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bhopal,BJP prepares ,panchayat elections ,amid epidemic in UP

अजय कुमार, लखनऊ कोरोना महामारी के चलते दुनिया भले ही ठहर गई, लेकिन केन्द्र और राज्यों की सरकारें लाकडाउन के चलते हुए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए फिर से हाथ-पैर मारने लगी हैं। एक तरफ योगी सरकार प्रदेश को पटरी पर लाने में लगी है तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में लगी है। इसी लिए लॉकडाउन-4 में ढिलाई मिलने के दूसरे ही दिन से भारतीय जनता पार्टी ने विधान परिषद और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया। प्रदेश भाजपा आलाकमान ने मंडल एवं जिला स्तर के अपने पदाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग व ब्रिजकॉल जैसे संचार सुविधाओं के जरिए पंचायत चुनाव के लिये टोलियां तैयार करने को कहा है। उत्तर प्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अक्टूबर में प्रस्तावित हैं। पंचायत चुनाव लडने के इच्छुक कार्यकर्ताओं से निरंतर सेवा कार्यों में जुटे रहने को कहा गया है तो दूसरी तरफ इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि पंचायत चुनाव के समय परिवारवाद से बचा रहा जाए। इसी लिए पंचायत चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वालों को खुद और अपने परिवार के लिए टिकट मांगने की मनाही कर दी गई है। पंचायत चुनाव प्रभारी महामंत्री विजय बहादुर पाठक का कहना है कि वैसे तो अभी पार्टी कोरोना संक्रमण से बने विकट हालात से निपटने में जुटी है। साथ ही राजनीतिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जा रही है। इस बार गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य लेकर भाजपा पूरी ताकत से पंचायत चुनाव में उतरेगी। कल्याणकारी योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में अनुकूल माहौल है। बूथ व सेक्टर स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता का लाभ भी मिलेगा। गौरतलब हो, कोरोना संक्रमण आरंभ होने से पहले ही पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र सिंह, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, कमल रानी व रमाशंकर पटेल को कोर कमेटी में शामिल करके क्षेत्रवार दायित्व भी दिए गए थे। इसी क्रम में मंडल व जिलों से ऐसे प्रमुख कार्यकर्ताओं के नाम मांगे गए थे, जो कि पंचायत चुनावों के जानकार हों। जिलाध्यक्षों के साथ तीन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की प्रशिक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित हो चुकी हैैं। सूत्रों का कहना है कि भाजपा जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत चुनाव पर विशेष फोकस करेगी। खैर, बात आगामी अक्तूबर में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव की करें तो अबकी पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण का गणित काफी बदला-बदला नजर आएगा। इस बार आरक्षण का फिर से निर्धारण किया जाएगा। इस नए निर्धारण से प्रदेश में पंचायतों के आरक्षण की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। वर्ष 2015 में हुए पिछले पंचायत चुनाव में जो पंचायत जिस वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी, इस बार वह उस वर्ग के लिए आरक्षित नहीं होगी। चक्रानुक्रम से पंचायत का आरक्षण परिवर्तित हो जाएगा। मान लीजिए कि अगर इस वक्त किसी ग्राम पंचायत का प्रधान अनुसूचित जाति वर्ग से है तो अब इस बार के चुनाव में उस ग्राम पंचायत का प्रधान पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकता है।चुनावों के लिए नए चक्रानुक्रम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, अनारक्षित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग महिला, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति महिला के वर्गों में नए सिरे से आरक्षण तय किया जाएगा। प्रदेश का पंचायती राज विभाग आरक्षण में बदलाव की यह कवायद जुलाई-अगस्त में पूरी करेगा क्योंकि नए आरक्षण का निर्धारण चुनाव से तीन महीने पहले किया जाता है। अनुमान है कि पिछले 5 वर्षों में करीब 250 से 300 ग्राम पंचायतें शहरी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक रूप से शामिल की गई हैं। इस हिसाब से इतनी पंचायतें कम हो जाएंगी। इनका ब्योरा राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर विकास विभाग से मांगा है। राज्य निर्वाचन आयोग भी नगर विकास विभाग की इस कवायद के पूरे होने का इंतजार कर रहा है। उसके बाद ही आयोग आगामी चुनाव के लिए ग्राम पंचायतों की वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का अभियान शुरू करेगा जिसमें बूथ लेबल आफिसर घर-घर जाकर पंचायतों के वोटरों की जानकारी संकलित करेंगे।   इस बार पंचायत चुनाव को पूर्वी गंभीरता से लड़ने को तैयार बीेजेपी ने पंचायत चुनाव अभियान में पूर्व मंत्रियों, पूर्व विधायकों व सांसदों को भी जोड़ने का मन बना लिया है। पार्टी पंचायत चुनाव को आगामी विधानसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास मानकर मैदान में उतरेगी। उधर, शिक्षक व स्नातक क्षेत्र की 11 सीटों पर होने वाले विधान परिषद चुनाव में घोषित प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं व कार्यकर्ताओं से ऑनलाइन संपर्क व संवाद जारी है।   अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal, Kejriwal government, Delhi, removed advertisement,laborers

दिल्ली की महान केजरीवाल सरकार कभी कभी महानता की चरमसीमा भी लांघ जाती है. इस सरकार ने दिल्ली में फंसे मजदूरों के श्रमिक एक्सप्रेस से जाने के बारे में जरूरी जानकारी देने के लिए विज्ञापन निकाला पर ये विज्ञापन हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में न होकर अंग्रेजी में है. अरविंद केजरीवाल के पास शायद डाटा हो कि कितने मजदूर अंग्रेजी पढ़ते हैं. पर ये सच है कि बहुत सारे लोग ये देखकर हंस रहे हैं कि मजदूरों के लिए विज्ञापन, अंग्रजी में, अंग्रजी समाचारपत्र में.   अब दिल्ली के मजदूर ये विज्ञापन नहीं पढ़ रहे हैं तो इसमें भला दिल्ली सरकार का क्या दोष हो सकता है…

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Dakhal News 25 May 2020


bhopal, Post-Karona media

जयराम शुक्ल करोना के लाकडाउन ने जिंदगी को नया अनुभव दिया है, अच्छा भी बुरा भी। जो जहां जिस वृत्ति या कार्यक्षेत्र में है उसे कई सबक मिल रहे और काफी कुछ सीखने को भी। मेरा मानना है ये जो सबक और सीख है यही उत्तर करोना काल की धुरी बनेगी। करोना भविष्य में कालगणना का एक मानक पैमाना बनने वाला है। हमारे पंचाग की कालगणना सृष्टि के आरंभ से प्रारंभ हुई जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के युगाब्ध, सहस्त्राब्ध हैं। सभी धर्मों/पंथों ने अपने हिसाब से कलैंडर बनाए। हमारे धर्म में शक और विक्रमी संवत शुरू होता है। क्रिस्चियन्स अपनी कालगणना क्राइस्ट के जन्म से शुरू करते हैं, जिसे हम बी,सी, ए,सी यानी कि ईसा पूर्व, ईसा बाद के वर्षों के साथ गिनते हैं। मुसलमानों का कैलेंडर हिजरी है, यानी कि हजरत मोहम्मद के पहले और बाद के वर्ष। अन्य धर्मों और पंथों के अपने-अपने कैलेन्डर होंगे। लेकिन अब एक नया वैश्विक कैलेन्डर प्रारंभ होगा, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय से ऊपर उठकर। करोना का पूर्व व उत्तर काल। इसे हम ईसाई कैलेंडर के तर्ज पर बिफोर करोना यानी बी.सी और आफ्टर करोना यानी ए.सी कहेंगे। करोना ने मानवता को जाति,धर्म,संप्रदाय, नस्ल,रंग,ढंग भूगोल इतिहास के कुँओं से निकालकर समतल में ला खड़ा कर दिया। उसने कांगो-सूडान को भी अमेरिका-इंग्लैंड की बराबरी में ला दिया। करोना ने वसुधैव को कुटुम्बकम में बदल दिया। इसके त्रास से सर्वे भवंतु सुखिनः,सर्वे संतु निरामयः के समवेत स्वर उठने लगे हैं। इस परिस्थिति को आंकने और देखने का एक नजरिया यह भी है..। करोना ने सोचने, विचारने और महसूस करने के लिए इफरात वक्त दिया है। वक्त थमता नहीं अपने निकलने का रास्ता ढूँढ़ लेता है। अपन मीडियावी दुनिया के आदमी हैं इसलिए पहले इसकी बात करते हैं। इस करोना काल में लिखना, पढ़ना और रचना वैसे ही है जैसे अभावों के बीच तिलक जैसों ने मंडाले जेल लिखा रचा। पहली बार लगा कि छुट्टी भी एक सजा होती है। आराम और अवकाश अब चिढ़ाने वाले हैं। मीडिया का रूपरंग.. ढंग सब बदल गया। वर्क फ्राम होम का पहला विचार यहीं से शुरू होता है। इन दिनों घर बैठे जूम एप के जरिए बेवीनार संगोष्ठी में हिस्सा ले रहे हैं। तोक्षकभी कभारचैनल वाला स्काइप के जरिए जोड़कर लाइव कमेंट ले लेता है। बिस्तर में लेटे-बैठे यह सब मन बहलाऊ अंदाज में हो रहा है। इसे आप मीडिया के काम का करोनाई अंदाज भी कह सकते हैं। 24×7 वाले मीडिया को हर क्षण की खबर चाहिए। आँधी-तूफान, बाढ़-बूड़ा, महामारी, प्रलय कुछ भी हो पर इनके बीच से ही खबरें निकालनी पड़ेगी। मेरा अनुमान है कि कल्पित प्रलय के समय भी आखिरी व्यक्ति मीडियावाला ही रहेगा जो उफनाते समंदर की कश्ती पर बैठकर अपने चैनल के लिए लाइव दे रहा होगा। इसके बावजूद विरोधाभास भरी त्रासदी यह कि जो मीड़िया चौबीसों घंटे दुनिया भर की खबरे उगल रहा है उस मीडिया में मीडिया और मीडियावालों की खबरें कहीं नहीं आतीं। सड़क, मैदान, अस्पतालों और क्वारंटाइन होम्स से जो खबरें निकाल कर आपतक पहुँचा रहे हैं क्या वे करोना संक्रमण से बचे होंगे.? जी नहीं कुल करोना संक्रमितों में से कुछ हजार लोग मीडिया के भी हैं। लेकिन इन अभागों की खबरें हम तक नहीं पहुँचतीं। जो अखबार यह दावा करते हैं कि हम खबरें बाँटते हैं करोना नहीं, क्या उनसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने किसी कर्मचारी करोना संक्रमण की खबरें दे या दिखाएं ? इसलिए उन अभागों को भी उसी श्रेणी में मानकर चलिए जिस श्रेणी में जान हथेली में लिए सड़कों पर मंजिल नापने वाले श्रमिक। सही बात यह कि कई चैनलों और अखबारों के मीडियाकर्मी संक्रमण की जद में हैं..मीडिया समूह के प्रबंधन ने उनसे दूरी बना ली है..साफ साफ कहें तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। मीडिया में नौकरी से वो लोग भी निकाले जा रहे हैं जो संक्रमित नहीं हुए। 22 मार्च के बाद से अबतक पूरे देशभर के मीडिया समूहों ने लगभग 20 से 25 प्रतिशत कर्मचारियों की छँटनी कर दी। ऊँची तनख्वाह वाले पत्रकारों की सैलरी में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा चुकी है। संपादक श्रेणी के ऐसे पत्रकारों की बड़ी संख्या है जिन्हें कहीं दूसरी नौकरी ढूँढने के लिए कह दिया गया है। कुलमिलाकर मीड़ियाजगत में वैसे ही हाहाकार है जैसे कि सड़क पर मजदूरों का, फर्क इतना है कि मजदूरों की व्यथा सामने आती है और मीडियावालों की व्यथा उनका मीडिया प्रतिष्ठान ही हजम कर जाता है। भूखे सड़क पर वो मजदूर भी हैं और भूखे अपने घरों में ये विपत्ति के मारे मीडियाकर्मी भी। भोपाल के एक मित्र ने सूचना दी कि यहां दो दर्जन से ज्यादा ऐसे पत्रकार हैं जिनकी नौकरी इस करोना काल में चली गई। इनमें से कई प्रतिभाशाली उदयीमान पत्रकार हैं वे चाहते तो दूसरी नौकरी भी कर सकते थे लेकिन जुनून के चलते पत्रकारिता को अपना करियर बनाया। इनमें से प्रायः के पास माकान का किराया देने की कूबत नहीं बची। कई के घर का चूल्हा एनजीओ या सरकार द्वारा बाँटे गए राशन से जलता है। कुछ दिन बाद चूल्हे का ईंधन भी खतम हो जाएगा। भोपाल, इंदौर जैसे प्रादेशिक महानगरों में दूसरे प्रांत से आकर काम करने वाले मीडयाकर्मियों की बड़ी संख्या है। जो दस साल पहले आए थे उनकी गिरस्ती तो कैसे भी जमी है पर जो इस बीच आए उनका तो भगवान ही मालिक..। संस्थानों ने किनाराकशी की और सरकार को ये कभी सुहाए नहीं सो उनपर कृपा का प्रश्न ही नहीं उठता। भोपाल-इंदौर जैसी ही व्यथा देशभर के उन शहरों की है जहां मीडिया उद्योग फला-फूला और उनके मालिकों ने उसकी कमाई की बदौलत माल-सेज, उद्योग और कालोनियाँ खड़ी कीं। देशभर सिर्फ़ एक मीडिया बेवसाइट है..भड़ास फार मीडिया.. जो देशभर के पत्रकारों के दुखदर्द की कथा सुनाती रहती है। इन दिनों पत्रकारों की विपदा से जुड़े एक से एक दुखद किस्से सुनने को मिलते हैं, आप भी उसके लिंक को खोलकर पढ़ें कभी। हिंदी की पत्रकारिता तो आरंभ से ही दुख-दिरिद्रता से भरी रही है। हिंदी के जो स्वतंत्र पत्रकार हैं, स्तंभ व आलेख लिखते हैं वह स्वातःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा नहीं.. अपितु खुद के जिंदा रहने के सबूत के लिए लिखते हैं.. हिंदी पत्रकारिता का विचार पक्ष ‘थैंक्यू सर्विस’ में चलता है। इस श्रेणी में प्रायः भूतपूर्व संपादक प्रजाति के लोग होते हैं जिनका खाना खर्चा बीबी-बच्चे उठाते हैं, सो इनका तो कैसे भी चल जाता है। चिंता का विषय हिंदी पत्रकारिता की नई पौध को लेकर है..जिसके ख्वाबों-खयालों की दुनिया को इस करोना ने पलक झपकते ही बदलकर धर दिया। उत्तर करोना काल की मीड़िया का अक्श स्पष्ट होने लगा है। प्रिंट मीड़िया का दायरा जिस गति से सिकुड़ रहा है..हालात ठीक होने के बाद भी वह अपने पुराने रूप में आएगा मुश्किल ही लगता है। इन दो महीनों ने पाठकीय आदत बदल दी है। अब बिना अखबार की सुबह असहज नहीं लगती। प्रिंट कापियाँ सिर्फ बड़े अखबारों की ही निकल रही हैं। मध्यम दर्जे के अखबार फाइल काँपियों तक सिमट गए। पुल आउट पत्रिकाएं और विशेषांक शीघ्र ही इतिहास में दर्ज हो जाएंगे। पृष्ठ संख्या आधे से भी कम हो गई। इनका भी पूरा फोकस अब डिजिटल अखबार निकालने पर है। कागज, स्याही और मैनपावर की कमी ने पहले ही लघु अखबारों को डिजिटल में बदल रखा था। जिनका सर्कुलेशन वाट्सएप ग्रुप्स और एफबी प्लेटफार्म तक सीमित हो गया। अखबारों के समक्ष विग्यापन का घोर संकट है। विग्यापन की शेयरिंग दिनोंदिन घट रही है। डिजिटल मीडिया का दायरा सात समंदरों से भी व्यापक है। विग्यापन की हिस्सेदारी का लायनशेयर अब इनके पास है। विदेश का डिजिटल मीडिया भी देसीरूप धरके प्रवेश कर चुका है। वह तकनीकी तौरपर ज्यादा दक्ष और पेशेवर है। डिजिटल मीडिया में जाने वाले मेनस्ट्रीम के अखबारों के समक्ष यह बड़ी चुनौती होगी। खबरे शीघ्रगामी तो हुई हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता नहीं रही। आने वाले समय में पाठक का सबसे ज्यादा पराक्रम इसी पर खर्च होगा कि वह जो पढ़ रहा है वह सत्य है कि नहीं। सत्य की परख करने वाले तंत्र का मीडिया में वर्चस्व बढ़ेगा।   कुल मिलाकर जब हम करोना संकट से निवृत्त होंगे तब तक जो पत्रकार हैं उनमें पचास फीसद वृत्ति से पत्रकार नहीं रह जाएंगे। मध्यम और लघु अखबार अपने पन्ने डिजिटली छापेंगे और वाट्सएप में पढ़ाएंगे। बड़े समूह के कुछ अखबार बचेंगे लेकिन उनकी वो धाक नहीं रहेगी..जिसकी बदौलत अबतक सत्ता के साथ अपना रसूख दिखाते आए हैं। करोना समदर्शी है..वह राजा और रंक में भेद नहीं करता। लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 22 May 2020


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जन्मदिन पर शरद जोशी जी को स्मरण करते हुए! शरद जोशी ने कोई पैतीस साल पहले हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे व्यंग्य निबंध रचा था। तब यह व्यंग्य था, लोगों को गुदगुदाने वाला। भ्रष्टाचारियों के सीने में नश्तर की तरह चुभने वाला। अब यह व्यंग्य, व्यंग्य नहीं रहा। यथार्थ के दस्तावेज में बदल चुका है। भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही व्यंग्य की मौत हो गई। समाज की विद्रूपताओं की चीर-फाड़ करने के लिए व्यंग्य का जन्म हुआ था। परसाईजी ने व्यंग्य को शूद्रों की जाति में रखते हुए लिखा था व्यंग्य चरित्र से स्वीपर है। वह समाज में फैली सड़ांध में फिनाइल डालकर उसके कीटाणुओं को नाश करने का काम करता है। जोशी-परसाई युग में सदाचार, लोकलाज व सामाजिक मर्यादा के मुकाबले विषमताओं, विद्रूपताओं और भ्रष्टाचार का आकार बेहद छोटा था। व्यंग्य उन पर प्रहार करता था। लोग सोचने-विचारने के लिए विवश होते थे। भ्रष्टाचार का स्वरुप इतना व्यापक नहीं था। व्यंग्य कब विद्रूपता के मुंह में समा गया पता ही नहीं चला। वेद पुराणों में भगवान का यह कहते हुए उल्लेख है कि हम भक्तन के भक्त हमारे। जोशी जी ने भ्रष्टाचार के लिए यही भाव लिया था। आज के दौर के बारे में सोचते हुए लगता है कि हमारे अग्रज साहित्यकार कितने बड़े भविष्यवक्ता थे। भ्रष्टाचार, सचमुच भगवान की तरह सर्वव्यापी है, कण-कण में, क्षण-क्षण में। कभी एक व्यंगकार ने लिखा था कि भगवान की परिभाषा और उनकी महिमा जो कि वेद-पुराणों में वर्णित है सब हूबहू भ्रष्टाचार के साथ भी लागू होती है।… बिन पग चलै,सुनै बिन काना कर बिनु कर्म करै विधि नाना। बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी़..़़ आदि-आदि। मंदिर में, धर्माचार्यों के बीच भगवान की पूजा हो न हो, भ्रष्टाचारजी पूरे विधि-विधान से पूजे जाते हैं। आसाराम,नित्यानंद, निर्मलबाबा से लेकर धर्माचार्यों की लंबी कतार है जिन्होंने मंत्रोच्चार और पूरे कर्मकांड के साथ भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा की है और हम वहां शीश नवाने पहुंचते हैं। भगवान को माता लक्ष्मी प्रिय है तो भ्रष्टाचारजी को भी लक्ष्मीमैया अतिप्रिय। रूप बदलने, नए-नए नवाचार और अवतार में भी भ्रष्टाचार का कोई सानी नहीं। आज के दौर में परसाई जी-शरद जोशी जी होते तो भ्रष्टाचार को लेकर और क्या नया लिखते! उनके जमाने में एक-दो भोलाराम यदाकदा मिलते जिनके जीव पेंशन की फाइलों में फड़फड़ाते। आज हर रिटायर्ड आदमी भोलाराम है, फर्क इतना कि वह परिस्थितियों से समझौता करते हुए परसेंट देने पर राजी है। परसेंट की यह कड़ी नीचे से ऊपर तक उसी तरह जाती है जैसे राजीव गांधी का सौ रुपया नीचे तक दस पैसा बनकर पहुंचता है। पिछले कुछ दिनों से भ्रष्टाचार पर भारी बहस चल रही है। भ्रष्टाचारी भी भ्रष्टाचार पर गंभीर बहस छेड़े हुए हैं। चैनलों ने इसे प्रहसन का विषय बना दिया। टीवी चैनलों में कभी-कभी बहस इतनी तल्ख हो जाती है कि मोहल्लों में औरतों के बीच होने वाले झगड़ों का दृश्य उपस्थित हो जाता है। एक कहती है..तू रांड तो दूसरी जवाब देती है तू रंडी़.. एक ने कहा तुम्हारी पार्टी भ्रष्ट तो दूसरा तड़ से जवाब देता है, तुम्हारी तो महाभ्रष्ट है। टीवी शो में एक पार्टी के प्रतिभागी ने कहा, फलांजी से बस इतनी गलती हो गई कि उन्होंने आपकी वाली पार्टी में जाकर प्रशिक्षण नहीं लिया था। वे लाखों करोडों गटक लेते हैं और पता भी नहीं चलता। भ्रष्टाचार अब बुद्घिविलास का विषय बन चुका है। चमड़ी इतनी मोटी हो गई कि व्यंग्य की कौन कहे गालियां तक जज्ब हो जाती हैं। एक नया फार्मूला है खुद को ईमानदार दिखाना है तो दूसरों को जोर-जोर से बेईमान कहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी कर्मकांडी हो गई है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ईमानदारी की अलख जगाने वाले नए पंडों के रूप में अवतरित हुए हैं। संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरू की मुक्ति के लिए अभियान चलाने वाले और उद्योगपतियों के खिलाफ याचिका में फोकट का इन्टरविनर बनने वाले पिता-पुत्र की जोड़ी शांति भूषण और प्रशान्त भूषण टीम नैतिकता की आचार संहिता तय करती है। मंचीय कवियों का गिरोह चलाने वाले मसखरे कविकुलश्रेष्ठ इमानदारी की रुबाइयाँ लिखते हैं।योग सिखाने के लिए निर्मल बाबा की तर्ज पर करोड़ों की फीस वसूलने वाले बाबा रामदेव राष्ट्रवाद व नैतिकता का पाठ सिखाते हैं। रंगमंच पर यही सब नाटक चल रहा है। सड़े से मुद्दों पर कैण्डल मार्च निकालने वाले भ्रष्टाचार से लड़ने चंदे के पैसे से दिल्ली तो कूंच कर सकते हैं पर अपने गांव के उस सरपंच के खिलाफ बोलने से मुंह फेर लेते हैं जो गरीबों का राशन और मनरेगा की मजदूरी में हेरफेर कर दो साल के भीतर ही बुलेरो और पजेरो जैसी गाड़ियों की सवारी करने लगता है। इसके खिलाफ हम इसलिए कुछ नहीं बोल पाते क्योंकि यह हमारा अपना बेटा, भाई, भतीजा और नात-रिश्तेदार हो सकता है। जब शहर के भ्रष्टाचार की बात करनी होती है तो ये दिल्ली के भ्रष्टाचार पर बहस करते हैं, अपने गांव व शहर की बात करने से लजाते हैं, भ्रष्टाचारी कौन है? यह चिमनी लेकर खोजने का विषय नहीं है। समाज में भ्रष्टाचार की प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले लोग कौन हैं? यह अलग से बताने की बात नहीं है, हम सबने मिलकर भ्रष्टाचार को अपने आचरण में जगह दी है। जिस दिन कोई पिता अपने बेटे को इसलिए तिरष्कृत कर देगा कि उसके भ्रष्टाचार की कमाई से बनी रोटी का एक टुकड़ा भी स्वीकार नहीं करेगा, कोई बेटा बाप की काली कमाई के साथ बाप को भी त्यागने का साहस दिखाएगा, परिवार और समाज में भ्रष्टाचार करने वालों का सार्वजनिक बहिष्कार होने लगेगा, उस दिन से ही भ्रष्टाचार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। क्योंकि भ्रष्टाचार कानून से ज्यादा आचरण का विषय है। कत्ल करने वाले को फांसी दिए जाने का प्रावधान है लेकिन कत्ल का सिलसिला नहीं रुका है। कत्ल भी हो रहे हैं और फांसी भी। भ्रष्टाचारियों को कानून की सजा देने मात्र से भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं। क्या कोई अपने घर से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़नें की शुरुआत करने को तैयार हैं?   लेखक जयराम शुक्ल मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 22 May 2020


bhopal,Sanjay Dwivedi ,appointed , Chancellor in charge, Makhanlal Chaturvedi University

भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है। प्रो. द्विवेदी 10 वर्ष से अधिक समय से विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। वहीं, विश्वविद्यालय में प्रभारी कुलसचिव की जिम्मेदारी मडिया प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अविनाश वाजपेयी को सौंपी गई है। इससे पूर्व वे विश्वविद्यालय में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रहे थे।गौरतलब है कि प्रो. संजय द्विवेदी लंबे समय तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। उन्हें प्रिंट, बेव और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य करने का अनुभव है। उन्होंने कई अखबारों, टीवी चैनलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। मुंबई, रायपुर, बिलासपुर और भोपाल में लगभग 14 साल सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद प्रो. द्विवेदी शिक्षा के क्षेत्र में आए और फरवरी-2009 में वे माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े। विश्वविद्यालय में उन्होंने विभागाध्यक्ष एवं कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों कार्य किया। वे विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर लेखन करते हैं। उन्होंने अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियों एवं मीडिया से संबंधित संगठनों में सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।

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Dakhal News 21 May 2020


Indore ,gets five star rating , Kacharam-free cities, Bhopal also slipped

भोपाल। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने नई दिल्ली में मंगलवार को स्वच्छता सर्वेक्षण के अंतर्गत कचरामुक्त शहरों की स्टार रेटिंग के परिणाम घोषित किए। इसमें लगातार तीन बार देश के सबसे स्वच्छ शहर रहे मध्यप्रदेश के इंदौर को पांच स्टार रेटिंग मिली है, जबकि पिछले साल कचरामुक्त शहरों में इंदौर को सेवन स्टार रेटिंग दी गई थी। वहीं, प्रदेश की राजधानी भोपाल को थ्री स्टार रेटिंग दी गई है।केन्द्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा घोषित किये गये स्टार रेटिंग के परिणामों में इंदौर को हालांकि पिछले साल की तरह सेवन स्टार रेटिंग तो नहीं मिली है, जिसका स्थानीय प्रशासन और नागरिकों द्वारा दावा किया गया था, लेकिन मध्यप्रदेश का यह शहर देश के कचरा मुख्त उन छह शहरों के साथ शीर्ष पर बना हुआ है, जिन्हें पांच स्टार रेटिंग मिली है। इनमें छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर, गुजरात के राजकोट और सूरत, कर्नाटक का मैसूर और महाराष्ट्र का नवी मुंबई शामिल है। इंदौर के अलावा मध्यप्रदेश के 10 शहरों को थ्री स्टार रेटिंग मिली है। इनमें भोपाल भी शामिल है, जो कि एक बार देश का दूसरा सबसे स्वच्छ शहर रह चुका है। भोपाल के अलावा बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, कांटाफोड़, कटनी, खरगोन, ओंकारेश्वर, पीथमपुर, सिगरौली और उज्जैन को भी थ्री स्टार रेटिंग मिली है। वहीं, प्रदेश के सात शहरों को एक स्टार रेटिंग दी गई है। इनमें ग्वालियर, सरदारपुर, हातोद, महेश्वर, खंडवा, शाहगंज और बदनावर है। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के 18 नगरों को कचरामुक्त शहरों में रेटिंग मिली है। इनमें इंदौर पांच स्टार रेटिंग मिलने वाला प्रदेश का एकमात्र शहर है। 

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Zee news, two dozen media workers, Corona positive!

बड़ी खबर जी न्यूज से आ रही है। यहां 4 लोगों के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद बाकी सभी का कोरोना टेस्ट कराया गया। सूचना है कि कुल 52 लोगों का टेस्ट कराया गया जिनमें से 28 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इस रिपोर्ट के आते ही पूरे जी ग्रुप में हड़कंप मच गया है। बताया जाता है कि सीईओ पुरुषोत्तम वैष्णव नए हालात पर मीटिंग ले रहे हैं। ये मीटिंग ज़ूम पर ऑनलाइन आयोजित है। बताया जा रहा है कि पूरे ऑफिस को सील कर सैनिटाइज किया जा रहा है। ज़ी न्यूज़ का संचालन इसी ग्रुप के एक अन्य चैनल wion की बिल्डिंग से होगा।   ज़ी न्यूज़ ऑफिस में नोएडा अथारिटी के लोग और डॉक्टर्स की टीमें घुस चुकी है। अब पूरे ग्रुप के मीडियाकर्मियों का टेस्ट किया जा रहा है।

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, Life between corona

अमरीक देशव्यापी लॉकडाउन से पहले कर्फ्यू लगाने वाला पंजाब पहला राज्य था। सूबे ने इतना लंबा कर्फ्यू अतीत में कभी नहीं झेला। और न ऐसे नागवार हालात झेले जो अब दरपेश हैं। यक्ष प्रश्न है कि कर्फ्यू तो हट जाएगा लेकिन सामान्य जनजीवन आखिर पटरी पर कैसे आएगा? 55 दिन की कर्फ्यू अवधि ने राज्य में जिंदगी से लेकर कारोबार तक, सब कुछ एकबारगी स्थगित कर दिया था। लुधियाना, अमृतसर, जालंधर महानगरों सहित अन्य कई शहरों की दिन-रात चलने वाली जिन फैक्ट्रियों अथवा औद्योगिक इकाइयों के गेट पर कभी ताले नहीं लगे थे, वहां एकाएक पूरी तरह सन्नाटा पसर गया। लाखों श्रमिक एक झटके में बेरोजगार हो गए और रोटी के लिए बेतहाशा बेजार। हर वर्ग की कमर टूट गई। लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए। कोरोना-काल के कर्फ्यू ने पंजाबियों को बेशुमार जख्म भी दिए हैं। लाखों लोग भूख से बेहाल हुए तो हजारों अवसादग्रस्त। जिन्हें कोरोना तो क्या, मामूली खांसी-बुखार ने भी नहीं जकड़ा-वे स्थायी तनाव के गंभीर रोगी हो गए। तिस पर डॉक्टरों की अमानवीय बेरुखी। सरकार के कड़े आदेशों और सख्ती के बावजूद प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी आमतौर पर बंद ही रहीं। ब्लड प्रेशर और शुगर तक चैक नहीं किए गए। डॉक्टर मरीज को छूने तक से साफ इंकार करते रहे। मेडिकल हॉल के दुकानदार बाकायदा डॉक्टरों की भूमिका में आ गए। चिकित्सा जगत की उपेक्षा का नागवार नतीजा था कि कर्फ्यू के इन 55 दिनों में 2000 से ज्यादा लोग हृदय रोग, कैंसर, लीवर, किडनी और मधुमेह की बीमारियों से चल बसे। राज्य के स्वास्थ्य विभाग भी मानता है कि इससे पहले कभी इतनी अवधि में बीमारियों से लोगों ने दम नहीं तोड़ा। ईएनटी, आंखों और दांतों की बीमारियों के इलाज करने वाले क्लीनिक और अस्पताल एक दिन के लिए भी नहीं खुले। मनोचिकित्सक तो मानो भूल ही गए कि समाज के एक बड़े तबके को इन दिनों उनकी कितनी जरूरत है। गोया अवाम की जिंदगी बेमूल्य हो गई। अमीर और गरीब एक कतार में आ गए। पंजाब में सवा सौ से ज्यादा मौतें कोरोना वायरस से हुईं हैं। संक्रमितों की संख्या हजारों में रही और वे एकांतवास में ठीक होकर घरों को लौट आए। लेकिन कोरोना मरीज होने के ठप्पा उन्हें निरंतर यातना दे रहा है। पंजाब के हर इलाके से उनके सामाजिक बहिष्कार की खबरें हैं। सामाजिक दूरी का संकल्प कोरोना वायरस से ठीक हुए मरीजों के लिए सामाजिक नफरत में तब्दील हो गया है। जालंधर और आसपास के इलाकों में इस पत्रकार ने कोरोना से ठीक होकर सही-सलामत लौटे कुछ मरीजों से मुलाकात में पाया कि वे मृत्यु के डर से तो निकल आए हैं लेकिन रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों की घोर उपेक्षा उन्हें मनोरोगी बना रही है। दिनेश कुमार (बदला हुआ नाम) लगभग एक महीना एकांतवास में रहे। इलाज चला। अस्पताल में तो किसी ने क्या मिलने आना था, घर लौटे तो अपनों ने भी किनारा कर लिया। पत्नी और बच्चों के सिवा कोई बात नहीं करता। जबकि घर में माता पिता और दो भाई तथा उनके परिवार हैं। वह फफकते हुए कहते हैं, “कोरोना से ठीक हो कर घर लौटा तो उम्मीद थी कि सब खुश होंगे और तगड़े उत्साह के साथ मुझे गले लगाएंगे। लेकिन कोई मत्थे लगने तक को तैयार नहीं हुआ। जैसे ही मैं लौटा, मेरा भाई अपनी बीवी और बच्चों के साथ ससुराल चला गया। यह कहकर कि या तो यह यहां रहेगा या हम।” नवांशहर शहर के नसीब सिंह भी कोरोना को पछाड़कर सेहतमंद होकर अपनी लंबी-चौड़ी कोठी में लौटे तो बेटों ने उनका सामान पिछवाड़े के सर्वेंट क्वार्टर में रखा हुआ था और उनसे कहा गया कि अब वे वहीं रहेंगे। पिछले साल उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। सारी जायदाद वह अपने दो बेटों के नाम कर चुके हैं। यह पत्रकार जब सर्वेंट क्वार्टर में कोठी के मालिक रहे नसीब सिंह से बात कर रहा था तो बारिश आ रही थी और सर्वेंट क्वार्टर की छत से पानी चू रहा था। फर्श पर गंदगी का ढेर था और नसीब सिंह का लिबास बेहद मैला था। उन्होंने बताया कि जो नौकर आज से एक महीना पहले उनके आगे पीछे सेवा-टहल के लिए भागते-दौड़ते रहते थे, अब उनका निवास बना दिए गए सर्वेंट क्वार्टर में झांकने तक को तैयार नहीं और न कपड़े धोने को। खाने की थाली भी बाहर रख दी जाती है। एक पानी की सुराही भर दी जाती है। रूआंसे होकर नसीब सिंह कहते हैं, “मुझे कोरोना हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर। अब डॉक्टरों ने मुझे पूरी तरह फिट घोषित कर दिया है। बकायदा इसका सर्टिफिकेट भी दिया है। लेकिन बच्चे मुझे अभी रोगी मानते हैं। मुझसे कौड़ियों जैसा सुलूक किया जा रहा है। मैं करोड़ों का साहिबे-जायदाद रहा हूं और इस बीमारी ने मुझे एकदम कंगाल बना दिया। बेटों को पास बुलाकर मैं उनसे बात करना चाहता हूं कि अगर उनकी यही मर्जी है तो मुझे वृद्ध आश्रम में दाखिल करवा दें लेकिन कोई पास खड़ा होने तक को तैयार नहीं। मुझसे मेरा फोन भी ले लिया गया है।” दिनेश कुमार और नसीब सिंह जैसी बदतर हालत ठीक हुए बेशुमार कोरोना मरीजों की है। लुधियाना में कोरोना वायरस से मरे एसीपी के परिजनों का पड़ोसियों ने आपत्तिजनक बहिष्कार किया और उस प्रकरण में स्थानीय पुलिस को दखल देनी पड़ी। उनके भांजे को ‘कोरोना फैमिली’ कहा गया और उस गली में जाने से रोका गया, जहां उनका अपना घर है। चार ऐसे मामले चर्चा में आए कि संक्रमण से मरे लोगों के शव उनके परिजनों ने लेने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस-प्रशासन और सेहत महकमे को मृतकों के संस्कार और अंतिम रस में अदा करनी पड़ीं। किसी को श्मशान घाट के माली ने मुखाग्नि दी तो किसी को सफाईकर्मी ने। जबकि यह लोग भरे पूरे और संपन्न परिवार से थे। ‘कोरोना फैमिली’ पंजाब में इन दिनों प्रचलित नया गालीनुमा मुहावरा है और यह किन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बताने की जरूरत नहीं। इस कथन के पीछे छिपी दुर्भावना व नफरत बेहद पीड़ादायक है। बल्कि यातना है। जालंधर के ही नीरज कुमार को उनके करीबी दोस्तों ने उन्हें ‘कोरोना कुमार’ कहना शुरू किया तो वह गंभीर अवसाद रोगी बन गए। अब खुदकुशी की मानसिकता का शिकार हैं। वायरस से ठीक हुए एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि पड़ोसियों ने एकजुट होकर फैसला किया कि कभी हमारे घर नहीं आएंगे। वह कहते हैं, “लॉकडाउन और कर्फ्यू खुलते ही हम यह इलाका छोड़कर कहीं और घर खरीद लेंगे। दुकान का ठिकाना भी बदलना पड़ेगा।” लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच पंजाब में बड़े पैमाने पर श्रमिकों का सामूहिक पलायन हो रहा है। उनकी भीड़ और दशा देख कर लगता है कि 1947 का विभाजनकाल मई, 2020 में लौट आया है। जो श्रमिक घर वापसी के लिए प्रतीक्षारत हैं या फिलवक्त जा नहीं पा रहे उन्हें उनके मकान मालिक जबरन घरों-खोलियों से निकाल रहे हैं। उनसे मारपीट और छीना-झपटी रोजमर्रा का किस्सा है। यह हर शहर में हो रहा है। कहने को 55 दिन कर्फ्यू रहा लेकिन मजदूरों से अलग किस्म की हिंसा होती रही और हो रही है। जाने वाले प्रवासी श्रमिकों में से बहुतेरे ऐसे हैं जो मन और देह पर जख्म लेकर जा रहे हैं। लॉकडाउन और कर्फ्यू ने समाज का सारा ताना-बाना बदल दिया है। सामाजिक दूरियों ने दिलों की दूरियां भी बढ़ाईं हैं। इस बीच कई रिश्ते टूटे। बार-बार विवाह स्थगित होने से उपजे तनाव ने एक लड़की को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। कम से कम 10 आत्महत्याएं कोरोना वायरस की दहशत की देन हैं।   इस रिपोर्ताज के लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 19 May 2020


bhopal, The path to online education is not easy!

वैश्विक महामारी कोविड-19 ने दुनिया की रफ़्तार पर ब्रेक लगा दिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी कई सालों पीछे कर दिया है। विश्व के अधिकांश देशों में लॉक डाउन है या फिर कर्फ़्यू जैसे हालात है। केवल जरूरी सामान व सेवाएं ही सुचारू रूप से संचालित हो रही है। भारत में भी इस महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। देश पूरी तरह से लॉक डाउन के कारण ठप्प पड़ा है। मानों लगता है, अब मानवीय सभ्यता अपनी आख़िरी सांसें गिन रही हो। ऐसे में भले ही आज संकट की घड़ी मानव सभ्यता पर आन पड़ी हो, लेकिन मानवीय जीवटता इतनी बलवती है कि वह इस संकट से हार नहीं मानेगी यह तो निश्चित है। ऐसे में सवाल उठता है शिक्षण संस्थानों का क्या होगा? जो कहीं न कहीं आता तो है जरूरी सेवाओं में, लेकिन जब सोशल डिस्टनसिंग बनाकर रखना है। फ़िर शिक्षण संस्थानों पर ताला लगना स्वाभाविक है। इन सब के बीच हमारी व्यवस्था ने बच्चों का भविष्य और समय बर्बाद न हो इसके लिए ऑनलाइन क्लासेज आदि का इंतज़ामात करा दिया है। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था पर यूं तो हमेशा से ही सवाल उठते आ रहे है। वह शिक्षा ऑनलाइन होकर कैसे बेहतर विकल्प बन सकती बड़ा सवाल यह भी है। लॉकडाउन के वक्त शिक्षा में सकारात्मक बदलाव हुए है। आज देश ऑनलाइन शिक्षा की ओर आगे बढ़ रहा है । वैसे भी जब तक बहुत आवश्यक न हो हम बदलाव को स्वीकारते नही है । लेकिन इस महामारी ने, न केवल हमारी दिनचर्या में परिवर्तन किए बल्कि आज सामाजिक, सांस्कृतिक, रीति रिवाजों में भी बदलाव आ गए है । जिसकी तस्वीर आए दिनों हम देख रहे है । जन्म , शादी समारोह और मृत्यु ये तीन कर्म को भारतीय संस्कृति में बहुत ही धूमधाम से मनाए जाता था, लेकिन इस एक वायरस ने इन सब पर ग्रहण लगा दिया है । इस भागती ज़िन्दगी में लोगो के पास स्वयं के लिए भी समय नही था आज वह अपने परिवार के साथ समय बिता रहे है । अपने हुनर को तराश रहे है । इस लॉकडाउन में भले ही लोगो से मिलना जुलना बन्द हो गया हो। लेकिन संवाद का एक नया रूप हमारे सामने आया है । जिसका असर शिक्षण संस्थाओं पर भी दिखाई दे रहा है। आज से करीब साढ़े पांच दशक पहले सन 1964 में कनाड़ा के प्रसिद्ध दार्शनिक मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि संस्कृति की सीमाएं खत्म हो रही हैं , और पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो रही है । 1997 में वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पत्रकार फ्रैंसिस केन्कोर्स ने ‘ द डेथ ऑफ डिस्टेंस ‘ सिद्धान्त दिया था। जिसमें कहा गया कि दुनिया की दूरियों का अंत हो गया है। लेकिन उन महान दार्शनिकों ने तो कभी वैश्विक महामारी की कल्पना नहीं की होगी और न ही कभी वैश्विक लॉक डाउन के बारे में सोचा होगा । कोरोना महामारी ने आज दुनिया भर में लोगो को अपने अपने घरों में कैद कर दिया है। लोग डर और भय के माहौल में जी रहे है, और दुनिया में हो रहे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे है । देखा जाए तो प्रत्येक चुनौती अपने साथ नए अवसरों को लेकर आती है । आज जरूरत है उन अवसरों को समझने और उनका लाभ उठाने की । शिक्षण संस्थानों ने भी ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया है । इसमें सरकार ने भी व्यापक पहल की है। जिसके तहत मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा लॉक डाउन के दौरान शिक्षा व्यवस्था गतिशील रह सकें, इसके लिए 11 अप्रैल 2020 को “भारत पढ़ें ऑनलाइन” की शुरुआत की। यह कार्यक्रम ऑनलाइन शिक्षा पारिस्थिकी तंत्र में सुधार और निगरानी के लिए लांच किया गया। इसके अलावा सरकार ने “युक्ति पोर्टल” भी लांच किया। सरकारी तंत्र द्वारा उठाया गया यह प्रयास अलहदा है। पर सवाल यह उठता है कि क्या ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण और समाज कल्याण के लक्ष्यों की पूर्ति कर पायेगी ? माना कि इस नई शिक्षा नीति में चुनोतियाँ बहुत है । लेकिन इस ओर एक व्यापक पहल आने वाले समय मे शिक्षा के स्तर में सुधार की दिशा में एक नया कदम है। एक बात यह भी है। इन सब के दरमियान देखें तो भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश में ऑनलाइन शिक्षा में कई चुनौतियां है। शैक्षणिक संस्थानों , कालेजों के पाठ्यक्रम में भिन्नता इसमें बहुत बड़ा रोड़ा है । जो ऑनलाइन शिक्षा के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है । देश मे समान पाठ्यक्रम पर लम्बी बहस बरसों से होती आई है , लेकिन इस पर एक राय कभी नही बन पाई । तो वही भारत में इंटरनेट की स्पीड भी ऑनलाइन क्लासेस में एक बड़ी समस्या रही है। ब्राडबैंड स्पीड विश्लेषण कम्पनी ऊकला की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2019 में भारत में मोबाइल इंटरनेट स्पीड में 128 वें स्थान पर रहा । भारत में लॉकडाउन के दौरान इंटरनेट स्पीड 11.18 एमबीपीएस ओर अपलोड स्पीड 4.38 एमबीपीएस रही । ऑनलाइन क्लासेस के समय इंटरनेट स्पीड का कम ज्यादा होना समस्या पैदा करता है । गांवों में यह समस्या कई गुना बढ़ जाती है । गांव में अधिकांश विद्यार्थियों के पास ऑनलाइन पढ़ने के लिए न ही संसाधन उपलब्ध है और असमय बिजली कटौती एक गंभीर चुनौती है । ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा के सपने को सही रूप में साकार कर पाना दूर की कौड़ी नजर आती है । ऑनलाइन शिक्षा के कई नुकसान है तो वही इसके फायदों की बात की जाए तो यह शिक्षा पर होने वाले खर्चो को कई गुना कम कर सकता है। वही देश विदेश में उच्च संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने का मार्ग भी सुगम कराता है । लेकिन ऑनलाइन शिक्षा के सुचारू संचालन भारत जैसे विशालकाय देश में एक ओर जहां फायदे का सौदा है तो वही तकनीकी रूप से इसमें होने वाली समस्याएं व चुनोतियाँ भी कम नही है । अभी लॉक डाउन की स्थिति में यह व्यवस्था भले भी बहुत आसान व फायदेमंद नजर आ रही हो । लेकिन इसके सभी पहलुओं को समझ कर ही आगामी समय मे इस पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत जैसे देश मे गुरुकुल की परम्परा रही है । जहां छात्र ओर शिक्षक एक साथ उपस्थित होकर विद्या अध्ययन करते थे ।। जहां गुरु छात्र के चेहरे के भाव देखकर समझ जाते थे कि शिष्य को कहा समस्या आ रही है । गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में जहां संस्कार ,संस्कृति , ओर शिष्टाचार की शिक्षा दी जाती थी। क्या ऑनलाइन शिक्षा में यह सब संभव हो सकेगा ? सवाल कई है लेकिन इन सवालों के जवाब मौजूदा वक़्त में संभव नही है । कोरोना काल के बाद आने वाला समय ही देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा को तय करेगा । तब तक देश के भविष्य से यही अपील है कि ऑनलाइन पढ़ते जाइए, क्योंकि समय अनमोल है, उसे व्यर्थ न जाने दें।   सोनम लववंशीखंडवामध्य प्रदेश

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, When difficult times come, Rajesh Joshi, find many mediums,expression.

अनिश्चितता में हम रोज़ कुछ निश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार, जरूरी व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने में सक्रिय है तो आम जनता और कुछ संस्थाएं सड़क पर बदहवास चले जा रहे हैं लोगों के लिए खाना या पानी उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ दूर के लिए कोई सवारी मिल जाने से निश्चिन्तता नहीं मिलेगी। जरा राहत मिल जाएगी। उसकी निश्चिन्तता घर की पहुंच है। दरअसल यह कोशिशें ही इस समय का सच है। हमारे समय के सवालों का जवाब। लेखक अनु सिंह चौधरी ने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर कहा कि, “हमारे भीतर ये सवाल गूंजता है कि जो भी हम कर रहे हैं इसका मानी क्या है? इस बीमारी के बारे में कहीं कोई जवाब नहीं है। तब इतिहास और साहित्य के पन्ने को पलट कर देखना एक उम्मीद, एक हौसले के लिए कि कैसे हमारे पूर्वज़ों ने बड़ी त्रासदियों का सामना किया है। कहानियों, किस्सों या काल्पनिक कथाओं के जरिए अपने समय को देखा है। उम्मीद या नाउम्मीदी कोई तो रास्ता वहां से निकलेगा…” कई भाषाओं एवं बोलियों में न केवल महामारियों बल्कि अन्य प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र हुआ है। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, कमलाकान्त त्रिपाठी, विलियम शेक्सपीयर, अल्बैर कामू, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ जैसे कई साहित्यकारों ने अपने समय की आपदाओं को अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाया है। “लेकिन जब कठिन समय आते हैं तो अभिव्यक्ति के कई माध्यम ढूँढने होते हैं।” राजेश जोशी ने यह बात लाइव बातचीत के दौरान कही। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर उन्होंने कहा, “यह महान दृश्य है चल रहा मनुष्य है – हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्ति आज के समय में बिलकुल बदल जाती है। पैदल चलते हुए मनुष्यों का दृश्य महान दृश्य नहीं हृदय विदारक और दुखी कर देने वाले दृश्य हैं। इस समय उम्मीद देने वाला दृश्य उन डॉक्टर, स्वास्थकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों, एक्टिविष्ट को देखना है जो जीवन को बचाने में रात दिन लगे हुए हैं।“ राजकमल प्रकाशन समूह के साथ फ़ेसबुक लाइव के जरिए राजेश जोशी ने अपनी कई नई कविताएं और कुछ पुरानी कविताओं का पाठ किया। राजेश जोशी ने अपनी कविताओं को जीवन को बचाने में लगे लोगों को समर्पित किया- “उल्लंघन / कभी जान बूझकर / कभी अनजाने में / बंद दरवाज़े मुझे बचपन से ही पसंद नहीं रहे / एक पांव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा / व्याकरण के नियम जानना मैंने कभी जरूरी नहीं समझा / इसी कारण मुझे कभी दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी / और किसी व्यापारी के हाथ मोर का पंख देकर उसे खरीदा नहीं / बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी / और उससे भी ज़्यादा मुश्किल था हर पल उसकी हिफ़ाजत करना..”   प्रस्तुति- सुमन परमार

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Dakhal News 15 May 2020


bhopal, Politicians misuse ,entrepreneurial defamation, court , intimidate  media

नई दिल्ली : नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया (एनयूजेआई) ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें कहा गया है कि ताकतवर राजनेता और कॉरपोट जगत के लोग ‘मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया को डराने-धमकाने के लिए करते हैं। कोर्ट ने कहा है कि रिपोर्टिंग में मात्र कुछ गलतियां अभियोजन पक्ष को यह अधिकार नहीं देती कि उसे अपराधी ठहराया जा सके। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन ने अपने फैसले में कहा है कि शक्तिशाली राजनेता और कॉर्पोरेट्स मानहानि के मामलों का दुरूपयोग मीडिया के खिलाफ ’डराने-धमकाने के हथियार’ के रूप में कर रहे हैं। एनयूजे (आई) के अध्यक्ष रास बिहारी और महासचिव प्रसन्ना मोहंती ने एक संयुक्त बयान में कहा कि एनयूजे (आई) मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करता है। यह निर्णय पूरे कॉर्पोरेट जगत और राजनेताओं के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। कोर्ट का यह फैसला उन लोगों को सबक सिखाने वाला साबित होगा जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दबाव डालकर और भय का वातावरण पैदा करके प्रेस की स्वतंत्रता को दबाते हैं। उन्होंने बताया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को और मजबूत करते हुए न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उच्च न्यायपालिका द्वारा एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह एक रिकॉर्ड का विषय है कि पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करना कॉर्पोरेट निकायों और शक्तिशाली राजनेताओं का एक साधन बन गई है। इन राजनेताओं की जेबें गहरी हैं और जिनके हाथों में लंबे समय तक मीडिया हाउसेज को बांधे रखने के लिए अच्छे संसाधन मौजूद हैं। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा कि हमेशा गलती का एक मार्जिन हो सकता है। तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर प्रत्येक मामले में मीडिया को इस बचाव का लाभ उठाने का हक है। रिपोर्टिंग में मात्र गलतियां अभियोजन के आरोपों को सही नहीं ठहरा सकते।

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, PMO refuses, benefits of extinguishing lights , lighting lamps

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 05 अप्रैल 2020 को 09.00 बजे लाइट बुझाने तथा दिया आदि जलाने के संबंध में भाषण के बारे में सूचना देने से मना कर दिया है. नूतन ने पीएमओ को पीएमओ अभिलेखों के अनुसार इन निर्देशों को निर्गत करने से संबंधित तर्क एवं कारण एवं इससे संभावित लाभ की जानकारी मांगी थी. साथ ही उन्होंने पूछा था कि ये निर्देश अनिवार्य हैं या मात्र सुझाव हैं, और यदि ये अनिवार्य निर्देश हैं तो इनके उल्लंघन कर क्या दंड प्राविधानित है. नूतन ने इस संबंध में पीएमओ अथवा भारत सरकार द्वारा निर्गत सरकारी आदेश तथा पीएमओ की पत्रावली की प्रति भी मांगी थी. पीएमओ के जन सूचना अधिकारी प्रवीण कुमार ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि मांगी गयी जानकारी आरटीआई एक्ट की धारा 2(एफ) में सूचना के अंतर्गत नहीं आता है.   नूतन ने इससे असहमत होते हुए इस संबंध में प्रथम अपील प्रस्तुत किया है.

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Dakhal News 12 May 2020


bhopal, Writers and literature lovers, paid tribute, story writer, Shashibhushan Dwivedi

कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की असामयिक मृत्यु से हिन्दी जगत एवं साहित्य प्रेमियों के बीच गहरा शोक व्याप्त है। कल शाम ह्दयगति रूकने से 45 वर्ष के शशिभूषण द्विवेदी की मृत्यु हो गई। कोरोना काल के इस अमानवीय समय ने हमें हमारे शोक में नितांत अकेला कर दिया है। सामाजिक दूरी बनाए रखने की हमारी विवशता में हम गले मिलकर एक-दूसरे से अपना ग़म भी नहीं बाँट पा रहे। लेकिन, आभासी दुनिया के माध्यम से लोगों ने शशिभूषण द्विवेदी को याद कर उनके साथ के अपने संस्मरणों को साझा कर, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। लेखक ममता कालिया ने कहा, “उनकी हर कहानी के अंदर उत्तर आधुनिक चेतना देखने को मिलती है। उनकी कहानी ‘छुट्टी का दिन’ बहुत मार्मिक कहानी है। उनकी कहानियों से उनके व्यक्तित्व को अलग नहीं किया जा सकता, अपनी हर कहानी में वे दिखाई देते हैं। राजनीतिक बातों को प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करना उनकी ख़ासियत थी।“ उन्होंने कहा, “कोरोना काल में जब हम अपने अपने घरों में रहने को मजबूर हैं ऐसे में आभासी माध्यम में साथ जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी को याद करना खुद के दुखों को कम करने का एहसास मात्र है।“ ममता कालिया ने लाइव बात करते हुए शशिभूषण द्विवेदी की कहानी का पाठ भी किया। कहानीकार चंदन पांडेय ने शशिभूषण द्विवेदी को एक दोस्त और एक समकालीन कथाकार के रूप में याद करते हुए कहा कि, “वे एक बेबाक लेखक थे। उनकी कहानियों की ख़ासियत थी कि वे इतिहास को उसी दौर में, उसी नज़रिये से देखते हुए उसे वर्तमान की कहानी बना देते थे। ‘विप्लव’, ‘ब्रह्महत्या’, ‘खेल’ उनकी कुछ महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। सोशल मीडिया पर लोग कल शाम शशिभूषण द्विवेदी के निधन की ख़बर आने के बाद से लगातार उन्हें ही याद कर रहे हैं। जितने साहित्य की दुनिया के लोग याद कर रहे हैं, उतने ही उससे बाहर के विस्तृत हिंदी समाज के लोगों ने उनके किस्से साझा किए। आलोचक अमितेश कुमार ने आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर शशिभूषण द्विवेदी के साथ बिताए बहुत सारे पलों को याद किया। उन्होंने कहा कि वो जीवन के मुश्किल क्षणों में भी हास्य का रस निकाल लाते थे। अमितेश ने कहा, “अभी तो हम इंतज़ार में थे कि हमें उनकी कई और रचनाओं को पढ़ने का मौका मिलेगा। लेकिन, जैसे उनकी कहानियों में शिल्प अचानक समाप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही वे अचानक हमारे बीच से चले गए।   अमितेश ने लाइव बातचीत में कहा, “जीवन में कठिनाई और तनाव के बीच सकारात्मकता ढूँढ़ निकाल लाने वाले व्यक्ति के तौर पर शशिभूषण द्विवेदी बहुत याद आएंगे। अपने दोस्तों और उभरते लेखकों, साहित्यकारों के लिए वे एक बेबाक और स्पष्ट आलोचक थे जिनकी कही बातों ने बहुतों को कुछ नया सिखाया था।“ लॉकडाउन में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा वाट्सएप्प से रोज़ साझा की जा रही पुस्तिका आज लेखक शशिभूषण द्विवेदी को समर्पित रही। पुस्किता में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी कहानियों को साझा किया गया है।

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, For six years, anonymous senior journalist ,writer Meenu Rani Dubey

प्रयागराज की वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका मीनू रानी दुबे के निधन से इस प्रदेश में महिला पत्रकारों के एक युग का अंत तो गया. मीनू ने उस समय पत्रकारिता में कदम रखा था जब प्रयागराज में एक भी महिला पत्रकार नहीं थी. उनका इस पेशे में आना एक कौतूहल से काम नहीं था. उन्होंने 1982 में तत्कालीन महिला मैगज़ीन मनोरमा में बतौर उप संपादक काम शुरू किया और बाद में वह इसकी सहयोगी संपादक बनीं. मैं इससे पहले 1979 से देशदूत (दैनिक अख़बार) के लिए खेल की न्यूज़ कवर करने लगा था. उस समय एलएलबी तृतीय वर्ष का छात्र था. डॉ राम नरेश त्रिपाठी इस अख़बार के चीफ रिपोर्टर थे. देशदूत स्व. नरेंद्र मोहन के चचेरे भाई वीरेंद्र कुमार का था. कुछ ही महीनों बाद दोनों में हिस्सेदारी का समझौता हुआ और देशदूत दैनिक जागरण हो गया. उसी साल अगस्त में तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास ने जागरण का लोकार्पण किया. यहाँ मुझे स्पोर्ट्स के अलावा डेस्क पर भी काम करने को कहा गया. इसी दौरान मेरा मीनू रानी से परिचय हुआ. उल्लेखनीय है कि गत चार मई को त्रिपोलिया (प्रयागराज) स्थित घर पर गिरने से गंभीर रूप से घायल होने के कारण मीनू रानी का निधन हो गया था. मीनू रानी बहुत प्रतिभावान थीं. उन्हें सामयिक तथा रुचिकर व पठनीय विषयों की गहरी समझ थी और मैगज़ीन के दो अंक बाद वाले अंक में क्या-क्या सामग्री जा सकती है, वह पहले से ही तैयारी में जुट जाती थीं. डेस्क पर काम करने के साथ ही वह फील्ड में जाकर महिला सन्दर्भ पर रिपोर्टिंग भी करती थीं और शुद्ध रूप से रचनात्मक रिपोर्टिंग में ही प्रतिमान स्थापित किया. मनोरमा उस समय देश की नंबर वन महिला मैगज़ीन हुआ करती थी और दक्षिणी राज्यों में भी हिंदी भाषी परिवारों में वह पढ़ी जाती थी. उसकी लोकप्रियता के बराबर कोई अन्य मैगज़ीन नहीं पहुँच पायी. प्रयागराज के सभी नामी साहित्यकारों महादेवी वर्मा, उपेंद्र नाथ अश्क, डॉ राम कुमार वर्मा, जगदीश गुप्त, अमर कांत आदि उन्हें बहुत स्नेह देते थे. शहर के पत्रकारों के हर आयोजन और कार्यक्रम में मीनू रानी अनिवार्य रूप से की उपस्थित रहती थीं. उन्होंने इतने आलेख, इंटरव्यू, प्रसंग, संस्मरण लिखे जिनकी कोई संख्या उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कभी पत्रकारों से सामान्य चर्चा में भी इसका कभी उल्लेख नहीं किया. हो सकता है इसलिए कि ऐसा कहने से अहंकार का भाव लक्षित होता. मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की साहित्यिक गतिविधियों में उन्हें भाग लेते देखता था. डेलीगेसी की मैगज़ीन में उनके लेख छपा करते थे. छात्र-छात्रों की गोष्ठियों में उन्हें विचार रखने के लिया बुलाया जाता था. मुझसे अक्सर वह यूनिवर्सिटी में ही इन सबकी चर्चा करती थीं. एक बार यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी हाल में उन्होंने कोई मैगज़ीन अपने गाँधी झोले से निकाली और मुझे पन्ने पलटकर दिखाते हुए बोली, देखिये इंद्र कांत जी मेरा लेख छपा है. मैंने सरसरी तौर पर देखा और उन्हें बधाई दी तो वह खुश हो गयीं. प्रबंधन की आपसी लड़ाई के कारण मनोरमा मैगज़ीन बंद हो गयी तो वह स्वतंत्र रूप से अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख देती रहीं. 1980 के आस पास प्रयागराज में उनके अलावा कोई महिला पत्रकार नहीं थी. हाँ लेखिकाएं कई थीं. बाद में नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका अख़बार में संध्या सिंघल, सुनीता द्विवेदी (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की पत्नी और सुप्रीम कोर्ट के जज स्व एसएन द्विवेदी की पुत्रवधू और हाई कोर्ट के जस्टिस धवन की बहन) आयीं. सुनीता द्विवेदी डेस्क के अलावा रिपोर्टिंग का भी काम कर लेती थीं और उनके लेख भी छपते थे. अब चैनलों की बाढ़ आने के बाद महिला पत्रकारों की भी बाढ़ आ गयी है. इनमें स्क्रिप्ट पढ़ते हुए एंकरिंग की तो क्षमता दिखती है लेकिन लेखन में नहीं, क्योंकि वैचारिक शून्यता है. पांच छह साल से गुमनाम थीं इधर पांच-छह साल से वह गुमनाम जैसी हो गयी थीं. पत्रकारों से उनकी मुलाकात नहीं होती थी और अपने को घर तक सीमित कर लिया था. एक साल पहले मेरी उनकी मुलाकात इलहाबाद ब्लॉक वर्क्स (प्रिंटिंग प्रेस ) में हुई थी, मेरा वहां के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज मित्तल से 40 साल पुराना सम्बन्ध है. वह मनोज के पास बैठी थीं. मुझे देखती ही पूछी…अरे ..इंद्र कांत जी आप यहाँ कैसे.?.. मनोज ने कहा कि भाई साहब तो हमेशा यहाँ आते रहते हैं..वह बताई कि वह भी यहाँ अक्सर आती हें. मैंने एक बात देखी जिससे मैं कुछ क्षण विचलित भी हुआ..मीनू रानी बहुत कमजोर हो गयी थीं और चेहरे पर चिंतन और चमक गायब थी. मैंने पूछा…मीनू जी आप इतनी कमजोर क्यों हो गयी? स्वास्थ्य को क्या गया है? वह पल भर खामोश रहीं, फिर रोने लगीं और पल्लू से आंसू पोछते हुए kaha, मै ठीक भी हूँ और नहीं भी. मैंने कहा, हुआ क्या है? वह बोली, कुछ नहीं. फिर पूछा, आप कुछ बताएं, हो सकता है मै कुछ मदद कर सकूँ. …बोलीं..नहीं नहीं सब ठीक है. आप अपना हाल बताएं , स्वास्थ्य कैसा है? कुछ देर बाद वह सामान्य हुईं. मनोज से कुछ देर बात हुई फिर मैं मीनू रानी को अपना ख्याल रखने की बात कहकर चला गया. उनके शारीरिक हालत को देख मुझे लगा कि कुछ न कुछ प्रॉब्लम है जरूर. इस मुलाकात के दो महीने बाद अपने एक लेख के बारे में कुछ जानकारी लेने के लिए उन्हें फ़ोन किया तो वह उत्साह के साथ बात करती रहीं, खुश मिजाज लग रही थीं और पूरी जानकारी दीं. लगभग आधा घंटे तक मेरी उनकी बात हुई. उसके बाद फिर बात नहीं हो सकी. एक लेखिका और पत्रकार के रूप में मीनू रानी जितना रचनात्मक योगदान समाज को दे सकती थीं, उतना उन्होंने दिया. वह अपने पीछे आदर्श और सकारात्मक पत्रकारिता ऐसा अध्याय छोड़ गयी, जो भविष्य में किसी अन्य महिला पत्रकार के वश की बात नहीं जो इसे दोहरा सके.   लेखक इंद्र कांत मिश्र प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. 

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Amit Shah, broke silence,no malice,pread rumors about my health

Amit Shah : पिछले कई दिनों से कुछ मित्रों ने सोशल मिडिया के माध्यम से मेरे स्वास्थ्य के बारे में कई मनगढ़ंत अफवाए फैलाई हैं। यहाँ तक कि कई लोगों ने मेरी मृत्यु के लिए भी ट्वीट कर दुआ मांगी है। देश इस समय कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा और देश के गृह मंत्री के नाते देर रात तक अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैंने इस सब पर ध्यान नहीं दिया। जब यह मेरे संज्ञान में आया तो मैंने सोचा कि यह सभी लोग अपनी काल्पनिक सोच का आनंद लेते रहें, इसलिये मैंने कोई स्पष्टता नहीं की। परन्तु मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओ और मेरे शुभचिंतकों ने विगत दो दिनों से काफी चिंता व्यक्त की और उनकी चिंता को मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता। इसलिए मैं आज स्पष्ट करना चाहता हूँ, कि मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ और मुझे कोई बीमारी नहीं है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ऐसा मानना है कि इस तरह की अफवाह स्वास्थ्य को और अधिक मज़बूत करती हैं। इसलिए मैं ऐसे सभी लोगों से आशा करता हूँ कि वो यह व्यर्थ की बातें छोड़ कर मुझे मेरा कार्य करने देंगे और स्वयं भी अपने काम करेंगे। मेरे शुभचिन्तक और पार्टी के सभी कार्यकर्ताओ का मेरे हालचाल पूछने और मेरी चिंता करने के लिए उनका आभार व्यक्त हूँ।   और जिन लोगों ने यह अफवाएं फैलाई है उनके प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना या द्वेष नहीं है। आपका भी धन्यवाद्।   देश के गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह की एफबी वॉल से.  

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Dakhal News 10 May 2020


bhopal, Senior journalist of Kadambini Shasibhushan Dwivedi is no more

दुखद सूचना हिंदुस्तान ग्रुप की मैगजीन कादम्बिनी से आ रही है। यहां कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी का निधन हो गया है। फेसबुक पर महेंद्र अवधेश श्रीवास्तव लिखते हैं- भाई शशि भूषण द्विवेदी नहीं रहे। एक बेबाक-बिंदास टिप्पणीकार के रूप में इसी फेसबुक के जरिये मैंने उन्हें जाना। समझने-परखने का प्रयास किया, अपना कोई कद-पहचान न होते हुए भी। मिलने की बहुत इच्छा थी। सोचा था कि कभी किसी पुस्तक मेले में दर्शन का सौभाग्य मिला, तो उन्हें प्रणाम करूंगा। लेकिन, जिम्मेदारियों और बेबसी ने इस कदर जकड़ा कि पिछले दो-तीन पुस्तक मेले मुझसे छूट गए। शशि जी जब कुछ कहते थे, तो लगता कि जैसे कोई अपने बीच का आदमी बोला। मैं उनकी हर पोस्ट को पढ़ता और लाइक करता, लेकिन कमेंट नहीं करता। डर सा लगता था। सादर नमन मेरे भाई। विधाता आपकी आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें। अरुण शीतांश की टिप्पणी पढ़ें- Shashi Bhooshan Dwivedi से मेरी मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में हरे प्रकाश उपाध्याय के साथ हुई थी, प्र ले सं का राष्ट्रीय सम्मेलन में। वहां हमलोग साथ में खाना-वाना खाए।विष्णु नागर ने कादम्बिनी पत्रिका में कविता प्रकाशित की थी तो उसकी चर्चा की। फोन पर बातचीत हमेशा होती रहती थी।विश्वास नहीं हो रहा है आज नहीं हैं। उनको रिक्शा पकड़ा कर गेस्ट हाउस लौट आया था। उस क्षण की बहुत याद आ रही है।मन बहुत दुःखी है। ये जाने की उमर नहीं थी। बहुत प्यारे इंसान थे। लग रहा है यह झूठी ख़बर है। उन्होंने अपना फ्लैट लिया। उसके बाद बात नहीं हो सकी।मैं तो लगातार सबको फोन कर रहा हूं जब से कोरोना काल की शुरुआत हुई है। अब इन्हीं से बात होने वाली थी कि….! नमन!! अजित प्रियदर्शी की प्रतिक्रिया- नयी सदी के चर्चित और अपने तरह के अनोखे कथाकार Shashi Bhooshan Dwivedi का इतनी जल्दी जाना हतप्रभ कर गया। वे जितने अच्छे कथाकार थे, उतने ही अच्छे इंसान। दोटूक, बेबाक, जि़न्दादिल इंसान की गवाही देते थे उनके पोस्ट। दिल्ली के आत्ममुग्ध और अहमन्य साहित्यिक परिदृश्य के बाहर था उनका व्यक्तित्व। किसी साहित्यिक प्रकरण की जानकारी लेने के लिए उन्होंने एक बार फोन किया था।उनसे दिलचस्प संवाद याद है। उनके परिवार को यह कठिन दुख सकने की शक्ति मिले। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि! कश्यप किशोर मिश्र का कमेंट- “अतीत झूठा होता है अतीत में ठीक ठीक वापसी संभव नहीं।” “मरना ही सबकुछ नहीं होता सही समय पर मरना जरूरी होता है।” बीते चार घंटे पहले शशिभूषण जी के एकाएक न रहने की खबर पढ़ी। बड़ी देर तक दिमाग में कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। कुछ सोचा ही नहीं जा रहा था। सिर्फ यहां वहां उनके नहीं रहने की खबर देख रहा था पढ़ रहा था। आज के दौर में, साहित्य और साहित्यकार “सुपर मार्केट” के प्रोडक्ट की तरह हैं उनके बीच शशिभूषण जी पुराने वक्त के कस्बाई या छोटे शहरों की एक परचून की दूकान की तरह थे। बिना किसी तड़क भड़क के बिना किसी चमकदार पैकिंग के, बिना किसी डिस्काउंट आफर के बेहद सहज तरीके से सिर्फ जरूरत भर की बात जरूरत भर की पुड़िया में बांध देते थे। विनीत कुमार नें शशिभूषण जी को याद करते हुए कहा कि “फोन पर बात करते हुए वो अपने साथ एक जंगल लेकर काल करते थे।” मेरे ख्याल में वो खुद में एक जंगल बन गये थे। भरी – पुरी आबादी के बीच एक पुरानी हवेली की मानिंद थे जिसमें समय के साथ साथ पौधों लतरों झाड़ झंखाड़ का एक जंगल उग आया हो। बीच आबादी एक मकान अपनें पैदा किये जंगल के साथ अपनी गति से जी रहा हो। ऐसी हवेलियां अपना जंगल लिए खत्म होती हैं या इनके जंगल इन्हें लिए दिए खत्म होते हैं। ऐसा ही हुआ भी। शशिभूषण जी के साथ साथ उनके परिवेश और व्यक्तित्व के सायबान तले फैला फूला जंगल भी सहसा ही खत्म हो गया।

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, Google added new meeting feature in Gmail

कोरोना के चलते दुनिया भर के देशों में लॉक डाउन के चलते कई किस्म की नई जरूरतें पैदा हुई हैं जिसे भुनाते हुए कई कंपनियों ने अपने अपने प्रोडक्ट/फीचर लांच किए हैं. इसमें जूम एप्प सर्वाधिक चर्चा में है जिसमें अलग अलग जगहों पर घर में बैठे लोग एक साथ चैट, मीटिंग, कांफ्रेंस कर सकते हैं. सबसे खास ये कि इस चैट मीटिंग कांफ्रेंस के वीडियो को सेव कर बाद में इसे किसी भी भी प्लेटफार्म (यूट्यूब, फेसबुक आदि) पर अपलोड भी कर सकते हैं. जूम के इस अविष्कार से सबसे बड़ा फायदा मीडिया वालों को हुआ जो घर बैठे दूसरे लोगों से कनेक्ट कर डिबेट परिचर्चा शो आदि कर पा रहे हैं. इस एप्प से कारपोरेट कंपनीज को भी काफी फायदा हो रहा है जो वर्क फ्राम होम के चलते अपने इंप्लाइज से इस एप्प के जरिए कनेक्ट हो पा रहे हैं. वाट्सअप ने भी एक साथ आठ लोगों के वीडियो चैट की सुविधा दी है. अभी तक चार लोग ही एक साथ चैट कर सकते थे. ताजा डेवलपमेंट जीमेल का है. गूगल की मेल कंपनी जीमेल ने मीटिंग का नया फीचर पेश कर दिया है. जब आप जीमेल खोलेंगे तो जिस तरफ इनबाक्स, स्टार्ड, सेंट, ड्राफ्ट, स्पैम आदि लिखा होता है, उसी के नीचे Meet करके एक फीचर लिखा आएगा. इस ‘मीट’ के नीचे दो फीचर लिखे आते हैं. स्टार्ट ए मीटिंग और ज्वाइन ए मीटिंग. स्टार्ट ए मीटिंग वाले फीचर में आप किसी नई मीटिंग की शुरुआत कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में एक कोड जनरेट होगा जिसे आप मीटिंग में शामिल होने वाले अन्य व्यक्तियों को भेजेंगे और वो लोग उस कोड के जरिए आपकी मीटिंग में जुड़ जाएंगे, ज्वाइन ए मीटिंग पर क्लिक कर कोड डालते हुए. कोलकाता से श्वेता सिंह की रिपोर्ट.  

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, God bless Amit Shah

अमित शाह के बारे में बहुत बातें हो रही हैं. उनके स्वास्थ्य और निस्तेज (अच्छी हिंदी में कहे तो बुझे हुए) चेहरे को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. कुछ लोग उन्हें बोन कैंसर से पीड़ित बता रहे हैं तो कुछ अन्य बीमारियों से. लेकिन मीडिया में उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई अपडेट नहीं है. अमित शाह ठीक उसी समय गायब हुए थे जब उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन गायब हुए थे. इंडियन मीडिया ने बगदादी की तरह किम को 20 से अधिक बार मार डाला लेकिन किम वापस आ गए, हर तानाशाह की तरह.   इंडियन मीडिया के पास मिसाइल रहता तो खुद ही किम को मार देतें ये बोल हमारा मजा खराब करने क्यों वापस आया तू? जा अब मर!! खैर, अमित शाह जब गायब थे तब मीडिया ने यह स्टोरी गढ़ी कि परदे के पीछे कोरोना से जंग की कमान अमित शाह के हाथ में था. अब जब अमित शाह वापस आये हैं तो मीडिया में आई उनकी फोटो ज़ूम कर देखा जा रहा है, लोग उनके पतले हाथों को देख तंज़ कस रहे हैं कि मांस कहाँ गया? आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई नहीं दे रही है जैसे वे गले को मोटा करते हुए बोलते थे “आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए.. पहले सीएबी आने जा रहा है, सीएबी आने के बाद एनआरसी आएगा. एनआरसी सिर्फ बंगाल के लिए नहीं आएगा, पूरे देश के लिए आएगा. ” लेकिन मामला उल्टा हो गया एनआरसी से पहले दुबले पतले अमित शाह आ गए. अब अमित शाह से लड़ने में मजा नहीं आ रहा है. कहाँ हट्टे -कट्टे अमित शाह और कहाँ माचिस की तीली सा अमित शाह. मैं बहुत निराश हूँ! क्या ये बात छुपाई नहीं जा सकती थी. जैसे बीमारी छुपा ली गई, जैसे उस हॉस्पिटल और डॉक्टर को छुपा लिया गया जिन्होंने रात के अंधेरे में अमित शाह का इलाज किया. उन लोगों को बोल दिया रहा होगा कि कोई जानकारी लीक नहीं होना चाहिए. अगर किसी ने किया तो लोया को याद कर लो. लेकिन मजा खुद अमित शाह ने खराब कर दिया. मेरी अमित शाह को एक सलाह है, जैसे हर तानाशाह अपना बॉडी डबल रखते हैं, वैसे ही उन्हें भी रख लेना चाहिए, जब लोग ज्यादा सवाल करने लगे तो एएनआई के कैमरामैन को बुलाकर हट्टे कट्टे बॉडी डबल की फ़ोटो खींच मीडिया में जारी कर दें. बाकी काम मीडिया कर देगा कि फलां फलां मिशन पर हैं अमित शाह. ये दुबला पतला अमित शाह हमें एकदम पसंद नहीं. तानाशाहों का परचम बुलंद रहे! विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से!

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Dakhal News 8 May 2020


bhopal, newspapers , relief package, government send money , media persons

अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के लिए संघर्षरत अखबार कर्मियों की यूनियन न्‍यूजपेपर इम्‍प्‍लाइज यूनियन आफ इंडिया (न्‍यूइंडिया) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अखबार मालिकों की संस्‍था आईएनएस की राहत पैकेज की मांग का विरोध करते हुए मजीठिया वेजबोर्ड लागू करवाने की लड़ाई में नौकरियां गवा चुके हजारों अखबारकर्मियों को सीधे तौर पर आर्थिक मदद की मांग की है। ज्ञात रहे कि ऐसे हजारों अखबार कर्मी नाैकरी छीन जाने के कारण रोजी रोटी को मोहताज हैं। इस संबंध में न्‍यूइंडिया द्वारा लिखा पत्र इस प्रकार से है: अखबार कर्मचारियों के लिए 11 नवंबर 2011 को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा संवैधानिक घोषित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू ना करके देश के संविधान और संसद का मखौल उड़ाने वाले अखबार मालिकों के संगठन आईएनएस की हजारों करोड़ के राहत पैकेज की मांग का हम देश भर के पत्रकार और अखबार कर्मचारी कड़ा विरोध करते हैं। आईएनएस एक ऐसी संस्‍था है जो खुद को देश के संविधान, सर्वोच्‍च न्‍यायालय और संसद से बड़ा समझती है। इसका जीता जागता उदाहरण अखबारों में कार्यारत पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित और माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा वैध और उचित घोषित किए गए मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू ना करना और वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छीन लेना है। महोदय, देश के लगभग सभी समाचारपत्रों की पिछली बैलेंसशीटें हर साल होने वाले करोड़ों रुपये के मुनाफे को दर्शाती हैं। वहीं देश भर के श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड की रिकवरी और उत्‍पीड़न के हजारों लंबित मामले साफ दर्शाते हैं कि किस तरह से अखबार प्रबंधन अपने कर्मचारियों का हक मार कर बैठे हैं और पत्रकारों, पत्रकारिता और रोजगार के नाम पर अपनी तिजोरियां ही भरते आए हैं। लिहाजा कोराना संकट में हजारों करोड़ के घाटे की बात करके आईएनएस राहत पैकेज की जो बात कर रहा है, यह सिर्फ अखबार मालिकों की तिजोरियां भरने का ही प्रपंच है। इससे अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं होने वाला। यहां गौरतलब है कि लॉकडाउन में भी अखबारों की प्रिंटिंग का काम नहीं रोका गया है और अखबारों के प्रसार में मामूली फर्क पड़ा है। महंगाई के दौर में जहां हर वस्‍तु के दाम उसकी लागत के अनुसार वसूले जाते हैं तो वहीं बड़े बड़े अखबार घराने अखबार का दाम इसलिए नहीं बढ़ाते ताकि छोटे अखबार आगे ना बढ़ पाएं। उनकी इस चालाकी को घाटे का नाम नहीं दिया जा सकता है। यहां एक समाचारपत्र द हिंदू का उदाहरण सबके सामने है, जिसकी कीमत 10 रुपये हैं जबकि बाकी अखबार अभी भी इससे आधी से कम कीमत में बेचे जा रहे हैं, इसका खामियाजा देश की जनता की खून पसीने की कमाई को लूटा कर नहीं भरा जा सकता। महोदय, यहां यह बात भी आपके ध्‍यान में लाना जरूरी है कि आईएनएस से जुड़े अधिकतर अखबारों ने केंद्र सरकार की उस अपील का भी सम्‍मान नहीं किया है जिसके तहत कर्मचारियों का वेतन ना काटने को कहा गया था। करीब सभी अखबारों ने जानबूझ कर अपने कर्मचारियों से पूरा काम लेने के बावजूद उनका आधे के करीब वेतन काट लिया है ताकि सरकार को घाटे का यकीन दिलाकर राहत पैकेज का ड्रामा रचा जा सके। वेतन काटे जाने को लेकर कुछ यूनियनें माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दखिल कर चुकी हैं। महोदय, असल में राहत के हकदार तो वे अखबार कर्मचारी हैं, जो पिछले पांच से छह सालों से मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके चलते अपनी नौकरियां तक गंवा चुके हैं। इनके परिवारों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना मुश्किल हो रहा है। केंद्र सरकार से मांग की जाती है कि राज्‍यों के माध्‍यम से श्रम न्‍यायालयों में मजीठिया वेजबोर्ड और अवैध तौर पर तबादले और अन्‍य कारणों से नौकरी से निकाले जाने की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मचारियों की पहचान करके उन्‍हें आर्थिक तौर पर सहायता मुहैया करवाई जाए।   साथ ही कोरोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को आर्थिक मदद जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से इस आशय का शपथपत्र देते हैं कि उन्‍होंने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड या इसके कारण कर्मचारी को नौकरी से निकालने का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की यूनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को राहत दी जाए।

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Punjab Kesari journalist dies of cancer

जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार एलएल शर्मा ने जानकारी दी है कि पंजाब केसरी के पत्रकार कमल शर्मा का निधन हो गया है. कमल शर्मा कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.   दुःखद सूचना. हमारे युवा साथी पत्रकार श्री कमल शर्मा पंजाब केसरी का आज सुबह निधन हो गया. वे पिछले कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे.-एलएल शर्मा

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Hurt by SP leader, making dirty allegations , character, women journalist

सुसाइड नोट के आधार पर लोहता पुलिस ने सपा नेता शमीम को किया गिरफ्तार वाराणसी। काशी की पत्रकार बिरादरी की एक तेज तर्रार बहुचर्चित महिला पत्रकार रिजवाना तबस्सुम ने रविवार की रात आत्महत्या कर ली। आरोप है कि एक सपा नेता ने रिजवाना पर झूठा इल्जाम लगाया था। दोनों के बीच रात करीब एक बजे विवाद हुआ। बाद में दो लाइन का सुसाइड नोट लिखकर रिजवाना फांसी पर झूल गई। इस घटना से बनारस के पत्रकार मर्माहत और सकते में हैं। रिजवाना की कई स्टोरीज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी हैं। विज्ञान में स्नातक रिजवाना तबस्सुम (28 साल) का रविवार की रात अपने आवास पर कमरे में फांसी लगाकर जान देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। बतौर स्वतंत्र पत्रकार अपने लेखन से परिवार का खर्च चलाने वाली रिजवाना तब्बसुम ने फंदे पर झूलने पहले लिखे सुसाइड नोट में सपा नेता शमीम नोमानी को जिम्मेदार ठहराया है। शमीम लोहता का रहने वाला है। वो समाजवादी पार्टी में कार्यकारिणी का सदस्य रहा है। रिजवाना की उससे दोस्ती थी। लाकडाउन में वो शमीम के साथ मिलकर गरीबों को राशन वितरित कर रही थी। पत्रकार रिजवाना तबस्सुम द वायर, न्यूज क्लिक, जनज्वार, द प्रिंट, एशिया लाइव, बीबीसी समेत तमाम पत्रिकाओं और न्यूज वेबसाइटों के लिए समसामयिक मुद्दों कवर करती थी। रविवार की रात 9.27 बजे रिजवाना ने न्यूज क्लिक को आखिरी रिपोर्ट भेजी थी। परिजनों के मुताबिक रात करीब एक बजे सपा नेता शमीम नोमानी ने उसे फोन किया था। उसने रिजवाना पर तमाम झूठे इल्जाम लगाए। शमीम ने उस पर कई लोगों के साथ नाजायज संबंध होने के झूठे आरोप जड़ दिए। रिजवाना इस इल्जाम को बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने चार शब्दों का सुसाइड नोट लिखा-शमीम नोमानी जिम्मेदार है। इस नोट को उसने अपने बिस्तर के पास लगे बोर्ड पर पिनअप किया। बाद में अपनी चुनरी निकाली और फांसी का फंदा लगाकर झूल गई। लोहता थाना क्षेत्र के हरपालपुर की रहने वाली फ्रीलान्सर रिजवाना तबस्सुम की आत्महत्या की खबर सोमवार की सुबह जब परिजनों को लगी तो उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दी। मौत की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे सदर सीओ अभिषेक पाण्डेय ने सुसाइड नोट के आधार पर सपा नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया। सीओ अभिषेक पाण्डेय ने बताया कि रिजवाना की खोजी रपटों के वो भी कायल थे। ग्रामीण जनजीवन में किसानों और गरीबों की बदरंग जिंदगी से जुड़े मुद्दों को रिजवाना काफी अहमियत देती थी। सुसाइड नोट के आधार पर सीओ ने तत्काल समीम नोमानी के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए प्रेरित करना) के तहत मुकदमा दर्ज करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। नोमानी समाजवादी पार्टी की जिला कार्यकारिणी का सदस्य है। आगामी विधानसभा चुनाव में वो सपा से टिकट का दावेदार था। बनारस के लोहता थाने में बंद शमीम अभी भी रिजवाना का चरित्र हनन करने से बाज नहीं आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि शमीम की रिजवाना से दोस्ती थी। वो उससे शादी करना चाहता था, लेकिन रिजवाना अपने करियर पर ध्यान दे रही थी। शमीम का उसके दूसरे दोस्तों से बात करना काफी नागवार लगता था। काफी होनहार थी रिजवाना तेजतर्रार और प्रतिभाशाली युवा रिजवाना की मौत से बनारस के पत्रकार बेहद दुखी हैं। लाकडाउन के दौरान रिजवाना ने कई न्यूज वेबसाइटों के लिए यादगार स्टोरियां लिखीं। इन दिनों वो अपने करियर पर ज्यादा ध्यान दे रही थी।   पत्रकार रिजवाना हमेशा सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हुई थी। जिसके लिए उसे कई प्रतिष्ठित संस्थानों की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका था। रिजवाना अपने पांच भाई बहनों में दूसरे नंबर की थी। इनकी मौत से उसके पिता अजीजुल हकीम, मांग अख्तरजहां, बड़े भाई मोहम्मद अकरम, छोटी बहन नुसरत जहां, इशरत जहां, छोटे भाई मोहम्मद आजम व मोहम्मद असलम का रो-रोकर बुरा हाल है।

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Dakhal News 7 May 2020


bhopal, Mahanayak has opened contracts

समरेंद्र सिंह जनता को कोठे पर बिठा कर पैसे मिले या फिर ठेके पर – सरकारों को बस पैसे से मतलब है…. हजारों साल बाद जो महानायक पैदा हुआ है उसने ठेके खुलवा दिए हैं. उसके इशारे पर विचारधारा की बंदिशें टूट गई हैं. जैसे सबको बस इसी इशारे का इंतजार हो. कुछ अपवादों को छोड़ कर सभी प्रदेश सरकारों ने ठेके खोल दिए हैं. सबने ऐसा क्यों किया है, यह सभी समझ रहे हैं. सरकारों को पैसे की जरूरत है. पैसे कहां से आएंगे? जनता से ही आएंगे. हर बार ऐसा ही होता है. जब भी संकट आता है, सरकार जनता से पैसे लेती है. चाहे वो दान की शक्ल में हो या फिर टैक्स कलेक्शन के नाम पर हो. जनता से पैसे उगाहने के बाद सरकार उस पैसे का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के हवाले कर देती है. इतना ही नहीं जनता ने जहां-जहां पैसा निवेश करके रखा होता है, सरकार उस पैसे को भी पूंजीपतियों को दे देती है. पूंजीपति जनता के पैसे का एक हिस्सा दबा कर अपने पास रख लेते हैं. दूसरे खातों में साइफनऑफ कर देते हैं. बाकी पैसे काम धंधे में लगा देते हैं. फिर जनता के एक तबके को रोजगार के नाम पर थोड़े-थोड़े पैसे मिलने लगते हैं. सेठ उनके श्रम से मुनाफा कमाने लगते हैं और सरकार को उसका हिस्सा देने लगते हैं. जनता को उसके श्रम की जो भी कीमत मिलती है, उसमें से वो एक हिस्सा आड़े वक्त के लिए बचाकर रखती है. मगर विडंबना देखिए जब भी संकट आता है, उसकी पूंजी घट जाती है. चाहे उसने वो पैसे जमीन में लगाए हों, प्रोपर्टी बाजार में लगाए हों या शेयर बाजार में लगाए हों. सबकुछ घट जाता है. उनके अलावा पीएफ के तौर पर या नकदी और गहने के तौर पर जो कुछ भी होता है, सरकार धीमे-धीमे उनसे वह भी बिकवा देती है. मतलब आम लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता. वो पहले से अधिक गुलाम हो जाते हैं. इन आम लोगों का वो तबका जो सबसे निचली पायदान पर है, उसके लिए तो संकट और भी बड़ा है. उसके पास अपने श्रम के अलावा कुछ शेष नहीं होता. वो हर रोज मेहनत करके जो दो-चार सौ रुपये कमाता है, सरकार और शराब के व्यापारी उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खींच लेते हैं. सोख लेते हैं. वो शराब पीता है. घर में मारपीट करता है. घर में मारपीट मध्य वर्ग के लोग भी करते हैं. और घर में कोई भी मारपीट करे, बच्चों के दूध और किताबों के पैसे की दारू पी जाए, दवा के पैसे की दारू पी जाए… सरकार को इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता है. उसे बस पूंजी चाहिए. वो चाहे कैसे भी आए. गौर से देखिएगा तो लगेगा कि इस दौर की सरकारों ने अपना हाल “सड़क” फिल्म की “महारानी” है और “अग्निपथ” फिल्म के “रऊफ लाला” जैसा बना लिया है. इन सरकारों का मकसद बस पैसे कमाना है, चाहे पैसे जनता को कोठे पर बिठा कर मिलें या फिर ठेके पर बिठा कर मिलें. और ऐसा करने के बाद भी ये निकम्मी और क्रूर सरकारें नैतिकता का ढोल पीट सकती हैं. ये बेशर्म और वहशी नेता नैतिकता का ढोल पीट सकते हैं. और हां, सरकार किसी की भी हो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. गांधी का नाम लेने वाले और राम का नाम लेने वाले – इस मामले में दोनों एक हैं. पूरे नंगे.   (जिन्होंने भी अपने प्रदेश में ठेके बंद रखने का फैसला लिया है, उन सभी को मेरा सलाम।)

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,Independent journalist, Rizwana Tabassum ,commits suicide

यह खबर मेरे लिए ज़िन्दगी की अनबूझ पहेली है…. स्वतंत्र पत्रकार रिजवाना तबस्सुम नहीं रही। अभी एशिया विल के संवाददाता विकास कुमार से इस घटना की जानकारी हो सकी….उनकी पोस्ट में जो कारण है वह ज़िक्र नहीं करूंगा लेकिन बीते रविवार 3 मई को ही तो मेरी इनसे बात हुई थी फोन व व्हाट्सएप पर….बाँदा में तिंदवारी तहसील के भिरौड़ा गांव में दो दिन पहले हार्ट अटैक से किसान की मृत्य पर खबर को लेकर। हाल ही गत सप्ताह इन्होंने बाँदा से 19 फर्जी तब्लीगी जमाती मस्ज़िद से पकड़ने को लेकर भी रिपोर्ट लिखी थी। विकास भाई कहिये यह झूठ है जो आप पोस्ट किए ,कहिये झूठ है यह अविश्वसनीय हैं मेरे लिए। रिजवाना जो कुछ देश मे घटित हो रहा है उससे आहत ज़रूर थी पर इतनी अवसाद में नही थी। कल ही जब मैंने व्हाट्सएप पर बात की तो चलते हुए उनके खुशी के संकेत पर उन्होंने रोजा में होने की बात भी बतलाई थी। क्या हो गया है ये अविश्वसनीय और हृदयविदारक घटना है रिजवाना ने खुदकुशी कर ली! हमारे आसपास जैसा वातावरण बन चुका है व्यक्ति के अंतस को समझकर भी समझ पाना बेहद मुश्किल हो चुका है लेकिन यह भयावह और कोलाहल भरा माहौल है। रिजवाना तबस्सुम द वायर,जनज्वार और भी अन्य वेबसाइट के लिए बेबाकी से लिखती रही है गौरतलब है यह बुंदेलखंड से प्रसारित खबर लहरिया की पत्रकारिता भी करती रही है। आज सुबह रिजवाना नहीं रही….आत्महत्या कर लिया!   यह कैसा रमजान का रोजा था रिजवाना?

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal,How easy, Irfan, Ajay Brahmatmaj

लॉकडाउन में 39 दिन से लगातार राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव पेज से साहित्यिक और वैचारिक चर्चाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी सिलसिले में गुरुवार का दिन वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी, लेखक रेखा सेठी, फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और इतिहासकार पुष्पेश पंत के सानिध्य में व्यतीत हुआ। राजकमल प्रकाशन समूह के आभासी मंच से ‘हासिल-बेहासिल से परे : इरफ़ान एक इंसान’ सत्र में इरफ़ान के व्यक्तित्व और फ़िल्मों से जुड़े कई किस्से साझा किए फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने। 29 अप्रैल की सुबह इरफ़ान ख़ान हमें छोड़ कर चले गए लेकिन उनकी याद हमारे साथ, हमारे मानस में अमिट है। फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान को याद करते हुए फ़ेसबुक लाइव के मंच से बताया कि “मुझे हमेशा लगता रहा है कि इरफ़ान हिन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री में मिसफिट थे। लेकिन, उन्हें यह भी पता था कि फ़िल्में ही ऐसा माध्यम है जो उनकी अभिव्यक्ति को एक विस्तार और गहराई दे सकता था इसलिए वे लगातार फ़िल्में करते रहे।“ इरफ़ान के जीवन की सरलता और सहजता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “ज़िन्दगी की छोटी चीज़ों का उन्हें बहुत शौक था। पतंगबाज़ी करना और खाने का शोक उन्हें नए व्यंजनों की ओर आकर्षित करता था। उन्हें खेती करना बहुत पसंद था। जब भी उन्हें समय मिलता तो वे शहर छोड़कर गाँव चले जाते थे।“ साहित्य के साथ इरफ़ान के रिश्ते को इसी से आंका जाता सकता है कि उनकी बहुत सारी फ़िल्में साहित्यिक रचनाओं पर आधारित हैं। इस विषय पर अपनी बात रखते हुए अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “थियेटर की पृष्ठभूमि से आने वाले इरफ़ान के जीवन में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान था। कई ऐसी साहित्यिक रचनाएं हैं जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी और वे चाहते थे कि कोई इसपर फ़िल्म बनाएं। वे खुशी से इन फ़िल्मों में काम करना पसंद करते। उदय प्रकाश उनके सबसे पसंदीदा लेखकों में से थे। उनकी रचनाओं के नाट्य रूपांतरण में उन्होंने काम भी किया था।“ इरफ़ान अपनी फ़िल्मों के किरदार पर बहुत मेहनत करते थे। पान सिंह तोमर, अशोक गांगूली या इलाहाबाद के छात्र नेता का किरदार, यह सभी इस बात का प्रमाण है कि वे अपने दर्शकों को उस स्थान की प्रमाणिकता से अभिभूत कर देते थे। अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि, “इरफ़ान के जीवन में उनकी पत्नी सुतपा का रोल बहुत महत्वपूर्ण है। एनएसडी के समय से दोनों दोस्त थे और सुतपा ने राजस्थान की मिट्टी से गढ़े इरफ़ान के व्यक्तित्व को निखारने और संवारने में अपना बहुत कुछ अर्पित किया है।“ अलगाव की स्थिति स्थाई नहीं होनी चाहिए – अशोक वाजपेयी अप्रैल का महीना समाप्त होने वाला है। 40 दिन से भी अधिक दिनों से हम एकांतवास में हैं। लेकिन आभासी दुनिया के जरिए हम दूसरे से जुड़े हुए हैं। गुरुवार की शाम राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने लोगों के साथ एकांतवास में जीवन एवं लॉकडाउन के बाद के समय की चिंताओं पर अपने विचार व्यक्त किए। आभासी दुनिया के मंच से जुड़कर अशोक वाजपेयी ने कहा, “इन दिनों इतना एकांत है कि कविता लिखना भी कठिन लगता हैं। हालांकि यह एक रास्ता भी है इस एकांत को किसी तरह सहने का। यही मानकार मैंने कुछ कविताएं लिखीं हैं।“ अशोक वाजपेयी ने कहा कि यह कविताएं लाचार एकांत में लिखी गई नोटबुक है। लाइव सेशन में उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया– “घरों पर दरवाज़ों पर कोई दस्तक नहीं देता / पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता/ अथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य/ हलके से हठियाता है / हर दरवाज़े हर खिड़की को / मंगल आघात पृथ्वी का/ इस समय यकायक / बहुत सारी जगह है खुली और खाली/ पर जगह नहीं है संग-साथ की/ मेल-जोल की/ बहस और शोर की / पर फिर भी जगह है/ शब्द की/ कविता की/ मंगलवाचन की…” लॉकडाउन का हमारे साहित्य और ललित कलाओं पर किस तरह का और कितना असर होगा इसपर अपने मत व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कि श्रोता या दर्शक संगीत या नृत्य कला की रचना प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। लेकिन, आने वाले समय में अगर यह बदल गया तो यह कलाएं कैसे अपने को विकसित करेंगी? साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि, वो बिना कार्यक्रमों के जीवन यापन कैसे करेंगी? उनके लिए आर्थिक मॉडल विकसित कर उन्हें सहायता देना हमारी जिम्मेदारी है। जरूरत है इस संबंध में एकजुट विचार के क्रियान्वयन की। साहित्य में भी ई-बुक्स का चलन बढ़ सकता है।“ उन्होंने यह भी कहा, “कोरोना महामारी ने सामाजिकता की नई परिभाषा को विकसित किया है। लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन महामारी का यह असामान्य समय व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के संबंध को नई तरह से देखेगा। जब हम एक दूसरे से दूर- दूर रहेंगे, एक दूसरे को बीमारी के कारण की तरह देखने लगेंगे…तो दरार की संभावनाएं बढ़ जाएगीं। यह भय का माहौल पैदा करेगा। हमारा सामाजिक जीवन इससे बहुत प्रभावित होगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह अलगाव स्थायी न हो।“ लॉकडाउन है लेकिन हमारी ज़ुबानों पर ताला नहीं लगा है। इसलिए हमें अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का पूरा उपयोग करना चाहिए। हम, इस समय के गवाह हैं। साहित्यिक विमर्श के कार्यक्रम के तहत राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के मंच से रेखा सेठी ने स्त्री कविता पर बातचीत की। लाइव जुड़कर बहुत ही विस्तृत रूप में स्त्रियों पर आधारित कविताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि, “स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता की कविताएं सिर्फ़ स्त्रियों ने नहीं लिखे हैं, बल्कि हिन्दी साहित्य में बहुत ऐसे कवि हैं जिन्होंने हाशिए पर खड़ी स्त्री को अपनी कविता का केन्द्र बनाया है।“ उन्होंने बातचीत में कहा कि “जब स्त्रियों ने अपने मानक को बदलकर अपने आप को पुरूष की नज़र से नहीं, एक स्त्री की नज़र से देखना शुरू किया, अपनी बात को संप्रेषित करना शुरू किया तो वहीं बदलाव की नई नींव पड़ी।“   स्त्री कविता पर रेखा सेठी की दो महत्वपूर्ण किताब – स्त्री कविता: पक्ष और परिपेक्ष्य तथा स्त्री कविता: पहचान औऱ द्वन्द राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

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Dakhal News 5 May 2020


bhopal, Corona tragedy is over, Sir Ration is over. Ask for money from home

वाराणसी। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में लाकडाउन में राशन खत्म होने से परेशान छात्र ने जब प्रशासन के सक्षम अधिकारी को फोन करके कहा कि सर राशन खत्म हो गया है तो जवाब मिला घर से पैसे मंगा लो। यही नहीं, अधिकारी ने कहा कि सभी को मदद करना संभव नहीं है, केवल 1 फीसदी लोगों को मदद करने के लिए ही योजना है। छात्र ने कहा कुछ कीजिए सर हमे घर ही भिजवा दीजिए तो फोन काट दिया गया। दरअसल लाकडाउन के चलते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान संस्थान के छात्र रोशन पाण्डेय, विवेक उपाध्याय, सूर्यकान्त द्विवेदी और उनके साथी बनारस में ही फंस गए हैं। मूलतः बिहार के विभिन्न जिलों के निवासी इन छात्रों का कहना है कि उनके पास रखा अनाज पिछले एक महीने से जारी लाक डाउन के चलते खत्म हो गया है, पैसे की भी दिक्कत है। ऐसे में पिछले चार दिनों से वो जिला प्रशासन के अधिकारियों से सम्पर्क कर रहे हैं लेकिन उन्हें आगे का मोबाइल नंबर थमा कर टाला जा रहा है। उनकी समस्या को बाईपास किया जा रहा है। फोन करने पर फोन तक नहीं उठाया जा रहा है। आज खाद्य आपूर्ति विभाग के एक अधिकारी से जब उन्होंने मोबाइल से बात कर खाने में आ रही तकलीफ़ का जिक्र किया तो अधिकारी महोदय ने घर से पैसे मंगवाने की सलाह दे डाली। छात्रों का कहना है उन्हें तुंरत मदद की ज़रूरत है। प्रशासनिक अधिकारियों के रवैए से नाराज़ छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ट्वीट कर अपनी समस्या से अवगत कराया है।   बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, A train departed silently 1225 workers returning to their country

जिस वक्त यह खबर भड़ास4मीडिया पर अपलोड हो रही है, 1225 यात्रियों को लेकर एक स्पेशल ट्रेन पटरियों पर धड़ाधड़ दौड़ रही होगी. ये ट्रेन आज सुबह पांच बजे लिंगमपल्ली से चली है और रात ग्यारह बजे हटिया पहुंच जाएगी. इस ट्रेन का संचालन इस कदर गोपनीय रखा गया कि ट्रेन के टीटी को कल रात बारह बजे यानि ट्रेन चलते से ठीक पांच घंटे पहले बताया गया कि आपकी इस ट्रेन में ड्यूटी है, समय से पहुंच जाएं. इस स्पेशल ट्रेन का नंबर है 02704. बताया जाता है कि तेलंगाना सरकार के अनुरोध पर और रेल मंत्रालय के निर्देशानुसार लिंगमपल्ली (हैदराबाद) से हटिया (झारखंड) तक ये विशेष ट्रेन चलाई गई. ये स्पेशल ट्रेन गिस लिंगमपल्ली स्टेशन से चली है, वह सिकंदराबाद में पड़ता है. सिंकदराबाद आंध्रप्रदेश में है. इस ट्रेन के जरिए मजदूरों को उनके होम टाउन भेजा जा रहा है. इस ट्रेन के संचालन को लेकर जो सरकुलर जारी हुआ वह भड़ास के पास है. इसे नीचे दिया जा रहा है. इस ट्रेन के कुछ वीडियो फुटेज भी भड़ास के पास है जिसे आप नीचे देख सकते हैं.   इन 1225 मजदूरों के लिए आज मजदूर दिवस वाकई सुखद और ऐतिहासिक रहा. ये लोग आज के एक मई को कभी न भूलेंगे.

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Dakhal News 1 May 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Buddha ,most powerful man,world ,during the times, Mahaapada

मानवता का दुर्भाग्य है कि शताब्दियों में कभी एक बार आने वाली महाआपदा के काल में एक बौड़म दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है! जब Action का समय था, तब शेखी बघार रहे थे, चीनी वायरस-वुहान वायरस करके चीनियों का मजाक उड़ा रहे थे, नमस्ते ट्रम्प में व्यस्त थे, और अब जब अमेरिका में लाशों का अम्बार लगने लगा है, इनके हाथ-पैर फूल गए हैं, इस सनकी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है! रोज पागलपनभरे बयान आ रहे हैं। ताज़ा बयान में इन्होंने फरमाया है कि अगर disinfectant जैसे डेटॉल, साबुन, डिटर्जेंट आदि से कोरोना मर रहा है, तो सभी मरीजों को इनका इंजेक्शन लगा दिया जाँय! इनके बयान से घबड़ाये डेटॉल (Lyson &Dettol) के मालिक/प्रवक्ता Reckitt Benckiser ने तुरंत बयान जारी कर कड़ी चेतावनी दिया कि किसी भी हाल में डेटॉल का इंजेक्शन किसी भी मरीज को न दिया जाय। यह घातक है! दरअसल, अमेरिका में मौत का तांडव जारी है, उधर ताकतवर कारपोरेट लॉबी का लॉकडाउन खोलने का आत्मघाती दबाव है और इधर राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इसमें भयभीत अमेरिकी जनता को दिलासा दिलाने, भटकाने, अच्छे दिन की उम्मीद जगाने के लिए ट्रम्प जादू की छड़ी की तलाश में हैं! कल उन्होंने और एक नायाब नमूना पेश किया, “लोग धूप का आनंद लें। इसका फायदा होता है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। यह बस एक सुझाव है, from a brilliant lab, by a very very smart, perhaps brilliant man!” वैज्ञानिकों ने यह जरूर बताया है कि वातावरण में, धूप में वायरस कुछ घंटो मैं मर जाता है लेकिन मानव शरीर में जो वायरस है, उसका इस sun therapy से क्या लेना देना ? आप चाहें तो ट्रम्प के इन नायाब नुस्खों की तुलना गोमूत्र चिकित्सा या ताली-थाली, go Korona go से कर सकते हैं! आइए, अब अपने देश में कोरोना से निपटने के सबसे सफल मॉडल को लेकर चर्चा कर लें। मुझे केरल के अपने भाई-बहनों से ईर्ष्या होती है! काश भारत केरल का ही विस्तार होता, शैलजा टीचर हमारी स्वास्थ्यमंत्री और …. केरल आज पूरी दुनिया में चर्चा में है । ग्लोबल एक्सपर्ट्स, मीडिया, बुद्धिजीवी केरल के अनुभव से सबको सीखने की सलाह दे रहे हैं। केरल जहां भारत में सबसे पहले कोरोना ने दस्तक दी, जहां एक समय Covid19 के सबसे ज्यादा मामले थे, ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वहां मात्र 1 नया मामला आया है, कुल 3 मौत हुई है, मात्र 138 मरीज हैं, 255 लोग ठीक हो चुके हैं विशेषज्ञों की तकनीकी भाषा में महामारी का curve वहां flatten हो गया है! जब‌कि, बाकी पूरे देश में कोरोना कहर बरपा कर रहा है। उधर केरल अब लॉकडाउन के संभावित खात्मे के बाद के दौर के लिए तैयारियों के अगले चरण की ओर बढ़ चुका है। जबकि, केरल देश के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में है, जो high international mobility वाला राज्य है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है जहां से सम्भवतः आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों समेत विदेशों में माइग्रेंट लेबर है, चीन समेत दुनिया के तमाम देशों में पढ़ाई और नौकरियां करता है। उक्त सब कारकों के सम्मिलित प्रभाव से केरल को कोरोना के सबसे बदतरीन शिकार Hotspots में होना चाहिए था। लेकिन हो रहा है ठीक उलटा, केरल हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरा है । प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में इशारे इशारे में यह जताते हैं कि हमारे पास पश्चिम के समृद्ध देशों जैसे संसाधन नहीं हैं, फिर भी हम इतना कर रहे हैं, वे अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे अमेरिका, यूरोप से भारत की तुलना करते हैं। आखिर केरल जो हमारे ही देश का एक राज्य है जिससे सीखने की बात पूरी दुनिया में हो रही है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उससे सीखने की बात वे क्यों नहीं करते? आज Experts की राय में हमारे लिए complacency का कोई कारण नहीं है। पूरी दुनिया भारत की आबादी, जनसंख्या घनत्व, गरीबों की जीवन-स्थितियों, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, कोरोना के अत्यंत सीमित टेस्ट, यहां चल रहे नफरती सामाजिक-राजनीतिक एजेंडा आदि के मद्देनजर भारत को लेकर आशंकित और ख़ौफ़ज़दा है। महासंकट की इस घड़ी में क्या देश केरल मॉडल से सीखेगा? भारी विविधतापूर्ण समाज(जहां लगभग आधी आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है-25% मुस्लिम, 20% ईसाई आबादी सहित सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी) की चट्टानी एकता और सामाजिक सौहार्द के साथ, अपनी शिक्षित मानवीय संपदा-नागरिक समाज, विकेन्द्रित लोकतांत्रिक राजनैतिक-प्रशासनिक मशीनरी, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और दूरदर्शी, चुस्त-दुरुस्त, समय रहते सटीक पहल लेते जवाबदेह नेतृत्व के बल पर केरल ने आज यह चमत्कार किया है! यही भारत के लिए उम्मीद की किरण है!   लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, this period,retrenchment, your job is left , media

कैसे मीडिया इंडस्ट्री के लिए काल बना कोरोना वायरस – पार्ट (2) पिछली पोस्ट पर जो भी प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उनमें से सिर्फ दो जिक्र लायक हैं. पहली प्रतिक्रिया में किसी ने कहा है कि सभी सेक्टरों का हाल ऐसा ही है. दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया एक मझौले अखबार के संपादक महोदय की है. उन्होंने मीडियाकर्मियों की मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति के लिए बड़े मीडिया संस्थानों को जिम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक यह नैतिक भ्रष्टाचार का मसला है. हर साल सैकड़ों करोड़ का मुनाफा कमाने वाले मीडिया संस्थान क्या दो-तीन महीने भी अपने कर्मचारियों का ख्याल नहीं रख सकते? वो चाहते तो अपने कर्मचारियों का ख्याल रख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने की जगह अवसर का फायदा उठना सही समझा. वो खर्च कम करने के लिए छंटनी कर रहे हैं. वेतन में कटौती कर रहे हैं और लोगों को छुट्टियों पर भेज रहे हैं. पहली प्रतिक्रिया, जिसमें कहा गया है कि सभी उद्योग धंधे संकट से जूझ रहे हैं, इस दौर की एक कड़वी सच्चाई है. पिछले पोस्ट में मैंने इसका जिक्र किया था कि इस साल देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ निगेटिव रहने का अनुमान है. इस सीरीज में हम मीडिया पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए मोटे तौर पर बात इसी पर केंद्रित रखेंगे. लेकिन जब भी जरूरत महसूस होगी हम अर्थव्यवस्था के कुछ बुनियादी बदलावों की चर्चा भी करते रहेंगे. जहां तक संपादक महोदय की प्रतिक्रिया का सवाल है, वह एक आधी-अधूरी सच्चाई है. मसला इतना सीधा-सपाट नहीं हैं. चुनौती वाकई बड़ी है. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मीडिया इंडस्ट्री बीते कुछ साल से संकट से जूझ रही थी. नोटबंदी और आर्थिक मंदी की वजह से उसका मुनाफा पहले ही घटा हुआ था. लिहाजा संपादक जी की प्रतिक्रिया पर भी हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी मीडिया इंडस्ट्री में कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति पर गौर कर लेते हैं. उसके लिए सबसे पहले देश और दुनिया में मीडियाकर्मियों की छंटनी और वेतन कटौती से जुड़ी कुछ बड़ी घोषणाओं पर एक सरसरी नजर डालते हैं. पश्चिमी देश: 1) दुनिया के सबसे ताकतवर मीडिया समूह में से एक – डिजनी के चोटी के अधिकारियों ने 20-50 प्रतिशत तक वेतन कटौती का फैसला लिया. यह बड़ा फैसला है. 2) फॉक्स न्यूज को नियंत्रित करने वाली कंपनी फॉक्स कॉर्प ने 700 एक्जीक्यूटिव्स की तनख्वाह में कम से कम 15 प्रतिशत की कटौती की है. ऊपर के पदों पर यह कटौती और भी ज्यादा है. 3) लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स के सीईओ ने 30 प्रतिशत का सेलेरी कट लिया है. बोर्ड अफसरों की वेतन में 20 प्रतिशत कटौती हुई है. जबकि मैनेजर और संपादकों के वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती की गई है. 4) फॉर्चून मैगजीन ने 35 कर्मचारियों की छंटनी की है. सीईओ का वेतन 50 प्रतिशत कटा है. बाकी कर्मचारियों की तनख्वाह 30 प्रतिशत घटायी गई है. 5) ब्रिटेन के टेलीग्राफ मीडिया ग्रुप ने गैर संपादकीय विभाग के कर्मचारियों के काम का दिन घटा दिया है. अब उन्हें सप्ताह में सिर्फ 4 दिन का ही रोजगार मिलेगा. लिहाजा उनका वेतन 20 प्रतिशत काट दिया गया है. ये विकसित देशों के कुछ बड़े और सम्मानित मीडिया संस्थानों की मौजूदा स्थिति है. खबरों के मुताबिक ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या बहुत ज्यादा है जिन्होंने छंटनी की है, कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजा है या फिर वेतन में कटौती की है. कुछ संस्थानों ने इनमें से दो या फिर सभी तीन कदम उठाए हैं. ये शुरुआती आंकड़े हैं. विस्तृत लिस्ट के लिए आप इन दो लिंक्स में से किसी एक पर क्लिक कर सकते हैं: https://www.forbes.com/sites/noahkirsch/2020/04/06/tracker-media-layoffs-furloughs-and-pay-cuts/ भारत: 1) देश में सच्ची पत्रकारिता की मशाल जिंदा रखने का दावा इंडियन एक्सप्रेस समूह करता है. ये समूह हर साल लाखों रुपये गोयनका अवार्ड के नाम पर बांटता है. इस समूह ने वेतन कटौती का फैसला सबसे पहले लिया. यहां अस्थाई तौर पर कर्मचारियों के वेतन में 10 से 30 प्रतिशत की कटौती की गई है. 2) देश का सबसे बड़ा और ताकतवर अंग्रेजी मीडिया समूह टाइम्स ऑफ इंडिया है. विज्ञापन और अन्य तरीकों से इसको जितने पैसे मिलते हैं, उतना पैसा कोई और मीडिया समूह नहीं कमाता है. इस समूह ने अपनी संडे मैगजीन के सभी कर्मचारियों को एक झटके में नौकरी से निकाल दिया. जैसे वो कर्मचारी नहीं शत्रु हों. बाकी जगह भी कटौती का प्रस्ताव है. 3) हिंदुस्तान टाइम्स के टॉप मैनेजमेंट ने खुद ही 25 प्रतिशत वेतन कटौती का प्रस्ताव दिया है. 4) एनडीटीवी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में 10 से 40 प्रतिशत तक की कटौती का फैसला लिया है. ये स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनी है, इसलिए इसे अपने फैसलों के बारे में सेबी को बताना होता है. सेबी को कंपनी ने बताया है कि यह फैसला पहले क्वार्टर के लिए है. उसके बाद इस पर फिर से विचार होगा. 5) मीडिया ग्रुप क्विंट तो इस समय वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. उसने अपने आधे कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया है. 50 हजार से ऊपर जिनकी भी तनख्वाह है उसमें 50 प्रतिशत की कटौती की है. लेकिन इसमें एक ख्याल रखा गया है कि 50 हजार से ऊपर की तनख्वाह वालों को कटौती के बाद भी कम से कम 50 हजार रुपये मिलते रहें. दो लाख रुपये से ऊपर वेतन वाले सभी कर्मचारियों को उनकी सीटूसी का सिर्फ 25 प्रतिशत ही भुगतान होगा. यह फैसला हालात सामान्य होने पर वापस ले लिया जाएगा. 6) न्यूज नेशन ने अपनी अंग्रेजी वेबसाइट पर तैनात 16 कर्मचारियों की पूरी टीम को एक झटके में विदा कर दिया है. वहां अन्य भी जगह पर छंटनी और कटौती की तलवार लटक रही है. 7) इंडिया न्यूज समूह में बीते कई महीने से कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिल रही थी. यह हाल कोरोना वायरस से पहले का था. अब वहां क्या होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. 8) पत्रिका समूह ने अपने यहां पर कर्मचारियों की तनख्वाह ही रोक दी है. एक खबर के मुताबिक सभी को सिर्फ 15-15 हजार रुपये का ही भुगतान किया गया. 9) हरिभूमि अखबार में 30 प्रतिशत तक कटौती की गई है. अधिक जानकारी के लिए आप इन लिंक्स पर क्लिक कर सकते हैं: https://www.exchange4media.com/coronavirus-news/media-houses-sanction-layoffs-pay-cuts-amid-covid-19-crisis-103948.html https://www.coverageindia.com/2020/04/30-50.html ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले जानते हैं कि कोई भी संस्थान ऐसा नहीं है जो अछूता है. सभी जगह से छंटनी, छुट्टी पर भेजे जाने और वेतन कटौती की खबरें आ रही हैं. जिनकी नौकरियां बची हैं, उन्हें यह अहसास कराया जा रहा है कि वो खुशकिस्मत हैं. इसलिए ज्यादा चू-चपड़ नहीं करें, वरना उन्हें भी छांटा जा सकता है. कुछ मीडिया संस्थानों ने मार्च में ही ये फैसला लागू कर दिया है. कुछ इसे अप्रैल महीने से लागू कर रहे हैं. जो बचे हैं संकट जारी रहा तो वो भी ऐसा करने पर मजबूर हो जाएंगे. ज्यादातार मीडिया संस्थान इसे अस्थाई निर्णय बता रहे हैं. मगर कुछ ने ऐसा कोई इशारा नहीं किया है. मतलब वहां यह फैसला स्थाई भी हो सकता है. अतीत में ऐसे कई उदाहरण हमारे पास मौजूद हैं. कुछ बुनियादी सवाल- आखिर मीडिया कंपनियां वेतन कटौती और छंटनी क्यों कर रही हैं? जैसा कि एक मझौले अखबार के संपादक ने कहा है… क्या ये महज नैतिक भ्रष्टाचार का मामला है? या फिर संकट सच में बड़ा है? और संकट बड़ा है तो कितना बड़ा है? इससे मीडिया की संरचना पर क्या फर्क पड़ेगा? मीडिया के कौन-कौन से धड़े सबसे अधिक प्रभावित होंगे? मतलब प्रिंट, टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया में किस-किस तरह के बदलाव होंगे? इससे मीडिया की आजादी पर क्या असर पड़ेगा? पत्रकारों की स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा? मीडिया पर स्टेट कंट्रोल बढ़ेगा या घटेगा? स्टेट कंट्रोल का अर्थ क्या है? कॉरपोरेट-पॉलिटिकल नेक्सस किस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी (फ्रीडम ऑफ स्पीच) नियंत्रित करता है? जब भी कोई मंदी या आर्थिक रुकावट आती है तो उससे मीडिया और पत्रकारों की आजादी पर किस तरह का फर्क पड़ता है? ये कुछ बुनियादी सवाल हैं. इन सवालों पर हम आने वाले दिनों में एक के बाद एक चर्चा करेंगे. लेकिन इन बुनियादी सवालों पर चर्चा करने के साथ हम कुछ और सवालों पर भी चर्चा करेंगे. मसलन इन बदलावों से मीडिया के फ्रंट लाइन पर किस तरह का असर होगा? वो पत्रकार जो जमीन पर काम कर रहे हैं, अपनी जान दांव पर लगा कर काम कर रहे हैं, उनकी सेहत पर कितना असर पड़ेगा? वो पत्रकार जो ईमानदार हैं और किसी तरह दो जून की रोटी कमा रहे हैं, वो कैसे जिंदा रहेंगे और अपनी जिम्मेदारियां को पूरा करेंगे? यहां एक बात हम सभी को ध्यान रखनी चाहिए कि आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलेगा. कोरोना वायरस का कहर जब थमेगा तो दुनिया पहले जैसे नहीं रहेगी. हम और हमारी दुनिया सीखेगी, उदार होगी इसकी संभावना कम है. आशंका ज्यादा इस बात है कि जो अधिकार, जो आजादी लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई थी, वो अधिकार छीने जा सकते हैं, वो आजादी कम हो सकती है. यह एक बहुत बड़ा सच है कि जो आर्थिक तौर पर गुलाम है, वो सियासी तौर पर आजाद नहीं हो सकता. और हमारे यहां मीडिया को ठीक उसी तरह विकसित किया गया, जैसे किसी गुलाम को खिला-पिला कर किसी युद्ध के लिए तैयार किया जाता है. (जारी) एनडीटीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे बेबाक पत्रकार समरेंद्र सिंह का विश्लेषण! 

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, How Corona Virus Part 1 Called for Media Industry

समरेंद्र सिंह किसी भी व्यवस्था में पूंजी का खास महत्व होता है, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में इसका महत्व अत्याधिक है. अमेरिकी प्रोफेसर डेविड हार्वे के मुताबिक जिस प्रकार हमारे शरीर को संचालित करने के लिए खून का संतुलित और निरंतर प्रवाह जरूरी है, ठीक वैसे ही पूंजीवादी व्यवस्था में “पूंजी का प्रवाह” महत्वपूर्ण है. पूंजी का प्रवाह जब भी रुकता है, व्यवस्था चरमराने लगती है. कोविड-19 ने ये प्रवाह बहुत हद तक रोक दिया है. पूरी दुनिया की व्यवस्था गड़बड़ा गई है. बड़ी-बड़ी कंपनियों की भी हालत खराब है. सब सरकार से पैकेज की आस लगाए बैठे हैं. यह हाल तो अभी का है. महामारी कुछ महीने और चली तो जो व्यवस्थाएं पूरी तरह पूंजीवादी हैं, वहां अराजक स्थिति हो सकती है. इसलिए दुनिया भर में इस पर शोध हो रहे हैं कि असर कितना होगा और दुनिया का सत्ता समीकरण किस हद तक परिवर्तित होगा. इसी सच्चाई को केंद्र में रख कर मैंने मीडिया पर यह सीरीज लिखने का फैसला लिया है. इसका मकसद जहां तक संभव हो सके सभी तथ्यों को एक जगह पर रखना है.ताकि जिसे ठीक लगे वो भविष्य में उनका इस्तेमाल कर सके. विश्व में मीडिया के दो मॉडल मौजूद हैं. सरकारी मीडिया और निजी क्षेत्र का मीडिया यानी स्वतंत्र मीडिया. कुछ दिन पहले मीडिया मोनेटाइजेशन पर हुए एक सेमीनार में किसी ने पूछा कि दूरदर्शन को कैसे मोनेटाइज किया जाए यानी ऐसा बना दिया जाए जिससे दूरदर्शन मुनाफा कमाने लगे? मैंने कहा कि दूरदर्शन को मोनेटाइज नहीं करना चाहिए. दूरदर्शन को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और उसके आर्थिक हितों का ख्याल सरकार को रखना चाहिए. हम सभी अपने श्रम से अर्जित धन का ज्यादातर हिस्सा बुनियादी जरूरतों पर खर्च करते हैं. सरकार से संदर्भ में भी यह बात लागू होती है. उसे तो टैक्स से होने वाली आमदनी को जनता और शासन की जरूरतों पर ही खर्च करना चाहिए. संवाद तंत्र, सूचना तंत्र किसी भी शासन तंत्र की एक बुनियादी जरूरत है. मोनेटाइज करने के लिए, मुनाफा कमाने के लिए या फिर स्वतंत्र संचालन योग्य पूंजी अर्जित करने के लिए सरकारी मीडिया को भी बाजार की शर्तों का पालन करना होगा. जब बाजार की शर्तों का पालन होगा तो सरकार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों से समझौता करना पड़ेगा. ऐसा करने से उसका चरित्र बदल जाएगा. चरित्र बदलने का अर्थ है कि उसका औचित्य खत्म हो जाएगा. उसकी सार्थकता खत्म हो जाएगी. जब चरित्र बदल जाए और सार्थकता खत्म हो जाए तो फिर होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. कोई भी सरकार अपना मीडिया तंत्र एक खास मकसद से विकसित करती है. यह सरकार के लिए जनता तक पहुंचने का महज जरिया मात्र नहीं है. यह सरकार का प्रोपैगेंडा तंत्र भी है. इसे समझने के लिए आपको मौजूदा समय पर गौर करना होगा. दूरदर्शन पर रामायण, रामायण उत्तरकथा, महाभारत, चाणक्य, हमलोग जैसे सीरियल यूं ही नहीं दिखाए जा रहे हैं. यह सरकारी प्रोपैगेंडा है. सरकार अपने मीडिया के जरिए अपनी जरूरत के मुताबिक जनता का मानस तैयार करती है. यही नहीं इसके माध्यम के यह अपने लोगों को संरक्षण देती है. उन्हें वो जमीन मुहैया कराती है जिससे वो उसके पक्ष में लड़ सकें. और जब तक सरकार का यह मकसद पूरा होता रहेगा, सरकारी मीडिया पर बहुत असर नहीं पड़ेगा. वहां तैनात लोग थोड़े-बहुत एडजस्टमेंट यानी समायोजन के बाद अपना काम करते रहेंगे. इसके उलट निजी क्षेत्र में मूल-चूल परिवर्तन होगा. लाखों लोग अभी ही बेरोजगार हो चुके हैं. लाखों और बेरोजगार होंगे. जब यह महामारी खत्म होगी तो हम देखेंगे कि बहुतेरे मीडिया संस्थान बंद हो चुके हैं. और जो बचेंगे उनकी भी कमर टूट चुकी होगी. इस समय सबसे खराब स्थिति पारंपरिक मीडिया संस्थानों की है. वहां हाहाकार मचा है. बीते डेढ़ महीने से सिनेमा सेक्टर में काम ठप है. फिल्म प्रोडक्शन बंद है. इवेंट्स बंद हैं. आउटडोर मीडिया का बाजार ठप्प पड़ा है. होर्डिंग, बैनर को कोई पूछ नहीं रहा. अखबारों की छपाई न के बराबर हो रही है. मीडियाकर्मी जान जोखिम में डालकर लोगों तक खबर पहुंचाने में जुटे हैं, लेकिन उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है. वो हर तरफ से मार झेल रहे हैं. जान भी संकट में है और आर्थिक तौर पर भी कमजोर हो रहे हैं. सच कहें तो खबरों के बाजार से जुड़े मीडियाकर्मियों के लिए तो यह एक डरावने सपने जैसा है और यह सपना अभी शुरू ही हुआ है. दूसरी तरफ न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या बढ़ गई है. आजतक जैसे चैनल 33 करोड़ दर्शक बटोरने का दावा कर रहे हैं. कॉमस्कोर डेटा के मुताबिक डिजिटल मीडिया पर अब 60 प्रतिशत ज्यादा दर्शक हैं. ये नंबर उत्साहित करने वाले हैं. हर कोई टीवी देख रहा है. मोबाइल स्क्रीन से चिपका हुआ है. ऑनलाइन गेम खेल रहा है. ओटीटी प्लैफॉर्म्स पर फिल्म या फिर सीरियल देख रहा है. खबर पढ़ रहा है. मतलब टीवी और ऑनलाइन माध्यमों पर हम सभी ज्यादा से ज्यादा समय बिता रहे हैं. सामान्य समय होता तो विज्ञापन बाजार के जुड़े लोगों के लिए इससे अधिक सुखद स्थिति कोई और नहीं हो सकती थी. लेकिन यह आपातकाल है. इतना दर्शक बटोरने के बाद भी रेवेन्यू गिर गया है. यह गिरावट मामूली नहीं है. 40-50 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है. ऐसा क्यों हुआ है – ये समझने के लिए आपको कोरोना वायरस की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को देखना होगा. दुनिया की तमाम रेटिंग और फंडिंग एजेंसियों ने जो आंकड़े दिए हैं उनके मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से इस साल भारत की अर्थव्यवस्था विकास दर 0.8 प्रतिशत तक गिर सकती है. साल की शुरुआत में आरबीआई ने 2020-21 वित्तीय वर्ष में 6 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया था, उसने बीते महीने इसे घटा कर 5.5 प्रतिशत कर दिया था. आईएमएफ ने 5.8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान घटा कर 1.9 प्रतिशत, विश्व बैंक ने 5 से 1.5 प्रतिशत, मूडी ने 5.4 से 2.5 और फिंच ने 5.6 से 0.8 प्रतिशत कर दिया है. 6 प्रतिशत ग्रोथ रेट की तुलना में 0.8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान डराता है. असली तस्वीर तीसरे क्वार्टर में उभरेगी. अगर यह लॉकडाउन मई के आखिर तक चला तो इस साल ग्रोथ निगेटिव हो सकती है. कुछ जानकारों के मुताबिक अगर सर्दियों में भी कोरोना वायरस का कहर जारी रहा तो 8-10 प्रतिशत निगेटिव ग्रोथ की आशंका है. रोजगार के लिहाज से यह एक खतरनाक स्थिति है. आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 1.2 करोड़ श्रमिक तैयार हो रहे हैं. जबकि सिर्फ 55 लाख रोजगार सृजन हो रहा है. यही नहीं शोध के मुताबिक भारतीय संदर्भ में 5 प्रतिशत ग्रोथ रेट के लिए अतिरिक्त वर्क फोर्स की जरूरत नहीं होती है. मतलब उससे कम ग्रोथ रहने पर रोजगार सृजन नहीं होता है. निगेटिव ग्रोथ का मतलब है कि इस साल जो वर्क फोर्स तैयार होगी, उसमें से चुनिंदा खुशकिस्मत लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी को काम नहीं मिलेगा और पिछले साल जितनी संख्या में लोग काम कर रहे थे, उस संख्या में भी गिरावट आ जाएगी. मतलब करोड़ों लोग बेरोजगार होंगे. इसके नतीजे बहुत बुरे होंगे. सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी. अपराध बढ़ेगा. तनाव बढ़ेगा तो मौत के आंकड़े बढ़ेंगे. मतलब नुकसान चौतरफा होगा. मीडिया इंडस्ट्री के लिए तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी. (… जारी)   एनडीटीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे बेबाक पत्रकार समरेंद्र सिंह का विश्लेषण! 

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Dakhal News 27 April 2020


bhopal, Humble tribute to two Delhi journalists

नई दिल्ली। वैश्विक महामारी करोना संक्रमण के इस लॉकडाउन की घड़ी में आज राष्ट्रीय राजधानी के पत्रकार बिरादरी से दो अत्यंत दुखद सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। वरिष्ठ हिंदी पत्रकार प्रमोद कुमार जी की पत्नी नीलिमा जी का निधन हुआ है। वह स्वयं भी यूनीवार्ता में पत्रकार थीं। उन्होंने अपने कैरियर के दौरान कई ब्रेकिंग खबरें अपने पत्रकारिता के जीवन में दी है। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रही थीं। दूसरी मृत्यु हिंदी दैनिक पंजाब केसरी से अपना कैरियर कैमरामैन के रूप में शुरू करने के बाद फ़ोकस न्यूज के संपादक के सम्मानित पद पर पहुंचे चंद्रशेखर अग्रवाल जी की हुई है। चंद्रशेखर जी एक होनहार पत्रकार थे और लगातार संसद से लेकर तमाम राजनीतिक गलियारों में उनका आना-जाना था। उनका हंसता मुस्कराता चेहरा बार-बार सामने आ रहा है। उन्होंने मेरे साथ लंबे समय तक कार्य किया था। चंद्रशेखर जी की उम्र अधिक नहीं थी। वह लगातार मधुमेह (शुंगर) की बीमारी से जूझ रहे थे और अंततः मधुमेह बहुत बढ़ जाने के कारण उनका निधन कल शाम को हो गया। ‘दिल्ली पत्रकार संघ’ दोनों पत्रकार साथियों के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सर्वविदित है कि कोरोना महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन के तहत अंत्येष्टि में सभी पत्रकारों का शामिल होना संभव नहीं था। बिहार का राष्ट्रीय राजधानी के तमाम पत्रकारों ने अपने शोक संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। इस दुख एवं शोक की घड़ी में ‘डीजेए’ के तमाम सदस्यों एवं पदाधिकारियों की ओर से महासचिव केपी मलिक ने उनके परिवार को सहानुभूति एवं संवेदनाएं अर्पित करते हुए भगवान से उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की। के पी मलिक महासचिव

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Dakhal News 25 April 2020


bhopal, Investigation report , 48 journalists, Lucknow ,corona positive

यूपी में लखनऊ के पत्रकारों के कोरोना टेस्ट का रुझान आना शुरू हो गया है। पहली लिस्ट में 48 पत्रकारों का नाम है जिसमें एक को छोड़ बाकी सबका रिजल्ट निगेटिव है। लिस्ट में एक पत्रकार का जांच नतीजा पॉज़िटिव आया है। बताया जा रहा कि जिनका टेस्ट रिजल्ट पॉजिटिव आया है वो पत्रकार नहीं बल्कि केबल ऑपरेटर हैं, यानि हैं मीडिया फील्ड से जुड़े ही।   देखें लिस्ट की एक झलक-

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Dakhal News 25 April 2020


bhopal,Supreme Court, bans ,Arnab

अर्नब गोस्वामी के ऊपर हुई सभी FIR में किसी भी तरह की कार्रवाई पर सुप्रीम शाखा ने फिलहाल 2 हफ्ते की रोक लगाई। कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी को अपनी अर्ज़ी में संशोधन कर सभी FIR को एक साथ जोड़े जाने की प्रार्थना करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि एक ही मामले की जांच कई जगह नहीं हो सकती।   सुप्रीम कोर्ट का आदेश अर्नब गोस्वामी को दो हफ़्ते का प्रोटेक्शननागपुर में दर्ज FIR के सिवा बाक़ी सभी पर स्टे अर्नब पर प्रोग्राम्स में किसी क़िस्म की रोक के सुप्रीम कोर्ट ख़िलाफ़ (प्रेस आजाद रहे , जस्टिस चंद्रचूड़) अर्नब निचली अदालतों में एंटीसिपेटरी बेल / प्रोटेक्शन ट्राई करें , जाँच में सहयोग करें महाराष्ट्र पुलिस अर्नब गोस्वामी के चैनल और स्टाफ़ की किसी संभावित हमले से सुरक्षा करें

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Dakhal News 25 April 2020


bhopal, attack is reprehensible, arnab , name of journalism , very shameful

Amitaabh Srivastava : रिपब्लिक चैनल के संपादक अरनब गोस्वामी पर हमला निंदनीय है। पिछले कुछ समय से पत्रकारिता के नाम पर वो जो कुछ भी कर रहे हैं, वह बहुत शर्मनाक है। अरनब गोस्वामी और उनके जैसे कुछ एंकर दरअसल पिछले कुछ समय से मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर स्वस्थ और स्वच्छ पत्रकारिता को कलंकित ही कर रहे हैं लेकिन उस सबका जवाब किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा नहीं हो सकती। अरनब ने पालघर में साधुओं की पीट-पीटकर हत्या के बाद अपने कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन पर हमला इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार को इस मामले में कड़ी जांच-पड़ताल और कार्रवाई करनी चाहिए। उम्मीद के मुताबिक बीजेपी और उसके समर्थक अरनब गोस्वामी के समर्थन में बोल रहे हैं और इस हमले की निंदा के बहाने कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं।   मेरी राय में कांग्रेस को भी बड़प्पन दिखाते हुए इस हमले की निंदा करनी चाहिए‌। अरनब गोस्वामी पत्रकारीय अभिव्यक्ति की आज़ादी के आदर्श नहीं है , न ही उन्हें इस हमले के बहाने हीरो बनने का मौक़ा देना चाहिए।   वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 23 April 2020


bhopal, Who will raise voice ,media persons , victims of lockdown

भारत के कनाडाई नागरिक अक्षय कुमार ने जब 25 करोड़ दान देने का एलान किया तो तुमने उन्हें सदी का सबसे बड़ा दानदाता घोषित किया। सिल्वर स्क्रीन के दबंग और बॉक्स ऑफिस के सुल्तान सलमान खान ने जब फिल्मनगरी के दिहाड़ी मजदूरों का पेट भरने की घोषणा की तो तुम्हारे शब्दों में सलमान से बड़ा कोई दलायु, कृपालु नहीं था। और जब कsssकsssकsss किंग यानी शाहरुख खान ने अपने ऑफिस को 14 दिनों के एकांतवासियों के लिए क्वारंटिन भवन बना दिया…तो तुम्हारे शब्दों में उसकी महिमा और भी शोभायमान हो गई। अमिताभ बच्चन की वीआर फैमिली के सदस्य बनने में भी तुम्हीं सबसे आगे थे। उद्योगपतियों की दानराशियों के आकर्षक ग्राफिक्स से लेकर, उनके ट्विट, वीडियो संदेश के बॉक्स आइटम बनाने में अपनी कल्पनाशीलता और ऊर्जा का उपयोग करने में तुमने ही सबसे अधिक पसीने बहाये। इसके बावजूद तुम बेगाने की शादी के अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे। क्योंकि तुम्हारी ड्यूटी थी, जैसेकि सीमा पर सैनिक, अस्पताल में डॉक्टर, चौराहे पर खाकीवर्दी या कि घर घर सिलेंडर और हरी सब्जियां पहुंचाने वालों ने रोजमर्रा की जिंदगी और ज़िद नहीं छोड़ी थी। इतना ही नहीं, अपने-अपने गांव, घर जाने के उतावले हुए सड़कों पर पैदल रेंगने वाले दिहाड़ी मिल्खा सिंहों के हुजूम को भी तुमने सदी का सबसे ‘रिच विजुअल’ समझा और उसे कभी लाइव काटा तो कभी म्यूजिक के साथ मोंटाज में सजाया तो कभी उस पर राष्ट्रीय बहसें कर लीं और तब तक लूप में चकरघिन्नी की तकह घुमाते रहे जब तक कि उसके बारे में सत्ताधारियों के अनमोल वचन नहीं आ गए। यकीन मानिये उतने पर भी तुम बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे। क्योंकि तुम्हारी कलम को खून के आंसू बहाने की लत है। तुम्हारे कलेजे को चट्टानी काया बनने का बड़ा शौक है। तुम्हारी फितरत को संवेदना से एकतरफा मोहब्बत करने की आदत है। याद करो तुमने ही चलाया न इस वक्त की सबसे बड़ी खबर है–प्रधानमंत्री ने कारोबारी जगत के स्वामियों से अपील की है कि कोरोना संकट को देखते हुए किसी कर्मचारी की सैलरी ना काटे। तुमने ही इस बयान को सत्तर साल का सबसे संवेदनशील बयान बताया था न! स्क्रीन पर दनादन चलाया था न! और तो और जब प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन के चलते किसी भी कर्मचारी की नौकरी ना जाये तो तुमने ही इसे सदी का सबसे मसीहाई स्टेटमेंट कहा था न! और सबके सब लट्टू हो गये थे। उत्साह इतना कि नौ मिनट के बदले नब्बे मिनट तक दीया जलाते रहे। जोश इतना कि ताली, थाली तो क्या बंदूक, पिस्तौल सब चलाने लगे। उन्होंने कहा लोग अपने अपने घरों में रहे लेकिन खून इतना खौला कि गली में जुलूस निकालने लगे। इन सब तस्वीरों को खूब चलाया न तुमने। यह दर्शाया न कि प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर इस देश की जनता को भी हनुमान जैसी भूली बिसरी ताकत याद आने लगती है। लेकिन क्या कभी फॉलोअप किया कि प्रधानमंत्री के सैलरी और नौकरी वाले बयान और अपील का किस-किस बिजनेस घराने ने पालन किया? क्या कभी इस मुद्दे पर बहस कराई कि जब प्रधानमंत्री समाज में सभी को मिलकर रहने की अपील करते हैं तो लोगों पर उसका असर क्यों नहीं होता है? क्यों तमाशा वाले बयान को भक्त जल्दी लपक लेते है और उनके सामाजिक सन्देश को गोलगप्पे की तरह उड़ा देते हैं। क्या कभी इस मुद्दे पर मेहमानों से बयानबाजी करवाई कि ताली, थाली के बदले बंदूक क्यों चलाई गई? क्या कभी इस सवाल की प्लेट को स्क्रीन पर फायर किया कि सरकार और रिजर्व बैंक के राहत एलान के बावजूद उद्योग, कारखाने के मालिक अपने-अपने कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं ले रहे? क्यों कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं? क्यों मालिक कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं? मैं जानता हूं इन सवालों को आप नहीं उठायेंगे। आप यह भी नहीं पूछेंगे कि जिस वक्त प्रधानसेवक लिट्टी चोखा खा रहे थे और और जब देश ट्रंपमय हो रहा था तब उसकी तस्वीर न्यूज मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में अवतारी पुरुष की तरह छाई हुई थी उस वक्त कोरोना किस किस देश में कितनी दहशत मचा रहा था और अपने देश में उससे बचाव के लिए क्या-क्या किया जा रहा था? आप कम से कम यह भी नहीं लिखेंगे कि होली से पहले ही देश में एक दिन का जनता कर्फ्यू क्यों नहीं लग जाना चाहिये था? और तो और यह कि जनता कर्फ्यू के एक दिन बाद ही संपूर्ण लॉकडाउन क्यों हो गया…? जब लॉकडाउन करना ही था तो जनता कर्फ्यू क्यों? आप के पास यह सवाल भी नहीं होगा कि ताली, थाली बचाने और दीया जलाने से देश को क्या मिला? जबकि आप इस तरह के सवालों पर पहले खूब बहसें करते रहे हैं। पीएम की अपीलों के बाद सिवाय अनुशासनहीनता की तस्वीरों और लाखों लाख की संख्या में वीडियो के आदान प्रदान के कारण इंटरनेट की फिजूल डेटाखर्ची के सिवा और क्या मिला? इन आयोजनों में दिखी अनुशासनहीनता की तस्वीरों को आप किस पंथ या संप्रदाय से जोड़ेंगे? मैं समझता हूं आप ये सब नहीं पूछेंगे क्योंकि जेनुइन सवाल को इन दिनों सरकार विरोधी माना जाता है। और सरकार विरोधी छवि होने पर दर्शक और पाठक कम होते हैं और विज्ञापन गिरने का खतरा बढ़ता है। खैर छोड़िये…ये सवाल बहुतों के लिए शायद छोटा मुंह बड़ी बात हो। लेकिन चलिये अपने बारे में या अपने हित को लेकर खुद से ही कुछ सवाल पूछ लीजिये। मीडिया जगत पढ़ा लिखा तबका है इसलिये यहां ‘दिहाड़ी मजदूर’ शब्द का इस्तेमाल शायद बहुत लोगों को अच्छा न लगे, उनके लिए चलिये ‘ठेका कर्मचारी’ कह लेते हैं। कोरोना के बाद हजारों की संख्या में पत्रकार बंधु घर से काम कर रहे हैं। लेकिन जो बेरोजगार हैं, किसी संस्थान से संबद्ध नहीं हैं…फ्रीलांस से घर चला रहे थे, क्या फिल्म इंडस्ट्री की तरह किसी संगठन या नामचीन हस्ती ने उनकी मदद के लिए एलान किया? जिस सरकार की योजनाओं और बयानों पर जान न्योछावर करते रहे, सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए प्रचार प्रसार करते रहे, उस सरकार की तरफ से किसी योजना या पैकेज का ऐलान हुआ? कितने बेरोजगार या फ्रीलांस पत्रकारों को मदद मिली? है कोई आंकड़ा? शायद नहीं। अपने रिसर्च विभाग को इस काम में लगाइए। जब तक कोई आंकड़ा निकले तब तक यह विचार कर लीजिए कि इस खबर को चलायेगा या छापेगा कौन? सोशल मीडिया पर भी लिखेंगे तो लोग आप ही को हिकारत की नज़रों से देखेंगे और दया भावना में कहेंगे – कितना ‘गिरा’ हुआ है? बहुत से लोग इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश भी करार देंगे और कन्नी काट लेंगे। लेकिन जो ‘उठे’ हुये हैं…चलिये उन्हीं के बारे में बात कर लेते हैं। मीडिया ने ही प्रधानमंत्री के उस बयान को प्रमुखता से चलाया न कि उन्होंने कारोबारी जगत से कहा है कि किसी की नौकरी न जाये! लेकिन अब कोरोना और ल़ॉकडाउन के चलते कई मीडिया हाउसों में छंटनी और बंदी शुरू हो गई, उसके बारे में क्या किसी ने सोचा या सवाल उठाया…? हर दूसरे तीसरे दिन सुनने को मिलता है फलां मीडिया संस्थान में इतने फीसदी स्टाफ कम किये जा रहे हैं या कर दिये गये। इसको लेकर किसी ने प्रधानमंत्री से कहा? शायद इसकी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मेंढ़क खुद को बड़े बुद्धिमान समझते हैं और उन्हें तराजू पर एकजुट रखा नहीं जा सकता।   -एक मीडियाकर्मी

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Dakhal News 23 April 2020


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नई दिल्ली। कोरोना महामारी के इस अंधेरे समय में राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से लगातार यह कोशिश है कि लॉकडाउन में लोग अपने-आप को अकेला महसूस न करें। कोरोना महामारी में हमारी लड़ाई दो तरफा है शारीरिक और मानसिक। घर पर रहकर अपना पूरा ध्यान रखते हुए, हम इस लड़ाई में समाज और देश के हित में सहायक कदम उठा रहे हैं। वहीं मानसिक रूप से अपने को मजबूत करना भी हमारी ज़िम्मेदारी है। इसी प्रयास के तहत राजकमल प्रकाशन के साथ Stay At Home With Rajkamal कार्यक्रम के अंतर्गत साहित्यकारों, रंगकर्मियों, अभिनेताओं और गीतकारों से रोज़ फ़ेसबुक लाइव के जरिए मुलाक़ात होती है। इस सार्थक पहल के बाद अब राजकमल प्रकाशन लेकर आया है ‘पाठ-पुनर्पाठ’ पुस्तिका। इसके तहत राजकमल प्रकाशन के आधिकारिक वाट्सएप्प नंबर से रोज़ कहानियाँ, कविताएं और लेख पाठकों से साझा किए जाएंगे। रोज़ अलग-अलग साहित्यिक कृतियों को एक जगह पीडीएफ में तैयार कर उसे पाठकों से साझा किया जाएगा। 18 अप्रैल की रात पहली पुस्तिका साझा की गई। आगे, 3 मई 2020 तक प्रतिदिन यह पुस्तिका पाठकों से साझा की जाएगी। इस पहल के बारे में बताते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, “सभी के लिए मानसिक खुराक उपलब्ध रहे, यह अपना सामाजिक दायित्व मानते हुए अब हम ‘पाठ-पुनर्पाठ’ पुस्तिकाओं की यह श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। ईबुक और ऑडियोबुक डाउनलोड करने की सुविधा सबके लिए सुगम नहीं है। इसलिए हम अब व्हाट्सएप्प पर सबके लिए नि:शुल्क रचनाएँ नियमित उपलब्ध कराने जा रहे हैं। जब तक लॉक डाउन है, आप घर में हैं लेकिन अकेले नहीं हैं। राजकमल प्रकाशन समूह आपके साथ है। भरोसा रखें।“ इस पुस्तिका को पाठक वाट्सएप्प से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए राजकमल प्रकाशन समूह के व्हाट्सएप्प नम्बर 98108 02875 को फोन में सुरक्षित कर, उसी नम्बर पर अपना नाम लिखकर मैसेज भेज दें। आपको नियमित नि:शुल्क पुस्तिका मिलने लगेगी। राजकमल प्रकाशन समूह अपनी पूरी प्रतिबद्धता के साथ लॉकडाउन के इस समय में पाठकों के लिए हमेशा कुछ नया करने की कोशिश कर रहा है। 22 मार्च से लगातार चल रहे लाइव कार्यक्रमों के जरिए समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर लेखक और साहित्यप्रेमी लोगों से किताब और कला की बातें करते हैं। 90 से ज्यादा लेखक और साहित्य प्रेमी लाइव कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं।   प्रेस रिलीज

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Dakhal News 21 April 2020


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कॉरपोरेट मीडिया को आईना दिखाने निकला मीडिया विजिल तो कॉरपोरेट का बाप निकला। ऐसी मनमानी तो एक से एक घाघ मीडिया घराने नहीं करते। मै मशहूर चिंतक आनंद स्वरूप वर्मा का एक लेख खोज रहा था। जब बहुत देर तक खोजने के बाद भी उनका लेख नहीं मिला तो मैंने पड़ताल की। पता चला मीडिया वीजिल के मालिकों ने हर उस स्तंभकार का नाम उड़ा दिया है जो उनको मालिक की तरह नहीं साथी को तरह देख रहे थे। दरअसल मालिक कहलाने की भूख बड़ी कमाल होती है। किसी भी उम्र में किसी को भी लग जाती है। और जब लग जाती है तो उसकी तमाम प्रगतिशीलता के ढोंग बहुत घिनौने तरीके से बेपर्दा होने लगते हैं। मीडिया विजिल इसका ताजा उदाहरण है। संपादकीय दायित्वों और ट्रस्ट से अभिषेक श्रीवास्तव इस्तीफे के बाद मीडिया विजिल शुद्ध रूप से पारिवारिक मालिकाना हक वाली एक संपत्ति है। जिस कॉरपोरेट टीवी को गालियां देकर मीडिया वजिल के संचालकों ने मालिक होने का दर्जा हासिल किया वो पहली फुरसत में कॉरपोरेट से बड़े कॉरपोरेट हो चुका है। लेकिन ये तो किसी के बौद्धिक श्रम पर डकैती का मामला है। अकेले Anand Swaroop Verma ही नहीं मीडिया विजिल की यात्रा के स्तंभ रहे कई स्तंभकारों के योगदान पर ये संस्थान डाका मारकर बैठ गया है। Abhishek Srivastava से लेकर Nityanand Gayen और तमाम लेखकों का नाम और योगदान दोनों को मीडिया विजिल बेशर्मी के साथ निगल गया है। इनके नाम शातिराना तरीके से उड़ा दिए गए हैं। यह आपराधिक सोच है और इसके लिए उच्च कोटि की निर्लज्जता चाहिए। नाम देना न देना सस्थान और लेखक के बीच का समझौता होता है। लेकिन एक बार बाइलाइन दे देने के बाद व्यवस्थागत बदलाव के कारण नाम हटा देना बेहयाई है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। जहां तक मुझे जानकारी है मीडिया वीजिल के फंडर्स ने शर्त रखी थी कि सभी लेखों पर संस्थान का अधिकार होगा। आनंद स्वरूप वर्मा और अभिषेक श्रीवास्तव जैसे लेखक इसके लिए हरगिज़ तैयार न होते। ये लोग लेखन को समाज की चीज मानते रहे हैं, खुद को उसका मालिक नहीं। यही बात मीडिया विजिल के नए मालिकों को खल रही होगी। इसलिए उनके नाम और काम दोनों को खारिज करके पूर्ण कॉरपोरेट मालिक बनने का खयाल उनके दिमाग में आया होगा। उन्हें अच्छी तरह पता है कि ये लोग किसी तरह का दावा नहीं करने वाले। मीडिया विजिल ने लेखकों की शराफत का फ़ूहड़ तरीके से मजाक उड़ाया है। अब मीडिया विजिल के लिए ना कॉमेंट्स फ्री रहे हैं और ना ही फैक्ट्स सैक्रेड।   टीवी पत्रकार नवीन कुमार की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 21 April 2020


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भारत को कोरोना से कौन बचा रहा है बहुत से लोगो बहुत से कारण दे रहे है कोई लॉकडाउन को वजह बता रहा है कोई भारतीयों की इम्युनिटी या बीसीजी के टीके को वजह बता रहा है लेकिन किसी के पास इसको साबित करने के लिए पर्याप्त डाटा और लाजिक नही है तो आखिकार इस देश को कोरोना से बचा कौन रहा है? भारत को कोरोना के कहर से भारत का दिनोदिन बढ़ता तापमान बचा रहा है जब मैंने विश्व के टॉप 10 तापमान वाले देशो का कोरोना के डाटा का विश्लेषण किया तो हैरान करने वाले रिजल्ट सामने आए, सभी उच्च तापमान वाले देशों में कोरोना वायरस की ग्रोथ बहुत धीरे है लीबिया विश्व का सबसे ज्यादा गर्म देश है वँहा आज के आंकड़ों के अनुसार केवल 49 केस दर्ज किए गए है और केवल एक मौत हुई है पूर्ण लॉकडाउन भी नही किया है और युद्ध प्रभावित गरीब देश होने के बाद भी टेस्टिंग 103 /मिलियन हो रही है लीबिया को तापमान बचा रहा है क्योंकि वँहा सरकार के नाम पर कुछ नही है ऐसा ही कुछ हालात सोमालिया, इथोपिया और जाम्बिया के है। सऊदी अरब विश्व का दूसरा गर्म देश है मिडिल ईस्ट के इस देश मे 8500 केसों में से 92 मौते हुई है और टेस्ट4900 /M हो रहे है सऊदी अरब में तानाशाही होने के बाद भी पूर्ण लाकडाउन् नही है इसलिए यँहा भी तापमान ही वायरस को रोक रहा है। मेक्सिको एक दक्षिणी अमेरिका का देश है वो तापमान की सूची में भारत से दो पायदान नीचे है और वँहा करीब 8000 केसों में 650 मौते हुई है एक समय दिवालिया हो चुके इस देश मे भी टेस्टिंग दर 381/M है यहाँ भी फूल लाकडाउन् नही है ड्रग और माफिया से भरे इस देश की सरकार सबसे ज्यादा लापरवाह है इसलिए इसे भी तापमान ही बचा रहा है। भारत विश्व का आठवां सबसे गर्म देश है भारत में टोटल लाकडाउन् है और 16300 से ज्यादा केस और 521 मौत हो चुकी है लेकिन विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की दम भरने वाली सरकार केवल 270/M की दर से टेस्टिंग कर रही है जाहिर है इतनी लापरवाही के बाद भी केवल तापमान इस देश को बचा रहा है। जिस भारतीय उपमहाद्वीप विश्व की 20 फीसद आबादी रहती है वँहा 1000 से ज्यादा मौते नही हुई है और पाकिस्तान जैसे बदहाल देश मे भी फूल लाकडाउन् नही होने बाद भी मौत का आंकड़ा 150 तक ही पहुंचा है और टेस्टिंग दर 446/M है ऐसे में इस पूरे साउथ एशिया को तापमान ही बचा रहा है। मैंने इस विश्लेषण में अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और एशिया के सारे गर्म देशो का डाटा विश्लेषण किया है इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं डाटावाणी यह बात बता चुका था पोस्ट लिखते लिखते आज तक पर खबर आ गई कि अमेरिका में कोरोना कड़ी धूप से मर रहा है अतः डाटा विश्लेषण पर मेडिकल रिसर्च की मुहर भी लग गई है। अगर 20 मई के बाद भारत मे भी कोरोना मर जाए तो आश्चर्य मत कीजियेगा क्योंकि जब रोहिणी तपेगी तो उसकी आग से तपकर एक नया भारत उदय होगा लेकिन इसका श्रेय किसी एक आदमी और सरकार बिलकुल मत दीजियेगा अगर श्रेय देना ही तो केवल और केवल सूर्य देवता को दीजियेगा उन्ही के ताप से हमें कोरोना जैसे राक्षस से मुक्ति मिलेगी। ऊँ भास्कराय नमः!   युवा डेटा एनालिस्ट अपूर्व भारद्वाज की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 21 April 2020


bhopal, Why are not talking ,Muslims clearly

हिंदी की एक प्रतिष्ठित वेब साइट (सत्यहिंदी.काम) में मुरादाबाद में हुए उस पागलपन को लेकर आलेख प्रकाशित हुआ है जिसमें वहां के एक मोहल्ले में इंदौर की टाटपट्टी बाखल की तरह ही स्वास्थ्य और पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया गया।लेखक इक़बाल रिज़वी ने तकलीफ़ ज़ाहिर की है कि इस समय मुसलमानों को ‘सॉफ़्ट टारगेट’ बनाकर पागलों की तरह व्यवहार करने पर मज़बूर किया जा रहा है ! लेखक ने आरोप लगाया है कि जमात’ की आड़ में मुसलमानों का बुरा हाल किया जा रहा है और इससे प्रशासन के प्रति जो अविश्वास भाव उनमें बढ़ रहा है उसने यह हालात कर दिए हैं कि मुरादाबाद जैसा पागलपन सामने आ रहा है।आलेख में यह भी कहा गया है कि एक सुनियोजित झूठ को इतनी बार पूछा जा रहा है कि मुसलमान ‘बैकफुट’ पर आ गए हैं।’ मुसलमानों की देश के प्रति निष्ठा को लेकर इस समय जो कुछ भी चल रहा है उससे कई नए सवाल खड़े होते है : पहला तो यह कि आज़ादी के बाद के तमाम सालों में (साम्प्रदायिक दंगों की घटनाओं और कश्मीर को छोड़कर) इस तरह का आचरण या पागलपन मुस्लिम बस्तियों की ओर से क्या पहली बार प्रकट हो रहा है या पहले के भी ऐसे कोई उदाहरण हैं जिन पर कि राष्ट्रीय स्तर की बहसें भी हो चुकीं हैं ? मुसलमान बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने या मलेरिया की दवा का छिड़काव करने या शहर को ‘नम्बर वन’ बनाने के लिए इन्हीं इलाक़ों में ‘अगर’ स्वास्थ्य या सफ़ाईकर्मी पहले भी गए हैं तो क्या तब भी ऐसी ही घटनाएं हुईं हैं ? अगर हुईं हैं तो उनका पैटर्न क्या था ?अगर ऐसा पहली बार हो रहा है तो क्या उसके कारणों में जाने की जानबूझकर कोशिश नहीं की गई ? दूसरा सवाल यह है कि हमलों को लेकर चल रही तमाम बहसों में मुसलमान समाज के उन्हीं लोगों की ज़्यादा भागीदारी क्यों हो रही है जो दूध को दूध और पानी को पानी कहने से हकलाते हैं ?तीसरा सवाल यह है कि जो कैमरे स्टूडियो के अंदर लगे हैं वे हमलावरों के घरों के अंदर पहुँचकर उनसे उनके पागलपन का असली कारण क्यों नहीं पूछ रहे हैं ? इंदौर की टाटपट्टी बाखल के मुसलमानों के पश्चाताप से भी दुनिया को रूबरू करवाना चाहिए था। अंत में यह कि देश का समूचा हिंदू समाज अगर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल नहीं है तो समूची मुसलमान क़ौम कैसे तबलीगी जमात, टाटपट्टी बाखल और मुरादाबाद हो सकती है ? हम क्या ऐसा मानने को तैयार हो सकते हैं कि कोरोना की महामारी का आक्रमण अगर साल-छह महीने के बाद तब होता जब नागरिकता क़ानून और एन सी आर को लेकर मुस्लिमों की शंकाओं के घाव भर गए होते तो इस तरह की घटनाएं बिलकुल नहीं होतीं ?शाहीनबाग़ चल रहा था तभी कोरोना हो गया और तभी तबलीगी जमात का जमावड़ा भी हो गया। क्या कुछ अजीब सा नहीं लगता ? हुआ यह है कि जो एक और अवसर मुसलमानों को देश की मुख्यधारा के साथ एकाकार करने का मिला था उसे उन्होंने अपनी ही क़ौम के कुछ कट्टरपंथी सिरफिरों के कारण गंवा दिया।और फिर उसे बहुसंख्यक समाज के कुछ अनुदारवादियों ने लपक कर हथिया लिया और मीडिया के एक वर्ग ने भी उसे अपने एजेंडे का हथियार बना लिया। एक जो अंतिम सवाल ‘थर्ड पार्टी’ की तरफ़ से भी पूछने का बनता है वह यह है कि इतनी बड़ी आबादी की नीयत और राष्ट्रीयता पर अगर देश के अधिकांश लोगों का ही यक़ीन गड़बड़ा रहा है तो फिर यह भी बताया जाना चाहिए कि उसका क्या इलाज किया जाए ?साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताया जा रहा है कि मुसलमानों से क्या करने को या कहाँ जाने को कहा जाए ?और यह आदेश देश के संविधान की तरफ़ से कौन देगा ? और अगर मुसलमान फिर भी यही कहते हैं कि हिंद की ज़मीन ही उनका ख़ुदा है तो उसके बाद किस तरह के दस्तावेज़ों की उनसे मांग की जानी चाहिए ? अगर इन सभी सवालों के जवाब उपलब्ध हैं तो उन्हें बिना किसी विलम्ब के सार्वजनिक किया जाना चाहिए कम से उस बड़ी जनसंख्या और उनके बच्चों का ख़याल करके जो दोनों तरफ़ की उत्तेजक भीड़ के बीच मौन और निःशस्त्र खड़ी हुई है।   लेखक श्रवण गर्ग देश के जाने-माने संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं

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Dakhal News 19 April 2020


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कोलकाता। अपने राज्यों में मजदूरों की कमी से उबरने के लिए पंजाब, तेलंगाना और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री बिहार फोन लगा कर मजदूरों को मनाने की अपील कर रहे हैं। अधिकतर राज्यों में कृषि और तमाम उद्योग धंधों में प्रवासी मजदूरों की कमी महसूस की जा रही है। लॉकडाउन के बाद मजदूर या तो अपने गांव लौट चुके हैं या कुछ अब तक अलग-अलग जगहों में फंसे हुए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार लॉकडाउन का हवाला देकर भले ही दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के लोगों को वापस लाने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं। मगर उद्योग धंधों में अन्य राज्यों के मजदूरों की कमी महसूस की जा रही है। इस कारण कई मुख्यमंत्री मजदूरों की खुशामद कर अपने यहां बुला रहे हैं। इससे पहले लॉकडाउन से घबराये प्रवासी मजदूरों की तकलीफ की सुनवाई नहीं हो रही थी। मदद की उम्मीद खो चुके मजदूर पैदल ही अपने गांवों की ओर चल पड़े। इन लोगों ने घर वापसी की जब-जब आवाज उठाने की कोशिश की तब पुलिस और प्रशासन ने धमकाकर और लाठियां बरसाकर इन पर काबू पा लिया। अब मंदी का असर दिखते ही सबको मजदूरों का ख्याल आया है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिहार फोन लगाकर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से कहा है कि वो मजदूरों से अपील करें कि जो मजदूर जहां हैं वो वहीं रहे, वहां की सरकारें उनका ख्याल रखेंगी। इधर तेलंगाना के मुख्य सचिव सोमेश कुमार ने उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को फोन कर कहा कि वे मजदूरों को तेलंगाना की चावल मिलों में वापस काम पर लौटने को राजी करें। उन्होंने मजदूरों को वापस लाने के लिए तेलंगाना से बस भेजने की भी पेशकश की है। मुख्य सचिव ने भरोसा दिलाया कि तेलंगाना में मजदूरों की हर जरूरत का ख्याल रखा जायेगा। अब भी देश के कई शहरों में बिहार के लोग फंसे पड़े हैं। कहीं से मजदूर तो कहीं से छात्र अपनी घर वापसी के लिए मुख्यमंत्री से गुहार लगा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। राजस्थान के कोटा में फंसे छात्रों को निकालने के लिए यूपी की योगी सरकार ने दो सौ भेजी हैं, वहीं इस कदम को नाइंसाफी करार देते हुए नीतिश कुमार ने कहा कि यह लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन है। ऐसा किया जाना गलत है।  राज्य सरकार हो या फिर केंद्र सरकार सभी दावा कर रही हैं कि स्थिति नियंत्रण में है। हम दूसरे देशों के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं। मगर लॉकडाउन की वजह से मजदूरों और गरीबों का जीना मुश्किल हो गया है। नौकरी गंवा चुके मजदूर भूखमरी से लड़ रहे हैं। राहत का सामान भी हर किसी को नहीं मिल रहा। दूरदर्शन पर पांच-पांच सौ रुपये पाकर धन्य हो रही कुछेक महिलाओं के वीडियो भी लगातार वाइरल हो रहे हैं। मगर उनमें से कोई भी गरीब और मोहताज नजर नहीं आ रही। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि सरकार किन्हें राहत पहुंचा रही है, गरीब तो अब भी राहत का इंतजार कर रहे हैं। सरकार जल्दी न जागी तो जिन लोगों को आज वह मोहताज समझ रही है, कल प्रवासी मजदूरों और बेरोजगारों की यही फौज अपने हक के लिए उनकी नींद हराम करने से नहीं चूकेगी।   कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार श्वेता सिंह का विश्लेषण

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Dakhal News 19 April 2020


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भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम जनसंपर्क विभाग के सचिव पी. नरहरि को सौंपा है।   दरअसल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री इस विश्वविद्यालय की महापरिषद के अध्यक्ष होते हैं, इसलिए प्राय: जब भी इस तरह से किसी भी कुलपति द्वारा अपना इस्तीफा भेजा जाता है तो वह मुख्‍यमंत्री को संबोधित करते हुए ही दिया जाता है। अपने दिए इस्‍तीफे के पत्र में दीपक तिवारी ने लिखा है वे कुलपति पद से अपना इस्तीफा प्रस्तुत कर रहे हैं, उनका कार्यकाल बहुत अच्‍छा रहा है और वे इससे बेहद संतुष्‍ट हैं। शनिवार रात दिए इस त्‍याग पत्र के पहले उन्‍होंने छात्रों और विश्वविद्यालय के स्टाफ के नाम भी एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने बतौर कुलपति के अपने अनुभव को साझा किया है।   उल्‍लेखनीय है कि उनका बतौर कुलपति कार्यकाल एक साल 2 महीने का रहा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद दीपक तिवारी को 24 फरवरी,2019 में पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था। उन्होंने वरिष्‍ठ पत्रकार जगदीश उपासने की जगह ली थी, जिन्होंने भाजपा की सरकार जाने के बाद कुलपति पद से इस्तीफा दिया था।   उल्लेखनीय है कि दीपक तिवारी के कुलपति बनने के बाद माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय चर्चा और विवादों में बना रहा है। विश्वविद्यालय की एक फैकल्टी की जातिवादी टिप्पणियों के बाद यहां छात्रों ने आंदोलन तक किया और इसके बाद 23 छात्रों का विश्वविद्यालय से निष्कासन किया गया था लेकिन जब छात्र आंदोलन तेज हुआ तो सभी का निष्कासन वापस लेना पड़ा था। इसके बाद उक्‍त फैकल्टी की सेवाएं भी विश्‍वविद्यायल ने वापस ले ली थी।

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Dakhal News 19 April 2020


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Journalism Emergency Relief Fund! जी हां, इसी नाम से गूगल ने एक रिलीफ फंड तैरा किया है. मकसद है छोटी-छोटी मीडिया संस्थाओं को डूबने और हजारों पत्रकारों को बेरोजगार होने से बचाना. न्यूज पब्लिशर्स की आर्थिक मदद के संबंध में गूगल ने ऐलान किया है. गूगल का कहना है कि कोरोना और लॉकडाउन संकट से प्रभावित छोटे-मीडियम न्यूज पब्लिशर्स व लोकल न्यूजरूम की आर्थिक मदद की जाएगी. जो मदद के इच्छुक हैं वे अप्लाई कर सकते हैं. गूगल फंड के लिए वो पब्लिशर्स अप्लाई कर सकते हैं जहां 2 से लेकर 100 तक फुल टाइम जर्नलिस्ट हैं. पब्लिकेशन की डिजिटल प्रेजेंस कम से कम 12 महीने की होनी चाहिए. गूगल न्यूज के वाइस प्रेसिडेंट रिचर्ड ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर छोटे-मीडियम न्यूज पब्लिशर्स को पैसे दिए जाएंगे. इसी मकसद के लिए गूगल ने जर्नलिज्म इमरजेंसी रिलीफ फंड बनाया है. गूगल ने ये नहीं बताया है कि कितने पैसे इस काम के लिए खर्चे जाएंगे. गूगल की फंडिंग पाने के लिए न्यूज पब्लिकेशन्स दो हफ्तों में आवेदन करें. आखिरी तारीख 29 अप्रैल है. आवेदन के लिए इस वेबसाइट का यूज करें- https://newsinitiative.withgoogle.com/ जिन लोकल पब्लिशर्स के पास 100 से ज्यादा फुल टाइम जर्नलिस्ट हैं वो भी इसके लिए आवेदन कर सकती है. हालांकि इस तरह के आवेदन को गूगल अपने तरीके से जांच कर फिर फैसला लेगा कि फंड करना है या नहीं. गूगल की तरफ से एक मिलियन डॉलर दो संस्थाओं इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट्स और कोलंबिया जर्नलिस्म स्कूल डार्ट सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड ट्रॉमा को दिए जाएंगे. ये संस्थाएं जर्नलिस्ट्स को सपोर्ट करती हैं. ज्ञात हो कि गूगल पहले भी गूगल न्यूज इनिशिएटिव के तहत 6.5 मिलियन डॉलर देने का ऐलान कर चुका है जो फैक्ट चेकर्स और कोरोना वायरस से जुड़े गलत इनफॉर्मेशन रोकने का काम करने वाले नॉन प्रॉफिट्स ऑर्गाइजेशन्स के लिए हैं.   गूगल के अलावा फेसबुक ने भी कहा है कि लोकल न्यूज ऑर्गनाइजेशन को कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौर में सपोर्ट करने के लिए 100 मिलियन डॉलर की मदद दी जाएगी. इनमें 25 मिलियन डॉलर लोकल कवरेज के लिए है, जबकि 75 मिलियन डॉलर मार्केटिंग के लिए है.

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Dakhal News 16 April 2020


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हमलावरों ने हमले के पहले कहा कि तुम्हारा पिता दिनभर इधर-उधर घूम कर काम कर रहा है, इससे मोहल्ले में कोरोनावायरस का खतरा बढ़ रहा है… नवभारत के फोटो ग्राफर गोपी डे के पुत्र शुभम डे के साथ जो घटना घटित हुई वह बेहद निंदनीय और चिंताजनक है. कल शाम को इस युवक पर कुछ लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया. बुरी तरह घायल हुए शुभम डे को सिम्स में भर्ती कर दिया गया है. वहां उसका उपचार चल रहा है. इस हमले का कोई व्यक्तिगत कारण नहीं है, बल्कि यह हमला इसलिए हुआ है कि पीड़ित बच्चे का पिता श्री गोपी डे नवभारत प्रेस में प्रेस फोटोग्राफर है. दिन भर घूम घूम कर अपनी ड्यूटी किया करता है. इसलिए उससे कोरोना का संक्रमण फैलाने की मूर्खतापूर्ण आशंका जताते हुए मोहल्ले के बदमाश और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने श्री गोपी डे के पुत्र पर प्राणघातक हमला कर दिया.   सरकण्डा पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया है और उन पर गैर-जमानती धाराओं के तहत अपराध भी पंजीबद्ध कर लिया है.

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Dakhal News 16 April 2020


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2011 की आर्थिक एवं जाति जनगणना के अनुसार भारत के कुल परिवारों में से 4.42 करोड़ परिवार अनुसूचित जाति (दलित) से सम्बन्ध रखते हैं. इन परिवारों में से केवल 23% अच्छे मकानों में, 2% रहने योग्य मकानों में और 12% जीर्ण शीर्ण मकानों में रहते हैं. इन परिवारों में से 24% परिवार घास फूस, पालीथीन और मिटटी के मकानों में रहते हैं. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अधिकतर दलितों के पास रहने योग्य घर भी नहीं है. काफी दलितों के घरों की ज़मीन भी उनकी अपनी नहीं है. यह भी सर्विदित है कि शहरों की मलिन बस्तियों तथा झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले अधिकतर दलित एवं आदिवासी ही हैं. यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इतने छोटे मकानों और झोंपड़ियों में कई कई लोगों के एक साथ रहने से कोरोना की रोकथाम के लिए फिज़िकल डिस्टेंसिंग कैसे संभव है. महाराष्ट्र का धार्वी स्लम इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है जहाँ बड़ी तेजी से संक्रमण के मामले आ रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में यदि ऐसी ही परिस्थिति रही तो इससे मरने वालों की संख्या का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. उपरोक्त जनगणना के अनुसार केवल 3.95% दलित परिवारों के पास सरकारी नौकरी है. केवल 0.93% के पास राजकीय क्षेत्र तथा केवल 2.47% के पास निजी क्षेत्र का रोज़गार है. इससे स्पष्ट है कि दलित परिवार बेरोज़गारी का सबसे बड़ा शिकार हैं. वास्तव में आरक्षण के 70 साल लागू रहने पर भी सरकारी नौकरियों में दलित परिवारों का प्रतिनिधित्व केवल 3.95% ही क्यों है? क्या आरक्षण को लागू करने में हद दर्जे की बेईमानी नहीं बरती गयी है? क्या मेरिट के नाम पर दलित वर्गों के साथ खुला धोखा नहीं किया गया है और दलितों को उनके संवैधानिक अधिकार (हिस्सेदारी) से वंचित नहीं किया गया है? यदि दलितों में मेरिट की कमी वाले वाले झूठे तर्क को मान भी लिया जाए तो फिर दलितों में इतने वर्षों में मेरिट पैदा न होने देने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इसी जनगणना में यह उभर कर आया है कि देश में दलित परिवारों में से केवल 83.55% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. केवल 11.74% परिवारों की मासिक आय 5,000 से 10,000 के बीच है और केवल 4.67% परिवारों की आय 10,000 से अधिक है. सरकारी नौकरी से केवल 3.56% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गरीबी की रेखा के नीचे दलितों का प्रतिश्त बहुत अधिक है जिस कारण दलित ही कुपोषण का सबसे अधिक शिकार हैं. इसी प्रकार उपरोक्त जनगणना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 56% परिवार भूमिहीन हैं. इन में से भूमिहीन दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से भी अधिक हो सकता है. दलितों की भूमिहीनता की दशा उन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है जिस कारण वे भूमिधारी जातियों पर पूरी तरह से आश्रित रहते हैं. इसी प्रकार देहात क्षेत्र में 51% परिवार हाथ का श्रम करने वाले हैं जिन में से दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से अधिक हो सकता है. जनगणना के अनुसार दलित परिवारों में से केवल 18.45% के पास असिंचित, 17.41% के पास सिंचित तथा 6.98% के पास अन्य भूमि है. इससे स्पष्ट है की दलितों की भूमिहीनता लगभग 91% है. दलित मजदूरों की कृषि मजदूरी पर सब से अधिक निर्भरता है. जनगणना के अनुसार देहात क्षेत्र में केवल 30% परिवारों को ही कृषि में रोज़गार मिल पाता है जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन में कितने दलितों को कृषि से रोज़गार मिल पाता होगा. यही कारण है कि गाँव से शहरों को ओर पलायन करने वालों में सबसे अधिक दलित ही हैं. हाल में कोरोना संकट के समय शहरों से गाँव की ओर उल्टा पलायन करने वालों में भी बहुसंख्यक दलित ही हैं. दलितों की भूमिहीनता और हाथ की मजदूरी की विवशता उनकी सब से बड़ी कमज़ोरी है. इसी कारण वे न तो कृषि मजदूरी की ऊँची दर की मांग कर सकते हैं और न ही अपने ऊपर प्रतिदिन होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न का मजबूती से विरोध ही कर पाते हैं. अतः दलितों के लिए ज़मीन और रोज़गार उन की सब से बड़ी ज़रुरत है परन्तु इस के लिए मोदी सरकार का कोई भी एजेंडा नहीं है. इस के विपरीत मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण करके दलितों को भूमिहीन बना रही है और कृषि क्षेत्र में कोई भी निवेश न करके इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों को कम कर रही है. अन्य क्षेत्रों में भी सरकार रोज़गार पैदा करने में बुरी तरह से विफल रही है. सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण दलितों को आरक्षण के माध्यम से मिलने वाले रोज़गार के अवसर भी लगातार कम हो रहे हैं. इसके विपरीत ठेकेदारी प्रथा से दलितों एवं अन्य मज़दूरों का खुला शोषण हो रहा है. मोदी सरकार ने श्रम कानूनों का शिथिलीकरण करके मजदूरों को श्रम कनूनों से मिलने वाली सुरक्षा को ख़त्म कर दिया है. इससे मजदूरों का खुला शोषण हो रहा है जिसका सबसे बड़ा शिकार दलित परिवार हैं. अमेरिका में वर्तमान कोरोना महामारी के अध्ययन से पाया गया है कि वहां पर संक्रमित/मृतक व्यक्तियों में गोरे लोगों की अपेक्षा काले लोगों की संख्या अधिक है. इसके चार मुख्य कारण बताये गए हैं: अधिक खराब सेहत और कम स्वास्थ्य सुविधाओं की उप्लब्धता एवं भेदभाव, अधिकतर काले अमरीकन लोगों का आवश्यक सेवाओं में लगे होना, अपर्याप्त जानकारी एवं छोटे घर. भारत में दलितों के मामले में तो इन सभी कारकों के इलावा सबसे बड़ा कारक सामाजिक भेदभाव है. इसी लिए यह स्वाभाविक है कि हमारे देश में भी काले अमरीकनों की तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर दलित एवं आदिवासी ही कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित होने की सम्भावना है. वर्तमान कोरोना संकट से जो रोज़गार बंद हो गए हैं उसकी सबसे अधिक मार दलितों/ आदिवासियों पर ही पड़ने वाली है. हाल के अनुमान के अनुसार कोरोना की मार के फलस्वरूप भारत में लगभग 40 करोड़ लोगों के बेरोज़गारी का शिकार होने की सम्भावना है जिनमें अधिकतर दलित ही होंगे. इसके साथ ही आगे आने वाली जो मंदी है उसका भी सबसे बुरा प्रभाव दलितों एवं अन्य गरीब तबकों पर ही पड़ने वाला है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान संकट के दौरान सरकार द्वारा राहत सम्बन्धी जो घोषणाएं की भी गयी हैं वे बिलकुल अपर्याप्त हैं और ऊंट के मुंह में जीरा के सामान ही हैं. इन योजनाओं में पात्रता को लेकर इतनी शर्तें लगा दी जाती हैं कि उनका लाभ आम आदमी को मिलना असंभव हो जा रहा है. उत्तर कोरोना काल में दलितों की दुर्दशा और भी बिगड़ने वाली है क्योंकि उसमें भयानक आर्थिक मंदी के कारण रोज़गार बिलकुल घट जाने वाले हैं. चूँकि दलितों के पास उत्पादन का अपना कोई साधन जैसे ज़मीन तथा व्यापर कारोबार आदि नहीं है, अतः मंदी के दुष्परिणामों का सबसे अधिक प्रभाव दलितों पर ही पड़ने वाला है. इसके लिए ज़रूरी है कि भोजन तथा शिक्षा के अधिकार की तरह रोज़गार को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये और बेरोज़गारी भत्ते की व्यवस्था लागू की जाये. इसके साथ ही स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये ताकि गरीब लोगों को भी स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सके. इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे विकास के वर्तमान पूंजीवादी माडल के स्थान पर जनवादी समाजवादी कल्याणकारी राज्य के माडल को अपनाया जाये. यह उल्लेखनीय है कि डा. आंबेडकर राजकीय समाजवाद (जनवादी समाजवाद) के प्रबल समर्थक और पूंजीवाद के कट्टर विरोधी थे. उन्होंने तो दलित रेलवे मजदूरों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा था कि “दलितों के दो बड़े दुश्मन हैं, एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूँजीवाद.” वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के बहुत बड़े पक्षधर थे. डॉ आंबेडकर के मस्तिष्क में समाजवाद की रूप-रेखा बहुत स्पष्ट थी। भारत के सामाजिक रूपान्तरण और आर्थिक विकास के लिए वे इसे अपरिहार्य मानते थे। उन्होंने भारत के भावी संविधान के अपने प्रारूप में इस रूप-रेखा को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत भी किया था जो कि “स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज अर्थात राज्य एवं अल्पसंख्यक” नामक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। वे सभी प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों, बीमा, कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण एवं सामूहिक खेती के पक्षधर थे. वे कृषि को राजकीय उद्योग का दर्जा दिए जाने के पक्ष में थे. डा. आंबेडकर तो संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाना चाहते थे परन्तु यह उनके वश में नहीं था. वर्तमान कोरोना संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक भारत सहित अधिकतर देशों में विकास का जो पूँजीवाद माडल रहा है उसने शोषण एवं असमानता को ही बढ़ावा दिया है. यह आम जन की बुनियादी समस्यायों को हल करने में बुरी तरह से विफल रहा है. जबसे राजनीति का कारपोरेटीकरण एवं फाइनेंस कैपिटल का महत्त्व बढ़ा है, तब से लोकतंत्र की जगह अधिनायिकवाद और दक्षिणपंथ का पलड़ा भारी हुआ है. इस संकट से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि इस संकट का सामना केवल समाजवादी देश जैसे क्यूबा, चीन एवं वियतनाम आदि ही कर सके हैं. उनकी ही व्यवस्था मानव जाति के जीवन की रक्षा करने में सक्षम है। वरना आपने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को तो सुना ही होगा जिसमें वह कहते हैं कि लगभग ढाई लाख अमरीकनों को तो कोरोना से मरना ही होगा और इसमें वह कुछ नहीं कर सकते। पूंजीवाद के सर्वोच्च माडल की यह त्रासद पुकार है जो दिखा रही है कि मुनाफे पर पलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था पूर्णतया खोखली है। इसलिए दलितों के हितों की रक्षा भी जनवादी समाजवादी राज्य व्यवस्था में ही सम्भव है। बाबा साहब की परिकल्पना तभी साकार होगी जब दलित, पूंजीपतियों की सेवा में लगे बसपा, अठवाले, रामविलास जैसे लोगों से अलग होकर, रेडिकल एजेंडा (भूमि आवंटन, रोज़गार, स्वास्थ्य सुरक्षा, शिक्षा, एवं सामाजिक सम्मान आदि) पर आधारित जन राजनीति के साथ जुड़ेंगे। यही राजनीति एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगी जिसमें उत्तर कोरोना काल की चुनौतियों का जवाब होगा। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इसी दिशा में जनवादी समाजवादी राजनीति का एक प्रयास है।   -एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.), राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

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Dakhal News 14 April 2020


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Soumitra Roy : लॉक डाउन कुछ समय के बाद तो खत्म हो ही जायेगा। लेकिन उसके बाद क्या? क्या आपने प्लान बनाया? किसका इंतज़ार है? अगर आपको यह लगता है कि लॉक डाउन खुलते ही बागों में बहार आ जायेगी तो आप बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। कोरोना के जन्मदाता चीन में कल 97 मरीज़ सामने आए हैं। मतलब संकट फिर गहरा रहा है। भारत में आईसीएमआर ने अपनी स्टडी में कह दिया है  कि कोरोना सितंबर में सबसे ज़्यादा सितम ढहायेगा। तो समझे पूरा साल गया। भूल जाइए दशहरा, दीवाली को। देश के कॉरपोरेट्स ने कह दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में 9 महीने तक का वक़्त लग सकता है। उधर विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया इकनोमिक फोकस रिपोर्ट में भारत सहित 8 देशों को तबाही की चेतावनी दी है। बैंक का कहना है कि अगर जल्दी लॉक डाउन खुला तो भी भारत की विकास दर 2020-21 में 1.2-2.8% के बीच रहेगी। 2022 में ही भारत 5% की विकास दर हासिल कर सकेगा, वह भी तब जबकि सरकार सब संभाल ले। अगर लॉक डाउन लंबा चलता है तो हालात और भी खराब हो सकते हैं। तो अभी से किफ़ायत की आदत डाल लीजिये। सिर्फ ज़रूरी चीजों पर ही खर्च कीजिये, पैसा बचाइए और रोजगार को मजबूत कीजिये। लॉक डाउन खुलने के बाद देश में भयंकर बेरोज़गारी का आलम बन सकता है। यानी अभी तेज़, तूफानी लहरों के बीच भंवर भी है। अगले 2 साल में अगर मोदी सरकार अर्थव्यवस्था की कश्ती को बचा ले जाती है तो 2024 उनका है। वरना जनता आती है।   पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट सौमित्र राय की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 14 April 2020


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एक बुरी खबर…लॉकडाउन में जब आप घरों में क़ैद हैं, ऐसे में गुड़गांव में अमेरिकन कंपनी फेयर पोर्टल (Fareportal) ने अपने 800 कर्मचारियों को कंपनी से निकाल दिया है। इसी कंपनी ने गुड़गांव के अलावा पुणे में भी कर्मचारियों को निकाला है। यह कंपनी ट्रेवल बिजनेस यानी फ्लाइट और होटल बुकिंग की बहुत बड़ी अमेरिकी कंपनी है। कर्मचारियों को निकाले जाने का सिलसिला कई दिनों से चल रहा है और मजाल है कि केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार या उसके श्रम विभाग गुड़गांव ने इस पर कोई ऐतराज किया हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश को नौकरियां जाने का आश्वासन दे रहे थे, ऐसे समय में केंद्र सरकार भी #फेयरपोर्टल के इस घटनाक्रम पर चुप है। कर्मचारियों का कहना है कि गुड़गांव की मल्टीनैशनल कंपनियों (एमएनसी) में अभी ये शुरुआत भर है। जल्द ही कुछ और कंपनियां भी इसी रास्ते पर चलेंगी। कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट ने बिना कोई नोटिस दिए फोन पर कर्मचारियों को अलग-अलग समय देते हुए दफ्तर बुलाया और उसने इस्तीफा देने को कहा। हर कर्मचारी से कहा गया कि अगर उन्हें वेतन चाहिए तो इस्तीफा देना होगा। अन्यथा वेतन भी रुक जाएगा। कर्मचारियों को मार्च का वेतन चाहिए था, उन्होॆने इस्तीफा लिख दिया। जो नए कर्मचारी थे यानी जिनको लगभग एक साल पूरा होने को था, उन्हें बर्खास्त करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी धारा 10ए का इस्तेमाल किया गया। इसके तहत कंपनी कभी भी उन्हें बर्खास्त कर सकती है। बर्खास्त कर्मचारियों को अभी तक मार्च का वेतन भी नहीं दिया गया। कंपनी से बर्खास्त की गई एक महिला कर्मचारी ने बताया कि उसके पास रखा पिछला सारा पैसा खत्म हो गया। अब उसके पास परिवार के साथ नेपाल लौटने तक के लिए पैसे नहीं हैं। तमाम कर्मचारियों का लगभग यही हाल है। हटाए गए कर्मचारियों में 8 और 10 साल तक सेवा देने वाले भी शामिल हैं। लेकिन ऐसे कर्मचारियों के मामले में किसी भी सेवाशर्त को लागू नहीं किया गया। सूत्रों का कहना है कि सबसे ज्यादा 500 कर्मचारी गुड़गांव दफ्तर से हटाए गए हैं। इसी तरह पुणे से 300 कर्मचारी हटाए गए हैं। पुणे में काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी पुराने हैं। चार साल तक काम कर चुके एक टिकटिंग एग्जेक्यूटिव राजू प्रसाद ने बताया कि उसे और उसके कुछ साथियों को बर्खास्तगी का लेटर ईमेल पर मिला है। आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल आफ ट्रेड यूनियनंस ने फेयरपोर्टल के कर्मचारियों को हटाए जाने के खिलाफ हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि कोरोना आपदा के दौरान कंपनी की यह हरकत कानून का खुला उल्लंघन है। इससे कर्मचारियों की दिक्कत बढ़ेगी। मुख्यमंत्री से इस मामले में फौरन दखल देने और कार्रवाई की मांग करते हुए कहा गया है कि इससे पहले हालात नाजुक हों, हरियाणा सरकार को फौरन ऐक्शन लेना चाहिए। इसी तरह का पत्र महाराष्ट्र सरकार को भी लिखा गया है। फेयरपोर्टल ने अपने पुराने कर्मचारियों को जो पत्र भेजा है, उसमें उन्हें हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई है। कई अधिकारी स्तर के कर्मचारियों ने कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट विनय कांची को संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने अपना मोबाइल बंद कर रखा है। इसी तरह कई और अफसरों से संपर्क की कोशिश भी बेकार गई। निकाले गए कर्मचारियों का कहना है कि सहानुभूति के तौर पर भी कोई अधिकारी बात नहीं कर रहा है। अपने काम से काम का मतलब रखने वाले कर्मचारियों को अब कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि वे किस तरफ जाए। अभी तक किसी ने पुलिस में कोई रिपोर्ट तक नहीं दर्ज कराई है। गुड़गांव के श्रम विभाग, डीएम, पुलिस कमिश्नर से लेकर डिविजनल कमिश्नर तक इस घटना की जानकारी हो चुकी है, लेकिन कर्मचारियों के आंसू पोंछने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। देश का टीवी मीडिया जब हिंदू-मुसलमानों को लड़ाने और देश को बांटने की कोशिश में लगा हुआ है, उसकी नजर इन कर्मचारियों की बर्खास्तगी पर नहीं गई। एक कर्मचारी ने बताया कि उन लोगों ने तमाम चैनलों को जानकारी दी लेकिन कहीं से कोई हमारी कहानी सुनने नहीं पहुंचा। इस मीडिया के पास मुसलमानों को टारगेट करके फर्जी खबरें दिखाने का समय तो है लेकिन हमारा दर्द सुनने के लिए कोई समय नहीं है। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि टीवी मीडिया देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम मनोहर लाल खट्टर से इस संबंध में सवाल करेगा लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। लॉकडाउन की घोषणा किए जाते समय मोदी ने आश्वासन दिया था कि किसी की नौकरी पर संकट नहीं आएगा लेकिन न सिर्फ मोदी बल्कि खट्टर के आश्वासन भी फर्जी साबित हुए। गुड़गांव का निकम्मा श्रम विभाग इस मामले में कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज तो करवा ही सकता है। क्योंकि कंपनी ने नोटिस देकर कर्मचारियों को बर्खास्त करने जैसा मामूली कदम भी नहीं उठाया है। इसी तरह श्रम विभाग डीएम को इस कंपनी के बैंक खाते फ्रीज करने, चल-अचल संपत्ति कुर्क करने के लिए सुझाव दे सकता था। इसी तरह डीएम भी श्रम विभाग का सुझाव मिले बिना ये सारे कदम बतौर जिला मैजिस्ट्रेट ये सारे कदम खुद से उठा सकते थे।

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Dakhal News 12 April 2020


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जरूरी अपडेट: उच्च पदस्थ सरकारी सूत्रों के अनुसार लॉक डाउन 30 अप्रैल तक जारी रहेगा। इसके बाद मई से लॉक डाउन चरणबद्ध तरीके से खोला जाएगा। प्रस्तावित तारीखें-धर्म स्थल: 5 मईफल-सब्जियों की दुकानें: 7 मईमॉल, सिनेमा हॉल: मई तीसरा हफ्ताट्रेन-फ्लाइट: 15 मईअन्तर्राष्ट्रीय उड़ानें: जुलाई 30 ये प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने आया प्रस्तावित प्लान है। मोदीजी 12 अप्रैल को देश के सामने अपनी योजना का खुलासा कर सकते हैं। न्यूज़ सोर्स- रेडिफ डॉट कॉम

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Dakhal News 12 April 2020


INS shed crocodile tears on Sonia Gandhi

वेजबोर्ड लागू करने को लेकर बेशर्मी और ढिठाई से बोला झूठ कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के केंद्र सरकार को सरकारी विज्ञापनों पर रोक के सुझाव पर तिलमिलाया अखबार मालिकों का संगठन आईएनएस घड़ियाली आंसू बहा रहा है। आईएनएस ने विपक्षी नेता के सुझाव के खिलाफ जारी बयान में बेशर्मी की हदें लांघते हुए ऐसा ना करने के पीछे प्रिंट मीडिया की विश्‍वसनीयता के अलावा वेजबोर्ड लागू होने का बेतुका और सरासर झूठा हवाला दिया है। सच्‍चाई तो यह है कि आईएनएस से जुड़ा लगभग हर अखबार मालिक अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन दिए जाने के खिलाफ कोरोना वायरस की तरह हर उस कर्मचारी को शिकार बनाता जा रहा है या बना चुका है, जिसने भी मजीठिया वेजबोर्ड के तहत संशोधित वेतन की मांग की है। लगभग किसी भी समाचारपत्र संस्‍थान ने वर्ष 2011 से अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद लागू नहीं किया है। इस वेजबोर्ड को लागू करवाने की लड़ाई में शामिल हजारों अखबार कर्मचारियों को प्रताड़ित करके उनकी नौकरियां छिन ली गई हैं। वेजबोर्ड के तहत वेतन की रिकवरी से जुड़े हजारों विवाद सुप्रीम कोर्ट होते हुए अब श्रम न्‍यायालयों में लंबित चल रहे हैं। इस सबके बावजूद आईएनएस ने जिस ढिठाई से अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड के तहत वेतन देने का हवाला देकर सोनिया गांधी के सरकारी विज्ञापन बंद किए जाने के सुझाव का विरोध किया है वो इनकी बेशर्मी से झूठ बोलने की आदत और धनलोलुपता को ही दर्शाता है। न्‍यूजपेपर इम्‍पलाइज युनियन ऑफ इंडिया(एनईयूआई) का अध्‍यक्ष होने के नाते मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से मांग/आग्रह करता हूं कि कारोना महामारी के इस संकट में सरकार सिर्फ उन्‍हीं सामाचारपत्र संस्‍थानों को सरकारी विज्ञापन जारी करे जो अपने बीओडी के माध्‍यम से प्रस्‍ताव पारित करके इस आशय का शपथपत्र देता है कि उसने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार की 11.11.2011 की अधिसूचना और माननीय सुप्रीम कोर्ट के 07.02.2014 और 19.06.2017 के निर्णय के अनुसार सौ फीसदी लागू किया है और उसके किसी भी कर्मचारी का श्रम न्‍यायालय या किसी अन्‍य न्‍यायालय में वेजबोर्ड से जुड़ा का विवाद लंबित नहीं है। साथ ही इस संस्‍थान के दावे की सत्‍यता के लिए राज्‍य और केंद्र स्‍तर पर श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारियों की युनियनों के सुझाव व आपत्‍तियां लेने के बाद ही इन अखबारों को सरकारी विज्ञापन जारी किए जाएं और वेजबोर्ड लागू ना करने वाले समाचारपत्र संस्‍थानों को सरकारी विज्ञापन देना पूरी तरह बंद किया जाए। ऐसी ही व्‍यवस्‍था राज्‍य सरकारों को भी करने के निर्देश जारी किए जाएं। रविंद्र अग्रवाल वरिष्‍ठ पत्रकार एवं अध्‍यक्ष, एनयूईआई

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Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Spinal problems may increase during work from home.

कोविड-19 की विश्वव्यापी महामारी और देशभर में लॉकडाउन के कारण अधिकांश कामकाजी लोगों को घर से ही काम करने की सलाह दी गई है। हालांकि, इस स्थिति में सोशल डिस्टेंसिंग बहुत जरूरी है, लेकिन लोगों को वर्क फ्रॉम होम के दौरान रीढ़ की समस्याओं को लेकर भी सावधान रहने की आवश्यकता है। एक हालिया अध्ध्यन के अनुसार, 30-40 साल की आयु वर्ग में हर पांचवा भारतीय किसी न किसी प्रकार की रीढ़ की समस्या से पीड़ित है। पिछले एक दशक में, इस समस्या की चपेट में आई युवा आबादी की संख्या में 60 प्रतिशत वृद्धि देखी गई है। रीढ़ की हड्डी की समस्या पहले बुजुर्गों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन आज गतिहीन जीवनशैली और गलत मुद्रा में बैठने के कारण युवा भी इस समस्या का शिकार हो रहे हैं, जो एक चिंता का विषय है। मुंबई स्थित मुंबई स्पाइन स्कोलियोसिस एंड डिस्क रिप्लेसमेंट सेंटर के डॉ. अरविंद कुलकर्णी ने बताया कि, “गतिहीन जीवनशैली, गलत मुद्रा में बैठना, लेट कर लैपटॉप पर काम करना और उठने-बैठने के गलत तरीकों के कारण घर से काम कर रहे लोगों में रीढ़ की समस्याएं विकसित हो सकती हैं। ये सभी फैक्टर रीढ़ और पीठ की मांसपेशियों पर तेज दबाव बनाते हैं। सभी काम झुककर करने से रीढ़ के लीगामेंट्स में ज्यादा खिचाव आजाता है, जिससे पीठ में तेज दर्द के साथ अन्य गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि, एक स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली के साथ इन समस्याओं से बचा जा सकता है। ऐसे में रोज एक्सरसाइज करना, सही तरीके से उठना-बैठना, सही तरीके से झुकना और शरीर को सीधा रखना आदि स्वस्थ रीढ़ के लिए जरूरी है।” आमतौर पर, जो लोग पीठ के निचले हिस्से के दर्द से परेशान रहते हैं, उनमें से 95 प्रतिशत लोगों को लक्षण के पहले महीने में किसी खास टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती है। टूटी रीढ़ जैसी कुछ समस्याएं हैं जो किसी गंभीर समस्या का संकेत देते हैं। ऐसे में पीड़ित के लिए तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी होता है। डॉ. कुलकर्णी ने आगे बताया कि, “वर्क फ्रॉम होम के साथ हमें घर के भी कई काम करने पड़ते हैं। ऐसे में अचानक झटके से उठना, ज्यादा झुकना, गलत तरीके से सामान उठाना, लेटकर लैपटॉप चलाना, लगातार एक ही मुद्रा में काम करना आदि आदतों से दूरी बनाना जरूरी है। काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें और यदि काम ज्यादा है तो किसी से मदद मांग लें। रोजाना एक्सरसाइज और वॉक करें, लेकिन इस दौरान बॉडी स्ट्रेच पर ज्यादा ध्यान दें। एक पोषणयुक्त डाइट लें, जिसमें प्रोटीन, सलाद, फल और हरी सब्जियां भरपूर मात्रा में मौजूद हों। शरीर में विटामिन डी की कमी न हो इसलिए रोज थोड़ी देर धूप में बैठना जरूरी है। यदि आप पेनकिलर दवाएं ले रहे हैं तो ‘आईब्युप्रोफेन’ वाली दवाइयां बिल्कुल न लें क्योंकि ये हमें कमजोर बनाती हैं जिससे हमारा शरीर घातक कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं रख पाता है।”

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Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Lockdown and alcoholic beggars!

Yashwant Singh : भारत में असली ज़रूरतमंद को तलाशना भी एक बड़ा दिमागी गेम है। लोकडौन के नाम पर कुछ बवंडर किस्म के अल्कोहलिक नगद मदद के लिए गुहार लगा रहे, घर में अन्न राशन न होने का दावा कर के। किसी सज्जन पुरुष के फोन करने पर पर्याप्त रो-गा भी देते हैं ताकि नौटंकी में कोई कमी न रहे। मित्रों ने उनकी हजार पांच सौ नगद भेजने की मांग अनसुनी कर उसकी जगह पर्याप्त अन्न राशन भिजवा दिया है। खुद को फ़क़ीर बताने वाले ऐसे अल्कोहलिकों से सावधान रहें। नगद की जगह अन्न ही भिजवाएं। ये साले पियक्कड़ कई दिन दारू न मिलने पर आखिरी दांव भयंकर इमोशनल वाला ही खेलते हैं! जिनके बारे में बात कर रहा हूं वो पूर्व परिचित है। उसके नाटक मैं बारह पंद्रह साल से जानता हूँ। वो मेरी मित्र मंडली के लोगों को इमोशमल ब्लैकमेल कर रहा था। फिर भी उस तक अन्न राशन के अलावा बोतल भर पीने के लिए लोगों ने मदद पहुंचा दी है। मालूम हो कि लॉक डाउन में जगह जगह ब्लैक में दारू बिक रही है। एल्कोहलिक किस्म के प्राणी ब्लैक वाली दारू खरीदने का सामर्थ्य न होने के चलते भांति भांति तरीकों के बहानों से लोगों से पैसे मांग रहे हैं।

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Dakhal News 10 April 2020


bhopal, Tabligi Jama Coronas hotspot and mask issue in news headlines

तबलीगी जमात के जलसे में शामिल अधिकतर लोगों के कोरोना संक्रमित होने से पूरे देश में कोहराम मच गया है। निजामुद्दीन को संक्रमण का केंद्र माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल लोगों से अब अन्य 20 राज्यों में भी कोरोना का संक्रमण फैलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म होता जा रहा है। निजामुद्दीन केंद्र के कोविड-19 मामलों से देश में खतरे की घंटी बज गयी है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के पुख्ता इंतजाम के दावे भी किये जा रहे हैं। आइए देखते हैं अंग्रेजी औऱ हिंदी अखबारों ने किन खबरों को कितनी अहमियत दी है। द हिंदू में सौरभ त्रिवेदी और निखिल एम.बाबू की रिपोर्ट जिसका शीर्षक हिंदी मे कुछ इस प्रकार होगा- तबलीगी जमात के अधिकारियों पर कानून तोड़ने का आरोप। इस खबर में बताया गया है कि निजामुद्दीन थाने में मरकज के प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद व अन्य पर केस दर्ज किया गया। इस खबर में बताया गया है कि चार सौ से अधिक लोगों को कोविड 19 के लक्षण देख कर अस्पताल में दाखिल कराया गया और तकरीबन एक हजार लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है। अधिकारियों को डर है कि जो लोग यहां से दूसरे शहरों में अपने घरों में जा पहुंचे हैं, वो सभी न जाने कितने और लोगों को संक्रमित किया होगा। इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है। इनके खिलाफ आईपीसी के तहत बीमारी फैलाने के लिए लापरवाही बरतने, घातक व नुकसानदेरह काम करने, दूसरे की जान जोखिम में डालने, सरकारी आदेश के उल्लंघन और आपराधिक षडयंत्र के अलावा महामारी एक्ट 1897 के तहत केस दर्ज हुआ है। इसी अखबार में जेकॉब कोशी की बाइलाइन से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका शीर्षक है- मास्क के इस्तेमाल पर स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर में मतभेद। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच मास्क पहनने और न पहनने को लेकर मतभेद सामने आये हैं। द हिंदू में ही शोभना के.नायर और जेबराज की रिपोर्ट का शीर्षक है- जबरन रोके गये मजदूर, अब भूखमरी से लड़ रहे। इस रिपोर्ट में प्रवासी मजदूरों के दर्द और तकलीफ को बयां किया गया है। इस खबर में बताया गया है कि विश्व में कोरोना वायरस का सामना कर रहे अधिकतर देशों ने घर में रहें, सुरक्षित रहें पर अमल करने की कोशिश की है। भारत में भी लॉकडाउन जारी कर हर नागरिक को घरों में रहने की हिदायत दी जा रही है। सीमाओं को भी सील किया जा चुका है ताकि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। ऐसे हालात में बिना काम और पैसों की किल्लत से परेशान मजदूरों और गरीबों को भूखमरी का सामना करना पड़ रहा है। सच तो यही है कि सरकार भले ही कितने भी दावे कर ले मगर गरीबों के रहने खाने का भरपूर प्रबंध नहीं हो पाया है। द इंडियन एक्सप्रेस में अबंतिका घोष की जो रिपोर्ट छपी है उसका शीर्षक है- आईसीएमआर ने माना भारत में अब भी संक्रमण कम है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तबलीगी जमात से देश भर में संक्रमण फैलने की आशंका के बाद भी आईसीएमआर को अब भी यकीन है कि विश्व में जिस तेजी से कोरोना का कहर बढ़ रहा है उसके मुकाबले भारत में संक्रमण अब भी कम है। सरकार के बाद भारत की प्रमुख संस्थाओं से इस तरह के बयान जारी कर यकीनन जनता के डर को कम करने की कवायद ही की जा रही है। इसी अखबार में सौम्या लखानी और सौरभ रायबर्मन की रिपोर्ट छपी है। इस खबर में लिखा है कि निजामुद्दीन केंद्र को खाली कराया गया है औऱ केजरीवाल ने मामले बढ़ने पर चेताया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इसे गैरजिम्मेदाराना करार दिया है। इसी बीच आप के विधायक अमानतुल्ला खान ने दिल्ली पुलिस को कटघरें में खड़ा कर सवाल दाग दिया कि उनके सूचना देने के बाद भी आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाया गया। देश कोरोना के कहर से जूझ रहा है। मगर केंद्र और राज्य सरकारें अब आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुट गयी हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की जगह दूसरे पर ही दोष मढ़ने में व्यस्त हो गया है। द हिंदू में एक चौंकाने वाली खबर आत्री मित्रा के नाम से प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है- 24 घंटों में तीन मौतें, एक मरीज जनरल वार्ड मे था। हावड़ा के अस्पताल में कोरोना वायरस से पीड़ित 48 वर्षीय महिला की मौत के बाद काफी हंगामा मचा है। महिला की मौत के बाद अस्पताल के 29 कर्मचारियों को क्वारंटाइन में रखा गया है। आरोप है कि महिला को जनरल वार्ड में रखा गया था। इसी बीच कोरोना के दो मरीजों की मौत की खबर आयी है जिसमें एक हावड़ा के 52 वर्षीय व्यक्ति और कोलकाता के एक 62 वर्षीय व्यक्ति शामिल हैं। पिछले चौबीस घंटों में कोरोना से तीन लोगों की मृत्यु के बाद से पश्चिम बंगाल में कोरोना से मरने वालों की संख्या पांच हो गयी है जबकि 37 लोग कोरोना से संक्रमित पाये गये हैं। हिंदी अखबारों में आज सबसे पहले अमर उजाला की बात करते हैं जिसकी लीड खबर का शीर्षक है- देश भर में खौफ का वायरस, 74 और जमाती संक्रमित। इस खबर में बताया गया है कि देश में कोरोना वायरस के मरीज लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। निजामुद्दीन मे आयोजित तबलीगी जमात का जलसा देश में कोरोना के संक्रमण का बड़ा स्त्रोत बन चुका है। जलसे में देश के 20 राज्यों के साथ-साथ 16 देश के जमाती भी शामिल हुए थे। इसके अलावा रूटिन खबरें छपी हैं जिसमें कोरोना के मरीजों के लगातार बढ़ते मामलों का जिक्र किया गया है। दिल्ली में तीसरे दिन भी 23 नए रोगी मिलने की पुष्टि हुई है। इसी बीच एक खबर और भी छपी है जिसका शीर्षक है- तब्लीगी कार्यक्रमों के लिए नहीं मिलेगा पर्यटक वीजा। हिंदुस्तान ने दूसरे अखबारों की तरह निजामुद्दीन की खबर को ही लीड बनाया है जिसमें बताया गया है कि मरकज ने 20 राज्यों को मुश्किल में डाला है। हालांकि पटना संस्करण में कुछ एक्सक्लूसिव खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। इस खबर का शीर्षक है- 85 लाख उज्ज्वला लाभार्थी आज से खाते में पाएंगे गैस की राशि। राहत की खबर बताते हुए हिंदुस्तान में लिखा है कि पटना में रसोई गैस सिलेंडर 65 रुपये सस्ता कर दिया गया है। इस खबर के अनुसार बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में एक अप्रैल से कमी की गयी है। पटना में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 65 रुपये घटा दिया गया है। इन सबके साथ ही सरकार कितनी तेजी से हालात नियंत्रित कर रही है। इसका पक्ष रखते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बारे में भी एक खबर छापी गयी है जिसका शीर्षक है- स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेटंर में सरकारी कर्मी तैनात हों– सीएम। हिंदुस्तान ने लिखा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि गांवों के स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेंटर में लोगों के ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था रखें। इन केंद्रों पर सरकारी कर्मचारी को प्रभारी बनाकर बेहतर ढंग से काम कराएं। जाहिर है अखबारों में इन खबरों से यही संदेश दिये जाने की कोशिश की जा रही है कि कोरोना के कोहराम से लड़ने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। सरकार की तरफ से कोताही नहीं बरती जा रही है। नवभारत टाइम्स ने भी निजामुद्दीन की खबर को ही लीड लिया है। मगर एंकर में आर्थिक पहलू का जिक्र करते हुए सिंगल कॉलम में छोटी सी खबर प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है- छोटी बचत की ब्याज दरों में बड़ी कटौती। जबकि कोरोना का कहर झेल रही जनता की जेब पर सरकार के इस कदम से कितना भारी बोझ बढ़ेगा। इसका ब्यौरा देते हुए इस खबर को प्रमुखता दी जानी चाहिए थी। इसी खबर के साथ नवभारत में एक खबर और छापी गयी है जिसमें बताया गया है कि भीषण मंदी का साया है पर भारत-चीन बच सकते हैं। पाठकों को राहत देने के मकसद से ही इस खबर को छाप दिया गया है जिससे लोग आश्वस्त रहें कि उनकी मुश्किलें ज्यादा नहीं बढ़ेंगी। दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपी एंकर स्टोरी ने ध्यान आकर्षित किया है । इस खबर में बताया गया है कि न्यूयार्क इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोध के अनुसार बीसीजी का टीका कोरोना की ढाल बन सकता है। इस खबर की मानें तो जिन देशों में बीसीजी का टीका नहीं लगा, वहां कोरोना का खतरा ज्यादा है। अमेरिकी शोध संस्थान ने विश्व भर में फैले कोरोना संक्रमण की वर्तमान स्थिति के आधार पर भविष्य की स्थित का आंकलन किया है। इसके परिणाम भारत सहित उन देशों के लिए सुखद हैं, जहां सालों से बीसीजी ( बैसिलस कैलमेट-गुएरिन ) का टीका लगता आया है। इसी खबर की बगल में सिंगल कॉलम में एक खबर छपी है। यह खबर है पीएम मोदी की मां हीराबेन के बारे में जिन्होंने 25,000 रुपये की मदद की है। पीएम केयर्स फंड में हीराबेन ने बचत के पैसे दान किए हैं। मोदी ने ट्वीट कर कहा यह मां का आशीष है। हैरत की बात है कि टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया में छाए रहने वाले पीएम मोदी की मां की यह खबर हाशिए पर रही। यह भी कोई विशेष रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। शायद यही की पीएम अपने सगे संबंधियों ही नहीं मां से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से नहीं छपवाते। पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

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Dakhal News 2 April 2020


bhopal, Read these lead news, Telegraph , light in your brain too!

देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत जानिए… नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अप्रैल को दिया जलाने का अनुरोध किया है। ज्यादा अच्छा हो जो हम देश में स्वास्थ्य के इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करें ताकि टोने टोटके की जरूरत ही न पड़े। दिमाग में ज्ञान की बत्ती जलाना जरूरी है। इतने बड़े देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए जो स्वास्थ्य सुविधा होनी चाहिए, वो बिलकुल भी नहीं है, ये एक कटु सत्य है। बाकी अखबार जब मोदी जी के गुणगान में लगे हैं तो टेलीग्राफ ने हेल्थ सेक्टर के बारे में बात कर सोचने को मजबूर किया है। आज के द टेलीग्राफ अखबार में छपी लीड खबर देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़मीनी हकीकत बयां कर रही है। जी.एस.मुदुर की बाइलाइन से छपी रिपोर्ट में लिखा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में सबसे आगे खड़े स्वास्थ्य कर्मियों के पास व्यक्तिगत सुरक्षा किट-पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) तक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि डॉक्टरों में भी यह संक्रमण तेजी से फैल रहा है। सरकार के ढुलमुल रवैये से स्वास्थ्य सेवा में जुटा समुदाय बेहद परेशान है। कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों, नर्सों और तमाम दूसरे सहयोगी कर्मचारियों में भी संक्रमण फैलने का खौफ बढ़ता ही जा रहा। वे ड्यूटी तो निभा रहे हैं मगर वे सभी यह सोचकर परेशान हैं कि उनकी वजह से उनका परिवार भी संक्रमित हो सकता है। इस खबर की माने तो देश भर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ के पास मास्क और आवश्यक किट की कमी होने की वजह से वे सभी कोरोना से संक्रमित होते जा रहे हैं। कुछ डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें नियमित रूप से नए मास्क नहीं मिल रहे हें। कोरोना से बचाने वाली कंप्लीट पीपीई किट सबको नहीं मिल पा रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, गृह मंत्रालय से भी सही आंकड़े न मिलने पर स्वास्थ्य सेवा समुदाय सोशल मीडिया और अपने संपर्कों से दस्तावेज इक्ट्ठा कर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कितने लोगों को संक्रमित किया है। रिपोर्ट में एम्स के वरिष्ठ डाक्टर का कहना है कि जिन्हें कोरोना वायरस की ड्यूटी नहीं दी गयी थी ऐसे डॉक्टर भी कोरोना की गिरफ्त में हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के चार डॉक्टरों और कुछ नर्सों ने अपना इस्तीफा भेजा था। उल्टा इन डाक्टरों को उत्तरी दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन की तरफ से सख्त कार्रवाई की सूचना भेज दी गयी। म्युनिसिपल की तरफ से भेजे गये संदेश में साफ कहा गया कि इन डाक्टरों और नर्सों के इस्तीफों को स्वीकार नहीं किया जायेगा और इनके नाम मेडिकल काउंसिल या नर्सिंग काउंसिल को भेज कर इनके खिलाफ अनशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी। टेलीग्राफ की इस रिपोर्ट में नयी दिल्ली एम्स के रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के महासचिव श्रीनिवास राजकुमार के हवाले से बताया गया है कि पूरे देश में कोरोना वायरस से लड़ रहे डाक्टरों और नर्सों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिनसे वह खुद इस बीमारी से बच सकें। राजकुमार ने बताया कि मास्क और तमाम सुरक्षित संसाधनों की कमी की वजह से डॉक्टरों और नर्सों में ही नहीं स्वास्थ्य सेवा में जुटे सभी लोगों में डर का माहौल है। पोस्टग्रेजुएकट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महेश देवनानी ने अपने ट्वीटर हैंडल पर देश भर में कोरोना वायरस से संक्रमित स्वास्थ्य समुदाय से जुड़े लोगों के बारे में तमाम जानकारियां इक्ट्ठा की हैं। इसमें दिल्ली, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित डाक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों की जानकारी मौजूद है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ अस्पतालों में मुहैया किये गये सुरक्षा संसाधनों और मास्क की क्वालिटी इतनी खराब हैं कि इस्तेमाल करते वक्त ही वह खराब हो जा रहे। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि स्वास्थ्य समुदाय नहीं चाहता कि इलाज कर रहे डाक्टर और नर्स खुद इस बीमारी से संक्रमित हो जायें। अगर ऐसा होता है तो वो जिन स्वास्थय कर्मियों के संपर्क में आएं उनका भी पता लगाना होगा। इस प्रकार से यह कड़ी बढ़ती ही जाएगी और हालात को संभालना काफी मुश्किल हो जाएगा। टेलीग्राफ की इस खबर से आसानी से समझा जा सकता है कि कोरोना से जंग लड़ रहे डाक्टरों और दूसरे मेडिकल स्टाफ संसाधनों की कमी की वजह से इस वायरस की चपेट में आने का जोखिम उठा रहे हैं। मगर सरकार अपनी पीठ थपथपाते नहीं थक रही कि स्वास्थ्य सुविधाओं में कहीं कोई कमी नहीं है। कोलकाता की पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

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Dakhal News 4 April 2020


bhopal, Why not  insurance, journalists coverage, Corona period

भारत सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संस्था प्रेस एसोसियेशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि कोरोना वायरस के खतरे के तहत अस्पतालों में जुटे डॉक्टर्स, नर्स और अन्य मेडिकल सेवा के लिए जिस तरह पचास लाख के इंश्योरेंस की घोषणा की गई वैसे ही पत्रकारों के लिए भी इंश्योरेंस की घोषणा की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने कोरोना की विषम परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवा में जुटे मेडिकल सेवा के लिए पचास लाख रुपए इंश्योरेंस की घोषणा की है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में प्रेस एसोसिएशन ने अनुरोध किया है कि मेडिकल सेवा के साथ उस लिस्ट में पत्रकारों को भी जोडा जाए। प्रधानमंत्री को याद दिलाया गया कि मीडिया के कामकाज को जरूरी सेवाओं में शामिल कर उनके कामकाज का उन्होंने खुद अभिवादन किया है। प्रेस एसोसिएशन ने कहा कि पत्रकारों के लिए भी इंश्योरेंस सेवा लागू होने से ग्राउंड ज़ीरो से पल पल की खबरें देश को पहुंचा रहे, राष्ट्र सेवा में जुटे पत्रकारों और उनके परिजनों को लगेगा कि केंद्र सरकार को उनकी भी उतनी ही चिंता है।

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Dakhal News 4 April 2020


bhopal, Tabligi Jama Corona

तबलीगी जमात के जलसे में शामिल अधिकतर लोगों के कोरोना संक्रमित होने से पूरे देश में कोहराम मच गया है। निजामुद्दीन को संक्रमण का केंद्र माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल लोगों से अब अन्य 20 राज्यों में भी कोरोना का संक्रमण फैलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म होता जा रहा है। निजामुद्दीन केंद्र के कोविड-19 मामलों से देश में खतरे की घंटी बज गयी है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के पुख्ता इंतजाम के दावे भी किये जा रहे हैं। आइए देखते हैं अंग्रेजी औऱ हिंदी अखबारों ने किन खबरों को कितनी अहमियत दी है। द हिंदू में सौरभ त्रिवेदी और निखिल एम.बाबू की रिपोर्ट जिसका शीर्षक हिंदी मे कुछ इस प्रकार होगा- तबलीगी जमात के अधिकारियों पर कानून तोड़ने का आरोप। इस खबर में बताया गया है कि निजामुद्दीन थाने में मरकज के प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद व अन्य पर केस दर्ज किया गया। इस खबर में बताया गया है कि चार सौ से अधिक लोगों को कोविड 19 के लक्षण देख कर अस्पताल में दाखिल कराया गया और तकरीबन एक हजार लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है। अधिकारियों को डर है कि जो लोग यहां से दूसरे शहरों में अपने घरों में जा पहुंचे हैं, वो सभी न जाने कितने और लोगों को संक्रमित किया होगा। इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है। इनके खिलाफ आईपीसी के तहत बीमारी फैलाने के लिए लापरवाही बरतने, घातक व नुकसानदेरह काम करने, दूसरे की जान जोखिम में डालने, सरकारी आदेश के उल्लंघन और आपराधिक षडयंत्र के अलावा महामारी एक्ट 1897 के तहत केस दर्ज हुआ है। इसी अखबार में जेकॉब कोशी की बाइलाइन से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका शीर्षक है- मास्क के इस्तेमाल पर स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर में मतभेद। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के दफ्तर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच मास्क पहनने और न पहनने को लेकर मतभेद सामने आये हैं। द हिंदू में ही शोभना के.नायर और जेबराज की रिपोर्ट का शीर्षक है- जबरन रोके गये मजदूर, अब भूखमरी से लड़ रहे। इस रिपोर्ट में प्रवासी मजदूरों के दर्द और तकलीफ को बयां किया गया है। इस खबर में बताया गया है कि विश्व में कोरोना वायरस का सामना कर रहे अधिकतर देशों ने घर में रहें, सुरक्षित रहें पर अमल करने की कोशिश की है। भारत में भी लॉकडाउन जारी कर हर नागरिक को घरों में रहने की हिदायत दी जा रही है। सीमाओं को भी सील किया जा चुका है ताकि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। ऐसे हालात में बिना काम और पैसों की किल्लत से परेशान मजदूरों और गरीबों को भूखमरी का सामना करना पड़ रहा है। सच तो यही है कि सरकार भले ही कितने भी दावे कर ले मगर गरीबों के रहने खाने का भरपूर प्रबंध नहीं हो पाया है। द इंडियन एक्सप्रेस में अबंतिका घोष की जो रिपोर्ट छपी है उसका शीर्षक है- आईसीएमआर ने माना भारत में अब भी संक्रमण कम है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तबलीगी जमात से देश भर में संक्रमण फैलने की आशंका के बाद भी आईसीएमआर को अब भी यकीन है कि विश्व में जिस तेजी से कोरोना का कहर बढ़ रहा है उसके मुकाबले भारत में संक्रमण अब भी कम है। सरकार के बाद भारत की प्रमुख संस्थाओं से इस तरह के बयान जारी कर यकीनन जनता के डर को कम करने की कवायद ही की जा रही है। इसी अखबार में सौम्या लखानी और सौरभ रायबर्मन की रिपोर्ट छपी है। इस खबर में लिखा है कि निजामुद्दीन केंद्र को खाली कराया गया है औऱ केजरीवाल ने मामले बढ़ने पर चेताया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इसे गैरजिम्मेदाराना करार दिया है। इसी बीच आप के विधायक अमानतुल्ला खान ने दिल्ली पुलिस को कटघरें में खड़ा कर सवाल दाग दिया कि उनके सूचना देने के बाद भी आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाया गया। देश कोरोना के कहर से जूझ रहा है। मगर केंद्र और राज्य सरकारें अब आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुट गयी हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की जगह दूसरे पर ही दोष मढ़ने में व्यस्त हो गया है। द हिंदू में एक चौंकाने वाली खबर आत्री मित्रा के नाम से प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है- 24 घंटों में तीन मौतें, एक मरीज जनरल वार्ड मे था। हावड़ा के अस्पताल में कोरोना वायरस से पीड़ित 48 वर्षीय महिला की मौत के बाद काफी हंगामा मचा है। महिला की मौत के बाद अस्पताल के 29 कर्मचारियों को क्वारंटाइन में रखा गया है। आरोप है कि महिला को जनरल वार्ड में रखा गया था। इसी बीच कोरोना के दो मरीजों की मौत की खबर आयी है जिसमें एक हावड़ा के 52 वर्षीय व्यक्ति और कोलकाता के एक 62 वर्षीय व्यक्ति शामिल हैं। पिछले चौबीस घंटों में कोरोना से तीन लोगों की मृत्यु के बाद से पश्चिम बंगाल में कोरोना से मरने वालों की संख्या पांच हो गयी है जबकि 37 लोग कोरोना से संक्रमित पाये गये हैं। हिंदी अखबारों में आज सबसे पहले अमर उजाला की बात करते हैं जिसकी लीड खबर का शीर्षक है- देश भर में खौफ का वायरस, 74 और जमाती संक्रमित। इस खबर में बताया गया है कि देश में कोरोना वायरस के मरीज लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। निजामुद्दीन मे आयोजित तबलीगी जमात का जलसा देश में कोरोना के संक्रमण का बड़ा स्त्रोत बन चुका है। जलसे में देश के 20 राज्यों के साथ-साथ 16 देश के जमाती भी शामिल हुए थे। इसके अलावा रूटिन खबरें छपी हैं जिसमें कोरोना के मरीजों के लगातार बढ़ते मामलों का जिक्र किया गया है। दिल्ली में तीसरे दिन भी 23 नए रोगी मिलने की पुष्टि हुई है। इसी बीच एक खबर और भी छपी है जिसका शीर्षक है- तब्लीगी कार्यक्रमों के लिए नहीं मिलेगा पर्यटक वीजा। हिंदुस्तान ने दूसरे अखबारों की तरह निजामुद्दीन की खबर को ही लीड बनाया है जिसमें बताया गया है कि मरकज ने 20 राज्यों को मुश्किल में डाला है। हालांकि पटना संस्करण में कुछ एक्सक्लूसिव खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। इस खबर का शीर्षक है- 85 लाख उज्ज्वला लाभार्थी आज से खाते में पाएंगे गैस की राशि। राहत की खबर बताते हुए हिंदुस्तान में लिखा है कि पटना में रसोई गैस सिलेंडर 65 रुपये सस्ता कर दिया गया है। इस खबर के अनुसार बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में एक अप्रैल से कमी की गयी है। पटना में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 65 रुपये घटा दिया गया है। इन सबके साथ ही सरकार कितनी तेजी से हालात नियंत्रित कर रही है। इसका पक्ष रखते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बारे में भी एक खबर छापी गयी है जिसका शीर्षक है- स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेटंर में सरकारी कर्मी तैनात हों– सीएम। हिंदुस्तान ने लिखा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि गांवों के स्कूलों में बने क्वारंटाइन सेंटर में लोगों के ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था रखें। इन केंद्रों पर सरकारी कर्मचारी को प्रभारी बनाकर बेहतर ढंग से काम कराएं। जाहिर है अखबारों में इन खबरों से यही संदेश दिये जाने की कोशिश की जा रही है कि कोरोना के कोहराम से लड़ने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। सरकार की तरफ से कोताही नहीं बरती जा रही है। नवभारत टाइम्स ने भी निजामुद्दीन की खबर को ही लीड लिया है। मगर एंकर में आर्थिक पहलू का जिक्र करते हुए सिंगल कॉलम में छोटी सी खबर प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है- छोटी बचत की ब्याज दरों में बड़ी कटौती। जबकि कोरोना का कहर झेल रही जनता की जेब पर सरकार के इस कदम से कितना भारी बोझ बढ़ेगा। इसका ब्यौरा देते हुए इस खबर को प्रमुखता दी जानी चाहिए थी। इसी खबर के साथ नवभारत में एक खबर और छापी गयी है जिसमें बताया गया है कि भीषण मंदी का साया है पर भारत-चीन बच सकते हैं। पाठकों को राहत देने के मकसद से ही इस खबर को छाप दिया गया है जिससे लोग आश्वस्त रहें कि उनकी मुश्किलें ज्यादा नहीं बढ़ेंगी। दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपी एंकर स्टोरी ने ध्यान आकर्षित किया है । इस खबर में बताया गया है कि न्यूयार्क इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोध के अनुसार बीसीजी का टीका कोरोना की ढाल बन सकता है। इस खबर की मानें तो जिन देशों में बीसीजी का टीका नहीं लगा, वहां कोरोना का खतरा ज्यादा है। अमेरिकी शोध संस्थान ने विश्व भर में फैले कोरोना संक्रमण की वर्तमान स्थिति के आधार पर भविष्य की स्थित का आंकलन किया है। इसके परिणाम भारत सहित उन देशों के लिए सुखद हैं, जहां सालों से बीसीजी ( बैसिलस कैलमेट-गुएरिन ) का टीका लगता आया है। इसी खबर की बगल में सिंगल कॉलम में एक खबर छपी है। यह खबर है पीएम मोदी की मां हीराबेन के बारे में जिन्होंने 25,000 रुपये की मदद की है। पीएम केयर्स फंड में हीराबेन ने बचत के पैसे दान किए हैं। मोदी ने ट्वीट कर कहा यह मां का आशीष है। हैरत की बात है कि टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया में छाए रहने वाले पीएम मोदी की मां की यह खबर हाशिए पर रही। यह भी कोई विशेष रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। शायद यही की पीएम अपने सगे संबंधियों ही नहीं मां से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से नहीं छपवाते। पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

Dakhal News

Dakhal News 2 April 2020


bhopal, Poster of Sonia Gandhi missing in Rae Bareli

अजय कुमार, लखनऊ लखनऊ। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में 26 मार्च की रात ‘लापता सांसद’ के पोस्टर लगाए गए। रविवार की सुबह जब लोगों की नजर इन पोस्टरों पर पड़ी तो चर्चा शुरू हो गई। इन पोस्टरों में सोनिया गांधी के संकट की इस घड़ी में अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर होने पर सवाल उठाए गए। पोस्टर के शीर्षक में ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा नजर आ रहा है। इतना ही नहीं पोस्टर में सबसे अमीर सांसदों में से एक कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा चुनाव क्षेत्र में कोई वित्तीय सहायता नहीं देने पर भी सवाल उठाया गया। पोस्टर में आगे लिखा है, ‘तुम्हारा हाथ, न जाने हमारा साथ,’ ‘सबसे बुरी भूल, तुमको किया कबूल’ भी लिखा नजर आ रहा था। गौरतलब हो इस तरह के पोस्टर चिपकाए जाने से एक दिन 27 मार्च को ही सोनिया गांधी ने रायबरेली के जिला मजिस्ट्रेट को एक पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में कोरोनो वायरस का मुकाबला करने के लिए एमपीएलएडी योजना के तहत सभी निधियां देने का वादा किया था। बहरहाल, इस पोस्टर में किसी का नाम नहीं है और प्रिंटर का नाम भी नहीं दिया गया है जो कि अनिवार्य होता है। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का कहना था कि इन पोस्टरों के सहारे कुछ लोगों ने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की मानसिकता को दर्शाया है, जो इस संकट के समय का उपयोग राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं। सोनिया गांधी हमेशा अपने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ी रही हैं और दो दिन पहले ही उन्होंने कोरोना संकट के लिए अपना सारा फंड दे दिया। जनता सच्चाई जानती है और इस निम्न स्तर की राजनीति से गुमराह नहीं होगी। कांग्रेस जिलाध्यक्ष पंकज कुमार ने पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की और जिला प्रशासन से इस पर ध्यान देने को कहा है।

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Dakhal News 2 April 2020


bhopal, The noise in the media on the corona will now cease to be shown

क्या मीडिया में लॉकडाउन की परेशानी का शोर अब थम जाएगा…. मेरा मानना है कि कोरोना पर मीडिया में शोर अब थम जाएगा। जो दिखाना था दिखा लिया गया। अब मजदूरों के पलायन की चर्चा रुक जाएगी। राहत सामग्री बंटने की खबरें दिखेंगी और अब सब ठीक बताया जाएगा। इसका कारण यह है कि सरकार ऐसे ही काम करती है। जमीन पर काम करने से ज्यादा अखबारों में और अखबार वाले खुशी-खुशी सेवा करते हैं। निश्चित रूप से खबरों का चयन संपादकीय विवेक और प्राथमिकता का मामला है और पहले पन्ने पर खबर नहीं होने का मतलब नहीं है कि खबर अखबार में ही नहीं है और पाठक को जानकारी ही नहीं है। फिर भी संपादक अपने अखबार में किस और कैसी खबर को प्राथमिकता देगा यह पहले से तय हो और उसकी भविष्यवाणी की जा सके तो अखबार की खबरों का क्या भरोसा? आइए आपको बताऊं कि आज अखबारों में क्या है। सबसे पहले द टेलीग्राफ का पहला पन्ना देखिए। पहली फोटो एक व्यक्ति के जख्मी पैरों की है। कैप्शन में बताया गया है यह इलाहाबाद की सीमा पर आराम कर रहे एक दिहाड़ी मजदूर के पैर हैं जो जाहिर है, लॉक डाउन के बाद पैदल चलने से जख्मी हो गए हैं। अखबार में एक और फोटो बरेली में पैदल जा रहे लोगों पर कीटनाशकों का छिड़काव किए जाने की खबर के साथ है। मुझे लगता है कि आज के लिए ये दोनों खबरें सबसे महत्वपूर्ण हैं। पर मीडिया क्या बता रहा है? पैदल निकले प्रवासी मजदूरों को रास्ते में मना लिया गया है। वे सरकारी व्यवस्था में हैं। उन्हें ठीक से खाना मिल रहा है और रास्ते पर कोई नहीं है। सरकार यही बताना चाहेगी और अखबार यही बता रहे हैं। या चुप हैं। वरना ये दो खबरें सभी अखबारों में पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। पैदल चलने वाले मजदूर के जख्मी पैर की फोटो हिन्दी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें किसी में नहीं है। पैदल जा रहे मजदूरों पर कीटनाशक छिड़कने की खबर (फोटो के साथ, पहले पन्ने पर) अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका में है। अमर उजाला की पूरी खबर कोरोना से संबंधित है और प्रवासी मजदूर सड़क पर हैं, उनके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ इससे ज्यादा प्रमुखता मरीजों और मरने वालों की संख्या को दी गई है। प्रवासियों की स्थिति बताना सरकारी व्यवस्था की पोल खोलना है पर जो मौतें हो रही हैं वह सरकारी इंतजामों के बावजूद हो रही है – इसका अंतर आप समझ सकते हैं। यही नहीं, कोरोना से संबंधित कोई भी खबर छापना मना है। पर दैनिक जागरण में खबर है, 23 डिग्री सेल्सियस पर मरे आधे कोरोना वायरस। वाराणसी डेटलाइन से हिमांशु अस्थाना की बाईलाइन वाली खबर में यही बताने की कोशिश की गई है कि कोरोना तो बस गया समझो। गर्मी आई नहीं कि वायरस मरने लगे। अगर यह खबर वाकई गंभीर है तो सभी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से क्यों नहीं होनी चाहिए। और सरकार को ही क्यों नहीं जारी करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि खबर बिल्कुल हवा हवाई है। बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और दिल्ली स्थित आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के डॉ. प्रमोद कुमार ने अपने लैब में शोध से यह निष्कर्ष निकाला है। दैनिक भास्कर (पटना) में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। अब आप इसका जो मतलब लगाना चाहें लगाइए। मैं इसे माहौल बनाना कहता हूं। वह इसलिए भी कि एक तरफ अगर जरूरी खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं तो दूसरी तरफ लॉक डाउन नहीं बढ़ेगा को पूरी प्राथमिकता दी गई है। दैनिक जागरण में यह सेकेंड लीड है जबकि तब्लीगी मरकज में शामिल छह लोगों की तेलंगाना में मौत लीड है। इसका उपशीर्षक है, लॉक डाउन के दौरान निजामुद्दीन में आयोजन में शामिल हुए थे। अमर उजाला ने इसे सात कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है। और इसके साथ ऐसी तस्वीर है कि आप कपड़े देखकर इनका धर्म जान लेंगे। लगभग ऐसा ही नवोदय टाइम्स और नवभारत टाइम्स में भी है। हिन्दुस्तान में इसे लीड के साथ छापा गया है और लीड है, लॉकडाउन बढ़ाने का इरादा नहीं। यहां समझने वाली बात यह है कि जब लॉकडाउन बगैर किसी पूर्व सूचना या योजना के लगाया गया तो दोबारा पूर्व सूचना दी जाएगी यह कहां जरूरी है. जब लगाने की जरूरत पहले तय नहीं हो पाई तो बढ़ाने की जरूरत पहले कैसे तय हो सकती है। वैसे भी लाकडाउन की घोषणा किसी ने की और कोई दूसरा कह रहा है कि इसे बढ़ाया नहीं जाएगा। ऐसे में इसे कितना महत्व देना है यह समझना मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद यह राजस्थान पत्रिका में भी लीड है। ऐसा नहीं है कि खबरों का जो महत्व मैं बता रहा हूं वह कोई बहुत महान और गंभीर पत्रकारों को ही समझ में आएगा। इसके बावजूद अलग तरह की खबरों को महत्व देना और असली खबरों को महत्व नहीं देना कुछ संकेत तो देता ही है। हो सकता है मैं गलत होऊं पर पत्रकारिता चल ऐसे ही रही है। राजस्थान पत्रिका में आज पहले पन्ने पर एक खबर है, पैदल घर लौटने की कवायद में 29 कामगार सड़कों पर जान गंवा चुके हैं। क्या यह सामान्य है? या यह सूचना नजरअंदाज करने लायक है पर किसी अखबार में टॉप पर नहीं है। राजस्थान पत्रिका में भी नहीं। इसके साथ यह भी उल्लेखनीय है कि दैनिक हिन्दुस्तान ने पहले पन्ने पर लगभग आधे पेज के साथ सिर्फ एक फोटो छापी है। इसका कैप्शन है, नई दिल्ली के आनंद विहार में बस अड्डे पर सोमवार को लॉकडाउन का पालन कराने के लिए तैनात बीएसएफकर्मी। इससे आपको यह भरोसा होगा कि दिल्ली में अब सब ठीक है और दिल्ली छोड़कर जाना चाहने वाले अब सब संतुष्ट हैं। इसमें यह नहीं पूछेंगे कि केजरीवाल ने इनके घरों की बिजली और पानी के कनेक्शन कटवाए थे उसका क्या हुआ? जुड़ गए या कटे ही नहीं थे? सड़क पर पैदल चलते प्रवासियों के साथ बस पकड़ने आनंद विहार पर जुटी भीड़ को देखकर दुनिया भर में लॉक डाउन नाकाम होने की चर्चा उड़ी तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया गया। भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाए और आम आदमी पार्टी ने अपना भरपूर बचाव किया। कल द टेलीग्राफ में इस आशय की एक खबर भी थी। हिन्दी के पाठकों के लिए मैंने उसका अनुवाद कर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। इसके बावजूद, बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने आरोप लगाया है कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने सुनियोजित तरीकों से बसों में ढूंसकर 50 हजार से अधिक बिहारियों को एक साथ दिल्ली से निकला। दैनिक भास्कर ने पटना संस्करण में इस आरोप को पहले पन्ने पर छापा है लेकिन इस खबर में यह नहीं बताया गया कि वे बिहार पहुंचे कि नहीं और पहुंचे तो सब अपने घर गए या उन्हें एक जगह रखा गया है या रास्ते में कहीं रोक लिया गया। सरकारी प्रचार जैसी एक और खबर आज के दैनिक जागरण में है। इसका शीर्षक है, लॉकडाउन का असर: अब तक थमा है कोरोना वायरस का प्रसार। अमर उजाला में खबर है, एक दिन में 227 और मरीज, सात की मौत। इसका फ्लैग शीर्षक है, 1200 पार हुआ मरीजों का आंकड़ा … देश भर में अब तक 32 की मौत, दिल्ली में 25 और मिले। जबकि दैनिक जागरण की खबर है, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के अनुसार, भारत में कोरोना के मरीजों की संख्या 100 से 1000 पहुंचने में 12 दिन लगे हैं। इसकी तुलना दुनिया के दूसरे विकसित देशों से करें, तो वहां 12 दिनों में संख्या 100 से बढ़कर आठ हजार तक पहुंच गई थी। उन्होंने कहा, इसे आगे बनाए रखने को सौ फीसद अलर्ट रहने व सरकार के निर्देशों का कड़ाई से पालन करने की जरूरत है। लव अग्रवाल ने कोरोना के प्रसार की गति कम होने का श्रेय लॉकडाउन और दूसरे एहतियाती उपायों को देते हुए कहा कि जिन देशों ने समय पर एहतियाती कदम नहीं उठाए, उन देशों में यह बेकाबू होता गया। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों कबरें सही हैं। खेल प्रस्तुति का है।

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Dakhal News 31 March 2020


bhopal, Positive Journalist!

Pushya Mitra : इस वक़्त आप पॉजिटिव पत्रकार कैसे हो सकते हैं? कुछ टिप्स- हर समस्या की वजह विपक्ष और जनता में, गरीबों में, दलितों में, अल्पसंख्यकों में ढूँढिये। राहुल गांधी, केजरीवाल, लालू, नेहरू और पाकिस्तान में ढूँढिये। चीन में ढूँढिये। फिर भी काम न चल रहा हो तो नीतीश जैसों में भी ढूंढ लीजिये। भाजपा, मोदी और उनके लोगों में मत ढूँढिये। सरकार की विफलता की बात मत कीजिये, यह वक़्त सरकार की आलोचना करने का नहीं है। बेचारी हतोत्साहित हो जाएगी। चुप रहकर देखिये, मोदी जी ने किया है, ठीक ही किया होगा। ऐसा लग रहा हो तो राष्ट्र के लिये थोड़ी कुर्बानी दीजिये। कुछ दिन ऐसा करके देखिये। आपको लोग पॉजिटिव मानने लगेंगे। Samarendra Singh : संधी लौंडों को मौका मिल गया है। चौके-छक्के मार रहे हैं। ब्रज में देसी-विदेशी गोपियों संग होली खेल रहे थे तो कोरोना नहीं फैला? 19-20 मार्च तक तिरुपति बालाजी और बाबा जगन्नाथ से लेकर सभी मंदिर खुले थे और भजन कीर्तन जारी था मगर वहां भी कोरोना नहीं फैला! बस 13-15 मार्च को निजामुद्दीन में ही फैला है! इन संधी लौंडों और पंडों को मुल्लों ने और मीडिया ने एक और अवसर दिया है राजनीति करने का अगले कुछ दिन इसी के नाम। जय कोरोना!     निज़ामुद्दीन में लोग छिपे होते हैं। लेकिन वैष्णो देवी में लोग फँसे होते है। शब्दों के बारीक हेरफेर से न्यूज़ में नफ़रत की खेती होती है। विवेक राव

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Dakhal News 31 March 2020


bhopal,  FIR , Corona infected journalist ,former CM, press conference

भोपाल।  मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल पुलिस ने कोरोना वायरस संक्रमित एक पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया है। उक्‍त पत्रकार कोराना (कोविड-19) से संक्रमित था इसके बाद भी वे पूर्व सीएम कमलनाथ की आहूत पत्रकार वार्ता में शामिल होने पहुंच गए थे, जबकि चिकित्‍सकों द्वारा  इस पत्रकार की बेटी के लंदन से वापस लौटने पर कोरोना संक्रमित पाए जाने पर पूरे परिवार को घर में पृथक रहने की सलाह दी गई थी।    उल्‍लेखनीय है कि पूर्व मुख्‍यमंत्री कमलनाथ ने अपने पद से त्‍याग देने के पूर्व पत्रकारों को  20 मार्च को मुख्यमंत्री निवास में प्रेसवार्ता में शामिल होने के लिए बुलाया था। जिसमें कि लगभग सभी प्रमुख मीडिया संस्‍थानों के 200 से अधिक पत्रकार शामिल हुए थे। पत्रकारों से हुई बातचीत के बाद पत्रकार की बेटी और दो दिन बाद स्वयं पत्रकार के कोराना (कोविड-19) के संक्रमण की पुष्टि हुई थी।  वर्तमान में पिता और पुत्री दोनों इलाज के लिए भोपाल के एम्स में भर्ती हैं।    भोपाल पुलिस के प्रवक्ता ने बताया कि शहर के श्यामला हिल्स पुलिस थाने में इस पत्रकार के खिलाफ भादंवि की धारा 188 (सरकारी सेवक के कानूनी आदेश की अवहेलना), धारा 269 (उपेक्षापूर्ण कार्य जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य हो), धारा 270 (परिद्वेषपूर्ण कार्य, जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य हो) के तहत मामला दर्ज किया गया है।  उनका यह भी कहना था कि कोरोना वायरस महामारी से संबंधित सरकार के प्रतिबंधात्मक आदेश का उल्लंघन करने पर पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है ।    इस घटना के बाद प्रदेश की राजधानी में रह रहे अनेक पत्रकारों ने स्‍वयं को होम कोरंटाइन कर लिया है, वहीं कई प्रशासनिक अधिकारी व पूर्व मंत्री एवं विधायक जोकि इस पत्रकार वार्ता में मौजूद थे, उन्‍होंने भी एतिहातन अपने को 14 दिन के लिए परिवार से अलग कर लिया है, जबकि कई लोग इस बीच अपनी कोरोना जांच करा चुके हैं, जिसमें कि अब तक सभी की रिपोर्ट नेगेटिव आई है।    वहीं, पूर्व मंत्री सचिन यादव ने शनिवार को इस बारे में ट्वीट कर जानकारी दी है। साथ ही उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों और अन्य लोगों से भी सावधानी बरतने का आग्रह किया हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा ‘20 मार्च को कमलनाथ जी की आयोजित प्रेसवार्ता में मौजूद एक पत्रकार साथी कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं, इसीलिए सावधानी के तौर पर मैं सेल्फ़-आइसोलेशन में हूँ एवं पत्रकार साथियों से भी अनुरोध है अपना ख्याल रखें। मैं सरकार के सभी आवश्यक निर्देशों का पालन कर रहा हूँ और आप भी करें’।    इसी तरह से कमलनाथ की प्रेस वार्ता में मौजूद ग्वालियर से कांग्रेस विधायक प्रवीण पाठक ने भी सावधानी के तौर पर पहले ही खुद को होम आइसोलेट कर लिया है। वहीं पूर्व पशुपालन मंत्री और भितरवार से कांग्रेस विधायक लाखन सिंह ने भी अपना मेडिकल चेकअप करवाया है । हालांकि डॉक्टर ने सब सामान्य बताया है।    उधर,  प्रशासन ने भी तत्काल पत्रकार और उनके परिवार समेत इनके संपर्क में आए लोगों से होम क्वारेंटाइन की अपील की थी । अब तक ज्‍यादातर की जांच हो चुकी है।  शेष की जांच कराई जा रही है। बतादें कि आरोपी पत्रकार की 26 वर्षीय बेटी लंदन में कानून की पढ़ाई कर रही है1  18 मार्च को उसके लंदन से भोपाल आने पर परिवार को घर में पृथक (होम क्वारेंटाइन) की सलाह दी गई थी लेकिन उसके आने के दो दिन बाद ही, 20 मार्च को ये पत्रकार मुख्यमंत्री निवास पत्रकार प्रेसवार्ता में शामिल होने पहुंच गए थे ।   

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Dakhal News 28 March 2020


 Publication , newspapers, Maharashtra ,closed till 31 March

देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई सहित पूरे महाराष्ट्र में पहली बार ऐसा हुआ है कि समाचार पत्रों का प्रकाशन लगातार हफ्ते भर से ज्यादा दिनों के लिए स्थगित रखना पड़ा हो। नई जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अखबारों को अब 31 मार्च तक के लिए बंद कर दिया गया है। बताते हैं कि पिछले रविवार को मुम्बई सहित आसपास में समाचार पत्रों की प्रिंटिंग पूर्व की तरह हुई लेकिन कोरोना वायरस के खौफ और जनता कर्फ्यू के कारण समाचार पत्र विक्रेताओं ने समाचार पत्रों को बांटने के लिए नहीं खरीदा। इसके बाद प्रिंटिंग पेपर वापस अखबार प्रबंधन के लोगों ने मंगा लिया। उसके बाद रविवार की रात से मुम्बई की लाइफलाइन लोकल ट्रेन बंद हो गयी जिसे देखते हुए अखबारों का प्रकाशन नहीं हुआ। सोमवार को समाचार पत्र विक्रेताओं के संगठन बृहनमुंबई वृतपत्र विक्रेता संघ ने दोपहर 12 बजे उद्योगमंत्री सुभाष देसाई से मुलाकात की जिसमे सभी संगठन के प्रतिनिधियों ने इस चर्चा में हिस्सा लिया। इस चर्चा में दिनोदिन बढ़ रहे कोरोना वायरस के संक्रमण से सुरक्षा को देखते हुए तय किया गया कि 24 मार्च और 25 मार्च को समाचार पत्रों का वितरण नहीं किया जाएगा। उसके बाद अगली परिस्थिति की समीक्षा कर अगला निर्णय 26 मार्च से लिया जाएगा। आज 25 मार्च को फिर समाचार पत्र विक्रेताओं के संगठन के पदाधिकारियों की बैठक हुई जिसमें तय हुआ कि 31 मार्च तक पूरे राज्य में समाचार पत्रों की विक्री नही की जाएगी और 29 मार्च को संगठन की फिर बैठक होगी जिसमें स्थिति की समीक्षा कर आगे की रणनीति तय की जाएगी। उधर, सोमवार देर शाम महाराष्ट्र सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में कर्फ्यू लगा दिया है। राज्य में कर्फ्यू और ऊपर से लोकल ट्रेन बन्द और 14 अप्रैल तक राष्ट्र व्यापी लॉक डाउन।जब तक लोकल चालू नहीं होगी तब तक ज्यादातर प्रिंट मीडिया के कर्मी घर पर रहेंगे। ऐसे में महाराष्ट्र में अखबारों का प्रकाशन कब शुरू होगा कोई नहीं जानता। आपको बता दें की ऐसा पहली बार हुआ है जब इतने लंबे समय तक मुम्बई में लोकल ट्रेन और समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद रहेगा। कुछ अखबार ऑनलाइन एडिशन अपडेट कर रहे हैं और रिपोर्टरों को बोलकर खबर मंगा रहे हैं। उधर राज्य सरकार और महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने एक आदेश जारी किया है कि राज्य में कोरोना वायरस से सुरक्षा के लिए सभी निजी कंपनियों को बंद किया जा रहा है। सरकारी परिपत्रक में कहा गया है कि न तो कर्मचारी को हटाना है और न ही उनका वेतन काटना है। कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर है।   शशिकांत सिंहपत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट

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Dakhal News 25 March 2020


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भोपाल। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी श्री सुधीर कुमार डेहरिया ने बताया कि विगत दिनों कोरोना संक्रमण पॉजिटिव पाई गई लड़की के पिता का कोरोना संक्रमण सेम्पल भी पॉजिटिव आया है। सीएचएमओ डेहरिया ने बताया कि के.के. सक्सेना के संपर्क में आये प्रत्येक व्यक्ति को 14 दिन तक होम आइसोलेशन में रहने की आवश्यकता है। 6 से 7 दिनों में सर्दी, खासी, बुखार आने पर तुरन्त कंट्रोल रूम से संपर्क करने की हिदायत दी जा रही है। लड़की के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार मिलने जुलने वाले 10 व्यक्तियों के सैंपल जांच हेतु भेजे गए थे। उनमें से 9 लोगो के टेस्ट नेगेटिव आए है , उनकी माताजी, भाई, घर मे काम करने वाले लोगो की रिपोर्ट नेगेटिव आइ है।   केवल उनके पिताजी का टेस्ट पॉजिटिव आया है जिन्हे इलाज हेतु एम्स हॉस्पिटल में भर्ती कराया जा रहा है।श्री डेहरिया ने आमजन से अपील की है कि किसी को पेनिक होने या घबराने की आवश्यकता नहीं है लड़की और पिताजी भी नार्मल है दोनों का इलाज एम्स में चल रहा है। साथ ही साथ कोरोना पॉजिटिव आए व्यक्ति से क्लोज कॉन्टैक्ट मे आए व्यक्तियों को स्वयं को 14 दिन तक होम क्वारेन्टाईन करने की हिदायत भी दी गई है।

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Dakhal News 25 March 2020


bhopal,  Through letter, Digvijay Singh, scandal on Scindia, auctioned ,mandate of MP

भोपाल। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बनने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मंगलवार को पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कटाक्ष करते हुए लिखा है कि सिंधिया मध्य प्रदेश के जनादेश को नीलाम कर गए। दिग्विजय सिंह ने यह पत्र सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है।  उन्होंने लिखा है कि पिछले दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ी और कांग्रेस की सरकार गिर गई। यह बेहद दुखद घटनाक्रम है जिसने न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं बल्कि उन सभी नागरिकों की आशाओं पर पानी फेर दिया, जो कांग्रेस की विचारधारा में यकीन रखते हैं। मुझे बेहद दुख है कि सिंधिया उस वक्त भाजपा में गए, जब वह खुलकर आरएसएस के असली एजेंडा को लागू करने के लिए देश को बांट रही है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि सिंधिया को कांग्रेस में उचित पद और सम्मान मिलने की संभावना समाप्त हो गई थी, इसलिए वह भाजपा में चले गए, लेकिन यह गलत है।सिंधिया गैर जिम्मेदार व्यक्ति को बनाना चाहते थे उपमुख्यमंत्रीदिग्विजय सिंह ने पत्र में आगे लिखा कि कांग्रेस ने सिंधिया को 2013 में प्रदेश अध्यक्ष बनाने का ऑफर दिया था, लेकिन तब वे केन्द्र में मंत्री बने रहे। फिर 2018 में चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपने समर्थक तुलसी सिलावट के नाम की पेशकश कर दी। कमलनाथ सिलावट को उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। सिलावट न सिर्फ भाजपा में ऐसे वक्त में जब राज्य में कोरोना वायरस की महामारी से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्री के नाते उन्हीं की थी। सिंधिया ऐसे गैर जिम्मेदार व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जो कांग्रेस की विचारधारा के प्रति बेईमान निकला।स्पेस छीनने के आरोप निराधारदिग्विजय सिंह ने पत्र में लिखा है कि सिंधिया के वैचारिक विश्वासघात को सम्माननीय बनाने के लिये सहानुभूति की आड़ लेने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि कमलनाथ और दिग्विजय ने पार्टी में उनका स्पेस छीन लिया था। इसीलिए पार्टी में वह घुटन महसूस कर रहे थे। यह आरोप निराधार हैं। ऐसा कहने वाले लोग पार्टी का इतिहास नहीं जानते हैं। वे भूलते हैं कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से मजबूत नेताओं की सामूहिक पार्टी रही है। मेरे 10 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ला, शंकरदयाल शर्मा, माधवराव सिंधिया, मोतीलाल वोरा, कमलनाथ, श्रीनिवास तिवारी जैसे सम्मानित और बड़े जनाधार वाले नेता कांग्रेस पार्टी में थे। इन सभी को मेरी ओर से सदैव मान सम्मान मिला था। सभी मिलकर कांग्रेस को मजबूत भी करते थे। यही कारण है कि 1993 के बाद 1998 में कांग्रेस को दोबारा जनादेश मिला था।सिंधिया की तरह सत्ता का लोभ मेरी राजनीति का ध्येय नहींउन्होंने आगे लिखा है कि घर को बचाने के लिए घर में आग लगा देना समझदारी नहीं। सिंधिया देश में कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च नेताओं में से थे। वह एआईसीसी के महामंत्री के पद पर नियुक्त हुए थे। वे भी प्रियंका गांधी के साथ उत्तरप्रदेश के प्रभारी बनाए गये थे। पार्टी से उन्हें बहुत कुछ मिला था। पार्टी को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम समझना कितना उचित है। 2003 में जब मेरे नेतृत्व में पार्टी मध्यप्रदेश में चुनाव हार गई थी, तब मैंने प्रण लिया था कि दस वर्ष तक मैं कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करूंगा। सिंधिया की तरह सत्ता का लोभ ही मेरी राजनीति का ध्येय होता, तो कांग्रेस के शासन वाले इन वर्षों में मैं सत्ता से दूर नहीं रहता, लेकिन राजनीति में जनसेवा का रास्ता हमेशा सत्ता की गली से नहीं गुजरता है।राजमाता मुझे जनसंघ में ले जाना चाहती थींदिग्विजय ने पत्र में आगे लिखा है कि मैंने 1971 में कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी तो ये एक वैचारिक निर्णय था। राजमाता सिंधिया मुझे जनसंघ में ले जाना चाहती थी, लेकिन उस विचारधारा से मैं एकमत नहीं था और 1971 में मैं कांग्रेस में शामिल हो गया। स्वर्गीय माधव राव सिंधिया को कांग्रेस पार्टी में किसी प्रकार की शिकायत का कभी भी मौका नहीं दिया था। उनके दुखद निधन के पश्चात ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में और गांधी परिवार में बहुत प्यार और सम्मान मिला। उनके क्षेत्र के सभी निर्णय उन्हीं की सहमति से होते थे। ये कहना गलत है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं देना चाहती थी, इसीलिये वे भाजपा में चले गए। जहां तक मेरी जानकारी है, किसी ने इसका विरोध नहीं किया था। कांग्रेस के पास दो राज्य सभा सीट जीतने के लिए जरूरी विधायक संख्या थी। इसलिए मुद्दा सिर्फ सीट का नहीं था। मुद्दा केंद्र सरकार में मंत्री पद का था, जो सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही दे सकते थे। मोदी-शाह की इस जोड़ी ने पिछले 6 साल में इसी धनबल और प्रलोभन के आधार पर उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में सत्ता पर कब्जा किया है। मध्य प्रदेश के जनादेश की नीलामी सिंधिया स्वयं करने निकल पड़े, तो मोदी-शाह तो हाजिर थे ही, लेकिन अपने घर की नीलामी को सम्मान का सौदा नहीं कहा जाता।

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Dakhal News 24 March 2020


bhopal,  Digvijay Twitter, status changed ,Shivraj changed ,Chief Minister

भोपाल। शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार की रात चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मुख्यमंत्री बनते ही उनका ट्विटर स्टेटस भी बदला गया। मुख्यमंत्री बनने से पहले तक वह कामन मैन थे, लेकिन अब वे चीफ मिनिस्टर आफ मप्र हो गए हैं। वहीं, उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने तंज कसा है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने धनबल और छलबल से प्रदेश की कमान उन्हें सौंपी है। वक्त आने पर जनता इसका जवाब देगी। शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सोमवार को देर रात ही अपना ट्विटर हैंडल पर स्टेटस बदल दिया। पहले उन्होंने अपने ट्विटर स्टेटस में “द कॉमन मैन ऑफ मध्यप्रदेश” लिखा था। अब उन्होंने ट्विटर स्टेटस को “द चीफ मिनिस्टर ऑफ मध्यप्रदेश” कर लिया है।इधर शिवराज के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद दिग्विजय सिंह ने सोमवार देर रात ट्वीट कर तंज कसते हुए लिखा मामा का मुक्ति के लिये मप्र की जनता ने कांग्रेस को जनादेश दिया था। भ्रष्ट शासन को बदलने के लिए कांग्रेस में जनता ने विश्वास दिखाया था, लेकिन भाजपा ने धनबल और छलबल से फिर मामा को प्रदेश की कमान सौंप दी। जनता यह सब देख रही है और वक्त आने पर वह जवाब देगी।

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Dakhal News 24 March 2020


bhopal, Due, Yogi Sarkar , Maprap Committee,  senior journalist, was saved!

जब बारह लाख के सरकारी फंड से मिल गया एक गरीब पत्रकार को जीवन… करीब पच्चीस वर्षों से अधिक समय से आधा दर्जन से ज्यादा जाने पहचाने अखबारों से जुड़े लिक्खाड़ और ईमानदार पत्रकार राकेश मिश्रा की प्रेस मान्यता खत्म हो गई थी। ये जिस ‘प्रभात अखबार में काम कर रहे थे उसका प्रसार कम होने के तकनीकी कारणों से इनकी प्रेस मान्यता बरकरार नहीं रह पायी। ऐसे में पत्रकार मनोज मिश्रा ने इस जुझारू पत्रकार को अपने अखबार से मान्यता दिलवा दी। दुर्भाग्य से पत्रकार राकेश मिश्रा को मेजर ब्रेन स्ट्रोक पड़ा और डाक्टरों ने साफ कह दिया कि इनके बचने की उम्मीद 95% नहीं है। फिर उन्हें पीजीआई ले जाया गया जहां ये पूरे दो महीने वैंटीलेटर पर रहे। उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति अपने अथक प्रयासों से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए पीजीआई में निशुल्क इलाज करवाने का जीओ बहुत पहले ही करवा चुकी थी। इसलिए राकेश मिश्रा का बारह लाख के सरकारी खर्चे पर बेहतरीन इलाज हुआ। इस तरह एक ईमानदार और गरीब पत्रकर की ज़िन्दगी बच गई। एक पत्रकार मित्र का जीवन बचाने के लिए धन्यवाद योगी सरकार। शुक्रिया उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति।   लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार नवेद शिकोह की रिपोर्ट.

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Patil Putappa was ideal during his lifetime

मनोहर यडवट्टि   बेंगलुरु, 18 मार्च (हि.स.)। वयोवृद्ध पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य पुट्टप्पा सिदालिंगप्पा पाटिल (पापु) अपने सभी पाठकों, प्रशंसकों के लिए सभी क्षेत्रों में महान शख्सियत और अद्वितीय व्यक्तित्व के साथ अपने जीवनकाल में आदर्श रहे। वह सार्वजनिक भाषणों और अपने प्रकाशनों में लिखे गए लेखों से संबंधित विषयों पर एक बहुमुखी संचारक होने के लिए अपने विचारों के लिए जाने जाते थे।   वह कन्नड़ वॉचडॉग समिति के पहले अध्यक्ष और सीमा सलाहकार समिति के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। पुट्टप्पा साप्ताहिक 'प्रपंच' के संस्थापक संपादक थे और उन्होंने पहले कन्नड़ दैनिक समाचार पत्र 'नवयुग' का भी संपादन किया। उन्होंने विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में कॉलम भी लिखे। उन्होंने तत्कालीन बॉम्बे से प्रकाशित कई अंग्रेजी पत्रिकाओं में योगदान दिया था। पुट्टप्पा ने कन्नड़ भाषा में कई किताबें लिखी हैं, जिनमें कवि लेखकरु, नीवु नागबेकु, कर्नाटक संगीता कलारतनारु इत्यादि हैं। पाटिल पुटप्पा को कई पुरस्कार मिले हैं। इसमें नाडोज पुरस्कार, वुडे पुरस्कार और नृपतुंगा पुरस्कार शामिल हैं।   अविभाजित धारवाड़ जिले में 14 जनवरी,1921 को हावेरी तालुक के कुराराबोंडा में जन्मे पुट्टप्पा ने अपनी प्राथमिक शिक्षा हलगेरी गांव में पूर्ण की और उच्च शिक्षा ब्याडगी, हावेरी और धारवाड़ में की। उन्होंने अपनी कानून की डिग्री बेलगावी लॉ कॉलेज से पूरी कर बॉम्बे में वकालत शुरू की। हालांकि, पत्रकारिता में उनकी गहरी रुचि को देखते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें पत्रकारिता में बने रहने का सुझाव दिया।   उन्होंने कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण के लिए चल रहे आंदोलन पर लिखकर फ्री प्रेस जर्नल और बॉम्बे क्रॉनिकल में योगदान देना शुरू किया। फिर फ्री प्रेस जर्नल के तत्कालीन सम्पादक के. सदानंद ने उन्हें फ्री प्रेस जर्नल ज्वाइन करने की पेशकश की। हालांकि उन्होंने हुबली से एक नए अखबार में काम करने का फैसला किया। उनकी वर्ष 1930 के दौरान हुई गिरफ्तारी ने उन्हें बदल दिया और फिर तब से वह जीवन भर खादी के कपड़े पहनने वाले व्यक्ति बन गए। वह जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित थे, जिन्होंने बाद में हुबली का दौरा किया था।   वर्ष 1934 में महात्मा गांधी ब्याडगी की यात्रा पर आए और इस युवा स्वयंसेवक पाटिल पुटप्पा की पीठ थपथपाई। संयोग से उन्होंने 1934 में पहले आम चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए भी प्रचार किया। संभवतः वह 1949 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता पाठ्यक्रम को आगे बढ़ाने वाले पहले कन्नडिगा रहे। अपने छात्र दिनों के दौरान उन्होंने विल डुरंट, रॉबर्ट हचिंस, न्यायमूर्ति फेलिक्स फ्रैंकफर्टर, अल्बर्ट आइंस्टीन और कई अन्य लोगों की मेजबानी की। उन्होंने एक ब्रिटिश रूढ़िवादी राजनेता सर एंथनी एडेन का साक्षात्कार लिया था। मार्च 1954 के दौरान घर वापस लौटने पर उन्होंने 'प्रपंच' नामक कन्नड़ साप्ताहिक शुरू किया।    फिर 1956 में उन्होंने पहला कन्नड़ डाइजेस्ट 'संगम' और 1959 में कन्नड़ अखबार विश्ववाणी प्रकाशित करना शुरू किया। 1961 में वह कर्नाटक विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य बने, जबकि उन्हें 1962 में राज्यसभा के लिए चुना गया। वह राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा कन्नडिगों और राज्य के हितों के विपरीत किसी भी कदम के खिलाफ आवाज उठाते थे। किसान आंदोलन के साथ-साथ भाषा आंदोलन आर. गुंडूराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को खत्म करने में एक उत्प्रेरक बना था और इस तरह रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ था। पाटिल पुट्टप्पा कन्नड़ और अंग्रेजी में अपने शानदार लेखन की तरह एक शक्तिशाली वक्ता थे।   1967 में वे धारवाड़ स्थित कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के अध्यक्ष बने। साल 1915 में कन्नड़ साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जो कन्नड़ साहित्य परिषद के अस्तित्व में आने से पहले और अंत तक उसी स्थिति में बनी रही। वह देश की सत्ता की राजनीति में नेहरू और इंदिरा गांधी परिवार की पारिवारिक तानाशाही के खिलाफ मुखर थे।   कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ के पूर्व महासचिव शंकर हलगट्टी कहते हैं कि चाहे कोई सहमत हो या असहमत, कन्नड़ और कन्नड़ भूमि के हितों से संबंधित सभी मुद्दों में पाटिल पुट्टप्पा का अपना एक तरीका था। कन्नड़ के कारण उसकी अखंडता और प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के बारे में कोई कभी सोच भी नहीं सकता। हालांकि वह आगे बढ़ने में हमेशा अकेले व्यक्ति बन गए थे।

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Dakhal News 19 March 2020


bhopal, Law and order in Noida is not bad night life safe

नोएडा में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लाागू करने और करोड़ों रुपये खर्चने के बावजूद लॉ एंड आर्डर में सुधार नहीं दिख रहा है. यहां की नाइट लाइफ उतनी ही अनसेफ है जितनी पहले थी. लगातार घटनाएं घटित हो रही हैं पर पुलिस महकमा कान में तेल डाले सोया पड़ा है. अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शनिवार रात बाइक सवार बदमाशों ने BMW कार लूट ली. कार चला रहा युवक पेशाब करने के लिए रुका हुआ था. पीड़ित युवक नोएडा सेक्टर 137 स्थित टियरा सोसायटी का रहने वाला है. बताया जाता है कि पीड़ित ने पुलिस कंट्रोल रूम में सौ नंबर पर काल किया लेकिन कुछ नहीं हुआ. आखिरकार उसे देर रात भटकते हुए खुद ही फेज 2 थाने पर जाना पड़ा. पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. नवभारत टाइम्स की महिला मीडियाकर्मी का रात में कार सवार शोहदों द्वारा पीछा करने की घटना हो ही चुकी है. इसके पहले एक मैनेजर गौरव चंदेल की गोली मार कर हत्या करने के बाद बदमाश कार व मोबाइल लैपटाप आदि लेकर भागे थे.   तमाम हो हल्ले और पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के बाद भी हालात में सुधार नहीं है. पुलिस वालों की संख्या बढ़ाई गई. पुलिस अफसर भी ढेर सारे आए. पर जमीनी हालात जस का तस है.   सूत्रों का कहना है कि नोएडा में पुलिस अब निश्चिंतता की मोड में है. योगी सरकार ने बदमाशों को मारने तक की छूट दे रखी है लेकिन थानेदार खुद को अभयदान पाए और संरक्षित मान कर आराम फरमा रहे हैं. घटनाएं होती जा रही हैं लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही न किसी को दंडित किया जा रहा. रात में सड़क पर पुलिस टीमें जितनी सक्रिय दिखनी चाहिए, उतनी हैं नहीं. नोएडा पुलिस अपना ध्यान उगाही और कमाई से थोड़ा-सा हटाकर कानून-व्यवस्था पर लगा दे तो स्थिति बदल सकती है.

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Dakhal News 17 March 2020


bhopal, Law and order in Noida is not bad night life safe

नोएडा में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लाागू करने और करोड़ों रुपये खर्चने के बावजूद लॉ एंड आर्डर में सुधार नहीं दिख रहा है. यहां की नाइट लाइफ उतनी ही अनसेफ है जितनी पहले थी. लगातार घटनाएं घटित हो रही हैं पर पुलिस महकमा कान में तेल डाले सोया पड़ा है. अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शनिवार रात बाइक सवार बदमाशों ने BMW कार लूट ली. कार चला रहा युवक पेशाब करने के लिए रुका हुआ था. पीड़ित युवक नोएडा सेक्टर 137 स्थित टियरा सोसायटी का रहने वाला है. बताया जाता है कि पीड़ित ने पुलिस कंट्रोल रूम में सौ नंबर पर काल किया लेकिन कुछ नहीं हुआ. आखिरकार उसे देर रात भटकते हुए खुद ही फेज 2 थाने पर जाना पड़ा. पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. नवभारत टाइम्स की महिला मीडियाकर्मी का रात में कार सवार शोहदों द्वारा पीछा करने की घटना हो ही चुकी है. इसके पहले एक मैनेजर गौरव चंदेल की गोली मार कर हत्या करने के बाद बदमाश कार व मोबाइल लैपटाप आदि लेकर भागे थे.   तमाम हो हल्ले और पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के बाद भी हालात में सुधार नहीं है. पुलिस वालों की संख्या बढ़ाई गई. पुलिस अफसर भी ढेर सारे आए. पर जमीनी हालात जस का तस है.   सूत्रों का कहना है कि नोएडा में पुलिस अब निश्चिंतता की मोड में है. योगी सरकार ने बदमाशों को मारने तक की छूट दे रखी है लेकिन थानेदार खुद को अभयदान पाए और संरक्षित मान कर आराम फरमा रहे हैं. घटनाएं होती जा रही हैं लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही न किसी को दंडित किया जा रहा. रात में सड़क पर पुलिस टीमें जितनी सक्रिय दिखनी चाहिए, उतनी हैं नहीं. नोएडा पुलिस अपना ध्यान उगाही और कमाई से थोड़ा-सा हटाकर कानून-व्यवस्था पर लगा दे तो स्थिति बदल सकती है.

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Dakhal News 17 March 2020


bhopal,  240 year, old feud, Gwalior and Raghogarh gharana

मध्यप्रदेश में जो सियासी घमासान मचा और कमलनाथ सरकार संकट में आ गई उसमें दो किरदारों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर, जहां भाजपा का कमल थाम लिया, वहीं पार्टी में ही उनके लगातार प्रतिद्वंदी रहे दिग्विजय सिंह राज्यसभा में जाने में जहां सफल रहे, वहीं इस पूरे मामले का ठिकरा भी उन्हीं पर फोड़ा जा रहा है। अगर इतिहास उठाकर देखा जाये तो ग्वालियर और राघोगढ़ की यह टसल 240 साल पुरानी हैं। उस दौरान अंग्रेजों ने समझौता भी कराया था, लेकिन कांग्रेस आलाकमान इस मामले मेें भी असफल साबित हुआ। अब दिग्गी का कहना है कि अतिमहत्वकांक्षा के चलते ज्योतिरादित्य भाजपा में गये, वहीं राहुल गांधी ने उन्हें अपना पुराना दोस्त बताया तो सिंधिया ने भी हुंकार भरी कि उनके परिवार को जब भी ललकारा गया तो चुप नहीं बैठे। प्रदेश की राजनीति में हमेशा दिग्गी और ज्योतिरादित्य की पटरी कभी नहीं बैठी और यही कारण है कि सिंधिया न तो प्रदेश अध्यक्ष बन सके और न ही मुख्यमंत्री। मध्यप्रदेश में जो राजनीतिक संकट आया और अच्छी भली चल रही कमलनाथ सरकार एकाएक ढहने के कगार पर पहुंच गई है और अब कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता है। भाजपा भी सिंधिया की बगावत को गुटबाजी से जोड़ते हुए मिस्टर बंटाढार यानी दिग्गी को इसका जिम्मेदार बताती है, वहीं राजनैतिक विशेषज्ञ और जनता में भी यहीं चर्चा है कि दिग्गी ने ही सरकार को डूबों दिया, हालांकि दिग्गी इन आरोपी की स्पष्ट खंडन करते हैं। अगर इतिहास के पन्नों को खंगाला जाये तो पता चलेगा कि इन दोनों घरानों के बीच अदावत नई नहीं है, बल्कि 240 साल पुरानी हैं। 1677 में राघोगढ़ को दिग्गी के पुरखे लालसिंह खिंची ने बसाया था और 1705 में राघोगढ़ का किला बना, उधर औरंगजेब की मौत के बाद मुगलों को खदेड़ते हुए मराठा जब आगे बढ़े तो इंदौर में होलकर घराने और ग्वालियर में सिंधिया घराने ने अपनी रियासत कायम करते हुए आस-पास के छोटे और बड़े राजाओं को भी उसका हिस्सा बनाया, लेकिन राघोगढ़ से सिंधियाओं की ठनी और महादजी सिंधिया ने 1780 में दिग्विजय सिंह के पूर्वज राजा बलवंत सिंह और उनके बेटे जयसिंह को बंदी बना लिया। नतीजतन 38 सालों तक दोनों राज घरानों में टसल चलती रही और 1818 में ठाकुर शेर सिंह ने राघोगढ़ को बर्बाद किया, ताकि सिंधियाओं के लिए उसकी कोई कीमत न बचे, जब राजा जयसिंह की मौत हुई, तब अंग्रेजों की मध्यस्थता से ग्वालियर और राघोगढ़ के बीच एक समझौता भी हुआ, जिसमें राघोगढ़ वालों को एक किला और आसपास की जमीनें मिली और तब 1.4 लाख रुपये सालाना का लगान तय किया गया और राघोगढ़ से कहा गया कि सालाना अगर 55 हजार रुपये से ज्यादा लगान की वसूली होती है तो यह राशि ग्वालियर दरबार में जमा करनी होगी और यदि 55 हजार से कम लगान मिला तो ग्वालियर रियासत राघोगढ़ की मदद करेगा, लेकिन राघोगढ़ वाले कम लगान वसूलते रहे, जिसके चलते ग्वालियर दरबार ने दी जाने वाली मदद रोक दी और सारी संपत्ती भी जब्त कर ली। 1843 में अंग्रेजों ने फिर समझौता करवाया, जिसमें राघोगढ़ को ग्वालियर रियासत के अधीन लगान वसूलने की छूट दी गई। 1780 में शुरू हुई यह जंग आज 2020 तक बदस्तूर जारी है यानी 240 साल का इतिहास गवाह है, जो ग्वालियर और राघोगढ़ की अदावत को जाहिर करता है। यही कारण है कि कभी भी सिंधिया परिवार से दिग्गी परिवार की पटरी नहीं बैठी। मजे की बात यह है कि अंग्रेजों ने तो इन दोनों घरानों में दो बार समझौता करवाया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान कभी भी समझौता कराने में सफल नहीं हो पाया। पूर्व के दो विधानसभा चुनावों में भी प्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपने की मांग उठती रही और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की भी मांग होती रही, लेकिन हर बार दिल्ली दरबार से दिग्गी सहित अन्य प्रदेश के दिग्गजों जिनमें कमलनाथ, सुरेश पचौरी व अन्य गुट शामिल रहे, ने कभी भी सिंधिया को उम्मीदवार घोषित नहीं होने दिया। यहां तक की पिछले विधानसभा चुनाव में भी उन्हें प्रचार-प्रसार का प्रमुख तो बनाया और फिर लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश भिजवा दिया, जबकि भाजपा को विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा खतरा सिंधिया के चहरे से ही था और उसने अपना प्रमुख चुनावी नारा भी यही दिया था कि… बहुत हुआ महाराज… हमारे तो शिवराज। अब वहीं ज्योतिरादित्य कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा का कमल थाम चुके है और कल भोपाल में उनका जोरदार स्वागत हुआ और पहले जहां शिवराज ने अंग्रेजों का साथ देकर रानी झांसी को मरवाने का जिम्मेदार गद्धार बताते हुए सिंधिया पर आरोप लगाये थे, वहीं कल उन्होंने अपने घर उनके सम्मान में रात्रि भोज आयोजित किया, जहां उनकी पत्नी साधना सिंह ने अपने हाथों से शिवराज, सिंधिया, तोमर सहित अन्य भाजपा नेताओं को भोजन परोसा। मध्यप्रदेश की राजनीति में हमेशा से तीन गुट प्रमुख रहे और विधानसभा से लेकर लोकसभा की टिकटे भी इनकी पसंद से बटती रही, लेकिन अब कमलनाथ और दिग्गी के ही दो प्रमुख गुट बच गये हैं। भोपाल आये सिंधिया ने भी कम तेवर नहीं दिखाये और पुरानी बातों को याद करते हुये कहा कि सिंधिया परिवार का खुन सहित चुनाव करता है और जब-जब इस परिवार को ललकारा गया उसका माकूल जवाब भी दिया, हालांकि भाजपा में शामिल होते ही, जहां सिंधिया भाजपा के लिए गद्धार से देशभक्त बन गये तो कांग्रेसी उन्हें गद्धार की उपमा देने में पीछे नहीं रहे और इंदौर से भोपाल तक उनका विरोध भी किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सिंधिया का साथ छोडऩा कांग्रेस के लिए नुकसान दायक है और भाजपा के लिए फायदेमंद, क्योंकि उन्हीं की बदौलत 15 माह पुरानी कमलनाथ सरकार को गिराकर अब भाजपा अपनी सरकार बना सकती है और प्रदेश में भी कर्नाटक की तर्ज पर रणनीति चल रही है। प्रोटोकॉल ने तय किया एक महाराजा तो दूसरा राजा यह भी जानकारी बहुत कम लोगों को होंगी की आखिरकार सिंधिया को महाराजा और दिग्गी को राजा क्यों कहा जाता है? दरअसल ऐतिहासिक परम्परा के मुताबिक प्रदेश के इन दोनों राज घरानों के बीच एक प्रोटोकॉल तय किया गया था, जिसमें यह तय हुआ कि सिंधिया हमेशा महाराज कहलायेंगे और राघोगढ़ वाले राजा। यही कारण है कि अतीत से लेकर अब तक सिंधिया को राजनैतिक क्षेत्र में भी सभी कार्यकर्ताओं से लेकर नेता महाराज ही कह कर संबोधित करते है और इसी तरह दिग्गी को राजा बोला जाता है। लंका विजय के बाद विभीषण का हुआ था राज्याभिषेक भोपाल आये ज्योतिरादित्य का स्वागत जहां भाजपा ने धूमधाम से किया वहीं शिवराज सिंह चौहान की जुबान फिसल गई।पहले जहां विधानसभा चुनाव में विरोधी के रूप में सिंधिया को गद्धार तक कह दिया था, तो कल विभीषण बोल गये। अब सोशल मीडिया पर भी लोग चुटकी ले रहे हैं कि अगर सिंधिया को शिवराज विभीषण बता रहे है तो इसका मतलब यह हुआ कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी बजाये सिंधिया बन सकते है, जब राम ने लंका विजय की तब उन्होंने विभीषण का ही राज्याभिषेक किया और अयोध्या लौटे। 4 हजार करोड़ से ज्यादा कीमती है जय विलास पैलेस अभी भाजपा में आये ज्योतिरादित्य पर जहां केंद्र सरकार के साथ डील करने के आरोप लग रहे है, वहीं यह भी कहा जा रहा है कि महल सहित उससे जुड़ी अरबों की संपत्तियों को बचाने के लिए उन्हें भाजपा का दामन थामना पड़ा। कल ही मुख्यमंत्री ने सिंधिया के खिलाफ चल रहे ईओडब्ल्यू के एक पुराने केस को फिर से खुलवा भी दिया, जिसमें जमीन घोटालों क आरोप उन पर लगे हैं। सिंधिया का ग्वालियर स्थित जयविलास पैलेस 150 साल पुराना है, जिसमें 400 कमरें है और दरबार हाल में अत्यंत बेशकीमती झूमर टंगे है। इस पूरे महर की कीमत 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा आकी जाती है, क्योंकि इसमें कई एंटिंक सामान मौजूद है। 40 कमरों का तो म्यूजियम ही है। 1874 में बने इसी पैलेस में सिंधिया परिवार रहता आया है और अभी ज्योतिरादित्य भी इसी जयविलास पैलेस में रहते हैं। इसके डायनिंग हाल में चांदी की ट्रेन से खाना परोसा जाता है।   लेखक राजेश ज्वेल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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Dakhal News 17 March 2020


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पोस्ट 1- जैसे नियमित व्यायाम नहीं करने से मांसपेशियां शिथिल पड़ जाती हैं, वैसे ही बुद्धि भी नियमित व्यायाम नहीं करने से रूढ़ हो जाती है। बुद्धि को प्रश्नों और जिज्ञासाओं से चुनौती मिलती है। बुद्धि के परिमार्जन के लिए विमुक्ति का वह अनुभव आवश्यक है। किंतु इक्कीसवीं सदी के आरम्भिक बीस सालों में, ऐसा मालूम होता है, हमने बुद्धि के बजाय जड़ता का अभ्यास अधिक किया है। उसी के परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं, जब एक वैश्विक महामारी मुंह बाए खड़ी है और हमारी बुद्धि उसे उसके वैश्विक और मानवीय आयामों में देखने में समर्थ ही नहीं हो पा रही है। हमारे औज़ार भोथरे साबित हो रहे हैं। बुद्धि की जड़ता से ही इस तरह की बातें कही जाती हैं कि आज संसार हाथ मिलाने के बजाय नमस्कार करने को विवश हो गया है, यह भारतीय संस्कृति का गौरव है। जैसे कि विषाणु भारतीयों को संक्रमित करने से बख़्श देगा? या यह कि केंद्र सरकार ने मेरी कॉलर ट्यून कैसे बदल दी, यह मेरी निजता में हनन है! कोई मुझे फ़ोन लगाए तो खांसने-खंखारने की आवाज़ उसे क्यूँ सुनाई देती है? जैसे कि यह संसार एक जलसाघर है, जिसमें आपकी अभिरुचि से बड़ा कोई चिंतन मनुष्य के सामने नहीं? या आपकी राजनीतिक निष्ठा ही सर्वोपरि है? बौद्धिक जड़ता की मिसाल तब मिली जब उन्होंने कहा, यह विषाणु चीन को ईश्वर का शाप है, क्योंकि उसने शिनशियांग में अत्याचार किए थे। फिर वैसा कहने वाले स्वयं विषाणु से संक्रमित हो गए। यक़ीनन, उनके ईश्वर उनसे भी बहुत ज़्यादा प्रसन्न नहीं मालूम होते थे। एक जड़ता ने कहा, तुम्हारा धर्मस्थल तो रिक्त हो गया, हमारे धर्मस्थल में देखो, कैसा रंग-गुलाल है। दूसरी जड़ता ने कहा, डैमोक्रेट्स होते तो बीमारी नहीं फैलती, रिपब्लिकन्स और उनका मंदबुद्धि नेता इस आपातकाल के लिए ज़िम्मेदार है। तीसरी जड़ता बोली, चमकी बुख़ार से इतने बच्चे मर गए, तब तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। शायद बीमारियों के भी स्टेटस होते हैं। चौथी जड़ता बड़े आत्मविश्वास से बोली, यह रोग किसी ज्वर से अधिक नहीं, किंतु नक़ाबों की बिक्री के लिए झूठ रचा गया! जब मनुष्य की बुद्धि, जो कि इस सृष्टि का सबसे बड़ा कौतूहल है, किसी वस्तु या घटना का आमने-सामने, उन्मुक्त साक्षात् नहीं करके उसे किसी चश्मे से देखने की अभ्यस्त हो जाती है, तब वो इस तरह की बातें करती है। यह बुद्धि स्वयं को किन्हीं जातीय-सामुदायिक-राजनीतिक पहचानों के अनुक्रम में देखने की इतनी आदी हो चुकी होती है कि एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्वयं को पाकर सहसा किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है। उसकी स्थिति उस विदूषक की तरह हो जाती है, जिसे एक शोकसभा में व्याख्यान देने के लिए खड़ा कर दिया गया है, किंतु उसको केवल लोगों को हंसाना ही आता है। अब वह क्या कहेगा, कैसे कहेगा, चुप ही क्यूं न रह जाएगा? किंतु विषाणु तो समस्त भ्रमों से मुक्त है। वह आपको जानता तक नहीं। आप उसके लिए एक माध्यम हैं। लिविंग सेल्स का एक संगठन, जो उसके प्रसार के लिए उपयोगी है। जैसे मनुष्य प्रोटीन की प्राप्ति के लिए नि:शंक होकर पशुओं की हत्या करता है और उनके शुभ का एकबारगी चिंतन नहीं करता, उसी तरह यह विषाणु अपने री-प्रोडक्शन के लिए आपके जैविक-तंत्र का विघटन करेगा। वह प्रकृति के नियमों के अधीन है। और प्रकृति स्वयंसिद्ध है! और, अलबत्ता, प्रखर बुद्धि वाले की जान बख़्शी नहीं जाएगी, फिर भी मनुष्य को अपनी बुद्धि का अभ्यास करते रहना चाहिए। क्योंकि वह मनुष्य है। क्योंकि उसका समूचा इतिहास ही अपनी बुद्धि के परिमार्जन का रहा है। यही उसका अभिमान भी है। अब इतनी लम्बी यात्रा करने के बाद वह पीछे नहीं हट सकता। इंटरनेट पर स्वयं को जड़बुद्धि की तरह प्रस्तुत करके वह संतोष से नहीं भर सकता। वैश्विक महामारी सम्मुख हो या न हो, केवल ये ही प्रश्न पूछे जाने जैसे हैं- क्या सच में ही कहीं पर कोई ईश्वर है? जिस भूखण्ड पर मेरा जन्म हुआ, क्या मैंने उसका सचेत चयन किया था? जिन रीतियों का मेरे पुरखे पालन करते रहे, क्यों वो मेरे माध्यम से स्वयं को जिलाए रखेंगी? मैं कौन हूं? जन्म से पूर्व मैं कहां था, मृत्यु के बाद कहां जाऊंगा? इस धरती पर मेरे होने का क्या प्रयोजन है? हमें अब भी धर्म, जाति, राष्ट्र, समुदाय, राजनीति के चश्मे से देखकर स्वयं को “एम्बैरेस” नहीं करना चाहिए। वुहान से विकसे विषाणु के समक्ष यह, आख़िरकार, मनुष्य की अस्मिता का प्रश्न भी है! पोस्ट 2- कोरोना वायरस का केंद्र पश्चिम दिशा में खिसक रहा है. चीन कह रहा है कि हम सबसे बुरा दौर देख चुके हैं! किंतु अब यूरोप दुनिया में कोरोना का एपिसेंटर बन चुका है. वुहान से वेनिस तक की यात्रा पूरी कर ली गई है! इटली में हज़ार मृत्युओं के बाद कम्प्लीट लॉकडाउन की स्थिति है और लोगों ने ख़ुद को अपने-अपने घरों में क़ैद कर लिया है. अमेरिका ने 50 मौतों के बाद नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दी है. भारत में अभी खाता खुला ही है, किंतु जैसे-जैसे संख्या बढ़ेगी, सामूहिक सम्भ्रम और वाइड स्प्रेड पैनिक का दृश्य निर्मित होगा. कोरोना के बारे में तमाम मालूमात हासिल करने के बाद दुनिया के लोग इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि अगर हम स्वयं को सबसे अलग कर लेंगे और घरों में क़ैद हो जाएंगे तो हम संक्रमण से सुरक्षित रहेंगे. तकनीकी रूप से यह तर्क ठीक मालूम होता है, किंतु अगर आधुनिक मनुष्य की समस्याएं इतनी ही सरल होतीं तो बात क्या थी. युवल नोआ हरारी का कहना है कि अगर आप फिर से पाषाण युग में जाने को तैयार हैं तो स्वयं को बंद कर लीजिए. किंतु आधुनिक वैश्वीकृत मनुष्य को तो घर से निकलना ही होगा. इटली में उन्होंने चौदह दिनों का क्वारेन्ताइन तय कर लिया है. कि चौदह दिन हम घर से नहीं निकलेंगे. वहां सड़कों पर भुतहा सन्नाटा व्याप्त हो गया है. इससे सरकार यह मान सकती है कि संक्रमितों की संख्या अब एक बिंदु पर आकर फ्रीज़ हो जाना चाहिए. पहले आपात स्थिति से निबटें. चौदह दिन के निर्वासन के बाद शेष की समस्या सुनी जाएगी. अगर भारत भी इस डगर पर चला तो यह निश्चय है कि सेवा क्षेत्र में “वर्क फ्रॉम होम” की कार्य संस्कृति सुदृढ़ होने जा रही है. पहले ही इसका व्यवहार असंगठित रूप से किया जा रहा था. लैपटॉप और इंटरनेट से घर बैठे काम करने वाला एम्प्लायी ड्राइव करके दफ़्तर जाने और ख़ुद को वायरस के लिए एक्सपोज़ करने की तैयारी नहीं ही दिखाएगा. मरण तो रोज़ कुआ खोदकर पानी पीने वाले दिहाड़ी मज़दूर का है. कोरोना पर वैश्विक चिंता के केंद्र में केवल लोक-स्वास्थ्य ही नहीं है. धड़कते दिल से दुनिया अर्थव्यवस्था पर नज़र जमाए है और उसे धीरे धीरे ध्वस्त होते देख रही है. पहले ही ग्लोबल इकोनॉमी बहुत अच्छी हालत में नहीं थी. 2020 को सुधार का साल होना था, किंतु यह 2008 के बाद सबसे बड़ी चुनौती की तरह सामने आया है. कौन जाने, यह भूमण्डलीकरण के तीस साल के इतिहास का सबसे बड़ा संकट सिद्ध हो. जब लोग ख़ुद को हफ्ता-पखवाड़े के लिए घर में क़ैद करने की तैयारी करेंगे तो वो “सीज-मेंटेलिटी” में सरक जाएंगे. पुराने वक़्तों में जब शहर की घेराबंदी होती थी तो अवाम चौमासे की रसद लेकर क़िले में चली जाती थी. मौजूदा दौर में यह सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनने जा रहा है. लोग तालाबंदी करेंगे तो जमाख़ोरी को बढ़ावा मिलेगा. जितना मैं भारत देश को समझता हूँ, जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी पहले ही शुरू हो चुकी होगी. ज़रूरत की चीज़ों के दाम तेज़ी से बढ़ेंगे. बाज़ार में अप्रत्याशित मांग का सामना फ़र्ज़ी क़िल्लत से होगा. वॉर प्राफ़िटीयरिंग की तर्ज़ पर आपदा से मुनाफ़ा कमाने वाली ताक़तें सक्रिय हो चुकी होंगी. क्या सरकार इसके प्रति सजग है? अनेक मित्रों ने चिंता जताई है कि कोरोना पर इतना हाहाकार क्यूँ? वो कह रहे हैं कि जिस देश में दंगों, सड़क हादसों, बुख़ार से लाखों लोग मर जाते हैं, उसमें विदेशी विषाणु पर हायतौबा क्यूँ मचाई जा रही है. पता नहीं वो महामारी शब्द का अर्थ समझते हैं या नहीं. कोई भी आपदा अपने स्वरूप में बाहरी संकट प्रस्तुत करती है, जबकि महामारियां एक जटिल, अंदरूनी, साभ्यतिक मसला हैं और संक्रमण की प्रविधि आणविक विस्फोट से कम नहीं होती. मनुष्य का मनोविज्ञान यह है कि नगर में हादसा हो तो वह अपने परिजनों की कुशलक्षेम के लिए अकुलाता है. वो सकुशल घर लौट आएं तो निश्चिंत हो जाता है. फिर वह भले ही कितनी चिंता औरों के लिए जताता रहे, उसका दायरा मैं और मेरा परिवार तक सीमित रहता है. संक्रामक महामारियां इस निश्चिंतता में सेंध लगाती हैं. यह चार दिन चलकर रुकने वाला दंगा या बलवा नहीं है, यह नित्यप्रति अपने प्राणों की रक्षा करने की चुनौती है. इससे पहले आख़िरी बार कब एक वैश्विक महामारी ने दुनिया को अपनी गिरफ़्त में लिया था? बीसवीं सदी के आरम्भ का स्पैनिश फ़्लू? इक्कीसवी सदी का स्वाइन फ़्लू? यक़ीन मानिए, नॉवल-कोरोनावायरस इनसे आगे की चीज़ है. आज ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा, यह विषाणु ऊष्ण मौसम में भी पनप सकता है. तिस पर किसी ने अंदेशा जताया, तब तो हो ना हो यह एक मैन्युफ़ैक्चर्ड वायरस है, इसका कार्य-व्यवहार सर्वथा नया और अप्रत्याशित है. तो क्या चीन के पीले दैत्य ने दुनिया को एक घोर संकट में धकेल दिया है? यह तो समय ही बताएगा. किंतु तब तक सतर्कता की लाठी थामकर ही सबने इस डगर पर चलना है! पोस्ट 3- कोरोना वायरस पर युवल नोआ हरारी ने सर्वथा भिन्न दृष्टि प्रस्तुत की है। हरारी ने कहा है कि अगर आप सोचते हैं स्वयं को सबसे अलग-थलग करके इससे बच जाएंगे, तो यह आपकी भारी भूल है। चौदहवीं सदी में, जब न रेलगाड़ियां थीं, न हवाई जहाज़, एशिया से शुरू हुआ प्लेग यूरोप तक फैल गया था और इसने साढ़े सात करोड़ लोगों की जान ले ली थी। इसे इतिहास में ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है। जब साल 1330-1350 में यह स्थिति थी, तो आज इक्कीसवीं सदी की भूमण्डलीकृत दुनिया में भूल ही जाइये कि आप सबसे कटकर बच जाएंगे। हरारी का कहना है कि वास्तव में ज़रूरत इससे ठीक विपरीत की है। हमें बंद होने की नहीं, अधिक से अधिक खुलने की आवश्यकता है। मनुष्यता को स्वयं को एक जाति मानना ही होगा, पूरी दुनिया को मिलकर इसका हल खोजना होगा, एक-दूसरे से निरंतर संवाद करना होगा, तभी इसका बेहतर ढंग से सामना किया जा सकता है। सरकारों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है। निश्चय ही, जब हरारी यह कह रहे थे, तो वे इस पर विश्वास नहीं कर रहे थे। कोई भी नहीं कर सकता। यह राजनीति की अग्निपरीक्षा है, और राजनीति ऐसी परीक्षाओं में विफल रहती है। आज दुनिया अनेक राष्ट्रों में बंटी हुई है, उन सभी की अपनी-अपनी सरकारें हैं, उन सरकारों के अपने निजी हित और न्यस्त स्वार्थ हैं। मानव-संयोजन में ये सरकारें अत्यंत विफल सिद्ध होती हैं, वास्तव में वे विघटन की दृष्टि से सोचती हैं और मनुष्यता के निकृष्ट आयामों का आह्वान करके अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं। आज तो उलटे संरक्षणवादी प्रवृत्तियां प्रबल हो चुकी हैं, और सभी राष्ट्र अपना हित पहले सोचते हैं। इंडिया फ़र्स्ट और अमेरिका फ़र्स्ट के इस दौर में यह वैश्विक संकट सामने आया है, जबकि राजनेता अपनी सरकार बचाने की फ़िराक़ में रहते हैं और कोई भी आपदा सामने आने पर उनकी पहली प्रतिक्रिया उसके वजूद से इनकार करने की होती है। ईरान में यही हुआ है। कोरोना वायरस का पता चलने के बावजूद वहां की सरकार लम्बे समय तक चुप रही। और अब वहां हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। इटली में वे युवाओं को बचाने के लिए बूढ़ों को मर जाने दे रहे हैं। यह नात्सी-विचार की वापसी है, जिसमें ऑश्वित्ज़ के रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर सिलेक्शन-प्रक्रिया के दौरान कहा जाता था कि बूढ़ों को गैस चेम्बर में भेज दो और नौजवानों को काम पर लगाओ। उपयोगिता का सिद्धांत ऐसे ही काम करता है। उपयोगिता के सिद्धांत के कारण ही चीन, जो कि इस पूरी बीमारी की जड़ है, से यह ख़बर आई थी कि कोरोना संक्रमण से ग्रस्त मनुष्यों को मार देने की तैयारी की जा रही है, ताकि रोग आगे न फैले। और फिर, जैविक-हथियारों के प्रयोग की कॉन्स्पिरेसी थ्योरी तो है ही। दुनिया की सरकारें अंदरूनी मोर्चों पर प्रतिद्वंद्वी से राजनीतिक लड़ाइयों में मुब्तिला रहती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसके भू-राजनीतिक हितों से संचालित गुट होते हैं। अमेरिका चीन से आने वाली किसी भी ख़बर पर भरोसा नहीं करता। ग्लोबल वॉर्मिंग को वह उसकी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने की साज़िश बतलाता है और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं कॉर्बन उत्सर्जन की अनिवार्यता के इस तर्क में उसका साथ देती हैं। 16 साल की क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट ग्रेटा थुनबर्ग ने कोरोना वायरस के चलते सभी सार्वजनिक प्रतिरोधों को निरस्त करके डिजिटल स्ट्राइक की बात कही है। उसने यह भी कहा है कि आज हमें विज्ञान के साथ मिलकर खड़े होना है। किंतु राजनीति स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय-हितों की बात करती है, वह सार्वभौमिक हितों की बात करके चुनाव नहीं जीतती। राजनीति का सम्बंध विज्ञान से नहीं विभ्रम से है। तब वैश्विक महामारियों का सामना करने में भूमण्डलीकरण के साथ ही आधुनिक राष्ट्र-राज्यों का स्वरूप भी एक बाधा बन जाता है। राजनीति से ऐसे अवसर पर कोई उम्मीद रखना बेकार है। धर्म की तब बात ही क्या करें। ईश्वर, जो कि कहीं नहीं है, की परिकल्पना मनबहलाव के लिए ठीक है, किंतु आपदाओं में वह मनुष्य की कोई मदद नहीं कर सकता। अतीत में उसने कभी नहीं की है और आगे भी नहीं करेगा। इस विराट सृष्टि में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे मनुष्य का सामान्य-बोध ही इकलौती उम्मीद है। इंटरनेट इसमें उसकी मदद कर सकता है, बशर्ते उसका उपयोग विवेक से किया जाए। मनुष्यता को तोड़ने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए उसे बरता जाए। धर्म और राष्ट्र, जाति और समुदाय काल्पनिक परिघटनाएं हैं, मनुष्य ही वास्तविक है। उसका हित ही सर्वोपरि होना चाहिए। मनुष्यता का इतिहास महामारियों का इतिहास रहा है। इतिहास में रोगों ने इतने लोगों की जान ली है, जितनी किसी और विपदा ने नहीं ली- दोनों विश्वयुद्धों ने भी नहीं। हैजा और चेचक, कोढ़ और तपेदिक, प्लेग और बुख़ार, सिफ़लिस और एड्स, भांति-भांति के फ़्लू, और हाल के सालों में उभरकर सामने आए इबोला, ज़ीका और अब कोरोना जैसे विषाणु- सर्वनाश की जितनी भी थ्योरियां प्रचलित हैं, उनमें अभी तक सबसे कारगर ये रोग और महामारियां ही साबित हुए हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग और आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस के ख़तरे भविष्य के गर्भ में हैं। एलीयन्स अभी तक धरती पर आए नहीं हैं। ज्वालामुखी लम्बे समय से सुषुप्त हैं। धरती से डायनोसोरों का ख़ात्मा कर देने वाले एस्टेरॉइड की जोड़ का अंतरिक्ष-पिण्ड फिर लौटकर नहीं आया है, पांच बार प्रलय होने के बावजूद। अभी तक के ज्ञात-इतिहास में महामारियां ही मनुष्य की सबसे बड़ी हत्यारिनी साबित हुई हैं। हमारे सामने एपिडेमिक और पेन्डिमिक का भेद है। संक्रामक रोग और वैश्विक महामारी। एक तरफ़ इबोला है, जो इतनी तेज़ी से मनुष्य की हत्या करता है कि रोग को लम्बी दूरी तक फैलने का अवसर ही नहीं मिलता। दूसरी तरफ़ मीज़ल्स हैं, जिनकी संक्रामक-क्षमता अत्यंत व्यापक है, किंतु इनका वैक्सीन सरलता से उपलब्ध है। और फिर कोरोना जैसे वायरस हैं, जो परस्पर-सम्पर्क से प्रसारित होते हैं, उजागर होने में समय लेते हैं और अनुकूल स्थिति प्राप्त होने पर दस प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से रोगियों का ख़ात्मा करते हैं। ग्लोबल अवेयरनेस सिस्टम ही इससे बचाव में काम आ सकता है। शुक्र है कि हमारे पास सूचना-प्रौद्योगिकी है, इसका विवेकपूर्वक उपयोग कीजिये। और आपकी सरकारें क्या कह रही हैं, इससे ज़्यादा विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी किए जा रहे अधिकृत प्रतिवेदनों और अपडेट्स पर भरोसा कीजिये। पोस्ट 4- कोरोना वायरस को लेकर आज की तारीख़ के दो अपडेट हैं- एक ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है। दूसरा ये कि इसके कारण इटली एक कम्प्लीट लॉकडाउन में चला गया है। अगर हम कोरोना वायरस को एक वैश्विक महामारी की तरह देखते हैं और उससे चिंतित हैं तो हमें चीन नहीं इटली की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। चीन में वह स्थानीय बीमारी थी, इटली में वह वैश्विक रोग है। मेरे सामने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 11 मार्च की रिपोर्ट है, जो बतला रही है कि कोरोना वायरस से चीन में अब तक 3162 मौतें हुई हैं और इसके बाद इटली का नम्बर आता है, जहां अब तक इससे 631 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। यह एक दिन पुराना आंकड़ा है। 12 मार्च की रिपोर्ट इटली में मृत्युओं का आंकड़ा 31 प्रतिशत की नाटकीय बढ़ोतरी के साथ 827 बतला रही है। यह विनाश की चक्रवृद्धि गति है। यह किसी भी ग़ैर-चीनी, ग़ैर-एशियाई देश के लिए बहुत बड़ा आंकड़ा है। तीसरे नम्बर पर ईरान है, जहां 290 मृत्युएं हुई हैं। जब पहले-पहल हमने कोरोना वायरस का नाम सुना था, तो इसे वुहान-विषाणु कहकर पुकारा था। यह चीन के एक प्रांत में फैल रहा था। हमने इसके लिए चीन की खानपान की आदतों को दोषी ठहराया था। मेरी टाइमलाइन पर 31 जनवरी को लिखी गई पोस्ट है, जिसे ख़ूब पढ़ा गया। किंतु हमें स्वीकार करना होगा कि 31 जनवरी को हममें से कोई भी यह सोच नहीं रहा था कि यह महामारी इतनी तेज़ी से फैलेगी। हम स्वयं को सुरक्षित मान रहे थे। कल विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव ने कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित करते हुए जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने कहा है कि आज की तारीख़ में दुनिया के 118 देशों के 1 लाख 25 हज़ार लोग इस विषाणु से ग्रस्त हैं। अच्छी ख़बर यह है कि अभी भी 77 देश ऐसे हैं, जहां से कोरोना के संक्रमण की कोई सूचना अभी तक नहीं मिली है। किंतु वे कब तक इससे बचे रहेंगे? अगर वे वैश्वीकरण के समक्ष लाचार हैं तो देर-अबेर यह विषाणु उन्हें जकड़ लेगा। अगर यह विषाणु पहले ही वहां पहुंच चुका है तो कौन जाने इसे कितने लोगों तक सीमित रखने में सफलता मिलेगी। जब मैंने देखा कि इटली में 827 लोग कोरोना वायरस से दम तोड़ चुके हैं, जो कि चीन में हुई मृत्युओं का एक-चौथाई है, तो भूमण्डलीकरण के इस अंधेरे पहलू ने मुझको निराशा से भर दिया। कोरोना से अब जाकर मैं सर्वाधिक चिंतित हुआ हूं। ये सच है कि इटली शीत-प्रधान देश है, भारत वैसा नहीं है, फिर भी यह दु:खद है कि जो बीमारी एक गांव से दूसरे गांव नहीं पहुंचना चाहिए थी, वो आज वैश्वीकरण की कृपा से दुनिया में फैल रही है और कोई इसे रोक नहीं पा रहा है। हम वैश्वीकरण के सामने लाचार हो चुके हैं। वैश्वीकरण का एक आयाम ग्लोबल मार्केट भी है और आज पूरी दुनिया के बाज़ार में आप शॉक-वेव्ज़ महसूस कर सकते हैं। महामारी अपने साथ महामंदी को लेकर आएगी। मृत्युबोध, नैराश्य, व्यामोह और असहायता- जो कि आधुनिक मनुष्य के चार बुनियादी गुण हैं- (अगर आप भारतीय हैं तो इसमें पांचवां गुण जोड़ लीजिये- मसखरी) – इस महामारी के सामने मुंह बाए खड़े होने पर अपनी पूरी आदिम त्वरा से उभरकर सामने आ रहे हैं। प्राणघातक विषाणु चीन से इटली कैसे पहुंचा? द गार्डियन बतलाता है जनवरी के अंत में इटली में कोराना वायरस के तीन मामले पाए गए थे। इनमें से दो चीनी पर्यटक थे, जो चीन-देश से अपने साथ यह तोहफ़ा लेकर यूरोप पहुंचे थे। रोकथाम की जो कोशिशें इटली में तब की जा सकती थीं, की गईं, किंतु फ़रवरी के महीने में उत्तरी इटली में रोग चुपचाप फैलता रहा। 18 फ़रवरी को इटली के कोन्डोंग्या में 38 वर्ष के एक स्वस्थ व्यक्ति में कोराना के लक्षण दिखलाई दिए। उसका चीन से कोई वास्ता नहीं था। आज उसे इतालवी मीडिया के द्वारा पेशेंट-वन कहकर पुकारा जा रहा है। वह 36 घंटे बिना इलाज के रहा। इससे भी बढ़कर, वह इस अवधि में सार्वजनिक सम्पर्क में रहा और अनजाने ही अपने से मिलने वाले लोगों को संक्रमित करता रहा। आज एक महीने से भी कम समय के बाद इटली में 10 हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हैं और 800 से अधिक की मृत्यु हो चुकी है। चीन से कहीं अधिक ठंडा मुल्क होने के कारण वहां पर कोरोना का स्ट्राइक रेट 10 फ़ीसद की घातक दर को छू रहा है। मात्र दो टूरिस्टों ने चीन से हज़ारों किलोमीटर दूर मौजूद यूरोप को सहसा एक वैश्विक महामारी के सामने एक्सपोज़ कर दिया। भारत देश में यह विषाणु 30 जनवरी को पहुंचा। बतलाने की आवश्यकता नहीं- चीन से। केरल में वुहान विश्वविद्यालय के एक छात्र के साथ इसकी आमद हुई। केरल के बाहर पहला मामला दूसरी मार्च को पाया गया। यह, ज़ाहिर है, इटली से लौटे एक व्यक्ति में था। फिर जयपुर, हैदराबाद और बेंगलुरु में मामले सामने आए। दुनिया में जिन तीन देशों में कोरोना का प्रकोप सबसे अधिक है- चीन, इटली और ईरान- अब वे शेष विश्व के लिए कोरोना के निर्यातक बन चुके हैं। एक से दो, दस से हज़ार, हज़ार से असंख्य की यह मल्टीप्लाइंग चेन-रिएक्शन है। आज दुनिया की आबादी 7.7 अरब है और सवा लाख संक्रमित लोग आबादी का बड़ा छोटा प्रतिशत हैं, किंतु महज़ तीन माह पूर्व तक यह केवल चीन-देश के एक प्रांत की फेफड़ाजनित बीमारी भर थी। वैश्विक सम्पर्क के इस कालखण्ड में आणविक विस्फोट की तरह इसका प्रसार हो सकता है। मुसीबत यह है कि जब आप घबड़ाकर तालाबंदी पर आमादा हो जाते हैं, जैसे कि इटली में हुआ है, तो इससे ग्लोबल इकोनॉमी, जो कि अत्यंत क्षणभंगुर परिघटना है, तीव्रगति से विषाद में चली जाती है। और सेवा क्षेत्र का फुगावा फूटने लगता है। हज़ार तरह की कॉन्स्पिरेसी थ्योरियां भी चलन में हैं। यह कि चीन-देश जैविक हथियारों का प्रयोग कर रहा था और उसके विफल रहने का यह दुष्परिणाम है। यह कि यह सब झूठ है (ग्लोबल वॉर्मिंग की तरह?) और इसके पीछे मास्क और सेनिटाइज़र का बाज़ार है। यह कि ज़ुकाम-नज़ला जितने लोगों को मारता हे, कोरोना की भी वही मारक क्षमता है। किंतु इटली के आंकड़े मुझको चिंतित कर रहे हैं। खेल-आयोजनों पर इसकी मार दिखने लगी है। शायद जब भारत में आईपीएल पर इसकी मार पड़ेगी, तभी जाकर यहां के लोगों को इसकी गम्भीरता का अहसास होगा। चीज़ों को समझने के भारत के अपने मानदण्ड हैं।   जब हमें भोजपुरी गीतों, सस्ते चुटकुलों, गंदे खानपान-रहनसहन पर गर्व और त्योहार की हुड़दंग से फ़ुरसत मिले, तब शायद हम सतर्कता को गम्भीरता से लेंगे। हर चीज़ में मसखरी भली बात नहीं है। चुटकुला-प्रधान देश अगर महामारी को लेकर थोड़ा-सा अधिक सचेत हो जाएगा तो दुनिया में उसकी नाक नहीं कट जावैगी।

Dakhal News

Dakhal News 14 March 2020


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संजय सक्सेना, लखनऊ लखनऊ से लगा जिला बाराबंकी वैसे तो अफीम की खेती के लिए जाना जाता है,लेकिन अब यह जिला विलुत्प होते गिद्धों को पुनःजीवनदान देने के चलते चर्चा में आ गया है। हाल ही में एक व्यक्ति ने विलुप्त होने केे कगार पर पहुंच चुके गिद्धों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डाला तो यह खूब वायरल हुआ। गिद्ध एक ऐसा पक्षी है जो देखने में भले ही बहुत कुरूप लगता हो,लेकिन सृष्टि के लिए इसकी उपयोगिता अन्य तमाम पक्षियों और जानवरों से कहीं अधिक है। मुर्दाखोर गिद्ध को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। वे बड़ी तेजी और सफाई से मृत जानवर की देह को सफाचट कर जाते हैं और इस तरह वे मरे हुए जानवर की लाश में रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्म जीवों को पनपने नहीं देते। लेकिन गिद्धों के न होने से टीबी, एंथ्रेक्स, खुर पका-मुंह पका जैसे रोगों के फैलने की काफी आशंका रहती है। इसके अलावा चूहे और आवारा कुत्तों जैसे दूसरे जीवों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। इन्होंने बीमारियों के वाहक के रूप में इन्हें फैलाने का काम किया। आंकड़े बताते हैं कि जिस समय गिद्धों की संख्या में कमी आई उसी समय कुत्तों की संख्या 55 लाख तक हो गई। इसी दौरान (1992-2006) देश भर में कुत्तों के काटने से रैबीज की वजह से 47,300 लोगों की मौत हुई। बहरहाल, बात करीब 30-35 वर्ष पुरानी है। 1990 के उत्तरार्द्ध में जब देश में गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट होने लगी उस दौरान गिद्धों की मौत के कारणों पर अध्ययन करने के लिये वर्ष 2001 में हरियाणा के पिंजौर में एक गिद्ध देखभाल केंद्र स्थापित किया गया। कुछ समय बाद वर्ष 2004 में गिद्ध देखभाल केंद्र को उन्नत करते हुए देश के पहले ‘गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र’ की स्थापना की गई। जब गिद्धों की संख्या में गिरावट का कारण तलाशा गया तो पता चला कि इसकी वजह डिक्लोफिनेक दवा है, जो पशुओं के शवों को खाते समय गिद्धों के शरीर में पहुँच जाती है। इसके बाद पशु चिकित्सा में प्रयोग की जाने वाली दवा डिक्लोफिनेक को वर्ष 2008 में प्रतिबंधित कर दिया गया। जिसका असर भी दिखाई देने लगा। इसी की एक बानगी है बाराबंकी जिले के महमूदपुर गांव में इतनी बड़ी संख्या में गिद्धों का दिखाई देना। डाइक्लोफेनिक दवा की मारक क्षमता को मात देकर गिद्ध अब फिर से इस आबोहवा में लौटने लगे हैं तो प्रकृति के इन ‘सफाईकर्मियों’ की वापसी के संकेत मिलने से प्रकृति प्रेमी खुश हैं। वहीं वन विभाग के अधिकारी भी इसे अच्छा संकेत मान रहे हैं। बताते चलें करीब बीस साल पहले घाघरा की तराई समेत अन्य इलाकों में हर जगह गिद्धों के बड़े झुंड अक्सर दिखाई देते थे। हर एक झुंड में 40-50 गिद्धों की मौजूदगी आम होती थी। 90 के दशक में यह सबसे ज्यादा आबादी वाला परभक्षी पक्षी भी था। लेकिन 1992 से 2005 के बीच इनकी संख्या 99 फीसदी तक घट गई। इसका मुख्य कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली डाइक्लोफेनिक दवाओं के इस्तेमाल को माना जा रहा है। इस दवा के इस्तेमाल के बाद मरने वाले पशु का मांस खाने से इनके गुर्दे फेल हो जाते थे। गिद्धों की कमी का असर सबसे अधिक पारसी समाज के एक अहम रिवाज पर भी पड़ा। पारसी समुदाय अपने मृतकों को प्रकृति को समर्पित करते हैं। इसके लिए वे मृत देह को ऊंचाई पर स्थित पारसी श्मशान में छोड़ देते हैं जहां गिद्ध उन्हें खा लेते थे। पर गिद्धों के न रहने पर उनकी यह परंपरा लगभग खत्म सी हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि सफेद पीठ वाले गिद्ध की संख्या 43.9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से गिर रही थी। गिद्धों के प्रजनन की दर बहुत धीमी होती है। वह एक बार में एक ही अंडा देते हैं जिसे लगभग 8 महीने सेना पड़ता है तब जाकर बच्चा अंडे से बाहर आता है।

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Dakhal News 14 March 2020


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भोपाल। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी, भोपाल ने जनसंपर्क एवं पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़ी महिलाओं को अचला और उदिता सम्मान से सम्मानित किया। सबधाणी कोचिंग संस्थान के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अमृता राय ने कहा कि महिलाओं के हाथ में शासन हो तो दुनिया खूबसूरत हो सकती है।   अमृता राय ने कहा की जिस तरह आज की महिलाओं के हाथ में मोबाइल आ जाने से अभियक्ति की एक नयी आजादी उन्हें मिली है, उसी तरह उन्हें अगर शासन करने दिया जाये तो वे समाज को एक नयी दिशा दे सकती है। इसके लिए आवश्यक है की वे स्वयं के अधिकारों को स्थापित करे। इस दौरान उन्होंने आगे कहा की महिलाओं को अपने गौरवशाली इतिहास को मौजूदा वक्त और उज्जवल भविष्य के बारे में सोचना होगा। इस अवसर पर सचिव मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग श्री पी.नरहरि ने कहा कि निर्णय जहाँ होने है महिलाओं को वहाँ पहुंचना है। श्री पी.नरहरि ने कहा कि आज के दौर में समाज में एक अच्छा बदलाव आया है। जिसमें महिलाओं को बेहतर भूमिका मिलनी शुरू हुई है। लेकिन पूर्ण समानता कब मिलेगी यह विचारणीय है। उन्होनें कहा कि जहाँ निर्णय लिए जाते हैं उस स्थान तक समाज के हर वर्ग की महिलाओं को पहुंचाना होगा तभी समानता की बात सार्थक होगी। वही वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरजा शंकर ने कहा की महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की जरुरत है जिसके लिए समाज की लुप्त हो रही सांस्कृतिक चेतना को जागृत करना होगा। फिल्म समीक्षक श्री अजित रॉय ने कहा की अपनी बात रखते हुए कहा की सत्य और न्याय के बीच द्वन्द होने पर न्याय पर ध्यान देना चाहिए द्यस्त्रियों के बारे में गंभीरता से बात करनी चाहिए कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार सुश्री स्वाति खंडेलवाल ने अपने विचार रखते हुए कहा की महिलाओं को अपनी राह खुद तलाशनी होगी और अपनी काबलियत से आगे बढ़ना होगा। महिलाओं को कई सारी भूमिकाएं निभानी होती हैं। जिस कारण उन्हें वर्क लाइफ बैलेंस में परेशानी होती है। महिलाओं को इससे उबरने के लिए मल्टीटास्किंग होने के साथ ही सकारात्मक होना होगा तभी सफलता प्राप्त होगी। मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक कुणाल चौधरी ने कहा कि महिलाएं समाज का आयना होती हैं। समाज को आगे ले जाने का कार्य इन्हीं का होता है। ईश्वर ने भी सृजन की शक्ति महिलाओ को ही सौंपी है। परन्तु पुरुष प्रधान समाज में उनकी स्थति तभी बेहतर होगी जब अपने अधिकारों को नारी जानेगी। वही वरिष्ठ पत्रकार एवं मेरी सहेली की डिजिटल एडिटर कमला बडोनी ने अपने विचार रखते हुए बताया की सार्थक प्रयास ये नहीं कि महिलाओं के समानता के अधिकार की केवल बात भर की जाये बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना जरुरी है। उन्होंने बताया महिलाओं का एक वर्ग जो अधिकार से अनभिज्ञ है वहीँ दूसरा हमेशा पुरुषों की होड़ में लगा हुआ है। जिससे वे अपने स्त्री सुलभ गुण भूलने लगी हैं। जिस कारण उनमें मातृत्व सम्बन्धी परेशानी आती हैं जो समाज के लिए ठीक नहीं है। पब्लिक रिलेशन सोसाइटी भोपाल चैप्टर के अध्यक्ष पुष्पेंद्र पाल सिंह ने हाल ही में आई महिलाओं को लेकर रिपोर्ट ऑन स्टेटस ऑफ़ वीमेन इन मीडिया इन साउथ एशिया का जिक्र करते हुए बताया कि महिलाओं की डिशिजन मेकिंग पावर की स्थिति सही नहीं है, यह एक ग्लोबल ट्रेंड है। बांग्लादेश जैसे छोटे देश में भी वर्क लाइफ बैलेंस को लेकर पाठ्यक्रम हैं और भारत जैसे बड़े देशों में ऐसा कल्चर नहीं है। वही भारत में एक बात बेहतर है यहाँ महिलाओं को लेकर कानून अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा अच्छा है। इसलिए महिलाओं को सम्मान देने का हमारा प्रयास है क्योंकि यही अग्रणी महिलाएं समाज को सही दिशा प्रदान करेगी। सबधाणी कोचिंग के संचालक आनंद सबधाणी ने इस दौरान कहा कि समाज में जो अच्छा कार्य करे उसका सम्मान करना जरुरी है। घरेलू महिलाएं कामकाजी महिलाओं से भी ज्यादा सम्मानीय हैं क्यूंकि वे पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरोती है। पब्लिक रिलेशंस सोसायटी भोपाल ने इस अवसर पर 2020 के अचला सम्मान से सुश्री श्रद्धा बोस, सुश्री आशा रोमन, डॉ. साधना गंगराडे, डॉ. अंजना तिवारी, डॉ. असमां रिजवान, डॉ. बबिता अग्रवाल, डॉ.राखी तिवारी, डॉ. आरती सारंग, सुश्री सुमन त्रिपाठी, सुश्री रंजना चितले, सुश्री रश्मि शुक्ला, सुश्री शीतल रॉय, सुश्री विभा शर्मा, सुश्री पल्लवी वाघेला, सुश्री गरिमा पटेल, सुश्री मुक्ता पाठक, सुश्री पूर्वा शर्मा त्रिवेदी, सुश्री शैफाली गुप्ता, सुश्री सीमा श्रीवास्तव, सुश्री आयुश्री सक्सेना, डॉ. जया सुरजानी सम्मानित किया तो उदिता सम्मान से सुश्री सोनी यादव, डॉ. अनु श्रीवास्तव, सुश्री राखी नंनदवानी, सुश्री उपमिता वाजपेयी, सुश्री सुधा कुमार, सुश्री अंजली राय, सुश्री ममता यादव, सुश्री आकांक्षा शर्मा, सुश्री दीक्षा मीना, सुश्री कीर्ति श्रीवास्तव, सुश्री दीपाली विर्क, सुश्री भूमिका विरथरे, सुश्री करिश्मा सचदेव, सुश्री अनादि तिवारी और सुश्री रश्क गौरी को सम्मानित किया गया।    

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Dakhal News 12 March 2020


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मां का निश्छल प्यार इतना अनमोल इसलिए है कि मां के गर्भ में भी बच्चा मां के प्यार को अनुभव कर सकता है, यही कारण है कि पैदा होने पर बच्चा सबसे ज्यादा अपनी मां से जुड़ा होता है और रोता हुआ शिशु भी मां की स्नेहिल गोद में आकर चुप हो जाता है। बड़ा होने पर बच्चा मां-बाप और भाई-बहनों, यानी, परिवार से सीखना शुरू करता है और जीवन को समझने की कोशिश करता है। कुछ और बड़ा होने पर बच्चा स्कूल जाता है और अपनी कक्षा में अध्यापकों से सीखता है। परिवार से मिले संस्कारों और सीख के बाद बच्चे की औपचारिक शिक्षा की शुरुआत यहां से होती है। हमारे देश में स्कूल-कालेज की शिक्षा अधिकतर किताबी होती है और शिक्षक सिर्फ शिक्षक है। हमारे देश में ज्यादातर अध्यापकों की अपनी शिक्षा भी किताबी है, स्कूल-कालेज-युनिवर्सिटी का पाठ्यक्रम भी किताबी है और विद्यार्थियों की ज्यादातर शिक्षा किताबों तक सीमित रहती है। यह जानना रुचिकर होगा कि सन् 1969 में शिक्षा जगत में एक प्रयोग किया गया जिसमें यह पता लगाया गया कि किन तरीकों से कितना सीखा जाता है। इस शोध के आधार पर एक ‘कोन आफ लर्निंग’ (सीखने का त्रिकोण) तैयार किया गया। इस शोध में यह बात सामने आई कि सीखने का सबसे कम प्रभावी तरीका पढऩा और लेक्चर सुनना है जबकि सबसे प्रभावी तरीका काम को सचमुच करके देखना है। अगला सबसे प्रभावी तरीका असली अनुभव की नकल (सिमुलेशन) करके सीखना है। इसके बावजूद क्या यह दिलचस्प नहीं है कि शिक्षा तंत्र इस प्रयोग के इतने वर्षों बाद भी मूलत: पढऩे और लेक्चर सुनने के पुराने तरीकों से ही सिखाता चला आ रहा है। इस शिक्षा पद्धति में व्यावहारिकता की तो कमी है ही, दूसरी कमी यह भी है कि अक्सर अगली कक्षा में जाने पर विद्यार्थी पिछली कक्षा का ज्ञान भूलता चलता है और जब वह शिक्षा समाप्त करके निकलता है तो अधिकांश ज्ञान को भूल चुका होता है। औपचारिक रूप से सिखाने वाले लोगों का दूसरा स्तर मार्गदर्शक का है। मार्गदर्शक वह व्यक्ति होता है जो स्वयं किसी व्यवसाय विशेष में पारंगत होता है और उस व्यवसाय में सक्रियता से जुड़ा होता है। मार्गदर्शक को उस व्यवसाय विशेष की लगभग हर छोटी-बड़ी बात की जानकारी होती है, तथा मार्गदर्शक को उस व्यवसाय की चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों का भी पता होता है। अध्यापक और मार्गदर्शक में यही अंतर है। क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादातर वकीलों के बच्चे वकील, डाक्टरों के बच्चे डाक्टर और राजनीतिज्ञों के बच्चे राजनीतिज्ञ क्यों बनते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि एक वकील अपने पेशे की बारीकियों को समझता है और वह अपने बच्चे को उस व्यवसाय के सैद्धांतिक और व्यावहारिक, यानी, दोनों पक्षों का ज्ञान देता है। घर में वैसा ही वातावरण होता है क्योंकि उसी पेशे से जुड़ी बातों का जिक्र बार-बार होता रहता है। यह ज्ञान किताबी ज्ञान के मुकाबले में कहीं ज्य़ादा सार्थक, उपयोगी और प्रभावी होता है। इसीलिए जीवन में मार्गदर्शक का महत्व अध्यापक के महत्व से भी ज्यादा है। लेकिन हमें ज्ञान देने वालों में मार्गदर्शक से भी ज्यादा ऊँचा स्तर प्रायोजक का है। प्रायोजक की भूमिका को समझने के लिए हमें थोड़ा गहराई में जाना होगा। मार्गदर्शक से हमारा रिश्ता लगभग एकतरफा होता है। मार्गदर्शक हमें सिखाता है, समझाता है, हमारी गलतियों पर टिप्पणी करता है और हमें सही राह दिखाता है लेकिन हम उसे बदले में कुछ नहीं दे रहे होते। प्रायोजक की भूमिका इससे काफी अलग होती है। प्रायोजक वह होता है जो हमारे पेशेवर कैरिअर को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है, सिर्फ हमें हमारी गलतियां ही नहीं बताता बल्कि कंपनी के वरिष्ठ लोगों में हमारी छवि के बारे में भी जानकारी देता है और यदि उसमें कु छ सुधार आवश्यक है तो उसके रास्ते भी सुझाता है, आवश्यक होने पर हमारी सिफारिश करता है, हमारे संपर्क मजबूत करने में सहायक होता है। ऐसा व्यक्ति साधारणतया उसी कंपनी अथवा व्यवसाय में हमारा वरिष्ठ अधिकारी होता है जो हमें अपना समर्थन इसलिए देता है ताकि हम उसके विभाग अथवा कंपनी में उसके आंख-कान बन सकें। यहां एक बड़े फर्क को समझना आवश्यक है। अक्सर लोग मान लेते हैं कि किसी प्रायोजक की चमचागिरी करके आप सफलता की सीढिय़ां चढ़ सकते हैं। वह सफलता की एक राह अवश्य है पर यहां हम उन लोगों की बात नहीं कर रहे, उसके बजाए हम ऐसे लोगों की बात कर रहे हैं जो योग्य हैं, अपनी पूरी शक्ति से अपनी जिम्मेदारियां निभाने तथा कंपनी को आगे बढ़ाने का प्रयत्न ही नहीं करते बल्कि उसमें सफल होकर दिखाते हैं। यह भूमिका चमचागिरी से बिलकुल अलग है। यह ऐसी भूमिका है जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे के काम आते हैं। वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ साथी को प्रबंधन तथा अन्य वरिष्ठ साथियों में उसकी छवि की जानकारी देता है, भविष्य में आने वाले अवसरों की पूर्व जानकारी देकर उसे उन अवसरों के लिए तैयारी करने की सुविधा देता है। कोई भी अधिकारी अकेला अपने विभाग के सारे लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता, उसके लिए उसे अपने मातहतों के सहयोग की आवश्यकता होती है और एक ऐसा मातहत अधिकारी जो अपने वरिष्ठ अधिकारी की ताल में ताल मिलाकर काम कर सकता हो, उस वरिष्ठ अधिकारी के लिए उतना ही उपयोगी है जितना कि वह वरिष्ठ अधिकारी अपने मातहत के लिए। पेशेवर जीवन का यह एक अनुभूत सत्य है कि वे लोग जो किसी प्रायोजक के साथ जुडऩे की कला में माहिर होते हैं, सफलता की सीढिय़ां अक्सर ज्य़ादा तेज़ी से चढ़ते हैं। बहुत से ऐसे लोग जो योग्य तो हैं पर उन्हें किसी प्रायोजक का समर्थन हासिल नहीं है, योग्यता के बावजूद तेजी से उन्नति नहीं कर पाते।   यही कारण है कि आज के जमाने में नेटवर्किंग को इतनी महत्ता दी जाती है। नेटवर्किंग में सफल लोग ज्यादा आगे बढ़ते हैं, तेजी से आगे बढ़ते हैं और अक्सर ऐसे दूसरे लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जो काबिल तो हैं पर नेटवर्किंग में माहिर नहीं हैं। लब्बोलुबाब यह कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। हम कितने ही काबिल हों और कितने ही ऊंचे पद पर हों, हमें दूसरों का साथ चाहिए, सहयोग चाहिए, समर्थन चाहिए, प्रायोजन चाहिए। ऐसा नहीं है कि इनके बिना हम सफल नहीं हो सकते लेकिन तब सफलता के शिखर छून में कदरन लंबा समय लग सकता है और यदि हम अपनी योग्यता का पूरा लाभ लेना चाहते हैं तो योग्यता बढ़ाने और काम में दक्ष होने के साथ-साथ हमें नेटवर्किंग में भी माहिर होना होगा और अध्यापक, मार्गदर्शक और प्रायोजक की अलग-अलग भूमिकाओं की बारीकियों को समझकर अपने रिश्ते विकसित करने होंगे, तभी हम सफल होंगे, ज्यादा सफल होंगे और जल्दी सफल होंगे।

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Dakhal News 12 March 2020


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  जनसम्पर्क मंत्री  पी.सी.शर्मा ने निजी अस्पताल में भर्ती पत्रकार सुनील तिवारी के स्वास्थ्य की जानकारी ली।  शर्मा ने तिवारी की पत्नी श्रीमती प्रेमलता और परिजनों से कहा कि इलाज में हर संभव मदद करेंगे। उन्होने चिकित्सकों से तिवारी के इलाज के संबध में चर्चा की और उचित उपचार और देखभाल के लिए कहा।

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Dakhal News 6 March 2020


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  मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने निवास पर आज यहां विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर कार्टूनिस्ट  हरिओम तिवारी की बाघों को समर्पित कार्टून कला की किताब "टाइगर स्पीक" का विमोचन किया। इस अवसर पर श्री हरिओम ने टाइगर स्टेट विषय पर बनाया कार्टून चित्र मुख्यमंत्री को भेंट किया।    बाघों के जीवन और उनके पर्यावरण को समर्पित कार्टून किताब में संकटग्रस्त बाघ के प्रति मानवीय  संवेदना जगाने के लिए कार्टून कला का रचनात्मक उपयोग करने की पहल की गई है। बाघ को मानव समाज के भद्र पुरूष के रूप में देखते हुए उसकी वेदना को कार्टून कला के माध्यम से अभिव्यक्त  किया गया है। कार्टूनों में बाघ हंसाता भी है और गंभीर बातें भी करता है।   मुख्यमंत्री नाथ ने कार्टूनिस्ट हरिओम के टाइगर के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के प्रयास की सराहना की।    इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार सोमदत्त शास्त्री, मंजूल प्रकाशन के संपादक कपिल सिंह और डॉ. राखी तिवारी उपस्थित थी।  

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Dakhal News 4 March 2020


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  लड़खड़ाती सरकार में एक और मंत्री का ट्विस्ट    खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल बोले , जिसकी सरकार उसको समर्थन भाजपा को अपनी शर्तों के साथ समर्थन दे सकता हूँ | खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल के इस बयान ने प्रदेश की राजनीति में फिर अटकलों का बाजार गर्म कर दिया हैं | एक तरफ भाजपा पर  हार्स ट्रेडिंग को लेकर आरोप लग रहे हैं | वहीं खनिज मंत्री जायसवाल का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार गिरने पर अपनी शर्तों के साथ भाजपा को समर्थन दे सकते हैं।  अपने गृह नगर वारासिवनी पहुंचे प्रदेश के खनिज संसाधन मंत्री प्रदीप जायसवाल ने मीडिया से चर्चा करते हुए एक बड़ा बयान जारी कर आने वाले समय में जिसकी भी सरकार रहे अपनी इच्छा साफ जाहिर कर दी हैं | उन्होंने कहा कि अगर कमलनाथ की सरकार गिरती है और भाजपा सरकार बनाती हैं  |  तो वो जिले व क्षेत्र के विकास के लिए अपनी जनता व समर्थकों की सलाह पर भाजपा सरकार को बाहर से समर्थन दे सकते हैं। जिले व क्षेत्र के विकास के लिए हमारा विकल्प हमेशा खुला रहेगा। दूसरी तरफ उन्होंने अभी वर्तमान में कमलनाथ सरकार के गिरने की आशंकाओं को ही गलत साबित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि भाजपा की आदत में शुमार है | कि वह हार्स ट्रेडिंग के माध्यम से विधायकों की खरीद फरोख्त करती है और जहां बहुमत नहीं होता है |  वहां पर जोड़-तोड़ की राजनीति कर सरकारें बनाने का प्रयास करती है।इसके पूर्व भी भाजपा ने कर्नाटक, आसाम, महाराष्ट्र, गोवा, हरियाणा आदि प्रदेशों में जोड़-तोड़ के माध्यम से सरकारें बनाई है। वहीं महाराष्ट्र में तो उसे मुंह की भी खानी पड़ी। उन्होंने कहा कि प्रदेश में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए उन्हें भी भाजपा के बड़े नेताओं के फोन आए थे। उनके द्वारा बड़े-बड़े प्रलोभन दिए गए थे, किंतु उन्होंने क्षेत्र व जिले के विकास को दृष्टिगत रखते हुए कमलनाथ को समर्थन देकर सरकार बनाने में सहयोग किया था। मंत्री प्रदीप जायसवाल ने एक सवाल के जवाब में स्पष्ट रुप से कहा कि उन्हें क्षेत्र की जनता ने निर्दलीय रूप में चुनकर प्रदेश की विधानसभा में भेजा है। क्षेत्र की जनता को उनसे बहुत सी अपेक्षाएं है कि वह क्षेत्र का विकास करेंगे। वर्तमान समय में प्रदेश सरकार में खनिज मंत्री के पद पर रहते हुए वह क्षेत्र व जिले में विकास की गति को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे है। अगर कमलनाथ सरकार किन्हीं कारणों से गिरती है और भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में आती है। यदि भाजपा की ओर से उनसे सहयोग मांगा जाता है |  तो वह अपने क्षेत्र की जनता की आशाओं व जिले के विकास को देखते हुए अपनी शर्तों पर भाजपा को बाहर से समर्थन देने का उनका विकल्प हमेशा खुला रहेगा।

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Dakhal News 4 March 2020


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भोपाल। पीटीआई भोपाल के पूर्व ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा का गुरुवार सुबह निधन हो गया। 66 वर्षीय अरविंद शर्मा लंबे समय से बीमार चल रहे थे और भोपाल के नर्मदा हॉस्पिटल में उनका ईलाज चल रहा था। जहां उन्होंने गुरुवार सुबह अंतिम सांस ली। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा नि:संतान थे और उनके परिवार में पत्नी का पहले ही देहांत हो चुका है। मप्र भाजपा नेताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि दी है।    पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट कर वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा के निधन पर दुख जताते हुए लिखा ‘वरिष्ठ पत्रकार, पीटीआई भोपाल के पूर्व ब्यूरो चीफ, मृदुभाषी, अरविंद शर्मा जी के निधन का दुखद समाचार मिला। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान और परिजनों को यह गहन दु:ख सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति!   नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने ट्वीट पर अपने शोक संदेश में लिखा ‘वरिष्ठ पत्रकार श्री अरविंद शर्मा जी के निधन का समाचार मिला। श्री शर्मा जी के निधन पर शोक व्यक्त करता हूँ। ईश्वर दिवंगत की आत्मा को अपने श्रीचरणो में स्थान दें और शोक संतृप्त परिवार पर जो वज्रपात हुआ है उसे सहन करने की शक्ति प्रदान करे। ॐ शांति’।    भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अरविंद शर्मा के निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा ‘सादर श्रद्धांजलि !!!  वरिष्ठ पत्रकार और पीटीआई से जुड़े श्री अरविंद शर्मा जी का निधन पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। ख़बरों की दुनिया में उनका नाम हमेशा याद किया जाएगा। ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। ॐ शांति !

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Dakhal News 27 February 2020


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नई दिल्ली । चर्चित लेखिका वंदना राग के नए उपन्यास ‘बिसात पर जुगनू’ का लोकार्पण शुक्रवार की शाम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। पूर्व एमएलए संदीप दिक्षित, पंकज राग, मंगलेश डबराल, विनोद भारद्वाज, अपूर्वानंद के साथ साहित्य, राजनीति, मीडिया और कला जगत के चर्चित चेहरे ने कार्यक्रम में शामिल हुए। लोकार्पण के बाद लेखिका वंदना राग से, आलोचक संजीव कुमार और लेखक ब्लॉगर प्रभात रंजन ने बातचीत की। बिसात पर जुगनू, उपन्यास की कहानी हिन्दुस्तान की पहली जंगे-आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर, 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है। उपन्यास, भारत और चीन, इन दो देशों से जुड़ी कहानी साथ-साथ लेकर चलती है जिसके इर्द-गिर्द आज पूरी दुनिया का अर्थतन्त्र, राजनीति, युद्ध की आशंकाएं और कृत्रिम बीमारियां; सब कुछ छितराया हुआ है। किताब पर बातचीत करते हुए वंदना राग ने कहा, “इस किताब के लिए मैंने चीन की लंबी यात्राएं कीं और जाना की दोनों ही देशों के आम लोगों का संघर्ष एक जैसा है। इतिहास में ऐसी कई महिलाएं गुमनामी में रहीं जिन्होंने स्वतंत्रा संघर्ष में योगदान दिया। यह उपन्यास इन महिलाओं की भी कहानी है।“ आलोचक संजीव ने भी वंदना की बात से सहमति जताते हुए कहा कि, “यहाँ फ़िरंगियों के अत्याचार से लड़ते दोनों मुल्कों के दुःखों की दास्तान एक-सी है और दोनों ज़मीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक-सी है। ऐसी कई गुमनाम स्त्रियाँ इस उपन्यास का मेरुदंड हैं।“ कथाकार प्रभात रंजन ने अपनी बात रखते हुए कहा, “बहुत दिनों बार एक बड़े कैनवास का ऐतिहासिक उपन्यास है बिसात पर जुगनू।“ उन्होंने यह भी कहा, “19 वीं शताब्दी के इतिहास के द्वंद्व, भारत-चीन व्यापार, कम्पनी का राज, जन जागरण, विद्रोह। पटना कलम के कलाकारों का बिखराव। इस उपन्यास में इतिहास, कला के बहुत से सवाल आते हैं और बेचैन कर देते हैं। बहुत से किरदार डराते भी हैं, मन के भीतर रह जाते हैं।“ किताब के लोकार्पण पर राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, “इस उपन्यास को पढ़ते हुए हम कुछ तो इस बारे में सोचने के लिए विवश होंगे। किताब भाषा की बात करती है। चीन में आज भी बहुत कम लोग अंग्रेज़ी समझने वाले हैं। वे अपना सारा काम अपनी भाषा में करते हैं, विज्ञान की खोजें भी, यहां तक कि कम्प्यूटर पर काम भी। उन्होंने अपने बच्चों पर एक अतिरिक्त गैरजरूरी बोझ नहीं डाला। मुझे लगता है चीन, जापान आदि देशों के विकसित होने का बड़ा कारण अपनी भाषा में सोचना और काम करना है।“ उपन्यास बिसात पर जुगनू के बारे में बिसात पर जुगनू सदियों और सरहदों के आर-पार की कहानी है। हिन्दुस्तान की पहली जंगे-आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर यह 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है। बीच में उत्तर बिहार की एक छोटी रियासत से लेकर कलकत्ता और चीन के केंटन प्रान्त तक का विस्तार समाया हुआ है। यहाँ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की त्रासदी है तो पहले और दूसरे अफ़ीम युद्ध के बाद के चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी।   वन्‍दना रागवन्‍दना राग मूलतः बिहार के सिवान ज़िले से हैं। जन्म इन्दौर मध्य प्रदेश में हुआ और पिता की स्थानान्तरण वाली नौकरी की वजह से भारत के विभिन्न शहरों में स्कूली शिक्षा पाई। 1990 में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया। पहली कहानी हंस में 1999 में छपी और फिर निरन्तर लिखने और छपने का सिलसिला चल पड़ा। तब से कहानियों की चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं—यूटोपिया, हिजरत से पहले, ख्‍़यालनामा और मैं और मेरी कहानियाँ।

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Dakhal News 25 February 2020


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Alok Kumar : डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के चकाचौंध से चौंधियाए भाई लोग इसे आखिरी मान कर आलोचना में तमाम ऊर्जा को उड़ेल मत देना.आलोचना – प्रत्यालोचना को बचाए रखना क्योंकि हाल फिलहाल ही अंदरूनी सियासत में इससे बड़ा घटने वाला है. इससे भी बड़े मौके आने वाले हैं. मौके की तैयारी मुक़म्मल हो रही है. खबर है कि इधर ट्रम्प लौटकर अमेरिका पहुंचे नहीं होंगे और घरेलू सियासी तुरुप के पत्ते तेज़ी से फेंटे जायेंगे. हौले हौले से राज्यों की सियासत के करवट बदलने का सिलसिला तेज हो जाएगा. बारी बारी से एक -दो नहीं बल्कि एक साथ कई राज्यों को बड़े सियासी बबंडर से गुजारा जाएगा. इसके मंचन की पूरी तैयारी है. यह संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में भाजपा के सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिहाज से खास होगा. क्योंकि सहज़ शासन के लिए राज्यसभा में भाजपा के सदस्यों की संख्या को बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता में शामिल है. तैयारी के हिसाब से संभव है कि सियासी नाटक इतना ज्यादा बड़ा हो कि उसकी तुलना में गोवा और कर्नाटक की कहानी लघु और पुरानी पड़ जाए. ओड़िशा और आंध्रप्रदेश में भाजपा अपने हिस्से से ज्यादा राज्यसभा सीट लेगी इसके लिए नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी तैयार हैं. सियासी नाटक के असली मंचन की जरुरत महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में है. इसे लेकर दांतों तले अंगुली दबाने वाली कोई बात हो जाए तो चौंकने से संकुचाईयेगा मत. दृश्य एक की तैयारी के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बड़ा गुल खिलाने वाले हैं.वह भाई राज की सक्रियता से सहमे हुए हैं. दबाव में सौदे की मेज पर आ बैठे हैं.बेटे आदित्य ठाकरे का भविष्य सुरक्षित होने की ताकीद के साथ ही वह किसी भी घड़ी दिल्ली के मेगा शो में भरत मिलाप का दृश्य फिल्माने वाले हैं. ट्रम्प की विदाई के बाद उद्धव की अयोध्या में मत्था टेकने की योजना है. संजय ने इसे बयां कर दिया है.7 मार्च को तय इस अभियान से वह सुर्खियों में छाने वाले है. सियासी तड़का लगाने वाले लोग काम पर लगे हैं. तलवार सिर पर लटकाया गया है, उद्धव वापसी के रास्ते पर नहीं आए तो राज ठाकरे को भगवान राम का बड़ा भक्त साबित करने की तैयारी होगी. दृश्य दो – मध्य प्रदेश में कुम्हलाए कमल का नया कर्णधार तय हो रहा है. नए गुल से राजमाता सिंधिया की संतति को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना दिन ब दिन मजबूत हो रही है.अंजाम के बदले में भाजपा को मध्य प्रदेश से ज्यादा राज्यसभा सीट मिल जाय. मार्च में राज्यसभा चुनाव से पहले ही सब तय होना है. दृश्य तीन – झारखण्ड के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री पर निशाना है. राज्यसभा की महज़ एक-दो ज्यादा सीट लेने के लिए झारखण्ड में बड़ा उलट फेर होने की संभावना है. संभव है कि वहां गठबंधन ही बदल जाए. मुख्यमंत्री तो हेमंत बने रहें लेकिन 2015 में रघुवर दास के मुख्यमंत्री बनने से पहले की स्थिति फिर से बहाल हो जाए. दृश्य चार – यह ज्यादा हंगामेदार होगा. कोलकाता से एक सीट भाजपा को मिल जाए, इसका इंतजाम जारी है. सफल हुआ तो संभव है, वो नज़र आए जिसे असली सियासत कहते हैं. बिहार में नीतीश के पुचकार के पीछे फिलहाल राज्यसभा चुनाव को ही पढ़िए.   दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार आलोक कुमार की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 25 February 2020


 bhopal, Akhilesh Yadav ,video will respond , interest , abusive people , social media

अखिलेश यादव कह रहे हैं कि वह सोशल मीडिया पर गाली देने वालों को लाइक कर रहे हैं। उनकी सूची बना रहे हैं। ब्याज सहित जवाब दिया जाएगा। अखिलेश या कोई भी वंचितों का नेता जब भी सत्ता में रहा है तो यह लोग बुनियादी गलतियां करते रहे हैं। इन लोगों ने कभी अपनी वैचारिक टीम नहीं बनाई। ऐसी कोई टीम नहीं है जो समाजवाद या उनके 1950 के बाद संसोपा से समाजवादी पार्टी की हिस्ट्री या उनके नेताओं के त्याग व बलिदान के बारे में लिखे। यहां तक कि इन लोगों ने यूनिवर्सिटी कॉलेज में ऐसे टीचरों की नियुक्ति नहीं की, जिन्होंने समाजवाद या समाजवादी नेताओं पर पीएचडी करवाई हो। इन्होंने पत्रकारों की ऐसी पीढ़ी नहीं तैयार की जिसे समाजवादी कहा जाए। कांग्रेसी, संघी, कम्युनिस्ट ढेरों मिल जाएंगे। इन्होंने अपना मीडिया हाउस, प्रिंट हाउस, बिजनेस खड़ा करने की कवायद नहीं की। इन्होंने अपनी विचारधारा के लोगों की पेशेवरों की टीम नहीं तैयार की। इस तरह की तमाम गलतियां हुई हैं। इसकी वजह से आज गर्त में हैं। कोई इनके फेवर में तार्किक तरीके से बोलने वाला नहीं है। इनके समर्थक भी पार्टी के संघर्षों को नही जानते। यह नहीं जानते कि समाजवादी आन्दोलन ने कितने आम नागरिकों के हाथों सत्ता की चाबी दी। इतने संकट के दौर में भी सपा, बसपा, राजद, जदयू जैसे दल ऐसी कोई कवायद नहीं कर रहे हैं। इसका खामियाजा जनता भुगत रही है।

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Dakhal News 23 February 2020


tikamgarh,   not be able, withdraw money,ATM, without OTP

टीकमगढ़। बैंक में रखे रुपये की सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद रहने वाले स्टेट बैंक के खाताधरकों के लिए एक अच्छी खबर है। बैंक प्रबंधन ने उनकी कमाई की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने एक नया सिस्टम लागू किया है। इस व्यवस्था के तहत अगर आपको रात के वक्त एटीएम का इस्तेमाल कर बड़ी रकम निकालनी हो, तो मोबाइल लेकर जाना होगा। एसबीआई अधिकारियों के अनुसार 10 हजार से अधिक रुपये निकालने की प्रक्रिया में ओटीपी जनरेट करना होगा। जिसे फीड करने के बाद ही मांगी गई। रकम एटीएम से निकल सकेगी। यह व्यवस्था केवल एसबीआई के खाता धारकों के लिए ही लागू की गई है। जिसमें जनरेट होने वाले ओटीपी को अन्य बैंकों के एटीएम में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। यानी यह सिस्टम केवल एसबीआई के एटीएम में ही प्रयोग हो सकेंगे।पंजीकृत मोबाइल नंबरों से पहले सत्यता की जांच होगीसहायक जनसम्पर्क अधिकारी शैफाली तिवारी ने शनिवार को इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि रात को आठ बजे से सुबह आठ बजे के बीच इस व्यवस्था के तहत एटीएम से रकम निकासी को जाने वाले इन खाताधारकों के बैंक में पंजीकृत अधिकृत मोबाइल नंबरों के माध्यम से सत्यता की जांच की जाएगी। इस जांच प्रक्रिया के लिए ओटीपी जनरेट कर मोबाइल नंबर पर भेजा जाएगा, तभी रकम आहरित होगी। बिना ओटीपी के रात के वक्त कोई भी खाताधारक दस हजार के अधिक रकम नहीं निकाल सकेंगे। इस तरह खाताधारकों की रकम उड़ाने की फिराक में रहने वाले जालसाजों पर लगाम लगेगी।यह व्यवस्था सिर्फ एसबीआई के ग्राहकों के लिए ही लागूउन्होंने बताया कि यह व्यवस्था एसबीआई के ग्राहकों के लिए लागू की गई है। एटीएक क्लोनिंग को रोकने के लिए व रकम की सुरक्षा को लेकर इसे लागू किया गया है। रात आठ से सुबह आठ बजे के बीच ओटीपी नहीं निकाली जा सकेंगी। इसके लिए ग्राहक को मोबाइल साथ लेकर जाना होगा। इससे उपभोक्ता की राशि सुरक्षित रहेगी।हेराफेरी-क्लोन के फ्रॉड रोकने के लिए की तैयारीबैंक अधिकारियों का कहना है कि भारतीय स्टेट बैंक की ओर से ओटीपी आधारित यह नई व्यवस्था उन मामलों को रोकने के लिए है। जिनमें डेबिट कार्ड में हेराफेरी या क्लोन के जरिए एटीएम फ्रॉड कर लोगों की गाढ़ी कमाई उड़ाने की कोशिश की जाती है। एटीएम फ्रॉड की इन घटनाओं से सबक लेते हुए स्टेट बैंक ने अपने ग्राहकों की रकम की सुरक्षा करने यह नया इंतजाम किया है। इस व्यवस्था के तहत अगर आपको रात आठ बजे के बाद एटीएम से दस हजार रुपये की राशि निकालनी हो, तो अपना मोबाइल फोन साथ रखना होगा। अगर दस हजार रुपये से अधिक रकम आहरण करना हो, तो बैंक में अधिकृत किए गए खाताधारक के अधिकृत मोबाइल नंबर पर ओटीपी भेजा जाएगा।दूसरे बैंक के लिए यह नियम लागू नहींइस व्यवस्था के तहत अगर खाताधारक अपने एसबीआई डेबिट कार्ड का इस्तेमाल किसी दूसरे बैंक के एटीएम पर करते हैं तो वहां ओटीपी की जरूरत नहीं होगी। इसी तरह दूसरे बैंक के खाताधारक भी एसबीआई के एटीएम मशीन पर अपना डेबिट कार्ड इस्तेमाल करता है, तो भी ओटीपी जनरेट करने की जरूरत नहीं है।

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Dakhal News 22 February 2020


bhopal, The reality of Shiva\

21 फरवरी शिवरात्रि पर्व पर विशेष   प्रमोद भार्गव   पुराणों में शिव की कल्पना ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के रूप में की गई है, जिनका आधा शरीर स्त्री तथा आधा पुरुष का है। शिव का यह स्त्री व पुरुष मिश्रित शरीर अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण के अनुसार शिव को इस रूप-विधान में परम पुरुष ब्रह्मात्मक मानकर, ब्रह्म से भिन्न उसकी शक्ति माया को स्त्री के आधे रूप में चित्रित किया गया है। शिव का रूप अग्नि एवं सोम अर्थात सूर्य एवं चंद्रमा के सम्मिलन का भी स्वरूप है। यानी पुरूष का अर्धांश सूर्य और स्त्री का अर्धांश चंद्रमा के प्रतीक हैं। यह भी पुराण सम्मत मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्तिरूपा पर्वती हुए थे। कथा में यह भी है कि इसी दिन शिव अत्यंत क्रोधित हुए और संपूर्ण ब्रह्माण्ड के विनाश के लिए तांडव नृत्य करने लगे। शिव स्वयं मानते हैं कि स्त्री-पुरूष समेत प्रत्येक प्राणी की ब्रह्माण्ड में स्वतंत्र सत्ता स्थापित है। इसे ही वैयक्तिक रूप में ब्रह्मात्मक या आत्मपरक माना गया है।   अर्धनारीश्वर के संदर्भ में जो प्रमुख कथा प्रचलन में है, वह है जब ब्रह्मा ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा तो उन्हें इसे अकेले पुरुष रूप में आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव को बुलाकर अपना मंतव्य प्रगट किया। शिव ने ब्रह्मा के मूल भाव को समझते हुए उन्हें अर्धनारीश्वर में दर्शन दिए। अर्थात् स्त्री और पुरुष के सम्मिलन या सहवास से सृष्टि के विकास की परिकल्पना दी। इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्मा सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील रखने का विधान रच पाए। सच्चाई भी यही है कि स्त्री व पुरुष का समन्वय ही सृष्टि का वास्तविक विधान है इसीलिए स्त्री को प्रकृति का प्रतीक भी माना गया है। अर्थात प्रकृति में जिस तरह से सृजन का क्रम जारी रहता है, मनुष्य-योनी में उसी सृजन प्रक्रिया को स्त्री गतिशील बनाए हुए है। अर्धनारीश्वर यानी आधे-आधे रूपों में स्त्री और पुरुष की देहों का आत्मसात हो जाना, शिव-गौरी का वह महा-सम्मिलन है, जो सृष्टि के बीज को स्त्री की कोख अर्थात प्रकृति की उर्वरा भूमि में रोपता है। सृष्टि का यह विकास क्रम अनवरत चलता रहे इसीलिए सृष्टि के निर्माताओं ने इसमें आनंद की उत्तेजक सुखानुभूति भी जोड़ दी।   सृष्टि के इस आदिभूत मातृत्व व पितृत्व को पुराणों की प्रतीकात्मक भाषा में पर्वती-परमेश्वर या शिव-पर्वती कहा गया है। अर्थात शिव-शक्ति के साथ संयुक्त होकर अर्धनारीश्वर बन जाते हैं। इसलिए शिव से कहलाया गया है कि शक्ति यानी स्त्री को स्वीकार किए बिना पुरुष अपूर्ण है। उसे शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। स्त्री के सहयोग के बिना कोई कल्पना फलित नहीं हो सकती। इसीलिए पुरुषरूपी शिव और प्रकृति रूपी स्त्री जब अर्धनारीश्वर के रूप में एकाकार होते हैं तो सभी भेद और विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। अर्थात जब पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरूष एक-दूसरे को आंतरिक रूप से तृप्त करते हैं तभी अर्धनारीश्वर स्वरूप सार्थक होता है। अर्धनारीश्वर की तरह एकाकार हुए बिना हम अपने जीवन अर्थात काल को आनंद या सुख की अनंत अनुभूति के साथ जी नहीं सकते। मनुष्य जीवन में सुख अनंतकाल तक बना रहे, इस हेतु स्त्री-पुरूष का एकालाप भी युग-युगांतरों में बने रहना जरूरी है।   शिवलिंग का रहस्य जाने बिना, शिव-महिमा का बखान अधूरा है। इसलिए लिंग के प्रकृति से जुड़े महत्व और इसकी पूजा के कारण भी जानना जरूरी है। वैसे आम प्रचलन में यही मान्यता है कि शिव और शक्ति दोनों का संयोगात्मक प्रतीक ही शिवलिंग है और यही इनकी माया है। क्योंकि सामान्यतः पुरूष और स्त्री के गुप्तंगों का आभास देने वाले शिवलिंग की प्रतीक मूर्तियों से साधारण अर्थ यही निकलता है। लेकिन ‘स्कंदपुराण‘ में इसका अर्थ प्रकृति की चेतना से संबंधित है, अर्थात आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। यह आकाश इसलिए लिंग कहलाता है क्योंकि इसी में समस्त देवताओं का निवास है और इसी में वे गतिशील रहते हैं। आकाश को पुराणकारों ने इसलिए भी लिंग माना है क्योंकि इसका स्वरूप शिवलिंग जैसा अर्ध-वृत्ताकार है। दूसरे वह पृथ्वी रूपी पीठिका पर स्थित या अधिरोपित होने जैसा दिखाई देता है।   प्रकृतिमय इसी लिंग के आकार का वर्णन लिंग पुराण में है। इसके अनुसार सभी लोकों का स्वरूप लिंग के आकार का है। इसी लिंग में ब्रह्मा समेत सभी चर-अचर जीव, बीज स्वरूप लघु रूपों में प्रतिष्ठित हैं। सांख्य दर्शन भी लिंग और योनि को प्रकृति के रूपों में देखता है। इसमें व्यक्त प्रकृति के लिए लिंग शब्द का उपयोग किया गया है, जबकि अव्यक्त प्रकृति के लिए अलिंग शब्द का। अलिंग अर्थात जो लिंग नहीं है, यानी इसका आशय योनि से है। अर्थात शिवलिंग के रूप में जिस मूर्ति की पूजा की जाती है, वह लौकिक स्त्री-पुरूष के जननांग नहीं वरन् विश्व जननी व्यक्त एवं अव्यक्त प्रकृति की मूर्तिस्वरूपा प्रतिमा है। शिवपुराण में शिवलिंग को चैतन्यमय और लिंगपीठ को अंबामय बताया गया है। किंतु लिंग पुराण में लिंग को शिव और उसके आधार को शिव-पत्नी बताया गया है। यहीं से यह मान्यता लोक प्रचलन में आई कि शिव-लिंग उमा-महेश के प्रतीक स्वरूप हैं।   इस प्रसंग में शिव के वाहन नंदी यानी वृषभ का वर्णन जरूरी है। नंदी शिव के वाहन के रूप में इसलिए उपयुक्त हैं क्योंकि वृषभ लोकव्यापी प्राणी होने के साथ खेती-किसानी का भी प्रमुख आधार है। यानी खेती का यांत्रिकीकरण होने से पहले बिना बैल के खेती संभव ही नहीं थी। फिर शिव ने लोक-कल्याण की दृष्टि से सर्वहारा वर्ग के ज्यादा हित साधे हैं, उन्हीं के बीच उन्होंने अधिकतम समय बिताया है। इसलिए ऐसे उदार नायक का वाहन बैल ही सर्वोचित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के रहस्यों की गवेषणा की आरंभिक अवस्था में ही समझ लिया था कि प्रकृति के अन्य जीव-जगत के साथ ही मनुष्य का सह-अस्तित्व संभव व सुरक्षित है। इसी कारण सभ्यता और संस्कृति का विकास क्रम जैसे-जैसे आगे बढ़ा, वैसे-वैसे अलौकिक शक्तियों में प्रकृति के रूपों को प्रक्षेपित करने के साथ, पशु-पक्षियों को भी देवत्व से जोड़ते गए। नंदी को विरक्ति का द्योतक माना जाता है इसलिए साधनारत शिव के लिए नंदी शक्ति के भी प्रतीक हैं।   पुराणों में वृषभ को धर्म-रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनके चार पैरों को सत्य, ज्ञान, तप तथा दान का प्रतीक माना गया है। शिवलिंग की उत्पत्ति को विद्युत तरंगों से भी होना मानते हैं। इसके आकार को ब्रह्माण्ड का रूप माना गया है। इस कारण शिव को विद्युताग्नि और नंदी को बादलों का प्रतीक माना गया है। बादल के प्रतीक होने के कारण ही शिव के नंदी शुभ्र-श्वेत हैं। शिवलिंग के रूप में योनि और लिंग प्रजनन के शक्ति के प्रतीक भी हैं, इसलिए वृषभ को काम का प्रतीक भी माना गया है। इसे काम का प्रतीक इसलिए भी माना गया है, क्योंकि इसमें काम शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। इस नाते वृषभ, सृजन शक्ति का प्रतीक है। शिव को नंदी पर आरूढ़ भी दिखाया गया है। इसका आशय है, एक शिव ही हैं, जो कामियों की वासनाओं को नियंत्रित करने या उनपर विजय प्राप्त करने में सक्षम हैं। स्पष्ट है, काम के रूप में वृषभ का प्रतीक शिव को विश्व की सृष्टि के लिए अभिप्रेरणा का द्योतक भी है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 February 2020


jabalpur,  Film city, tourism department , invite  producer-directors

जबलपुर।  मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में फिल्म बनाए जाने का क्रेज लम्बे समय से देखने को मिल रहा है, लेकिन अब राज्य की संस्कारधानी के नाम से मशहूर महाकौशल क्षेत्र के जबलपुर शहर को भी फिल्म सिटी बनाने को जोर दिया जा रहा है। इसको लेकर पर्यटन विभाग ने अपनी तैयारी भी शुरू कर दी है। पर्यटन विभाग जबलपुर में करीब छह लाख रुपये खर्च कर एक कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है, जिसके लिए जाने माने निर्माता-निर्देशकों को जबलपुर आने का न्योता दिया है। इधर, भाजपा ने पर्यटन विभाग के इस कार्यक्रम पर सवाल उठाने शुरू कर दिये हैं। टूरिज्म एवं प्रमोशन कौंसिल के सीईओ हेमंत कुमार ने शुक्रवार को बताया कि एक अच्छी फिल्म के लिए जो लोकेशन होना चाहिए, वह सब कुछ जबलपुर में है और यही वजह है कि फि़ल्म इंडस्ट्री के कई निर्माता-निर्देशकों को जबलपुर जिला फिल्म बनाने के लिए पसन्द आ रहा है। मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग ने करीब 26 निर्माता-निर्देशकों को जबलपुर बुलाया है, जो कि यहां आकर अपनी फिल्म के लिए लोकेशन देखेंगे और कोशिश करेंगे कि वह जबलपुर में अपनी फिल्मों को तैयार करे।पर्यटन विभाग का मानना है कि जबलपुर में फिल्म सिटी बनने से यहां के लोगो को न सिर्फ रोजगार मिलेगा, बल्कि जबलपुर जिले का नाम देश मे होगा। पर्यटन विभाग करीब छह लाख रुपये इस कार्यक्रम को लेकर खर्च कर रहा है, लेकिन इस छह लाख में से पांच लाख रुपये निर्माता-निर्देशको के आने जाने पर ही खर्च हो जाएगा। इसके लोकर भाजपा ने सवाल उठाए हैं। पर्यटन विभाग के इस कार्यक्रम में भाजपा ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि यह कार्यक्रम जबलपुर के लिए नहीं, बल्कि अधिकारी अपने बच्चों और परिजनों के प्रमोशन के लिए ये सब कर रहे हैं, क्योकि फिल्म निर्माता-निर्देशक अगर जबलपुर आएंगे तो उनसे मिलने के लिए अधिकारियों के परिवार वाले ही सबसे आगे रहते हैं।

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Dakhal News 14 February 2020


dhaar, Video ,in-charge of police station ,caught celebrating girl\

धार। पत्नी के होते हुए अन्य युवती के साथ रंगरेलियां मनाते पकड़ाए गंधवानी टीआई नरेंद्रसिंह सूर्यवंशी को पुलिस अधीक्षक ने निलंबित कर दिया है। एस.पी. ने पहले टी.आई. सूर्यवंशी को लाइन हाजिर किया था, वहीं बुधवार को एस.डी.ओ.पी. की रिपोर्ट मिलने के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडिया सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है जिसमें टीआई साहब पत्नी से पिटते देखे जा सकते है।    पत्नी ने किया था हंगामा टी.आई. नरेंद्रसिंह सूर्यवंशी की पत्नी इंदौर में रहती हैं। पति के आचरण पर शंका होने पर पत्नी मंगलवार शाम गंधवानी पहुंची थी। पत्नी ने जब टी.आई. के घर का दरवाजा खटखटाया, तो गेट नहीं खुला। जिसके बाद पत्नी ने वहां हंगामा कर दिया। शोर-शराबा सुनकर कई नागरिक भी वहां जमा हो गए। टी.आई. के निवास पर हंगामे की सूचना मिलने पर एस.डी.ओ.पी भी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे। जिसके बाद पुलिस टी.आई. के निवास से निकालकर युवती को मनावर थाने ले गई  थी। पत्नी का आरोप है कि टी.आई. सूर्यवंशी विगत तीन दिनों से अनजान युवती के साथ रह रहे हैं। इस मामले में एस.पी. आदित्यप्रताप सिंह ने टीआई नरेंद्रसिंह सूर्यवंशी को लाइन हाजिर कर दिया था, वहीं, इस मामले में एस.डी.ओ.पी. से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट मिलने के बाद एस.पी. ने बुधवार को टी.आई. नरेंद्रसिंह सूर्यवंशी को निलंबित कर दिया। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर टी.आई. के उक्त युवती के साथ फोटो वायरल हो रहे हैं। 

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Dakhal News 12 February 2020


bhopal, Fingerprints are also not safe

मीडिया डेस्क। अगर आप ये सोचते हैं कि आपकी उंगलियों के निशान यूनिक हैं और दुनिया में और किसी के पास नहीं हो सकते तो आप मूर्ख हैं। गुजरात पुलिस ने एक गैंग को पकड़ा है। ये 1000 रुपये में फिंगर प्रिंट के डुप्लीकेट बनवाता था। अब आप सोचें कि आपने कितने जगह अपने फिंगर प्रिंट लगा रखे हैं? मोबाइल से लेकर दफ्तर के गेट पर थंब स्कैनर तक। गांव का ग़रीब तो मानता ही है कि ईश्वर ने उसे अंगूठा दिया ही ठप्पा लगाने के लिए है। ताकि उसका हक कोई शातिर हड़प ले। मैं अंगूठे वाली व्यवस्था के पहले से ही खिलाफ़ रहा हूँ। किसी भी व्यक्ति या उसकी ईमानदारी की पहचान अंगूठा नहीं हो सकता। लेकिन DL, आधार बनवाने से लेकर मोबाइल अनलॉक तक के लिए धड़ल्ले से अंगूठा लिया जा रहा है। ये अंगूठा आपको मूर्ख बना रहा है। अंगूठा टेक। एक बार फिर मशीन पर सवाल है। व्यवस्था पर, आपकी चुप्पी पर सवाल है। इसका विरोध कीजिये। सिविल नाफरमानी कीजिये। ठान लीजिये, हम अंगूठा नहीं लगाएंगे। शुरुआत मोबाइल के अनलॉक को बदलने से ही कीजिये। पत्रकार सौमित्र राय की एफबी वॉल से

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Dakhal News 9 February 2020


chatarpur,  Locked children, were waiting in school

छतरपुर। प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने का भले की प्रयास कर रही हो, लेकिन शिक्षकों की मनमानी सरकार के प्रयासों पर भारी पड़ रही है। बच्चे अपने निर्धारित समय पर स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन स्कूल के शिक्षक समय पर नहीं पहुंचते और बच्चे घण्टों स्कूल के बाहर खड़े होकर स्कूल खुलने का इंतजार करते रहते हैं। ऐसा ही मामला शनिवार को सामने आया है।   दरअसल, संकुल अंतर्गत आनी वाली शासकीय माध्यमिक शाला कराठा का शनिवार को जब मीडियाकर्मियों ने सुबह 11 बजे औचक निरीक्षण किया तो पाया कि बच्चे स्कूल के बाहर खड़े होकर स्कूल खुलने का इंतजार कर रहे हैं। छात्रों ने बताया कि यह हाल रोजाना का है। शिक्षक रोज ही देर से आते हैं और समय से पहले स्कूल बंद कर चले जाते हैं। इस संबंध में जब नौगांव बीआरसी विनोद गुप्ता से बात की गई और उन्हें स्कूल बंद होने की जानकारी दी गई तो उन्होंने कार्यवाही करते हुए एक जनशिक्षक को मौके पर भेजा, जिसने पंचानामा बनाया। ज्ञात हो कि कराठा माध्यमिक शाला में प्रधानाध्यापक किशोरी लाल प्रजापति के अलावा एक महिला शिक्षक और एक अतिथि शिक्षक पदस्थ हैं जो कि कभी भी समय पर स्कूल नहीं पहुंचते और यही कारण है कि इस क्षेत्र में लगातार शिक्षा का स्तर गिर रहा है।   इनका कहना   स्कूल बंद होने की शिकायत मिली थी, मैंने जनशिक्षक को भेज कर पंचानामा बनवाया है, लापरवाह शिक्षकों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी तथा उनका एक दिन का वेतन भी काटा जाएगा।   विनोद गुप्ता, बीआरसी, नौगांव

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Dakhal News 8 February 2020


bhopal, Four trains canceled, four partially canceled,six diverted routes , track doubling work

भोपाल। रेल प्रशासन द्वारा सोगरिया, डीगोद, श्री कल्याणपुरा एवं भोनोरा स्टेशनों पर ट्रेक दोहरीकरण के लिए प्री-नॉन इंटरलॉकिंग एवं नॉन इंटरलॉकिंग के कार्य के चलते चार ट्रेनों को निरस्त,चार को आंशिक निरस्त एवं छह: ट्रेनों को परिवर्तित मार्ग से चलाने का निर्णय लिया गया है। यह जानकारी भोपाल रेल मंडल के जनसम्पर्क अधिकारी आईए सिद्दीकी ने शनिवार को मीडिया को दी। उन्होंने बताया कि ट्रेक दोहरीकरण कार्य के चलते गाड़ी संख्या 19811 कोटा-इटावा एक्सप्रेस रविवार, 09 फरवरी से आगामी 19 फरवरी तक, गाड़ी संख्या 19812 इटावा-कोटा एक्सप्रेस 10 फरवरी से 20 फरवरी तक, गाड़ी संख्या 19809 कोटा-जबलपुर एक्सप्रेस रविवार, 09 फरवरी से आगामी 19 फरवरी तक और गाड़ी संख्या 19810 जबलपुर-कोटा एक्सप्रेस 10 फरवरी से 20 फरवरी तक अपने प्रारम्भिक स्टेशन से निरस्त रहेगी।इसी प्रकार, रविवार, 09 फरवरी से 19 फरवरी तक अपने प्रारम्भिक स्टेशन से चलने वाली गाड़ी संख्या 14813 जोधपुर-भोपाल एक्सप्रेस, कोटा स्टेशन पर शार्ट टर्मिनेट होगी एवं कोटा-भोपाल स्टेशनों के मध्य आंशिक निरस्त रहेगी। इसी अवधि में प्रारम्भिक स्टेशन से चलने वाली गाड़ी संख्या 14814 भोपाल-जोधपुर एक्सप्रेस भोपाल-कोटा स्टेशनों के मध्य आंशिक निरस्त रहेगी एवं 10 फरवी से 20 फरवरी तक कोटा-जोधपुर स्टेशनों के मध्य चलेगी। वहीं, 9 फरवरी से 19 फरवरी तक अपने प्रारम्भिक स्टेशन से चलने वाली गाड़ी संख्या 51612 बीना-कोटा पैसेंजर बारॉ स्टेशन पर शार्ट टर्मिनेट होगी एवं बारॉ-बीना स्टेशनों के मध्य आंशिक निरस्त रहेगी, जबकि 10 फरवरी से 20 फरवरी तक  अपने प्रारम्भिक स्टेशन से चलने वाली गाड़ी संख्या 51611 कोटा-बीना पैसेंजर बारॉ स्टेशन से प्रारम्भ होगी एवं बीना-बारॉ स्टेशनों के मध्य आंशिक निरस्त रहेगी। जिन ट्रेनों के मार्ग परिवर्तित किये गए हैं, उनमें गाड़ी संख्या 13423 भागलपुर-अजमेर एक्सप्रेस, 14710 पुरी-बीकानेर एक्सप्रेस, 18573 विशाखापट्टनम-भगत की कोठी एक्सप्रेस, 18207 दुर्ग-अजमेर एक्सप्रेस, 18213 दुर्ग-अजमेर एक्सप्रेस और 13424 अजमेर-भागलपुर एक्सप्रेस शामिल हैं।

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Dakhal News 8 February 2020


bhopal, E calculator , department to remove, common problems, income tax payers

भोपाल। केंद्र सरकार ने नयी आयकर व्यवस्था में वैकल्पिक मार्ग चुनने की व्‍यवस्‍था देकर करदाताओं के सामने अपने लिए सही विकल्‍प का चुनाव करने का जो अवसर दिया है, उससे जहां अब तक कई करदाताओं के बीच भ्रम की स्‍थ‍िति बनी हुई है, आखिर वे अपने लिए कौन से आयकर स्लैब का चुनाव करें नए या पुराने? वहीं अब सरकार स्‍वयं उनकी मदद करने इस मामले में आगे आई है। आयकर विभाग की वेबसाइट को देखें तो आयकरदाताओं को मदद देने उसने  ई-कैल्कुलेटर लॉन्च किया है।    गौरतलब है कि इंडिया फिलिंग के डाटा के अनुसार मध्‍यप्रदेश में पिछले वित्‍त वर्ष के दौरान 26 लाख 35 हजार 445 लोगों ने आयकर जमा किया था, जबकि देशभर में कुल आयकर जमा करनेवालों की संख्‍या 08 करोड़ 45 लाख 14 हजार 539 थी । इसी तरह से पिछले वर्ष में 154 करोड़ रुपये केगत वर्ष रिफंड के मुकाबले 38.39 फीसदी अधिक यानी कि 213 करोड़ रुपये के रिफंड इश्यू किए थे और  पिछले वित्त वर्ष में करीब 6 लाख 80 हजार नए आयकरदाता पूरे मध्यप्रदेश में जोड़े गए हैं।     इस मामले में जब विभाग की अधिकारिक वेबसाइट incometaxindiaefiling.gov.in पर जाते हैं तो वहां एक ऑनलाइन ई-कैल्कुलेटर नजर आता है, जिसकी मदद से सभी आयकर दाता अपने लिए बेहतर विकल्‍प चुन सकते हैं । सभी करदाता यहां वेबसाइट की मदद से कैल्कुलेटर के जरिए बजट में प्रस्तावित नए और पुराने आयकर स्लैब विकल्पों की तुलना कर अब आसानी से जान सकते हैं  कि उनके लिए कौन सा विकल्‍प चुनना लाभकारी होगा ।    उल्‍लेखनीय है कि आयकर के मोर्चे पर करदाताओं कुछ राहत देते हुए वित्त मंत्री ने आयकर स्लैब में व्यापक बदलाव की घोषणा की है। नए टैक्स सिस्टम में 100 रियायतों में से 70 को खत्म करने के साथ ही कर के कई स्लैब बनाए हैं। नयी आयकर व्यवस्था वैकल्पिक है।  करदाताओं को पुरानी व्यवस्था या नयी व्यवस्था में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया गया है । उन्होंने कहा कि 15 लाख रुपए की आय पर पर आयकर दाता यदि किसी प्रकार की छूट या लाभ नहीं लेता है तो उसे एक लाख 95 हजार रुपए का कर देना होगा जबकि पुरानी प्रणाली में दो लाख 73 हजार रुपये का कर देना पड़ता था। इस प्रकार नयी प्रणाली को अपनाने पर 78 हजार का लाभ होगा। फिर भी कई मामलों में पुरानी कर प्रणाली चुनने में अपने अलग लाभ भी यहां आयकर विभाग ने बताए हैं।    उधर, यह जानना भी जरूरी है कि  नई आयकर व्यवस्था वैकल्पिक है और करदाता चाहे तो छूट और कटौती के साथ पुरानी कर व्यवस्था में पूर्वत ही रह सकता है। यहां महत्‍वपूर्ण और ध्‍यानदेने योग्‍य जरूरत यह है कि एक बार नई कर व्यवस्था को चुनने के बाद करदाता पर यह व्यवस्था आगामी वर्षों में भी लागू रहेगी। अब फैसला आयकर दाताओं को लेना है कि उनके लिए कौन सा स्‍लैब फायदेमंद है।   

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Dakhal News 7 February 2020


Prasar Bharati, budget cut

मोदी सरकार की नीति रही है बड़े मीडिया हाउसों को खुश रखना. इसी के तहत छोटे अखबारों की मोदी सरकार ने कमर तोड़ दी और बड़े अखबारों को भरपूर लालीपाप दिया. बजट में भी मोदी सरकार ने अखबार मालिकों को राहत दी है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में न्यूज प्रिंट के आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी आधा कर दिया है. इस कदम से अखबार निकालने का लागत घट जाएगा. मोदी सरकार के इस फैसले से प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री प्रसन्न है. न्यूज प्रिंट और लाइटवेट कोटेड पेपर के आयात पर पिछले साल जुलाई में दस प्रतिशत कस्टम ड्यूटी लगा दिया गया था. इस बजट में इसे घटाकर पांच प्रतिशत कर दिया गया है. इस निर्णय से अखबार मालिकों को प्रति टन न्यूजप्रिंट पर 1500 से 1700 रुपए की बचत होगी. ज्ञात हो कि भारत में न्यूजप्रिंट की डिमांड 2.5 मिलियन टन सालाना है. अपने देश में साल भर में न्यूजप्रिंट उत्पादन करीब एक मिलियन हो पाता है. ऐसे में अखबार मालिकों को न्यूज प्रिंट आयात करना पड़ता है। बजट में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के लिए 4375.21 करोड़ रुपए आवंटित किया गया है जो पिछले साल से ज्यादा है. प्रसार भारती का बजट पिछले वित्त वर्ष की तुलना में कम कर दिया गया है. पिछले वित्तीय वर्ष (2019-20) में ये 473 करोड़ रुपए था, लेकिन अब इसे घटाकर 370 करोड़ रुपए कर दिया गया है. इस बजट में ब्रॉडकास्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क डेवलपमेंट (BIND) को भी आवंटन किया गया है. वित्त वर्ष 2020 में आवंटित किए गए 227 करोड़ रुपए के मुकाबले कुल सूचना बजट घटाकर 220 करोड़ रुपए कर दिया गया है. सूचना क्षेत्र के लिए संशोधित बजट अनुमान 215 करोड़ रुपए है. फिल्म क्षेत्र को 145.50 करोड़ रुपए का आवंटन प्राप्त हुआ है.    

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Dakhal News 4 February 2020


 big business, private prisons , America, privatization , entering into prisons,back door in India.

अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया ने एक जनवरी से निजी जेलों और डिटेंशन सेंटरों से कोई नया कांट्रैक्ट करने या रिन्यू करने पर रोक लगा दिया है. ऐसे सभी मौजूदा कांट्रैक्ट 2028 तक ख़त्म कर दिए जायेंगे. अमेरिका में निजी जेल का धंधा बहुत बड़ा है. 20 फ़ीसदी फ़ेडरल क़ैदी ऐसी जेलों में हैं. फ़ेडरल और राज्यों के क़ैदियों को मिलाकर देखें, तो यह आंकड़ा आठ फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा है. सरकार एक क़ैदी पर जेल चलानेवाली कंपनी को 23 हज़ार डॉलर के आसपास देती है, जबकि अमेरिका में न्यूनतम वेज पर नियमित काम करनेवाला साल में सिर्फ़ 15 हज़ार डॉलर ही कमा पाता है. धंधा चलाने के लिए अधिक लोगों को अधिक दिनों तक जेलों में रखने का खेल भी होता है. डेमोक्रेटिक पार्टी के मुख्य उम्मीदवारों ने निजी जेल बंद करने का वादा किया है.   भारत में पिछले दरवाज़े से निजीकरण जेलों में घुस रहा है. इसके लिए लॉबिंग भी एक्टिवेटेड मोड में है. पता नहीं कि देश में अनेक जगहों पर बन रहे डिटेंशन सेंटर सरकार चलायेगी या निजी ठेकेदारों को सौंपेगी तथा देशभर की एनआरसी के बाद और जेलों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए आगे क्या होता है. यह भी अहम है कि क्या डिटेंशन सेंटर और जेलों की समीक्षा/सर्वेक्षण की व्यवस्था भी ठीक से की जायेगी.

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Dakhal News 4 February 2020


bhopal,  BJP besieges, President ,Prime Minister, photo,Urdu Academy

भोपाल। राजधानी स्थित उर्दू अकादमी कार्यालय में अध्यक्ष बदलते ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तस्वीरें हट गईं। इसे लेकर शुक्रवार को जमकर बवाल हुआ। इसके बाद दोनों तस्वीरें अपने पुराने स्थान पर लगा दी गई हैं और इस सिलसिले में एक व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है।    पूर्व राज्यपाल पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी के उर्दू अकादमी का अध्यक्ष बनने के बाद सरकारी कार्यालय से राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें हटने का मामला सामने आया। इसकी जानकारी जब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगी, तो शुक्रवार दोपहर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूर्व भाजपा विधायक सुरेंद्रनाथ सिंह के साथ बाणगंगा स्थित उर्दू अकादमी कार्यालय का घेराव कर दिया। इस दौरान पार्टी नेताओं ने सरकार पर जातिवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। हालांकि बाद में पुनः दोनों तस्वीरें जहां लगी थी, वहीं लगा दी गई। लेकिन तब तक महौल खराब हो चुका था। जिसके बाद उर्दू अकादमी के सचिव हिशामुदद्दीन फारूकी कर्मचारियों पर ही भड़क गए। इस मामले को  लेकर कई घंटों तक कार्यालय परिसर में हंगामा चलता रहा।    कर्मचारी के विरुद्ध की शिकायत    उर्दू अकादमी के अध्यक्ष अजीज कुरैशी की ओर से टीटीनगर थाने में अकादमी के एक कर्मचारी राहिल के खिलाफ प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति की फोटो हटाने की शिकायत दर्ज कराई गई है। टीटीनगर पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। बताया जा रहा है कि राहिल नागरिकता संशोधन कानून लागू किए जाने से नाराज था। सूत्रों के अनुसार इस शिकायत के आधार पर टीटीनगर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। 

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Dakhal News 31 January 2020


Talented journalist Abhay Sarwate ,dies due to oral cancer

दुखद खबरः- अभय सर्वटे नहीं रहे.. मेरे प्रिय मित्र, हरदिल अजीज, जिंदादिल इंसान, जाने-माने संस्कृतकर्मी, और वरिष्ठ पत्रकार अभय सर्वटे का अभी कुछ देर पहले आगरा के एक निजी अस्पताल में कार्डिअक अरेस्ट के चलते दुखद निधन हो गया। पिछले कुछ साल से वह मुख से कैंसर से पीड़ित थे लेकिन अपनी जुझारू प्रवृत्ति के कारण हर बार संकट से बाहर निकले और जीवटता के साथ जिंदगी का संघर्ष जारी रखा। ग्वालियर निवासी अभय सर्वटे लंबे समय से आगरा अमर उजाला के प्रबंधन से जुड़े हुए थे। इससे पहले वह स्वदेश और दैनिक भास्कर में अपनी प्रबंधन कार्यकुशलता का परिचय दे चुके थे। कोटि कोटि नमन मेरे भाई.. बहुत याद आओगे…   हिंदुस्तान अखबार के संपादक डॉ मनोज पमार की एफबी वॉल से.

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Dakhal News 23 January 2020


bhopal,5G services will get wings in the country

योगेश कुमार गोयल 17 जनवरी की सुबह 2.35 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इस साल के अपने पहले मिशन के तहत दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर फ्रैंच गुयाना के कोरोऊ प्रक्षेपण केन्द्र से यूरोपियन रॉकेट ‘एरियन 5-वीए 251’ की मदद से अपना संचार उपग्रह ‘जीसैट-30’ लॉन्च किया। ‘एरियन स्पेस सेंटर’ से एरियन 5 रॉकेट का पहली बार पिछले वर्ष ही इस्तेमाल हुआ था और उस समय भी इसी रॉकेट के जरिये भारतीय सैटेलाइट लॉन्च किया गया था। एरियन 5 के जरिये इसरो के जीसैट-30 के अलावा यूटेलसैट के यूटेलसैट कनेक्ट उपग्रह को भी भूस्थिर अंतरण कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। सी तथा केयू बैंड की कवरेज क्षमता बढ़ाने के लिए आने वाले दिनों में जीसैट-30 को भूमध्य रेखा से 36 हजार किमी की ऊंचाई पर स्थित जियोस्टेशनरी (भू-स्थैतिक) कक्षा में स्थानांतरित किया जाएगा। कक्षा उठाने के अंतिम चरण में दो सौर सारणियों तथा एंटीना रिफ्लेक्टर को इसमें तैनात किया जाएगा, जिसके बाद इसे अंतिम कक्षा में स्थापित किया जाएगा। परीक्षणों के पश्चात् यह कार्य शुरू करेगा। हालांकि भारत के पास चार टन वजनी क्षमता का रॉकेट, जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एमके-3 (जीएसएलवी-एमके-3) है लेकिन अगर इसरो ने अपने करीब 3.3 टन वजनी जीसैट-30 को अंतरिक्ष में भेजने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी ‘एरियन स्पेस’ की मदद ली है तो उसकी वजह जानना भी जरूरी है। दरअसल विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ एक उपग्रह की लॉन्चिंग के लिए पूरी जीएसएलवी-एमके-3 तकनीक को अपनाने में लंबा समय लगता है और इसी कारण उन देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों से सम्पर्क किया जाता है, जो इस तरह की तकनीक के जरिये उपग्रह लॉन्च कर रही हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ तथा यूरोपियन एजेंसी ‘एरियन स्पेस’ दूसरे देशों के मिशन को अपने स्पेस सेंटर से अंजाम देती हैं। ‘एरियन स्पेस’ यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) की वाणिज्यिक शाखा है, जो भारत की पुरानी साझेदार है। इसी स्पेस एजेंसी की मदद से अब तक कई भारतीय उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जा चुके हैं। इस स्पेस एजेंसी द्वारा सबसे पहले वर्ष 1981 में भारत के एक छोटे प्रयोगात्मक उपग्रह ‘एप्पल’ को लांच किया गया था और इसी एजेंसी के एरियन लांचर से प्रक्षेपित किया गया जीसैट-30 भारत का 24वां उपग्रह है। एरियन स्पेस से 23 उपग्रहों की परिक्रमा चल रही है और भारत ने उसके साथ 24 उपग्रहों को लॉन्च करने के लिए करार किया है। गुआना के एरियन स्पेस सेंटर से ही 6 फरवरी 2019 को भारत के संचार उपग्रह जी-सैट 31 को लॉन्च किया गया था और उससे पहले देशभर में इंटरनेट पहुंचाने के लिए 5 दिसम्बर 2018 को भी 5854 किलोग्राम वजनी इसरो द्वारा निर्मित सबसे भारी उपग्रह जी-सैट-11 को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। इसरो के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के निदेशक पी. कुन्हीकृष्णन के अनुसार एरियन 5 एक बेहद भरोसेमंद लांचर है, जिसके जरिये भारत ने जीसैट-30 को लॉन्च किया है। इसरो ने डिजिटल सिग्नल के लगातार बढ़ते प्रयोग और देश को इस कारोबार में नई दिशा देने के लिए ही संचार उपग्रह जीसैट-30 प्रक्षेपित किया है। बहरहाल, इसरो को 3357 किलोग्राम वजनी उपग्रह ‘जीसैट-30’ के लॉन्च के करीब 38 मिनट 25 सेकेंड बाद कक्षा में स्थापित करने में बहुत बड़ी सफलता मिली है। इसे इसरो के संवर्धित ‘आई-2के बस’ में संरूपित किया गया है, जो भू-स्थिर कक्षा में सी और केयू बैंड क्षमता बढ़ाएगा। जीसैट-30 अंतरिक्ष में अगले 15 वर्षों तक कार्य करेगा और यह इनसैट-4ए की जगह लेगा, जिसे साल 2005 में लॉन्च किया गया था। दरअसल इस संचार उपग्रह की उम्र पूरी हो रही है, इसीलिए इसकी जगह अब जीसैट-30 को जियो-इलिप्टिकल ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। इसरो के अध्यक्ष के. सिवन का कहना है कि जीसैट-30 कई फ्रीक्वेंसी में काम करने में सक्षम है और साथ ही इसके सफल प्रक्षेपण से कवरेज में वृद्धि होगी। इस संचार उपग्रह से राज्य संचालित तथा निजी सेवा प्रदाता कम्पनियों के संचार लिंक देने की क्षमता बढ़ सकती है। अभी जीसैट सीरीज के 14 उपग्रह काम कर रहे हैं, जिनकी बदौलत देश में संचार व्यवस्था कायम है और अब प्रक्षेपित किया गया ‘जीसैट-30’ जीसैट सीरीज का बेहद ताकतवर और महत्वपूर्ण संचार उपग्रह है, जिसकी मदद से देश की संचार प्रणाली में और इजाफा होगा। जीसैट-30 डीटीएच, टेलीविजन अपलिंक, टेलीपोर्ट सेवाओं, डिजिटल सैटेलाइट खबर संग्रहण (डीएसएनजी), ई-गवर्नेंस, शेयर बाजार तथा वीसैट सेवाओं के लिए एक क्रियाशील संचार उपग्रह है। देश की संचार व्यवस्था को मजबूत बनाने में इसकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी क्योंकि इसकी मदद से मोबाइल नेटवर्क तथा डीटीएच सेवाओं का भी विस्तार होगा। यह संचार उपग्रह पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन को समझने तथा भविष्यवाणी करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ‘जीसैट-30’ लॉन्च मिशन की सफलता से उत्साहित इसरो के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के निदेशक पी कुन्हीकृष्णन का कहना है कि वर्ष 2020 की शुरुआत एक शानदार लॉन्च के साथ हुई है। इस सैटेलाइट की मदद से जहां इंटरनेट की स्पीड बढ़ेगी, वहीं देश में जिन स्थानों में अभीतक मोबाइल नेटवर्क नहीं है, वहां मोबाइल नेटवर्क का विस्तार किया जा सकेगा। दुनिया भर में इस समय 5जी इंटरनेट पर तेज गति से कार्य चल रहा है और भारत में भी इंटरनेट की नई तकनीक आ रही है, ऑप्टिकल फाइबर बिछाए जा रहे हैं। ऐसे में देश को पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर संचार उपग्रह की आवश्यकता थी और जीसैट-30 को भारत का अभीतक का सबसे ताकतवर संचार उपग्रह माना जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि इन्हीं सब जरूरतों को यह उपग्रह बखूबी पूरा करेगा। जीसैट-30 उपग्रह की जरूरत के बारे में इसरो का कहना है कि जिस तरह देश और दुनिया में संचार व्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, उस तरह हमें भी बड़े सुधारों की जरूरत है। इसरो द्वारा डिजाइन किए और बनाए गए इस दूरसंचार उपग्रह से राज्य-संचालित और निजी सेवा प्रदाताओं की संचार लिंक प्रदान करने की क्षमता बढ़ेगी और माना जा रहा है कि इस उपग्रह की बदौलत इंटरनेट की दुनिया में क्रांति आ सकती है क्योंकि इसकी मदद से देश में नई इंटरनेट टेक्नोलॉजी लाए जाने की उम्मीदों को बल मिला है। इस उपग्रह के जरिये देश की संचार प्रणाली, टेलीविजन प्रसारण, समाचार प्रबंधन, भू-आकाशीय सुविधाओं, आपदाओं की पूर्व सूचना और खोजबीन, मौसम संबंधी जानकारी व भविष्यवाणी तथा रेस्क्यू ऑपरेशन में भी बहुत मदद मिलेगी। यह उपग्रह उच्च गुणवत्ता वाली टेलीविजन, दूरसंचार एवं प्रसारण सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इसरो के अनुसार जीसैट-30 के संचार पेलोड को विशेष रूप से डिजाइन किया गया है और अंतरिक्ष यान की बस में ट्रांसपॉन्डर की संख्या को अधिकतम करने के लिए अनुकूलित किया गया है। 12 सी तथा 12 केयू बैंड ट्रांस्पॉन्डरों से लैस जीसैट-30 इनसैट जीसैट उपग्रह श्रृंखला का उपग्रह है, जो छह हजार वॉट ऊर्जा का इस्तेमाल करेगा। इसे ऊर्जा प्रदान करने के लिए इसमें दो सोलर पैनल और बैटरी लगाई गई हैं। 12 केयू ट्रांसपॉन्डर से यह उपग्रह भारतीय भूमि और द्वीपों को जबकि 12 सी ट्रांसपॉन्डर से खाड़ी देशों, कई एशियाई देशों तथा ऑस्ट्रेलिया में उच्च गुणवत्ता वाली टेलीविजन, डीटीएच, दूसरसंचार व इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराएगा। केयू बैंड सिग्नल से पृथ्वी पर चल रही गतिविधियों को पकड़ा जा सकता है। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार इस उपग्रह के सफल प्रक्षेपण के बाद केयू बैंड तथा सी-बैंड कवरेज में बढ़ोतरी होने से भारतीय क्षेत्र व द्वीपों के साथ बड़ी संख्या में खाड़ी और एशियाई देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया में भी पहुंच बढ़ेगी। दरअसल इसरो ने इस उपग्रह को 1-3 केबस मॉडल में तैयार किया है, जो जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के सी तथा केयू बैंड से संचार सेवाओं में मदद करेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 20 January 2020


bhopal,Social media, related journalists ,should also be honored

भोपाल। जनसम्पर्क मंत्री पी.सी. शर्मा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के राज्य-स्तरीय पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में शमिल हुए। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री सुरेश पचौरी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। समारोह में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के पत्रकारिता की विभिन्न विधाओं के पत्रकारों को सम्मानित किया गया।  मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकारों को सम्मानित किया जाना चाहिये। यह वर्तमान और भविष्य में समाचार जगत को मजबूत बनाने के लिये जरूरी है। उन्होंने सप्रे संग्रहालय द्वारा पत्रकारिता के इतिहास को संजोए रखने की दिशा में किये जा रहे कार्यों की सराहना की। श्री शर्मा ने संग्रहालय को डिजिटाइजेशन के लिए सहयोग स्वरूप 5 लाख रुपये देने की घोषणा की। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री सुरेश पचौरी ने कहा कि सप्रे संग्रहालय की पूरी यात्रा संघर्षपूर्ण रही। इस संस्था ने देश भर में अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि जिन्हें पुरस्कार मिले हैं, नि:संदेह उनके कार्यों से समाज लाभान्वित हो रहा है। जिन विभूतियों की स्मृति में पुरस्कारों की स्थापना की गई है, उनके कार्य भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। संग्रहालय के संस्थापक-संयोजक श्री विजयदत्त श्रीधर ने संस्था की गतिविधियों की जानकारी दी। सम्मानित व्यक्तित्व पत्रकारिता की शिक्षा में दीर्घ योगदान के लिए माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव डा. श्रीकांत सिंह को सम्मानित किया गया। वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान कमाल, रमेश तिवारी, सर्वदमन पाठक, महेश दीक्षित और मुकुन्द प्रसाद मिश्र को  'हुक्मचंद नारद पुरस्कार’ प्रदान  किया गया। संतोष कुमार शुक्ल लोक संप्रेषण पुरस्कार - अखिल कुमार नामदेव,माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार - पंकज मुकाती, लाल बलदेव सिंह पुरस्कार -  रश्मि खरे, जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी पुरस्कार -  विकास वर्मा, झाबरमल्ल शर्मा पुरस्कार-  संजीव कुमार शर्मा, रामेश्वर गुरु पुरस्कार- महेश सोनी, के.पी. नारायणन पुरस्कार- डा. ऋतु पाण्डेय शर्मा, राजेन्द्र नूतन पुरस्कार- विनोद त्रिपाठी, गंगाप्रसाद ठाकुर पुरस्कार-आसिफ इकबाल (रायपुर), जगत पाठक पुरस्कार -  सुशील पाण्डेय, सुरेश खरे पुरस्कार-  कृष्णमोहन झा, आरोग्य सुधा पुरस्कार-पुष्पेन्द्र सिंह तथा होमई व्यारावाला पुरस्कार- होमेन्द्र सुन्दर देशमुख को प्रदान किया गया।x

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Dakhal News 19 January 2020


pakistan

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में केबल टेलिविजन ऑपरेटरों को मुस्लिम देशों के प्राइवेट चैनलों को दिखाने को लेकर चेतावनी जारी की है. इन मुस्लिम देशों में पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया के अलावा ईरान भी शामिल है.5 अगस्त को भारत सरकार ने जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का फैसला किया तो पाकिस्तान के साथ-साथ मलेशिया और तुर्की ने भी विरोध जताया था. हालांकि, सऊदी अरब, यूएई और ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के फैसले पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी.सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी एडवाइजरी  में केबल टीवी ऑपरेटरों को केबल टीवी नियमों के तहत उनके दायित्वों को याद दिलाया गया है.इस नोट में कहा गया है कि मंत्रालय के संज्ञान में आया है कि कुछ केबल ऑपरेटर अपने नेटवर्क पर मंत्रालय की प्रकाशित सूची से बाहर निजी चैनलों का प्रसारण कर रहे हैं. यह स्पष्ट तौर पर केबल टीवी रूल्स के उपनियम 6 (6) का उल्लंघन है और इस पर तुरंत कार्रवाई किए जाने की जरूरत है. बता दें कि सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 500 से ज्यादा चैनल को मान्यता दी हुई है.एडवाइजरी पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव विक्रम सहाय के हस्ताक्षर हैं. एडवाइजरी में केबल टीवी ऑपरेटरों को चेतावनी दी गई है कि अगर वे नियमों का उल्लंघन करते हैं तो उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है और उनके उपकरण जब्त किए जा सकते हैं. सहाय हाल ही में केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ बैठक करने के लिए श्रीनगर पहुंचे थे.बैठक में शामिल हुए एक केबल ऑपरेटर ने बताया, अधिकारियों ने बैठक में कहा कि ईरान, तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान के सभी चैनलों को ब्लॉक किया जाना चाहिए.सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों को ऑपरेटरों ने बताया कि वे ईरान आधारित सहर चैनल और सऊदी अरब के अल-अरबिया चैनल का प्रसारण कर रहे हैं. कश्मीर की ज्यादातर आबादी के बीच इन चैनलों के कार्यक्रम लोकप्रिय हैं. शिया समुदाय के लोग इन चैनलों को धार्मिक कार्यक्रमों की वजह से बड़ी दिलचस्पी के साथ देखते हैं.मंत्रालय के एक अधिकारी ने ईटी से बताया, इंटरनेट बैन होने की वजह से ईरान, तुर्की, सऊदी अरब, मलेशिया और पाकिस्तान के कई धार्मिक चैनल स्थानीय केबल ऑपरेटरों के जरिए कश्मीर के टीवी सेट में जगह बना रहे थे. इसके बारे में हमें अलर्ट किया गया जिसके बाद हमने इस पर लगाम कसने का फैसला लिया 

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Dakhal News 19 November 2019


अंतर्वेद प्रवर

    पुस्तक ‘अंतर्वेद प्रवरः गणेश शंकर विद्यार्थी’ का लोकार्पण शुक्रवार को नई दिल्ली के 10, राजाजी मार्ग पर किया गया। भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को उनके आवास पर लेखक अमित राजपूत ने इस मौके पर अपनी किताब की पहली प्रति भेंट की। इसमें उनके साथ शैलेन्द्र भदौरिया, वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मी शंकर बाजपेयी और भारतीय जनसंचार के महानिदेशक वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश शामिल रहे। लेखक ने बताया कि उनकी क़िताब ‘अंतर्वेद प्रवर’ गणेश शंकर विद्यार्थी का पुनरावलोकन है, जिसमें विद्यार्थीजी से जुड़ी इतिहास की उन जानकारियों का संग्रह किया गया है, जो अब तक प्रकाश में नहीं आयी हैं, ख़ासतौर से उनके गृह जनपद फतेहपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी के सरोकारों को इसमें शामिल किया गया है। आज़ादी के बाद गणेशजी के प्रभावों से पनपे अनेक राजनैतिक कुतूहल का भंडार भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है। इस मौके पर राजीव तिवारी, राजश्री त्रिवेदी और हर्ष कुमार मिश्र सहित अनेक प्रशासनिक अधिकारी और विद्वान शामिल रहे।

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Dakhal News 13 November 2019


black mailar

ग्वालियर की महाराजपुरा थाना पुलिस ने 5 फर्जी पत्रकारों को गिरफ्तार किया है जो एक व्यवसायी को ब्लैकमेल कर उससे 50 हजार रुपये हड़पने की फिराक में थे।पुलिस ने बताया इन्होंने जयपुर और अन्य शहरों से भी अवैध बसूली की है पुलिस ने मामला कायम कर लिया हैं और इनसे कड़ी पूछताछ कर रही है। ग्वालियर के मुरार में रहने वाला सूरज कौशल शेयर मार्केट का काम करता है जिनके डीडी नगर स्थित ऑफिस पर कल 5 लोग आये जिन्होंने खुद को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का पत्रकार बताया और धमकी दी कि तुम फर्जी कंपनी चला रहे हो और तुम्हारी खबर बनाते है और उसे हड़काने लगे  बाद में उन्ही में शामिल दीपक तिवारी सूरज के पास दोबारा गया और मामला निपटाने के नाम पर 50 हजार रुपये मांगे और शाम को महाराजपुरा गेट 2 पर मिलकर पैसे देने का सूरज ने वायदा किया उसने इसकी पुलिस को जानकारी दी और पैसे देने के दौरान पुलिस ने आकस्मिक कार्यवाही कर पांचों को पकड़  लिया।पुलिस के मुताबिक पूछताछ में सभी फर्जी पत्रकार निकले पुलिस ने उनपर धारा 384 के अड़ीबाजी का मामला फिलहाल कायम कर लिया हैपुलिस के मुताबिक तथ्यों के आधार पर धोखाधड़ी का मामला भी पुलिस कायम करेगी।  पकड़े गए फर्जी 4 पत्रकारों में  सुभाष शुक्ला (ENN today )भगवान बसंत (तहलका ) विजय सिरोलिया (अखबार जगत) हुकुम सिंह (मानव अधिकार मीडिया  सभी इंदौर और दीपक तिवारी ग्वालियर के डबरा का रहने वाला बताया जाता है पुलिस को पूछताछ में इन्होंने बताया यह 5 नवंबर को निकले है और जयपुर सहित अन्य शहरों में भी इसी तरह ब्लैकमेल करते आये है पुलिस इनसे पूछताछ कर अन्य वारदातों की जानकारी भी ले रही है।

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Dakhal News 13 November 2019


Whatsapp वालों सावधान रहें

 बग गैलरी व्यू पर अटैक करता है व्हाट्स ऐप से जुड़े एक नए खतरे से मोबाइल यूजर्स को आगाह किया गया है। हैकर्स किसी भी GIF फाइल के जरिए वायरस भेजकर मोबाइल का डाटा हैक कर सकते हैं। द नेक्स्ट वेब की रिपोर्ट के अनुसार, इस व्हाट्स ऐप बग पर रिसर्च हो रहा है, लेकिन अभी खतरा बरकरार है। यूजर्स को सलाह दी गई है कि वे किसी अन्जान सोर्स से मिली GIF इमेज को ओपन न करें।इस बग को डबल फ्री बताया गया है। यह सीधा फोन की मेमोरी पर अटैक करता है। यानी इसके हमले से एप्लिकेशन क्रैश हो सकती है या अटैकर्स के हाथ पूरे मोबाइल का डाटा लगा सकता है, जिसका वे दुरूपयोग कर सकते हैं। GitHub में प्रकाशित एक पोस्ट के अनुसार, यह बग व्हाट्स ऐप के गैलरी व्यू पर अटैक करता है, जिससे फोटो, वीडियो और GIF का प्रिव्यू हासिल किया जाता है।रिपोर्ट में कहा गया है कि यह GIF मोबाइल में सेव होने के बाद यूजर्स द्वारा ओपन किए जाने का इंतजार करती है। यूजर्स जैसे ही इसे खोलता है, उसका मोबाइल हैक हो जाता है। शोधकर्ताओं ने लिखा है कि व्हाट्स ऐप वर्जन 2.19.230 में इसका खतरा ज्यादा है। व्हाट्स ऐप वर्जन 2.19.244 में इस जोखिम को खत्म कर दिया गया है।यह बग Android 8.1 और Android 9.0 OS पर भी अटैक करता है, लेकिन Android 8.0 और उससे नीचे के वर्जन वाले यूजर्स सुरक्षित हैं। पुराने Android संस्करणों में डबल-फ्री अभी भी ट्रिगर किया जा सकता है। हालांकि, डबल-फ्री के बाद सिस्टम द्वारा मॉलॉक कॉल के कारण ऐप क्रैश हो जाता है और इस कारण पीसी रजिस्टर को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है।यह पहली बार नहीं है कि व्हाट्स ऐप पर डाटा सुरक्षा और गोपनीयता सुविधाओं के बारे में चिंताएं जताई गई हैं। इस साल की शुरुआत में एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि फेसबुक के स्वामित्व वाले इस मैसेजिंग ऐप में हैकर्स ने डिवाइस पर स्पाइवेयर भेजकर उसे हैक करने की कोशिश की है। हालांकि, यह मामला सामने आने के बाद व्हाटएस ऐप ने कहा कि उस समस्या को हल कर लिया गया है, लेकिन यह नहीं बताया कि यह बग क्या था और कैसे अटैक कर पाया।            

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Dakhal News 9 October 2019


इंडियाज मोस्ट पावरफुल वुमन इन मीडिया चुनी गईं  कली पुरी

इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी को ‘इंडियाज मोस्ट पावरफुल वुमन इन मीडिया’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया|  कली पुरी को ये सम्मान ब्रिटिश संसद में आयोजित लोकप्रिय कॉनफ्लुएंस एक्सीलेंस अवॉर्ड्स समारोह में दिया गया|  दो हफ्ते पहले ही कली पुरी को लंदन में 21st सेंचुरी आइकन अवॉर्ड्स में ‘आउटस्टैंडिंग मीडिया एंड एंटरटेनमेंट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया था|इस अंतरराष्ट्रीय सम्मान को स्वीकार करते हुए कली पुरी ने कहा, 'इंडिया टुडे ग्रुप में हम इंडस्ट्री के रुझानों का नेतृत्व कर रहे हैं|  हमने मोबाइल के इर्द-गिर्द एक पूरा इकोसिस्टम तैयार किया है| हमने डिजिटल और मोबाइल के आधार पर सिर्फ दो साल के वक्त में 20 से ज्यादा चैनलों का नेटवर्क विकसित किया है और हमें लगता है कि हमने नई पीढ़ी के विचारों को पकड़ने में सक्षम होने का सराहनीय काम किया है| हम नई ऊर्जा, नए विचार और काम करने के नए तरीके में भरोसा रखते हैं|ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र में स्नातक कली पुरी का खबरों के भविष्य को लेकर नजरिया साफ है|  वे भविष्य की ओर उन्मुख एक ऐसे न्यूज रूम में, सबसे सम्मानित और प्रख्यात पत्रकारों की टीम का नेतृत्व कर रही हैं, जो आज की मल्टीमीडिया और मल्टी डिवाइस वाली दुनिया को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है| कली पुरी एक सतत उद्यमी हैं जिन्हें मीडिया के एक विस्तृत नेटवर्क को चलाने का समृद्ध अनुभव है| आज तक, आज तक एचडी, इंडिया टुडे टीवी, दिल्ली आज तक, तेज, एप्स, डिजिटल न्यूजपेपर, विश्वस्तरीय कार्यक्रमों का आयोजन, ग्रुप के लिए सोशल मीडिया रणनीति तैयार करने आदि का उन्हें गहन अनुभव है|    

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Dakhal News 29 September 2019


हनी के ट्रैप

  प्रकाश भटनागर हनी के ट्रैप में पत्रकारिता भी कांदा (प्याज) और फंदा (यहां हनी ट्रैप के संदर्भ में) कोई तालमेल नहीं है लेकिन एक विचित्र संयोग है। प्याज लगातार महंगी हो रही है। परत दर परत खुलने वाली इस खाद्य सामग्री की कीमत आसमान छूने लगी है। इधर हनी ट्रैप वाला फंदा भी लगातार भारी-भरकम कीमत वाले खेल के तौर पर सामने आ रहा है। परत-दर-परत नये-नये नाम (अघोषित रूप से) सामने आ रहे हैं। अभी किसी छिलके पर किसी राजनेता की तस्वीर दिख रही है तो कहीं कोई अफसर भी नजर आ जा रहा है। लेकिन एक छिलके में कोशिकाओं की तरह छिपी उन असंख्य तस्वीरों का सामने आना अभी बाकी है, जो इस सारे घटनाक्रम की जड़ हैं। जिनका सहारा लेकर इस घिनौने काम को बीते लम्बे समय से अंजाम दिया जा रहा था। किस्सा हनी-मनी कांड में मीडिया खासकर टीवी मीडिया की भूमिका का है।   बात शुरू से शुरू करते हैं। कहानी को कुछ ऐसे समझें। इस काम को सहारा देने का समय तब आया, जब कई मीडिया हाउस भयावह मंदी की चपेट में आ गए हैं। कुछ एक रीजनल टीवी चैनल तो अपने मालिकों के पापों को पिछले लंबे समय से भोग रहे हैं। यहां तक कि मनु वादी कहे जाने वाले मीडिया समूह के कर्मचारियों तक को तो इसलिए ही लंबे समय से वेतन के लाले हैं। घोर संकट का समय। दूसरी जगह नौकरी मिलने की संभावनाएं भी कम थी। तब प्रिंट मीडिया की पीत पत्रकारिता को मात देने वाले ये हनी-मनी टाईप के ट्रेप की कोमल सी कठोर आकांक्षाए रची गई जिसके तार दिल्ली तक जुड़ गए। योजनाबद्ध तरीके से ब्लैकमेलिंग के ताने बाने रचे गए। मीडिया से जुड़ी आधी आबादी के अति महत्वाकांक्षी कुछ हिस्से का इसमें चतुराई से उपयोग किया गया। अलग-अलग समूहों में कुछ लोगों की फौज मछली के चारे के तौर पर तैयार की गयी। इनमें उन तितलियों को सहारा लिया गया जो कम समय में बड़ा नाम ना सही दौलत बनाने सरकारी लाभ कमाने की ख्वाहिशमंद थी, जो केवल ग्लैमर के लालकालीन पर अपने पैर बढाती मीडिया इंडस्ट्री में आई थीं।  रात के अंधेरे में जो करना है, उसकी भूमिका सुबह की रोशनी में बनायी जाती। टारगेट पहले से ही तय रहते। महिला पत्रकार उनके पास बाइट लेने के नाम पर पहुंचतीं। यह औपचारिकता पूरी करने के बाद क्वालिटी समय बिताने की बात छेड़ी जाती। शाम ढले किसी खास जगह पर, किसी छिपे हुए कैमरे के सामने मामला शराब से शबाब के सेवन तक पहुंचता। इसके बाद ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू किया जाता। भोपाल/इंदौर तक नये शिकार की तलाश में जुट जाते। पुराने शिकार से डील करने का काम दिल्ली के स्तर पर होता। इसके बाद होने वाली हिस्सा-बांट की व्यापकता इस बात से समझी जा सकती है कि कई मीडिया हाउस में असंख्य कर्मचारी लम्बे समय से तन्ख्वाह न मिलने के बावजूद एक दिन के लिए भी आर्थिक तंगी के शिकार नहीं हो पाये। बल्कि उनके संसाधन ऐसे तमाम पत्रकारों से कई गुना ज्यादा बेहतर हैं, जो नियमित रूप से वेतन पाने के बावजूद आर्थिक संतुष्टि की परिधि से कोसो दूर हैं।   मामला बेहद संजीदा होता जा रहा है। लिहाजा कुछ पल के लिए माहौल हलका कर देते हैं। 'अनुरोध' फिल्म का एक गीत है, 'तुम बे-सहारा हो तो, किसी का सहारा बनो...' तो यहां भी ऐसा ही हुआ। बे-सहारा और सहारा का ऐसा घालमेल बना, जिसने कि पीत पत्रकारिता को भी कई सदियों पीछे धकेल दिया। यह प्रीत पत्रकारिता बन गयी। प्रीत, पैसे के लिए। संसाधनों के लिए। प्रीत के जरिये लोगों को फंसाया गया और फिर 'भय बिन होय न प्रीत...' की तर्ज पर भयग्रस्त लोगों से इस प्रीत की तगड़ी कीमत वसूली गयी। इस कांड के नाम पर आपको अखबार तथा सोशल मीडिया पर जिन महिलाओं की तस्वीरें दिख रही हैं, वो तो महज मुखौटा हैं। कठपुतली हैं। जिनकी डोर कई अन्य लोगों के हाथ में थी। जबकि मुख्य डोर दिल्ली से खींची जाती रही।   तीन दशक से अधिक की पत्रकारिता में मैंने पीत पत्रकारिता के कई अध्याय देखे हैं। तब ऐसा करने वालों पर क्रोध आता था। आज उन पर दया आ रही है। क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से ऐसा करने के लिए बदनाम थे। पढ़ने-लिखने वाले मीडिया के बीच वे शर्मिंदगी के भाव से घिरे नजर आते थे। लेकिन हनी ट्रैपनुमा पत्रकारिता वाले तो इस पेशे के रसूखदार लोगों में गिने जाते रहे हैं। पद, प्रतिष्ठा और सम्मान की उन्हें कभी भी कमी नहीं आयी। यहां तक कि इस घटनाक्रम का खुलासा होने के चार दिन बाद भी पुलिस तथा कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंच सके हैं। यह हमारे सिस्टम की कमजोरी तो नहीं, मजबूरी जरूर हो सकती है।क्योंकि इतना बड़ा माफिया भारी-भरकम बैकिंग के बगैर कतई संचालित नहीं किया जा सकता। तो अब इंतजार इस बात का है कि इस सबको पीछे से मिल रहा सहारा कब हटे और कब असली गुनाहगारों का चेहरा सामने लाया जाएगा। फंदे में बड़े भारी भरकम लोग हैं, इसलिए संभावना कम है।   मामले की गंभीरता एक खयाल से और बढ़ जाती है। जो शिकार बने, वे सभी सरकारी तंत्र के असरकारी नाम बताये जा रहे हैं। जाहिर-सी बात है कि ब्लैकमेलर्स ने इन लोगों से उनके पद का दुरूपयोग भी करवाया होगा। कहा जा रहा है कि कई वरिष्ठ अफसरों सहित सत्तारूढ़ दल और प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के  जन प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में इस सबके मजे से शिकार हुए हैं। तो क्या यह नहीं पता लगाया जाना चाहिए कि इन सभी ने मायाजाल से बाहर निकलने के लिए किस-किस तरह के गलत कामों को अंजाम दिया होगा। यह जांच हुई तो निश्चित ही यह भी पता चल जाएगा कि ऐसे गुनाहगारों को सहारा प्रदान करने वालों ने गलत तरीके से सरकारी काम करवाने का ठेका भी ले रखा था। देर-सबेर यह सच सामने आकर रहेगा। नाम चाहे सार्वजनिक न हो पाएं। डर है कि पहले ही किसी पतित-पावन को तरस रही पत्रकारिता के दामन पर इसके बाद और कितने दाग नजर आने लगेंगे। इस सबकी इबारत उसी दिन लिख दी गयी थी, जब पत्रकारिता को ग्लैमर से जोड़ने का महा-गुनाह किया गया। ऐसा पाप करने वालों की फौज अब गुजरे कल की बात हो चुकी है, लेकिन उनके द्वारा रोपा गया विषवृक्ष का बीज आज इस पूरी बिरादरी में भयावह प्रदूषित हवा का संचार कर रहा है। यह हवा दमघोंटू है। इससे बचने के लिए नई खिड़कियां खोलने की संभावनाएं कोई और नहीं मीडिया में ही लोगों को तलाशनी होगी। प्रिंट मीडिया तक तो विश्वसनीयता बाकी थी लेकिन इलेक्ट्रानिक, डिजीटल और सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की आत्मा 'विश्वसनीयता' घायल पड़ी हुई है। इसलिए खबरें बेअसर हो रही हैं।  ताजी हवा का यह प्रसार पत्रकारिता के मूल्यों की दोबारा स्थापना से ही संभव हो सकेगा। माना कि यह बहुत दुश्वारी वाला काम है, लेकिन इस पेशे में सिर उठाकर चलने का दौर वापस लाने के लिए इस कड़ी मेहनत के अलावा और कोई चारा बाकी नहीं रह गया है।  तो जो ये दमघोंटू माहौल है, इससे बाहर आने खिड़की खोलिए.....रोशनी आएगी तो चेहरे भी साफ साफ दिखाई देंगे.....और डिओडरेंट की खुशबूओँ में छिपाई गई दुर्गन्ध भी बाहर होगी.....

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Dakhal News 28 September 2019


अनुपमा सिंह

हनीट्रैप मामला भोपाल… किस -किस को धमकी दोगे…..कोई चुप नहीं है … कोई बोल रहा, तो कोई बोल नहीं रहा…. आपकी करतूतें खुल गईं है सबके सामने …. चमड़ी की कमाई जब खाई है…. तो खिसियाट कैसी…. क्या केवल महिलाएं ही दोषी हैं? उन्हें लाने वाले पुरूष पत्रकार, उनका उपयोग करने वाले पुरुष पत्रकार दोषी नहीं? उन्हें पैसों की चकाचौंध दिखाने वाले पुरूष दोषी नहीं है? उन पुरूष पत्रकारों से माइक id छीनने के लिए किसी ने पहल क्यों नहीं की? किसी ने कभी उस समय क्यों नहीं सोचा कि भोपाल में आखिर ऐसा क्या है, जो दो साल में आते ही लोग घर, गाड़ी और अन्य सुविधाएं जुटा लेते हैं। एक 22 हजार की मामूली नौकरी करने वाली 3-3 गृहस्थियों को कैसे पाल रही है। एक का मिसयूज करने के लिए दूसरे की नौकरी खाना। अरे कब तक किस -किस को धमकी देते फिरोगे। क्या पत्रकारिता नहीं करेगा तो भूखा मर जायेगा कोई … किसके पुरखे कह गए, पत्रकारिता ही करो। पत्रकारिता व्यवसाय कभी नहीं था पर गन्दे लोगों ने आकर इसे भी रेड लाइट एरिया बना दिया। बस अंतर इतना है उनका जमीर होता है, वो मजबूरी में ये सब करती हैं, वो किसी को ब्लैकमेल नहीं करती, उन बेचारियों को करोड़ो नहीं मिलते। यहाँ चकाचौंध भी, मीडिया का सम्मान भी, बड़े – बड़े नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों से सम्बंध भी… सम्मानीय भी…. गजब की तरक्की है, भाई। जय हो(ग्वालियर की टीवी पत्रकार अनुपमा सिंह की एफबी वॉल से)

Dakhal News

Dakhal News 27 September 2019


अनुपमा सिंह

हनीट्रैप मामला भोपाल… किस -किस को धमकी दोगे…..कोई चुप नहीं है … कोई बोल रहा, तो कोई बोल नहीं रहा…. आपकी करतूतें खुल गईं है सबके सामने …. चमड़ी की कमाई जब खाई है…. तो खिसियाट कैसी…. क्या केवल महिलाएं ही दोषी हैं? उन्हें लाने वाले पुरूष पत्रकार, उनका उपयोग करने वाले पुरुष पत्रकार दोषी नहीं? उन्हें पैसों की चकाचौंध दिखाने वाले पुरूष दोषी नहीं है? उन पुरूष पत्रकारों से माइक id छीनने के लिए किसी ने पहल क्यों नहीं की? किसी ने कभी उस समय क्यों नहीं सोचा कि भोपाल में आखिर ऐसा क्या है, जो दो साल में आते ही लोग घर, गाड़ी और अन्य सुविधाएं जुटा लेते हैं। एक 22 हजार की मामूली नौकरी करने वाली 3-3 गृहस्थियों को कैसे पाल रही है। एक का मिसयूज करने के लिए दूसरे की नौकरी खाना। अरे कब तक किस -किस को धमकी देते फिरोगे।       क्या पत्रकारिता नहीं करेगा तो भूखा मर जायेगा कोई … किसके पुरखे कह गए, पत्रकारिता ही करो। पत्रकारिता व्यवसाय कभी नहीं था पर गन्दे लोगों ने आकर इसे भी रेड लाइट एरिया बना दिया। बस अंतर इतना है उनका जमीर होता है, वो मजबूरी में ये सब करती हैं, वो किसी को ब्लैकमेल नहीं करती, उन बेचारियों को करोड़ो नहीं मिलते। यहाँ चकाचौंध भी, मीडिया का सम्मान भी, बड़े – बड़े नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों से सम्बंध भी… सम्मानीय भी…. गजब की तरक्की है, भाई। जय हो(ग्वालियर की टीवी पत्रकार अनुपमा सिंह की एफबी वॉल से)

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Dakhal News 27 September 2019


jamal khagoshi

   मुंह को मत ढंको, मुझे अस्थमा है, यह मत करो आप मेरा दम घोट देंगे  सऊदी के पत्रकार जमाल खाशोगी ने अपने अंतिम शब्दों में हत्यारों से कहा था कि वह उसका मुंह नहीं ढंके क्योंकि वह अस्थमा से पीड़ित थे और उनका दम घुट सकता था। तुर्की की सरकार के करीब माने जाने वाले समाचार पत्र ने यह खबर प्रकाशित की है। इसमें खशोगी की सऊदी के हिट स्क्वैड के सदस्यों से हुई बातचीत की एक रिकॉर्डिंग की नई जानकारी प्रकाशित की गई है, जो खशोगी की हत्या करने के लिए आए थे। अखबार का कहना है कि खशोगी की हत्या 2 अक्टूबर 2018 को इस्तांबुल में सऊदी वाणिज्य दूतावास में की गई थी और उनकी बातचीत की रिकॉर्डिंग को तुर्की की खुफिया एजेंसी ने हासिल किया था। इसके अनुसार, सऊदी हिट दस्ते का एक सदस्य मैहर मुतरेब ने खशोगी को बताया कि उसके खिलाफ इंटरपोल के आदेश के कारण उसे रियाद वापस ले जाना है। पत्रकार इसका विरोध करता है और कहता है कि उसके खिलाफ कोई कानूनी मामला नहीं है और उसकी मंगेतर बाहर उसका इंतजार कर रही है।अखबार के अनुसार, मुतरेब और एक अन्य व्यक्ति खाशोगी को अपने बेटे को संदेश भेजने के लिए मजबूर करने की कोशिश करते हैं। रिकॉर्डिंग में सुना जा सकता है कि वे दोनों खाशोगी से कहते हैं कि वह अपने बेटे को मैसेज भेजे कि यदि वह बात नहीं कर पाते हैं, तो वे चिंता न करें। खशोगी इसका विरोध करते हुए कहते हैं कि मैं कुछ नहीं लिखूंगा।खशोगी की हत्या 2 अक्टूबर 2018 को इस्तांबुल में सऊदी वाणिज्य दूतावास में की गई थी और उनका शव आज-तक नहीं मिला है। मुतरेब को बाद में यह कहते हुए सुना गया- हमारी मदद करो, ताकि हम तुम्हारी मदद कर सकें। क्योंकि आखिर में हम आपको सऊदी अरब ले जाएंगे और यदि आप हमारी मदद नहीं करते हैं, तो आप जानते हैं कि अंत में क्या होगा। सबा ने भी खशोगी के अंतिम शब्दों को भी प्रकाशित किया। उसे कथिततौर पर नशा दिए जाने और बेहोश होने से पहले यह कहते हुए सुना गया था कि मेरे मुंह को मत ढंको, मुझे अस्थमा है, यह मत करो आप मेरा दम घोट देंगे। अखबार में प्रकाशित कुछ जानकारी का विवरण पहले से ही खशोगी की हत्या पर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में हैं, जो जून में जारी की गई थी। यूएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब को हत्या की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की हत्या में संभावित भूमिका की जांच की जानी चाहिए।सऊदी अरब ने शुरू में खशोगी के लापता होने के बारे में कई बार बयान बदला। मगर, अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद सऊदी ने आखिर में यह कहा कि खगोशी से विवाद होने के बाद उसके दुष्ट अधिकारियों ने अपने वाणिज्य दूतावास के अंदर मार दिया था। इस मामले में सऊदी ने 11 लोगों पर गैर-सार्वजनिक कार्यवाही में ट्रायल पर रखा है। 33 वर्षीय राजकुमार को अपने पिता किंग सलमान का समर्थन मिला हुआ है और वह हत्या में किसी भी तरह अपना हाथ होने की बात से इंकार करते हैं। 

Patrakar amitabh upadhyay

amitabh upadhyay 11 September 2019


जेल पानी

  कलेक्टर और एसपी नाव से पहुंचे जेल   हरदा जेल में बंद 229 कैदियों की जान पर उस समय बन आयी जब अचानक बारिश का पानी जेल में घुस गया और बैरकों में पहुँच गया  |  जेल के कुल दो बैरेक ऐसे थे जो पानी में डूबने से बच गए थे  | सभी कैदियों को इन दो बैरेक में शिफ्ट किया गया  |  मौके का जायजा लेने कलेक्टर और एसपी को भी जेल तक नाव से पहुंचना पड़ा   |   पिछले 24 घंटों  हरदा में जोरदार बारिश हुई  | बारिश का पानी इंदौर-हरदा रोड पर बने जिला जेल में घुस गया  | भारी बारिश के चलते सुकनी नदी पूरे उफान पर है और  नदी का पानी हरदा जेल में घुस गया  | दो बैरकों को छोड़ दें तो पूरे जेल में पानी भर गया है  | एहतियातन सभी कैदियों को इन्हीं दो बैरकों में रखा गया है  | जेल में पानी घुसने की खबर मिलते ही प्रशासन हरकत में आया | खुद कलेक्टर एस विश्वाथन और एसपी भगवंत सिंह नाव में सवार होकर जेल तक पहुंचे और हालात का जायजा लिया |      कलेक्टर एस विश्वानाथन ने बताया कि, "बीती रात हुई तेज बारिश के चलते सुकनी नदी के किनारे बने जिला जेल में बारिश का पानी घुस गया था  | फिलहाल जलस्तर घट रहा है  | जेल में कुल 229 कैदी हैं  |  जिन्हें उन दो बैरकों में रखा गया है |  जहां पानी नहीं भरा है  |  कैदियों के नाश्ते की व्यवस्था की गई है | कैदियों के अलावा जेल अफसरों और कर्मचारियों के  परिवार भी  जेल परिसर में हैं  |  

Dakhal News

Dakhal News 9 September 2019


car accident

  भोपाल से इंदौर का रहे थे सभी लोग   सीहोर में  भोपाल-इंदौर हाईवे पर आज सुबह एक कार नाले में गिर गई  | ... इस हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई |  ... यह सभी लोग भोपाल से इंदौर जा रहे थे। ..   भोपाल से इंदौर जा रहे है लोग एक दर्दनाक हादसे का शिकार हो गए | यह हादसा सीहोर के पास हुआ |  जब इंदौर जा रहे लोगों की कार नाले में गिर गई |  अब तक पुलिस ने चार शव बरामद कर लिए हैं |   ये सभी लोग भोपाल के आशिमा मॉल के सामने बने कार शोरूम में काम करते थे  |  आज इंदौर में कंपनी की एक मीटिंग होनी थी | इसी सिलसिले में सभी लोग कार में सवार होकर मीटिंग के लिए इंदौर निकले थे |   तभी सीहोर के जटा खेड़ा के पास इनकी कार हादसे का शिकार होकर पुलिया से नीचे गिर गई और कार में बैठे पांच लोगों की डूबने से मौत हो गई |  हादसे की जानकारी लगते ही पुलिस मौके पर पहुंचीं और शवों को निकालने का काम शुरू किया गया | फिलहाल चार शव बरामद हो गए |  जिनका सीहोर के सरकारी अस्पताल में पोस्टमॉर्टम कराया जा रहा है | सभी मृतक जीवन मोटर शोरूम पर काम करते थे |  कंपनी के अधिकारी नीरज ने बताया कि, ये सभी पांचों लोग कार में सवार होकर मीटिंग के लिए आज सुबह निकले थे | लेकिन सीहोर में इनकी कार को पीछे से किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी  |  जिसके बाद कार अनियंत्रित होकर नाले में गिर गई और पांच कर्मचारियों की मौत हो गई |  

Dakhal News

Dakhal News 9 September 2019


chandrayaan-2 painting

   बच्चियों ने बनाई चन्द्रयान-2 से जुडी पेंटिंग      भले ही हमारा चन्द्रयान-2 अपने मिशन में पूरी तरह सफल नहीं रहा हो   लेकिन इससे देश के उत्साह में कोई कमी नहीं है  |  पूरा देश इस मौके पर ISRO के वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है  | इसमें स्कूली बच्चे भी शामिल हैं  | इस खास लम्हे को यादगार बनाने के लिए शिवपुरी के गीता पब्लिक स्कूल की सात छात्राओं ने 9100 स्केवयर फीट की एक पेंटिंग बनाई  |      चन्द्रयान-2  की पूरी यात्रा पर बनी पेंटिंग में बच्चियों ने देश का झंडा भी बनाया हैं  |  चंद्रयान 2  चांद से भले ही कुछ कदम की दूरी पर  रह गया हो मगर   भारत के महात्वाकांक्षी मिशन के विक्रम लैंडर से संपर्क टूटने के बावजूद भी देश भर में  इसरो के वैज्ञानिकों की तारीफ हो रही है  |  और इस पेंटिंग को बनाकर बच्चियों ने पुरे देश  की तरफ से इसरो के  वैज्ञानिकों को सन्देश दिया हैं की पूरा भारत उनके साथ हैं |     

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Dakhal News 7 September 2019


श्री महाकालेश्वर मंदिर को "स्वच्छ आइकॉनिक स्थल का पुरस्कार मिला

  नई दिल्ली में केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री ने दिया कलेक्टर को पुरस्कार   स्वच्छ भारत मिशन में महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन को जल शक्ति मंत्रालय एवं पेयजल और स्वच्छता विभाग, भारत सरकार द्वारा फेज-2 में फर्स्ट रनरअप 'स्वच्छ आइकॉनिक स्‍थल'' घोषित किया गया है। आज दिल्ली में यह पुरस्कार केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने उज्जैन कलेक्टर श्री शशांक मिश्रा को दिया।   द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर के हर कोने में स्वच्छता एवं सुंदरता दिखाई पड़ती है। यहाँ पर आधुनिक मशीनों से साफ-सफाई करवाई जा रही है। इसीलिये स्वच्छता के सभी मानकों पर मंदिर की व्यवस्थाएँ खरी उतरी हैं।   इस दौरान जिला पंचायत, उज्जैन के सीईओ श्री नीलेश पारिख और महाकालेश्वर मंदिर समिति के प्रशासक श्री सुजान सिंह रावत उपस्थित थे।    

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Dakhal News 6 September 2019


नौकरी  कार्यवाही जल्दी

मंत्री श्री शर्मा द्वारा 65वीं शालेय खेल कूद प्रतियोगिता का शुभारंभ जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने आज यहाँ  मेजर ध्यानचंद स्टेडियम मेँ 65वीं राज्य स्तरीय शालेय खेल कूद प्रतियोगिता का शुभारंभ किया। श्री शर्मा ने खिलाड़ियों को शपथ दिलाई और खिलाड़ियों से परिचय भी प्राप्त कियाl  मंत्री श्री शर्मा ने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के स्कूलों से आये 1600  से अधिक बालक-बालिका वर्ग के खिलाड़ियों से कहा कि खेल का  शारीरिक और मानसिक विकास मेँ बड़ा योगदान हैl  उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों मेँ खेल कोटे से खिलाड़ियों को नौकरी देने की कई वर्षों से रुकी कार्रवाई को जल्दी शुरू की जाएगी। भोपाल मेँ खिलाड़ियों को ठहरने के लिये स्पोर्टस काम्प्लेक्स का निर्माण करवाया जाएगा।   श्री शर्मा ने विभाग के अधिकारियों से कहा कि खेलों के आयोजन की व्यवस्थाओं मेँ किसी प्रकार की कोई कमी नहीँ रहनी चाहिएl  पार्षद श्री योगेन्द्र सिंह चौहान गुड्डू , श्री नसीम खान, आयोजन समिति के पदाधिकारी और खेल टीमों के मैनेजर मौज़ूद थे l  

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Dakhal News 4 September 2019


सलमान गणेश विसर्जन

  स्वरा के साथ सलमान जमकर नाचे   अब बात आज के वीडिओ वायरल की  बॉलीवुड स्टार सलमान खान  के डांस का वीडिओ जमकर वाइरल हो रहा है |  सलमान ने गणेश विसर्जन कार्यक्रम में जमकर ठुमके लगाए   सलमान के डांस का वीडिओ जमकर वायरल हो रहा है |  इसमें सलमान स्वरा के साथ डांस करते नजर आ रहे हैं |  सलमान अपनी बहन अर्पिता के घर गणेश विसर्जन कार्यक्रम में पहुंचे थे | वहां सोनाक्षी सिन्हा, डेजी शाह, नेहा धूपिया भी नजर आयीं |    सलमान खान गणेश उत्सव के दूसरे दिन बहन अर्पिता खान शर्मा के घर गणेश विसर्जन पर परिवार के साथ पहुंचे | सलमान ने न केवल अपने भतीजे आहिल के साथ गणेश आरती की, बल्कि जमकर  डांस भी किया  |  सलमान खान फिल्म 'दबंग 3' की शूटिंग में व्यस्त हैं | फिल्म में सलमान के साथ सोनाक्षी सिन्हा. किच्चा सुदीप और अरबाज खान भी मुख्य किरदार निभा रहे हैं |  यह फिल्म दिसंबर में रिलीज होगी  अर्पिता के घर पर ये सभी नजर आये सलमान और अन्य सितारों ने गणेश जी की आरती में भाग लिया |      गणेश विसर्जन के दौरान नाच रहे सलमान का वीडियो वायरल हो गया है  | उनके साथ स्वरा भास्कर भी नाचती नजर आ रही है  सलमान को बराबर डांस में टक्कर दे रही स्वरा का डांस काफी बिंदास और मुंबईयां अंदाज का था |  ढोल-ताशों पर सलमान खान खूब नाचे |   गणेश विसर्जन में सोनाक्षी सिन्हा, डेजी शाह, नेहा धूपिया और अंगद बेदी सहित कई सेलेब्स ने शिरकत की | सलमान ने अर्पिता, आयुष और अपनी भतीजी अलीजा अग्निहोत्री के साथ भी जमकर डांस किया | फिल्ममेकर अतुल अग्निहोत्री ने इस उत्सव के दौरान के सलमान के कई वीडियो शेयर किए है | इन वीडियो में अर्पिता, अरबाज, सोहेल और उनकी मां सलमा खान भी नजर आ रही हैं | 

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Dakhal News 4 September 2019


davv -ganesh

  गणपति बप्पा के स्वागत में नाचे स्टूडेंट    इंदौर में गणेशोत्सव की धूम है |  आज सुबह सबसे पहले नाचते गाते विद्यार्थी सड़कों पर निकले पर  और गणपति बप्पा को लेकर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय परिसर में लेकर आये और उनकी स्थापना की  |    खंडवा रोड स्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश का आगमन हुआ  |  यूनिवर्सिटी कैंपस के सभी स्टूडेंट ने बप्पा का स्वागत नाच-गाकर किया  | यहां अलग-अलग डिपोर्टमेंट में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना की गई है  | सभी डिपोर्टमेंट के स्टूडेंट्स में गणेश उत्सव को लेकर काफी उत्साह नजर आ रहा है  | सभी  स्टीडेंट गणेश उत्सव के लिए  ट्रेडिंशन ड्रेस में  पहुंचे और नाचते गाते गणपति बप्पा को लेकर विश्विद्यालय पहुंचे  |  

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Dakhal News 2 September 2019


air india

  और प्रसिद्ध होगा ग्वालियर का मानसिंह महल    ग्वालियर का ऐतिहासिक दुर्ग अब एयर इंडिया की फ्लाइट का हिस्सा बन गया है | जहाज के टेल पोर्शन में ग्वालियर किले  के मानसिंह पैलेस को जगह दी गई है | अब यह दुर्ग विश्व की हर उस जगह जाएगा, जहां एयर इंडिया की फ्लाइट जाती है |    ग्वालियर का किला और उसकी पहचान राजा मानसिंह का महल मान मंदिर अब हवा में उड़ता नजर आएगा |  एयर इण्डिया ने इसे अपने टेल पोर्शन पर जगह दी है | टूरिज्म कंपनी के मैनेजर पुनीत द्विवेदी ने बताया कि एयर इंडिया ने दिल्ली का लाल किला और ग्वालियर दुर्ग के मान सिंह पैलेस को चुना है |  एयर इंडिया की फ्लाइट की टेल पोर्शन पर टूरिज्म को प्रमोट करने के लिए कई ऐतिहासिक स्थल लिए हैं, लेकिन किले केवल दो ही हैं | ग्वालियर किला हमेशा से देशी विदेशी पर्यटकों में आकर्षण का केंद्र रहा है | किले का मुख्य आकर्षण महाराजा मानसिंह महल को देखने के लिए हर वर्ष  लाखों देसी विदेशी  पर्यटक यहां आते हैं। ग्वालियर दुर्ग का मानसिंह महल पूरी दुनिया में अपनी दुर्लभ बनावट के लिए  प्रसिद्ध है, एयर इंडिया के इस टेल डिजाइन में आने के बाद कई देश मानसिंह महल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं | राजा मानसिंह तोमर ने 1486  से 1516 के बीच महल का निर्माण करवाया था |  इसकी बाहरी दीवारों पर पीले बतख, नीले, पीले और हरे रंग के हाथी, बाघ और मगरमच्छ और बेजोड़ पच्चीकारी की गई है | एयर इंडिया ने अपने अपने एयरक्राफ्ट पर ग्वालियर के दुर्ग सहित देश की ऐतिहासिक धरोहरों को स्थान देकर इन्हें दुनियाभर में प्रचारित करने का अनोखा प्रयोग किया है | इससे ग्वालियर सहित देश का गौरव दुनियाभर में बढ़ेगा |  

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Dakhal News 2 September 2019


ganesh ji

    मिट्टी की बनी मूर्तियां पसंद कर रहे हैं लोग  प्लास्टर ऑफ पैरिस की मूर्तियों पर लगा  प्रतिबन्ध   गणेश उत्सव की तैयारियां बड़े धूम धाम से की जा रही है |  जगह जगह गणेश भगवान् की एक फ्रेंडली  मूर्तियां बनाई गई हैं | प्रशासन के आदेश के बाद प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों पर प्रतिबन्ध लगाया गया है  | जिसको देखते हुए शहर में मिटटी की मूर्तियां बनाई गई हैं |    भोपाल में गणेश उत्सव को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है |  नगर निगम और प्रशासन के आदेश के बाद प्लास्टर ऑफ पैरिस की बनी मूर्तियों पर रोक लगाई गई है | जिसको देखते हुए शहर में मूर्तिकारों और विक्रेताओं ने मिटटी की मूर्तियां बनाई है | शाहपुरा स्थित एक बीज संस्था ने मिटटी की मूर्तियों के  विक्रय का एक बेहतरीन प्रयास किया है | जिसमे यह संस्था गांव में लोगों को मिटटी की मूर्ती बनाने को प्रेरित करती है | और बनी हुई मूर्तियों को बेचा जाता है | संस्था की ऑनर कंचन का कहना है की ऐसा करने से एक तो गांव में रोजगार पैदा होता है |  वही दूसरी ओर पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है |  

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Dakhal News 2 September 2019


गढढों की धड़कन

  गढढों की चेक की  धड़कन  चढ़ाया ग्लूकोस  सड़कों के जीवन के लिए महिलाओं ने रखा व्रत     शहर की लगभग सभी सड़के गढ्ढों में तब्दील हो चुकी हैं | ये सड़के कही सीवेज की लाईन बिछाने के नाम पर खोदी गई तो कही पानी की लाईन के लिए | मगर उसे फिर से बनाना प्रसाशन भूल गया और जब बारिश हुई तो कीचड़ और पानी से भरे गढ्ढे बचे  सड़के यमलोक सिधार गई | इसलिए लोगो ने दम तोड़ती सड़कों के गढढों की धड़कन चेक कर  ग्लूकोस चढ़ाया और रही बची सड़कों के लिए महिलाओं ने उनकी जीवन की प्रार्थना कर व्रत रखा |        सड़क के गड्ढों के कारण वाहन चालकों का निकलना बहुत मुश्किल हो गया है |  कई लोग गिरकर घायल हो रहे हैं |  तो किसी के वहान कीचड़ में फंस जाते हैं इसको देखते हुए सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए बाग मुगालिया एक्सटेंशन कॉलोनी विकास समिति द्वारा | एक अनोखा प्रदर्शन किया गया  | दशहरा मैदान सरिता सेतु के पास सड़क के गड्ढों की धड़कन चेक कर उपस्थित डॉक्टरों द्वारा ग्लूकोस की बोतल लगाई गई | घटिया निर्माण होने से बारिश में सड़कों के गड्ढों के कारण चलना नामुमकिन हो गया है |   इसको लेकर आज महिला पुरुष वृद्ध बच्चों द्वारा उपस्थित होकर अच्छी सड़कों की मांग सरकार से की गई भ्रष्टाचार के कारण हर दो-तीन महीने में सड़क खराब हो जाती है इसका खामियाजा टैक्स देने वाली जनता को भुगतना पड़ता है | प्रसाषन की आंखे खोलने और बची हुई सड़कों की लम्बी जिंदगी के लिए महिलाओं ने व्रत भी रखा |

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Dakhal News 1 September 2019


बस टकराई

  नागपुर से सागर जा रही बस दुर्घटनाग्रस्त    ड्राइवर की लापरवाही के कारण सागर से नागपुर जा रही बस अनियंत्रित हो कर पहाड़ से टकरा गई | ये हादसा परतापुर-कुंडाली मार्ग के  पास रात करीब 3 बजे हुआ  इसमें 12 यात्री घायल हो गए  |    नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा जिले के  परतापुर-कुंडाली मार्ग के बीच एक बस देर रात अनियंत्रित होकर पहाड़ी से टकरा गई | हादसे में बस में सवार 12 यात्री घायल हो गए  |  बस नागपुर से सागर जा रही थी  |  हादसे में गंभीर रूप से घायल कंडक्टर अनिल अवस्थी को जबलपुर रेफर किया गया है  | बाकी 11 घायलों को एंबुलेंस के जरिए  नरसिंहपुर जिला अस्पताल में भर्ती करवाया गया है  | इसमें 9 यात्री सागर जिले के बताए जा रहे हैं  | हादसे की वजह रास्ते से गुजर रहे एक डंपर द्वारा बस को क्रासिंग के दौरान कट मारना बताया  जा रहा  है  | जबकि यात्रियों का कहना है बस ड्राइवर लापरवाही से बस चला रहा था और अचानक उसे झपकी लग जाने के कारण यह हादसा हुआ  |  

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Dakhal News 31 August 2019


sdrf rescue

  पानी में डूबे तीन दोस्तों में से एक बचा    भोपाल की केरवा नदी पर पिकनिक मानाने गए तीन दोस्त बह गए थे  | जिनमे से एक को तो रेस्क्यू टीम ने तत्काल बचा लिया था   लेकिन बाकि दो दोस्तों के शव ही वापस उनके घर पहुँच सके  | इस घटना के बाद केरवा इलाके में बड़ी संख्या में पुलिस को तैनात किया गया है   |   भोपाल  में केरवा नदी में नहाने के दौरान तीन युवकों के बहने की घटना के बाद मंगलवार को पुलिस और प्रशासन चेत गया   |  लिहाजा केरवा डैम के चप्पे-चप्पे पर अब पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए हैं  |सोमवार को केरवा नदी में तीन युवक बह गए थे   | उनमें से एक मुकेश कोचले तो बच गया था   | वहीं मंगलवार सुबह रेस्क्यू टीम को दूसरे युवक शंकर मंडलोई का शव मिल गया, जबकि तीसरे मुकेश हिरवे का  शव बुधवार को नदी से निकाला गया   इतनी बड़ी घटना के बाद भी लोग यहां के खतरनाक स्थानों में जाने से नहीं चूक रहे हैं   | स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स  की पुलिस और होमगार्ड की टीम सुबह पांच बजे से लेकर शाम 7 सात बजे तक रेस्क्यू करती रही, लेकिन मुकेश का लगाव नहीं मिला वहीं उसके परिजन सुबह से आस लगाए बैठे थे कि कहीं उनका बच्चा मिल जाए   | उसके पिता आस भरी नजरों से रेक्स्यू टीम को देख रहे थे  | तभी रेस्क्यू टीम को कुछ संकेत मिले और वह जल की तलहटी से मुकेश के शव को निकाल के लाये  | थोड़ी से मौज मस्ती में दो युवक असमय काल के गाल में समां गए  |   

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Dakhal News 28 August 2019


 hadsa

  बाल बाल बची महिला अफसर   नरसिंगपुर में लोक अभियोजन कार्यालय का पिलर कार पर  गिरने से कार चकनाचूर हो गई गनीमत रही की हादसे के  वक़्त  कार में कोई नहीं था  | पिलर गिरने से बिल्डिंग निर्माण को लेकर कई सवाल खड़े हो गए  है   |        नरसिंहपुर के जिला लोक अभियोजन कार्यालय में बड़ा हादसा हो गया  |   महिला अफसर जैसे ही  कार से उतरकर दफ्तर में घुसी, तभी पिलर  कार पर  गिर गया |  सहायक जिला अभियोजन अधिकारी संगीता दुबे एक बड़े हादसे का शिकार होने से बच गई  | पिलर गिरने की वजह से उनकी कार चकनाचूर हो गई   इस हादसे के बाद बिल्डिंग निर्माण को लेकर भी सवाल खड़े किये जा रहे  |  आशंका जताई जा रही है की बिल्डिंग निर्माण में गड़बड़ी के कारण  यह हादसा हुआ  |        

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Dakhal News 27 August 2019


gundagardi

नगर निगम की रिमूवल गैंग की गुंडागर्दी  इंदौर नगर निगम में गुंडों की फ़ौज    इंदौर नगर निगम की रिमूवल गैंग  |    गुंडा गैंग में तब्दील हो गई है  |  ये लोगों को धमकाती है उनके साथ अभद्रता करती है और जब कोई इनसे बातचीत करना चाहे तो ये उन्हें मारती है |   इस गैंग का एक महिला के साथ मारपीट का वीडिओ वायरल हुआ है |  जो बताता है कि इंदौर की सड़कों पर कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं हैं|    इंदौर नगर निगम की रिमूवल गैंग का एमआर टेन इलाके में मारपीट का वीडियो वायरल हुआ है |   इसमें नगर निगम के कर्मचारियों ने लाठियों से एक महिला की पिटाई की   | नगर निगम के ये गुंडे महिला को मरते हुए खुद को मर्द साबित करना चाह रहे थे   |  इस महिला की जो भी मदद करने आया नगर निगम के गुंडों ने उनकी भी पिटाई कर दी |  नगर निगम की ये रिमूवल  गैंग  यहां ठेला चालकों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पहुंची थी  |   इस महिला ने जब इनसे ऐसा करने का कारन पूछा तो गैंग के गुंडों को बुरा लग गया और ये सब लठ्ठ लेकर महिला पर पिल पड़े |    इस गैंग में शामिल इन लोगों ने सड़कों पर जमकर उत्पात मचाया और लोगों को मारा  | ऐसा लग रहा थी कि इंदौर जैसे शहर में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज है ही नहीं |     

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Dakhal News 21 August 2019


encounter

  एनकाउंटर की  मजिस्ट्रियल जांच के आदेश   जबलपुर के दो नामी बदमाशों  को नरसिंहपुर पुलिस ने मार गिराया है  | दोनों पर हत्या, लूटपाट,अवैध वसूली सहित अन्य गंभीर मामले दर्ज थे  |  पुलिस मुठभेड़ में मारे गए बदमाशों का नाम विजय  यादव और समीर खान बताए  है  |  इन पर जबलपुर के कांग्रेस नेता राजू मिश्रा और कुक्कू पंजाबी की हत्या का भी आरोप था  | इस मुठभेड़ में एएसपी राजेश तिवारी, गोटेगांव टीआई प्रभात शुक्ला और एक प्रधान आरक्षक भी घायल हुए हैं  | इस मुठभेड़  की  मजिस्ट्रियल जांच के आदेश भी किये गए हैं  | मुठभेड़ नरसिंहपुर के सुआतला थाना के कुमरोडा गांव के पास हुई   |   इसमें जबलपुर के दो इनामी बदमाश मारे गए हैं  |   जबलपुर के कोतवाली थाने ने इन दो बदमाशों के खिलाफ इनाम का ऐलान किया हुआ था  |   विजय यादव के बारे में जानकारी देने पर तीस हजार और समीर खान के बारे में बताने पर 15 हजार का इनाम घोषित  था   |   विजय यादव लंबे वक्त से फरार चल रहा था  |    वो जबलपुर के गोरखपुर इलाके का रहने वाला था  |    इस पर हत्या, आर्म्स एक्ट के अलावा कई और संगीन धाराओं में मामले दर्ज थे   |   वहीं इस मुठभेड़ में मारा गया दूसरा  बदमाश समीर हनुमानताल का रहने वाला था और उस पर भी कई गंभीर धाराओं में मामले दर्ज थे और वो भी लंबे वक्त से फरार चल रहा था  |     इस एनकाउंटर में घायल हुए पुलिस अफसरों को जिला अस्पताल लाया गया है  |  यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं  |    मुठभेड़ सोमवार तड़के तीन बजे नेशनल हाईवे 12 पर हुई  |  जिसमें राजेश शर्मा नाम के एक प्रधान आरक्षक भी घायल हुए हैं  |    जिन्हें इलाज के लिए जिला अस्पताल लाया गया है   |  एनकाउंटर में शामिल रहे एएसपी राजेश तिवारी ने बताया कि पुलिस को मुखबिर से बदमाशों के इलाके में बड़ी वारदात अंजाम देने की जानकारी मिली थी  |   इसके बाद इलाके में तलाशी अभियान चलाया गया था    सोमवार तड़के तीन बजे पुलिस को एक गाड़ी नजर आई  .जिसे रोकने की कोशिश की गई तो अंदर से फायरिंग शुरू हो गई  |   पुलिस ने मोर्चा लेते हुए जवाबी फायरिंग की  |   जिसमें कार में बैठे दो बदमाशों को गोली लगी  |   जिन्हें  स्थानीय अस्पताल ले जाया गया  |   जहां दोनों को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया  |    एनकाउंटर के दौरान दोनों तरफ से 15 से 17 राउंड गोली चली है  |     दोनों बदमाशों  विजय यादव और समीर खान का पूरे महाकोशल में दबदबा था   |  दोनों पर हत्या, अपहरण और अवैध वसूली से जुड़े कई गंभीर मामले दर्ज थे   नरसिंहपुर एसपी गुरुकरण सिंह ने बताया कि, "ये दोनों बदमाश ढाई साल से फरार चल रहे थे   |  सोमवार तड़के जब इन्हें रोकने की कोशिश की तो इन्होंने पुलिस पर फायरिंग कर दी |    जवाबी कार्रवाई में दोनों बदमाश ढेर हो गए  |    मामले की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए गए हैं |     

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Dakhal News 19 August 2019


gas cylinder

  उमरिया में हादसा ड्राइवर क्लीनर घायल HP  गैस कम्पनी के खली सिलेंडर लेकर जा रहा ट्रक | सड़क पर पलट गया  | बताया जा रहा हैं की ट्रक एक अन्य गाड़ी को ओवर टेक करने की कोशिश कर रहा थी ट्रक की गति तेज थी जिसको वो नियंत्रित नहीं कर पाया और पलट गया  | हादसे में किसी तरह की जनहानि की खबर नहीं हैं | उमरिया मुख्यालय से 6 किमी दूर कोतवाली थाना अंतर्गत |  शहपुरा मार्ग पर एचपी कंपनी के खाली गैस सिलेंडर से भरा एक ट्रक पलट गया |  इस घटना में चालक महेश और क्लीनर धन्नू  गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं  | जिन्हें उपचार के लिए 108 की मदद से जिला अस्पताल  ले जाया गया  | बुधवार की सुबह 7 बजे हुए इस हादसे की मुख्य वजह ट्रक को अन्य गाडी को तेज गति से ओवर टेक करना बताया जा रहा हैं  | जिसके बाद अनियंत्रित होकर ट्रक पलट गया | दुर्घटनाग्रस्त ट्रक भोपाल के विकास जैन का है  | जो जबलपुर डिपो से सिलिंडर लेकर अनूपपुर जा रहा था |   

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Dakhal News 14 August 2019


vinod kapri

विनोद कापड़ी ने टीवी9 भारतवर्ष को गुडबॉय बोल दिया… टीवी9 भारतवर्ष के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी ने आखिरकार चैनल को अलविदा कह दिया. भड़ास पर इस बाबत पहले ही खबर छप चुकी है. टीवी9 भारतवर्ष चैनल के स्टाफ ने विनोद कापड़ी को विदाई दी. इस मौके पर ग्रुप फोटो भी हुए. विनोद कापड़ी ने न्यूज रूम में जाकर सभी से हाथ मिलाया. भावुक कर देने वाले इस क्षण के दरम्यान हर कोई इस चैनल के निर्माण में विनोद कापड़ी की मेहनत और विजन की तारीफ कर रहा था. विनोद कापड़ी ने अपना अंतिम विदा पत्र पूरे स्टाफ को जो भेजा वो यूं है- दोस्तों… कुछ मीठा हो जाए… शाम 6.15 बजे आइए कैफ़ेटेरिया में .. जलेबी और समोसे के साथ…कुछ जश्न हो जाए…शानदार जानदार काम करने का और आप से जुदा होने का ?? .. कई दोस्तों ने पिछले कुछ दिनों में कई बार कहा कि सर launch party कब है? तो मैं उनसे कहता था farewell party की तैयारी करो…तो इसे वो पार्टी भी समझ लिया जाए ?? बात बस इतनी कहनी है कि जीवन भर अपने कुछ उसूलों पर अमल किया.. ये छोटे मोटे उसूल ही आपको उर्जा देते हैं…पिछले कुछ दिनों में कई बार लगा कि चलिए कुछ सुलह सफ़ाई समझौते कर लेते हैं… लेकिन वो जो आपका अंतर्मन होता है ना… वो आपसे जब सवाल करने लगता है तो फिर आप अपने मन की सुनते है… क्योंकि वही अंतर्मन आपको खुद अपने लिए सम्मान दिलाता है। और दूसरी बात.. आप सब जानते हैं कि फ़िल्म मेरा पहला प्यार है… ये फ़िल्मे ही हैं… जिस की वजह से पाँच साल पहले मैंने जमे जमाए टीवी करियर को छोड़ दिया था… मैंने वापसी की थी अपने 23 साल पुराने दोस्त रवि प्रकाश के लिए… जिसने हाड़ माँस से TV9 को पैदा किया…बनाया… और यहाँ तक पहुँचाया… मेरे सारे दोस्त जानते हैं कि रवि नहीं होता तो मैं टीवी में नहीं आता… हाँ .. इस मौक़े पर मैं उन सबसे माफ़ी माँगना चाहूँगा जो मुझ पर भरोसा करके यहाँ आए.. इस तरह इस क़दम के लिए मैं आपका गुनहगार हूँ पर आप अगर मुझे जानते हैं तो आप मेरी मजबूरी समझेंगे… फिर भी आपका विश्वास तोड़ने के लिए आपसे बार बार माफ़ी माँगता हूँ.. सच कहूँ तो ये वो आप ही लोग थे कि जिनकी वजह से मैंने सोचा कि चलो थोड़े बहुत समझौते जीवन में कौन नहीं करता.. मुझे भी कर लेने चाहिए.. लेकिन फिर उसकी भी एक सीमा होती है… साथ ही मैं आप सब को आश्वस्त करना चाहता हूँ TV9 एक शानदार ग्रुप है… 16 साल में इस ग्रुप ने जानदार काम किया है…आगे भी इस ग्रुप की बड़ी योजनाएँ हैं…नए मैनेजमेंट के भारतवर्ष को लेकर बड़े प्लान हैं… इसलिए आप सब लोग बिलकुल भी चिंता ना करें… सब कुछ यथावत चलता रहेगा… शायद और बेहतर होगा… कम से कम अब न्यूज़रूम में कोई चिल्लाने वाला नहीं होगा…News में कुछ प्रयोग किए थ…जिन पर मुझे गर्व ह … आप लोग उसे चलाते रहेंगे तो बेहद ख़ुशी होगी… आख़िरी बात .. आप सब जानते है .. टीवी पत्रकारिता के लिए ये एक बेहद मुश्किल वक्त है… मुझे बस इतना ही कहना है कि आप सिर्फ निष्पक्ष भी रहेंगे तो पत्रकारिता की बहुत बड़ी सेवा हो जाएगी… आप सबको बहुत सारा प्यार… आप सब को और भारतवर्ष के सपने को हमेशा मिस करूँगा…. BIG THANKS to all of you. All my love and best wishes friends [भड़ास फॉर मीडिया से साभार ]  

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Dakhal News 2 June 2019


 WhatsApp

लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp हमेशा की अपने फ्रेश रखने के लिए एक के बाद एक नए अपडेट पेश कर रहा है। फेसबुक के स्वामित्व वाली इस कंपनी ने अब अपने लेटेस्ट बीटा अपडेट के साथ कुछ दिलचस्प फीचर्स पेश किए हैं। WABetaInfo द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार ऐप स्टोर में नया बीटा अपडेट मिला है, जिसके बाद WhatsApp बहुत जल्द प्रोफाइल फोटो को कॉपी, सेव या डाउनलोड करने का ऑप्शन हटा देगा। आईओएस यूजर के लिए ये लेटेस्ट बीट अपडेट हो सकता है। बता दें कि यह फीचर पहले एंड्रॉयड के अपडेट में भी देखने को मिला था। हालांकि, ग्रुप चैट्स के लिए यह लागू नहीं है। यूजर्स WhatsApp ग्रुप आईकन की फोटो अभी भी सेव कर सकते हैं। WABetaInfo के पेज पर इस फीचर को हटाने को लेकर कई लोगों ने ये भी कहा है कि किसी भी प्रोफाइल फोटो को सेव करने के लिए स्क्रीनशॉट अब भी लिए जा सकते हैं। ऐसे में भले कोई प्रोफाइल फोटो डाउनलोड ना कर सके, लेकिन उसका स्क्रीनशॉट आसानी से ले सकता है इसके अलावा, अपडेट के साथ WhatsApp ने ऑडियो फॉर्मेट को लेकर भी बदलाव किए हैं। अभी तक ऑडियो भेजने और रिसीव करने के लिए OPUS फॉर्मेट का इस्तेमाल करता था, लेकिन WhatsApp ऑडियो फाइल्स को अब M4A फॉर्मेट में रिसीव करेगा और भेजेगा। इस बदलाव का कारण है कि OPUS फॉर्मेट सभी ऐप्स सपोर्ट नहीं करता है। गौरतलब है कि हाल ही में पुष्टि हुई है कि साल 2020 से WhatsApp में विज्ञापन दिखना शुरू हो जाएंगे। नीदरलैंड्स में एनुअल मार्केटिंग सबमिट के दौरान इस बारे में खुलासा हुआ कि शुरुआत में विज्ञापन यूजर्स को WhatsApp स्टोरी सेक्शन में दिखाए जाएंगे। बता दें कि इंस्टाग्राम में पिछले साल से ही विज्ञापन शुरू किए जा चुके हैं।

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Dakhal News 1 June 2019


 पिचाई  गूगल

    सर्च इंजन कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने लाखों डॉलर के मूल्य के गूगल स्टॉक्स को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने 2 साल से इक्विटी अवॉर्ड (शेयरों के रूप में मिलने वाला भुगतान) नहीं लिया है। पिछले साल शेयर लेने से इनकार करते हुए पिचाई ने कहा था कि उन्हें पहले ही काफी भुगतान मिल चुका है। इस बात की जानकारी ब्लूमबर्ग मीडिया ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है। पिचाई ने कितनी वैल्यू के शेयर छोड़े, इसे लेकर आई एक रिपोर्ट के अनुसार संभवतः इनकी कीमत 58 मिलियन डॉलर हो सकती है। हालांकि यह भी हो सकता है पिचाई ने रणनीति के तहत शेयर लेने से मना किया हो क्योंकि गूगल के कर्मचारी , सीईओ का वेतन बहुत ज्यादा होने को लेकर सवाल उठा चुके हैं। जबकि कई कर्मचारियों के लिए रोज की जरूरतें पूरा करना भी मुश्किल होता है। अल्फाबेट इस साल सीईओ के वेतन पर फिर से करेगी विचारअगर पिचाई के पिछले शेयर अवॉर्ड्‌स की बात करें तो 2014 में उन्हें 25 करोड़ डॉलर (1750 करोड़ रुपए) की वैल्यू के शेयर मिले थे। 2015 में गूगल ने उन्हें 10 करोड़ डॉलर (700 करोड़ रुपए) और 2016 में 20 करोड़ डॉलर (1400 करोड़ रुपए) की वैल्यू के शेयर दिए थे। गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट इस साल सीईओ के वेतन पर फिर से विचार करेगी। उस वक्त तक पिचाई के पिछले शेयर उनके खाते में आ जाएंगे।

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Dakhal News 1 June 2019


modi

    वर्ष 2019 के जनादेश से हमें दो संदेश मिलते हैं। एक तो यह कि तमाम विविधताओं के बावजूद जब भारत के नागरिकों के सामने अपने भविष्य की दिशा तय करने की चुनौती आती है तो वे एक राष्ट्रीय सहमति का निर्माण करने में सक्षम होते हैं। हम बुद्धिजीवी और पत्रकार दिशाभ्रम के शिकार हो सकते हैं, लेकिन जनता इस समस्या से पीड़ित नहीं है। जनादेश से जुड़ा दूसरा संदेश यह है कि मिथ्या प्रचार करने वाले सबसे पहले खुद अपने विचारों में कैद होकर बाहरी दुनिया से बेखबर हो जाते हैं। गुजरात से लेकर असम तक और कर्नाटक से लेकर हिमाचल तक मतदाताओं ने एकमत से देश की बागडोर प्रधानमंत्री मोदी को सौंपने का फैसला किया। यह राष्ट्रीय सहमति हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को विपक्ष कभी प्रभावी चुनौती नहीं दे पाया, लेकिन किसी सकारात्मक कार्यक्रम के आधार पर भारी बहुमत हासिल करने का एक उदाहरण पहले भी मिला था। 1971 में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ जैसे नारे के दम पर सत्ता हासिल की थी। हालांकि वह इस वादे को निभाने में बुरी तरह विफल रही थीं। 1984 में राजीव गांधी को भारी बहुमत मिला था, लेकिन वह जनादेश इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति का परिणाम था। पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकारें अपने अस्तित्व को बचाने और रूठे सहयोगियों को मनाने में ही लगी रहीं। हालांकि इस दौरान कुछ बहुत अच्छे काम भी हुए, लेकिन मनमोहन सिंह के शब्दों में 'गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों के कारण ये सरकारें सांसदों की खरीदफरोख्त, भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों के बचाव और देश की अर्थनीति और विदेश नीति से संबंधित कठोर फैसलों से कतराती रहीं। नकारात्मकता एक कुंठा है। भारत का युवा मतदाता राहुल गांधी की यह बात मानने के लिए तैयार नहीं था कि सिर्फ कुंठा और क्रोध से उसके अस्तित्व को परिभाषित किया जाए। चुनाव के दौरान देशव्यापी जनअसंतोष को लेकर भी दुष्प्रचार किया गया। मसलन युवा बेरोजगार है, किसान नाराज है, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं, दलित हिंसा के शिकार हैं, व्यापारी टैक्स-आतंकवाद से व्यथित हैं यानी समाज के हर तबके को मोदी ने धोखा दिया है। दिल्ली के स्वनिर्मित वैचारिक बुलबुले में रहने वाले ये लोग जब चुनावी भ्रमण के लिए निकले तो उनकी चुनावी रिपोर्ट जनता की नब्ज नहीं पकड़ पाई। वे अपने ही प्रचार के शिकार बन गए। मिसाल के तौर पर, गांव में सिर पर भूसा ढोने वाली 11 वर्षीय एक किशोरी की मेहनत में हमारे अंग्र्रेजीदां पत्रकारों को शोषण दिखाई दिया। यह किशोरी नए भारत की बेटी है, जिसे मेहनत करने में शर्म नहीं आती। उसके सपने जिंदा हैं। वह डॉक्टर बनना चाहती है। उसके सपनों को पूरा करने के लिए कम आय के बावजूद उसके पिता उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे हैं। उसके पास पक्का मकान है, शौचालय भी है और मोदी सरकार ने उसे गैस सिलेंडर भी दिया है। भले ही वह सिलेंडर आज खाली हो, लेकिन जनवरी से लेकर मार्च तक उसे दो बार भरवाया भी गया है, किंतु चुनावी पर्यटन पर निकले पत्रकार महोदय इस किशोरी की जिंदगी पर तरस खाते हुए उसे गरीबी और शोषण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते रहे। सच तो यह है कि यह किशोरी नए भारत में होने वाले अभूतपूर्व आर्थिक समावेशीकरण का एक नायाब उदाहरण है, लेकिन यह बात अंग्र्रेजियत के खंडहरों में आलीशान जिंदगी बिताने वाले दिल्ली के पत्रकारों की समझ से बाहर है। वे यह नहीं देख सके कि भारत के गांव और कस्बों में रहने वाले करोड़ों किशोर व युवा बेहतर जिंदगी का सपना देखने लगे हैं। इसी कारण जब देश की भावी सरकार चुनने का समय आया तो उन्होने राहुल गांधी की कुंठा और झुंझलाहट को ठुकराकर नरेंद्र मोदी द्वारा दिखाई आशाओं के लोकतंत्र की राह पर चलने का निर्णय लिया।  

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Dakhal News 1 June 2019


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मोबाइल और संचार की दुनिया में यह साल 5जी टेक्नोलॉजी के नाम रहने वाला है। हालांकि अभी 5जी तकनीक आने मे वक्त लगेगा, लेकिन न केवल मोबाइल डिवाइस बल्कि इसका पूरा इकोसिस्टम इस वर्ष 5जी में तब्दील हो जाएगा। यह साल विभिन्न 5जी उत्पादों के लांच का भी रहेगा जिसमें सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स पहला 5जी फोन लांच करके बाजी मार चुकी है। आने वाले समय में कई और कंपनियां भी 5जी हैंडसेट लाने की तैयारी में हैं। सैमसंग ने पिछले हफ्ते ही 5जी मोबाइल हैंडसेट एस-10 बाजार में उतारने का एलान किया है। हालांकि अभी 5जी मोबाइल सेवा की शुरुआत नहीं हुई है। लेकिन मोबाइल हैंडसेट व उपकरण बनाने वाली कंपनियों ने इसकी तैयारी लगभग पूरी कर ली है। मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में तकरीबन सभी कंपनियों ने अपने 5जी उत्पादों का प्रदर्शन किया है। इन कंपनियों की घोषणाओं से स्पष्ट है कि इस वर्ष 5जी का पूरा इकोसिस्टम तैयार हो जाएगा। मोबाइल डिवाइस बनाने वाली कंपनियां भी साल 2020 की शुरुआत में ही अपने उत्पाद बाजार में उतारने को तैयार हैं। सैमसंग भी इनमें से एक है। मोबाइल चिप बनाने वाली कंपनी क्वालकॉम 5जी तकनीक पर आधारित स्नैपड्रैगन 855 मोबाइल चिप और स्नैपड्रैगन एक्स50 चिप बाजार में उतार चुकी है। सैमसंग ने अपने नवीनतम एस-10 5जी फोन में इनका इस्तेमाल किया है। क्वॉलकॉम 5जी डिवाइसेज के लिए एक और चिप जल्द बाजार में उतारेगी। क्वॉलकॉम के प्रेसिडेंट क्रिष्टियानो ने बताया कि इस चिप पर आधारित पहला मोबाइल फोन भी सैमसंग की तरफ से ही आएगा। दुनियाभर में 5जी तकनीक को विकसित होने से लेकर उस पर आधारित उत्पादों के बाजार में आने में मात्र 10 वर्ष का समय लगा है। साल 2009 में जब 4जी तकनीक लांच हुई थी, तब दुनियाभर में केवल चार ऑपरेटर और तीन उपकरण निर्माता कंपनियां थी। लेकिन आज 20 से अधिक ऑपरेटर 5जी टेक्नोलॉजी लांच की तैयारी पूरी कर चुके हैं और इतने ही ओईएम उपकरण और हैंडसेट बनाने के लिए तैयार हैं। भारत में रिलायंस जियो भी 5जी टेक्नोलॉजी के लांच के लिए पूरी तरह तैयार है। ब्रिटेन की टेलीकॉम दिग्गज वोडाफोन ने आरोप लगाया है कि पिछले दो वर्षों में भारत में टेलीकॉम सेक्टर के लिए नियामक संबंधी जितने भी फैसले आए हैं, वे रिलायंस जियो के पक्ष में और अन्य सभी कंपनियों के खिलाफ रहे हैं। वोडाफोन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) निक रीड ने यह भी कहा कि पिछले कुछ समय के दौरान भारत में कंपनी मुश्किल दौर से गुजरी है। लेकिन अब नेटवर्क में निवेश और संपत्तियों के मौद्रीकरण के माध्यम से वह भारतीय बाजार में टिकने के लिए बेहतर स्थिति में आ चुकी है। रीड ने यह भी कहा कि वर्तमान में भारतीय बाजार में टेलीकॉम सेवा की दरें सबसे कम और कारोबार के लिहाज से टिकाऊ नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'सभी तीन टेलीकॉम कंपनियां नकदी की किल्लत से जूझ रही हैं। दुनियाभर में टेलीकॉम सेवाओं के दाम भारत में सबसे सस्ते हैं। वहां एक औसत ग्राहक इतनी कम दर में हर महीने 12 जीबी डाटा का इस्तेमाल कर रहा है, जो दुनियाभर में कहीं भी नजर नहीं आती हैं।' गौरतलब है कि कंपनी भारत में आदित्य बिड़ला ग्रुप से गठजोड़ के तहत वोडाफोन आइडिया लिमिटेड के तहत कारोबार का संचालन कर रही है।  

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Dakhal News 3 March 2019


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मोबाइल और संचार की दुनिया में यह साल 5जी टेक्नोलॉजी के नाम रहने वाला है। हालांकि अभी 5जी तकनीक आने मे वक्त लगेगा, लेकिन न केवल मोबाइल डिवाइस बल्कि इसका पूरा इकोसिस्टम इस वर्ष 5जी में तब्दील हो जाएगा। यह साल विभिन्न 5जी उत्पादों के लांच का भी रहेगा जिसमें सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स पहला 5जी फोन लांच करके बाजी मार चुकी है। आने वाले समय में कई और कंपनियां भी 5जी हैंडसेट लाने की तैयारी में हैं। सैमसंग ने पिछले हफ्ते ही 5जी मोबाइल हैंडसेट एस-10 बाजार में उतारने का एलान किया है। हालांकि अभी 5जी मोबाइल सेवा की शुरुआत नहीं हुई है। लेकिन मोबाइल हैंडसेट व उपकरण बनाने वाली कंपनियों ने इसकी तैयारी लगभग पूरी कर ली है। मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में तकरीबन सभी कंपनियों ने अपने 5जी उत्पादों का प्रदर्शन किया है। इन कंपनियों की घोषणाओं से स्पष्ट है कि इस वर्ष 5जी का पूरा इकोसिस्टम तैयार हो जाएगा। मोबाइल डिवाइस बनाने वाली कंपनियां भी साल 2020 की शुरुआत में ही अपने उत्पाद बाजार में उतारने को तैयार हैं। सैमसंग भी इनमें से एक है। मोबाइल चिप बनाने वाली कंपनी क्वालकॉम 5जी तकनीक पर आधारित स्नैपड्रैगन 855 मोबाइल चिप और स्नैपड्रैगन एक्स50 चिप बाजार में उतार चुकी है। सैमसंग ने अपने नवीनतम एस-10 5जी फोन में इनका इस्तेमाल किया है। क्वॉलकॉम 5जी डिवाइसेज के लिए एक और चिप जल्द बाजार में उतारेगी। क्वॉलकॉम के प्रेसिडेंट क्रिष्टियानो ने बताया कि इस चिप पर आधारित पहला मोबाइल फोन भी सैमसंग की तरफ से ही आएगा। दुनियाभर में 5जी तकनीक को विकसित होने से लेकर उस पर आधारित उत्पादों के बाजार में आने में मात्र 10 वर्ष का समय लगा है। साल 2009 में जब 4जी तकनीक लांच हुई थी, तब दुनियाभर में केवल चार ऑपरेटर और तीन उपकरण निर्माता कंपनियां थी। लेकिन आज 20 से अधिक ऑपरेटर 5जी टेक्नोलॉजी लांच की तैयारी पूरी कर चुके हैं और इतने ही ओईएम उपकरण और हैंडसेट बनाने के लिए तैयार हैं। भारत में रिलायंस जियो भी 5जी टेक्नोलॉजी के लांच के लिए पूरी तरह तैयार है। ब्रिटेन की टेलीकॉम दिग्गज वोडाफोन ने आरोप लगाया है कि पिछले दो वर्षों में भारत में टेलीकॉम सेक्टर के लिए नियामक संबंधी जितने भी फैसले आए हैं, वे रिलायंस जियो के पक्ष में और अन्य सभी कंपनियों के खिलाफ रहे हैं। वोडाफोन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) निक रीड ने यह भी कहा कि पिछले कुछ समय के दौरान भारत में कंपनी मुश्किल दौर से गुजरी है। लेकिन अब नेटवर्क में निवेश और संपत्तियों के मौद्रीकरण के माध्यम से वह भारतीय बाजार में टिकने के लिए बेहतर स्थिति में आ चुकी है। रीड ने यह भी कहा कि वर्तमान में भारतीय बाजार में टेलीकॉम सेवा की दरें सबसे कम और कारोबार के लिहाज से टिकाऊ नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'सभी तीन टेलीकॉम कंपनियां नकदी की किल्लत से जूझ रही हैं। दुनियाभर में टेलीकॉम सेवाओं के दाम भारत में सबसे सस्ते हैं। वहां एक औसत ग्राहक इतनी कम दर में हर महीने 12 जीबी डाटा का इस्तेमाल कर रहा है, जो दुनियाभर में कहीं भी नजर नहीं आती हैं।' गौरतलब है कि कंपनी भारत में आदित्य बिड़ला ग्रुप से गठजोड़ के तहत वोडाफोन आइडिया लिमिटेड के तहत कारोबार का संचालन कर रही है।  

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Dakhal News 3 March 2019


वॉट्सएप  ग्रुप कॉलिंग के लिएलाया यह बड़ा अपडेट

 WhatsApp ने पिछले साल अपने यूजर्स के लिए कईं फीचर्स पेश किए थे। इसी कड़ी में ग्रुप कॉलिंग फीचर भी शामिल था जिसकी मदद से यूजर अपने ग्रुप में वॉइस और वीडियो कॉल कर सकता है। यह फीचर आने के बाद अब कंपनी ने इसमें बड़ा अपडेट किया है। इस अपडेट के आने के बाद अब ग्रुप कॉलिंग और भी आसान और मजेदार हो जाएगी। खबरों के अनुसार अब तक ग्रुप कॉलिंग के लिए इसमें यूजर्स को अलग-अलग लोगों को एड करना पड़ता था। अब WhatsApp एंड्रॉइड ऐप के लिए एक नया अपडेट जारी किया गया है। इसके तहत ग्रुप कॉल के लिए एक अलग से बटन उपलब्ध कराया गया है। इस फीचर के जरिए यूजर्स ग्रुप कॉल के लिए पार्टिसिपेंट्स को एक बार में ही एड कर पाएंगे। पहले यह फीचर केवल iOS यूजर्स के लिए ही उपलब्ध था। लेकिन अब यह Android यूजर्स के लिए भी रोलआउट कर दिया गया है। WhatsApp (v2.19.9) की जानकारी सबसे पहले WABetaInfo पर दी गई है। जहां पहले ग्रुप कॉल में यूजर्स को एक एक कर लोगों को एड करना होता था। वहीं, इस फीचर के जरिए एक बार में ही ग्रुप कॉल में लोगों को एड किया जा सकेगा। एक व्यक्ति को कॉल लगाने के बाद दूसरे व्यक्ति को कॉल लगाने के लिए ऊपर दायीं तरफ दिए गए आइकन पर क्लिक करना होता था। ऐसे ही चार लोगों को एड करने के लिए चार बार यह प्रक्रिया दोहरानी पड़ती थी। नया ग्रुप कॉल बटन मिलने के बाद ग्रुप वीडियो या वॉयस कॉल करना और आसान हो जाएगा। इसके लिए एक अलग से बटन दिया गया होगा। इस पर टैप करते ही स्लाइड आउट ट्रे खुल जाएगी। यहां आपके सभी कॉन्टेक्ट कार्ड मौजूद होंगे। यहा से आप जिसे भी ग्रुप वॉयस या वीडियो कॉल का हिस्सा बनाना चाहते हैं उनन्हें चुन सकते हैं। इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए आपको WhatsApp एंड्रॉइड का लेटेस्ट स्टेबल वर्जन डाउनलोड करना होगा। इसके लिए गूगल प्ले स्टोर या WhatsApp.com/Android पर जाएं। आपको बता दें कि इस नए अपडेट में GIF के बग्स को भी फिक्स कर दिया गया है।  

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Dakhal News 18 January 2019


 गंगोत्री

संसार तभी आनंद देगा जब इसमें रहने वाला, यहां अपना दैनंदिन जीवन बिताने वाला मनुष्य भावनाओं और संवेदनाओं से भरा होगा। भाव-संवेदना रूपी गंगोत्री के सूख जाने पर व्यक्ति निष्ठुर बनता चला जाता है। आज का सबसे बड़ा दुर्भिक्ष इन्हीं भावनाओं के क्षेत्र का है। जब भी इस संसार में कोई अवतारी चेतना आई है, उसने एक ही कार्य किया- मनुष्य के अंदर से उस गंगोत्री के प्रवाह के अवरोध को हटाना और सृजन-प्रयोजनों में उसे नियोजित करना। कुछ कथानकों द्वारा व दृष्टांतों के माध्यम से इस तथ्य को भलीभांति समझा जा सकता है। देवर्षि नारद एवं वेद व्यास के वार्तालाप के एक तथ्य से स्पष्ट होता है कि मानवीय गरिमा का उदय जब भी होता है, सबसे पहले भावचेतना का जागरण होता है। तभी वह ईश्वर-पुत्र की गरिमामय भूमिका निभा पाता है। चैतन्य जैसे अंतर्दृष्टि-संपन्न् महापुरुष भी शास्त्र-तर्क मीमांसा के युग में इसी चिंतन को दे गए। भाव श्रद्धा के प्रकाश में मनुष्यता, जो कि इस समय में कहीं खो गई है, उसे पुन: पाया जा सकता है। पीतांबरा मीरा जीवनभर करुणा विस्तार का, ममत्व का ही संदेश देती रहीं। जब संकल्प जागता है, तो अशोक जैसा निष्ठुर भी बदल जाता है। अशोक एक मामूली व्यक्ति से अशोक महान बन जाता है। जीसस का जीवन करुणा के जन-जन तक विस्तार का संदेश देता है। दक्षिण अफ्रीका में वकालत सीखने-करने पहुंचे मोहनदास गांधी नामक एक सामान्य शख्स इसी भाव-संवेदना के जागरण के कारण एक घटना मात्र से महात्मा गांधी बन गए और जीवन भर आधी धोती पहनकर एक पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र करने में सक्षम हुए। ठक्कर बापा के जीवन में भी यही क्रांति आई। वस्तुत: अवतारी चेतना जब भी सक्रिय होती है, इसी रूप में व्यक्ति को बेचैन करके उसके अंतर्मन को आमूलचूल बदल डालती है। ये भाव-संवेदना ही है, जो मनुष्य को गहराई से जोड़कर उससे महान कार्य करवा लेती है। पं श्रीराम शर्मा

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Dakhal News 18 January 2019


tv channel

  TRAI के नए नियम का लागू होने में अब बस महज दो दिन बचे हैं और 29 दिसंबर के बाद से आपका टीवी देखने का अनुभव बदलने वाला है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने हाल ही में निर्देश जारी किए हैं जिसके बाद ब्रॉडकास्ट सेक्टर को अपने कंज्यूमर को चैनल सेलेक्ट करने और उसी के पैसे देने का ऑप्शन उपलब्ध कराना होगा। इसके बाद अब खबरें आ रहीं हैं कि ट्राई के इस आदेश के बाद अब टीवी देखना महंगा होगा। हालांकि, वास्तव में यह सब आपके केबल ऑपरेटर्स और डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर पर निर्भर करेगा। फिलहाल डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर भी नई कीमतों के आधार पर अपने पैक्स बनाने में लगे हैं। अब तक यह डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर्स वेबसाइट्स और अपने चैनल्स के माध्यम से लोगों को नए पैक्स की जानकारी दे रहे हैं। हालांकि, वक्त कम बचा है और आम यूजर के मन में सबसे पहला सवाल यह है कि 29 दिसंबर के बाद क्या होगा, क्या उसने जो पैक ले रखा है वही जारी रहेगा या कोई नए पैक्स डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर्स उपलब्ध करवाएंगे। साथ ही इनकी कीमतों को लेकर भी असमंजस बना हुआ है। इसलिए, हम आपको आज स्टार, जी, सोनी व अन्य चैनल ब्रॉडकास्चर्स द्वारा घोषित किए गए चैनल्स के दामों और पैक्स के हिसाब से होने वाले खर्च की जानकारी देने जा रहे हैं। यह तो साफ है कि अब तक आप जो फ्री टू एयर चैनल्स मुफ्त में देख रहे थे अब वो मुफ्त में नहीं मिलेंगे और उसके लिए आपको 130 रुपए चुकाने होंगे जिस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगने वाला है। इसके अलावा हिंदी में देखे जाने वाले ज्यादातर चैनल्स सोनी, जी, स्टार व कलर्स के होते हैं। साथ ही कुछ अन्य भी है जिनके न्यूज चैनल्स देखे जाते हैं। अगर ब्रॉडकास्टर्स द्वारा घोषित किए गए आ ला कार्टे और बैक्वेट चैनल्स की कीमतों पर नजर डालें तो लगता है कि जहां तक अपनी पसंद के चैनल चुनने की बात है तो इसमें कुछ चैनल्स के पैकेज सस्ते हैं वहीं कुछ चैनल्स आ ला कार्टे के माध्यम से चुनना फायदेमंद होगा। हालांकि, डीटूएच सर्विस प्रोवाइडर्स ने इसे लेकर अब तक कोई जानकारी अपने ग्राहकों को उपलब्ध नहीं करवाई है कि उन्हें कैसे अपने पैक अपडेट करवाने होंगे। जैसा कि बताया जा रहा है आपका खर्च बढ़ेगा, यह संभव है लेकिन तब जब वर्तमान के हिसाब से उन चैनल्स को भी सबस्क्राइब करें जिन्हें आप खबी देखते भी नहीं। वहीं ट्राई का नया नियम कहता है कि अब आप वही चैनल्स देखेंगे जो आप चाहते हैं और उन्हीं का पैसा चुकाना होगा। इस आधार पर ब्रॉडकास्टर्स ने अपनी वेबसाइट्स पर बैंक्वेट और आ ला कार्टे के आधार पर चैनल्स की कीमतें दी हैं। बैंक्वेट्स में उन चैनल्स का शामिल किया गया है जो यूजर द्वारा सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। स्टार ने अपने 49 रुपए के पैक में 13 सबसे ज्यादा देखे जाने वाले चैनल्स रखे हैं इनमें मूवी, एंटरटेनमेंट, जनरल नॉलेज और स्पोर्ट्स के सभी चैनल्स मौजूद हैं। हालांकि, अगर आप स्पोर्ट्स के चैनल्स नहीं देखना चाहते तो आपके लिए आ ला कार्टे ठीक रहेगा जिसमें सिर्फ स्टार प्लस, स्टार गोल्ड, स्टार गोल्ड सिलेक्ट, मूवीज ओके, नेशनल जियोग्राफी और नेट जियो वाइल्ड चुनते हैं तो आपको 37 रुपए ही खर्च करने होंगे। वहीं अगर आप इसमें एक भी स्पोर्ट चैनल एड करते हैं तो आपके आ ला कार्टे का खर्च सीधे 54 रुपए हो जाएगा। जी ने भी अपने 24 सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले चैनल्स का पैक पेश किया है और इसकी कीमत 45 रुपए है। जी के चैनल्स के मामले में बैंक्वेट पैक ज्यादा बेहतर नजर आता है क्योंकि 45 रुपए में यूजर को सभी जरूरी चैनल्स मिलते हैं। वहीं अगर वो आ ला कार्टे करता है तो महज 4-5 चैनल्स जिमें जी टीवी, जी सिनेमा, एंड पिक्चर्स, एंड टीवी जैसे चैनल्स के लिए ही 50 रुपए से ज्यादा चुकाने पड़ जाएंगे, ऐसे में न्यूज और स्टेट न्यूज के अलावा एंटरटेनमेंट के अन्य चैनल्स नहीं मिल पाएंगे। सोनी चैनल्स के मामले में भी कंपनी 31 रुपए में बैंक्वेट पैक लॉन्च किया है जिसमें 9 सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले चैनल्स हैं। इस चैनल के मामले में भी बैंक्वेट पैक चुनना ही बेहतर होगा क्योंकि आ ला कार्टे करने में सोनी सब, सोनी चैनल, सेट मैक्स के दाम ही लगभग 50 रुपए हो जाते हैं। वहीं स्पोर्ट्स चैनल्स का खर्च तो अलग ही है। हालांकि, सोनी ने अपने 31 रुपए वाले पैक में स्पोर्ट्स चैनल्स नहीं रखे हैं और इन्हें देखने के लिए 69 रुपए का प्लैटिनम पैक बनाया है जिसमें सभी बड़े चैनल्स शामिल हैं। टाइम्स, जिस्कवरी व अन्य ने मिलकर अपने अलग चैनल पैक्स लॉन्च किए हैं और बड़े ब्रॉडकास्टर्स के मुकाबले इन पैक्स के दाम कम हैं। मसलन डिस्कवरी के 8 चैनल्स महज 8 रुपए मे देख उपलब्ध हैं वहीं डिज्नी के 7 चैनल्स 10 रुपए में। इसके अलावा टाइम्स के 4 चैनल्स 7 रुपए में उपलब्ध होंगे जबकि टर्नर्स के 2 चैनल्स साढ़े चार रुपए में मिलेंगे। वायोकॉम ने भी 20 रुपए में 25 चैनल्स का पैक पेश किया है जिसमें न्यूज, एंटरटेनमेंट, म्यूजिक के अलावा कार्टून चैनल्स भी शामिल हैं हालांकि, आ ला कार्टे में भी इन चैनल्स की कीमत बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन इस मामले में भी वायोकॉम का बैंक्वेट पैक ज्यादा बेहतर नजर आता है। हालांकि, यह पूरा आंकलन चैनल कंपनियों द्वारा दी चैनल्स की कीमतों के आधार पर है। इसके बाद डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर्स की भूमिका भी बेहद अहम है। अगर आपका डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर वर्तमान की ही तरह कोई बजट पैक पेश करता है तो आपका खर्च ज्यादा प्रभावित नहीं होगा।  

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Dakhal News 26 December 2018


पत्रकार खशोगी

खबर इस्तांबुल से । पत्रकार जमाल खशोगी की मौत मामले में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पर संदेह बढ़ता जा रहा है। तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यिप एर्दोगन ने जोर देकर कहा है कि मामले का नंगा सच सामने लाया जाएगा। उनके बयान के बाद तुर्की सरकार समर्थक मीडिया ने सोमवार को नए दावे किए। मीडिया ने पत्रकार की मौत से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस को जोड़ा है। बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सऊदी के बादशाह और क्राउन प्रिंस ने खशोगी के बेटे को सोमवार सवेरे फोन किया और शोक जताया। एर्दोगन ने कहा है कि वह मंगलवार को संसद में खशोगी की गुमशुदगी के बारे में नई जानकारी देंगे। इस्तांबुल में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में दो अक्टूबर को दाखिल होने के बाद पत्रकार की हत्या की गई थी। दो सप्ताह तक मामले पर चुप्पी साधे रहने के बाद सऊदी अरब ने स्वीकार किया कि खशोगी की मौत वाणिज्य दूतावास में हुई, लेकिन सहयोगी और विश्व शक्तियों में शामिल देश उसके बयान को परस्पर विरोधी और संतोषजनक नहीं मान रहे हैं। एर्दोगन के सलाहकार ने रियाद के दावे पर सवाल उठाए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के सलाहकार यासिन अक्ताय ने सोमवार को सरकार समर्थित अखबार में लिखा है, 'कोई भरोसा तो नहीं करेगा, लेकिन हैरत जरूर होगी कि 15 प्रशिक्षित लड़ाकों और 60 साल के अकेले निहत्थे खशोगी के बीच मारपीट कैसे हो सकती है? झगड़े की दलील हड़बड़ी में गढ़ी गई है क्योंकि यह साफ हो चुका है कि घटना की सच्चाई शीघ्र ही सामने आ जाएगी। जितना इसके बारे में सोचा जाए उतना ही यह महसूस होता है कि हमारे गुप्तचरों को मूर्ख बनाया जा रहा है।' तुर्की के अखबारों का क्राउन प्रिंस की ओर इशारा तुर्की के सरकार समर्थक अखबार येनि सफाक ने कहा है कि सऊदी सुरक्षा अधिकारी माहेर अब्दुलअजीज मुर्तेब इस अभियान का कथित लीडर था। उसने क्राउन प्रिंस के कार्यालय के प्रमुख बदर अल-अस्केर को हत्या के बाद चार बार फोन किया था। अखबार की एक हेडिंग में लिखा है, 'क्राउन प्रिंस के गिर्द तंग होता जा रहा घेरा।' हुर्रियत दैनिक में प्रकाशित एक कालम में कहा गया है कि नई जानकारी है। क्राउन प्रिंस को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए और उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए। सऊदी के हत्यारा दस्ते ने खशोगी को बांध दिया। इस काम में सिर्फ आठ मिनट लगे और फिर सऊदी फोरेंसिक विभाग में लेफ्टिनेंट कर्नल सलाह मुहम्मद अल-तुबैग्य ने शव के 15 टुकड़े किए। हत्या के बाद 'बॉडी डबल' को सऊदी ने बुलाया लिया निगरानी कैमरे एक वीडियो में एक आदमी को सऊदी वाणिज्य दूतावास से जमाल खशोगी के कपड़ों में बाहर आते देखा गया है। यह आदमी पत्रकार की हत्या के बाद बाहर आया था। सीएनएन ने सोमवार को निगरानी फुटेज जारी किया है। तुर्की के अधिकारियों ने इस आदमी को 'बॉडी डबल' कहा है। यह भी पत्रकार की हत्या करने के लिए भेजी गई सऊदी टीम का सदस्य था। पिछले दरवाजे से निकल कर इस आदमी ने टैक्सी ली अैर इस्तांबुल के मशहूर सुल्तान अहमद मस्जिद तक पहुंचा। वहां एक सार्वजनिक शौचालय में गया। अपने कपड़े बदलने के बाद वह वहां से रवाना हो गया। खशोगी की हत्या के बाद सऊदी अधिकारियों ने शुरू में कहा था कि वह वाणिज्य दूतावास से बाहर आ गए थे। यह सऊदी टीम की योजना के अनुसार कहा गया। बाद में तुर्की के अधिकारियों और मीडिया की जांच के बाद दावा बदल गया।  

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Dakhal News 23 October 2018


पेड़ न्यूज़

  पेड न्यूज को लेकर चुनाव आयोग अभी से काफी सतर्कता बरत रहा है। 2013 के विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक 37 पेड न्यूज के मामले बालाघाट में सामने आए थे। कुल 486 शिकायतें हुई थीं, जिनमें 172 को सही पाते हुए खर्च उम्मीदवारों के खाते में जोड़ा गया। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव ने सभी कलेक्टर और रिटर्निंग ऑफिसरों को पेड न्यूज के मामले में सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने बताया कि पिछले विधानसभा चुनाव में 486 पेड न्यूज की शिकायतें सामने आई थीं। जिला स्तरीय समिति ने 237 मामलों को पेड न्यूज मानकर प्रकरण पंजीबद्ध कर उम्मीदवरों को नोटिस थमाए थे। 17 मामलों में उम्मीदवारों ने पेड न्यूज को स्वीकार करते हुए खर्च खाते में शामिल करने की सहमति दी थी। वहीं, अपील आदि प्रक्रिया के बाद 155 मामलों को भी पेड न्यूज माना गया और खर्च निर्वाचन व्यय में जोड़ा गया। बालाघाट के बाद उज्जैन में 30, नीमच 18, रीवा 14, खंडवा 13, ग्वालियर 11, इंदौर 8, छतरपुर और कटनी में 6-6 और सतना में चार प्रकरण पेड न्यूज के बने थे। सत्तारूढ़ होने के बावजूद चुनाव के दौरान शिकायत करने में कांग्रेस से आगे भाजपा है। चुनाव आयोग के राष्ट्रीय पोर्टल पर भाजपा ने 46 शिकायतें दर्ज कराई हैं तो कांग्रेस 15 तक ही पहुंच सकी। पोर्टल पर कुल 781 शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से 507 का निराकरण हो चुका है और 274 लंबित हैं। वहीं, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय में शिकायत देने की बात की जाए तो कांग्रेस बहुत आगे है। यहां कांग्रेस ने आचार संहिता लागू होने के बाद से अब तक 27 शिकायतें दी हैं तो भाजपा की ओर से मात्र आठ शिकायत ही की गईं। आम आदमी और समाजवादी पार्टी की ओर से एक-एक शिकायत दर्ज कराई गई हैं। बाकी 10 शिकायतें अन्य व्यक्तियों की ओर से की गई हैं।  

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Dakhal News 23 October 2018


narottm mishra

शहरी महिलाओं के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं से सतत संवाद और उनके बौद्धिक स्तर में वृद्धि के प्रयास करना जरूरी है। यह कार्य शासकीय और अशासकीय संस्थाओं को मिलकर करना होगा। जनसम्पर्क, जल-संसाधन एवं संसदीय कार्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र ने वूमन प्रेस क्लब द्वारा आयोजित जन-संवाद कार्यक्रम में यह बात कही। इस अवसर पर महिला बाल विकास मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस भी उपस्थित थीं। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने महिला कल्याण, सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका आदि मुद्दों पर सवाल पूछे, जिनके उन्हें समाधान कारक जवाब मिले। डॉ. मिश्र विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं और प्रश्नों के सटीक उत्तर दिये। कार्यक्रम में पत्रकारिता के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस अवसर पर कुलपति  जगदीश उपासने भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी से संबंधित प्रीति त्रिपाठी निर्देशित फ़िल्म के अंश भी दिखाये गये।

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Dakhal News 3 October 2018


krishak jagat

  एमपी के जनसम्पर्क, जल संसाधन और संसदीय कार्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र ने आज भोपाल में  साप्ताहिक समाचार पत्र कृषक जगत के मध्यप्रदेश के विकास पर केन्द्रित विशेषांक का विमोचन किया। विशेषांक में कृषि और सिंचाई के माध्यम से प्रदेश में आई समृद्धि का ब्यौरा सफलता कहानियों के साथ प्रकाशित किया गया है। विशेषांक विमोचन अवसर पर अखबार के संपादक  सुनील गंगराड़े और श्रीमती साधना गंगराड़े मौजूद थे।  

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Dakhal News 29 September 2018


बिग बॉस TRP में छठवें नंबर पर ,नागिन नंबर वन

भारत में टेलिविजन का क्रेज किसी से छिपा नहीं है। यहां फिल्मों से ज्यादा टीवी सीरियल्स को महत्व दिया जाता है। बार्क द्वारा जारी 38वें हफ्ते की टीआरपी रेटिंग्स में भी यह बात दिखाई दे रही है। इस बार की रेटिंग में काफी उलटफेर भी देखने को मिले हैं। हालांकि इस बार सभी की निगाहें सलमान खान द्वारा होस्ट बिग बॉस की रेटिंग पर थीं। इस सप्ताह बार्क की लिस्ट में इस शो को 6वां स्थान मिला है। जबकि, डांस दीवाने रियलिटी शो, एकता कपूर का नागिन 3 अभी भी टॉप 5 की लिस्ट में जमें हुए हैं। सबसे बड़ा झटका टीवी सीरियल 'ये हैं मोहब्बतें' को लगा है जो टॉप  पिछले हफ्ते की तरह इस हफ्ते भी 'नागिन 3' सबसे ज्यादा प्वाइंट्स के साथ पहले पायदान पर बना हुआ है। इसके दर्शकों की संख्या 10 मिलियन से भी उपर है। माधुरी दीक्षित के डांस रियलिटी शो 'डांस दीवाने' बार्क की लिस्ट में दूसरे नंबर पर काबिज है। यह शो पूरे समय टॉप 10 में जमा रहा। इस बार इसे 7 मिलियन दर्शक मिलें। टीवी सीरियल 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर है। चौथा और पांचवां नंबर 'कुंडली भाग्य' और 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' को मिला। मशहूर रियलिटी शो बिग बॉस को 6वां स्थान मिला। कुमकुम भाग्य को इस हफ्ते रेटिंग में नुकसान का सामना करना पड़ा। यह टॉप 5 से बाहर होकर इस बार 7वें नंबर पर आ गई। इस हफ्ते जारी रेटिंग्स के अनुसार कलर्स, स्टार प्लस, सोनी इंटरटेनमेंट, जी टीवी और सब टीवी टॉप 5 में शामिल हैं  

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Dakhal News 27 September 2018


surendr patwa

  मध्यप्रदेश पर्यटन को एक बार फिर मिले 10 नेशनल अवार्ड  पिछले साल भी मिले थे 10 नेशनल अवार्ड मध्यप्रदेश पर्यटन को एक बार फिर से लगातार दूसरे साल नेशनल आवर्डस से नवाजे जाने का सुअवसर हासिल हुआ है। पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा आज नई दिल्ली में घोषित नेशनल अवार्डस में मध्यप्रदेश पर्यटन को 10 अवार्ड प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त लगातार तीन साल से बेस्ट टूरिज्म स्टेट के रूप में हॉल ऑफ फेम का नेशनल अवार्ड भी दूसरे साल भी प्रभावशील है। यह अवार्ड लगातार तीन साल तक प्रभावी रहेगा। अवसर था; विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित गरिमापूर्ण समारोह का। समारोह में केन्द्रीय पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री के.जे. अल्फोन्स ने यह अवार्ड प्रदान किये। मध्यप्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री सुरेन्द्र पटवा, पर्यटन निगम के अध्यक्ष श्री तपन भौमिक, प्रमुख सचिव, पर्यटन एवं टूरिज्म बोर्ड के एमडी श्री हरि रंजन राव, पर्यटन निगम के एमडी श्री टी इलैया राजा एवं टूरिज्म बोर्ड की अपर प्रबंध संचालक श्रीमती भावना वालिम्बे आदि मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा विश्व पर्यटन दिवस पर घोषित अवार्डस में मध्यप्रदेश को एक्सीलेन्स एन पब्लिसिंग इन फॉरेन लेंगवेज अदर देन इंगलिश के लिए विदेशी भाषा जर्मनी में रूचिकर कॉर्पोरेट ब्रोशर के प्रकाशन, बेस्ट हेरीटेज वॉक का इन्दौर शहर को, बेस्ट हेरीटेज सिटी का सिटी ऑफ जॉय माण्डू को, बेस्ट एडवेंचर स्टेट का मध्यप्रदेश और उत्तराखण्ड को संयुक्त रूप से, एक्सीलेन्स एन पब्लिसिंग इन इंगलिश लेंगवेज में कॉफी टेबल बुक कान्हा टाईगर रिर्जव को स्वच्छता का नेशनल अवार्ड इन्दौर को, बेस्ट सिविक मैनेजमेंट का ओंकारेश्वर को, बेस्ट वाइल्ड लाइफ गाइड का पन्ना नेशनल पार्क के गाइड श्री राशिका प्रसाद को, वेस्ट एयरपोर्ट के रूप में देवी अहिल्या बाई होलकर एयरपोर्ट इन्दौर को और बेस्ट हेरीटेज प्रोपर्टी का देवबाघ ग्वालियर को नेश्नल अवार्ड मिला है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री सुरेन्द्र पटवा सहित पर्यटन निगम के अध्यक्ष श्री तपन भौमिक ने इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को मध्यप्रदेश के लिए गौरव का विषय बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने पर्यटन की संपूर्ण टीम संबंधित विभाग और संस्थाओं को इस उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए इसी तरह आगे भी टीम भावना से कार्य करने और इस गौरव को बरकरार रखने की अपेक्षा की है।    

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Dakhal News 27 September 2018


anadi tv

   जनसम्पर्क, जल-संसाधन एवं संसदीय कार्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र ने आज टीवी चैनल अनादि के कार्यालय जाकर संपादकीय टीम से भेंट की। डॉ. मिश्र ने टीवी न्यूज रूम, एडीटिंग रूम की कार्य पद्धति की जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर चैनल के एडीटर इन चीफ श्री श्रीराम तिवारी, एडीटर श्री राकेश अग्निहोत्री सहित टीवी जर्नलिस्ट, एंकर्स और प्रोडक्शन से जुड़े अमले से परिचय प्राप्त किया। जनसम्पर्क मंत्री ने विभिन्न मुददों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए। चैनल द्वारा जनसम्पर्क मंत्री डॉ. मिश्र की विजिट का सजीव प्रसारण किया गया। डॉ. मिश्र को चैनल क ओर से भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्मृति स्वरूप भेंट की गई।  

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Dakhal News 17 September 2018


पत्रकारों के होम लोन पर पांच फीसदी ब्याज सरकार देगी

  पत्रकारों के कैमरे क्षतिग्रस्त होने पर मिलेगी 50 हजार की अार्थिक सहायता एमपी के मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में  हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में मध्यप्रदेश के अधिमान्यता प्राप्त श्रमजीवी पत्रकारों की मृत्यु होने पर उनके आश्रित पत्नि और नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता देने की अधिकतम सीमा राशि एक लाख को बढ़ाकर 4 लाख रूपये करने का निर्णय लिया गया। इसी प्रकार प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकारों/कैमरामैनों के वाहन/कैमरा आदि क्षतिग्रस्त होने पर पत्रकार कल्याण कोष से सहायता राश