अक्षय फलदायी है अक्षय तृतीया
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अक्षय तृतीया (3 मई) पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

हिन्दू पंचांग के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में मांगलिक कार्यों के लिए यह दिन बेहद शुभ माना गया है। विभिन्न शास्त्रों के अनुसार इस दिन हवन, जप, दान, स्वाध्याय, तर्पण इत्यादि जो भी कर्म किए जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं। मान्यता है कि द्वापर युग इसी तिथि को समाप्त हुआ था जबकि त्रेता, सतयुग और कलियुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ था, इसीलिए इसे कृतयुगादि तृतीया भी कहा जाता है।

भारत में कई स्थानों पर अक्षय तृतीया को ‘आखा तीज’ के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि की अधिष्ठात्री देवी पार्वती मानी गई हैं और इस दिन मां लक्ष्मी की भी विधिवत पूजा की जाती है। भगवान शिव-मां पार्वती तथा भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से इनकी कृपा बरसती है, समृद्धि आती है, जीवन धन-धन्य से भरपूर होता है और संतान भी अक्षय बनी रहती है।

अक्षय तृतीया पर अबूझ मुहूर्त के साथ इस बार खरीदारी के लिए तीन राजयोग भी बन रहे हैं। मान्यता है कि यदि अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है और धर्म के जानकारों के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व पर इस बार रोहिणी नक्षत्र के कारण मंगल रोहिणी योग बन रहा है, जो तैतिल करण और वृषभ राशि के चंद्रमा के साथ आ रहा है और यह शोभन योग अक्षय तृतीया को शुभ बना रहा है। 30 साल पश्चात् अक्षय तृतीया पर बनने वाला शुभ योग इस वर्ष इस दिन का महत्व बढ़ा रहा है और 50 वर्षों के बाद ग्रहों के विशेष योग से भी अद्भुत संयोग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 50 वर्ष लंबे अंतराल के बाद ऐसा संयोग बनेगा, जब दो ग्रह उच्च राशि में और दो प्रमुख ग्रह स्वराशि में स्थित होंगे। इन ग्रहों की युति से बने अद्भुत योग में दान करना बहुत पुण्य का कार्य होगा। इस दिन चार ग्रहों का अनुकूल स्थिति में होना अक्षय तृतीया पर्व को इस बार और भी खास बना रहा है। वैसे यह भी माना जाता है कि अक्षय तृतीया यदि रविवार के दिन हो तो वह सर्वाधिक शुभ तथा पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है।

मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन माता पार्वती ने अमोघ फल देने की सामर्थ्य का आशीर्वाद दिया था, जिसके प्रभाव से अक्षय तृतीया के दिन किया गया कोई भी कार्य निष्फल नहीं होता। अक्षय तृतीया के दिन स्वयं सिद्ध योग होते हैं और इस दिन बिना मुहूर्त निकलवाए कोई भी शुभ कार्य सम्पन्न किया जा सकता है, इसीलिए लोग बिना पंचांग देखे अक्षय तृतीया के दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार, धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, घर, भूखंड या नए वाहन आदि की खरीदारी इत्यादि विभिन्न शुभ कार्य करते हैं। पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान, दान, जप, स्वाध्याय इत्यादि करना शुभ फलदायी होता है।

सतयुग, द्वापर युग और त्रेता युग के प्रारंभ की गणना भी इसी दिन से होती है और भगवान विष्णु के चरणों से गंगा भी इसी दिन धरती पर अवतरित हुई थी। अक्षय तृतीया को वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभ का दिन भी माना जाता है। इस पर्व को लेकर लोक धारणा है कि इस तिथि को यदि चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल अच्छी होगी लेकिन यदि रोहिणी पीछे होगी तो फसल अच्छी नहीं होगी।

कहा जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन खरीदी गई वस्तुएं लंबे समय तक चलती हैं और शुभ फल देती हैं। वैसे इस दिन सोना-चांदी खरीदना बहुत शुभ माना जाता है लेकिन सोना-चांदी खरीदने में असमर्थ हों तो कुछ सस्ती चीजें भी खरीदी जा सकती हैं, जिन्हें खरीदने से घर में सुख-समृद्धि आती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि इस दिन प्राप्त धन-सम्पत्ति एवं पुण्य फल अक्षय रहते हैं और खरीदी गई चीजें मां लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की कृपा दिलाती हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन दान-पुण्य करने वाला व्यक्ति सूर्य लोक जाता है और अक्षय तृतीया के दिन उपवास करने वाला व्यक्ति रिद्धि-सिद्धि और श्री से सम्पन्न हो जाता है।

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Dakhal News 3 May 2022

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