाज़ वहां तक पहुंचे जहां संस्थान अपने लोगों की सुधि लेने का संकल्प लें। क्योंकि जो मरा वो सबकी सोचने वाला एक पत्रकार था… हे ईश्वर, उन्हें सद्गति और इन्हें सद्बुद्धि देना। पत्रकार अभिषेक त्रिपाठी की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 8 August 2020


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आज दोपहर बारह से तीन बजे के दौरान लखनऊ के पत्रकरों के पास विदेश से लगातार जहरीले वाइस कॉल्स आने से हड़कंप मच गया है। यूसुफ अली नाम से ये कॉल दो नंबरों से आ रही है। इसके नंबर यूनाइटेड स्टेट के अटलांटा के हैं। फोन पर राम मंदिर और नरेंद्र मोदी का विरोध करने की अपील की जा रही है। साथ ही भारतीय मुसलमानों को भड़काने के प्रयास किये गये हैं। साथ ही कहा गया है कि स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झंडा फहराने से रोकना चाहिए। इस जसरीली वाइस कॉल में ये भी कहा गया है कि हिंदुस्तान के मुसलमान उर्दूस्थान निर्माण के लिए प्रयास करें। पत्रकारों ने इस गंभीर मामले की इत्तेला तत्काल पुलिस को दी। इसके बाद हजरतगंज पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। नवेद शिकोह

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Dakhal News 8 August 2020


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हम आज भी अंग्रेज़ी हुकूमत के नियमों से फ़िल्म प्रमाणन प्रक्रिया करते हैं, सौ वर्षों की सिनेमाई यात्रा का पूरा विवरण पेश करती है पुस्तक ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’, पुस्तक में देश के जाने माने फ़िल्मकारों और फ़िल्म पत्रकारों के साक्षात्कार हैं समाहित   फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर देश भर में माहौल हमेशा से गरम रहा है. 1918 में अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा फ़िल्मों की सामग्री को परीक्षण करने के इरादे से आरम्भ की गई नीति आज 21वीं सदी में ओटीटी प्लेटफ़ोर्म के ज़माने में भी प्रासंगिक है. एक दर्शक फ़िल्म में क्या देखे? इसे तय करने की एक संस्था आज़ाद भारत में भी बनाई गई जिसे केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड का नाम दिया गया.   इसी क्रम में कई कमेटियाँ बनी जिसने इस बोर्ड के क्रियान्वयन और तरीक़ों में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी सुझाव भी दिए. यह सब कितना सफल हुआ और क्या बदलाव हुए पुस्तक फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष बताती है. डॉ मनीष जैसल द्वारा लिखी गई यह किताब संभवत: हिंदी में इस विषय पर लिखी गई पहली किताब है जो फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्षों का पूरा लेखा जोखा पेश करती है.   दुनिया भर में फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर बने मॉडल में भारत में कौन सा सबसे उपर्युक्त होना चाहिए पुस्तक में दिए सुझावों से जाना और समझा जा सकता है. कभी पद्मावती जसी फ़िल्मों को लेकर विवाद होता है तो कभी उड़ता पंजाब के सीन कट हो जाने से मीडिया में हेडलाइन बनने लगती है. लेकिन इसके पीछे के तर्कों और इससे बचाव को लेकर सरकारें क्या क्या उपाय सोचती और उसे करने का प्रयास करती है पुस्तक कई उदाहरणों के साथ सामने लाती है. देश के शिक्षाविद, फ़िल्मकार,पत्रकारों, लेखकों आदि से किए गए साक्षात्कार फ़िल्म सेन्सरशिप के भविष्य को लेकर एक राह दिखते हैं. जिन पर अमल किया जाये तो संभवत: इस दिशा में सकारात्मक कार्य हो सकता है.   महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से फ़िल्म स्टडीज़ में पीएचडी डॉ जैसल ने काशीपुर के ज्ञानार्थी मीडिया कोलेज में भी अपनी सेवाएँ बतौर सहायक प्रोफ़ेसर और मीडिया प्रभारी दे चुके हैं. सीएसआरयू हरियाणा में सेवाएँ देने बाद वर्तमान में नेहरु मेमोरियल लाइब्रेरी नई दिल्ली के सहयोज से पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा पर पुस्तक लिख रहे डॉ मनीष ने मशहूर फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली पर भी पुस्तक लिखी है, जो काफ़ी चर्चित रही.   बुक बजुका प्रकाशन कानपुर द्वारा इनकी तीनों किताबें प्रकाशित हुई हैं. प्रकाशक ने बताया कि सिनेमा पर लिखने वाले बहुत काम लोग हैं ऐसे में भारतीय सिनेमा और सेन्सरशिप पर लिखी गई इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय संदर्भों के साथ अमेरिका यूरोप और एशिया के कई प्रमुख देशों के फ़िल्म सेन्सरशिप की विस्तृत चर्चा की है. वहीं प्रमुख फ़िल्मकारों और पत्रकारों से संवाद पुस्तक को और भी तथ्य परक बनाती है. फ़िल्म समीक्षक, लेखक और स्वतंत्र पत्रकार की भूमिका का बराबर निर्वहन कर रहे पुस्तक के लेखक डॉ मनीष जैसल ने सभी फ़िल्म रसिक, फ़िल्मी दर्शकों और पाठकों से पुस्तक को पढ़ने और उस पर टिप्पणी की अपील की है. वर्तमान में लेखक मंदसौर विश्वविद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर हैं. फ़िल्म मेकिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे टेक्निकल विषय पर विशेष रुचि भी है. स्क्रीन राईटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया, आइचौकडॉटइन, अमर उजाला, हिंदुस्तान, भास्कर, न्यूजलांड्री जैसे पोर्टल में लगातार इनकी फ़िल्म समीक्षाए और लेख प्रकाशित होते रहते हैं. दो भागों में प्रकाशित ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’ को प्राप्त करने के लिए आप mjaisal2@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते है

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Dakhal News 4 August 2020


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ये खबर मेरे जैसों के लिए है जो कोरोना को हलके में लेते हैं. इधर उधर फुदकते रहते हैं. विजय विनीत जी बनारस के दबंग और मुखर पत्रकारों में से एक हैं. आम जन के दुखों, जनता से जुड़ी खबरों को लेकर शासन प्रशासन से टकराना इनकी फितरत है. इन्हें जब कोरोना का संक्रमण हुआ तो तनिक भी अंदाजा न था कि मरते मरते बचेंगे. यूं कहें कि ये मर ही गए थे, बस अपनी जीवटता और कुछ डाक्टरों की जिद के चलते जी गए. कृपया सावधान रहें. घर में रहें. बहुत जरूरी हो तो ही निकलें. कोरोना का कोई इमान धर्म नहीं है. कब किसे कहां पकड़ ले और मार डाले, कुछ कहा नहीं जा सकता. विजय विनीत जी ने अपनी स्टोरी विस्तार से लिखी है, पढ़िए पढ़ाइए और बहुत जरूरी न हो तो चुपचाप घर में बैठे रहिए. मुझे भी कुछ फीडबैक हैं. गर्दन, कंधे व हाथ के दर्द के कारण मैं फिजियोथिरेपी कराने जिस डाक्टर के पास जाता था, उनकी पत्नी एक सरकारी अस्पताल (ईपीएफ वाले) में हेड नर्स हैं. उनके फिजियोथिरेपिस्ट पति बता रहे थे कि वाइफ जहां काम करती हैं वहां के अस्पताल में तैनात मेडिकल स्टाफ में अघोषित तौर पर ये सहमति है कि जिन कोरोना मरीजों की हालत बिगड़ गई हो उसे छूना-छेड़ना नहीं है. उसे मरने के लिए छोड़ देना है क्योंकि उन्हें ठीक करने की लंबी कवायद में मेडिकल स्टाफ संक्रमित हो सकता है. उनने बताया कि कोरोना संक्रमित कई मरीजों को बचाया जा सकता था लेकिन मेडिकल स्टाफ के बीच एक मूक सहमति के चलते कोई मरीज के पास जाकर उसे बचाने की कवायद में खुद संक्रमित होने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ. मैं तो सुनकर दंग रह गया. मतलब जब हालत खराब हो और मदद की जरूरत हो तब मरने के लिए छोड़ दीजिए. जब माइल्ड लक्षण हों तो बस खाना वगैरह भिजवा कर अकेले पड़े पड़े डिप्रेशन में जाने के लिए छोड़ दीजिए. आप ठीक हो जाएं या मर जाएं, ये आपका भाग्य है. वैसे भी कोरोना पेशेंट के लिए आजकल अस्पतालों में न बेड है, न गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आक्सीजन सिलेंडर. जो कुछ हैं भी तो वो बड़े व वीवीआईपी के लिए आरक्षित-सुरक्षित हैं. ज्यादा बड़े वीवीआईपी तो मैक्स व मेदांता जैसे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. ग़ज़ब है ये देश. ग़ज़ब है इस देश के हुक्मरां जिन्होंने अपनों की जेबें तो खूब भरी-भरवाईं लेकिन देश की जनता के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया न करा सके. हर कोई विजय विनीत जी जैसा भाग्यशाली नहीं है कि उन्हें मुश्किल वक्त में कुछ जिद्दी डाक्टर मिल जाएं. हर कोई विजय विनीत जैसा इच्छा शक्ति रखने वाला भी नहीं है. विजय विनीत की कहानी हमें डराती है. विजय विनीत की कहानी हमें बताती है फिलहाल तो सारी सत्ताओं से बड़ी मौत की सत्ता है जो अदृश्य होकर यहां वहां जहां तहां विराजमान है. कौन इसकी गिरफ्त चपेट में आएगा, न मालूम. ऐसे में जरूरी है कि हम आप यथासंभव प्रीकाशन रखें. जीवन-मृत्यु को उदात्तता से समझने-बूझने की प्रक्रिया शुरू कर दें ताकि मौत आए भी तो उसके साथ जाने में कोई मलाल शेष न रहे. हालांकि ये भी जान लीजिए कि मरता वही है जो दिमागी से रूप से मरने के लिए तैयार हो जाए. विजय विनीत जैसी कहानियां बताती हैं कि जिनमें जिजीविषा है, वो मौत को मात देकर उठ खड़े होते हैं. तो, समझिए बूझिए सब कुछ, पर जिजीविषा तगड़ी वाली बनाकर रखिए. जैजै भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 4 August 2020


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भोपाल। सदाबहार गायक, अभिनेता किशोर कुमार की आज मंगलवार को जंयती है। बॉलीवुड की फिल्मों में कई शानदार गानों को अपनी आवाज देने वाले किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था और उनका निधन 13 अक्टूबर को 1987 में हुआ। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। बॉलीवुड में कई सिंगर्स आए और गए लेकिन किशोर कुमार की आवाज का जादू आज भी बरकरार है। किशोर कुमार अभिन्न प्रतिभा के धनी थे। इसके अलावा वो व्यवहार से मजाकिया और मस्तमौला किस्म के इंसान थे। अब किशोर कुमार तो हमारे बीच नहीं पर उनकी यादें आज भी जिंदा हैं।   किशोर कुमार की जयंती पर आज उन्हें हर कोई याद कर रहा है। आम आदमी से लेकर राजनेता तक उन्हें याद कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किशोर कुमार को जयंती पर स्मरण कर उन्हें नमन किया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा ‘जिंदगी के हर पल को जिंदादिली के साथ जीने वाले, महान गायक, अभिनेता स्व. किशोर कुमार की जयंती पर नमन। वह बहुत शान से 'किशोर कुमार खंडवे वाले' कहते हुए अपना परिचय देते थे। अपनी जड़ों से इतना प्रेम करने और सदा जुड़े रहने वाले अपने रत्न को मध्यप्रदेश कभी विस्मृत न कर सकेगा।   भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने संदेश में कहा ‘चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना...हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, संगीतकार, निर्माता-निर्देशक और साथ में एक उम्दा पाश्र्व गायक श्री किशोर कुमार जी की जयंती पर सादर नमन...।   गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपने ट्वीट में कहा ‘मप्र की माटी के सपूत किशोर कुमार जितने अच्छे गायक थे, उतने ही जिंदादिल इंसान। उनकी गाने की शैली अद्वितीय थी।

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Dakhal News 4 August 2020


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एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिव्री शुल्क के किराने का सामान उपलब्ध वाराणसी : कोरोना महामारी के ऐसे मुश्किल समय में वाराणसी में रहने वाले लोगों के लिए एक ख़ुशखबरी है। अब ग्राहकों को घर बैठे एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिवरी शुल्क के किराने का सामान ऑर्डर फ़रमाइए द्वारा घर पर डिलिवर करवाया जाएगा। ग्राहकों को बस व्हाट्सएप या कॉल करके अपना ऑर्डर देना होगा और चंद मिनटों में उनके घर सामान पहुँचाया जाएगा। ऑर्डर फ़रमाइए के संस्थापक श्री जितेश पांडेय और राहुल अग्रहरी हैं। जितेश पांडेय ने बताया कि ‘जिस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री जी का कहना है कि हमें आपदा को अवसर में बदलना है तो इसी बात से प्रेरणा लेते हुए हमने इस कंपनी की शुरुआत की। अभी हम ऑर्डर फ़ोन और वट्सऐप द्वारा ले रहे हैं और जल्द ही हम इसकी ऐप भी लॉंच करेंगे’। राहुल अग्रहरी का कहना है ‘ऑर्डर फ़रमाइए के द्वारा हम लोगों की समस्या का निवारण करना चाहते हैं। हम जानते हैं कि इस वैश्विक बीमारी के समय में लोग अपने घरों से बहुत कम निकलना चाहते हैं क्यूँकि सबके मन में डर बैठा हुआ है। हम लगातार प्रयास कर रहे हैं कि लोगों की ज़रूरतों का सामान उचित तरीके से सेनेटाइज़ करके उनको उपलब्ध करवाया जा सके जिससे लोगों को किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े’।

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Dakhal News 30 July 2020


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तो क्या सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के बाद भी होगा कोरोना! दुनिया को ज्ञान देने वाले अमिताभ, शिवराज, सिकेरा जैसों ने क्या कोरोना से बचने के लिए एहतियात नहीं बरती थी! उठने वाले तमाम सवाल वाजिब भी हैं। तर्कपूर्ण सवालों के पीछे कोरोना से बचाव की जिज्ञासा और भय है। लेकिन सियासी प्रतिद्वंद्विता में बीमार का मज़ाक उड़ाने की मंशा बेहूदगी लगती है। ये सच है कि ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो ना सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग का खूब पालन कर रहे थे बल्कि दूसरों को भी जागरुक कर रहे थे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और चर्चित पुलिस अफसर नवनीत सिकेरा समेत दर्जनों ऐसे लोग कोरोना से संक्रिमित हो चुके हैं। अब इन दो बातों में एक बात तो सही होगी ही। या तो ये कि जितनी भी एहतियात कर लो फिर भी आप इस संक्रमण का शिकार हो सकते हैं। दूसरी बात कि अमिताभ और शिवराज जैसी देश दुनिया की तमाम खास हस्तियों ने सोशल डिस्टेंसिंग और तमाम एहतियातों को बरतने में लापरवाहियां कीं। ये लोग दुनियां को कोविड से बचने का ज्ञान देते रहे किंतु खुद ही जागरूक नहीं थे ! कोरोना के भय, मुसीबतों और इस पर डिबेट में ऐसी बातें भी चर्चा का विषय बनी हैं। इस संजीदा और बुरे वक्त में संक्रमित बड़ी.हस्तियों का मजाक उड़ाने वालों की भी कमी नहीं है। आम इंसान ही नहीं खास लोग भी कोरोना पीड़ित ख़ास लोगों का मज़ाक उड़ा रहे हैं। राजनीति कर रहे हैं। कोरोना पीड़ित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सवाल पूछा है कि क्या आपने सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं रखा था ! दिग्विजय के अलावा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी खोने वाले कमलनाथ ने भी ट्वीट करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर तंज़ कसा है। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले कोरोना काल में ही मध्यप्रदेश के सियासी घटनाक्रम में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार चली गयी थी और यहां भाजपा की सरकार बनी जिसमें शिवराज सिंह चौहान पुनः मुख्यमंत्री बनाये गये। कांग्रेस ने आरोप लगाये थे कि भाजपा ने खरीद-फरोख्त कर उनके विधायकों को तोड़ कर सरकार गिरवायी। जाहिर सी बात है कि सूबे के कांग्रेसी दिग्गजों को अपनी सरकार के गिरने का मलाल होगा ही। ये कुंठा कहिए या प्रतिशोध की भावना कहिए, अब कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का मज़ाक उड़ा रहे हैं। महामारी से जूझ रहे देश के संकटकाल में गंदी सायासत का आलम ये है कि संक्रमितों का उपहास उड़ा जा रहा है। बिहार भाजपा कार्यालय और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कुछ पदाधिकारियों को कोरोना होने पर व्यंग्य किये गये। इसके अतिरिक्त एक मीडियों समूह के कार्यालय से लेकर बिग बी के बंगले जलसा में संक्रमण फैलने को भी कुछ लोगों ने मजाक में लिया। हांलाकि कोई वर्ग, कोई क्षेत्र और पेशा कोविड के कहर से छूटा नहीं है। लेकिन जब जागरूकता की बात करने वाले और लापरवाही पर एतराज करने वाले इसका शिकार होते हैं तो ऐसे लोगों को सोशल मीडिया में खूब निशाने पर लिया जाता है। सिंगर कनिका कपूर और मरकज के जमातियों का भी जिक्र होता है। तर्क दिया जाता है कि कोरोना काल के शुरुआती दौर में कनिका और जमातियों के संक्रमित होने पर उन्हें लापरवाह बताया गया था। और अब ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो कहते थे कि ये वायरस लापरवाही करने से क़ाबिज होता है। नवेद शिकोह

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Dakhal News 30 July 2020


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अजय कुमार, लखनऊ लखनऊ। पांच अगस्त को अयोध्या में प्रभु राम की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन के साथ ही हिन्दुस्तान की सियासत का एक महत्वपूर्ण पन्ना बंद हो जाएगा। तीन दशकों से भी अधिक से समय से देश की सियासत जिस ‘मंडल-कमंडल’ के इर्दगिर्द घूम रही थी, वह अब इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। मंडल यानी पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बना आयोग और कमंडल मतलब आयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा चलाया गया अभियान। मंडल-कमंडल की सियासत ने अगड़े-पिछड़े के नाम पर हिन्दुओं में बड़ी फूट डाली थी और इसके लिए संविधान को मोहरा बनाया गया था। दरअसल, 1931 की जनगणना के हिसाब से देश में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जनसंख्या 52 फीसदी और अनुसूचित जाति (एससी) की 16 एवं व अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 7.5 प्रतिशत थी। एससी और एसटी वर्ग को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता था, जबकि पिछड़ा समाज के लोग अपने लिए भी आरक्षण चाहते थे। इसकी वजह थी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 (4), जो कहता है कि सरकार पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है। बहरहाल, जब तत्कालीन केन्द्र सरकार पर पिछड़ों को आरक्षण के लिए काफी दबाव पड़ने लगा तो प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग गठित कर दिया। 1978 में बने बी पी मंडल आयोग ने 12 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट मोरारजी सरकार को सौंपते हुए जनसंख्या के हिसाब से ओबीसी को 52 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन इन सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। जब मंडल आयोग ने सिफारिश की थी तब मोरारजी देसाई की ही सरकार थी, जो आपसी खींचतान के चलते अपना कार्यकाल पूरा किए बिना गिर गई थी। मोरार जी की सरकार गिरने के बाद हुए लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने लेकिन बोफोर्स घोटाले के कारण जनता में भरोसा खो दिया और एकजुट विपक्ष ने उन्हें चुनाव में पटखनी दे दी। तत्पश्चात वी पी सिंह संयुक्त मोर्चे के प्रधानमंत्री बने। मोर्चे में देवी लाल, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे जो अपने आप को पिछड़ों का नेता कहते थे और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होते हुए देखना चाहते थे। प्रधानमंत्री वीपी सिंह के सामने हालात यह बन गए कि अगर मंडल कमीशन लागू नहीं किया तो उक्त नेता उनकी सरकार गिरा देंगे। इसी दबाव के बीच वीपी सिंह ने 7 अगस्त 1990 को मंडल कमीशन की रिपोर्ट की धूल झाड़ी और 13 अगस्त 1990 को इसे लागू कर दिया। लेकिन इसके कुछ दिनों के बाद इन नेताओं ने वीपी की सरकार गिरा कर ही चैन लिया। उधर, मंडल कमीशन लागू होते ही 12 सितंबर 1990 को दिल्ली में बीजेपी की मीटिंग बुला ली गई। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के तुरंत बाद ही भाजपा ने कमंडल अर्थात अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनवाने की लड़ाई अपने हाथों में ले ली। भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा शुरू करने का एलान कर दिया। आडवाणी की इस यात्रा को मंडल की काट के रूप में देखा गया। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से देशभर में सवर्णों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। यह ऐसा दौर था जब उत्तर भारत की जाट, पटेल, मराठा जैसी बड़ी किसान जातियां सवर्णों के साथ विरोध प्रदर्शन में भाग ले रही थी तो दूसरी तरफ ‘आओ अयोध्या चलें’ वाले कमंडल के नारों के साथ जयकारे लगा रही थी। इसी बीच मंडल कमीशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को अपने फैसले में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण न करने की बात कहकर 52 फीसदी ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण तक सीमित कर दिया व एक लाख रुपये से ज्यादा आय वालों को क्रीमीलेयर की श्रेणी में डाल दिया, जो आज तक बदस्तूर जारी है। उधर, अन्य सियासी घटनाक्रम में एक तरफ लालू यादव व मुलायम सिंह यादव कमंडल का विरोध करते हुए मुसलमानों के नेता बन गए थे तो दूसरीं तरफ इन नेताओं ने यादवों को आरक्षण दिलवाकर उनका भी विश्वास जीत लिया। लेकिन समय के साथ मंडल की आग धीमी पड़ती गई और बीजेपी अयोध्या मुद्दे को गरमाती रही। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद हिन्दुओं में जो खाई पैदा हो गई थी, उसे कमंडल की राजनीति ने पूरी तरह से पाट दिया और पूरा हिन्दू समाज एकजुट होकर मंदिर निर्माण के पक्ष में खड़ा हो गया। इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और बीजेपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बहरहाल, पांच अगस्त को भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन के साथ बीजेपी की कमंडल की सियासत भी खत्म हो जाएगी। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि मंदिर निर्माण के साथ ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच की खाई भी खत्म हो जाएगी क्योंकि मंदिर के साथ मस्जिद का भी निर्माण हो रहा है। यह काफी सौहार्दपूर्ण स्थिति है।   ऐसा लगता है कि अयोध्या में श्री राम मंदिर के भव्य निर्माण के साथ ही देश में सांप्रदायिक समरसता का भी नया युग प्रारम्भ हो जाएगा। तीन दशकों से जन्मभूमि विवाद के कारण देश के सांप्रदायिक सद्भाव को गहरी चोट पहुंच रही थी। गत वर्ष नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवाद के समाधान के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों पक्षों ने जिस सहिष्णु मानसिकता के साथ सारे पूर्वाग्रह त्यागकर इसे स्वीकार किया, उसने पूरी दुनिया को चौंकाया जबकि दशकों से इसे मुद्दा बनाकर वोटबैंक राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को निराश किया। इससे यह धारणा भी पुष्ट हो गई कि मंदिर-मजिस्द के नाम पर राजनीति दल और कारोबारी मानसिकता के संगठन स्वार्थ सिद्ध कर रहे थे, दोनों पक्षों के आम लोगों की विवाद बढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी। लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Dakhal News 28 July 2020


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  एक बड़े कॉलेज के मैनेजिंग डायरेक्टर से बात हुई। हालचाल पूछा तो बोले- हाल तो बेहाल हैं। कोरोना के चलते हॉस्टल खाली हैं। छात्र गायब हैं, छात्रों ने फीस नहीं दी है। एडमिशन का समय है, लेकिन नए छात्र रजिस्ट्रेशन भी नहीं करवा रहे हैं। कमाई पूरी तरह ठप है। कहां से दें अध्यापकों और बाकी कर्मचारियों का का वेतन। बोले-भाई साहब ऐसा ही चलता रहा तो 70 फीसदी प्राइवेट कॉलेज बंद हो जाएंगे। प्राइवेट कॉलेज के अध्यापक आत्महत्या पर मजबूर हो जाएंगे।   कुछ दिन पहले एक मित्र का फोन आया था। कस्बाई इलाके में इंटर तक प्राइवेट स्कूल चलाते हैं। छात्रों ने स्कूल में आना बंद कर दिया तो अभिभावकों ने फीस भी बंद कर दी। अध्यापक से लेकर चपरासी तक पैदल हो गए। मुझसे कहा-सर मीडिया में ये बात उठवाइए, बेलआउट पैकेज तो स्कूल और कॉलेजों को मिलना चाहिए।     मेरे बहुत ही घनिष्ठ मित्र एजुकेशन के बिजनेस में हैं । उनके लाखों रुपये तमाम मेडिकल कॉलेजों में फंसे हैं। कॉलेज पैसे नहीं दे पा रहे हैं और इस पेशे में इतना बैक अप नहीं होता कि वो बहुत दिनों तक अपने पास से कर्मचारियों को वेतन दे पाएं।   गाजियाबाद के एक डेंटल कॉलेज की हालत ये है कि वहां चार महीने से स्टाफ को वेतन नहीं मिला है। मैनेजमेंट ने कह दिया है कि आप चाहे आएं या न आएं आपकी मर्जी। हम तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं हैं। कॉलेज में फीस नहीं आ रही है। नीट का इम्तिहान भी आगे बढ़ गया है, जाने कब इम्तिहान होगा, कब नतीजे आएंगे और कब छात्र कॉलेज पहुंचेंगे। नए एडमिशन हो नहीं रहे हैं, कॉलेज में पैसे कहां से आएं। तमाम प्राइवेट स्कूल-कॉलेजों की हालत खस्ता है। प्राइवेट कॉलेज के कई अध्यापक अब सब्जी और फल बेच रहे हैं। ऐसी खबरें रोज आ रही हैं।   उन अभिभावकों की भी हालत खराब है, जो प्राइवेट नौकरी में रहते हुए छंटनी के शिकार हो गए या फिर बिजनेस में थे और कोराना काल के लॉकडाउन में उनके बिजनेस की रीढ़ ही टूट गई। जिंदगी में दो जून की रोटी के लाले पड़ गए तो बच्चों की फीस का इंतजाम कहां से करें..? ये लोग और आर्थिक दुष्चक्र में फंसे कॉलेज मालिक हर रोज एक नई सुबह का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अंधेरा छंटने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोरोना से बच भी गए तो इस अंधेरे से बचने का उनके पास रास्ता क्या है..?   ये हालत उन मेडिकल, इंजीनियरिंग और सामान्य प्राइवेट कॉलेजों की है, जिनमें फीस अपेक्षाकृत कम है, जो बहुत मशहूर नहीं हैं। जो ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में हैं। जो बड़े शहरों में फाइव स्टार स्कूल और कॉलेज हैं, वहां ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चों की 4-4 घंटे तक ऑनलाइन क्लास चल रही है। बच्चे पस्त हो जा रहे हैं, गार्जियन के सामने नए-नए बहाने बना रहे हैं। बच्चे अवसाद के शिकार भी हो रहे हैं।   ऐसे स्कूलों में फीस न देने का कोई रास्ता नहीं है। कोई मुरव्वत नहीं, फीस नहीं तो नाम कट। अब जहां-तहां से इंतजाम करके लोग फीस भर रहे हैं। यही नहीं तमाम स्कूल तो तय सीमा से ज्यादा फीस ले रहे हैं। वाहन बंद हैं, लेकिन उसकी फीस भी ली जा रही है। स्कूल प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि कोरोना काल में अभिभावक संगठित नहीं हो सकते तो इनकी पहले भी चांदी थी, अब भी चांदी है।   मेरे पुत्र भी एक फाइव स्टार प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं। कर तो रहे हैं बीए ऑनर्स, लेकिन फीस देते वक्त मुझे इंजीनियरिंग और मेडिकल में बेटे को पढ़ाने का गौरव महसूस होता है। सैमेस्टर की फीस जमा करने के लिए यूनिवर्सिटी सिर्फ 2 दिन का वक्त देती है। वो भी बिना पूर्व सूचना के। फीस में एक दिन की भी देरी हुई तो लेट पेमेंट के नाम पर करीब हजार रुपये का चूना। ज्यादा देर हो गई तो दोगुनी फीस भी देनी पड़ सकती है।   उन तमाम मध्यमवर्गीय, निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है, जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं। सबकी ऑनलाइन क्लास एक ही वक्त चलनी है। घर में पहले एक स्मार्ट फोन था तो अब जरूरत उससे ज्यादा की है। स्मार्ट फोन पर ऑनलाइन क्लास तो सजा ही है, सही मायने में तो लैपटॉप चाहिए। लेकिन 3-4 बच्चों के लिए 3-4 लैपटॉप का इंतजाम अभिभावक कैसे करेंगे..? अभी एक खबर आई है कि एक आदमी ने अपनी गाय बेचकर बच्चे के लिए मोबाइल खरीदा ताकि बेटा ऑनलाइन पढ़ाई कर ले। अब वो शख्स हर महीने मोबाइल डाटा रिचार्ज करने का पैसा कहां से लाएगा, भगवान जाने।   मेरठ में मेरे एक परिचित के तीन बच्चे हैं, तीनों की क्लास एक ही वक्त शुरू हो जाती है, अड़ोस-पड़ोस से मोबाइल मांगकर लाते हैं। घर में एक लैपटॉप है, उसको लेकर झगड़ा मचता है। मेरी एक पूर्व साथी ने कॉल करके बोला- सर ये स्कूल वाले तो बच्चों की जान ले लेंगे। गाइडलाइन है कि 8वीं तक के छात्रों की ऑनलाइन क्लास डेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन स्कूल वाले तो 3 से 4 घंटे तक बेटी को पीस रहे हैं। बेटी शायद दूसरी या तीसरी क्लास में पढ़ रही है।   कोरोना काल में अभिभावक की हालत ये है कि जैसे बच्चा पैदा करना अपराध हो गया है। वहां मुश्किल और भी ज्यादा जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी में हैं। उन्हें अपने काम पर जाना है और बच्चे को ऑनलाइन क्लास भी अटेंड करनी है। माता-पिता की गैरमौजूदगी में इंटरनेट पर बच्चा अपनी क्लास के अलावा क्या-क्या देख सकता है, खतरा आप समझ सकते हैं। वो भी बच्चे को किसके भरोसे छोड़कर जाएं..? अब जरा सरकारी स्कूलों का हाल भी सुनिए। यूपी के प्राइमरी टीचर्स को राशन कार्ड पर मुफ्त राशन बंटवाने की जिम्मेदारी दी गई है। मेरी एक मित्र प्राइमरी स्कूल में अध्यापक है। एक दिन फोन पर बता रही थी-मुफ्त राशन उन्हीं को मिल रहा है, जिनके पास राशन कार्ड है, लेकिन जो वाकई जरूरतमंद हैं, उनमें से ज्यादातर के पास न तो राशन कार्ड हैं और न ही उन्हें राशन मिल रहा है। स्कूल भी चल रहा है, ऑनलाइन पढ़ाना है। अब अगर घर में स्मार्ट मोबाइल फोन की हैसियत होती तो वो सरकारी स्कूलों में क्यों पढ़ते। मेरी मित्र बता रही थी कि 40 बच्चों की क्लास में बमुश्किल दो बच्चों के घर मोबाइल फोन है। पढ़ाई भगवान भरोसे है।   आजतक न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से। विकास मिश्र

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Dakhal News 28 July 2020


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नवेद शिकोह कोराना के मुश्किल दौर में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संशोशित ‘मीडिया नीति 2020’ एक अगस्त से लागू होने जा रही है। ये देश के हजझारों मझौले अखबारों को महा कोरोना बन कर डराने लगी है। हिन्दी पट्टी के सार्वाधिक अखबारों वाले उत्तर प्रदेश में इसका सबसे अधिक खौफ है। इस सूबे से प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया के सदस्य संशोधित नीति के खिलाफ बगावती तेवर दिखा रहे है। मंझोले अखबारों पर लटकटी तलवार से प्रदेश की राजधानी के लगभग एक हजार राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों में सैकड़ों पत्रकारों की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए यहां पत्रकार मीडिया संगठनों के नेताओं पर दबाव बना रहे हैं कि वो संशोधित मीडिया नीति के खिलाफ आवाज उठायें। इस संशोधित नीति के तहत पच्चीस से पैतालिस हजार के बीच प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को आर.एन.आई. या एबीसी की जटिल जांच करानी होगी। इस जांच में मंहगी वेब प्रिंटिंग मशीन, न्यूज प्रिंट(अखबारी क़ागज) और इंक इत्यादि की डिटेल, कार्यालय स्टॉफ, पीएफ, प्रसार डिस्ट्रीब्यूशन के सेंटर आदि का विवरण देना होगा। कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्रों के लिए ऐसी अग्नि परीक्षा देना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता के लिए पच्चीस हजार से अधिक प्रसार होना ज़रूरी है। यदि मंझोले अखबार जांच से बचने के लिए अपने अखबारों का प्रसार पच्चीस हजार से कम करके लघु समाचार पत्र के दायरे में आ जाते हैं तो ऐसे अखबारों के सैकड़ों पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता समाप्त हो जायेगी। इसलिए यूपी के मीडिया संगठनों पर प्रकाशक और पत्रकार ये भी दबाव बना रहे हैं कि वे योगी सरकार से प्रेस मान्यता के मानकों को संशोधित करवाना का आग्रह करें। ताकि संशोधित मीडिया नीति के तहत जांच से बचने के लिए मझोले वर्ग से लघु समाचार पत्र के दायरे में आने वाले समाचार पत्रों के पत्रकारों की मुख्यालय मान्यता बच जाये।   इन तमाम घबराहट, बगावत, सियासत और विरोध के बीच प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य अशोक नवरत्न और रज़ा रिज़वी केंद्र सरकार के सूचना एंव प्रसारण मंत्रकालय के फैसले के खिलाफ प्रकाशकों और पत्रकारों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कुछ मीडिया संगठनों ने भी संशोधित नीति का विरोध करना शुरु कर दिया है। इसे छोटे अखबारों को खत्म करने की साजिश बताया जा रहा हैं। चर्चा ये भी है कि देश के चंद बड़े अखबारों ने स्थानीय अखबारों को खत्म करने के लिए ऐसी साजिश रची है। सोशल मीडिया पर प्रकाशकों और कलमकारों का विरोध मुखर हो रहा है- हर क्षेत्र की बड़ी ताकतें होती हैं। ऐसी शक्तियां अपने क्षेत्र की संघर्षशील प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहतीं। जैसा कि उभरते हुए फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की आत्महत्या की वजह के पीछे फिल्म उद्योग की बड़ी ताकतों को शक की निगाहों से देखा जा रहा है। ताकत की ताकत से दोस्ती होती है। बड़ी मीडिया इंडस्ट्रीज की हर सरकार से दोस्ती रही है। दोस्त दोस्त के काम भी आता है। इन दिनों कोरोना काल की तबाही में तबाह होती हर इंडस्ट्री की तरह मीडिया की अखबारी खर्चीली ब्रॉड इंडस्ट्री बुरी तरह आर्थिक मंदी का शिकार है। कई संस्करण बंद कर दिए, पेज भी कम कर लिए। छंटनी कर ली। वेतन आधा कर दिया। कांट्रेक्ट पर काम कर रहे मीडियाकर्मियों का रिनिवल बंद कर दिया। कॉस्ट कटिंग और छट्नी की तलवाल भी चला दी, लेकिन फिर भी कमाई के मुख्य द्वारा लगभग बंद हैं। वजह साफ है। मीडिया में सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन ही अर्निंग के दो रास्ते होते हैं। कोरोना की चपेट में ये आधे हो गये हैं। सरकार आने वाले समय में विज्ञापन जैसे खर्चों का खर्च और भी कम कर सकती है। गैर सरकारी विज्ञापन आधे से भी कम हो गया है। कार्पोरेट के कामर्शियल विज्ञापनों से लेकर वर्गीकृत विज्ञापन बेहद कम हो गये हैं।अब कैसे अपने बड़े खर्च पूरे करें ! कैसे विज्ञापन का स्त्रोत बढ़ायें ! इस फिक्र में बड़े ब्रॉड अखबारों को एक रास्ता सूझा होगा ! विज्ञापनों के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे लोकल अखबारों के हिस्से में चला जाता है। ये खत्म हो जायें या लघु वर्ग में पंहुचकर इनकी विज्ञापन दरें बेहद कम हो जायें तो सरकारी विज्ञापन के अधिकांश बजट पर बड़े अखबारों का कब्जा हो जायेगा। ये डूबते को तिनके का सहारा होगा। शायद इसी लिए ही देश के बड़े मीडिया समूहों के दबाव में इस कोरोना काल के तूफान में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संशोधित मीडिया पॉलिसी लागू कर रहा है।नहीं तो ऐसे वक्त में जब पीआई बी में नियमित अखबार जमा होने का सिलसिला तक चार महीने से रुका है। आर एन आई ने तीन महीने विलम्ब से एनुअल रिटर्न का सिलसिला शुरू किया। देश में सबकुछ अस्त-वयस्त है। पुराने जरूरी रुटीन काम तक बंद है। सूचना मंत्रालय के अधीन कार्यालय में ही कोरोना संक्रमण से बचाव के मद्देनजर शेडयूल वाइज थोड़े-थोड़े कर्मचारी बुलाये जाते हैं। ऐसे में देश के सैकड़ों अखबारों और सैकड़ों कर्मचारियों को फील्ड में निकल कर इकट्ठा होने का नया काम देने वाली नई संशोधित मीडिया पॉलिसी को हड़बड़ी में लागू करने का क्या अर्थ है ! नियमानुसार मीडिया पॉलिसी संशोधन से पहले प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया की सहमति लेना जरुरी होती है, किंतु कौंसिल के सदस्य आरोप लगा रहे हैं कि इस संबंध में उनसे परामर्श के लिए कोई बैठक तक नहीं हुई। उत्तर प्रदेश से कौंसिल के सदस्य सवाल उठा रहे हैं कि कोरोना काल में कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्र जो पहले ही आर्थिक तंगी से बेहाल हैं ऐसे में उनपर जांच थोपने का क्या अर्थ है। ऐसे में देश के कोरोना काल में मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के प्रकाशकों को एक नया कोरोना डराने लगा है। कोविड 19 वाले कोरोना वायरस की चपेट वाले तीन फीसद को जान का खतरा और 97% को ठीक होने की उम्मीद होती है। लेकिन यहां अखबार के प्रकाशकों को जिस नये कोरोना का डर सता रहा है उसमें 97% को खत्म हो जाने का डर है।   पब्लिशर्स को डराने वाले कोरोना संशोधित मीडिया पॉलिसी के अंतर्गत मंझोले वर्ग के प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को निर्देश दिया गया है कि इन्हें आर.एन.आई या ए बी सी की जटिल जांच की अग्नि परीक्षा से ग़ुजरना होगा। तब ही मध्यम वर्गीय प्रसार संख्या वर्ग में सरकारी विज्ञापन की दर बर्करार रहेगा, अन्यथा इनकी डीएवीपी की मान्यता समाप्त कर दी जायेगी। जांच ना कराने की स्थिति में प्रकाशकों के पास एक मौका है। वो पच्चीस हजार के ऊपर के प्रसार का दावा छोड़कर पच्चीस हजार के अंदर प्रसार का ही दावा करें। यानी लघु समाचार के वर्ग में आकर वो कम विज्ञापन दरों में ही संतोष करे, अन्यथा जांच करायें। जो ज्यादातार प्रकाशकों के लिए मुम्किन ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए प्रकाशक कह रहे हैं कि जांच का ये कोरोना हमें मार देगा !

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Dakhal News 28 July 2020


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सूर्या समाचार सहित कई न्यूज़ चैनलों में बतौर एंकर और प्रोड्यूसर काम करने वाली दीप्ति यादव इन दिनों अपने पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेढ़क’ से वापसी कर चुकी है और पूरी तरह सक्रिय है। 9 जुलाई को लांच हुए इस पॉडकास्ट चैनल की लोकप्रियता को देखते हुए इसे स्पॉटीफाई सहित 6 प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया है। इस चैनल के जरिये दीप्ति यादव युवा कवियों और लेखकों की रचनाओं और कहानियों को बिल्कुल अलग अंदाज में पेश करती हैं। इसके अलावा वह खुद की कविताओं को भी बेहद रोचक तरीके से पेश करती हैं। इस तरह यह प्लेटफॉर्म गलियों और मोहल्लों के युवा लेखकों को प्रमोट करने का एक माध्यम बनता जा रहा है। उनके पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेंढक’ का नाम जितना दिलचस्प है उतना ही दिलचस्प है इस चैनल का हर एक एपिसोड का कंटेंट। फिलहाल दीप्ति यादव खुद इसका कंटेंट भी लिख रही है, एडिटिंग भी कर रही है, आवाज़ भी दे रही है और सबसे खास बात इसके हर एपिसोड में एक मेंढक भी आता है जिसकी आवाज़ भी खुद दीप्ति ही दे रही हैं। हमेशा एंकर के रूप में दिखने वाली दीप्ति इन दिनों कविताएं भी लिख रही है और कवि सम्मेलनों में अपने एंकर और रेडियो जॉकी अंदाज़ को समावेशित कर बेहतरीन प्रस्तुति भी दे रही है। एक वॉइस ओवर आर्टिस्ट के तौर पर अब तक कई सारे कमर्शियल ऐड का चुकी है फ़िलहाल कुछ कार्टून कैरेक्टर के वॉइस ओवर के लिए भी कई कंपनियों से उनकी बात चल रही है। पॉडकास्ट एक नए तरीके का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जिसमें खुद का रेडियो चैनल बना कर अपनी रचनात्मकता को नया आयाम दिया जा सकता है। इसे आवाज की दुनिया का टिकटॉक कहा जा सकता है। यूपी के उन्नाव जैसे छोटे शहर से निकली और कानपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने वाली दीप्ति रेडियो से भी बेहद प्यार है और इसी रेडियो को उन्होंने पॉडकास्ट में बेहतर उतारा है। उनके पॉडकास्ट चैनल की तारीफ ‘भाभी जी घर पर हैं’ के टिल्लू यानी सलीम ज़ैदी भी कर चुके है। 2019 में सूर्या समाचार में कार्यरत दीप्ति यादव ने स्वास्थ्य कारणों के चलते चँनेल से इस्तीफा दिया था। लॉकडाउन के दौर में जब मीडिया सेक्टर में जबर्दस्त छंटनी का दौर चल रहा है, दीप्ति ने दिखाया है कि अगर आपके अंदर रचनात्मकता और आईडिया है तो आपके पास विकल्पों की कमी नही है। सोशल मीडिया के इस जमाने में खुद को साबित करने के लिए किसी बड़े बैनर की जरूरत नही और न ही किसी एकलव्य की तरह किसी को अंगूठा काट के देने की विवशता झेलनी पड़ती है। आप भी उनके इस प्लेटफॉर्म से जुड़ सकते हैं और सुझाव भी दे सकते हैं.. आपका स्वागत है.

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Dakhal News 23 July 2020


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एक बादशाह ने रफूगर रखा हुआ था, जिसका काम कपड़ा रफू करना नहीं, बातें रफू करना था. एक दिन बादशाह दरबार लगाकर शिकार की कहानी सुना रहे थे, जोश में आकर बोले – एकबार तो ऐसा हुआ मैंने आधे किलोमीटर से निशाना लगाकर जो एक हिरन को तीर मारा तो तीर सनसनाता हुआ हिरन की बाईं आंख में लगकर दाएं कान से होता हुआ पिछले पैर के दाएं खुर में जा लगा. जनता ने कोई दाद नहीं दी. वो इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे. इधर बादशाह भी समझ गया ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी छोड़ दी.. और अपने रफूगर की तरफ देखने लगा… रफूगर उठा और कहने लगा.. हज़रात मैं इस वाक़ये का चश्मदीद गवाह हूँ, दरसल बादशाह सलामत एक पहाड़ी के ऊपर खड़े थे हिरन काफी नीचे था, हवा भी मुआफ़िक चल रही थी वरना तीर आधा किलोमीटर कहाँ जाता है… जहां तक बात है ‘आंख’ , ‘कान’ और ‘खुर’ की, तो अर्ज़ करदूँ जिस वक्त तीर लगा था उस वक़्त हिरन दाएं खुर से दायाँ कान खुजला रहा था,… इतना सुनते ही जनता जनार्दन ने दाद के लिए तालियां बजाना शुरू कर दीं… अगले दिन रफूगर बोरिया बिस्तरा उठाकर जाने लगा… बादशाह ने परेशान होकर पूछा– कहाँ चले? रफूगर बोला- बादशाह सलामत मैं छोटी मोटी तुरपाई कर लेता हूँ, शामियाना सिलवाना हो तो इंडियन मीडिया को रख लीजिए!

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Dakhal News 23 July 2020


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Pushya Mitra : अगर यह अवमानना है तो सोचता हूँ, थोड़ी सी सविनय अवमानना मैं भी कर लूं। खबर है कि इस ट्वीट के लिये प्रशांत भूषण जी पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा हुआ है। Vijay Shankar Singh : सीजेआई जस्टिस बोबड़े की एक फोटो एक महंगी मोटर बाइक पर खूब चर्चित हुयी और उसी का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट कर दिया। अब उस ट्वीट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की नोटिस जारी कर दी है। यह भी खबर थी कि वह बाइक एक भाजपा नेता की थी, और जस्टिस बोबडे बिना हेलमेट के उस बाइक पर बैठे थे। न्यायमूर्ति अरुण मिश्र अवमानना पीठ के अध्यक्ष हैं। यह मामला वह सुनेंगे। प्रशांत भूषण का ट्वीट इस प्रकार है,CJI rides a 50 Lakh motorcycle belonging to a BJP leader at Raj Bhavan Nagpur, without a mask or helmet, at a time when he keeps the SC in Lockdown mode denying citizens their fundamental right to access Justice! इस ट्वीट में कौन से तथ्य मिथ्या हैं ? बाइक बीजेपी के नेता की है, सीजेआई, न तो मास्क लगाए हैं, और न हैलमेट। लॉक डाउन चल भी रहा था और अदालतें बंद भी थीं। फिर यह खुन्नस है या सच मे अदालत की तौहीन अब यह जब अदालत तय करे तो पता चले ! Jitendra Narayan : केवल प्रशांत भूषण पर ही क्यों? हम सब पर भी चलाओ अवमानना का केस…देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप मे आपकी हरकतें निंदनीय है और मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा के खिलाफ है…आपके दिए कई फैसले भी पूर्णतः पक्षपातपूर्ण और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है!

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Dakhal News 22 July 2020


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Vikas Mishra : गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी पर गोली चलाने वाले पकड़े गए हैं। पुलिस ने 9 बदमाशों को गिरफ्तार किया है। आमतौर पर बदमाशों के पैर में गोली मारकर गिरफ्तार करने वाली यूपी पुलिस ने इन अपराधियों को ‘रक्तहीन’ तरीके से गिरफ्तार किया है। पत्रकार विक्रम जोशी की भानजी के साथ कुछ बदमाश छेड़खानी कर रहे थे। इसकी रिपोर्ट लिखवाने वे गाजियाबाद के विजय नगर थाने गए थे। पुलिस ने रिपोर्ट तो नहीं लिखी। अलबत्ता रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश से खुन्नस खाए बदमाशों ने विक्रम जोशी पर ताबड़तोड़ गोलीबारी कर दी। एक गोली उनके सिर में लगी हुई है। अस्पताल में उनकी हालत गंभीर है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वो जल्द ही विक्रम जोशी को पूर्ण स्वस्थ करें। जिस वक्त बदमाशों ने विक्रम जोशी को गोली मारी, उस वक्त वे अपनी दो बेटियों के साथ टहलने निकले थे। बेटियां चिल्ला रही थीं, लेकिन अपराधियों पर खून सवार था। अब इन अपराधियों को अदालत, हवालात या जेल ले जाते वक्त अगर पुलिस की गाड़ी पलट जाए तो अपराधी जरूर पुलिस से पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश करेंगे। पुलिस पर गोली भी चलाएंगे। ऐसे में अगर पुलिस ‘आत्मरक्षार्थ’ उन्हें गोलियों से भून डालती है तो मैं व्यक्तिगत रूप से पुलिस का समर्थन करूंगा। यही नहीं, 24 घंटे बाद गिन लीजिएगा, मुझे यकीन है कि इस पोस्ट के कमेंट बॉक्स में आकर कम से कम 100 लोग इस बात का समर्थन करेंगे, जिनमें से ज्यादातर पत्रकार साथी होंगे। अगर पुलिस ऐसा कर पाई तो शायद अपना पाप भी धो सके। मुझे और मेरे तमाम पत्रकार साथियों को उम्मीद है कि बारिश के इस मौसम में गाजियाबाद पुलिस की गाड़ी जरूर फिसलेगी। नहीं फिसली तो भी पुलिस को ‘आत्मरक्षार्थ’ गोली चलाने का मौका जरूर मिलेगा। आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal, Journalist Vikram Joshi could not be saved

पत्रकार साथी विक्रम जोशी की इलाज के दौरान डेथ हो गई है। उनके भाई अनिकेत द्वारा ये जानकारी दी गई है। अनिकेत के अनुसार उन्हें आज सुबह 4 बजे इस बारे में बताया गया। भगवान विक्रम भाई की आत्मा को शांति दे। इस कठिन वक़्त में हम उनके परिवार के साथ खड़े हैं। विक्रम भाई को शहीद का दर्जा मिलना चाहिए। आरोपियों को मुठभेड़ में मारा जाना चाहिए। थाना प्रभारी पर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए जिसने पत्रकार द्वारा लिखित कंप्लेन दिए जाने के बावजूद आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। उधर, इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर दुख और क्षोभ व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 50 लाख रुपये की तात्कालिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में हेमंत तिवारी ने कहा कि की विगत एक वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमले, सरकारी उत्पीड़न, फर्जी मुकदमे लगाने की दर्जनों घटनाएं हुईं और हर बार शासन के वरिष्ठ अधिकारियों से बात हुई, पत्र लिखे गए लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि संवेदनशीलता नही दिखी । उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इस बार भी नकारात्मक रवैया अपनाती है तो पूरे प्रदेश पत्रकारों से संग्रह कराकर पीड़ित परिवार का सहयोग किया जाएगा ।परसों आपराधिक तत्वों ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की गोली मार दी थी जिनकी कल रात मौत हो गई है। जोशी को विजय नगर इलाके में स्कूटी सवार बदमाशों ने सोमवार को सिर में गोली मारी थी। इस सिलसिले में कल तक नौ लोगों को गिरफ्तार और चौकी इंचार्ज को निलंबित किया गया था।   विजयनगर बाईपास निवासी विक्रम जोशी एक समाचार पत्र से जुड़े थे। सोमवार रात वह माता कॉलोनी निवासी बहन के घर गए थे। रात करीब 10:30 बजे वहां से आते समय कुछ बदमाशों ने उन पर हमला बोल दिया। एक बदमाश ने तमंचा सिर से सटाकर विक्रम को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर हमलावर फरार हो गए। परिजनों के मुताबिक विक्रम जोशी के परिवार की एक लड़की के साथ छेड़छाड़ हुई थी। इस संबंध में थाने में नामजद शिकायत की गई थी। पुलिस द्वारा कार्रवाई न करने पर आरोपी पीड़ित पक्ष को लगातार धमकी दे रहे थे। विक्रम इस मामले की पुलिस में पैरवी कर रहे थे। इसी बात को लेकर आरोपियों ने उन्हें गोली मार दी।

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal,Miscreants shot journalist, head ,Ghaziabad , opposing molestation

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में बदमाश इतने बेखौफ हो गए हैं कि वह पत्रकारों पर भी गोली चलाने लगे हैं। गाजियाबाद में पत्रकार ने अपनी भांजी के छेड़ने की तहरीर पुलिस को दी थी। पुलिस ने ना उसमें कार्यवाही की और ना ही किसी की गिरफ्तारी की। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने पत्रकार को गोली मार दी। पत्रकार जिंदगी और मौत से अस्पताल में लड़ रहा है। गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी का कसूर बस इतना था अपनी भांजी को लगातार छेड़ने वालों के खिलाफ थाने में तहरीर दी थी। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने बीती रात विक्रम को गोली मार दी। विक्रम के सिर में गोली लगी है। वह गंभीर हालत में यशोदा अस्पताल में भर्ती है। पुलिस का कहना है कि आरोपियों पर कार्रवाई की जाएगी। सवाल ये है कि अगर पुलिस पहले ही आरोपियों पर कार्रवाई कर देती तो शायद विक्रम आज अस्पताल में भर्ती ना होता। गाजियाबाद में बदमाश लगातार हावी हो रहे हैं और पुलिस हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। बदमाश अब पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाने लगे हैं। जब पत्रकार ने तहरीर दी थी तो फिर आरोपी कैसे खुलेआम घूमते रहे? पुलिस लापरवाही का नतीजा है कि बदमाशों ने इस तरह की दुस्साहसिक वारदात को अंजाम दे डाला। फिलहाल पत्रकार साथी विक्रम जोशी की तबियत नाज़ुक बनी हुई है।

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal,New phase of films on third screen

–रवि राय– दो महीने पहले तक मोबाइल पर मैंने कोई फ़िल्म नहीं देखी थी। लॉकडाउन के दौरान सिनेमाहाल बन्द हो गए। मित्रों की राय पर नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और सोनी लिव डाउनलोड किया। पता चला कि यहां एक अलग फिल्मी दुनिया बसी हुई है। मिर्ज़ापुर, पाताल लोक, रंगबाज़, द फैमिली मैन, आर्या, स्पेशल ऑप्स, असुर, बेताल, डेल्ही क्राइम , माधुरी टाकीज़, ब्रीद, ब्रीद इनटू द शैडो, अपहरण आदि कई फिल्में देख डालीं। आठ से बारह एपिसोड्स की इन फिल्मों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पंकज त्रिपाठी, मनोज बाजपेयी, माधवन, अमित साध, केके मेनन से लेकर सुष्मिता सेन, कल्कि, शेफाली शाह जैसे स्थापित कलाकार छाए हुए हैं। कोविड 19 के वर्तमान प्रकोप को देखते हुए यह तो स्पष्ट है कि सिनेमाहाल निकट भविष्य में खुलने वाले नहीं हैं।खुले भी तो कोरोना के डर से दर्शकों का टोटा ही रहेगा।ऐसी स्थिति में मोबाइल पर फ़िल्म देखने का यह दौर क्या ऐसे ही चलता रहेगा ? ज़ाहिर बात तो यही है कि कोरोना से पहले जब आम दर्शक के पास दोनों विकल्प थे, मोबाइल पर फ़िल्म देखना आम नहीं था।उच्च एवं मध्यवर्ग के दर्शकों के लिए हज़ार दो हज़ार के खर्च में परिवार के साथ हॉल में सीट पर बैठ कर फ़िल्म देखने का मज़ा ही कुछ और था।मगर फ़िल्म की असली कमाई टिकट खिड़की पर टूट पड़नेवाले सेकेंड क्लास, फर्स्ट क्लास, डीसी के दर्शकों से ही होती रही है। जैसे भी हो सिनेमा दर्शकों से हुई कमाई को ही बॉक्स ऑफिस का नाम दिया गया यानी सिनेमा की आमदनी। शुरुआती दिनों में सौ करोड़ को सफल और इससे भी अधिक की कमाई को सुपर-डुपर हिट कहा गया।सलमान, शाहरुख, आमिर आदि की कई फिल्में तो पांच से छह सौ करोड़ या इससे भी आगे तक चली गईं। वर्ष 2016 में आमिर खान की ब्लॉक बस्टर फ़िल्म ‘दंगल’ ने दो हज़ार करोड़ के वैश्विक आंकड़े के साथ सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। आमिर की ही पीके (2014) ने 832 करोड़,प्रभास की बाहुबली 2 (2016) ने 650 करोड़, सलमान की बजरंगी भाई जान (2015) ने 626 करोड़,सलमान की सुल्तान (2016) ने 584 करोड़, आमिर खान की धूम3 (2013) ने 542 करोड़ की कुल कमाई की। मूल प्रश्न तो यही है कि क्या मोबाइल एप्प से फिल्मों की लागत भर की कमाई भी हो सकेगी ?इसके उत्तर के लिए मोबाइल पर फिल्मों के बारे में थोड़ा गहरे उतरना पड़ेगा। ऑडियो विजुअल मनोरंजन क्षेत्र में सिनेमा स्क्रीन के बाद टेलीविजन को सेकेंड स्क्रीन की पहचान मिली । इसी क्रम में मोबाइल को अब थर्ड स्क्रीन कहा जाने लगा है। थर्ड स्क्रीन पर मनोरंजन या अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने वाले एप्प्स को OTT कहते हैं यानी कि OVER THE TOP प्लेटफार्म। भारत में NETFLIX, AMAZON PRIME, VOOT, ZEE5, VIU, MAX, SONY LIV, ALT BALAJI आदि तमाम प्लेटफॉर्म ने तो खुद अपनी फिल्मों का प्रोडक्शन शुरू कर दिया है।अभी सामान्यतः इनका शुल्क डेढ़ से दो सौ रुपये मासिक है। यह सुविधा विज्ञापनयुक्त होती है और विकल्प यह है कि यदि आप विज्ञापनमुक्त स्ट्रीम चाहते हैं तो अधिक दाम देना होगा।इसे प्रीमियम सर्विस कहा गया है। सिनेमा से OTT का तो अभी मुकाबला ही नहीं है पर केबल या डिश टीवी बिजनेस में OTT ने सेंध लगा दी है। KPMG की रिपोर्ट है कि वित्तवर्ष 2019 में केबल और सेटेलाइट के कुल 19.7 करोड़ यूज़र्स में लगभग डेढ़ करोड़ यूज़र्स कम हुए। इस गिरावट की वजह ग्राहकों द्वारा केबल का नवीनीकरण न कराना, नए टैरिफ रेट में बढ़ोत्तरी और OTT पर बेहतर फिल्मों की उपलब्धता रही। इस वक्त भारत में करीब चालीस OTT प्रोवाइडर्स हैं। वर्ष 2018 में OTT से 2150 करोड़ की कुल कमाई हुई जो 2019 में 3500 करोड़ हो गई। इस वर्ष यह आराम से 5000 करोड़ तक पहुंचेगी । KPMG का आकलन है कि OTT का मार्केट वर्ष 2023 तक 13800 करोड़ तक पहुंच जाएगा । Ernst &Young ने कहा है कि वर्तमान वर्ष में भारत में 50 करोड़ एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोनधारक OTT प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएंगे। अब OTT की आमदनी का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। OTT का बढ़ता चलन देखते हुए कई स्मार्ट टीवी अब इनबिल्ट OTT चैनल्स भी दे रहे हैं। विगत दिनों में अमिताभ और आयुष्मान खुराना की गुलाबो सिताबो तथा अभिषेक बच्चन की ब्रीद इनटू द शैडो OTT पर रिलीज हुई। अगले कुछ दिनों में OTT पर आने वाली प्रमुख फिल्में हैं- सुशांत सिंह राजपूत की दिल बेचारा,विद्या बालन की शकुंतला देवी, अक्षय कुमार की लक्ष्मी बॉम्ब, अजय देवगन की भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया, संजय दत्त, पूजा व आलिया भट्ट की सड़क 2, अभिषेक की द बिग बुल,विद्युत जामवाल की खुदा हाफ़िज़। इसके अतिरिक्त गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल, टोरबाज,लूडो, क्लास ऑफ ’83, रात अकेली है, डॉली किट्टी और वो, चमकते सितारे, काली खुही ,बॉम्बे रोज, भाग बीनी भाग, बॉम्बे बेगम्स ,मसाबा मसाबा, AK vs AK, गिन्नी वेड्स सनी, त्रिभंगा- टेढ़ी-मेढ़ी क्रेजी, अ सूटेबल बॉय, मिसमैच, सीरियस मेन भी थर्ड स्क्रीन पर उपलब्ध होंगी। कुल मिला कर भारत में फिल्मों का सीन तो यही बनता दिख रहा है कि अब अच्छी कहानी, पटकथा, फ़िल्म की स्पीड, अदाकारी और टेक्निकल सुपिरियारिटी के दम पर ही फिल्में चलेंगी। स्टारडम और प्रचार के बल पर फिल्में हिट कराने का दौर नहीं रहा।गुलाबो सिताबो या ब्रीद इनटू द शैडो का हाल सामने है।अब वह समय गया जब टिकट खरीद कर हाल में बैठ गए तो फ़िल्म अच्छी हो या खराब, देखनी ही है।बाद में हाल से बाहर भले ही झींकते हुए निकलें। OTT में फिल्म की शुरुआत में संक्षिप्त रिव्यू मौजूद है।फिर अगर कुछ देर देखने पर भी फ़िल्म मन माफिक नहीं लगी तो बन्द करिये दूसरी देखिये। क्यों अपना वक्त खराब करें ? सबसे बड़ी बात, फ़िल्म रिलीज़ के दिन ही आपके एंड्रॉइड मोबाइल पर हर फिल्म मौजूद है। अपनी सुविधानुसार जब चाहें देखें। OTT प्लेटफॉर्म पर यह तो रही सिर्फ फिल्मों की बात। खबरिया , किड्स, कुकरी , हेल्थ और रिलिजियस चैनल्स भी यहां आ गए हैं। ऑडियो स्ट्रीमिंग,VoIP कॉल, कम्युनिकेशन मैसेजिंग आदि भी OTT में ही शामिल हैं।अब पैसा फेंक तमाशा देख नहीं , पैसा फेंक और पैसावसूल तमाशा देख ! लेखक रवि राय गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के रिटायर्ड अधिकारी हैं. बैंकिंग करियर से पहले दैनिक जागरण, गोरखपुर के प्रारंभिक पत्रकारों में से रहे हैं और साहित्य के अनुरागी हैं.

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal,Kanpuria editor ,earnestly helping ,Bhopal journalists, infected by Corona!

भोपाल : कोरोना संक्रमण में भी खुद को देश में नम्बर-1 बताने वाले अखबार के सम्पादक अस्पताल में भर्ती कोरोना पॉजिटिव स्टाफ से खबरें मंगा रहे हैं। जिन निगेटिव कर्मचारियों को ऑफिस बुला रहे थे, वे भी आ गए पॉज़िटिव! कनपुरिया सम्पादक सारी हदें पार कर जान लेने पर आमादा हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उत्तर प्रदेश से आये एक कनपुरिया सम्पादक इन दिनों खासी चर्चा में हैं। चर्चा है अखबार प्रेम को लेकर। अब इसके लिये पत्रकार चाहे कोरोना पॉजिटिव होकर मर ही क्यों न जाएं। दरअसल पिछले हफ्ते इस अखबार के कुछ पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हुए तो सम्पादक जी ने उन्हे छुट्टी नहीं दी। नतीजा पॉजिटिव पत्रकारों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पर संपादक जी लगातार दबाव बना रहे हैं कि नहीं दफ्तर आओ। वर्क फ्रॉम होम कुछ नहीं होता। दिलचस्प बात ये है कि कनपुरिया संपादक फोन पर दबाव बनाकर जिन कर्मचारियों को जबरन ऑफिस बुलाने धमका रहे थे, उन कर्मचारियों की रिपोर्ट भी पॉजीटिव आ गई। बस चले तो पूरा पॉजिटिव को भी अस्पताल से ऑफिस बुला लेंगे औऱ खुद घर मे दुबके बैठे हैं। तो साहब आलम ये है कि संपादक जी का पत्रकारों से प्रेम पत्रकारों पर ही भारी पड़ रहा है। मीडिया में खासकर प्रिंट मीडिया में कोरोना पॉजिटिव पत्रकारों के साथ ऐसे व्यवहार की खबरें आम होती जा रही हैं।।इस अखबार के मालिकान तो राज्यसभा सदस्य भी हैं।

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, Journalist organization welcomed Pyare Mian

IJU welcomes daily owner’s arrest in MP New Delhi : Welcoming the arrest of owner of Afkar daily Pyare Miyan, accused of raping four minor girls and running a sex racket in Madhya Pradesh, the Indian Journalists Union demanded strictest action be taken against him as other than his heinous crimes he had sullied the profession of journalism. Further, the Union demanded the SIT investigate the matter thoroughly in the backdrop of rumours he had a ‘quid pro quo relationship with those in power’. Miyan, who was absconding carried a reward of Rs 30,000 on his head, and was arrested in Srinagar, J&K on Wednesday following a group of minor girls in capital Bhopal being found by police in a disoriented condition on the city outskirts. Investigations reveal Miyan brought out Afkar, solely for ‘government advertisements and to get access to politicians, police and bureaucrats.’ SP (South) Sai Krishna Thota told The Indian Express that Miyan had travelled abroad with minor girls in past few years, though he passed these off as treatment/business-related. He was dealing in property and owns several properties in Bhopal and Indore and the district administration demolished a wedding hall built illegally by him and a flat among others. His flat, which the police broke into, resembles a dance bar with expensive liquor bottles and child pornography, sex toys etc. Miyan’s 21-year-old woman accomplice, a driver, a manager were taken into custody. In a statement, IJU President and former Member, Press Council of India Geetartha Pathak and Secretary General and IFJ Vice President Sabina Inderjit, regretted the media was getting a bad name because of crooks like Miyan. They welcomed cancellation of his accreditation and withdrawal of government quarter allotment in Professors’ Colony from where he ran his office. Noting Miyan’s activities suggest he had support of those in power the IJU insisted a thorough probe and all, including the powerful, be brought to book. Recalling, a similar case of Brajesh Thakur, who claimed to be a journalist and ran a sex racket in a girls’ shelter home in Muzaffarpur, Bihar, the Union called upon its members and journalist fraternity to uphold ethical standards and expose those who were misusing the profession for personal gains and power.

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, media dragons,frying , making dragon, gangster Vikas

अपराध के ‘रक्तबीजों’ को सींचता कौन है! हमारे देश का मीडिया अजब-गजब है। एक मुद्दे को चबाते हुए पचा नहीं पाता कि उसकी उल्टी कर दूसरे की तरफ लपक पड़ता है। ड्रैगन को बैगन बनाकर भून ही रहा था कि बीच में गैंगस्टर विकास दुबे आ गया..। प्राइम टाइम में सीधे श्मशान से अपने-अपने पैकेज के रैपर खोलने ही जा रहे थे कि..’सदी के महानायक’ कोरोना के साथ लीलावती अस्पताल पधार गए। कोरोना अब तेरी खैर नहीं, इसे ‘जंजीर’ में बाँधकर ‘शोले’ से जला देंगे बिग बी..से लेकर रेखा के रोमांस का ‘सिलसिला’ भी घुल गया। एंकर मोहतरमा रिपोर्टर से चीख-चीखकर पूछ रहीं थी..कि अब कोरोना की अगली स्ट्रैटजी क्या हो सकती है।   बंदरों के समान उस्तरे से अपनी ही नाक उतार रहे इन छिछोरों ने परदे पर गत्ते की तलवार भाँजने वाले लखटकिया (अरबटकिया) अभिनेता को सदी का महानायक घोषित कर दिया तो महात्मा गांधी, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चंद्रशेखर और सरहद पर प्राण देने वाले परमवीर योद्घा क्या हैं..! समझ में नहीं आता कि ब्रैकिंग सूचनाओं की यह सँडांध श्रोताओं/दर्शकों/पाठकों को किस नरक-कुंड में धकेलने को आमादा है।   बहरहाल लेख का विषय यह नहीं बल्कि सिस्टम की सँडांध का है, जहाँँ विकास दुबे जैसे अपराधी पनपते हैं और मरने के बाद भी उनके रक्तबीज से बहुगुणित संख्या में पजाते रहते हैं।   अपने देश में नेता-गैंगस्टर-पुलिस के घालमेल की तुलना आप शराब-सोडा-कबाब से कर सकते हैं। नेता और अपराधी शराब में सोडे की तरह एक दूसरे में घुले हैं..। जो आज गैंगस्टर है कल नेता हो सकता है।   दोनों की युति से चुनावी रथ का पहिया आगे बढ़ता है। पुलिस को इस काकटेल में स्नैक्स समझिए कभी-कभी कबाब की हड्डियां जायका खराब कर देती है..मुश्किल तभी होती है..।   विकास दुबे मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, अतीक अहमद जैसे रसूख को प्राप्त कर पाता कि कच्ची उमर में ही फँस गया..और जो तय है वही हुआ।   राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण की ओर बढ़ते हुए विकास दुबे के मार्फत अपराध की राजनीति को भी समझते चलें..।   सोशल मीडिया मेंं गैंगस्टर की जाति को लेकर उबाल है। जिसका मूलस्वर यह कि ठाकुर जाति के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुन-चुनकर ब्राह्मण बाहुबलियों को निपटा रहे हैं। इन संदेशों की छुपी मंशा यह है कि उन्हें मुसलमान बाहुबलियों का संहार करना चाहिए.. ठाकुर-बाम्हन तो मिल-पटकर रह भी लेंगे।   इसलिए बार-बार याद दिलाया जा रहा कि बिहार में डीएम की हत्या करने का आरोपी शहाबुद्दीन सही सलामत है, न उसका घर धंसाया, न मुठभेड़ हुई। अतीक और मुख्तार के जेल में रहने के बावजूद उनका कालासाम्राज्य वैसे ही चल रहा है।   अपने यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं स्वच्छंदता भी है सो सामाजिक समरसता जाए चूल्हे-भाड़ में जिसको जो मन पड़ेगा..लिखेगा. जहर घुलता है तो और घुले।   पिछले छह दशकों से अपराधी-पुलिस का साझा सहकार चलता रहा है, एक दूसरे का पूरक बनकर एक जैसी कार्यपद्धति अख्तियार करते हुए।   यह मैं नहीं कहता, साठ के दशक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में कुछ इसी तरह की तल्ख टिप्पणी की है – “मैं जिम्मेदारीपूर्वक सभी अर्थों के साथ कहता हूँ, पूरे देश में एक भी कानून विहीन समूह नहीं हैं जिसके अपराध का रिकार्ड अपराधियों के संगठित गिरोह पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो”   इस टिप्पणी को सरलीकृत करके आमतौर पर उल्लेख किया जाता है कि भारत में पुलिस अपराधियों के संगठित गिरोह से ज्यादा कुछ भी नहीं।   पुलिस तंत्र ऐसा स्वमेव बना या बनने के लिए विवश किया गया इसकी कहानी अँग्रेजों के समय से शुरू होती है। तब उसकी एक मात्र भूमिका स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपराधी बताकर दमन करने की थी। इसी पुलिस की लाठी से शेर-ए-पंजाब लाला लाजपतराय की हत्या हुई थी।   वोहरा, रुस्तम जी समेत पुलिस तंत्र में सुधार के लिए बने तमाम आयोगों और समितियों की सिफारिशों और संतुस्तियों के बाद भी पुलिस के प्रायः सभी मूल कानून और संहिताएं अँग्रेजों के जमाने की हैं।     आजाद भारत का सत्ता समूह गुलाम भारत के जमाने की पुलिस चाहता है ताकि विरोधियों को अपराधी बताकर उसी तरह दमन किया जाता रहे जैसा कि अँग्रेजों के जमाने में था।   विपक्ष जब सत्ता समूह बनकर आता है तो चूँकि उसे भी बदला भँजाना होता है इसलिए वह भी वैसा ही पुलिस तंत्र चाहता है..जो विरोधियों के लिए दमनकारी हो।   बहुत पहले एक नाट्यकृति पढ़ी थी। लेखक और नाटक का नाम विस्मृत है पर तथ्य और कथ्य आज भी याद है। नाटक रावण और मारीच पर केंद्रित था। रावण को सत्ताधारी दल का नेता और मारीच को स्थानीय गुंडा बताया गया था। रावण उसे राम (विपक्षी दल के नेता)को मारने की सुपारी देता है।   विपक्षी दल के नेता के गुणों से प्रभावित गुंडा जब सुपारी लेने से मना करता है तब सत्ताधारी दल का नेता धमकाता है..कोई मरे या न मरे पर तेरा मरना तो तय है..इसलिए बेहतर है कि तू मेरे दुश्मन को मारते हुए मर या फिर मेरी पुलिस से मुठभेड़ में मरने के लिए तैय्यार रह।   यह नाटक साठ सत्तर दशक का है। अपराध राजनीति में प्रवेश ही पा रहा था..। राजनीति में पूँजीपतियों के धनबल, गैंगस्टरों के बाहुबल के बीच गठबंधन होना शुरू हो चुका था। इधर जयप्रकाश नारायण ने जितने भी दुर्दांत दस्युओं का आत्मसमर्पण करवाया था उनमेंसे ज्यादातर राजनीति में अपने भविष्य की तलाश में लग गए थे।   मुंबई में हाजी मस्तान, वरदाराजन मुदलियार और करीमलाला जैसे स्मगलर अपराध में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रतीक बनकर उभर रहे थे। चुनावी फायदों के लिए विभिन्न दलों के नेता आधीरात कंबल ओढ़कर इनके ठिकाने आने लगे थे।   उत्तरप्रदेश और बिहार में हरिशंकर तिवारी और सूरजदेव सिंह जैसे कई बड़े सफेदपोश राजनीति की छतरी ओढ़ चुके थे। समाजवादी डकैतों को सोशल जस्टिस के लिए बीहड़ पर उतरे बागी बताने लगे थे..।   सन् सत्तर-पचहत्तर के आसपास राजनीतिक लोकतंत्र में अपराध की विषबेल का लिपटना शुरू हो चुका था..। इसके बाद मामला तेज रफ्तार से आगे बढ़ा।   नब्बे के आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रायः सभी तरह के अपराधी उद्योगपति बनने की होड़ में जुट गए, रियल स्टेट और ठेकेदारी इनके कब्जे में आती गई।   राजनीति में अकूत धन की ताकत का निवेश चमत्कारी साबित होने लगा। और जब देखा कि बड़े-बड़े कतली गिरोहबाज विधायक, सांसद और मंत्री हैं, वही पुलिस उनको सैल्यूट कर रही है तो राजनीति अपराधियों के लिए सुरक्षित स्वर्ग बनता गया। विकास दुबे तो बड़ा कतली गैंगस्टर था, उसकी ख्वाहिश भी बड़ी थी। आज तो मोहल्ले का गुंडा भी पार्षदी अपनी जेब में रखता है।   इतिहास में अपराधियों की राजनीति में प्रवेश की इतनी फूलप्रूफ योजनाओं के दृष्टांतों के चलते आखिर विकास दुबे चूक कहाँ गया..?   शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रघुराज प्रताप सिंह, अमरमणि त्रिपाठी, ब्रजेश सिंह जैसों की तरह सांसदी, विधायकी भोगने की जगह सीधे ऊपर भेज दिया गया।   दरअसल नेता-पुलिस-माफिया के गठजोड़ का खेल साँप-सीढ़ी जैसे होता है। सभी एक दूसरे के कंधे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनमें छोटे से लेकर बड़े, सभी साइज के स्वार्थ होते हैं। विकास दुबे पुलिस की आपसी अदावत औ छोटे स्वार्थ की भेंट चढ़ गया।   अपराध जगत कांटे से काँटा निकालने के लिए जाना जाता है। कभी अपराधी अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने के लिए पुलिस को हथियार बनाते हैं।   जैसे कि मुंबई का एनकाउंटरर पुलिस काँप दया नायक था(इस आरोप में जेल में भी रहा)। तो कभी पुलिस ही आपसी अदावत के चलते अपने पुलिस सहकर्मी को निपटाने के लिए गैंगस्टर की मदद लेती है।   कभी -कभी पुलिस और गैंगस्टर समझ भी नहीं पाते कि वे किसके मोहरे के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। बिल्कुल फिल्मी कथानक..नहीं यूँ कहें कि सही कथानक फिल्मों के लिए..। विकास दुबे इसी कथानक का एक मोहरा बनकर पिट गया।   कहानी बड़ी साफ है..। चौबेपुर के दरोगा विनीत तिवारी की उस परिक्षेत्र के डीएसपी देवेंद्र मिश्रा से अदावत थी। विनीत तिवारी विकास दुबे का खबरी और कानूनी मददगार था। विनीत ने विकास के दिमाग में यह बैठाया कि देवेन्द्र मिश्रा तुम्हारा दुश्मन है और तुम्हें बर्बाद कर देगा।   देवेंद्र मिश्रा वाकई विकास दुबे को बर्बाद करना चाहता था यह कहानी स्पष्ट नहीं, पर विकास ऐसा ही मानकर चल रहा था।   जिस विकास दुबे ने थाने में घुसकर एक राज्यमंत्री को गोली मारी हो, रसूख के चलते जल्दी ही अदालत से रिहा होकर फिर माफियागिरी में जुट गया हो, उसकी ताकत को जानते हुए मूरख से मूरख पुलिस अधिकारी भी सात आठ सिपाहियों के साथ मुठभेड़ करने नहीं जाएगा, यह जानते हुए कि सामने गैंग के रूप में समूची पलटन है।   यह भी संभव है कि देवेंद्र मिश्रा को यह फर्जी इनपुट दिया गया हो कि वह आज विकास दुबे को आसानी से पकड़ सकता है। कुलमिलाकर डबलक्रास जैसी स्थिति है।   अब इस घटना के प्रमुख किरदार विनीत तिवारी की तफसील से जाँच की जाए तो एक यह नया सूत्र सामने आ सकता है कि विनीत तिवारी को यह सब करने के लिए उस प्रतिद्वंद्वी ने प्रेरित किया हो जिसे विकास दुबे के बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व से खतरा रहा हो।   गाँव की प्रधानी और जिला पंचायत में विकास दुबे परिवार का कब्जा था, निश्चित ही विकास की यह ख्वाहिश रही होगी कि वह भी अन्य गैंगस्टरों की भाँति विधायक-सांसद बने।   इस कहानी की बुनियाद में भावी चुनाव की विधायकी और सांसदी का मुद्दा जुड़ा निकले तो यह कोई हैरत की बात नहीं।   उज्जैन में सरेंडर कर चुके विकास दुबे को यूपी पुलिस ने कैसे मारा..तरीका सही था या गलत यह पुलिस तंत्र व न्यायजगत के बीच बहस का विषय है लेकिन इस घटना ने यूपी की राजनीति को एक ट्विस्ट जरूर दिया है।   विकास की मौत के बाद राजनीति साँप की तरह पलट रही है। जातीय ध्रुवीकरण की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। कानपुर इलाके की वह पट्टी दबंग ब्राह्मणों के लिए जानी जाती है..विकास दुबे की रूह का चुनावी इस्तेमाल होगा।   यूपी में विधानसभा के चुनाव सामने हैं और भाजपा सपा दो के बीच मुकाबला। भाजपा सरकार पर विकास दुबे के मारने का आरोप है। संभव है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को वैसे ही टेकओवर करे जैसे कि मिर्जापुर जीतने के लिए फूलनदेवी का किया था। बात फिलहाल थमने वाली नहीं.. क्योंकि राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भाँति कुटिल होती है। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Dakhal News 17 July 2020


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केंद्र की मोदी सरकार ने समाचार एजेंसी पीटीआई को सबक सिखाने का काम शुरू कर दिया है. चीनी राजदूत के इंटरव्यू से नाराज मोदी सरकार ने इस न्यूज एजेंसी पर 84.4 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. पीटीआई से कहा गया है कि उसने वर्ष 1984 से उस सरकारी बिल्डिंग के किराए का भुगतान नहीं किया है जिससे इसका कामकाज संचालित होता है. ज्ञात हो कि पीटीआई का ये आफिस संसद मार्ग पर स्थित है. पीटीआई पर लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 84.48 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इसी लीज के तहत पीटीआई को दिल्ली में संसद मार्ग कार्यालय के लिए भूमि आवंटित की गई थी. ज्ञात हो कि केंद्र सरकार चीनी राजदूत सन सुन वेइदोन का इंटरव्यू पीटीआई द्वारा लिए जाने के जवाब में पीटीआई को दंडित कर रही है. पीटीआई को 84.48 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस जारी किया गया है. भुगतान के लिए 7 अगस्त का टाइम दिया गया है. न देने पर 10 प्रतिशत ब्याज लगेगा. किसी भी स्पष्टीकरण के लिए पीटीआई को एक सप्ताह का समय दिया गया है. कहा गया है कि पीटीआई ने 1984 के बाद से जमीन के किराए का भुगतान नहीं किया है. बेसमेंट के एक कार्यालय में बदलाव कर भूमि-आवंटन की शर्तों का दुरुपयोग किया है. लीज के अनुसार बेसमेंट का उपयोग केवल स्टोर के मकसद से करना था.

Dakhal News

Dakhal News 14 July 2020


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एक दुखी करने वाली खबर है. दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ को ब्रेन स्ट्रोक का सामना करना पड़ा है. इसके चलते उनके शरीर का बायां हिस्सा पैरलाइज हो गया है. डाक्टरों का कहना है कि रजत अमरनाथ को समय से अस्पताल लाने और ब्रेन स्ट्रोक तत्काल डायग्नोज होने के चलते इलाज अतिशीघ्र शुरू कर दिया गया जिससे उनकी जान बच गई. रजत अमरनाथ को बोलने में अभी भी तकलीफ है. डाक्टरों ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी है. साथ ही तनाव न लेने को कहा है. कुछ साल पहले रजत अमरनाथ को दो बार हार्ट अटैक से भी गुजरना पड़ा था. ज्ञात हो कि रजत अमरनाथ किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहे हैं. वे तत्कालीन स्टार न्यूज समेत कई न्यूज चैनलों में बड़े पदों पर रहे हैं. दिल्ली के दरियागंज के निवासी रजत अमरनाथ जीवन में दूसरों की मदद करने का काम लगातार करते रहे हैं. जब जब भड़ास पर किसी के लिए मदद की अपील छपी तो रजत अमरनाथ ने उस अपील पर फौर