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bhopal, IIMC

आईआई एम सी की प्रवेश परीक्षा संपन्न, परिणाम अगले हफ्ते नई दिल्ली । भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा 8 पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए रविवार को प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। इस वर्ष प्रवेश परीक्षा को कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को दी गई थी। यह पहला मौका है जब परीक्षा एनटीए द्वारा आयोजित करवाई गई है। इससे पूर्व आईआईएमसी द्वारा स्वयं परीक्षाओं का आयोजन किया जाता था।   कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष प्रवेश परीक्षा ऑनलाइन आयोजित की गई। एनटीए द्वारा 4 बैचों में सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। आईआईएमसी के 6 परिसरों में संचालित होने वाले 8 पाठ्यक्रमों की 476 सीटों के लिए इस वर्ष लगभग 4600 विद्यार्थियों ने आवेदन किया था। इनमें से 3773 विद्यार्थी परीक्षा में शामिल हुए। प्रवेश परीक्षा का परिणाम अगले हफ्ते आईआईएमसी की वेबसाइट पर घोषित किया जाएगा। कोरोना महामारी की वजह से इस वर्ष सत्र नवंबर के पहले हफ्ते से शुरू होगा।

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal, Why not TRP free news?

रंजना मिश्रा आम दर्शक तो टीवी पर केवल सच्ची और साफ-सुथरी खबरें ही देखना चाहते हैं, किंतु टीआरपी की होड़ ने आज न्यूज़ चैनलों की पत्रकारिता को इतने निचले स्तर पर ला दिया है कि अब अधिकतर न्यूज़ चैनलों पर सही न्यूज़ की जगह फेक न्यूज़ और डिबेट के रूप में हो-हल्ला ही देखने-सुनने को मिलता है। सभी चैनल यह दावा करते हैं कि हम ही नंबर वन हैं। अभी हाल ही में देश के दो बड़े न्यूज़ चैनलों पर टीआरपी से छेड़छाड़ के आरोप लगे हैं। टीआरपी की इस होड़ ने न्यूज़ चैनलों की पत्रकारिता का स्तर इतना अधिक गिरा दिया है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया से आम लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है। हर हफ्ते गुरुवार के दिन टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट जारी करने वाली संस्था बार्क (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) ने यह घोषणा कर दी है कि अगले 8 से 12 हफ्ते तक अलग-अलग न्यूज़ चैनलों के टीआरपी के आंकड़े जारी नहीं किए जाएंगे। इनमें हिंदी न्यूज़ चैनल, इंग्लिश न्यूज़ चैनल, बिजनेस न्यूज़ चैनल और क्षेत्रीय भाषाओं के सभी न्यूज़ चैनल शामिल हैं। बार्क का कहना है कि इस दौरान उनकी तकनीकी टीम टीआरपी मापने के मौजूदा मानदंडों की समीक्षा करेगी और जिन घरों में टीआरपी मापने वाले मीटर लगे हैं, वहां हो रही किसी भी प्रकार की धांधली और छेड़छाड़ को रोकने की कोशिश करेगी। कुछ न्यूज़ चैनलों द्वारा किए गए कथित टीआरपी घोटाले के कारण दो से तीन महीनों के लिए टीआरपी को रोक दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि दो से तीन महीनों तक न्यूज़ चैनलों की टीआरपी की गतिविधियों को रोककर मीडिया को साफ-सुथरा करने की जो कोशिश की जा रही है, क्या वो सच में कामयाब होगी? जिस चैनल की टीआरपी जितनी ज्यादा होती है उसे उतने ही ज्यादा और महंगे विज्ञापन मिलते हैं। टेलीविजन के सभी चैनलों के मुकाबले न्यूज़ चैनलों की भागीदारी बहुत कम है, किंतु दर्शकों पर इनका प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। देश के केवल 44 हजार घरों में ही टीआरपी मापने के मीटर लगे हैं, तो सवाल यह भी है कि केवल इतने घरों में लगे टीआरपी मापने के मीटर पूरे देश की टीआरपी कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? घोटाले के आरोपों के मुताबिक इन घरों में से कुछ घरों को कुछ रुपए देकर टीआरपी के आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई है। आजकल अधिकतर न्यूज़ चैनल डिबेट दिखाते हैं, क्योंकि डिबेट में टीवी का दर्शक उस न्यूज़ चैनल पर अपना ज्यादा समय खर्च करता है और जिससे उसकी टीआरपी बढ़ जाती है। आजकल ग्राउंड रिपोर्ट न्यूज़ चैनलों से धीरे-धीरे गायब ही होती जा रही है, क्योंकि अब कोई न्यूज़ चैनल ग्राउंड रिपोर्टिंग में मेहनत और पैसा खर्च करना नहीं चाहता और ना ही अपने रिपोर्टरों को बाहर भेजना चाहता है। अब सवाल यह है कि टीआरपी मापने की जो व्यवस्था फिलहाल लागू है, वो क्या वास्तव में सही है? क्या यह व्यवस्था सच्ची और साफ-सुथरी खबरें दिखाने वाले न्यूज़ चैनलों के लिए उपयोगी है? जवाब है नहीं। यदि ये न्यूज़ चैनल डिबेट करना बंद कर दें, मनोरंजक खबरें देने की बजाय सच्ची और साफ-सुथरी खबरें दिखाना शुरू कर दें तो उनकी टीआरपी निश्चित ही बहुत नीचे आ जाएगी। जिससे विज्ञापनदाता उन चैनलों को विज्ञापन देना बंद कर देंगे और विज्ञापन न मिलने के कारण, उन चैनलों को अपने रिपोर्टरों को तनख्वाह देना भी मुश्किल हो जाएगा और इस कारण उन न्यूज़ चैनलों को फिर से डिबेट और सस्ती खबरों को दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। डिबेट और सस्ती, मनोरंजक खबरें चैनल की टीआरपी को बढ़ा देंगे, जिससे आगे लोगों को यह भरोसा हो जाएगा कि यही मॉडल सही है। न्यूज़ चैनलों के न्यूज़ रूम में बैठे प्रोग्राम एडिटर और पत्रकारों के दिमाग में न्यूज़ बनाते समय केवल एक ही बात ध्यान में रहती है कि कौन-सा प्रोग्राम और न्यूज़ ज्यादा टीआरपी लाएगा। अब आवश्यकता है कि टीआरपी की इस अंधी दौड़ को छोड़कर, न्यूज़ चैनलों का उद्देश्य, दर्शकों तक जरूरी खबरें और सूचनाएं पहुंचाना होना चाहिए, न कि मनमर्जी की खबरें दिखाना। यह खबरें रिसर्च और ग्राउंड रिपोर्टिंग पर आधारित होनी चाहिए, यही पत्रकारिता का सच्चा धर्म है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  

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Dakhal News 20 October 2020


bhopal,Do not spoil , environment by working ,more in the office

-जे सुशील- ज़िंदगी में नौकरी सबकुछ नहीं होता है नौकरी मिल जाए तो छुट्टी लेते रहना चाहिए. मैं जब नौकरी करता था तो शुरू शुरू में हीरो बना. छुट्टी नहीं लेता था. मुझे लगता था कि इससे मुझे लोग हीरो समझेंगे कि बहुत काम करता है. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. हमारे दफ्तर में साल की करीब तीस पैंतीस छुट्टियां होती थीं. मैं लेता नहीं था छुट्टी. लगता था काम बहुत करूंगा तो लोग पसंद करेंगे. दो साल में बहुत छुट्टी जमा हो गई. फिर एक बार जाकर संपादक से कहा कि मेरी इतनी छुट्टियां बची हुई हैं क्या अब ले लूं तो उन्होंने कहा नियम के अनुसार छुट्टियां तीस मार्च को खतम हो जाती हैं. तो आपकी चालीस छुट्टियां पिछले दो साल की खत्म हैं. मैं बड़ा दुखी हुआ. मैंने बहस की तो उन्होंंने कहा कि आपकी गलती है. हमने तो आपसे कहा नहीं था कि छुट्टियां न लें. आपकी छुट्टी है लेना ही चाहिए. नहीं ली तो आपकी गलती है. उस दिन के बाद मैंने तय कर लिया कि एक एक छुट्टी ज़रूर लेना है दफ्तर में. मैंने उस दिन के बाद मेडिकल वाली छुट्टियां भी ली. थोड़ी भी तबियत खराब रही या मूड नहीं हुआ तो छु्ट्टी ले ली. सालाना छुट्टियां बचा कर लेने लगा. इससे मेरा जीवन बेहतर हो गया. मैं किताब पढ़ने लगा. आर्ट करने लगा. दफ्तर में कई लोग दिन रात काम करते थे. लेकिन काम की कोई बखत नहीं थी. आगे वही बढ़ रहे थे तो जो मक्खन लगा रहे थे. कई लोग थे मेरे दफ्तर में जो सुबह आठ बजे आते और रात के आठ बजे जाते. मैं उनको गरियाता रहता था कि तुम लोग माहौल खराब कर रहे हो. मैं अपने अनुभव के बाद कभी भी समय से अधिक नहीं रूका और सार्वजनिक रूप से कहता रहा कि जो आदमी बिना किसी ब्रेकिंग न्यूज़ के दफ्तर में रूक रहा है समझो वो कामचोर है या नाकारा जो आठ घंटे में अपना काम पूरा नहीं कर पाता है. इससे मक्खनबाज़ों को बहुत दिक्कत हुई और उन्होंने मेरे खिलाफ शिकायतें की कि मैं माहौल खराब कर रहा हूं. लेकिन किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं. मैं इसी तरह से आठ घंटे की शिफ्ट में जितने ब्रेक अलाउड हैं वो भी लेता था. मैं जानता हूं बहुत लोग सीट पर चिपक कर बैठते हैं और दर्शाते हैं कि वो बहुत महान काम कर रहे हैं. मान लीजिए बात. चार पांच साल के बाद कमर में दर्द होगा तो संपादक बोलेगा कि आपकी गलती है. हमारे यहां एक वरिष्ठ थे. उनको डेंगू हुआ. छुट्टियां खत्म हो गईं. बीमारी ने उनके पैरों को कमजोर कर दिया था. हमारे यहां संपादक को अधिकार था कि छुट्टियां बढ़ा दे. संपादक ने बढ़ा दीं. एचआर खच्चर था. उसने पैसे काट लिए. बाद में पैसे वापस हुए क्योंकि संपादक अच्छा था. कहने का मतलब है कि आपको नौकरी में जो अधिकार मिले हैं छुट्टी के वो ज़रूर लीजिए. छुट्टी लेकर आप अहसान नहीं कर रहे हैं. छुट्टी लेंगे तो तरोताजा काम करते रहेंगे तो दफ्तर खुश रहेगा. जो छुट्टी नहीं लेते हैं दफ्तरों में वो मूल रूप से इनसेक्योर और नकारा लोग होते हैं जो कामचोरी करते हैं. हीरो बनने के लिए काम करना चाहिए. छुट्टी कैंसल कर के क्यों हीरो बनना. जब ज़रूरत होती थी तो मैं छुट्टियां कैंसल कर के भी काम पर लौटा हूं. तो ऐसा नहीं है कि दफ्तर में ज़रूरत हो तो मैं टांग पर टांग चढ़ा कर बैठा हूं लेकिन जबरदस्ती दफ्तर जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. एक और महानुभाव थे. जब भी किसी व्यक्ति का निधन होता तो ये आदमी छुट्टी हो तो दफ्तर पहुंच जाता और तीन लोगों से फोन पर बाइट लेकर स्टोरी कर देता और एवज में छुट्टी ले लेता. ये सिलसिला चार पांच बार चला फिर किसी ने संपादक को कहा कि जो काम ये घर से आकर करते हैं वो तो यहां दफ्तर में जो बैठा है वो कर सकता है तो इन्हें बेवजह इस आसान काम की छुट्टी क्यों दी जा रही है. बाइलाइन चाहिए तो घर से कर के भेज दें. संपादक को समझ में आई बात और उनको मना किया गया कि आप दफ्तर आएंगे बिना बुलाए छुट्टी के दिन तो उसकी छुट्टी नहीं मिलेगी. बंदे ने आना तो बंद कर ही दिया फोन वाले इंटरव्यू भी बंद हो गए. यही सब है. सोचा बता दें. छुट्टी की महिमा अपरंपार है. लेते रहना चाहिए. आदमी का जनम नौकरी करने के लिए नहीं हुआ है जीने के लिए हुआ है. नौकरी कर के आज तक कोई महान नहीं हुआ है. बाकी इमेज बनाना हो तो अलग बात है. मोदी जी बिना छुट्टी लिए ही लाल हुए जा रहे हैं. हम भी पीएम होंगे तो कभी छुट्टी नहीं लेंगे. वैसे छुट्टी मनमोहन सिंह भी नहीं लेते थे लेकिन बोलते नहीं थे इस बारे में. खैर आजकल तो बोलना छोड़ो फोटो अपलोड करने का भी चलन है.

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Dakhal News 15 October 2020


bhopal, The roots are very deep in TRP

-श्रवण गर्ग- क्या चिंता केवल यहीं तक सीमित कर ली जाए कि कुछ टीवी चैनलों ने विज्ञापनों के ज़रिए धन कमाने के उद्देश्य से ही अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उस बड़े फ़र्जीवाड़े को अंजाम दिया होगा जिसका कि हाल ही में मुंबई पुलिस ने भांडाफोड़ किया है ? या फिर जब बात निकल ही गई है तो उसे दूर तक भी ले जाया जाना चाहिए ? मामला काफ़ी बड़ा है और उसकी जड़ें भी काफ़ी गहरी हैं। यह केवल चैनलों द्वारा अपनी टीआरपी( टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट )बढ़ाने तक सीमित नहीं है। पूछा जा सकता है कि इस भयावह कोरोना काल में जब दुनियाभर में राष्ट्राध्यक्षों की लोकप्रियता में सेंध लगी पड़ी है, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे चतुर खिलाड़ी भी अपने से एक अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी से ‘विश्वसनीय’ ओपीनियन पोल्स में बारह प्रतिशत से पीछे चल रहे हैं, हमारे यहाँ के जाने-माने मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा करवाए जाने वाले सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी को 66 और राहुल गांधी को केवल आठ प्रतिशत लोगों की पसंद बतलाए जाने का आधार आख़िर क्या है ? मोदी का पलड़ा निश्चित ही भारी होना चाहिए, पर क्या उनके और राहुल के बीच लोकप्रियता का गड्ढा भी अर्नब के ‘रिपब्लिक’ और दूसरे चैनलों के बीच की टीआरपी के फ़र्क़ की तरह ही संदेहास्पद नहीं माना जाए? इस बात का पता कहाँ के पुलिस कमिश्नर लगाएँगे कि प्रभावशाली राजनीतिक सत्ताधारियों की लोकप्रियता को जाँचने के मीटर देश में किस तरह के लोगों के घरों में लगे हुए हैं ? जनता को भ्रम में डाला जा रहा है कि टीआरपी का फ़र्जीवाड़ा केवल विज्ञापनों के चालीस हज़ार करोड़ के बड़े बाज़ार में अपनी कमाई को बढ़ाने तक ही सीमित है। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। दांव पर और कुछ इससे भी बड़ा लगा हुआ है। इसका सम्बंध देश और राज्यों में सूचना तंत्र पर क़ब्ज़े के ज़रिए राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने से भी हो सकता है।देशभर में अनुमानतः जो बीस करोड़ टीवी सेट्स घरों में लगे हुए हैं और उनके ज़रिए जनता को जो कुछ भी चौबीसों घंटे दिखाया जा सकता है, वह एक ख़ास क़िस्म का व्यक्तिवादी प्रचार और किसी विचारधारा को दर्शकों के मस्तिष्क में बैठाने का उपक्रम भी हो सकता है।वह विज्ञापनों से होनेवाली आमदनी से कहीं बड़ा और किसी सुनियोजित राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा हो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्या कोई बता सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले में मुंबई पुलिस को बदनाम करने के लिए हज़ारों (पचास हज़ार ?) फ़ेक अकाउंट सोशल मीडिया पर रातों-रात कैसे उपस्थित हो गए और इतने महीनों तक सक्रिय भी कैसे रहे? इतने बड़े फ़र्जीवाड़े के सामने आने के बाद सत्ता के गलियारों से अभी तक भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने क्यों नहीं आई? सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी अकाउंट क्या देश की किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती या दल के ख़िलाफ़ इसी तरह से रातों-रात प्रकट और सक्रिय होकर ‘लाइव’ रह सकते हैं ? निश्चित ही इतने बड़े काम को बिना किसी संगठित गिरोह की मदद के अंजाम नहीं दिया जा सकता। चुनावों के समय तो ये पचास हज़ार अकाउंट पचास लाख और पाँच करोड़ भी हो सकते हैं !हुए भी हों तो क्या पता ! ‘रिपब्लिक’ या गिरफ़्त में आ गए कुछ और चैनल तो टीवी स्क्रीन के पीछे जो बड़ा खेल चलता है, उसके सामने कुछ भी नहीं हैं। वह खेल और भी बड़ा है और उसके खिलाड़ी भी बड़े हैं। उसके ‘वार रूम्स’ भी अलग से हैं। सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्मों पर नामी हस्तियों के लिए जिस तरह से ‘फ़र्ज़ी’ फ़ॉलोअर्स और ‘लाइक्स’ की ख़रीदी की जाती है, वे चैनलों के फ़र्जीवाड़े से कितनी अलग हैं ? एक प्रसिद्ध गायक (रैपर) द्वारा यू ट्यूब पर अपना रिकार्ड बनाने के लिए फ़ेक ‘लाइक्स’ और ‘फ़ॉलोइंग’ ख़रीदने के लिए बहत्तर लाख रुपए किसी कम्पनी को दिए जाने की हाल की कथित स्वीकारोक्ति, क्या हमें कहीं से भी नहीं चौंकाती ? ऐसी तो देश में हज़ारों हस्तियाँ होंगी, जिनके सोशल मीडिया अकाउंट बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही संचालित करती हैं और इसी तरह से उनके लिए ‘नक़ली फ़ालोअर्स’ की फ़ौज भी तैयार की जाती है। सवाल यह भी है कि एक ख़ास क़िस्म की विचारधारा, दल विशेष या व्यक्तियों को लेकर सच्ची-झूठी ‘खबरों’ की शक्ल में अख़बारों तथा पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्लांट’ की जाने की सूचनाएँ और उपलब्धियाँ दो-तीन या ज़्यादा चैनलों द्वारा टीआरपी बढ़ाने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों से कितनी भिन्न हैं ? सरकारें अपने विकास कार्यों की संदेहास्पद उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती हैं और मीडिया संस्थानों में उन्हें लपकने के लिए होड़ मची रहती है।राज्यों में मीडिया (पर नियंत्रण) के लिए विज्ञापनों का बड़ा बजट होता है, जिस पर पूरी निगरानी ‘ऊपर’ से की जाती है। लिखे, छपे, बोले और दिखाए जाने वाले प्रत्येक शब्द और दृश्य की कड़ी मॉनीटरिंग होती है और उसी से विज्ञापनों की शक्ल में बाँटी जाने वाली राशि तय होती है। बताया जाता है कि ‘ सुशासन बाबू ‘ के बिहार में सूचना और जन-सम्पर्क विभाग का जो बजट वर्ष 2014-15 में लगभग 84 करोड़ था, वह पाँच सालों (2018-19) में बढ़कर 133 करोड़ रुपए से ऊपर हो गया।चालू चुनावी साल का बजट कितना है अभी पता चलना बाक़ी है।अनुमानित तौर पर इतनी बड़ी राशि का साठ से सत्तर प्रतिशत प्रचार-प्रसार माध्यमों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर खर्च होता है।हाल में सरकार की ‘उपलब्धियों’ का नया वीडियो भी जारी हुआ है और वह ख़ूब प्रचार पा रहा है। कोई भी चैनल या प्रचार माध्यम, जिनमें अख़बार भी शामिल है, कभी यह नहीं बताता या स्वीकार करता कि पिछले साल भर, महीने या सप्ताह के दौरान कितनी अपुष्ट और प्रायोजित खबरें प्रसारित-प्रकाशित की गईं, कितने लोगों और समुदायों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई गई, साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने में क्या भूमिका निभाई गई ! तब्लीगी जमात को लेकर जो दुष्प्रचार किया गया, वह तो अदालत के द्वारा बेनक़ाब हो भी चुका है।दिल्ली के दंगों में मीडिया की भूमिका का भी आगे-पीछे खुलासा हो जाएगा। एक चैनल पर बहस के बाद एक राजनीतिक दल से जुड़े प्रवक्ता की मौत ने क्या एंकरों की भाषा, ज़ुबान और आत्माएँ बदल दी हैं या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है ? कोरोना सहित बड़े-बड़े मुद्दों को दबाकर महीनों तक केवल एक अभिनेत्री और उसके परिवार को निशाने पर लेने का उद्देश्य क्या हक़ीक़त में भी सिर्फ़ अपनी टीआरपी बढ़ाना था या फिर उसके कोई राजनीतिक निहितार्थ भी थे? ‘रिपब्लिक‘ चैनल या अर्नब जैसे ‘पत्रकार/एंकर’ कभी भी अकेले नहीं पड़ने वाले हैं ! न ही मुंबई पुलिस द्वारा पर्दाफ़ाश किए गए किसी भी फ़र्ज़ीवाड़े में किसी को भी कभी कोई सजा होने वाली है।मारने वालों से बचाने वाले के हाथ काफ़ी लम्बे और बड़े हैं। देश के जाने माने पत्रकार श्रवण गर्ग की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 15 October 2020


bhopal,Ravish Kumar, jumps on all ,other channels , soon , gets a chance!

-समरेंद्र सिंह- आत्मश्लाघा में डूबा हुआ कोई भी जीव.. रवीश कुमार बन जाता है! रवीश कुमार को मौका मिलना चाहिए फिर वो बाकी सारे चैनलों पर कूद पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि सारे चैनल मिल कर उनके खिलाफ साजिश करते हैं। एनडीटीवी और उनके कार्यक्रम प्राइम टाइम की टीआरपी साजिश के तहत ही कम की गई है। और चैनलों की इस साजिश में मोदी सरकार भी शामिल है। उन्हें ये भी लगता है कि वो रोज रोज ऐतिहासिक भाषण देते हैं और इतना ऐतिहासिक कि सारी पब्लिक बस उन्हें ही देखती और सुनती है। मगर साजिशन सौ में दो नंबर दिए जाते हैं। यहां सवाल उठता है कि उनकी टीआरपी तो मनमोहन सरकार में भी रसातल में थी। तो क्या मनमोहन सिंह भी एनडीटीवी के पीछे पड़े थे? एनडीटीवी तो मनमोहन सिंह का अपना चैनल था। प्रणव रॉय के मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से बहुत अच्छे संबंध थे। उस दौर में राष्ट्रपति भी उनके अपने ही थे। राष्ट्रपति भवन में एनडीटीवी का जलसा होता था और उस जलसे में सारे कांग्रेसी नेता शामिल होते थे। तो क्या एनडीटीवी की चरण वंदना से खुश होने की जगह सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह नाराज रहते थे? इतने नाराज कि उन्होंने एनडीटीवी की टीआरपी गिरवा दी थी? दरअसल एनडीटीवी में कुछ अपवादों को छोड़ कर सारे के सारे शेखचिल्ली हैं। लेढ़ा और ढकलेट हैं। टीवी क्या होता है उन्हें पता ही नहीं, न्यूज भी नहीं पता। बस भाषण देना जानते हैं इसलिए सब के सब भाषण देते हैं। कोई स्टूडियो में भाषण देता है कोई सड़क से मोबाइल के जरिए भाषण देता है। खबर कोई नहीं करता। खबर द वायर वाले करें, क्विंट वाले करें। इंडियन एक्सप्रेस करे और द हिंदू करे। कोई भी कर ले, मगर ये खबर नहीं करेंगे। बस दूसरों की खबरों पर भाषण देंगे। फिर भी रवीश कुमार को लगता है कि इनकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी से भी अधिक है और पब्लिक सिर्फ इनके कार्यक्रम प्राइम टाइम का इंतजार करती है। अरे भई, यहां तो खुद बीजेपी वाले अपने युगपुरुष नरेंद्र मोदी के भाषण से उकता गए हैं। एक ही बात कितने दिन सुनें और क्यों सुनें? कोई आदमी मिठाई भी रोज रोज खाएगा तो उकता जाएगा या फिर डायबिटीज से मर जाएगा। रवीश कुमार को ये भी लगता है कि इनके जलवों में माधुरी दीक्षित और सलमान खान से अधिक जादू है। और पब्लिक इनके पीछे पागल है। इनकी अदाओं के देखने के लिए इनके चैनल की स्क्रीन से चिपकी रहती है। अगर दूसरे चैनल वाले और सरकार साजिश नहीं रचती तो ये हर रोज नया इतिहास रच देते। सरकारें बनाते और गिराते। आत्मश्लाघा में डूबा हुआ जीव ऐसा ही होता है। वो रवीश कुमार हो जाता है। उसे हर जगह मैं ही मैं दिखता है।

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, If JP were today, how many people, would have supported him?

-श्रवण गर्ग- लोक नायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की आज पुण्यतिथि है और तीन दिन बाद ग्यारह अक्टूबर को उनकी जयंती ।सोचा जा सकता है कि वे आज अगर हमारे बीच होते तो क्या कर रहे होते ! 1974 के ‘बिहार आंदोलन’ में जो अपेक्षाकृत छोटे-छोटे नेता थे, आज वे ही बिहार और केंद्र की सत्ताओं में बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियाँ हैं। कल्पना की जा सकती है कि जेपी अगर आज होते और 1974 जैसा ही कोई आह्वान करते (‘सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है ‘) तो कितने नेता अपने वर्तमान शासकों को छोड़कर उनके साथ सड़कों पर संघर्ष करने का साहस जुटा पाते ! ऐसा कर पाना शायद उस जमाने में काफ़ी आसान रहा होगा ! चौबीस मार्च, 1977 को मैं उस समय दिल्ली के राजघाट पर उपस्थित था, जब एक व्हील चेयर पर बैठे हुए अस्वस्थ जेपी को गांधी समाधि पर जनता पार्टी के नव-निर्वाचित सांसदों को शपथ दिलवाने के लिए लाया गया था। वर्तमान की मोदी सरकार में शामिल कुछ हस्तियाँ भी तब वहाँ प्रथम बार निर्वाचित सांसदों के रूप में मौजूद थीं। जेपी के पैर पर पट्टा चढ़ा हुआ था।आग्रह किया जा रहा था कि उनके पैरों को न छुआ जाए। वह दृश्य आज भी याद आता है, जब भीड़ के बीच से निकल कर उनके समीप पहुँचने के बाद मैंने उन्हें प्रणाम किया तो वे हलके से मुस्कुराए और मैं स्वयं को रोक नहीं पाया … उनके पैरों के पास पहुँचकर हल्के से स्पर्श कर ही लिया।उन्होंने मना भी नहीं किया। जेपी ने (और शायद दादा कृपलानी ने भी) सांसदों को यही शपथ दिलवाई थी कि वे गांधी का कार्य करेंगे और अपने आप को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करेंगे।राजघाट पर हज़ारों लोगों की उपस्थिति थी।अभिनेता देव आनंद भी वहाँ पहुँचे थे।प्रशंसकों ने उन्हें अपने पैर ज़मीन पर रखने ही नहीं दिए।अपने कंधों पर ही उन्हें बैठाकर पूरे समय घुमाते रहे।शत्रुघ्न सिन्हा भी शायद वहाँ थे। अदभुत दृश्य था। राजघाट की शपथ के बाद के दिनों में दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में जे पी की उपस्थिति में ही सत्ता के बँटवारे को लेकर बैठकों का जो दौर चला उसका अपना अलग ही इतिहास है। राजघाट की आशाभरी सुबह के कोई ढाई वर्षों के बाद आज के ही दिन जेपी ने देह त्याग कर दिया।वे भी तब उतने ही निराश रहे होंगे जैसे कि आज़ादी प्राप्ति के बाद गांधी जी रहे होंगे। कांग्रेस, बापू को और जनता पार्टी जेपी को जी नहीं पाईं। जेपी के निधन तक उनका जनता पार्टी का प्रयोग उन्हें धोखा दे चुका था। याद पड़ता है कि जेपी को सबसे पहले राजगीर(बिहार) में 1967 के सर्वोदय सम्मेलन में दूर से देखने का अवसर मिला था।तब तक उनके बारे में केवल सुन-पढ़ ही रखा था।जेपी की देखरेख में ही सम्मेलन की सारी तैयारियाँ हुईं थीं।दलाई लामा भी उसमें आए थे।संत विनोबा भावे तो उपस्थित थे ही, पर जेपी के विराट स्वरूप को पहली बार नज़दीक से देखने का मौक़ा अप्रैल 1972 में मुरैना के जौरा में हुए चम्बल घाटी के दस्युओं के आत्म-समर्पण और फिर उसके अगले माह बुंदेलखंड के दस्युओं के छतरपुर के निकट हुए दूसरे आत्म समर्पण में मिला था। उनका जो स्नेह उस दौरान प्राप्त हुआ, वही बाद में मुझे 1974 में बिहार आंदोलन की रिपोर्टिंग के लिए पटना ले गया।तब मैं दिल्ली में प्रभाष जोशी जी और अनुपम मिश्र के साथ ‘सर्वोदय साप्ताहिक’ के लिए काम करता था। पटना गया था केवल कुछ ही दिनों के लिए पर जे पी ने अपने पास ही रोक लिया उनके कामों में मदद के लिए। पटना में तब जेपी के कदम कुआ स्थित निवास स्थान पर केवल एक ही कमी खटकती थी और वह थी प्रभावती जी की अनुपस्थिति की। वे 15 अप्रैल, 1973 को जेपी को अकेला छोड़कर चली गईं थीं। जे पी और प्रभावती जी के साथ केवल दो ही यात्राओं की याद पड़ती है।पहली तो तब की जब अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी के विमान में दोनों को लेने लिए दिल्ली से पटना गया था और वहाँ से हम तीनों बुंदेलखंड के दस्युओं के आत्म समर्पण के लिए खजुराहो के हवाई अड्डे पर पहुँचे थे। दूसरी बार (शायद) उसी वर्ष किसी समय जेपी और प्रभावती जी के साथ रेल मार्ग द्वारा दिल्ली से राजस्थान में चूरू की यात्रा और वहाँ से वापसी। चूरू में तब अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी की पुस्तक ‘अग्नि परीक्षा’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। जेपी के मित्र प्रभुदयाल जी डाबरीवाला लोक नायक को आग्रह करके चूरू ले गए थे, जिससे कि वहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित हो सके। जेपी ने कहलवाया कि मुझे उनके साथ चूरू की यात्रा करनी है और मैं तुरंत तैयार हो गया। चूरू की वह शाम भूले नहीं भूलती है, जब जे पी ने पूछा था उनके साथ टहलने हेतु जाने के लिए … और मैं भाव-विभोर हो चूरू के एकांत में उस महान दम्पति के साथ घूमने चल पड़ा था।तब दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र बाँटे जा रहे थे। मैंने उनसे इस दौरान किए गए कई सवालों के बीच यह भी पूछ लिया था कि:’ क्या सरकार आपको स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती ?’ जेपी शायद कुछ क्षण रुके थे फिर धीमे से सिर्फ़ इतना भर कहा कि :’हो सकता है, शायद ऐसा ही हो।’ मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने तब जेपी से कितने सवाल किए होंगे और उन्होंने क्या जवाब दिए होंगे।क्योंकि मैं तो उस समय अपने इतने निकट उनकी आत्मीय उपस्थिति के आभा मण्डल में ही पूरी तरह से खो गया था।जिस तरह से गांधी नोआख़ली में दंगों को शांत करवाकर चुपचाप दिल्ली लौट आए थे, वैसे ही जेपी भी चूरू से लौट आए। मुझे अच्छे से याद है कि हम दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर चूरू जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े थे। जेपी थे, प्रभावती जी थीं, उनके सहायक गुलाब थे और मैं था।शायद प्रभुदयाल जी भी रहे हों। लम्बे प्लेटफ़ार्म पर काफ़ी लोगों की उपस्थिति के बावजूद कोई जेपी को बहुत विश्वास के साथ पहचान नहीं पा रहा था।उनकी तरफ़ लोग देख ज़रूर रहे थे।हो सकता है कि किसी को उनके वहाँ इस तरह से उपस्थित होने का अनुमान ही नहीं रहा होगा। पर जेपी के चेहरे पर किसी भी तरह की अपेक्षा या उपेक्षा का भाव नहीं था।वे निर्विकार थे।बेचैनी मुझे ही अधिक थी कि ऐसा कैसे हो रहा है ! याद पड़ता है कि सर्वोदय दर्शन के सुप्रसिद्ध भाष्यकार दादा धर्माधिकारी ने एक बार जेपी को संत और विनोबा को राजनेता निरूपित किया था।ऐसा सच भी रहा हो ! स्मृतियाँ तो कई और भी हैं पर फिर कभी। जेपी की स्मृति को प्रणाम ।

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal, China has shown ,right to impart knowledge , Indian media!

-अंकित माथुर-   ताइवान के विदेश मंत्री जोसेफ वू ने बुधवार को भारत स्थित चीनी मिशन द्वारा भारतीय मीडिया को जारी की गई मीडिया अड्वाइज़री के विषय में प्रतिक्रिया देते हुए चीनी मिशन को “भाड़ में जाने” (Get Lost) की नसीहत दे डाली। 10 अक्टूबर को ताइवान के राष्ट्रीय दिवस से पहले, दिल्ली में चीनी मिशन ने भारतीय मीडिया को लिखा और ताइवान को “राष्ट्र” के रूप में संदर्भित अथवा संबोधित नहीं करने का आह्वान किया। पत्र में चीनी मिशन ने कहा, हम अपने भारतीय मीडिया मित्रों को याद दिलाना चाहेंगे कि दुनिया में एक चीन है और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार पूरी चीन की एकमात्र वैध सरकार है। ताइवान चीन का एक अटूट व अभिन्न हिस्सा है। चीन के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले सभी देशों को वन-चाइना नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करना चाहिए, जो कि भारत सरकार लंबे समय से करती आ रही है। चीन का मानना है कि भारतीय मीडिया ताइवान के सवाल पर भारत सरकार की आधिकारिक स्थिति पर ही रिपोर्टिंग करे। भारतीय मीडिया को ताइवान को “देश” या “रिपब्लिक ऑफ चाइना” के रूप में रिपोर्ट नहीं करने के लिए हिदायत दी गई है। चीन द्वारा दी गई अडवाइज़री में स्पष्ट किया गया है, कि राष्ट्रपति के रूप में या ताइवान अध्यक्ष त्साई इंग-वेन के रूप में कोई भी संबोधन भारत या विश्व की आम जनता के अंदर चीन की ताइवान के प्रति नीति को लेकर गलत संकेत भेज सकता है। इस अड्वाइज़री के बाद भारतीय मीडिया में अव्यक्त रोष अवश्य है। परंतु मुखर होकर दिखाई नहीं दे रहा। पत्रकार अंकित माथुर की रिपोर्ट  

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Dakhal News 10 October 2020


bhopal,Senior journalist dies from Corona

भोपाल। गंजबासौदा (विदिशा) के वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव का बीती रात निधन हो गया है। कोरोना संक्रमण के बाद उनका राजधानी के अस्पताल में उपचार चल रहा था। श्री यादव पत्रकारिता और वन्य प्राणी संरक्षण के कार्य में दशकों से साधक की तरह जुटे रहे । श्री यादव को सरोकारों की पत्रकारिता के लिए देश दुनिया में पहचाना गया है। वन्य प्राणियों और वन संपदा के संरक्षण के लिए श्री यादव ने कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया है। अपने सम्पादकीय उच्च स्तर और विचार की गुणवत्ता के कारण इन डाक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मान और पुरस्कार से नवाजा गया है। मूलतः गंजबसौदा निवासी अनिलजी ने पत्रकारिता के साथ अन्तर्राष्टीय स्तर पर पर्यावरण व जीव बचाव की चिंता को रेखांकित करते रहे। इनका असमय चला जाना अपूरणीय क्षति है। परमपिता परमात्मा दिवंगत आत्मा को श्रीचरणो में स्थान दे।

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal,Navodaya Vidyalaya ,alumni donated ,16 Samsung smart phones

कोरोना काल ने डिजिटलाइजेशन को इस कदर बढ़ाया कि पढ़ाई-लिखाई भी अब आनलाइन होने लगी है. इससे बड़ा संकट उन छात्रों के समक्ष आ गया है जो गरीब घरों से हैं. खासकर नवोदय विद्यालय में पढ़ने वाले ज्यादातर होनहार छात्रों का बैकग्राउंड ऐसा नहीं होता कि उनके परिजन उन्हें मोबाइल फोन दे सकें. इसी कष्ट को देखते हुए नवोदय विद्यालय से पढ़कर अलग अलग क्षेत्रों में नाम रोशन कर रहे पूर्व छात्रों ने एक पहल की. इनने स्मार्ट फोन खरीदे और नवोदय विद्यालय में पढ़ रहे गरीब बच्चों में वितरित कर दिया. खबर यूपी के जिला गाजीपुर से है. जवाहर नवोदय विद्यालय गाजीपुर से पढ़े पूर्व छात्रों ने वर्तमान में पढ़ रहे छात्रों को 16 स्मार्ट फोन की सहायता दी. इससे अब ये छात्र आनलाईन अध्ययन अच्छे ढंग से कर सकेंगे. जवाहर नवोदय विद्यालय गाजीपुर के परिसर में आनलाईन पढ़ाई में आ रही परेशानी को देखते हुए यहीं के पूर्व छात्रों ने आज दिनांक 04/10/2020 को अपने अनुज छात्रों के संकट का हल कर दिया. इन पूर्व छात्रों ने 16 स्मार्ट फोन का वितरण किया. प्राचार्य महोदय डा. इकरामुद्दीन सिद्दीकी ने पूर्व छात्रों की इस दानवीरता की प्रशंसा की और उन्हें नेक काम के लिए धन्यवाद दिया. इस कार्य में श्रीमती निर्मला कश्यप सक्रिय रहीं। इनके निर्देशन में पूर्व छात्र संजय, आनन्द, डा0 अनिल, शिवबचन, विवेक, उपेन्द्र, अजहर एवं जितेन्द्र ने अन्य छात्रों से सहयोग लेकर 16 सैमसंग स्मार्ट फोन विद्यालय को प्रदान किया। इसको आज प्राचार्य की अध्यक्षता में छात्र एवं छात्राओं में वितरित किया गया। ये स्मार्ट फोन उन्हीं बच्चों को दिया गया जो फोन न होने के अभाव में अभी तक आन लाईन अध्ययन नहीं कर पा रहे थे। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षक वीपी दूबे, श्री सतीश कुमार पाण्डेय, श्री मनीष कुमार जायसवाल, श्री एसके मिश्रा, श्रीमती निर्मला कश्यप, श्रीमती सुशीला देवी, श्री कमल कुमार, एसके बिन्द, श्री उमेश कुमार श्रीवास्तव समाजसेवी गाजीपुर एवं अन्य छात्र तथा अभिभावकगण उपस्थित थे।

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Dakhal News 5 October 2020


bhopal, Lata Mangeshkar , poem of nature written,inscription of Khushbu

-श्रवण गर्ग– लता जी पर मैंने कोई बीस-इक्कीस वर्ष पहले एक आलेख लिखा था ।अवसर था इंदौर में ‘माई मंगेशकर सभागृह ‘के निर्माण का ।उसमें मैंने लता जी के साथ उसके भी सोलह वर्ष पूर्व(1983) इंदौर की एक होटल में तब उनके साथ हुई भेंटवार्ता का ज़िक्र किया था ।उस आलेख का शीर्षक दिया था ‘ख़ुशबू के शिलालेख पर लिखी हुई प्रकृति की कविता’।आलेख की शुरुआत कुछ इस तरह से की थी :’लता एक ऐसी अनुभूति हैं जैसे कि आप पैरों में चंदन का लेप करके गुलाब के फूलों पर चल रहे हों और प्रकृति की किसी कविता को सुन रहे हों।’ अपने बचपन के शहर इंदौर की उनकी यह आख़िरी सार्वजनिक यात्रा थी।(वे बाद में कोई पंद्रह साल पहले स्व.भय्यू महाराज के आमंत्रण पर उनके आश्रम की निजी आध्यात्मिक यात्रा पर इंदौर आयीं थीं)।इंदौर और उसका प्रसिद्ध सराफा बाज़ार उनकी यादों में हमेशा बसा रहता है जिसका कि वे मुंबई में भी ज़िक्र करती रहतीं हैं। वर्ष 1983 की इस मुलाक़ात के बाद लता जी से फ़ोन पर कोई बारह-तेरह साल पहले बात हुई थी।तब मैंने ‘दैनिक भास्कर’ के एक आयोजन में समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था और उन्होंने अपने ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए असमर्थता व्यक्त कर दी थी।उनकी 1983 की इंदौर यात्रा कई मायनों में अविस्मरणीय कही जा सकती है।मैं तब ‘नई दुनिया’ हिंदी दैनिक को छोड़ देने के बाद अंग्रेज़ी दैनिक ‘फ़्री प्रेस जर्नल’ के साथ काम कर रहा था। लता जी तब इंदौर के एकमात्र अच्छे होटल श्रीमाया में वे ठहरी हुईं थीं। मैं उनके साथ जिस समय चर्चा कर रहा था ,उनके नाम के साथ जुड़कर होने जा रहे लता मंगेशकर समारोह का तब के बहुत बड़े कांग्रेस नेता स्व.सुरेश सेठ विरोध कर रहे थे। सेठ साहब का विरोध लता जी के प्रति नहीं बल्कि समारोह के आयोजक समाचार पत्र (नई दुनिया) के प्रति था।सेठ साहब का विरोध अपनी चरम सीमा पर था।होटल के बाहर काफ़ी हलचल थी ।ख़ासा पुलिस बंदोबस्त था।अर्जुन सिंह तब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।सेठ साहब(शायद) उनकी सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी थे। बहरहाल, श्रीमाया होटल के अपने छोटे से कमरे में प्रशंसकों से घिरी हुईं स्वर साम्राज्ञी के चेहरे पर बाहर जो कुछ चल रहा था उसके प्रति कोई विक्षोभ नहीं था।मन अंदर से निश्चित ही दुखी हो रहा होगा।मैं सवाल पूछता गया और वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ जवाब देती रहीं।वे जब तक जवाब देतीं ,सोचना पड़ता था कि अगला प्रश्न क्या पूछा जाए।लता जी को जैसे पहले से ही पता चल जाता था कि आगे क्या पूछा जाने वाला है।वे जानतीं थीं कि दुनिया भर के पत्रकार एक जैसे ही सवाल पूछते हैं।प्रत्येक साक्षात्कार का पहला सवाल भी यही होता है कि आपको यहाँ (इंदौर) आकर कैसा लग रहा है ? इतने वर्षों के बाद सोचता हूँ कि इंदौर की बेटी को उसके शहर में आकर कैसा लगा होगा ,क्या यह भी कोई पूछने की बात थी ? शायद इसलिए थी कि उन्हें अपने ही गृह-नगर में इस तरह के विरोध की उम्मीद नहीं रही होगी।और निश्चित ही डरते-डरते पूछा गया आख़िरी सवाल भी वही था जो उनसे लाखों बार पूछा गया होगा :’आप पर आरोप लगता रहता है कि आप नयी गायिकाओं को आगे बढ़ने का मौक़ा नहीं देतीं ?’ चेहरे पर कोई शिकन नहीं।हरेक सवाल का जवाब वैसे ही दे दिया जैसे किसी ने निवेदन कर दिया हो कि अपनी पसंद का कोई गाना या भजन गुनगुना दीजिए।और फिर एक खिलखिलाहट ,पवित्र मुस्कान जिसके सामने आगे के तमाम प्रश्न बिना पूछे ही ख़त्म हो जाते हैं। भारत के ख्यातिप्राप्त क्रांतिकारी कवि, साहित्यकार और अपने जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका ‘कर्मवीर’ के सम्पादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी से मैं उनके निधन (30 जनवरी,1968) के पहले खंडवा में जाकर मिला था।वे उन दिनों वहाँ एक अस्पताल में भर्ती थे।बातों ही बातों में उन्होंने लता जी का ज़िक्र किया ।उनका कहना था कि ‘ईथर वेव्ज़’ के रूप में लता(जी) आज हमारे चारों ओर उपस्थित हैं। उनके कहने का आशय था कि हमारे हृदय में अगर रेडियो की तरह कोई रिसीवर हो तो हम चौबीसों घंटे हर स्थान पर सुनते रह सकते हैं।स्वर साम्राज्ञी के प्रति इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता था ! थोड़े दिनों बाद उक्त वार्ता मैंने माखनलाल जी के अभिन्न सहयोगी रहे प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार स्व. रामचंद्र जी बिल्लोरे को इंदौर में सुनाई।वे तब इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। डॉ.बिल्लोरे ने लता जी के प्रति माखनलाल जी के स्नेह और सम्मान का एक और प्रसंग याद करके मुझे बताया : ‘दादा (माखनलाल जी) के बैठक कक्ष में दीवार पर दो तस्वीरें लगी हुईं थीं ।इनमें एक महात्मा गांधी की थी और दूसरी किसी अन्य महापुरुष की थी।एक स्थान ख़ाली था।दादा से पूछा गया कि ख़ाली स्थान पर वे किसकी तस्वीर लगाएँगे तो उन्होंने जवाब दिया था कि लता मंगेशकर की।’ मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार विजय तेंडुलकर ने लता जी के बारे में एक बार कहा था :’लड़की एक रोज़ गाती है ।गाती रहती है-अनवरत।यह जगत व्यावहारिकता पर चलता है ,तेरे गीतों से किसी का पेट नहीं भरता। फिर भी लोग सुनते ही जा रहे हैं पागलों की तरह।’ और लताजी गाए ही जा रही हैं-बिना रुके ,बिना थके।और लोग सुनते ही जा रहे हैं ,पागलों की तरह। लता जी को उनके जन्मदिन पर कोटिशः प्रणाम। श्रवण गर्ग देश के वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं.

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Dakhal News 30 September 2020


mumbai, RK Sinha, punishing media persons ,

इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार में हाहाकार मचा हुआ है। सैकड़ों कर्मचारी निकाले जा चुके हैं और बचे कर्मचारी वेतन के लिए विलाप कर रहे हैं। हिन्दुस्थान समाचार के चेयरमैन आरके सिन्हा ने पत्रकारों को पिछले चार महीने की सैलरी नहीं दी है। उनको दूसरी बार भाजपा द्वारा राज्यसभा न भेजे जाने के कारण वो नाराज हैं। यह नाराजगी वो हिन्दुस्थान समाचार के कर्मचारियों पर निकाल रहे हैं। सिन्हा इन दिनों संघ से इतने नाराज हैं कि उनके बड़े पदाधिकारियों को भी इग्नोर कर रहे हैं। संपादकीय टीम व संघ सिन्हा से सैलरी के लिए गिड़गिड़ा रहा है, इसके बाद भी सिन्हा अपने देहरादून की कोठी में सपरिवार आनंद ले रहे हैं। हिन्दुस्थान के कर्मचारी अपने बच्चों के दूध के पैसे नहीं जुटा पा रहे हैं। मकान का किराया नहीं दे पा रहे हैं। फीस, कॉपी, दवा नहीं जुटा पा रहे हैं। इसके बावजूद संस्थान के शीर्ष पदाधिकारियों पर कोई असर नहीं है। आखिर जब चार महीने का वेतन न मिला हो तो कर्मचारी कैसे जिन्दा हैं, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वहीं सिन्हा का कहना है कि उन्होंने संस्थान को बहुत कुछ दिया, संघ की खूब सेवा की। पर उन्हें बदले में न राज्यसभा मिली और न राज्यपाल बनाए गए। इन दिनों सिन्हा के सुर बदले हैं। वो बिहार राजनीति में भाजपा से इतर अपना नया ठिकाना तलाश रहे हैं। हालांकि पार्टी विरोधी गतिविधि वो लोकसभा चुनाव में भी कर चुके हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। सिन्हा का राजनैतिक रसूख इतना है कि उनकी सिक्योरिटी कंपनी दिन प्रतिदिन कमाई दोगुनी कर रही है। हर सरकारी जगह पर उनकी सिक्योरिटी एजेंसी को मौका दिया जा रहा। वहीं पत्रकार बंधु रोड पर आने को मजबूर हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि अब वेतन पाने के लिए केवल आमरण अनशन ही बचा है। हिन्दुस्थान समाचार के हालात अब लावारिश जैसे हैं। क्योंकि अब कर्मचारियों की पीड़ा का निदान तो दूर कोई महसूस करने वाला भी नहीं है। (छोटा कर्मचारी हूँ। इसलिए विनम्र निवेदन है कि पहचान गुप्त रखी जाए) एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Dakhal News 30 September 2020


bhopal, Has India become a police state?

एस आर दारापुरीआईपीएस (सेवानिवृत्त) लेखक, स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल ज़िब्लाट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई: व्हाट हिस्ट्री रिवीलज़ फ़ॉर फ्यूचर” में कहा है कि “डेमोक्रेसी तख्तापलट के साथ मर सकती हैं- या वे धीरे-धीरे मर सकती हैं। यह एक भ्रामक रूप में धीरे धीरे होता है, एक तानाशाह नेता के चुनाव के साथ, सरकारी सत्ता का दुरुपयोग और विपक्ष का पूर्ण दमन। ये सभी कदम दुनिया भर में उठाए जा रहे हैं- कम से कम डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव के साथ- और हमें समझना चाहिए कि हम इसे कैसे रोक सकते हैं। ” अब अगर हम अपने देश को देखें तो यह उतना ही सत्य प्रतीत होता है जितना कि अमेरिका में। क्या उपरोक्त सभी घटनाएँ भारत में नहीं हो रही हैं? एक तानाशाह नेता और विपक्ष के पूर्ण दमन के रूप में मोदी के चुनाव के अलावा, सरकारी सत्ता का दुरुपयोग बहुत स्पष्ट है। सरकारी शक्तियों के बीच पुलिस किसी भी सरकार के हाथों में सबसे शक्तिशाली साधन है। वास्तव में इसे राज्य की शक्ति का डंडा कहा जाता है। सामान्य तौर पर, पुलिस को कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराध को रोकने, अपराध की जांच करने और अपने अधिकारों के प्रयोग करने वाले लोगों की रक्षा करने के लिए एक उपकरण कहा जाता है। लेकिन यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि अक्सर राज्य द्वारा पुलिस को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ताकि विपक्ष और नागरिकों को दबाया जा सके, जो सरकार की नीतियों और कार्यों के साथ इत्तफाक नहीं रखते हैं। इस लिए सरकार पुलिस को अधिक से अधिक शक्तियां देना चाहती है। इसलिए धीरे धीरे लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने सत्ता पक्ष यानी पुलिस के सहारे एक अधिनायकवादी संगठन में बदल जाती है। राज्य के अन्य संस्थान भी एक सत्तावादी मोड में बदल दिये जाते हैं। अंत में लोकतांत्रिक राज्य एक पुलिस राज्य बन जाता है।   अब अगर हम अपने देश को देखें तो हमें पता चलता है कि 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से राज्य अधिक से अधिक तानाशाही होता जा रहा है। हर भाजपा शासित राज्य में पुलिस को अधिक से अधिक शक्तियां दी गई हैं और न केवल अपराधियों या कानून तोड़ने वालों के साथ बल्कि असंतुष्टों और राजनीतिक विरोधियों के साथ कठोर व्यवहार करने के लिए खुली छूट दी गयी है। सामान्य दंड वाले प्रावधानों के साथ यूएपीए और एनएसए जैसे कठोर कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि यूएपीए और एनएसए के तहत बहुत बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को बुक किया गया है। भीमा कोरेगांव मामला इसका एक भयानक उदाहरण है। गुजरात और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां पुलिस का दमन सबसे क्रूर है। उत्तर प्रदेश में योगी ने पुलिस को “ऑपरेशन ठोक दो” यानी अपराधियों पर कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हाथ दिया है। राज्य ने 5000 से अधिक मुठभेड़ों को अंजाम दिया है जिसमें 100 से अधिक लोग मारे गए हैं और बहुत बड़ी संख्या में टांग या पैरों में गोली मारी गयी है। निस्संदेह मारे गए और घायलों की अधिकतम संख्या मुसलमानों के बाद दलितों और सबसे पिछड़े वर्ग के लोगों की है। राज्य नीति के रूप में किए गए मुठभेड़ों के गुजरात मॉडल का ईमानदारी से पालन किया जा रहा है, यहां तक ​​कि कभी-कभी उत्तर प्रदेश में उससे अधिक भी। एक बहुत बड़ी संख्या में व्यक्तियों को एनएसए के तहत जेल में रखा गया है। आपातकाल के दौरान संख्या इससे कम हो सकती है। यहाँ भी मुसलमानों और दलितों का अनुपात मुठभेड़ों की तरह ही अधिक है। वर्तमान में हम कोरोना संकट का सामना कर रहे हैं। कोविड-19 संक्रमण के कारण न केवल लोगों की मौत हो रही है, बल्कि वे महामारी को नियंत्रित करने के नाम पर राज्य द्वारा दमन का सामना भी कर रहे हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि एक कानून “महामारी रोग अधिनियम, 1897 के रूप में जाना जाता है जो कि विभिन्न महामारियों के दौरान अब तक इस्तेमाल किया गया है। इस अधिनियम में केवल 4 धाराएं थीं। इस अधिनियम के तहत जारी किए गए सरकारी आदेशों के उल्लंघन के लिए, धारा 3 में एक माह की जेल की अधिकतम सजा और रुo 200 जुर्माना था. लेकिन मार्च में मोदी सरकार ने कोरोना वारियर्ज़ को साधारण चोट पहुँचाने के लिए इसमें 3 महीने से 5 साल तक की कैद की अधिकतम सजा और 50,000 से 2 लाख रुo तक का जुर्माना होने का संशोधन किया है। गंभीर चोट के मामले में 6 महीने से 7 साल तक की कैद और 2 लाख से 5 लाख रुपये का जुर्माना। इसके अलावा संपत्ति को नुकसान की कीमत की दुगनी लागत पर वसूली का प्रावधान है। इससे आप देख सकते हैं कि ब्रिटिश और पिछली सरकारें बहुत मामूली सजा से महामारी के खतरे से निपट सकती थीं लेकिन मोदी सरकार ने इसे बहुत कठोर दंड के रूप में बढ़ाया है। इसका उद्देश्य आम आदमी को आतंकित करना है। मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि हमें संकट को अवसर में बदलना चाहिए। लेकिन कोरोना महामारी से लड़ने के उपायों को बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करने के बजाय, उनकी सरकार ने जनता को आतंकित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया है। पुलिस द्वारा सताए जा रहे प्रवासी मजदूरों के दृश्य राज्य के आतंक और दुखी नागरिकों के प्रति अमानवीयता के उदाहरण हैं। इसी तरह दिसंबर में उत्तर प्रदेश में सीएए / एनआरसी प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी हजारों की संख्या में हुई, जिसमें 21 लोग मारे गए लेकिन पुलिस ने इससे इनकार करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनकारियों की आपसी गोलीबारी से हुयी हैं. इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि असंतोष की आवाज को कुचलने के लिए पुलिस की ताकत का कैसे इस्तेमाल किया गया है। फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में पुलिस न केवल हमलावरों से मिली रही, बल्कि अब उसने पीड़ितों को ही आरोपी बना दिया है। सीएए / एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ यूएपीए का कड़ा कानून इस्तेमाल किया गया है। यहां तक ​​कि सीपीएम के सीताराम येचुरी, स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, डॉ. अपूर्व नंद और फिल्म निर्माता राहुल रॉय जैसे राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को भी चार्जशीट में रखा गया है। इसी तरह बड़ी संख्या में छात्र नेताओं और जामिया मिलिया और जेएनयू के सांस्कृतिक कर्मियों को झूठे आधार पर गिरफ्तार किया गया है। उमर खालिद की हालिया गिरफ्तारी राज्य की शक्ति के दुरुपयोग का एक क्रूर उदाहरण है। ऊपरोक्त से यह देखा जा सकता है कि मोदी सरकार के तहत भारत तेजी से पुलिस स्टेट बन रहा है। सामान्य कानूनों को और अधिक कठोर बनाया जा रहा है। राजद्रोह, यूएपीए और एनएसए जैसे काले कानूनों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार रक्षकों और विपक्षी नेताओं को झूठे आरोपों में फंसाया जा रहा है। दुर्भाग्य से अदालतें भी आम आदमी के बचाव में नहीं आ रही हैं जैसा कि अपेक्षित है। विरोधियों या असंतुष्टों को दंडित करने के लिए पुलिस और अन्य पुलिस एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसलिए यह उचित समय है कि जो लोग लोकतंत्र और कानून के राज में विश्वास करते हैं, उन्हें तानाशाही के हमले के खिलाफ खड़े होने के लिए हाथ मिलाना चाहिए और हमारे देश को पुलिस स्टेट नहीं बनने देना चाहिए। अब चूंकि यह हिंदुत्ववादी ताकतों की राजनीतिक रणनीति का नतीजा है, अतः इसका प्रतिकार भी राजनीतिक स्तर से ही करना होगा जिसके लिए एक बहुवर्गीय पार्टी की ज़रुरत है क्योंकि वर्तमान विपक्ष इसको रोकने में असमर्थ दिखाई दे रहा है। एस आर दारापुरीआईपीएस (सेवानिवृत्त)राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

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Dakhal News 28 September 2020


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डॉ. अजय खेमरिया   भारत में बेनकाब हो चुके सेक्युलरिस्ट उदारवादियों का विदेशी नेक्सस वैश्विक जगत में भी सबको नजर आने लगा है। टाइम पत्रिका के ताजा अंक में विश्व की 100 ताकतवर शख्सियत के साथ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जगह देना और साथ में शाहीन बाग धरने पर बैठी 82 वर्षीय महिला को इस सूची में शामिल किया जाना, बहुत कुछ स्पष्ट कर रहा है। वैसे भी अमेरिका और पश्चिमी मीडिया के लिए भारत के हिन्दू तत्व और दर्शन सदैव उसी अनुपात में हिकारत भरे रहे हैं जैसा भारत के वाम बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग प्रस्तुत करता आया है। टाइम की सूची में यूं तो जिनपिंग, ट्रम्प, मर्केल सहित अन्य राष्ट्रों के प्रमुख भी शामिल हैं लेकिन जिस वैशिष्ट्य के साथ हमारे प्रधानमंत्री को छापा गया है, उससे दो बातें स्पष्ट होती हैं- प्रथम यह कि मोदी के बगैर विदेशी मीडिया का भी गुजारा नहीं होता है। दूसरा भारत को समझने और रिपोर्टिंग के लिए वामपंथी ही उनके पास अकेले स्रोत हैं।   "टाइम" ही नहीं बीबीसी, दी इकोनॉमिस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाल स्ट्रीट जनरल, वाशिंगटन पोस्ट, गल्फ न्यूज, एफ़वी, डीपीए, रॉयटर्स, एपी, गार्डियन जैसे बड़े मीडिया हाउस का भारतीय एजेंडा देश के उन्हीं बुद्धिजीवियों द्वारा निर्धारित और प्रसारित होता है, जिनकी पहचान पिछले कुछ वर्षों में टुकड़े-टुकड़े, अवॉर्ड वापसी के रूप में सार्वजनिक हो चुकी है। मई 2014 के बाद से सरकारी धन और स्वाभाविक शासक दल की सुविधाओं पर टिके रहने वाला यह बड़ा बौद्धिक गिरोह भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के प्रति लोगों को भड़काने में भी जुटा हुआ है। सुविधाओं से सराबोर लुटियंस से बेदखली ने इस गिरोह को इतना परेशान कर दिया है कि आज भारत के विरुद्ध खड़े होने में भी इन्हें संकोच नहीं है। वस्तुतः हिंदुत्व और बाद में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लंबा प्रायोजित अभियान चलाने के बावजूद जनता द्वारा मोदी को राज दिए जाने के संसदीय घटनाक्रम ने इस वर्ग की कमर तोड़ दी है। 2014 के बाद 2019 की मोदी की ऐतिहासिक जीत तो किसी पक्षाघात से कम नहीं है। ध्यान से देखा जाए तो भारतीय उदारवादियों ने बेशर्मी की सीमा लांघकर दुनिया में भारत और हिंदुत्व को लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिन्दू नेशनलिस्ट, हिन्दू तालिबान, हिन्दू रेडिकल, हिन्दू मर्डरर जैसी शब्दावलियों को सर्वप्रथम किसी विदेशी मीडिया ने नहीं बल्कि भारतीय वाम बुद्धिजीवियों ने ईजाद किया है।   टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर 2012, 2015, 2019 में भी स्टोरी प्रकाशित की और सबकी इबारत में हिन्दू शब्द अवश्य आया है। बीजेपी के लिए हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाता है। मानों हिन्दू और हिंदुत्व कोई नाजिज्म का स्रोत हो। ताजा अंक में पत्रिका के संपादक कार्ल विक लिखते हैं- "लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि इससे केवल यही मालूम पड़ता है कि किसे अधिक वोट मिले हैं। भारत की 130 करोड़ आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध रहते हैं, 80 प्रतिशत हिन्दू हैं। अबतक सभी प्रधानमंत्री हिन्दू ही हुए। मोदी ऐसे शासन कर रहे हैं जैसे और कोई उनके लिए महत्व नहीं रखता। मुसलमान मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी के निशाने पर है।" पत्रिका आगे लिखती है "नरेंद्र मोदी सशक्तीकरण के वादे के साथ सत्ता में आये। उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा ने न केवल उत्कृष्टता को बल्कि बहुलतावाद विशेषकर भारत के मुसलमानों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। दुनिया का सबसे जीवित लोकतंत्र अंधेरे में घिर गया है।"   सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचन प्रक्रिया से दो बार चुनकर आये मोदी को निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के बाद भी खारिज किया जाएगा? लोकतंत्र का झंडा लेकर घूमने वाले अमेरिकी मीडिया के लिए भारत में निष्पक्ष चुनाव की स्वीकार्यता कोई महत्व नहीं रखती है?क्या यह निष्कर्ष हमारे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर ठीक वैसा ही आक्षेप नहीं है जो अवॉर्ड वापसी गैंग पिछले 6 वर्षों से स्थानीय विमर्श में लगाता आ रहा है। कभी ईवीएम, कभी वोट परसेंट, कभी चुनावी मुद्दों की विकृत व्याख्या और हिन्दू ध्रुवीकरण जैसे कुतर्कों को खड़ा कर मोदी सरकार की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न यहां भी लगाये जाते हैं। केवल बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाना कुत्सित मानसिकता को प्रमाणित नहीं करता है? क्या अमेरिका, इंग्लैंड या यूरोप में गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे हैं? चेक रिपब्लिक और फ्रांस को छोड़ कितने देशों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर रखा है।   बुनियादी सवाल यही है कि क्यों भारत के सिर पर सेक्यूलरिज्म को थोपकर इसकी सुविधाजनक व्याख्या के आधार पर हमारे चुने हुए प्रधानमंत्री को लांछित किया जाए। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि विदेशी मीडिया के पास क्या कोई अध्ययन और शोध मौजूद है जो यह प्रमाणित करता हो कि मोदी और बीजेपी मुसलमानों को निशाने पर ले रहे हैं? सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास मोदी सरकार का दर्शन रहा है। सरकार की फ्लैगशिप स्कीमों में प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, जनधन, हर घर शौचालय, सुकन्या, किसान सम्मान निधि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रा लोन में किसी हितग्राही को केवल मुसलमान होने पर बाहर किया गया हो, ऐसा कोई उदाहरण आजतक सामने नहीं आया। प्रायोजित खबरें अक्सर तथ्य की जगह कथ्य का प्रतिबिम्ब होती है।   टाइम ने दुनिया के 100 ताकतवर शख्सियत में शाहीन बाग की 82 वर्षीय दादी बिलकिस बानो को जगह दी है। इसकी इबारत लिखाई गई है- राणा अयूब से। जी हां वही राणा अयूब जो सार्वजनिक तौर पर मोदी और अमित शाह के विरुद्ध झूठ का प्रोपेगंडा चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में बेपर्दा हो चुकी हैं। "गुजरात फाइल्स"-एनाटॉमी ऑफ ए कवरअप 'कूटरचना में इन्ही राणा अयूब ने हरेन पांड्या की हत्या की मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी और फिर एक जेबी एनजीओ से सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से जांच के लिए जनहित याचिका दायर कराई। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात फाइल्स को फर्जी, मनगढ़ंत, काल्पनिक बताकर खारिज कर दिया। दिल्ली दंगों के दौरान दो साल पुराना कोई वीडियो ट्वीट कर नफरत फैलाने के मामले में भी इन मोहतरमा का दामन दागदार रहा है। पत्रिका का बिलकिस को 100 ताकतवर शख्सियत में रखा जाना और राणा अयूब से ही उसके बारे में लिखवाना टुकड़े-टुकड़े गैंग और पश्चिमी मीडिया के गठबन्धन को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं।   सभी जानते हैं कि शाहीन बाग का धरना अवैध था उस धरने में भारत के विरुद्ध षडयंत्र रचे गए। शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे छात्र नेताओं ने भारत के चिकिन नेक काटने, ट्रम्प के दौरे पर अराजकता फैलाने से लेकर दिल्ली दंगों तक की पृष्ठभूमि तैयार की। नागरिकता संशोधन कानून का सबन्ध भारत के किसी मुसलमान से नही है, यह सर्वविदित तथ्य है। एनआरसी का प्रारूप तब और आज भी सामने नहीं था, लेकिन देश भर में झूठ और नफरत फैलाकर मोदी-अमित शाह के साथ भारत को बदनाम किया गया। इसी नकली और प्रायोजित धरना-प्रदर्शन की आइकॉन के रूप में राणा अयूब के जरिये टाइम ने बिलकिस को मोदी के समानान्तर जगह देकर अपनी चालाकी को खुद ही प्रमाणित कर दिया।   राणा के हवाले से बिलकिस को लेकर लिखा गया है कि "वो ऐसे देश में प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं जहाँ मोदी शासन बहुमत की राजनीति द्वारा महिलाओं और अल्पसंख्यक की आवाज को बाहर कर रही है।" सवाल यह है कि तीन तलाक के नारकीय दंश से मुक्ति दिलाने वाले मोदी राज में महिलाओं और अल्पसंख्यक के उत्पीड़न का प्रमाणिक साक्ष्य किसी के पास उपलब्ध है? सिवाय अतिरंजित मॉब लिंचिंग की घटनाओं के जो 130 करोड़ के देश में स्थानीय कानून की न्यूनता का नतीजा है जो अखलाक के साथ पालपुर में भी घटित होती है। लेकिन शोर केवल अल्पसंख्यक और उसमें भी मुसलमानों को लेकर खड़ा किया जाता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 26 September 2020


bhopal,Disillusioned with Harivansh!

रवि प्रकाश- आप पत्रकारिता में हमारे हीरो थे। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ते थे। ईमानदार थे। शानदार पत्रकारिता करते थे। ‘जनता’ और ‘सरकार’ में आप हमेशा जनता के पक्ष में खड़े हुए। आपको इतना मज़बूर (?) पहले कभी नहीं देखा। अब आप अच्छे मौसम वैज्ञानिक हैं। आपको दीर्घ जीवन और सुंदर स्वास्थ्य की शुभकामनाएँ सर। आप और तरक़्क़ी करें। हमारे बॉस रहते हुए आपने हर शिकायत पर दोनों पक्षों को साथ बैठाकर हमारी बातें सुनी। हर फ़ैसला न्यायोचित किया। आज आपने एक पक्ष को सुना ही नहीं, जबकि उसको सुनना आपकी जवाबदेही थी। आप ऐसा कैसे कर गए सर? यक़ीन नहीं हो रहा कि आपने लोकतंत्र के बुनियादी नियमों की अवहेलना की। क़रीब दस साल पहले एक बड़े अख़बार के मालिक से रुबरू था। इंटरव्यू के वास्ते। उन्होंने पूछा कि आप क्या बनना चाहते हैं। जवाब में मैंने आपका नाम लिया। वे झल्ला गए। उन्होने मुझे डिप्टी एडिटर की नौकरी तो दे दी, लेकिन वह साथ कम दिनों का रहा। क्योंकि, हम आपकी तरह बनना चाहते थे। लेकिन आज…! एक बार झारखंड के एक मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को लाने के लिए सरकारी हेलिकॉप्टर भेजा। आपने पहले पन्ने पर खबर छापी। बाद में उसी पार्टी के एक और मुख्यमंत्री हर सप्ताहांत पर सरकारी हेलिकॉप्टर से ‘घर’ जाते रहे। आपका अख़बार चुप रहा। हमें तभी समझना चाहिए था। आपके बहुत एहसान हैं। हम मिडिल क्लास लोग एहसान नहीं भूलते। कैसे भूलेंगे कि पहली बार संपादक आपने ही बनाया था। लेकिन, यह भी नहीं भूल सकते कि आपके अख़बार ने बिहार में उस मुख्यमंत्री की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की, जिसने बाद में आपको राज्यसभा भेजकर उपकृत किया। आपकी कहानियाँ हममें जोश भरती थीं। हम लोग गिफ़्ट नहीं लेते थे। (कलम-डायरी छोड़कर) यह हमारी आचार संहिता थी। लेकिन, आपकी नाक के नीचे से एक सज्जन सूचना आयोग चले गए। आपने फिर भी उन्हें दफ़्तर में बैठने की छूट दी। जबकि आपको उन पर कार्रवाई करनी थी। यह आपकी आचार संहिता के विपरीत कृत्य था। बाद में आप खुद राज्यसभा गए। यह आपकी आचार संहिता के खिलाफ बात थी। ख़ैर, आपके प्रति मन में बहुत आदर है। लेकिन, आज आपने संसदीय नियमों को ताक पर रखा। भारत के इतिहास में अब आप गलत वजहों के लिए याद किए जाएँगे सर। शायद आपको भी इसका भान हो। संसद की कार्यवाही की रिकार्डिंग फिर से देखिएगा। आप नज़रें ‘झुकाकर’ बिल से संबंधित दस्तावेज़ पढ़ते रहे। सामने देखा भी नहीं और उसे ध्वनिमत से पारित कर दिया। संसदीय इतिहास में ‘पाल’ ‘बरुआ’ और ‘त्रिपाठी’ जैसे लोग भी हुए हैं। आप भी अब उसी क़तार में खड़े हैं। आपको वहाँ देखकर ठीक नहीं लग रहा है सर। हो सके तो हमारे हीरो बने रहने की वजहें तलाशिए। शुभ रात्रि सर।

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Editor Manoj Binwal ,dies from Corona

बेहद दुखदायी ख़बर मिल रही है। दैनिक भास्कर से जुड़े रहे और वर्तमान में प्रजातंत्र अखबार इंदौर में कार्यरत पत्रकार मनोज बिनवाल का कोरोना के कारण निधन हो गया है। मनोज का इलाज एक सुपर स्पेशिएलटी हास्पिटल में चल रहा था। मनोज के निधन से मीडियाकर्मी स्तब्ध हैं। सभी ने ईश्वर से कामना की, दुखी शोक संतप्त परिवार को दुख सहने की शक्तिप्रदान करें!   दैनिक भास्कर के डीबी संस्करण के मध्यप्रदेश में  संपादक रहे मनोज बिनवाल का कोरोना उपचार के दौरान निधन से अब वो मीडियाकर्मी भी कोरोना से सतर्क हो गए हैं जो इसे हल्के में ले रहे थे और लगातार बाहर निकल रहे थे। श्री बिनवाल ने हाल ही में प्रजातन्त्र अखबार जॉइन किया था. वे गुजरात, राजस्थान में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्हें चरक अस्पताल में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद भर्ती किया गया था. मृत्यु से दो दिन पहले  कोविड केयर सुपर हास्पिलिटी सेंटर में दाखिल किया गया था. बताया जा रहा है कि बिनवाल के माता-पिता भी संक्रमित हैं  

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Dakhal News 21 September 2020


bhopal, Jaya worried, about which plate, cinema has become,drain of intoxication

-निरंजन परिहार अगर वह किसी हिंदी सिनेमा का कोई सीन होता, और वे इतने ही दमदार तरीके से बोलतीं, तो लोग हर डायलॉग पर तालियां बजाते, वाह वाह करते और खुश हो जाते। क्योंकि वे अभिनय बहुत अच्छा कर लेती हैं। जीवन भर किया भी तो वहीं है। सो, जया बच्चन सुपर हिट हो जाती। लेकिन बात थी जमाने की परवाह न करनेवाले सिनेमा में नशे को कारोबार की, और जगह थी संसद, जहां पर जो कह दिया, वही दर्ज हो जाता है इतिहास में। संसद में फिल्मों की तरह रीटेक के अवसर नहीं होते। यह वे जानती थीं। इसीलिए जमकर बोलीं। लेकिन बोलने पर बवाल मच गया। क्योंकि जिंदगी कोई सिनेमा नहीं है, जहां पटकथा के पात्रों को पढ़े पढ़ाए डायलॉग पर जीना होता है। यहां तो लोग खुलकर खेलते हैं, बोलते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर गालियां तक परोस देते हैं, जो कि जया बच्चन को सोशल मीडिया पर मिल भी खूब रही हैं। जया बच्चन ने संसद में कहा कि बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश चल रही है। कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं, उसमें ही छेद करते हैं। ये गलत बात है। मनोरंजन उद्योग के लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से बदनाम किय़ा जा रहा है। उनकी तकलीफ यही थी कि बॉलीवुड को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। जया बच्चन के कहने का अर्थ यही था कि सिनेमा के निष्पाप लोगों को अचानक गुनाहगार साबित किया जा रहा है। लेकिन संसद में यह कहते वक्त जया बच्चन शायद यह भूल गई थी कि सिनेमा के कलाकारों को तो अपनी बदनामी की असल में कोई चिंता ही नहीं होती। अगर होती, तो क्या वे फिल्में हिट करवाने के लिए खुद को बदनाम करने के नुस्खे ढूंढते ? खुद ही खुद के खिलाफ षड़यंत्र फैलाते ? और खुद ही खुद की इज्जत की भद्द पिटवाने की कारस्तानियां करते ? सो, ऐसे फिल्मवालों की क्या तो इज्जत और क्या ही उनकी बदनामी की चिंता। संसद में जया जब सोशल मीडिया के उलाहने दे रही थीं, तो उन्हें इस बात का कतई अंदेशा नहीं था कि वही सोशल मीडिया उनके लिए सनसनाता जबाव लेकर बाहर तैयार खडा मिलेगा। कंगना रणौत ने सोशल मीडिया पर ही उनसे पूछा – ‘जयाजी, क्‍या आप तब भी यही कहतीं अगर मेरी जगह पर आपकी बेटी श्‍वेता को किशोरावस्था में पीटा गया होता, ड्रग्‍स दिए गए होते और शोषण होता। क्‍या आप तब भी यही कहतीं अगर अभिषेक एक दिन फांसी से झूलते पाए जाते? थोड़ी हमदर्दी हमसे भी दिखाइए।‘ जाहिर है कंगना के इस सवाल का सीधा, सरल, सहज और सामान्य सा जवाब माननीय सांसद महोदया के पास हो ही नहीं सकता। कंगना के बाद तो बॉलीवुड सहित देश भर में जया बच्चन के विरोध और समर्थन में जो स्वर उठने लगे, उनमें उनके प्रति आभार के मुकाबले गालियां और गोलियां बहुत ज्यादा हैं। जया बच्चन के खिलाफ यह गुबार इसलिए भड़क रहा है, क्योंकि सिनेमा जगत में ड्रग्स की असलियत से अच्छी तरह वाकिफ होने के बावजूद जया बच्चन संसद में जो बोली, उसमें कितना सच था और कितना झूठ, यह वे खुद भी जानती है। यह सच है कि ‘सिलसिला’, ‘शोले’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘जंजीर’ और ऐसी ही ढेर सारी फिल्मों में गजब का अभिनय करने वाली जया बच्चन आजकल बडे पर्दे पर कुछ खास नहीं कर पा रही हैं, लेकिन संसद में वे अभिनय जैसा ही कुछ करने में जबरदस्त कामयाब रही हैं। उन्हें सिनेमा के संसार की उड़ रही इज्जत की चिंता है। लेकिन सिनेमा खुद अपनी इज्जत की परवाह न करते हुए कोकीन, स्मैक और हेरोइन के धुएं में अपनी इज्जत उडाने को हर पल बेताब दिखता है और ड्रग्स की पार्टियां करता है। जया बच्चन चाहे कहे कुछ भी, लेकिन जानती वे भी हैं कि सिनेमा के संसार में सबसे ज्यादा नशेड़ी बसते हैं, और अक्सर वहीं से, किसी न किसी कलाकार के नशीले धुंए में धंसे होने की गंध आती रहती है। फिर भी वही सिनेमा, जया बच्चन की नजरों में दूध का धुला है, किसी हवन की आहुति से प्रज्वलित ज्वाला सा पवित्र है और सूरज की किरणों से निकली चमक सा पावन है। उसे कैसे कोई बदनाम करने की जुर्रत कर सकता है। सो, जया ने कहा, बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश चल रही है। कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं, उसमें ही छेद करते हैं। ये गलत बात है। कायदे से देखें, तो बीजेपी के सांसद रविकिशन ने तो ऐसा कुछ कहा भी नहीं था, जिस पर जया बच्चन इतना बवाल मचाती। उल्टे जया बच्चन को तो रविकिशन समर्थन करना चाहिए था। क्योंकि उन्होंने तो पाकिस्तान और चीन से ड्रग्स की तस्करी रोकने और फिल्म उद्योग में इसके सेवन को लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की जांच का मुद्दा उठाया था और इस दिशा में कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन वे तो भड़क उठीं। उसके उलट आश्चर्यजनक रूप से अमिताभ बच्चन चुप हैं। एकदम चुप। वे अकसर कई ज्वलंत विषयों पर ब्लॉग लिखते हैं। लेकिन फिल्म जगत में बहुत दिनों से हो रहे बवाल पर कुछ नहीं बोले। माना जा रहा है कि अमिताभ की बात उनकी पत्नी जया बच्चन ने कह दी है। वह भी सीधे संसद में। इसीलिए जया के साथ अमिताभ भी निशाने पर है। सोशल मीडिया में दोनों को लेकर जबरदस्त विरोध के स्वर सुलग रहे हैं। हर छोटे – बड़े मामले पर भी मुखर होकर अपना मत व्यक्त करनेवाले अमिताभ का राम मंदिर के शिलान्यास पर कुछ नहीं बोलना भी सोशल मीडिया में मुद्दा बना हुआ है और जया बच्चन का तो विरोध हो ही रहा है। जय़ा के जवाब में रवि किशन ने कहा है कि जिस थाली में जहर हो उसमें छेद करना ही पड़ेगा। और भी बहुत कुछ कहा जा रहा है। तो. अब शायद अमिताभ भी सोच रहे होंगे कि कभी कभी किसी मुद्दे पर न बोलना, बोलने के मुकाबले बहुत बेहतर होता है। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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Dakhal News 17 September 2020


bhopal, Take much money, you want, but soften ,your attitude, towards the government

-अमरीक- गुरशरण सिंह हमारे दौर के योद्धा थे। एक विलक्षण सांस्कृतिक महा-लोकनायक। एक ऐसी मशाल जो मनुष्य विरोधी हर अंधेरे को चीरने के लिए सदैव तत्पर रहती है। उन्होंने लोक चेतना के लिए जो किया और जैसा जीवन जिया, उसे पीढ़ियां-दर-पीढ़ियां यकीनन याद रखेंगी। उस विरली-निराली एक शख्सियत के कई मकबूल नाम थे। गुरशरण सिंह..भाजी..बाबा…भाई मन्ना सिंह…। आकड़ों और (विश्व स्तरीय) रिकॉर्डों का संकलन करने वाली नामी-गिरामी संस्थाओ तथा व्यवस्थाओं की जानकारी में हो या नहीं, लेकिन यह तथ्य ऐतिहासिक ओर बेहद जिक्रेखास है कि गुरशरण सिंह ऐसे नाटककार-संस्कृति कर्मी रहे जिन्होने अपने सूबे (पंजाब) के एक- एक गांव, कसबे और शहर में जाकर नाटक किए। बेशक ज्यादा तादाद नुक्कड़ नाटकों की रही। उन्हें नुक्कड़ नाटकों का अनथक व क्रांतिकारी रहनुमा बेवज़ह नहीं कहा जाता। भारत, उत्तर भारत, पंजाब का सियासी व सामाजिक इतिहास और गुरशरण सिंह का रंगकर्म-सफरनामा साथ-साथ चले है। जिस भी घटना ने देश और पंजाब की दशा-दिशा पर अहम असर छोड़ा, उन्होंने बाकायदा उस पर नाटक लिखा और किया। उनमें से कई घटनाएं आज भले ही विस्मृत है पर उन पर भाजी के लिखे नाटक जिंदा है। पंजाब में एक काला दौर ऐसा रहा है जब लोग अखबारों की खबरों और विश्लेषणों पर कम, गुरशरण सिंह के नाटकों और तर्कों पर ज्यादा भरोसा करते थे। खालिस्तानी-सरकारी आतंकवाद के उस खौफनाक दौर में गुरशरणजी ने जो महान काम किया, उसकी मिसाल समूची दुनिया में शायद दूसरी नहीं। उस काली आंधी में जब सूबे की ज्यादातर कलमें खामोश थीं और संस्कृतिकर्मी खौफजदा होकर घरों में आराम कुर्सियों पर बैठ गए थे तो इस बुजुर्ग बाबा ने खिलाफ वक्त को यूं ही बगल से नहीं गुजरने दिया। चौतरफा खूनखराबा और आपाधापी के बीच, ऐन जमीनी स्तर पर जाकर अमन और सद्भाव के लिए सशक्त काम किया। अपनी कला के जरिए अवाम को बड़ी बारीकी से समझाया-बताया कि हिन्दू-सिख एकता कायम रहेगी तो पंजाब बचेगा,देश बचेगा, वर्ना कुछ नहीं बचेगा।   आंतकवाद के काले दौर में कट्टरपंथी मरजीवड़े आतंकी तो गुरशरण सिंह के मुखर खिलाफ थे ही- हुकुमत तथा गैर वामपंथी सियासत भी उनके मुखालिफ थी। वजह भी शीशे की मानिंद साफ थी। उनके उस दौर के नाटको में संत जनरैल सिंह भिंडरावाला, संत हरचन्द सिंह लौंगोवाल, जत्थेदार,गुरूचरणसिंह तोहड़ा, जत्थेदार तलवंडी , सुरजीत सिंह बरनाला, और प्रकाश सिंह बादल के साथ-साथ इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह, दरबारा सिंह, राजीव गांधी और कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बकायदा पात्र होते थे। सबके सब खलनायक की भूमिकाओ में होते थे। प्रसंगवश, भाजी का एक नाटक है ‘हिटलिस्ट’। इस नुक्कड़ नाटक का मंचन एक बार अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास किया गया।’संत जी’ इसमें पात्र बनाये गये थे। उन दिनो संत जी की दहशत समूचे पंजाब में बेतहाशा दनदना रही थी और उनकी बदनाम, जालिम तथा जानलेवा ‘हिटलिस्ट’ के किस्से खासजनों तथा आम लोगों को खूब थर्राते थे। चलते नाटक के बीच गुरशरण सिंह जी को धमकी दी गई, नाटक फौरन बंद करने का फरमान सुनाया गया और सूचित किया गया कि आज के बाद उनका नाम हत्यारी हिटलिस्ट में शुमार हो। लेकिन न नाटक रुका और न जान से मार दिये जाने की धमकी फौरी तौर असर दिखा पाई, उल्टे भाजी का बुलंद और अडिग जवाब था कि हथियारों के बूते उन्हें खौफजदा करने की कोशिश न की जाए। हथियार उन्हें भी चलाने-उठाने आते हैं। कोई गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए, एक हिटलिस्ट अवाम के भीतर भी आकार ले रही है और उनमें उन सब के नाम शिखर पर हैं जो धर्म और राजनीति के नाम पर निहत्थे व बेगुनाह लोगों पर जुल्म कर रहे हैं। खैर, इस घटना के बाद गुरशरण सिंह को सरकारी एजेंसियों के जबरदस्त दबाव के चलते अमृतसर छोड़कर चंडीगढ़ चले जाना पड़ा। हालाकि उनके प्रशंसकों का एक बड़ा तबका भी चाहता व मानता था कि भाजी को जुनूनी आतंकियो का आसान शिकार कतई नहीं बनना चाहिए। इसी मानिंद गुरशरण सिंह के एक और मशहूर नाटक में बादल, बरनाला और कैप्टन पात्र थे। उसके एक मंचन के दौरान बतौर मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला भी दर्शक-दीर्घा में थे। खुद को पात्र और वह भी खलनायक के तौर पर देखकर वह नाराज होकर उठकर चले गए, पर गुरशरण सिंह ने इस सबकी कोई परवाह नहीं की। यही बरनाला जी मुख्यमंत्री थे और एक नाट्य उत्सव में मुख्य अतिथि थे। वहीं भाजी ने भी नाटक प्रस्तुत करना था। मुख्यमंत्री को बावक्त आता न पाकर उन्होने रोष स्वरूप बहिष्कार कर दिया और नाट्यशाला से बाहर आकर नाटक किया। वह बेखौफ तार्किक प्रतिरोध से लबालब से भरे हुए थे। सोलह सितम्बर 1929 को जन्मे गुरशरण सिंह ने बतौर इंजीनियर लंबा अरसा भाखड़ा डैम में बिताया। वहां वह अक्सर श्रमिक हितों को लेकर लैक डैम के प्रबंधतंत्र से टकराया करते थे। उसी सिलसिले में उन्होने कुछ निर्णायक हड़तालों और आंदोलनो की मजबूत अगुवाई भी बखूबी की। भाजी के भीतर सक्रिय नाटककार ने भाखड़ा डैम पर जन्म लिया। वह श्रमिकों और कर्मचारियों के बीच अर्थपूर्ण नाटक प्रस्तुत करते तो बहुधा प्रबंधन और शिखर अफसरशाही को उनके तीखे तेवर रास न आते। मगर गुरशरण पूरी जिद और लोक समर्पण की भावना से जुटे एवं अड़े रहते। जून, 1975 के बर्बर आपातकाल का उन्होंने हर लिहाज से पुरजोर से विरोध किया था। आपातकाल के जोरदार विरोध में नाटक किए तथा कई सेमीनार आयोजित किए। बौखलाई सरकार ने कई तरह की धमकियां देकर उन्नीस सितम्बर 1975 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। बेशक इस इंकलाबी संस्कृतिकर्मी की सरकार विरोधी सांस्कृतिक गतिविधियां नहीं ही रूकीं। वह निरन्तर अलख जगाते रहे।   जून-84 और नवम्बर-84 ने पंजाबियों और पंजाब को बहुतेरे जख़्म दिये हैं। उस अवधि में भी गुरशरण सिंह पंजाब और पंजाबियत की गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति बनकर सामने आए। खालिस्तानी और राज्य आतंकवाद के प्रबलविरोधी गुरशरण ने आपरेशन ब्लू स्टार का भी अपने तई जबरदस्त विरोध किया और गाँव कस्बों तथा शहरो में जाकर नुक्कड़ नाटक करके तत्कालीन पंजाब संकट की असली परतों से अवाम को रू-ब-रू करवाया। यही काम उन्होंने नवंबर-84 के भयावह सिख विरोधी कत्लेआम के बाद किया। तब उन्होंने ने दिल्ली, कानपुर, हरियाणा व अन्य हिंसाग्रस्त इलाकों में जाकर नुक्कड़ नाटक किया। उनके हर नाटक में यह खुला संदेश है कि व्यवस्था न बदली और हम खामोश रहे तो बार-बार जून-84 और नवंबर-84 होंगे। 1969-71 की नक्सलबाड़ी लहर के साथ भाजी की खुली और सक्रिय सहानुभूति थी। उस लहर ने पंजाब में दस्तक दी तो उन्होने उसके पक्ष में सांस्कृतिक मोर्चा संभाला। पंजाबी के कतिपय नामवर लेखक, कवि व नाटककार नक्सलबाड़ी लहर की देन है। अवतार सिंह पाश, सुरजीत पातर, लालसिंह दिल, अमरजीत चंदन, संतराम उदासी, मित्रसेन मीत, वरियामसिंह संधू, अत्तरजीत,त्रिलोचन तथा अजमेर सिंह औलख आदि कुछ खास नाम है। इन सबका गुरूशरण सिंह से लगाव जगजाहिर है। बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि पाश का पहला चर्चित कविता संग्रह और वरियामसिंह संधू का पहला कहानी संग्रह गुरशरणजी ने ही छापा था। कितने ही लेखक व नाटककार उनके संरक्षण में परिपक्व हुए और आम पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने बलराज साहनी प्रकाशन की स्थापना की थी, जिसका मूल मकसद अच्छा जनवादी और प्रगतिशील साहित्य बेहद कम कीमत पर साहित्यप्रेमियों तक पहुंचाना था। अपनी इस मुहिम को उन्होंने ताउम्र जारी रखा। लोक मुद्दों और लोक साहित्य-संस्कृति पर आधारित कुछ पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन भी गुरशरण सिंह ने समय-समय पर किया। बलराज साहनी उनके गहरे दोस्त थे तो मशहूर फक्कड़ हिन्दी कवि कुमार विकल भी बहुत करीबी दोस्तो में शुमार थे। उन्होंने प्रेमचंद से लेकर असगर वजाहत तक की कहानियों पर आधारित पंजाबी में कालजयी नाटक लिखे। कई पंजाबी उपन्यासों में गुरशरणजी नायक के तौर पर जनहित में लड़ाइयां लड़ते दिखते हैं। केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक मित्रसेन मीत ने तो अपने तीन उपन्यासों में उन्हे नायक बनाया है। तीनों उपन्यास हिन्दी में एक ही जिल्द में ’रामराज्य ’ के नाम से अनुदित होकर संकलित है। बेशुमार कहानियों और नाटको में भी गुरशरण सिंह ने अपने बड़े कद के साथ, पात्र बनकर उपस्थित हैं। उन पर ढेरों कविताएं और गीत भी है। ऐसा विरल सम्मान और स्नेह पंजाबी में शायद ही किसी और को हासिल हो। गुरशरण सिंह की अपार लोकप्रियता की ही मिसाल है कि पंजाब में सैकड़ों, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें उनके कई नाटकों के दृश्य और संवाद हूबहू बखूबी याद हैं। इन नाटको में ‘बाबा बोलदा है’, ‘टोया’, ‘हिटलिस्ट’, ‘कुर्सीवाला-मंजीवाला’, ‘जंगीराम दी हवेली’, ‘ऐह लहू किस दा है’, ‘धमक नगारे दी’, ‘कुर्सी मोर्चा ते हवा दे विच लटकदे लोग’, ‘नवां जनम’ आदि प्रमुख हैं। ये वे नाटक हैं जिनका मंचन उन्होने पंजाब के चप्पे-चप्पे में किया है। एक गांव में किये जा रहे नाटक को आस-पास के कई गांवों के लोग, हजारों की संख्या में एकजुट होकर देखते थे। उन्होने दूरदर्शन के लिए धारावाहिक भी बनाया था-’भाई मन्ना सिंह’। इस धारावाहिक में पंजाब के संताप से जुड़ी कहानियो की नाटकीय प्रस्तुति होती थी। इस धारावाहिक ने उन्हें और ज्यादा मकबूल किया और उनका एक और नाम भाई मन्ना सिंह पड़ गया। देश के कई अन्य इलाको में भी वह भाई मन्ना सिंह के नाम से खासे मशहूर हैं। गौरतलब है कि धारावाहिक के लिए भाजी ने किसी किस्म का विचारधारात्मक समझौता नहीं किया था और पंजाब की बाबत् एक सही समझ शेष देश को देने की कोशिश की थी। यह काम उन सरीखा शख्स ही कर सकता था। गुरशरण सिंह ने प्रगतिशील इंकलाबी संगठनों को एक मंच पर लाने की कई बार कोशिश की। प्रमुख संगठन हर बार शहीद भगत सिंह शहादत दिवस पर उनके पुश्तैनी गांव खटकर कलां में बदस्तुर जुटते। इसी मानिंद हमख्याल लोग आए बरस जालंधर स्थित देशभगत यादगार हाल में होने वाले ‘मेला गदरी बाबयां’ इकठ्ठा होते। उन्होंने एक बेमिसाल काम सुदूर देशों मे नुक्कड़ नाटक करने का किया। यही वजह है कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग जानते-मानते हैं। पंजाबी-हिन्दी के साथ-साथ गुरशरणसिंह ने अंग्रेजी में भी नाटक किये। विमर्श और संवाद का कोई भी मौका वे छोड़ते नहीं थे। विद्यार्थी तथा युवा संगठनो में भी उन्होंने खूब काम किया। विद्यार्थियों और युवाओं को वह अपनी असली ताकत मानते थे। महिला व बाल सरोकार भी उनकी चिन्ताओं में शिद्दत से शुमार थे। इन पंक्तियों के लेखक ने बतौर पत्रकार गुरशरणसिंह के कई इंटरव्यू लिये। एक बार उनसे पूछा कि मूलवाद और प्रगतिशीलता विरोधी ताकतों से लड़ने का ऐसा जज्बा पहले-पहल कब पनपा? एक वाकया उन्होंने सुनाया। 1947 में बँटवारे के वक्त वह करीब सत्रह साल के थे। अमृतसर के हाल बाजार से एक जुलूस निकल रहा था। अलफ नंगी औरतों का। वे मुसलिम परिवारों से थी और घोड़ों पर सवार, तलवारों-बरछों से लैस जुनूनी लोग उन्हे घेरे चल रहे थे- शर्मनाक तरीके से उन्हें अपमानित करते हुए। किशोर गुरशरण यह सब देखकर दहल गए और तभी प्रण लिया कि आज के बाद हर तरह की धार्मिक कट्टरता के खिलाफ काम करेगें। ताउम्र उन्होंने किया भी। चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने आतंकवादियों से खुली बातचीत की कवायद शुरू की। साप्ताहिक सण्डे-मेल के लिए इस मुद्दे पर मैने गुरशरण जी का लम्बा साक्षात्कार लिया। रोष में उन्होंने कहा था कि आतंकी संगठनों से भारत सरकार को जरूर बात करनी चाहिए, लेकिन बातचीत में उन समूहों को भी शामिल करना चाहिए, जिन्हें आंतकवादियो ने निशाने पर लिया। तत्कालीन केंद्र सरकार की शर्त थी कि आमने-सामने संवाद से पहले आतंकवादियों को हथियार छोड़ने होंगे और भारतीय संविधान में आस्था रखनी होगी। गुरशरण सिंह का दो टूक कहना था कि यह शर्त दरअसल एक सरकारी मजाक है। खालिस्तानी आंतकवादियों से बातचीत तो करनी ही इसलिये है कि वे हथियार छोड़ दें और भारतीय संविधान को मान लें। भाजी का कहना एकदम सही था। बाद में वह सरकारी कवायद एकदम मजाक बनकर रह गई थी। वह पंजाब के रेशे-रेशे से वाकिफ थे। एक बार उन्होंने न छापने की शर्त पर मुझे बताया था कि एक आला सरकारी एजेंसी के बड़े अधिकारी उनसे मिलने आए और पेशकश की कि जितना चाहे (सरकारी) पैसा ले लीजिए, आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम तेज कीजिए पर सरकार के प्रति अपना रवैया नर्म कर लीजिए। गुरशरण सिंह ने सख्ती से इंकार करते हुए उक्त अधिकारियों को चलता किया तथा खूब खरी-खोटी सुनाई। भाजी ने जितना काम खालिस्तानी आतंकवाद पर किया, ठीक उतना ही सरकारी आतंकवाद के खिलाफ भी। उनका साफ मानना था कि व्यवस्था की विसंगतियां धार्मिक कट्टरतावाद और साम्प्रदायिक हिंसा को बल देती है। उन्होंने फर्जी मुठभेड़ों का भी जबरदस्त विरोध किया। जहां संत भिंडरावाला और कतिपय सियासतदानों को उन्होने नाटकों का खलनायक बनाया वहीं सूबे के तत्कालीन डीजीपी रिबेरो, केपीएस गिल व राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे सरीखे मुठभेड़ विशेषज्ञों को भी नहीं छोड़ा । अब जिस्मानी तौर पर भाजी गुरशरण सिंह नही हैं पर उनका नाम जिन्दा है और सदैव जिंदा रहेंगे। और सदा जिंदा रहेंगे उनके विचार। उनके आलोचक सही ही कहते हैं कि उनके समूचे कृतित्व में कला-सौंदर्य कम बल्कि चिंतन-विचार ज्यादा है। वह हमेशा इसी पर अडिग रहे कि कला कला के लिए नहीं, अवाम और उसके बेहतरी के लिए होती है। तो सदा रहेगी गुरशरण सिंह की रोशनी……! लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Dakhal News 17 September 2020


bhopal Garde ji

आलोक पराड़कर- हिंदी पत्रकारिता के आधार स्तंभ पत्रकारों में से एक तथा मराठी भाषी होते हुए भी कोलकाता और वाराणसी में पत्र-पत्रिकाओं के संपादन का मानदंड स्थापित करने वाले लक्ष्मण नारायण गर्दे के छोटे पुत्र पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे का मंगलवार को पूर्वाहन पत्थर गली स्थित पैतृक निवास में निधन हो गया।   अभी दो माह पूर्व ही पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे के पुत्र विश्वास गर्दे भाऊ का निधन हुआ था। 92 वर्ष पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे स्मृति लोप के शिकार थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। विश्वास ही उनकी देखभाल करते थे। उनके निधन के बाद बेटियों ने यह दायित्व संभाला था। अपने पिता की तरह पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे ने पत्रकारिता की राह नहीं चुनी बल्कि डाक विभाग में नौकरी की लेकिन वे एक कुशल चित्रकार थे। नागरी प्रचारिणी सभा, पराड़कर स्मृति भवन सहित कई स्थानों पर उनके बनाए प्रसिद्ध व्यक्तियों के चित्र लगे हुए हैं। वे गर्दे जीके छोटे पुत्र थे। बड़े पुत्र का वर्षों पहले निधन हो गया था। बाबूराव विष्णु पराड़कर के समकालीन और रिश्तेदार लक्ष्मण नारायण गर्दे ने मराठीभाषी होते हुए भी हिन्दी की अप्रतिम सेवा की है। भारतमित्र, नवजीवन, वेंकटेश्वर समाचार और हिंदी बंगवासी के संपादकीय दायित्वों का निर्वाह करने वाले गर्दे जी ने श्रीकृष्ण संदेश और नवनीत जैसी पत्रिकाएं भी निकाली। उन्होंने महात्मा गांधी की पुस्तक का अनुवाद किया। उनकी सरल गीता पुस्तक भी काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने कल्याण के अंकों का संपादन भी किया।

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Dakhal News 11 September 2020


bhopal, Home Ministry, refuses to give list , people with Y category security

जहाँ गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने कंगना रानौत को दी गयी वाई श्रेणी सुरक्षा का जोरशोर से प्रचार-प्रसार किया है, वहीं कुछ दिन पहले ही इस मंत्रालय ने सुरक्षा दिये गए लोगों के नाम सार्वजनिक करने का जोरदार विरोध किया था. लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर ने एक्स, वाई, जेड तथा जेड प्लस सुरक्षा प्रदत्त लोगों की सूची तथा अन्य संबंधित सूचना मांगी थी. गृह मंत्रालय ने मात्र सुरक्षा प्रदत्त लोगों की कुल संख्या बताई किन्तु उन्होंने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(जी) में सूचना जिसे प्रकट करने से किसी के जीवन या सुरक्षा को खतरा हो तथा 8(1)(जे) में व्यक्तिगत सूचना के नाम पर सुरक्षा दिए गए लोगों के नाम सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया. गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने भी वही बात कही जिससे सहमत होते हुए सूचना आयुक्त वाई के सिन्हा ने कहा कि सुरक्षा प्राप्त लोगों के नाम सार्वजनिक करने से सुरक्षा देने का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा तथा इन लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है. नूतन ने कंगना का नाम सार्वजनिक करने तथा पूरी सूची को सामने लाने से मना करने की स्थिति को आपत्तिजनक बताया है. MHA declares Kangana Y security, denies info on other’s security While Ministry of Home Affairs, Government of India has announced grant of Y Category security to Kangana Ranaut with much fanfare, only few days ago, it had vehemently opposed providing names of those granted security cover. Lucknow based activist Dr Nutan Thakur had sought list of persons who have been provided various security covers like X, Y, Z, Z plus etc and other related information. MHA only provided total number of persons with different security categories, but opposed providing names of protectees under sections 8(1)(g), related with information, the disclosure of which would endanger the life or physical safety of any person and 8(1)(j), related with personal information. MHA took the same stand before Central Information Commission as well. Information Commissioner Y K Sinha agreed to it saying that revelation of names of the protectees or other details will militate against the very objective of providing security cover and may constitute a threat to the safety and security of the protectee. As per Nutan, making public Kangana’s grant of protection while opposing declaration of the list of other protectees is clearly objectionable.

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Dakhal News 11 September 2020


bhopal, Pro. KG Suresh,new vice-chancellor , Makhanlal Chaturvedi National Journalism University

भोपाल। प्रो. के.जी. सुरेश माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍व विद्यालय भोपाल के नए कुलपति बनाए गए हैं। उनकी नियुक्ति के संबंध में सोमवार को आदेश जारी कर दिये गए हैं। जारी आदेश के अनुसार प्रो. केजी सुरेश का कार्यकाल चार वर्ष का रहेगा। प्रोफेसर के.जी. सुरेश आईआईएमसी के महानिदेशक भी रह चुके हैं।   विदित हो कि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के नए कुलपति की तलाश लंबे समय से चल रही थी। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद कुलपति दीपक तिवारी ने इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद प्रो. संजय द्विवेदी को प्रभारी कुलपति बनाया गया था। लेकिन इस बीच प्रभारी कुलपति प्रो संजय द्विवेदी को आईआईएमसी का महानिदेशक बनाया दिया गया है। जिसके बाद से यह पद खाली हो गया था। 

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Dakhal News 7 September 2020


mumbai, Film journalist ,Shyam Sharma ,dies from Corona

दुखद खबर मुंबई से आ रही है. फ़िल्म पत्रकार श्याम शर्मा का कोरोना से निधन हो गया है. फ़िल्म पत्रकार श्याम शर्मा मायापुरी फ़िल्म पत्रिका से जुड़े थे. कई फिल्मी सितारों का किया उनका इंटरव्यू काफी मशहूर हुआ था. मायापुरी फ़िल्म पत्रिका में वे फिल्मों की समीक्षा भी लिखते थे. उनके निधन पर फ़िल्म पत्रकारों की संस्था चेम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट ने गहरा दुख जताया है. मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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Dakhal News 5 September 2020


bhopal, Corona bomb, explodes ,Dainik Bhaskar Bhopal

दैनिक भास्कर के मुख्यालय भोपाल में इस बार कोरोना बम का विस्फोट हुआ है। बताया जा रहा है कि भास्कर के भोपाल ऑफिस में धड़ाधड़ लोग कोरोना पॉजिटिव आ रहे हैं। भास्कर के नेशनल न्यूज रूम, भोपाल में सबसे पहले बिक्रम प्रताप कोरोना पॉजिटिव हुए। बिक्रम ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से बताया है कि वो भोपाल एम्स में फिलहाल भर्ती हैं और उनका इलाज चल रहा है। बिक्रम के बाद नेशनल न्यूज रुम के ही कृष्ण मोहन तिवारी भी पॉजिटिव आए हैं। बताया जा रहा है कि इस फ्लोर पर कई लोग बीमार हैं। कुछ लोगों ने अपना टेस्ट कराया है जिनकी रिपोर्ट आनी बाकी है। ज्यादातर लोगों को अब वर्क फ्रॉम होम भेजा जा रहा है। एचआर डिपार्टमेंट के भी कुछ लोग पॉजिटीव आए हैं लेकिन मामला छुपाया जा रहा है। वहीं भास्कर के डिजिटल विंग में गौरव पांडे और सत्य प्रकाश पॉजिटिव आए हैं। इस फ्लोर पर भी कई लोग बीमार हैं और टेस्ट करा कर आए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भोपाल ऑफिस में कोरोना फैलाने के लिए यहां के संपादक पूरी तरह जिम्मेदार हैं। भास्कर डिजिटल एडिटर प्रसून मिश्रा किसी जल्लाद से कम नहीं है। पिछले दिनों हितेश कुशवाहा नाम के पत्रकार का इस्तीफा पत्र भी भड़ास ने छापा था जिसमें प्रसून के उत्पीड़न के चलते हितेश ने इस्तीफा दे दिया था। जहां दुनिया भर के डॉट कॉम वर्क फ्रॉम होम सिस्टम से चल रहे हैं वहीं प्रसून मिश्रा लोगों को जबरदस्ती ऑफिस बुलाते हैं। नौकरी से निकालने की धमकी देकर लोगों को जबरिया ऑफिस बुलाया जाता है जबकि घर से आराम से काम हो सकता है। प्रसून मिश्रा के उत्पीड़न से यहां के ज्यादातर कर्मचारी त्रस्त हैं लेकिन कोई नौकरी की वजह से आवाज नहीं उठा पा रहा।   भास्कर के एक पूर्व पत्रकार ने बताया कि प्रूसन मिश्रा कर्मचारियों के उत्पीड़न के लिए कुख्यात आदमी है। किसी की एक छोटी सी गलती पर भी प्रसून एक एक घंटा डांटता है और व्यक्तिगत स्तर पर आकर कर्मचारियों की हद से भी ज्यादा बेइज्जती करता है। डिजिटल के पहले प्रसून नेशनल न्यूज रूम भोपाल का ही एडीटर था। उसके यहां से जाने के बाद कर्मचारियों ने आपस में चॉकलेट बांट कर जश्न मनाया था। एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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Dakhal News 3 September 2020


bhopal, TRP,Big bang , Republic India, number one chair, Aaj Tak

यशवन्त–   आजतक को पटखनी देकर नम्बर एक की कुर्सी पर पहुंचे रिपब्लिक भारत चैनल ने नया धमाका कर दिया। पूरे साढ़े तीन अंक की वृद्धि कर आजतक से बहुत ज्यादा आगे निकल गया है।   ऐसा पहली बार हुआ है जब आजतक के अलावा किसी चैनल की टीआरपी 20 अंक के पार पहुंची हो। ऐसा पहली बार हुआ है जब आजतक किसी दूसरे चैनल से चार से ज्यादा अंकों से पिछड़ कर नम्बर दो पर रहा हो।   सुशांत कांड ने हिंदी न्यूज़ चैनलों की दुनिया में बड़ा उलटफेर करा दिया है। सर्वकालिक नम्बर वन आजतक अब रिपब्लिक भारत के सामने घुटने टेक चुका है।   सबसे बुरा हाल हुआ है ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ का। ये क्रमशः सातवें और छठें स्थान पर सिसक रहे हैं।   देखें आज रिलीज हुई टीआरपी-   Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:NCCS 15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 34   Republic Bharat 20.1 up 3.5   Aaj Tak 16.0 up 1.4   India TV 12.8 up 0.8   TV9 Bharatvarsh 10.4 dn 0.8   News18 India 9.2 dn 0.9   ABP News 8.0 dn 1.3   Zee News 7.6 dn 1.0   News Nation 5.5 dn 0.8   Tez 3.9 dn 0.6   News 24 3.5 dn 0.3   NDTV India 1.8 same   India News 1.1 same   TG: NCCS AB Male 22+   Republic Bharat 20.6 up 3.7   Aaj Tak 15.6 up 1.3   India TV 13.3 up 0.5   TV9 Bharatvarsh 9.9 dn 0.9   News18 India 8.7 dn 1.1   Zee News 8.1 dn 1.1   ABP News 7.8 dn 1.4   News Nation 5.9 dn 0.6   News 24 3.6 dn 0.2   Tez 3.0 dn 0.3 NDTV India 2.1 same

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Dakhal News 3 September 2020


bhopal, Social media is becoming a threat to democracy?

देश में इस समय सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म्स-फ़ेसबुक और व्हाट्सएप -आदि पर नागरिकों के जीवन में कथित तौर पर घृणा फैलाने और सत्ता-समर्थक शक्तियों से साँठ-गाँठ करके लोकतंत्र को कमज़ोर करने सम्बन्धी आरोपों को लेकर बहस भी चल रही है और चिंता भी व्यक्त की जा रही हैं। पर बात की शुरुआत किसी और देश में सोशल मीडिया की भूमिका से करते हैं: खबर हमसे ज़्यादा दूर नहीं और लगभग एकतंत्रीय शासन व्यवस्था वाले देश कम्बोडिया से जुड़ी है। प्रसिद्ध अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की वेब साइट द्वारा जारी इस खबर का सम्बंध एक बौद्ध भिक्षु लुओन सोवाथ से है, जिन्होंने अपने जीवन के कई दशक कम्बोडियाई नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा की लड़ाई में गुज़ार दिए थे। अचानक ही सरकार समर्थक कर्मचारियों की मदद से बौद्ध भिक्षु के जीवन के सम्बंध में फ़ेसबुक के पेजों पर अश्लील क़िस्म के वीडियो पोस्ट कर दिए गए और उनके चरित्र को लेकर घृणित मीडिया मुहीम देश में चलने लगी। उसके बाद सरकारी नियंत्रण वाली एक परिषद द्वारा बौद्ध धर्म में वर्णित ब्रह्मचर्य के अनुशासन के नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में लुओन सोवाथ को बौद्ध भिक्षु की पदवी से वंचित कर दिया गया। उनके खिलाफ इस प्रकार से दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने गिरफ़्तारी की आशंका से कहीं और शरण लेने के लिए चुपचाप देश ही छोड़ दिया। सबकुछ केवल चार दिनों में हो गया। फ़ेस बुक सरीखे सोशल मीडिया प्लेटफार्म के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर तमाम प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं में जो चिंता ज़ाहिर की जा रही है, उसका कम्बोडिया केवल छोटा सा उदाहरण है।हम अपने यहाँ अभी केवल इतने खुलासे भर से ही घबरा गए हैं कि एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर साम्प्रदायिक वैमनस्य उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रसारित की जा रही पोस्ट्स को किस तरह बिना किसी नियंत्रण के प्रोत्साहित किया जाता है। अभी यह पता चलना शेष है कि देश की प्रजातांत्रिक सम्पन्नता को एक छद्म एकतंत्र की आदत में बदल देने के काम में मीडिया और सोशल मीडिया के संगठित गिरोह कितनी गहराई तक सक्रिय हैं। कोरोना ने नागरिकों की जीवन पद्धति में सरकारों की सेंधमारी के लिए अधिकृत रूप से दरवाज़े खोल दिए हैं और इस काम में सोशल मीडिया का दुनिया भर में ज़बरदस्त तरीक़े से उपयोग-दुरुपयोग किया जा रहा है। महामारी के इलाज का कोई सार्थक और अत्यंत ही विश्वसनीय वैक्सीन नहीं खोज पाने या उसमें विलम्ब होने का एक अन्य पहलू भी है ! अलावा इसके कि महामारी का दुश्चक्र लगातार व्यापक होता जाएगा और संक्रमण के साथ-साथ मरनेवालों की संख्या बढ़ती जाएगी, नागरिक अब अधिक से अधिक तादाद में अपने जीवन-यापन के लिए सरकारों की कृपा पर निर्भर होते जाएँगे। पर इसके बदले में उन्हें ‘अवैध’ रूप से जमा किए गए हथियारों की तरह अपने ‘वैध’अधिकारों का ही समर्पण करना पड़ेगा। सरकारें अगर इस तरह की भयंकर आपातकालीन परिस्थितयों में भी अपने राजनीतिक आत्मविश्वास और अर्थव्यवस्थाओं को चरमराकर बिखरने से बचाने में कामयाब हो जातीं हैं, तो माना जाना चाहिए कि उन्होंने एक महामारी में भी अपनी सत्ताओं को मजबूत करने के अवसर तलाश लिए हैं। चीन के बारे में ऐसा ही कहा जा रहा है। महामारी ने चीन के राष्ट्राध्यक्ष को और ज़्यादा ताकतवर बना दिया है। रूस में भी ऐसी ही स्थिति है। दोनों ही देशों में सभी तरह का मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है। रूस में तो पुतिन के धुर विरोधी नेता नेवेल्नी को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का ज़बरदस्त तरीक़े से उपयोग किया गया। रूस के बारे में तो यह भी सर्वज्ञात है कि उसने ट्रम्प को पिछली बार विजयी बनाने के लिए फ़ेसबुक का किस तरह से राजनीतिक इस्तेमाल किया था। नागरिकों को धीमे-धीमे फैलने वाले ज़हर की तरह इस बात का कभी पता ही नहीं चल पाता है कि जिस सोशल मीडिया का उपयोग वे नागरिक आज़ादी के सबसे प्रभावी और अहिंसक हथियार के रूप में कर रहे थे वही देखते-देखते एकतंत्रीय व्यवस्थाओं के समर्थक के विकल्प के रूप में अपनी भूमिका-परिवर्तित कर लेता है।(उल्लेखनीय है कि महामारी के दौर में जब दुनिया के तमाम उद्योग-धंधों में मंदी छाई हुई है, सोशल मीडिया संस्थानों के मुनाफ़े ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ गए हैं।अख़बारों में प्रकाशित खबरों पर यक़ीन किया जाए तो चालीस करोड़ भारतीय व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं ।अब व्हाट्सएप चाहता है कि उसके पैसों का भुगतान किया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार की स्वीकृति चाहिए। इसीलिए व्हाट्सएप की नब्ज पर भाजपा की पकड़ है।) ऊपर उल्लेखित भूमिका का सम्बंध अफ़्रीका के डेढ़ करोड़ की आबादी वाले उस छोटे से देश ट्यूनिशिया से है, जो एक दशक पूर्व सारी दुनिया में चर्चित हो गया था। सोशल मीडिया के कारण उत्पन्न अहिंसक जन-क्रांति ने वहाँ न सिर्फ़ लोकतंत्र की स्थापना की बल्कि मिस्र सहित कई अन्य देशों के नागरिकों को भी प्रेरित किया। ट्यूनिशिया में अब कैसी स्थिति है ? बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी, ख़राब अर्थव्यवस्था के चलते लोग देश में तानाशाही व्यवस्था की वापसी की कामना कर रहे हैं। वहाँ की वर्तमान व्यवस्था ने उन्हें लोकतंत्र से थका दिया है। ट्यूनिशिया के नागरिकों की मनोदशा का विश्लेषण यही हो सकता है कि जिस सोशल मीडिया ने उन्हें ‘अरब क्रांति’ का जन्मदाता बनने के लिए प्रेरित किया था वही अब उन्हें तानाशाही की ओर धकेलने के लिए भी प्रेरित कर रहा होगा या इसके विपरित चाहने के लिए प्रोत्साहित भी नहीं कर रहा होगा। नागरिकों को अगर पूरे ही समय उनके आर्थिक अभावों , व्याप्त भ्रष्टाचार और जीवन जीने के उपायों से ही लड़ते रहने के लिए बाध्य कर दिया जाए और सोशल मीडिया के अधिष्ठाता अपने मुनाफ़े के लिए राजनीतिक सत्ताओं से साँठ-गाँठ कर लें तो उन्हें (लोगों को) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं, मानवाधिकार और संवैधानिक संस्थाओं का स्वेच्छा से त्याग कर एकाधिकारवादी सत्ताओं का समर्थन करने के लिए अहिंसक तरीक़ों से भी राज़ी-ख़ुशी मनाया जा सकता है।और ऐसा हो भी रहा है! लेखक श्रवण गर्ग देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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Dakhal News 31 August 2020


bhopal, Meaning of closure of Kadambini and Nandan

कादम्बिनी वह पत्रिका है जिसे हम पढ़ते हुए बड़े हए हैं। कादम्बिनी आपको रोचक अनुभवों, यात्रा वृतांतों, साहित्यिक कृतियों व जीवनशैली से जुड़े कभी उत्सुकता, कभी आश्चर्य तो कभी सुकून देने वाले सफर पर ले जाती है। कादम्बिनी के अंत में एक चित्र पर कहानी लिखने की प्रतियोगिता आपके बिम्ब निर्माण व कल्पना को सशक्त करती थी तो शब्द के अर्थ व प्रयोग का स्तम्भ शब्द ज्ञान को।   आरम्भ के दिनों में लघु आकार की सर्वप्रिय पत्रिका थी। मेरे यहां अखबार देने वाले महोदय कहते थे कि इसे आप तक पहुंचाने हेतु कुछ अतिरिक्त श्रम व समय व्यय करना पड़ता है। इसके लिए मैं आज भी उनका आभार व्यक्त करता हूँ।   मेरी जानकारी में 1998 या उससे भी पूर्व के संस्करण मेरे घर की अलमारियों, दराजों और एक पुराने अखबारों व पत्रिकाओं से भरे वर्षों से बन्द एक छोटे से कमरे में बिखरे हुएं हैं।   ना जाने कितनी बार मैंने चाय पीते हुए इसकी शब्द पहेलियों को हल करने व सोते समय पीछे दिए चित्र पर शीर्षक देने या कहानी लिखने के प्रयास किए।   सन् १९६० में शुरू हुई कादम्बिनी पत्रिका हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की एक सामाजिक व साहित्यिक पत्रिका थी जो नई दिल्ली से प्रकाशित होती थी। यह विगत पांच दशक से निरंतर हिंदी जगत में एक विशिष्ट स्थान बनाए रखी। संस्कृति, साहित्य, कला, सेहत जैसे विषयों पर सुरुचिपूर्ण सामग्री की प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने इसे एक अलहदा पहचान दी। पत्रिका में संवेदना, यात्रावृत्तांत, अनुभवपरक लेख, स्वस्थ मनोरंजन, सहित भाषागत आलेख व बौद्धिक प्रतियोगिताएं रहती थीं। जीवनशैली संदर्भित इसके लेख खासा लोकप्रिय रहे। किशोर, बुजुर्ग, विद्यार्थी, नौकरीपेशा, महिला सहित अन्य सभी लोगों के लिए इसमें उपयोगी सूचनाएं लोगों को लाभान्वित करतीं थीं।   पत्रिकाओं के प्रकाशन बन्द होने की श्रृंखला में प्रसिध्द बाल पत्रिका नंदन भी बन्द होने की दुःखद घोषणा हो चुकी है।   बाल पत्रिका नंदन पिछले ४० वर्षो से प्रति मास प्रकाशित होती है। इस पत्रिका की शुरुआत १९६४ में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की स्मृति में हुई थी। नंदन का पहला अंक पंडित नेहरू को ही समर्पित था। नंदन की विषयवस्तु पौराणिक, परीकथाओं, पहेली, अंतर ढूढों आदि पर आधारित होता था। समय के साथ एवं अपने बाल पाठको की बदलती रुचि को ध्यान रख कर नंदन ने प्रासंगिक विषयों एवम महापुरुषों के जीवनवृत्त भी प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया। आज तक नंदन में प्रकाशित हो चुकीं १०,००० से भी ज्यादा कहानियों ने लोगों को प्रेरणा, सूचना तथा शिक्षा दी। पत्रिका में सुशील कालरा द्वारा बनाई कॉमिक चित्रकथा चीटू-नीटू एक अलग ही पहचान बनाने में सफल रहे।   आज जबकि ऐसी पत्रिकाओं के प्रकाशन की और भी अधिक आवश्यकता है। इसका बन्द हो जाना ना सिर्फ मेरी तकिया की ऊंचाई को कुछ कम कर देगा बल्कि मेरे उस वैचारिक सफर को भी रोक देगा जिस पर मैं जब चाहे इसके पृष्ठों के साथ निकल पड़ता था।   सक्षम द्विवेदी, हिंदी कंटेंट राइटर, डिज़ाइन बॉक्सड क्रिएटिव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। चंडीगढ़।

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Dakhal News 29 August 2020


bhopal, Bring government job insurance policy

केंद्र सरकार को चाहिए कि वह नौकरी करने वालों की नौकरी सुरक्षित रखने के लिए नौकरी बीमा पॉलिसी बनाये। इसमें सरकार और नौकरी करने वालों दोनों को फायदा है। इसमें सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा कंपनी को भारी धनराशि प्रीमियम के रूप में मिलेगी और जो नौकरी कर रहे हैं उन्हें भी नौकरी खोने के बाद परिवार का खर्च चलाने में आर्थिक मदद मिलेगी। इसके लिए सरकार स्वाथ्य बीमा योजना की तर्ज पर हर महीने एक निर्धारित प्रीमियम राशि उन लोगों से ले जो कहीं भी निजी संस्थान में नौकरी कर रहे हैं। उसके बाद अगर प्रीमियम राशि देने वाले किसी भी व्यक्ति को उसके नियोक्ता नौकरी से निलंबित करते हैं तो निलंबन की अवधि तक उस व्यक्ति का जो अंतिम माह का वेतन होगा उसका 25 प्रतिशत हर महीने सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा कंपनी दे और अगर प्रीमियम देने वाले व्यक्ति को नियोक्ता टर्मिनेट करते हैं तो उस व्यक्ति को उसके अंतिम वेतन का पचास प्रतिशत या 75 प्रतिशत हर महीने सरकार या उसके द्वारा नियुक्त बीमा पॉलिसी कंपनी दे। पूरा वेतन हर महीने बीमा कंपनी ना दे। इसकी वजह ये है कि अगर पूरा वेतन बीमा कंपनी देगी तो नौकरी छोड़ने वालों की बाढ़ लग जायेगी। स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होने पर बीमा कंपनी कोई धनराशि न दे। साथ ही सभी राज्य और केंद्र सरकार एक काम और करे। एक नियम बनाये कि कोई भी नियोक्ता अगर किसी भी कर्मचारी को नौकरी पर रखता है तो उसकी नियुक्ति पत्र की एक प्रति नौकरी करने वाले, उसकी बीमा कंपनी, पीएफ ऑफिस और लेबर विभाग को जरूर दे। आज होता ये है कि आज बड़ी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र नहीं देती या उनसे साइन कराकर दोनों प्रति रख लेती हैं। अगर कर्मचारियों का नियुक्ति पत्र लेबर विभाग में या पीएफ ऑफिस में होगा तो कंपनियां कर्मचारी को उसका नियुक्ति पत्र आराम से देंगी। अगर कोई कंपनी लेबर विभाग को बिना नियुक्ति पत्र भेजे किसी कर्मचारी की नियुक्ति करतीं हैं तो सरकार उस कंपनी पर भारी जुर्माना लगाए। साथ ही सभी कंपनियों के लिए स्टैंडिंग आर्डर बनाना अनिवार्य कर दे और उसकी एक प्रति लेबर विभाग तथा एक प्रति कर्मचारी को नियुक्ति के समय ही देना अनिवार्य हो। आज ज्यादात्तर कंपनियां स्टैंडिंग आर्डर की जगह मॉडल स्टैंडिंग आर्डर का इस्तेमाल कर रही हैं। साथ ही श्रमिकों की भलाई के लिए सरकार एक नियम और बनाये कि जिन कंपनियों में 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं उन्हें आरटीआई के दायरे में लाएं। शशिकांत सिंहपत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

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Dakhal News 29 August 2020


bhopal, make a career, media,  profile on Linkedin!

इस समय मीडिया इंडस्ट्री में काफी लोग बेरोजगार हुए हैं। खासकर हिंदी मीडिया में। लिंकडीन नौकरियों के लिए अच्छा सोर्स है। यहां कमसे कम पता तो चलते रहता है। वो बात अलग है काम बने या न बने। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बिल्कुल भी किसी का काम नहीं बनता है। अगर आप अभी तक लिंकडीन पर प्रोफाइल नहीं बनाए हैं और मीडिया में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको बिल्कुल बना लेना चाहिए। बहुत सारे मीडिया हाउस लिंकडीन के जरिए ही वैकेंसी निकाल रहे हैं और ज्वाइनिंग प्रोसेस बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही जिन लोगों के लिंकडीन पर फालोवर्स कम हैं या वह ज्यादा एक्टिव नहीं रहते हैं। उन्हें समय पर नौकरियों के बारे में पता नहीं चल पाता है। इसलिए, मैं हर JD को लिंकडीन पर पोस्ट, रिशेयर करते रहता हूं। ताकि जरूरतमंद तक हर जानकारी आसानी से पहुंच सके, और वह किसी पर नौकरियों के लिए निर्भर न रहें। लेकिन इसके साथ ही हम लोग WhatsApp पर Media Jobs ग्रुप भी चलाते हैं। अभी ग्रुप के चार पार्ट हैं। सभी ग्रुप में मेनस्ट्रीम मीडिया इंडस्ट्री के सीनियर्स और कुछ HR जुड़े हुए हैं। जो ग्रुप में JD शेयर करते रहते हैं। मीडिया जाब्स ग्रुप का मसकद स्पष्ट है। जरूरतमंद लोगों तक निस्वार्थ भाव से नौकरियों के संबंध में सूचना/जानकारी पहुंचाना। जिन लोगों को लगे कि उनके जुगाड़/सोर्स/यार दोस्त काम नहीं आ रहे हैं। वह सोशल मीडिया, जाब्स पोर्टल, जाब्स ऐप पर हमेशा एक्टिव न रहने के कारण नौकरियों से अपडेट नहीं रह पाते हैं। वह लोग मुझे DM करके ग्रुप से जुड़ने के लिए कह सकते हैं। कृपया कमेंट न करें। ग्रुप में मीडिया से संबंधित नौकरियों की सूचना को बिना देरी के शेयर किया जाता है। सिर्फ हिंदी मीडिया के ही नहीं। बल्कि रीजनल लैंग्वेज़। जैसे भोजपुरी, मराठी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, उड़िया के भी पत्रकार (न्यूज़ प्रोड्यूसर, एंकर, रिपोर्टर), कंटेंट राइटर्स/कापी एडिटर/प्रूफ रीडर/ट्रांसलेटर/वीडियो एडिटर/ग्राफिक डिजाइनर/इंटर्न/पत्रकारिता के छात्र जुड़ सकते हैं।‌ लेकिन ध्यान रहे, कृपया वही लोग हमारे ग्रुप से जुड़े जो वाकई नौकरी को लेकर खुद परेशान हैं या खुद नौकरी करते हुए जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ भाव से मदद करना चाहते हैं। हमारा मकसद खराब करने वाले लोग ग्रुप से कतई न जुड़ें। युवा पत्रकार सिद्धार्थ चौरसिया की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 26 August 2020


bhopal, Upendra Rai ,admitted in hospital ,due to deteriorating health!

सहारा मीडिया के सीईओ और एडिटर इन चीफ उपेंद्र राय के बारे में खबर आ रही है कि वे दिल्ली में बसंतकुंज इलाके में स्थित फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराए गए हैं. लगातार चार दिनों से उनका बुखार कम नहीं हो रहा है. 104 डिग्री तक बुखार रहने के कारण उन्हें चार दिनों बाद फोर्टिस हास्पिटल में ले जाया गया.   बताया जा रहा है कि गहन जांच पड़ताल के बाद सामने आया है कि उन्हें एक किस्म का टाइफाइड है. लगातार पत्रकारीय कार्य करने, सहारा मीडिया के लिए हर मोर्चे पर चौतरफा सक्रिय रहने, आराम बिलकुल न करने के चलते शरीर ने अचानक साथ देना बंद कर दिया. बुखार आने के कारण शक हुआ कि कहीं उन्हें कोरोना का संक्रमण तो नहीं. लेकिन कोविड टेस्ट में वे निगेटिव आए. इसके बाद हर किस्म का परीक्षण कराया गया जिसमें टाइफाइड के लक्षण दिखे.   डाक्टरों ने उन्हें अभी भी अपनी निगरानी में अस्पताल में रखा हुआ है. पिछले पांच दिनों से वे हर किस्म के कामकाज से दूर हैं. यहां तक कि वे मोबाइल व वाट्सअप पर भी रिस्पांड नहीं कर रहे.   उल्लेखनीय है कि सहारा मीडिया की जिम्मेदारी संभालने के बाद उपेंद्र राय ने रिकार्डतोड़ इंटरव्यू व शोज किए. इसके लिए उन्हें सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय का प्रशंसा पत्र भी मिला. इस साल फरवरी से अगस्त तक के बीच हस्तक्षेप शो के कुल सौ एपिसोड किए. 45 परसनल इंटरव्यू किए. जिनके इंटरव्यू किए गए उनमें ज्यादातर कैबिनेट मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर और गवर्नर थे. बताया जा रहा है कि अभी हफ्ते भर तक उपेंद्र राय अस्पताल में रह सकते हैं या वहां से मुक्ति मिलने के बाद घर पर आराम करेंगे.

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Dakhal News 26 August 2020


bhopal,After shock, Aaj Tak ,walked through, Republic India!

-दयाशंकर शुक्ल सागर- देखिए टीवी के न्यूज चैनल कैसे काम करते हैं. रिपब्लिक भारत पिछले डेढ महीने से सिर्फ और सिर्फ सुशांत डेथ मिस्ट्री चला रहा है. और TRP के खेल यानी हफ़्ते की रेटिंग में कभी वह दूसरे तो कभी तीसरे नम्बर पर रहने लगा. लेकिन इस हफ्ते वह देश का नम्बर-1 चैनल बन गया. पिछले18 साल से नम्बर-1 पर चल रहा है ‘आज तक’ दूसरे नम्बर पर आ गया. अब आज तक दो दिन से सिर्फ और सिर्फ सुशांत डेथ मिस्ट्री चला रहा है. बाकी सारे चैनल भी यही कर रहे हैं.इसलिए टीवी देखने से बेहतर है अमेजन या नेटफिल्कस पर चले जाइए. वहां आपको ज्यादा बेहर मर्डर मिस्ट्री देखने को मिल जाएगी. वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 24 August 2020


bhopal,Hear story ,Hemant Sharma, returning corona

हेमंत शर्मा– लौट आया कोविड से मुठभेड़ करके…. तो हो गयी अपनी भी मुठभेड कोविड से। भयानक। हाहाकारी और लगभग जानलेवा। बस यूं समझिए कि तीन रोज तक मौत से सीधा आमना-सामना था और मैं बस ज़िन्दगी और मौत के पाले को छूकर लौट आया। बीस रोज तक अस्पताल में कोविड से लड़ा। कभी थका ,कभी जीतता दीखता तो कभी हारता नज़र आया। सुबह कोरोना को पराजित करने की उम्मीद जगती। रात होते होते टूटती नज़र आती। यह ‘टग आफ वार‘ था। हर रोज़ डाक्टरों की टीम नई रणनीति बनाती मगर ये वाईरस उन्हें गच्चा दे जाता। ये एकदम चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु सी स्थिति थी। लंबे समय तक गाड़ी सातवें व्यूह पर अटकी रही। कई बार तो लगा कि ये सातवां व्यूह वाकई अभेद्य होता है। मगर डॉक्टर भी नए नए अस्त्रों से युद्ध में जुटे हुए थे। यह कोरोना वाईरस रहस्यमय तो है ही साथ ही षड्यन्त्रकारी और धूर्त भी है। एक बार लगेगा कि आप ठीक हो रहे हैं। आप काफी हद तक निश्चिंत होने लगते हैं। मगर यह आठवें, नवें और दसवें दिन पूरी ताक़त से व्यूहरचना करके फिर वापिस आता है और शरीर के सभी अंगों पर एक साथ हमला करता है। आपकी तैयारी, मेडिकल प्रबन्धन और जिजीविषा अगर नही टूटी तो आप लड़ लेंगे। वरना….सामने प्लास्टिक बैग आपका इन्तज़ार कर रहा होता है । कहानी लम्बी डरावनी और रोमांचक है। बस यूं समझिए की मित्रों की दुआएँ, आत्मबल और परिजनों की पुण्याई से ही मैं इसे हरा सका। पूरी ताक़त से जूझा, लड़ा और वापस आ गया। परेशान हुआ पर पराजित नही। इसे आप मेरा दूसरा जन्म भी मान सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि अब किसी और की उम्र पर तो नही जी रहा हूँ! मुझे पता है उन्नीस रोज से मैं यह लड़ाई अस्पताल में अकेले नही लड़ रहा था।आप सब मेरे साथ थे।इसलिए मुझे लगता है यह बचा हुआ दूसरा जीवन आप सबके हिस्से का है।मेरी कोशिश होगी कि अब वैसा ही जिया जाय। मित्रों,कोरोना से लड़ना सिर्फ़ चिकित्सकीय प्रबन्धन है और कुछ नही। प्रबन्धन कमजोर हुआ।या आपकी जिजीविषा घटी तो कोरोना जीतेगा। वरना आप उसे पटक देगें। यह मेरा भोगा हुआ यथार्थ है। कोविड शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों पर एक साथ हमला करता है लीवर ,किडनी ,फेफड़ों , दिल और पैक्रियाज को एक साथ निशाना बनाता है। फेफड़ों में सूजन आती है।दम फूलने लगता है। हार्ट की आर्टरी भी सूजने लगती है जिससे हार्ट के चोक होने का ख़तरा बराबर बना रहता है। उधर पैक्रियाज पर हमले से इंसुलिन कम बनती है। इसलिए शरीर में शुगर का स्तर उछाल मारता है। फेफड़ों में सूजन से सॉंस में दिक़्क़त होती है। इन्हे ठीक करने के चक्कर में लीवर और किडनी के एंजाइम इधर उधर भागने लगते है। डॉक्टर इन्हीं चीजों का प्रबन्धन करते हैं। चार रोज़ अस्पताल में भर्ती रहने के बाद मैं कोविड से उबर रहा था। सारे पैरामीटर ठीक थे। केवल निमोनिया के कारण सॉंस लेने में दिक़्क़त थी। सीटी स्कैन की रिपोर्ट बता रही थी कि फेफड़ों में बीस प्रतिशत संक्रमण है। तभी आठवें रोज़ रात में वाईरस ने पूरी ताक़त से दुबारा हमला किया। खून में आक्सीजन का लेवल गिरने लगा। रक्तचाप नीचे की तरफ़ आने लगा। दम घुटने लगा था। डॉक्टरों के हाथ पॉंव फूलने लगे। फ़ौरन फेफड़ों का दुबारा सीटी स्कैन हुआ। इस दौरान मै श्लथ था। डूब उतरा रहा था। पर समझ बनी हुई थी। मैंने डाक्टरों की बातचीत सुनी। संक्रमण ८४ प्रतिशत हो गया था। सिर्फ़ १६ प्रतिशत फेफड़ों पर सॉंस ले रहा था। माहौल बेहद डरावना था। सीटी स्कैन के कक्ष से ही मुझे आई सी यू में ले जाने का फ़ैसला हुआ। यह दूसरी दुनिया थी। आईसीयू जीवन का वह दोराहा होता है जहॉं से एक रास्ता मार्चुरी में जाता है और दूसरा आपके स्वजनों की पुण्याई से खींच कर आपको वापस लाता है। यहॉं एक क्षण में दरवाज़े का रूख बदल जाता है। डॉक्टर विमर्श कर रहे थे। तभी मेरी चिकित्सा में लगे डॉ शुक्ला ने कहा, आई सी यू से अभी बचना चाहिए। आईसीयू जनित समस्याएँ पीछे पड़ सकती है।डॉ शुक्ला कोविड के मास्टर हो गए है। हर रोज़ इटली ,यूके स्पेन में वेवनार के ज़रिए वहॉं के डॉक्टरों के सम्पर्क में रहते है।मेरे प्रति उनमें आत्मीयता का भाव भी है। आईसीयू में जाने न जाने पर डॉ महेश शर्मा का फ़ैसला था कि इनके कक्ष को ही आईसीयू बना दिया जाय। इसके बाद मेरी चेतनता पर असर होने लगा था। मुझे अब कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मुझे लगा कि मैं एक अन्धे गहरे कुएँ में डूबता जा रहा हूँ। शायद यह मेरा मृत्यु से साक्षात्कार था। मुझे अपने सारे दिंवगत मित्र और परिजन दिखने लगे थे। लगा सब छूट रहा है। पर अभी काम बहुत बाक़ी है। गृहस्थी कच्ची है। मित्रों का बृहत्तर परिवार मेरे भरोसे है। काम सिमटा नहीं है। थोड़ा समय मिलता तो सब चीज़ें पटरी पर ला देता। फिर जीवन जिस उत्सवधर्मिता से जिया है। उसमें यह कोरोना मौत तो ‘डिज़र्ब ‘ नहीं करता। अकेलेपन और प्लास्टिक बैग में। नहीं यह कैसे हो सकता है ? काशी यानी महाश्मशान का रहने वाला हूँ जहॉं मृत्यु उत्सव है। मृत्यु के देवता महाकाल का गण हूँ। इतनी छूट तो वो मुझे देगें। अगर नहीं देंगे तो आज उनसे भी मुठभेड़ होगी क्योंकि अब मेरे पास खोने के लिए क्या है? राम ,कृष्ण और शिव भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्न है। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है। कृष्ण की उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी है। तीनों से अपना घरोपा रहा है। काशी से कैलाश तक शिव का गण रहा हूँ। कृष्ण चरित पर सबसे बड़ा आख्यान कृष्ण की आत्मकथा पिता ने लिखी। वे बड़े भारी कृष्ण भक्त थे इसलिए इनसे भी अपना घरेलू नाता बना और राम की जन्मभूमि आन्दोलन में अपना भी योगदान रहा है। दो किताबें लिखी। सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को जन्मभूमि देने का जो फ़ैसला लिया उसमें इन किताबो की भी भूमिका है। पर इस बार मुझे इन तीनों ने झटका दिया। ऐसा क्यों हुआ यह समझ से परे है। शायद इसे ही भवितव्यता कहते है। पहली बार कोरोना से जंग लड़ते इन तीनों के प्रति मेरे मन में सवाल खड़े हुए। इन तीनों ने मेरी आस्था को डिगाया ही नही लम्बे समय से चली आ रही मेरी आस्था, धार्मिक परम्परा और सिलसिले को तहस नहस कर दिया। मैं गए तीस वर्षों से सावन के आख़िरी सोमवार को बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाज़िरी लगाता हूँ।पर इस बार उन्होंने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की।कि मैं वहॉं नहीं जा सका। मैं आज़ादी के बाद अयोध्या रामजन्मभूमि से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण मौक़ों पर मैं अयोध्या में मौजूद रहा हूँ।पर इस बार भूमिपूजन के ऐतिहासिक मौक़े पर मर्यादा पुरूषोतम् ने मुझे जाने से रोका। होश सम्भालने के बाद गए साल तक जन्माष्टमी की झॉकी खुद से सजाता रहा। साईकिल पर लाद कर झॉंवा उनकी झॉंकी के लिए लाता था।लेकिन इसबार लीलाधर ने मुझे अस्पताल के एकांत में बिस्तर पर पटक दिया था। मैं अपने अकेलेपन और कमरे की दीवारों से पूछ रहा था मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? एक तरफ़ कोविड वाईरस से थका देने वाली जंग दूसरी तरफ़ इष्टदेवों का यह व्यवहार। तीसरे किसी परिजन और मित्र से दस रोज से देखा देखी नही। तीनों परिस्थितियॉं मृत्यु से भी ज़्यादा भयावह थी। यह सोच ही रहा था कि लगा, अरे सावन का अन्तिम सोमवार तो कल ही है। तीस साल से मैं इस रोज़ काशी विश्वनाथ केमंगला आरती में जाता रहा हूँ।यह सिलसिला अबकी टूटेगा। “क्या भोलेनाथ क्या बिगाड़ा है मैनें ? इसबार आप नहीं जाने देंगे।पुराना सेवक हूँ आपका। यह अन्याय क्यों भाई। हे विश्वनाथ यह जान लिजिए ईश्वर का अस्तित्व हमारी आस्था और विश्वास पर टिका है। ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना-अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।” सोचा आज इनसे सीधी बात कर ही लूँ। इतवार की रात बैचैन थी। कल सावन का आख़िरी सोमवार है।जीवन में इन्हीं परंपराओ को संस्कारों की अनमोल थाती की तरह सहेजकर रखा हुआ है।मेरे मन में रोग से डर और तकलीफ़ तो थी। पर बनारस न जाने का ग़ुस्सा ज़्यादा था। नाक में आक्सीजन ,उँगली में मानिटर का क्लम्पू, हाथ में केन्नडूला…. न जाने कब तंन्द्रा में आ गया। जीवन की अनिश्चितताओं और संसार की क्षणभंगुरता पर विचार के दौरान धुएँ सी एक आकृति उभरी। अरे यह तो अपने भंगड भिक्षुक भोलेनाथ है। वे गम्भीर आवाज़ में बोले “क्यों परेशान हो बालक।” डर की चरम सीमा पर मनुष्य निडर हो जाता है।मैंने सोचा मौत के मुहाने पर तो हूँ ही । अब और क्या बिगड़ेगा।तो आज बाबा से अपना सीधा संवाद हो जाय।मैंने पूछा “मेरा अपराध क्या है प्रभु? जाना था अन्तिम सोमवार में आपके दर्शन के लिए और आपने मुझे अस्पताल पहुँचा दिया।”“यह काल की गति है वत्स।”“पर मैं तो महाकाल से बात कर रहा हूँ।हे महाकाल मैं आपका पुराना भक्त हूँ। आपके सारे ज्योतिर्लिंगों का दर्शन कर चुका हूँ। आपके त्रिशूल पर टिकी काशी कीं पंचकोश परिक्रमा भी किया है। आपकी सेवा में कैलाश तक जा चुका। किताब लिख दी। अब तो अंग्रेज़ी में छप गयी।ताकि विधर्मी लोग भी आपका प्रताप जान ले। गुरूदेव अब जान ही लेंगे क्या?” मैं बड़बड़ा रहा था। वे मुस्करा रहे थे।तुम जानते हो।“यह काल की गति है। इसे कोई नहीं रोक सकता।”“पर आप तो काल के देवता हैं“। ऐसा लग रहा था मानो मेरे भीतर नचिकेता की शक्ति आ गई है। अभी कुछ ऐसा पूछ लूंगा कि महादेव भी निरूत्तर हो जाएंगे। “ठीक कहते हो पर हमारे काम बँटे है। ब्रह्मा, सृष्टि विष्णु पालन और मैं संहार करता हूँ।मैं इस वक्त संहार में निकला हूँ।” “प्रभु आप जगत के स्वामी है। आप कुछ भी कर सकते है। बेशक आपने सृष्टि के लिए एक विधान बनाया है। पर आप भी उस विधान से बंधे हुए है। विधाता भी विधान से उपर नहीं हो सकता।” “सच है विधान से ऊपर कोई नहीं हो सकता।लेकिन मनुष्य प्रकृति को कैसे जीत सकता हैं। यहॉं तो ऐसा लग रहा है कि लोग प्रकृति और काल को जीत रहे है। अपनी अलग सृष्टि बनाने में लगे है।“ वे क्रोधित होने लगे।मैंने कहा, “हे रूद्र ,आपकी छवि रौद्र है। नील लोहित शंकर नील लोहित। वह आपकी क्रोध मूर्ति थी। आप विनाशक, संहारक और उच्छेदक है। क्रोध न करे। क्रोध स्वभाव नहीं अभाव है। जहॉं शान्ति और संतोष का अभाव हुआ वहॉं क्रोध उत्पन्न हुआ। आपने क्रोध में काम के भस्म किया पर उसे भी फिर ज़िन्दा करना पड़ा भले अंनग होकर ही।“ मुझे लगा वे मेरी बात सुनने के मूड में है।इसलिए मेरी हिम्मत बढ़ी। “हे गंगाधर चाहे आप कैलाश के राजभवन में रहे या वाराणसी के महाश्मशान में। हिमालय के वैभव और काशी की दरिद्रता दोनो में आपका समभाव है। बाक़ी देव हैं आप महादेव। देवों के भी देव। राम के भी ईश्वर। तो हे रामेश्वर क्रोध में संहार का संकल्प न लें।” वह मुस्कुराए। “मेरे ज़िम्मे संहार का काम है।सृष्टि के संतुलन के लिए सृजन के साथ संहार ज़रूरी है।” “तो प्रभु एक सौ पैंतीस करोड़ में मैं ही मिला आपको। इस जिपिंगवा को क्यो नहीं पकड़ते। उसी ने सब गड़बड़ की है।” मैं निर्दोष मन से प्रश्न कर रहा था।वे बोले, “वही तो इस वक्त हमारे संतुलन का निमित्त है। पर अंत तो उसका भी है। “ “आप ठीक कह रहे है। पर इस वक्त आपके यहॉं सब ठीक नहीं चल रहा है। जिनकी यहॉं ज़रूरत है वो वहॉं जा रहे है। जो यहॉं पाप के बोझ से दबे है। उन्हें कोई नहीं पूछ रहा है। आपके यहॉं भी लालफ़ीताशाही की जकड़न दिख रही है। आपके भैंसे वाले सज्जन जो लोगों का वारंट काटते हैं, आज कल ले देकर लोगों की फ़ाईलों को इधर उधर कर देते हैं जिनका नंबर नहीं है उनका नम्बर पहले लगा देते है और जिनका नम्बर होता है। जो धरती पर बोझ है वह अपनी फ़ाइलों को ग़ायब करा धरती पर मज़ा ले रहे हैं?” महाकाल मुस्कराए, “तो आपकी पत्रकारिता हमारे दफ़्तर तक पहुँच चुकी है।” “इसे आप कंटेम्ट मत समझ लिजिएगा महादेव। ऐसी धारणा बन रही है” इस बात को टाल वे गम्भीर हुए। पूछा, “पर इस वक्त तुम क्यों परेशान हो। तुम बनारस नहीं जा पा रहे हो। इसलिए मैं स्वयं आ गया हूँ। मनुष्य खुद ईश्वर तक नहीं पहुंचता है, बल्कि जब वह तैयार हो जाता है तो ईश्वर खुद उस तक पहुंच जाते हैं।”मुझे लगा सचमुच यह मेरा यह सौभाग्य है। मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा।“अगर आपका इतना स्नेह है। तो इस मुसीबत में मैं अस्पताल में क्यों प्रभु।”“इसे ही विधि का विधान कहते है। वत्स जीवन मिलता नहीं, उसे निर्मित करना होता है। जन्म मिलता है, जीवन तो खुद से बनाना होता है।आप जैसा बनाएँगे। वैसे प्रतिफल मिलेगें।”“पर मैंने तो वैसा कुछ नहीं किया है।कि यह रद्दी प्रतिफल मुझे मिले। “ “मृत्यु शाश्वत है वत्स। मनुष्य पैदा होते ही मरना शुरू हो जाता है।तुम जिसको जन्म-दिन कहते हो। वह मृत्यु की घड़ी है, शुरुआत है मृत्यु की। सत्तर वर्ष बाद वह मरेगा, सौ वर्ष बाद मरेगा, मरना आकस्मिक नहीं है कि अचानक आ जाता है, रोज-रोज हम मरते जाते हैं, धीमे-धीमे मरते जाते हैं। मरने की लंबी क्रिया है, जन्म से लेकर मृत्यु तक हम मरते हैं। रोज मरते जाते हैं, थोड़ा-थोड़ा मरते जाते हैं। इसी मरने की लंबी क्रिया को हम जीवन समझ लेते हैं।” मैं भी डटा रहा, “पर मेरे साथ आप ठीक नहीं कर रहे है। जिस काशी में आप चिता भस्म लगा मज़ा लेते हैं। उसी मिट्टी में जन्म लेने और पलने का मुझे सौभाग्य है। यह आपने ही दिया है ।दुनिया में जातिवाद ,परिवारवाद, क्षेत्रवाद फैला है।क्षेत्र के लिहाज से भी आप मेरा ध्यान नहीं रख रहे है। मैं आपका झन्डा उठाए घूमता हूँ। फिर मैं कैसे घुटते दम के साथ नितातं अकेले अस्पताल में हूँ। आपने खबर तक नहीं ली ।” “ये जो सफ़ेद कपड़े पहन कर आपकी देखभाल कर रहे है। इस वक्त वही हमारे प्रतिनिधि है। फिर अगर आप मेरे पास नही आ पा रहे है तो मै तो आपके पास आया।”महादेव की ये बात सुनकर मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा।उन्होने पूछा, “क्या चाहते हो?” ” हे गल भुजंग भस्म अंग! अब तो पहले कोरोना से मुक्ति दिलवाए । कोविड निगेटिव होऊँ ।” “अरे निगेटिविटी बहुत ख़राब प्रवृति है।तुम्हें उससे बचना चाहिए।वर्तामान में दुनिया का यही संकट है चौतरफ़ा निगेटिविटी फैली है। ““नहीं भोलेनाथ दुनिया की सारी निगेटिविटी को आपने गरल के तौर पर अपने कण्ठ में रखा हैं ,नीलकण्ठ।” “ हॉं मैंने उसे गले मे रखा है ।पर उसे गले से नीचे नहीं उतरने दिया है।तभी से यह मुहावरा है कि गले की नीचे नहीं उतर रहा है। “ “तो क्या मैं जान दे दूँ।” “नहीं फ़िलहाल आप मंगला आरती में शामिल हो।” इतना कहते ही वे ग़ायब हुए। और मैं मंगला आरती कीतैयारियों में खुद को पा रहा था। अद्भुत दृश्य! अद्भुत दर्शन! मंगला आरती यानी बाबा भोले नाथ को जगाकर ,नहला – धुलाकर उनका श्रृंगार और आरती। दो घंटे की इस पूरी प्रक्रिया में मेरा और उनका आमना सामना रहा बीच में कोई नहीं। अनवरत गंगा की जलधार और दुग्ध धार। बाबा गदगद। यह भोलेपन का चरम नहीं तो और क्या है! इतनी ताक़तवर सत्ता और केवल जल से प्रसन्न! श्रृंगार का ये दृश्य भी आस्था के असीम संसार सा निराला है। श्रृंगार में लगे हुए पुजारी भॉंग धतूरा और न जाने किस किस चीज़ का भोग लगा रहे है। अब मेरी तल्लीनता मेरे फेफड़ों से निकल उनके भोग और जल प्रेम में उलझ चुकी है। सोचने में डूब गया हूं कि इस देव की यूएसपी क्या है? क्यों कोई दूसरा देवता ऐसा नहीं है? ऐसे अनुपम सामंजस्य और अद्भुत समन्वय वाला शिव ही क्यों है ?शिव अर्धनारीश्वर होकर भी काम विजेता हैं। वे गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त हैं। हलाहल पान करने के कारण नीलकण्ठ होकर भी विष से अलिप्त हैं। ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी होकर भी उनसे विलग हैं। उग्र होते हुए भी सौम्य हैं। अकिंचन होते हुए भी सर्वेश्वर हैं। भंगड भिक्षुक होकर भी देवाधिदेव महादेव हैं। यह शिव विरोधाभासों के अनंत महासागर हैं। पर ये विरोधाभास एक दूसरे के विरूद्ध न होकर, पूरक हैं। भयंकर विषधर नाग और सौम्य चन्द्रमा दोनों ही उनके आभूषण हैं। मस्तक में प्रलयकालीन अग्नि और सिर पर परम शीतल गंगाधारा शिव के अनुपम श्रृंगार है। उनके यहां वृषभ और सिंह व मयूर एवं सर्प अपना सहज वैर भाव भुलाकर साथ-साथ खेलते हैं। इतने विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय वाला शिव का व्यक्तित्व जीवन शैली के अनंत अमृत से ओतप्रोत है। शिवत्व का दूसरा अर्थ ही दुनिया को सह-अस्तित्व का अनुपम संदेश देना है। रावण शिव तांडव के मंत्रों में शिव की जटाओं में गंगा और मस्तक पर प्रचंड अग्नि की ज्वालाओं का वर्णन करता है। अग्नि और जल के सह अस्तित्व का यही शिवत्व युगों युगों से मानव संतति की प्रेरणा और मार्गदर्शन की नींव बना हुआ है। मंगला की आरती , रूद्राष्टक की ध्वनियाँ ,मंदिर की घंटियों से टकराते हुए आत्मा के तहखानों में उतर गए। दो घंटे की उपासना के बाद मैं तो बाहर आ गया पर मन वहीं छूट गया। अपनी अस्तित्व के कतरे-कतरे को सार्थक करता हुआ। सुबह के पॉंच बज गए। कमरे में नर्स प्रकट हुंई। अरे मैं तो शायद अपने अवचेतन से बात कर रहा था। फिर रोज़ की जॉंच पड़ताल शुरू। रक्त सैम्पल लिए जाने लगे। ईसीजी ,एक्स रे का दौर शुरू। ….जारी…. हेमंत शर्मा लंबे समय तक जनसत्ता अखबार के लिए लखनऊ में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत रहे। फिर इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर रहे। इन दिनों टीवी9भारतवर्ष न्यूज़ चैनल का संचालन कर रहे हैं।

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Dakhal News 24 August 2020


bhopal, Recording TRPs is paid for watching TV!

-विवेक सत्य मित्रम- बात पुरानी है। जब टीआरपी का पैमाना टैम हुआ करता था, और मैं एक चैनल का संपादकीय प्रमुख, तब टैम से जुड़े अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में खुलासा किया था कि राजधानी दिल्ली में टीआरपी मापने वाले सबसे ज़्यादा बक्से सीलमपुर में लगाए गए है़ं! और दूसरे शहरों में भी कमोबेश ऐसे ही इलाक़ों में ज़्यादा बक्से लगे हैं। अगर बार्क वालों ने इन बक्सों की लोकेशन से छेड़छाड़ नहीं की हो तो इस हफ़्ते टीआरपी में नंबर वन होने पर आजतक की खुल्लमखुल्ला बेइज्ज़ती करने वाले रिपब्लिक भारत को कल ही सीलमपुर जैसे सभी इलाक़ों में मिठाई बांट देनी चाहिए ताकि अगले हफ़्ते भी वो चिल्ला सकें न्यूज़रूम में! बाक़ी आपके लिए (ग़ैरचैनलवालों के लिए) ये जान लेने में कोई हर्ज़ नहीं है कि इस देश के नेशनल न्यूज़ चैनलों की औक़ात तय करने वाले लोगों का सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक (शैक्षिक पढ़ा जाए) परिवेश कैसा है? और, ये भी कि टीवी व्यूइंग पैटर्न डेटा कलेक्शन के लिए उन्हें टीवी देखने के पैसे दिए जाते हैं! अब आपके लिए समझना आसान होगा कि हर चैनल पर जो चिल्लमचिल्ली होती है उसका टारगेट ऑडिएंस कौन है? PS: इस पोस्ट का मकसद केवल तथ्य रखना है, इसे किसी ख़ास क्लास के विरूद्ध ना माना जाए। बाक़ी आपकी श्रद्धा! कई न्यूज़ चैनलों में कार्यरत रहे और वर्तमान में बतौर एंटरप्रेन्योर सक्रिय विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 21 August 2020


bhopal, Non-payment ,wages violation , workers

मुंबई : श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान करने में देरी या वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त जीवन के उनके अधिकार का उल्लंघन है। यह बात बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को कही। जस्टिस उज्जल भुयान और एन आर बोरकर की पीठ ने यह बात उस समय कही जब एक कंपनी को आदेश दिया कि वह लॉकडाउन के दौरान वेतन का भुगतान करे। रायगढ़ में एक इस्पात कारखाने के लगभग 150 श्रमिकों ने अपनी यूनियन के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कोरोनोवायरस महामारी को देखते हुए सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए कारखाने को दिशा-निर्देश देने की भी मांग की। कंपनी ने वरिष्ठ वकील गायत्री सिंह के माध्यम से दायर याचिका में कहा कि मार्च, अप्रैल और मई में मजदूरों को आधे से कम मजदूरी का भुगतान किया गया था। इसके अलावा, लॉकडाउन से पहले कंपनी ने उन्हें दिसंबर, जनवरी और फरवरी के लिए मजदूरी का भुगतान नहीं किया। हालांकि उन्हें लॉकडाउन लागू होने के बाद मार्च में काम बंद रखने के लिए कहा गया था, लेकिन बाद में कारखाना फिर से खुल गया। याचिका में कहा गया है कि महामारी के मद्देनजर सुरक्षा उपायों को लागू नहीं किया गया और न ही सार्वजनिक परिवहन के अभाव के बावजूद कारखाने से श्रमिकों को आने जाने के लिए कोई व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप, कई मजदूर काम को फिर से करने में असमर्थ हैं। याचिका में कहा गया है कि श्रमिकों और फैक्ट्री मालिकों के बीच विवाद के कारण भुगतान में देरी हुई। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि इस साल मई में हाईकोर्ट ने कारखाने के मालिकों को निर्देश दिया था कि तालाबंदी से पहले के महीनों के लिए श्रमिकों को उनका बकाया भुगतान करें, लेकिन कोई भुगतान नहीं किया गया था। फैक्ट्री मालिकों ने हालांकि आरोपों का खंडन किया और कहा कि यूनियन उनके साथ एक अनौपचारिक समझौता की थी, जिसके तहत श्रमिकों को किश्तों में उनके बकाये का भुगतान किया गया था। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं को अनौपचारिक समझौता के आधार पर उनके वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता है। शशिकांत सिंहपत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal,News photo agency,

World Photography Day : Photojournalists launch News Photo Agency Shall provide large pool of pics for ‘pay and use’ model With an aim to revolutionise the world of photo journalists, an innovative photo agency, News Graph has been launched. The agency has been conceptualised by veteran photo journalists. This platform has been designed in a unique way where both photo journalists and media houses can be mutually benefitted. News Graph began its journey on February 3, 2018 in Chandigarh. After initial success, the founder converted it into Newsgraph Infotainment Media LLP on World Photography Day August 19, 2020. Now this platform is open for all upcoming and senior photo journalists across the country. This will provide a ready platform where photo journalists can learn and earn. By associating with this agency, photo journalists can have multiple benefits. The agency will allow them to create their own profile and photo gallery which will be showcased to all reputed media houses and various other organisations. If their photograph gets chosen for publication, then they shall get paid. The agency will help the photo journalists to earn a decent amount if they can share their exclusive pictures. In an interesting feature, the agency will give cash awards to the best picture of the day or month. Besides, News Graph will provide all relevant information related to photo journalists. A team of experts will help them through webinars and exclusive events. At the same time, the agency will help the media houses who are reeling under economic crisis as it will reduce their dependency on other agencies. The editor of Newsgraph Pankaj Sharma said that our visual database will bring forth the talent of photo journalists. The founder of the agency Anil Thakur said that an excellent platform has been created where media houses and photo journalists can draw innumerable benefits. प्रेस रिलीज

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal, Crisis on Sushant, Shiv Sena, Supreme Court, CBI and Government!

-निरंजन परिहार महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार विपक्ष के साथ अपनों के भी निशाने पर है। सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है। इस मामले में बीजेपी तो शुरू से ही शिवसेना पर हमलावर रही, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद कांग्रेस और एनसीपी के नेता भी शिवसेना के रुख पर खुलकर बोल रहे हैं। इस केस की जांच के मामले में शिवसेना पर शुरू से ही उंगली उठती रही है। कांग्रेस और एनसीपी महाराष्ट्र सरकार में शिवसेना की सहयोगी पार्टियां है और इनके नेताओं व मंत्रियों द्वारा इस मामले में बयानों की वजह से सरकार की एकता में फूट साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस के तेजतर्रार नेता संजय निरूपम, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री असलम शेख और एनसीपी के शरद पवार, पार्थ पवार सहित गृह मंत्री अनिल देशमुख के बयानों सहित बिहार कांग्रेस के नेताओं के बयान इस मामले में शिवसेना पर हमले के रूप में देखे जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर सीबीआई जांच से शिवसेना परेशान क्यों हैं। सरकार में शामिल अपनों के ही हमलावर रुख को देखकर माना जा रहा है कि सरकार हिल रही है। शिवसेना शुरू से ही सुशांत सिह मामले में शक के दायरे में दिखती रही। उसके नेताओं के बयान भी जैसे किसी के बचाव की मुद्रा वाले ही हमेशा लगे और यह भी साफ लगता रहा कि किसी न किसी को तो इस मामले में बचाने की कोशिश हो रही है। हालांकि शुरू से ही महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री का नाम सुना जाता रहा, लेकिन मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य ठाकरे ने जब एक बयान में कहा था कि वे सड़क छाप राजनीति नहीं करते, उनका नाम यूं ही घसीटा जा रहा है, तो सभी को लोगों को लगा कि जिस मंत्री का नाम लिया जा रहा है, वह आदित्य ठाकरे ही हो सकते हैं। लेकिन 14 जून को हुई वारदात को दो महीने से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद एफआईआऱ दर्ज नहीं होना, मुंबई पुलिस की भूमिका स्पष्ट न होने और शिवसेना के नेताओं की अनाप शनाप बयानबाजी ने इस मामले की जांच पर शक पैदा कर दिया। इसके अलावा बिहार पुलिस की टीम को जांच न करने देना और एक पटना पुलिस के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को जांच के लिए मुंबई आने पर कोरोंटाइन कर दिए जाने से शिवसेना और सरकार की इस मामले में सपष्ट संदेहास्पद भूमिका सामने आई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 अगस्त की सुबह सीबीआई को जांच सौंपे जाने के बाद अब महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार पर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले चौतरफा हमले शुरू हो गए हैं। कांग्रेस पार्टी के नेता संजय निरुपम ने कहा कि मुंबई पुलिस इस मामले को नाहक प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करे और सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जांच सीबीआई को सौंप दे। निरुपम ने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस की क्षमता पर किसी को शक नहीं है। लेकिन इस मामले की जांच में ढिलाई बरती जा रही थी, यह दिख भी रहा था। मगर इस ढिलाई का कारण तो सरकार ही जानती है। महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस के कोटे से मंत्री असलम शेख ने भी एएनआई से बातचीत में सीबीई जांच का स्वागत करते हुए कहा कि अगर इस मामले में केंद्र चाहता है कि जांच सीबीआई करे, तो होने देना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे एनसीपी के नेता पार्थ पवार ने भी ट्वीट करके कहा – सत्यमेव जयते। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस पर लेकर उठ रहे सवालों पर 13 अगस्त को ही शरद पवार ने भी कहा था कि सीबीआई जांच कराए जाने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी कहा है कि वे सुशांत सिंह राजपूत मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हैं। देशमुख ने यह भी कहा कि सीबीआई को जो भी सहयोग की आवश्यकता होगी, वो दी जाएगी। अभिनेता सुशांत सिंह केस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है, लेकिन इस केस में शिवसेना अपनी भूमिका पर अड़ी हुई है। यह उसके नेताओं के बयानों से साफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा कि सीबीआई को जांच सौंपने की कोई जरूरत नहीं थी। राऊत ने कहा कि मुंबई पुलिस जांच के लिए पूरी तरह सक्षम है। मगर बिहार चुनाव की वजह से मामले में राजनीति हो रही है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है, तो शिवसेना सन्न है क्योंकि सरकार गिरने की बातें भी सुनने को मिल रही है। सरकार में शामिल तीनों दलों में मतभेद भी लगातार बढ़ रहे हैं। ताजा बयानबाजी के संकेत भी साफ हैं। उधर, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसके स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है कि दोस्तों जल्दी ही सुनेंगे महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है। शिवसेना का रक्षात्मक रुख, उसके साथ सरकार में शामिल कांग्रेस व एनसीपी के सीधे हमले और संबित पात्रा के बयानों के अलावा महाराष्ट्र भाजपा के दो बड़े नेताओं प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल और हर मामले में बहुत आक्रामक तेवर दिखानेवाले विपक्ष के नेता देवेंद्र पडणवीस की रहस्यमयी चुप्पी किसी बड़ी राजनीतिक उथल पुथल के साफ सकेत दे रही है। शिवसेना शायद इसीलिए सुशांत सिंह की मौत का केस सीबीआई को सौंपे जाने से ज्यादा परेशान हैं। (लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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Dakhal News 20 August 2020


bhopal, Why did stock, Hong Kong newspaper ,Apple Daily

–रवीश कुमार– हांगकांग में लोकतंत्र की लड़ाई चल रही है। चीन के आधिपत्य के ख़िलाफ़ हांगकांग की जनता महीनों से प्रदर्शन कर रही है। अब चीन ने एक नया सुरक्षा क़ानून बनाया है जिसके ख़िलाफ़ फिर से प्रदर्शन होने लगे है। इन प्रदर्शनों को कवर करने वाले अख़बार एप्पल डेली के मालिक ज़िम्मी लाई को पुलिस दफ़्तर से गिरफ्तार कर ले गई। हथकड़ी पहना कर। इस गिरफ़्तारी के अगले दिन अख़बार की हेडिंग था “Apple daily must fight on” लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली जनता अख़बार के समर्थन में आ गई। लोग ढाई बजे रात को ही लाइन में लग गए कि इस अख़बार की कॉपी ख़रीदनी है। किसी ने कई कापियाँ ख़रीदी। अख़बार का सर्कुलेशन एक लाख से पाँच लाख हो गया। इसके बाद लोग एप्प डेली का कंपनी के शेयर ख़रीदने लगे। शेयरों के दाम हज़ार प्रतिशत तक बढ़ गए। ज़िम्मी लाई को ज़मानत पर रिहा किया गया है। यह ख़बर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के देश में झूठ मानी जाएगी। यहाँ प्रेस का दमन जनता की भागीदारी से हुआ है। तो विरोध कौन करे। बस जनता को ईमानदारी से एलान कर देना चाहिए कि हमें प्रेस की ज़रूरत ही नहीं है। अब देर हो गई है। जनता मर्ज़ी चाहे ट्रेंड करा लें या मीम बन कर वायरल हो जाए अब कोई फ़ायदा नहीं। यह सवाल अलग से है। ख़ुद को विश्व गुरु कहलाने की चाह रखने वाले भारत के प्रधानमंत्री हांगकांग या कहीं भी लोकतंत्र के दमन पर एक शब्द नहीं बोलते हैं। ट्रंप और अमरीका ने हांककांग में चीन के दमन और सुरक्षा कानून पर खुल कर बोला है। भारत के प्रधानमंत्री बेलारूस और हांगकांग पर बोलेंगे ? रूस की संसद ने पुतीन को 2036 तक पद पर बनाए रखने का क़ानून पास किया है। क्या भारत के प्रधानमंत्री या विपक्षों नेता इस पर कुछ बोलेंगे ? लोकतंत्र का मामला आंतरिक मामला नहीं होता है। मानवीय मूल्यों की रक्षा मामला है। मानवीय मूल्य सार्वभौम होते हैं। कभी सोचिएगा। लोड मत लीजिएगा।जो ख़त्म हो चुका है उसके सूखे बीज से माला बना गले में हार डाल लीजिएगा। नाचिएगा। ख़ुशी से । आपने जिस चीज़ को ख़त्म करने में इतनी मेहनत की है उसका जश्न तो मनाइये। Ndtv के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Death spokesperson ,alleged media compulsions!

एक राजनीतिक दल के ऊर्जावान प्रवक्ता की एक टीवी चैनल की उत्तेजक डिबेट में भाग लेने के बाद कथित मौत को लेकर टी आर पी बढ़ाने वाले कार्यक्रमों की प्रतिस्पर्धा पर चिंता व्यक्त की जा रही है। एक सभ्य समाज में ऐसा होना स्वाभाविक भी है। पर इस तरह की बहसों के पीछे काम कर रहे प्रभावशाली लोग और जो प्रभावित हो रहे हैं वे भी अच्छे से जानते हैं कि शोक की अवधि समाप्त होते ही जो कुछ चल रहा है, उसे मीडिया की व्यावसायिक मज़बूरी मानकर स्वीकार कर लिया जाएगा। मीडिया उद्योग को नज़दीक से जानने वाले लोग भी अब मानते जा रहे हैं कि बहसों के ज़रिए जो कुछ भी बेचा जा रहा है, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही बची है, जितनी कि उनमें हिस्सा लेने वाले प्रवक्ताओं/प्रतिनिधियों के दलों/संस्थानों की जनता के बीच स्थापित है। सत्ता की राजनीति में बने रहने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों ने समाज को जाति और वर्गों के साम्प्रदायिक घोंसलों में सफलतापूर्वक बांटने के बाद अब मीडिया के उस टुकड़े को भी अपनी झोली में समेट लिया है, जिसका जनता की आकांक्षाओं का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व कर पाने का साहस तो काफ़ी पहले ही कमज़ोर हो चुका था। अब तो केवल इतना भर हो रहा है कि ‘आपातकाल’ ने जिस मीडिया के ऊपरी धवल वस्त्रों में छेद करने का काम पूरा कर दिया था, आज उसे लगभग निर्वस्त्र-सा किया जा रहा है। उस जमाने में (अपवादों को छोड़ दें तो )जो काम प्रिंट मीडिया का केवल एक वर्ग ही दबावों में कर रहा था, वही आज कुछ अपवादों के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा तबका स्वेच्छा से कर रहा है। यही कारण है कि एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता की किसी उत्तेजक बहस के कारण कथित मौत दर्शकों की आत्माओं पर भी कोई प्रहार नहीं करती और मीडिया के संगठनों की ओर से भी कोई खेद नहीं व्यक्त किया जाता। समझदार दर्शक तो समझने भी लगे हैं कि टीवी की बहसों में प्रायोजित तरीक़े से जो कुछ भी परोसा जाता है, वह केवल कठपुतली का खेल है, जिसकी असली रस्सी तो कैमरों के पीछे ही बनी रहने वाली कई अंगुलियाँ संचालित करतीं हैं। एंकर तो केवल समझाई गई स्क्रिप्ट को ही अभिनेताओं की तरह पढ़ने काम अपने-अपने अन्दाज़ में करते हैं। पर कई बार वह अन्दाज़ भी घातक हो जाता है। हो यह गया है कि जैसे अब किसी तथाकथित साधु, पादरी, ब्रह्मचारी या धर्मगुरु के किसी महिला या पुरुष के साथ बंद कमरों में पकड़े जाने पर समाज में ज़्यादा आश्चर्य नहीं प्रकट किया जाता या नैतिक-अनैतिक को लेकर कोई हाहाकार नहीं मचता, वैसे ही मीडिया के आसानी से भेदे जा सकने वाले दुर्गों और सत्ता की राजनीति के बीच चलने वाले सहवास को भी ‘नाजायज़ पत्रकारिता ‘के कलंक से आज़ाद कर दिया गया है। एक राजनीतिक प्रवक्ता की मौत को कारण बनाकर अब यह उम्मीद करना कि मूल मुद्दों पर जनता का ध्यान आकर्षित करने से ज़्यादा उनसे भटकाने के लिए प्रायोजित होने वाली बहसों का चरित्र बदल जाएगा, एंकरों के तेवरों में परिवर्तन हो जाएगा या राजनीतिक दल उनमें भाग लेना ही बंद कर देंगे वह बेमायने है।ऐसा इसलिए कि जो कुछ भी अभी चल रहा है, उसे क़ायम रखना मीडिया बाज़ार की सत्ताओं की राजनीतिक मजबूरी और व्यावसायिक ज़रूरत बन गया है। मीडिया उद्योग भी नशे की दवाओं की तरह ही उत्पादित की जाने वाली खबरों और बहसों को बेचने के परस्पर प्रतिस्पर्धी संगठनों में परिवर्तित होता जा रहा है। दर्शकों और देश का भला चाहने वाले कुछ लोग अभी हैं जो लगातार सलाहें दे रहे हैं कि जनता द्वारा चैनलों को देखना बंद कर देना चाहिए। पर वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि फिर देखने के लिए नया क्या है और कहाँ उपलब्ध है ? यह वैसा ही है जैसे सरकारें तो बच्चों से उनके खेलने के असली मैदान छीनती रही और उनके अभिभावक उन्हें वीडियो गेम्स खेलने के लिए भी मना करते रहें। ये भले लोग जिस मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बता रहे हैं उसे ही इस समय असली मीडिया होने की मान्यता हासिल है। जो गोदी मीडिया नहीं है वह फ़िल्म उद्योग की उन लो बजट समांतर फ़िल्मों की तरह रह गया है, जिन्हें बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिल सकते हैं देश में बॉक्स ऑफ़िस वाली सफलता नहीं। एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अख़बारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक सप्रयास नहीं किया जाए )आम तौर पर अभी भी नहीं होता। यानी कि काली स्याही से छपकर बंटने वाले अख़बार चैनलों के ‘घातक’ शब्दों के मुक़ाबले अभी भी ज़्यादा प्रभावकारी और विश्वसनीय बने हुए हैं। उन्हें लिखने या पढ़ने के बाद व्यक्ति भावुक हो सकता है, उसकी आँखों में आंसू आ सकते हैं पर उसकी मौत नहीं होती।यह बात अलग से बहस की है कि जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं उसमें मौत केवल अख़बारों को ही दी जानी बची है पर वह इतनी जल्दी और आसानी से होगी नहीं।चैनल्स तो खैर ज़िंदा रखे ही जाने वाले हैं।उनमें बहसें भी इसी तरह जारी रहेंगी। सिर्फ़ प्रवक्ताओं के चेहरे बदलते रहेंगे।एंकरों सहित बाक़ी सब कुछ वैसा ही रहने वाला है । लेखक श्रवण गर्ग देश के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Senior journalist ,Pramod Singh died , liver cancer

अखबारों के डेस्क किंग प्रमोद सिंह नहीं रहे… लखनऊ के बड़े-बड़े पत्रकारों की खबरों को सजाने से लेकर नवोदित पत्रकारों को ख़बर का शिल्प सिखाने वाले अखबारी डेक्स वर्क के बाजीगर प्रमोद सिंह नहीं रहे। ये मौजूदा समय में दैनिक प्रभात के लखनऊ एडीशन के स्थानीय संपादक थे।   पिछले 6 महीने से वो लीवर कैंसर से पीड़ित थे। चौथे स्टेज में कैंसर ट्रेस होने के बाद कोरोना काल के कारण परिजनों को उनके इलाज में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा।   कल रविवार उन्होंने आंखिरी सांस ली। कोरोना से बचाव की एहतियात के चलते कम लोगों की उपस्थिति में आज इनका अंतिम संस्कार लखनऊ के गोमतीनगर स्थित बैकुण्ठ धाम में कर दिया गया। 65 वर्षीय प्रमोद सिंह ने करीब तीन दशक से लखनऊ के करीब आधा दर्जन बड़े अखबारों में डेक्स पर काम किया। दैनिक जागरण, पायनियर, स्वतंत्र भारत, कुबेर टाइम्स इत्यादि अखबारों में वो सब एडीटर, सीनियर सब, चीफ सब जैसे अखबारी डेस्क के ओहदों की सीढ़िया चढ़ते हुए स्थानीय संपादक के पद पर पंहुचे थे। उन्होंने माधवकांतमिश्रा, विनोद शुक्ला, प्रमोद जोशी, नवीन जोशी, ज्ञानेंद शर्मा, घनश्याम पंकज, गुरुदेव नारायण जैसे बड़े संपादको और दिग्गज पत्रकारों के साथ काम किया था।

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Dakhal News 17 August 2020


bhopal, Sand mafia, Madhya Pradesh ,threatens, kill litterateur, Uday Prakash

देश और दुनिया वैश्विक महामारी कोरोनावायरस से लड़ने और लोग अपनी जान बचाने की मुहिम में लगे हैं, वहीं मध्य प्रदेश में रेत माफिया लोगों की जान लेने पर तुले हैं। लॉकडाउन के दौरान राज्य में पूरी तरह रेत माफिया का राज रहा। राज्य में पिछले 4 महीने के दौरान उप जिलाधिकारी, एसडीओपी, तहसीलदार, थानाध्यक्ष, सब इंसपेक्टर से लेकर सिपाही तक रेत माफिया के हमले के शिकार हो चुके हैं। ताजा घटनाक्रम में विश्व के जाने माने और भारत में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले साहित्यकार उदय प्रकाश को ट्रक से कुचलकर मार देने की धमकी मिली है। उदय प्रकाश की गलती यह थी कि उन्होंने सड़क और उनके घर की बाउंड्री तोड़ रही रेत से भरी ट्रकों को रोकने की कोशिश की। रेत से लदे वाहनों ने उनके घर के बाहर से गुजरने वाली निजी सड़क की हालत बदतर कर दी है, जिसके सुधार के लिए उन्होंने स्थानीय प्रशासन से अनुरोध किया था। मंगलवार को उन्होंने रेत माफियाओं के वाहनों को रोका तो खनिज विभाग सहित माफिया के तमाम गुर्गे भी पहुंच गए। माफिया के गुर्गे उदय प्रकाश को धमकियां देने लगे। इस बीच एक युवा ने उन्हें ट्रक से कुचलकर मार देने की धमकी दी। उदय प्रकाश ने इस मसले पर कहा, “मैंने रेत से भरे ट्रकों की आवाजाही पर विरोध जताया, इसलिए माफिया के लोगों ने मुझे धमकी दी। अभी मैंने पुलिस में शिकायत नहीं की है।” उदय प्रकाश सामान्यतया राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के वैशाली इलाके में रहते हैं। कोरोनावायरस के प्रसार के पहले वह अपने पैतृक आवास अनूपपुर पहुंचे। उसके बाद हुए लॉकडाउन से वह गांव में ही फंस गए। वह सोन नदी के किनारे गांव में सुकून महसूस करते हैं। उनके मकान से सटे सोन नदी बहती है। वहीं से खनन माफिया बालू निकालते हैं। उदय प्रकाश का कहना है कि उनके घर के सामने बनी सड़क उनकी पुश्तैनी जमीन है। उन्होंने तत्कालीन जिला कलेक्टर अजय शर्मा को पत्र लिखकर वह जमीन जिला प्रशासन को सड़क के लिए दे दी थी, जिससे स्थानीय निवासियों की सुचारु आवाजाही सुनिश्चित हो सके। स्थानीय लोग रेत माफिया के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे उदय प्रकाश के साथ हैं, लेकिन राजनीति और अपराध जगत के कॉक्टेल के कारण वे विवश हैं। पहले भी मिल चुकी है परिवार को मारने की धमकी मई 2018 में रेत माफियाओं ने उदय प्रकाश के बेटे शांतनु और उनकी पत्नी कुमकुम को रिवॉल्वर दिखाते हुए गोली मार देने की धमकी दी थी। उस समय अनूपपुर के एसपी सुनील जैन ने कहा था कि पहले क्या हुआ, मैं नहीं बता सकता, मैं उस वक्त ट्रेनिंग पर था। सोन नदी में अवैध खनन होने की शिकायत बिल्कुल गलत है। उस समय उदय प्रकाश के परिवार के खिलाफ मिली धमकियों को लेकर साहित्य जगत के लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए थे। 2018 में मिली धमकियों के बाद जब उदय प्रकाश का परिवार प्रशासन को शिकायत की तो माफिया ने उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज करा दी। इस समय उदय प्रकाश के खिलाफ 4 मुकदमें दर्ज हैं, जो अपराधियों ने उनके खिलाफ दर्ज कराए हैं। साहित्य जगत की वैश्विक हस्ती उदय प्रकाश को भारत की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून, नेता व माफियाओं के गठजोड़ ने मुकदमों में उलझा रखा है। मध्य प्रदेश में रेत माफियाओं का राज   मध्य प्रदेश में रेत माफियाओं पर कोई कानून नहीं चलता। जानकारों का कहना है कि इसमें स्थानीय नेताओं से लेकर प्रदेश के आला नेताओं का माफियाओं के साथ गठजोड़ काम करता है, जिसके चलते अधिकारी पूरी तरह बेबस नजर आते हैं और जो भी अधिकारी या पुसिल विभाग का व्यक्ति माफिया का विरोध करता है, उसे मारने पीटने से लेकर हत्या तक कर देने की घटनाएं सामने आ जाती हैं। कुछ घटनाओं से मध्य प्रदेश में माफिया राज के बारे में समझा जा सकता है। मध्य प्रदेश के कटनी में 11 अगस्त 2020 को रेत माफिया पर ग्रामीणों ने लाठी डंडों से हमला कर दिया, जिसकी वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई। कटनी के बरही थाना क्षेत्र के नदावन गांव के केशव तिवारी ने रेत निकाल रहे माफिया का विरोध किया। रेत माफिया भी वहां पहुंच गया। रेत माफिया के लोगों ने तिवारी पर हमला कर दिया। उसके बाद गांव के लोग भी उग्र हो गए और रेत माफिया व उसके साथियों को दौड़ा दौड़ाकर पीटने लगे। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में विजयपुर के गढ़ी चेकपोस्ट पर 17 जुलाई 2020 को रेत माफिया ने पुसिलकर्मियों पर हमला कर दिया। असिस्टेंट सब इंसपेक्टर राजेन्द्र जादौन को धमकाते हुए चांटा मारा और धक्का देकर जमीन पर पटक दिया। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामला सामने आया, जिसमें पुलिसकर्मी रेत माफिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। विजयपुर के गोहटा रोड पर ट्रैक्टर ट्रॉली पकड़ने पर 15 से ज्यादा रेत माफिया ने 26 जून 2020 को सहायक कलेक्टर और प्रभारी एसडीएम नवजीवन विजय और तहसीलदार अशोक गोबड़िया के साथ हाथापाई की। रेत माफिया अधिकारियों को धमकाते हुए रेत के ट्रैक्टर-ट्रॉली ले गए। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में 28 जून 2020 को रेत माफिया ने अपने बेटे के साथ रेत के अवैध भंडारण के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचे वन रक्षक देवशरण और श्रमिक राम नरेश यादव के साथ मारपीट की। वन रक्षक को आरोपियों ने जमकर पीटा और उसकी वर्दी फाड़ डाली। देवास में एसडीओपी ने 29 जून 2020 को दो पुलिस जवानों के साथ रेत से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली रोकने की कोशिश की। आरोपी ने एसडीओपी के ड्राइवर पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया। इस बीच माफिया ने अन्य साथियों को भी बुला लिया। उसके बाद सभी ने पुलिस जवानों पर हमला कर दिया, जिसमें एसडीओपी के ड्राइवर और पुलिसकर्मी संदीप जाट घाटल हो गए। गढ़ी चेकपोस्ट पर रेत माफिया ने मई 2020 को दो कांस्टेबल को बुरी तरह पीटा। सिपाहियों ने तत्कालीन थाना प्रभारी सतीश साहू से इसकी शिकायत की, लेकिन रेत माफिया पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 3 दिन बाद दोनों कांस्टेबल को लाइन हाजिर कर दिया गया। बैतूल जिला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर शाहपुर थाना क्षेत्र में ग्राम गुवाड़ी के पास 19 मई, 2020 को रात साढ़े 11 बजे अवैध रेत खनन कर रहे माफिया के गुर्गों ने राजस्व और पुसिल की टीम पर जानलेवा हमला किया। वाहनों पर पथराव में 2 पटवारी, तहसीलदार के वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो गए और तहसीलदार नरेंद्र ठाकुर और थाहपुर थाना प्रभारी प्रशिक्षु डीएसपी देवनारायण यादव को मामूली चोटें आईं। लॉकडाउन के दौरान नरसिंहपुर जिले में रात के अंधेरे में नर्मदा के साथ उसकी सहायक नदियों में अप्रैल 2020 में रेत का खनन हुआ। रेत माफिया इसका भंडारण कर रहे थे, जिससे मॉनसून शुरू होने पर महंगे दाम पर रेत बेची जा सके। स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत की। इसके बारे में जिले के खनिज अधिकारी रमेश पटेल ने कहा कि लॉकडाउन और कोरोना संकट को लेकर पुलिस बल अभी अन्य कामों में लगा है। सुरक्षा बल की कमी है। रेत खनन की शिकायतें आई हैं, लेकिन फोर्स मिलने के बाद ही कार्रवाई की जा सकती है। व्यावरा शहर की अजनार नदी के किनारे मोहनीपुरा गांव के पास अवैध रेत ले जाने वाले ट्रैक्टरों को पकड़ने गई राजस्व टीम पर मार्च 2020 में हमला हुआ। तहसीलदार की मौजूदगी में कार्रवाई करने पहुंचे आरआई ओपी चौधरी पर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की गई, जिसे आस पास खड़े पटवारियों ने किसी तरह रोका। माफिया सरकारी कर्मियों से ट्रैक्टर छीनकर ले गए।  

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Dakhal News 12 August 2020


bhopal, Rahat Indorei: End of an era of Ghazal

जनाब राहत इंदौरी का जाना ग़ज़ल के एक युग का जाना है। 1 जनवरी 1950 को इंदौर में उनका जन्म हुआ था। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक 1369 हिजरी थी और तारीख 12 रबी उल अव्वल थी। उन्होंने 1969-70 के दौरान शायरी शुरू की थी। वह जोश मलीहाबादी, साहिर लुधियानवी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद फ़राज़ और हबीब जालिब की परंपरा के शायर थे। सचबयानी के उतने ही कायल। हुकूमत किसी भी रहनुमा की हो, राहत इंदौरी की ग़ज़ल ने उसे नहीं बख्शा। उन्होंने 1986 में कराची में एक शेर पढ़ा और पाकिस्तान के नेशनल स्टेडियम में हजारों लोग खड़े होकर पांच मिनट तक ताली बजाते रहे। उसी शेर को कुछ अर्से बाद दिल्ली के लाल किले के मुशायरे में पढ़ा, तब भी उसी तरह की शोरअंगेजी हुई। शेर था: ‘अब के जो फ़ैसला होगा वो यहीं पे होगा/हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली…।’ यह शेर पाकिस्तान और हिंदुस्तान के अवाम के मुश्तरका गम को बखूबी बयान करता है। उनका एक और शेर है: ‘ मेरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे/मेरे भाई मेरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले…।’ यह शेर भी गौरतलब है: ‘हम ऐसे फूल कहां रोज़-रोज़ खिलते हैं/सियह गुलाब बड़ी मुश्किलों से मिलते हैं…।’   राहत इंदौरी दुनिया भर में घूमे लेकिन मन हिंदुस्तान और अपने घर ही रमा। उनकी शरीके-हयात सीमा जी ने कहीं एक इंटरव्यू में कहा था कि वह एक बार एक महीने अमेरिका रहकर लौटे तो सीधे रसोई में पहुंच गए और कहने लगे-“घर का खाना लाओ, इससे अच्छा खाना पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता।” उनका एक शेर है: ‘फुर्सतें चाट रही हैं मेरी हस्ती का लहू/मुंतज़िर हूं कि कोई मुझको बुलाने आए…।’ उनकी तीन संतानें हैं–शिब्ली, फैसल और सतलज। बेहतरीन ग़ज़लकार और गीतकार के साथ-साथ वह उम्दा चित्रकार भी थे। मुसव्विरी में भी उनके जज्बात खूब-खूब उभरते थे। जिन्होंने उनकी चित्रकारिता देखी है वे बताते हैं कि ब्रश और रंगों से भी वह नायाब ग़ज़ल रचते थे। राहत साहब ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि चित्रकारी की प्रेरणा उन्हें गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर से हासिल हुई। पेंटिंग सीखने की बकायदा शुरुआत उन्होंने इंदौर के ज्योति स्टूडियो (ज्योति आर्ट्स) से की, जिस के संचालक छगनलाल मालवीय थे। इंदौर के गांधी रोड पर हाईकोर्ट के पास यह स्टूडियो था। उन दिनों ज्यादातर सिनेमा के बैनर और होर्डिंग का काम यहां होता था। इसी स्टूडियो के पास सिख मोहल्ला था, जहां किवदंती गायिका लता मंगेशकर जी का जन्म हुआ। प्रसंगवश, राहत साहब ने नायाब गीत भी लिखे और उनमें कुछ को लता जी ने स्वर दिया। राहत इंदौरी नौवीं जमात में थे। उनके नूतन हायर सेकेंडरी स्कूल में मुशायरा हुआ। जांनिसार अख्तर की खिदमत उनके हवाले थी। वह उनसे ऑटोग्राफ लेने गए तो कहा कि मैं भी शेर कहना चाहता हूं, इसके लिए मुझे क्या करना होगा। अख्तर साहब का जवाब था कि पहले कम से कम-से-कम पांच हजार शेर याद करो। राहत साहब ने कहां की इतने तो मुझे अभी याद हैं। जनाब जांनिसार ने सिर पर हाथ रखा और कहा कि तो फिर अगला शेर जो होगा वह तुम्हारा खुद का होगा। ऑटोग्राफ देने के बाद अख्तर साहिब ने अपनी ग़ज़ल का एक शेर लिखना शुरू किया: ‘हम से भागा न करो दूर, ग़जालों की तरह…।’ राहत साहब के मुंह से बेसाख्ता दूसरा मिसरा निकला: ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहनेवालों की तरह…।’ वह ताउम्र जांनिसार अख्तर का बेहद एहेतराम करते रहे लेकिन शायरी में उनके उस्ताद कैसर इंदौरी साहब थे। उनकी शागिर्दी में आने के बाद राहत साहब ने अपना नाम ‘राहत कैसरी’ रख लिया था। उनके पहले मज्मूआ ‘धूप-धूप’ राहत कैसरी नाम से छाया हुआ था। बाद में अपने उस्ताद की सलाह पर ही उन्होंने अपना नाम राहत इंदौरी कर लिया। शुरुआती मुशायरों में उन्हें ‘इंदौरी’ होने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। खासतौर पर जो मुशायरे दिल्ली, लखनऊ और भोपाल में होते थे। उनका गोशानशीन उस्तादों और उनके नामनिहाद शागिर्दों को जवाब होता था: ‘जो हंस रहा है मेरे शेरों पे वही इक दिन/क़ुतुबफरोश से मेरी किताब मांगेगा..।’ शुरुआती दिनों का ही उनका एक शेर है: ‘मैं नूर बन के ज़माने में फैल जाऊंगा/तुम आफ्ताब में कीड़े निकालते रहना..।’ राहत इंदौरी वस्तुतः सियासी शायर थे। इन दिनों के मुशायरों में भी अक्सर वह विपरीत हवा पर शेर कहते थे। उनके ये अल्फ़ाज़ जिक्र-ए-खास हैं: ‘जिन चराग़ों से तअस्सुब का धुआं उठता है/ उन चराग़ो को बुझा दो तो उजाले होंगे..।’ इस शेर के जरिए वह सीधा फिरकापरस्त सियासत पर कटाक्ष करते हैं। उनके बेशुमार प्रशंसकों का एक पसंदीदा शेर है : ‘ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन/यह पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है?’ कोरोना उनके जिस्मानी अंत की वजह बना और कोरोनाकाल में हिजरत ने दुनिया भर में इतिहास बनाया। बहुत पहले उन्होंने लिखा था: ‘तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं/अगर हमारी तरह चार दिन सफ़र में रहो…।’ जनाब इंदौरी के यह अल्फ़ाज़ भी रोशनी की मानिंद हैं: ‘रिवायतों की सफें तोड़कर बढ़ो वर्ना, जो तुमसे आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे..।’। जिस प्रगतिशील रिवायत से उनकी शायरी थी, उसी में यह लिखना संभव था: ‘हम अपने शहर में महफूज भी हैं, खुश भी हैं/ये सच नहीं है, मगर ऐतबार करना है..।’ इसी कलम से यह भी निकला: ‘मुझे ख़बर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद/मेरी निगाह के आगे तो सब धुआं है मियां..।’ यह भी लिखा: ‘महंगी कालीनें लेकर क्या कीजिएगा/अपना घर भी इक दिन जलनेवाला है…।’ और यह भी कि: ‘गुजिश्ति साल के ज़ख्मों हरे-भरे रहना/जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा..।’   बहरहाल, अब आप जिस्मानी तौर पर नहीं हैं राहत इंदौरी साहब लेकिन आपका यह शेर आपके चाहने वालों के अंतर-कोनों में जरूर है: ‘घर की तामीर चाहे जैसी हो/उसमें रोने की कुछ जगह रखना..!’ आमीन!! लेखक अमरीक पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 12 August 2020


bhopal, Journalist Bindiya Bhatt, becomes

फिल्मी दुनिया में खबरें तो बहुत होती हैं लेकिन TV वाले सारी खबरें कवर नहीं कर पाते। बॉलीवुड स्टार्स से जुड़ी ऐसी बहुत सी खबरें होती हैं जो लोग टीवी चैनल्स की जगह on the go देखना पसंद करते हैं। आज इस डिजिटल वर्ल्ड में लोग इनफार्मेशन से भरे हुए वीडियोस देखना चाहते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ उनकी नॉलेज भी बढ़ाएं। तो ऐसा ही एक नया Youtube channel लॉन्च हुआ है जिसका नाम है ‘फिल्म सर्किल’। ये यूट्यूब चैनल बॉलीवुड से रिलेटेड महत्वपूर्ण ख़बरों को तो कवर करता ही है साथ ही उन सारी खबरों को कवर कर रहा है जिसे TV चैनल समय की कमी के चलते छोड़ देते हैं. इस चैनल का फेस हैं तेजतर्रार जर्नलिस्ट बिंदिया भट्ट। बिंदिया भट्ट ‘फिल्म सर्किल’ यूट्यूब चैनल में आपको ‘फिल्मी बिंदिया’ के नाम से होस्ट के रूप में नज़र आएंगी। बिंदिया को मीडिया में 14 साल का एक्सपीरियंस हैं। BAG फिल्म्स & मीडिया लिमिटेड, News24, दैनिक भास्कर, न्यूज़ नेशन और माइक्रोसॉफ्ट न्यूज़ जैसी संस्थानों के लिए वो काम कर चुकी हैं। बिंदिया ने अपना ये Youtube चैनल अपने दो मित्रों के साथ, यानि एक छोटी सी टीम के साथ मिल-जुलकर शुरू किया है। बिंदिया के साथ उनकी टीम उनके लोग ‘फिल्म सर्किल’ चैनल का प्रोडक्शन संभाल रहे हैं। यह चैनल 7 जुलाई को लॉन्च किया गया था। इस चैनल पर कई रोचक और दर्शनीय वीडियोज अपलोड हो चुके हैं। आपको बता दें कि आत्मनिर्भरता की ओर बिंदिया का यह एक छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास है। इसलिए आप सहयोग करें। नीचे दिए गए लिंक पर जाकर इस चैनल को सब्सक्राइब करें, अपने पसंदीदा वीडियोज को देखें और शेयर करें…

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Dakhal News 8 August 2020


bhopal, Because the one who died was a journalist…

पिछले 24 घंटे से मन बड़ा विचलित हुआ पड़ा है। हालांकि पहले विचलन कुछ अजीब सा होता था। घंटों, दिनों या कभी-कभी हफ़्तों तक मन नहीं लगता था, दिमाग झुंझलाया रहता था। मगर अब वक्त की ठोकरें कहें या मस्तिष्क की परिपक्वता, मन अब विचलन के साथ दैनिकचर्या का सामंजस्य बिठाने के तरीके सीख गया है। विचलन का कारण वही है जिससे कमोबेश कल से बनारस और आसपास के पत्रकारिता जगत के अलावा तमाम लोग विचलित हैं… राकेश चतुर्वेदी सर का असमय जाना। आज सुबह तो कलेजा मुंह को ही आ गया जब आंखें खुलते ही फेसबुक पर जन्मदिन का नोटिफिकेशन आया, उनमें एक विजय का भी था। विजय उपाध्याय… वही लड़का जो कम समय में तमाम सफ़र करते हुए एक सम्मानित अखबार तक पहुंचा और फिर अचानक एक दिन अनंत के सफ़र पर चल पड़ा। तमाम बातें थीं जो मन में सुबह से ही घुमड़ रही थीं। आखिर एक पत्रकार क्या है… समाजसेवी नहीं है, क्योंकि समाज को समय नहीं दे पाता। नौकरी से जो थोड़ा-मोड़ा समय मिलता है उसमें अपनी तमाम दुश्वारियों को दरकिनार कर सबसे ज्यादा हंसना चाहता है। खुद को larger then life दिखाना चाहता है। वह नौकरशाह भी नहीं है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के समय वो जिंदगी से सबक सीखने में अपना समय ‘नष्ट’ कर चुका होता है, बाद में अपने से कम उम्र या बेहद कम मेधा वाले अफसरों को सर या भाई साहब कहने को अभिशप्त होता है। वो कारोबारी नहीं है, नेता नहीं है, शिक्षक नहीं, वकील नहीं, डॉक्टर नहीं, पुलिस नहीं…समाज का नजरिया उसे एक सामान्य नौकरीपेशा बनने नहीं देता। तो कुल मिलाकर वो एक ऐसी अभिशप्त आत्मा का जीवन जीता है, जिसके पास न अपना कोई बड़ा बैंक बैलेंस होता है, न कारोबार, न नौकरी की निश्चिंतता। और तो और अगर कुर्सी पर नहीं रहा तो अंत समय में चार कंधे साथ होंगे या नहीं इसमें भी संदेह है। बच्चों के, परिवार के बड़े सपने उसे डराते हैं। ‘मुझे कुछ हो गया तो इनका क्या होगा’ की फिक्र कई लोगों की सच हो भी चुकी है। साथी अफसोस जताते हैं, जो सक्षम हैं वो मदद का ढांढस बंधाते हैं, कुछ अफसरों के यहां तक की दौड़ लगाते हैं और वहां बड़े ही विनम्र तरीके से ये बताकर लौट आते हैं कि जो गया उसका परिवार बड़ी ही परेशानी में है। अगर प्रशासन मदद कर देता तो उसका यशोगान होता आदि आदि… फेहरिस्त लंबी है ऐसे जाने वालों की। राकेश सर से पहले विजय, मंसूर चचा, गंगेश सर, सागर, सुशील चचा जैसे कई रहे जो असमय काल के गाल समा गए। कारण अलग अलग हो सकते हैं मगर नियति एक सी दिखी है अब तक। दो-चार दिनों की श्रद्धांजलियों का दौर, कुछ हफ़्तों की दौड़भाग। जो खुशकिस्मत थे उन्हें संस्थान और प्रशासन से सहयोग मिला। कुछ ऐसे भी थे जो अपने बाद बेटे और परिवार के लिए संघर्ष की थाती ही छोड़ पाए… समाज के किसी भी तबके से न जुड़ के भी हम पत्रकार हर तबके की सोच विकसित कर लेते हैं। हम एक नेता, एक नौकरशाह, एक समाजसेवी, एक डॉक्टर, एक वकील, एक पुलिस वाले, एक कारोबारी और ऐसे ही न जाने कितने एक-एक की तरह एक ही समय में सोच सकते हैं। लेकिन यह सब विकसित करने में हम अपने विकास को कहीं पीछे, बहुत पीछे छोड़ देते हैं। 30 साल से ज्यादा पत्रकारिता और 15 साल से ज्यादा संपादकी कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार को एक फ्लैट खरीदने के लिए मैंने पाई पाई जुटाते देखा है, एक अति वरिष्ठ को बार बार वही टुटही स्कूटर बनवाते देखा है, दशकों के क्राइम रिपोर्टर को अपने प्लॉट पर मिट्टी गिरवाने के लिए पिता से पैसे मांगते भी देखा है। आखिर क्यों ऐसा है। आखिर क्या वजह है कि इनके मरने पर अफसोस करने वाला सबसे पहले यही कहता है कि बेचारे का घर कैसे चलेगा !!! जबकि अखबारों के मालिकान या दिल्ली में बैठे जिल्ले-इलाहियों के बारे में ऐसी बातें नहीं होतीं !!! अफसोस होता है कभी कभी कि मैंने जीवन के अमूल्य डेढ़ दशक इस काम को दे दिए। अफसोस होता है जब पलट कर देखता हूं और सोचता हूं कि मुझे आज भी इस काम से उतना ही प्यार है। खैर, अफसोस बहुत से हैं। बस कामना है कि राकेश सर, विजय या मंसूर चचा जैसे अफसोस न करने पड़ें जिंदगी में आगे। आवाज़ वहां तक पहुंचे जहां संस्थान अपने लोगों की सुधि लेने का संकल्प लें। क्योंकि जो मरा वो सबकी सोचने वाला एक पत्रकार था… हे ईश्वर, उन्हें सद्गति और इन्हें सद्बुद्धि देना। पत्रकार अभिषेक त्रिपाठी की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 8 August 2020


bhopal, Lucknow journalists ,stunned ,poisonous phone calls, abroad

आज दोपहर बारह से तीन बजे के दौरान लखनऊ के पत्रकरों के पास विदेश से लगातार जहरीले वाइस कॉल्स आने से हड़कंप मच गया है। यूसुफ अली नाम से ये कॉल दो नंबरों से आ रही है। इसके नंबर यूनाइटेड स्टेट के अटलांटा के हैं। फोन पर राम मंदिर और नरेंद्र मोदी का विरोध करने की अपील की जा रही है। साथ ही भारतीय मुसलमानों को भड़काने के प्रयास किये गये हैं। साथ ही कहा गया है कि स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झंडा फहराने से रोकना चाहिए। इस जसरीली वाइस कॉल में ये भी कहा गया है कि हिंदुस्तान के मुसलमान उर्दूस्थान निर्माण के लिए प्रयास करें। पत्रकारों ने इस गंभीर मामले की इत्तेला तत्काल पुलिस को दी। इसके बाद हजरतगंज पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। नवेद शिकोह

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Dakhal News 8 August 2020


bhopal, Published

हम आज भी अंग्रेज़ी हुकूमत के नियमों से फ़िल्म प्रमाणन प्रक्रिया करते हैं, सौ वर्षों की सिनेमाई यात्रा का पूरा विवरण पेश करती है पुस्तक ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’, पुस्तक में देश के जाने माने फ़िल्मकारों और फ़िल्म पत्रकारों के साक्षात्कार हैं समाहित   फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर देश भर में माहौल हमेशा से गरम रहा है. 1918 में अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा फ़िल्मों की सामग्री को परीक्षण करने के इरादे से आरम्भ की गई नीति आज 21वीं सदी में ओटीटी प्लेटफ़ोर्म के ज़माने में भी प्रासंगिक है. एक दर्शक फ़िल्म में क्या देखे? इसे तय करने की एक संस्था आज़ाद भारत में भी बनाई गई जिसे केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड का नाम दिया गया.   इसी क्रम में कई कमेटियाँ बनी जिसने इस बोर्ड के क्रियान्वयन और तरीक़ों में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी सुझाव भी दिए. यह सब कितना सफल हुआ और क्या बदलाव हुए पुस्तक फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष बताती है. डॉ मनीष जैसल द्वारा लिखी गई यह किताब संभवत: हिंदी में इस विषय पर लिखी गई पहली किताब है जो फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्षों का पूरा लेखा जोखा पेश करती है.   दुनिया भर में फ़िल्म सेन्सरशिप को लेकर बने मॉडल में भारत में कौन सा सबसे उपर्युक्त होना चाहिए पुस्तक में दिए सुझावों से जाना और समझा जा सकता है. कभी पद्मावती जसी फ़िल्मों को लेकर विवाद होता है तो कभी उड़ता पंजाब के सीन कट हो जाने से मीडिया में हेडलाइन बनने लगती है. लेकिन इसके पीछे के तर्कों और इससे बचाव को लेकर सरकारें क्या क्या उपाय सोचती और उसे करने का प्रयास करती है पुस्तक कई उदाहरणों के साथ सामने लाती है. देश के शिक्षाविद, फ़िल्मकार,पत्रकारों, लेखकों आदि से किए गए साक्षात्कार फ़िल्म सेन्सरशिप के भविष्य को लेकर एक राह दिखते हैं. जिन पर अमल किया जाये तो संभवत: इस दिशा में सकारात्मक कार्य हो सकता है.   महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से फ़िल्म स्टडीज़ में पीएचडी डॉ जैसल ने काशीपुर के ज्ञानार्थी मीडिया कोलेज में भी अपनी सेवाएँ बतौर सहायक प्रोफ़ेसर और मीडिया प्रभारी दे चुके हैं. सीएसआरयू हरियाणा में सेवाएँ देने बाद वर्तमान में नेहरु मेमोरियल लाइब्रेरी नई दिल्ली के सहयोज से पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा पर पुस्तक लिख रहे डॉ मनीष ने मशहूर फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली पर भी पुस्तक लिखी है, जो काफ़ी चर्चित रही.   बुक बजुका प्रकाशन कानपुर द्वारा इनकी तीनों किताबें प्रकाशित हुई हैं. प्रकाशक ने बताया कि सिनेमा पर लिखने वाले बहुत काम लोग हैं ऐसे में भारतीय सिनेमा और सेन्सरशिप पर लिखी गई इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय संदर्भों के साथ अमेरिका यूरोप और एशिया के कई प्रमुख देशों के फ़िल्म सेन्सरशिप की विस्तृत चर्चा की है. वहीं प्रमुख फ़िल्मकारों और पत्रकारों से संवाद पुस्तक को और भी तथ्य परक बनाती है. फ़िल्म समीक्षक, लेखक और स्वतंत्र पत्रकार की भूमिका का बराबर निर्वहन कर रहे पुस्तक के लेखक डॉ मनीष जैसल ने सभी फ़िल्म रसिक, फ़िल्मी दर्शकों और पाठकों से पुस्तक को पढ़ने और उस पर टिप्पणी की अपील की है. वर्तमान में लेखक मंदसौर विश्वविद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर हैं. फ़िल्म मेकिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे टेक्निकल विषय पर विशेष रुचि भी है. स्क्रीन राईटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया, आइचौकडॉटइन, अमर उजाला, हिंदुस्तान, भास्कर, न्यूजलांड्री जैसे पोर्टल में लगातार इनकी फ़िल्म समीक्षाए और लेख प्रकाशित होते रहते हैं. दो भागों में प्रकाशित ‘फ़िल्म सेन्सरशिप के सौ वर्ष’ को प्राप्त करने के लिए आप mjaisal2@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते है

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Dakhal News 4 August 2020


bhopal, important comment , Yashwant, Corona

ये खबर मेरे जैसों के लिए है जो कोरोना को हलके में लेते हैं. इधर उधर फुदकते रहते हैं. विजय विनीत जी बनारस के दबंग और मुखर पत्रकारों में से एक हैं. आम जन के दुखों, जनता से जुड़ी खबरों को लेकर शासन प्रशासन से टकराना इनकी फितरत है. इन्हें जब कोरोना का संक्रमण हुआ तो तनिक भी अंदाजा न था कि मरते मरते बचेंगे. यूं कहें कि ये मर ही गए थे, बस अपनी जीवटता और कुछ डाक्टरों की जिद के चलते जी गए. कृपया सावधान रहें. घर में रहें. बहुत जरूरी हो तो ही निकलें. कोरोना का कोई इमान धर्म नहीं है. कब किसे कहां पकड़ ले और मार डाले, कुछ कहा नहीं जा सकता. विजय विनीत जी ने अपनी स्टोरी विस्तार से लिखी है, पढ़िए पढ़ाइए और बहुत जरूरी न हो तो चुपचाप घर में बैठे रहिए. मुझे भी कुछ फीडबैक हैं. गर्दन, कंधे व हाथ के दर्द के कारण मैं फिजियोथिरेपी कराने जिस डाक्टर के पास जाता था, उनकी पत्नी एक सरकारी अस्पताल (ईपीएफ वाले) में हेड नर्स हैं. उनके फिजियोथिरेपिस्ट पति बता रहे थे कि वाइफ जहां काम करती हैं वहां के अस्पताल में तैनात मेडिकल स्टाफ में अघोषित तौर पर ये सहमति है कि जिन कोरोना मरीजों की हालत बिगड़ गई हो उसे छूना-छेड़ना नहीं है. उसे मरने के लिए छोड़ देना है क्योंकि उन्हें ठीक करने की लंबी कवायद में मेडिकल स्टाफ संक्रमित हो सकता है. उनने बताया कि कोरोना संक्रमित कई मरीजों को बचाया जा सकता था लेकिन मेडिकल स्टाफ के बीच एक मूक सहमति के चलते कोई मरीज के पास जाकर उसे बचाने की कवायद में खुद संक्रमित होने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ. मैं तो सुनकर दंग रह गया. मतलब जब हालत खराब हो और मदद की जरूरत हो तब मरने के लिए छोड़ दीजिए. जब माइल्ड लक्षण हों तो बस खाना वगैरह भिजवा कर अकेले पड़े पड़े डिप्रेशन में जाने के लिए छोड़ दीजिए. आप ठीक हो जाएं या मर जाएं, ये आपका भाग्य है. वैसे भी कोरोना पेशेंट के लिए आजकल अस्पतालों में न बेड है, न गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आक्सीजन सिलेंडर. जो कुछ हैं भी तो वो बड़े व वीवीआईपी के लिए आरक्षित-सुरक्षित हैं. ज्यादा बड़े वीवीआईपी तो मैक्स व मेदांता जैसे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. ग़ज़ब है ये देश. ग़ज़ब है इस देश के हुक्मरां जिन्होंने अपनों की जेबें तो खूब भरी-भरवाईं लेकिन देश की जनता के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया न करा सके. हर कोई विजय विनीत जी जैसा भाग्यशाली नहीं है कि उन्हें मुश्किल वक्त में कुछ जिद्दी डाक्टर मिल जाएं. हर कोई विजय विनीत जैसा इच्छा शक्ति रखने वाला भी नहीं है. विजय विनीत की कहानी हमें डराती है. विजय विनीत की कहानी हमें बताती है फिलहाल तो सारी सत्ताओं से बड़ी मौत की सत्ता है जो अदृश्य होकर यहां वहां जहां तहां विराजमान है. कौन इसकी गिरफ्त चपेट में आएगा, न मालूम. ऐसे में जरूरी है कि हम आप यथासंभव प्रीकाशन रखें. जीवन-मृत्यु को उदात्तता से समझने-बूझने की प्रक्रिया शुरू कर दें ताकि मौत आए भी तो उसके साथ जाने में कोई मलाल शेष न रहे. हालांकि ये भी जान लीजिए कि मरता वही है जो दिमागी से रूप से मरने के लिए तैयार हो जाए. विजय विनीत जैसी कहानियां बताती हैं कि जिनमें जिजीविषा है, वो मौत को मात देकर उठ खड़े होते हैं. तो, समझिए बूझिए सब कुछ, पर जिजीविषा तगड़ी वाली बनाकर रखिए. जैजै भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 4 August 2020


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भोपाल। सदाबहार गायक, अभिनेता किशोर कुमार की आज मंगलवार को जंयती है। बॉलीवुड की फिल्मों में कई शानदार गानों को अपनी आवाज देने वाले किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था और उनका निधन 13 अक्टूबर को 1987 में हुआ। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। बॉलीवुड में कई सिंगर्स आए और गए लेकिन किशोर कुमार की आवाज का जादू आज भी बरकरार है। किशोर कुमार अभिन्न प्रतिभा के धनी थे। इसके अलावा वो व्यवहार से मजाकिया और मस्तमौला किस्म के इंसान थे। अब किशोर कुमार तो हमारे बीच नहीं पर उनकी यादें आज भी जिंदा हैं।   किशोर कुमार की जयंती पर आज उन्हें हर कोई याद कर रहा है। आम आदमी से लेकर राजनेता तक उन्हें याद कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किशोर कुमार को जयंती पर स्मरण कर उन्हें नमन किया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा ‘जिंदगी के हर पल को जिंदादिली के साथ जीने वाले, महान गायक, अभिनेता स्व. किशोर कुमार की जयंती पर नमन। वह बहुत शान से 'किशोर कुमार खंडवे वाले' कहते हुए अपना परिचय देते थे। अपनी जड़ों से इतना प्रेम करने और सदा जुड़े रहने वाले अपने रत्न को मध्यप्रदेश कभी विस्मृत न कर सकेगा।   भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने संदेश में कहा ‘चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना...हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, संगीतकार, निर्माता-निर्देशक और साथ में एक उम्दा पाश्र्व गायक श्री किशोर कुमार जी की जयंती पर सादर नमन...।   गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपने ट्वीट में कहा ‘मप्र की माटी के सपूत किशोर कुमार जितने अच्छे गायक थे, उतने ही जिंदादिल इंसान। उनकी गाने की शैली अद्वितीय थी।

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Dakhal News 4 August 2020


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एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिव्री शुल्क के किराने का सामान उपलब्ध वाराणसी : कोरोना महामारी के ऐसे मुश्किल समय में वाराणसी में रहने वाले लोगों के लिए एक ख़ुशखबरी है। अब ग्राहकों को घर बैठे एमआरपी से कम दाम पर और बिना किसी डिलिवरी शुल्क के किराने का सामान ऑर्डर फ़रमाइए द्वारा घर पर डिलिवर करवाया जाएगा। ग्राहकों को बस व्हाट्सएप या कॉल करके अपना ऑर्डर देना होगा और चंद मिनटों में उनके घर सामान पहुँचाया जाएगा। ऑर्डर फ़रमाइए के संस्थापक श्री जितेश पांडेय और राहुल अग्रहरी हैं। जितेश पांडेय ने बताया कि ‘जिस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री जी का कहना है कि हमें आपदा को अवसर में बदलना है तो इसी बात से प्रेरणा लेते हुए हमने इस कंपनी की शुरुआत की। अभी हम ऑर्डर फ़ोन और वट्सऐप द्वारा ले रहे हैं और जल्द ही हम इसकी ऐप भी लॉंच करेंगे’। राहुल अग्रहरी का कहना है ‘ऑर्डर फ़रमाइए के द्वारा हम लोगों की समस्या का निवारण करना चाहते हैं। हम जानते हैं कि इस वैश्विक बीमारी के समय में लोग अपने घरों से बहुत कम निकलना चाहते हैं क्यूँकि सबके मन में डर बैठा हुआ है। हम लगातार प्रयास कर रहे हैं कि लोगों की ज़रूरतों का सामान उचित तरीके से सेनेटाइज़ करके उनको उपलब्ध करवाया जा सके जिससे लोगों को किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े’।

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Dakhal News 30 July 2020


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तो क्या सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के बाद भी होगा कोरोना! दुनिया को ज्ञान देने वाले अमिताभ, शिवराज, सिकेरा जैसों ने क्या कोरोना से बचने के लिए एहतियात नहीं बरती थी! उठने वाले तमाम सवाल वाजिब भी हैं। तर्कपूर्ण सवालों के पीछे कोरोना से बचाव की जिज्ञासा और भय है। लेकिन सियासी प्रतिद्वंद्विता में बीमार का मज़ाक उड़ाने की मंशा बेहूदगी लगती है। ये सच है कि ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो ना सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग का खूब पालन कर रहे थे बल्कि दूसरों को भी जागरुक कर रहे थे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और चर्चित पुलिस अफसर नवनीत सिकेरा समेत दर्जनों ऐसे लोग कोरोना से संक्रिमित हो चुके हैं। अब इन दो बातों में एक बात तो सही होगी ही। या तो ये कि जितनी भी एहतियात कर लो फिर भी आप इस संक्रमण का शिकार हो सकते हैं। दूसरी बात कि अमिताभ और शिवराज जैसी देश दुनिया की तमाम खास हस्तियों ने सोशल डिस्टेंसिंग और तमाम एहतियातों को बरतने में लापरवाहियां कीं। ये लोग दुनियां को कोविड से बचने का ज्ञान देते रहे किंतु खुद ही जागरूक नहीं थे ! कोरोना के भय, मुसीबतों और इस पर डिबेट में ऐसी बातें भी चर्चा का विषय बनी हैं। इस संजीदा और बुरे वक्त में संक्रमित बड़ी.हस्तियों का मजाक उड़ाने वालों की भी कमी नहीं है। आम इंसान ही नहीं खास लोग भी कोरोना पीड़ित ख़ास लोगों का मज़ाक उड़ा रहे हैं। राजनीति कर रहे हैं। कोरोना पीड़ित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सवाल पूछा है कि क्या आपने सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं रखा था ! दिग्विजय के अलावा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी खोने वाले कमलनाथ ने भी ट्वीट करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर तंज़ कसा है। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले कोरोना काल में ही मध्यप्रदेश के सियासी घटनाक्रम में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार चली गयी थी और यहां भाजपा की सरकार बनी जिसमें शिवराज सिंह चौहान पुनः मुख्यमंत्री बनाये गये। कांग्रेस ने आरोप लगाये थे कि भाजपा ने खरीद-फरोख्त कर उनके विधायकों को तोड़ कर सरकार गिरवायी। जाहिर सी बात है कि सूबे के कांग्रेसी दिग्गजों को अपनी सरकार के गिरने का मलाल होगा ही। ये कुंठा कहिए या प्रतिशोध की भावना कहिए, अब कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का मज़ाक उड़ा रहे हैं। महामारी से जूझ रहे देश के संकटकाल में गंदी सायासत का आलम ये है कि संक्रमितों का उपहास उड़ा जा रहा है। बिहार भाजपा कार्यालय और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कुछ पदाधिकारियों को कोरोना होने पर व्यंग्य किये गये। इसके अतिरिक्त एक मीडियों समूह के कार्यालय से लेकर बिग बी के बंगले जलसा में संक्रमण फैलने को भी कुछ लोगों ने मजाक में लिया। हांलाकि कोई वर्ग, कोई क्षेत्र और पेशा कोविड के कहर से छूटा नहीं है। लेकिन जब जागरूकता की बात करने वाले और लापरवाही पर एतराज करने वाले इसका शिकार होते हैं तो ऐसे लोगों को सोशल मीडिया में खूब निशाने पर लिया जाता है। सिंगर कनिका कपूर और मरकज के जमातियों का भी जिक्र होता है। तर्क दिया जाता है कि कोरोना काल के शुरुआती दौर में कनिका और जमातियों के संक्रमित होने पर उन्हें लापरवाह बताया गया था। और अब ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जो कहते थे कि ये वायरस लापरवाही करने से क़ाबिज होता है। नवेद शिकोह

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Dakhal News 30 July 2020


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अजय कुमार, लखनऊ लखनऊ। पांच अगस्त को अयोध्या में प्रभु राम की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन के साथ ही हिन्दुस्तान की सियासत का एक महत्वपूर्ण पन्ना बंद हो जाएगा। तीन दशकों से भी अधिक से समय से देश की सियासत जिस ‘मंडल-कमंडल’ के इर्दगिर्द घूम रही थी, वह अब इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। मंडल यानी पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बना आयोग और कमंडल मतलब आयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा चलाया गया अभियान। मंडल-कमंडल की सियासत ने अगड़े-पिछड़े के नाम पर हिन्दुओं में बड़ी फूट डाली थी और इसके लिए संविधान को मोहरा बनाया गया था। दरअसल, 1931 की जनगणना के हिसाब से देश में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जनसंख्या 52 फीसदी और अनुसूचित जाति (एससी) की 16 एवं व अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 7.5 प्रतिशत थी। एससी और एसटी वर्ग को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता था, जबकि पिछड़ा समाज के लोग अपने लिए भी आरक्षण चाहते थे। इसकी वजह थी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 (4), जो कहता है कि सरकार पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है। बहरहाल, जब तत्कालीन केन्द्र सरकार पर पिछड़ों को आरक्षण के लिए काफी दबाव पड़ने लगा तो प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग गठित कर दिया। 1978 में बने बी पी मंडल आयोग ने 12 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट मोरारजी सरकार को सौंपते हुए जनसंख्या के हिसाब से ओबीसी को 52 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन इन सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। जब मंडल आयोग ने सिफारिश की थी तब मोरारजी देसाई की ही सरकार थी, जो आपसी खींचतान के चलते अपना कार्यकाल पूरा किए बिना गिर गई थी। मोरार जी की सरकार गिरने के बाद हुए लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने लेकिन बोफोर्स घोटाले के कारण जनता में भरोसा खो दिया और एकजुट विपक्ष ने उन्हें चुनाव में पटखनी दे दी। तत्पश्चात वी पी सिंह संयुक्त मोर्चे के प्रधानमंत्री बने। मोर्चे में देवी लाल, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे जो अपने आप को पिछड़ों का नेता कहते थे और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होते हुए देखना चाहते थे। प्रधानमंत्री वीपी सिंह के सामने हालात यह बन गए कि अगर मंडल कमीशन लागू नहीं किया तो उक्त नेता उनकी सरकार गिरा देंगे। इसी दबाव के बीच वीपी सिंह ने 7 अगस्त 1990 को मंडल कमीशन की रिपोर्ट की धूल झाड़ी और 13 अगस्त 1990 को इसे लागू कर दिया। लेकिन इसके कुछ दिनों के बाद इन नेताओं ने वीपी की सरकार गिरा कर ही चैन लिया। उधर, मंडल कमीशन लागू होते ही 12 सितंबर 1990 को दिल्ली में बीजेपी की मीटिंग बुला ली गई। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के तुरंत बाद ही भाजपा ने कमंडल अर्थात अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनवाने की लड़ाई अपने हाथों में ले ली। भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा शुरू करने का एलान कर दिया। आडवाणी की इस यात्रा को मंडल की काट के रूप में देखा गया। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 52 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से देशभर में सवर्णों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। यह ऐसा दौर था जब उत्तर भारत की जाट, पटेल, मराठा जैसी बड़ी किसान जातियां सवर्णों के साथ विरोध प्रदर्शन में भाग ले रही थी तो दूसरी तरफ ‘आओ अयोध्या चलें’ वाले कमंडल के नारों के साथ जयकारे लगा रही थी। इसी बीच मंडल कमीशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को अपने फैसले में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण न करने की बात कहकर 52 फीसदी ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण तक सीमित कर दिया व एक लाख रुपये से ज्यादा आय वालों को क्रीमीलेयर की श्रेणी में डाल दिया, जो आज तक बदस्तूर जारी है। उधर, अन्य सियासी घटनाक्रम में एक तरफ लालू यादव व मुलायम सिंह यादव कमंडल का विरोध करते हुए मुसलमानों के नेता बन गए थे तो दूसरीं तरफ इन नेताओं ने यादवों को आरक्षण दिलवाकर उनका भी विश्वास जीत लिया। लेकिन समय के साथ मंडल की आग धीमी पड़ती गई और बीजेपी अयोध्या मुद्दे को गरमाती रही। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद हिन्दुओं में जो खाई पैदा हो गई थी, उसे कमंडल की राजनीति ने पूरी तरह से पाट दिया और पूरा हिन्दू समाज एकजुट होकर मंदिर निर्माण के पक्ष में खड़ा हो गया। इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और बीजेपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बहरहाल, पांच अगस्त को भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन के साथ बीजेपी की कमंडल की सियासत भी खत्म हो जाएगी। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि मंदिर निर्माण के साथ ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच की खाई भी खत्म हो जाएगी क्योंकि मंदिर के साथ मस्जिद का भी निर्माण हो रहा है। यह काफी सौहार्दपूर्ण स्थिति है।   ऐसा लगता है कि अयोध्या में श्री राम मंदिर के भव्य निर्माण के साथ ही देश में सांप्रदायिक समरसता का भी नया युग प्रारम्भ हो जाएगा। तीन दशकों से जन्मभूमि विवाद के कारण देश के सांप्रदायिक सद्भाव को गहरी चोट पहुंच रही थी। गत वर्ष नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवाद के समाधान के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों पक्षों ने जिस सहिष्णु मानसिकता के साथ सारे पूर्वाग्रह त्यागकर इसे स्वीकार किया, उसने पूरी दुनिया को चौंकाया जबकि दशकों से इसे मुद्दा बनाकर वोटबैंक राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को निराश किया। इससे यह धारणा भी पुष्ट हो गई कि मंदिर-मजिस्द के नाम पर राजनीति दल और कारोबारी मानसिकता के संगठन स्वार्थ सिद्ध कर रहे थे, दोनों पक्षों के आम लोगों की विवाद बढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी। लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Dakhal News 28 July 2020


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  एक बड़े कॉलेज के मैनेजिंग डायरेक्टर से बात हुई। हालचाल पूछा तो बोले- हाल तो बेहाल हैं। कोरोना के चलते हॉस्टल खाली हैं। छात्र गायब हैं, छात्रों ने फीस नहीं दी है। एडमिशन का समय है, लेकिन नए छात्र रजिस्ट्रेशन भी नहीं करवा रहे हैं। कमाई पूरी तरह ठप है। कहां से दें अध्यापकों और बाकी कर्मचारियों का का वेतन। बोले-भाई साहब ऐसा ही चलता रहा तो 70 फीसदी प्राइवेट कॉलेज बंद हो जाएंगे। प्राइवेट कॉलेज के अध्यापक आत्महत्या पर मजबूर हो जाएंगे।   कुछ दिन पहले एक मित्र का फोन आया था। कस्बाई इलाके में इंटर तक प्राइवेट स्कूल चलाते हैं। छात्रों ने स्कूल में आना बंद कर दिया तो अभिभावकों ने फीस भी बंद कर दी। अध्यापक से लेकर चपरासी तक पैदल हो गए। मुझसे कहा-सर मीडिया में ये बात उठवाइए, बेलआउट पैकेज तो स्कूल और कॉलेजों को मिलना चाहिए।     मेरे बहुत ही घनिष्ठ मित्र एजुकेशन के बिजनेस में हैं । उनके लाखों रुपये तमाम मेडिकल कॉलेजों में फंसे हैं। कॉलेज पैसे नहीं दे पा रहे हैं और इस पेशे में इतना बैक अप नहीं होता कि वो बहुत दिनों तक अपने पास से कर्मचारियों को वेतन दे पाएं।   गाजियाबाद के एक डेंटल कॉलेज की हालत ये है कि वहां चार महीने से स्टाफ को वेतन नहीं मिला है। मैनेजमेंट ने कह दिया है कि आप चाहे आएं या न आएं आपकी मर्जी। हम तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं हैं। कॉलेज में फीस नहीं आ रही है। नीट का इम्तिहान भी आगे बढ़ गया है, जाने कब इम्तिहान होगा, कब नतीजे आएंगे और कब छात्र कॉलेज पहुंचेंगे। नए एडमिशन हो नहीं रहे हैं, कॉलेज में पैसे कहां से आएं। तमाम प्राइवेट स्कूल-कॉलेजों की हालत खस्ता है। प्राइवेट कॉलेज के कई अध्यापक अब सब्जी और फल बेच रहे हैं। ऐसी खबरें रोज आ रही हैं।   उन अभिभावकों की भी हालत खराब है, जो प्राइवेट नौकरी में रहते हुए छंटनी के शिकार हो गए या फिर बिजनेस में थे और कोराना काल के लॉकडाउन में उनके बिजनेस की रीढ़ ही टूट गई। जिंदगी में दो जून की रोटी के लाले पड़ गए तो बच्चों की फीस का इंतजाम कहां से करें..? ये लोग और आर्थिक दुष्चक्र में फंसे कॉलेज मालिक हर रोज एक नई सुबह का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अंधेरा छंटने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोरोना से बच भी गए तो इस अंधेरे से बचने का उनके पास रास्ता क्या है..?   ये हालत उन मेडिकल, इंजीनियरिंग और सामान्य प्राइवेट कॉलेजों की है, जिनमें फीस अपेक्षाकृत कम है, जो बहुत मशहूर नहीं हैं। जो ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में हैं। जो बड़े शहरों में फाइव स्टार स्कूल और कॉलेज हैं, वहां ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चों की 4-4 घंटे तक ऑनलाइन क्लास चल रही है। बच्चे पस्त हो जा रहे हैं, गार्जियन के सामने नए-नए बहाने बना रहे हैं। बच्चे अवसाद के शिकार भी हो रहे हैं।   ऐसे स्कूलों में फीस न देने का कोई रास्ता नहीं है। कोई मुरव्वत नहीं, फीस नहीं तो नाम कट। अब जहां-तहां से इंतजाम करके लोग फीस भर रहे हैं। यही नहीं तमाम स्कूल तो तय सीमा से ज्यादा फीस ले रहे हैं। वाहन बंद हैं, लेकिन उसकी फीस भी ली जा रही है। स्कूल प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि कोरोना काल में अभिभावक संगठित नहीं हो सकते तो इनकी पहले भी चांदी थी, अब भी चांदी है।   मेरे पुत्र भी एक फाइव स्टार प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं। कर तो रहे हैं बीए ऑनर्स, लेकिन फीस देते वक्त मुझे इंजीनियरिंग और मेडिकल में बेटे को पढ़ाने का गौरव महसूस होता है। सैमेस्टर की फीस जमा करने के लिए यूनिवर्सिटी सिर्फ 2 दिन का वक्त देती है। वो भी बिना पूर्व सूचना के। फीस में एक दिन की भी देरी हुई तो लेट पेमेंट के नाम पर करीब हजार रुपये का चूना। ज्यादा देर हो गई तो दोगुनी फीस भी देनी पड़ सकती है।   उन तमाम मध्यमवर्गीय, निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है, जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं। सबकी ऑनलाइन क्लास एक ही वक्त चलनी है। घर में पहले एक स्मार्ट फोन था तो अब जरूरत उससे ज्यादा की है। स्मार्ट फोन पर ऑनलाइन क्लास तो सजा ही है, सही मायने में तो लैपटॉप चाहिए। लेकिन 3-4 बच्चों के लिए 3-4 लैपटॉप का इंतजाम अभिभावक कैसे करेंगे..? अभी एक खबर आई है कि एक आदमी ने अपनी गाय बेचकर बच्चे के लिए मोबाइल खरीदा ताकि बेटा ऑनलाइन पढ़ाई कर ले। अब वो शख्स हर महीने मोबाइल डाटा रिचार्ज करने का पैसा कहां से लाएगा, भगवान जाने।   मेरठ में मेरे एक परिचित के तीन बच्चे हैं, तीनों की क्लास एक ही वक्त शुरू हो जाती है, अड़ोस-पड़ोस से मोबाइल मांगकर लाते हैं। घर में एक लैपटॉप है, उसको लेकर झगड़ा मचता है। मेरी एक पूर्व साथी ने कॉल करके बोला- सर ये स्कूल वाले तो बच्चों की जान ले लेंगे। गाइडलाइन है कि 8वीं तक के छात्रों की ऑनलाइन क्लास डेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन स्कूल वाले तो 3 से 4 घंटे तक बेटी को पीस रहे हैं। बेटी शायद दूसरी या तीसरी क्लास में पढ़ रही है।   कोरोना काल में अभिभावक की हालत ये है कि जैसे बच्चा पैदा करना अपराध हो गया है। वहां मुश्किल और भी ज्यादा जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी में हैं। उन्हें अपने काम पर जाना है और बच्चे को ऑनलाइन क्लास भी अटेंड करनी है। माता-पिता की गैरमौजूदगी में इंटरनेट पर बच्चा अपनी क्लास के अलावा क्या-क्या देख सकता है, खतरा आप समझ सकते हैं। वो भी बच्चे को किसके भरोसे छोड़कर जाएं..? अब जरा सरकारी स्कूलों का हाल भी सुनिए। यूपी के प्राइमरी टीचर्स को राशन कार्ड पर मुफ्त राशन बंटवाने की जिम्मेदारी दी गई है। मेरी एक मित्र प्राइमरी स्कूल में अध्यापक है। एक दिन फोन पर बता रही थी-मुफ्त राशन उन्हीं को मिल रहा है, जिनके पास राशन कार्ड है, लेकिन जो वाकई जरूरतमंद हैं, उनमें से ज्यादातर के पास न तो राशन कार्ड हैं और न ही उन्हें राशन मिल रहा है। स्कूल भी चल रहा है, ऑनलाइन पढ़ाना है। अब अगर घर में स्मार्ट मोबाइल फोन की हैसियत होती तो वो सरकारी स्कूलों में क्यों पढ़ते। मेरी मित्र बता रही थी कि 40 बच्चों की क्लास में बमुश्किल दो बच्चों के घर मोबाइल फोन है। पढ़ाई भगवान भरोसे है।   आजतक न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से। विकास मिश्र

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Dakhal News 28 July 2020


bhopal, revised media policy,being implemented, destruction of Corona!

नवेद शिकोह कोराना के मुश्किल दौर में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संशोशित ‘मीडिया नीति 2020’ एक अगस्त से लागू होने जा रही है। ये देश के हजझारों मझौले अखबारों को महा कोरोना बन कर डराने लगी है। हिन्दी पट्टी के सार्वाधिक अखबारों वाले उत्तर प्रदेश में इसका सबसे अधिक खौफ है। इस सूबे से प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया के सदस्य संशोधित नीति के खिलाफ बगावती तेवर दिखा रहे है। मंझोले अखबारों पर लटकटी तलवार से प्रदेश की राजधानी के लगभग एक हजार राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों में सैकड़ों पत्रकारों की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए यहां पत्रकार मीडिया संगठनों के नेताओं पर दबाव बना रहे हैं कि वो संशोधित मीडिया नीति के खिलाफ आवाज उठायें। इस संशोधित नीति के तहत पच्चीस से पैतालिस हजार के बीच प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को आर.एन.आई. या एबीसी की जटिल जांच करानी होगी। इस जांच में मंहगी वेब प्रिंटिंग मशीन, न्यूज प्रिंट(अखबारी क़ागज) और इंक इत्यादि की डिटेल, कार्यालय स्टॉफ, पीएफ, प्रसार डिस्ट्रीब्यूशन के सेंटर आदि का विवरण देना होगा। कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्रों के लिए ऐसी अग्नि परीक्षा देना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता के लिए पच्चीस हजार से अधिक प्रसार होना ज़रूरी है। यदि मंझोले अखबार जांच से बचने के लिए अपने अखबारों का प्रसार पच्चीस हजार से कम करके लघु समाचार पत्र के दायरे में आ जाते हैं तो ऐसे अखबारों के सैकड़ों पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता समाप्त हो जायेगी। इसलिए यूपी के मीडिया संगठनों पर प्रकाशक और पत्रकार ये भी दबाव बना रहे हैं कि वे योगी सरकार से प्रेस मान्यता के मानकों को संशोधित करवाना का आग्रह करें। ताकि संशोधित मीडिया नीति के तहत जांच से बचने के लिए मझोले वर्ग से लघु समाचार पत्र के दायरे में आने वाले समाचार पत्रों के पत्रकारों की मुख्यालय मान्यता बच जाये।   इन तमाम घबराहट, बगावत, सियासत और विरोध के बीच प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य अशोक नवरत्न और रज़ा रिज़वी केंद्र सरकार के सूचना एंव प्रसारण मंत्रकालय के फैसले के खिलाफ प्रकाशकों और पत्रकारों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कुछ मीडिया संगठनों ने भी संशोधित नीति का विरोध करना शुरु कर दिया है। इसे छोटे अखबारों को खत्म करने की साजिश बताया जा रहा हैं। चर्चा ये भी है कि देश के चंद बड़े अखबारों ने स्थानीय अखबारों को खत्म करने के लिए ऐसी साजिश रची है। सोशल मीडिया पर प्रकाशकों और कलमकारों का विरोध मुखर हो रहा है- हर क्षेत्र की बड़ी ताकतें होती हैं। ऐसी शक्तियां अपने क्षेत्र की संघर्षशील प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहतीं। जैसा कि उभरते हुए फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की आत्महत्या की वजह के पीछे फिल्म उद्योग की बड़ी ताकतों को शक की निगाहों से देखा जा रहा है। ताकत की ताकत से दोस्ती होती है। बड़ी मीडिया इंडस्ट्रीज की हर सरकार से दोस्ती रही है। दोस्त दोस्त के काम भी आता है। इन दिनों कोरोना काल की तबाही में तबाह होती हर इंडस्ट्री की तरह मीडिया की अखबारी खर्चीली ब्रॉड इंडस्ट्री बुरी तरह आर्थिक मंदी का शिकार है। कई संस्करण बंद कर दिए, पेज भी कम कर लिए। छंटनी कर ली। वेतन आधा कर दिया। कांट्रेक्ट पर काम कर रहे मीडियाकर्मियों का रिनिवल बंद कर दिया। कॉस्ट कटिंग और छट्नी की तलवाल भी चला दी, लेकिन फिर भी कमाई के मुख्य द्वारा लगभग बंद हैं। वजह साफ है। मीडिया में सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन ही अर्निंग के दो रास्ते होते हैं। कोरोना की चपेट में ये आधे हो गये हैं। सरकार आने वाले समय में विज्ञापन जैसे खर्चों का खर्च और भी कम कर सकती है। गैर सरकारी विज्ञापन आधे से भी कम हो गया है। कार्पोरेट के कामर्शियल विज्ञापनों से लेकर वर्गीकृत विज्ञापन बेहद कम हो गये हैं।अब कैसे अपने बड़े खर्च पूरे करें ! कैसे विज्ञापन का स्त्रोत बढ़ायें ! इस फिक्र में बड़े ब्रॉड अखबारों को एक रास्ता सूझा होगा ! विज्ञापनों के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे लोकल अखबारों के हिस्से में चला जाता है। ये खत्म हो जायें या लघु वर्ग में पंहुचकर इनकी विज्ञापन दरें बेहद कम हो जायें तो सरकारी विज्ञापन के अधिकांश बजट पर बड़े अखबारों का कब्जा हो जायेगा। ये डूबते को तिनके का सहारा होगा। शायद इसी लिए ही देश के बड़े मीडिया समूहों के दबाव में इस कोरोना काल के तूफान में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संशोधित मीडिया पॉलिसी लागू कर रहा है।नहीं तो ऐसे वक्त में जब पीआई बी में नियमित अखबार जमा होने का सिलसिला तक चार महीने से रुका है। आर एन आई ने तीन महीने विलम्ब से एनुअल रिटर्न का सिलसिला शुरू किया। देश में सबकुछ अस्त-वयस्त है। पुराने जरूरी रुटीन काम तक बंद है। सूचना मंत्रालय के अधीन कार्यालय में ही कोरोना संक्रमण से बचाव के मद्देनजर शेडयूल वाइज थोड़े-थोड़े कर्मचारी बुलाये जाते हैं। ऐसे में देश के सैकड़ों अखबारों और सैकड़ों कर्मचारियों को फील्ड में निकल कर इकट्ठा होने का नया काम देने वाली नई संशोधित मीडिया पॉलिसी को हड़बड़ी में लागू करने का क्या अर्थ है ! नियमानुसार मीडिया पॉलिसी संशोधन से पहले प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया की सहमति लेना जरुरी होती है, किंतु कौंसिल के सदस्य आरोप लगा रहे हैं कि इस संबंध में उनसे परामर्श के लिए कोई बैठक तक नहीं हुई। उत्तर प्रदेश से कौंसिल के सदस्य सवाल उठा रहे हैं कि कोरोना काल में कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्र जो पहले ही आर्थिक तंगी से बेहाल हैं ऐसे में उनपर जांच थोपने का क्या अर्थ है। ऐसे में देश के कोरोना काल में मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के प्रकाशकों को एक नया कोरोना डराने लगा है। कोविड 19 वाले कोरोना वायरस की चपेट वाले तीन फीसद को जान का खतरा और 97% को ठीक होने की उम्मीद होती है। लेकिन यहां अखबार के प्रकाशकों को जिस नये कोरोना का डर सता रहा है उसमें 97% को खत्म हो जाने का डर है।   पब्लिशर्स को डराने वाले कोरोना संशोधित मीडिया पॉलिसी के अंतर्गत मंझोले वर्ग के प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को निर्देश दिया गया है कि इन्हें आर.एन.आई या ए बी सी की जटिल जांच की अग्नि परीक्षा से ग़ुजरना होगा। तब ही मध्यम वर्गीय प्रसार संख्या वर्ग में सरकारी विज्ञापन की दर बर्करार रहेगा, अन्यथा इनकी डीएवीपी की मान्यता समाप्त कर दी जायेगी। जांच ना कराने की स्थिति में प्रकाशकों के पास एक मौका है। वो पच्चीस हजार के ऊपर के प्रसार का दावा छोड़कर पच्चीस हजार के अंदर प्रसार का ही दावा करें। यानी लघु समाचार के वर्ग में आकर वो कम विज्ञापन दरों में ही संतोष करे, अन्यथा जांच करायें। जो ज्यादातार प्रकाशकों के लिए मुम्किन ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए प्रकाशक कह रहे हैं कि जांच का ये कोरोना हमें मार देगा !

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Dakhal News 28 July 2020


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सूर्या समाचार सहित कई न्यूज़ चैनलों में बतौर एंकर और प्रोड्यूसर काम करने वाली दीप्ति यादव इन दिनों अपने पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेढ़क’ से वापसी कर चुकी है और पूरी तरह सक्रिय है। 9 जुलाई को लांच हुए इस पॉडकास्ट चैनल की लोकप्रियता को देखते हुए इसे स्पॉटीफाई सहित 6 प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया है। इस चैनल के जरिये दीप्ति यादव युवा कवियों और लेखकों की रचनाओं और कहानियों को बिल्कुल अलग अंदाज में पेश करती हैं। इसके अलावा वह खुद की कविताओं को भी बेहद रोचक तरीके से पेश करती हैं। इस तरह यह प्लेटफॉर्म गलियों और मोहल्लों के युवा लेखकों को प्रमोट करने का एक माध्यम बनता जा रहा है। उनके पॉडकास्ट चैनल ‘मन का मेंढक’ का नाम जितना दिलचस्प है उतना ही दिलचस्प है इस चैनल का हर एक एपिसोड का कंटेंट। फिलहाल दीप्ति यादव खुद इसका कंटेंट भी लिख रही है, एडिटिंग भी कर रही है, आवाज़ भी दे रही है और सबसे खास बात इसके हर एपिसोड में एक मेंढक भी आता है जिसकी आवाज़ भी खुद दीप्ति ही दे रही हैं। हमेशा एंकर के रूप में दिखने वाली दीप्ति इन दिनों कविताएं भी लिख रही है और कवि सम्मेलनों में अपने एंकर और रेडियो जॉकी अंदाज़ को समावेशित कर बेहतरीन प्रस्तुति भी दे रही है। एक वॉइस ओवर आर्टिस्ट के तौर पर अब तक कई सारे कमर्शियल ऐड का चुकी है फ़िलहाल कुछ कार्टून कैरेक्टर के वॉइस ओवर के लिए भी कई कंपनियों से उनकी बात चल रही है। पॉडकास्ट एक नए तरीके का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जिसमें खुद का रेडियो चैनल बना कर अपनी रचनात्मकता को नया आयाम दिया जा सकता है। इसे आवाज की दुनिया का टिकटॉक कहा जा सकता है। यूपी के उन्नाव जैसे छोटे शहर से निकली और कानपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने वाली दीप्ति रेडियो से भी बेहद प्यार है और इसी रेडियो को उन्होंने पॉडकास्ट में बेहतर उतारा है। उनके पॉडकास्ट चैनल की तारीफ ‘भाभी जी घर पर हैं’ के टिल्लू यानी सलीम ज़ैदी भी कर चुके है। 2019 में सूर्या समाचार में कार्यरत दीप्ति यादव ने स्वास्थ्य कारणों के चलते चँनेल से इस्तीफा दिया था। लॉकडाउन के दौर में जब मीडिया सेक्टर में जबर्दस्त छंटनी का दौर चल रहा है, दीप्ति ने दिखाया है कि अगर आपके अंदर रचनात्मकता और आईडिया है तो आपके पास विकल्पों की कमी नही है। सोशल मीडिया के इस जमाने में खुद को साबित करने के लिए किसी बड़े बैनर की जरूरत नही और न ही किसी एकलव्य की तरह किसी को अंगूठा काट के देने की विवशता झेलनी पड़ती है। आप भी उनके इस प्लेटफॉर्म से जुड़ सकते हैं और सुझाव भी दे सकते हैं.. आपका स्वागत है.

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Dakhal News 23 July 2020


bhopal, Keep , Indian media, silly joke,shamiana!

एक बादशाह ने रफूगर रखा हुआ था, जिसका काम कपड़ा रफू करना नहीं, बातें रफू करना था. एक दिन बादशाह दरबार लगाकर शिकार की कहानी सुना रहे थे, जोश में आकर बोले – एकबार तो ऐसा हुआ मैंने आधे किलोमीटर से निशाना लगाकर जो एक हिरन को तीर मारा तो तीर सनसनाता हुआ हिरन की बाईं आंख में लगकर दाएं कान से होता हुआ पिछले पैर के दाएं खुर में जा लगा. जनता ने कोई दाद नहीं दी. वो इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे. इधर बादशाह भी समझ गया ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी छोड़ दी.. और अपने रफूगर की तरफ देखने लगा… रफूगर उठा और कहने लगा.. हज़रात मैं इस वाक़ये का चश्मदीद गवाह हूँ, दरसल बादशाह सलामत एक पहाड़ी के ऊपर खड़े थे हिरन काफी नीचे था, हवा भी मुआफ़िक चल रही थी वरना तीर आधा किलोमीटर कहाँ जाता है… जहां तक बात है ‘आंख’ , ‘कान’ और ‘खुर’ की, तो अर्ज़ करदूँ जिस वक्त तीर लगा था उस वक़्त हिरन दाएं खुर से दायाँ कान खुजला रहा था,… इतना सुनते ही जनता जनार्दन ने दाद के लिए तालियां बजाना शुरू कर दीं… अगले दिन रफूगर बोरिया बिस्तरा उठाकर जाने लगा… बादशाह ने परेशान होकर पूछा– कहाँ चले? रफूगर बोला- बादशाह सलामत मैं छोटी मोटी तुरपाई कर लेता हूँ, शामियाना सिलवाना हो तो इंडियन मीडिया को रख लीजिए!

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Dakhal News 23 July 2020


bhopal, Supreme Court, angry, Prashant Bhushan , tweet

Pushya Mitra : अगर यह अवमानना है तो सोचता हूँ, थोड़ी सी सविनय अवमानना मैं भी कर लूं। खबर है कि इस ट्वीट के लिये प्रशांत भूषण जी पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा हुआ है। Vijay Shankar Singh : सीजेआई जस्टिस बोबड़े की एक फोटो एक महंगी मोटर बाइक पर खूब चर्चित हुयी और उसी का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट कर दिया। अब उस ट्वीट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की नोटिस जारी कर दी है। यह भी खबर थी कि वह बाइक एक भाजपा नेता की थी, और जस्टिस बोबडे बिना हेलमेट के उस बाइक पर बैठे थे। न्यायमूर्ति अरुण मिश्र अवमानना पीठ के अध्यक्ष हैं। यह मामला वह सुनेंगे। प्रशांत भूषण का ट्वीट इस प्रकार है,CJI rides a 50 Lakh motorcycle belonging to a BJP leader at Raj Bhavan Nagpur, without a mask or helmet, at a time when he keeps the SC in Lockdown mode denying citizens their fundamental right to access Justice! इस ट्वीट में कौन से तथ्य मिथ्या हैं ? बाइक बीजेपी के नेता की है, सीजेआई, न तो मास्क लगाए हैं, और न हैलमेट। लॉक डाउन चल भी रहा था और अदालतें बंद भी थीं। फिर यह खुन्नस है या सच मे अदालत की तौहीन अब यह जब अदालत तय करे तो पता चले ! Jitendra Narayan : केवल प्रशांत भूषण पर ही क्यों? हम सब पर भी चलाओ अवमानना का केस…देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप मे आपकी हरकतें निंदनीय है और मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा के खिलाफ है…आपके दिए कई फैसले भी पूर्णतः पक्षपातपूर्ण और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है!

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal, car of criminals , shot journalist, head, front daughters

Vikas Mishra : गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी पर गोली चलाने वाले पकड़े गए हैं। पुलिस ने 9 बदमाशों को गिरफ्तार किया है। आमतौर पर बदमाशों के पैर में गोली मारकर गिरफ्तार करने वाली यूपी पुलिस ने इन अपराधियों को ‘रक्तहीन’ तरीके से गिरफ्तार किया है। पत्रकार विक्रम जोशी की भानजी के साथ कुछ बदमाश छेड़खानी कर रहे थे। इसकी रिपोर्ट लिखवाने वे गाजियाबाद के विजय नगर थाने गए थे। पुलिस ने रिपोर्ट तो नहीं लिखी। अलबत्ता रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश से खुन्नस खाए बदमाशों ने विक्रम जोशी पर ताबड़तोड़ गोलीबारी कर दी। एक गोली उनके सिर में लगी हुई है। अस्पताल में उनकी हालत गंभीर है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वो जल्द ही विक्रम जोशी को पूर्ण स्वस्थ करें। जिस वक्त बदमाशों ने विक्रम जोशी को गोली मारी, उस वक्त वे अपनी दो बेटियों के साथ टहलने निकले थे। बेटियां चिल्ला रही थीं, लेकिन अपराधियों पर खून सवार था। अब इन अपराधियों को अदालत, हवालात या जेल ले जाते वक्त अगर पुलिस की गाड़ी पलट जाए तो अपराधी जरूर पुलिस से पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश करेंगे। पुलिस पर गोली भी चलाएंगे। ऐसे में अगर पुलिस ‘आत्मरक्षार्थ’ उन्हें गोलियों से भून डालती है तो मैं व्यक्तिगत रूप से पुलिस का समर्थन करूंगा। यही नहीं, 24 घंटे बाद गिन लीजिएगा, मुझे यकीन है कि इस पोस्ट के कमेंट बॉक्स में आकर कम से कम 100 लोग इस बात का समर्थन करेंगे, जिनमें से ज्यादातर पत्रकार साथी होंगे। अगर पुलिस ऐसा कर पाई तो शायद अपना पाप भी धो सके। मुझे और मेरे तमाम पत्रकार साथियों को उम्मीद है कि बारिश के इस मौसम में गाजियाबाद पुलिस की गाड़ी जरूर फिसलेगी। नहीं फिसली तो भी पुलिस को ‘आत्मरक्षार्थ’ गोली चलाने का मौका जरूर मिलेगा। आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से।

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal, Journalist Vikram Joshi could not be saved

पत्रकार साथी विक्रम जोशी की इलाज के दौरान डेथ हो गई है। उनके भाई अनिकेत द्वारा ये जानकारी दी गई है। अनिकेत के अनुसार उन्हें आज सुबह 4 बजे इस बारे में बताया गया। भगवान विक्रम भाई की आत्मा को शांति दे। इस कठिन वक़्त में हम उनके परिवार के साथ खड़े हैं। विक्रम भाई को शहीद का दर्जा मिलना चाहिए। आरोपियों को मुठभेड़ में मारा जाना चाहिए। थाना प्रभारी पर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए जिसने पत्रकार द्वारा लिखित कंप्लेन दिए जाने के बावजूद आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। उधर, इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर दुख और क्षोभ व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 50 लाख रुपये की तात्कालिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में हेमंत तिवारी ने कहा कि की विगत एक वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमले, सरकारी उत्पीड़न, फर्जी मुकदमे लगाने की दर्जनों घटनाएं हुईं और हर बार शासन के वरिष्ठ अधिकारियों से बात हुई, पत्र लिखे गए लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि संवेदनशीलता नही दिखी । उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इस बार भी नकारात्मक रवैया अपनाती है तो पूरे प्रदेश पत्रकारों से संग्रह कराकर पीड़ित परिवार का सहयोग किया जाएगा ।परसों आपराधिक तत्वों ने गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की गोली मार दी थी जिनकी कल रात मौत हो गई है। जोशी को विजय नगर इलाके में स्कूटी सवार बदमाशों ने सोमवार को सिर में गोली मारी थी। इस सिलसिले में कल तक नौ लोगों को गिरफ्तार और चौकी इंचार्ज को निलंबित किया गया था।   विजयनगर बाईपास निवासी विक्रम जोशी एक समाचार पत्र से जुड़े थे। सोमवार रात वह माता कॉलोनी निवासी बहन के घर गए थे। रात करीब 10:30 बजे वहां से आते समय कुछ बदमाशों ने उन पर हमला बोल दिया। एक बदमाश ने तमंचा सिर से सटाकर विक्रम को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर हमलावर फरार हो गए। परिजनों के मुताबिक विक्रम जोशी के परिवार की एक लड़की के साथ छेड़छाड़ हुई थी। इस संबंध में थाने में नामजद शिकायत की गई थी। पुलिस द्वारा कार्रवाई न करने पर आरोपी पीड़ित पक्ष को लगातार धमकी दे रहे थे। विक्रम इस मामले की पुलिस में पैरवी कर रहे थे। इसी बात को लेकर आरोपियों ने उन्हें गोली मार दी।

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Dakhal News 22 July 2020


bhopal,Miscreants shot journalist, head ,Ghaziabad , opposing molestation

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में बदमाश इतने बेखौफ हो गए हैं कि वह पत्रकारों पर भी गोली चलाने लगे हैं। गाजियाबाद में पत्रकार ने अपनी भांजी के छेड़ने की तहरीर पुलिस को दी थी। पुलिस ने ना उसमें कार्यवाही की और ना ही किसी की गिरफ्तारी की। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने पत्रकार को गोली मार दी। पत्रकार जिंदगी और मौत से अस्पताल में लड़ रहा है। गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी का कसूर बस इतना था अपनी भांजी को लगातार छेड़ने वालों के खिलाफ थाने में तहरीर दी थी। तहरीर देने से नाराज बदमाशों ने बीती रात विक्रम को गोली मार दी। विक्रम के सिर में गोली लगी है। वह गंभीर हालत में यशोदा अस्पताल में भर्ती है। पुलिस का कहना है कि आरोपियों पर कार्रवाई की जाएगी। सवाल ये है कि अगर पुलिस पहले ही आरोपियों पर कार्रवाई कर देती तो शायद विक्रम आज अस्पताल में भर्ती ना होता। गाजियाबाद में बदमाश लगातार हावी हो रहे हैं और पुलिस हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। बदमाश अब पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाने लगे हैं। जब पत्रकार ने तहरीर दी थी तो फिर आरोपी कैसे खुलेआम घूमते रहे? पुलिस लापरवाही का नतीजा है कि बदमाशों ने इस तरह की दुस्साहसिक वारदात को अंजाम दे डाला। फिलहाल पत्रकार साथी विक्रम जोशी की तबियत नाज़ुक बनी हुई है।

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal,New phase of films on third screen

–रवि राय– दो महीने पहले तक मोबाइल पर मैंने कोई फ़िल्म नहीं देखी थी। लॉकडाउन के दौरान सिनेमाहाल बन्द हो गए। मित्रों की राय पर नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और सोनी लिव डाउनलोड किया। पता चला कि यहां एक अलग फिल्मी दुनिया बसी हुई है। मिर्ज़ापुर, पाताल लोक, रंगबाज़, द फैमिली मैन, आर्या, स्पेशल ऑप्स, असुर, बेताल, डेल्ही क्राइम , माधुरी टाकीज़, ब्रीद, ब्रीद इनटू द शैडो, अपहरण आदि कई फिल्में देख डालीं। आठ से बारह एपिसोड्स की इन फिल्मों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पंकज त्रिपाठी, मनोज बाजपेयी, माधवन, अमित साध, केके मेनन से लेकर सुष्मिता सेन, कल्कि, शेफाली शाह जैसे स्थापित कलाकार छाए हुए हैं। कोविड 19 के वर्तमान प्रकोप को देखते हुए यह तो स्पष्ट है कि सिनेमाहाल निकट भविष्य में खुलने वाले नहीं हैं।खुले भी तो कोरोना के डर से दर्शकों का टोटा ही रहेगा।ऐसी स्थिति में मोबाइल पर फ़िल्म देखने का यह दौर क्या ऐसे ही चलता रहेगा ? ज़ाहिर बात तो यही है कि कोरोना से पहले जब आम दर्शक के पास दोनों विकल्प थे, मोबाइल पर फ़िल्म देखना आम नहीं था।उच्च एवं मध्यवर्ग के दर्शकों के लिए हज़ार दो हज़ार के खर्च में परिवार के साथ हॉल में सीट पर बैठ कर फ़िल्म देखने का मज़ा ही कुछ और था।मगर फ़िल्म की असली कमाई टिकट खिड़की पर टूट पड़नेवाले सेकेंड क्लास, फर्स्ट क्लास, डीसी के दर्शकों से ही होती रही है। जैसे भी हो सिनेमा दर्शकों से हुई कमाई को ही बॉक्स ऑफिस का नाम दिया गया यानी सिनेमा की आमदनी। शुरुआती दिनों में सौ करोड़ को सफल और इससे भी अधिक की कमाई को सुपर-डुपर हिट कहा गया।सलमान, शाहरुख, आमिर आदि की कई फिल्में तो पांच से छह सौ करोड़ या इससे भी आगे तक चली गईं। वर्ष 2016 में आमिर खान की ब्लॉक बस्टर फ़िल्म ‘दंगल’ ने दो हज़ार करोड़ के वैश्विक आंकड़े के साथ सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। आमिर की ही पीके (2014) ने 832 करोड़,प्रभास की बाहुबली 2 (2016) ने 650 करोड़, सलमान की बजरंगी भाई जान (2015) ने 626 करोड़,सलमान की सुल्तान (2016) ने 584 करोड़, आमिर खान की धूम3 (2013) ने 542 करोड़ की कुल कमाई की। मूल प्रश्न तो यही है कि क्या मोबाइल एप्प से फिल्मों की लागत भर की कमाई भी हो सकेगी ?इसके उत्तर के लिए मोबाइल पर फिल्मों के बारे में थोड़ा गहरे उतरना पड़ेगा। ऑडियो विजुअल मनोरंजन क्षेत्र में सिनेमा स्क्रीन के बाद टेलीविजन को सेकेंड स्क्रीन की पहचान मिली । इसी क्रम में मोबाइल को अब थर्ड स्क्रीन कहा जाने लगा है। थर्ड स्क्रीन पर मनोरंजन या अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने वाले एप्प्स को OTT कहते हैं यानी कि OVER THE TOP प्लेटफार्म। भारत में NETFLIX, AMAZON PRIME, VOOT, ZEE5, VIU, MAX, SONY LIV, ALT BALAJI आदि तमाम प्लेटफॉर्म ने तो खुद अपनी फिल्मों का प्रोडक्शन शुरू कर दिया है।अभी सामान्यतः इनका शुल्क डेढ़ से दो सौ रुपये मासिक है। यह सुविधा विज्ञापनयुक्त होती है और विकल्प यह है कि यदि आप विज्ञापनमुक्त स्ट्रीम चाहते हैं तो अधिक दाम देना होगा।इसे प्रीमियम सर्विस कहा गया है। सिनेमा से OTT का तो अभी मुकाबला ही नहीं है पर केबल या डिश टीवी बिजनेस में OTT ने सेंध लगा दी है। KPMG की रिपोर्ट है कि वित्तवर्ष 2019 में केबल और सेटेलाइट के कुल 19.7 करोड़ यूज़र्स में लगभग डेढ़ करोड़ यूज़र्स कम हुए। इस गिरावट की वजह ग्राहकों द्वारा केबल का नवीनीकरण न कराना, नए टैरिफ रेट में बढ़ोत्तरी और OTT पर बेहतर फिल्मों की उपलब्धता रही। इस वक्त भारत में करीब चालीस OTT प्रोवाइडर्स हैं। वर्ष 2018 में OTT से 2150 करोड़ की कुल कमाई हुई जो 2019 में 3500 करोड़ हो गई। इस वर्ष यह आराम से 5000 करोड़ तक पहुंचेगी । KPMG का आकलन है कि OTT का मार्केट वर्ष 2023 तक 13800 करोड़ तक पहुंच जाएगा । Ernst &Young ने कहा है कि वर्तमान वर्ष में भारत में 50 करोड़ एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोनधारक OTT प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएंगे। अब OTT की आमदनी का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। OTT का बढ़ता चलन देखते हुए कई स्मार्ट टीवी अब इनबिल्ट OTT चैनल्स भी दे रहे हैं। विगत दिनों में अमिताभ और आयुष्मान खुराना की गुलाबो सिताबो तथा अभिषेक बच्चन की ब्रीद इनटू द शैडो OTT पर रिलीज हुई। अगले कुछ दिनों में OTT पर आने वाली प्रमुख फिल्में हैं- सुशांत सिंह राजपूत की दिल बेचारा,विद्या बालन की शकुंतला देवी, अक्षय कुमार की लक्ष्मी बॉम्ब, अजय देवगन की भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया, संजय दत्त, पूजा व आलिया भट्ट की सड़क 2, अभिषेक की द बिग बुल,विद्युत जामवाल की खुदा हाफ़िज़। इसके अतिरिक्त गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल, टोरबाज,लूडो, क्लास ऑफ ’83, रात अकेली है, डॉली किट्टी और वो, चमकते सितारे, काली खुही ,बॉम्बे रोज, भाग बीनी भाग, बॉम्बे बेगम्स ,मसाबा मसाबा, AK vs AK, गिन्नी वेड्स सनी, त्रिभंगा- टेढ़ी-मेढ़ी क्रेजी, अ सूटेबल बॉय, मिसमैच, सीरियस मेन भी थर्ड स्क्रीन पर उपलब्ध होंगी। कुल मिला कर भारत में फिल्मों का सीन तो यही बनता दिख रहा है कि अब अच्छी कहानी, पटकथा, फ़िल्म की स्पीड, अदाकारी और टेक्निकल सुपिरियारिटी के दम पर ही फिल्में चलेंगी। स्टारडम और प्रचार के बल पर फिल्में हिट कराने का दौर नहीं रहा।गुलाबो सिताबो या ब्रीद इनटू द शैडो का हाल सामने है।अब वह समय गया जब टिकट खरीद कर हाल में बैठ गए तो फ़िल्म अच्छी हो या खराब, देखनी ही है।बाद में हाल से बाहर भले ही झींकते हुए निकलें। OTT में फिल्म की शुरुआत में संक्षिप्त रिव्यू मौजूद है।फिर अगर कुछ देर देखने पर भी फ़िल्म मन माफिक नहीं लगी तो बन्द करिये दूसरी देखिये। क्यों अपना वक्त खराब करें ? सबसे बड़ी बात, फ़िल्म रिलीज़ के दिन ही आपके एंड्रॉइड मोबाइल पर हर फिल्म मौजूद है। अपनी सुविधानुसार जब चाहें देखें। OTT प्लेटफॉर्म पर यह तो रही सिर्फ फिल्मों की बात। खबरिया , किड्स, कुकरी , हेल्थ और रिलिजियस चैनल्स भी यहां आ गए हैं। ऑडियो स्ट्रीमिंग,VoIP कॉल, कम्युनिकेशन मैसेजिंग आदि भी OTT में ही शामिल हैं।अब पैसा फेंक तमाशा देख नहीं , पैसा फेंक और पैसावसूल तमाशा देख ! लेखक रवि राय गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के रिटायर्ड अधिकारी हैं. बैंकिंग करियर से पहले दैनिक जागरण, गोरखपुर के प्रारंभिक पत्रकारों में से रहे हैं और साहित्य के अनुरागी हैं.

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Dakhal News 21 July 2020


bhopal,Kanpuria editor ,earnestly helping ,Bhopal journalists, infected by Corona!

भोपाल : कोरोना संक्रमण में भी खुद को देश में नम्बर-1 बताने वाले अखबार के सम्पादक अस्पताल में भर्ती कोरोना पॉजिटिव स्टाफ से खबरें मंगा रहे हैं। जिन निगेटिव कर्मचारियों को ऑफिस बुला रहे थे, वे भी आ गए पॉज़िटिव! कनपुरिया सम्पादक सारी हदें पार कर जान लेने पर आमादा हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उत्तर प्रदेश से आये एक कनपुरिया सम्पादक इन दिनों खासी चर्चा में हैं। चर्चा है अखबार प्रेम को लेकर। अब इसके लिये पत्रकार चाहे कोरोना पॉजिटिव होकर मर ही क्यों न जाएं। दरअसल पिछले हफ्ते इस अखबार के कुछ पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हुए तो सम्पादक जी ने उन्हे छुट्टी नहीं दी। नतीजा पॉजिटिव पत्रकारों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पर संपादक जी लगातार दबाव बना रहे हैं कि नहीं दफ्तर आओ। वर्क फ्रॉम होम कुछ नहीं होता। दिलचस्प बात ये है कि कनपुरिया संपादक फोन पर दबाव बनाकर जिन कर्मचारियों को जबरन ऑफिस बुलाने धमका रहे थे, उन कर्मचारियों की रिपोर्ट भी पॉजीटिव आ गई। बस चले तो पूरा पॉजिटिव को भी अस्पताल से ऑफिस बुला लेंगे औऱ खुद घर मे दुबके बैठे हैं। तो साहब आलम ये है कि संपादक जी का पत्रकारों से प्रेम पत्रकारों पर ही भारी पड़ रहा है। मीडिया में खासकर प्रिंट मीडिया में कोरोना पॉजिटिव पत्रकारों के साथ ऐसे व्यवहार की खबरें आम होती जा रही हैं।।इस अखबार के मालिकान तो राज्यसभा सदस्य भी हैं।

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, Journalist organization welcomed Pyare Mian

IJU welcomes daily owner’s arrest in MP New Delhi : Welcoming the arrest of owner of Afkar daily Pyare Miyan, accused of raping four minor girls and running a sex racket in Madhya Pradesh, the Indian Journalists Union demanded strictest action be taken against him as other than his heinous crimes he had sullied the profession of journalism. Further, the Union demanded the SIT investigate the matter thoroughly in the backdrop of rumours he had a ‘quid pro quo relationship with those in power’. Miyan, who was absconding carried a reward of Rs 30,000 on his head, and was arrested in Srinagar, J&K on Wednesday following a group of minor girls in capital Bhopal being found by police in a disoriented condition on the city outskirts. Investigations reveal Miyan brought out Afkar, solely for ‘government advertisements and to get access to politicians, police and bureaucrats.’ SP (South) Sai Krishna Thota told The Indian Express that Miyan had travelled abroad with minor girls in past few years, though he passed these off as treatment/business-related. He was dealing in property and owns several properties in Bhopal and Indore and the district administration demolished a wedding hall built illegally by him and a flat among others. His flat, which the police broke into, resembles a dance bar with expensive liquor bottles and child pornography, sex toys etc. Miyan’s 21-year-old woman accomplice, a driver, a manager were taken into custody. In a statement, IJU President and former Member, Press Council of India Geetartha Pathak and Secretary General and IFJ Vice President Sabina Inderjit, regretted the media was getting a bad name because of crooks like Miyan. They welcomed cancellation of his accreditation and withdrawal of government quarter allotment in Professors’ Colony from where he ran his office. Noting Miyan’s activities suggest he had support of those in power the IJU insisted a thorough probe and all, including the powerful, be brought to book. Recalling, a similar case of Brajesh Thakur, who claimed to be a journalist and ran a sex racket in a girls’ shelter home in Muzaffarpur, Bihar, the Union called upon its members and journalist fraternity to uphold ethical standards and expose those who were misusing the profession for personal gains and power.

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Dakhal News 17 July 2020


bhopal, media dragons,frying , making dragon, gangster Vikas

अपराध के ‘रक्तबीजों’ को सींचता कौन है! हमारे देश का मीडिया अजब-गजब है। एक मुद्दे को चबाते हुए पचा नहीं पाता कि उसकी उल्टी कर दूसरे की तरफ लपक पड़ता है। ड्रैगन को बैगन बनाकर भून ही रहा था कि बीच में गैंगस्टर विकास दुबे आ गया..। प्राइम टाइम में सीधे श्मशान से अपने-अपने पैकेज के रैपर खोलने ही जा रहे थे कि..’सदी के महानायक’ कोरोना के साथ लीलावती अस्पताल पधार गए। कोरोना अब तेरी खैर नहीं, इसे ‘जंजीर’ में बाँधकर ‘शोले’ से जला देंगे बिग बी..से लेकर रेखा के रोमांस का ‘सिलसिला’ भी घुल गया। एंकर मोहतरमा रिपोर्टर से चीख-चीखकर पूछ रहीं थी..कि अब कोरोना की अगली स्ट्रैटजी क्या हो सकती है।   बंदरों के समान उस्तरे से अपनी ही नाक उतार रहे इन छिछोरों ने परदे पर गत्ते की तलवार भाँजने वाले लखटकिया (अरबटकिया) अभिनेता को सदी का महानायक घोषित कर दिया तो महात्मा गांधी, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चंद्रशेखर और सरहद पर प्राण देने वाले परमवीर योद्घा क्या हैं..! समझ में नहीं आता कि ब्रैकिंग सूचनाओं की यह सँडांध श्रोताओं/दर्शकों/पाठकों को किस नरक-कुंड में धकेलने को आमादा है।   बहरहाल लेख का विषय यह नहीं बल्कि सिस्टम की सँडांध का है, जहाँँ विकास दुबे जैसे अपराधी पनपते हैं और मरने के बाद भी उनके रक्तबीज से बहुगुणित संख्या में पजाते रहते हैं।   अपने देश में नेता-गैंगस्टर-पुलिस के घालमेल की तुलना आप शराब-सोडा-कबाब से कर सकते हैं। नेता और अपराधी शराब में सोडे की तरह एक दूसरे में घुले हैं..। जो आज गैंगस्टर है कल नेता हो सकता है।   दोनों की युति से चुनावी रथ का पहिया आगे बढ़ता है। पुलिस को इस काकटेल में स्नैक्स समझिए कभी-कभी कबाब की हड्डियां जायका खराब कर देती है..मुश्किल तभी होती है..।   विकास दुबे मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, अतीक अहमद जैसे रसूख को प्राप्त कर पाता कि कच्ची उमर में ही फँस गया..और जो तय है वही हुआ।   राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण की ओर बढ़ते हुए विकास दुबे के मार्फत अपराध की राजनीति को भी समझते चलें..।   सोशल मीडिया मेंं गैंगस्टर की जाति को लेकर उबाल है। जिसका मूलस्वर यह कि ठाकुर जाति के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुन-चुनकर ब्राह्मण बाहुबलियों को निपटा रहे हैं। इन संदेशों की छुपी मंशा यह है कि उन्हें मुसलमान बाहुबलियों का संहार करना चाहिए.. ठाकुर-बाम्हन तो मिल-पटकर रह भी लेंगे।   इसलिए बार-बार याद दिलाया जा रहा कि बिहार में डीएम की हत्या करने का आरोपी शहाबुद्दीन सही सलामत है, न उसका घर धंसाया, न मुठभेड़ हुई। अतीक और मुख्तार के जेल में रहने के बावजूद उनका कालासाम्राज्य वैसे ही चल रहा है।   अपने यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं स्वच्छंदता भी है सो सामाजिक समरसता जाए चूल्हे-भाड़ में जिसको जो मन पड़ेगा..लिखेगा. जहर घुलता है तो और घुले।   पिछले छह दशकों से अपराधी-पुलिस का साझा सहकार चलता रहा है, एक दूसरे का पूरक बनकर एक जैसी कार्यपद्धति अख्तियार करते हुए।   यह मैं नहीं कहता, साठ के दशक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में कुछ इसी तरह की तल्ख टिप्पणी की है – “मैं जिम्मेदारीपूर्वक सभी अर्थों के साथ कहता हूँ, पूरे देश में एक भी कानून विहीन समूह नहीं हैं जिसके अपराध का रिकार्ड अपराधियों के संगठित गिरोह पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो”   इस टिप्पणी को सरलीकृत करके आमतौर पर उल्लेख किया जाता है कि भारत में पुलिस अपराधियों के संगठित गिरोह से ज्यादा कुछ भी नहीं।   पुलिस तंत्र ऐसा स्वमेव बना या बनने के लिए विवश किया गया इसकी कहानी अँग्रेजों के समय से शुरू होती है। तब उसकी एक मात्र भूमिका स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपराधी बताकर दमन करने की थी। इसी पुलिस की लाठी से शेर-ए-पंजाब लाला लाजपतराय की हत्या हुई थी।   वोहरा, रुस्तम जी समेत पुलिस तंत्र में सुधार के लिए बने तमाम आयोगों और समितियों की सिफारिशों और संतुस्तियों के बाद भी पुलिस के प्रायः सभी मूल कानून और संहिताएं अँग्रेजों के जमाने की हैं।     आजाद भारत का सत्ता समूह गुलाम भारत के जमाने की पुलिस चाहता है ताकि विरोधियों को अपराधी बताकर उसी तरह दमन किया जाता रहे जैसा कि अँग्रेजों के जमाने में था।   विपक्ष जब सत्ता समूह बनकर आता है तो चूँकि उसे भी बदला भँजाना होता है इसलिए वह भी वैसा ही पुलिस तंत्र चाहता है..जो विरोधियों के लिए दमनकारी हो।   बहुत पहले एक नाट्यकृति पढ़ी थी। लेखक और नाटक का नाम विस्मृत है पर तथ्य और कथ्य आज भी याद है। नाटक रावण और मारीच पर केंद्रित था। रावण को सत्ताधारी दल का नेता और मारीच को स्थानीय गुंडा बताया गया था। रावण उसे राम (विपक्षी दल के नेता)को मारने की सुपारी देता है।   विपक्षी दल के नेता के गुणों से प्रभावित गुंडा जब सुपारी लेने से मना करता है तब सत्ताधारी दल का नेता धमकाता है..कोई मरे या न मरे पर तेरा मरना तो तय है..इसलिए बेहतर है कि तू मेरे दुश्मन को मारते हुए मर या फिर मेरी पुलिस से मुठभेड़ में मरने के लिए तैय्यार रह।   यह नाटक साठ सत्तर दशक का है। अपराध राजनीति में प्रवेश ही पा रहा था..। राजनीति में पूँजीपतियों के धनबल, गैंगस्टरों के बाहुबल के बीच गठबंधन होना शुरू हो चुका था। इधर जयप्रकाश नारायण ने जितने भी दुर्दांत दस्युओं का आत्मसमर्पण करवाया था उनमेंसे ज्यादातर राजनीति में अपने भविष्य की तलाश में लग गए थे।   मुंबई में हाजी मस्तान, वरदाराजन मुदलियार और करीमलाला जैसे स्मगलर अपराध में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रतीक बनकर उभर रहे थे। चुनावी फायदों के लिए विभिन्न दलों के नेता आधीरात कंबल ओढ़कर इनके ठिकाने आने लगे थे।   उत्तरप्रदेश और बिहार में हरिशंकर तिवारी और सूरजदेव सिंह जैसे कई बड़े सफेदपोश राजनीति की छतरी ओढ़ चुके थे। समाजवादी डकैतों को सोशल जस्टिस के लिए बीहड़ पर उतरे बागी बताने लगे थे..।   सन् सत्तर-पचहत्तर के आसपास राजनीतिक लोकतंत्र में अपराध की विषबेल का लिपटना शुरू हो चुका था..। इसके बाद मामला तेज रफ्तार से आगे बढ़ा।   नब्बे के आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रायः सभी तरह के अपराधी उद्योगपति बनने की होड़ में जुट गए, रियल स्टेट और ठेकेदारी इनके कब्जे में आती गई।   राजनीति में अकूत धन की ताकत का निवेश चमत्कारी साबित होने लगा। और जब देखा कि बड़े-बड़े कतली गिरोहबाज विधायक, सांसद और मंत्री हैं, वही पुलिस उनको सैल्यूट कर रही है तो राजनीति अपराधियों के लिए सुरक्षित स्वर्ग बनता गया। विकास दुबे तो बड़ा कतली गैंगस्टर था, उसकी ख्वाहिश भी बड़ी थी। आज तो मोहल्ले का गुंडा भी पार्षदी अपनी जेब में रखता है।   इतिहास में अपराधियों की राजनीति में प्रवेश की इतनी फूलप्रूफ योजनाओं के दृष्टांतों के चलते आखिर विकास दुबे चूक कहाँ गया..?   शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रघुराज प्रताप सिंह, अमरमणि त्रिपाठी, ब्रजेश सिंह जैसों की तरह सांसदी, विधायकी भोगने की जगह सीधे ऊपर भेज दिया गया।   दरअसल नेता-पुलिस-माफिया के गठजोड़ का खेल साँप-सीढ़ी जैसे होता है। सभी एक दूसरे के कंधे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनमें छोटे से लेकर बड़े, सभी साइज के स्वार्थ होते हैं। विकास दुबे पुलिस की आपसी अदावत औ छोटे स्वार्थ की भेंट चढ़ गया।   अपराध जगत कांटे से काँटा निकालने के लिए जाना जाता है। कभी अपराधी अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने के लिए पुलिस को हथियार बनाते हैं।   जैसे कि मुंबई का एनकाउंटरर पुलिस काँप दया नायक था(इस आरोप में जेल में भी रहा)। तो कभी पुलिस ही आपसी अदावत के चलते अपने पुलिस सहकर्मी को निपटाने के लिए गैंगस्टर की मदद लेती है।   कभी -कभी पुलिस और गैंगस्टर समझ भी नहीं पाते कि वे किसके मोहरे के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। बिल्कुल फिल्मी कथानक..नहीं यूँ कहें कि सही कथानक फिल्मों के लिए..। विकास दुबे इसी कथानक का एक मोहरा बनकर पिट गया।   कहानी बड़ी साफ है..। चौबेपुर के दरोगा विनीत तिवारी की उस परिक्षेत्र के डीएसपी देवेंद्र मिश्रा से अदावत थी। विनीत तिवारी विकास दुबे का खबरी और कानूनी मददगार था। विनीत ने विकास के दिमाग में यह बैठाया कि देवेन्द्र मिश्रा तुम्हारा दुश्मन है और तुम्हें बर्बाद कर देगा।   देवेंद्र मिश्रा वाकई विकास दुबे को बर्बाद करना चाहता था यह कहानी स्पष्ट नहीं, पर विकास ऐसा ही मानकर चल रहा था।   जिस विकास दुबे ने थाने में घुसकर एक राज्यमंत्री को गोली मारी हो, रसूख के चलते जल्दी ही अदालत से रिहा होकर फिर माफियागिरी में जुट गया हो, उसकी ताकत को जानते हुए मूरख से मूरख पुलिस अधिकारी भी सात आठ सिपाहियों के साथ मुठभेड़ करने नहीं जाएगा, यह जानते हुए कि सामने गैंग के रूप में समूची पलटन है।   यह भी संभव है कि देवेंद्र मिश्रा को यह फर्जी इनपुट दिया गया हो कि वह आज विकास दुबे को आसानी से पकड़ सकता है। कुलमिलाकर डबलक्रास जैसी स्थिति है।   अब इस घटना के प्रमुख किरदार विनीत तिवारी की तफसील से जाँच की जाए तो एक यह नया सूत्र सामने आ सकता है कि विनीत तिवारी को यह सब करने के लिए उस प्रतिद्वंद्वी ने प्रेरित किया हो जिसे विकास दुबे के बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व से खतरा रहा हो।   गाँव की प्रधानी और जिला पंचायत में विकास दुबे परिवार का कब्जा था, निश्चित ही विकास की यह ख्वाहिश रही होगी कि वह भी अन्य गैंगस्टरों की भाँति विधायक-सांसद बने।   इस कहानी की बुनियाद में भावी चुनाव की विधायकी और सांसदी का मुद्दा जुड़ा निकले तो यह कोई हैरत की बात नहीं।   उज्जैन में सरेंडर कर चुके विकास दुबे को यूपी पुलिस ने कैसे मारा..तरीका सही था या गलत यह पुलिस तंत्र व न्यायजगत के बीच बहस का विषय है लेकिन इस घटना ने यूपी की राजनीति को एक ट्विस्ट जरूर दिया है।   विकास की मौत के बाद राजनीति साँप की तरह पलट रही है। जातीय ध्रुवीकरण की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। कानपुर इलाके की वह पट्टी दबंग ब्राह्मणों के लिए जानी जाती है..विकास दुबे की रूह का चुनावी इस्तेमाल होगा।   यूपी में विधानसभा के चुनाव सामने हैं और भाजपा सपा दो के बीच मुकाबला। भाजपा सरकार पर विकास दुबे के मारने का आरोप है। संभव है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को वैसे ही टेकओवर करे जैसे कि मिर्जापुर जीतने के लिए फूलनदेवी का किया था। बात फिलहाल थमने वाली नहीं.. क्योंकि राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भाँति कुटिल होती है। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Dakhal News 17 July 2020


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केंद्र की मोदी सरकार ने समाचार एजेंसी पीटीआई को सबक सिखाने का काम शुरू कर दिया है. चीनी राजदूत के इंटरव्यू से नाराज मोदी सरकार ने इस न्यूज एजेंसी पर 84.4 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. पीटीआई से कहा गया है कि उसने वर्ष 1984 से उस सरकारी बिल्डिंग के किराए का भुगतान नहीं किया है जिससे इसका कामकाज संचालित होता है. ज्ञात हो कि पीटीआई का ये आफिस संसद मार्ग पर स्थित है. पीटीआई पर लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 84.48 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इसी लीज के तहत पीटीआई को दिल्ली में संसद मार्ग कार्यालय के लिए भूमि आवंटित की गई थी. ज्ञात हो कि केंद्र सरकार चीनी राजदूत सन सुन वेइदोन का इंटरव्यू पीटीआई द्वारा लिए जाने के जवाब में पीटीआई को दंडित कर रही है. पीटीआई को 84.48 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस जारी किया गया है. भुगतान के लिए 7 अगस्त का टाइम दिया गया है. न देने पर 10 प्रतिशत ब्याज लगेगा. किसी भी स्पष्टीकरण के लिए पीटीआई को एक सप्ताह का समय दिया गया है. कहा गया है कि पीटीआई ने 1984 के बाद से जमीन के किराए का भुगतान नहीं किया है. बेसमेंट के एक कार्यालय में बदलाव कर भूमि-आवंटन की शर्तों का दुरुपयोग किया है. लीज के अनुसार बेसमेंट का उपयोग केवल स्टोर के मकसद से करना था.

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Dakhal News 14 July 2020


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एक दुखी करने वाली खबर है. दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ को ब्रेन स्ट्रोक का सामना करना पड़ा है. इसके चलते उनके शरीर का बायां हिस्सा पैरलाइज हो गया है. डाक्टरों का कहना है कि रजत अमरनाथ को समय से अस्पताल लाने और ब्रेन स्ट्रोक तत्काल डायग्नोज होने के चलते इलाज अतिशीघ्र शुरू कर दिया गया जिससे उनकी जान बच गई. रजत अमरनाथ को बोलने में अभी भी तकलीफ है. डाक्टरों ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी है. साथ ही तनाव न लेने को कहा है. कुछ साल पहले रजत अमरनाथ को दो बार हार्ट अटैक से भी गुजरना पड़ा था. ज्ञात हो कि रजत अमरनाथ किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहे हैं. वे तत्कालीन स्टार न्यूज समेत कई न्यूज चैनलों में बड़े पदों पर रहे हैं. दिल्ली के दरियागंज के निवासी रजत अमरनाथ जीवन में दूसरों की मदद करने का काम लगातार करते रहे हैं. जब जब भड़ास पर किसी के लिए मदद की अपील छपी तो रजत अमरनाथ ने उस अपील पर फौरन पहल करते हुए यथोचित मदद पहुंचाई. साथ ही ये ताकीद भी की कि उनका नाम न किसी को बताया जाए और न प्रकाशित किया जाए. रजत अमरनाथ के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना उनके मित्रों-परिचितों ने की है.

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Dakhal News 14 July 2020


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भोपाल : जिस पत्रकार महोदय को राज्य सरकार मान्यता दिए हुए थी, उसे सरकारी बंगला मिला हुआ था, वही पत्रकार बच्चियों के यौन शोषण में लिप्त था. ऐसा घटिया पत्रकार समाज में अभी तक सम्मान पाता रहा है. लेकिन पोल खुलने के बाद अब इनसे सब लोग हाथ खींचने लगे हैं. प्रदेश सरकार ने बलात्कारी प्यारे मियां की सरकारी मान्यता निरस्त कर दी है. उनसे सरकारी बंगला खाली कराने का आदेश दे दिया गया है. प्यारे मियां के शासकीय आवास को खाली कराने औऱ अधिमान्यता समाप्त करने के निर्देश खुद मुख्यमंत्री ने दिए हैं. पत्रकारिता के नाम पर गलत एवं अनैतिक कार्यों में संलिप्त था प्यारे मियां। ऐसे लोग ही पत्रकारिता को बदनाम करते हैं. भोपाल में नाबालिग बेटियों के यौन शोषण के मामले पर मुख्यमंत्री ने अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि इस मामले में जो भी शामिल है, उसमें से किसी को नहीं छोड़ा जाएगा. प्यारे मियां को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए हैं. ऐसी सूचना है कि प्यारे मियां को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. प्यारे मियां के बारे में एक अपुष्ट जानकारी मिली है कि ये भोपाल के ख्यातनाम गुंडे हैं। बताया जाता है कि सारे अखबार मालिक इनके आगे नतमस्तक रहते हैं। चर्चा है कि बच्चियों के यौन शोषण के मामले में भोपाल के एक बड़े अखबार मालिक के रिलेटिव भी शामिल थे, लेकिन पुलिस ने बचा लिया।

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Dakhal News 14 July 2020


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लाकडाउन के बाद से बडे अखबारी समूहों में जहां बडे पैमाने पर छंटनी हो रही है , वहीं दैनिक अमृत विचार छंटनी का शिकार हुए बेरोजगार पत्रकारों – गैर पत्रकारों का सहारा बनता जा रहा है। बड़े अखबारों में लगातार स्टाफ कम करने का क्रम जारी है। ये समूह 35 से 40 प्रतिशत तक स्टाफ घटाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जिलों के ब्यूरो आफिस बंद किये जा रहे या कार्यरत कर्मचारियों की संख्या कम कर दी गयी है। तहसीलों के आफिस बंद कर दिये गए हैं। इससे बडे पैमाने पर कोरोना जन्य संकट कालीन स्थित में मीडियाकर्मी , खासकर पत्रकारों के सामने आजीविका का बडा संकट उत्पन्न हो गया है। इसमें कई युवा पत्रकार भी हैं। हालत यह है कि तीस-पैंतीस हजार रुपये वेतन पाने पत्रकार पंद्रह-बीस हजार रुपये की नौकरी को भटक रहे हैं।   दैनिक जागरण, मुरादाबाद से छंटनी के शिकार डिप्टी चीफ सब एडिटर आशुतोष मिश्र ने अमृत विचार, मुरादाबाद में सिटी इंचार्ज के रूप में ज्वाइन किया है। दैनिक जागरण, मुरादाबाद के डिजाइनर रिजवान अहमद ने भी अमृत विचार , मुरादाबाद ज्वाइन किया है। हिंदुस्तान, नोएडा से छटनी कर दिए गए मनीष मिश्रा ने अमृत विचार, मुरादाबाद में सीनियर सब एडिटर के पद पर ज्वाइन किया है। वह मुरादाबाद में दैनिक जागरण और अमर उजाला में भी सेवारत रह चुके हैं। हिंदुस्तुान, नोएडा से छंटनी के शिकार हुए युवा पत्रकार पीयूष द्विवेदी भी अमृत विचार, बरेली आ गए हैं। वह दैनिक जागरण, बरेली से एक वर्ष पहले ही हिंदुस्तान गए थे और छंटनी की जद में आ गए। वह अमृत विचार, बरेली में सिटी प्रभारी के रूप सेवायें देंगे।   दैनिक जागरण, बरेली से छंटनी अभियान में बाहर कर दिये गए सर्कुलेशन मैनेजर त्रिनाथ शुक्ला ने अमृत विचार, बरेली में सर्कुलेशन मैनेजर के पद पर ज्वाइन किया है। वह दैनिक जागरण में सिटी सेल्स हेड थे और उससे पहले अमर उजाला, लखनऊ, टाइम्स आफ इंडिया, बिजिनेस स्टैंटर्ड, पायनियर, राजस्थान पत्रिका और आउटलुक में काम कर चुके हैं। दैनिक अमृत विचार लखनऊ, बरेली और मुरादाबाद से प्रकाशित है। समूह संपादक शंभू दयाल वाजपेयी के अनुसार प्रबंधन की योजना अखबार का चौथा संस्करण हल्द्वानी (नैनीताल) से भी शुरू करने की योजना है। नोएडा संस्करण भी प्रबंधन की योजना में है। अमृत विचार वेबसाइट और यूट्यूब चैनेल भी है। डिजिटल में एक दर्जन से अधिेक पूर्ण कालिक पत्रकार कार्यरत हैं। बरेली में अखबार का प्रकाशन शुरू हुए आठ महीने हुए हैं। पांच महीने पहले मुरादाबाद संस्करण शुरू हुआ। बेहतर कंटेंट, सभी रंगीन और अच्छा कागज व छपाई होने से अखबार ने कम समय में ही पाठकों में अपनी पहचान बनायी और तेजी से बढ़ रहा है। 14 -16 पेज के अखबार के साथ रविवार को चार पेज की मैगजीन भी है।

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Dakhal News 13 July 2020


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मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार द्विजेन्द्र तिवारी आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं। पिछले दिनों ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य व प्रवक्ता प्रीति शर्मा मेनन ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया। समझा जाता है कि महाराष्ट्र में अपनी उपस्थिति दमदार करने के लिए आम आदमी पार्टी अपना विस्तार कर रही है और इस उद्देश्य से तिवारी को पार्टी में शामिल किया गया। तिवारी का पत्रकारिता में लंबा अनुभव रहा है। मुंबई में जनसत्ता के तेजतर्रार राजनीतिक संवाददाता के रूप में उनकी छवि रही है। इसके बाद नवभारत, मुंबई के स्थानीय संपादक और हमारा महानगर के संपादक के रूप में उन्होंने मुंबई की पत्रकारिता में अपना एक अलग मुकाम बनाया। तिवारी ने लगभग 30 साल मुंबई में राजनीतिक रिपोर्टिंग की और कई राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध रहे हैं। स्व.बाल ठाकरे, स्वर्गीय विलासराव देशमुख और शरद पवार जैसे नेताओं से लिए गए उनके इंटरव्यू काफी चर्चित रहे हैं। मुंबई में सबसे पहले बने हिंदी पत्रकार संघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसके बाद महाराष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था मंत्रालय एवं विधि मंडल वार्ताहर संघ की कार्यकारिणी में भी वे तीन बार सदस्य रहे हैं। राजनीतिक पत्रकारिता में तिवारी का लंबा अनुभव देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि उनके अनुभवों से महाराष्ट्र में आगामी चुनावों में आम आदमी पार्टी को लाभ मिल सकता है। विशेषकर आगामी मुंबई महानगरपालिका चुनाव में मुंबई के उत्तर भारतीय समाज के बीच एक मजबूत संदेश जाएगा।

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Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Thoothu stunned, hear the story ,Ayyashi , elderly journalist

पत्रकार बिरादरी का नाम बदनाम कर दिया भोपाल के प्यारे मियां नामक पत्रकार ने। ये प्यारे मियाँ नामक पत्रकार एक अखबार निकालता है। अखबार का नाम ‘अफ़कार’ है। इस अखबार का मालिक प्यारे मियां भोपाल के पुराने पत्रकारों में से एक है। इसकी उम्र 68 साल है। पढ़ें इस कमीने का कारनामा- सिर्फ नाबालिग लड़कियां (14 से 15 साल की) ही होती थी निशाने पर। बालिग होते ही कट्टे की नोक पर कुछ पैसा देकर उनकी करवा देता था शादी। 6 नाबालिग बच्चियों के यौनशोषण से जुड़ा है मामला। आरोपियों में राजधानी भोपाल के 5 बड़े नाम आ रहे हैं सामने। चाइल्ड हेल्प लाइन की टीम कर रही है नाबालिग बच्चियों की काउंसलिंग। देर रात बालाओं के साथ डांस करते पकड़े गए रसूखदार। रातीबड थाना क्षेत्र के फ़ार्महाउस में बना रखा था डांस बार।

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Dakhal News 13 July 2020


bhopal, Anand Swaroop Varma, use of Hindi translation ,many happy birthday wishes

आज जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और मेरे प्रिय लेखक-अनुवादक आनंद स्वरूप वर्मा का जन्मदिन है. मुझे 2009 से 2011 के बीच उनके साथ काम करने का मौका मिला जो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ. खासकर, हिंदी में लेखन और अनुवाद सीखने का बहुत खूब अवसर साबित हुआ वह समय. आज तक उनसे हमेशा कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है. एक किस्सा तो अनुवाद करने वाले सभी लोगों को सुनना ही चाहिए. 15 सितंबर 2009 इराकी पत्रकार मुंतसर अल जैदी जेल से रिहा हुए. उन्हें जेल होने की वजह बहुत क्रांतिकारी है. इराक को तबाह करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की 14 दिसंबर 2008 को इराक में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जैदी ने उन पर अपने जूते फैंके थे. इसके बाद जैदी को गिरफ्तार कर लिया गया था और लगभग एक साल बाद उन्हें रिहा किया गया. जेल से बाहर आने के तुरंत बाद जैदी ने ब्रिटिश अखबार द गर्डियन पर “वाई आई थ्र्यू द शू” नाम से लेख लिखा. इस लेख को, जिसके पहले दो वाक्य हैं, “मैं आजाद हूं. लेकिन मेरा मुल्क अब भी युद्ध बंदी है”, सभी को पढ़ना चाहिए. अब उस प्रसंग पर आता हूं. जैदी के इस लेख का अनुवाद बहुतों ने हिंदी में किया. वर्मा जी ने भी सोचा कि समकालीन तीसरी दुनिया के उस माह के अंक में यह जाना चाहिए. उन्होंने अनुवाद किया और पढ़ कर सुनाया तो लगा कि जैदी ने ही लिखा है. इस बीच जितने अनुवाद पढ़े थे, वे अच्छे भले ही थे लेकिन एक तरह की कृत्रितमा थी उनमें. फिर वर्मा जी ने बताया कि क्योंकि लेखक महत्वपूर्ण हैं और अरब के हैं, इसलिए उन्होंने कोशिश कि है कि जरूरी स्थानों पर ऊर्दू के शब्द हों. फिर मैं समझा कि यही छोटा सा ट्विस्ट (twist) उस अनुवाद को शानदार बना दे रहा था. उस अनुवाद से मुझे सबक मिला कि अच्छे अनुवाद के लिए जरूरी है कि अनुवादक लेखक के बैकग्राउंड को समझे, उसके हावभाव पर गौर करे, लेखक किस संदर्भ में लिख रहा है उस संदर्भ को विजुअलाइज करे. अनुवाद सिर्फ एक भाषा से दूसरी भाषा में साहित्य को प्रकट करना नहीं बल्कि अच्छा अनुवादक उस संस्कृति और परिवेश को भी अनुवाद कर रहा होता है जिससे लेखक आया है. वर्मा जी के अनुवाद अनुवाद कला का सर्वोत्तम रूप हैं. मेरे पास उनके द्वारा अनूदित कई किताबें हैं. कुछ के नाम हैं : औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, वेनेजुएला की क्रांति, नेपाली समरगाथा, आज की अफ्रीकी कहानियां, खून की पंखुडियां. इन सभी में अनुवाद का गजब कौशल देखने को मिलता है. अनुवाद में वर्मी जी ने जैसे प्रयोग किए हैं वे शायद ही किसी ने. और यही वजह है कि उनका एक भी अनुवाद कृत्रिम नहीं लगता. हम लोग अक्सर लेखन में प्रयोग की बात करते हैं लेकिन अनुवाद में होने वाले प्रयोगों पर ध्यान नहीं देते. वैसे भी हिंदी में अनुवाद को इतना सस्ता काम माना जाता है कि इसके कलात्मक पक्ष पर लोगों का ध्यान ही नहीं जाता. जो लोग करते हैं वे भी सिर्फ करते हैं. ना महत्व देते हैं, ना अपने काम को सुधारना ही चाहते हैं. कुछ तो लेखक पर एहसान करने के भाव से अनुवाद करते हैं और मूल पर हावी हो जाना चाहते हैं और ऐसे-ऐसे बोझिल शब्द डाल देते हैं कि सिर दर्द करने लगता है. लेकिन वर्मा जी के किसी भी अनुवाद में ऐसा दोष नहीं दिखता. वह एक शानदार अनुवादक हैं. अगर हम यूरोप या अमेरिका होते तो अनुवाद के रूप में वह ग्रेगोरी राबासा होते और कोई गैब्रियल गार्सिया मार्केज कहता, “आनंद स्वरूप वर्मा का अनुवाद मेरी मूल रचना से उत्कृष्ट है.” पत्रकार और अनुवादक विष्णु शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क- simplyvishnu2004@yahoo.co.in

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Dakhal News 11 July 2020


bhopal, Shivraj , helplessCM ,forced government , Madhya Pradesh!

“मध्यप्रदेश मंत्रिपरिषद में विभागों के बँटवारे में वैसे ही स्थिति है जैसे रोटी के एक टुकड़े को बंदर-बिल्ली-कुत्ते और कौव्वे के बीच बाँटना” मध्यप्रदेश सरकार की स्थिति आज वैसे ही है जैसे कोई नटी आसमान में तने रस्से पर बाँस लेकर संतुलन साधे चीटी की गति से आगे बढ़ रही हो। प्रदेश की जनता मेले के तमाशबीनों की भाँति अवाक और हतप्रभ है। 21 मार्च को भाजपा की ‘लाए-जोरे’ की सरकार बनने के बाद पंच परमेश्वरों को मंत्री बनाने में पखवाड़े भर लग गए। फिर अगले विस्तार के लिए राज्यसभा चुनाव का उबाऊ इंतजार। 20 जून को चुनाव के बाद मंत्रिमंडल के पूर्ण विस्तार में 12 दिन लगे वह भी दिल्ली के बारह फेरे के बाद। अब विभागों के बँटवारे में वैसे ही स्थिति है जैसे रोटी के एक टुकड़े को बंदर-बिल्ली-कुत्ते और कौव्वे के बीच बाँटना। विस्तार के बाद से हल्ला है कि मंत्रिपरिषद में ‘लायन शेयर’ ज्योतिरादित्य सिंधिया ले गए और विभागों के बँटवारे में उनकी नजर अपने समर्थकों को मलाईदार विभाग दिलाने में है। अब सत्ता सेवा रह भी कहां गई..! वह तो मालपुआ है और कोरोना के संकट काल में यह पौष्टिकता कौन नहीं चाहेगा। सिंधियाजी ने शिवराज जी के ‘टाइगर अभी जिंदा है’ के चर्चित डायलॉग को भी हड़पने की कोशिश की है। जंगल की व्यवस्था में टाईगर की अपनी टेरेटरी होती है। वह दूसरे के बर्दाश्त नहीं करता। इस डायलॉग के निहतार्थ को अच्छे से समझ लेना चाहिए, वजह मध्यप्रदेश के सियासी जंगल की एक ही टेरेटरी में दो टाईगर आ चुके हैं। बहरहाल गठजोड़ की सरकार में यह स्वाभाविक है..। हम लोकतंत्र की नैतिकता और मर्यादा का भले ही कितना ढोल पीटें उसकी पोल में सभी धतकरम चलते रहते हैं। यह कोई आज से नहीं.. जमाने से चलता चला आ रहा है। हमने हरियाणा में भजनलाल-वंशीलाल-देवीलाल-रामलाल का दौर भी देखा है। रात किसी दल में सोते, सुबह होते ही किसी दूसरे दल की दालान में कुल्ला मुखारी कर रहे होते। अब इसी बार हरियाणा में यदि देवीलाल के पंती ने भाजपा सरकार को समर्थन नहीं दिया होता तो..बलात्कार और धोखाधड़ी के नामाजादिक आरोपी गोपाल कांड़ा के लिए दरवाजा खुला था। मध्यप्रदेश में लोकतंत्र का गला चपाने की बात करने वाली कांग्रेस का तो ट्रैक रिकॉर्ड ही दूसरे दलों की सरकार की अकाल हत्या का रहा है..सो हम लोक-फोकतंत्र की बात करने की बजाय बात करेंगे कि मध्यप्रदेश में क्या हो रहा है और आगे का अनुमान क्या है। जो लोग सरकार को लेकर सिंधिया जी के अपरहैंड और उनकी मनमर्जी की बात कर रहे हैं उनको यह अच्छे से समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस सरकार को गिराने को लेकर उनका भाजपा के साथ यही ‘एमओयू’ हुआ था। जो कांग्रेस का मंत्रिपरिषद त्याग कर आए थे उन्हें तो मंत्री बनना ही था और उनको भी मंत्री बनाना था जो इसी की लालसा के चलते कांग्रेस छोड़ी। सो इसलिए यह अनहोनी नहीं कि कांग्रेस से आए लोगों को थोक के भाव मंत्री बना दिया गया। मुझे यह भी मिथ्या लगता है कि मलाईदार विभागों को लेकर सिंधिया जी का कोई पेंच है..। यदि पेंच है तो भाजपा के भीतर ही है और वह अबतक एक छत्र रहे शिवराज सिंह चौहान को कसने के लिए। इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि पहली किश्त में जब पाँच मंत्री बनाए गए तब एक भी उनकी पसंद के नहीं थे। पूर्ण विस्तार में सिर्फ़ सागर के भूपेन्द्र सिंह को उनके खाते का माना गया। भूपेन्द्र सिंह भले ही शिवराज जी के खाते के माने गए हों लेकिन उन्हें मंत्री बनने देने का ज्यादा योगदान गोविंद सिंह राजपूत को है जिन्हें सुर्खी से उपचुनाव लड़ना है। राजपूत के कहने पर सिंधिया जी ने भूपेन्द्र की पैरोकारी की ताकि उनके पट्ठे राजपूत का पथ प्रशस्त हो सके। राजपूत और भूपेन्द्र राजनीति में दुश्मनों की हद तक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। भूपेन्द्र फुरसत में बैठते तो राजपूत का बंटाधार करते ऐसा मान लिया गया था। सो शिवराज जी अपने ही मंत्रिपरिषद में सदा सर्वथा अकेले हैं..और शेरी भोपाली का यह शेर कि- पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफरकिससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे। मंत्रिपरिषद के गठन के दिनों मैं भी भोपाल में फँसा था, करोना की वजह से। 1 जुलाई की रात की बेसब्री देखी..यह लगभग वैसे ही थी जैसे कि दूसरे दिन लाटरी का बम्पर ड्रा निकलने वाला हो। 2 जुलाई को शपथ के बाद मेरे एक पत्रकार मित्र की जुबानी टिप्पणी थी कि ‘यह लचर नेतृत्व(संगठन), लाचार मुख्यमंत्री वाली मजबूर सरकार है। ऐसे-ऐसे मंत्रियों के चेहरे और घर बैठने को कह दिए गए कद्दावरों को देखकर साफ कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार बौनों ने आदमकदों की सीआर(गोपनीय चरित्रावली) लिखी है। भाजपा कार्यालय के बाहर एक बागी तेवर वाले पके हुए नेता की एक लाइन की टिप्पणी थी ‘आधी छोड़़ सारी को धावै, आधी मिलै न सारी पावै’। इस टिप्पणी की व्याख्या आप उमा भारती के वक्तव्य से समझ सकते हैं- इस सौदेबाज़ी से बेहतर होता कि मध्यावधि चुनाव कराकर नया जनादेश लेकर आते। पस्त कांग्रेस किसी भी कीमत पर दुबारा न जीतती। उमा भारती की तरह कई वरिष्ठ नेताओं को अंदेशा है कि यह मंत्रिमंडल और सरकार दशकों की मेहनत से अर्जित किए गए भाजपा के जनाधार को खो देगी..क्योंकि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, परफॉर्मेंस और जनाधार वाले नेताओं की गंभीर उपेक्षा की गई है। उपचुनाव को साधने के लिए चंबल-ग्वालियर के कंधे पर एक जुआँ रख दिया गया है..और दूसरा खाली। सत्ता की बैलगाड़ी कभी भी चरमराकर ध्वस्त हो सकती है। मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व को लेकर मालवा, महाकोशल से लेकर विंध्य तक में उबाल है। लावा जब तक बाहर नहीं आता पता ही नहीं चलता कि जमीन के भीतर ज्वालामुखी धधक रहा है। महाकोशल के दिग्गज भाजपा नेता अजय विश्नोई की यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि संगठन और सरकार अपने विधायक और कार्यकर्ताओं को साध सकती है जनता को नहीं। सबसे ज्यादा उपेक्षा विन्ध्य व महाकोशल की हुई है। निवृत्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ महाकोशल से थे। कांग्रेस की सरकार में इस क्षेत्र का अच्छा खासा रसूख था। भाजपा ने इसे एक झटके में शून्य कर दिया। महाकोशल जन्मजात भाजपाई नहीं है। जबलपुर भले ही आरएसएस की शक्तिपीठ रहा हो लेकिन भाजपा को खाता खोलने में 1990 तक इंतजार करना पड़ा। महाकोशल की तासीर भी विंध्य की तरह कांग्रेसी और समाजवादी रही है। कार्यकर्ताओं ने बड़ी मेहनत से इसे भाजपा का अभेद्य गढ बनाया। महाकोशल के लोग आज भी यह नहीं भूले हैं कि 1956 में गठित मध्यप्रदेश की राजधानी जबलपुर को न बनाकर उसके साथ कैसा छल किया गया। आज प्रदेश के इस महानगर व जिले का प्रतिनिधित्व मंत्रिपरिषद में शून्य है। कार्यकर्ता से ज्यादा यहां की जनता उपेक्षित और असम्मानित महसूस कर रही है। विंध्य की बात तो और भी विकट है। आज प्रदेश में भाजपा की जो सरकार है उसकी इमारत विंध्य के बुनियाद पर टिकी है। विंध्य जिसे हम अब बघेलखण्ड तक ही सीमित मानकर चलते हैं, में 2018 के चुनाव में 30 में से 24 सीटें मिलीं। रीवा-शहड़ोल-सिंगरौली में तो कांग्रेस का खाता ही नहीं खुल सका..वह प्रतिनिधित्व शून्य है। उमरिया और सतना जिले से जिन मीना सिंह और रामखेलावन पटेल को मंत्री बनाया गया उन्हें पड़ोस के जिले के लोग भी अच्छी तरह से नहीं जानते। आजादी के बाद से 2018 तक इस क्षेत्र के प्रतिनिधित्व की ऐसी भीषण अवहेलना कभी नहीं हुई। विंध्य कभी विंध्यप्रदेश रहा है। इसकी अपनी अलग राजनीतिक पहचान भोपाल से दिल्ली तक रही। श्रेष्ठ नेताओं की एक भव्य परंपरा रही। पंडित शंभूनाथ शुक्ल, गोविंदनारायण सिंह यमुना शास्त्री, अर्जुन सिंह, श्रीनिवास तिवारी, बैरिस्टर गुलशेर अहमद, कृष्णपाल सिंह, चंद्रप्रताप तिवारी, शत्रुघ्न सिंह तिवारी, रामकिशोर शुक्ल, मुनिप्रसाद शुक्ल, रामानंद सिंह, जगन्नाथ सिंह, राजेंद्र कुमार सिंह, अजय सिंह राहुल से लेकर राजेंद्र शुक्ल तक व कई अन्य नेता भी। इन नेताओं ने अपनी राजनीतिक मेधा से भोपाल और दिल्ली तक विंध्य के प्रतिनिधित्व की धाक जमाई..। इसके बरक्स जब आज की स्थिति देखते हैं तो यहां के नेतृत्व को अपाहिज बना देने की साजिश साफ नजर आती है। यह कैसी विडंबना है..10 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रीवा जिले के गुढ़ बदवार में बने दुनिया के विशालतम समझे जाने वाले सोलर पार्क को लोकार्पित करेंगे और इस सोलरपार्क के योजनाकार राजेन्द्र शुक्ल महज एक विधायक की हैसियत में रहेंगे। यह तो आयोजकों का बडप्पन है कि उनको लोकार्पण समारोह में जगह दी वरना वो तो महज रीवा विधानसभा के सदस्य मात्र हैं..और यह सोलरपार्क गुढ़ विधानसभा में है। ऊर्जा के क्षेत्र में बतौर मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने जो काम किया उसकी सराहना खुले मंच से नरेन्द्र मोदी स्वयं कई बार कर चुके हैं। मंत्रिपरिषद में सत्ता की सौदेबाजी के चलते प्रदेश के एक होनहार नेता की मेधा, क्षमता की बलि दे दी गई। जनता के बीच सही संदेश नहीं गया। विंध्य कभी जनसंघ और भाजपा का नहीं रहा।1990 के बाद यहां के कार्यकर्ताओं ने अपने खून पसीने से सींचकर इसे भाजपा का बाग बनाया। जनता में उम्मीदें जगीं और तब से लेकर अब तक हर चुनाव में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले आगे बढ़कर भाजपा का साथ दिया। लेकिन मिला क्या…! सबके सामने है..। भाजपा के उस बुजुर्गवार का कहना सही ही है-“आधी छोड़ सारी को धावै आधी मिलै न सारी पावै”। कांग्रेस भाजपा के इसी विरोधाभास से मुदित है। उपचुनाव के उसके सर्वे में जीत ही जीत नजर आ रही है। ‘गद्दारों को हराओ’ के हुंकार के साथ उसका रथ चंबल-ग्वालियर में उतर चुका है। भाजपा की राह आसान नहीं… उसके पास ‘मोदी’ नाम के करिश्मे के सिवाय कुछ शेष नहीं बचा है। लोकसभा चुनाव में सिंधिया अपने ही एक सिपहसलार से हार चुके हैं। उन्हें हराने वाले केपी सिंह भाजपा में ही हैं। विधानसभा में जो-जो भी कांग्रेस से हारे हैं बदले समीकरण में वे उनकी जीत के लिए जाजम नहीं बिछाएंगे…काँटे ही बोएंगे। उनके भविष्य का सवाल है। दलबदलुओं का एक बार सिक्का जमा तो अपनी जवानी होम करने वाले वो भाजपाई पल भर में खरे से खोटे हो जाएंगे। वे और उनके समर्थक ऐसा कैसे होने देंगे। जनता के बीच में ऐसे असहाय भाजपाइयों के प्रति सहानुभूति और ऊपर से कांंग्रेस का ‘गद्दारों को हराओं’ वाला आक्रामक नारा इस उपचुनाव को सहज नहीं रहने देगा। कांग्रेस इन उप चुनावों में तन-मन-धन सभी झोंक देगी। भविष्य की एक और कल्पित तस्वीर सामने है, ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर। भाजपा यदि इन उप चुनावों में जीत जाती है तो सिंधिया का कद “लार्जर दैन लाइफ” हो जाएगा। उनके गुट के मंत्रियों के लिए अभी भी भाजपा नहीं महाराज ही अभीष्ट हैं..। कल सरकार बनी रही तो सत्ता के दो स्वाभाविक केंद्र बन जाएंगे.. वैसे अभी भी कमोबेश स्थिति ऐसे ही है। यदि उप चुनावों में भाजपा सफल नहीं रहती तो तय है कि वह भविष्यवाणी चरितार्थ होगी कि- छब्बीस जनवरी को कमलनाथ ही झंडा फहराएंगे। लगता है भाजपा अपने ही बुने जाल में उलझ चुकी है। बौने कद के योजनाकारों ने आदमकदों को घर बैठाकर घरफूँक तमाशा देखने की तैय्यारी कर ली है..। क्योंकि दोनों ही स्थितियों का असर भविष्य निर्धारित करेगा। मध्यप्रदेश भाजपा का अजेय किला समझा जाता था..। कभी कभार के चुनावों में बुर्ज के कंगूरे..या झाड़फनूस भले ही हिले हों पर किला अबतक सलामत ही बचा रहा। यह आगे भी सलामत बचा रहेगा.. एक अकेले शिवराज के बूते इसे आसान नहीं और वह तब, जब- पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल का विश्लेषण. संपर्कः 8225812813

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Dakhal News 9 July 2020


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रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रेस क्लब महासमुंद के दो वर्षीय कार्यकाल के लिए नई कार्यकारिणी का गठन किया गया। अध्यक्ष आनंदराम साहू (नईदुनिया), उपाध्यक्ष संजय महंती (आज की जनधारा), महासचिव रवि विदानी (सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़) बहुमत से निर्वाचित हुए। वहीं एकल नामांकन होने से कोषाध्यक्ष देवीचंद राठी (चैनल इंडिया), सहसचिव संजय यादव (हरिभूमि)और प्रचार एवं संगठन सचिव प्रभात महंती (स्वतंत्र पत्रकार) निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। मिनी स्टेडियम रोड महासमुन्द स्थित प्रेस क्लब के सांस्कृतिक भवन में निर्वाचन अधिकारी शकील लोहानी ने चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ की। अध्यक्ष पद के लिए आनंदराम साहू और रत्‍‌नेश सोनी, उपाध्यक्ष के लिए संजय महंती, दिनेश पाटकर तथा महासचिव के लिए रवि विदानी और विपिन दुबे ने नामांकन दाखिल किया। मतदान के तत्काल बाद मतगणना हुई। जिसमें अध्यक्ष के लिए आनंदराम साहू को 18 और रत्‍‌नेश सोनी को 9 वोट मिले। इस तरह आनंदराम साहू नौ मतों के अंतर से लगातार दूसरी बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए। वर्ष 2018 में हुए कांटे की टक्कर में आनंदराम साहू महज एक वोट के अंतर से अध्यक्ष चुने गए थे। उपाध्यक्ष पद के लिए संजय महंती को 15 और दिनेश पाटकर को 12 मत मिले। महासचिव पद के लिए रवि विदानी को 14 और विपिन दुबे को 13 वोट मिले। विजयी प्रत्याशियों को निर्वाचन अधिकारी ने संरक्षकों व सदस्यों की उपस्थिति में निर्वाचन प्रमाण पत्र सौंपा। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को उपस्थित सभी सदस्यों ने बधाई देते हुए प्रेस क्लब की उत्तरोत्तर प्रगति के लिए कार्य करने प्रेरित किया। कुल 28 सदस्यों में 27 सदस्यों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। उल्लेखनीय है कि 22 मार्च को प्रेस क्लब का चुनाव निर्धारित था। इस बीच कोरोना वायरस संक्रमण के कारण जनता कर्फ्यू और बाद में लॉकडाउन हो जाने से चुनाव स्थगित हो गया था। अनलाक के बाद प्रशासन से 23 जून को निर्वाचन के लिए विधिवत अनुमति ली गई थी। कार्यकारिणी का गठनचुनाव होने के बाद सांस्कृतिक सचिव और चार कार्यकारिणी सदस्यों का मनोनयन के आधार पर पदपूर्ति का विशेषाधिकार अध्यक्ष को प्रदान किया गया। अध्यक्ष आनंदराम साहू ने सांस्कृतिक सचिव ललित मानिकपुरी(नवभारत), कार्यकारिणी सदस्यों में प्रज्ञा चौहान(स्वदेश), दिनेश पाटकर(दैनिक भास्कर), जसवंत पवार(आवाम दामिनी), अजय पांडेय (स्वतंत्र पत्रकार) को मनोनीत किया है।

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Dakhal News 5 July 2020


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भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू प्रतिबंधों के बावजूद अपराध बढ़ते जा रहे हैं। यहां दो दिन पहले दो इंजीयिरिंग के छात्रों की शराबियों ने पैसे नहीं देने पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी थी। अब एक पत्रकार पर शराबियों ने मामलू बात पर जानलेवा हमला कर दिया। बताया गया है कि उन्होंने देर रात शराबियों को घर के पास बैठकर शराब पीने से रोका, जिसके चलते उन्होंने हमला किया। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच कर रही है।   भोपाल के अयोध्या बायपास स्थित अभिनव होम्स में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार धनंजय प्रताप सिंह शनिवार की रात करीब साढ़े 10 बजे से अपने आफिस से घर पहुंचे थे। इस दौरान पड़ोसी ने उन्हें घर के पास कुछ लोगों के शराब पीकर हंगामा करने की जानकारी दी। उन्होंने देखा कि कॉलोनी में बनी टंकी पर बैठकर तीन युवक शराब पीकर अभी भी हंगामा कर रहे हैं। धनंजय ने उन्हें वहां से जाने के लिए कहा तो शराबियों ने उन पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया। तब तक वहां पड़ोसी भी पहुंच गए तो शराबी वहां से भाग गए। उन्होंने रात में ही अयोध्या नगर थाना पुलिस को जानकारी दी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मामले की जानकारी ली और उन्हें थाने पहुंचकर प्रकरण दर्ज कराने को कहा।    इस घटना को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं संज्ञान में लिया है। उन्होंने रविवार को ट्वीट करके कहा है कि जिन्होंने पत्रकार धनंजय प्रताप सिंह जी के साथ ये हरकत की है, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस एवं प्रशासन को मैंने कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दे दिए हैं। मैं धनंजय प्रताप जी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ। बता दें कि मुख्यमंत्री ने शनिवार को दोपहर में डीजीपी समेत सभी पुलिस अधिकारियों को प्रदेश से अपराधियों और को क्रश करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि अगर कोई अपराध होता है तो टीआई नहीं बल्कि अफसर जिम्मेदार होंगे। उनके दिल्ली रवाना होते ही रात में यह घटना सामने आ गई।   वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने घटना को लेकर शिवराज सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट के माध्यम से कहा है कि कल ही मुख्यमंत्री ने कानून व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा की और अधिकारियों को कड़ी कार्यवाही के निर्देश दिये और आज यह घटना ख़ुद सवाल खड़े कर रही है? इस घटना के आरोपितों पर कड़ी कार्यवाही हो और धनंजय प्रताप सिंह को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए।   बता दें कि बीते गुरुवार की रात ही भोपाल के छोला मंदिर थाना क्षेत्र में बदमाशों ने दो दिन पहले 21 साल के इंजीनियर छात्र समेत दो की हत्या कर दी थी। हमलावरों में 2 बदमाश और तीन नाबालिग के नाम सामने आए थे। जांच में सामने आया था कि आरोपितों ने शराब के लिए पैसे नहीं मिलने के कारण हमला किया था। फिलहाल, आरोपितों को दूसरे दिन ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।

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Dakhal News 5 July 2020


bhopal,Media organizations, angry over ,Prasar Bharati ,threatening ,news agency PTI

IJU Concern Over Prasar Bharati Threat To PTI The Indian Journalists Union expresses profound concern over government’s latest attempt to rein in the media, this time the biggest news agency PTI through the so-called ‘autonomous’ public service broadcaster Prasar Bharati. It is learnt that the Prasar Bharati has written to PTI saying that its conduct has made it “no longer tenable’ to patronise the news agency, after it quoted the Chinese Ambassador in India, following an earlier interview with the Indian Ambassador in Beijing, on the ongoing India-China stand-off. The Prasar Bharati has reportedly accused the PTI of its coverage ‘disseminated widely to its domestic subscribers and prominently shared with foreign entities’, of being “detrimental to national interest while undermining India’s territorial integrity”. To justify its proposed action of reviewing its subscription, which amounts to a “huge fees”, the Prasar Bharati now recalls that it has often alerted the PTI on ‘editorial lapses resulting in dissemination of wrong news harming public interest.’ In a statement, the IJU President Geetartha Pathak and Secretary General Sabina Inderjit said that though Prasar Bharati was set up as an autonomous body, it is no secret that it functions as the Government’s mouth piece and its action against the PTI smacks of the known growing intolerance there is towards ethical and independent journalism. An embedded media has no place in a democracy, even in the times of a conflict, as going on between India and China, believes the IJU. Prasar Bharati needs to remember that citizens’ right to information and the journalists’ right to report facts are non-negotiable and that its attempt to threaten the PTI will be seen as yet another attempt by the government to treat country’s media as a hand maid. Prasar Bharati must review its decision, demanded the IJU. (Sabina Inderjit)Secretary General

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Dakhal News 1 July 2020


bhopal, Government threat to PTI

डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई-भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन करके हमें किसी खबर को जबर्दस्ती देने के लिए या रोकने के लिए आदेश या निर्देश दे। अब तो प्रसार भारती ने लिखकर पीटीआई को धमकाया है कि उसे सरकार जो 9.15 करोड़ रु. की वार्षिक फीस देती है, उसे वह बंद कर सकती है। यह राशि पीटीआई को विभिन्न सरकारी संस्थान जैसे आकाशवाणी, दूरदर्शन, विभिन्न मंत्रालय, हमारे दूतावास आदि, जो उसकी समाचार-सेवाएं लेते हैं, वे देते हैं। यह धमकी वैसी ही है, जैसी कि आपात्काल के दौरान इंदिरा सरकार ने हिंदी की समाचार समितियों- ‘हिंदुस्थान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ को दी थी। मैंने ‘हिंदुस्थान समाचार’ के निदेशक के रुप में इस धमकी को रद्द कर दिया था। मैं अकेला पड़ गया। मेरे अलावा सबने घुटने टेक दिए और इन दोनों एजेंसियों को उस समय पीटीआई में मिला दिया गया। क्या पीटीआई को दी गई यह धमकी कुछ वैसी ही नहीं है ? मैं पीटीआई के पत्रकारों से कहूंगा कि वे डरें नहीं। डटे रहें। 1986 में बोफोर्स कांड पर जब जिनीवा से चित्रा सुब्रह्मण्यम ने घोटाले की खबर भेजी तो ‘भाषा’ ने उसे सबसे पहले जारी कर दिया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके अफसरों की हिम्मत नहीं हुई कि वे मुझे फोन करके उसे रुकवा दें। अब पीटीआई ने क्या गलती की है ? सरकारी चिट्ठी में उस पर आरोप लगाया गया है कि उसने नई दिल्ली स्थित चीनी राजदूत सुन वीदोंग और पेइचिंग स्थित भारतीय राजदूत विक्रम मिसरी से जो भेंट-वार्ताएं प्रसारित की हैं, वे राष्ट्रविरोधी हैं और वे चीनी रवैए का प्रचार करती हैं। उनसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य का खंडन होता है। हमारे राजदूत ने कह दिया कि चीन गलवान घाटी में हमारी जमीन खाली करे जबकि मोदी ने कहा था कि चीन हमारी जमीन पर घुसा ही नहीं है। इसी तरह चीनी राजदूत ने भारत को चीनी-जमीन पर से अपना कब्जा हटाने की बात कही है। यही बात चीनी विदेश मंत्री ने हमारे विदेश मंत्री से कही थी। मेरी समझ में नहीं आता कि इसमें पत्रकारिता की दृष्टि से राष्ट्रविरोधी काम क्या हुआ है? यह पत्रकारिता का कमाल है कि वह दुश्मन से भी उसके दिल की बात उगलवा लेती है। जो काम नेता और राजदूत के भी बस का नहीं होता, उसे पत्रकार पलक झपकते ही कर डालते हैं। उन पर राष्ट्रविरोधी होने की तोहमत लगाकर प्रसार भारती अपनी प्रतिष्ठा को ही ठेस लगा रही है। मैं समझता हूं कि सरकार को चाहिए कि प्रसार भारती के मुखिया अफसर को वह फटकार लगाए और उसे खेद प्रकट करने के लिए कहे। लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक देश के जाने माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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Dakhal News 1 July 2020


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जो इस देश का मुख्य न्यायाधीश हो, उससे कम से कम ये अपेक्षा तो की ही जाती है कि वह जब तक पद पर रहे तब तक किसी खास पार्टी के पक्ष में अपने खड़े होने का दिखावा या प्रदर्शन न करे. पर वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़ ने शर्म-लिहाज ताक पर रख दिया है. इस तस्वीर में दिख रहा है कि स्टैंड पर खड़ी एक शानदार मोटरसाइकिल, जिसे एक भाजपा नेता के पुत्र का बताया जाता है, पर बिना मास्क लगाए मुख्य न्यायाधीश महोदय बैठे हुए हैं और खास स्टाइल में तस्वीर क्लिक करा रहे हैं. तस्वीर क्लिक हुई है तभी तो इंडियन एक्सप्रेस में छपी है. यह सब कुछ जो माहौल बनाता है उससे देश के मुख्य न्यायाधीश पद की गरिमा गिरती है.

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Dakhal News 29 June 2020


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रतलाम। हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर,  गांधीवादी प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुरेश आनन्द गुप्ता का शनिवार शाम देवलोगमन हो गया है। उनका अंतिम संस्कार रविवार को प्रात:  जवाहर नगर स्थित मुक्तिधाम पर किया गया। उनके एक मात्र पुत्र इंगित गुप्ता ने मुखाग्नि दी।    बताया गया है कि वे विगत कुछ माह से बीमार थे, वे जाने माने साहित्यकार थे, जिन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी तथा लगभग डेढ़ हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख,कविताएं प्रकाशित हो चुकी है।    उनके पुत्र इंगित ने बताया कि उन्हें साहित्यालंकार सहित दर्जनों उपाधियों से सम्मानित भी किया गया। आकाशवाणी , दूरदर्शन पर उनकी रचनाएं प्रसारित हो चुकी है । ग्वालियर में पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी , जगदीश तोमर , शैवाल सत्यार्थी , स्व भवानी प्रसाद मिश्र, कवि नीरज, शैल चतुर्वेदी जैसे अनेक साहित्यकारों के साथ रह चुके हैं। ' छन छन कर आती है धूप , मेरे पर्दे से मेरे कमरे में , लड़ा बैठी आंखे मेरी दीवारों से उनका चर्चित गीत रहा है। उनके तीखे व्यंग्य किसी तीर के वार से कम नही रहे है । ' मैं हिंदुस्तान को हिन्दुस्तान देखना चाहता हूं , जिसने भी उठाई आंख उसे भेदना जानता हूँ , क्या हुआ मेरे पास तलबार नहीं है , मैं कलम में ही बारूद भरना चाहता हूँ  काव्य के ऊर्जावान साहित्यकार आनन्द जी के निधन की खबर मिलते ही उनके चाहने वाले उनके निवास पर पहुंच गए थे। 

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Dakhal News 28 June 2020


bhopal,Indira Gandhi, Narendra Modi ,Ram Bahadur Rai ,article

विषय : पत्रकार-बुद्धिजीवी राम बहादुर राय Communal & Prejudice Mind श्रीमान संपादक जी राजस्थान पत्रिका समूह के प्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक पत्रिका में अत्यंत वरिष्ठ और सम्मानीय पत्रकार के लेख पर मेरी यह प्रतिक्रिया आप धैर्य धारण कर अवश्य पढ़ लीजिए। शायद कुछ बातें आपको बहुत पसंद आए! पत्रिका अखबार के दिनांक 25 जून के अंक में “दूसरे आपातकाल की कोई आशंका नहीं” शीर्षक से वरिष्ठ, सम्मानित पत्रकार और बुद्धिजीवी राम बहादुर राय का लेख इंदिरा गांधी के आपातकाल के संबंध में निष्पक्ष और यथार्थवादी विवेचन नहीं है। श्री रामबहादुर राय को भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की स्मृति में बनाए गए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का चेयरमैन मोदी राज में बनाया गया। श्री रामबहादुर राय का जन्म गाजीपुर में जुलाई 1946 में हुआ। उन्होंने देश के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकाशन संस्थानों में सक्रिय रहकर पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन कड़वा सच यह भी है कि ये हमेशा कांग्रेस के विरोध में रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी से संबंधित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन के विस्तार में लगे रहे। उस संगठन के यह सचिव भी रहे हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदू शब्द हटाए जाने के संबंध में 1965 में इन्होंने विरोध आंदोलन में भाग लिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में छात्र परिषदों के चुनाव पर रोक के संबंध में उग्र आंदोलन किया था। इंदिरा गांधी को काले झंडे दिखाए थे। साथ ही श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के दिनों में यह 16 महीने जेल में भी रहे। इस तरह इंदिरा गांधी के प्रति इनका आक्रोश, इनकी नफरत और पूर्वाग्रह को अच्छी तरह समझा जा सकता है। श्री राय का चरित्र और स्वभाव और मूल चिंतन कट्टर हिंदू वाद है। यह इमरजेंसी की आलोचना करते हैं और श्रीमती गांधी पर व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे हैं जो कुछ हद तक तो सही है परंतु इमरजेंसी में जो रेल रोको आंदोलन करके पूरे देश की अर्थव्यवस्था और जन सुविधा को तहस-नहस कर दिया गया था; पूरे देश में उग्र आंदोलन चल रहे थे, उसके संबंध में इन पत्रकार महोदय ने पूरी तरह चुप्पी साध ली। इमरजेंसी की घोषणा आजादी के संदर्भ में बहुत ही निंदनीय थी लेकिन जिस तरह कोरोना का एक पहलू बहुत अच्छा है वैसे ही इमरजेंसी में भी बहुत सारे अच्छे काम हुए थे। इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत ईमानदारी, निष्ठा, निडरता, देशभक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता। भारत एक महाशक्ति बन चुका है, जैसा संदेश देना उनकी विशेषता है! इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता, सिवाय चंद पूर्वाग्रही लोगों के! भूतपूर्व राजा महाराजाओं के सरकारी प्रीवि पर्स समाप्त करना और बैंकों का राष्ट्रीयकरण व बांग्लादेश का निर्माण तो उनके अमर ऐतिहासिक कदम है, उपलब्धियां हैं! इंदिरा गांधी और आपातकाल की निंदा करने के बाद राम बहादुर राय वर्तमान शासन काल और मोदी की प्रशंसा में लेख लिखे हैं। इस लेख से उनकी कर्तव्य निष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता और निर्भीक पत्रकारिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है और बड़े आश्चर्य की बात है कि पद्मश्री प्राप्त ऐसा तेजतर्रार और उच्च शिक्षा प्राप्त पत्रकार/लेखक उस शासन तंत्र की तारीफ कर रहा है जिसके शासनकाल में देश की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई है। डीजल पेट्रोल के दामों में भयानक वृद्धि की गई है जिससे पूरा देश विचलित है!! कोराना महामारी का इतना भयानक प्रचार-प्रसार हो गया। हिंदू मुसलमानों के बीच में जो नफरत और भेदभाव अंग्रेजों के शासन काल में भी नहीं हो सका; वह सन 2014 के बाद अब देखने को मिल रहा है। संपन्न तथा सत्तापक्ष से जुड़े लोगों को छोड़कर, एक अघोषित आपातकाल जैसा चल रहा है! अब तो देश की रक्षा के संबंध में प्रश्न पूछने वाले टीवी पत्रकारों और विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं को, नागरिकों को, कभी भी देशद्रोही/ गद्दार /और सेना का अपमान करने जैसा, आरोप लगाकर निम्न स्तरीय दुष्प्रचार किया जाता है। ये इस शासनकाल में आम बात हो गई है। श्री राम बहादुर राय अपने चिंतन में शायद कट्टर सांप्रदायिकता और कट्टर राष्ट्रवाद को बहुत सही मानते होंगे। आतंकवाद की समाप्ति और विकास के नाम पर पूरे कश्मीर राज्य के टुकड़े करके लगभग 6 महीने तक के लिए पूरे राज्य को जेल खाने में बदल दिया गया। उसके संबंध में ये पत्रकार महोदय जिन्हें पद्मश्री भी दी गई है, एक शब्द भी नहीं लिखते! व्यक्तिगत पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत राग द्वेष की दृष्टि से, देश के अपने समय के अभूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संबंध में एकपक्षीय दूषित विचार रखना, स्वस्थ निष्पक्ष निर्भीक पत्रकारिता नहीं है। संपादक जी आप अगर निष्पक्ष निर्भीक और स्वस्थ पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं और इतना साहस भी रखते हैं (हालांकि इसकी आशा कम ही है) तो आप से निवेदन है कि हो सके तो श्री राम बहादुर राय तक मेरी यह प्रतिक्रिया अवश्य पहुंचा दें! बड़ा आभारी होऊंगा! श्रीकांत चौधरीभूतपूर्व शिक्षक एवं न्यायाधीशव्यंग्य लेखकएमए, एलएलबी (असली डिग्री धारी)दमोह (मध्य प्रदेश)shrikant2011dmo@gmail.com

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Dakhal News 27 June 2020


bhopal,Career in journalism

  प्रमोद भार्गव आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से पत्रकारिता जुड़ गई है। इसीलिए पत्रकारिता में विविधता को प्रस्तुत करने के लिए बहु आयाम भी विकसित हो गए हैं। इन्हें हम अभिव्यक्ति के रूप में मुद्रित और दृश्य व श्रव्य के रूप में प्रसारण से जुड़े संचार के अनेक माध्यमों के जरिए सुन व देख सकते हैं। सभी माध्यमों की आसान या कहें मुट्ठी में उपलब्धता के चलते इसकी पहुंच दूरांचलों के उन दुर्गम इलाकों में भी हो गई है, जहां आज भी सुगम रास्ते नहीं हैं। जबतक समाचार मुद्रित स्वरूप में उपलब्ध थे, तब यह जरूरी था कि इनका लाभ बिना पढ़ी-लिखी एक बड़ी आबादी नहीं उठा पा रही है और इस कारण वह देश के हालात, जनकल्याणकारी योजनाएं और जागरुकता से वंचित हैं। परंतु अब मुट्ठी में बंद मोबाइल ने इस कमी को पूरा कर दिया है। यदि आपके पास स्मार्टफोन है और उसमें इंटरनेट की सुविधा है तो फिर देश का नागरिक सीमाओं के भीतर कहीं भी बैठा हो, वह ई-पेपर से लेकर समाचार चैनलों के जरिए समाचार की भूख की पूर्ति कर सकता है। फेसबुक, वाट्सअप, इंस्ट्राग्राम व अन्य अनेक सोशल साइट्स पर वह अपनी समस्या भी टूटी-फूटी भाषा अथवा चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है। सोशल प्लेटफॉर्म पर आंख गढ़ाए बैठे पत्रकार इसे देखते ही उठा लेंगे और आम आदमी की यह पोस्ट खबर बन जाएगी। आजकल बाढ़ग्रस्त इलाकों में जहां पत्रकार की पहुंच संभव नहीं हो पाती है, वहां के समाचार धड़ल्ले से सोशल प्लेटफार्मों से ही उठाए जा रहे हैं। भारत में आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना माना जाता है। इसकी शुरुआत 30 मई 1826 को हिंदी में प्रकाशित साप्तहिक समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड से हुई थी। किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित होने वाला यह देश का पहला समाचार-पत्र है। उदंत मार्तण्ड का अर्थ उगता सूर्य है। पत्रकार और पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में यह शब्द अत्यंत सार्थक हैं क्योंकि पत्रकार या लेखक वह रोशनी है जो देश के नागरिकों में उस ज्ञान की जानकारी भरती है जो नागरिक को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत बनाए रखने का काम करती है। प्रत्येक मंगलवार को छपने वाले इस अखबार के मालिक, मुद्रक व संपादक पंडित कुमार शुक्ला थे। इसमें खड़ी बोली और ब्रजभाषा का उपयोग होता था। अखंड या बृहत्तर भारत में सूचना संप्रेषण की शुरुआत नारद मुनि से मानी जाती है। नारद मुनि समाज में व्याप्त विसंगति या किसी आक्रांता शासक की मनमानी की सूचना ब्रह्मलोक में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को पहुंचाने का काम करते थे और फिर ये शक्तिशाली ईश्वरीय अवधारणा से जुड़े देव समस्या के समाधान के प्रति सचेत हो जाते थे। रामायण काल में सूचना के वाहक के रूप में यही काम रामभक्त हनुमान ने किया था। मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त आरएमपी सिंह ने इस कालखंड की पत्रकारिता को बड़े ही सहज रूप में अति सुंदर शिल्प के साथ अपनी पुस्तक रामचरित मानस में संवाद संप्रेषण में अभिव्यक्त किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में यह पुस्तक इसलिए अनूठी है क्योंकि पत्रकारिता के लगभग सभी आयामों को स्पर्श करते हुए हरेक पहलू को इस पुस्तक में आधुनिक संदर्भ में व्याख्यायित किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो आज अनेक रूपों में है, स्वतंत्रता के पहले वह रेडियो और बाद में दूरदर्शन के माध्यमों में ही दिखाई देता था। किंतु यही माध्यम महाभारत काल में धृतराष्ट्र और संजय के वार्तालाप में इस ढंग से दर्शाया है कि कोई पत्रकार उपग्रह से जुड़े कैमरे के जरिए कुरुक्षेत्र में चल रहे महाभारत युद्ध का लाइव वृत्तांत सुना रहा हो। मेरी दृष्टि में यही कल्पना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और उसमें भी लाइव प्रसारण का आधार स्रोत है। अब एक युवा जो पत्रकार बनने की जिज्ञासा रखता है, वह पत्रकारिता का समग्र अध्ययन करे कहां, सार्थक प्रायोगिक प्रशिक्षण कहां से ले तो इस जिज्ञासा शमण का सर्वश्रेष्ठ स्थान है भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय! यह मध्य प्रदेश का ही नहीं एशिया का सबसे पहला पत्रकारिता विवि है, जिसकी नींव 1990 में रखी गई थी। आज इस विवि से प्रशिक्षित होकर निकले पत्रकार प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचार चैनलों में श्रेष्ठतम सेवाएं दे रहे हैं। विवि के कुलपति संजय द्विवेदी कहते हैं, `हमारी कोशिश है कि यह विवि भारतीय भाषाई पत्रकारिता के प्रशिक्षण के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो। इसके लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।' उनकी यह परिकल्पना इसलिए अहम् है क्योंकि आज हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं से प्रशिक्षण देने वाले विवि तो देशभर में खुल गए हैं लेकिन भारतीय भाषाओं में इनका अभाव खलता है। दरअसल, जितनी आज महत्वपूर्ण व राष्ट्रव्यापी पत्रकारिता हिंदी व अंग्रेजी की है उतनी ही महत्वपूर्ण देश की अन्य भाषाओं की भी है। इन भाषाओं में भी बड़े-बड़े समाचार पत्र व पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और लगभग संविधान की अनुसूची में दर्ज प्रत्येक भाषा में टीवी समाचार चैनल हैं। जब देश में बड़ी राजनीतिक घटना या दुर्घटना घटती है तो हम देखते हैं कि हिंदी व अंग्रेजी के चैनल, भाषाई चैनलों से ही खबर उठाकर प्रसारित करते हैं। इसीलिए जरूरी है कि भाषाई पत्रकार भी पत्रकारिता के गुणों से संपूर्ण रूप में दक्ष हों और दायित्व को लेकर संविधान के नैतिक मानदंडों के प्रति स्वनियंत्रित हों। स्वनियंत्रण की नैतिकता ही किसी पत्रकार को इस क्षेत्र में लंबी पारी खेलने का अधिकारी बनाने का रास्ता खोलती है। स्वनियमन का प्रशिक्षण कोई विद्यार्थी आदर्श रूप में वहीं से ग्रहण कर सकता है जहां के परिवेश में नैतिक मूल्य आचरण में शुमार हों। स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता के माध्यम से मुख्य भूमिका निभाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी न केवल समर्थ पत्रकार व लेखक थे बल्कि कर्मवीर नामक पत्र निकालकर उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध कलम चलाकर जनमानस को भी स्वतंत्रता के लिए खड़ा करने में अहम् भूमिका निभाई। गोया यह नाम ही आदर्श आचरण का प्रतिरूप है। यह विवि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खबर से आगे भी क्या संभव है, इस धारणा को विकसित करता है। यानी मौलिक सोच को कैसे फीचर लेखन का आयाम दिया जाए, इस समझ को विद्यार्थी के मन में विकसित करता है। इस लेखन में विचार भी अंगीकार होता है। यही वह समझ है जो नवोदित पत्रकार में संपादकीय लिखने की क्षमता विकसित करती है। इसलिए यहां के प्राध्यापक रामदीन त्यागी कहते हैं संचार माध्यमों के व्यापक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप और कर्तव्य के प्रति सचेत बने रहने के लिए हमें अत्यंत कर्मठ और लगनशील युवा पत्रकारों को गढ़ने की जरूरत है, जिससे वे राष्ट्रीय सरोकरों से जुड़े रहते हुए अपनी भाषा में आकर्षक ढंग से समाचार अभिव्यक्त करने की दक्षता इस परिसर से प्राप्त कर सकें। वर्तमान में इस विवि में प्रवेश की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। यहां मीडिया और आईटी पाठ्यक्रमों को पढ़ने की स्नातक व स्नातकोत्तर सुविधाएं हैं। इन क्षेत्रों में कैरियर के अभिलाषी छात्र-छात्राएं भोपाल स्थित विवि के अलावा इसी विवि के रीवा और खंडवा परिसरों में भी पढ़ने के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। प्रवेश की सुविधा ऑनलाइन के जरिए विवि की वेबसाइट पर जाकर भी सीधे आवेदन फॉर्म भर सकते हैं।  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 June 2020


bhopal,JP Nadda,huge amount ,Chinese institutions , Rajiv Gandhi Foundation

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरुवार को मध्यप्रदेश की वर्चुअल रैली को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कांगेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की विभिन्न संस्थाओं ने मोटी रकम मुहैया कराई है। इस फाउंडेशन के चेयरपर्सन सोनिया गांधी हैं और इससे कई कांग्रेस के नेता जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि चीन और कांग्रेस के बीच गुपचुप रिश्ता है।   भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने वर्चुअल रैली को संबोधित करते हुए कहा कि आज ही मैंने टेलीविजन में देखा और दंग हूं कि राजीव गांधी फाउंडेशन को 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और चाइनीज एंबेसी ने तीन हजार यूएस डॉलर मुहैया कराए हैं। इस फाउंडेशन को इतनी मोटी रकम क्यों दी गयी। देश जानना चाहता है कि फाउंडेशन को इतना पैसा किस उद्देश्य से दिया गया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि ये वही लोग हैं जो चीन से फंड लेकर उसके पक्ष में माहौल बनाते हैं, स्टडी कराई जाती है। सभी राजनीतिक दल के लोगों ने मोदी जी से कहा कि वह सभी देशहित में एक साथ खड़े हैं। एक परिवार ने विरोध किया। कांग्रेस पार्टी के हाथी के दांत है खाने और दिखाने के अलग हैं।   उन्होंने कहा कि गलवान घाटी में हुयी घटना पर भी कांग्रेस ने राजनीति की। ये वही कांग्रेस है, जिसने 2017 के अगस्त माह में जब चीन और भारत आमने सामने थे, तब राहुल गांधी चीन के राजदूत के साथ गुपचुप मुलाकात कर रहे थे और अब ये लोग चीन के मामले में सवाल उठा रहे हैं। तीन हजार यूएस डालर लेने वाले मुखर नहीं हो सकते हैं। ये अपने स्वार्थ के जाल में स्वयं उलझे हुये हैं। नड्डा ने गांधी-नेहरु परिवार पर निशाना साधते हुए कि एक ही परिवार, जिसे जनता ने वर्तमान में नकार दिया है, वह संपूर्ण विपक्ष नहीं हो सकता है। उन्होंने इस परिवार की नीयत और नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसकी ही गलती के कारण 43 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि चली गयी। जब गलवान घाटी को लेकर सभी राजनैतिक दल केंद्र की मोदी सरकार के साथ हैं, वहीं एक परिवार सवाल खड़े कर रहा हैं।   भाजपा अध्यक्ष ने वर्चुअल रैली में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि मैं मध्य प्रदेश को बधाई देना चाहता हूं कि कोराना संकट में 3 करोड़ फूड पैकेट्स, 30 लाख राशन किट और लगभग 5 करोड़ लोगों को फूड द निडी कार्यक्रम में और लगभग 70 लाख लोगों को फेस कवर पहुंचाने का काम मध्य प्रदेश की इकाई ने किया है। उन्होंने कहा कि मार्च में शक्तिशाली देश असहाय महसूस कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी जी ने तुरन्त डिसीजन लेकर लॉकडाउन लगाकर लोगों को नया जीवन दान दिया। आज एक हजार कोविड के डेडिकेटेड अस्पताल हैं। दुनिया में 6 मौतें प्रति लाख हो रही हैं, जबकि हमारे देश में एक मौत प्रति लाख हो रही है।   उन्होंने कहा कि हम कोरोना संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। बीते मार्च में बड़े-बड़े देश अपने आप को लाचार, असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन भारत मोदी जी के नेतृत्व में कोरोना संकट से लडऩे के लिए तैयार हुआ। आज देश अनलॉक हो रहा है, लेकिन कई राजनीतिक पार्टियां आज भी लॉकडाउन में हैं। मुझे खुशी है कि भाजपा ने डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोगों के साथ जुडऩे की शुरुआत की है।   नड्डा ने कहा कि मुझे कोरोना काल में आपसे संवाद करने का मौका मिला। ये 45वी वर्चुअल रैली है। इस समय वर्चुअल रैली में 33 लाख लोग हमसे जुड़े हुए हैं। छह साल में प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में वह काम हुए जो 6 दशकों में भी नहीं हो सके थे। बता दें कि मध्यप्रदेश भाजपा की ओर से आयोजित इस वर्चुअल रैली को राज्य में लाखों लोगों ने सुना। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिल्ली से अत्याधुनिक तकनीकी की मदद से संबोधित किया और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा और अन्य भाजपा नेताओं ने इसे भोपाल में संबोधित किया और सुना भी।

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Dakhal News 25 June 2020


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ग्वालियर। देश के जाने माने पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर के छोटे भाई अनुराग तोमर का भी गत दिनों यहां कैंसर के कारण असामयिक निधन हो गया। अनुराग केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे और अरूणाचल प्रदेश में तैनात थे। हाल में उनको कैंसर होने की जानकारी मिली जिसके बाद कुछ महीनों तक ग्वालियर में ही उनका उपचार चलता रहा लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। ज्ञात हो कि वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर का निधन कैंसर के चलते हुआ। आलोक तोमर की कई राउंड कीमियोथिरेपी हुई थी पर उन्हें बचाया न जा सका था।

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Dakhal News 24 June 2020


bhopal,Is this letter of UP STF real or fake?

वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर पर दो पन्ने का एक लेटर शेयर फारवर्ड किया जा रहा है जिसे यूपी एसटीएफ का बताया गया है. इस लेटर में चाइनीज एप्प हटाने के निर्देश हैं. आखिर में पुलिस महानिरीक्षक एसटीएफ लखनऊ का नाम लिखा गया है. पर यहां किसी के नाम से कोई हस्ताक्षर नहीं है.   हस्ताक्षर विहीन इस लेटर का लुक एंड फील भी प्रथम नजर में यह बता देता है कि यह आफिसियल लेटर नहीं है. लेटर में न तो यूपी पुलिस का लोगो है न ही कोई लेटर पैड है. न ही कोई पत्र क्रमांक संख्या है और न ही पत्र किसी को संबोधित है. पत्र की प्रतिलिपि भी किसी को नहीं है.   साथ ही ये भी सोचने की बात है कि जब भारत सरकार, यूपी सरकार ने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया तो अचानक यूपी एसटीएफ कैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े मामले में किसी एक देश का एप्प जोड़ने या हटाने को लेकर आदेश जारी कर देगी? हां ये हो सकता है कि अनआफिसियली ये लेटर जारी किया गया हो लेकिन अनधिकृत पत्र को कैसे असली व सरकारी मानकर खबर का प्रकाशन किया जा सकता है? आजतक, हिंदुस्तान समेत कई बड़े-छोटे मीडिया वालों ने इस लेटर के आधार पर खबर का प्रकाशन कर दिया. बताया जाता है कि कुछ जगहों से इस खबर को वरिष्ठों के निर्देश के बाद हटा लिया गया. देखें छोटे बड़े कई पोर्टलों पर छपी इस खबर का स्क्रीनशाट-

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Dakhal News 20 June 2020


bhopal, Vishwas Garde Bhau is being deceived like this!

प्रख्यात पत्रकार लक्ष्मण नारायण गर्दे के पौत्र विश्वास गर्दे ‘भाऊ’ की शल्य चिकित्सा और फिर निधन के दुख के बीच रविवार को बनारस से लखनऊ लौट रहा था तो रास्ते में फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबर आई। मुझे नहीं मालूम कि टेलीविजन और फिल्म की चकाचौंध भरी दुनिया में वह किस तरह का अवसाद और अकेलापन था जिसके कारण सुशान्त ने आत्महत्या जैसे पलायन का मार्ग चुना लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मैंने भाऊ को लगातार अकेला होते जाने को देखा है।   सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर और लक्ष्मण नारायण गर्दे- बनारस में दो प्रसिद्ध और समकालीन मराठीभाषी पत्रकार तो थे ही, आपस में रिश्तेदार भी थे। पराड़कर जी की भतीजी का विवाह गर्दे जी के पुत्र से हुआ। भाऊ के पिता गर्दे जी के पुत्र और माता पराड़कर जी की भतीजी थीं। इस तरह भाऊ मेरे भाई थे। करीब डेढ़-दो दशक पूर्व हम जब भी भाऊ के घर जाते, अक्सर वे घर पर नहीं होते। उनके यार-दोस्तों का एक बड़ा दायरा था। वे जब भी आते, कुछ लोगों के साथ ही आते। उनके बहुत सारे दोस्तों के नाम हमें भी याद थे।   भाऊ का अर्थ भाई होता है और वे पूरे मोहल्ले में घर के बड़े भाई की तरह ही लोकप्रिय थे। ज्यादातर लोग उन्हें भाऊ कहते और कुछ लोग भाऊ को किसी नाम-उपनाम की तरह समझते हुए उसमें आदर से भैया भी जोड़ देते। इस प्रकार वे बहुत सारे लोगों के भाऊ भैया हो जाते जबकि दोनो का अर्थ एक ही है। भाऊ सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते। किसी के घर विवाह हो या कोई अस्पताल में हो, भाऊ उसमें शामिल मिलते। वे पत्थरगली, रतनफाटक, जतनबर, दूधकटरा, बीबी हटिया, गायघाट, ब्रह्माघाट, दुर्गाघाट, दूध विनायक और आसपास के क्षेत्रों के अघोषित सभासद की तरह थे। हालांकि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं रही लेकिन उनकी सामाजिक सहभागिता से अक्सर ये भ्रम होता कि वे किसी ऐसे लाभ के लिए ही ऐसा कर रहे हैं। भाऊ पक्के महाल के इन इलाकों में पत्रकारों के सबसे बड़े सूत्र थे। दिग्गज पत्रकार के परिवार से होने के कारण ज्यादातर समाचार पत्रों के संवाददाताओं के पास उनके नंबर होते और भाऊ उनके लिए हमेशा उपलब्ध रहते। इन मराठी बाहुल्य क्षेत्रों में मराठियों से जुड़े आयोजन की खबर तो भाऊ के बिना पूरी ही नहीं होती। गणेशोत्सव के दौरान तो उनकी खूब मांग रहती थी। भाऊ कभी स्वतः पत्रकार नहीं बन सके लेकिन वे बनारस की पत्रकारिता में लंबे समय तक अपरिहार्य रहे। यहां तक की कोई पराड़कर जी, गर्दे जी या रणभेरी आदि से जुड़े टीवी कार्यक्रमों का निर्माण कर रहा होता तो वह भाऊ की ही शरण में होता। हालांकि इन सब का कभी कोई क्रेडिट उन्हें नहीं मिला लेकिन भाऊ मदद करके ही खुश हो लेते। ये जरूर हुआ कि इन सारी चीजों का असर उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ता गया। सामाजिक कार्यों में ऐसा मन रमता रहा कि न कहीं नौकरी कर सके और न विवाह। चार बहनों के विवाह और उनके परिवारों की खुशी में अपनी खुशी देखी लेकिन बहनों के बाद माता-पिता के देखभाल की जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं। फिर यह भी हुआ कि माता-पिता की देखभाल के कारण उनका सामाजिक दायरा कम होता चला गया और परिवार में पूरा वक्त बीतने लगा। फिर मां भी चल बसी और पिता को स्मृतिलोप के बाद संभाल पाना कठिन से कठिनतर होता चला गया लेकिन यहीं भाऊ ने समाज का बदला हुआ रूप भी देखा। जो भाऊ हमेशा दूसरों के कामों में बढ़चढ़कर शामिल होते थे, जो हमेशा यार-दोस्तों से घिरे रहते थे, जिनका पता मोहल्ले में कोई भी बता सकता था, जिनका नाम ज्यादातर लोगों की जुबान पर होता था, उनका हालचाल लेने वाला भी कोई नहीं बचा। वे लगातार अकेले होते चले गए। ऐसा समय भी आया कि मई के मध्य जब भाऊ बीमार पड़े और बेसुध रहने लगे तो उनका हालचाल लेने वाला तक कोई नहीं था। यह लाकडाउन का समय था और कोरोना के भय से लोग अपनों तक से दूर थे। भाऊ कई दिनों तक इलाज को तरसते रहे। अन्ततः योगेश सप्तर्षि, पूर्व सभासद घनश्याम और पत्रकार मनोज को खबर मिली तो उन्होंने जैसे-तैसे पास के एक अस्पताल में उन्हें दाखिल कराया। बाद में उन्हें एक निजी अस्पताल लाया गया लेकिन उनकी हालत बिगड़ चुकी थी। इस बीच सूचना पाकर उनकी बहनें और उनके पति भी वहां आ सके। लेकिन भाऊ को बचाया नहीं जा सका। 62 वर्ष की उम्र में भाऊ चल बसे लेकिन उनके निधन के बहुत पहले ही उनके उस विश्वास का अन्त भी हो गया था जो परपीड़ा और परहित को अपना समझने के दौरान उनके मन में कहीं न कहीं फल-फूल रहा था!  

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Dakhal News 20 June 2020


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कम से कम अभी तक शहीद जवानों के नाम और तस्वीरें साझा होनी चाहिए थी। देरी हो रही है। क्यों देरी हुई पता नहीं। फ़िल्म अभिनेता की मौत पर ट्विट करने वाले प्रधानमंत्री चुप हैं। शायद उनके समर्थक बताने में लगे होंगे कि कोई बात नहीं, अभी कोई चुनाव होगा आप ही जीतेंगे। जवाब मिल जाएगा। लेकिन शहादत को सलाम करने में देरी कैसी? यही नहीं, पूरा दिन बीत गया संख्या बताने में। रक्षा कवर करने वाले पत्रकारों ने उसी वक्त संख्या को लेकर ट्विट करना शुरू कर दिया था मगर सरकारी बयान में संख्या तीन ही रही। रात दस बजे तक। यही नहीं आधिकारिक तौर पर उनके नाम नहीं बताए गए। ख़ैर यह बात चटखारे के लिए नहीं है। यह बात है कि हम कब हालात की संवेदनशीलता को समझेंगे। कब तक सूत्रों के सहारे से खबरों को प्लांट कर तीर मारा जाएगा। इससे आप चुनाव जीत सकते हैं । सच्चाई को हरा नहीं सकते। सतीश आचार्य का यह कार्टून उचित ही पूछ रहा है। आप बनने को तो हर चीज़ बन जाते हैं, प्रधानमंत्री कब बनेंगे। मीडिया मैनेजमेंट और तमाशे से कूटनीति में टी आ पी का जोश आता है लेकिन झूला झूलने से भव्यता आती होगी, कूटनीति इससे तय नहीं होती। प्रधानमंत्री को जनता ने दो वरदान दिए हैं। एक चुनाव में विजय और दूसरा पराजित और दंडवत् मीडिया। स्वीकार करें प्रधानमंत्री जी। कोई इवेंट की योजना बन रही हो तब तो कोई बात नहीं। उसके तमाशे में ऐसे सवाल धूल बन कर उड़ जाएँगे। बैंड बाजा बारात आपके पास है तो तमाशा करने की कला भी आपके ही पास होगी। आई टी सेल शहादत के सम्मान में जुटा होता तो आज पूछ रहा होता कि शहीदों के नाम क्या हैं ? उनकी संख्या क्या है? सीमा पर चीनी सैनिकों का जमघट बनने कैसे दिया गया? लेकिन इस सवालों की कोई क़ीमत नहीं है। मुझे यक़ीन है कि लोग राहुल गांधी पर ग़ुस्सा निकाल रहे होंगे, जो कोरोना की तरह इस बार भी चीन को लेकर अपना सर ओखली में डाल पूछ रहे थे। देश झूला नहीं है। प्रधानमंत्री जी। कोविड -19 से लड़ने की हमारी तैयारियाँ फुस्स हो चुकी हैं फिर भी आप कह रहे हैं कि हमारी तैयारियों का अध्ययन किया जाएगा। ऐसा आत्म विश्वास अच्छी यूनिवर्सिटी बनाने, अस्पताल बनाने और रोज़गार पैदा करने में होता तो क्या ही बात थी । लेकिन इसमें आपकी गलती नहीं है। राहुल गांधी की है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 17 June 2020


bhopal,Yogi remains intact within the government

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था किसी भी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए और यह तब संभव है जब सरकार की गंगोत्री यानि मंत्रिमंडल में शामिल लोग साफ-सुथरे हों। उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने हाल में आटा की आपूर्ति का ठेका दिलाने के लिए हुई 9 करोड़ 79 लाख रुपये की धोखाधड़ी के जिस मामले में कार्रवाई की है उसमें पशुधन राज्य मंत्री रजनीश दीक्षित के निजी सचिव को गिरफ्तार किये जाने से सरकार के अंदरूनी हालातों की झलक मिल गई है।   कैसे हो गया दिया तले अंधेरामुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने पदभार संभालते ही भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टोलरेंस की नीति की घोषणा की थी। लेकिन तब दिया तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ हो गई थी जब उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों का निजी स्टॉफ काम कराने के लिए डील करते हुए स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ लिया गया। इसके बाद अपने मंत्रिमंडल के पहले पुनर्गठन में योगी ने कुछ मंत्रियों की छुटटी कर दी और कुछ के पर कतर दिये जो बेहद प्रभावशाली थे। मुख्यमंत्री के क्यों बंधे हैं हाथमुख्यमंत्री के इस कठोर रुख से कुछ दिनों तक उनके सहयोगियों में खौफ रहा लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक कायम नही रह सकी। इसके कारणों पर विचार करते हुए यह बात भी सामने आती है कि मुख्यमंत्री के हाथ ऊपरी हस्तक्षेप के चलते पूरी तरह खुले हुए नही हैं। कई दागी मंत्रियों को हटाने में वे इस कारण नाकामयाब हो गये थे क्योंकि उन्हें शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त था। पटरी से उतरी प्राथमिकताएंदरअसल मुख्यमंत्री के सामने यह स्पष्ट है कि जन समर्थन जुटाने में विकास, स्वच्छ शासन-प्रशासन और प्रभावी कानून व्यवस्था जैसे मुददे ज्यादा महत्व नही रखते। इसलिए उन्होंने भावनात्मक एजेंडे को आगे बढ़ाया। बसपा का बहुजन फार्मूला बेहद कारगर था लेकिन सत्ता पाने और उसे मुटठी में बनाये रखने की अधीरता में मायावती ने अपना भावनात्मक एजेंडा दरकिनार कर दिया और शासन की स्वाभाविक प्राथमिकताओं में बढ़त लेकर सिक्का जमाने की कोशिश की जिसमें वे बुरी तरह फेल रहीं। मायावती के इस हश्र से योगी ने कहीं न कहीं सबक सीखा है इसलिए उन्होंने ट्रैक बदला और गुड गवर्नेन्स के फेर में पड़ने के बजाय जिलों के नाम बदलकर उन्होंने भावनात्मक मुददों पर आगे बढ़ने की शुरूआत की। संकीर्ण राजनीति को लेकर उनकी आलोचना भी हुई, यहां तक कि केंद्रीय नेतृत्व को भी उनके तौर-तरीके रास नही आये लेकिन वे टस से मस नही हुए। आज हालत यह है कि उनके कटटरवादी रवैये को बड़ी जन स्वीकृति मिल चुकी है और उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी व्यक्तिगत स्थिति इतनी मजबूत कर ली है कि लखनऊ में मोदी नही योगी चाहिए के पोस्टर तक लग गये हैं। कैलकुलेटिव योगी की कूटनीतिपर योगी संत होकर भी बहुत ही कैलकुलेटिव हैं। उन्होंने अपनी मंजिल तय कर रखी है। जिसकी ओर आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ने की निपुणता दिखा रहे हैं। वे नही चाहते कि केंद्रीय नेतृत्व के प्रतिद्वंदी के रूप में उनकी छवि बने और उनका पहले कौर में ही बिस्मिल्लाह हो जाये। इसकी बजाय उन्हें फिलहाल अनुयायी बने रहकर अपनी जड़ें मजबूत करते जाने की रणनीति पर भरोसा है। खबर है कि उत्तर प्रदेश में प्रशासन के बड़े पदों पर नियुक्तियां दिल्ली के निर्देशों पर होती हैं। इसलिए कई भ्रष्ट अफसर ऊपर के लोगों के कृपा पात्र होने के कारण प्राइज पोस्टिंग हासिल करने में सफल हो रहे हैं। योगी इसका कोई प्रतिरोध नही करना चाहते। मंत्रियों के मामले मे भी उन्होंने इसी तरह टकराव से बचने की नीति अपना रखी है। भ्रष्टाचार को लेकर संघ भी क्यों नही है दो-टूकसंघ को भी भ्रष्टाचार रोकने और विकास के मामले में बहुत दिलचस्पी नही है, भले ही संघ प्रमुख कहते हों कि उनका काम व्यक्ति और समाज का निर्माण करना हैं। इसी कारण संघ मंत्रियों और अधिकारियों को लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों पर कान नही धर रहा। संघ समाज के उस पुराने मॉडल को पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है जो उसका आदर्श है। उसे जो चाहिए योगी कर रहे हैं। इसलिए योगी संघ के और ज्यादा प्रिय बनते जा रहे हैं और वे यही चाहते हैं। रहस्य जानना नहीं रहा मुश्किलबहरहाल मंत्री का निजी स्टॉफ अपने बॉस की बिना जानकारी के गड़बड़ियां करे यह संभव नहीं है। इसलिए अपने निजी सचिव के कारनामें के छीटों से पशुधन राज्य मंत्री खुद को बचाना चाहें तो यह मुश्किल है। आम धारणा यह है कि अकेले पशुधन राज्य मंत्री ही नहीं ज्यादातर मंत्री इस सरकार में खुला खेल फर्रुखाबादी खेल रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामले में खुद निष्कलंक होते हुए भी योगी व्यापक रूप से इस मोर्चे पर निर्णायक क्यों नही होना चाहते इसका रहस्य जाहिर है कि अबूझ नही है। लेखक केपी सिंह जालौन के वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क- 9415187850

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Dakhal News 17 June 2020


bhopal,Bharu

प्रख्यात पत्रकार लक्ष्मण नारायण गर्दे के पौत्र विश्वास गर्दे का वाराणसी में शनिवार की सुबह अन्ततः निधन हो गया था। वे पिछले एक पखवारे से मौत से संघर्ष कर रहे थे। शुक्रवार को उन्हें निजी चिकित्सालय से स्थानीय शिवप्रसाद गुप्त जिला चिकित्सालय में लाया गया था।   वे परिवारीजनों और मित्रों में भाऊ के नाम से लोकप्रिय थे। मिलनसार और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले भाऊ का पिछले दिनों महमूरगंज स्थित एक निजी चिकित्सालय में आंत का आपरेशन किया गया था। तबसे वे सघन चिकित्सा कक्ष में थे। उनके रक्त में संक्रमण भी था। भाऊ वाराणसी के पत्थर गली स्थित अपने पैतृक निवास में पिता पुरुषोत्तम लक्ष्मण गर्दे के साथ रहते थे। पिता भी अस्वस्थ हैं। लाकडाउन के दौरान भाऊ की तबीयत बिगड़ने पर पहले उन्हें मच्छोदरी के बिडला अस्पताल में दाखिल कराया गया था। शनिवार की भोर उन्होंने अन्तिम सांस ली।लक्ष्मण नारायण गर्दे हिन्दी पत्रकारिता के आधारस्तम्भ पत्रकारों में रहे हैं। भारतमित्र, नवजीवन, वेंकटेश्वर समाचार और हिंदी बंगवासी के संपादकीय दायित्वों का निर्वाह करने वाले गर्दे जी ने मराठीभाषी होते हुए हिन्दी की अप्रतिम सेवा की। वे गांधी और तिलक के करीब रहे, सरल गीता लिखी। कल्याण के अंकों का संपादन भी किया।

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Dakhal News 13 June 2020


bhopal,Contractor appeasement of Muslim politics

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और करोड़ो की सम्पति की मालिक मायावती तमाम ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो दलित परिवार में जन्म लेने के कारण हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। मायावती ने कभी दलित होने को अभिशाप नहीं समझा। बल्कि अपनी सूझबूझ से माया ने दलित परिवार में जन्म लेने को भी एक सुनहरे मौके में बदल दिया। दलित चिंतक और नेता मान्यवर काशीराम को जब मायावती में अपनी ‘सियासी परछाई’ दिखाई दी तो उन्हें इस बात की तसल्ली हो गई कि जिस दलित मिशन को वह(काशीराम) बढ़ती उम्र के कारण मुकाम तक नहीं पहुंचा पाए हैं, उसे मायावती वह मुकाम दिलाएंगी,ताकि दलित समाज में शान से जी सके। इसी लिए काशीराम ने अपने जीतेजी उस मायावती को दलितों की आवाज बना दिया जो एक आईएएस अधिकारी बनकर देश-दुनिया को यह बताना चाहती थी कि दलितों में भी काबलियत की कमी नहीं है। बस उन्हें मौके की तलाश है।   काशीराम ने मायावती को सियासी जामा पहनाया तो माया ने अपनी काबलियत के बल पर मजबूत दलित वोट बैंक तैयार कर दिया। इसी वोट बैंक के सहारे माया ने चार बार उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। माया ने कभी एतराज नहीं किया कि उन्हें लोग दलित की बेटी कहते हैं। राजठाठ से रहले वाली मायावती को चिढ़ तो तब होती थी,जब लोग उन्हें दौलत की बेटी कहते थे। हां, जब माया को सियासी रूप से यह लगने लग कि सिर्फ दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती हैं तो माया ने अन्य जातियों के मतदाताओं को लुभाने के लिए भी खूब पैतरेबाजी की। उनके द्वारा बनाई गई भाई-चारा कमेटी को कौन भूल सकता है। कभी वैश्य-ब्राहमणों पर डोरे डाले तो कभी क्षत्रिय वोटरों को लुभाया। सत्ता हासिल करने के लिए मायावती ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाया’ का नारा भी खूब उछाला, लेकिन माया को सबसे अधिक दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सियासत रास आई। यूपी के सियासी गलियारों में हमेशा इस बात की चर्चा होती रहती है कि समाजवादी पार्टी यादव-मुस्लिम तो बसपा दलित-मुस्लिम वोट बैंक के सहारे ही सियासत में सम्मानजनक स्थान हासिल कर पाए थे। उत्तर प्रदेश में मायावती पिछले तीन दशकों से दलित वोटरों की अकेली ‘ठेकेदार’ बनी हुई हैं। उन्हें कहीें से कोई विशेष चुनौती नहीं मिली। बीते कुछ वर्षो में अगर मायावती को किसी ने थोड़ा-बहुत परेशान किया है तो वह हैं भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर रावण। रावण अपने आप को मायावती का भतीजा भी बताता है और उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश भी करता रहता हैं। दलित ही नहीं, माया की तरह मुस्लिम वोट बैंक पर भी रावण गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं। इसी लिए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जब कुछ मुसलमानों ने संघर्ष का बिगुल बजाया तो रावण भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल दिया। तब्लीगी जमात पर जब कोरोना फैलाने का आरोप लगा तब भी रावण ने इसके विरोध में हंगामा किया। बहरहाल, यह किसी ने नहीं सोचा था कि मायावती हों या फिर भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर रावण दोनों मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत के चलते अपने कोर दलित वोटरों के साथ होने वाले अत्याचार से भी आंखें मंूद सकते हैं। अगर ऐसा न होता तो माया और रावण जौनपुर और आजमगढ़ में कुछ मुस्लिमों द्वारा दलितों के घर जलाए जाने और दलित बेटियों के साथ अभद्रता के मामले मेें चुप्पी नहीं साधे रहते। खैर, दलितों पर अत्याचार की खबरों से चन्द्रशेखर रावण और मायावती की जुबान पर लगा ‘मजबूरी का ताला’, भले नहीं खुला हो, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना का पता चलते ही आनन-फानन में उक्त घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून(एनएसए) और गैंगेस्टर एक्ट लगाने में देरी नहीं की। इस बीच इतना जरूर हुआ की जब माया को लगा की कहीं योगी दलित सियासत में बाजी मार नहीं ले जाएं तो उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बयान जरूर जारी कर दिया कि उक्त घटना में लिप्त लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। मायावती ने ट्वीट किया, यूपी में चाहे आजमगढ़, कानपुर या अन्य किसी भी जिले में खासकर दलित बहन-बेटी के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो या फिर अन्य किसी भी जाति व धर्म की बहन-बेटी के साथ हुए उत्पीड़न का मामला हो, उसकी जितनी भी निंदा की जाये, वह कम है,बहरहाल, जब तक माया का ट्वीट आया तब तक योगी सरकार बदमाशों पर एनएसए और गैंगेस्टर एक्ट लगाने का आदेश दे चुकी थी। वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में दलितों पर हो रहे अत्याचार तथा अपराध के मामले में बेहद सख्त हैं। जौनपुर में दलितों के साथ मारपीट के बाद घर जलाने के आरोपतियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की गई तो आजमगढ़ में भी दलित बालिकाओं के साथ छेड़छाड़ करने के मामले में एक दर्जन लोगों को अंदर भेजने के साथ एनएसए लगाया गया है। दर्जन भर से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका था। लब्बोलुआब यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ अराजक तत्वों द्वारा अनुसूचित जाति के परिवारों पर जुल्म ढाए जाने की घटना तो निंदनीय है हीं, उससे अधिक दुखद यह है कि जो राजनीतिक दल दशकों से अनुसूचित जातियों का दशको तक भावनात्मक शोषण करते रहे, वह नेता दलितों के घर फूंके जाने और उनकी बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किए जाने पर इसलिए सधे लहजें में प्रतिक्रिया दे रहे थे कि कहीं पीड़ित दलितों के पक्ष में उनकी दी गई बयानबाजी से मुस्लिम वोटर नाराज न हो जाएं। दलितों के साथ इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है कि जिन दलों और नेताओं पर बार-बार विश्वास करके उन लोगांे(दलितों ने) ने सत्ता की सीढ़िया चढ़ने में मदद पहुंचाई, वे दल इतने घटिया स्तर की वोटबैंक राजनीति कर रहे हैं कि दलितों की जान-माल और बहू-बेटियों की इज्जत पर हमलों का डंके की चोट पर विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। पीड़ित दलित परिवार के लोगों को इस बात का जरूर संतोष हुआ होगा कि मुख्यमंत्री ने उन पीड़ितों की भरपूर सहायता की,लेकिन यह बात मायावती को कैसे रास आ सकती थी,इस लिए उन्होंने नया शिगूफा छोड़ दिया। बसपा प्रमुख ने कहा कि आजमगढ़ में दलित बेटी के साथ हुए उत्पीड़न के मामले में कार्रवाई को लेकर यूपी के मुख्यमंत्री देर आए पर दुरुस्त आए, यह अच्छी बात है. लेकिन बहन-बेटियों के मामले में कार्रवाई आगे भी तुरन्त व समय से होनी चाहिये तो यह बेहतर होगा। आजमगढ़ और जौनपुर में दलितों पर अत्याचार और उसको लेकर माया की पहले चुप्पी और फजीहत पर मायावती ने घटना में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भले कर दी हो,लेकिन मायावती का असली चेहरा और मकसद तो सब समझ ही गए। इसीलिए जानकार तो यही कह रहे हैं कि मुसीबत की घड़ी में दलित वोट बैंक की सियासत करने वाले नेता चुप रहे, इस बात का मलाल पीड़ितों और दलित चिंतकों को उतना नहीं हुआ होगा, जितना यह देखकर हो रहा होगा कि ट्विटर पर लगातार सक्रिय मायावती ने उसी बीच ट्वीट कर जेएनयू और जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी की रैंक बेहतर होने पर उक्त संस्थाओं को बधाई दी लेकिन, जौनपुर में अनुसूचित वर्ग के लोगों के घर जलाने के प्रकरण पर सहानुभूति जताने के लिए मायावती की जुबान से दो शब्द निकले में काफी समय लग गया। ऐसे मसलों पर अक्सर कूच का एलान करने वाले भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को भी आजमगढ़ व जौनपुर के अपने समाज की पीड़ा का अहसास नहीं हुआ। अक्सर मुखर रहने वाले इन नेताओं की खामोशी ने अनुसूचित जातियों से उनके वोटबैंक की सियासत के चलते मायावती और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के रवैये को लेकर सवाल उठने लगें है। माया-रावण के इस कृत्य से दुखी रिटायर्ड आइपीएस और पूर्व डीजीपी बृजलाल ने ट्वीट कर मायावती और चंद्रशेखर पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा सुश्री मायावती आपने सियासी मंच पर दशकांे खुद को दलित की बेटी कहकर सत्ता का मजा लिया है। आज आजमगढ़ की दलित बेटियां आपको पुकार रही है। और आप चुप है। गेस्ट हाउस कांड की पीड़ा से कम यह दर्द नहीं है। बहनजी। आजमगढ़ में मुस्लिम लड़कों ने दलितों को बेरहमी से पीटा, जो कि अपनी बालिकाओं से की जा रही छेड़छाड़ का विरोध कर रहे थे। इनती संवेदनशील घटना पर मायावती और प्रो. दिलीप मंडल चुप्पी साधे हैं। बृजलाल ने भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को भी कठघरें में खड़ा किया। उन्होंने लिखा दलित वर्ग कह रहनुमाई की नुमाइश करने वाले बहुरूपिए भीम आर्मी चीफ जौनपुर व आजमगढ़ की लोमहर्ष घटना पर खामोश हो? जौनपुर-आजमगढ़ की घटनाओं पर बसपा सुप्रीमों मायावती की चुप्पी और दबाव पड़ने पर उक्त घटना की आलोचना के कई मायने हैं। दरअसल, मायावती मुस्लिम-दलित गठजोड़ के सहारे 2022 में फिर से सत्ता हासिक करने का सपना देख रही हैं। इसी क्रम में बीते वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश के 19 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को हासिल करने के लिए टिकटों के बंटवारे में उनकी बड़ी हिस्सेदारी तय की गई थी मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकने के लिए ही उन्होंने गत लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से भी गठबंधन किया था। इसी तरह भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर भी इसी समीकरण के सहारे खुद को बसपा का विकल्प बनाने की कोशिश में लगे है। इसी लिए चन्द्रशेखर ने पहले नागरिकता सुरक्षा कानून और फिर कोरोना संक्रमण के दौर में तब्लीगी जमात का खुला समर्थन कर मुस्लिमों में पकड़ बनाने की कोशिश की । जौनपुर और आजमगढ़ की घटनाओं को लेकर बसपा सुप्रीमों मायावती और भीम आर्मी के चन्द्रशेखर रावण की ही नहीं कांगे्रस की महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका वाड्रा और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादवकी चुप्पी भी सताती रही। अगर यूपी में किसी को छींक भी आ जाए तो प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी को कोसने-काटने लगती हैं, लेकिन मुस्लिम वोटों के सहारे यूपी में पैर जमाने की मंशा के चलते प्रियंका इस मुद्दे पर मुंह सिले बैठी हैं। बात-बात पर मोदी-योगी सरकार के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाने वाली प्रियंका के लिए संभवत: दलित बेटियों का सम्मान मायने नहीं रखता होगा। वर्ना दंगाइयों के घर जाकर मातम मनाने वाली प्रियंका वाड्रा यों शांत नहीं रहती। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का विश्लेषण

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Dakhal News 13 June 2020


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केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पत्रकार कल्याण योजनाओं के लिए नौ सदस्यीय नई कमेटी की घोषणा कर दी है. मंत्रालय द्वारा जारी सूचना के अनुसार गैर सरकारी सदस्यों का कार्यकाल एक जून 2020 से 31 मई 2022 तक रहेगा. कमेटी की बैठक तिमाही हुआ करेगी. बैठक में पत्रकारों से जुड़ी कल्याण योजनाओं पर विचार करने और वित्तीय सहायता देने के लिए मामलों पर विचार किया जाएगा. अगर कोई तुरंत मदद का मामला आता है तो उसके लिए आपात बैठक बुलाई जा सकती है. इस कमेटी में मंत्रालय की ओर से सूचना सचिव, पीआईबी के महानिदेशक और मंत्रालय के संयुक्त सचिव के अलावा छह पत्रकार हैं. देखें छह पत्रकारों के नाम- राज किशोर तिवारी एबीपी गंगा संदीप ठाकुर लोकमत समूह सर्जना शर्मा सन्मार्ग हिंदी दैनिक अमित कुमार न्यूज24 चैनल उमेश्वर कुमार स्वतंत्र पत्रकार   गणेश बिष्ट फोटोजर्नलिस्ट हिंदुस्थान समाचार एजेंसी

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Dakhal News 10 June 2020


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  आज के कई अखबारों में चीन के पीछे हटने की खबर है। दैनिक जागरण का शीर्षक है, “रंग लाई भारतीय कूटनीति, पूर्वी लद्दाख में कई जगहों से ढाई किलोमीटर पीछे हटा चीन। नई दिल्ली डेटलाइन से जयप्रकाश रंजन की खबर इस प्रकार है, “पूर्वी लद्दाख एलएसी पर जारी गतिरोध को खत्‍म करने के लिए भारतीय कूटनीति का बड़ा असर सामने आया है। पूर्वी लद्दाख में चीन के सैनिकों ने कई बिंदुओं को छोड़ा है। सरकार के शीर्ष सूत्रों ने बताया कि गलवन क्षेत्र में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने पैट्रोलिंग प्वाइंट 15 और हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से ढाई किलोमीटर पीछे हटी है जबकि भारत ने अपने सैनिकों को कुछ पीछे हटाया है। इससे पहले चार जून को भी ऐसी रिपोर्ट आई थी कि चीनी सेना दो किलोमीटर पीछे हट गई है। चीन ने उक्‍त कदम छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बैठक से पहले उठाए थे।” हिन्दी अखबारों में यह खबर दैनिक हिन्दुस्तान में भी है। सूत्रों के हवाले से दी गई इस खबर में नहीं बताया गया है कि चीन कब कितना अंदर आया था या कितने बिन्दुओं पर कब्जा कर लिया था लेकिन दिल्ली में सूत्रों ने बता दिया कि चीनी सैनिकों ने कई बिन्दुओं को छोड़ दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि खबर खुद ही कह रही है कि उसकी सत्यता की कोई गारंटी नहीं है। यह स्थिति तब है जब रक्षा मंत्री ट्वीटर पर कह चुके हैं कि वे संसद में जवाब देंगे और कल राहुल गांधी के ट्वीट का जवाब उन्होंने नहीं दिया। अंग्रेजी में यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू में लीड छपी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। एक्सप्रेस और हिन्दू में बाईलाइन भी। पर सब सूत्रों के हवाले से है। निश्चित रूप से यह उच्च स्तर का प्लांटेशन है। इसकी पोल द टेलीग्राफ ने खोली है, अंदर के पन्ने पर राहुल गांधी के सवाल के साथ छापा है जो उनने कल ट्वीट किया था और लिखा है कि जवाब अनाम सूत्रों के हवाले से है। यह एएनआई की खबर है। मुझे लगता है कि पीटीआई अभी भी सरकारी दबाव में नहीं आता है। खिलाफ खबरें तो रहती ही हैं प्लांटेशन एएनआई और बाईलाइन के जरिए हो रहा है। अखबारों में खबरें पहले भी प्लांट होती थीं। पर ऐसे एक ही खबर कई अखबारों में बाईलाइन और लीड भी छप जाए ऐसा बहुत कम होता था। अमूमन रिपोर्टर भी बुरा मानते थे कि उन्हें एक्सक्लूसिव कह दी गई खबर दूसरे अखबारों को भी दे दी गई। पहले ज्यादा अखबारों में छपवाने वाली खबर एजेंसी के जरिए लीक या प्लांट की जाती थी। तब एजेंसी की साख होती ही थी खबर वैसी ही बनाई जाती थी। इसके अलावा, एक अखबार में कोई खास खबर छपे तो दूसरे अखबार भी छापते थे। अब लाल लाल आंख दिखाने की सलाह और सूत्रों का कहना कि सेना पीछे चली गई – मानने वाली खबर नहीं है। इसलिए प्लांट करने वाले को भी पता है। सबको दे दी गई। और रिपोर्टर की हैसियत नहीं है कि बुरा मान जाए। अगली बार फिर ऐसा प्लांटेशन छापेगा। मैं फिर बताउंगा। दैनिक जागरण की आज की खबर में आगे लिखा है, “सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख के एलएसी के पास चीनी सैनिकों के जमावड़े में बीते छह जून, 2020 को हुई बातचीत से पहले ही कुछ कमी हुई थी। चीन कुछ चुनिंदा जगहों से धीरे धीरे अपनी सेनाओं की संख्या कम कर रहा है। बताया जाता है कि विदेश मंत्रालय के स्तर पर हुई बातचीत में बनी सहमति को सीमा पर पहुंचने से हालात को सामान्य बनाने में काफी मदद मिली है। इन दोनों बैठकों में पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी शिनफिंग के बीच दो अनौपचारिक बातचीतों में हर हाल में सीमा पर शांति बहाली बनाए रखने के मिले निर्देश का जिक्र किया गया था।“ ना सूत्रों के नाम ना वार्ताकारों के नाम। कूटनीति रंग ला रही है का दावा पर कूटनीति है किसकी यह नहीं बताएंगे।   वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह का विश्लेषण.

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Dakhal News 10 June 2020


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फ़तेहपुर । जिला पत्रकार संघ/एशोसिएशन के अध्यक्ष अजय भदौरिया व अन्य वरिष्ठ पत्रकारों के खिलाफ जिला प्रशासन दमनकारी नीति अपनाए हुए हैं. कुछ समय पूर्व इन पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मुकद्दमे दर्ज करवाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने का प्रयास किया. जिला प्रशासन के इस रवैए के खिलाफ लगभग पच्चीस दिन पूर्व पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल व मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अध्यक्ष समेत अन्य पत्रकारों पर दर्ज कराए गये फर्जी मुकद्दमों को स्पंज कर पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराते हुए दोषी अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही की मांग की थी. किन्तु लम्बे समयांतराल बीतने के बाद भी शासन द्वारा मामले पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया. इसके विरोध में जिले के एक दर्जन से अधिक स्थानों पर पत्रकारों ने 30 मई (हिन्दी पत्रकारिता) दिवस को काला दिवस के रूप में मनाया था. न्याय न मिलने पर 7 जून को जिलाधिकारी की सरकार विरोधी नीतियों के खिलाफ जल सत्याग्रह आंदोलन करने का आह्वान किया गया. इसको सफल बनाने के लिए एसोशिएशन ऑफ इंडियन जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष व जिला पत्रकार संघ के अध्यक्ष अजय भदौरिया के नेतृत्व में यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन फ़तेहपुर के जिलाध्यक्ष विवेक मिश्र के साथ जिले के लगभग पन्द्रह अलग अलग स्थानों में सैकडो की संख्या में एकत्र होकर पत्रकारों ने गंगा, यमुना आदि नदियों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए जल सत्याग्रह के आंदोलन को सफल बनाया. इस मौके पर जिलाधिकारी की निरंकुश कार्यशैली के खिलाफ पत्रकारों ने जमकर नारेबाजी की और सरकार से ऐसे अधिकारी को हटाकर उसके खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग की. गौरतलब है कि जिले भर के पत्रकारों ने रविवार को जिला पत्रकार संघ/एसोशियेसन के बैनर तले जल सत्याग्रह आंदोलन किया. जिला मुख्यालय के पत्रकारों ने हुसेनगंज के भृगुधाम के बलखण्ड़ी गंगा घाट पर प्रेम शंकर अवस्थी व अजय भदौरिया, विवेक मिश्र के नेतृत्व में गंगा नदी में सुबह दस बजे से बारह बजे तक पानी के अंदर रहकर आंदोलन को सफल बनाया. इसी प्रकार बिंदकी व जाफरगंज के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार अरुण द्विवेदी वह श्याम तिवारी की अगुवाई में बक्सर के गंगा घाट पर पहुंचकर जिला प्रशासन की द्वेषपूर्ण कार्यशैली के खिलाफ प्रदर्शन किया. वहीं चौडगरा के पत्रकारों ने गंगा नदी के गुनीर गंगा घाट पर जल सत्याग्रह आंदोलन को गति दिया. इसी प्रकार बकेवर के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र त्रिपाठी के नेतृत्व में पक्का तालाब में पहुंचकर जिला प्रशासन के खिलाफ जल सत्याग्रह को सफल बनाने की मुहिम को आगे बढाया. जहानाबाद में डॉ जौहर रज़ा व संतोष त्रिपाठी की अगुवाई में रिंद नदी में जिला प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सत्य की जीत के लिए जल सत्याग्रह आंदोलन कर आंदोलन को मजबूती प्रदान की. उधर अमौली व जाफरगंज के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार विमलेश त्रिवेदी के नेतृत्व में रुस्तमपुर घाट पर यमुना नदी में जल सत्याग्रह कर सरकार से ऐसे अधिकारी को हटाने की मुहिम को गति देने का सार्थक प्रयास किया। इसी प्रकार बहुआ के पत्रकारों ने मो. शाहिद वह प्रदीप सिंह की अगुवाई में कोर्राकनक यमुना नदी में जल सत्याग्रह के कार्यक्रम को गति दी। वहीं गाजीपुर के पत्रकारों ने प्रथम चंद्र की अगुवाई में यमुना नदी के औगासी घाट पर जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर कार्यक्रम को सफल बनाया। असोथर के पत्रकारों ने यमुना नदी में गौरव सिंह व फूलचंद्र के नेतृत्व में यमुना के ब्रह्मकुंड घाट पर जिला प्रशासन की क्रूर कार्यशैली के खिलाफ जल सत्याग्रह कर आंदोलन को मजबूती प्रदान की। खागा मुख्यालय व किशनपुर के पत्रकारों ने किशनपुर यमुना नदी में दमदार प्रदर्शन कर जिला प्रशासन की दमनकारी नीति की जमकर आलोचना करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाया. खखरेरू के पत्रकारों ने वरिष्ठ पत्रकार अशोक सिंह के नेतृत्व में यमुना नदी के कोट घाट पर जल सत्याग्रह को सफल बनाने का कार्य किया. धाता के पत्रकारों ने ज्ञान सिंह वह विवेक सिंह की अगुवाई में रानीपुर यमुना घाट पर जल सत्याग्रह को सफल बनाया. इसके साथ ही प्रेम नगर के पत्रकारों ने मंडवा गंगा घाट पर कार्यक्रम कर संगठन को मजबूती प्रदान की. इसी प्रकार हथगाम व छिउलहा के पत्रकारों ने कोतला गंगा घाट पर प्रदर्शन किया.   जिले के लगभग डेढ़ दर्जन स्थानो में पानी के अंदर घुसकर पत्रकारों ने अर्धनग्न प्रदर्शन किया. इकट्ठे पूरे जनपद के पत्रकारों के प्रदर्शन से जिले में हड़कम्प मचा रहा. लोग जिला प्रशासन की कार्यशैली पर तरह-तरह की चर्चाएं करते रहे. पत्रकारों के सामूहिक प्रदर्शन की जानकारी लगातार जनपद से लेकर मुख्यालय लखनऊ की खुफिया टीम भी जानकारी लेती रहीं.

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Dakhal News 9 June 2020


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वरिष्ठ पत्रकार व प्रेस क्लब कार्यकारिणी सदस्य अंकुर जायसवाल ने आज मुख्यमंत्री के सामने संझा लोकस्वामी, जीतू सोनी और अमित सोनी के संबंध में अपनी बात रखी। श्री जायसवाल ने बताया कि आज अभय प्रशाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त होने के बाद जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेन्दोला, तुलसी सिलवाट के साथ जा रहे थे तभी उन्होंने संझा लोकस्वामी के संबंध में मुख्यमंत्री से सवाल किया कि हनी ट्रैप मामले की सच्चाई छापने पर संझा लोकस्वामी कार्यालय को जमींदोज किया तथा लोकस्वामी के मालिक व वरिष्ठ पत्रकार जीतू सोनी और उनके पुत्र अमित सोनी सहित पूरे परिवार पर झूठे प्रकरण दर्ज किए गए।   यह सारी कार्रवाई कमलनाथ सरकार के शासनकाल में की गई है आप इस संबंध में उचित कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री ने अंकुर जायसवाल से कहा कि इस संबंध में वे उचित कार्रवाई करेंगे हो सका तो पूरे मामले की जांच करवाएंगे।

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Dakhal News 9 June 2020


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कोरोना काल में देश ही नहीं बल्कि विदेश के मीडिया हाउस भी ध्वस्त हो रहे हैं. अमेरिकी मैगजीन ‘प्लेब्वॉय’ के खेल खत्म होने की खबर आ रही है. इस चर्चित मैग्जीन का प्रिंट एडिशन बंद कर दिया गया है. करीब 25 संपादकीयकर्मियों को हटा दिया है. इस मैग्जीन का प्रकाशन 66 साल बाद बीते मार्च महीने में बंद किया गया. यहां कार्यरत कर्मियों की छंटनी अब की गई है. जिन लोगों को हटाया गया है वे डिजिटल आपरेशन से जुड़े थे. एक दुखद खबर मातृभूमि ग्रुप से आ रही है. इस ग्रुप के प्रबंध निदेशक वीरेंद्र कुमार की मौत हो गई है. वीरेंद्र कुमार पीटीआई के निदेशक मंडल में भी शामिल थे. मलयालम लेखक-पत्रकार वीरेंद्र कुमार केरल से राज्यसभा सदस्य थे. 84 साल के वीरेंद्र का निधन कोझिकोड में हुआ. वे मलयालम दैनिक समाचार पत्र मातृभूमि समूह के प्रबंध निदेशक थे. उनका अंतिम संस्कार वायनाड में किया गया. बताया जाता है कि हार्ट अटैक के कारण उनकी मौत हुई.   इस बीच खबर है कि खेल पत्रकार अयाज मेमन ने 1 प्ले स्पोर्ट्स के साथ नई पारी की शुरुआत की है. वे भारत के लिए कंसल्टिंग एडिटर-इन-चीफ बनाए गए हैं.

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Dakhal News 1 June 2020


bhopal, Punjab Kesari journalist KK Sharma dies

पंजाब केसरी के वरिष्ठ पत्रकार केके शर्मा के निधन की सूचना है। केके शर्मा को गम्भीर हालत में संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। केके शर्मा के पुत्र अश्विनी शर्मा भी पत्रकार हैं जो हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत हैं। पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव अपने संस्मरण में फेसबुक पर लिखते हैं- दिल्ली में पंजाब केसरी अखबार में एक के के शर्मा जी हुआ करते थे. यूं तो वह मेरे एक अभिन्न मित्र के बहुत जिगरी थे मगर जब से मैं उनसे मिला, उनके बेहद मिलनसार स्वभाव के चलते वे मेरे भी बेहद अच्छे मित्र हो गए थे. जिंदगी को ठहाके मार कर जीने वाले जिंदादिल और मस्तमौला इंसान शर्मा जी काफी तेज तर्रार पत्रकार भी थे.   एक आवाज पर दोस्तों की मदद के लिए आ जाने वाले और अपनी जान पर खेल जाने वाले शर्मा जी दिल्ली में मेरे रहने तक मेरे करीबी और प्रिय लोगों में से एक थे. पूरी-पूरी रात तक दोस्तों के साथ दारूबाजी की महफिलों का दौर जमाने और अपने उग्र स्वभाव के कारण मुसीबत में फंस जाने पर दिल्ली में भी मुझे न जाने कितनी बार अपने दोस्तों का सहारा लेना पड़ता था …ऐसे मौकों में से कुछ में शर्मा जी भी खुद मेरे लिए आधी-आधी रात को उठकर अपने घर या दफ्तर से कई- कई किलोमीटर दूर बस एक फोन करने पर भागे चले आए थे … और फिर चाहे पूरी रात जगकर उन्हें मेरे लिए दिल्ली पुलिस या सरकार के बड़े से बड़े नेता- अधिकारी को फोन करके जगाना पड़ा हो … या मीडिया में अपने दोस्तों को मेरे लिए आधी रात के बाद भी किसी समय बुलाना पड़ा हो, वह सब उन्होंने मेरे एक फोन पर करके दिखाया है. दिल्ली में मेरे कई ऐसे मित्र थे, जो इसी तरह मेरी दोस्ती पर जान लुटाते थे. उनमें से शर्मा जी का स्थान निसंदेह बेहद अहम था. दिल्ली क्या छूटा, माथे पर हर समय तिलक लगाकर चलने वाले मृदुभाषी और मेरे अजीज मित्र शर्मा जी से भी मेरा वास्ता लखनऊ में आकर कम होते- होते फिर खत्म ही हो गया. आज बरसों बाद एक खबर पढ़ी कि बीमारी से शर्मा जी का निधन हो गया तो दिल दुखी हो गया और उनसे दोस्ती के पल व मुझ पर किए उनके एहसान याद आ गए. ईश्वर शर्मा जी की आत्मा को शांति दे. मेरी तरफ से शर्मा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि एवम् आखिरी नमन.

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Dakhal News 31 May 2020


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भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय द्विवेदी ने सभी विभागाध्यक्षों एवं प्राध्यापकों के साथ बुधवार को ऑनलाइन बैठक की, जिसमें पूर्व में संचालित सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद पाठ्यक्रमों एवं प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है। मीडिया और आईटी के क्षेत्र में करियर बनाने की चाह रखने वाले विद्यार्थी विश्वविद्यालय के भोपाल, रीवा एवं खंडवा परिसर में प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। एमपी ऑनलाइन की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। आवेदन की अंतिम तिथि 31 जुलाई है। बैठक में कुलपति प्रो. द्विवेदी ने कहा कि लॉकडाउन के कारण विद्यार्थी पाठ्यक्रमों की जानकारी के लिए परिसर में नहीं आ सकते, इसलिए विद्यार्थियों को अधिक से अधिक जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रवेश की सूचना के लिए भी सबको मिलकर प्रयास करने चाहिए ताकि प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँच सके। उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय में मीडिया, कम्प्यूटर, आईटी और प्रबंधन के रोजगारोन्मुखी स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम संचालित होते हैं। मीडिया के प्रमुख स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम हैं : एमए (पत्रकारिता), एमए (डिजिटल जर्नलिज्म), एमए-एपीआर (विज्ञापन एवं जनसंपर्क), एमए-बीजे (ब्राडकास्ट पत्रकारिता), एमए-एमसी (जनसंचार), एमएससी-ईएम (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया), एमएससी-एमआर (मीडिया शोध), एमएससी-एफपी (फिल्म प्रोडक्शन), एमएससी-एनएम (नवीन मीडिया)। विश्वविद्यालय में मीडिया प्रबंधन का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एमबीए (मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट) है। एमफिल (मीडिया अध्ययन) में भी प्रवेश के लिए आवेदन आमंत्रित हैं। पत्रकारिता में स्नातक पाठ्यक्रम हैं : बीए-एमसी (जनसंचार), बीएससी-ईएम (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया), बीएससी-एमएम (मल्टी मीडिया), बीबीए-ई-कॉमर्स, बीए-जर्नलिज्म एंड क्रिएटिव राइटिंग, बीटेक-प्रिंटिंग एंड पैकेजिंग। इस वर्ष बैचलर ऑफ लाइब्रेरी एंड इंफोर्मेशन साइंसेज में भी प्रवेश हेतु आवेदन आमंत्रित हैं। कम्प्यूटर एवं आईटी के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय की पहचान मीडिया पाठ्यक्रमों के साथ ही कंप्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में भी है। विश्वविद्यालय की ओर से बीसीए, एमसीए के साथ-साथ एमएससी-इंफोर्मेशन एंड सायबर सिक्युरिटी जैसे नवीनतम विद्या के पाठ्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं। कोरोना संक्रमण एवं लॉकलाउन के समय में विद्यार्थियों के हित को ध्यान में रखकर विश्वविद्यालय द्वारा संचालित इन सभी पाठ्यक्रमों के लिए ऑनलाइन आवेदन मंगाया जा रहा है। किसी प्रकार की जानकारी के लिए दूरभाष नंबर- 0755-2553523 पर संपर्क किया जा सकता है।

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Dakhal News 29 May 2020


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अजय कुमार, लखनऊ कोरोना महामारी के चलते दुनिया भले ही ठहर गई, लेकिन केन्द्र और राज्यों की सरकारें लाकडाउन के चलते हुए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए फिर से हाथ-पैर मारने लगी हैं। एक तरफ योगी सरकार प्रदेश को पटरी पर लाने में लगी है तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में लगी है। इसी लिए लॉकडाउन-4 में ढिलाई मिलने के दूसरे ही दिन से भारतीय जनता पार्टी ने विधान परिषद और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया। प्रदेश भाजपा आलाकमान ने मंडल एवं जिला स्तर के अपने पदाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग व ब्रिजकॉल जैसे संचार सुविधाओं के जरिए पंचायत चुनाव के लिये टोलियां तैयार करने को कहा है। उत्तर प्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अक्टूबर में प्रस्तावित हैं। पंचायत चुनाव लडने के इच्छुक कार्यकर्ताओं से निरंतर सेवा कार्यों में जुटे रहने को कहा गया है तो दूसरी तरफ इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि पंचायत चुनाव के समय परिवारवाद से बचा रहा जाए। इसी लिए पंचायत चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वालों को खुद और अपने परिवार के लिए टिकट मांगने की मनाही कर दी गई है। पंचायत चुनाव प्रभारी महामंत्री विजय बहादुर पाठक का कहना है कि वैसे तो अभी पार्टी कोरोना संक्रमण से बने विकट हालात से निपटने में जुटी है। साथ ही राजनीतिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जा रही है। इस बार गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य लेकर भाजपा पूरी ताकत से पंचायत चुनाव में उतरेगी। कल्याणकारी योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में अनुकूल माहौल है। बूथ व सेक्टर स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता का लाभ भी मिलेगा। गौरतलब हो, कोरोना संक्रमण आरंभ होने से पहले ही पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र सिंह, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, कमल रानी व रमाशंकर पटेल को कोर कमेटी में शामिल करके क्षेत्रवार दायित्व भी दिए गए थे। इसी क्रम में मंडल व जिलों से ऐसे प्रमुख कार्यकर्ताओं के नाम मांगे गए थे, जो कि पंचायत चुनावों के जानकार हों। जिलाध्यक्षों के साथ तीन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की प्रशिक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित हो चुकी हैैं। सूत्रों का कहना है कि भाजपा जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत चुनाव पर विशेष फोकस करेगी। खैर, बात आगामी अक्तूबर में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव की करें तो अबकी पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण का गणित काफी बदला-बदला नजर आएगा। इस बार आरक्षण का फिर से निर्धारण किया जाएगा। इस नए निर्धारण से प्रदेश में पंचायतों के आरक्षण की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। वर्ष 2015 में हुए पिछले पंचायत चुनाव में जो पंचायत जिस वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी, इस बार वह उस वर्ग के लिए आरक्षित नहीं होगी। चक्रानुक्रम से पंचायत का आरक्षण परिवर्तित हो जाएगा। मान लीजिए कि अगर इस वक्त किसी ग्राम पंचायत का प्रधान अनुसूचित जाति वर्ग से है तो अब इस बार के चुनाव में उस ग्राम पंचायत का प्रधान पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकता है।चुनावों के लिए नए चक्रानुक्रम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, अनारक्षित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग महिला, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति महिला के वर्गों में नए सिरे से आरक्षण तय किया जाएगा। प्रदेश का पंचायती राज विभाग आरक्षण में बदलाव की यह कवायद जुलाई-अगस्त में पूरी करेगा क्योंकि नए आरक्षण का निर्धारण चुनाव से तीन महीने पहले किया जाता है। अनुमान है कि पिछले 5 वर्षों में करीब 250 से 300 ग्राम पंचायतें शहरी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक रूप से शामिल की गई हैं। इस हिसाब से इतनी पंचायतें कम हो जाएंगी। इनका ब्योरा राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर विकास विभाग से मांगा है। राज्य निर्वाचन आयोग भी नगर विकास विभाग की इस कवायद के पूरे होने का इंतजार कर रहा है। उसके बाद ही आयोग आगामी चुनाव के लिए ग्राम पंचायतों की वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का अभियान शुरू करेगा जिसमें बूथ लेबल आफिसर घर-घर जाकर पंचायतों के वोटरों की जानकारी संकलित करेंगे।   इस बार पंचायत चुनाव को पूर्वी गंभीरता से लड़ने को तैयार बीेजेपी ने पंचायत चुनाव अभियान में पूर्व मंत्रियों, पूर्व विधायकों व सांसदों को भी जोड़ने का मन बना लिया है। पार्टी पंचायत चुनाव को आगामी विधानसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास मानकर मैदान में उतरेगी। उधर, शिक्षक व स्नातक क्षेत्र की 11 सीटों पर होने वाले विधान परिषद चुनाव में घोषित प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं व कार्यकर्ताओं से ऑनलाइन संपर्क व संवाद जारी है।   अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 25 May 2020


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दिल्ली की महान केजरीवाल सरकार कभी कभी महानता की चरमसीमा भी लांघ जाती है. इस सरकार ने दिल्ली में फंसे मजदूरों के श्रमिक एक्सप्रेस से जाने के बारे में जरूरी जानकारी देने के लिए विज्ञापन निकाला पर ये विज्ञापन हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में न होकर अंग्रेजी में है. अरविंद केजरीवाल के पास शायद डाटा हो कि कितने मजदूर अंग्रेजी पढ़ते हैं. पर ये सच है कि बहुत सारे लोग ये देखकर हंस रहे हैं कि मजदूरों के लिए विज्ञापन, अंग्रजी में, अंग्रजी समाचारपत्र में.   अब दिल्ली के मजदूर ये विज्ञापन नहीं पढ़ रहे हैं तो इसमें भला दिल्ली सरकार का क्या दोष हो सकता है…

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal, Post-Karona media

जयराम शुक्ल करोना के लाकडाउन ने जिंदगी को नया अनुभव दिया है, अच्छा भी बुरा भी। जो जहां जिस वृत्ति या कार्यक्षेत्र में है उसे कई सबक मिल रहे और काफी कुछ सीखने को भी। मेरा मानना है ये जो सबक और सीख है यही उत्तर करोना काल की धुरी बनेगी। करोना भविष्य में कालगणना का एक मानक पैमाना बनने वाला है। हमारे पंचाग की कालगणना सृष्टि के आरंभ से प्रारंभ हुई जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के युगाब्ध, सहस्त्राब्ध हैं। सभी धर्मों/पंथों ने अपने हिसाब से कलैंडर बनाए। हमारे धर्म में शक और विक्रमी संवत शुरू होता है। क्रिस्चियन्स अपनी कालगणना क्राइस्ट के जन्म से शुरू करते हैं, जिसे हम बी,सी, ए,सी यानी कि ईसा पूर्व, ईसा बाद के वर्षों के साथ गिनते हैं। मुसलमानों का कैलेंडर हिजरी है, यानी कि हजरत मोहम्मद के पहले और बाद के वर्ष। अन्य धर्मों और पंथों के अपने-अपने कैलेन्डर होंगे। लेकिन अब एक नया वैश्विक कैलेन्डर प्रारंभ होगा, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय से ऊपर उठकर। करोना का पूर्व व उत्तर काल। इसे हम ईसाई कैलेंडर के तर्ज पर बिफोर करोना यानी बी.सी और आफ्टर करोना यानी ए.सी कहेंगे। करोना ने मानवता को जाति,धर्म,संप्रदाय, नस्ल,रंग,ढंग भूगोल इतिहास के कुँओं से निकालकर समतल में ला खड़ा कर दिया। उसने कांगो-सूडान को भी अमेरिका-इंग्लैंड की बराबरी में ला दिया। करोना ने वसुधैव को कुटुम्बकम में बदल दिया। इसके त्रास से सर्वे भवंतु सुखिनः,सर्वे संतु निरामयः के समवेत स्वर उठने लगे हैं। इस परिस्थिति को आंकने और देखने का एक नजरिया यह भी है..। करोना ने सोचने, विचारने और महसूस करने के लिए इफरात वक्त दिया है। वक्त थमता नहीं अपने निकलने का रास्ता ढूँढ़ लेता है। अपन मीडियावी दुनिया के आदमी हैं इसलिए पहले इसकी बात करते हैं। इस करोना काल में लिखना, पढ़ना और रचना वैसे ही है जैसे अभावों के बीच तिलक जैसों ने मंडाले जेल लिखा रचा। पहली बार लगा कि छुट्टी भी एक सजा होती है। आराम और अवकाश अब चिढ़ाने वाले हैं। मीडिया का रूपरंग.. ढंग सब बदल गया। वर्क फ्राम होम का पहला विचार यहीं से शुरू होता है। इन दिनों घर बैठे जूम एप के जरिए बेवीनार संगोष्ठी में हिस्सा ले रहे हैं। तोक्षकभी कभारचैनल वाला स्काइप के जरिए जोड़कर लाइव कमेंट ले लेता है। बिस्तर में लेटे-बैठे यह सब मन बहलाऊ अंदाज में हो रहा है। इसे आप मीडिया के काम का करोनाई अंदाज भी कह सकते हैं। 24×7 वाले मीडिया को हर क्षण की खबर चाहिए। आँधी-तूफान, बाढ़-बूड़ा, महामारी, प्रलय कुछ भी हो पर इनके बीच से ही खबरें निकालनी पड़ेगी। मेरा अनुमान है कि कल्पित प्रलय के समय भी आखिरी व्यक्ति मीडियावाला ही रहेगा जो उफनाते समंदर की कश्ती पर बैठकर अपने चैनल के लिए लाइव दे रहा होगा। इसके बावजूद विरोधाभास भरी त्रासदी यह कि जो मीड़िया चौबीसों घंटे दुनिया भर की खबरे उगल रहा है उस मीडिया में मीडिया और मीडियावालों की खबरें कहीं नहीं आतीं। सड़क, मैदान, अस्पतालों और क्वारंटाइन होम्स से जो खबरें निकाल कर आपतक पहुँचा रहे हैं क्या वे करोना संक्रमण से बचे होंगे.? जी नहीं कुल करोना संक्रमितों में से कुछ हजार लोग मीडिया के भी हैं। लेकिन इन अभागों की खबरें हम तक नहीं पहुँचतीं। जो अखबार यह दावा करते हैं कि हम खबरें बाँटते हैं करोना नहीं, क्या उनसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने किसी कर्मचारी करोना संक्रमण की खबरें दे या दिखाएं ? इसलिए उन अभागों को भी उसी श्रेणी में मानकर चलिए जिस श्रेणी में जान हथेली में लिए सड़कों पर मंजिल नापने वाले श्रमिक। सही बात यह कि कई चैनलों और अखबारों के मीडियाकर्मी संक्रमण की जद में हैं..मीडिया समूह के प्रबंधन ने उनसे दूरी बना ली है..साफ साफ कहें तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। मीडिया में नौकरी से वो लोग भी निकाले जा रहे हैं जो संक्रमित नहीं हुए। 22 मार्च के बाद से अबतक पूरे देशभर के मीडिया समूहों ने लगभग 20 से 25 प्रतिशत कर्मचारियों की छँटनी कर दी। ऊँची तनख्वाह वाले पत्रकारों की सैलरी में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा चुकी है। संपादक श्रेणी के ऐसे पत्रकारों की बड़ी संख्या है जिन्हें कहीं दूसरी नौकरी ढूँढने के लिए कह दिया गया है। कुलमिलाकर मीड़ियाजगत में वैसे ही हाहाकार है जैसे कि सड़क पर मजदूरों का, फर्क इतना है कि मजदूरों की व्यथा सामने आती है और मीडियावालों की व्यथा उनका मीडिया प्रतिष्ठान ही हजम कर जाता है। भूखे सड़क पर वो मजदूर भी हैं और भूखे अपने घरों में ये विपत्ति के मारे मीडियाकर्मी भी। भोपाल के एक मित्र ने सूचना दी कि यहां दो दर्जन से ज्यादा ऐसे पत्रकार हैं जिनकी नौकरी इस करोना काल में चली गई। इनमें से कई प्रतिभाशाली उदयीमान पत्रकार हैं वे चाहते तो दूसरी नौकरी भी कर सकते थे लेकिन जुनून के चलते पत्रकारिता को अपना करियर बनाया। इनमें से प्रायः के पास माकान का किराया देने की कूबत नहीं बची। कई के घर का चूल्हा एनजीओ या सरकार द्वारा बाँटे गए राशन से जलता है। कुछ दिन बाद चूल्हे का ईंधन भी खतम हो जाएगा। भोपाल, इंदौर जैसे प्रादेशिक महानगरों में दूसरे प्रांत से आकर काम करने वाले मीडयाकर्मियों की बड़ी संख्या है। जो दस साल पहले आए थे उनकी गिरस्ती तो कैसे भी जमी है पर जो इस बीच आए उनका तो भगवान ही मालिक..। संस्थानों ने किनाराकशी की और सरकार को ये कभी सुहाए नहीं सो उनपर कृपा का प्रश्न ही नहीं उठता। भोपाल-इंदौर जैसी ही व्यथा देशभर के उन शहरों की है जहां मीडिया उद्योग फला-फूला और उनके मालिकों ने उसकी कमाई की बदौलत माल-सेज, उद्योग और कालोनियाँ खड़ी कीं। देशभर सिर्फ़ एक मीडिया बेवसाइट है..भड़ास फार मीडिया.. जो देशभर के पत्रकारों के दुखदर्द की कथा सुनाती रहती है। इन दिनों पत्रकारों की विपदा से जुड़े एक से एक दुखद किस्से सुनने को मिलते हैं, आप भी उसके लिंक को खोलकर पढ़ें कभी। हिंदी की पत्रकारिता तो आरंभ से ही दुख-दिरिद्रता से भरी रही है। हिंदी के जो स्वतंत्र पत्रकार हैं, स्तंभ व आलेख लिखते हैं वह स्वातःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा नहीं.. अपितु खुद के जिंदा रहने के सबूत के लिए लिखते हैं.. हिंदी पत्रकारिता का विचार पक्ष ‘थैंक्यू सर्विस’ में चलता है। इस श्रेणी में प्रायः भूतपूर्व संपादक प्रजाति के लोग होते हैं जिनका खाना खर्चा बीबी-बच्चे उठाते हैं, सो इनका तो कैसे भी चल जाता है। चिंता का विषय हिंदी पत्रकारिता की नई पौध को लेकर है..जिसके ख्वाबों-खयालों की दुनिया को इस करोना ने पलक झपकते ही बदलकर धर दिया। उत्तर करोना काल की मीड़िया का अक्श स्पष्ट होने लगा है। प्रिंट मीड़िया का दायरा जिस गति से सिकुड़ रहा है..हालात ठीक होने के बाद भी वह अपने पुराने रूप में आएगा मुश्किल ही लगता है। इन दो महीनों ने पाठकीय आदत बदल दी है। अब बिना अखबार की सुबह असहज नहीं लगती। प्रिंट कापियाँ सिर्फ बड़े अखबारों की ही निकल रही हैं। मध्यम दर्जे के अखबार फाइल काँपियों तक सिमट गए। पुल आउट पत्रिकाएं और विशेषांक शीघ्र ही इतिहास में दर्ज हो जाएंगे। पृष्ठ संख्या आधे से भी कम हो गई। इनका भी पूरा फोकस अब डिजिटल अखबार निकालने पर है। कागज, स्याही और मैनपावर की कमी ने पहले ही लघु अखबारों को डिजिटल में बदल रखा था। जिनका सर्कुलेशन वाट्सएप ग्रुप्स और एफबी प्लेटफार्म तक सीमित हो गया। अखबारों के समक्ष विग्यापन का घोर संकट है। विग्यापन की शेयरिंग दिनोंदिन घट रही है। डिजिटल मीडिया का दायरा सात समंदरों से भी व्यापक है। विग्यापन की हिस्सेदारी का लायनशेयर अब इनके पास है। विदेश का डिजिटल मीडिया भी देसीरूप धरके प्रवेश कर चुका है। वह तकनीकी तौरपर ज्यादा दक्ष और पेशेवर है। डिजिटल मीडिया में जाने वाले मेनस्ट्रीम के अखबारों के समक्ष यह बड़ी चुनौती होगी। खबरे शीघ्रगामी तो हुई हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता नहीं रही। आने वाले समय में पाठक का सबसे ज्यादा पराक्रम इसी पर खर्च होगा कि वह जो पढ़ रहा है वह सत्य है कि नहीं। सत्य की परख करने वाले तंत्र का मीडिया में वर्चस्व बढ़ेगा।   कुल मिलाकर जब हम करोना संकट से निवृत्त होंगे तब तक जो पत्रकार हैं उनमें पचास फीसद वृत्ति से पत्रकार नहीं रह जाएंगे। मध्यम और लघु अखबार अपने पन्ने डिजिटली छापेंगे और वाट्सएप में पढ़ाएंगे। बड़े समूह के कुछ अखबार बचेंगे लेकिन उनकी वो धाक नहीं रहेगी..जिसकी बदौलत अबतक सत्ता के साथ अपना रसूख दिखाते आए हैं। करोना समदर्शी है..वह राजा और रंक में भेद नहीं करता। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

Dakhal News

Dakhal News 22 May 2020


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जन्मदिन पर शरद जोशी जी को स्मरण करते हुए! शरद जोशी ने कोई पैतीस साल पहले हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे व्यंग्य निबंध रचा था। तब यह व्यंग्य था, लोगों को गुदगुदाने वाला। भ्रष्टाचारियों के सीने में नश्तर की तरह चुभने वाला। अब यह व्यंग्य, व्यंग्य नहीं रहा। यथार्थ के दस्तावेज में बदल चुका है। भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही व्यंग्य की मौत हो गई। समाज की विद्रूपताओं की चीर-फाड़ करने के लिए व्यंग्य का जन्म हुआ था। परसाईजी ने व्यंग्य को शूद्रों की जाति में रखते हुए लिखा था व्यंग्य चरित्र से स्वीपर है। वह समाज में फैली सड़ांध में फिनाइल डालकर उसके कीटाणुओं को नाश करने का काम करता है। जोशी-परसाई युग में सदाचार, लोकलाज व सामाजिक मर्यादा के मुकाबले विषमताओं, विद्रूपताओं और भ्रष्टाचार का आकार बेहद छोटा था। व्यंग्य उन पर प्रहार करता था। लोग सोचने-विचारने के लिए विवश होते थे। भ्रष्टाचार का स्वरुप इतना व्यापक नहीं था। व्यंग्य कब विद्रूपता के मुंह में समा गया पता ही नहीं चला। वेद पुराणों में भगवान का यह कहते हुए उल्लेख है कि हम भक्तन के भक्त हमारे। जोशी जी ने भ्रष्टाचार के लिए यही भाव लिया था। आज के दौर के बारे में सोचते हुए लगता है कि हमारे अग्रज साहित्यकार कितने बड़े भविष्यवक्ता थे। भ्रष्टाचार, सचमुच भगवान की तरह सर्वव्यापी है, कण-कण में, क्षण-क्षण में। कभी एक व्यंगकार ने लिखा था कि भगवान की परिभाषा और उनकी महिमा जो कि वेद-पुराणों में वर्णित है सब हूबहू भ्रष्टाचार के साथ भी लागू होती है।… बिन पग चलै,सुनै बिन काना कर बिनु कर्म करै विधि नाना। बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी़..़़ आदि-आदि। मंदिर में, धर्माचार्यों के बीच भगवान की पूजा हो न हो, भ्रष्टाचारजी पूरे विधि-विधान से पूजे जाते हैं। आसाराम,नित्यानंद, निर्मलबाबा से लेकर धर्माचार्यों की लंबी कतार है जिन्होंने मंत्रोच्चार और पूरे कर्मकांड के साथ भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा की है और हम वहां शीश नवाने पहुंचते हैं। भगवान को माता लक्ष्मी प्रिय है तो भ्रष्टाचारजी को भी लक्ष्मीमैया अतिप्रिय। रूप बदलने, नए-नए नवाचार और अवतार में भी भ्रष्टाचार का कोई सानी नहीं। आज के दौर में परसाई जी-शरद जोशी जी होते तो भ्रष्टाचार को लेकर और क्या नया लिखते! उनके जमाने में एक-दो भोलाराम यदाकदा मिलते जिनके जीव पेंशन की फाइलों में फड़फड़ाते। आज हर रिटायर्ड आदमी भोलाराम है, फर्क इतना कि वह परिस्थितियों से समझौता करते हुए परसेंट देने पर राजी है। परसेंट की यह कड़ी नीचे से ऊपर तक उसी तरह जाती है जैसे राजीव गांधी का सौ रुपया नीचे तक दस पैसा बनकर पहुंचता है। पिछले कुछ दिनों से भ्रष्टाचार पर भारी बहस चल रही है। भ्रष्टाचारी भी भ्रष्टाचार पर गंभीर बहस छेड़े हुए हैं। चैनलों ने इसे प्रहसन का विषय बना दिया। टीवी चैनलों में कभी-कभी बहस इतनी तल्ख हो जाती है कि मोहल्लों में औरतों के बीच होने वाले झगड़ों का दृश्य उपस्थित हो जाता है। एक कहती है..तू रांड तो दूसरी जवाब देती है तू रंडी़.. एक ने कहा तुम्हारी पार्टी भ्रष्ट तो दूसरा तड़ से जवाब देता है, तुम्हारी तो महाभ्रष्ट है। टीवी शो में एक पार्टी के प्रतिभागी ने कहा, फलांजी से बस इतनी गलती हो गई कि उन्होंने आपकी वाली पार्टी में जाकर प्रशिक्षण नहीं लिया था। वे लाखों करोडों गटक लेते हैं और पता भी नहीं चलता। भ्रष्टाचार अब बुद्घिविलास का विषय बन चुका है। चमड़ी इतनी मोटी हो गई कि व्यंग्य की कौन कहे गालियां तक जज्ब हो जाती हैं। एक नया फार्मूला है खुद को ईमानदार दिखाना है तो दूसरों को जोर-जोर से बेईमान कहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी कर्मकांडी हो गई है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ईमानदारी की अलख जगाने वाले नए पंडों के रूप में अवतरित हुए हैं। संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरू की मुक्ति के लिए अभियान चलाने वाले और उद्योगपतियों के खिलाफ याचिका में फोकट का इन्टरविनर बनने वाले पिता-पुत्र की जोड़ी शांति भूषण और प्रशान्त भूषण टीम नैतिकता की आचार संहिता तय करती है। मंचीय कवियों का गिरोह चलाने वाले मसखरे कविकुलश्रेष्ठ इमानदारी की रुबाइयाँ लिखते हैं।योग सिखाने के लिए निर्मल बाबा की तर्ज पर करोड़ों की फीस वसूलने वाले बाबा रामदेव राष्ट्रवाद व नैतिकता का पाठ सिखाते हैं। रंगमंच पर यही सब नाटक चल रहा है। सड़े से मुद्दों पर कैण्डल मार्च निकालने वाले भ्रष्टाचार से लड़ने चंदे के पैसे से दिल्ली तो कूंच कर सकते हैं पर अपने गांव के उस सरपंच के खिलाफ बोलने से मुंह फेर लेते हैं जो गरीबों का राशन और मनरेगा की मजदूरी में हेरफेर कर दो साल के भीतर ही बुलेरो और पजेरो जैसी गाड़ियों की सवारी करने लगता है। इसके खिलाफ हम इसलिए कुछ नहीं बोल पाते क्योंकि यह हमारा अपना बेटा, भाई, भतीजा और नात-रिश्तेदार हो सकता है। जब शहर के भ्रष्टाचार की बात करनी होती है तो ये दिल्ली के भ्रष्टाचार पर बहस करते हैं, अपने गांव व शहर की बात करने से लजाते हैं, भ्रष्टाचारी कौन है? यह चिमनी लेकर खोजने का विषय नहीं है। समाज में भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले लोग कौन हैं? यह अलग से बताने की बात नहीं है, हम सबने मिलकर भ्रष्टाचार को अपने आचरण में जगह दी है। जिस दिन कोई पिता अपने बेटे को इसलिए तिरष्कृत कर देगा कि उसके भ्रष्टाचार की कमाई से बनी रोटी का एक टुकड़ा भी स्वीकार नहीं करेगा, कोई बेटा बाप की काली कमाई के साथ बाप को भी त्यागने का साहस दिखाएगा, परिवार और समाज में भ्रष्टाचार करने वालों का सार्वजनिक बहिष्कार होने लगेगा, उस दिन से ही भ्रष्टाचार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। क्योंकि भ्रष्टाचार कानून से ज्यादा आचरण का विषय है। कत्ल करने वाले को फांसी दिए जाने का प्रावधान है लेकिन कत्ल का सिलसिला नहीं रुका है। कत्ल भी हो रहे हैं और फांसी भी। भ्रष्टाचारियों को कानून की सजा देने मात्र से भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं। क्या कोई अपने घर से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़नें की शुरुआत करने को तैयार हैं?   लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 22 May 2020


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भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है। प्रो. द्विवेदी 10 वर्ष से अधिक समय से विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। वहीं, विश्वविद्यालय में प्रभारी कुलसचिव की जिम्मेदारी मडिया प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अविनाश वाजपेयी को सौंपी गई है। इससे पूर्व वे विश्वविद्यालय में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रहे थे।गौरतलब है कि प्रो. संजय द्विवेदी लंबे समय तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। उन्हें प्रिंट, बेव और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य करने का अनुभव है। उन्होंने कई अखबारों, टीवी चैनलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। मुंबई, रायपुर, बिलासपुर और भोपाल में लगभग 14 साल सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद प्रो. द्विवेदी शिक्षा के क्षेत्र में आए और फरवरी-2009 में वे माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े। विश्वविद्यालय में उन्होंने विभागाध्यक्ष एवं कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों कार्य किया। वे विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर लेखन करते हैं। उन्होंने अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियों एवं मीडिया से संबंधित संगठनों में सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।

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Dakhal News 21 May 2020


Indore ,gets five star rating , Kacharam-free cities, Bhopal also slipped

भोपाल। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने नई दिल्ली में मंगलवार को स्वच्छता सर्वेक्षण के अंतर्गत कचरामुक्त शहरों की स्टार रेटिंग के परिणाम घोषित किए। इसमें लगातार तीन बार देश के सबसे स्वच्छ शहर रहे मध्यप्रदेश के इंदौर को पांच स्टार रेटिंग मिली है, जबकि पिछले साल कचरामुक्त शहरों में इंदौर को सेवन स्टार रेटिंग दी गई थी। वहीं, प्रदेश की राजधानी भोपाल को थ्री स्टार रेटिंग दी गई है।केन्द्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा घोषित किये गये स्टार रेटिंग के परिणामों में इंदौर को हालांकि पिछले साल की तरह सेवन स्टार रेटिंग तो नहीं मिली है, जिसका स्थानीय प्रशासन और नागरिकों द्वारा दावा किया गया था, लेकिन मध्यप्रदेश का यह शहर देश के कचरा मुख्त उन छह शहरों के साथ शीर्ष पर बना हुआ है, जिन्हें पांच स्टार रेटिंग मिली है। इनमें छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर, गुजरात के राजकोट और सूरत, कर्नाटक का मैसूर और महाराष्ट्र का नवी मुंबई शामिल है। इंदौर के अलावा मध्यप्रदेश के 10 शहरों को थ्री स्टार रेटिंग मिली है। इनमें भोपाल भी शामिल है, जो कि एक बार देश का दूसरा सबसे स्वच्छ शहर रह चुका है। भोपाल के अलावा बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, कांटाफोड़, कटनी, खरगोन, ओंकारेश्वर, पीथमपुर, सिगरौली और उज्जैन को भी थ्री स्टार रेटिंग मिली है। वहीं, प्रदेश के सात शहरों को एक स्टार रेटिंग दी गई है। इनमें ग्वालियर, सरदारपुर, हातोद, महेश्वर, खंडवा, शाहगंज और बदनावर है। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के 18 नगरों को कचरामुक्त शहरों में रेटिंग मिली है। इनमें इंदौर पांच स्टार रेटिंग मिलने वाला प्रदेश का एकमात्र शहर है। 

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Zee news, two dozen media workers, Corona positive!

बड़ी खबर जी न्यूज से आ रही है। यहां 4 लोगों के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद बाकी सभी का कोरोना टेस्ट कराया गया। सूचना है कि कुल 52 लोगों का टेस्ट कराया गया जिनमें से 28 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इस रिपोर्ट के आते ही पूरे जी ग्रुप में हड़कंप मच गया है। बताया जाता है कि सीईओ पुरुषोत्तम वैष्णव नए हालात पर मीटिंग ले रहे हैं। ये मीटिंग ज़ूम पर ऑनलाइन आयोजित है। बताया जा रहा है कि पूरे ऑफिस को सील कर सैनिटाइज किया जा रहा है। ज़ी न्यूज़ का संचालन इसी ग्रुप के एक अन्य चैनल wion की बिल्डिंग से होगा।   ज़ी न्यूज़ ऑफिस में नोएडा अथारिटी के लोग और डॉक्टर्स की टीमें घुस चुकी है। अब पूरे ग्रुप के मीडियाकर्मियों का टेस्ट किया जा रहा है।

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Life between corona

अमरीक देशव्यापी लॉकडाउन से पहले कर्फ्यू लगाने वाला पंजाब पहला राज्य था। सूबे ने इतना लंबा कर्फ्यू अतीत में कभी नहीं झेला। और न ऐसे नागवार हालात झेले जो अब दरपेश हैं। यक्ष प्रश्न है कि कर्फ्यू तो हट जाएगा लेकिन सामान्य जनजीवन आखिर पटरी पर कैसे आएगा? 55 दिन की कर्फ्यू अवधि ने राज्य में जिंदगी से लेकर कारोबार तक, सब कुछ एकबारगी स्थगित कर दिया था। लुधियाना, अमृतसर, जालंधर महानगरों सहित अन्य कई शहरों की दिन-रात चलने वाली जिन फैक्ट्रियों अथवा औद्योगिक इकाइयों के गेट पर कभी ताले नहीं लगे थे, वहां एकाएक पूरी तरह सन्नाटा पसर गया। लाखों श्रमिक एक झटके में बेरोजगार हो गए और रोटी के लिए बेतहाशा बेजार। हर वर्ग की कमर टूट गई। लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए। कोरोना-काल के कर्फ्यू ने पंजाबियों को बेशुमार जख्म भी दिए हैं। लाखों लोग भूख से बेहाल हुए तो हजारों अवसादग्रस्त। जिन्हें कोरोना तो क्या, मामूली खांसी-बुखार ने भी नहीं जकड़ा-वे स्थायी तनाव के गंभीर रोगी हो गए। तिस पर डॉक्टरों की अमानवीय बेरुखी। सरकार के कड़े आदेशों और सख्ती के बावजूद प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी आमतौर पर बंद ही रहीं। ब्लड प्रेशर और शुगर तक चैक नहीं किए गए। डॉक्टर मरीज को छूने तक से साफ इंकार करते रहे। मेडिकल हॉल के दुकानदार बाकायदा डॉक्टरों की भूमिका में आ गए। चिकित्सा जगत की उपेक्षा का नागवार नतीजा था कि कर्फ्यू के इन 55 दिनों में 2000 से ज्यादा लोग हृदय रोग, कैंसर, लीवर, किडनी और मधुमेह की बीमारियों से चल बसे। राज्य के स्वास्थ्य विभाग भी मानता है कि इससे पहले कभी इतनी अवधि में बीमारियों से लोगों ने दम नहीं तोड़ा। ईएनटी, आंखों और दांतों की बीमारियों के इलाज करने वाले क्लीनिक और अस्पताल एक दिन के लिए भी नहीं खुले। मनोचिकित्सक तो मानो भूल ही गए कि समाज के एक बड़े तबके को इन दिनों उनकी कितनी जरूरत है। गोया अवाम की जिंदगी बेमूल्य हो गई। अमीर और गरीब एक कतार में आ गए। पंजाब में सवा सौ से ज्यादा मौतें कोरोना वायरस से हुईं हैं। संक्रमितों की संख्या हजारों में रही और वे एकांतवास में ठीक होकर घरों को लौट आए। लेकिन कोरोना मरीज होने के ठप्पा उन्हें निरंतर यातना दे रहा है। पंजाब के हर इलाके से उनके सामाजिक बहिष्कार की खबरें हैं। सामाजिक दूरी का संकल्प कोरोना वायरस से ठीक हुए मरीजों के लिए सामाजिक नफरत में तब्दील हो गया है। जालंधर और आसपास के इलाकों में इस पत्रकार ने कोरोना से ठीक होकर सही-सलामत लौटे कुछ मरीजों से मुलाकात में पाया कि वे मृत्यु के डर से तो निकल आए हैं लेकिन रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों की घोर उपेक्षा उन्हें मनोरोगी बना रही है। दिनेश कुमार (बदला हुआ नाम) लगभग एक महीना एकांतवास में रहे। इलाज चला। अस्पताल में तो किसी ने क्या मिलने आना था, घर लौटे तो अपनों ने भी किनारा कर लिया। पत्नी और बच्चों के सिवा कोई बात नहीं करता। जबकि घर में माता पिता और दो भाई तथा उनके परिवार हैं। वह फफकते हुए कहते हैं, “कोरोना से ठीक हो कर घर लौटा तो उम्मीद थी कि सब खुश होंगे और तगड़े उत्साह के साथ मुझे गले लगाएंगे। लेकिन कोई मत्थे लगने तक को तैयार नहीं हुआ। जैसे ही मैं लौटा, मेरा भाई अपनी बीवी और बच्चों के साथ ससुराल चला गया। यह कहकर कि या तो यह यहां रहेगा या हम।” नवांशहर शहर के नसीब सिंह भी कोरोना को पछाड़कर सेहतमंद होकर अपनी लंबी-चौड़ी कोठी में लौटे तो बेटों ने उनका सामान पिछवाड़े के सर्वेंट क्वार्टर में रखा हुआ था और उनसे कहा गया कि अब वे वहीं रहेंगे। पिछले साल उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। सारी जायदाद वह अपने दो बेटों के नाम कर चुके हैं। यह पत्रकार जब सर्वेंट क्वार्टर में कोठी के मालिक रहे नसीब सिंह से बात कर रहा था तो बारिश आ रही थी और सर्वेंट क्वार्टर की छत से पानी चू रहा था। फर्श पर गंदगी का ढेर था और नसीब सिंह का लिबास बेहद मैला था। उन्होंने बताया कि जो नौकर आज से एक महीना पहले उनके आगे पीछे सेवा-टहल के लिए भागते-दौड़ते रहते थे, अब उनका निवास बना दिए गए सर्वेंट क्वार्टर में झांकने तक को तैयार नहीं और न कपड़े धोने को। खाने की थाली भी बाहर रख दी जाती है। एक पानी की सुराही भर दी जाती है। रूआंसे होकर नसीब सिंह कहते हैं, “मुझे कोरोना हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर। अब डॉक्टरों ने मुझे पूरी तरह फिट घोषित कर दिया है। बकायदा इसका सर्टिफिकेट भी दिया है। लेकिन बच्चे मुझे अभी रोगी मानते हैं। मुझसे कौड़ियों जैसा सुलूक किया जा रहा है। मैं करोड़ों का साहिबे-जायदाद रहा हूं और इस बीमारी ने मुझे एकदम कंगाल बना दिया। बेटों को पास बुलाकर मैं उनसे बात करना चाहता हूं कि अगर उनकी यही मर्जी है तो मुझे वृद्ध आश्रम में दाखिल करवा दें लेकिन कोई पास खड़ा होने तक को तैयार नहीं। मुझसे मेरा फोन भी ले लिया गया है।” दिनेश कुमार और नसीब सिंह जैसी बदतर हालत ठीक हुए बेशुमार कोरोना मरीजों की है। लुधियाना में कोरोना वायरस से मरे एसीपी के परिजनों का पड़ोसियों ने आपत्तिजनक बहिष्कार किया और उस प्रकरण में स्थानीय पुलिस को दखल देनी पड़ी। उनके भांजे को ‘कोरोना फैमिली’ कहा गया और उस गली में जाने से रोका गया, जहां उनका अपना घर है। चार ऐसे मामले चर्चा में आए कि संक्रमण से मरे लोगों के शव उनके परिजनों ने लेने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस-प्रशासन और सेहत महकमे को मृतकों के संस्कार और अंतिम रस में अदा करनी पड़ीं। किसी को श्मशान घाट के माली ने मुखाग्नि दी तो किसी को सफाईकर्मी ने। जबकि यह लोग भरे पूरे और संपन्न परिवार से थे। ‘कोरोना फैमिली’ पंजाब में इन दिनों प्रचलित नया गालीनुमा मुहावरा है और यह किन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बताने की जरूरत नहीं। इस कथन के पीछे छिपी दुर्भावना व नफरत बेहद पीड़ादायक है। बल्कि यातना है। जालंधर के ही नीरज कुमार को उनके करीबी दोस्तों ने उन्हें ‘कोरोना कुमार’ कहना शुरू किया तो वह गंभीर अवसाद रोगी बन गए। अब खुदकुशी की मानसिकता का शिकार हैं। वायरस से ठीक हुए एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि पड़ोसियों ने एकजुट होकर फैसला किया कि कभी हमारे घर नहीं आएंगे। वह कहते हैं, “लॉकडाउन और कर्फ्यू खुलते ही हम यह इलाका छोड़कर कहीं और घर खरीद लेंगे। दुकान का ठिकाना भी बदलना पड़ेगा।” लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच पंजाब में बड़े पैमाने पर श्रमिकों का सामूहिक पलायन हो रहा है। उनकी भीड़ और दशा देख कर लगता है कि 1947 का विभाजनकाल मई, 2020 में लौट आया है। जो श्रमिक घर वापसी के लिए प्रतीक्षारत हैं या फिलवक्त जा नहीं पा रहे उन्हें उनके मकान मालिक जबरन घरों-खोलियों से निकाल रहे हैं। उनसे मारपीट और छीना-झपटी रोजमर्रा का किस्सा है। यह हर शहर में हो रहा है। कहने को 55 दिन कर्फ्यू रहा लेकिन मजदूरों से अलग किस्म की हिंसा होती रही और हो रही है। जाने वाले प्रवासी श्रमिकों में से बहुतेरे ऐसे हैं जो मन और देह पर जख्म लेकर जा रहे हैं। लॉकडाउन और कर्फ्यू ने समाज का सारा ताना-बाना बदल दिया है। सामाजिक दूरियों ने दिलों की दूरियां भी बढ़ाईं हैं। इस बीच कई रिश्ते टूटे। बार-बार विवाह स्थगित होने से उपजे तनाव ने एक लड़की को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। कम से कम 10 आत्महत्याएं कोरोना वायरस की दहशत की देन हैं।   इस रिपोर्ताज के लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, The path to online education is not easy!

वैश्विक महामारी कोविड-19 ने दुनिया की रफ़्तार पर ब्रेक लगा दिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी कई सालों पीछे कर दिया है। विश्व के अधिकांश देशों में लॉक डाउन है या फिर कर्फ़्यू जैसे हालात है। केवल जरूरी सामान व सेवाएं ही सुचारू रूप से संचालित हो रही है। भारत में भी इस महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। देश पूरी तरह से लॉक डाउन के कारण ठप्प पड़ा है। मानों लगता है, अब मानवीय सभ्यता अपनी आख़िरी सांसें गिन रही हो। ऐसे में भले ही आज संकट की घड़ी मानव सभ्यता पर आन पड़ी हो, लेकिन मानवीय जीवटता इतनी बलवती है कि वह इस संकट से हार नहीं मानेगी यह तो निश्चित है। ऐसे में सवाल उठता है शिक्षण संस्थानों का क्या होगा? जो कहीं न कहीं आता तो है जरूरी सेवाओं में, लेकिन जब सोशल डिस्टनसिंग बनाकर रखना है। फ़िर शिक्षण संस्थानों पर ताला लगना स्वाभाविक है। इन सब के बीच हमारी व्यवस्था ने बच्चों का भविष्य और समय बर्बाद न हो इसके लिए ऑनलाइन क्लासेज आदि का इंतज़ामात करा दिया है। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था पर यूं तो हमेशा से ही सवाल उठते आ रहे है। वह शिक्षा ऑनलाइन होकर कैसे बेहतर विकल्प बन सकती बड़ा सवाल यह भी है। लॉकडाउन के वक्त शिक्षा में सकारात्मक बदलाव हुए है। आज देश ऑनलाइन शिक्षा की ओर आगे बढ़ रहा है । वैसे भी जब तक बहुत आवश्यक न हो हम बदलाव को स्वीकारते नही है । लेकिन इस महामारी ने, न केवल हमारी दिनचर्या में परिवर्तन किए बल्कि आज सामाजिक, सांस्कृतिक, रीति रिवाजों में भी बदलाव आ गए है । जिसकी तस्वीर आए दिनों हम देख रहे है । जन्म , शादी समारोह और मृत्यु ये तीन कर्म को भारतीय संस्कृति में बहुत ही धूमधाम से मनाए जाता था, लेकिन इस एक वायरस ने इन सब पर ग्रहण लगा दिया है । इस भागती ज़िन्दगी में लोगो के पास स्वयं के लिए भी समय नही था आज वह अपने परिवार के साथ समय बिता रहे है । अपने हुनर को तराश रहे है । इस लॉकडाउन में भले ही लोगो से मिलना जुलना बन्द हो गया हो। लेकिन संवाद का एक नया रूप हमारे सामने आया है । जिसका असर शिक्षण संस्थाओं पर भी दिखाई दे रहा है। आज से करीब साढ़े पांच दशक पहले सन 1964 में कनाड़ा के प्रसिद्ध दार्शनिक मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि संस्कृति की सीमाएं खत्म हो रही हैं , और पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो रही है । 1997 में वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पत्रकार फ्रैंसिस केन्कोर्स ने ‘ द डेथ ऑफ डिस्टेंस ‘ सिद्धान्त दिया था। जिसमें कहा गया कि दुनिया की दूरियों का अंत हो गया है। लेकिन उन महान दार्शनिकों ने तो कभी वैश्विक महामारी की कल्पना नहीं की होगी और न ही कभी वैश्विक लॉक डाउन के बारे में सोचा होगा । कोरोना महामारी ने आज दुनिया भर में लोगो को अपने अपने घरों में कैद कर दिया है। लोग डर और भय के माहौल में जी रहे है, और दुनिया में हो रहे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे है । देखा जाए तो प्रत्येक चुनौती अपने साथ नए अवसरों को लेकर आती है । आज जरूरत है उन अवसरों को समझने और उनका लाभ उठाने की । शिक्षण संस्थानों ने भी ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया है । इसमें सरकार ने भी व्यापक पहल की है। जिसके तहत मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा लॉक डाउन के दौरान शिक्षा व्यवस्था गतिशील रह सकें, इसके लिए 11 अप्रैल 2020 को “भारत पढ़ें ऑनलाइन” की शुरुआत की। यह कार्यक्रम ऑनलाइन शिक्षा पारिस्थिकी तंत्र में सुधार और निगरानी के लिए लांच किया गया। इसके अलावा सरकार ने “युक्ति पोर्टल” भी लांच किया। सरकारी तंत्र द्वारा उठाया गया यह प्रयास अलहदा है। पर सवाल यह उठता है कि क्या ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण और समाज कल्याण के लक्ष्यों की पूर्ति कर पायेगी ? माना कि इस नई शिक्षा नीति में चुनोतियाँ बहुत है । लेकिन इस ओर एक व्यापक पहल आने वाले समय मे शिक्षा के स्तर में सुधार की दिशा में एक नया कदम है। एक बात यह भी है। इन सब के दरमियान देखें तो भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश में ऑनलाइन शिक्षा में कई चुनौतियां है। शैक्षणिक संस्थानों , कालेजों के पाठ्यक्रम में भिन्नता इसमें बहुत बड़ा रोड़ा है । जो ऑनलाइन शिक्षा के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है । देश मे समान पाठ्यक्रम पर लम्बी बहस बरसों से होती आई है , लेकिन इस पर एक राय कभी नही बन पाई । तो वही भारत में इंटरनेट की स्पीड भी ऑनलाइन क्लासेस में एक बड़ी समस्या रही है। ब्राडबैंड स्पीड विश्लेषण कम्पनी ऊकला की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2019 में भारत में मोबाइल इंटरनेट स्पीड में 128 वें स्थान पर रहा । भारत में लॉकडाउन के दौरान इंटरनेट स्पीड 11.18 एमबीपीएस ओर अपलोड स्पीड 4.38 एमबीपीएस रही । ऑनलाइन क्लासेस के समय इंटरनेट स्पीड का कम ज्यादा होना समस्या पैदा करता है । गांवों में यह समस्या कई गुना बढ़ जाती है । गांव में अधिकांश विद्यार्थियों के पास ऑनलाइन पढ़ने के लिए न ही संसाधन उपलब्ध है और असमय बिजली कटौती एक गंभीर चुनौती है । ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा के सपने को सही रूप में साकार कर पाना दूर की कौड़ी नजर आती है । ऑनलाइन शिक्षा के कई नुकसान है तो वही इसके फायदों की बात की जाए तो यह शिक्षा पर होने वाले खर्चो को कई गुना कम कर सकता है। वही देश विदेश में उच्च संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने का मार्ग भी सुगम कराता है । लेकिन ऑनलाइन शिक्षा के सुचारू संचालन भारत जैसे विशालकाय देश में एक ओर जहां फायदे का सौदा है तो वही तकनीकी रूप से इसमें होने वाली समस्याएं व चुनोतियाँ भी कम नही है । अभी लॉक डाउन की स्थिति में यह व्यवस्था भले भी बहुत आसान व फायदेमंद नजर आ रही हो । लेकिन इसके सभी पहलुओं को समझ कर ही आगामी समय मे इस पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत जैसे देश मे गुरुकुल की परम्परा रही है । जहां छात्र ओर शिक्षक एक साथ उपस्थित होकर विद्या अध्ययन करते थे ।। जहां गुरु छात्र के चेहरे के भाव देखकर समझ जाते थे कि शिष्य को कहा समस्या आ रही है । गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में जहां संस्कार ,संस्कृति , ओर शिष्टाचार की शिक्षा दी जाती थी। क्या ऑनलाइन शिक्षा में यह सब संभव हो सकेगा ? सवाल कई है लेकिन इन सवालों के जवाब मौजूदा वक़्त में संभव नही है । कोरोना काल के बाद आने वाला समय ही देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा को तय करेगा । तब तक देश के भविष्य से यही अपील है कि ऑनलाइन पढ़ते जाइए, क्योंकि समय अनमोल है, उसे व्यर्थ न जाने दें।   सोनम लववंशीखंडवामध्य प्रदेश

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, When difficult times come, Rajesh Joshi, find many mediums,expression.

अनिश्चितता में हम रोज़ कुछ निश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार, जरूरी व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने में सक्रिय है तो आम जनता और कुछ संस्थाएं सड़क पर बदहवास चले जा रहे हैं लोगों के लिए खाना या पानी उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ दूर के लिए कोई सवारी मिल जाने से निश्चिन्तता नहीं मिलेगी। जरा राहत मिल जाएगी। उसकी निश्चिन्तता घर की पहुंच है। दरअसल यह कोशिशें ही इस समय का सच है। हमारे समय के सवालों का जवाब। लेखक अनु सिंह चौधरी ने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर कहा कि, “हमारे भीतर ये सवाल गूंजता है कि जो भी हम कर रहे हैं इसका मानी क्या है? इस बीमारी के बारे में कहीं कोई जवाब नहीं है। तब इतिहास और साहित्य के पन्ने को पलट कर देखना एक उम्मीद, एक हौसले के लिए कि कैसे हमारे पूर्वज़ों ने बड़ी त्रासदियों का सामना किया है। कहानियों, किस्सों या काल्पनिक कथाओं के जरिए अपने समय को देखा है। उम्मीद या नाउम्मीदी कोई तो रास्ता वहां से निकलेगा…” कई भाषाओं एवं बोलियों में न केवल महामारियों बल्कि अन्य प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र हुआ है। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, कमलाकान्त त्रिपाठी, विलियम शेक्सपीयर, अल्बैर कामू, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ जैसे कई साहित्यकारों ने अपने समय की आपदाओं को अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाया है। “लेकिन जब कठिन समय आते हैं तो अभिव्यक्ति के कई माध्यम ढूँढने होते हैं।” राजेश जोशी ने यह बात लाइव बातचीत के दौरान कही। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर उन्होंने कहा, “यह महान दृश्य है चल रहा मनुष्य है – हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्ति आज के समय में बिलकुल बदल जाती है। पैदल चलते हुए मनुष्यों का दृश्य महान दृश्य नहीं हृदय विदारक और दुखी कर देने वाले दृश्य हैं। इस समय उम्मीद देने वाला दृश्य उन डॉक्टर, स्वास्थकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों, एक्टिविष्ट को देखना है जो जीवन को बचाने में रात दिन लगे हुए हैं।“ राजकमल प्रकाशन समूह के साथ फ़ेसबुक लाइव के जरिए राजेश जोशी ने अपनी कई नई कविताएं और कुछ पुरानी कविताओं का पाठ किया। राजेश जोशी ने अपनी कविताओं को जीवन को बचाने में लगे लोगों को समर्पित किया- “उल्लंघन / कभी जान बूझकर / कभी अनजाने में / बंद दरवाज़े मुझे बचपन से ही पसंद नहीं रहे / एक पांव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा / व्याकरण के नियम जानना मैंने कभी जरूरी नहीं समझा / इसी कारण मुझे कभी दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी / और किसी व्यापारी के हाथ मोर का पंख देकर उसे खरीदा नहीं / बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी / और उससे भी ज़्यादा मुश्किल था हर पल उसकी हिफ़ाजत करना..”   प्रस्तुति- सुमन परमार

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, Politicians misuse ,entrepreneurial defamation, court , intimidate  media

नई दिल्ली : नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया (एनयूजेआई) ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें कहा गया है कि ताकतवर राजनेता और कॉरपोट जगत के लोग ‘मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया को डराने-धमकाने के लिए करते हैं। कोर्ट ने कहा है कि रिपोर्टिंग में मात्र कुछ गलतियां अभियोजन पक्ष को यह अधिकार नहीं देती कि उसे अपराधी ठहराया जा सके। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन ने अपने फैसले में कहा है कि शक्तिशाली राजनेता और कॉर्पोरेट्स मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया के खिलाफ ’डराने-धमकाने के हथियार’ के रूप में कर रहे हैं। एनयूजे (आई) के अध्यक्ष रास बिहारी और महासचिव प्रसन्ना मोहंती ने एक संयुक्त बयान में कहा कि एनयूजे (आई) मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करता है। यह निर्णय पूरे कॉर्पोरेट जगत और राजनेताओं के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। कोर्ट का यह फैसला उन लोगों को सबक सिखाने वाला साबित होगा जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दबाव डालकर और भय का वातावरण पैदा करके प्रेस की स्वतंत्रता को दबाते हैं। उन्होंने बताया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को और मजबूत करते हुए न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उच्च न्यायपालिका द्वारा एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह एक रिकॉर्ड का विषय है कि पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करना कॉर्पोरेट निकायों और शक्तिशाली राजनेताओं का एक साधन बन गई है। इन राजनेताओं की जेबें गहरी हैं और जिनके हाथों में लंबे समय तक मीडिया हाउसेज को बांधे रखने के लिए अच्छे संसाधन मौजूद हैं। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा कि हमेशा गलती का एक मार्जिन हो सकता है। तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर प्रत्येक मामले में मीडिया को इस बचाव का लाभ उठाने का हक है। रिपोर्टिंग में मात्र गलतियां अभियोजन के आरोपों को सही नहीं ठहरा सकते।

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, PMO refuses, benefits of extinguishing lights , lighting lamps

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 05 अप्रैल 2020 को 09.00 बजे लाइट बुझाने तथा दिया आदि जलाने के संबंध में भाषण के बारे में सूचना देने से मना कर दिया है. नूतन ने पीएमओ को पीएमओ अभिलेखों के अनुसार इन निर्देशों को निर्गत करने से संबंधित तर्क एवं कारण एवं इससे संभावित लाभ की जानकारी मांगी थी. साथ ही उन्होंने पूछा था कि ये निर्देश अनिवार्य हैं या मात्र सुझाव हैं, और यदि ये अनिवार्य निर्देश हैं तो इनके उल्लंघन कर क्या दंड प्राविधानित है. नूतन ने इस संबंध में पीएमओ अथवा भारत सरकार द्वारा निर्गत सरकारी आदेश तथा पीएमओ की पत्रावली की प्रति भी मांगी थी. पीएमओ के जन सूचना अधिकारी प्रवीण कुमार ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि मांगी गयी जानकारी आरटीआई एक्ट की धारा 2(एफ) में सूचना के अंतर्गत नहीं आता है.   नूतन ने इससे असहमत होते हुए इस संबंध में प्रथम अपील प्रस्तुत किया है.

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, Writers and literature lovers, paid tribute, story writer, Shashibhushan Dwivedi

कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की असामयिक मृत्यु से हिन्दी जगत एवं साहित्य प्रेमियों के बीच गहरा शोक व्याप्त है। कल शाम ह्दयगति रूकने से 45 वर्ष के शशिभूषण द्विवेदी की मृत्यु हो गई। कोरोना काल के इस अमानवीय समय ने हमें हमारे शोक में नितांत अकेला कर दिया है। सामाजिक दूरी बनाए रखने की हमारी विवशता में हम गले मिलकर एक-दूसरे से अपना ग़म भी नहीं बाँट पा रहे। लेकिन, आभासी दुनिया के माध्यम से लोगों ने शशिभूषण द्विवेदी को याद कर उनके साथ के अपने संस्मरणों को साझा कर, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। लेखक ममता कालिया ने कहा, “उनकी हर कहानी के अंदर उत्तर आधुनिक चेतना देखने को मिलती है। उनकी कहानी ‘छुट्टी का दिन’ बहुत मार्मिक कहानी है। उनकी कहानियों से उनके व्यक्तित्व को अलग नहीं किया जा सकता, अपनी हर कहानी में वे दिखाई देते हैं। राजनीतिक बातों को प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करना उनकी ख़ासियत थी।“ उन्होंने कहा, “कोरोना काल में जब हम अपने अपने घरों में रहने को मजबूर हैं ऐसे में आभासी माध्यम में साथ जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी को याद करना खुद के दुखों को कम करने का एहसास मात्र है।“ ममता कालिया ने लाइव बात करते हुए शशिभूषण द्विवेदी की कहानी का पाठ भी किया। कहानीकार चंदन पांडेय ने शशिभूषण द्विवेदी को एक दोस्त और एक समकालीन कथाकार के रूप में याद करते हुए कहा कि, “वे एक बेबाक लेखक थे। उनकी कहानियों की ख़ासियत थी कि वे इतिहास को उसी दौर में, उसी नज़रिये से देखते हुए उसे वर्तमान की कहानी बना देते थे। ‘विप्लव’, ‘ब्रह्महत्या’, ‘खेल’ उनकी कुछ महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। सोशल मीडिया पर लोग कल शाम शशिभूषण द्विवेदी के निधन की ख़बर आने के बाद से लगातार उन्हें ही याद कर रहे हैं। जितने साहित्य की दुनिया के लोग याद कर रहे हैं, उतने ही उससे बाहर के विस्तृत हिंदी समाज के लोगों ने उनके किस्से साझा किए। आलोचक अमितेश कुमार ने आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी के साथ बिताए बहुत सारे पलों को याद किया। उन्होंने कहा कि वो जीवन के मुश्किल क्षणों में भी हास्य का रस निकाल लाते थे। अमितेश ने कहा, “अभी तो हम इंतज़ार में थे कि हमें उनकी कई और रचनाओं को पढ़ने का मौका मिलेगा। लेकिन, जैसे उनकी कहानियों में शिल्प अचानक समाप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही वे अचानक हमारे बीच से चले गए।   अमितेश ने लाइव बातचीत में कहा, “जीवन में कठिनाई और तनाव के बीच सकारात्मकता ढूँढ़ निकाल लाने वाले व्यक्ति के तौर पर शशिभूषण द्विवेदी बहुत याद आएंगे। अपने दोस्तों और उभरते लेखकों, साहित्यकारों के लिए वे एक बेबाक और स्पष्ट आलोचक थे जिनकी कही बातों ने बहुतों को कुछ नया सिखाया था।“ लॉकडाउन में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा वाट्सएप्प से रोज़ साझा की जा रही पुस्तिका आज लेखक शशिभूषण द्विवेदी को समर्पित रही। पुस्किता में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी कहानियों को साझा किया गया है।

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, For six years, anonymous senior journalist ,writer Meenu Rani Dubey

प्रयागराज की वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका मीनू रानी दुबे के निधन से इस प्रदेश में महिला पत्रकारों के एक युग का अंत तो गया. मीनू ने उस समय पत्रकारिता में कदम रखा था जब प्रयागराज में एक भी महिला पत्रकार नहीं थी. उनका इस पेशे में आना एक कौतूहल से काम नहीं था. उन्होंने 1982 में तत्कालीन महिला मैगज़ीन मनोरमा में बतौर उप संपादक काम शुरू किया और बाद में वह इसकी सहयोगी संपादक बनीं. मैं इससे पहले 1979 से देशदूत (दैनिक अख़बार) के लिए खेल की न्यूज़ कवर करने लगा था. उस समय एलएलबी तृतीय वर्ष का छात्र था. डॉ राम नरेश त्रिपाठी इस अख़बार के चीफ रिपोर्टर थे. देशदूत स्व. नरेंद्र मोहन के चचेरे भाई वीरेंद्र कुमार का था. कुछ ही महीनों बाद दोनों में हिस्सेदारी का समझौता हुआ और देशदूत दैनिक जागरण हो गया. उसी साल अगस्त में तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास ने जागरण का लोकार्पण किया. यहाँ मुझे स्पोर्ट्स के अलावा डेस्क पर भी काम करने को कहा गया. इसी दौरान मेरा मीनू रानी से परिचय हुआ. उल्लेखनीय है कि गत चार मई को त्रिपोलिया (प्रयागराज) स्थित घर पर गिरने से गंभीर रूप से घायल होने के कारण मीनू रानी का निधन हो गया था. मीनू रानी बहुत प्रतिभावान थीं. उन्हें सामयिक तथा रुचिकर व पठनीय विषयों की गहरी समझ थी और मैगज़ीन के दो अंक बाद वाले अंक में क्या-क्या सामग्री जा सकती है, वह पहले से ही तैयारी में जुट जाती थीं. डेस्क पर काम करने के साथ ही वह फील्ड में जाकर महिला सन्दर्भ पर रिपोर्टिंग भी करती थीं और शुद्ध रूप से रचनात्मक रिपोर्टिंग में ही प्रतिमान स्थापित किया. मनोरमा उस समय देश की नंबर वन महिला मैगज़ीन हुआ करती थी और दक्षिणी राज्यों में भी हिंदी भाषी परिवारों में वह पढ़ी जाती थी. उसकी लोकप्रियता के बराबर कोई अन्य मैगज़ीन नहीं पहुँच पायी. प्रयागराज के सभी नामी साहित्यकारों महादेवी वर्मा, उपेंद्र नाथ अश्क, डॉ राम कुमार वर्मा, जगदीश गुप्त, अमर कांत आदि उन्हें बहुत स्नेह देते थे. शहर के पत्रकारों के हर आयोजन और कार्यक्रम में मीनू रानी अनिवार्य रूप से की उपस्थित रहती थीं. उन्होंने इतने आलेख, इंटरव्यू, प्रसंग, संस्मरण लिखे जिनकी कोई संख्या उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कभी पत्रकारों से सामान्य चर्चा में भी इसका कभी उल्लेख नहीं किया. हो सकता है इसलिए कि ऐसा कहने से अहंकार का भाव लक्षित होता. मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की साहित्यिक गतिविधियों में उन्हें भाग लेते देखता था. डेलीगेसी की मैगज़ीन में उनके लेख छपा करते थे. छात्र-छात्रों की गोष्ठियों में उन्हें विचार रखने के लिया बुलाया जाता था. मुझसे अक्सर वह यूनिवर्सिटी में ही इन सबकी चर्चा करती थीं. एक बार यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी हाल में उन्होंने कोई मैगज़ीन अपने गाँधी झोले से निकाली और मुझे पन्ने पलटकर दिखाते हुए बोली, देखिये इंद्र कांत जी मेरा लेख छपा है. मैंने सरसरी तौर पर देखा और उन्हें बधाई दी तो वह खुश हो गयीं. प्रबंधन की आपसी लड़ाई के कारण मनोरमा मैगज़ीन बंद हो गयी तो वह स्वतंत्र रूप से अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख देती रहीं. 1980 के आस पास प्रयागराज में उनके अलावा कोई महिला पत्रकार नहीं थी. हाँ लेखिकाएं कई थीं. बाद में नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका अख़बार में संध्या सिंघल, सुनीता द्विवेदी (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की पत्नी और सुप्रीम कोर्ट के जज स्व एसएन द्विवेदी की पुत्रवधू और हाई कोर्ट के जस्टिस धवन की बहन) आयीं. सुनीता द्विवेदी डेस्क के अलावा रिपोर्टिंग का भी काम कर लेती थीं और उनके लेख भी छपते थे. अब चैनलों की बाढ़ आने के बाद महिला पत्रकारों की भी बाढ़ आ गयी है. इनमें स्क्रिप्ट पढ़ते हुए एंकरिंग की तो क्षमता दिखती है लेकिन लेखन में नहीं, क्योंकि वैचारिक शून्यता है. पांच छह साल से गुमनाम थीं इधर पांच-छह साल से वह गुमनाम जैसी हो गयी थीं. पत्रकारों से उनकी मुलाकात नहीं होती थी और अपने को घर तक सीमित कर लिया था. एक साल पहले मेरी उनकी मुलाकात इलहाबाद ब्लॉक वर्क्स (प्रिंटिंग प्रेस ) में हुई थी, मेरा वहां के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज मित्तल से 40 साल पुराना सम्बन्ध है. वह मनोज के पास बैठी थीं. मुझे देखती ही पूछी…अरे ..इंद्र कांत जी आप यहाँ कैसे.?.. मनोज ने कहा कि भाई साहब तो हमेशा यहाँ आते रहते हैं..वह बताई कि वह भी यहाँ अक्सर आती हें. मैंने एक बात देखी जिससे मैं कुछ क्षण विचलित भी हुआ..मीनू रानी बहुत कमजोर हो गयी थीं और चेहरे पर चिंतन और चमक गायब थी. मैंने पूछा…मीनू जी आप इतनी कमजोर क्यों हो गयी? स्वास्थ्य को क्या गया है? वह पल भर खामोश रहीं, फिर रोने लगीं और पल्लू से आंसू पोछते हुए kaha, मै ठीक भी हूँ और नहीं भी. मैंने कहा, हुआ क्या है? वह बोली, कुछ नहीं. फिर पूछा, आप कुछ बताएं, हो सकता है मै कुछ मदद कर सकूँ. …बोलीं..नहीं नहीं सब ठीक है. आप अपना हाल बताएं , स्वास्थ्य कैसा है? कुछ देर बाद वह सामान्य हुईं. मनोज से कुछ देर बात हुई फिर मैं मीनू रानी को अपना ख्याल रखने की बात कहकर चला गया. उनके शारीरिक हालत को देख मुझे लगा कि कुछ न कुछ प्रॉब्लम है जरूर. इस मुलाकात के दो महीने बाद अपने एक लेख के बारे में कुछ जानकारी लेने के लिए उन्हें फ़ोन किया तो वह उत्साह के साथ बात करती रहीं, खुश मिजाज लग रही थीं और पूरी जानकारी दीं. लगभग आधा घंटे तक मेरी उनकी बात हुई. उसके बाद फिर बात नहीं हो सकी. एक लेखिका और पत्रकार के रूप में मीनू रानी जितना रचनात्मक योगदान समाज को दे सकती थीं, उतना उन्होंने दिया. वह अपने पीछे आदर्श और सकारात्मक पत्रकारिता ऐसा अध्याय छोड़ गयी, जो भविष्य में किसी अन्य महिला पत्रकार के वश की बात नहीं जो इसे दोहरा सके.   लेखक इंद्र कांत मिश्र प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. 

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Amit Shah, broke silence,no malice,pread rumors about my health

Amit Shah : पिछले कई दिनों से कुछ मित्रों ने सोशल मिडिया के माध्यम से मेरे स्वास्थ्य के बारे में कई मनगढ़ंत अफवाए फैलाई हैं। यहाँ तक कि कई लोगों ने मेरी मृत्यु के लिए भी ट्वीट कर दुआ मांगी है। देश इस समय कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा और देश के गृह मंत्री के नाते देर रात तक अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैंने इस सब पर ध्यान नहीं दिया। जब यह मेरे संज्ञान में आया तो मैंने सोचा कि यह सभी लोग अपनी काल्पनिक सोच का आनंद लेते रहें, इसलिये मैंने कोई स्पष्टता नहीं की। परन्तु मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओ और मेरे शुभचिंतकों ने विगत दो दिनों से काफी चिंता व्यक्त की और उनकी चिंता को मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता। इसलिए मैं आज स्पष्ट करना चाहता हूँ, कि मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ और मुझे कोई बीमारी नहीं है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ऐसा मानना है कि इस तरह की अफवाह स्वास्थ्य को और अधिक मज़बूत करती हैं। इसलिए मैं ऐसे सभी लोगों से आशा करता हूँ कि वो यह व्यर्थ की बातें छोड़ कर मुझे मेरा कार्य करने देंगे और स्वयं भी अपने काम करेंगे। मेरे शुभचिन्तक और पार्टी के सभी कार्यकर्ताओ का मेरे हालचाल पूछने और मेरी चिंता करने के लिए उनका आभार व्यक्त हूँ।   और जिन लोगों ने यह अफवाएं फैलाई है उनके प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना या द्वेष नहीं है। आपका भी धन्यवाद्।   देश के गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह की एफबी वॉल से.  

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Senior journalist of Kadambini Shasibhushan Dwivedi is no more

दुखद सूचना हिंदुस्तान ग्रुप की मैगजीन कादम्बिनी से आ रही है। यहां कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी का निधन हो गया है। फेसबुक पर महेंद्र अवधेश श्रीवास्तव लिखते हैं- भाई शशि भूषण द्विवेदी नहीं रहे। एक बेबाक-बिंदास टिप्पणीकार के रूप में इसी फेसबुक के जरिये मैंने उन्हें जाना। समझने-परखने का प्रयास किया, अपना कोई कद-पहचान न होते हुए भी। मिलने की बहुत इच्छा थी। सोचा था कि कभी किसी पुस्तक मेले में दर्शन का सौभाग्य मिला, तो उन्हें प्रणाम करूंगा। लेकिन, जिम्मेदारियों और बेबसी ने इस कदर जकड़ा कि पिछले दो-तीन पुस्तक मेले मुझसे छूट गए। शशि जी जब कुछ कहते थे, तो लगता कि जैसे कोई अपने बीच का आदमी बोला। मैं उनकी हर पोस्ट को पढ़ता और लाइक करता, लेकिन कमेंट नहीं करता। डर सा लगता था। सादर नमन मेरे भाई। विधाता आपकी आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें। अरुण शीतांश की टिप्पणी पढ़ें- Shashi Bhooshan Dwivedi से मेरी मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में हरे प्रकाश उपाध्याय के साथ हुई थी, प्र ले सं का राष्ट्रीय सम्मेलन में। वहां हमलोग साथ में खाना-वाना खाए।विष्णु नागर ने कादम्बिनी पत्रिका में कविता प्रकाशित की थी तो उसकी चर्चा की। फोन पर बातचीत हमेशा होती रहती थी।विश्वास नहीं हो रहा है आज नहीं हैं। उनको रिक्शा पकड़ा कर गेस्ट हाउस लौट आया था। उस क्षण की बहुत याद आ रही है।मन बहुत दुःखी है। ये जाने की उमर नहीं थी। बहुत प्यारे इंसान थे। लग रहा है यह झूठी ख़बर है। उन्होंने अपना फ्लैट लिया। उसके बाद बात नहीं हो सकी।मैं तो लगातार सबको फोन कर रहा हूं जब से कोरोना काल की शुरुआत हुई है। अब इन्हीं से बात होने वाली थी कि….! नमन!! अजित प्रियदर्शी की प्रतिक्रिया- नयी सदी के चर्चित और अपने तरह के अनोखे कथाकार Shashi Bhooshan Dwivedi का इतनी जल्दी जाना हतप्रभ कर गया। वे जितने अच्छे कथाकार थे, उतने ही अच्छे इंसान। दोटूक, बेबाक, जि़न्दादिल इंसान की गवाही देते थे उनके पोस्ट। दिल्ली के आत्ममुग्ध और अहमन्य साहित्यिक परिदृश्य के बाहर था उनका व्यक्तित्व। किसी साहित्यिक प्रकरण की जानकारी लेने के लिए उन्होंने एक बार फोन किया था।उनसे दिलचस्प संवाद याद है। उनके परिवार को यह कठिन दुख सकने की शक्ति मिले। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि! कश्यप किशोर मिश्र का कमेंट- “अतीत झूठा होता है अतीत में ठीक ठीक वापसी संभव नहीं।” “मरना ही सबकुछ नहीं होता सही समय पर मरना जरूरी होता है।” बीते चार घंटे पहले शशिभूषण जी के एकाएक न रहने की खबर पढ़ी। बड़ी देर तक दिमाग में कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। कुछ सोचा ही नहीं जा रहा था। सिर्फ यहां वहां उनके नहीं रहने की खबर देख रहा था पढ़ रहा था। आज के दौर में, साहित्य और साहित्यकार “सुपर मार्केट” के प्रोडक्ट की तरह हैं उनके बीच शशिभूषण जी पुराने वक्त के कस्बाई या छोटे शहरों की एक परचून की दूकान की तरह थे। बिना किसी तड़क भड़क के बिना किसी चमकदार पैकिंग के, बिना किसी डिस्काउंट आफर के बेहद सहज तरीके से सिर्फ जरूरत भर की बात जरूरत भर की पुड़िया में बांध देते थे। विनीत कुमार नें शशिभूषण जी को याद करते हुए कहा कि “फोन पर बात करते हुए वो अपने साथ एक जंगल लेकर काल करते थे।” मेरे ख्याल में वो खुद में एक जंगल बन गये थे। भरी – पुरी आबादी के बीच एक पुरानी हवेली की मानिंद थे जिसमें समय के साथ साथ पौधों लतरों झाड़ झंखाड़ का एक जंगल उग आया हो। बीच आबादी एक मकान अपनें पैदा किये जंगल के साथ अपनी गति से जी रहा हो। ऐसी हवेलियां अपना जंगल लिए खत्म होती हैं या इनके जंगल इन्हें लिए दिए खत्म होते हैं। ऐसा ही हुआ भी। शशिभूषण जी के साथ साथ उनके परिवेश और व्यक्तित्व के सायबान तले फैला फूला जंगल भी सहसा ही खत्म हो गया।

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, Google added new meeting feature in Gmail

कोरोना के चलते दुनिया भर के देशों में लॉक डाउन के चलते कई किस्म की नई जरूरतें पैदा हुई हैं जिसे भुनाते हुए कई कंपनियों ने अपने अपने प्रोडक्ट/फीचर लांच किए हैं. इसमें जूम एप्प सर्वाधिक चर्चा में है जिसमें अलग अलग जगहों पर घर में बैठे लोग एक साथ चैट, मीटिंग, कांफ्रेंस कर सकते हैं. सबसे खास ये कि इस चैट मीटिंग कांफ्रेंस के वीडियो को सेव कर बाद में इसे किसी भी भी प्लेटफार्म (यूट्यूब, फेसबुक आदि) पर अपलोड भी कर सकते हैं. जूम के इस अविष्कार से सबसे बड़ा फायदा मीडिया वालों को हुआ जो घर बैठे दूसरे लोगों से कनेक्ट कर डिबेट परिचर्चा शो आदि कर पा रहे हैं. इस एप्प से कारपोरेट कंपनीज को भी काफी फायदा हो रहा है जो वर्क फ्राम होम के चलते अपने इंप्लाइज से इस एप्प के जरिए कनेक्ट हो पा रहे हैं. वाट्सअप ने भी एक साथ आठ लोगों के वीडियो चैट की सुविधा दी है. अभी तक चार लोग ही एक साथ चैट कर सकते थे. ताजा डेवलपमेंट जीमेल का है. गूगल की मेल कंपनी जीमेल ने मीटिंग का नया फीचर पेश कर दिया है. जब आप जीमेल खोलेंगे तो जिस तरफ इनबाक्स, स्टार्ड, सेंट, ड्राफ्ट, स्पैम आदि लिखा होता है, उसी के नीचे Meet करके एक फीचर लिखा आएगा. इस ‘मीट’ के नीचे दो फीचर लिखे आते हैं. स्टार्ट ए मीटिंग और ज्वाइन ए मीटिंग. स्टार्ट ए मीटिंग वाले फीचर में आप किसी नई मीटिंग की शुरुआत कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में एक कोड जनरेट होगा जिसे आप मीटिंग में शामिल होने वाले अन्य व्यक्तियों को भेजेंगे और वो लोग उस कोड के जरिए आपकी मीटिंग में जुड़ जाएंगे, ज्वाइन ए मीटिंग पर क्लिक कर कोड डालते हुए. कोलकाता से श्वेता सिंह की रिपोर्ट.  

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, God bless Amit Shah

अमित शाह के बारे में बहुत बातें हो रही हैं. उनके स्वास्थ्य और निस्तेज (अच्छी हिंदी में कहे तो बुझे हुए) चेहरे को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. कुछ लोग उन्हें बोन कैंसर से पीड़ित बता रहे हैं तो कुछ अन्य बीमारियों से. लेकिन मीडिया में उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई अपडेट नहीं है. अमित शाह ठीक उसी समय गायब हुए थे जब उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन गायब हुए थे. इंडियन मीडिया ने बगदादी की तरह किम को 20 से अधिक बार मार डाला लेकिन किम वापस आ गए, हर तानाशाह की तरह.   इंडियन मीडिया के पास मिसाइल रहता तो खुद ही किम को मार देतें ये बोल हमारा मजा खराब करने क्यों वापस आया तू? जा अब मर!! खैर, अमित शाह जब गायब थे तब मीडिया ने यह स्टोरी गढ़ी कि परदे के पीछे कोरोना से जंग की कमान अमित शाह के हाथ में था. अब जब अमित शाह वापस आये हैं तो मीडिया में आई उनकी फोटो ज़ूम कर देखा जा रहा है, लोग उनके पतले हाथों को देख तंज़ कस रहे हैं कि मांस कहाँ गया? आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई नहीं दे रही है जैसे वे गले को मोटा करते हुए बोलते थे “आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए.. पहले सीएबी आने जा रहा है, सीएबी आने के बाद एनआरसी आएगा. एनआरसी सिर्फ बंगाल के लिए नहीं आएगा, पूरे देश के लिए आएगा. ” लेकिन मामला उल्टा हो गया एनआरसी से पहले दुबले पतले अमित शाह आ गए. अब अमित शाह से लड़ने में मजा नहीं आ रहा है. कहाँ हट्टे -कट्टे अमित शाह और कहाँ माचिस की तीली सा अमित शाह. मैं बहुत निराश हूँ! क्या ये बात छुपाई नहीं जा सकती थी. जैसे बीमारी छुपा ली गई, जैसे उस हॉस्पिटल और डॉक्टर को छुपा लिया गया जिन्होंने रात के अंधेरे में अमित शाह का इलाज किया. उन लोगों को बोल दिया रहा होगा कि कोई जानकारी लीक नहीं होना चाहिए. अगर किसी ने किया तो लोया को याद कर लो. लेकिन मजा खुद अमित शाह ने खराब कर दिया. मेरी अमित शाह को एक सलाह है, जैसे हर तानाशाह अपना बॉडी डबल रखते हैं, वैसे ही उन्हें भी रख लेना चाहिए, जब लोग ज्यादा सवाल करने लगे तो एएनआई के कैमरामैन को बुलाकर हट्टे कट्टे बॉडी डबल की फ़ोटो खींच मीडिया में जारी कर दें. बाकी काम मीडिया कर देगा कि फलां फलां मिशन पर हैं अमित शाह. ये दुबला पतला अमित शाह हमें एकदम पसंद नहीं. तानाशाहों का परचम बुलंद रहे! विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से!

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, newspapers , relief package, government send money , media persons

अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के लिए संघर्षरत अखबार कर्मियों की यूनियन न्‍यूजपेपर इम्‍प्‍लाइज यूनियन आफ इंडिया (न्‍यूइंडिया) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अखबार मालिकों की संस्‍था आईएनएस की राहत पैकेज की मांग का विरोध करते हुए मजीठिया वेजबोर्ड लागू करवाने की लड़ाई में नौकरियां गवा चुके हजारों अखबारकर्मियों को सीधे तौर पर आर्थिक मदद की मांग की है। ज्ञात रहे कि ऐसे हजारों अखबार कर्मी नाैकरी छीन जाने के कारण रोजी रोटी को मोहताज हैं। इस संबंध में न्‍यूइंडिया द्वारा लिखा पत्र इस प्रकार से है: अखबार कर्मचारियों के लिए 11 नवंबर 2011 को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा संवैधानिक घोषित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू ना करके देश के संविधान और संसद का मखौल उड़ाने वाले अखबार मालिकों के संगठन आईएनएस की हजारों करोड़ के राहत पैकेज की मांग का हम देश भर के पत्रकार और अखबार कर्मचारी कड़ा विरोध करते हैं। आईएनएस एक ऐसी संस्‍था है जो खुद को देश के संविधान, सर्वोच्‍च न्‍यायालय और संसद से बड़ा समझती है। इसका जीता जागता उदाहरण अखबारों में कार्यारत पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा वैध और उचित घोषित किए गए मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू ना करना और वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छीन लेना है। महोदय, देश के लगभग सभी समाचारपत्रों की पिछली बैलेंसशीटें हर साल होने वाले करोड़ों रुपये के मुनाफे को दर्शाती हैं। वहीं देश भर के श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड की रिकवरी और उत्‍पीड़न के हजारों लंबित मामले साफ दर्शाते हैं कि किस तरह से अखबार प्रबंधन अपने कर्मचारियों का हक मार कर बैठे हैं और पत्रकारों, पत्रकारिता और रोजगार के नाम पर अपनी तिजोरियां ही भरते आए हैं। लिहाजा कोराना संकट में हजारों करोड़ के घाटे की बात करके आईएनएस राहत पैकेज की जो बात कर रहा है, यह सिर्फ अखबार मालिकों की तिजोरियां भरने का ही प्रपंच है। इससे अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं होने वाला। यहां गौरतलब है कि लॉकडाउन में भी अखबारों की प्रिंटिंग का काम नहीं रोका गया है और अखबारों के प्रसार में मामूली फर्क पड़ा है। महंगाई के दौर में जहां हर वस्‍तु के दाम उसकी लागत के अनुसार वसूले जाते हैं तो वहीं बड़े बड़े अखबार घराने अखबार का दाम इसलिए नहीं बढ़ाते ताकि छोटे अखबार आगे ना बढ़ पाएं। उनकी इस चालाकी को घाटे का नाम नहीं दिया जा सकता है। यहां एक समाचारपत्र द हिंदू का उदाहरण सबके सामने है, जिसकी कीमत 10 रुपये हैं जबकि बाकी अखबार अभी भी इससे आधी से कम कीमत में बेचे जा रहे हैं, इसका खामियाजा देश की जनता की खून पसीने की कमाई को लूटा कर नहीं भरा जा सकता। महोदय, यहां यह बात भी आपके ध्‍यान में लाना जरूरी है कि आईएनएस से जुड़े अधिकतर अखबारों ने केंद्र सरकार की उस अपील का भी सम्‍मान नहीं किया है जिसके तहत कर्मचारियों का वेतन ना काटने को कहा गया था। करीब सभी अखबारों ने जानबूझ कर अपने कर्मचारियों से पूरा काम लेने के बावजूद उनका आधे के करीब वेतन काट लिया है ताकि सरकार को घाटे का यकीन दिलाकर राहत पैकेज का ड्रामा रचा जा सके। वेतन काटे जाने को लेकर कुछ यूनियनें माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दखिल कर चुकी हैं। महोदय, असल में राहत के हकदार तो वे अखबार कर्मचारी हैं, जो पिछले पांच से छह सालों से मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके चलते अपनी नौकरियां तक गंवा चुके हैं। इनके परिवारों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना मुश्किल हो रहा है। केंद्र सरकार से मांग की जाती है कि राज्‍यों के माध्‍यम से श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड और अवैध तौर पर तबादले और अन्‍य कारणों से नौकरी से निकाले जाने की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मचारियों की पहचान करके उन्‍हें आर्थिक तौर पर सहायता मुहैया करवाई जाए।   साथ ही कोरोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को आर्थिक मदद जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से इस आशय का शपथपत्र देते हैं कि उन्‍होंने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड या इसके कारण कर्मचारी को नौकरी से निकालने का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की यूनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को राहत दी जाए।

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Punjab Kesari journalist dies of cancer

जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार एलएल शर्मा ने जानकारी दी है कि पंजाब केसरी के पत्रकार कमल शर्मा का निधन हो गया है. कमल शर्मा कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.   दुःखद सूचना. हमारे युवा साथी पत्रकार श्री कमल शर्मा पंजाब केसरी का आज सुबह निधन हो गया. वे पिछले कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.-एलएल शर्मा

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Hurt by SP leader, making dirty allegations , character, women journalist

सुसाइड नोट के आधार पर लोहता पुलिस ने सपा नेता शमीम को किया गिरफ्तार वाराणसी। काशी की पत्रकार बिरादरी की एक तेज तर्रार बहुचर्चित महिला पत्रकार रिजवाना तबस्सुम ने रविवार की रात आत्महत्या कर ली। आरोप है कि एक सपा नेता ने रिजवाना पर झूठा इल्जाम लगाया था। दोनों के बीच रात करीब एक बजे विवाद हुआ। बाद में दो लाइन का सुसाइड नोट लिखकर रिजवाना फांसी पर झूल गई। इस घटना से बनारस के पत्रकार मर्माहत और सकते में हैं। रिजवाना की कई स्टोरीज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी हैं। विज्ञान में स्नातक रिजवाना तबस्सुम (28 साल) का रविवार की रात अपने आवास पर कमरे में फांसी लगाकर जान देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। बतौर स्वतंत्र पत्रकार अपने लेखन से परिवार का खर्च चलाने वाली रिजवाना तब्बसुम ने फंदे पर झूलने पहले लिखे सुसाइड नोट में सपा नेता शमीम नोमानी को जिम्मेदार ठहराया है। शमीम लोहता का रहने वाला है। वो समाजवादी पार्टी में कार्यकारिणी का सदस्य रहा है। रिजवाना की उससे दोस्ती थी। लाकडाउन में वो शमीम के साथ मिलकर गरीबों को राशन वितरित कर रही थी। पत्रकार रिजवाना तबस्सुम द वायर, न्यूज क्लिक, जनज्वार, द प्रिंट, एशिया लाइव, बीबीसी समेत तमाम पत्रिकाओं और न्यूज वेबसाइटों के लिए समसामयिक मुद्दों कवर करती थी। रविवार की रात 9.27 बजे रिजवाना ने न्यूज क्लिक को आखिरी रिपोर्ट भेजी थी। परिजनों के मुताबिक रात करीब एक बजे सपा नेता शमीम नोमानी ने उसे फोन किया था। उसने रिजवाना पर तमाम झूठे इल्जाम लगाए। शमीम ने उस पर कई लोगों के साथ नाजायज संबंध होने के झूठे आरोप जड़ दिए। रिजवाना इस इल्जाम को बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने चार शब्दों का सुसाइड नोट लिखा-शमीम नोमानी जिम्मेदार है। इस नोट को उसने अपने बिस्तर के पास लगे बोर्ड पर पिनअप किया। बाद में अपनी चुनरी निकाली और फांसी का फंदा लगाकर झूल गई। लोहता थाना क्षेत्र के हरपालपुर की रहने वाली फ्रीलान्सर रिजवाना तबस्सुम की आत्महत्या की खबर सोमवार की सुबह जब परिजनों को लगी तो उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दी। मौत की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे सदर सीओ अभिषेक पाण्डेय ने सुसाइड नोट के आधार पर सपा नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया। सीओ अभिषेक पाण्डेय ने बताया कि रिजवाना की खोजी रपटों के वो भी कायल थे। ग्रामीण जनजीवन में किसानों और गरीबों की बदरंग जिंदगी से जुड़े मुद्दों को रिजवाना काफी अहमियत देती थी। सुसाइड नोट के आधार पर सीओ ने तत्काल समीम नोमानी के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए प्रेरित करना) के तहत मुकदमा दर्ज करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। नोमानी समाजवादी पार्टी की जिला कार्यकारिणी का सदस्य है। आगामी विधानसभा चुनाव में वो सपा से टिकट का दावेदार था। बनारस के लोहता थाने में बंद शमीम अभी भी रिजवाना का चरित्र हनन करने से बाज नहीं आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि शमीम की रिजवाना से दोस्ती थी। वो उससे शादी करना चाहता था, लेकिन रिजवाना अपने करियर पर ध्यान दे रही थी। शमीम का उसके दूसरे दोस्तों से बात करना काफी नागवार लगता था। काफी होनहार थी रिजवाना तेजतर्रार और प्रतिभाशाली युवा रिजवाना की मौत से बनारस के पत्रकार बेहद दुखी हैं। लाकडाउन के दौरान रिजवाना ने कई न्यूज वेबसाइटों के लिए यादगार स्टोरियां लिखीं। इन दिनों वो अपने करियर पर ज्यादा ध्यान दे रही थी।   पत्रकार रिजवाना हमेशा सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हुई थी। जिसके लिए उसे कई प्रतिष्ठित संस्थानों की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका था। रिजवाना अपने पांच भाई बहनों में दूसरे नंबर की थी। इनकी मौत से उसके पिता अजीजुल हकीम, मांग अख्तरजहां, बड़े भाई मोहम्मद अकरम, छोटी बहन नुसरत जहां, इशरत जहां, छोटे भाई मोहम्मद आजम व मोहम्मद असलम का रो-रोकर बुरा हाल है।

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Mahanayak has opened contracts

समरेंद्र सिंह जनता को कोठे पर बिठा कर पैसे मिले या फिर ठेके पर – सरकारों को बस पैसे से मतलब है…. हजारों साल बाद जो महानायक पैदा हुआ है उसने ठेके खुलवा दिए हैं. उसके इशारे पर विचारधारा की बंदिशें टूट गई हैं. जैसे सबको बस इसी इशारे का इंतजार हो. कुछ अपवादों को छोड़ कर सभी प्रदेश सरकारों ने ठेके खोल दिए हैं. सबने ऐसा क्यों किया है, यह सभी समझ रहे हैं. सरकारों को पैसे की जरूरत है. पैसे कहां से आएंगे? जनता से ही आएंगे. हर बार ऐसा ही होता है. जब भी संकट आता है, सरकार जनता से पैसे लेती है. चाहे वो दान की शक्ल में हो या फिर टैक्स कलेक्शन के नाम पर हो. जनता से पैसे उगाहने के बाद सरकार उस पैसे का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के हवाले कर देती है. इतना ही नहीं जनता ने जहां-जहां पैसा निवेश करके रखा होता है, सरकार उस पैसे को भी पूंजीपतियों को दे देती है. पूंजीपति जनता के पैसे का एक हिस्सा दबा कर अपने पास रख लेते हैं. दूसरे खातों में साइफनऑफ कर देते हैं. बाकी पैसे काम धंधे में लगा देते हैं. फिर जनता के एक तबके को रोजगार के नाम पर थोड़े-थोड़े पैसे मिलने लगते हैं. सेठ उनके श्रम से मुनाफा कमाने लगते हैं और सरकार को उसका हिस्सा देने लगते हैं. जनता को उसके श्रम की जो भी कीमत मिलती है, उसमें से वो एक हिस्सा आड़े वक्त के लिए बचाकर रखती है. मगर विडंबना देखिए जब भी संकट आता है, उसकी पूंजी घट जाती है. चाहे उसने वो पैसे जमीन में लगाए हों, प्रोपर्टी बाजार में लगाए हों या शेयर बाजार में लगाए हों. सबकुछ घट जाता है. उनके अलावा पीएफ के तौर पर या नकदी और गहने के तौर पर जो कुछ भी होता है, सरकार धीमे-धीमे उनसे वह भी बिकवा देती है. मतलब आम लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता. वो पहले से अधिक गुलाम हो जाते हैं. इन आम लोगों का वो तबका जो सबसे निचली पायदान पर है, उसके लिए तो संकट और भी बड़ा है. उसके पास अपने श्रम के अलावा कुछ शेष नहीं होता. वो हर रोज मेहनत करके जो दो-चार सौ रुपये कमाता है, सरकार और शराब के व्यापारी उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खींच लेते हैं. सोख लेते हैं. वो शराब पीता है. घर में मारपीट करता है. घर में मारपीट मध्य वर्ग के लोग भी करते हैं. और घर में कोई भी मारपीट करे, बच्चों के दूध और किताबों के पैसे की दारू पी जाए, दवा के पैसे की दारू पी जाए… सरकार को इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता है. उसे बस पूंजी चाहिए. वो चाहे कैसे भी आए. गौर से देखिएगा तो लगेगा कि इस दौर की सरकारों ने अपना हाल “सड़क” फिल्म की “महारानी” है और “अग्निपथ” फिल्म के “रऊफ लाला” जैसा बना लिया है. इन सरकारों का मकसद बस पैसे कमाना है, चाहे पैसे जनता को कोठे पर बिठा कर मिलें या फिर ठेके पर बिठा कर मिलें. और ऐसा करने के बाद भी ये निकम्मी और क्रूर सरकारें नैतिकता का ढोल पीट सकती हैं. ये बेशर्म और वहशी नेता नैतिकता का ढोल पीट सकते हैं. और हां, सरकार किसी की भी हो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. गांधी का नाम लेने वाले और राम का नाम लेने वाले – इस मामले में दोनों एक हैं. पूरे नंगे.   (जिन्होंने भी अपने प्रदेश में ठेके बंद रखने का फैसला लिया है, उन सभी को मेरा सलाम।)

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,Independent journalist, Rizwana Tabassum ,commits suicide

यह खबर मेरे लिए ज़िन्दगी की अनबूझ पहेली है…. स्वतंत्र पत्रकार रिजवाना तबस्सुम नहीं रही। अभी एशिया विल के संवाददाता विकास कुमार से इस घटना की जानकारी हो सकी….उनकी पोस्ट में जो कारण है वह ज़िक्र नहीं करूंगा लेकिन बीते रविवार 3 मई को ही तो मेरी इनसे बात हुई थी फोन व व्हाट्सएप पर….बाँदा में तिंदवारी तहसील के भिरौड़ा गांव में दो दिन पहले हार्ट अटैक से किसान की मृत्य पर खबर को लेकर। हाल ही गत सप्ताह इन्होंने बाँदा से 19 फर्जी तब्लीगी जमाती मस्ज़िद से पकड़ने को लेकर भी रिपोर्ट लिखी थी। विकास भाई कहिये यह झूठ है जो आप पोस्ट किए ,कहिये झूठ है यह अविश्वसनीय हैं मेरे लिए। रिजवाना जो कुछ देश मे घटित हो रहा है उससे आहत ज़रूर थी पर इतनी अवसाद में नही थी। कल ही जब मैंने व्हाट्सएप पर बात की तो चलते हुए उनके खुशी के संकेत पर उन्होंने रोजा में होने की बात भी बतलाई थी। क्या हो गया है ये अविश्वसनीय और हृदयविदारक घटना है रिजवाना ने खुदकुशी कर ली! हमारे आसपास जैसा वातावरण बन चुका है व्यक्ति के अंतस को समझकर भी समझ पाना बेहद मुश्किल हो चुका है लेकिन यह भयावह और कोलाहल भरा माहौल है। रिजवाना तबस्सुम द वायर,जनज्वार और भी अन्य वेबसाइट के लिए बेबाकी से लिखती रही है गौरतलब है यह बुंदेलखंड से प्रसारित खबर लहरिया की पत्रकारिता भी करती रही है। आज सुबह रिजवाना नहीं रही….आत्महत्या कर लिया!   यह कैसा रमजान का रोजा था रिजवाना?

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,How easy, Irfan, Ajay Brahmatmaj

लॉकडाउन में 39 दिन से लगातार राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव पेज से साहित्यिक और वैचारिक चर्चाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी सिलसिले में गुरुवार का दिन वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी, लेखक रेखा सेठी, फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और इतिहासकार पुष्पेश पंत के सानिध्य में व्यतीत हुआ। राजकमल प्रकाशन समूह के आभासी मंच से ‘हासिल-बेहासिल से परे : इरफ़ान एक इंसान’ सत्र में इरफ़ान के व्यक्तित्व और फ़िल्मों से जुड़े कई किस्से साझा किए फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने। 29 अप्रैल की सुबह इरफ़ान ख़ान हमें छोड़ कर चले गए लेकिन उनकी याद हमारे साथ, हमारे मानस में अमिट है। फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान को याद करते हुए फ़ेसबुक लाइव के मंच से बताया कि “मुझे हमेशा लगता रहा है कि इरफ़ान हिन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री में मिसफिट थे। लेकिन, उन्हें यह भी पता था कि फ़िल्में ही ऐसा माध्यम है जो उनकी अभिव्यक्ति को एक विस्तार और गहराई दे सकता था इसलिए वे लगातार फ़िल्में करते रहे।“ इरफ़ान के जीवन की सरलता और सहजता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “ज़िन्दगी की छोटी चीज़ों का उन्हें बहुत शौक था। पतंगबाज़ी करना और खाने का शोक उन्हें नए व्यंजनों की ओर आकर्षित करता था। उन्हें खेती करना बहुत पसंद था। जब भी उन्हें समय मिलता तो वे शहर छोड़कर गाँव चले जाते थे।“ साहित्य के साथ इरफ़ान के रिश्ते को इसी से आंका जाता सकता है कि उनकी बहुत सारी फ़िल्में साहित्यिक रचनाओं पर आधारित हैं। इस विषय पर अपनी बात रखते हुए अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “थियेटर की पृष्ठभूमि से आने वाले इरफ़ान के जीवन में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान था। कई ऐसी साहित्यिक रचनाएं हैं जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी और वे चाहते थे कि कोई इसपर फ़िल्म बनाएं। वे खुशी से इन फ़िल्मों में काम करना पसंद करते। उदय प्रकाश उनके सबसे पसंदीदा लेखकों में से थे। उनकी रचनाओं के नाट्य रूपांतरण में उन्होंने काम भी किया था।“ इरफ़ान अपनी फ़िल्मों के किरदार पर बहुत मेहनत करते थे। पान सिंह तोमर, अशोक गांगूली या इलाहाबाद के छात्र नेता का किरदार, यह सभी इस बात का प्रमाण है कि वे अपने दर्शकों को उस स्थान की प्रमाणिकता से अभिभूत कर देते थे। अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “इरफ़ान के जीवन में उनकी पत्नी सुतपा का रोल बहुत महत्वपूर्ण है। एनएसडी के समय से दोनों दोस्त थे और सुतपा ने राजस्थान की मिट्टी से गढ़े इरफ़ान के व्यक्तित्व को निखारने और संवारने में अपना बहुत कुछ अर्पित किया है।“ अलगाव की स्थिति स्थाई नहीं होनी चाहिए – अशोक वाजपेयी अप्रैल का महीना समाप्त होने वाला है। 40 दिन से भी अधिक दिनों से हम एकांतवास में हैं। लेकिन आभासी दुनिया के जरिए हम दूसरे से जुड़े हुए हैं। गुरुवार की शाम राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने लोगों के साथ एकांतवास में जीवन एवं लॉकडाउन के बाद के समय की चिंताओं पर अपने विचार व्यक्त किए। आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर अशोक वाजपेयी ने कहा, “इन दिनों इतना एकांत है कि कविता लिखना भी कठिन लगता हैं। हालांकि यह एक रास्ता भी है इस एकांत को किसी तरह सहने का। यही मानकार मैंने कुछ कविताएं लिखीं हैं।“ अशोक वाजपेयी ने कहा कि यह कविताएं लाचार एकांत में लिखी गई नोटबुक है। लाइव सेशन में उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया– “घरों पर दरवाज़ों पर कोई दस्तक नहीं देता / पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता/ अथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य/ हलके से हठियाता है / हर दरवाज़े हर खिड़की को / मंगल आघात पृथ्वी का/ इस समय यकायक / बहुत सारी जगह है खुली और खाली/ पर जगह नहीं है संग-साथ की/ मेल-जोल की/ बहस और शोर की / पर फिर भी जगह है/ शब्द की/ कविता की/ मंगलवाचन की…” लॉकडाउन का हमारे साहित्य और ललित कलाओं पर किस तरह का और कितना असर होगा इसपर अपने मत व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कि श्रोता या दर्शक संगीत या नृत्य कला की रचना प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। लेकिन, आने वाले समय में अगर यह बदल गया तो यह कलाएं कैसे अपने को विकसित करेंगी? साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि, वो बिना कार्यक्रमों के जीवन यापन कैसे करेंगी? उनके लिए आर्थिक मॉडल विकसित कर उन्हें सहायता देना हमारी जिम्मेदारी है। जरूरत है इस संबंध में एकजुट विचार के क्रियान्वयन की। साहित्य में भी ई-बुक्स का चलन बढ़ सकता है।“ उन्होंने यह भी कहा, “कोरोना महामारी ने सामाजिकता की नई परिभाषा को विकसित किया है। लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन महामारी का यह असामान्य समय व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के संबंध को नई तरह से देखेगा। जब हम एक दूसरे से दूर- दूर रहेंगे, एक दूसरे को बीमारी के कारण की तरह देखने लगेंगे…तो दरार की संभावनाएं बढ़ जाएगीं। यह भय का माहौल पैदा करेगा। हमारा सामाजिक जीवन इससे बहुत प्रभावित होगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह अलगाव स्थायी न हो।“ लॉकडाउन है लेकिन हमारी ज़ुबानों पर ताला नहीं लगा है। इसलिए हमें अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का पूरा उपयोग करना चाहिए। हम, इस समय के गवाह हैं। साहित्यिक विमर्श के कार्यक्रम के तहत राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के मंच से रेखा सेठी ने स्त्री कविता पर बातचीत की। लाइव जुड़कर बहुत ही विस्तृत रूप में स्त्रियों पर आधारित कविताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि, “स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता की कविताएं सिर्फ़ स्त्रियों ने नहीं लिखे हैं, बल्कि हिन्दी साहित्य में बहुत ऐसे कवि हैं जिन्होंने हाशिए पर खड़ी स्त्री को अपनी कविता का केन्द्र बनाया है।“ उन्होंने बातचीत में कहा कि “जब स्त्रियों ने अपने मानक को बदलकर अपने आप को पुरूष की नज़र से नहीं, एक स्त्री की नज़र से देखना शुरू किया, अपनी बात को संप्रेषित करना शुरू किया तो वहीं बदलाव की नई नींव पड़ी।“   स्त्री कविता पर रेखा सेठी की दो महत्वपूर्ण किताब – स्त्री कविता: पक्ष और परिपेक्ष्य तथा स्त्री कविता: पहचान औऱ द्वन्द राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal, Corona tragedy is over, Sir Ration is over. Ask for money from home

वाराणसी। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में लाकडाउन में राशन खत्म होने से परेशान छात्र ने जब प्रशासन के सक्षम अधिकारी को फोन करके कहा कि सर राशन खत्म हो गया है तो जवाब मिला घर से पैसे मंगा लो। यही नहीं, अधिकारी ने कहा कि सभी को मदद करना संभव नहीं है, केवल 1 फीसदी लोगों को मदद करने के लिए ही योजना है। छात्र ने कहा कुछ कीजिए सर हमे घर ही भिजवा दीजिए तो फोन काट दिया गया। दरअसल लाकडाउन के चलते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान संस्थान के छात्र रोशन पाण्डेय, विवेक उपाध्याय, सूर्यकान्त द्विवेदी और उनके साथी बनारस में ही फंस गए हैं। मूलतः बिहार के विभिन्न जिलों के निवासी इन छात्रों का कहना है कि उनके पास रखा अनाज पिछले एक महीने से जारी लाक डाउन के चलते खत्म हो गया है, पैसे की भी दिक्कत है। ऐसे में पिछले चार दिनों से वो जिला प्रशासन के अधिकारियों से सम्पर्क कर रहे हैं लेकिन उन्हें आगे का मोबाइल नंबर थमा कर टाला जा रहा है। उनकी समस्या को बाईपास किया जा रहा है। फोन करने पर फोन तक नहीं उठाया जा रहा है। आज खाद्य आपूर्ति विभाग के एक अधिकारी से जब उन्होंने मोबाइल से बात कर खाने में आ रही तकलीफ़ का जिक्र किया तो अधिकारी महोदय ने घर से पैसे मंगवाने की सलाह दे डाली। छात्रों का कहना है उन्हें तुंरत मदद की ज़रूरत है। प्रशासनिक अधिकारियों के रवैए से नाराज़ छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ट्वीट कर अपनी समस्या से अवगत कराया है।   बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, A train departed silently 1225 workers returning to their country

जिस वक्त यह खबर भड़ास4मीडिया पर अपलोड हो रही है, 1225 यात्रियों को लेकर एक स्पेशल ट्रेन पटरियों पर धड़ाधड़ दौड़ रही होगी. ये ट्रेन आज सुबह पांच बजे लिंगमपल्ली से चली है और रात ग्यारह बजे हटिया पहुंच जाएगी. इस ट्रेन का संचालन इस कदर गोपनीय रखा गया कि ट्रेन के टीटी को कल रात बारह बजे यानि ट्रेन चलते से ठीक पांच घंटे पहले बताया गया कि आपकी इस ट्रेन में ड्यूटी है, समय से पहुंच जाएं. इस स्पेशल ट्रेन का नंबर है 02704. बताया जाता है कि तेलंगाना सरकार के अनुरोध पर और रेल मंत्रालय के निर्देशानुसार लिंगमपल्ली (हैदराबाद) से हटिया (झारखंड) तक ये विशेष ट्रेन चलाई गई. ये स्पेशल ट्रेन गिस लिंगमपल्ली स्टेशन से चली है, वह सिकंदराबाद में पड़ता है. सिंकदराबाद आंध्रप्रदेश में है. इस ट्रेन के जरिए मजदूरों को उनके होम टाउन भेजा जा रहा है. इस ट्रेन के संचालन को लेकर जो सरकुलर जारी हुआ वह भड़ास के पास है. इसे नीचे दिया जा रहा है. इस ट्रेन के कुछ वीडियो फुटेज भी भड़ास के पास है जिसे आप नीचे देख सकते हैं.   इन 1225 मजदूरों के लिए आज मजदूर दिवस वाकई सुखद और ऐतिहासिक रहा. ये लोग आज के एक मई को कभी न भूलेंगे.

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, this period,retrenchment, your job is left , media

कैसे मीडिया इंडस्ट्री के लिए काल बना कोरोना वायरस – पार्ट (2) पिछली पोस्ट पर जो भी प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उनमें से सिर्फ दो जिक्र लायक हैं. पहली प्रतिक्रिया में किसी ने कहा है कि सभी सेक्टरों का हाल ऐसा ही है. दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया एक मझौले अखबार के संपादक महोदय की है. उन्होंने मीडियाकर्मियों की मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति के लिए बड़े मीडिया संस्थानों को जिम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक यह नैतिक भ्रष्टाचार का मसला है. हर साल सैकड़ों करोड़ का मुनाफा कमाने वाले मीडिया संस्थान क्या दो-तीन महीने भी अपने कर्मचारियों का ख्याल नहीं रख सकते? वो चाहते तो अपने कर्मचारियों का ख्याल रख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने की जगह अवसर का फायदा उठना सही समझा. वो खर्च कम करने के लिए छंटनी कर रहे हैं. वेतन में कटौती कर रहे हैं और लोगों को छुट्टियों पर भेज रहे हैं. पहली प्रतिक्रिया, जिसमें कहा गया है कि सभी उद्योग धंधे संकट से जूझ रहे हैं, इस दौर की एक कड़वी सच्चाई है. पिछले पोस्ट में मैंने इसका जिक्र किया था कि इस साल देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ निगेटिव रहने का अनुमान है. इस सीरीज में हम मीडिया पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए मोटे तौर पर बात इसी पर केंद्रित रखेंगे. लेकिन जब भी जरूरत महसूस होगी हम अर्थव्यवस्था के कुछ बुनियादी बदलावों की चर्चा भी करते रहेंगे. जहां तक संपादक महोदय की प्रतिक्रिया का सवाल है, वह एक आधी-अधूरी सच्चाई है. मसला इतना सीधा-सपाट नहीं हैं. चुनौती वाकई बड़ी है. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मीडिया इंडस्ट्री बीते कुछ साल से संकट से जूझ रही थी. नोटबंदी और आर्थिक मंदी की वजह से उसका मुनाफा पहले ही घटा हुआ था. लिहाजा संपादक जी की प्रतिक्रिया पर भी हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी मीडिया इंडस्ट्री में कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति पर गौर कर लेते हैं. उसके लिए सबसे पहले देश और दुनिया में मीडियाकर्मियों की छंटनी और वेतन कटौती से जुड़ी कुछ बड़ी घोषणाओं पर एक सरसरी नजर डालते हैं. पश्चिमी देश: 1) दुनिया के सबसे ताकतवर