दखल क्यों


bhopal, Pseudo environmental movement becoming an obstacle

प्रमोद भार्गव विकास संबंधी परियोजनाओं के लिए कथित पर्यावरण संरक्षण संबंधी आंदोलन बाधा बनते रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी हैं। परियोजनाओं का विरोध स्वयंसेवी संगठन करें या पर्यावरणविद् यह तब शुरू होता है, जब जमीन पर इनका क्रियान्वयन शुरू होने लगता है। साफ है, ऐसे विरोधों की मंशा राष्ट्रहित में होने की बजाय उन देश और संस्थाओं के हित में होती है, जो भारत को शक्ति-संपन्न देश बनने देना नहीं चाहते हैं। दिल्ली मेट्रो आधुनिक विकास का ऐसा अनूठा उदाहरण है, जो जनता के लिए सुविधाजनक भी रही और पर्यावरण का संरक्षण भी। करीब 20 साल पहले शुरू हुई इस परियोजना में अबतक 311 किलोमीटर के विस्तार में 274 स्टेशन बन चुके हैं। इस हेतु बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए लेकिन पांच गुना अधिक पेड़ लगाए भी गए। इससे तय होता है कि विकास पर्यावरण का शत्रु नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने कुडनकुलम परमाणु विद्युत परियोजना का विरोध करने वाले लोगों पर आरोप लगाया था कि इन आंदोलनकारियों के पीछे जो एनजीओ हैं, उन्हें अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से आर्थिक मदद मिल रही है और वे इस राशि का उपयोग देशहित में नहीं कर रहे हैं। तमिलनाडू के कुडनकुलम परमाणु विद्युत संयंत्र को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हरी झण्डी मिलने के बाद ही तय हो गया था कि अन्य परमाणु बिजली घर लगाए जाने का सिलसिला तेज हो जाएगा। हालांकि कुडनकुलम परियोजना रूस के सहयोग से लगाई गई है। इसकी खासियत है कि यह परियोजना अमेरिकी कंपनियों की तुलना में सस्ती है। इसी तरह मध्य-प्रदेश में मण्डला और शिवपुरी जिलों में परमाणु विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। शिवपुरी में अभी भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू नहीं हुई है लेकिन मण्डला जिले में लगने वाली चुटका परमाणु परियोजना की कार्रवाई जबरदस्त जन-विरोध के बावजूद प्रदेश सरकार कछुआ गति से आगे बढ़ा रही है। हालांकि चुटका के लोग नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत चार गुना मुआवजा मिलने के लालच में परियोजना के समर्थन में हैं। लेकिन वामपंथी संगठन और एनजीओ इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यहां के बहुसंख्यक गौड़ जनजाति के आदिवासी इस परियोजना के खिलाफ हैं। यदि परमाणु संयंत्र स्थापित होता है तो मण्डला जिले के 54 गांवों की करीब सवा लाख आबादी को विस्थापित होना पड़ेगा। जबकि कुल 165 गांवों के लोग प्रभावित होंगे। यह परियोजना नर्मदा नदी के किनारे लगाई जा रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में मंडला जिले के चुटका में परमाणु बिजलीघर लगाने की मंजूरी प्रदान की थी। 20 हजार करोड़ की इस परियोजना के तहत सात-सात सौ मैगावाट की दो इकाइयां लगनी हैं। इसके लिए चुटका, टाटीघाट, कुंडा और मानेगांव की लगभग 497 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसमें 288 हेक्टेयर जमीन निजी खातेदारों की और 209 हेक्टेयर जमीन राज्य सरकार के वन विभाग और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की है। राज्य सरकार ने जन सुनवाई के जरिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन विरोध के चलते बाधाएं पीछा नहीं छोड़ रही हैं। एनजीओ के विरोध के चलते ही भारत से पास्को, लवासा, वेदांता जैसी कंपनियां अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर लौट गई हैं। इससे जहां अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई वहीं इन परियोजनाओं के तहत जो रोजगार मिलने थे, वे भी नहीं मिल पाए। गाहे-बगाहे मेधा पाटकर और अरुधंती राय जैसे स्वयंसेवी भी इन योजनाओं में बाधा बनकर आड़े आ जाते हैं। नर्मदा सागर परियोजना को भी इन्होंने लंबे समय तक प्रभावित किया था। जबकि आधुनिक अथवा नवीन स्वयंसेवी संगठनों को सरकार की जटिल शासन प्रणाली के ठोस विकल्प के रूप में देखा गया था। उनसे उम्मीद थी कि वे एक उदार और सरल कार्यप्रणाली के रूप में सामने आएंगे। चूंकि सरकार के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि वह हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में विकास संबंधी कार्यक्रमों में आम लोगों की सहभागिता की अपेक्षा की जाने लगी और उनके स्थानीयता से जुड़े महत्व व ज्ञान परंपरा को भी स्वीकारा जाने लगा। वैसे भी सरकार और संगठन दोनों के लक्ष्य मानव के सामुदायिक सरोकारों से जुड़े हैं। समावेशी विकास की अवधारणा भी खासतौर से स्वैच्छिक संगठनों के मूल में अतर्निहित है। बावजूद प्रशासनिक तंत्र की भूमिका कायदे-कानूनों की संहिताओं से बंधी है। लिहाजा उनके लिए मर्यादा का उल्लंघन आसान नहीं होता। जबकि स्वैच्छिक संगठन किसी आचार संहिता के पालन की बाध्यता से स्वतंत्र हैं। इसलिए वे धर्म, सामाजिक कार्याे और विकास परियोनाओं के अलावा समाज के भीतर मथ रहे उन ज्वलंत मुद्दों को भी हवा देने लग जाते हैं, जो उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं और तथाकथित परियोजनाओं के संभावित खतरों से जुड़े होते हैं। कुडनकुलम और चुटका परमाणु परियोजनाओं के विरोध में लगे जिन विदेशी सहायता प्राप्त संगठनों पर सवाल खड़े किये गये थे, वे इस परियोजना के परमाणु विकिरण संबंधी खतरों की नब्ज को सहलाकर ही अमेरिकी हित साधने में लगे थे। जिससे रूस के रिएक्टरों की बजाय अमेरिकी रिएक्टरों की खरीद भारत में हो। ऐसे छद्म संगठनों की पूरी एक श्रृंखला है, जिन्हें समर्थक संस्थाओं के रूप में देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों ने शह दी। चूंकि इन संगठनों की स्थापना के पीछे एक सुनियोजित प्रचछन्न मंशा थी, इसलिए इन्होंने कार्पाेरेट एजेंट की भूमिका निर्वहन में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि आलिखित अनुबंध को मैदान में क्रियान्वित किया। गैर सरकारी संगठनों का जो मौजूदा स्वरूप है, वह देशी अथवा विदेशी सहायता नियमन अधिनियम के चलते राजनीति से जुड़े दल विदेशी आर्थिक मदद नहीं ले सकते हैं। लेकिन स्वैच्छिक संगठनों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं है। इसलिए खासतौर से पश्चिमी देश अपने प्रच्छन्न मंसूबे साधने के लिए उदारता से भारतीय एनजीओ को अनुदान देने में लगे हैं। ब्रिटेन, इटली, नीदरलैण्ड, स्विटजरलैण्ड, कनाड़ा, स्पेन, स्वीडन, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, फिनलैण्ड और नार्वे जैसे देश दान दाताओं में शामिल हैं। आठवें दशक में इन संगठनों को समर्थ व आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का काम काउंसिल फाॅर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन (कपार्ट) ने भी किया। कपार्ट ने ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार, महिला कल्याण, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा साक्षरता, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, एड्स और कन्या भ्रूण हत्या के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए संगठनों को दान में धन देने के द्वार खोल दिए। भूमण्डलीय परिप्रेक्ष्य में नव उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आगमन का सिलसिला परवान चढ़ने के बाद तो जैसे एनजीओ के दोनों हाथों में लड्डू आ गए। खासतौर से दवा कंपनियों ने इन्हें काल्पनिक महामारियों को हवा देने का जरिया बनाया। एड्स, एंथ्रेक्स और वल्र्ड फ्लू की भयवहता का वातावरण रचकर एनजीओ ने ही अरबों-खरबों की दवाएं और इनसे बचाव के नजरिए से ‘निरोध’ (कण्डोम) जैसे उपायों के लिए बाजार और उपभोक्ता तैयार करने में उल्लेखनीय किंतु छद्म भूमिका का निर्वहन किया। चूंकि ये संगठन विदेशी कंपनियों के लिए बाजार तैयार कर रहे थे, इसलिए इनके महत्व को सामाजिक ‘गरिमा’ प्रदान करने की चालाक प्रवृत्ति के चलते संगठनों के मुखियाओं को न केवल विदेश यात्राओं के अवसर देने का सिलसिला शुरू हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता देते हुए इन्हें राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित विश्व सम्मेलनों व परिचर्चाओं में भागीदारी के लिए आमंत्रित भी किया जाने लगा। इन सौगातों के चलते इन संगठनों का अर्थ और भूमिका दोनों बदल गए। जो सामाजिक संगठन लोगों द्वारा अवैतनिक कार्य करने और आर्थिक बदहाली के पर्याय हुआ करते थे, वे वातानुकूलित दफ्तरों और लग्जरी वाहनों के आदी हो गए। इन संगठनों के संचालकों की वैभवपूर्ण जीवन शैली में अवतरण के बाद उच्च शिक्षितों, चिकित्सकों, इंजीनियरों, प्रबंधकों व अन्य पेशेवर लोग इनसे जुड़ने लगे। देखते-देखते दो दशक के भीतर ये संगठन सरकार के समानांतर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हो गए। बल्कि विदेशी धन और संरक्षण मिलने के कारण ये न केवल सरकार के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं, अलबत्ता आंख दिखाने का काम भी कर रहे हैं। भारत में स्वैच्छिक भाव से दीन-हीन मानवों की सेवा सनातन परंपरा रही है। वैसे भी परोपकार और जरूरतमंदों की सहायता भारतीय दर्शन और संस्कृति का अविभाज्य हिस्सा है। पाप और पुण्य के प्रतिफलों को भी इन्हीं सेवा कार्याें से जोड़कर देखा जाता है। किंतु स्वैच्छिक संगठनों को देशी-विदेशी धन के दान ने इनकी आर्थिक निर्भरता को दूषित तो किया ही, इनकी कार्यप्रणाली को भी अपारदर्शी बनाया है। इसलिए ये विकारग्रस्त तो हुए ही अपने बुनियादी उद्देश्यों से भी भटक गए। कुडनकुलम में जिन संगठनों पर कानूनी शिकंजा कसा गया था, उन्हें धन तो विकलांगों की मदद और कुष्ठ रोग उन्मूलन के लिए मिला था, लेकिन इसका दुरूपयोग वे परियोजना के खिलाफ लोगों को उकसाने में कर रहे थे। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के न्यास ने विकलांगों के कल्याण हेतु जो धन भारत सरकार से लिया, उसका मंत्री जैसे दायित्व को संभाले हुए भी ठीक से सदुपयोग नहीं किया। हमारे देश में प्रत्येक 40 लोगों के समूह पर एक स्वयंसेवी संगठन है, इनमें से हर चौथा संगठन धोखाधड़ी के दायरे में हैं। नरेंद्र मोदी सरकार जब केंद्र में आई तो उसने इन एनजीओ के बही-खातों में दर्ज लेखे-जोखे की पड़ताल शुरू कर दी। ज्यादातर एनजीओ के पास दस्तावेजों का उचित संधारण ही नहीं पाया गया। लिहाजा, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन काम करने वाले कपार्ट ने 1500 से ज्यादा एनजीओ की आर्थिक मदद पर प्रतिबंध लगा दिया और 833 संगठनों को काली सूची में डाल दिया है। इनके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक न्याय मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों द्वारा काली सूची में डाले गये एनजीओ अलग से हैं। भू-मण्डलीकरण के पहले 1990 तक हमारे यहां केवल 50 हजार एनजीओ थे जबकि 2012 में इनकी संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो गई। इन संगठनों को देश के साथ विदेशी आर्थिक सहायता भी खूब मिल रही थी। 2009-10 में 14 हजार संगठनों को विदेशी धन दिया गया। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इन छद्म संगठनों पर गंभीर नजर रखी जाए और यदि ये अपने उद्देश्य से भटकते हैं तो इन पर कानूनी शिकंजा कसा जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 February 2020


bhopal, Pathik ji, the first founder of Kisan Revolution

डाॅ. राकेश राणा विजय सिंह पथिक भारतीय राजनैतिक परिदृश्य पर ऐसा नेतृत्व हैं, जिन्होंने समाज के साथ मिलकर सफल सत्याग्रह की शैली ईजाद की। होली के दूसरे दिन दुल्हेंडी 27 फरवरी, 1884 को जन्में भूपसिंह ही विजय सिंह पथिक बने। उनके पिता व माता दोनों के परिवारों की 1857 की क्रांति में सक्रिय भागीदारी थी। पथिक इन्दौर में 1905 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी देशभक्त शचीन्द्र सान्याल के सम्पर्क में आये। उन्होंने पथिक जी को रासबिहारी बोस से मिलाया। क्रांतिकारियों के इस समूह में पथिक जी कई महत्वपूर्ण कार्रवाहियों का हिस्सा रहे। 1912 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाया तो क्रांतिकारियों ने उद्घाटन समारोह में वायसराय के जुलूस पर चांदनी चौक में बम फेंका। इस कर्यवाही में पथिक जी शामिल थे। 1914 में रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल ने सम्पूर्ण भारत में एकसाथ सशस्त्र क्रांति के लिए ’अभिनव भारत समिति’ नाम का संगठन बनाया। पथिक जी को इस काम के लिए राजस्थान का जिम्मा सौंपा गया। अजमेर से प्रमुख समाचार पत्रों का सम्पादन और प्रकाशन प्रारम्भ किया। बिजौलिया का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन, बेगू किसान आन्दोलन, सिरोही का भील आन्दोलन, बरार किसान आन्दोलन ये सब बड़े किसान आन्दोलन पथिक जी के नेतृत्व में खड़े हुए। राजस्थान के स्वतंत्रता आन्दोलन का विस्तार कर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक ले गये। उस दौर के बड़े नेता गांधी और तिलक थे, उनतक राजस्थान के स्वतंत्रता संघर्ष की पूरी योजना और परिणामों को पहुंचाया। ऐनी हडसन के जरिये ब्रिटेन के हाउस ऑफ काॅमन में राजस्थान स्वतंत्रता संघर्ष की आवाज उठायी। रियासतों के दमन और शोषण को समझाने वाली विशाल प्रदर्शनी अधिवेशन स्थलों पर आयोजित की। यह सब पथिक जी की दूरदृष्टि और नेतृत्व शैली को समझने के लिए पर्याप्त है। 1920 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। इसके माध्यम से सत्याग्रह के प्रयोग शुरू किए। बाद में संघ की गतिविधियों का केन्द्र अजमेर बना। देशभक्त युवाओं को खोज-खोजकर आन्दोलन में शामिल किया। माणिक्य लाल वर्मा, राम नारायण चौधरी, हरिभाई किंकर, नैनूराम शर्मा और मदनसिंह करौला जैसे देशभक्त और आजाद भारत के बड़े नेता पथिक जी के राजस्थान सेवा संघ की ही देन हैं।1929 में पथिक जी राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। पथिक जी की कार्यशैली और नेतृत्व शैली दोनों अद्भुत है। दोनों के केन्द्र में सत्याग्रह की पद्धति है। उनके कार्यक्रम और प्रबंधन का जो अनूठापन और परिणाम देने वाला है वह सत्याग्रह ही है। लगान के सम्बन्ध में, ठिकाने के अत्याचारों के सम्बन्ध में, किसानों की बहादुरी के सम्बन्ध में, गीत और भजन के द्वारा किसानों में गांव-गांव आन्दोलन का प्रचार करना, सबकुछ सत्याग्रह को साक्षी मानकर ही किया। पथिक जी ने सम्मिलित हस्ताक्षरों से राज्य को किसानों के अभाव अभियोगों के लिए आवेदन देना बन्द करवा दिया। केवल पंचायत के सरपंच के नाम से ही लिखा-पढ़ी की जाने लगी। चेतावनी दी गई कि अब किसान अनुचित लागतें और बेगारें नहीं देंगे। पंचायत ने यह निश्चय किया है कि यदि ठिकाना इन्हें समाप्त नहीं करेगा तो पंचायत उन्हें अन्य टैक्स भी नहीं देगी। राज्य ने अपने कर्मचारियों और ठिकाने के पक्ष में आदेश दिया कि सरपंच या पंचायत के नाम से किसी अर्जी या आवेदन पर कोई कार्यवाही न हो अर्थात राज्य ने पंचायत के अस्तित्व को मानने से इनकार कर दिया। विजय सिंह पथिक ने किसानों को समझाया कि कोई किसान व्यक्तिगत रूप से या सम्मिलित हस्ताक्षर करके आवेदन न दे। सभी किसानों की ओर से बोलने का अधिकार एकमात्र पंचायत को ही होगा। उनके इस आह्वान से सम्पूर्ण राजस्थान सत्याग्रह की गूंज से जागृत हो उठा। पथिकजी के आह्वान पर बिजोलिया के किसानों ने युद्ध का चन्दा देने से इन्कार कर दिया। प्रेमचन्द भील भजन गा-गाकर किसानों को सत्याग्रह के लिए प्रेरित करते रहे। पथिकजी ने गणेश शंकर विद्यार्थी को पत्र लिखा कि वे बिजोलिया में किसान सत्याग्रह चला रहे हैं, उनके प्रसिद्ध पत्र प्रताप की सहायता की आन्दोलन को अत्यन्त आवश्यकता है। साथ ही बिजोलिया के किसानों की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी को राखी भेजी गई। पत्र मिलते ही गणेश शंकर विद्यार्थी का जवाब आया कि बिजोलिया आन्दोलन के लिए प्रताप के पृष्ठ सदैव खुले हैं। आप अपने सत्याग्रह पथ पर चलते रहिए। यह सत्याग्रह की शैली का ही प्रभाव था कि देखते ही देखते राजस्थान का स्वतंत्रता संघर्ष पूरे देश में पहचाना जाने लगा। विजयसिंह पथिक सत्याग्रह पथ पर अडिग रहे और आजादी के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे। 29 मई, 1954 को जब उनका देहान्त हुआ, तब भी पथिक जी एक समरस, शान्तिपूर्ण और सुन्दर समाज के निर्माण में जुटे थे। एक नया अखबार शुरू करने की योजना बना रहे थे। पथिक जी जीवन भर सामंतवाद, जातिवाद, पूंजीवाद, सम्प्रदायवाद, धर्मांधतता, सामाजिक कुप्रथाओं, शोषण, दमन और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करते रहे। पथिक जी जहां देश, समाज और राष्ट्र के बड़े सवालों को लेकर चिंतनशील थे, वही बेरोजगारी, पर्यावरण विनाश, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे सामाजिक महत्व के मुद्दों पर अपने अखबारों के जरिए बराबर लिख रहे थे। इसीलिए देश का पहला सत्याग्रही विजयसिंह पथिक हैं। सत्याग्रह की शक्ति ने स्वतंत्रता संघर्ष को सामाजिक महत्व के जनान्दोलन में बदलने का बड़ा काम किया। पूरे स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रह एक शक्तिशाली हथियार की तरह उपयोग में आया। वास्तव में भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानी सत्याग्रह की ही कहानी है। आज भी न इसका महत्व कम हुआ है और न ही इसकी प्रासंगिकता कम हुई है। जैसे-जैसे दुनिया में अन्याय, शोषण और अत्याचार बढ़ेगा, सत्याग्रह के लिए आग्रह और तीव्र होंगे। इस जादुई हथियार को समझने के लिए पथिक साहित्य/शोधकार्य/इतिहास सामग्री/संस्मरण और उनके जीवनानुभवों तथा सामाजिक कार्यों को समझना आवश्यक है। उनके द्वारा प्रकाशित छः प्रमुख समाचार-पत्रों में राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, राजस्थान संदेश, नव-संदेश और उपरमाल को डंको है। पथिक जी ने पत्रकारिता को सत्याग्रह का शस्त्र बनाया और समाज व राष्ट्र को संघर्ष सिखाया। एक सफल सत्याग्रह राष्ट्रीय चेतना में कैसे प्रस्फुटित होता है और समाज को बदलाव के लिए खड़ा करता है, यह पथिक के प्रयोगों से ही सीखा जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 February 2020


bhopal,  Trump increased the value of Hindi

प्रभुनाथ शुक्ल   राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली भारत यात्रा पर आए दुनिया के सबसे शक्तिशाली शख्सियत डोनाल्ड ट्रम्प बेहद खुश और गौरवान्वित दिखे। गुजरात से लेकर मोहब्बत की नगरी आगरा तक बेमिसाल ताज का दीदार कर बेहद खुश हुए। दुनिया के सबसे ताकतवर देश और भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के राष्ट्राध्यक्ष ट्रम्प-मोदी इस दोस्ती को नया आयाम देना चाहते हैं। अपने दो दिवसीय यात्रा में ट्रम्प और मोदी एक-दूसरे से क्या खोया और क्या पाया, यह विश्लेषण का विषय होगा। लेकिन एक बात जो खुलकर सामने आई, वह है हिंदी की अहमियत। मोदी और ट्रम्प की जुगलबंदी ने हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाया है। मोटेरा स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम की मूल थीम हिंदी यानी नमस्ते ट्रम्प पर आधारित थी। लेकिन ट्रम्प और मोदी ने लाखों की भीड़ का हिंदी यानी नमस्ते से अभिवादन किया। अपनी भारत यात्रा के दौरान ट्रम्प ने तीन बार हिंदी में ट्वीट किया।   भारत के अभिजात वर्ग में हिंदी और हिंदी भाषियों को हिकारत की नजरों से भले देखा जाता हो, लेकिन ग्लोबल स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने हिंदी की स्वीकार्यता को निश्चित रूप से बढ़ाया है। ट्रम्प ने हिंदी फिल्म शोले और शाहरुख का भी जिक्र किया। जबकि देश में हिंदी भाषा की स्वीकार्यता पर संसद से लेकर सड़क तक खूब राजनीति होती है। पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर क्या स्थिति है, सभी जानते हैं। गुजरात में हिंदी भाषियों पर किस तरह जानलेवा हमले हुए यह कहने की बात नहीं है। लेकिन ट्रम्प ने उसी गुजरात की धरती से हिंदी को बड़ा सम्मान दिया है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा भले मिल गया हो लेकिन राष्ट्रभाषा का सम्मान आजतक नहीं मिल पाया है। सरकारी परीक्षाओं को हिंदी माध्यम से कराने पर भी राजनीति होती है। अंग्रेजी सोच की हिमायती राजनीति हिंदी बोलने में अपना अपमान और शर्म महसूस करती है। अधिकांश राजनेता अपने ट्वीट अंग्रेजी में करते हैं। जबकि अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हिंदुस्तान और हिंदी की अहमियत समझते हुए अपनी भारत यात्रा को हिंदीमय बना दिया।   अंग्रेजी के हिमायती यह कह सकते हैं कि ट्रम्प ने यह सब अमेरिका में होने वाले आम चुनाव के लिए किया क्योंकि अमेरिका में भारतीय मूल के 40 लाख लोग रहते हैं। लेकिन आलोचकों को यह सोचना होगा कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति को हिंदी में ट्वीट की क्या जरुरत थी। वह अपनी बात अंग्रेजी में भी कह सकते थे। निश्चित रूप से हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाने में ट्रम्प और मोदी का अहम योगदान है। पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा- हम भारत आने के लिए तत्पर हैं। हम रास्ते में हैं, कुछ ही घंटों में हम सबसे मिलेंगे। दूसरे और तीसरे ट्वीट में उन्होंने भारत और अमेरिकी संबंधों का जिक्र किया। इसका असर भी अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों पर गहरा होगा। लोग इस ट्वीट के राजनीतिक मायने चाहे जो निकालें, लेकिन सच है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है।   हिंदी में संबोधन किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की कोई नई पहल नहीं है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब 2010 में भारत आए तो उन्होंने भी अपने सत्कार से प्रभावित होकर हिंदी में 'बहुत-बहुत धन्यवाद' बोलकर भारत और भारतीयता के प्रति अभार जताया था। जबकि भाषण का समापन 'जय हिंद' से किया था। विदेशी धरती पर सिर्फ हिंदी नहीं उसकी क्षेत्रीय भाषाओं का भी जलवा कायम रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिकी यात्रा पर गए थे तो तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गुजराती भाषा में 'केम छो मिस्टर मोदी' से स्वागत किया था। जब अमेरिका में आम चुनाव हो रहे थे तो वहां भी 'अबकी बार ट्रम्प सरकार' की गूंज सुनाई दी थी। भारत में गढ़ा इस चुनावी जुमले का इस्तेमाल खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने किया था। भारत में 2014 के आम चुनाव में यह चुनावी नारा खूब गूंजा था अबकी बार मोदी सरकार। हिंदी की अहमियत और ग्लोबल स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं में हिंदी का खुलकर प्रयोग करते रहे हैं। हिंदी को 'ग्लोबल' बनाने में भी खास योगदान रहा है। अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान ट्रम्प से मुलाकात में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था।   इससे पूर्व भारत के कई राजनेता वैश्विक मंच पर हिंदुस्तान और हिंदी का मान बढ़ाते आए हैं। देश की विदेश मंत्री के पद पर रहीं सुषमा स्वराज आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन हिंदी के उत्थान और विकास के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। विदेश मंत्री रहते संयुक्त राष्ट्र संघ में 2017 में उन्होंने हिंदी में भाषण देकर पाकिस्तान को खूब लताड़ लगाई थी। संसद से लेकर वैश्विक मंच पर उन्होंने हिंदी का मान बढ़ाया। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी प्रेम किसी से छुपा नहीं है। अटल जी ने विदेशी दौरों के समय कई मंचों पर हिंदी में अपनी बात रखी। 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ में उन्होंने अपना पहला भाषण हिंदी में दिया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी हिंदी के हिमायती थे। उनकी पहल पर ही 14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को संविधान सभा में अधिकारिक भाषा सम्मान मिला था। सोशल मीडिया में हिंदी का अच्छा प्रयोग हो रहा है। ट्विटर पर भी हिंदी में काफी ट्वीट किए जा रहे हैं। वक्त आ गया है जब हमें हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता को समझते हुए राजनीति को किनारे रख हिंदी को और समृद्ध बनाने के लिए काम करना चाहिए।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,  Jammu and Kashmir: Police will be equipped with hi-tech facilities

योगेश कुमार सोनी   देश के बंटवारे के बाद से ही जम्मू-कश्मीर पुलिस तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करती रही है लेकिन धारा 370 हटने के बाद स्थिति में फर्क आया है। हरकत वाले नेता या जो कुछ लोग थे, उनपर शासन-प्रशासन ने शिकंजा कस रखा है लेकिन पाकिस्तान अभी भी बाज नहीं आ रहा। जैसा कि जम्मू-कश्मीर हमेशा से एक संवेदनशील राज्य रहा है, यहां कभी भी पत्थरबाजी या आतंकी हमले की आशंकाएं बनी रहती हैं। अलगाववादी व हुर्रियत नेताओं की वजह से माहौल इतना खराब रहा है कि पुलिस पर भी हमले होते रहे हैं। हजारों पुलिसकर्मियों ने शहादत दी।   जब से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बना, यहां बदलाव आ रहा है। फिलहाल पुलिस को हाईटैक करने पर काम जारी है। रोबोट, हेलीकॉप्टर, टोटल कॉन्टेनमेंट वेसल और रिमोट से चलने वाले वाहनों के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस पचास हाइटैक यूएवी से लैस होने वाली है। इतने ज्यादा यूएवी की डील पहली बार हो रही है। यूएवी का अर्थ होता है मानव रहित विमान। यह संदिग्ध इलाकों व दुश्मनों के क्षेत्रों पर निगरानी रखने के लिए काम आता है और जरूरत पड़ने पर आक्रमण करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। यह रिमोर्ट से कंट्रोल होता है व इसे ड्रोन विमान भी कहा जाता है। इसे इस्तेमाल का सबसे बड़ा कारण यह है कि निगरानी से कोई भी संदिग्ध जगह बची न रह जाए।   इसबार स्वयं गृह मंत्रालय पुलिस को आधुनिक बनाने में लगा हुआ है। हर छोटी से छोटी बात पर सीधे गृहमंत्री अमित शाह से संपर्क साधते हुए संबंधित अधिकारी किसी भी पहलू को छोड़ते नहीं दिख रहे। जानकारी के मुताबिक 15 मार्च तक सभी उपकरणों के साथ पुलिस लैस नजर आएगी। जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाद सिंह ने स्थिति व व्यवस्था को समझते हुए बताया कि अब बिना टेक्नोलॉजी के पुलिसिया सिस्टम प्रभावित होने लगा है। समय के साथ अपटेड व अपग्रेड होते रहना चाहिए। अब रिकॉर्डिंग सहित ड्रोन कैमरे का प्रयोग होगा। जो लोग घटना को अंजाम देकर सबूत के अभाव में बेकसूर बताकर बच जाते थे वो अब नहीं बचेंगे।   धारा 370 हटने के बाद शांति बनी हुई है। यहां का जनजीवन पटरी पर लौट आया है लेकिन अभी भी कुछ नेता अपनी घटिया हरकतों को अंजाम की योजना बना सकते हैं। जैसा कि अबतक जम्मू-कश्मीर में 22 जिले थे। दो केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में 20 और लद्दाख में 2 जिले घोषित हो चुके। क्षेत्रफल के हिसाब से लेह भारत का सबसे बड़ा जिला माना जाता है इसलिए सतर्कता के हिसाब से चुनौती यहां भी कम नहीं है। जब भी कोई घटना होती है और अपराधी या आतंकवादी पकड़े नहीं जाते तो हमेशा पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठता था हालांकि स्थिति आज भी यही है। लेकिन इसके विपरित हमें यह भी समझना चाहिए कि संवेदनशील जगहों पर पुलिस बेहद कठिनाइयों के साथ काम करती है। भारी ठंड और गर्मी के बीच हर वक्त अपनी सेवाएं देना चुनौतीपूर्ण है। यदि बात जम्मू-कश्मीर जैसे प्रदेश की हो तो यहां दोहरी कठिनाइयां झेलते हुए पुलिसकर्मी देश की सेवा करते हैं। इसलिए आज पुलिस बल को और अधिक बल देने की जरूरत है।   बीते वर्ष के अंत में प्रदेश पुलिस को अंडर-व्हीकल इंस्पेक्शन सिस्टम और डीप सर्च मेटल डिटेक्टर जैसे आधुनिक उपकरण दिए गए थे। यह उपकरण विस्फोटक ले जा रहे वाहनों की पहचान करने और जमीन के कई फीट अंदर तक छुपाए गए विस्फोटक को ढूंढ लेता है। मौजूदा केंद्र सरकार ऐसी चीजों पर काम करके देश को अग्रसरता की ओर लेकर जा रही है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,  Fire of delhi

डाॅ. रमेश ठाकुर   देश की राजधानी दिल्ली बीते दो-तीन दिनों से उपद्रवियों की लगाई आग में झुलस रही है। सियासी जमात और व्यवस्था तमाशबीन बनी हुई है। दिल्ली के हालात बेहद नाजुक बन गए हैं। अमन कमेटियों और पुलिस-प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद उपद्रवी पीछे हटने को राजी नहीं हैं। नफरत के माहौल में लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। शाहीन बाग से निकली लपटें अब दूसरे इलाकों में फैल गई है। बीते दो दिनों के भीतर हालात इस कदर बिगड़ गए हैं, जिसमें एक पुलिसकर्मी समेत पांच अन्य लोग दंगाईयों का निशाना बन गए। पूर्वी दिल्ली के मौजपुर में सीएए के विरोध प्रदर्शन में दंगाईयों ने रतन लाल नाम के कांस्टेबल को घटनास्थल पर ही मार दिया। कांस्टेबल पास के ही गोकुलपुर एसीपी ऑफिस में तैनात था। वह सिर्फ दंगाईयों को रोक रहा था। घटना में स्थानीय डीसीपी और एसीपी भी गंभीर रूप से घायल हुए। दोनों को उपचार के लिए अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।   राजधानी में इस वक्त भयंकर तनाव है। जिन इलाकों में उपद्रव हो रहे हैं, वहां परिवहन सेवाओं पर बुरा असर पड़ा है। हिंसा को देखते हुए जाफराबाद, मौजपुर-बाबरपुर, गोकुलपुरी, जौहरी इनक्लेव और शिव विहार मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया है। उधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के कारण भी राजधानी में कई रास्तों पर ट्रैफिक प्रभावित हुआ है। पूरी दिल्ली में चक्का जाम की स्थिति बनी हुई है। हिंसा वाले इलाकों में आवाजाही एकदम बंद है। मंगलवार को सभी स्कूल बंद रहे, लोगों ने अपने बच्चों को घरों से नहीं निकलने दिया। दुकानें, मकान, कारखाने आदि बंद रहे। पूरे इलाके में धारा-144 लागू कर दी गई है लेकिन वह भी बेअसर दिखाई पड़ती है।   रात में भी लोगों ने नारेबाजी और पत्थरबाजी की। दंगाई खुलेआम जमकर पत्थरबाजी कर रहे हैं। देशविरोधी नारेबाजी कर आजादी की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने कर्दमपूरी के एक पेट्रोल पंप को आग में झोंक दिया है। पेट्रोल पंप जलता देख लोगों में अफरातफरी मच गई। लेकिन, उपद्रवी वहां से नहीं भागे, वहीं डटे रहे। उपद्रवियों ने कई वाहनों के शीशे भी तोड़े, घरों में लगातार पत्थर मार रहे हैं। पुलिस ने चारों ओर से मोर्चा संभाला हुआ है, बावजूद इसके हालात बेकाबू हो गए हैं। पूर्वी दिल्ली के अल्पसंख्यक क्षेत्र जाफराबाद, मौजपुर, कर्दमपूरी, भजनपुरा और सीलमपुर दंगों की आग में झुलस रहे हैं। पुरुष के अलावा महिलाएं भी सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रही हैं। सोमवार दोपहर के समय हालात उस समय ज्यादा खराब हो गए, जब सीएए विरोधियों के खिलाफ सैकड़ों लोग भगवा झंडे लेकर सड़क पर उतरे। उन्हें देखकर उपद्रवी और भड़क गए। उनपर ही पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इस दौरान हिंसक भीड़ ने कई घरों को आग लगा दी और कई दुकानों में तोड़फोड़ की।   जहां हिंसा हो रही है वहां दोनों धर्मों के लोग रहते हैं। प्रदर्शन को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि सीलमपुर को गोकलपुर से जोड़ता रोड नंबर 66 करीब 4 किलोमीटर लंबा है। यहां आमने-सामने अलग-अलग समुदाय की आबादी रहती है। बीच में 50 से ज्यादा गलियां पड़ती हैं। हर गली के कोने पर लोग खड़े हैं। यहां यह समझना, खासकर मौजपुर के आगे के क्षेत्र में मुश्किल हो रही थी कि गली के कोने पर खड़े लोग किस तरफ के हैं। दंगा बड़े ही सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है। सोमवार देर रात से प्रभावित इलाकों में भारी पुलिस बलों की तैनाती की गई है। घटना पर केंद्र सरकार की फिलहाल नजर बनी हुई है लेकिन हिंसा रोकने में नाकाम है। घटना को देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने देर रात तक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर दिल्ली पुलिस आयुक्त व अन्य सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक की। आयुक्त से घटना की तत्कालिक रिपोर्ट भी तलब की। लेकिन सवाल यही है कि बद से बदतर होती जा रही स्थिति पर आख़िरकार कबतक काबू पाया जाएगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 25 February 2020


bhopal,Manure is not only clothing but a medium of thought and employment

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   खादी केवल वस्त्र नहीं अपितु यह विचार, स्वाभिमान और बड़े वर्ग के लिए रोेजगार का माध्यम है। आज खादी से जुड़े उद्यमियों और विशेषज्ञों को तकनीक में बदलाव, बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद तैयार करने और नित नए प्रयोगों की ओर ध्यान देना जरूरी हो गया है। पिछले दिनों जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहल पर दो दिनी ग्लोबल कॉन्फ्रेंस का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस आयोजन से इंग्लैंण्ड, जापान सहित दुनिया के आठ देशों के प्रतिनिधियों, देशभर के जाने-माने गांधीवादी विचारकों और खादी से जुड़े विशेषज्ञों ने खादी के भविष्य को लेकर चिंतन मनन किया।   आजादी के आंदोलन में स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक बनी खादी आज अधिक प्रासंगिक हो गई है तो खादी की ताकत को पहचान कर आज भी ग्राम स्वराज का सपना साकार हो सकता है। इको फ्रैण्डली होने से आज दुनिया के देशों में खादी की मांग बढ़ी है। खादी-मार्केटिंग, एक्सपोर्ट पोंटेंशिएल, लो कॉस्ट और प्रोडक्शन कैपेसिटी पर माना गया कि खादी को फैशन से जोड़ना आज की आवश्यकता है तो खादी में इनोवेशन, डायवर्सिफिकेशन, मार्केट इंटेलिजेेंस पर ध्यान रखना होगा। पर्यावरण प्रदूषण और पानी की कमी से जूझ रही देश-दुनिया के सामने खादी एक सशक्त विकल्प है। इकोफ्रैण्डली होने के साथ ही अधिक लोगों को रोजगार, सभी मौसम में प्रकृति अनुकूल है खादी। खादी क्या और क्यों को चंद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। खादी मतलब ऑनेस्टी, सिंसिएरिटी, स्वदेशी, जीरो कार्बन फूट प्रिन्ट, जल संरक्षण, इकोफैण्डली सहित न जाने कितने ही प्रेरणास्पद बहुआयामी मायने रखती है।   आज खादी जन-जन की पहचान बनती जा रही है। विदेशों में इकोफ्रैण्डली परिधानों की मांग हो रही है। यह अच्छी बात है कि खादी में नवाचार किए जा रहे हैं। आईटीईएन्स के सहयोग से उन्नत चरखे तैयार किए जा रहे हैं, वहीं डिजाइनरों को इससे जोड़ा जा रहा है क्योंकि आज यह उभरकर आ गया है कि पर्यावरण को बचाना है तो खादी को अपनाना ही होगा। लंदन की जो सोल्टर ने गुणवत्ता के साथ ही पारदर्शी सस्टेनेबल सप्लाई चेन विकसित करने की आवश्यकता प्रतिपादित की तो जापान की फुमी कोबायशी ने भारत-खादी और जापान के बीच पिछली दो-तीन सदियों के समन्वय को रेखांकित किया। जापान में एनजीओ व अन्य संस्थाओं के सहयोग से खादी को नया मुकाम दिलाया जा रहा है। खास बात यह कि स्वयं फुमी कोबायशी खादी से बने वस्त्र ही पहने थीं। कम्फरटेबल, इकोलॉजीकली, डिजाइन आदि के अनुसार तैयार होने से खादी वस्त्रों की अच्छी मांग विदेशों में होने लगी है। गुजरात के कच्छ में हस्तकरघा और हस्तकला ने गरीबों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए है। आज खादी वस्त्रों के निर्यात की विपुल संभावनाएं हैं।   यह सब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश में 20 लाख गांठ कपास उत्पादन में से बड़ी मात्रा में कपास का निर्यात बांग्लादेश को होता है, वहां से अपेरल तैयार होकर दुनिया के देशों को निर्यात हो रहे हैं। हमारे पास कच्चा माल होते हुए भी हम सही मायने में वेल्यू एडिशन नहीं कर पा रहे। सम्मेलन में जाने-माने फैशन डिजायनरों रीतू बेरी, हिम्मत सिंह, पूजा जैन, परेश लांबा, पूजा गुप्ता, अदिति जैन, रूमा देवी के साथ ही भारतीय शिल्प कला संस्थान की निदेशक डॉ. तूलिका गुप्ता ने फैशन की दुनिया में हो रहे प्रयोगों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि खादी परिधानों को ग्लोबल फैशन शो में प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है। खादी में रंग संयोजन, नित नए प्रयोग होने से अब खादी आमजन की पसंद बनती जा रही है।   सर्दी हो या गर्मी या बरसात खादी ऐसा वस्त्र है, जिसे सभी मौसम में पहना जा सकता है। एक समय था जब गांवों में घर-घर में चरखा होता था तो बच्चों को स्कूलों में तकली से कताई सिखाई जाती थी। हालांकि आज वस्त्र की दुनिया में तेजी से बदलाव आया है पर इको फ्रैण्डली होने के कारण देश-विदेश में खादी की तेजी से मांग बढ़ती जा रही है। कातिनों और बुनकरों को मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिलने से धीरे-धीरे घरों से चरखे गायब हो गए तो आज की पीढ़ी ने इस काम से मुंह मोड़ लिया। खादी की प्रासंगिकता आज और अधिक होने से तकनीक में सुधार की, बाजार की मांग के अनुसार खादी वस्त्रों को आकार देने की आवश्यकता हो गई है। आजादी के समय खादी केवल वस्त्र न होकर विचार के साथ ही स्वाभिमान का प्रतीक रही है। ऐसे में खादी के वैश्वीकरण के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे सभी लोगों के साथ ही फैशन डिजाइनरों को नई तकनीक और एग्रेसिव मार्केटिंग के साथ आगे आना होगा। विज्ञापन की चकाचौंध में खादी कहीं पिछड़ती जा रही है। सरकार द्वारा हर साल खादी को बढ़ावा देने के लिए खादी मेलों का आयोजन किया जाता रहा है। सामान्यतः गांधीजी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से खादी मेलों का सिलसिला चलता है जो सामान्यतः जनवरी के बाद तक चलता रहता है। राजस्थान सरकार ने खादी उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक छूट दी। परिणाम सामने हैं, जहां अन्य सालों के डेढ़-दो करोड़ की सालाना छूट खादी संस्थाओं को मिल पाती थी, वहीं इस साल 17 करोड़ की बड़ी राशि छूट के रूप में खादी संस्थाओं को प्राप्त हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खादी की ब्राण्डिंग का संदेश दे चुके हैं। देश में खादी की ब्राण्डिंग का ही परिणाम है कि समूचे देश में 2018-19 में 3215 करोड़ का टर्नओवर रहा जो इस साल 5 हजार करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। इससे पहले आठ सौ-सवा आठ सौ करोड़ का ही टर्नओवर रहता था। इस दौरान खादी उत्पादों पर अच्छी-खासी छूट भी दी जाती है।   खादी पर मंथन इसलिए सामयिक हो जाता है कि देश में बुनकरों की माली हालत दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। जबकि केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा बुनकरों के कल्याण की अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। खादी में नवाचार और बाजार मिलने से इन ग्रामोद्योगों से जुड़े लोगों की आय में इजाफा होगा। एक ओर हमें प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए खादी उत्पादों को जनता की मांग के अनुकूल बनाना होगा, फैशनेबल व आकर्षक बनाने का शोध कार्य जारी रखना होगा, वहीं विपणन कला का उपयोग भी करना होगा। उत्पाद की गुणवत्ता तो पहली शर्त है ही। यदि ऐसा होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब खादी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बन जाएगी।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 February 2020


bhopal,  Collector: Need to change mentality, not name

डॉ. अजय खेमरिया   मध्य प्रदेश में सरकार कलेक्टर का नाम बदलने जा रही है। अंग्रेजी हुकूमत के लिए राजस्व वसूलने यानी कलेक्ट करने के लिए ईजाद किये गए कलेक्टर के पद में अभी भी औपनिवेशिक प्रतिध्वनि होती है। हालांकि मप्र के आईएएस अफसर इस नाम को बदलने के लिये राजी नहीं हैं। मप्र आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आईसीपी केसरी की अध्यक्षता में बनाई गई पांच सदस्यीय कमेटी के समक्ष राज्य के आईएएस अफसरों के अलावा राज्य प्रशासनिक सेवा और तहसीलदार संघ ने भी सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध किया है। अब यह कमेटी राज्य के सांसद, विधायक, और अन्य मैदानी जनप्रतिनिधियों से परामर्श कर मुख्यमंत्री कमलनाथ को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। राज्य के सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ. गोविंद सिंह स्पष्ट कर चुके हैं कि कलेक्टर का नाम बदला जाएगा। मप्र सरकार मैदानी प्रशासन तंत्र में भी नीतिगत रूप से बदलाव कर रही है, अब जिलों में जिला सरकार काम करेगी। यानी जिला प्रशासन की जगह अब सरकार लेगी जो प्रशासन की तुलना में सरकार के समावेशी स्वरूप का अहसास कराता है।   कलेक्टर अभी जिले का सबसे बड़ा अफसर होता है और उसकी प्रशासनिक ताकत समय के साथ असीमित रूप से बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि कलेक्टर के आगे विधायक, सांसद जैसे जनता के चुने प्रतिनिधि भी लाचार नजर आते हैं।मप्र में छतरपुर के मौजूदा कलेक्टर तो स्थानीय विधायकों को मिलने के लिये घन्टो इंतजार कराकर सुर्खियों में रह चुके हैं। सरकार के तमाम मंत्री अनदेखी की शिकायत करते रहते हैं।   असल में मौजूदा राजव्यवस्था का स्वरूप स्वतः कलेक्टर के पद को अपरिमित ताकत देता है। लोककल्याणकारी राज के चलते सरकारें लगातार जनजीवन में अपना सकारात्मक दखल बढ़ाती जा रही हैं। प्रशासन का ढांचा विशालकाय हो गया है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक सरकार की भागीदारी सुनिश्चित है। ऐसे में कलेक्टर लोककल्याणकारी योजनाओं से लेकर आधारभूत ढांचा विकास और कानून-व्यवस्था के अंतहीन दायित्व कलेक्टर के पास आ गए हैं। इन परिस्थितियों में कलेक्टर की व्यस्तता तो बढ़ी ही है, समानान्तर ताकत और अधिकारों के साथ आनेवाली बुराइयों ने भी इस पद को कब्जे में ले लिया है। सरकार की समस्त मैदानी प्रयोगशाला आज जिला इकाई है। कलेक्टर एक ऐसे परीक्षक बन गए हैं, जहां से हर समीकरण निर्धारित होता है। कलेक्टर के पद से जुड़ी असीम ताकत ने निर्वाचित तंत्र को आज लाचार-सा बना दिया है। आज भी आम आदमी कलेक्टर को लेकर कतई सहज नहीं है। इसी व्यवस्थागत विवशता को समझते हुए मप्र की कमलनाथ सरकार ने बुनियादी परिवर्तन का मन बना लिया है।   जिला सरकार का प्रयोग वस्तुतः मैदानी प्रशासन तंत्र में जनभागीदारी को प्रधानता देना ही है। इस जिला सरकार में प्रभारी/पालक मंत्री अध्यक्ष होंगे और कलेक्टर सचिव। चार सदस्य जनता की ओर से मनोनीत होंगे। कलेक्टर का पदनाम बदला जाना भी इस अंग्रेजी राज व्यवस्था पर मनोवैज्ञानिक रूप से प्रधानता हासिल करने का प्रतीक है। बेहतर होगा कलेक्टर भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर आम नागरिकों के साथ, उनकी अपेक्षाओं व आकांक्षाओं के साथ समेकन का प्रयास करें। नहीं तो पदनाम बदले जाने का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा। वैसे, देश में कलेक्टर हर राज्य में नहीं हैं। पंजाब में यह डीसी, यूपी में डीएम, बिहार में समाहर्ता के नाम से जाने जाते हैं। जनप्रतिनिधियों को भी चाहिये कि वे भी लोकव्यवहार में पारदर्शिता का आवलंबन करें, तभी औपनिवेशिक राजव्यवस्था से जनता को मुक्ति मिल सकेगी।   अफसरशाही को लेकर आम धारणा है कि वह एक अनावश्यक आवरण खड़ा करके रहती है। लोकसेवक के रूप में उसकी आवश्यकता के साथ आज भी भारत की नौकरशाही न्याय नहीं कर पाई है। त्रासदी यह है कि 70 साल बाद भी मानसिकता के स्तर पर हमारे समाज से निकली जमात ने खुद को आईसीएस के मनोविज्ञान को त्यागा नहीं है। कलेक्टर की व्यवस्था असल में आज भी देशभर में लोगों को सुशासन का अहसास कराने में नाकाम रही है। नाम बदलकर जिला अधिकारी, जिला प्रमुख, जिलाधीश करने से उस बुनियादी लक्ष्य की ओर उन्मुख होना संभव नहीं है, जिसे लेकर कमलनाथ सरकार यह कदम उठा रही है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 February 2020


bhopal,  Need to connect common farmers with innovations of exploratory farmers

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   देश में किसान को समझने के सार्थक प्रयास हुए ही नहीं। आजादी के बाद से ही राजनीतिक दलों के लिए किसान सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का माध्यम बने रहे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्ता की वैतरणी पार करने के लिए किसान प्रमुख माध्यम रहा है। कर्ज माफी ऐसा नारा रहा है जो पिछले पांच दशक से छाया रहा है। किसानों को ब्याजमुक्त ऋण से लेकर ऋण माफी का लंबा सिलसिला चला आ रहा है पर जो ठोस प्रयास होने चाहिए वह प्रयास देश के कोने-कोने में अपने बलबूते पर प्रयास कर रहे अन्नदाता का ही है जो पद्मश्री या कृषि विज्ञानी पुरस्कार पाने के बाद भी उस मुकाम को प्राप्त नहीं कर सके हैं जो हासिल होना चाहिए।   यह सही है कि किसानों की बदहाली और खेती किसानी से होने वाली आय को लेकर आज सभी राजनीतिक दल चिंतित हैं। लगभग सभी दल और किसानों से जुड़े संगठन किसानों की ऋणमाफी की बात तो करते ही हैं तो कोई कृषि उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने, कोई अनुदान बढ़ाने या कोई किसानों को दूसरी रियायतें देने पर जोर दे रहे हैं। मजे की बात यह है कि अब तो ऋणमाफी या एक-दूसरे की घोषणाओं पर तंज कसते हुए अपनी योजनाओं को अधिक किसान हितैषी बताने की जुगत में भी लगे हैं। मजे की बात यह है कि ऋणमाफी या दूसरी इसी तरह की घोषणाएं किसानों की तात्कालिक समस्या को तो हल कर रही है पर दीर्घकालीन कृषि विकास में ऋणमाफी जैसी घोषणाएं कितनी कारगर होगी, यह आज भी सवालों के घेरे में है।   आजादी के बाद देश में कृषि विज्ञानियों ने शोध व अध्ययन के माध्यम से तेजी से कृषि उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम किया। अधिक उपज देने वाली व प्रदेश विशेष की भौगोलिक स्थिति के अनुसार जल्दी तैयार होने वाली किस्मों का विकास हुआ। रोग प्रतिरोधक क्षमता व उर्वरा शक्ति बढ़ाने के नए-नए प्रयोग हुए। खेती किसानी को आसान बनाने के लिए एक से एक कृषि उपकरण बाजार में आए। इस सबके बावजूद हमारी खेती अंधाधुंध प्रयोगों की भेंट चढ़ती गई। आज एक ओर उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित प्रयोग की बात की जा रही है तो दूसरी और ऑरगेनिक खेती व परंपरागत खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता प्रतिपादित की जा रही है। आज तकनीक के अत्यधिक प्रयोग से पशुपालन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। हालांकि अब किसानों की आय को दोगुणा करने के संकल्प के चलते कंपोजिट खेती की बात की जा रही है, जिसमें खेती के साथ ही अतिरिक्त आय के लिए पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और इसी तरह के अन्य कार्यों को साथ-साथ करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।   इन सबके बीच देश के कोने-कोने मेें प्रगतिशील किसानों द्वारा अपने बल पर या कहें कि संकल्पित होकर खेत को ही प्रयोगशाला बनाकर कुछ नया करने में जुटे कृषि विज्ञानियों को सामने लाने की पहल जाने-माने कृषि लेखक डॉ. महेन्द्र मधुप ने की है। डॉ. मधुप ने देश के 13 प्रदेशों के 56 प्रगतिशील किसानों को एक माला में पिरोते हुए उनके नवाचारों को पहचान दिलाने का प्रयास किया है। अन्वेषक किसान के नए अवतार में लाख कठिनाइयों से जूझते हुए खेती के लिए कुछ नया करने के प्रयासों को इस पुस्तक में समाहित किया है। कहने को हमारे यहां जुगाड़ शब्द का आम चलन है पर जुगाड़ ही इनमें से कई किसानों के प्रयासों से खेती आसान हुई है। सबसे अच्छी बात यह कि यह सब अपने बलबूते और कठिन संघर्ष के बाद हासिल हुआ। इन प्रगतिशील किसान विज्ञानियों ने प्रयोगशाला या कागज-पेन के सहारे नहीं, खेत-खलिहान की वास्तविक प्रयोगशाला में प्रयोग किए हैं। यही कारण है कि चाहे महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर हों या राजस्थान के जगदीश पारीक या हरियाणा के धर्मवीर कंबोज या इस पुस्तक में स्थान पानेे वाले अन्य 56 कर्मवीर किसान अपनी मेहनत से मुकाम हासिल कर पाए हैं।   सबसे जरूरी है सरकार अपने बजट का कुछ हिस्सा खेत से सीधे जुड़े इन प्रयोगधर्मी किसानों के खेत को ही योजनाओं के क्रियान्वयन, किसानों के शिक्षण-प्रशिक्षण और विजिट का व्यावहारिक केन्द्र बनाने की दिशा में आगे बढ़े तो इन विज्ञानियों को न केवल प्रोत्साहन मिलेगा अपितु किसानों को धरातलीय अनुभव का लाभ मिलेगा। किसी भी योजना या किसानों के प्रशिक्षण का कुछ प्रावधान रखा जाता है तो यह खेती किसानी को नई दिशा दे सकेगा। इसके लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। आशा की जानी चाहिए कि गुदड़ी के लाल इन अन्वेषी किसानों की पहल को प्रोत्साहित करने के सकारात्मक प्रयास होंगे, तभी डॉ. मधुप की मेहनत रंग लाएगी। सरकार किसानों की आय को दोगुणा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, ऐसे में इन अन्वेषी किसानों के प्रयोगों से किसानों को जोड़ने के प्रयास करने ही होंगे।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 February 2020


bhopal,  Congress should lead new people

रमेश सर्राफ धमोरा   दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस सकते में है। दिल्ली के सिंहासन पर वर्षों एकछत्र राज करने वाली पार्टी कांग्रेस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि दिल्ली में उसे इतनी बदतर स्थिति का सामना करना पड़ेगा। उसके तीन उम्मीदवारों को छोड़ बाकी सभी की जमानत तक जब्त हो जायेगी। पिछली बार की तरह इसबार भी दिल्ली में कांग्रेस अपना खाता खोलने में नाकाम रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत पर भी कांग्रेस नेता खुश नजर आ रहे हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने ट्वीट करते हुए लिखा कि `आप की जीत हुई और धोखेबाज हार गये। दिल्ली के लोग जो कि भारत के सभी हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं उन्होंने भाजपा के ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और खतरनाक एजेंडे को हरा दिया। मैं दिल्ली के लोगों को सेल्यूट करता हूं। जिन्होंने उन राज्यों के लोगों के लिए एक उदाहरण पेश किया है, जहां 2021 और 2022 में चुनाव होने वाले हैं।' पी. चिदंबरम के ट्वीट पर दिल्ली महिला कांग्रेस अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने पी. चिदंबरम पर निशाना साधते हुये दिल्ली में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर नेतृत्व पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने ट्वीट किया-`क्या कांग्रेस ने भाजपा को हराने का काम क्षेत्रीय दलों को आउटसोर्स कर दिया है? यदि ऐसा नहीं है तो हम अपनी करारी हार की चिंता करने के स्थान पर आम आदमी पार्टी की जीत पर खुशी क्यों मना रहे हैं? और अगर इसका जवाब हां में है तो हमें अपनी (प्रदेश कांग्रेस समितियां) दुकान बंद कर देनी चाहिए।' शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा था कि `शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने में देरी और एकजुटता की कमी के कारण यह शिकस्त हुई है। हम दिल्ली में फिर हार गए। आत्ममंथन बहुत हुआ, अब कार्रवाई का समय है। उन्होंने सवाल किया कि अगर भाजपा विभाजनकारी राजनीति कर रही है। केजरीवाल स्मार्ट पॉलिटिक्स कर रहे हैं तो हम क्या कर रहे हैं? क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि हमने घर को व्यवस्थित रखने के लिए पूरा प्रयास किया?' शर्मिष्ठा मुखर्जी के बयान के बाद कांग्रेस में कपिल सिब्बल जैसे बयान वीर नेताओं को मानो सांप सूंघ गया। किसी ने भी मुखर्जी की बात काटने की हिम्मत नहीं दिखायी। उलटे मिलिंद देवड़ा, जयराम रमेश ने मुखर्जी के बयान का समर्थन किया।दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद लगता है कि कांग्रेस के लिए 2020 का साल अच्छा नहीं रहेगा। इसी साल बिहार विधानसभा के भी चुनाव होने हैं, जहां भाजपा जनता दल (यू) का मजबूत गठबंधन सरकार में है। उसके मुकाबले बिहार में कांग्रेस कुछ खास कर पाएगी, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। इसी वर्ष 73 राज्यसभा सीटों के चुनाव भी होने हैं। राज्यसभा सीटों के चुनाव में भी कांग्रेस को लाभ होता नहीं दिख रहा है। राज्यसभा में फिलहाल कांग्रेस के पास 46 सीटें हैं। इस साल राज्यसभा में कांग्रेस की 17 सीटें खाली होंगी उनमें से कांग्रेस 11 सीटें ही जीत पाएगी। इस तरह देखें तो कांग्रेस को राज्यसभा में छह सीटों का नुकसान होने वाला है। हालांकि कांग्रेस को राजस्थान में दो, मध्य प्रदेश में एक, छत्तीसगढ़ में दो व गुजरात में एक सीट का फायदा होगा। लेकिन उसे आंध्र प्रदेश में दो, अरुणाचल प्रदेश में एक, असम में एक, हिमाचल प्रदेश में एक, कर्नाटक में एक, उत्तर प्रदेश में एक, उत्तराखंड में एक, मेघालय में एक, मिजोरम में एक व ओडीशा में एक सीट का घाटा भी होगा। इस वर्ष के राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गोवा, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, ओडीशा, दिल्ली, पुड्डुचेरी सहित 11 प्रदेशों में पूरी तरह साफ हो जाएगी। राज्यसभा में कांग्रेस को मिलने वाली 11 सीटों पर दावेदारों की लंबी कतार लगी हुई है। लोकसभा और विधानसभा में पराजित हुये सभी बड़े नेता राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुंचना चाहते हैं। इसीलिए सभी नेता अपने लिये लॉबिंग करने में जुटे हैं। राज्यसभा से रिटायर हो रहे वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह, राज बब्बर, कुमारी सैलेजा, टी सुब्बारामी रेड्डी, हुसैन दिलवई, मधुसूदन मिस्त्री फिर से अपनी सीट पक्की करना चाहते हैं। हरियाणा में कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में है। जहां से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने पुत्र दीपेंद्र हुड्डा को राज्यसभा में भेजना भेजना चाहते हैं। वही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा की मौजूदा सदस्य कुमारी सैलेजा फिर से टिकट पाने का प्रयास कर रही हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी राज्यसभा में जाकर अपनी सुविधाएं बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस दो सीटें जीतने की स्थिति में है। वहां पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एकबार फिर राज्यसभा में जाना चाहते हैं। इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, मीनाक्षी नटराजन जैसे दर्जनों नेता हैं, जिनकी नजर राज्यसभा टिकट पर लगी हुई है।   कर्नाटक में कांग्रेस अपने दम पर एक सीट जीतने की स्थिति में है। वहां पूर्व केंद्रीय मंत्री मलिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोइली, बीके हरिप्रसाद, सलीम अहमद जैसे नेताओं की लंबी लाइन लगी हुई है। गुजरात की दो सीटों पर मधुसूदन मिस्त्री, दीपक बावरिया, शक्ति सिंह गोहिल, राजीव शुक्ला, राज बब्बर प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा तारिक अनवर, सुबोधकांत सहाय, जितिन प्रसाद, आरएनपी सिंह, हरीश रावत, के.सी. वेणुगोपाल, भंवर जितेंद्र सिंह, गिरीजा व्यास, रुचि डालमिया, अविनाश पांडे, पृथ्वीराज चौहान, मिलिन्द देवड़ा, सुशील कुमार शिंदे, मुकुल वासनिक, हुसैन दिलवई, राजीव सावंत, डॉ. चन्द्रभान, दुरू मियां, अश्क अली टाक, रामेश्वर डूडी सहित काफी संख्या में कांग्रेस के पुराने व वरिष्ठ नेता राज्यसभा टिकट पाने को प्रयासरत हैं।   कांग्रेस को चाहिए कि पूर्व के चुनाव में जनता द्वारा नकारे गए वर्षों से सत्ता व संगठन में काबिज नेताओं के बजाय ऐसे युवा चेहरों को राज्यसभा में मौका देना चाहिए जिनका अपने राज्यों में जमीनी स्तर पर प्रभाव हो और जो पूरी दक्षता से संगठन के कार्य कर रहे हों। कांग्रेस में महासचिवों के अलावा प्रदेशों के प्रभारी, राष्ट्रीय सचिव, राष्ट्रीय संयुक्त सचिव के पदों पर कई उर्जावान नेता काम कर रहे हैं। यदि कांग्रेस उनमें से कुछ लोगों को राज्यसभा में लाकर नया नेतृत्व देती है तो यह कांग्रेस के लिए अच्छी बात होगी। इससे कांग्रेस के प्रति युवाओं का आकर्षक बढ़ेगा। साथ ही संगठन के प्रति समर्पित लोगों को एक संदेश मिलेगा कि जो भी पार्टी पदाधिकारी, कार्यकर्ता पार्टी हित में अच्छा काम करेगा उसे सत्ता में भी भागीदार बनाया जाएगा। नए लोगों के आगे आने से पुरानी हो चुकी कांग्रेस एकबार फिर नए जोश व नई सोच के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करेगी। इससे देश की जनता में भी कांग्रेस एक अच्छा सकारात्मक संदेश देने में कामयाब हो सकेगी।   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal,  How will Kejriwal deal with challenges

योगेश कुमार गोयल दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने अरविंद केजरीवाल की अगले पांच वर्षों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी पर मुहर लगा दी। रामलीला मैदान में लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए जिस प्रकार उन्होंने कहा कि वे दिल्ली के विकास के लिए प्रधानमंत्री का आशीर्वाद चाहते हैं और दिल्ली को आगे बढ़ाने के लिए अब केन्द्र सरकार के साथ मिलकर काम करेंगे, उससे उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं और इरादे जाहिर करने का प्रयास किया है। केजरीवाल मंत्रिमंडल में उनके पिछले सभी छह मंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन, गोपाल राय, कैलाश गहलोत, इमरान हुसैन और राजेंद्र गौतम शामिल किए गए हैं। रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के बाद केजरीवाल सरकार से लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ी हैं। उन्हें अब जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पिछले पांच साल के अधूरे कार्यों को पूरा करना होगा और चुनाव के दौरान किए गए वायदों को अमलीजामा पहनाना होगा, जो आसान नहीं है। नए कार्यकाल में अनेक चुनौतियां उनके समक्ष मुंह बाये खड़ी हैं। केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान 10 चीजों की लिखित गारंटी देते हुए जनता से मुफ्त दी जा रही तमाम योजनाएं अगले कार्यकाल में भी जारी रखने तथा कुछ और नए वर्गों को भी कुछ मुफ्त योजनाओं का लाभ देने का वादा किया था। इसके अलावा उन्होंने प्रदूषण से कराहती दिल्ली में प्रदूषण कम करने का भी बड़ा वादा किया। इन वादों को मूर्त रूप देने में केजरीवाल सरकार की अग्निपरीक्षा होगी। उनके समक्ष बिजली, पानी, बस यात्रा, वाई-फाई सरीखी मुफ्त योजनाओं और मोहल्ला क्लीनिक, परिवहन व्यवस्था में सुधार, यातायात जाम से मुक्ति दिलाना, बसों में मार्शलों की तैनाती, महिला सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरे, अच्छी शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को नए कार्यकाल में किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं, यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसमें गौर करना होगा कि अपनी सरकार के खजाने को घाटे में लाए बगैर जनता को कैसे ये तमाम सुविधाएं देना जारी रखते हैं, साथ ही दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़ा निवेश करने के लिए धन कहां से जुटाते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार दिल्ली सरकार ने पिछले पांच वर्षों में कोई नया कर लगाए बिना और करों में बढ़ोतरी किए बगैर इन लक्ष्यों को हासिल किया, उसे देखते हुए यह कोई ज्यादा बड़ी चुनौती नहीं होगी। दरअसल, देश के करीब तीन फीसदी वित्तीय घाटे के मुकाबले कई मुफ्त योजनाओं के बावजूद दिल्ली का वित्तीय घाटा आधा फीसदी से भी कम बताया जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह माना गया है कि राजस्व संग्रह के मामले में दिल्ली की पूर्ववर्ती सरकारों के मुकाबले केजरीवाल सरकार की स्थिति राष्ट्रीय स्तर के औसत से बेहतर है। केजरीवाल सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती गैस चेंबर में तब्दील होती दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर साफ-सुथरा शहर बनाने की है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार दिल्ली का प्रदूषण स्तर आपातकालीन स्थिति में पहुंच जाता है। इसके पीछे अन्य कारणों के अलावा दिल्ली से लगते हरियाणा, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में जलती पराली से निकलने वाले धुएं का भी अहम योगदान है। देखना होगा कि इस गंभीर समस्या से निपटने और दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए केजरीवाल क्या कदम उठाते हैं। दिल्ली को वर्ल्ड क्लास शहर बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना, दिल्ली सरकार के लिए दुष्कर होगा। जिस प्रकार दिल्ली में झुग्गी-झोंपडि़यों और रेहड़ी-पटरियों की तादाद लगातार बढ़ रही है, दिल्ली कैसे साफ-सुथरी बनेगी और विश्वस्तरीय स्मार्ट सिटी का दर्जा हासिल करेगी, कह पाना मुश्किल है। यमुना की सफाई भी बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि केजरीवाल स्वयं विपक्षी दलों के आरोपों के जवाब में चुनौती दे चुके हैं कि आगामी पांच वर्षों में वे यमुना को इतना साफ कर देंगे कि उसमें डुबकी लगाई जा सकेगी लेकिन पड़ोसी राज्यों के सहयोग के बिना यह लक्ष्य पूरा होना संभव नहीं होगा। चुनाव से कुछ समय पहले दिल्ली में दूषित पेयजल को लेकर काफी राजनीतिक गर्मागर्मी देखी गई थी। जहां केन्द्र सरकार की ओर से विभिन्न रिपोर्टों के हवाले से दिल्ली में अधिकांश जगहों पर दूषित पेयजल की सप्लाई के दावे किए गए थे, वहीं दिल्ली सरकार ने इन दावों को गलत बताते हुए साफ पानी उपलब्ध कराने के दावे किए थे। अपने चुनावी घोषणापत्र में केजरीवाल ने हर परिवार को 20 हजार लीटर मुफ्त पानी की योजना जारी रखने के साथ हर घर 24 घंटे शुद्ध पेयजल की सुविधा देने की बात कही थी। आने वाले समय में दिल्ली में स्वच्छ पानी की सप्लाई के लिए सरकार भले ही बड़े-बड़े जलशोधन संयंत्र लगाकर गंभीर प्रयास करती दिखे लेकिन दिल्ली की जनता को हर समय शुद्ध हवा और शुद्ध पानी निरन्तर मिले, इसके लिए जरूरी है कि पड़ोसी राज्यों का सहयोग दिल्ली सरकार को मिले।  जनलोकपाल बनाने, भ्रष्टाचार रोकने और दिल्ली को ईमानदार सरकार देने का वादा इस कार्यकाल में केजरीवाल कब और कैसे पूरा करेंगे, इसपर भी सभी की नजरें होंगी। दरअसल जनलोकपाल बिल पिछले काफी से केन्द्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। जनलोकपाल के मुद्दे से ही दिल्ली की राजनीति में कदम रखने वाले केजरीवाल पर चुनाव के दौरान निरन्तर आरोप लगते रहे कि वे जनलोकपाल को भूल चुके हैं। हालांकि केजरीवाल कहते रहे कि पिछले चार वर्षों से केन्द्र सरकार ने जनलोकपाल को लंबित रखा है और इसे पास कराने के लिए वे संघर्ष जारी रखेंगे। ऐसे में उनके लिए किसी भी प्रकार दिल्ली में जनलोकपाल को लागू करना बड़ी चुनौती है। केजरीवाल की ईमानदार प्रशासन की मुहिम पर भी काले बादल मंडराते रहे हैं। पांच साल पहले दिल्ली में प्रचण्ड बहुमत के साथ सरकार बनाने के बाद केजरीवाल ने लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने के गुर समझाते हुए कहा था कि वे उनसे रिश्वत मांगने वालों की वीडियो बनाकर पोस्ट करें, जिनपर सरकार कार्रवाई करते हुए भ्रष्ट कर्मचारियों को दंडित करेगी लेकिन पिछले काफी समय से कोई नहीं जानता कि लोगों द्वारा पोस्ट की गई ऐसी वीडियोज पर कितनी कार्रवाई हुई। दिल्ली के सरकारी विभागों का हाल भ्रष्टाचार के मामले में आज भी संतोषजनक नहीं है। लिहाजा, तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन केजरीवाल की जिम्मेदारियां, चुनौतियां और जनता के प्रति जवाबदेही पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। बेहतर यही होगा कि अपने नए कार्यकाल में वे केन्द्र के साथ टकराव का रास्ता छोड़ दिल्ली के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करने का प्रयास करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal, Opponents need excuse

सियाराम पांडेय 'शांत'   कुछ लोगों की बेवजह लड़ने, विरोध अथवा मीन-मेख निकालने की आदत होती है। जहां जरूरत न हो, वहां भी विवाद-फसाद की जमीन तैयार कर लेते हैं। वहीं, कुछ लोग सहजता में ऐसे काम कर जाते हैं जो विपरीत धारा के लोगों को न केवल उद्वेलित और विचलित करते हैं बल्कि उन्हें विरोध करने की आधारभूमि भी मुहैया कराते हैं। अच्छा होता कि नए प्रयोगों को अंजाम देने से पूर्व जनसम्मति ले ली जाती। विरोधियों की भी राय जान ली जाती। विरोधी से समर्थन की अपेक्षा बेमानी है लेकिन सबका दिल जीतने के प्रयास होते ही रहने चाहिए।   देश में महाकाल एक्सप्रेस को भी लेकर राजनीतिक विवाद आरंभ हो गया है। यह विवाद उसे धार्मिकता से जोड़ने को लेकर है। ट्रेन राष्ट्रीय संपत्ति है और इसे धार्मिक स्वरूप दिया जाना चाहिए या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन अकारण विवाद की स्थिति पैदा करना किसी लिहाज से ठीक नहीं। ट्रेन का नाम कुछ भी रखा जा सकता है। पहले भी देवी-देवताओं और महापुरुषों के नाम पर ट्रेनों का संचालन हुआ लेकिन कभी प्रतिवाद नहीं हुआ। काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस लंबे समय से चल रही है लेकिन इसमें बाबा विश्वनाथ के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं की गई। इसमें कोई मंदिर नहीं बनाया गया। कामाख्या एक्सप्रेस में भगवती कामाख्या का एक भी चित्र नहीं लगाया गया। वैद्यनाथ धाम एक्सप्रेस के साथ भी कमोबेश यही स्थिति रही है। अनेक ऐसी ट्रेन हैं जो देवी-देवताओं या तीर्थस्थलों के नाम पर हैं। सवाल उठता है कि जब बाकी ट्रेनों में इस तरह के प्रयोग नहीं हुए तो इसका क्या औचित्य है? कुछ लोग इस बात पर आपत्ति जाहिर कर सकते हैं कि सरकार ट्रेनों का भगवाकरण कर रही है लेकिन इस विचारधारा पर सम्यक चिंतन और मनन की भी आवश्यकता है।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 फरवरी को अपने संसदीय क्षेत्र से महाकाल एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। चूंकि यह ट्रेन महाकाल के नाम से शुरू की गई है, इसलिए रेलवे ने उसे महत्व देने की कोशिश की। इसके लिए उसने नवोन्मेष भी किया है। यह पहली ट्रेन है जिसमें कोच बी-5 में एक सीट भगवान महाकाल के लिए आरक्षित की गई है। अनजाने में कोई उस सीट पर बैठ न जाए, इसलिए सीट पर महाकाल का मंदिर बना दिया गया है। यह पहली ट्रेन है जिसमें इस तरह की व्यवस्था की गई है लेकिन इसपर राजनीति शुरू हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन औवेसी ने तो प्रधानमंत्री कार्यालय को ट्वीट कर ट्रेन की सीट पर शिव मंदिर बनाए जाने को लेकर सवाल उठा दिया है। उन्होंने अपने ट्वीट में संविधान की प्रस्तावना भी साझा की है और यह बताने-जताने की कोशिश की है कि संविधान में सभी धर्मों के लोगों के साथ समानता का व्यवहार करने की बात कही गई है। किसी ट्रेन के चलने और उसमें धार्मिक वातावरण बनाए रखने में किसी को क्या ऐतराज हो सकता है? रही बात महाकाल एक्सप्रेस की तो यह काशी, उज्जैन और ओंकारेश्वर को जोड़ती है। देश के दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच की यात्रा को आसान बनाती है। काशी विश्वनाथ, महाकाल, ओंकारेश्वर और मम्लेश्वर के प्रति शिवभक्तों की अपार आस्था है। उनकी श्रद्धा और विश्वास को यह ट्रेन मजबूती प्रदान करेगी, इतनी उम्मीद की जा सकती है। यात्री जिस स्थल पर जा रहा है, अगर उसके साथ सकारात्मक आध्यात्मिकता का समावेश हो, शुचिता और सद्भाव बना रहे तो इसमें बुराई क्या है? इस ट्रेन में भारत या दुनिया का कोई भी भारत आया पर्यटक भी यात्रा कर सकता है। किसी के लिये भी इस ट्रेन में न बैठने देने जैसा कोई नियम नहीं बनाया गया है, ऐसे में समानता के अधिकारों का हनन कहां होता है?   महाकाल एक्सप्रेस में भक्ति संगीत की व्यवस्था भी की गई है। हर कोच में दो निजी गार्ड होंगे और केवल शाकाहारी भोजन मिलेगा। हर कोच में पांच सुरक्षाकर्मियों की तैनाती होगी मतलब यात्री सुरक्षित और निरापद यात्रा कर सकेंगे, इस बात का विश्वास तो किया ही जा सकता है। जिस तरह महाकाल एक्सप्रेस का इंदौर में भजन गाकर स्वागत किया गया, वह काबिलेतारीफ है। यह स्वागत का सिलसिला रोज नहीं चलेगा, यह सबको पता है लेकिन इससे जनभावना का प्रकटीकरण तो होता ही है। ट्रेन में इंदौर का पोहा, काशी की कचौरी, पूड़ी-भाजी और भोपाल के आलूबड़े का स्वाद यात्री ले सकेंगे, यह क्या कम है? ट्रेन का न्यूनतम किराया भले ही अधिक हो लेकिन प्रति यात्री दस लाख रुपये का बीमा उम्मीद बढ़ाता है।   असदुद्दीन ओवैसी को इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए। वैसे भी ओवैसी ने सही निर्णयों पर भी सवाल उठाए हैं लेकिन उनकी देखादेखी अन्य राजनीतिक दल भी अपनी रोटी सेंक सकते हैं। बेहतर तो यही होगा कि इसे सकारात्मक नजरिये से ही देखा जाए। ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा के साथ उनके स्वस्थ मनोरंजन का भी ध्यान रखा जाए। इस बहाने रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाएं। अच्छा होता कि अन्य धर्मों के लोगों को सम्मान देते हुए और भी इस तरह की नई ट्रेनें चलाई जाएं। इससे देश में सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता का माहौल बनेगा। विरोध का बहाना ढूंढते बहुत दिन हो गए, अब विरोध में भी सकारात्मकता झलकनी चाहिए। विरोध जोश में नहीं, पूरी तरह होश में किया जाना चाहिए। आचार्य रजनीश ने कहा है कि अच्छे काम भी होश में रहकर किया जाना चाहिए और बुरे काम भी। आप अपने में बड़ा परिवर्तन देखेंगे, ऐसा परिवर्तन जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। रेलवे विभाग धार्मिक हो रहा है या अधार्मिक, यह उतना मायने नहीं रखता, जितना यह कि वह यात्रियों के मनोविज्ञान को समझ रहा है और बेहतर व्यावसायिकता को तरजीह दे रहा है। वह यात्रियों की सुरक्षा-संरक्षा, उनके स्वास्थ्य और मनोरंजन का ध्यान रख रहा है, विचार तो इसपर होना चाहिए।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 18 February 2020


bhopal,  Congress\

डॉ. अजय खेमरिया मप्र के उत्तरी औऱ मालवा इलाके में सोशल मीडिया पर एक नारा ट्रेंड कर रहा है- माफ करो कमलनाथ, हमारे नेता तो महाराज। कमलनाथ के दिल्ली आवास पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ समन्वय बैठक में हुए कथित टकराव के बाद मप्र में सिंधिया समर्थक आगबबूला हैं। खुलेआम मुख्यमंत्री कमलनाथ के विरुद्ध मुखर होकर बयानबाजी हो रही है। दावा किया जा रहा है कि अभी तो सिंधिया समन्वय बैठक से बाहर निकलकर आए हैं, अगर पार्टी से बाहर चले गए तो मप्र में दिल्ली जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। असल में मप्र काँग्रेस की अंदरुनी लड़ाई अब सड़कों पर आ गयी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी खुलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की चुनौती को स्वीकार कर उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए कह दिया है। 15 वर्षो तक सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के लिए मप्र में मुसीबत बीजेपी से कहीं ज्यादा खुद कांग्रेसियों से खड़ी होती रही है। सीएम पद की रेस में रहे सिंधिया लोकसभा का चुनाव हारने के बाद खुद को मप्र में अलग-थलग महसूस करते हैं। सरकार के स्तर पर मामला चाहे राजनीतिक नियुक्तियों का हो या प्रशासन में जो महत्व दिग्विजय सिंह को मिलता है वह सिंधिया को नहीं। इसलिये समानान्तर सत्ता केन्द्र के लिए समर्थकों द्वारा पिछले एक वर्ष से उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाये जाने के लिये आलाकमान पर दबाव बनाया जा रहा है। सिंधिया खुद अक्सर सरकार के विरुद्ध बयान देते रहे हैं, जिससे मुख्यमंत्री के लिये असहज स्थिति पैदा हो जाती है। अतिथि शिक्षकों की मांगों को लेकर सिंधिया ने एकबार फिर कमलनाथ के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर सड़कों पर उतरकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष का एलान कर दिया। किसानों की कर्जमाफी को लेकर भी उन्होंने जिस अतिशय विपक्षी सुर में अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उसने शांत प्रवृत्ति के कमलनाथ को जवाबी हमले के लिये मजबूर कर दिया। बताया जाता है कि दिल्ली में कमलनाथ के बंगले पर हुई बैठक में दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर भिड़ंत हो गई और सिंधिया बैठक से निकलकर चले गए। मुख्यमंत्री जो प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष भी हैं, अब खुलकर कह रहे हैं कि अगर सिंधिया को सड़कों पर उतरना है तो बेशक उतर जाएं। आमतौर पर कमलनाथ इस तरह के सीधे टकराव से अभीतक बचते रहे हैं। यह पहला अवसर है जब कमलनाथ ने सीधे सिंधिया को उनकी हद बताने का प्रयास किया है। वस्तुतः मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है। कमलनाथ ने उनके साथ आरम्भ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है। अक्सर सरकार के ऊपर होने वाले सभी नीतिगत हमलों को दिग्विजय सिंह ही फेस करते हैं। उनके समर्थक विधायक और मंत्री संख्या में सबसे अधिक हैं और कभी भी उनके द्वारा कमलनाथ की सम्प्रभुता को चैलेंज नहीं किया जाता है। दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक मंत्री अक्सर अफसरशाही, वचनपत्र से लेकर प्रदेश अध्यक्ष जैसे विषयों पर कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। मप्र के सियासी समीकरण में सबसे अहम फैक्टर दिग्विजय सिंह हैं। सर्वविदित है कि कमलनाथ को सीएम की कुर्सी दिग्विजय के वीटो से ही मिल सकी है। सिंधिया और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक अदावत दो पीढ़ी पुरानी है। ग्वालियर अंचल में सिंधिया परिवार के दो राजघरानों की सभ्य और संसदीय अदावत में दिग्विजय सिंह सदैव बीस साबित हुए हैं। मप्र की मौजूदा लड़ाई असल में कांग्रेस की जन्मजात गुटीय लड़ाई का ही एक पड़ाव है। कमलनाथ कभी मप्र की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहे हैं, जैसे दिग्विजय या सिंधिया। न ही उनका वैसा कोई जमीनी और कैडर आधारित जनाधार है। राजनीतिक परिस्थितियों के चलते दिग्विजय सिंह कमलनाथ के साथ हैं और इसकी एक वजह सिंधिया को रोकना भी है। असल में सिंधिया जिस शाही आवरण के साथ सियासत करते हैं वह मप्र के दूसरे सियासी क्षत्रपों को रास नहीं आती है। अपने पिता के उलट उनके राजनीतिक विरोधी प्रतिक्रियात्मक धरातल पर उनसे मुकाबले के लिये खड़े हो जाते हैं। गुना लोकसभा सीट पर उनकी अप्रत्याशित पराजय ने उन्हें मप्र में सत्ता विमर्श के केंद्र से बाहर-सा कर दिया है। इसीलिए उनके समर्थक जिन्हें उनकी भी सहमति होती है पार्टी लाइन से परे जाकर प्रदेश अध्यक्ष के लिये लाबिंग करते रहे हैं। मप्र में इसबार कांग्रेस की वापसी में ग्वालियर चंबल की उन 34 सीटों का निर्णायक योगदान है, जिनमें से 26 पर पार्टी को जीत मिली है। सिंधिया इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं और विधानसभा चुनाव की पूरी कैम्पेन 'अबकी बार सिंधिया सरकार' के साथ हुई थी। ऐसे में सिंधिया और उनके समर्थकों को लगता है कि आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है। इस बीच लोकसभा चुनाव में हुई हार ने माहौल को और खराब कर दिया। पिछले 7 महीने से सिंधिया अक्सर सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। किसान कर्जमाफी को लेकर उनके बयान विपक्षियों की भाषा और लहजे की प्रतिध्वनि करते हैं। ताजा विवाद अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण पर है, जिसे लेकर सिंधिया ने सरकार के विरूद्ध सड़कों पर उतरने की धमकी दी है। उन्होंने पार्टी के वचनपत्र को लेकर भी कमलनाथ को कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री ने जिस तल्खी के साथ पहली बार सिंधिया को जवाब दिया है वह बताता है कि पार्टी में अब गुटबाजी नियंत्रण से बाहर हो चली है। प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोविन्द सिंह ने तत्काल सिंधिया को सरकार के खाली खजाने का अवलोकन करने की सलाह दे डाली। इस बयान को दिग्विजय कैम्प का जवाब भी कहा जा रहा है। वहीं, सिंधिया समर्थक मंत्री गोविंद राजपूत ने सागर में एकदिन पहले कर्जमाफी न कर पाने पर सिंधिया की मौजूदगी में अफसोस जताया था। यानी मप्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के साथ भी नहीं चल रही है। दूसरी तरफ दिग्विजय और कमलनाथ की कैमिस्ट्री अभी भी बेहतरीन है। मार्च में प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर भी मतदान होना है। एक सीट पर दिग्विजय सिंह का जाना तय है तो दूसरी पर सिंधिया की दावेदारी रोकने के लिये अब आदिवासी या ओबीसी कार्ड भी चला जा सकता है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सत्ता का समानान्तर केंद्र विकसित किया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  The problem of moral problems and confusion arising from literature

मनोज ज्वाला   आज देश के सामने जितनी भी समस्याएं और चुनैतियां हैं, उनका मूल कारण वस्तुतः बौद्धिक संभ्रम है। यह अज्ञानतावश या अंग्रेजी मैकाले शिक्षा व साहित्य से निर्मित औपनिवेशिक सोच का परिणाम है अथवा वैश्विक महाशक्तियों के भारत विरोधी साम्राज्यवादी षड्यंत्र का दुष्परिणाम। राष्ट्रीय एकता-अखण्डता पर प्रहार करता रहने वाला आतंकवाद, अलगाववाद, क्षेत्रीयतावाद, सम्प्रदायवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद हो या आर्थिक विषमता की खाई चौड़ी करने वाली समस्याओं में शुमार भूख, बेरोजगारी, गरीबी, पलायन, शोषण-दमन हो अथवा सामाजिक जीवन की शुचिता-नैतिकता को निगलने वाला अनाचार, व्याभिचार, भ्रष्टाचार या व्यैक्तिक-पारिवारिक जीवन में घर करती जा रही स्वार्थपरायणता व संकीर्णता, सबका मूल कारण अनर्गल बौद्धिक-शैक्षिक परिपोषण ही है। जबकि किसी भी व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र की बौद्धिकता-शैक्षिकता का सीधा सम्बन्ध साहित्य से है। साहित्य न केवल संस्कृति के संवर्द्धन में सहायक है, अपितु लोकमानस व लोक-प्रवृति के निर्माण में भी साहित्य की कारगर भूमिका होती है।   उल्लेखनीय है कि अपने देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में जबतक राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता रहा, तबतक राष्ट्रीय एकता अखण्डता की भावनायें राजनीतिक दासता से स्वतंत्रता-प्राप्ति तक पुष्ट होती रहीं। किन्तु स्वतंत्र्योत्तर साहित्य में जब वामपंथी धारा के बहाव से जनवाद, दलितवाद, नारीवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद जैसी प्रवत्तियां मुखरित हो उठीं; उनके प्रभाव-दुष्प्रभाव से देश में पृथकतावाद व जातिवाद ही नहीं, आतंकवाद व नक्सलवाद का हिंसक विषवमन भी होने लगा, जो आज राष्ट्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियां बनी हुई है। इन अनुचित-अवांछित ‘वादों’ का किसी न किसी रूप में साहित्य से भी पोषण हो रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। आज जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शीर्षस्थ शिक्षण संस्थानों में भारत-विरोधी नारे मुखरित हो रहे हैं, गोमांस भक्षण के समारोह आयोजित हो रहे हैं; तो समझा जा सकता है कि ऐसी मनःस्थिति व राष्ट्र-विरोधी प्रवृति के निर्माण में साहित्य की खास धारा प्रभावी भूमिका निभा रही है।   इसी तरह से व्यक्ति के नैतिक पतन और लगातार बढ़ रहे पारिवारिक विघटन में भी कहीं-न-कहीं ऐसी प्रवृत्तियों का निर्माण करने वाले साहित्य का ही योगदान है। साहित्य के नाम पर जनमानस को अवांछित-गर्हित विचारों का मानसिक आहार परोसा जाना इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं है। यह साहित्य की एक खास धारा का ही प्रभाव है, जिसकी वजह से परिवार की परिभाषा बदलकर पति-पत्नी व बच्चे तक सिमट गई। ‘प्रेम’ व ‘प्यार’ जैसे पवित्र शब्दों को युवक-युवती या स्त्री-पुरुष के दैहिक आकर्षण एवं मैथुनिक आचरण में परिणत कर देने और इसके परिणामस्वरूप समाज में बढ़ रहे व्याभिचार-बलात्कार की प्रवृत्तियों के लिए साहित्य जिम्मेवार है। स्थिति यह हो गई है कि किसी युवती-स्त्री के प्रति मैथुन-प्रेरित पशुवत आचरण करने वाले निकृष्ट अपराधी को भी उस स्त्री-युवती का प्रेमी कहा जाने लगा है, तो दूसरी ओर भाई-बहन के परस्पर सम्बन्ध के स्वरूप को ‘प्रेम’ या ‘प्यार’ कहे जाने में लोगों को संकोच होने लगा है।   यह साहित्य ही है, जिसके आधार पर समाज में नैतिक पतन व चारित्रिक क्षरण को बढ़ावा देने वाली फिल्मों के निर्माण हो रहे हैं। समाज में व्याभिचार फैलाने वाली फिल्मों के निर्माण व अभिनयन हेतु कच्चे माल के तौर पर फूहड़ गीतों व कहानियों की आपूर्ति साहित्य से ही हो रही है। आज किशोर-किशोरियों, युवक-युवतियों को फिल्मी कथा-कहानियों से प्रेरित होकर अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करने तथा जीवनसाथी स्वयं चयनित करने और उस निर्धारण-चयन में माता-पिता की उपेक्षा करने में साहित्य ही प्रेरक बना हुआ है। पारिवारिक विघटन के लिए और भी तत्व चाहे जितने भी जिम्मेवार हों, किन्तु साहित्य इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेवार है। अपने देश में संयुक्त परिवारों का विघटित सिर्फ सामाजिक चुनौती के रूप में चिन्हित हो रहा है, मगर यह पारिवारिक विघटन प्रकारान्तर से राष्ट्रीय चुनौती भी है; क्योंकि इससे एकता की भावना खण्डित होती है, स्वार्थपरता बढ़ती है और सामूहिक-पारिवारिक विकास अवरुद्ध होता है, जिससे अंततः राष्ट्र कमजोर होता है।   आज देश की राष्ट्रीय अस्मिता एवं पुरातन संस्कृति और भारतीय धर्म-दर्शन, जीवन-दृष्टि तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के प्रति हमारी पीढ़ियों में बढ़ती अरुचि एवं निष्ठाहीनता तथा पश्चिम के प्रति बढ़ती पलायनवादिता के लिए भी कहीं न कहीं वर्तमान साहित्य भी जिम्मेवार है। हालांकि इन सबके प्रति लोगों में बची-खुची थोड़ी-बहुत निष्ठा, रुचि व आकर्षण भी पूर्ववर्ती साहित्य के कारण ही कायम है; इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। आज हमारे देश में जिस तरह की शिक्षा-पद्धति है, उससे हमारी अस्मिता अबतक तो समाप्त हो जानी चाहिए थी; इसके बावजूद अगर हमारे भीतर राष्ट्रीयता अभी जीवित है तो निस्संदेह इसका श्रेय साहित्य को ही है। जिससे यह प्रमाणित होता है कि साहित्य की तत्सम्बन्धी सृजनशीलता से यह और पुष्ट हो सकती है; जबकि यथास्थितिवादिता से हमारी अस्मिता धीरे-धीरे मिट भी सकती है।   देश की समस्याओं व चुनौतियों का कारण राजनीतिक प्रदूषण है और इस राजनीति का अभीष्ट सिर्फ शासनिक सत्ता है। ऐसे में इन चुनौतियों का समाधान साहित्य में ही ढूंढना वांछित है। कहा भी गया है गया है कि राजनीति जब डगमगाती है तो साहित्य उसे गिरने से बचाता है। किन्तु यह तभी सम्भव है जब साहित्य अपने धर्म-पथ पर अडिग रहे। किन्तु देश की वर्तमान स्थिति भिन्न है। साहित्य की एक धारा साहित्य के स्वधर्म के पथ पर नहीं, बल्कि राजनीति के एक पथ-विशेष पर उन्मुख हो उसी की हां में हां मिलाता रहा है। स्वातंत्र्योत्तर भारत का लोकमानस गढ़ने में राजनीति व साहित्य की इसी दुरभिसंधि का योगदान रहा है, जिसके तहत अब राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने पर पुरस्कार-सम्मान वापसी से लेकर सहिष्णुता-असहिष्णुता को मापने तक के प्रहसन किये जा रहे हैं। ऐसे में साहित्य की भूमिका न केवल बढ़ी है बल्कि बदल भी गई है। साहित्य व राजनीति की दुरभिसंधि अगर कायम रही, तो स्थिति और बिगड़ती जाएगी। अतएव साहित्य को अपने स्वधर्म पर लौटना होगा और धर्म के मार्ग पर ही अडिग रहना होगा। तभी बौद्धिक संभ्रम के कारण कायम तमाम नैतिक समस्याओं का समाधान हो पाएगा और स्वस्थ बौद्धिक विमर्श का वातावरण निर्मित होगा।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  Martyrdom on the altar of independence

(असहयोग आंदोलन के पहले शहीद पत्रकार पंडित रामदहिन ओझा के शहादत दिवस 18 फरवरी पर विशेष) विनय के. पाठक देश की आजादी के आंदोलन से पत्रकारिता का विशेष संबंध रहा है। आजादी के आंदोलन में आम लोगों के बीच अलख जगाने में तत्कालीन अखबारों और पत्रकारों की भूमिका, दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों से कम नहीं है। अनेक पत्रकारों ने आजादी के आंदोलन में घर-परिवार छोड़ देश पर सर्वस्व न्योछावर कर दिया। अपनी लेखनी के बल पर उन्होंने अनगिनत लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। इसकी वजह से उन्हें तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, कठोर कारावास तक की सजा भुगतनी पड़ी और कुछ ने तो स्वतंत्रता की वेदी पर बलिदान तक दिया। ऐसे ही आजादी के मतवाले पत्रकारों में एक नाम पंडित रामदहिन ओझा का भी है, जिन्हें गांधीजी के असहयोग आंदोलन के दौरान देश के लिए शहादत देने वाला पहला पत्रकार माना जाता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश का हर कोना अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ समर्पित हो चला था। शायद ही कोई भौगोलिक क्षेत्र, समुदाय अथवा वर्गीय लोग हों, जिन्होंने इस यज्ञ में आहुति न दी हो। पत्रकार और पत्रकारिता तो देश के लिए इस लड़ाई में सबसे आगे रहने वाला हिस्सा था। ऐसे ही पत्रकार सेनानियों में एक थे कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से 1923-24 में प्रकाशित होने वाले हिन्दी साप्ताहिक 'युगांतर' के सम्पादक पंडित रामदहिन ओझा। उत्तर प्रदेश के बलिया जिलान्तर्गत बांसडीह कस्बे के रहने वाले पंडित रामदहिन ओझा अपनी ओजस्वी लेखनी और आजादी के लिए जन आंदोलन में अपने भाषणों के आरोप में कई बार गिरफ्तार किए गये। जिस समय बलिया जेल में उनकी शहादत हुई, उनकी उम्र सिर्फ 30 वर्ष थी। उनके साथी रहे स्वतंत्रता सेनानी हमेशा कहते रहे कि पंडित रामदहिन ओझा के खाने में धीमा जहर दिया जाता रहा और इसी कारण उनकी मृत्यु हुई। ऐसे सेनानी के बारे में संक्षेप में कहें तो मात्र 30 वर्ष के उनके सम्पूर्ण जीवन के बहुआयामी पक्ष हैं। कवि, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनके सारे आयाम देश को समर्पित थे। उस दौर में जब पूर्वी उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अधिकांश क्षेत्र में प्रगति का नामोनिशान तक नहीं था, प्रारम्भिक शिक्षा के बाद रामदहिन ओझा के पिता उन्हें आगे की शिक्षा के लिए कलकत्ता ले गये। क्रांतिकारियों की इस धरती पर उन्हें मातृभूमि के लिए समर्पण की प्रेरणा मिली। बीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते देशभक्त लेखक पत्रकार रामदहिन ओझा की कलकत्ता और बलिया में स्वतंत्रता योद्धाओं और सुधि राष्ट्रसेवियों के बीच पहचान बन चुकी थी। कलकत्ता के 'विश्वमित्र', 'मारवाणी अग्रवाल' आदि पत्र-पत्रिकाओं में कुछ स्पष्ट नाम तो कुछ उपनाम से उनके लेख और कविताएं छपने लगी थीं। उन्होंने कलकत्ता, बलिया और गाजीपुर की भूमि को सामान्य रूप से अपना कार्यक्षेत्र बनाया। आजादी के लिए अनुप्रेरक उनकी लेखनी और ओजस्वी भाषण ही था, जिसके चलते उन्हें पहले बंगाल, बाद में बलिया और गाजीपुर से निष्कासन का आदेश थमा दिया गया। उनकी 'लालाजी की याद में' और 'फिरंगिया' जैसी कविताओं पर प्रतिबंध लगा। वर्ष 1921 में छह अन्य सेनानियों के साथ बलिया में पहली गिरफ्तारी में बांसडीह कस्बे के जिन सात सेनानियों को गिरफ्तार किया गया, पंडित रामदहिन ओझा उनमें सबसे कम उम्र के थे। गांधीजी ने इन सेनानियों को असहयोग आंदोलन का सप्तऋषि कहा था। रामदहिन ओझा 1922 और 1930 में फिर गिरफ्तार किये गये। अंतिम गिरफ्तारी में 18 फरवरी 1931 का वो काला दिन भी आया जब रात के अंधेरे में बलिया जेल और जिला प्रशासन ने मृतप्राय सेनानी को उनके मित्र, प्रसिद्ध वकील ठाकुर राधामोहन सिंह के आवास पहुंचा दिया। उन्हें बचाया नहीं जा सका। बाद में पद्मकांत मालवीय कमेटी ने अपनी जांच में पाया कि पंडित ओझा के खाने में मीठा जहर मिलाया जाता रहा, इसके चलते उनकी मौत हुई। इस तरह एक युवा सेनानी 1931 के प्रारम्भ में ही शहीद हो गया। उनके बलिदान और 1921 तथा 1930-31 में देशसेवा के उल्लेखनीय योगदान ने बलिया के सेनानियों में ऐसी ऊर्जा का संचार किया, जिसका प्रस्फुटन 1942 की जनक्रांति में दिखाई देता है। बंगाल के मेदिनीपुर और महाराष्ट्र के सतारा की तरह बलिया के सेनानियों ने 1942 में ही कुछ दिनों के लिए अपनी आजाद सरकार चलाई थी। निश्चित ही इसकी प्रेरणा पंडित रामदहिन ओझा जैसे सेनानियों से भी मिली होगी। वैसे भी आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश के बलिया का हमेशा ही विशेष उल्लेख किया जाता है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में बलिया के मंगल पांडेय की पहली शहादत हुई थी तो 1942 में बंगाल के मेदिनीपुर और महाराष्ट्र के सतारा की तरह बलिया भी कई दिनों तक स्वाधीन रहा। इसके नायक चित्तू पांडेय थे। इसी तरह माना जाता है कि असहयोग आंदोलन में किसी पत्रकार की पहली शहादत बलिया के ही पंडित रामदहिन ओझा की थी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 February 2020


bhopal,  Message from mandate of delhi

प्रभुनाथ शुक्ल   दिल्ली का जनादेश राजनीतिक दलों, खासतौर पर भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़ा सबक है। आम आदमी पार्टी की जीत को महज हार-जीत के तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए। आप और केजरीवाल की जीत में दिल्ली के मतदाताओं की मंशा को समझना होगा। दिल्ली में कांग्रेस की जमीन खत्म हो गई है। उसकी बुरी पराजय पार्टी के नीति नियंताओं पर करारा थप्पड़ है। कभी दिल्ली कांग्रेस की अपनी थी। शीला दीक्षित जैसी मुख्यमंत्री ने दिल्ली को बदल दिया था। वहां के जमीनी बदलाव के लिए आज भी शीला दीक्षित को याद किया जाता है। लेकिन उनके जाने के बाद दिल्ली से कांग्रेस का अस्तित्व मिट गया। यह सोनिया और राहुल गांधी के लिए आत्ममंथन का विषय है। दिल्ली की जनता ने तीसरी बार केजरीवाल को केंद्र शासित प्रदेश की सत्ता सौंप साफ कर दिया कि जो सीधे जनता और उसकी समस्याओं से जुटेगा, दिल्ली पर उसी का राज होगा। भावनात्मक मसलों से वोट नहीं हासिल किए जा सकते। भाजपा ने दिल्ली पर भगवा फहराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी लेकिन मतदाताओं के बीच मुख्यमंत्री केजरीवाल की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इस परिणाम ने यह साबित कर दिया है कि सिर्फ मोदी और हिंदुत्व को आगे कर भाजपा हर चुनावी मिशन फतह नहीं कर सकती है। भाजपा 22 साल बाद भी अपना वनवास नहीं खत्म कर पाई।   देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं बचा। वह भाजपा की बुरी पराजय पर सीना भले ठोंक ले लेकिन उसके लिए आत्ममंथन का विषय है। दिल्ली जैसे राज्य में उसका सफाया बेहद चिंता की बात है। पांच सालों के दौरान आखिर दिल्ली में कांग्रेस और सोनिया गांधी गांधी का कुनबा कर क्या रहा था। दिल्ली में अपनी उपलब्धियां बताने के लिए उसके पास बहुत कुछ था, लेकिन कांग्रेस ने उसका भरपूर उपयोग नहीं किया। कांग्रेस की दुर्गति शीर्ष नेतृत्व को भले न हैरान करे लेकिन देश में बचे-खुचे उसके समर्थकों को उसकी पराजय बेहद खली है। बड़बोले राहुल गांधी ने सिर्फ मोदी को कोसने में अपनी सारी उर्जा खत्म कर दी। ट्यूटर हैंडिल की राजनीति से बाहर निकलना होगा। राहुल गांधी अपने नेतृत्व में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। राहुल गांधी खुद की दिल्ली में एक सीट नहीं निकाल पाए। अपनी बयानबाजी से संसद से लेकर सड़क तक सिर्फ मजाक बनते दिखे। प्रियंका गांधी की नजर यूपी पर भले है लेकिन दिल्ली को लावारिस छोड़ना कहां का न्याय है। प्रियंका गांधी हाल ही में वाराणसी में संत रविदास की जयंती पर पहुंच दलित कार्ड खेलने की कोशिश की। इसके पहले भी वह सोनभद्र के उम्भाकांड और दूसरे मसलों पर राज्य की योगी सरकार को घेरती रही हैं लेकिन खुद अपनी नाक नहीं बचा पाई। पूरा गांधी परिवार दिल्ली में है लेकिन एक भी सीट कांग्रेस नहीं निकाल पाई। पूरी की पूरी कांग्रेस सिर्फ गांधी परिवार की परिक्रमा में खड़ी दिखती है। शायद महात्मा गांधी ने सच कहा था कि कांग्रेस को अब खत्म कर देना चाहिए। जबतक कांग्रेस आतंरिक गुटबाजी से बाहर नहीं निकलती है उसकी पुनर्वापसी संभव नहीं है। कांग्रेस को गांधी परिवार की भक्ति से बाहर निकलना होगा। कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए सोनिया गांधी को कड़े फैसले लेने होंगे। युवा चेहरों को आगे लाना होगा। सिर्फ राहुल और प्रियंका गांधी को आगेकर कांग्रेस का कायाकल्प नहीं किया जा सकता।   भाजपा आठ सीट जीतकर भले कहे कि उसने कुछ खोया नहीं बल्कि 2015 के आम चुनाव से इसबार उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है। लेकिन इस तर्क का कोई मतलब नहीं है। भाजपा की पूरी रणनीति फेल हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव की दिशा को शाहीनबाग की तरफ मोड़ने की कोशिश की लेकिन उसका परिणाम उल्टा पड़ गया। चुनाव पूर्व आए सर्वेक्षणों में यह बात साफ हो गई थी कि दिल्ली की जनता की पहली पंसद केजरीवाल हैं। लोगों ने झाडू पर वोट करने का मूड बना लिया था। लेकिन इस बात को भाजपा नहीं समझ पाई। दिल्ली में आप मुखिया केजरीवाल ने दिल्ली वालों को मुफ्त की बिजली-पानी के साथ, मोहल्ला क्लीनिक, बेहतर स्कूल और शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई है। झुग्गी वालों को कॉलोनियों की सुविधा दी है। जिसका परिणाम रहा कि जनता ने उन्हें वोट किया।   दिल्ली भाजपा और उसका केंद्रीय नेतृत्व ने चुनावी दिशा मोड़ उसे हिंदू बनाम मुस्लिम करने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सीएए के खिलाफ शाहीनबाग में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन को मुद्दा बनाया गया और केजरीवाल को आतंकवादी तक कहा गया। भाजपा सोचती थी कि शाहीनबाग को आगे कर चुनाव की दिशा बदली जा सकती है लेकिन धोखा खा गई। मुस्लिम मतों का पूरा ध्रुवीकरण आप की तरफ मुड़ गया, जिसकी वजह से कांग्रेस जैसी पार्टी एक भी सीट नहीं निकाल पाई। भाजपा यह चाहती थी कि दिल्ली के चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल कर दिया जाए लेकिन केजरीवाल ने सीधे हमले के बजाय जनता के बीच सिर्फ अपनी बात रखी। केजरीवाल ने आक्रामक राजनीति को हाशिए पर रखा। प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमलों से बचते रहे। सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव हैं। अगर रणनीति में बदलाव नहीं हुआ तो बिहार और पश्चिम बंगाल की डगर और भी मुश्किल होगी। कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए यह चिंता का विषय है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal,  Delhi\

डॉ. अजय खेमरिया   दिल्ली में मिली चुनावी शिकस्त की इबारत बहुत स्पष्ट है। यह बीजेपी के लिये सामयिक महत्व रखती है। बेहतर होगा नए अध्यक्ष जेपी नड्डा उन बुनियादी विषयों को पकड़ने की पहल सुनिश्चित करें, जिन्हें पकड़कर अमित शाह ने सफलता के प्रतिमान खड़े किए। सत्ता के साथ आई अनिवार्य बुराइयों ने बीजेपी को भी अपने शिकंजे में ले लिया है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि बीजेपी मूल रूप से व्यक्ति आधारित चुनावी दल नहीं है। उसका एक वैचारिक धरातल और वैशिष्ट्य भी है। दिल्ली हो या झारखंड, मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान सभी स्थानों पर वह बड़ी राजनीतिक शक्ति रखती है तथापि पार्टी की सूबों में निरन्तर हार, चिंतन और एक्शन प्लान की मांग करती है। दिल्ली में पार्टी की यह लगातार छठवीं पराजय है। निःसंदेह मोदी-शाह की जोड़ी ने बीजेपी को उस राजनीतिक मुकाम पर स्थापित किया जहां पार्टी केवल कल्पना कर सकती थी। दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना बीजेपी और भारत के संसदीय लोकतंत्र में महज चुनावी जीत नहीं बल्कि एक बड़ी परिघटना है। अमित शाह और मोदी वाकई बीजेपी के अभूतपूर्व उत्कर्ष के शिल्पकार हैं। ये जोड़ी परिश्रम की पराकाष्ठा पर जाकर काम करती है। बावजूद बीजेपी के लिये अब सबकुछ 2014 के बाद जैसा नहीं है। यह समझने वाला पक्ष है कि दीनदयाल उपाध्याय सदैव व्यक्ति के अतिशय अबलंबन के विरुद्ध रहे। उन्होंने परम्परा और नवोन्मेष के युग्म की वकालत की।   सफलता की चकाचौंध अक्सर मौलिक दर्शन को चपेट में ले लिया करती है। बीजेपी के लिए मौजूदा चुनौती यही है जो चुनावी हार-जीत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। दिल्ली, झारखंड, मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान में मिली शिकस्त यही सन्देश देती है कि वक्त के साथ बुनियादी पकड़ कमजोर होने से आपकी दिव्यता टिक नहीं पायेगी। बीजेपी की बुनियाद उसकी वैचारिकी के अलावा उसका कैडर भी है। यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि पार्टी के अश्वमेघी विजय अभियान के कदमताल में उसका मूल कैडर बहुत पीछे छूटता जा रहा है। कभी यही गलती देश की सबसे बड़ी और स्वाभाविक शासक पार्टी कांग्रेस ने भी की थी। राज्यों के मामलों को गहराई से देखा जाए तो मामला कांग्रेस की कार्बन कॉपी प्रतीत होता है। दिल्ली में मनोज तिवारी का चयन हर्षवर्धन, विजय गोयल, मीनाक्षी लेखी जैसे नेताओं के ऊपर किया जाना किस तरफ इशारा करता है? बेशक मोदी और शाह के व्यक्तित्व का फलक व्यापक और ईमानदार है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि करोड़ों लोगों ने बीजेपी को अपना समर्थन वैचारिकी के इतर सिर्फ शासन और रोजमर्रा की कठिनाइयों में समाधान के नवाचारों के लिए भी दिया है। राज्यों में जिस तरह के नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा रहा है वे न मोदी-शाह की तरह परिश्रमी हैं न ही उतने ईमानदार।   मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान, झारखंड की पराजय का विश्लेषण ईमानदारी से किया जाता तो दिल्ली में तस्वीर कुछ और होती। हकीकत यह है कि राज्यों में बीजेपी अपवादस्वरूप ही सुशासन के पैमाने पर खरी उतर पाई है। इन राज्यों में न बीजेपी का कैडर अपनी सरकारों से खुश रहा न जनता को नई सरकारी कार्य संस्कृति का अहसास हो पाया। मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान, झारखंड में नारे लगते थे वहां के मुख्यमंत्रियों की खैर नहीं, मोदी तुमसे वैर नहीं। इसे समझने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई।   यह सही है कि राज्य दर राज्य पराजय के बावजूद बीजेपी का वोट प्रतिशत कम नहीं हुआ है लेकिन लोगों के इस भरोसे को सहेजने की ईमानदारी भी दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी वामपंथी और नेहरूवादी वैचारिकी से लड़ती दिखाई देती है लेकिन इसके मुकाबले के लिये क्या संस्थागत उपाय पार्टी की केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा किये गए हैं? पार्टी ने सदस्यता के लिये ऑनलाइन अभियान चलाया लेकिन उस परम्परा की महत्ता को खारिज कर दिया, जब उसके स्थानीय नेता गांव, खेत तक सदस्यता बुक लेकर 2 रुपए की सदस्यता करते थे और परिवारों को जोड़ते थे। जिन राज्यों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई, वहां आज वे चेहरे नजर नहीं आते जो सरकार के समय हर मंत्री के कहार बने रहते थे। नतीजतन राज्यों में बीजेपी का कैडर ठगा रह जाता है।   जिस परिवारवाद पर प्रधानमंत्री प्रहार करते हैं, वह बीजेपी में हर जिले में हावी है। हर मंडल और जिलास्तर पर चंद चिन्हित चेहरे ही नजर आएंगे जो संगठन, सत्ता, टिकट, कारोबार यानी सब जगह हावी हैं। यह समझने की जरूरत है कि आज का भारत खुली आंखों से सोचता है। वह 370, आतंकवाद, कश्मीर, तुष्टिकरण, पाकिस्तान से निबटने के लिए मोदी में भरोसा करता है तो यह जरूरी नहीं कि मोदी के नाम पर अपने स्थानीय बीजेपी विधायक के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को भी स्वीकार करे। इस नए भारत को मोदी की तरह पार्टी के स्थानीय नेतृत्व को भी समझना होगा।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal, BJP policy not change the intention of its leaders

मनोज ज्वाला   राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद झारखण्ड तक हार चुकी भाजपा दिल्ली भी नहीं जीत सकी। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘सत्ता के केन्द्र’ में विराजमान भाजपा अब देश के ‘केन्द्र’ में नहीं बल्कि सिर्फ ‘देश की सत्ता के शीर्ष’ पर आसीन रहेगी और देश के आन्तरिक सत्ता प्रतिष्ठानों से बेदखल होती रहेगी। पांच राज्यों में हार के बाद भाजपा इसके कारणों की समीक्षा करती रही है। स्वाभाविक है ‘दिल्ली से दूर’ रहने के कारणों की भी पड़ताल करेगी। जिस पार्टी को पिछले साल ही संसदीय चुनाव में देशभर के मतदाताओं ने आशा से अधिक प्रचण्ड बहुमत देकर केन्द्रीय सत्ता के शीर्ष पर दोबारा आसीन किया, उसी दल को विधानसभा चुनाव में उन्हीं मतदाताओं द्वारा नकार दिया जाता है तो यह उस पार्टी के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी गहन चिन्तन-मंथन का विषय अवश्य है। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनाव में एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के लगातार पराभव का कारण उसकी नीतियां ही हैं या और कुछ?   यह बात भी सही है कि संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनावों के मुद्दे एक-दूसरे से भिन्न होते हैं किन्तु यह भी गौरतलब है कि जिन प्रदेशों की सत्ता भाजपा को गंवानी पड़ी, उन प्रदेशों में पहले से कायम उसकी सरकार की प्रादेशिक रीतियां-नीतियां-गतिविधियां अथवा जनकल्याण की उसकी विधियां कहीं से भी गलत नहीं थी। केन्द्र सरकार की तरह उन राज्यों की उसकी सरकारें भी आमतौर पर शुचिता व पारदर्शिता से युक्त एवं भ्रष्टाचार से मुक्त होने के साथ-साथ चुस्त-दुरुस्त व कमोबेश लोकप्रिय भी थीं। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में नक्सली आतंक-अत्याचार पर काबू पाने का श्रेय भाजपा के नाम ही दर्ज है। इसी तरह से राजस्थान व महाराष्ट्र में उसकी सरकार कांग्रेस की तुलना में ज्यादा कल्याणकारी थीं। बावजूद इसके विधानसभा चुनावों में वह सत्ता से बेदखल हो गई। पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उससे उसकी नीति के बजाय उसके नेताओं की नीयत व कार्यपद्धति की ओर संकेत मिलता है। प्रायः इन सभी प्रदेशों में भाजपा की हार ‘भाजपाइयों’ के कारण हुई दिखती है। भाजपा के छुटभैये नेता और उसके जमीनी कार्यकर्ताओं ने ही उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव की बात करें तो दिल्ली प्रदेश में भाजपा सदस्यों की संख्या 62 लाख से भी अधिक है किन्तु उसे प्राप्त हुए कुल मतों की संख्या मात्र 35 लाख है। प्राप्त मतों में आम जनता के मत भी शामिल हैं। मतलब साफ है कि उसके सभी सदस्यों ने भी उसे अपना मत नहीं दिया।   संसदीय चुनाव के दौरान उसके राष्ट्रवाद और मोदी जी के आदर्शवाद से प्रेरित-प्रभावित होकर दिल्ली की सभी सातों लोकसभा क्षेत्रों में जिन लोगों ने उसे भारी बहुमत से विजय प्रदान कर दिया, उसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्हीं लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 निरस्त करने और पाकिस्तानी हिन्दुओं को नागरिकता प्रदान करने सहित राष्ट्रीय महत्व के कई काम करने के बावजूद आखिर ऐसा क्यों हुआ? कम से कम दिल्ली में तो भाजपा को प्राप्त कुल मतों के आंकड़ों से तो साफ हो जाता है कि उसके सदस्यों की कुल संख्या जो 62 लाख है, वह या तो फर्जी हैं या उसके आम सदस्य और आम कार्यकर्ता भी उससे नाराज हैं। इन दोनों ही स्थितियों में उसके नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति के दोष उजागर हो जाते हैं।   इसी तरह मोदी लहर के सहारे सांसद बने बड़े भाजपाई पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और सामान्य सदस्यों से असामान्य दूरी बनाकर अपने ऊपर के नताओं की परिक्रमा में लगे रहे होंगे। भाजपा के भीतर-बाहर यह आम शिकायत है कि उसके नेतागण सत्ता या संगठन में बड़ा पद हासिल कर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेते हैं। फलतः पांच वर्षों तक हैरान-परेशान कार्यकर्ता चुनाव के ऐन मौके पर अपनी भड़ास निकालने के लिए या तो पार्टी के विरोध में चला जाता है या मन मारकर चुपचाप घर बैठ जाता है । बची-खुची कसर दल-बदलुओं को चुनावी टिकट देकर पूरी हो जाती है। झारखण्ड में यही हुआ।   दूसरी ओर भाजपा विरोधी दल और उनके नेता-नियन्ता सत्ता हासिल करते ही अपने कार्यकर्ताओं को शासनतंत्र का हिस्सा बना कर उन्हें न केवल संतुष्ट किये रखते हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी उनकी स्थिति सुदृढ़ बना देते हैं। सत्ता में रहने के दौरान वे अपने कार्यकर्ताओं से नजदीकी बनाए रखने में भी लगे रहते हैं। पांच साल अपने मतदाताओं-समर्थकों के हितों की चिन्ता भी करते हैं। अपना वोटबैंक बनाये रखना उनकी प्राथमिकताओं में होता है। दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल हों या झारखण्ड के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन हों; उनके कार्यकर्ता उनसे कभी नाराज नहीं रहते क्योंकि सत्ता की चाशनी के रस-गंध उन्हें भी मिलते रहते हैं। इसके विपरीत भाजपा के नेतागण अपने केन्द्रीय नेतृत्व, जो पिछले छह वर्षों से मोदी-शाह के नेतृत्व में है उनके भरोसे या ‘संघ’ के सहारे बैठे रहते रहते हैं। ‘संघ’ कोई राजनीतिक संगठन तो है नहीं जो भाजपा के लिए ‘सत्ता-प्रबंधन’ का काम करता रहे, उसकी प्राथमिकताओं में अपने बहुत सारे कार्यक्रम हैं। यह बात दीगर है कि उसकी गतिविधियों का लाभ सीधे-सीधे भाजपा को ही मिलता है। ऐसे में जाहिर है कि भाजपा का यह पराभव ‘भाजपाइयों’ के कारण हुआ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।   मालूम हो कि दिल्ली में लगभग 25-26 ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा उम्मीदवारों की हार महज कुछ सौ या कुछ हजार वोटों से हुई है। अगर भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं एवं सदस्यों में चुनाव के प्रति पर्याप्त उत्साह होता और उन तमाम लोगों ने केवल अपना-अपना मतदान भी किया होता तो भाजपा ‘दिल्ली से दूर’ नहीं रहती। अन्य पांच राज्यों में भाजपा की लगातार हुई हार का यही सबसे बड़ा कारण है। भाजपा को इस पराभव से उबरने के लिए अपनी ‘नीति’ में नहीं, अपने नेताओं की नीयत और उनकी कार्यपद्धति को बदलना होगा। अन्यथा आगे उसे और भी नुकसान हो सकता है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 13 February 2020


bhopal, The exercise to make Bundelkhand a bowl of lentils again

-सियाराम पांडेय 'शांत'    बुंदेलखंड का कालिंजर किला अपनी ऐतिहासिकता और धार्मिकता के लिए तो मशहूर है ही, लेकिन अब वह अरहर सम्मेलन के लिए भी चर्चा में है। इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी है कि यह विश्व दलहन दिवस (10 फरवरी) के अवसर पर कटरा कालिंजर में हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 नवम्बर, 2015 को इटली में आधिकारिक रूप से वर्ष 2016 को अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की थी। कालिंजर सम्मेलन में अतिथि कृषि वैज्ञानिकों का स्वागत परंपरागत फूलों की जगह चना, अरहर, सरसों और मटर आदि के फूल और पत्तियों से बने पुष्पगुच्छों से किया गया। सवाल उठता है कि दलहन उत्पादन को लेकर सम्मेलन एक ही जिले में क्यों, देश भर में क्यों नहीं होना चाहिए? देखा यह जाता है कि दिवस विशेष पर तो विशेष आयोजन होते हैं लेकिन बाद में सबकुछ भुला दिया जाता है। अगर किसानों के जीवन में बदलाव लाना है तो इस तरह के सम्मेलनों की निरंतरता बनाए रखनी चाहिए।भारत में पिछले कुछ वर्षों में दलहनी फसलों के उत्पादन में जिस तरह कमी आई है और उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं, उसे देखते हुए इस तरह के आयोजन विशेष अहमियत रखते हैं।    इस सम्मेलन में न केवल बुंदेलखंड के किसानों की  घटती आय पर चिंता व्यक्त की गई, बल्कि खेती-किसानी को व्यावसायिक स्वरूप देने पर भी मंथन हुआ। अरहर और अन्य दलहनी फसलों को ब्रांड बनाने पर जोर दिया गया। धान और देसी गेहूं की कई किस्मों के प्रोत्साहन और औषधीय पौधों के संरक्षण पर चर्चा हुई।  सम्मेलन इसलिए भी अहम है कि इसमें कृषि क्षेत्र के पांच पद्मश्री भी मौजूद रहे। सबने इस पर गहन विचार किया कि दलहनी फसलों के क्षेत्र में बुंदेलखंड अपना खोया गौरव कैसे वापस पा सकता है। पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने अरहर और चने की फसल के लिए बुंदेलखंड की माटी को बेहद मुफीद बताया। वह यह कहने से भी नहीं चूके कि इस क्षेत्र में खाद डालने की जरूरत नहीं है। मुजफ्फरपुर की किसान चाची पद्मश्री राजकुमारी देवी ने किसानों को दलहन उत्पाद प्रोडक्ट के रूप में बेचने की सलाह दी। उनकी इस बात में दम है कि दाल सेहत दुरुस्त रखती है। परहेज में डाक्टर तमाम चीजें खाने से रोकते हैं पर दाल को मना नहीं करते। उन्होंने महिला किसानों को स्वयं सहायता समूह बनाने, साइकिल पर भ्रमण करने और अरहर की फसल की ब्रांडिंग करने की सलाह दी।    बाराबंकी से कालिंजर पहुंचे पद्मश्री रामशरण वर्मा और कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के प्रो. मान सिंह भारती ने भी माना कि अगर व्यावसायिक ढंग से दलहन उगाई जाए तो किसाानों के दिन बहुरते देर नहीं लगेगी।बांदा के जिलाधिकारी हीरालाल मानते हैं कि जिले में 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इनकी खुराक में दाल बढ़ाकर सेहत सुधारी जा सकती है। अरहर सम्मेलन के साथ ही नरैनी में स्वयं सहायता समूह की ग्रामीण उद्यमिता परियोजना के तहत दाल प्रसंस्करण इकाई की शुरुआत भी हो गई है।  बांदा जिले में 17,753 हेक्टेयर भूमि में अरहर, 91,110 हेक्टेयर में चना और 24,624 हेक्टेयर में मसूर की खेती की जाती है। जिले में सरसों की खेती भी 2706 हेक्टेयर भूमि में होती है। इस सम्मेलन में का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इसमें चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, निदेशालय रेपसीड-मस्टर्ड रिसर्च, भरतपुर (राजस्थान), इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स, हैदराबाद और बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बांदा की भी समान सहभागिता रही। सम्मेलन में 40 खेती -किसानी बागवानी और बैंकों के स्टॉल लगाए गए। बुंदेलखंडी व्यंजन का स्टॉल भी लगा। लगभग 65 किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया। एक समय कोदों, सांभा फसलें बुंदेलखंड क्षेत्र में बहुत होती थीं, इन फसलों का उत्पादन बढ़ाए जाने पर जोर दिया गया।    योगी सरकार बुंदेलखंड के विकास को लेकर बेहद गंभीर है। इसके मद्देनजर गत वर्ष बांदा जिले में इनोवेशन ऐंड स्टार्टअप समिट का आयोजन किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि बांदा को साइंस पार्क उपलब्ध हुआ। अब अतर्रा कृषि फार्म को एक्सीलेंट सेंटर बनाया जाना है। इस लिहाज से देखें तो यह सम्मेलन विषेष मायने रखता है। कभी बुंदेलखंड को दलहन का कटोरा कहा जाता था । इस सम्मेलन से इस क्षेत्र में उसका खोया गौरव और प्रतिष्ठा लौटेगी, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है। भारत की बड़ी जनसंख्या को देखते हुए हर साल उसे विदेशों से दाल आयात करनी पड़ती है। वित्त वर्ष 2017-18 में दलहनों के रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था फिर भी देश को 56.5 लाख टन दलहन का आयात करना पड़ा था।  भारत में लगभग 220-230 लाख हेक्टयर क्षेत्रफल में दलहन की खेती होती है। इससे हर साल 130-145 लाख टन दलहन की पैदावार होती है। भारत में सर्वाधिक 77 प्रतिशत दाल पैदा होती है। इसमें मध्य प्रदेश का 24 उत्तर प्रदेश का 16, महाराष्ट्र का 14 , राजस्थान का 6,आन्ध्र प्रदेश का 10 और कर्नाटक का 7 प्रतिशत योगदान होता है। जनसंख्या के लिहाज से यह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित किए जाने की जरूररत है। कालिंजर में हुए इस सम्मेलन की एक खासियत यह भी रही कि इसमें बुंदेलखंड के सातों जिलों समेत कानपुर के मिलर्स और उत्पादक भी शामिल रहे। इसमें संदेह नहीं कि नीति निर्धारण में ईमानदारी और इच्छा शक्ति हो तो समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकता है। खेती के नजरिए से उपेक्षित बुंदेलखंड पूरे उत्तर प्रदेश का दाल से पेट भर सकता है। कृषि के विकास व किसानों की भलाई को लेकर बातें बहुत हुईं पर योजनाएं बनाने और अमल में कहीं न कहीं चूक रहीं अन्यथा खाद्यान्न में देश को आत्मनिर्भर बना देने वाले किसान दलहन संकट भी नहीं होने देते। समय से खाद, पानी व उन्नत बीज का प्रबंध होने के साथ उचित मूल्य की व्यवस्था पुख्ता होनी चाहिए।भारत में किसानों का दलहन उत्पादन के प्रति मोह जिस तरह कम हो रहा है, वह खतरे की घंटी है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।   (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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Dakhal News 12 February 2020


bhopal, Institutional arbitration, judicial process, need of the hour  

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा   देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की जरूरत जताई है। देश की राजधानी दिल्ली में फिक्की के समारोह में अदालतों में मुकदमों के अंबार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने यह सुझाव दिया। इसमें कोई दोराय नहीं कि मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैरसरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर हैं। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृत्ति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रह चुके हैं। यह सही है कुछ पीएलआर अपने आपमें मायने रखती हों पर पीएलआर दाखिल करने की सुविधा का दुरुपयोग भी जगजाहिर है और इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय को तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी थी और उसका असर भी देखने को मिल रहा है। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझाइश से मुकदमों को कम करने के प्रयास जारी हैं। लोक अदालतों का आयोजन अब तो नियमित होने लगा है।    इस दिशा में राजस्थान सरकार का मोटर व्हीकल एक्ट से जुड़े करीब दस हजार मुकदमों को लोक अदालत के माध्यम से समाप्त करने का निर्णय भी महत्वपूर्ण है। हालांकि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत विचाराधीन मुकदमों को सरकार द्वारा वापस लेने का संदेश गलत नहीं जाना चाहिए व दोषियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि उन्हें एक सभ्य नागरिक होने का दायित्व उठाते हुए कानून पालन के अपने कर्तव्य का निर्वहन करन चाहिए। देश के न्यायालयों में लंबित मुकदमों के गणित को लोकसभा में पिछले दिनों लिखित उत्तर में प्रस्तुत आंकड़ों से समझा जा सकता है। राष्ट्र्रीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 59 हजार 867 मामले लंबित हैं। आंकड़ों का सबसे बड़ा सच यह है कि देश की अदालतों में करीब एक हजार मामले 50 साल से लंबित हैं तो करीब दो लाख मामले 25 साल से विचाराधीन हैं। 44 लाख 76 हजार से अधिक मामले देश की 24 हाईकोर्ट में लंबित हैं। करीब पौने तीन करोड़ मामले देश की निचली अदालतों में विचाराधीन हैं।  देश के वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की चिंता से पुराने मामलों के निपटारे की कार्ययोजना भी बनी है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने पुराने मामलों के लंबित होने की गंभीरता को समझा। सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बेंच के सामने रखने के निर्देश निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने दिए थे।कुल लंबित तीन करोड़ से अधिक मामलों में से करीब 14 प्रतिशत मामले गत दस सालों से लंबित हैं। जारी रिपोर्ट के अनुसार 10 साल से अधिक लंबित मामलों में सर्वाधिक 9 लाख 43 हजार से अधिक मामले अकेले उत्तर प्रदेश में हैं तो बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र्, गुजरात, ओडिसा आदि प्रदेशों में दस साल से अधिक पुराने मामले लाखों की संख्या में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न बेंचों में अब 34 न्यायमूर्ति मुकदमों का निस्तारण कर रहे हैं।    सर्वोच्च न्यायालय की पहली प्राथमिकता पांच साल से पुराने लंबित मामलों की शीघ्र निस्तारित करने की है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए अत्यंत इमरजेंसी को छोड़कर कार्य दिवस पर छुट्टी न ली जाएं। मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने संस्थागत मध्यस्थता की जो आवश्यकता महसूस की है उसको इस मायने में भी समझा जा सकता है कि हमारी सनातन परंपरा और ग्रामीण व्यवस्था में पंच परमेश्वरों की जो भूमिका थी आज उस भूमिका को पुनर्स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। यातायात नियमों की अवहेलना, मामूली कहासुनी, मामूली विवाद आदि के प्रकरणों को चिह्नित कर इनकी सुनवाई कर तत्काल निर्णय की जरूरत है। ऐसे मामलों में अनावश्यक अपील का प्रावधान भी न हो। ऐसे करके मुकदमों के बोझ को कम किया जा सकता है। राजस्व के मामलों के अंबार को भी पंच परमेश्वरों या अन्य दूसरी तरह के निस्तारण का मैकेनिज्म बनाकर काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हाल ही में राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की जारी रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। इस पर ब्रेक लगाने के लिए भी संस्थागत मध्यस्थता जरूरी है।      (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 12 February 2020


bhopal, China mentality heavy on humanity

ऋतुपर्ण दवे   कोरोना वायरस आज चीन समेत दुनिया भर में सेहत और जिंदगी के लिए जबरदस्त चुनौती बनकर खड़ा है। पूरी दुनिया में असर दिखने लगा है। दुख इस बात का है चीन जैसे विकसित और दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश ने इस सच्चाई को सभी से क्यों छुपाया? हजारों लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमण के सच को डेढ़ महीने तक छुपाकर उसे क्या मिला? पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ को बता दिया होता तो हालात बेकाबू नहीं होते। मुमकिन था कि दुनिया भर में एकदम से भय और तबाही मचाने को तैयार नया कोरोना वायरस इतना पैर नहीं पसार पाता। पिछले कई मौकों की तरह इसबार भी चीन से ही निकला यह वायरस दुनिया भर में आतंक का पर्याय बन गया।   कोरोना वायरस साल 2020 के लिए नई महामारी बनकर चुनौती जरूर है लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि कुछ साल पहले ही सार्स (सीवियर एक्यूट रेसपेरेटरी सिंड्रोम), बर्ड फ्लू, एच-1 एन-1 जैसी घातक बीमारियां भी चीन से ही निकलीं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्या है जो जबरदस्त संक्रमण से तबाही फैलाने वाली सारी बीमारियां चीन से ही शुरू होती हैं? इसका जवाब बेहद चौंकाने वाला है और वह है चीन का सी फूड मार्केट। पूरे चीन में सब्जी और मांस बाजार हर शहर में जहां-तहां फैले हुए हैं। चीनी लोग समुद्री जीवों के मांस के शौकीन हैं। इंटरनेट पर मौजूद सूची में वहां बिकने वाले मांस में जिन्दा लोमड़ी, मगरमच्छ, भेड़िया, सैलामैंडर, सांप, बिल्ली, चूहे, मोर, साही, ऊंट सहित 112 तरह के मांस का जिक्र है, जिन्हें खाया जाता है। वहां के बाजार ऐसे मांस से पटे होते हैं। घनी आबादी के कारण संक्रमित बीमारियों को फैलते देर नहीं लगती। चीन में पशुधन भी बहुत ज्यादा है, जिससे जानवरों से इंसान के शरीर में पहुंचने वाले वायरस को मनमुताबिक वातावरण मिल जाता है। इसके अलावा चीन का दुनिया के तमाम देशों के साथ जबरदस्त व्यापारिक व राजनीतिक गठजोड़ भी है। इस कारण एयर नेटवर्क भी तगड़ा है, जिससे संक्रमण तेजी से दुनिया के बाकी हिस्सों में पहुंच जाता है।   दुनिया भर में जंगल तेजी से कम हो रहे हैं। इस कारण जानवरों की फार्मिंग का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। जंगली जानवरों के वायरस फार्मिंग वाले जानवरों में आ जाते हैं और से ये इंसान के शरीर तक पहुंच जाते हैं। चीन के मांस बाजार में कई जानवरों के मांस मिलते हैं इसलिए वहां से नए-नए वायरस तेजी से फैलते हैं और संक्रामक होने की वजह से तमाम दुनिया में फैल जाते हैं। मांस बाजार में जानवरों के मांस और खून का इंसानों के शरीर से संपर्क होता रहता है जो वायरस के फैलने की सबसे बड़ी वजह है। साथ ही हाईजीन में थोड़ी भी चूक वायरस फैलाने में मददगार होती है।   तमाम परीक्षणों और रिसर्च से भी यह साबित हुआ है कि कई खतरनाक वायरस जानवरों के मांस से इंसान में आए हैं और फिर इनका संक्रमण तेजी से फैला। हालात यह है कि 30 साल में 30 नई और खतरनाक संक्रामक बीमारियों के बारे में पता चला जिसमें 75 फीसदी के वायरस जानवरों से इंसान में आए हैं। चीन का जो बुहान शहर सबसे ज्यादा प्रभावित है वहां एक करोड़ से ज्यादा आबादी है जो एक प्रमुख परिवहन केंद्र भी है। सार्स के समय भी पाया गया था कि वन्य जीव बाजार में मिलने वाली कस्तूरी बिलाव में पहला सार्स वायरस मिला था। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि चमगादड़ों ने बिल्ली जैसे जीवों को इससे संक्रमित किया और फिर इंसानों द्वारा बिल्लियों को खाने से यह उनमें फैला।   चीन में इस वायरस से संक्रमित मरीजों के मरने की संख्या लगातार विशाल होता जा रहा है। बुहान प्रान्त में इस वायरस का अटैक दिसंबर 2019 में ही हो चुका था लेकिन इसे न केवल छुपाया गया बल्कि साधारण बीमारी बताकर दुनिया को गुमराह किया गया। झूठ की इन्तिहा तो तब हो गई जब कहा गया कि इससे किसी की मौत नहीं हुई लेकिन जर्मनी की लैब जर्मन सेंटर फॉर इंफेक्शन रिसर्च ने इस बारे में जाँच-पड़ताल शुरू की तो पाया नोवोल कोरोना वायरस पहली बार चीन के बुहान में ही उभरा है, जिससे गंभीर निमोनिया होता है लेकिन लेकिन तबतक काफी देर हो चुकी थी। कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति को सबसे पहले सांस लेने में दिक्कत, गले में दर्द, जुकाम, खांसी और बुखार होता जो निमोनिया का रूप ले सकता है। इससे गुर्दे से जुड़ी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। यह वायरस संक्रमित व्‍यक्ति के दूसरे से संपर्क में आने पर तेज फैलता है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका समुद्री भोजन से बचना है। इससे बचाव को लेकर फिलहाल कोई वैक्सीन नहीं है।   तिब्बत को छोड़कर चीन के सभी प्रांतों से कोरोना वायरस के मामले सामने आए हैं। इसके अलावा थाइलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, नेपाल, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका में भी कोरोना वायरस के संदिग्ध मिले हैं। जबकि जर्मनी और कनाडा में पहले ही पुष्टि हो चुकी है। भारत के कई शहरों में संदिग्ध मरीज मिले हैं। कोलकाता में भर्ती थाईलैण्ड की युवती की मौत के बाद भारत में भी दहशत स्वाभाविक है। उप्र, बिहार, राजस्थान, हैदराबाद, कर्नाटक, गोवा समेत कई राज्यों में इसको लेकर अलर्ट है। वायरस के संक्रमण की थर्मल जांच के दायरे में देश के 20 हवाई अड्डों को और शामिल किया गया है फिलहाल नयी दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोच्चि सहित 7 हवाई अड्डे शामिल थे।   डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जानवरों के मांस से फैले वायरस की वजह से ही दुनिया में करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों मौतें होती हैं। यह भी सच है कि संक्रमण की 60 फीसदी बीमारियां जानवरों से फैलती हैं। उससे भी बड़ा सच यह कि सैकड़ों तरह का मांस खाने के मामले में चीन दुनिया में सबसे आगे निकलता जा रहा है, जिसका नतीजा दिख रहा है। ऐसे में संक्रमण और वायरस अटैक स्वाभाविक है लेकिन इतनी बड़ी घटना को पचाने की कोशिश से चीन की नीयत पर पूरी दुनिया को शक होने लगा है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal,  Disgusting game in the name of religion in Pakistan

योगेश कुमार सोनी   वैसे तो पाकिस्तान में धर्म के नाम पर उत्पीड़न की खबरें अब आम हैं। हिन्दू व ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन खुलेआम हो रहा है। लेकिन एक ऐसा मामला सामने आया है कि जो पाकिस्तान की न्याय प्रणाली पर भी गंभीर सवाल बनकर आया है। पाकिस्तान की चौदह वर्षीय ईसाई लड़की को अगवाकर उसका धर्म बदलवाकर अपहरणकर्ता ने उससे शादी कर ली। लड़की के परिजनों ने इस मामले में जब कानून का दरवाजा खटखटाया तो वहां की एक निचली अदालत ने घटिया व बेतुकी दलील देते हुए कहा कि ‘लड़की की उम्र भले कम है लेकिन शरिया कानून के अनुसार उसका पहला मासिक धर्म हो चुका है तो इस हिसाब से शादी वैध मानी जाएगी।’ हालांकि इस फैसले के बाद लड़की के परिजनों ने वहां की सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है। लड़की की मां ने कैथोलिक समाज से जुड़ी वेबसाइटों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले में मदद मांगी है।   लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी को अब्दुल जब्बार नामक शख्स ने पिछले चार महीने से अगवा कर रखा था, जिसके लिए वह लगातार संबंधित पुलिस स्टेशन जा रहे थे लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। किसी माध्यम से लड़की का पता चला तो पुलिस प्रशासन ने तब भी कोई कार्रवाई नहीं की तो लड़की के परिजन कोर्ट गए और न्याय व्यवस्था के ठेकेदारों ने भी घटिया दलील देकर उन्हें निराश किया। इस तरह की कार्यशैली से स्पष्ट है कि वहां का सारा सिस्टम अल्पसंख्यकों की नस्ल मिटाने में लगा है। कानून के मुताबिक इस तरह की शादियों पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2014 में सिंध बाल विवाह एक्ट पारित हुआ था। इसके अंतर्गत 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगाने का जिक्र है। इस कानून को पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों की जबरदस्ती शादी के आधार पर बनाया था लेकिन पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कानूनों का कोई मतलब नहीं है।   ह्यूमन राइट सर्व रिपोर्ट के अनुसार बंटवारे के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी उन्नीस प्रतिशत थी जो अब मात्र दो प्रतिशत भी नहीं रह गई है। यदि हिन्दुओं की बात करें तो उस समय हिन्दू आबादी 15 प्रतिशत थी जो अब 1 प्रतिशत पर सिमट गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले उन्नीस साल में पाकिस्तान में एक भी अल्पसंख्यक नहीं बचेगा। इसका सबसे बड़ा कारण या तो वहां के अल्पसंख्यकों को डराकर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है या फिर उनको जान से मार दिया जाता है। लड़कियों के धर्म परिवर्तन से भी यह आंकड़ा बहुत तेजी से गिर रहा है।   पाकिस्तान की इन हकरतों पर यदि विश्वस्तरीय कार्रवाई नहीं की गयी तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लेकर वहां के हालात और बिगड़ सकते हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘जब से इमरान खान ने पाकिस्तान की कमान संभाली है तब से धर्म के नाम पर अत्याचार बढ़ गया। आयोग के अनुसार तहरीक-ए-इंसाफ सरकार द्वारा भेदभावपूर्ण कानून से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिए कट्टरपंथियों के हौसले बढ़े हैं। दिसंबर 2019 में पेश की गई रिपोर्ट में आयोग ने ईशानिंदा कानून के राजनीतिकरण व शस्त्रीकरण और अहमदिया विरोधी कानूनों को लेकर चिंता जाहिर की थी। जिसका उपयोग इस्लामी समूह न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने बल्कि राजनीतिक आधार भी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। ऐसे मामलों में शासन-प्रशासन पूर्ण रूप से बहुसंख्यक मुसलमानों का सहयोग करता है, जिस वजह से आरोपियों पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती। यही कारण है कि पीड़िता अपने घर वापस नहीं लौट पाती। इसके अलावा ज्यादा विरोध करने पर उसे जान से भी मार दिया जाता है। पाकिस्तान में पूर्ण रूप से जंगलराज स्थापित हो चुका।'   एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में अत्याचार से परेशान होकर करीब 20 हजार अल्पसंख्यक परिवार भारत आ चुके हैं और बीती 3 फरवरी को 187 हिन्दुओं का जत्था स्थायी नागरिकता लेने आया है। मौजूदा समय में पाकिस्तान में अपहरण व धर्म परिवर्तन के आंकड़ों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वहां अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने के लिए संगठित रूप से काम हो रहा है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal,  Constitution: Hindi Word of the Year

डॉ. अजय खेमरिया   ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने `संविधान' शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ दी ईयर 2019 घोषित किया है। भारत में बीते वर्ष यह शब्द संसद, सुप्रीम कोर्ट और सड़क पर सर्वाधिक प्रचलित और प्रतिध्वनित हुआ। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश हर साल इस तरह के भाषीय शब्दों को उस वर्ष का शब्द घोषित करता है। भारतीय संदर्भ में इस शब्द की उपयोगिता महज डिक्शनरी तक सीमित नहीं है। असल में संविधान आज भारत की संसदीय राजनीति और चुनावी गणित का सबसे सरल शब्द भी बन गया है। हजारों लोग संविधान की किताब लेकर सड़कों, विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में आंदोलन करते नजर आ रहे हैं। दिल्ली के शाहीन बाग धरने में संविधान की किताबें सैंकड़ों हाथों में दिखाई दे रही हैं। संविधान जैसा विशुद्ध तकनीकी और मानक शब्द भारत में प्रायः हर सरकार विरोधी व्यक्ति की जुबान पर है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या, तीन तलाक और 370 जैसे मामलों की सुनवाई भी संविधान के आलोक में की इसलिए वहां भी बीते साल यह शब्द तुलनात्मक रूप से अधिक प्रचलन में आया। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने इसी बहु उपयोगिता के आधार पर `संविधान' को 2019 का वार्षिक हिंदी शब्द घोषित किया है।   सवाल यह कि क्या देश के लोकजीवन में संविधान और उसके प्रावधान (जिन्हें मानक शब्दावली में अनुच्छेद, भाग, अनुसूची कहा जाता है) आम प्रचलन में है? 130 करोड़ भारतीय जिस संविधान के अधीन हैं, क्या वे संवैधानिक उपबन्धों से परिचित हैं? हकीकत यह है जिस संविधान शब्द की गूंज संचार माध्यमों में सुनाई दे रही है वह चुनावी राजनीति का शोर है। हमें समझने की आवश्यकता है कि हाथों में संविधान की किताब उठाये भीड़ और उसके नेतृत्वकर्ता असल में संविधान के आधारभूत ढांचे से कितने परिचित हैं? संविधान की पवित्रता की दुहाई देने वाले आंदोलनकारियों ने इसकी मूल भावना को समझा है या वे इतना ही समझते हैं जितना सेक्यूलर ब्रिगेड ने अपने चुनावी गणित के लिहाज से वोटरों में तब्दील हो चुके नागरिकों को बताया है। सच यही है कि आज भारत के लगभग 95 फीसदी लोग अपने संविधान की बुनियादी बातों से परिचित नहीं हैं। क्या एक परिपक्व गणतंत्रीय व्यवस्था में उसके नागरिकों से संवैधानिक समझ की अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये? जिस देश का संविधान लिखित रूप में दुनिया का सबसे विशाल और विस्तृत है, उसके 95 फीसदी शासित उसकी मूलभूत विशेषताओं और प्रावधानों से नावाकिफ रहते हुए आखिर कैसे संविधान की रक्षा की दुहाई दे सकते हैं? हकीकत यही है कि हम भारत के लोग इतना ही संविधान की समझ रखते हैं कि कुछ जन्मजात अधिकार संविधान से मिले हैं। जो घूमने, बोलने, खाने, इबादत, व्यापार करने, सरकार के विरुद्ध खड़े होने, सरकारी योजनाओं में हकदारी का दावा करने की आजादी देता है। संविधान की इस एकपक्षीय समझ ने भारत में पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक आत्मकेंद्रित फौज खड़ा करने का काम किया है। इसी फौज के बीसियों संस्करण आपको देशभर में अलग-अलग रूपों में मिल जायेंगे। जिनका एक ही एजेंडा है, सरकारी खजाने का दोहन और संवैधानिक कर्त्तव्य के नाम पर उसकी तरफ से पीठ करके खड़ा हो जाना।   वस्तुतः भारत संवैधानिक रूप से एक ऐसे नागरिक समाज की रचना पर खड़ा किया गया है, जहां नागरिक जिम्मेदारी के तत्व को कभी प्राथमिकता पर रखा नहीं गया। 1950 में संविधान लागू हुआ और 1976 में 42 वें संशोधन से 10 कर्तव्य जोड़े गए। यानी 26 साल तक इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया कि लोकतंत्र जैसी सभ्य शासन प्रणाली कैसे बगैर जवाबदेही के चलाई जा सकती है? आज भी संविधान की इस अनुगूंज में केवल अधिकारों के बोल हैं। एकपक्षीय प्रलाप जिसके पार्श्व बोल उन नेताओं और बुद्धिजीवियों ने निर्मित किये हैं जो भारत में हिंदुत्व और तालिबानी बर्बरता को एक सा निरूपित करते हैं, एक विकृत सेक्युलर अवधारणा को 65 साल तक भारत के भाल पर जबरिया चिपका रखा है। क्योंकि पेट्रो और वेटिकन डॉलर से इनकी बौद्धिकता का सूर्य सुदीप्त रहता है। यही वर्ग भारत में स्वाभाविक शासकों के थिंक टैंक रहे हैं। यानी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी तक पहुँचा भारत का संविधान शब्द किसी जनोपयोगी, लोक प्रचलन या सामाजिकी में स्थापना के धरातल पर नहीं खड़ा है बल्कि यह एक बदरंगी तस्वीर है भारत के सियासी चरित्र की।   संविधान की आड़ में भारत को चुनावी राजनीति का ऐसा टापू समझने और बनाने की जहां सत्ता खोने या हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिये लोग तैयार हैं। झूठ, अफवाह और मिथ्या प्रचार भारतीय जीवन का स्थाई चरित्र बनता जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सब कुछ संविधान की किताब हाथ में लेकर किया जाता है। एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि "जो सीएए में लिखा है आप उसे मत देखिये, मत पढ़िए, जो इसमें नहीं लिखा है उसे पढ़िए, जो मैं बता रहा हूं उसे मानिये।" इसका मतलब यही कि जिस विहित संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाकर भारत की संसद ने कानून बनाया उसे जनता मूल रूप से नहीं, नेताओं के बताए भाष्य ओर व्याख्यान के अनुरूप माने। यही भारतीय संविधान की बड़ी विडम्बना है। इसी का फायदा एक बड़ा वर्ग हिंदुस्तानी नागरिक बनकर उठाता आ रहा है। इसी बड़े मुफ्तखोर और गैर जवाबदेह नागरिक समाज की भीड़ के शोरशराबे में आपको संविधान शब्द सुनाई देता है। हमारी चुनावी राजनीति ने लोगों को कभी नागरिक बनने का अवसर नहीं दिया। अपने फायदे के लिए वोटर समाज की रचना में जिस पराक्रम और निष्ठा के साथ सियासी लोगों ने काम किया, अगर इसी अनुपात में वे संवैधानिक साक्षरता के लिये काम करते तो भारत की तस्वीर अलग होती।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 10 February 2020


bhopal, Ram temple: dignity will return to historical heritage

प्रमोद भार्गव   केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पालन में स्वायत्त न्यास के गठन की जिम्मेदारी पूरी कर ली है। 15 सदस्यीय न्यास का नाम ‘श्री रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र‘ होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस न्यास की घोषणा करते हुए कहा कि न्यास में एक सदस्य दलित समाज से होगा। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि राम को ‘भगवान-राम‘ बनाने में मुख्य भूमिका उस समाज की रही थी, जो कमजोर होने के साथ अलग-थलग पड़ा था। यह समाज उस वर्ग से आता था, जो जंगलों में निवास करता था। इसी वनवासी समाज ने राम के नेतृत्व में लंका-नरेश रावण पर विजय प्राप्त की और राम ने इस विजय के बाद एक ऐसे समरसतावादी समाज की परिकल्पना की जो फलीभूत होती हुई ‘रामराज्य‘ कहलाई। गांधी भी भारत की स्वतंत्रता के बाद इसी तरह के रामराज्य की कल्पना करते थे लेकिन वह चरितार्थ नहीं हुई। गोया, दलित को न्यास का सदस्य बनाकर इस सरकार ने जहां छुआछूत पर कुठाराघात किया है, वहीं अयोध्या में जातीय समरसता कायम रहे, इसकी भी नींव राममंदिर के निर्माण से पहले रख दी है।   न्यायालय के फैसले के तीन माह के भीतर न्यास का गठन न्यायालय के निर्देश की समय-सीमा का पालन है। हालांकि मोदी के निंदक इसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में चुनावी लाभ का गणित मानकर चल रहे हैं। जबकि यह कार्यवाही अदालत के साथ-साथ देश की राष्ट्रीय आकांक्षा की पूर्ति है। बहुसंख्यक हिंदू समाज ही नहीं, भारतीय इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझने वाले मुसलमान भी विवादित स्थल को राममंदिर ही मानते हैं। इस कड़ी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक के.के. मोहम्मद पुरातत्वीय साक्ष्यों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि विवादित स्थल पर भव्य मंदिर था। यही नहीं उच्च न्यायालय, इलाहाबाद और शीर्ष न्यायालय की राममंदिर विवाद से जुड़ी पीठों के सदस्य रहे मुस्लिम न्यायमूर्तियों ने भी विवादित स्थल को मंदिर माना है। केवल वामपंथी इतिहास व साहित्यकार ही इस सच्चाई को हमेशा झुठलाते रहे हैं।   अब विवाद-मुक्त हुई भूमि समेत 67.703 एकड़ भूमि भी इस न्यास को सौंप दी जाएगी। याद रहे 1992 में जब विवादित ढांचे को गुस्साए कारसेवकों ने ढहा दिया और विवाद गहराया तो 1993 में अयोध्या में विवादित स्थल सहित इससे जुड़ी करीब 67 एकड़ भूमि का उस समय की पीवी नरसिंह राव सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था। तभी से यह भूमि केंद्र सरकार के पास है। चूंकि अब न्यास अस्तित्व में आ गया है, इसलिए भव्य राममंदिर निर्माण के लिए इस भूमि को न्यास को दिया जाना जरूरी था। गौरतलब है कि 9 नवंबर 2019 को जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में विवादित भूमि पर सर्वसम्मति से रामलला का अधिकार माना था। नतीजतन यह भूमि राममंदिर के लिए दे दी गई। न्यायालय ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भी अयोध्या जिले में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि देने का फैसला दिया था। इस निर्णय का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पांच एकड़ भूमि बोर्ड को आवंटित कर दी है। इन कार्यवाहियों से जल्द मंदिर निर्माण का रास्ता खुलने के साथ यह संदेश भी भारतीय जन-मानस में पहुंचा है कि इस भूखंड पर रहने वाले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी सभी एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं। गोया, हमारी संस्कृति एवं परंपराएं ऐसी विलक्षण है, जो दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम और सर्व भवतु सुखिनः‘ का संदेश देती है।   सरकार ने स्वायत्त न्यास का गठन इसलिए किया है, जिससे न्यास सरकारी हस्तक्षेप से दूर रहे और कामकाज में न्यासियों को संपूर्ण स्वतंत्रता मिले। न्यास को मंदिर निर्माण और उसके संचालन के साथ-साथ आर्थिक लेन-देन की स्वायत्तता भी दी गई है। लेकिन न्यास को कोई भी अचल सम्पत्ति किसी भी स्थिति में बेचने का अधिकार नहीं होगा। न्यास के विधान में यह व्यवस्था भी की गई है कि पदेन व सरकार द्वारा मनोनीत के अलावा जो दस सदस्य रहेंगे, उनमें से किसी सदस्य की मौत होने या त्यागपत्र देने अथवा किसी करणवश हटाए जाने पर, उनके स्थान पर नए सदस्य के चयन का अधिकार न्यासियों को होगा, किंतु नए सदस्य का हिंदू धर्मालंबी होना अनिवार्य है। दलित सदस्य का स्थान खाली होने की स्थिति में दलित को ही चयनित करना जरूरी होगा। पदेन सदस्यों में जिला कलेक्टर भी एक सदस्य हैं। इसमें प्रावधान रखा गया है कि अयोध्या में यदि किसी मुस्लिम कलेक्टर को पदस्थ किया जाता है तो उस स्थिति में जिले के एडीएम पदेन सदस्य होंगे। इन न्यासियों को वेतन व भत्ते नहीं दिए जाएंगे। अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि राममंदिर का शिलान्याय 25 मार्च से शुरू हो रहे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर 2 अप्रैल को राम जन्मदिन या इस बीच संभव है।   इक्ष्वाकु वंश के इस नायक राम की लंका पर विजय ही इस बात का पर्याय है कि सामूहिक जातीय चेतना से प्रगट राष्ट्रीय भावना ने इस महापुरुष का दैवीय मूल्यांकन किया और भगवान विष्णु के अवतार का अंश मान लिया। क्योंकि अवतारवाद जनता-जर्नादन को निर्भय रहने का विश्वास, सुखी व संपन्न होने के अवसर और दुष्ट लोगों से सुरक्षित रहने का भरोसा देता है। अवतारवाद के मूल में यही मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति काम करती है। लेकिन राम वाल्मीकि के रहे हों, चाहे गोस्वामी तुलसीदास के अलौकिक शक्तियों से संपन्न होते हुए भी वे मनुष्य हैं और उनमें मानवोचित गुण व दोष हैं। इसीलिए वे भारतीय जनमानस के सबसे ज्यादा निकट हैं। इसका एक कारण यह भी है कि राम ने उत्तर से दक्षिण की यात्रा करके देश को सांस्कृतिक एकता में पिरोने का सबसे बड़ा काम किया था। इसी काम को कृष्ण ने अपने युग में पूरब से पश्चिम की यात्रा करके देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया था। राम और कृष्ण की शताब्दियों पहले की गई सामाजिक सद्भाव की ये ऐसी अनूठी यात्रा रही हैं, जो सामाजिक संरचना को आज भी मजबूती देने का काम करती है।    दरअसल, राजनीति के दो प्रमुख पक्ष हैं, एक शासन धर्म का पालन और दूसरा युद्ध धर्म का पालन। रामचरितमानस की यह विलक्षणता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांतों और लोक-व्यवहार की भी चिंता की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रामकथा व राम का चरित्र संघर्ष और आस्था का प्रतीक रूप ग्रहण कर लोक कल्याण का रास्ता प्रशस्त करते हैं। महाभारत में भी कहा गया है कि ’राजा रंजयति प्रजा’ यानी राजा वही है, जो प्रजा के सुख-दुख व इच्छाओं की चिंता करते हुए उनका क्रियान्वयन करे। इस परिप्रेक्ष्य में प्रजा की नरेंद्र मोदी सरकार से अपेक्षा थी कि अयोध्या में भव्य एवं दिव्य राममंदिर बने। मोदी इस राष्ट्रीय आकांक्षा पूर्ति के प्रतीक बनकर उभरे हैं। यह ऐसा अनूठा मंदिर हो जो सामाजिक समरसता के रंग में पूरी तरह रंगा हो, क्योंकि इसी भावना में इस रामनगरी का पौराणिक महत्व और ऐतिहासिक-गाथा अंतर्निहित है। साफ है, भारत के लिए राम की प्रासंगिकता, इस राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता व एकता के लिए हमेशा अनिवार्य बनी रहेगी।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 February 2020


bhopal, Relevance of Legislative Councils

रमेश सर्राफ धमोरा   विधान परिषदों की प्रासंगिकता को लेकर एकबार फिर बहस छिड़ी हुई है। गत दिनों आंध्र प्रदेश विधानसभा ने वहां की विधान परिषद् को भंग करने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को संसद से पास करवाने के लिये भेज दिया था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी का कहना है चाहे कितना भी समय लग जाए, वह विधान परिषद् को भंग कराकर ही मानेंगे।   दरअसल, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी राज्य में तीन राजधानियां बनाना चाहते हैं। इस बाबत विधान परिषद् में जब विधेयक लाया गया तो वहां तेलुगू देशम पार्टी का बहुमत होने के कारण विधेयक को सलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया गया। जिससे मुख्यमंत्री की यह महत्वाकांक्षी योजना लटक गई। इससे मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी इतने नाराज हुए कि उन्होंने तुरंत ही विधान परिषद् भंग करने का फैसला कर लिया। आंध्र प्रदेश विधान परिषद् में कुल 58 सदस्य हैं। जिनमें से मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के 9 व मुख्य विरोधी तेलुगू देशम पार्टी के 26 सदस्य हैं। 20 सदस्यों में से नामांकित 8, भाजपा 3, निर्दलीय 3, पीडीएफ के 5 व चार स्थान रिक्त हैं। विधान परिषद् में तेलुगू देशम पार्टी का बहुमत होने के कारण मुख्यमंत्री के महत्वकांक्षी दोनों बिल आंध्र प्रदेश विकेंद्रीकरण और सभी क्षेत्रों के समावेशी विकास विधेयक 2020 और आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजनल डेवलपमेंट अथॉरिटी विधेयक को सिलेक्ट कमिटी को भेजकर एक तरह से लटका दिया गया। अपने दोनों महत्वपूर्ण विधेयक लटक जाने से मुख्यमंत्री खासे नाराज हो गये और उन्होने बाधा बन रही विधान परिषद् को ही भंग करने का फैसला कर आगे का रास्ता साफ कर दिया। आंध्र प्रदेश की तरह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र विधान परिषद् में भी सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की संख्या कम होने से वहां भी अक्सर टकराव की स्थिति देखी जाती है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन एक्ट 2019 के तहत जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा समाप्त होने के साथ वहां की विधान परिषद् का अस्तित्व भी समाप्त हो गया। उसके बाद देश में अब आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश सहित कुल 6 प्रदेशों में विधान परिषद् कार्यरत है। इन छह राज्यों की विधान परिषदों में कुल 426 सदस्य हैं, जिनमें से 367 सदस्यों का विभिन्न तरीकों से चुनाव किया जाता है तथा 59 सदस्यों को वहां के राज्यपालों द्वारा राज्य सरकार की सिफारिश पर मनोनीत किया जाता है।   देश के इन छह राज्यों के अलावा राजस्थान, असम, ओडिशा में भी विधान परिषद् के गठन को संसद ने मंजूरी प्रदान कर दी है। शीघ्र ही इन तीन प्रदेशों में भी विधान परिषदों का गठन किया जाएगा। पूर्व में तमिलनाडु में 1950 से 1986 तक 78 सदस्यीय विधान परिषद् कार्यरत रह चुकी थी। वहीं पश्चिम बंगाल में 1952 से 1969 तक विधान परिषद् थी, जिसके 98 सदस्य थे। आंध्र प्रदेश में भी पूर्व में 1958 से 1985 तक विधान परिषद् थी जिसे एन.टी. रामाराव ने मुख्यमंत्री रहते जगनमोहन की तरह ही समाप्त करवा दिया था। फरवरी 2007 में कांग्रेस शासन के दौरान फिर से आंध्र प्रदेश में विधान परिषद् का गठन हुआ था।विधान परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है तथा प्रत्येक 2 साल पर विधान परिषद् के एक तिहाई सदस्य बदल जाते हैं। विधान परिषद् में 40 से कम व उस राज्य की विधानसभा के एक तिहाई से अधिक सदस्य नहीं हो सकते हैं। विधान परिषद् के सदस्यों को भी वह सभी सुविधाएं मिलती हैं जो एक निर्वाचित विधानसभा के सदस्य को मिलती है। राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को विधान परिषद् से भी पारित करवाना पड़ता है। हालांकि राजस्थान, असम, उड़ीसा की राज्य सरकारें विधान परिषद् का गठन करने जा रही है। वहीं देशभर में विधान परिषद् के औचित्य व उसकी उपयोगिता को लेकर समय-समय पर विरोध के स्वर उठते रहे हैं। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा नकार दिए गये लोगों को विधान परिषद् के रास्ते मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता रहा है। जिससे देश के लोगों में विधान परिषद् को लेकर अच्छी राय नहीं बन रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो विधानसभा का चुनाव लड़ते ही नहीं हैं। विधान परिषद् के सदस्य के तौर पर ही वे मुख्यमंत्री बने हुए हैं। वहां के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी विधान परिषद् के सदस्य हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व डॉ दिनेश शर्मा भी विधान परिषद् के सदस्य हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अभी किसी सदन के सदस्य नहीं है। लेकिन छह माह में उन्हें किसी भी सदन का सदस्य बनना जरूरी होगा इसलिए वह भी शार्टकट रास्ता अपनाते हुये विधान परिषद् के माध्यम से ही विधायक बनेंगे। विधान परिषद् के एक सदस्य पर सालाना करीब 50 लाख रूपये खर्च किए जाते हैं। इस तरह देश में कुल 426 विधान परिषद् सदस्यों पर सालाना 200 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च होती है। इसके अलावा कार्यकाल पूरा करने के बाद उनको आजीवन पेंशन, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, मुफ्त रेल-बस यात्रा सहित अन्य कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं। विधान परिषद् के सदस्य की मृत्यु होने पर उसकी पत्नी को भी पेंशन मिलती है।   चूंकि देश में राज्यसभा ऊपरी सदन है, जिसमें पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोग जाते हैं। राज्यसभा-लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों का अध्ययन कर उनपर बहस कर उन्हें पास करती है। उसके बाद ही वह कानून बन पाता है। लेकिन राज्य में ऐसी स्थिति नहीं है। राज्य में विधानसभा ही कानून बनाने के लिए पर्याप्त है क्योंकि विधानसभा द्वारा बनाया गया कोई भी कानून राज्य स्तर का ही होता है, उसका पूरे देश पर प्रभाव नहीं पड़ता है। लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभा सदस्यों की तरह विधान परिषद् के सदस्यों को राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव में वोट देने का भी अधिकार नहीं होता है। ऐसे में देखा जाए तो राज्य में विधान परिषद् की आवश्यकता नहीं है। यदि ऐसा होता तो देश में संविधान लागू करते वक्त ही सभी प्रदेशों में विधानसभा की तरह विधान परिषदों का भी गठन किया जाता। लेकिन संविधान सभा ने ऐसा कोई जरूरी प्रावधान नहीं किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 February 2020


bhopal, Mahatir\

अनिल बिहारी श्रीवास्तव मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के तेवर ढीले पड़ने लगे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मलेशिया यात्रा के अंत में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में महातिर के मुंह से कश्मीर का 'क' तक नहीं निकला। जारी किए गए संयुक्त बयान में म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों और फिलिस्तीन के साथ कश्मीर का उल्लेख अवश्य था। महातिर के रुख में बदलाव की वजह उनकी भारत विरोधी बयानबाजी के कारण मलेशिया में बढ़ी चिंता को बताया जा रहा है। महातिर की जुबान के कारण दोनों देशों के संबंध खराब होने का खतरा बढ़ा है। मलेशिया में एक बड़ा वर्ग भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से नाराज है। मलेशियाई पाम ऑयल उत्पादक, रिफायनर्स और निर्यातक अधिक चिंतित हैं। महातिर की बयानबाजी से मलेशिया में बढ़ी नाराजगी का प्रमाण महातिर के उत्तराधिकारी अनवर इब्राहिम की टिप्पणी से मिल जाता है। हाल ही में एक इंटरव्यू में इब्राहिम ने कहा, ''यदि आप चिंता व्यक्त करते हो तो कोई देश आपत्ति नहीं करता लेकिन महातिर की भाषा काफी सख्त और तीखी रही है।'' वह आगे कहते हैं, 'गौर करें कि महातिर के लहजे में बदलाव आया है।' 94 वर्षीय महातिर मोहम्मद जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त किए जाने पर अनेक मंचों पर भारत के विरुद्ध टिप्पणी कर चुके हैं। जिसके जवाब में भारत ने मलेशिया को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने की नसीहत दी। जल्द ही महसूस हुआ कि महातिर अपनी बयानबाजी से बाज नहीं आएंगे। इसके तीन कारण बताए गए। पहला, मलेशिया के साथ पाकिस्तान के करीबी संबंध, दूसरे मुस्लिम जगत का नेता बनने की महातिर की महत्वाकांक्षा और तीसरा महातिर की धार्मिक कट्टरता। दिसम्बर 2019 में महातिर ने एकबार फिर मर्यादा तोड़ी। उन्होंने नागरिकता (संशोधन) कानून की आलोचना की और इसे मुसलमानों के विरूद्ध बताया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने मलेशियाई दूतावास के प्रभारी को बुलाकर महातिर की टिप्पणी पर पुन: अपनी आपत्ति दर्ज की लेकिन महातिर ने रवैये नहीं बदला। जनवरी मध्य में प्रेस से बातचीत में वह बोल गए कि 'अपने शब्द वापस नहीं लेंगे और जो बात गलत लगेगी उसपर बोलते रहेंगे।' इसके बाद ही भारत ने रिफाइंड पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अब केवल कच्चा पाम ऑयल और पामोलिन का आयात किया जा सकेगा। सरकार के इस फैसले से स्वदेशी रिफायनर्स को लाभ होगा। मलेशिया विश्व में दूसरा सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक देश है। खास बात यह है कि मलेशियाई रिफाइंड पाम ऑयल का भारत अबतक सबसे बड़ा आयातक रहा है। भारत में खपत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले साल भारत ने मलेशिया से 44 लाख टन रिफाइंड पाम ऑयल आयात किया था। इसके अलावा इंडोनेशिया, नेपाल और सिंगापुर से भी भारत पाम ऑयल आयात करता है। मलेशिया के विरूद्ध कार्रवाई से सबसे ज्यादा फायदा इंडोनेशिया को होगा। इंडोनेशिया कच्चे पाम ऑयल का सबसे बड़ा निर्यातक है। उसने भारत से चीनी और भैंस के मांस का आयात बढ़ाने प्रस्ताव रखा है। आम मलेशियाइयों में चिंता इस बात की है कि भारत जैसा बड़ा बाजार खोकर महातिर क्या हासिल कर लेंगे? क्या उदारता, प्राकृतिक सौंदर्य, तटीय पर्यटन और बहुजातीय पहचान के लिए प्रसिद्ध रहा मलेशिया कट्टरवाद की ओर बढ़ रहा है? भारत से फरार जाकिर नाइक जैसे विवादास्पद व्यक्ति को स्थाई निवासी का दर्जा दिए जाने से पहले ही मलेशिया धर्मनिरपेक्षता के पैमाने की लाल रेखा पर है। मलेशियाई फेडरेशन का धर्म इस्लाम अवश्य है लेकिन वहां का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है। एक तरह से लगभग सवा तीन करोड़ आबादी वाला मलेशिया एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ही है। वहां की आबादी में 61.3 प्रतिशत मुस्लिम, 19.8 प्रतिशत बौद्ध, 9.2 प्रतिशत ईसाई, 6.2 प्रतिशत हिंदू और शेष में अन्य हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के मलेशिया दौरे के समय एक बड़ा मजाक हुआ। मजाक स्वयं इमरान खान ने किया है। उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन करने के लिए महातिर की प्रशंसा करते हुए आश्वासन दे दिया कि भारत द्वारा रिफाइंड पाम ऑयल आयात पर प्रतिबंध लगा दिए जाने से मलेशिया को होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करने का पूरा प्रयास करेंगे। उनके अनुसार पाकिस्तान मलेशिया से रिफाइंड पाम ऑयल का आयात बढ़ाएगा। यह एक तरह से फूहड़ मजाक ही हुआ। भारत की तुलना में पाकिस्तान में रिफाइंड पाम ऑयल की कितनी खपत है? सिर से पैर तक कर्ज में डूबे और विदेशी मदद को तरसते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के आश्वासन पर मलेशिया अपना सिर ठोंके तो आश्चर्य नहीं। माना जा रहा है कि दो वर्ष पूर्व बनी सहमति के चलते 2020 में महातिर पद छोड़ सकते हैं। अनवर इब्राहिम उम्र में महातिर से लगभग 22 साल छोटे हैं लेकिन व्यवहारिकता में वह उनसे कहीं आगे हैं। यही कारण है कि वह भारत से संबंध अच्छे रखने पर जोर दे रहे हैं। महातिर की भारत विरोधी बयानबाजी में लगाम लगवाने में उनकी प्रमुख भूमिका मानी जा रही है। भारत में एक अच्छी बात यह देखी जा रही है कि रिफाइंड पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगाकर मलेशिया को कसने वाले कदम का स्वागत हुआ है। जैसे को तैसा वाली कार्रवाई कर भारत सरकार ने अपनी दृढ़ता प्रकट की है। उधर, भारत से खुन्नस निकालते-निकालते महातिर ने मलेशिया में अपने आलोचक बढ़ा लिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 9 February 2020


PFI is real brother of banned SIMI

-मनोज ज्वाला  नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ लंबे समय दिल्ली केशाहीनबाग में आसमान सिर पर उठाने की मशक्कत कर रही ‘भाड़े की भीड़’ के पीछे काम कर रहे संगठन ‘पीएफआई’ का पूरा नाम पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया है। यह इसका छद्म नाम है। दरअसल यह एक जिहादी संगठन है। यह संगठन पुलिस जांच के घेरे में है। ...और सबसे बड़ा तथ्य यह है कि यह संगठन प्रतिबंधित संगठन 'सिमी' का सगा भाई है। सिमी का पूरा नाम  स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया है। पुलिस मान रही है कि पीएफआई इस्लामी जेहाद का झंडाबरदार है। वह नगरिकता संशोधन अधिनियम की मुखालफत के बहाने देश भर में मुसलमानों को बरगलाने के साथ उन्हें हिंसा की राह पर ले जाने के लिए सक्रिय है। इस बात की चर्चा है कि इसके शाहीनबाग क्षेत्र में पांच दफ्तर हैं।   इस संगठन की भूमिका उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर हुए हिंसक प्रदर्शनों में सामने आई है। उत्तर प्रदेश सरकार पीएफआई को कभी भी प्रतिबंधित कर सकती है। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस संगठन के असली चेहरे से अवगत कराया है। पीएफआई का गठन 2006 में हुआ था। कहने को यह खुद को पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का शुभचिंतक बताता है। हकीकत यह है कि यह चरमपंथी इस्लामिक संगठन है। खुलासा हुआ है कि  पहले इसका नाम ‘नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट (एनडीएफ) था । तब  इसकी जडें केरल के कालीकट में थीं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पीएफआई का मुख्यालय बेशक दिल्ली में है पर इसकी जिहादी योजनाओं का निर्धारण और संचालन केरल से ही होता है । इसकी शाखाओं का विस्तार देश भर में हो चुका है । इसने ‘कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी’, तमिलनाडु के ‘मनिथा नीति पासराई’, गोवा के ‘सिटीजंस फोरम’, राजस्थान के ‘कम्युनिटी सोशल ऐंड एजुकेशनल सोसायटी’ , आंध्र प्रदेश के ‘एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस’ आदि संगठनों के साथ मिलकर कई राज्यों में अपनी पैठ बना ली है । यही नहीं पीएफआई ने महिलाओं और छात्रों के बीच घुसपैठ बनाने के लिए ‘नेशनल वीमेंस फ्रंट’ और विद्यार्थियों के लिए ‘कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया’ का गठन किया है। पीएफआई के संचालकों ने समाज और शासन को भ्रमित रखने की चालाकी से इसका नाम ऐसा रखा है कि इसे ‘मुस्लिम-संगठन’ कतई न समझा जाए ।    यही नहीं उसकी जिहादी छवि पर नकाब ढका रहे इसके दिखावे के लिए भी काम होते रहते हैं। साल 2006 में दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘नेशनल पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन इसी रणनीति का हिस्सा था। देश और सरकार को धोखे में रखने के लिए यह खुद को न्याय, स्वतंत्रता और सुरक्षा का पैरोकार बताता है। मुस्लिमों के अलावा हिन्दू-दलितों और आदिवासियों पर होने वाले कथित अत्याचार पर  मोर्चा खोलता रहता है । मगर इसकी ज्यादातर गतिविधियां मुस्लिम समाज के इर्द-गिर्द मंडराती हैं। साम्प्रदायिक आधार पर सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण दिलाना भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके लिए यह कई बार आंदोलन कर चुका है। एक स्टिंग में पीएफआई के सदस्य यह तक स्वीकार कर चुके हैं कि खाड़ी देशों से हवाला के जरिये पैसा आता है। वह इस पैसे से भारत में धर्मांतरण का धंधा चलाते हैं । कुछ समय पहले केरल के कन्नूर जिले में योग प्रशिक्षण शिविर की आड़ में मुस्लिम युवकों को आतंक और जिहाद के लिए तैयार करने के मामले का खुलासा ‘एनआईए’ कर चुकी है। एनआईए ने यहां से देसी बम और आईईडी बनाने वाली सामग्री बरामद करने के साथ फर्जी पासपोर्ट एवं वीजा जब्त किए थे। सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी पीसी कटोच तो यहां तक कह चुके हैं कि पीएफआई के तार पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों से जुड़े हैं।    2012 में केरल पुलिस ने केरल हाईकोर्ट को बताया था कि पीएफआई संगठन से संबद्ध लोग  हत्या के 27, हत्या की कोशिश के 86 और  साम्प्रदायिक दंगों के 106 मामलों में शामिल है। इस संगठन के सदस्यों ने केरल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता एन. सचिन गोपाल और संघ के स्वयंसेवकों की हत्या की है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पीएफआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल हमीद पहले ‘सिमी’ का राष्ट्रीय सचिव था।‘सिमी’ के अनेक पूर्व पदाधिकारी इस वक्त पीएफआई में विभिन्न पदों पर काबिज हैं । 1977 से सक्रिय ‘सिमी’ को 2001 में वाजपेयी सरकार ने प्रतिबंधित किया था। फिलवक्त देश के 23 राज्यों में पीएफआई सक्रिय है। पीएफआई के तार अल कायदा, जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान जैसे वैश्विक जिहादी-आतंकी संगठनों से होने के संकेत हैं। झारखंड के माओवादियों से भी इस संगठन का संबंध है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार नक्सली रोना विल्सन का संबंध भी पीएफआई से रहा है। 2018 में झारखंड सरकार ने इसे प्रतिबंधित किया था। यह बात अलग है कि बाद में यह प्रतिबंध निरस्त हो गया। पीएफआई की राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) उसकी राजनीतिक इकाई है। ‘एसडीपीआई’ केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में सक्रिय है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एसडीपीआई. ने कांग्रेस का समर्थन इस शर्त पर किया था कि सरकार बनने पर उसके समर्थकों के विरुद्ध दर्ज  मुकदमे वापस लिए जाएंगे । पश्चिम बंगाल में ‘मिल्ली इत्तेहाद परिषद’ और तमिलनाडु में ‘तमिल मुस्लिम मुनेत्र कडगम (टीएमएमके) आदि से पीएफआई से संबद्ध एसडीपीआई से गठबंधन है। पीएफआई पिछले दो साल से 15 अगस्त पर  ‘फ्रीडम परेड’ का आयोजन करने लगा है। ऐसी परेड केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के कई शहरों में आयोजित हो चुकी हैं।

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Dakhal News 5 February 2020


Implications of announcements in the budget

-योगेश कुमार गोयल    संसद में पेश किए जा चुके आम बजट में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणाओं के निहितार्थ को समझना बेहद जरूरी है। आम बजट ने पहले दिन शेयर बाजार का मूड खराब कर दिया। आर्थिक सुस्ती से बाहर निकलने के लिए खपत को बढ़ावा देने पर कुछ खास नहीं हुआ। लंबे समय से सुस्ती झेल रहा ऑटो सेक्टर हो या फिर रियल एस्टेट सेक्टर वह टकटकी लगाए रह गए। निवेशकों को उम्मीद थी कि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स खत्म होगा या लॉन्ग टर्म की परिभाषा बदलेगी पर ऐसा भी नहीं हुआ। ऐसा कुछ आर्थिक पंडित मानते हैं पर बजट में ऐसा बहुत कुछ है जो देश को नई दिशा जरूर देने वाला है। डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स खत्म करने की घोषणा अहम कदम है। सरकार ने यह परवाह नहीं की कि इससे सरकारी खजाने पर 25 हजार करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा। हालांकि  विशेषज्ञों को आशंका है कि इससे निवेशकों को भी नुकसान होगा क्योंकि डिविडेंड अब करदाता की आय से जुड़ जाएगा। वित्तमंत्री ने कर छूट और कटौती का लाभ छोड़ने वालों को आयकर दरों में कटौती की घोषणा के बाद कहा है कि सरकार का इरादा दीर्घकाल में सभी प्रकार की आयकर छूट को समाप्त करना है। तेजस जैसी और ट्रेनें देश में ही बनाने और चलाने की घोषणा रेलवे की रफ्तार बढ़ाने वाली है। रेलवे, आयकर स्लैब, शिक्षा, किसानों आदि के लिए बड़ी घोषणाओं की सचमुच दरकार थी।   वित्त वर्ष 2020-21 के लिए आर्थिक विकास दर 10 फीसदी रहने का अनुमान लगाते हुए आयकर स्लैब में बड़ा बदलाव बेहद अहम है। 2.10 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश का बड़ा लक्ष्य सरकार के इरादे को परिलक्षित करता है। कृषि-पशु आधारित उत्पाद, रॉ शुगर, स्किम्ड मिल्क, प्यूरीफाइड टेरिफैलिक एसिड (पीटीए), सोया फाइबर, सोया प्रोटीन, अखबारी कागज, कोट्ड पेपर को सस्ता करने का ऐलान अच्छा कदम है। इस देश के किसानों को सरकार से जो उम्मीद थी, वह काफी हद तक पूरी हुई है।  सिगरेट, तम्बाकू उत्पाद, फर्नीचर, फुटवियर, स्टील, कॉपर, कुछ खिलौने, कुछ मोबाइल उपकरण के महंगे होने का कुछ लोगों को गम हो सकता है। किसानों का जीवन स्तर सुधारने के लिए  2.83 लाख करोड़ रुपये का फंड आवंटित करने की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए। सिंचाई आज भी देश की समस्या है। सरकार ने इस चिंता को दूर करने के लिए इस फंड में से कृषि और सिंचाई के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपये दी है। प्रधानमंत्री कुसुम स्कीम के जरिये 20 लाख किसानों को सोलर पंप मुहैया करवाने का निर्णय धरतीपुत्रों की दशा-दिशा बदलने वाला साबित होगा। देश में सूखा राष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। सरकार ने देश की पीड़ा को समझते हुए 100 सूखाग्रस्त जिलों के विकास पर कार्य करने का इरादा जताया है। 15 लाख किसानों को ग्रिड कनेक्टेड पंपसेट से जोड़ने की बात कही है। कृषि बाजारों को उदार बनाने के अलावा मंडियों के कामकाज में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने का फैसला किया है।   नॉन बैंकिंग फाइनेंस कम्पनियों को प्रोत्साहित कर 15 लाख करोड़ रुपये का कर्ज किसानों को देने और मिल्क प्रोसेंसिंग क्षमता 108 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है। राष्ट्रीय शीत आपूर्ति शृंखला के निर्माण के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी मॉडल) के तहत फल-सब्जी जैसे जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों की ढुलाई के लिए किसान रेल चलाने का प्रस्ताव कर निराश किसानों को संजीवनी प्रदान की है। कुछ मेल एक्सप्रेस और मालगाड़ियों के जरिये जल्दी खराब होने वाले सामान (फल, सब्जियों, डेयरी उत्पाद, मछली, मांस इत्यादि) की ढुलाई के लिए रेफ्रिजरेटेड पार्सल वैन का प्रस्ताव कर उदारता दिखाई है।  बंजर जमीन पर सोलर पावर जेनरेशन यूनिट लगाकर उत्पादित बिजली को ग्रिड को बेचने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। समुद्री इलाकों में 3077 सागर मित्र बनाने के अलावा वहां के किसानों के लिए मछली उत्पादन का लक्ष्य 208 मिलियन टन रखा है।    सरकार ने अल्पसंख्यकों की चिंता भी समझी है। 2019 में पुन: सत्तासीन होने के बाद सरकार ने जुलाई में पेश किए गए बजट में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के लिए 4700 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा था लेकिन इस बार इसमें 329 करोड़ की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5029 करोड़ कर विपक्ष का मुंह बंद करने की कोशिश की है।  पोषण संबंधी कार्यक्रम के लिए 35600 करोड़ और वरिष्ठ नागरिकों एवं दिव्यांगों के लिए 9500 करोड़ रुपये आवंटित कर सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर सरकार ने दिल जीता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों की बेहतरी के लिए सरकार ने उम्मीद के अनुरूप काम किया है। जम्मू-कश्मीर में  30757 करोड़ रुपये और लद्दाख में 5958 करोड़ रुपये से विकास का पहिया दौड़ेगा।   शिक्षा क्षेत्र में बदलाव की बड़ी जरूरत महसूस की जा रही थी। इस बजट में जल्द ही नई शिक्षा नीति की घोषणा करने की बात कही गई है। शिक्षा क्षेत्र के लिए 99,300 करोड़ रुपये और कौशल विकास के लिए 3,000 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव से साफ है कि सरकार संजीदा है। वह वंचित तबके से संबंध रखने वाले छात्रों को उच्च शिक्षा देने के लिए वचनबद्ध है। इसी लिए देश के शीर्ष 100 शैक्षणिक संस्थानों में डिग्री स्तर का ऑनलाइन शिक्षण कार्यक्रम आरंभ करने की घोषणा की गई है।

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Dakhal News 5 February 2020


Shaheen Bagh, performance in questions

सुरेश हिन्दुस्थानी   नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर दिल्ली के शाहीन बाग में पिछले करीब डेढ़ माह से चल रहा प्रदर्शन सत्याग्रह है या षड्यंत्र? यह सवाल इसलिए उपजा है क्योंकि शाहीन बाग से रह-रहकर देश विरोधी नारे सुनाई दे रहे हैं। देश के मुस्लिम समाज की बात करें तो यह ध्यान रखना चाहिए कि जब जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त किया गया, तब कुछेक राजनीतिक दलों के उकसावे वाली भाषा के बावजूद मुस्लिम समाज ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या में राममंदिर बनाए जाने के निर्णय का भारत के ज्यादातर मुसलमानों ने समर्थन किया। शाहीन बाग के आंदोलन को मुस्लिम समाज का प्रदर्शन इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि मुस्लिम समाज यह भली-भांति जानता है कि नागरिकता संशोधन कानून किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता छीनने के लिए नहीं है। इसे पूरी तरह से राजनीतिक आंदोलन कहा जाए तो सर्वथा उचित ही होगा। हम जानते हैं कि शाहीन बाग के धरने को जहां कांग्रेस का व्यापक समर्थन मिल रहा है, वहीं आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल मुसलमानों के वोट प्राप्त करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं। सवाल यह है कि हमारे देश की राजनीति किस ओर जा रही है? क्या इस प्रकार की राजनीति देश के भविष्य को अंधेरे की ओर ले जाने का प्रयास नहीं है?   यह सही है कि लोकतंत्र में रचनात्मक विरोध होना ही चाहिए लेकिन विरोध के नाम पर देश का विरोध कतई नहीं होना चाहिए। शाहीन बाग में जो प्रदर्शन हो रहा है, उसमें शामिल होने वाले यह नहीं जानते कि वास्तव में नागरिकता संशोधन कानून में क्या है? विपक्षी राजनीतिक दलों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें सत्य से अवगत कराया जाए लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा। हाल ही में यहां जेएनयू के छात्र शरजील इमाम के भाषण का वीडियो सामने आया, जिसमें उसने पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात कही। इससे यह काफी हद तक स्पष्ट हो गया कि शाहीन बाग के प्रदर्शन के पीछे विभाजनकारी मानसिकता है। शरजील इमाम ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमें भारत को इस्लामिक देश बनाना है। इससे यह लगता है कि सीएए के विरोध के नाम पर हिंसा एक सोची-समझी साजिश है। सीएए विरोध के नाम पर भ्रम फैलाकर देश के मुस्लिम वर्ग को सरकार के खिलाफ खड़ा करने का षड्यंत्र है। भारत विरोधी ताकतें सीएए, एनपीआर, एनआरसी जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर पहले समाज और फिर देश तोड़ने का मंसूबा पाले हैं।   महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सीएए को लेकर देशभर में हुई हिंसा के लिए पीएफआई की ओर से 120 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात सामने आई। इसमें से 77 लाख रुपए कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल को दिए गए। कपिल सिब्बल का कहना है कि उन्हें यह राशि फीस के रूप में मिली है। देश की सबसे पुरानी पार्टी मानी जाने वाली कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर इन षड्यंत्रकारियों के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि किसी भी कीमत पर उन्हें वोट और सत्ता चाहिए। सत्ता प्राप्त करने के लिए कांग्रेस को दुश्मन देश पाकिस्तान की भी मदद लेना पड़े तो पीछे नहीं हटेगी। मणिशंकर अय्यर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने पाकिस्तान में जाकर नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए मदद मांगी थी।   धर्मनिरपेक्षता की डींगे हांकने वालों से सवाल है कि पाकिस्तान में आए दिन हिन्दू लड़कियों को अगवा किए जाने की घटनाओं पर उनका गला जाम क्यों है? कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार व घाटी से पलायन पर धर्मनिरपेक्ष लोगों की आत्मा क्यों नहीं जागी थी? पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब देशभर में सिखों का कत्लेआम हुआ, तब धर्मनिरपेक्षता वादियों की रूह क्यों नहीं कांपी? पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने जनसांख्यिकीय का स्वरूप बदल दिया, तब धर्मनिरपेक्ष लोग खामोश क्यों रहे? पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आए सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और हिन्दुओं को भारत की नागरिकता देने के लिए कानून पास किया गया तो कथित धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर लोगों को भारतीय संविधान खतरे में क्यों नजर आ रहा है? इनके कुचक्र को समझने की जरूरत है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 4 February 2020


bhopal, Concern, every Indian, Nirmala\

-सियाराम पांडेय 'शांत'     केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारण ने अपने कार्यकाल का दूसरा बजट पेश करते हुए कई रिकॉर्ड तोड़े। यह और बात है कि इसके लिए प्रतिपक्ष ने उन्हें बधाई तो नहीं दी। अलबत्ता उनकी आलोचना जरूर की। एक झटके में  बजट को नकारना व्यवस्था को नकारने जैसा होता है। हालांकि आजादी के बाद से लेकर अब तक जितने भी बजट पेश हुए हैं, उससे विपक्ष कभी खुश नजर नहीं आया। राहुल गांधी को लगता है कि बेरोजगारी से निपटने का बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं है। माकपा नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि जब तक मोदी सरकार के मंत्री और भाजपा नेता भारतीय समाज को नष्ट करने के लिए काम करेंगे, तब तक देश में कोई भी आर्थिक पुनरुत्थान नहीं हो सकता। यह विपक्ष का पक्ष है लेकिन इस बजट में निर्मला सीतारमण ने भारतीय करदाताओं को बड़ी राहत दी है।पांच लाख तक की वार्षिक आय को करमुक्त कर टैक्स स्लैब में व्यापक बदलाव किया है। इसका लाभ हर आम और खास को मिलना तय है।    उन्होंने अनुमान जताया है कि 2020-21 में विकास दर 10 फीसदी रहेगी। आगामी वित्त वर्ष में सरकार की कुल कमाई 22.46 लाख करोड़ रुपये हो सकती है जबकि कुल खर्च 30.42 लाख करोड़ रुपये हो सकते हैं। चालू वित्त वर्ष 2019-20 के संशोधित अनुमानित खर्च 26.99 लाख करोड़ और कमाई 19.32 लाख करोड़ रुपये तक होने की उन्होंने बात कही है। उन्होंने यह भी कहा है कि वित्त वर्ष 2021 में उधारी 5.36 लाख करोड़ रह सकती है जबकि वित्त वर्ष 2019-20 में सरकार की शुद्ध बाजार उधारी 4.99 लाख करोड़ रहेगी। उन्होंने देश को यह बताने का भी प्रयास किया है कि कर संग्रह में उछाल आने में समय लगेगा, क्योंकि हाल में कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती के चलते अल्पकाल में कर संग्रह घट सकता है। मगर उन्होंने अपनी सकारात्मक सोच का इजहार किया है कि अर्थव्यवस्था को भारी लाभ होगा। बजट में वित्त वर्ष 2021 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.5 प्रतिशत रखा गया है। चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। उनका मानना है कि सरकार से मिलने वाली राहत और छूट को छोड़ने वाले आयकरदाताओं को कर की दरों में उल्लेखनीय राहत मिलेगी। एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों के पास कर्ज देने के लिए धन की कमी न हो, इसके लिए सरकार की ओर से लोन गारंटी स्कीम शुरू करने का वादा कर उन्होंने मरहम लगाने का भी काम किया है। एनबीएफसी के लघु और मध्यम इकाइयों को बिल आधारित कर्ज देने के लिए नियम-कायदे में संशोधन करने और सरकार के 15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट की सिफारिशों को मान लेने की बात कहकर उन्होंने छोटे और मंझोले उद्योगों का भी सहारा बनने का काम किया है।    लेखा परीक्षा के लिए कुल कारोबार की उच्चतम सीमा पांच करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव, स्टार्टअप प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में रियायत, लाभ की 100 प्रतिशत कटौती के लिए कुल कारोबार की सीमा 25 करोड़ से बढ़ाकर 100 करोड़ करने और विदेशी सरकारों व अन्य विदेशी निवेश की सॉवरेन धन निधि के लिए टैक्स रियायत की घोषणा कर उन्होंने भारत को औद्योगिक विकास के क्षितिज तक पहुंचने का प्रयास किया है। विद्युत क्षेत्र में लाभांश वितरण टैक्स को हटाने का प्रस्ताव कर निवेशकों को लुभाने की कोशिश इस बजट में सहज ही देखी जा सकती है। एलआईसी के बड़े हिस्से को बेचने की घोषणा अवश्य ही चिंताजनक है। केंद्रीय बजट में नवगठित संघ राज्यों के लिए 2020-21 में 30,757 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव बेहद सराहनीय है। जल संकट से जूझ रहे देश के 100 जिलों में जरूरी उपाय करने की घोषणा की गई है। किसानों के लिए रेल और विमान चलाने का विचार किसी सरकार में पहली बार आया है।  ग्रामीण विकास के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का आवंटन किसानों के लिए कितना हितकारी साबित होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए 2500 करोड़ रुपये और संस्कृति मंत्रालय के लिए 3150 करोड़ की व्यवस्था कर उन्होंने देश की नब्ज को मजबूती प्रदान की है। को-ऑपरेटिव सोसायटीज को अब 30 प्रतिशत की जगह 22 प्रतिशत टैक्स देना होगा। महिलाओं से जुड़ी योजनाओं के लिए 28,600 करोड़ रुपए, 6 लाख से ज्यादा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 10 करोड़ घरों की महिलाओं तक पहुंचने के लिए स्मार्टफोन देना यह बताता है कि महिला होने के नाते वे महिलाओं की पीड़ा को बखूबी समझती हैं।    शिक्षा क्षेत्र के लिए 99,300 करोड़ रुपये का प्रस्ताव कर जल्द ही नई शिक्षा नीति घोषित करने की बात कह उन्होंने इस क्षेत्र की धड़कनें बढ़ा दी हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 69,000 करोड़ रुपये और रक्षा क्षेत्र के लिए भारी भरकम राशि का प्रस्ताव कर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि उनकी सरकार देश के विकास को लेकर तो गंभीर है ही लेकिन वह देश की सुरक्षा और संरक्षा से भी कोई समझौता नहीं करने जा रही है। 1860 में पहला टैक्स कानून बना था। आजाद भारत में टैक्स कानून 1961 में बना लेकिन सबसे बड़ा टैक्स सुधार इसी बार नजर आया । भले ही इसके साथ कुछ शर्तें जुड़ी हों और यह देश हित में है लेकिन इसका देश के विकास पर दूरगामी असर होना तय है। यह और बात है कि मोदी सरकार के बजट को सातवीं बार भी शेयर बाजार ने खारिज किया है। वित्तमंत्री ने नई कर व्यवस्था में 70 तरह के डिडक्शन खत्म किए हैं। करदाता छूट के लिए पुरानी व्यवस्था का विकल्प ले सकते हैं। नई व्यवस्था किसी भी लिहाज से करदाताओं पर बोझ नहीं है। बजट में सारी चीजें बयां नहीं की जा सकतीं। बजट निर्माण की अपनी मजबूरियां होती हैं लेकिन इतना जरूर है कि इसमें सभी का ध्यान रखा गया है और यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। 

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Dakhal News 4 February 2020


bhopal, Hopeful again after 36 years

अमरीक   पंजाबी के नामी शायर सुरजीत पातर का शेर है- 'ऐस अदालत च बंदे बिरख हो गए; सुक्क गए फैसले सुनदयां-सुनदयां/ आक्खौ ऐहनां नूं हुण घरे जाण आपणे ऐ कदों तीक ऐत्थे खड़े रहणगे...' यानी अदालत में फैसले सुनते-सुनते मनुष्य वृक्ष हो गए, इनसे कहिए अब वे अपने घरों को लौट जाएं, कबतक मरते-सूखते यहीं खड़े रहेंगे! 84 के सिख कत्लेआम पीड़ितों पर यह शेर पूरी तरह प्रासंगिक है। नवंबर 1984 के सिख विरोधी एकतरफा भीषण कत्लेआम के जख्म 36 साल के बाद आज भी रिस रहे हैं। पीड़ित पीढ़ी-दर-पीढ़ी इंसाफ के लिए भटकते फिर रहे हैं। उम्मीद ने एकबारगी फिर उनकी दहलीज पर दस्तक दी है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एस एन ढींगरा की अगुवाई वाली एसआईटी की सिफारिशें मंजूर कर ली हैं तो फिर लगने लगा कि शायद अभीतक कोसों दूर खड़ा न्याय पास आ जाएगा। 84 की हिंसा की जांच के लिए गठित जस्टिस ढींगरा विशेष जांच टीम से पहले 10 आयोग और जांच कमेटियां काम कर चुकी हैं लेकिन शिकार और वहशी शिकारी वहीं के वहीं हैं जहां 36 साल पहले थे। जाहिर है कि 1984 के सिख विरोधी कत्लेआम को राजनीतिक संरक्षण में अंजाम दिया गया। आयोगों तथा जांच कमेटियों की कवायद के बावजूद दोषी बचते रहे। अपवाद की तरह कुछ सजाएं हुईं लेकिन उन्हें अधूरे इंसाफ का हिस्सा ही माना जाएगा। पूरा इंसाफ अभी होने की प्रक्रिया में है और न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो चुकी यह प्रक्रिया खत्म कब होगी- कोई नहीं जानता। फिर भी उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गठित जस्टिस ढींगरा के नेतृत्व वाली एसआईटी की सिफारिशों ने आस की नई खिड़की यकीनन खोली है।   इससे पहले केंद्र सरकार ने 2014 में 293 ऐसे मामलों की जांच के लिए आयोग की घोषणा की थी। जस्टिस ढींगरा ने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी है वह साफ बताती है कि बेगुनाह सिखों के बेरहम कातिलों को तमाम एजेंसियों ने किस तरह बचाया। यह रिपोर्ट कई ऐसे दाग उजागर करती है जो भविष्य के लिए नजीर अथवा सबक हैं। उक्त रिपोर्ट का एक अहम पहलू पुलिसिया व मजिस्ट्रेट जांच और ट्रायल की घोर विसंगतियां हैं। अनगिनत आपराधिक मामलों पर फैसला सुनाने वाले जस्टिस एसएन ढींगरा ने हैरानी जताई है कि कानून के मुताबिक ज्यादा से ज्यादा पांच एक जैसे मामले, एक साथ जोड़े जा सकते हैं लेकिन यहां पुलिस ने पांच हत्यारों के मामलों में एकसाथ चार्जशीट दायर की थी, उनमें से भी सिर्फ पांच मामलों पर ही दोष आयद किए गए। 498 हिंसक घटनाओं की एक ही एफआईआर दर्ज की गई और महज एक अन्वेषण अधिकारी लगाया गया। अदालत ने भी पुलिस को मामले अलग-अलग करने के आदेश नहीं दिए। हद देखिए कि चश्मदीद गवाहों ने अदालतों में कहा कि वे दोषियों को बखूबी पहचान सकते हैं लेकिन सरकारी वकीलों ने दांवपेंच बरतकर गवाहों को शिनाख्त नहीं करने दी और दोषी बरी हो गए। एसआईटी की रिपोर्ट में साफ शब्दों में लिखा है कि इन मामलों में सुनवाई को थका देने वाली लंबाई तक इस तरह खींचा गया कि पीड़ित और गवाह बार-बार अदालतों के चक्कर काटते बेहाल हो गए और उनमें से कईयों ने खुद ही हार मान ली।   रिपोर्ट में कई अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ एक ऐसे इंस्पेक्टर को साजिश का हिस्सेदार बताया गया है जिसने जानबूझकर छह सिखों को हिंसा से बीचबचाव के लिए रखे गए लाइसेंसी हथियारों से मौके पर मरहूम कर दिया ताकि दंगाई आराम से उन्हें निशाना बना सकें। इसका खुलासा होने पर इस इंस्पेक्टर को पहले नौकरी से निलंबित करने का नाटक किया गया और फिर बहाल करके तरक्की देकर एसीपी बना दिया गया! जस्टिस ढींगरा ने लिखा है कि सिख यात्रियों को रेलगाड़ियों से निकालकर रेलवे स्टेशनों पर कत्ल किया गया लेकिन पुलिस ने मौके पर एक भी गिरफ्तारी नहीं की। बाद में बहानेनुमा सफाई दी कि दंगाइयों की तादाद ज्यादा थी। विभिन्न स्टेशनों पर 426 लोग मारे गए, जिनमें से 84 की शिनाख्त नहीं हो पाई। जस्टिस ढींगरा ने सिर्फ 186 बंद मामलों की जांच के आधार पर ऐसे निष्कर्ष दिए हैं जबकि ऐसे केसों की संख्या हजारों में है और निर्दोष मरने वालों की भी हजारों में है।   सिख विरोधी कत्लेआम में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के हाथ खून से सने हैं। बीते दिनों पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भरे समारोह में कहा था कि उस वक्त के गृहमंत्री नरसिंह राव ने इंद्रकुमार गुजराल और उनके कुछ साथियों की सलाह मान ली होती तो कत्लेआम थम सकता था। ढेरों प्रमाण हैं कि उस समय लगभग समूची सरकारी मशीनरी ने कम-से-कम दिल्ली में तो दंगाइयों का खुला साथ दिया। तब के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह खुद सिख थे लेकिन जिन राजीव गांधी को उन्होंने बगैर संसदीय बोर्ड का नेता चुने प्रधानमंत्री पद की शपथ निहायत गैर संवैधानिक ढंग से दिलाई, उन्हीं राजीव गांधी ने पेड़ वाले मुहावरे का इस्तेमाल कर सिख विरोधी कत्लेआम को जायज ठहराया। जब राष्ट्रपति खामोश बैठे रहें और प्रधानमंत्री कातिलों के बचाव में सरेआम बोलें, तब कहां न्याय मिलना था? खैर, जस्टिस एसएन ढींगरा की अगुवाई वाली एसआईटी की रिपोर्ट केंद्र सरकार ने स्वीकार करते हुए कहा है कि इसकी सिफारिशों पर यथाशीघ्र सख्ती तथा लाग लपेट के बगैर अमल किया जाएगा। यह तो 186 मामलों पर आधारित रिपोर्ट है जबकि पीड़ितों की संख्या हजारों में है। ऐसे सैकड़ों मामले या तो बंद कर दिए गए या अदालतों तक जाने ही नहीं दिए गए। उन्हें भी इसी तरह से खोला जाना चाहिए।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 January 2020


bhopal, Ganga journey on the path of development

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री   गंगा दुनिया की सबसे पवित्र नदी है। इस तथ्य को वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। ऋषियों ने आदिकाल में ही यह शोध कर लिया था। परतंत्रता के लंबे कालखंड और बाद में आने वाली सरकारों ने इसकी महिमा नहीं समझी। नरेंद्र मोदी ने पहली बार सरकार बनाने के बाद नमामि गंगे परियोजना शुरू की थी। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस परियोजना पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया। इसके अनुकूल परिणाम मिले। गंगा यात्रा इसी भावना को आगे बढ़ा रही है।   योगी आदित्यनाथ मुजफ्फरनगर में पतित पावन यात्रा में सम्मिलित हुए। उन्होंने कहा कि गंगा जी हमारी आस्था, विश्वास और अर्थव्यवस्था का प्रतीक रही हैं। भारत की संस्कृति, आस्था एवं अर्थव्यवस्था में गंगा जी के योगदान के प्रति हम आभारी है। नमामि गंगे के तहत प्रदेश सरकार ने गंगा यात्रा प्रारम्भ की है। गंगा किनारे के 27 जनपद, 21 नगर निकाय, एक हजार अड़तीस ग्राम पंचायतों से यह यात्रा निकलेगी। सरकार विकास और आस्था दोनों के प्रति कटिबद्ध है। गंगा यात्रा आस्था का प्रतीक है। इसे ध्यान में रखते हुए यहां के किसानों एवं नौजवानों की आजीविका के साथ जोड़ा जाएगा। गंगाजी के किनारे गंगा मैदान, गंगा पार्क, गंगा नर्सरी, जिम आदि बनेंगे। गंगाजी को निर्मल बनाए जाने व लोगों में गंगाजी के प्रति जागरूकता के लिए बिजनौर व बलिया से गंगायात्रा का प्रारम्भ किया गया है।   यह गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने का अभियान है। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने बलिया से गंगायात्रा का शुभारंभ किया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित आठ केंद्रीय मंत्री भी विभिन्न स्थानों पर यात्रा में शामिल होंगे। बिजनौर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यात्रा का शुभारंभ किया। यह यात्राएं प्रदेश के 87 विधानसभा क्षेत्रों 26 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरेगी। दोनों यात्राएं सड़क मार्ग से 1248 और नाव से 150 किमी की दूरी तय करेगी। गंगा का कुल बहाव 2525 किलोमीटर है। इसमें 1140 किमी लंबा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में है। बलिया से कानपुर तक 657 और बिजनौर से कानपुर तक 581 किमी की यात्रा सड़क मार्ग से होगी।   राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने बलिया में गंगा पूजन व आरती के बाद यात्रा को रवाना किया। उन्होंने कहा कि गंगा किनारे बसने वाले लोग भाग्यशाली हैं। गुजरात में मात्र एक नदी है। यहां नदियां ही नदियां हैं। मानव जीवन बचाने के लिए इन नदियों को प्रदूषित होने से बचाना पड़ेगा। पीने का पानी हम नदी से लेते हैं और गंदगी भी नदी में डालते हैं। लोगों ने नदियों के साथ उपजाऊ भूमि को भी केमिकल युक्त बना दिया। कारखानों का केमिकल युक्त पानी नदी में बहने देते हैं, इसका दुष्परिणाम हुआ। गम्भीर बीमारियां फैलने लगी, उपजाऊ भूमि का क्षरण होने लगा। इसपर हमको विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसपर विचार किया और नदियों को बचाने के लिए कदम उठाये गए। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते उन्होंने कारखानों के गन्दे जल को शुद्ध करके नदी में जाने के लिए एसटीपी प्लांट लगवाया। इससे नर्मदा निर्मल हो गई। अब नमामि गंगे अभियान चल रहा है। इससे गंगाजी निर्मल होंगी।   भारतीय परंपरा में नदियां,जीव-जंतु भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं। इनके संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी है। हमारे चिंतन में वसुधा भी कुटुंब है। सबको बचाने से ही हमारा जीवन बचेगा। पौधरोपण हम सबका कर्तव्य है। राज्य सरकार किनारे के गांवों में समुचित विकास, शुद्ध पानी की उपलब्धता, गंगा उद्यान, खेल मैदान सहित हर प्रकार की सुविधाओं को उपलब्ध करा रही है। गंगा जीवन यापन करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराने वाली मां हैं। मां को स्वस्थ रखने का प्रयत्न करना हर गंगापुत्र का कर्तव्य है। बलिया और बिजनौर से चलने वाली दोनों यात्रा कानपुर में मिलेगी। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी भी रहेंगे। इस यात्रा का उद्देश्य गंगा किनारे गांवों को विकसित करना है। गंगा तटों के साथ अर्थ गंगा के रूप में एक आधुनिक व प्रदूषण मुक्त इलाका स्थापित करना है। गंगा किनारे गांवों में जीरो बजट खेती व ऑर्गेनिक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा। गंगा उद्यान, गंगा खेल मैदान, गंगा चबूतरा आदि का निर्माण होगा। शहर का मल, कारखानों का गंदा पानी गंगा में नहीं जाने दिया जाएगा। साढ़े तीन लाख करोड़ खर्च कर हर घर तक पाइप से शुद्ध पानी पहुंचाया जाएगा। गंगा यात्रा के अंतर्गत अनेक सांस्कृतिक व जागरूकता के कार्यक्रम भी सम्मिलित किये गए हैं।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 30 January 2020


bhopal,Corona dangerous world endangered

प्रमोद भार्गव खतरनाक विषाणु (वायरस) कोरोना से पूरी दुनिया सहमी है। चीन के ग्यारह करोड़ की आबादी वाले वुहान नगर में संक्रमित हुए वायरस के विस्तार ने चीन के अनेक शहरों में दहशत फैला दी है। यहां के करीब 1283 लोग इसकी चपेट में हैं। 42 की मौत हो चुकी है और अनेक की हालत गंभीर है। यह विषाणु बिना किसी अवरोध के चीन की सीमा लांघ कर हांगकांग, मकाऊ, ताइवान, नेपाल, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाइलैंड, वियतनाम, फ्रांस और अमेरिका में फैल चुका है। भारत भी इसकी दस्तक से चौकन्ना होकर सावधानी बरत रहा है, जिससे इसका संक्रमण नियंत्रित रहे। गोया, भारत में दो हजार लोगों को चिकित्सकों की निगरानी में रखा है। चीन से लौटे तीन लोगों का मुंबई के एक अस्पताल में चिकित्सीय परीक्षण किया गया, जिनमें से दो की जांच रिपोर्ट नकारात्मक है। तीसरे संदिग्ध यात्री के रक्त के नमूनों को जांच के लिए पुणे स्थित ‘नेशनल इंस्ट्रीट्यूट ऑफ वायरोलाॅजी‘ भेजी गई है। मुंबई में चीन से लौटने वाले 1789 और हैदराबाद में 250 यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग की गई है। चीन में भारत की शिक्षिका प्रीति महेश्वरी इस संक्रमण से गंभीर रूप से पीड़ित हैं। प्रीति यहां के इंटरनेशनल स्कूल ऑफ सांइस एंड टेक्नोलाॅजी में शिक्षिका हैं। उनके उपचार में करीब एक करोड़ रुपए खर्च आ रहा है। साफ है, आंख से नहीं दिखने वाला यह अत्यंत मामूली विषाणु जहां इंसान पर कहर बनकर टूट रहा है, वहीं आधुनिकतम चिकित्सा विज्ञान के लिए भयावह चुनौती के रूप में पेश आया है।   अक्सर हर साल दुनिया में कहीं न कही, किसी न किसी वायरस से उत्पन्न होने वाली बीमारी का प्रकोप देखने में आ जाता है, जिस पर यदि समय रहते नियंत्रण नहीं हो पाया तो महामारी फैलने में देर नहीं लगेगी। इस नए वायरस को जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और दूषित होते पर्यावरण का कारक बताया जा रहा है। ऋतुचक्र में हो रहे परिवर्तन और खानपान में आए बदलाव को भी इसके उत्सर्जन का कारण माना गया है। साफ है, प्रकृति के अंधाधुंध विकास पर टिकी यह जीवन शैली हमें एक ऐसे अंधकूप में धकेल रही है, जहां जीवन जीने के खतरे निरंतर करीब आते दिख रहे हैं। गोया, चिकित्सा विज्ञान अपनी उपलब्धियों के चरम पर जरूर है, लेकिन जिस तरह से नए-नए रूपों में निपाह, एड्स, हेपोटाईटिस-बी, स्वाइन-फ्लू, बर्ड-फ्लू और इबोला जैसी बीमारियां वायरसों के प्रकोप से सामने आ रही हैं, उससे लगता है कि अंततः हम प्रकृति के प्रभुत्व के समक्ष लाचार हैं। इस वायरस के परिप्रेक्ष्य में आशंका यह भी है कि कहीं इन वायरसों का उत्सर्जन वैज्ञानिकों द्वारा जेनेटिकली इंजीनियरिंग से खिलवाड़ का कारण तो नहीं है? क्योंकि अनेक देश अपनी सुरक्षा के लिए घातक वायरसों का उत्पादन कर इन्हें, जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल की फिराक में हैं।   चीन से फैले इस कोरोना विषाणु से फैलने वाली बीमारी के इलाज के लिए फिलहाल कोई टीका (वैक्सीन) का आविष्कार नहीं हो पाया है। हालांकि अमेरिका की सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध एजेंसी ने कोरोना वायरस से बचाव का टीका विकसित करने पर काम शुरू कर दिया है। वर्तमान दुनिया को परेशान कर रहे इस वायरस का संबंध ‘कोरोनोवाइरीडी‘ परिवार से है। इस परिवार के वायरस से फैलने वाली ‘सार्स‘ (सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटरी सिंड्रोम) बीमारी ने 2002 में 800 लोगों की जान ले ली थी। यह बीमारी चीन से शुरू हुई थी। इसके अलावा 2012 में पश्चिम एशिया में रेस्पेरेटरी सिंड्रोम कोरोनोवाइरस (मर्स) ने कोहराम मचाया था। उस समय प्रत्येक 10 संक्रमित लोगों में से 3-4 लोगों को बचाया नहीं जा सका था।   कोरोना वायरसों का एक ऐसा बड़ा समूह है, जो आमतौर से जानवरों में पाए जाते हैं। अभीतक ज्ञात ऐसे छह विषाणुओं की पहचान हो चुकी है, जो मानव समूहों पर संक्रमण का कहर ढा रहे हैं। इनकी संख्या सात भी हो सकती है। फिलहाल इस वायरस के उत्पन्न होने के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। चीन के पेकिंग विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र के शोधार्थियों ने कोरोना वायरस के सांप से इंसानों में प्रवेश का अंदेशा जताया है। जबकि चीनी अकादमी ऑफ साइंसेज द्वारा कराए गए शोध से पता चला है कि कोरोना की उत्पत्ति चमगादड़ व सांप दोनों से हो सकती है। चीन में की गई आरंभिक जांचों से पता चला है कि वुहान सी-फूड बाजार में यह वायरस जानवरों के जरिए ही फैला है। सी-फूड यानी समुद्री जीन-जंतुओं व वनस्पतियों से निर्मित भोजन। इसका मुख्य स्रोत समंदर ही होता है। यह आहार शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों ही प्रकार का होता है। समुद्र में सर्पों की भी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इन्हें व्यंजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में इन सांपों द्वारा शिकार बनाए जो जीव आधे-अधूरे खाकर छोड़ दिए जाते हैं, उन्हें भी इंसान पकाकर खा जाता है, जो कालांतर में इस जानलेवा विषाणु के शरीर में उत्सर्जन का कारक बन जाता है। समुद्री भोजन के रूप में बड़े पैमाने पर मछली, झींगा, केकड़ा, लाॅबस्टर, स्क्विड और ओएस्टर जीव खाए जाते हैं। शाकाहारी भोजन के रूप में अनेक प्रकार की समुद्री काईयों को खाया जाता है।   विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फिलहाल इस वायरस के प्रकोप से बचने के उपायों में खाने से पहले हाथ धोना और मांसाहारी भोजन से बचने की सलाह दी है। यदि यह वायरस मनुष्य में पहुंच जाता है तो इसके लक्षण जुकाम, खांसी व बुखार के रूप में सामने आने लगते हैं। यदि इसका समय पर इलाज शुरू नहीं हुआ तो यह फेफड़ों को संक्रमित कर न्यूमोनिया में परिवर्तित होकर श्वांस तंत्र से जुड़े लोगों को नुकसान पहुंचाने लगता है। लाइलाज रहते हुए यह एक इंसान से अनेक इंसानों में फैलने लगता है। छींक और हाथ मिलाने से भी इसका संक्रमण फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया है कि 2002 में यह वायरस पहली बार संज्ञान में आया। तब 37 देशों में इसका संक्रमण फैल गया था। इसके बाद 2003 में 8098 लोग इसकी चपेट में आए, जिनमें से 774 लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 2012 में यूरोप और मध्य-पूर्व में इस वायरस से संक्रमित होने वाले रोगियों की संख्या 33 तक पहुंच गई थी। इनमें से 18 काल के गाल में समा गए थे।   इस खतरनाक वायरस का प्रकोप अब सऊदी अरब, जाॅर्डन, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस में भी दिखाई दे रहा है। यहां संक्रमण से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोरोना विषाणु के जेनेटिक कोड के विश्लेषण से पता चला है कि मनुष्य को संक्रमित करने की क्षमता रखने वाला कोरोना-वायरस, सार्स का निकट संबंधी है। 2002 में इसी सार्स के कहर से लगभग 800 लोगों की मौत हुई थी। बहरहाल इस खतरनाक वायरस के लक्षण जरूर सामान्य से रोग सर्दी-जुकाम-बुखार व सूजन के रूप में सामने आते हैं लेकिन इसे बेअसर करने वाला फिलहाल कोई टीका अस्तित्व में नहीं आ पाया है। इसलिए यह जानलेवा बना हुआ है। इसके संक्रमण से बचने का फिलहाल सबसे प्रमुख उपाय समुद्री खाद्य सामग्री खाने से बचना तो है ही, सावधानी व सतर्कता भी जरूरी है।     (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 27 January 2020


bhopal, Interrelation of land and animal

हृदयनारायण दीक्षित   भूमि और सभी प्राणी परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं। यह नेह मां और पुत्र जैसा है। वैदिक साहित्य में इस सम्बंध का अनेकशः उल्लेख है। वैदिक ऋषि पृथ्वी को बार-बार नमन करते हैं। अथर्ववेद (भूमि सूक्त, 12.26 व 27) में कहते हैं, “इस भूमि की सतह पर धूलिकण हैं, शिलाखण्ड व पत्थर हैं। इसके भीतर स्वर्ण, रत्न आदि खनिज तत्व हैं। हम इस पृथ्वी को नमस्कार करते हैं। इस भूमि में वृक्ष वनस्पति स्थिर रहते हैं। वृक्ष वनस्पति औषधि रूप में हमारी सेवा करते हैं। जो पृथ्वी वनस्पति धारिणी, धर्मधारक और सबका पालन करती है, हम उसे नमन करते हैं। उसकी स्तुति करते हैं।” अथर्ववेद को अंधविश्वास से युक्त बताने वाले भूमि सूक्त का प्रत्यक्ष भौतिक दर्शन नहीं देखते।   भूमि का अंधाधुंध उत्खनन पर्यावरण विनाशी है। ऋषि कवि अथर्वा भूमि के प्रति आदरभाव के गीत गाते हैं। बार-बार उसे मां कहते हैं। ऐसे आदरभाव से युक्त अभिजन पृथ्वी को क्षति नहीं पहुंचाते। भूमि सूक्त (वही 34 व 35) में यह आदरभाव बहुत गहरे प्रकट हुआ है। कहते हैं “हे सबकी आश्रयदाता भूमि! हम दायें या बाएं करवट लेते या पैर फैलाते, पीठ के बल शयन करते हैं, आपको कष्ट न हो, आप हमसे रूष्ट न हों। कृषि कार्य सहित तमाम अवसरों पर हम आपको खोदते हैं। आपको कष्ट न हो।” इन दोनों मंत्रों में पृथ्वी जीवमान प्राणी जैसी है। ऋग्वेद में दीर्घजीवन की अभिलाषा है। इस अभिलाषा में स्वस्थ जीवन भी जुड़ा हुआ है। रूग्ण दशा में दीर्घजीवन भार बन जाता है। ऋषि की इच्छा है कि हम दीर्घजीवन में लगातार सूर्य देखते रहें लेकिन अथर्ववेद के भूमि सूक्त में सूर्य प्रकाश के समक्ष भूमि देखते रहने की प्रीतिकर स्तुति है “हे भूमि! हम स्नेही सूर्य के समक्ष आपका विस्तार देखते रहें। आयु वृद्धि के साथ नेत्र ज्योति शिथिल न हो।” (वही 33) आयु वृद्धि में दृष्टि कमजोर होती है। ऋग्वेद के ऋषि सूर्य देखते रहने की अभिलाषा करते हैं। अथर्ववेद के ऋषि सूर्य प्रकाश में भूमि का विस्तार देखते रहने के इच्छुक हैं।   आनंद वैदिक पूर्वजों की अभिलाषा है। प्रकृति का उल्लास ऋतुओं में प्रकट होता है। भारत भूमि में प्रकृति का अंतस् 6 ऋतुओं ग्रीष्म, वर्षा, हेमंत, शिशिर, शरद् व बसंत में व्यक्त होता है - ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि, शरद, हेमंतः शिशिरो वसंतः। इन सभी ऋतुओं के दिन-रात हमारे लिए आनंददाता हों।” (वही 36) ऋषि समूची पृथ्वी का स्तोता है लेकिन उसकी स्तुति का केन्द्र जम्बूद्वीप भरतखण्ड है। स्वाभाविक ही उसके सामने 6 ऋतुओं वाली भारतभूमि है। कहते हैं, “इस धरती में यज्ञ होते हैं। यज्ञ मण्डप बनते हैं। यहां ऋग्वेद, साम व यजुर्वेद के मंत्र गूंजते हैं। इसी भूमि पर प्राचीन काल में लोकमंगल के इच्छुक ऋशि तपसिद्ध वाणी द्वारा सात सत्रों वाले ज्ञान यज्ञ करते थे।” (वही 38 व 39) अथर्वा पूर्वकालीन ज्ञान यज्ञ सत्रों का उल्लेख करते हैं। यह समय अथर्ववेद के पहले का है। संभवतः अथर्ववेद के समय ऐसे सत्र नहीं हो रहे हैं। अथर्ववेद का समय तो भी उल्लास और ज्ञान से भरापूरा है। अथर्वा इस उल्लास के घटक बताते हैं, “यस्या गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां - इस भूमि पर गीत गाए जाते हैं, नृत्य होते हैं।” (वही 41) सामंत काल में गीत और नृत्य लोकजीवन का भाग नहीं थे। अथर्ववेद के समय गीत और नृत्य का स्थल ‘भूमि’ है, यह भूमि जन सामान्य का रंगमंच है। बताते हैं कि यहां युद्ध भी हैं और युद्ध के नगाड़े भी हैं। यह पृथ्वी हम सबको शत्रुविहीन करे।” (वही 41) भारतभूमि प्रत्येक दृष्टि से उल्लासधर्मा है। बताते हैं “यहां प्रचुर अन्न होते हैं। यहां ‘पंच कृष्टया’ निवास करते हैं। वर्षा समयानुकूल होती है। पर्जन्य (प्राकृतिक इकोलोजिकल समूह) पोषण करते हैं। इस भूमि को नमस्कार है।” (वही 42) ऋग्वेद के समाज में मनुष्यों के बड़े समूह पांच हैं। इन्हें पंचजनाः कहा गया है और पंचकृष्टया भी। वैसे अन्य समूह भी हैं। अथर्वा ने यहां ‘पंचकृष्टया’ का ही प्रयोग किया है। अथर्ववेद के काल में यहां अनेक विश्वासों वाले लोग रहते हैं। पृथ्वी सबका पोषण करती है। विचार और विश्वास का परिपूर्ण लोकतंत्र है। भूमि सूक्त का यह मंत्र (वही 45) बहुत लोकप्रिय है, “जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथ्वी यथौकसं - भिन्न आस्था विश्वास व भाषा वाले समाज को पृथ्वी एक परिवार के रूप में पोषण व आश्रय देती है। यह पृथ्वी गाय दुग्ध की सहस्त्रधारा के समान हम सबको तमाम ऐश्वर्य देने वाली बने।” यहां पृथ्वी के पोषक व सुंदर बने रहने की कामना है।    अथर्वा का भावबोध गहरा है। इस भावबोध में यथार्थबोध की नींव हैं। कहते हैं कि “इस भूमि पर दो पैरों वाले हंस, गरूण आदि पक्षी रहते हैं। वायुदेव धूल उड़ाते हैं, पेड़ उखाड़ते हैं। वायु की तीव्र गति से अग्नि भी तीव्र गतिशील होते हैं। इस पृथ्वी पर शुक्ल-अरूण व कृष्ण पक्ष मिलकर चलते हैं और दिन रात भी परस्पर मिले रहते हैं। यह पृथ्वी हमारी कल्याणकारी वृत्ति से हमें सुंदर प्रिय स्थान दें। (वही 51 व 52) पृथ्वी पहले अविकसित थी। बाद में विस्तीर्ण हुई। यह वैज्ञानिक सत्य है। अथर्वा कहते हैं “हे पृथ्वी पहले आपका विकास नहीं हुआ था। देवों ने आपसे विस्तृत होने की प्रार्थना की। उस समय आपने सबको आश्रय दिया और आपने दिशाओं की कल्पना की -तदानीम कल्पयथा। (वही 55) यहां दिशाएं कल्पित धारणा हैं। सही बात है। दिशाएं सापेक्ष हैं। भारत में हैं तो ब्रिटेन पश्चिम में है। ब्रिटेन के पश्चिम बैठे हैं तो ब्रिटेन पूरब में होगा।    भूमि आनंद और सृजन का क्षेत्र है। वह ऋषि की दृष्टि भूमि की हरेक गतिविधि पर है। कहते हैं, “इस भूमि पर ग्राम हैं, नगर हैं। सभाएं होती हैं। संग्राम हैं, समिति है। हम सर्वत्र आपकी स्तुति करते हैं। (वही 56) वैदिक समाज को पिछड़ा बताने वाले गल्ती पर हैं। वैदिक काल का समाज ग्रामीण ही नहीं है। इस समाज में नगर भी है। समाज सभ्य है। सभाएं भी होती हैं। विमर्श भी होे हैं। संग्राम का अर्थ युद्ध नहीं ग्रामों का मिलन है। संग्राम संभवतः सभा विमर्श के बड़े आयोजन थे। इसीलिए आगे कहते हैं, “हम जो भी बोले, जब भी बोले, वह मधुमय हों। हम मधुरता देखे, प्रिय और हितकर देखें। हम तेजस्वी होकर गतिशील बनें।” (वही 58) ऋषि की अभिलाषा सामाजिक प्रीतिभाव की है। स्वस्थ व प्रसन्न पूर्ण समृद्ध समाज की है। ऋग्वेद की परंपरा यही है। ऋग्वेद में सोम से स्तुति है “जहां सदानीरा नदियां हैं, प्रचुर अन्न हैं सुन्दर राजव्यवस्था है, जहां मुद मोद प्रमोद है। हे सोम हमें वहां स्थान दें।” अथर्ववेद की भी अभिलाषा यही है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में ऋग्वेद की इसी अभिलाषा का विस्तार है। कहते हैं, “शांतिप्रद पृथ्वी सुखदायी अन्न दूध व सुंदर सामग्री देती है। वह हमें सभी ऐश्वर्य देने वाली हो।” (वही 59) पृथ्वी स्वस्थ तो हम सब स्वस्थ।    अथर्ववेद भारत के परमवैभव की अभिलाषा का काव्य अभिलेख है। भूमि सर्वसुख दाता हैं। अथर्ववेद में पृथ्वी सर्वगुण संपन्न है। सभी ऐश्वर्यों से समृद्ध है। वह समस्त विश्व का आश्रय व आधार है। अथर्वा के लिए पृथ्वी दिव्य है, देवी है और कवि है। (वही 63) कहते हैं कि यह पृथ्वी हमें कल्याणकारी प्रतिष्ठा से युक्त करे।” (वही) समृद्धि यश प्रतिष्ठा निश्चित ही आनंददाता है लेकिन उत्तम स्वास्थ्य के अभाव में सभी उपलब्धियां व्यर्थ हैं। अथर्वा का ध्यान राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर भी है। भूमि सूक्त (12.62) में कहते हैं “हे भूमि! आपमें उत्पन्न सभी प्राणी निरोग हों। क्षय, जीर्णता से मुक्त हों। हम सब दीर्घायु प्राप्त करें। राष्ट्र समाज के लिए त्याग करें।” भूमि सूक्त लोकमंगल का शपथपत्र है। भूमि का आदर संरक्षण हम सबका कर्तव्य है। भूमि माता है। हम सब पुत्र हैं। स्वस्थ प्रसन्न माता के पुत्र स्वस्थ प्रसन्न व सौभाग्यशाली होते हैं।   (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 27 January 2020


bhopal,Dream of complete independence of India

डॉ. वंदना सेन   'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा'-यह केवल नारा भर नहीं था। इस नारे ने भारत में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा किया, जो भारत की स्वतंत्रता का बड़ा आधार भी बना। सुभाषचंद्र बोस की वीरता की गाथा भारत ही नहीं, विदेशों में भी सुनाई देती है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की कथनी और करनी में गजब की समानता थी। वे जो कहते थे, उसे करके भी दिखाते थे। इसी कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस के कथन से अंग्रेज सरकार घबराती थी। सुभाषचंद्र बोस की लोकप्रियता इतनी थी कि लोग उन्हें प्यार से 'नेताजी' कहते थे। उनके व्यक्तित्व एवं वाणी में एक ओज एवं आकर्षण था। उनके हृदय में राष्ट्र के लिये मर मिटने की चाह थी। उन्होंने आम भारतीय के हृदय में इसी चाह की अलख जगा दी।   सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा प्रांत के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकी दास बोस एक प्रसिद्ध वकील थे। प्रारम्भिक शिक्षा कटक में प्राप्त करने के बाद यह कलकत्ता उच्च शिक्षा के लिये गये। आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण करके उन्होंने अपनी योग्यता का परिचय दिया। देश के लिये अटूट प्रेम के कारण यह अंग्रेजों की नौकरी नहीं कर सके। बंगाल के देशभक्त चितरंजन दास की प्ररेणा से यह राजनीति में आये। गाँधीजी के साथ असहयोग आन्दोलन में भाग लेकर यह जेल भी गये। 1939 में यह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। लेकिन कांग्रेस और गाँधीजी के अहिंसावादी विचार उनके क्रान्तिकारी विचारों से मेल नहीं खाते थे इसलिए इन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। तत्पश्चात नेताजी ने फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। उन्होंने पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य रखा। उनका नारा था 'जय हिन्द'। पूर्ण स्वराज का आशय भारतीय संस्कारों से आप्लावित राज्य। आज भी हमें पूर्ण स्वराज की तलाश है।   सन् 1942 में नेता सुभाषचन्द्र बोस जर्मनी से जापान गये। वहाँ उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' का गठन किया। उनकी फौज ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। कम पैसों और सीमित संख्या में सैनिक होने पर भी नेताजी ने जो किया, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने अंडमान निकोबार को भारत से पहले ही स्वतंत्र करा दिया। नेताजी भारत को महान विश्व शक्ति बनाना चाहते थे। उनकी नजर में भारत भूमि वीर सपूतों की भूमि थी, इसी भाव को वह हर हृदय में फिर से स्थापित करना चाहते थे।   बंगाल के बाघ कहे जाने वाले नेताजी सुभाषचन्द्र बोस 'अग्रणी' स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। उनके नारों 'दिल्ली चलो' और 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' से युवा वर्ग में नये उत्साह का प्रवाह हुआ। पूरे देश में नेताजी के इस नारे को सुनकर राष्ट्रभक्ति की अलख जगी। कहा जाता है कि मृत्यु भी वीर पुरुषों का यश और उनका नाम मिटा नहीं पाती। सुभाषचन्द्र बोस ने भारत की आजादी का जो रास्ता चुना, वह औरों से अलग था। उनके मन में छात्र काल से ही क्रांति का सूत्रपात हो गया था। कॉलेज के दिनों में अंग्रेजी के एक अध्यापक ने हिंदी के छात्रों के खिलाफ नफरत से भरे शब्दों का प्रयोग किया तो उन्होंने उसे थप्पड़ मार दिया। वहीं से उनमें क्रांतिकारी विचारों की रूपरेखा तय हो गयी थी। उनके तीव्र क्रांतिकारी विचारों और कार्यों से त्रस्त होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल कर दी, जिसकी वजह से देश में अशांति फ़ैल गयी थी। इसके फलस्वरूप उनको उनके घर पर ही नजरबंद रखा गया था। इसी दौरान उन्होंने 26 जनवरी, 1942 को पुलिस और जासूसों को चकमा दे दिया।   नेताजी ने देखा कि शक्तिशाली संगठन के बिना स्वाधीनता मिलना मुश्किल है। वे जर्मनी से टोकियो गए और वहां उन्होंने आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी का नेतृत्व किया था। अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर भारत को स्वाधीन करने के लिए बनाई गई थी। आजाद हिन्द ने यह फैसला किया कि वे लड़ते हुए दिल्ली पहुंचकर अपने देश की आजादी की घोषणा करेंगे या वीरगति को प्राप्त होंगे। जब नेताजी विमान से बैंकाक से टोकियो जा रहे थे तो मार्ग में विमान में आग लग जाने की वजह से उनका निधन हो गया लेकिन नेताजी के शव या कोई चिन्ह न मिलने की वजह से बहुत से लोगों को इस दुर्घटना में नेताजी की मौत को लेकर संदेह रहा। नेताजी भारत के ऐसे सपूत थे जिन्होंने भारतवासियों को झुकना नहीं बल्कि शेर की तरह दहाड़ना सिखाया। नेताजी ने जो आह्वान किया वह सिर्फ आजादी हासिल करने तक सीमित नहीं था बल्कि भारत के जन-जन का पुरुषार्थ जगाना था। आजादी मिलने के बाद वीर पुरुष ही आजादी की रक्षा कर सकता है। आजादी पाने से ज्यादा आजादी की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। नेताजी जैसे वीर पुरुष को भारतीय इतिहास में हमेशा बेहद श्रद्धा से याद किया जाता रहेगा।   (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2020


bhopal, The need to improve the judicial process

-लालजी जायसवाल   न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही है। लोगों को जल्द न्याय मिल सके, इसके लिए यह बेहद जरूरी है। लोकतंत्र का दम भरने वाली सरकारें अक्सर सशक्त और स्वतंत्र न्यायतंत्र को पसंद नहीं करतीं। सिद्धांतहीन व्यवस्था ऐसी न्याय प्रणाली चाहती है जो चुनावी वादों को पूरा करने में रोड़ा न बने।न्यायतंत्र को धमकाने का भी प्रयास भी किया जाता है। भारत में न्यायालय पर अंकुश लगाने के भले ही उग्र साधन न अपनाए गए हों,लेकिन कार्यपालिका उस पर नियंत्रण का पूरा प्रयास करती है। इसे न्यायपालिका को आवंटित बजट से समझा जा सकता है। वर्ष 2017-18 के आम बजट में न्यायपालिका को 1,744 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे। यह कुल बजट का मात्र 0.4 प्रतिशत था।    दिल्ली एकलौता ऐसा राज्य है, जहां न्यायपालिका पर सबसे अधिक पैसा खर्च किया जाता है। दिल्ली अपने कुल बजट का 1.9 फीसद न्यायपालिका पर खर्च करता है। बाकी राज्य एक फीसद भी खर्च नहीं करते। देश में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) का 0.08 फीसदी हिस्सा ही न्यायपालिका पर खर्च किया जाता है। अगर न्याय देने की प्रक्रिया में देश के आबादी की भूमिका देखें तो यह एक तिहाई से भी कम है। अदालतों में महज 26.5 फीसद महिला न्यायाधीश हैं। पुलिस बल में महज महिलाओं का फीसद मात्र सात है। 'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2019'  में न्यायिक और पुलिस व्यवस्था में महिलाओं की समुचित भागीदारी न होने पर चिंता जताई जा चुकी है।न्यायपालिका को कम सहायता मिलने का असर विदेशी निवेश पर भी पड़ा है। 'वर्ल्ड बैंक की इज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स 2019' की रैंकिंग में 14 पायदान ऊपर चढ़ने के बावजूद भी भारत में महज एक कॉन्ट्रैक्ट लागू करने में औसतन चार साल का समय लगता है। वर्ष 2016-17 में यह अनुमान लगाया गया था कि अदालती कामकाज में देरी की वजह से देश को सालाना अपनी जीडीपी का लगभग 0.5 फीसदी यानी कि 7.5 बिलियन डॉलर का बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एक कमजोर न्याय प्रणाली आगे चलकर आर्थिक वृद्धि को भी नुकसान पहुंचाती है।    'आस्ट्रेलियन थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स ऐंड पीस' की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक इंसाफ देने और कानून को कायम रखने में नाकामी से भारत में अपराध और हिंसा में बढ़ोतरी होती है। इसकी वजह से भारत को अपनी जीडीपी का लगभग नौ फीसदी के बराबर का नुकसान उठाता पड़ता है। वर्ष 2018 में देश में कुल जजों की संख्या स्वीकृत संख्या से बहुत कम थी। सभी स्तरों पर खाली स्वीकृत पदों में 23.25 फीसदी थे। वर्ष 2016-17 में उच्च न्यायालयों में जजों के 42 फीसदी और निचली अदालतों में 23 फीसदी पद खाली थे। अगर पूरे भारत के न्यायालयों में लंबित मामलों पर ध्यान दिया जाए तो यह आंकड़ा 3.4 करोड़ को भी पार करता हुआ नजर आता है। दुनिया के विकसित देशों में स्थिति ठीक इसके उलट है। आस्ट्रेलिया में प्रति दस लाख आबादी पर 42, कनाडा में 75, ब्रिटेन में 51और अमेरिका में 107 जज हैं। भारत में दस लाख आबादी पर 11 जज हैं। अगस्त 2019 में उच्च न्यायालयों में 409 पद खाली थे। हाल यह है कि देश की अदालतों में लगभग तीन करोड़ मामले लंबित हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर हमारे न्यायाधीश हर घंटे 100 मामले में भी  निपटाएं तो इस ढेर को खत्म करने में लगभग 35 साल लगेंगे।    एक और विडंबना है कि मुंबई उच्च न्यायालय में एक सिविल रिवीजन याचिका का निपटारा लगभग 77 दिन में हो जाता है,जबकि सिविल अपील के निपटारे में  लगभग 2303 दिन लगता है। सवाल जायज है कि आखिर ऐसा क्यों है?  इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। न्याय प्रणाली में वकीलों की भूमिका और अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। वे प्रायः न्यायाधीश और याचिकाकर्ता के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं। दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार की बेल ने उन्हें भी जकड़ लिया है। क्षतिपूर्ति वाले मामले में अक्सर वकील अपना हिस्सा मागते हैं। 'एडवोकेट अधिनियम 1961' से पहले वकीलों पर अंकुश था। अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का अधिकार न्यायालयों के पास था। त्वरित न्याय के पक्षधर चाहते हैं कि अब न्यायालयों को यह अधिकार वापस दिया जाए। साथ ही कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया सिर्फ डाटा एकत्रीकरण पर केंद्रित न होकर न्यायाधीशों को अन्य तरह से सहयोग करने के लिए भी हो। चीन में 'रिसर्च इंस्टीट्यूट' ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है जिसमें 300 न्यायाधीशों को डेढ़ लाख मामले सुलझाने में मदद करके उनके काम को एक तिहाई कर दिया है। संविधान के अनुच्छेद 130 के अनुसार, उच्चतम न्यायालय को देश के अन्य भागों में भी विशेष न्यायालय आयोजित करने की सलाह दी गई थी,परंतु काम की अधिकता के कारण अभी यह हो पाना संभव नहीं हो सका है। इसी कारण छोटे मामले तक उच्चतम न्यायालयों के चौखट तक पहुंच चुके हैं।    (लेखक स्वंत्रत टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2020


bhopal, When will girls be safe in the country?

(24 जनवरी राष्ट्रीय बालिका दिवस विशेष)  रमेश सर्राफ    राष्ट्रीय बालिका दिवस से पहले खेल के मैदान से आई अच्छी खबर ने सबका दिल खुश कर दिया। आस्ट्रिया के इन्सब्रूक में चल रहे मीटन कप इंटरनेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में भारत की निशानेबाज अपूर्वी चंदेला ने स्वर्ण पदक पर निशाना साध कर दुनिया में देश का मान बढ़ाया है। मगर सात वर्ष पूर्व हैवानों के हत्थे चढ़ी निर्भया की आत्मा अब तक  न्याय के लिए तड़प रही है। उसके गुनहगारों को अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया जा सका है। हद यह है कि कुछ तथाकथित मानवतावादी निर्भया के परिजनों से गुनहगारों को माफ करने की अपील करने लगे हैं। बेशक भारत में बालिकायें हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हीं पर वह अनेक कुरीतियों की शिकार हैं। विडंबना यह है कि हजारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। समाज के बड़े हिस्सों में बेटा-बेटी में भेद किया जाता है। हद यह है कि बेटी के पैदा होते ही उसकी परवरिश से ज्यादा उसकी शादी की चिंता सताने लगती है। महंगी होती शादियों के कारण हर पिता हर समय फिक्रमन्द नजर आता है।    संभवतः इन्हीं कुरीतियों की वजह से बड़ा तबका बेटी बचाओ अभियान से नहीं जुड़ पाया। जन जागरुकता के लंबे अभियानों के बावजूद  कन्या भ्रूण हत्या पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई। बड़ी विडंबना है कि नवरात्रि पर लोग बच्चियों को पूजते हैं और जब घर में लड़की का जन्म होता है तो लोग दुखी हो जाते हैं। कई प्रदेशों में तो बालिकाओं के जन्म को अभिशाप तक माना जाता है। सवाल यह है कि लोग क्यों भूल जाते हैं कि वह उस देश के नागरिक हैं जहां रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं ने देश की आन-बान में अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे।देश में लिंगानुपात लगातार घट रहा है। 2014-2016 में लिंगानुपात 898 था। 2015-17 में यह गिरकर 896 पर आ गया। 2011 की जनगणना में लिंगानुपात 940 था। सर्वे के मुताबिक 2012 से 2017 के दौरान देश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में जन्मदर में क्रमश: 1.3 फीसदी और 0.6 फीसदी की गिरावट आई। इस अंतर को गंभीरता से देखने और समझने की जरुरत है। इसलिए आज  'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' को सिर्फ योजना नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी समझने की जरूरत है। वैसे भी अच्छे और सभ्य समाज के निर्माण के लिए बेटियों को भी भयमुक्त वातावरण प्रदान करना परिवार, समाज और सरकार की जिम्मेदारी है। लड़कियों इतना पढ़ाने और सशक्त बनाने की जरूरत है कि हम गर्व से कह सकें की देखो वह हमारी बेटी है।    भारत में हर साल तीन से सात लाख कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं सामने आती हैं। यहां महिलाओं से पुरुषों की संख्या 5 करोड़ ज्यादा है। समाज में निरंतर परिवर्तन और कार्य बल में महिलाओं की बढ़ती भूमिका के बावजूद रुढ़िवादी लोग मानते हैं कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होगा और बेटी हुई तो वह अपने घर चली जाएगी। बावजूद इसके बड़ा सच यह है कि लड़किया लड़कों से कमतर नहीं हैं। वह हर वो काम कर रही हैं जो लड़के करते हैं। झुंझुनू जिले की मोहना सिंह जैसी लड़कियां भी हैं जो लड़ाकू विमान  उड़ाकर जिले का पूरे देश में मान बढ़ा रही हैं। वक्त आ गया है कि लोग राष्ट्रीय बालिका दिवस पर लड़का-लड़की में भेद न करने लिंग समानता के प्रयास करने की शपथ लें।  लड़कियों का कोख में कत्ल,  बलात्कार और विरोध करने पर हत्या जैसी वारदात रूह कंपा देती हैं। सच यह है कि लड़कियां न तो घरों पर सुरक्षित हैं और न ही स्कूल और कार्यस्थलों पर। हर जगह भेड़िये घात लगाकर बैठे रहते हैं। ऐसे माहौल में बालिकायें कैसे आगे बढ़ पाएंगी। इससे अच्छा है कि  हर साल बालिका दिवस मनाने की बजाय ऐसे वातावरण निर्मित करने की कोशिश की जाए जिससे बालिकायें खुद को महफूज समझ सकें। बालिका दिवस मनाने की सार्थकता तभी है जब उनके गुनहगारों को सजा देने में देरी न हो। कई राज्य सरकारों ने नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसी देने का कानून बनाया है। ऐसा कानून सभी जगह लागू होना चाहिए। निर्भया प्रकरण का हश्र सबके सामने है। हाल ही में केंद्र ने अच्छी पहल की है। उसने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है कि  यह तय किया जाए कि डेथ वारंट जारी करने के बाद सात दिनों के भीतर ही दया याचिका दायर की जा सकती है। निर्भया प्रकरण में पटियाला हाउस कोर्ट ने दोषियों को 22 जनवरी को फांसी देने के लिए डेथ वारंट जारी किया था। दया याचिका दाखिल करने के बाद कोर्ट ने एक फरवरी के लिए नया डेथ वारंट जारी किया।    (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 23 January 2020


bhopal,Opposition\

डॉ. नीलम महेंद्र   सीएए को कानून बने एक माह से ऊपर हो चुका है लेकिन विपक्ष द्वारा इसका विरोध अनवरत जारी है। बल्कि गुजरते समय के साथ विपक्ष का यह विरोध तमाम हदों को लांघ हताशा व निराशा से होकर विद्रोह का रूप अख्तियार कर चुका है। शाहीन बाग का धरना इसी बात का उदाहरण है। अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए ये दल किस हद तक जा सकते हैं, यह धरना इस बात का भी प्रमाण है। दरअसल नोएडा और दिल्ली को जोड़ने वाली सड़क पर लगभग एक महीने से चल रहे धरने के कारण लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी सड़क पर इस प्रकार धरने पर बैठे हैं कि लोगों के लिए वहाँ से पैदल निकलना भी दूभर है। लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे, स्थानीय लोगों का व्यापार ठप हो गया है। रास्ता बंद हो जाने के कारण आधे घंटे की दूरी तीन चार घंटे में तय हो रही है, जिससे नौकरीपेशा लोगों का अपने कार्यस्थल तक पहुंचने में असाधारण समय बर्बाद हो रहा है। जाहिर है इससे गाड़ियों में ईंधन की खपत भी बढ़ गई है जो निश्चित ही पहले से प्रदूषित दिल्ली की हवा में और जहर घोलेगी।   जो राजनैतिक दल इस धरने को खुलकर समर्थन दे रहे हैं और इनका जोश बनाए रखने के लिए बारी-बारी से यहां उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि यह ज़हर कहीं देश की फिजाओं में भी न घुल जाए। क्योंकि हाल में बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख ने एक वीडियो साझा किया, जिसमें एक युवक कह रहा है कि यहाँ महिलाओं को धरने पर बैठने के पांच सौ से सात सौ रुपये तक दिए जा रहे हैं। ये महिलाएं शिफ्ट में काम कर रही हैं और एक निश्चित संख्या में अपनी मौजूदगी सुनिश्चित रखती हैं। इतना ही नहीं, उस युवक का यह भी कहना है कि वहाँ की दुकानों के किराए भी मकान मालिकों द्वारा माफ कर दिए गए हैं। वीडियो की सत्यता की जांच गंभीरता से की जानी चाहिए क्योंकि अगर इस युवक द्वारा कही गई बातों में जरा भी सच्चाई है तो निश्चित ही विपक्ष की भूमिका संदेह के घेरे में है। सवाल तो बहुत उठ रहे हैं कि इतने दिनों तक जो लोग धरने पर बैठे हैं, इनका खर्च कैसे चल रहा है। जो खाना-पीना धरनास्थल पर उपलब्ध कराया जा रहा है, वो कहाँ से आ रहा है।   दरअसल विपक्ष आज बेबस है क्योंकि उसके हाथों से चीज़ें फिसलती जा रही हैं। जिस तेजी और सरलता से मौजूदा सरकार देश के सालों पुराने उलझे मुद्दे, जिनपर बात करना भी विवादों को आमंत्रित करता था, उसे सुलझाती जा रही है इससे विपक्ष खुद को मुद्दाविहीन पा रहा है। ऊपर से मौजूदा सरकार की कूटनीति के चलते संसद में विपक्ष की राजनीति भी नहीं चल पा रही, जिससे वह खुद को अस्तित्वविहीन भी पा रहा है। शायद इसलिए अब वो अपनी राजनीति सड़कों पर ले आया। खेद का विषय है कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए अभीतक विपक्ष आम आदमी और छात्रों का सहारा लेता था लेकिन अब वो महिलाओं को मोहरा बना रहा है। देश की मुस्लिम महिलाएँ और बच्चे अब विपक्ष के नये हथियार हैं क्योंकि शाहीन बाग का मोर्चा महिलाओं के हाथ में है।   अगर शाहीन बाग का धरना वाकई में प्रायोजित है तो इसका समर्थन करने वाला हर शख्स और हर दल सवालों के घेरे में है। संविधान बचाने के नाम पर उस कानून का हिंसक विरोध जिसे संविधान संशोधन द्वारा खुद संसद ने ही बहुमत से पारित किया हो क्या संविधान सम्मत है? जो लड़ाई आप संसद में हार गए उसे महिलाओं और बच्चों को मोहरा बनाकर सड़क पर लाकर जीतने की कोशिश करना किस संविधान में लिखा है? लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार के काम में बाधा उत्पन्न करना लोकतंत्र की किस परिभाषा में है? संसद द्वारा बनाए कानून का अनुपालन हर राज्य का कर्तव्य है। संविधान में उल्लिखित होने के बावजूद विभिन्न राज्यों में विपक्ष की सरकारों का इसे लागू नहीं करना या फिर केरल सरकार का इसके खिलाफ न्यायालय में चले जाना क्या संविधान का सम्मान है? जो लोग महीने भर तक रास्ता रोकना अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं उनका उनलोगों के संवैधानिक अधिकारों के विषय में क्या कहना है जो उनके इस धरने से परेशान हैं? अपने अधिकारों की रक्षा करने में दूसरों के अधिकारों का हनन करना किस संविधान में लिखा है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उन मुस्लिम महिलाओं से जो धरने पर बैठी हैं। आज जिस कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर जैसे नेताओं का भाषण उनमें जोश भर रहा है उसी कांग्रेस की सरकार ने शाहबानो के हक में आए न्यायालय के फैसले को संसद में उलटकर शाहबानो ही नहीं हर मुस्लिम महिला के जीवन में अंधेरा कर दिया था। यह दुर्भाग्यजनक ही है कि वर्तमान सरकार की नीतियों के कारण तीन तलाक से छुटकारा पाने वाले समुदाय की महिलाएँ उस विपक्ष के साथ खड़ी हैं जो एक राजनैतिक दल के नाते आजतक उन्हें केवल वोटबैंक समझकर उनका उपयोग करता रहा और आज भी कर रहा है।   चूंकि 2016 के बाद अपने परिसर में विभिन्न देशविरोधी गतिविधियों के सार्वजनिक होने के चलते जेएनयू अब बेनकाब हो चुका है और वहाँ का छात्र आंदोलन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रभाव छोड़ने के बजाए खुद ही विवादों में आ जाता है। इसलिए विपक्ष ने अब महिलाओं को अपना मोहरा बनाया है। क्योंकि मोदी सरकार की नीतियों ने वोटबैंक की राजनीति पर जबरदस्त प्रहार किया है और जो थोड़ा बहुत मुस्लिम-दलित का वोटबैंक बचा भी है तो उनमें प्रतियोगिता बहुत हो गयी है क्योंकि भाजपा को छोड़ लगभग समूचा विपक्ष उसे साधने में लगा है। इसलिए उसने विश्व इतिहास पर नज़र डाली और महिला आंदोलन की कुंजी खोजी जिसका इस्तेमाल वो सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में भी कर चुका था। यह अब मुस्लिम महिलाओं के सोचने का विषय है कि वे किसी दल के राजनैतिक हथियार के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं या देश के उस जागरूक नागरिक के रूप में, जो देश निर्माण में योगदान देता है।   (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 January 2020


bhopal,Reasonable concern of population explosion

डॉ. रमेश ठाकुर   संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जिस सामाजिक समस्या पर अपनी चिंता व्यक्त की, उसे सियासी चश्मे से देखने की बजाय उसपर मंथन की आवश्यकता है। गज भर जमीने के लिए एक-दूसरे के कत्ल होंगे, रोटी पर झपटमारी होगी, लोग अपने हकों के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे होंगे? ऐसी स्थिति सामने खड़ी है। सड़कें खचाखच भरी हैं, पार्किंग फुल हैं, घरों के आंगन सिमट गए हैं, आवासीय जगहों के कम होने से फ्लैट सिस्टम वर्षों से शुरू है, बावजूद इसके जनसंख्या की विकराल होती समस्या पर ज्यादा चिंतन नहीं हो रहा। उपरोक्त सभी समस्याओं को कायदे से देखें तो हर समस्या की जड़ बढ़ती जनसंख्या ही है। इसलिए इस विस्फोट को रोकना निहायत जरूरी है। इसमें भला किसी एक वर्ग या एक समुदाय का नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से सभी का है। इस मुद्दे को जबरन सियासी मसला बनाया जा रहा है।   जनसंख्या विस्फोट ने हर किसी को बुरी तरह से प्रभावित किया है। पढ़ा-लिखा हिंदू-मुसलमान, सिख-ईसाई सभी समर्थन में हैं कि इसपर मुकम्मल प्रयास होने चाहिए। इसी दिशा में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपनी चिंता जताई। लेकिन उनके बयान पर बेवजह की बहस छिड़ी हुई है। समूचा हिंदुस्तान जनसंख्या विस्फोट का भुगतभोगी होता जा रहा है। रेल, सड़क, बाजार, सार्वजनिक स्थान लोगों से खचाखच भरे हैं। नौकरियां, मौके, संसाधन सिमटते जा रहे हैं। नौबत ऐसी आ गई है कि चपरासी की वैकेंसी के लिए पीएचडी जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी एप्लाई कर रहे हैं। ऐसी स्थिति को देखते हुए जनसंख्या नियंत्रण निहायत जरूरी है। चिंता की बात है कि आज ऐसी स्थिति है तो आने वाले वक्त में क्या होगा? दो बच्चे पैदा करने की नीति का हमें अनुपालन करना ही होगा, अगर सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाती है तो उसका सामूहिक रूप से सभी भारतीयों को समर्थन करना चाहिए।   इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है। बेरोजगारी के कारण युवा शक्ति लगातार तनाव की तरफ बढ़ रही है। कुछ गलत रास्तों पर भी चलते हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं। हर तरह के अपराधों में युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है जिसमें ब्लैकमेलिंग, लूट-चोरी, रंगबाजी आदि कृत्य शामिल हैं। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें जब भी किसी बड़े मसले पर लगाम लगाने की सुगबुगाहट होती है तो उससे लागू होने से पहले ही विरोध शुरू हो जाता है। कोई कानून या नीति बनने से पहले ही दुष्प्रचार शुरू हो जाता है। जनसंस्खा नियंत्रण काननू को लेकर भी हवा बननी शुरू हो गई है। दरअसल, बढ़ती जनसंख्या के नियंत्रण की मांग पर किसी एक वर्ग विशेष की नहीं, बल्कि हर वर्ग की सहमति है। लेकिन इसकी सुगबुगाहट से पहले ही उसे सियासी भट्टी में झोंका जा रहा है। देश का हर वर्ग सहूलियतें, सामान अधिकार, घरों की छत और रोजगार चाहता है। पर इनके स्थान पर उनके हिस्से सिर्फ परेशानियां ही आती हैं।   देश में विगत कुछ दशकों से तेजी से बढ़ी जनसंख्या ने रोजगार, शिक्षा व जरूरतों को सीमित कर दिया है। दूसरे देशों के मुकाबले हम जनसंख्या वृद्धि में अभी दसवें पायदान पर हैं। भारत के अलावा इथियोपिया-तंजानिया, संयुक्त राष्ट्र, चीन, नाइजीरिया, कांगो, पाकिस्तान, युगांडा, इंडोनेशिया व मिस्र ऐसे मुल्क हैं जहां स्थिति कमोबेश हमारे जैसी ही है। लेकिन इन कई देशों में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए कानून अमल में आ चुके हैं। कई देशों में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर सरकारी सुविधाओं से वंचित करने का फरमान है।   भारत की आबादी अगले एक दशक में 1.5 बिलियन हो जाने का अनुमान है। आजादी के समय देश की जनसंख्या मात्र 34 करोड़ थी लेकिन बीते सत्तर सालों में बढ़कर डेढ़ सौ करोड़ के आसपास पहुंच गई। जनगणना 2011 के मुताबिक भारत की आबादी 121.5 करोड़ थी जिनमें 62.31 करोड़ पुरुष और 58.47 करोड़ महिलाएं शामिल थीं। अगले वर्ष नया आकंड़ा आएगा, उससे पता चलेगा हम कहां पहुंच चुके हैं। सर्वाधिक जनसंख्या उत्तर प्रदेश में है जहां कुल आबादी 19.98 करोड़ है। सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है जहां की आबादी मात्र 6 लाख है। बढ़ती जनसंख्या पर कायदे से गौर करें तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे।   आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के जनसंख्या नियंत्रण पर दिए बयान को अगर सियासी चश्मे से न देखकर सामाजिक लिहाज से देखें तो कई बातें साफ हो जाती हैं। इस मसले पर जितने दूसरे वर्ग चिंतित हैंं, उतने ही अल्पसंख्यक भी। यह दुष्प्रचार मात्र है कि अल्पसंख्यक जनसंख्या नियंत्रण कानून के खिलाफ हैं। वे भी भविष्य के खतरों से वाकिफ हैं। अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आई थी जिसमें बताया गया था कि हिंदुस्तान में जिस तेज गति से जनसंख्या बढ़ रही है उससे 2024 तक चीन को भी पीछे छोड़ देगा। इस लिहाज से अगले पचास वर्ष बाद हिंदुस्तान समूची दुनिया में जनसंख्या में सबसे बड़ा मुल्क हो जाएगा। इसलिए इस विकराल होती समस्या पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 20 January 2020


bhopal,Internet freedom swallows ethos

डॉ. अजय खेमरिया   भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट की निर्बाध उपयोगिता को मौलिक अधिकार के समकक्ष दर्जा देते हुए जम्मू-कश्मीर में इसकी बहाली के लिये सरकार को निर्देशित किया है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान है और कोर्ट ने इंटरनेट की निर्बाध उपयोगिता को इसी आलोक में रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के साथ ही यह बहस तेज हो गयी है कि क्या इंटरनेट की आजादी पर कोई युक्तियुक्त पाबंदी मुल्क की सुरक्षा या सामाजिक सरोकारों की जमीन पर संभव है या नहीं? क्या नागरिक आजादी का नागरिक व्यवस्था के साथ किसी तरह का जवाबदेह युग्म होना चाहिये अथवा नहीं? भारत का संविधान उन्मुक्त और स्वच्छन्दता के साथ नागरिक आजादी की व्यवस्था नहीं देता है वह इस पर युक्तियुक्त निर्बन्धन का पक्षधर है। लेकिन हकीकत की जमीन पर पिछले 72 साल में अनुच्छेद 19 की व्याख्या बगैर जवाबदेही के ही की गई है। इसके राष्ट्रीय तत्व को सुनियोजित तरीके से तिरोहित किया गया है। भारत तेरे टुकड़े होंगे या अफजल हम शर्मिंदा हैं जैसे अभिव्यक्ति के नारे, असल में अनुच्छेद 19 की उसी व्याख्या और संरक्षण पर खड़े हैं जो राष्ट्र राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है। दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में इस तरह की आजादी का उदाहरण हमें देखने को नहीं मिलता।   इसका सामाजिक पहलू भी गौर करने वाला है। संविधान के हर मौलिक अधिकार उसके नागरिकों के सर्वांगीण विकास के कारक के रूप में अधिमान्य किये गए हैं लेकिन इंटरनेट की सामाजिक उपयोगिता के विश्लेषणात्मक आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। हाल ही में जारी एक वैश्विक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा पोर्न देखने वालों में भारत नम्बर एक पर है। भारत में इस समय 450 मिलियन स्मार्टफोन यूजर हैं। 2019 में भारत के 89 फीसदी यूजर ने अपने स्मार्टफोन पर पोर्न मूवी देखी। 2017 में यह आंकड़ा 86 फीसदी था। मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कम्पनी एरिक्सन के अनुसार भारत में औसत 9.8 जीबी मासिक खपत स्मार्टफोन पर है और 2024 में यह बढ़कर 18 जीबी प्रति महीने होगी। अब सवाल यह है कि जब हमारा इंटरनेट उपयोग का संजाल इस बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है तब इसकी सामाजिक उत्पादकीय क्षमताओं का मूल्यांकन होना चाहिये या नहीं? बेशक इंटरनेट ने लोकजीवन को सरलता और सुविधाओं के धरातल पर एक अकल्पनीय आयाम दिया है लेकिन इसके देय उपयोग को मूलाधिकारों के साथ जोड़ा जाना कुछ अतिशय आजादी की ओर इशारा करता है। हमारा लोकजीवन सदैव संयमित यौनाचार का हामी रहा है और एक आत्मकेंद्रित अनुशासन ने हजारों सालों से हमारे सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को मर्यादित रखा है। सवाल यह है कि क्या सर्वसुलभ इंटरनेट की आजादी हमारी मर्यादित जीवन पद्धति को निगल नहीं रही है? निर्भया केस के अपराधी हों या हैदराबाद के दरिंदे, यौन हिंसा के बीज कहीं न कहीं इंटरनेट पर निर्बाध रूप से उपलब्ध पोर्नोग्राफी साइटों में ही नजर आते है। इंदौर के बाल सम्प्रेक्षण गृह में रह रहे दो नाबालिगों ने स्वीकार किया कि 14 वर्षीय बालिका के बलात्कार से पहले उन्होंने पोर्न मूवी अपने मोबाइल पर देखी थी। जाहिर है इंटरनेट की यह आजादी हमारे लोकाचार की मर्यादा को निगल रही है।   फ़ोर्ब्स पत्रिका के ताजा 100 भारतीय आइकॉन्स की लिस्ट में सनी लियॉन भी शामिल है क्योंकि उन्हें इस नेट ट्रैफिक में हमने सर्वाधिक खोजा है। 2019 में अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, फ्रांस जैसे देशों से भी हम भारतीय पोर्न देखने के मामले में आगे रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या 2013 की 40 फीसदी की पोर्न लत के 2019 में 86 फीसदी तक पहुँचने के साथ ही हमारी चेतना का स्वरूप समेकित रूप से विकृत तो नहीं हो रहा है। क्या हम एक कामांध समाज की चेतना का निर्माण कर रहे हैं। 2017 में जियो के आने के बाद स्मार्टफोन उपयोग को लेकर जिस तरह का वातावरण बना है, वह इस बात की चेतावनी भी है कि हमारे इंटरनेट उपभोग पर तार्किक बंधन भी आवश्यक है।   केंद्र सरकार ने पिछले सालों में करीब 400 पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाया है इसके बावजूद जिओ कम्पनी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि इससे महज 200 एमबी डाटा की खपत स्मार्टफोन से घटी है। समझा जा सकता है कि हमारी सामूहिक चेतना किस तरफ उन्मुख है। इसलिये इंटरनेट की मौलिक आजादी का नियमन और नियंत्रण अत्यावश्यक है। केवल एक नागरिक की आजादी भर से यह जुड़ा हुआ सीमित महत्व का मामला नहीं है, ये समाज की सेहत का आधार भी है। जाहिर है इसे बोलने, घूमने, फिरने, रहने जैसी जीवनोपयोगी स्वतंत्रता के समानांतर नहीं रखा जा सकता है। एक सभ्य और सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के अपने अंतर्निहित हित होते हैं जो सर्वोपरि है। अगर इंटरनेट की मौलिक स्वतंत्रता राष्ट्रीय राज्य की अवसंरचना या सुरक्षा में खलल पैदा करती है तो किसी भी संप्रभु राज को इसपर विचार करना होगा।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 19 January 2020


bhopal, Earthly Realism in the Vedas

हृदयनारायण दीक्षित   कविता और विज्ञान एक साथ नहीं मिलते। काव्य में भाव अभिव्यक्ति की प्रमुखता होती है और विज्ञान में प्रत्यक्ष सिद्धि की। विज्ञान में पृथ्वी सौर मण्डल का ग्रह है। पृथ्वी पर तमाम वस्तुएं, खनिज, वनस्पतियां और जल पृथ्वी का भाग है। तमाम जीव भी इस पृथ्वी पर हैं। इन सबका अध्ययन विज्ञान है। इनसे नेह, स्नेह, प्रीति और राग-विराग भाव जगत् के भाग हैं। सौन्दर्य बोध और भाव प्रवणता में काव्य का जन्म होता है। विज्ञान और भाव प्रवणता अलग-अलग हैं लेकिन अथर्ववेद का भूमि सूक्त विज्ञान और भाव प्रवणता की एकात्म कविता है। भूमि सूक्त में भूसांस्कृतिक प्रीति और प्रत्यक्ष भौतिकवाद का प्रणय है। ऋषि कवि अथर्वा रचित यह सूक्त काव्य सौन्दर्य की अनूठी अभिव्यक्ति है। अमेरिकी विद्वान ब्लूम फील्ड ने इसकी प्रशंसा की है। लिखा है कि “इस सूक्त में अथर्वन् की विशिष्टता है। यह विशेष आकर्षक है। इसमें देवकथात्मक विचार धारणा कम है। मनुष्य, पशु, वनस्पति से पृथ्वी का सम्बंध ही प्रमुख है।” ब्लूम फील्ड भूमि सूक्त के प्रति आदर भाव से भरे जान पड़ते है लेकिन इन्हीं ब्लूम फील्ड ने अथर्ववेद को जादू-टोने से भरा बताया है। ऐसा सही नहीं है। अथर्ववेद के अधिकांश सूक्तों में सांसारिक यथार्थवाद है। विज्ञान और अनुभूति का संगम अनूठा होता है लेकिन आसान नहीं होता। वैदिक ऋषियों का प्रत्यक्ष संसार से रागात्मक सम्बंध है। प्रकृति के गोचर प्रपंचों में उनकी रूचि है। वे इन प्रपंचों के प्रति जिज्ञासा से भरे पूरे हैं। पृथ्वी जीवन का रंगमंच है। जीवन का प्रवाह और अंत पृथ्वी पर ही होता है। सो पृथ्वी से प्रीति स्वाभाविक है। अथर्वा का भूमि सूक्त ऋग्वेद की परंपरा है। ऋग्वेद में भी भूमि की स्तुति है। ऐसी स्तुति में पृथ्वी का दैवीकरण नहीं है, मानवीकरण भी कम ही है। ऋग्वेद (5.84) में “पृथ्वी पर ऊंचे पहाड़ हैं। वह पर्वतों का भार वहन करती है। यह वन-वनस्पतियों वनों का आधार है।” एक सूक्त (10.18.10) में “पृथ्वी माता है। यह जीवन भर भार ढोती है। मृत्यु के बाद भी यह अपनी गोद में रखती है।”   पृथ्वी को माता कहना सही है। माता गर्भ में रखती है। बाद में पोषण देती है। तरुण होने पर शुभाशीष देती है। पृथ्वी भी ऐसी ही है। हम सब इसी में उगते हैं। सभी सांसारिक व आध्यात्मिक कार्यों का स्थल यह पृथ्वी ही है। मोक्ष या मुक्ति के प्रयत्नों का आधार भी यही पृथ्वी है। मुद मोद प्रमोद और आनंद का क्षेत्र भी पृथ्वी है। हम सबकी काया पृथ्वी से बनती है। पांच महाभूतों में पृथ्वी ही हमारा आधार है। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में अथर्वा स्वभाविक ही पृथ्वी माता के गुण गाते हैं। भूमि माता है। सभी जीवों का आधार है। यह सबको संरक्षण देती है। इसलिए इसका संरक्षण सबका दायित्व है। भूमि सूक्त (12.1) में कहते है, “अविचल निष्ठा, यथार्थ बोध, कर्म कुशलता, तेजतप और ज्ञान आदि पृथ्वी के पोषक है। अबतक जो जीव प्राणी हो चुके हैं और जो भविष्य में होंगे- सा नो भूतस्य भव्यस्य यह सबका संरक्षण करने वाली माता भूमि हमें स्थान दे।” भूत और भविष्य की काल धारणा ऋग्वेद के पुरूष सूक्त का स्मरण कराती है - पुरूष एवमेदं सर्वं यद् भूतं भव्यं च। पृथ्वी की अनुकम्पा और धारक शक्ति में काल अखण्ड इकाई है। भूत और भविष्य एक ही निरंतरता में है। पृथ्वी पर अनेक प्राणी है, भिन्न-भिन्न वनपतियां व जीव-जंतु हैं। मनुष्य भी गुण, इच्छा व कर्म के कारण भिन्न-भिन्न हैं। ऋषि कवि की अभिलाषा है कि भिन्नता के बावजूद सब एक होकर इसी पृथ्वी पर रहते हैं, यह पृथ्वी तमाम औषधियां धारण करती है, यह पृथ्वी हमारी कामना पूरी करे और यशवृद्धि करे। (वही 2) ऋषि पृथ्वी को ध्यान से देखता है। पृथ्वी पर अनेक रूप हैं। जल जीवन है। जलों के भी तमाम रूप हैं। फल, अन्न, शाक हैं। वह इन्हें भी ध्यान से देखते हैं। कहते हैं, “इस भूमि पर समुद्र, महा समुद्र हैं, नदियां हैं, झीले हैं, कूप हैं, अन्न-फल आदि हैं। इससे सभी प्राणी सुखी हैं। कृषक कृषि करते हैं, शिल्पी संगठित शिल्पकर्म करते हैं। यह हमारी पृथ्वी हमें श्रेष्ठ भोजन व ऐश्वर्य दे।” (वही 3) अथर्ववेद के रचनाकाल में कृषि कर्म का विकास हो चुका है, शिल्पी भी है। यह काल ऋग्वेद का परवर्ती हैं। तब मनुष्य अपने कर्म फल के लिए किसी अज्ञात शक्ति पर निर्भर नहीं है। उसे अपने कर्म फल व भूमि की पोषण शक्ति पर विश्वास है।   भूमि पर तप कर्म करने का सुदीर्घ इतिहास है। अथर्वा इस इतिहास से परिचित हैं। लेकिन उन्हें लोकहित में किए गए कर्म व युद्धों के प्रति ज्यादा लगाव है। कहते हैं “इस पृथ्वी पर पूर्वजों ने अनेक पराक्रम किये हैं। सत्य के पक्ष में युद्ध भी किये हैं। यहां गाय और अश्व रहते हैं। पशु-पक्षी इसी पृथ्वी पर आश्रय पाते हैं। ऐसी पृथ्वी हमारे ज्ञान-विज्ञान व ऐश्वर्य की वृद्धि करने वाली है।” (वही 5) मंत्र में जोर पृथ्वी के खूबसूरत हो जाने पर है। अश्व और गाय ऋग्वैदिक समाज में उल्लेखनीय रहे हैं। अथर्ववेद में भी उनकी प्रतिष्ठा है। आलस्य व अज्ञान आदि की लत दुर्गुण है। इन दुर्गुणों से मुक्ति श्रेयस्कर है। कहते हैं कि इन दुर्गुणों से रहित देवगण इस भूमि की रक्षा प्रमादरहित करते हैं। यह भूमि ज्ञान व ऐश्वर्य दे। (वही 7) यहां भूमि के रक्षक देव हैं। दुर्गुणविहीन देव ही पृथ्वी की रक्षा करते हैं। दुर्गुणविहीन देव वस्तुतः मनुष्य ही हैं। भूमि अखण्ड है। भूमि का राष्ट्र-राज्यों में विभाजन मनुष्यकृत है। वैदिक पूर्वज पृथ्वी, आकाश को समग्रता में देखते हैं लेकिन अथर्वा के सामने सरस्वती सिंधु की भूमि है। यहां संन्यासी रहते हैं। उपदेश देते हैं। अथर्वा कहते हैं, “इस पृथ्वी पर सब तरफ परिव्राजक विचरण करते हैं। वे जल की तरह शीतल उपदेश देते हैं, ज्ञान देते हैं। यह भूमि अन्न, जल, दूध देती है। यह पृथ्वी हमारी तेजस्विता बढ़ाए।” (वही 9) इस सूक्त में अन्न, दूध, फल आदि की इच्छा का दोहराव है। मांस का उल्लेख कहीं नहीं। वैदिकजन अपने प्रिय खाद्य में अन्न, दूध व फल को ही महत्व देते थे। एक मंत्र (वही 16) में कहते हैं “सूर्य की किरणें हमारे लिए प्रजा व वाणी का संग्रह करे। पृथ्वी हम सबको मधुर पदार्थ व मधुवाणी दे-मधु पृथिवि होहि मह्यम्।”   ऋग्वेद के ऋषि धरती को माता व आकाश को पिता कहते हैं। इसी परंपरा में अथर्वा स्वयं को पुत्र व भूमि को माता कहते हैं, “माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः।” (वही 12) ऋग्वेद में पिता आकाश है। अथर्ववेद में पिता पर्जन्य है। पर्जन्य आकाश में व्याप्त जलवायु चक्र हैं। आधुनिक विज्ञान की भाषा में ईकोलोजिकल साईकिल है। पर्जन्य से वर्षा है। वर्षा के सेचन से माता पृथ्वी आनंदित होती है। अन्न, जल, फल आदि पर्जन्य व पृथ्वी का ही प्रसाद हैं।   प्रकृति के 5 महाभूतों में पृथ्वी सर्वाधिक स्थूल है। सूक्ष्मतम आकाश का गुण शब्द है। वायु का गुण स्पर्श है। अग्नि का गुण ताप है। जल का गुण रस है। पृथ्वी का गुण गंध है। पृथ्वी सगंधा है। पृथ्वी से उत्पन्न सभी प्राणियों में गंध है। अथर्वा कहते हैं “हे भूमि आपके भीतर गंध भरी हुई है। यह औषधियों वनस्पतियों में प्रकट होती हैं। इस गंध को अप्सराएं व गंधर्व धारण करते हैं। देव भी गंध प्रिय हैं। हे भूमि! आप हमें उसी गंध से आपूरित करें। हम किसी से द्वैष न करें। हम सब प्रेमभाव से रहें।” (वही 23) पृथ्वी की गंध सभी जीवों में है। अथर्वा गाते हैं “यस्ते गंधः पुरूषेषु स्त्रीषु पुंसु-जो गंध पुरूषों-स्त्रियों, चारों पैरों वाले प्राणियों में है, वही गंध हमको भी आपूरित करे। हमसे कोई द्वेष न करे।” (वही 25) अथर्ववेद का भूमि सूक्त गंधमादन है। गंध आपूरित है। अथर्वा इस गंध को सब तरफ पाने के अभिलाषी है। यह प्रार्थना समूची मानव जाति को द्वेषरहित गंधपूर्व बनाने की आकांक्षा है। अथर्वा ऋग्वेद के विवाह सूक्त का स्मरण करते हैं। यह सूक्त सूर्य पुत्री सूर्या के विवाह से सम्बंधित है। अथर्वा कहते हैं, “हे भूमि आपकी गंध कमल में प्रकट हुई है। इसी गंध को सूर्या के विवाह के समय वायुदेव ने धारण किया था। आप हमें उसी गंध से भरें। संसार में परस्पर द्वेषभाव न रहे।” (वही 24) ऋग्वेद के ऋषि प्रकृति को मधु आपूरित बनाने के मंत्र गा गए हैं। अथर्वा ने भी मधु अभिलाषा वाले मंत्र गाए हैं लेकिन भूमि सूक्त में वे सुगंध अभिलाषी हैं। द्वेषरहित समाज के लिए वातायन में प्रेम गंध का आपूरण अनिवार्य है भी।    (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

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Dakhal News 19 January 2020


bhopal, Dr. Ambedkar and CAA

वीरेन्द्र सिंह परिहार   मोदी सरकार द्वारा देश में नागरिकता संशोधन विधेयक जिसे संक्षेप में सीएए कहते हैं, वह 10 जनवरी 2020 से लागू कर दिया गया। इस कानून के तहत 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए सभी अल्पसंख्यकों यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन और यहाँ तक कि ईसाई भी भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि कांग्रेस समेत कई विरोधी दल एवं देश का एक बड़ा वर्ग इस कानून का उग्र विरोध कर रहा है। उनके द्वारा कहा जा रहा है कि यह डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के बनाए संविधान के विरूद्ध है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और समानता जो भारतीय संविधान का आधार है, उसका उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में गौर करने की बात यह है कि यदि डाॅ. अम्बेडकर आज जीवित होते तो इस अधिनियम पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?   वस्तुतः 1947 में देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में हिन्दू और दूसरे अल्पसख्यकों के साथ कैसा व्यवहार होगा, यह दूरदृष्टा एवं मनीषी डाॅ. अम्बेडकर को उसी वक्त पूर्वाभास हो गया था। कोई कह सकता है- यह कैसे? यह इस तरह से कि देश के बंटवारे के वक्त ही डाॅ. अम्बेडकर ने जनसंख्या की अदला-बदली की बात कही थी। यानी पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं एवं अन्य अल्पसंख्यकों को भारत आ जाना चाहिए, या भारत में लेना चाहिए और मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना या भेज देना चाहिए। डाॅ. अम्बेडकर सभी दलितों को भी जो पाकिस्तान में फंस गए थे, उनको कहा था कि उनको किसी भी तरीके या उपाय से पाकिस्तान से भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि मुसलमानों या मुस्लिम लीग पर दलितों का भरोसा उनके लिए घातक साबित होगा। इसीलिए उन्होंने सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, तब निजाम के राज हैदराबाद में रह रहे दलितों को भी चेतावनी देते हुये कहा था कि उच्चवर्गीय हिन्दुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़ा होना एक बड़ी भूल होगी। (डाॅ.अम्बेडकर लाइफ एण्ड मिशन, धनंजय वीर पेज 399) कांग्रेस पार्टी और पं. जवाहरलाल नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों के चलते जालंधर में 19 अक्टूबर 1951 में डाॅ. अम्बेडकर ने पंडित नेहरू के लिए कहा था कि वह पागलपन की हद तक मुस्लिमों के साथ हैं और अनुसूचित जातियों के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं है। (वही पृ. 938) डाॅ. अम्बेडकर इस बात पर विश्वास करते थे कि यह असंभव है कि एक गैर मुस्लिम एक इस्लामिक देश में रह सके। उनका कहना था इस्लाम एक बंद समुदाय है और मुस्लिम और गैर मुस्लिम में यह अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मुसलमानों का भ्रातृत्व वैश्विक व्यक्तियों के लिए न होकर मात्र मुस्लिम का मुस्लिम के लिए है। उनका स्पष्ट मानना था कि मुस्लिम कानून के तहत दुनियाँ दो कैम्पों (शिविरों) में विभाजित है- दारूल-इस्लाम और दारूल हरब। दारूल-इस्लाम के मायने जो देश मुस्लिमों द्वारा शासित हैं, दारूल हरब के सामने जहाँ मुसलमान निवास तो करते हैं परन्तु शासन उनका नहीं रहता। इस तरह से भारत हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का सामान्य तौर पर मातृभूमि नहीं है, जहाँ वह बराबरी के साथ रह सके। बल्कि वह मुसलमानों की भूमि तभी होगी-जब मुसलमानों द्वारा शासित होगी। इस तरह से जबतक वह भूमि दारूल-इस्लाम नहीं बन जाती तब तक वह दारूल-हरब ही रहेगी। इसे किसी भी तरह जीतकर दारूल-इस्लाम बनाना है। (सिर्फ मुस्लिमों के लिए) जनसंख्या की अदला-बदली के सम्बन्ध में डाॅ. अम्बेडकर का कहना था कि हिन्दू या कोई गैर मुस्लिम, मुसलमानों की दृष्टि से काफिर है, जो सम्मान के योग्य नहीं है। ऐतिहासिक उदाहरण देते हुये उन्होंने बताया कि प्रमुख मुस्लिम हमेशा कट्टर और जिहादी मुस्लिमों का ही समर्थन करते हैं। इसीलिए डाॅ. अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों को न्याय नहीं मिल सकता। इसीलिए उनका कहना था कि भारत और पाकिस्तान के बीच हिन्दुओं और मुसलमानों की जनसंख्या की अदला-बदली स्वैच्छिक ढंग से ग्रीस और बुल्गारिया की तर्ज पर होनी चाहिए।   लोगो को पता ही होगा कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए कानून का सबसे ज्यादा फायदा दलितों को होगा क्योंकि देश के बंटवारे के वक्त यह बड़ी तादाद में पाकिस्तान से नहीं निकल पाए। पाकिस्तान में इन्हें सफाई और ऐसे ही कामों के लिए जबरिया रोक लिया गया था। पर पंडित नेहरू ने इस सम्बन्ध में कोई पहल नहीं की। अब-जब मोदी सरकार यह कानून लेकर आई है तो सनक की हद तक मुस्लिम पक्षधरता के चलते कांग्रेस इसका बेतुका विरोध करती है जबकि मोदी सरकार के पूर्व यह उनके पक्ष में थी। यह बात अलग है कि मुस्लिम वोटबैंक के खौफ के चलते वह यह कानून नहीं ला सकी। कांग्रेस की बात अलग है, अपने को दलितों का मसीहा कहने वाला मायावती और भीम आर्मी के चन्द्रशेखर उर्फ रावण भी इसके तीव्र विरोध में हैं। समस्या वहीं मुस्लिम वोट बैंक। अब असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता जब डाॅ. अम्बेडकर के संविधान का हवाला देकर इस कानून का विरोध कर रहे हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि यदि डाॅ. अम्बेडकर का वश चलता तो वह देश के बंटवारे के वक्त ही यह समस्या समाप्त कर देते और ओवैसी जैसे नेता पाकिस्तान में होते क्योंकि डाॅ. अम्बेडकर के लिए वोटबैंक नहीं वरन देश महत्वपूर्ण था।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 January 2020


bhopal, Meaning of freedom of expression, artical

मनोज ज्वाला   खबर है कि मुम्बई विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक योगेश सोमण को महराष्ट्र राज्य सरकार के इशारे पर विश्वविद्यालय-प्रशासन ने सिर्फ इस कारण जबरन छुट्टी पर भेज दिया क्योंकि वे कांग्रेसी नेता राहुल गांधी के सावरकर-सम्बन्धी बयान पर नकारात्मक टिप्पणी करते हुए उन्हें सावरकर तो क्या सच्चा ‘गांधी’ मानने से भी इनकार कर दिया।प्रोफेसर साहब की टिप्पणी कहीं से भी आपत्तिजनक नहीं है। सच्चाई यह है कि उन्होंने राहुल के जिस बयान पर बेबाक टिप्पणी की, वह बयान आपत्तिजनक है। गत 14 जनवरी को प्रोफेसर योगेश ने अपने ट्विटर पेज पर राहुल गांधी के द्वारा विनायक दामोदर सावरकर के नाम से स्वयं को जोड़कर दिए बयान की तीखी आलोचना की थी। राहुल गांधी ने देश की राजधानी दिल्ली में आये दिन बलात्कार की घटनाओं पर प्रतिक्रिया जताते हुए दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ कह दिया था। उनके बयान की देशभर में निन्दा हुई। ऐसे में राहुल गांधी ने एक और बयान दिया था कि “ मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है ; इसलिए मैं माफी नहीं मांगूंगा।” राहुल ने पहले के मुकाबले और भी ज्यादा आपत्तिजनक बयान दे दिया जिसकी हर तरफ कड़ी आलोचना हुई।   मुम्बई यूनिवर्सिटी के ‘एकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट्स’ के डायरेक्टर योगेश सोमण ने सावरकर से अपना नाम जोड़ने वाले राहुल को गलत भी नहीं कहा है। उन्होंने अपने ट्विटर पेज पर लिखा है- “आप सही कह रहे हैं राहुल, आप सावरकर नहीं हैं। आप में उन जैसा कुछ भी नहीं है। न समर्पण, न बलिदान और न ही वीरता। सच तो यह है कि आप सच्चे ‘गांधी’ भी नहीं हैं। मैं आपकी पप्पूगीरी का विरोध करता हूं।” सच तो यही है कि देश की स्वतंत्रता के निमित्त कालापानी के लिए कुख्यात अंडमान की जेल में एक ही साथ दो-दो आजीवन कारावास की कठोर सजा काटते हुए काल-कोठरी की दीवारों पर ऐतिहासिक महाकव्य तक लिख देने वाले सावरकर के बहुआयामी राष्ट्रीय व्यक्तित्व की पासंग में भी नहीं हैं राहुल। कहां सावरकर और कहां राहुल! आसमान-जमीन से भी बड़ा अन्तर है। प्रोफेसर योगेश ने उन्हें गलत नहीं कहा है; बल्कि यह कहा है कि “आप सच्चे गांधी भी नहीं हैं” तो इसमें भी पूरी सच्चाई है। अपने नाम के आगे-पीछे महात्मा सूचक ‘गांधी’ शब्द जोड़ लेने मात्र से कोई भला सच्चा गांधी कैसे हो सकता है?   बावजूद इसके महाराष्ट्र भाजपा नेता आशीष शेलार के हवाले से जो खबर प्रसारित हुई, उसके मुताबिक मुम्बई युनिवर्सिटी में कायम कांग्रेसी-वामपंथी छात्र-संगठनों से सम्बद्ध छात्रों ने योगेश सोमन को धमकी दे डाली और उनके खिलाफ विश्वविद्यालय-प्रशासन में शिकायतें दर्ज करवाकर आन्दोलन-प्रदर्शन का मोर्चा खोल दिया। भाजपा नेता शेलार ने तो ठीक ही सवाल किया है कि यह ‘असहिष्णुता’ नहीं है क्या? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झण्डा लहराते-फहराते रहने वाले वामपंथी-कांग्रेसी छात्र-संगठनों की मांग पर मुम्बई युनिवर्सिटी के कुलपति सुहास पेडेनकर ने 14 जनवरी को इस मामले में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के दबाव में आ कर प्रोफेसर योगेश को जबरन छुट्टी पर भेज दिया। समझा जा सकता है कि इसके लिए राज्य-सरकार से भी उनपर दबाव पड़ा होगा, जिसमें सोनिया-राहुल की कांग्रेस भी एक घटक है। वामपंथियों-कांग्रेसियों की यह करतूत कोई नई करतूत नहीं है। इससे पहले भी वे अभी हाल ही में नागरिकता संशोधन अधिनियम पर कन्नूर विश्वविद्यालय में अपने विचार व्यक्त कर रहे केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को बोलने से बलपूर्वक रोकने की धृष्ठता कर चुके हैं। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस और कम्युनिस्ट समर्थक नेताओं-वक्ताओं-अभिनेताओं-कलाकारों को ही कुछ भी बोलने का अधिकार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दायरे में आता है? वे किसी राष्ट्रीय व्यक्तित्व का भी अपमान कर दें तो वह उनकी आजादी है और दूसरा व्यक्ति कुछ बोले अथवा उनके किसी अनुचित बयान का विरोध भी करे तो ऐसा करने की उसे आजादी नहीं है?   वामपंथियों और कांग्रेसियों की यही सबसे बड़ी त्रासदी है। वे अपनी सुविधा के अनुसार राजनीति की परिभाषा तय करते रहते हैं । वे लोग देश को जबरिया यह सिखाने-समझाने की कोशिश में लगे हुए हैं कि वे कुछ अनुछित-अवांछित बोलें-करें तो उसे चुपचाप सह लेना ही ‘सहिष्णुता’ है और उसका विरोध करना ‘असहिष्णुता’ है; जबकि कुछ भी बोलने की आजादी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दायरे में तभी आ सकती है, जब बोलने वाला कांग्रेसी या कम्युनिस्ट हो अथवा जिससे इनका हित सधता हो। यही कारण है कि ‘सहिष्णुता-असहिष्णुता’ की ‘माप-तौल’ अपने हिसाब से कर समय-समय पर सरकारी पुरस्कार-सम्मान वापस करते रहने का जो प्रहसन ये करते रहे हैं, उसे देश के आम-जनमानस का समर्थन कतई नहीं मिला।   मुम्बई विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इन झण्डाबरदारों की यह नई करतूत चिंताजनक है क्योंकि यह एक वरिष्ठ प्राध्यापक को अध्यापन कार्य से जबरिया वंचित कर देने और उनसे सम्बद्ध छात्रों की शिक्षा बाधित कर देने का मामला है। इससे मुम्बई युनिवर्सिटी के ‘जेएनयू’ करण की पृष्ठभूमि तैयार होती दिख रही है। कभी सावरकर को अपना आदर्श मानने वाले शिवसैनिक ‘ठाकरे’ आज अगर सत्ता-सुख के कारण राज्य के एक ऐतिहासिक विश्वविद्यालय के भीतर ऐसा अनैतिक होते देख रहे हैं तो यह उनके वैचारिक क्षरण का ताजा उदाहरण है। उद्धव ठाकरे सत्ता-सुख के लिए सोनिया-राहुल के मुख से छत्रपति शिवाजी का अपमान भी सुन सकते हैं; किन्तु कम से कम महाराष्ट्र के राज्यपाल को तो मुम्बई विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक के साथ हो रही इस ज्यादती के माममे में तुरंत हस्तक्षेप करना ही चाहिए।   (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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Dakhal News 17 January 2020


jio

   जल्द महंगी होंगी सेवाएं  इससे पहले एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया ने भी 1 दिसंबर से टैरिफ बढ़ाने का फैसला कर लिया है। रिलायंस जियो  अपने ग्राहकों को बड़ा झटका देने जा रही है। कंपनी ने कहा है कि वह आने वाले कुछ हफ्तों में अपनी सेवाओं को महंगी कर देगी। इससे पहले सोमवार को एयरटेल  और वोडाफोन-आइडिया  ने भी ट्रैरिफ बढ़ाने का ऐलान किया था। हालांकि अभी एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया की नई दरों का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन ये दरें 1 दिसंबर से लागू होंगी। बता दें, जियो अन्य नेटवर्क पर फ्री कॉलिंग की सुविधा पहले ही बंद कर चुकी है। अब जियो से अन्य नेटवर्क पर कॉल करने के लिए हर मिनट 6 पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। हालांकि कंपनी इस राशि के बदले फ्री डेटा देकर भरपाई कर रही है। सेवाएं महंगी करने के बाद में जियो की ओर से मंगलवार को जारी बयान में कहा गया कि अन्य ऑपरेटरों की तरह हम भी सरकार सरकार की नीतिओं के अनुसार काम करेंगे। टेलिकॉम इंडस्ट्री को मजबूत करने के लिए ट्राई के नियमों का पालन करते हुए अगले कुछ हफ्तों में शुल्क में उचित वृद्धि करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कंपनी को सूचना मिली है कि ट्राई जल्द ही विभिन्न ऑपरेटर्स से बात करके टेलिकॉम टैरिफ में संशोधन पर राय बनने की कोशिश करेगा। हालांकि कंपनी की ओर से यह भरोसा भी दिया गया है कि डाटा की खपत और डिजिटल एडोप्शन में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। Jio ने कहा कि 4जी के प्रवेश के लिए निवेश बढ़ाने की जरूरत होगी। इस सेक्टर में निरंतर निवेश की आवश्यकता होती है। अब भारतीय नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करने और देश के डिजिटल एजेंडे को पूरा करने के लिए आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। जानकारों का कहना है कि टेलिकॉम सेक्टर के लिए यह एक सकारात्मक कदम होगा।

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Dakhal News 19 November 2019


jai vardhan singh

    नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री जयवर्द्धन सिंह ने बताया है कि मध्यप्रदेश के शहरों का नियोजन विश्व-स्तरीय होगा। इसके लिये न्यूयार्क, लंदन, टोक्यो, शंघई, हांगकांग, जोहांसवर्ग और म्यूनिख के मास्टर प्लान का अध्ययन किया जा रहा है। इन्हीं शहरों की तर्ज पर प्रदेश के 34 शहरों का जीआईएस बेस्ड मास्टर प्लान बनाने जा रहे हैं। इन शहरों के महत्वपूर्ण बिन्दुओं ट्रांजिट ओरिएंटेड डेव्हलपमेंट, मिक्स लैण्ड यूज, जोनिंग प्लान और ट्रेफिक इन्पेक्ट स्टडी आदि को प्रदेश के इन 34 शहरों के नियोजन में अपनाया जायेगा।  सिंह ने बताया कि प्रदेश में बहुत जल्द लैण्ड पूलिंग पॉलिसी बनायी जायेगी। इसमें भू-धारकों को स्टेक होल्डर बनाकर भूमि का विकास किया जायेगा। पॉलिसी में हाउसिंग बोर्ड, टूरिज्म और स्थानीय निकाय को भी शामिल किया जायेगा। रियल इस्टेट कारोबार को गति देने के उद्देश्य से वन स्टेट-वन रजिस्ट्रेशन का फार्मूला ला रहे हैं। सरकार ने 2 हेक्टेयर से कम भूमि वालों को भी आवासीय योजना बनाने की अनुमति दी है।  सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा है कि प्रत्येक परिवार के पास निवास योग्य भूमि जरूर होना चाहिये। इसी तारतम्य में 11 सितम्बर, 2019 को मुख्यमंत्री आवास मिशन का शुभारंभ किया गया है। मिशन में एक लाख 15 हजार 892 आवासीय इकाइयों के निर्माण की योजना स्वीकृत हो चुकी है। प्रदेश के डेढ़ लाख भूमिहीन परिवारों को निवास योग्य पट्टे वितरण की कार्यवाही चल रही है। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री ने बताया कि शहरों को प्रदूषण से बचाने के लिये 5 नगरीय निकायों में 380 इलेक्ट्रिक बस संचालित की जायेंगी। इंदौर में 40 बसों का संचालन भी शुरू हो चुका है। सिंह ने बताया कि अक्षय जल संचय अभियान प्रारंभ किया गया है। अभियान में 378 नगरीय निकायों में 80 हजार से अधिक रूफ वॉटर हॉर्वेस्टिंग स्ट्रक्चर बनाये गये हैं। नगरीय निकायों में 10 लाख पौधे लगाये गये हैं। उन्होंने बताया कि नगरीय निकायों में 11 लाख पारम्परिक लाइटों को एलईडी में बदला जायेगा। इससे स्ट्रीट लाइट की विद्युत खपत 50 प्रतिशत तक कम हो जायेगी।  सिंह ने बताया कि प्रदेश में अब तक 2 लाख से अधिक नागरिकों द्वारा सिंगल यूज प्लास्टिक उपयोग नहीं करने की शपथ ली गई है। सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग को रोकने के लिये 4 लाख कपड़े के झोले वितरित किये गये हैं। सार्वजनिक एवं निजी आयोजनों में सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग रोकने के लिये 1500 से अधिक बर्तन बैंक बनाये गये हैं। अपशिष्ट कचरा प्रबंधन के लिये 836 छोटे कचरा संग्रहण वाहन खरीदे जा रहे हैं। साथ ही 83 मटेरियल रिकवरी केन्द्र भी बनाये जा रहे हैं। मंत्री  सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री युवा स्वाभिमान योजना लागू कर नगरीय क्षेत्रों के युवाओं को व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण देने के साथ ही 100 दिन का अस्थाई रोजगार अथवा स्टाइपेन्ड दिया जा रहा है। योजना 166 नगरीय निकाय में संचालित है। वर्तमान में 19 हजार 932 हितग्राही प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं और 18 हजार 396 पात्र हितग्राहियों को 12 करोड़ 10 लाख रुपये स्टाइपेन्ड के रूप में वितरित किये गये हैं।  सिंह ने बताया कि इसके अलावा मेट्रोपालिटन अथॉरिटी, मेट्रो रेल का संचालन और माँ नर्मदा की निर्मलता को बरकरार रखने के लिये नर्मदा किनारे के सभी 21 स्थानीय निकायों में मल-मूत्र निस्तारण प्रबंधन (सेप्टेज मैनेजमेंट) पर कार्य किया जा रहा है। श्री सिंह ने कहा कि उनके विभागों से संबंधित वचन-पत्र के सभी वचनों को समय-सीमा में पूरा किया जायेगा।  

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Dakhal News 19 November 2019


दाऊद दो

  भारत का पाकिस्तान को लेटेस्ट ऑफर   भारत ने पाकिस्तान के सामने एक ऑफर रखा है, जिसे स्वीकार कर इमरान खान दोनों देशों के रिश्ते सुधारने में अहम भूमिका निभा सकते है| विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने फ्रांसीसी अखबार को दिए इंटरव्यू  में कहा है कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के घोषित आतंकी दाऊद इब्राहीम को भारत को सौंप दे, तो दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य हो सकते हैं |  पकिस्तान के लिए भारत का एक नया ऑफर सामने आया  है | हालाँकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान  की इतनी क्षमता नहीं है कि ने इसे पूरा कर सकें  फ़्रांसिसी अखबार  ले मॉन्डे से एक इंटरव्यू के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते तब तक नहीं सुधार सकते, जब तक वह भारत के खिलाफ खुलेआम आतंकी फैलाता रहेगा  अगर पाकिस्तान रिश्तों में सुधार चाहता है तो उसे सबसे पहले उन भारतीयों को सौंपना होगा जिन पर भारत मे आतंकी हमलों को अंजाम  देने के आरोप हैं | आतंकी हमलों के ये आरोपी लंबे समय से पाकिस्तान में रह रहे हैं | जयशंकर ने कहा  पाक के साथ भारत के रिश्ते कई सालों से मुश्किल दौर में हैं | ऐसा इसलिए है क्योंकि पड़ोसी देश ने आतंकी पैदा करने की फैक्टरी जैसा सिस्टम तैयार कर रखा है |   पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत में भेजता है और हमले करवाता है |  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी इस सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं | जयशंकर ने कहा, भारत में आतंकी हमले के 3 मुख्य आरोपी पाकिस्तान में सालों से छिपे बैठे हैं | इनमें दाऊद की शामिल है दाऊद पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के साथ मिलकर मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके कराने का आरोप है |   

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Dakhal News 16 November 2019


जब्बार का निधन

  बीमारी से जूझते जब्बार का आखिरी वीडियो   भोपाल गैस पीड़ितों के सबसे बड़े नेता अब्दुल जब्बार को इलाज के लिए मुंबई ले जाया जाता उससे पहले ही उनका निधन हो गया बीमारी से दो दो हाथ कर रहे अब्दुल जब्बार का आखिरी वीडियो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ सामने आया जहाँ दिग्विजय सिंह उनसे कह रहे हैं तुमसे बहुत काम लेना है सब ठीक हो जाएगा | इस मामले में यह भी सामने आया कि दूसरों के हक़ और स्वास्थ्य की लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल जब्बार को खुद ठीक इलाज नहीं मिल पाया  और उनकी मौत हो गई |    गैस पीड़ितों के लिए संघर्ष का बड़ा अध्याय लिखने वाले अब्दुल जब्बार का गुरूवार रात  भोपाल के चिरायु अस्पताल में  निधन हो गया जब्बार का निधन हृदय गति रुकने से  हुआ  वह 63 साल के थे  | ज्यादा डायबिटीज के चलते पैर की नसें ब्लाक होने से उन्हें गैंगरीन हो गया था  | शुरू में उन्हें कमला नेहरू अस्पपताल में भर्ती कराया गया था इसके बाद हालत बिगड़ी तो वे  बीएमएचआरसी में भर्ती हो गए | जहाँ  डॉक्टरों ने कहा कि इलाज की पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं लिहाजा 11 नवंबर को उन्हें चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया गया | अब्दुल जब्बार की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं  जिस व्यक्ति ने गैस पीड़ितों के हक़ उनकी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अपना जीवन खपा दिया उसे खुद सही इलाज नहीं मिल पाया अब्दुल जब्बार का आखिरी वीडियो सामने आया जिसमे पीड़ा उनके चेहरे पर साफ़ देखी जा सकती है | पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह गुरूवार को उनका हाल जानने गए और उन्हें ततकाल मुंबई इलाज के लिए चलने को कहा | दिग्विजय सिंह ने जब्बार से कहा सब ठीक हो जाएगा तुमसे अभी बहुत काम लेना है |  दिग्विजय सिंह ने सरकारी कमला नेहरू अस्पताल पर सवाल उठाते हुए कहा तू पड़ा रहा न कमला नेहरू में इतने दिन उससे यह सब हुआ है |    दिग्विजय सिंह शुक्रवार को अब्दुल जब्बार को इलाज के लिए मुंबई शिफ्ट करवाना चाहते थे | लेकिन ऐसा हो नहीं सका और गैस पीड़ितों के लिए अंतिम सांस तक लड़ते रहने वाले अब्दुल जब्बार इस दुनिया को ही अलविदा कह गए भोपाल में गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य को लेकर सदैव सजग रहने वाले अब्दुल जब्बार को ही भोपाल में ठीक इलाज नहीं मिल पायेगा इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी | शुक्रवार को भोपल के गरम गड्डा कब्रिस्तान में   अब्दुल जब्बार को  सुपुर्दे खाक किया  गया |  

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Dakhal News 15 November 2019


आदमी जैसी मछली

  आदमी जैसी दिखने वाली चीनी मछली   तालाब से एक मछली दाना खाने के लिए किनारे की तरफ आती है | तो उसे देख कर लोग  चौंक जाते हैं | क्योंकि  मछली का  चेहरा मछली जैसा कम और इंसान जैसा ज्यादा है | इंसानी चेहरे वाली यह मछली चीन में देखी गई अब इसका वीडियो जमकर वायरल हो रहा है |    क्या कभी आप मछली को देखकर चौंके हैं आपका जवाब होगा नहीं लेकिन आप इस मछली को देखकर हैरत में पड़ जाएंगे  सोशल मीडिया में इस मछली का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है | जिसमें इंसानी चेहरे वाली मछली नजर आ रही है | यह मछली चीन में देखी गई है और पानी में बड़े साफ तौर पर इसे देखा जा सकता है | दक्षिणी चीन के कनमिंग शहर के बाहर एक विजिटर ने इस मछली का वीडियो बनाया है | एक तालाब के किनारे खड़े विजिटर ने जब इस मछली को देखा तो हैरान रह गया और इसके बाद उसने मछली का वीडियो बनाया | यह वीडियो सोशल मीडिया में डालते ही तेजी से वायरल होने लगा है और अब तक लाखों लोग इसे देख चुके हैं वीडियो में मछली तालाब के किनारे पर आती दिखाई दे रही है और जैसे ही वो अपना चेहरा बाहर निकालती है तो यह एक इंसानी चेहरे की तरह नजर आता है | इसमें मछली के चेहरे पर दो काले स्पॉट हैं जो आंखों की तरह नजर आ रहे हैं वहीं एक सीधी लाइन है जो नाक का आकार दिखाती है इस वीडियो में उस महिला की भी आवाज है जो इसे बना रही है और वो यह कहते हुए सुनी जा सकती है कि मछली एक परी में पदल गई यह पहली बार नहीं है जब चीन में इस तरह की मछली का मामला सामने आया है | इससे पहले 2016 में भी एक मछली को लेकर खूब बहस हुई थी कि उसका चेहरा इंसान की तरह है। यह मछली हुनान प्रांत के वुगांग शहर में पकड़ी गई थी |

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Dakhal News 12 November 2019


eid juloos

  धारा 144 लागू प्रशासन बना रहा मूक दर्शक   टीकमगढ़ में मुस्लिम समुदाय ने ईद मिलादुन्नबी  त्यौहार शहर में जुलूस निकालकर मनाया | इस दौरान  प्रशासन की लापरवाही देखने को मिली शहर में धारा 144 लागू है जिसके बाद भी प्रशासन और पुलिस  की अनदेखी के चलते जुलूस निकाला गया | जुलूस के दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं घटी  और स्थानीय लोगों ने हिंदू मुस्लिम भाईचारे की भावना से त्यौहार को मनाया |    अयोध्या फैसला आने के बाद टीकमगढ़ में धारा 144 लागू की गई | शहर में मुस्लिम समुदाय ने बड़ी संख्या में जुलूस निकालकर ईद मिलादुन्नबी का त्यौहार मनाया | इसमें  प्रशासन और पुलिस की बड़ी लापरवाही देखने को मिली | जुलूस के दौरान पुलिस और प्रशासन मूक दर्शक बना रहा प्रशासन की तरफ से जुलूस की परमिशन नहीं थी फिर भी लोगों ने जुलूस निकालकर धारा 144 को दरकिनार किया |  जब इस संबंध में नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन जबर खान से बात की गई तो उन्होंने बताया की | मौखिक रूप से प्रशासन से परमिशन ली गई थी | पर प्रशासन  का कोई भी अधिकारी इस बारे में बोलने को तैयार नहीं हुआ | धरा 144 में जुलुस के बाद  टीकमगढ़ में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई | सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा दुकाने बंद रही  और लोग जरूरी वस्तुओं के लिए परेशान होते नजर आए | इस दौरान  कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी और स्थानीय लोगों ने हिंदू मुस्लिम भाईचारे की भावना से त्यौहार को मनाया |   

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Dakhal News 12 November 2019


इमरान सिद्धू

  इमरान खान के कहा- हमारा सिद्धू कहां है   अब बात वीडियो वाइरल की | आपको ये जानकार कतई आश्चर्य नहीं होगा कि कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के करीबी हैं | करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन का एक वीडियो सामने आया है जहाँ इमरान खान पाकिस्तानी अधिकारियों से कह रहे हैं कि हमारा सिद्धू कहाँ हैं |  करतारपुर कॉरिडोर से जुड़ा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का एक वीडियो वायरल हो रहा है | इसके उद्घाटन समारोह के दौरान वह अपने साथियों से पूछते हैं कि हमारा सिद्धू किधर है मैं कह रहा हूं हमारा सिद्धू |  इसके बाद उनके साथ शटल में सवार कोई सहयोगी कहता है कि उन्हें रोक रखा था | वीडियो में बैकग्राउंड से एक और आवाज आती है कि वह जत्थे की लाइन में लग गए हैं, लेकिन अभी आए नहीं है इसके बाद इमरान खान पूछते हैं- मनमोहन आ गया   तो एक महिला मंत्री जवाब देती है- हां सिद्धू को रोक रखा था | इस पर इमरान कहते हैं- उसे  हीरो बनाएंगे  इस पर महिला मंत्री कहती है कि हां वो सारे चैनल की हेडलाइन बनेगी | इस बीच एक और आवाज आती है कि उनके दरवाजे बंद हैं, हमने अपने दरवाजे खोल रखे हैं  इसका एक शॉट ले लेते हैं |   बहरहाल यह वीडियो अब वायरल हो रहा है | पाकिस्तानी न्यूज चैनल 24 का ने इस वीडियो को सबसे पहले प्रसारित किया | इमरान खान ने शनिवार 9 नवंबर को लंबे समय से प्रतीक्षित पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित करतारपुर कॉरिडोर का शनिवार को उद्घाटन किया | यह उसी दिन का वीडियो है |  पाकिस्तान सेना  के अधिकारीयों और इमरान खान से दोस्ती के चलते सिद्धू काफी विवादस्पद हो गए हैं | बीजेपी ही नहीं कांग्रेस का एक धड़ा भी सिद्धु को इन कामों के चलते नपसंद कर रहा है | इस वीडियो के बाद सिद्धू की मुसीबतें और बढ़ सकती हैं |     

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Dakhal News 11 November 2019


टीएन शेषन का निधन

  बहुत ही सख्‍त अधिकारी थे टीएन शेषन   भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का छियासी वर्ष की आयु में  रविवार रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया  एक वक्त में काफी अव्यवस्थित रही भारत की चुनाव व्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय टीएन शेषन को ही जाता है |    टीएन शेषन ने बीती रात अंतिम सांस ली  दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया | वर्ष 1990 से 1996 के दौरान भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे |  ...  मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने से पहले वह 1989 में भारत के 18वें कैबिनेट सेक्रेटरी का पद संभाल रहे थे | 1996 में उन्हें सरकारी सेवाओं के लिए रमन मेग्सेसे अवॉर्ड दिया गया था | पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है | कुरैशी ने कहा कि वह सच्चे अर्थों में महान थे  ...  कुरैशी ने लिखा- मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं। 15 दिसंबर 1932 को केरल के पलक्क्ड़ जिले के थिरुनेल्लई में पैदा हुए शेषन ने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली इसके बाद वह भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एडवर्ड एस मेसन फैलोशिप के तहत पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री हासिल की | टीएन शेषन और मेट्रो मैन कहे जाने वाले ई श्रीधरन ने पलक्कड़ के बीईएम हाईस्कूल और विक्टोरिया कॉलेज में साथ-साथ पढ़ाई की |10वें चुनाव आयुक्त के तौर पर शेषन पारदर्शिता और दक्षता का पर्याय थे | टीएन शेषन ने 1997 में देश के राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा लेकिन वह केआर नारायणन से हार गए थे |   

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Dakhal News 11 November 2019


 डॉ प्रभुराम चौधरी

  स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. चौधरी द्वारा बाल मेले का शुभारंभ स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी ने आज यहाँ शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जहॉगीराबाद में बाल मेले का शुभारंभ करते हुए कहा कि स्कूल का वातावरण ऐसा बनाएं कि बच्चे खुद स्कूल आने के लिये उत्सुक रहें, उत्साहित हों। डॉ. चौधरी ने कहा कि बच्चों को ऐसी प्राथमिक शिक्षा देना चाहिये, जिससे उनकी जिज्ञासाओं का समाधान हो और वे खुद करके सीखें।   मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि प्रदेश की शिक्षा की गुणवत्ता को देश में अग्रणी बनाने के लिये सरकार प्रतिबद्ध है और कारगर प्रयास भी कर रही है। प्रदेश के सभी स्कूलों में हर तीन माह में पालक-शिक्षक बैठक अनिवार्य कर दी गई है। अभिभावकों को स्कूल की गतिविधियों में शामिल करने से पॉजिटिव परिणाम भी आने लगे हैं। उन्होंने स्कूलों में किये गये नवाचारों की सराहना की। डॉ. चौधरी ने कहा कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये स्कूलों में शिक्षा के साथ अन्य रचनात्मक गतिविधियाँ भी संचालित की जानी चाहिये।   स्कूल शिक्षा मंत्री ने मेले में गांधी जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर आयोजित प्रदर्शनी का अवलोकन किया, उत्कृष्ट शिक्षकों तथा 10वीं एवं 12वीं कक्षा की प्रतिभावान छात्राओं को पुरस्कृत किया।   बाल मेले में कई रोचक गतिविधियाँ संचालित की गईं, जिनमें अभिभावकों ने सहभागिता की। विधायक  आरिफ मसूद, छात्राएँ और अभिभावक उपस्थित थे।        

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Dakhal News 7 November 2019


सोनिया मोबाईल

  सोनिया गांधी ने लगाया मोबाइल पर प्रतिबंध कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक बड़ा और अहम फैसला लेते हुए पार्टी की बैठकों में मोबाइल फोन लाने पर पाबंदी लगा दी है  | ऐसा करने से  कांग्रेस की महत्वपूर्ण बैठकों की जानकारियां अब तत्काल  बाहर नहीं आ सकेंगी  | सोनिया गांधी ने यह फैसला कांग्रेस पार्टी की बैठकों में सदस्यों के मुद्दे से भटकाव और एजेंडे की गोपनीयता को बनाए रखने के लिए लिया है | सोनिया गांधी द्वारा लिए गए इस फैसले को बड़ा कदम माना जा रहा है  | सोनिया गांधी ने भविष्य में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में भी मोबाइल फोन लेकर आने पर पाबंदी लगाने का फैसला किया है | इसके अलावा कांग्रेस की सामान्य बैठकों में भी मोबाईल पर प्रतिबंध रहेगा  | सूत्रों ने बताया कि इससे बैठक में चर्चा किए जाने वाले मुद्दों की गोपनीयता सुनिश्चित होगी  | सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने यहां शनिवार को पार्टी के महासचिव और अन्य पदाधिकारियों की बैठक बुलाई थी  इस बैठक की खबरें भी तुरंत लीक हो गई थीं | इस बैठक में आर्थिक सुस्ती आर सी ई पी किसानों की समस्याओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए योजना को लेकर पदाधिकारियों के साथ चर्चा हुई थी  और यह सभी जानकारियां कुछ ही क्षणों में लीक हो गई थीं  | इन दिनों पार्टी में महाराष्ट्र में सरकार बनाने के अलावा आने वाले लोकसभा सत्र को लेकर कईं अहम मुद्दों पर बैठकें हो रही हैं और ऐसे में इनकी गोपनीयता बनाए रखना अहम माना जा रहा है |          

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Dakhal News 6 November 2019


बीफ राजनीति

  दिलीप घोष बोले  कुत्ते का मांस भी खाना चाहिए   बीफ को लेकर पश्चिम बंगाल में राजनीति गरमाने लगी है | इसकी शुरुआत राज्य में भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने की है दिलीप घोष का एक बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने उन बुद्धिजीवियों पर निशाना साधा है जो बीफ खाते हैं उन्होंने ऐसे लोगों को कुत्ते का मांस भी खाने की सलाह दे डाली है | साथ ही कहा कि वह भी उनकी सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाएगा  | घोष ने कहा कि बुद्धिजीवियो को जो भी खाना हो खाएं लेकिन अपने घर में रहकर खाएं |  भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष  ने बीफ खाने वालों को कुत्ते का मांस भी खाने की सलाह दी है  | घोष ने कहा कि 'कुछ बुद्धिजीवी सड़क पर बैठकर बीफ खाते हैं | मैंने उन्हें कुत्ते का मांस खाने का भी कहा है | उनकी सेहत अच्छी रहेगी चाहे वे किसी भी जानवर को खाएं, लेकिन सड़कों पर क्यों? अपने घर पर खाओ |   बर्धमान में आयोजित गोपा अष्टमी कार्यक्रम के दौरान घोष ने कहा कि 'गाय हमारी माता है, हम गाय का दूध पीकर जिंदा रहते हैं, तो कोई अगर मेरी मां के साथ गलत व्यवहार करेगा, मैं उसके साथ ऐसे पेश आउंगा जैसा उनके साथ आना चाहिए | भारत की पवित्र भूमि पर गाय को मारना और बीफ खाना अपराध है | घोष अपने विवादित बयानों को लेकर पहले भी सुर्खियों में रह चुके हैं |       

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Dakhal News 6 November 2019


मंत्री सिलावट ने राज्यपाल को भेंट किया संकल्प उद्घोषणा-पत्र

राज्यपाल लालजी टंडन ने कहा है कि स्वास्थ्य का अधिकार एक क्रांतिकारी पहल है। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि यथार्थवादी दृष्टिकोंण के साथ प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि समाज के यथार्थ को पहचान कर नई सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।  टंडन आज मिन्टो हॉल में हेल्थ कॉन्क्लेव के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री  तुलसीराम सिलावट ने राज्यपाल को संकल्प उद्घोषणा पत्र भेंट किया। राज्यपाल टंडन ने कहा कि शिक्षित एवं स्वस्थ व्यक्ति समाज का आधार होते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ते बाजारवाद के कारण समाज मेंधनार्जन की अंधी दौड़ शुरू हो गई है, इसे रोकना होगा। उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में गरीब व्यक्ति को 5 लाख रूपए तक के नि:शुल्क उपचार की व्यवस्था की गई है। जन-औषधालयों के माध्यम से प्रभावी दवाएँ सस्ती कीमत पर मिल रही हैं। आगामी 5 वर्षों में चिकित्सकों की कमी भी दूर हो जाएगी।  टंडन ने कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि अन्त्योदय तक इन लाभों को पहुँचाने के लिए पूरा समाज सेवाभावी स्वरूप में काम करे।   राज्यपाल ने पुरातन भारतीय चिकित्सा पद्धति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतवर्ष मेंवैद्यों के आदर्श औरमान्यताएं इतनी ऊँची थीं कि यदि बिना उपचार के उनके द्वार से कोई गरीब लौट जाता था तो वह स्वयं को ईश्वरीय दंड का भागी मानते थे। उनकी मान्यता थी कि ऐसा होने पर उनका समस्त ज्ञान नष्ट हो जायेगा। उन्होंने कहा कि उपचार विधि भी लागत आधारित थी। चूर्ण लेप आदि से आमजन का नि:शुल्क और समृद्ध वर्ग का रस भस्म से मूल्य प्राप्त कर उपचार किया जाता था। राज्यपाल ने कहा कि संस्कृति की इस विरासत को स्वास्थ्य के अधिकार के लिए प्रसारित करना होगा।   लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसीराम सिलावट ने कहा कि मध्यप्रदेश, देश में स्वास्थ्य के अधिकार को मान्यता देने वाला पहला राज्य बनेगा। प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये तेजी से प्रयास किए गए हैं। चिकित्सकों, पीजी तथा नॉन पीजी मेडिकल ऑफिसर्स, सामुदायिक स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी और नर्सिंग स्टॉफ के रिक्त पदों की पूर्ति की गई है। शेष पदों की भर्ती की प्रक्रिया तेजी से प्रचलित है। उन्होंने बताया कि लोक सेवा आयोग से एक हजार से अधिक पदों की भर्ती की जा रही है। करीब 550 चिकित्सकों की उपलब्धता हो गयी है। इस अवसर पर चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ, विधि-विधायी कार्य मंत्री  पी.सी. शर्मा, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल, नगरीय विकास मंत्री  जयवर्धन सिंह, मानव अधिकार आयोग के सदस्य जस्टिस  नरेन्द्र कुमार जैन, रामकृष्ण मिशन के स्वामी वरिष्ठानंद सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।  

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Dakhal News 4 November 2019


hotel me aag

  5 करोड़ की सम्पत्ति का हुआ नुकसान   शार्ट सर्किट से  ग्वालियर के  लजीज  होटल में अचानक आग लग गई |आग इतनी भीषण थी की  उसने कुछ ही देर में पूरी ईमारत को अपनी चपेट में ले लिया | दमकल के अमले ने बमुश्किल आग पर काबू पाया  गनीमत  रही कि आगजनी के दौरान होटल में कोई ग्राहक मौजूद नहीं था |    ग्वालियर में शॉर्ट सर्किट से अचलेश्वर मन्दिर के सामने स्थित लजीज होटल में  अचानक आग लगने से क्षेत्र में अफरा तफरी का माहौल बन गया  बमुश्किल दमकल अमले  और पुलिस ने आग पर काबू पाया  | आग की चपेट में आते ही बिल्डिंग धू धू करके जलने लगी  | इस बीच दो लोगों के होटल में फंसने से खलबली मच गई  |  बताया जा रहा है दमकल अमले ने होटल में फंसे दोनों लोगों को रेस्क्यू कर सुरक्षित बाहर  निकाला  | अनुमान लगाया जा रहा है की इस आगजनी में लगभग पांच करोड़ की सम्पत्ति का नुक्सान हुआ है  | गनीमत ये रही कि आगजनी के दौरान होटल में कोई ग्राहक मौजूद नहीं था |

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Dakhal News 3 November 2019


निकम्मा प्रशासन

  उधर मंत्री गोविन्द सिंह  भाषण पेल रहे थे   भिंड में प्रशासन का निर्दयी चेहरा सामने आया | मध्य प्रदेश स्थापना दिवस समारोह में दो दर्जन से ज्यादा स्कूली छात्राओं को मधुमक्खियों ने काट लिया  जिस वक्त मधुमक्खियों ने छात्राओं पर हमला किया | उस समय सहकारिता मंत्री गोविंद सिंह का भाषण चल रहा था और मंच पर कलेक्टर के अलावा कई आला अफसर बैठे हुए थे   लेकिन किसी ने भी छात्राओं की सुध नहीं ली | वो खुद को मधुमक्खियों के हमले से बचाने के लिए मैदान में ही इधर-उधर दौड़ती रहीं  |  भिंड में मध्यप्रदेश स्थापना दिवस समारोह चल रहा था  | मंच से मंत्री गोविन्द सिंह भाषण दे रहे थे तभी मधु मक्खियों ने स्कूली छात्राओं  पर हमला कर दिया  | कुछ छात्राओं ने कपड़े से अपने शरीर और मुंह को ढंकने की कोशिश की लेकिन फिर भी कई छात्राओं को मधुमक्खियों ने काट लिया  | इससे कई छात्राओं के चेहरे पर सूजन आ गई और कई छात्राओं बेसुध हो गईं  | मौके पर मौजूद छात्राओं ने बताया कि,सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद फोटो सेशन हो रहा था  | उसी दौरान अचानक मधुमक्खियों ने हमला कर दिया  | जब तक वो सुरक्षित स्थान पर पहुंचते  | उससे पहले ही कई छात्राओं को मधुमक्खियों ने काट लिया | कुछ देर के लिए मैदान पर अफरा-तफरी मच गई  | आनन-फानन में कुछ लोग छात्राओं को अस्पताल ले कर गए जहां उनका इलाज  किया गया  | लेकिन अस्पताल में न तो सहकारिता मंत्री और न ही कोई आला अफसर छात्राओं का हाल-चाल जानने पहुंचा   | इसे लेकर छात्राओं के अभिभावक भी काफी नाराज  नजर आए |  

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Dakhal News 2 November 2019


इमरान संकट में

  जोरदार प्रदर्शन सड़कों पर उतरे लोग   ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान की इमरान सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है  |  हमेशा कश्मीर के लिए आजादी की बात करने वाले इमरान खान से पाकिस्तान की जनता खुद इतनी परेशान हो गई है कि अब वह उनकी सरकार से आजादी के लिए  सड़कों पर उतर चुकी है  |    इमरान खान की सरकार संकट में है  | इमरान खान के खिलाफ पाकिस्तान की सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ा है और अब यह आजादी मार्च इस्लामाबाद पहुंच चुका है | इसकी अगुवाई पाकिस्तान के सबसे बड़े धार्मिक गुट जमीयत-उल-इस्लाम पाकिस्तान के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान कर रहे हैं  | फजलुर रहमान की अगुवाई में पाकिस्तान के कराची समेत सभी बड़े शहरों से 27 अक्टूबर को आजादी मार्च की शुरुआत हुई, जिसका पिछले 5 दिनों में पाकिस्तान में बड़ा असर देखने को मिला  | अलग-अलग शहरों से लोग इस आजादी मार्च में शामिल होकर इस्लामाबाद की ओर कूच करने लगे | अर्थव्यवस्था से लेकर विदेश नीति के मोर्चे पर इमरान खान चौतरफा घिरे हुए हैं, कश्मीर पर पटखनी खाने के बाद सेना प्रमुख बाजवा पैरलल सरकार चलाकर ये संकेत दे चुके हैं  | 14 महीने की इमरान खान सरकार पूरी तरह खतरे में दिख रही है यह मार्च इतना बड़ा है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी समेत कई विपक्षी दलों के समर्थक भी सरकार विरोधी इस प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं | मार्च को देखते हुए पाकिस्तानी अधिकारियों ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं  | इस प्रदर्शन से डरी इमरान खान सरकार ने अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के अलावा कई जगहों पर सेना को भी तैनात कर दिया है |       

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Dakhal News 1 November 2019


rishvat

  घूसखोर है अवार्ड पाने वाला एसआई   स्वतंत्रता दिवस पर  दुर्ग  के प्रभारी मंत्री के हाथों बेस्ट थाना प्रभारी का अवार्ड लेने वाला सब इंस्पेकटर घूसखोर निकला  इस पुलिस वाले का रिश्वत लेते  हुए  वीडियो वायरल हो गया है | आला अधिकारीयों ने इस मामले की जाँच के आदेश दिए हैं  |    कुम्हारी थाना में पदस्थ उप निरीक्षक चार हजार रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगा है  | स्वतंत्रता दिवस पर  दुर्ग  के प्रभारी मंत्री के हाथों बेस्ट थाना प्रभारी का अवार्ड लेने वाले इस  सब इंस्पेकटर  की रिश्वत खोरी का  वीडियो वायरल हो रहा है  | इस घटना के बाद पुलिस विभाग शर्मसार नजर आ रहा है  एक  ट्रांसपोर्टर ने उप निरीक्षक का पैसा लेते हुए वीडियो बनाया हैऔर  मामले की शिकायत एसपी से की   है  | एसपी ने जांच के निर्देश दिए हैं  भिलाई निवासी सुखवंत सिंह ने इस मामले का खुलासा किया  सुखवंत ने बताया कि वह गहोतरा ट्रांसपोर्ट नागपुर की गाड़ियों की छत्तीसगढ़ में देख रेख करता है  ...  24 अक्टूबर 2019 को उनके ट्र्क  |  जिसका ड्राइवर विनोद धुर्वे रायपुर से माल भरकर नागपुर के लिए रवाना हुआ था  | इस दौरान पीछे से आ रही एक तेज रफ्तार कार ने पहले जायलो गाड़ी, फिर पीसीआर गाड़ी और उसके बाद उसकी गाड़ी को ठोकर मार दी मौके पर पहुंची पुलिस ड्राइवर विनोद धुर्वे को कुम्हारी थाना ले गई जहां उप निरीक्षण प्रकाश शुक्ला ड्यूटी पर थे प्रकाश ने सुखवंत से उसके मोबाइल पर बात की और थाने पहुंचने कहा  दो घंटे के भीतर थाना नहीं पहुंचने पर गाड़ी के खिलाफ बड़ा अपराध दर्ज करने की धमकी दी सुखवंत के मुुताबिक वह दो घंटे बाद थाने पहुंचा जहां कार चालक व उसके साथी बैठे हुए थे  | सुखवंत ने आरोप लगाया कि उप निरीक्षक प्रकाश शुक्ला ने उनकी गाड़ी छोड़ने के एवज में पहले 60 हजार फिर 40 हजार रुपये की डिमांड की | सुखवंत ने इतने पैसे देने से मना किया तो उप निरीक्षक ने धाराएं बढ़ाकर ड्राइवर को जेल भेजने की धमकी दी और गाड़ी थाने में खड़ा करवा लिया  |  30 अक्टूबर को ड्राइवर ने सुखवंत को फोन कर कहा कि थानेदार शुक्ला आपको थाना बुला रहे हैं  | सुखवंत के थाना पहुंचने पर प्रकाश शुक्ला ने कहा कि उसी दिन सेवा पानी कर देते तो आपकी गाड़ी को थाने से उसी समय छोड़ देते  सुखवंत ने बताया कि थानेदार ने कहा कि उसकी फीस पांच हजार रुपये है  |  इतनी रकम दे दोगे तो आपकी गाड़ी अभी छोड़ दूंगा  | सुखवंत ने बताया कि मजबूरी में प्रकाश शुक्ला को चार हजार रुपये देने पड़े  सुखवंत ने बताया कि गाड़ी सात दिन से खड़ी हुई थी जिसमें भरा हुआ मुर्गी दाना पानी पड़ने से खराब हो रहा था  सुखवंत सिंह ने बताया कि वह पहले भी पुलिस कर्मियों का पैसे लेते स्टिंग कर चुके है  | उन्होंने बताया कि अब तक सात-आठ पुलिस कर्मियों का स्टिंग कर शिकायत कर चुके हैं और पैसे लेने वाले सभी पुलिस कर्मी फिलहाल बर्खास्त हैं | अब इस मामले में जांच चल रही है  |

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Dakhal News 1 November 2019


कांतिलाल भूरिया विजयी

  कमलनाथ सरकार पर जनता को पूरा भरोसा   झाबुआ उपचुनाव में जीत का सहारा कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया के सिर बंधा है  ... कांतिलाल भूरिया ने बीजेपी के भानु भूरिया को शिकस्त दी और अपनी जीत का श्रेय कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के कामों को दिया  ...   झाबुआ के भूरिया वर्सेस भूरिया में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने बीजेपी के भानु भूरिया को हरा दिया  | मतगणना में कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया लगातार बढ़त बनाए रहे   ...   भूरिया ने कहा कि ये  कमलनाथ सरकार पर जनता का भरोसा है  |  मैंने हमेशा झाबुआ के विकास पर ध्यान दिया  |बीजेपी ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन वे उनकी इस चाल को समझ गए  | उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी का नेतृत्व बहुत ही सख्त है और पूरे देश की कांग्रेस एकजुट हो गई है राहुल जी और प्रियंका जी सब मिलकर कांग्रेस को और मजबूत कर रहे हैं  भूरिया ने कहा कि भाजपा ने 15 साल तक मध्यप्रदेश के लोगों के लिए कुछ नहीं किया और कांग्रेस की सरकार आते ही जनता के लिए कितनी चीजें की गईं  | किसानों का कर्जा माफ हो गया  |   कांतिलाल भूरिया की विजय से  कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर दौड़ गई है  | कांतिलाल जहां-जहां भी जा रहे हैं उनका स्वागत किया जा रहा है उनके समर्थकों ने पटाखे फोड़कर   जीत और दीपावली का जश्न शुरू कर दिया  | सीएम कमलनाथ ने भी कांतिलाल भूरिया को बधाई दी है मंत्री पीसी शर्मा ने भी कहा कि यह कमलनाथ सरकार पर जनता का भरोसा है | हमने सरकार बनने के बाद जो काम किया वह जनता को पसंद आया है  |  

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Dakhal News 25 October 2019


विधानसभा उपचुनाव

  बस्तर संभाग की12 विधानसभा सीटों पर  कांग्रेस   चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ने शानदार जीत हासिल की है | कांग्रेस प्रत्याशी राजमन बेंजाम ने 17853 मतों से जीत हासिल की है  कांग्रेस प्रत्याशी की इस जीत के साथ ही बस्तर क्षेत्र की सभी 12 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है |   चित्रकोट में मुख्य मुकाबला कांग्रेस-भाजपा उम्मीदवारों के बीच था | उपचुनाव की मतगणना सुबह आठ बजे से जगदलपुर के धरमपुरा स्थित महिला पॉलीटेक्निक कॉलेज में हो रही थी और यहां शुरुआती चरण से ही कांग्रेस प्रत्याशी राजमन बेंजाम ने बढ़त बनाकर रखी | इस जीत के साथ ही कांग्रेस खेमे में उत्साह का वातावरण है| कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष मोहन मरकाम भी जगदलपुर पहुंच गए हैं अपनी जीत के बाद बेंजाम ने कहा की कांग्रेस की रीतिनीति और भूपेश बघेल सरकार ने जो काम किये हैं उससे मतदाता प्रभावित हुआ है |    चुनाव मैदान में छह प्रत्याशियों की किस्मत दांव पर लगी  थी | इनमें कांग्रेस से राजमन बेंजाम, भाजपा से लच्छूराम कश्यप, सीपीआइ से हिड़मोराम मंडावी, जकांछ से बोमड़ाराम मंडावी और निर्दलीय लखेश्वर कवासी व रितिका कर्मा शामिल हैं |  

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Dakhal News 24 October 2019


NIA नक्सली

  झीरम कांड में शामिल थे ये सभी नक्सलवादी   पांच साल पहले दरभा के झीरम में नरसंहार करने वाले नक्‍सली नेताओं का पोस्‍टर अब गांव-गांव में चस्‍पा हो रहे हैं | इनकी खबर देने वालों के नाम गोपनीय रखे जायेंगे और उन्हें बड़ा  इनाम भी दिया जाएगा |    25 मई 2013 में झीरम घाटी में नक्‍सलियों ने कांग्रेस की रैली पर हमला कर सीनियर व टॉप लीडरों सहित 32 लोगों की हत्‍या की थी |  पांच साल बाद भी इसके मुख्‍य आरोपी अब भी पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं | अब एनआईए ने झीरम के मोस्‍ट वांटेड नक्‍सलियों के पोस्‍टर अंदरूनी गांव में चस्‍पा कर संबंधितों को पकड़वाने की अपील की हैं  इन नक्सलियों के बारे में पुख्ता जानकारी देने वाले को इनाम भी दिया जाएगा | कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान दरभा के करीब झीरम घाटी में नक्‍सलियों ने हमला किया था | इसमें कांग्रेस नेता  नंदकुमार पटेल सहित उसके पुत्र, महेंद्र कर्मा, विद्या चरण शुक्‍ल और अन्‍य नेता व आम नाम नागरिक, सुरक्षा में लगे नेताओं के अंगरक्षक मारे गए थे | जिसकी जांच के लिए स्‍थानीय स्‍तर से लेकर एसआईटी अैर एनआईए जैसी एजेंसी को नियुक्‍त किया गया | अब यह जांच एजेंसी वारदात में शामिल वांटेड नक्‍सलियों की तस्‍वीर लगे पोस्‍टर गांव- गांव में चस्‍पा कर रही है | पोस्‍टर में ग्रामीणों से अपील की जा रही है कि संबंधितों की सूचना देने पर इनाम मिलेगा और नाम भी गोपनीय रखा जाएगा  पोस्‍टर के मुताबिक अलग- अलग नक्सलियों पर अलग अलग इनाम है |     

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Dakhal News 23 October 2019


naxali surrender

  जंगल छोड़कर मुख्‍यधारा में आना चाहते हैं नक्सली   आत्‍मसमर्पित इनामी नक्‍सली राजू मिड़कोम की अपील का असर कटेकल्‍याण इलाके में दिखने  लगा है  | राजू की अपील पर  चार इनामी सहित 28 नक्‍सलियों ने आत्म समर्पण किया  | नक्‍सलियों ने मौजूद अधिकारी और ग्रामीणों से वायदा किया है कि वे अब मुख्‍यधारा में जुड़कर जनहित और क्षेत्र विकास के लिए काम करेंगे  |    सरकार की नीतियों का असर और नक्सलवादियों के अपने साथियों के साथ किये जा रहे अमानवीय व्यवहार के कारण नक्सली अब मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं  एक पूर्व  नक्सली की अपील पर 28 नक्सलवादियों ने समर्पण कर दिया  | समर्पण करने वाले नक्‍सलियों में एक मंगलू पिता मासे मड़कामी 26 नंबर प्‍लाटून का सदस्‍य है जिस पर दो लाख रूपए का इनाम था  | इसी तरह तीन अन्‍य इनामी नक्‍सलियों में कटेकल्‍याण एलएसओ सदस्‍य बामन पिता मांझी कवासी, एलजीएस सदस्‍य हांदा   और सीएनएम कमांडर पोडि़यामी गंगी   पर एक- एक लाख रूपए का इनाम था  |    समर्पण  करने वाले अन्‍य 24 जनमिलिशिया सदस्‍य हैं |इन सभी ने राजू मिड़कोम के समर्पण और उसकी बातों को सुनने के बाद शांति की जिंदगी जीने के लिए पुलिस के समक्ष समर्पण किया  |  समर्पण करने वाले इनामी नक्‍सलियों को अधिकारियों ने दस- दस हजार रूपए के प्रोत्‍साहन राशि का चेका सौंपा  |  इस दौरान एसपी डॉ अभिषेक पल्‍लव, सीईओ जिला पंचायत सच्चिदानंद आलोक, सीआरपीएफ के डीआईजी डीएन लाल मौजूद थे  |   

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Dakhal News 23 October 2019


hotel me aag

  होटल में फंसे लोग बमुश्किल बचाए गए   इंदौर के विजय नगर क्षेत्र में स्थित गोल्डन गेट होटल में सोमवार सुबह अचानक आग लग गई  | देखते ही देखते इसने भीषण रूप ले लिया  घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई  होटल में  मौजूद लोंगों को बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला गया  | दर्जनों गयर ब्रिगेड भी घंटों की मश्शकत के बाद आप पर जैसे तैसे काबू पा सकीं | बताया जा रहा है आग शार्ट सर्किट के कारण लगी  |  विजय नगर क्षेत्र में स्थित गोल्डन गेट होटल में अचानक आग लगी  | जब तक कोई कुछ समझ पाता आग ने विकराल रूप धारण कर लिया   ... होटल स्टाफ ने होटल में ठहरे लोगों को जैसे तैसे बाहर निकाला  |  कुछ लोगों  अंदर ही फंसे  रह गए  | ऐसे में होटल का अगला हिस्सा धूं  धूं कर जलने लगा   ...  सूचना मिलने के बाद 4 फायर ब्रिगेड की गाड़ियां   पहुंच गईं और आग पर काबू पाने की कोशिश शुरू की  | लेकिन इससे कुछ नहीं हुआ पूरा होटल आग की आगोश में था  | फायर फाइटर्स  | स्थानीय लोगों और कुछ पुलिस जवानों ने पास की बिल्डिंग से होटल में सीढ़ी लगाकर होटल में फंसे लोगों को निकालने का काम शुरू किया  | लोगों को बचाने में इन लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी  |  एक व्यक्ति को रेस्क्यू करने का एक वीडियो वायरल हो रहा है  जिसमें सीढ़ियों के सहारे एक बुजुर्ग को आग से धधकती होटल से बाहर निकाला गया  |    होटल आग के शोले में तब्दील हो गया था  | काफी मशक्कत के बाद भी आग पर काबू नहीं पाया जा सका  होटल से लगी दूसरी इमारतों को भी खाली करवा लिया गया है  | आग की लपटें होटल में नीचे से ऊपर तक फैल गईं  | आशंका जताई जा रही है कि आग शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी है बताया जा रहा है कि होटल का ज्यादातर हिस्सा लकड़ी से बना हुआ था  | इसकी वजह से  आग  बहुत तेजी से फैल गई  | आग पर काबू पाने के लिए फायर ब्रिगेड की टीम लगातार लगी रहीं  नगर निगम के पानी के टैंकर भी मौके पर पहुंचते रहे और फायर ब्रिगेड की मदद करते रहे  | घटना के बाद वहां आस-पास भीड़ जमा हो गई थी  आग की वजह से पूरे क्षेत्र में धुंआ फैल गया था  उधर बिल्डिंग के पिछले हिस्से को फायर ब्रिगेड और नगर निगम की टीम ने तोड़ा और अंदर के हिस्से में पहुंची और फिर पीछे और होटल के आगे दोनों तरफ से आग बुझाने के प्रयास शुरू हुए  | घंटों की मशक्क्त के बाद आग पर काबू पाया जा सका  इस आग के कारण होटल के आस पास के भवनों को भी काफी नुक्सान पहुंचा हैं  |  

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Dakhal News 23 October 2019


अमनदीप शहीद

  अमनदीप जोधपुर रेजीमेंट  में था पदस्थ   जोधपुर रेजीमेंट की 126 बटालियन में तैनात ग्वालियर के जवान अमनदीप किरार का ड्यूटी के दौरान निधन हो गया  ... उनका पार्थिव शरीर ग्वालियर लाया गया |  सैनिक सम्म्मान के साथ उनकी अंतेष्टि की गई   |   ग्वालियर  का अमनदीप किरार जोधपुर रेजीमेंट की 126 बटालियन में तैनात था  |  14 तारीख  की सुबह  सेना के इस 21 वर्षीय  नौजवान का आकस्मिक निधन  हो गया  | निधन के समय अमनदीप ऑन ड्यूटी थे | हॉकी खेलते समय उसके सीने में दर्द हुआ  इसके बाद उन्हें  जोधपुर एमएच हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया  | जहाँ उसके इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई  | अमनदीप कुछ दिनों पहले लेह में पोस्टेड था दो दिन पहले ही अमनदीप  रेजीमेंट में पोस्टिंग होकर आया  था  | भारतीय सेना के जवान  शहीद जवान अमनदीप किरार का पार्थिव शरीर ग्वालियर लेकर आये   जहाँ  खुरेरी  श्मशान में शहीद जवान के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि की गई  |      

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Dakhal News 17 October 2019


आँख में चींटियां

  घंटों अस्पताल के बेड पर पड़ा रहा शव शव को पर रेंगती रहीं चीटियां   स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट जी मध्यप्रदेश के अस्पताल और उनका प्रबंधन बीमार पड़ा है इस जल्दी ठीक कीजिये |  अब  शिवपुरी  से मानवता को शर्मसार करने वाली खबर आई है अस्पताल के मेडिकल वार्ड में घंटों एक शव पड़ा रहा  | शव पर चींटियां लग गईं  लेकिन इसकी सुध किसी ने नहीं ली आपके अस्पताल और वहां काम करने वालों की संवेदनायें मर गई हैं |    शिवपुरी का जिला अस्पताल कभी काम के मामले में नंबर वन था |  लेकिन अब यहाँ संवेदनाएं मर चुकी हैं  भावनाओं का क़त्ल कर दिया गया है  इस दृश्य को देखिये इन आँखों को देखिये स्वास्थ्य मंत्री जी शायद आपकी आँखें खुला जाएँ | ये एक शव की आँखें हैं | यह शव अस्पताल के बेड पर घंटों पड़ा रहा लेकिन अस्पताल प्रबंधन को क्या  पलंग पर चढ़ते हुए चींटियों ने इस शव पर कब्ज़ा कर लिया | चींटियां शव की आँखों में पहुंच गई लेकिन आपके विभाग के संवेदनहीं स्टाफ को इससे क्या लेना देना | इस शख्स की मौत कब हुई किसी को कुछ पता नहीं | मेडिकल वार्ड के पलंग पर शव  की  आंख पर चीटियां रेंगती नजर आने लगीं |  तब लोगों ने स्टाफ को बताया लेकिन तब भी किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया | जिला अस्पताल इसे साधारण मौत बता रहा है, लेकिन इंसानियत के नाम पर यह घटना शर्मसार करने वाली है | मरीज ने जब दम तोड़ा, तब उसके साथ कोई परिजन मौजूद नहीं था फक्कड़ कॉलोनी में रहने वाले बालचंद्र लोधी  इलाज के लिए दो दिन पहले जिला अस्पताल के मेडीकल वार्ड में भर्ती हुए थे | उनकी कब मौत हुई किसी को पता नहीं  आसपास के मरीजों ने दिन में  अस्पताल के स्टाफ को  इस की जानकारी दी इस घटना की जानकारी मृतक की पत्नी  रामश्री को  मिलने के बाद  वह अस्पताल  पहुंची | मौके पर मौजूद मरीजों के मुताबिक ऐसे में रामश्री ने ही पल्लू से चीटियां आंख से हटाईं  बाद में अपने पति के शव को जैसे-तैसे मरीजों के सहयोग से  वो घर लेकर गई मंत्री तुलसी सिलावट जी अगर आप इस तरह वक्त  बदलना चाहते हैं  तो इस पर लानत है |     

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Dakhal News 16 October 2019


alok bayan

   नगर निगम के बंटवारे पर राजनैतिक बवाल   भोपाल नगर निगम को दो भागों में बांटकर शहर विकास किए जाने की कवायदें की जा रही हैं, मगर इसे लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच तलवारें खींच गई हैं | महापौर और भारतीय जनता पार्टी के पार्षद दल इसे लेकर कलेक्टर से मिलने गए  | इसके पूर्व पार्षद दल ने इस बंटवारे का विरोध करते हुए  कहा कि इस बंटवारे से भोपाल का बंटाढार हो जाएगा और  विकास भी प्रभावित होगा |   नगर निगम की दृष्टि से भोपाल को दो हिस्सों में बाँटने पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जाहिर की है भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि भोपाल को दो भागों में बांटने से शहर का विकास रूक जाएगा  | दो भागों में बांटने से जनता को असुविधा होगी  | लोगों को जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र बनाने के लिए काफी दूर जाना होगा  | विकास के कई कार्य भोपाल को दो भागों में बांटे जाने से प्रभावित होंगे  | आज बीजेपी के पार्षद महापौर अलोक शर्मा के साथ बस में बैठकर कलेक्टरेट पहुंचे और अपनी आपत्ति दर्ज करवाई  |    पार्षदों का कहना था कि यदि इस मामले में न्यायालय भी जाना पड़ेगा तो वे न्यायालय जाएंगे  गौरतलब है कि भाजपा पार्षदों और पार्टी के अन्य नेताओं ने कहा है कि दो नगर निगम बनने के बाद, केंद्र की हाउसिंग फॉर ऑल  स्कीम का लाभ भी जनता को नहीं मिल पाएगा   कहा जा रहा है कि पुराने शहर में जमीन की उपलब्धता काफी कम है ऐसे में कई आवासीय प्रोजेक्ट अटके हुए हैं  | शहर के बाणगंगा क्षेत्र में भी आवासीय योजना के लिए कार्य किया गया तो इसके लिए बहुत दूरी पर जमीन मिल सकेगी  ऐसे में लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है  |  

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Dakhal News 15 October 2019


pm modi

  बेटियों के अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए हरियाणा के चरखी दादरी में  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा को संबोधित किया |  उन्होंने कहा कि इस बार की दिवाली दो तरह की है  एक दीपों वाली दिवाली और एक 'कमल' वाली दिवाली  हमें इस बार दिवाली को हमारी बेटियों को समर्पित करना चाहिए और उनके अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा इस बार की दिवाली बेटियों को समर्पित करना चाहिए और उनके अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि 'मैं हरियाणा में चुनावी रैलियों के लिए नहीं आया हूं | मैं हरियाणा में भाजपा के लिए कैंपेन नहीं कर रहा हूं  हरियाणा ने खुद मुझे बुलाया है |  मैं खुद को यहां आने से नहीं रोक सका हूं  | आप लोगों मुझे इतना ज्यादा प्यार दिया है |  हरियाणा में 21 अक्टूबर को मतदान होना है |  ऐसे में राजनीतिक दलों के पास अब प्रचार के लिए एक हफ्ते से भी कम का वक्त रह गया है। यही वजह है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है | भाजपा की ओर से खुद पीएम मोदी ने कमान संभाली हुई है तो वहीं कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी जनता के बीच जाकर भाजपा के खिलाफ  राफेल उड़ा  रहे हैं |        

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Dakhal News 15 October 2019


pm modi

  बेटियों के अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए हरियाणा के चरखी दादरी में  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा को संबोधित किया |  उन्होंने कहा कि इस बार की दिवाली दो तरह की है  एक दीपों वाली दिवाली और एक 'कमल' वाली दिवाली  हमें इस बार दिवाली को हमारी बेटियों को समर्पित करना चाहिए और उनके अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा इस बार की दिवाली बेटियों को समर्पित करना चाहिए और उनके अचीवमेंट को सेलिब्रेट करना चाहिए इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि 'मैं हरियाणा में चुनावी रैलियों के लिए नहीं आया हूं | मैं हरियाणा में भाजपा के लिए कैंपेन नहीं कर रहा हूं  हरियाणा ने खुद मुझे बुलाया है |  मैं खुद को यहां आने से नहीं रोक सका हूं  | आप लोगों मुझे इतना ज्यादा प्यार दिया है |  हरियाणा में 21 अक्टूबर को मतदान होना है |  ऐसे में राजनीतिक दलों के पास अब प्रचार के लिए एक हफ्ते से भी कम का वक्त रह गया है। यही वजह है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है | भाजपा की ओर से खुद पीएम मोदी ने कमान संभाली हुई है तो वहीं कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी जनता के बीच जाकर भाजपा के खिलाफ  राफेल उड़ा  रहे हैं |      

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Dakhal News 15 October 2019


Mukundpur White Tiger

  शेरनी ने दिया तीन  शावकों को जन्म   सतना  के मुकुंदपुर में बने व्हाइट टाइगर सफारी में 3 नए सदस्यों का आगमन हुआ है | मुकुंदपुर में  एक शेरनी ने 3 शावकों को जन्म दिया है | हालांकि एक शावक की हालत गंभीर बनी हुई है |    व्हाइट टाइगर सफारी में एक शेरनी ने तीन शावकों को जन्म दिया है | दो शावक घूमफिर कर अपनी मां से लिपट जाते हैं | जबकि एक का स्वास्थ्य थोड़ा गड़बड़ है | तीनों शावक अपनी मां के साथ बाड़ी में हैं | शावकों पर सीसीटीवी कैमरे से नजर रखी जा रही है | शावकों के पास जाने पर शेरनी हिंसक होने लगती है | ऐसे में शावक फिलहाल शेरनी के पास ही रखे गए हैं | वन विभाग का अमला इन शावकों और शेरनी की देखरेख में लगा है शावकों के जन्म के बाद शेरनी की खुराक में बढ़ोतरी की गई है और उनकी नियमित जांच भी की जा रही है | रीवा से दुनिया भर में भेजे गए बाघों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन आखिरी बाघ के रूप में 8 जुलाई 1976 को विराट नाम के बाघ की मौत के बाद सफेद बाघों के बिना ही जंगल रहे सतना और रीवा जिले की सीमा पर स्थित मांद रिजर्व क्षेत्र मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी बनाई गई, यहां पर भोपाल के वन विहार से 9 नवंबर 2015 को सफेद बाघिन विंध्या लाई गई |  वर्तमान में मुकुंदपुर सफारी और चिडिय़ाघर में सफेद बाघों  के  दो  जोडे  हैं | साथ ही तीन यलो टाइगर के साथ ही एक जोड़ा लायन भी है  ...  व्हाइट टाइगर सफारी को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी अब मुकुंदपुर पहुंचने लगे हैं | रीवा की धरती से सफेद शेर मोहन के वंशज दुनिया के कई देशों में भेजे गए | जहां भी सफेद शेर हैं वे कहीं न कहीं मोहन के वंशज ही हैं |   

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Dakhal News 12 October 2019


सट्टा जुलुस

  सट्टा खेलना पाप है, पुलिस हमारी बाप है   राजगढ़ की ब्यावरा पुलिस ने  11 सटोरिए पकडे और उनका  जुलूस निकालकर उनसे सड़कों पर नारे लगवाए | कि सट्टा खेलना पाप है, पुलिस हमारी बाप है  पुलिस का तर्क है कि ऐसा करने से सटोरियों में खौफ पैदा होगा  |   ब्यावरा सिटी पुलिस ने मातामंड क्षेत्र में 11 सटोरियों को गिरफ्तार किया | इस दौरान दो  आरोपी  भाग गए  | पुलिस ने मौके से लेकर थाने तक इन सटोरियों का जुलूस निकाला और उनसे नारे लगवाए 'सट्टा खेलना पाप है, पुलिस हमारी बाप है"  | सिटी थाना प्रभारी डीपी लोहिया के मुताबिक खाईबाज फुरकान खां के घर दबिश देकर वहां से 11  सटोरियों को गिरफ्तार किया  |इस दौरान फुरकान और तौफीक भाग गए मौके से 4250 रुपए कैश और 3 लाख 20 हजार 520 रुपए की सट्टा पर्चियां जब्त की हैं  | उन्होंने बताया कि इन आरोपियों से नारे इसलिए लगवाए हैं, ताकि लोगों को सीख मिले कि सट्टा एक अनैतिक कृत्य है  | इसके माध्यम से समाज और परिवार के बीच बिखराव हो रहा है पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने जिले के सभी  थाना प्रभारियों को सटोरियों के विरूद्ध कार्यवाही करने के लिए कहा  है  |

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Dakhal News 11 October 2019


जुएं पुलिस और बंदर

  थानाध्यक्ष के कंधे पर बैठा बंदर जुएं बीनने लगा   अब बात वीडियो वाइरल की  आपने बंदरों को जुएं बीनते तो देखा होगा लेकिन हम जिस बंदर की बात कर रहे हैं |  ये बंदर पुलिस स्टेशन में पहुंचकर थानेदार के कंधे पर बैठ कर जुएं बीनता है |  उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के थानेदार और बंदर का यह वीडिओ जमकर वायरल हो रहा है |    पीलीभीत में  एक बंदर थानाध्यक्ष के कंधे पर आकर बैठ गया और फिर सिर से जुएं बीनने लगा | जिसने भी ये देखा उसकी हंसी  नहीं रुकी  दरअसल थानाध्यक्ष श्रीकांत द्विवेदी अपनी कुर्सी पर बैठकर जरूरी काम निपटा रहे थे |  तभी थाने में एक बंदर आ धमका | कुछ देर इधर-उधर उछलकूद मचाने के बाद बंदर थानाध्यक्ष की कुर्सी के पास पहुंचा  | उन्होंने उसे भगाने की कोशिश की  लेकिन वो नहीं भागा और सीधे उनके कंधे पर आकर बैठ गया | इसके बाद बंदर उनके सिर पर चढ़ गया और जुएं बीनने लगा | कमरे में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने बंदर की इस हरकत का एक वीडियो बना लिया | जिसे बाद में यूपी पुलिस के एडिशनल एसपी राहुल श्रीवास्तव ने अपने ट्वीटर अकाउंट पर शेयर कर दिया | शेयर करते ही ये वीडियो वायरल हो गया  हैरान करने वाली बात यह है कि जिस वक्त बंदर थानाध्यक्ष के सिर से जुएं बीन रहा था, उस वक्त वो बड़े आराम से अपना काम कर रहे थे  ऐसा लगा ही नहीं कि वो बंदर से परेशान है | वीडियो में सुना भी जा सकता है कि वो बार-बार बंदर से नीचे उतरने के लिए कहते हैं |  लेकिन बंदर अपनी ही धुन में जुएं बीनने में लगा हुआ नजर आ रहा है हालांकि कुछ देर बाद वो उतरकर चला गया |   

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Dakhal News 10 October 2019


पुलों का काम बंद

  मध्यप्रदेश में 250 पुलों के  निर्माण पर संशय   आर्थिक संकट से जूझ रही मध्य प्रदेश सरकार के पास विकास कार्यों के लिए भी पैसा नहीं बचा है  इसका बड़ा असर लोक निर्माण विभाग द्वारा कराए जाने वाले निर्माण कार्यों पर पड़ रहा है | अब मध्यप्रदेश में करीब 250 पुल के निर्माण पर भी संशय बना हुआ है  |   कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपना अधिकाँश समय मध्यप्रदेश की  पूर्व  बीजेपी सरकार को कोसने में निकाल दिया है  | इस दौरान आर्थिक मोर्चे पर जो काम किये जाने थे वो सरकार कर नहीं पाई  | ऐसे में सरकार के कुछ निर्णय सरकार पर ही भारी पड़ गए और मध्यप्रदेश के आर्थिक हालात पहले से भी बदतर हो गए | हालात इतने विषम हैं की  पुल निर्माण को लेकर बीते चार माह से भुगतान के लिए ठेकेदार परेशान हो रहे हैं  सूत्रों की मानें तो अब तक प्रोजेक्ट राशि का महज 30 प्रतिशत ही भुगतान निर्माण कंपनियों व ठेकेदारों को हुआ है  इससे निर्माण कार्यों पर असर पड़ना शुरू हो गया है  |प्रदेश सरकार ने जून माह में 5,540 करोड़ के पुल निर्माण को स्वीकृति दी थी | प्रदेश के बड़े शहरों में शामिल भोपाल में 5, इंदौर में 6 और जबलपुर व छिंदवाड़ा में दो-दो फ्लाईओवर का निर्माण प्रस्तावित है | इसके अलावा सरकार ने आगामी पांच वर्षों में प्रदेश में 400 वृहद व मध्यम पुल 55 रेलवे ओवरब्रिज    और 17 फ्लाईओवर के निर्माण की भी घोषणा की थी  | इन कामों को करने की बात आर्थिक संकट में दब गई है प्रदेश में इस बार तेज बारिश में सड़कों को भारी नुकसान हुआ है | प्रदेश सरकार के निर्देश पर लोक निर्माण विभाग ने सड़कों का सर्वे कर खाका तैयार किया है  उधर, सड़क सुधार के लिए ही प्रदेश सरकार ने केंद्र से 1,188 करोड़ रुपए की मांग की है  |      

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Dakhal News 7 October 2019


पम्प पर सांप

  सांप इधर-उधर भागता रहा ,बाद में पकड़ा गया   पेट्रोल भराने को लेकर जब मारा-मारी हो रही थी  तभी पंप पर एक सांप आ गया | थोड़ी  मशक्कत के बाद पेट्रोल पंप पर निकला सांप पकड़ में आया इसके बाद लोगों के चैन की सांस ली यह वाकया इंदौर का है | मध्य प्रदेश में ट्रांसपोर्टर्स और टैंकर संचालकों की हड़ताल से आम जनजीवन प्रभावित होने लगा है  | हड़ताल के चलते रोजमर्रा की चीजें लोगों तक आसानी से नहीं पहुंच पा रही है |हड़ताल के चलते पेट्रोल-डीजल की किल्लत होने लगी है  पेट्रोल की कमी के चलते  पेट्रोल पंप पर गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं  इसी बीच  गांधीनगर इलाके में पेट्रोल पंप पर सांप निकल आया  | सांप देखते ही सबके होश फाख्ता हो गए  | पहले से ही पेट्रोल-डीजल के लिए परेशान हो रहे लोग पंप पर सांप देखकर घबरा गए | इसके बाद पंप संचालक ने सांप पकड़ने की कोशिश शुरू की | लेकिन कभी सांप इधर भागता तो कभी उधऱ  | थोड़ी   मशक्कत के बाद सांप पकड़ में आया  | इसके बाद पंप पर हालात सामान्य हुए  |

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Dakhal News 7 October 2019


मंत्री पीए लूट

  कांग्रेस के राज में गुंडों के हौंसले बुलंद     इंदौर-अहमदाबाद हाईवे पर  डकैतों ने परिवार सहित झाबुआ जा रहे मंत्री पीसी शर्मा के पीए आनंद भट्ट के साथ लूटपाट की | डकैतों ने भट्ट परिवार के साथ मारपीट भी की | इस घटना से साफ़ पता चलता है कि कांग्रेसराज में  बार फिर मध्यप्रदेश में अपराधी के हौंसले बुलंद हो गए हैं |   मध्यप्रदेश में कांग्रेस शासन में एक बार फिर अपराधियों का बोलबाला हो गया है | लुटेरे ,डकैत और बदमाश लगातार वारदातों को अंजाम दे रहे हैं | और सरकार कुछ कर नहीं पा रही इंदौर-अहमदाबाद हाईवे पर देडकैतों ने परिवार सहित झाबुआ जा रहे मंत्री पीसी शर्मा के पीएम आनंद भट्ट के साथ लूटपाट की  धार जिले के तिरला थाना क्षेत्र में प्रवीण पेट्रोल पंप के पास डकैतों ने आनंद की कार को रापी लगाकर पंक्चर कर दिया  | इसके बाद  डकैतों ने आनंद की पत्नी नीलू भट्ट, बेटी नूपुर और ड्राइवर के साथ मारपीट की और सोने-चांदी के जेवर, टॉप्स, गले की चेन, दो हाथ घड़ी, सोने के मंगलसूत्र और 10 हजार नगद सहित करीब 3 से 4 लाख का सामान लूट ले गए  मंत्री के पीए के साथ हुई इस घटना के बाद यहां हड़कंप मच गया है  | पहले भी इस इलाके में ऐसी वारदातें होती रही हैं | आनंद भट्ट और उनके परिवार ने पुलिस को बताया कि वे पूजन करने के लिए भोपाल से झाबुआ जा रहे थे  | इसी दौरान धार जिले में रास्ते में उनकी इनोवा कार का टायर अचानक पंक्चर हो गया   इसके बाद ड्राइवर नीचे उतरा और टायर बदलने लगा।  इसी दौरान वहां 5 से 6 बदमाश आ गए और हमें धमकाने लगे  | इसके बाद उन्होंने आनंद भट्ट की पत्नी, बेटी के पर्स, जेवर और सूटकेस लेकर फरार हो गए |  

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Dakhal News 6 October 2019


Robot Sophia

  लोगों को मजेदार जवाब दिए सोफिया ने     इंदौर शहर में चल रहे इंटरनेशनल राउंड स्क्वेयर कांफ्रेंस में दुनिया की पहली रोबोट नागरिक सोफिया शामिल हुईं  | सोफिया ने मंच शेयर किया और लोगों दे बातचीत कर उन्हें लाजवाब कर दिया |    इंटरनेशनल राउंड स्क्वेयर कांफ्रेंस में दुनिया की पहली रोबोट नागरिक सोफिया शामिल हुईं  | सोफिया को अक्टूबर 2017 में सऊदी अरब की नागरिकता दी गई थी  |  सोफिया ने छात्रों के सवालों के जवाब भी दिए  |  इस  खास गेस्ट को देखने के लिए कांफ्रेंस में मौजूद हर व्यक्ति उत्साहित नजर आ रहा था  |   स्टेज पर जब उनसे सवाल पूछे गए तो सोफिया ने अपने ही अंदाज में उसके जवाब दिए, कुछ जवाबों ने वहां मौजूद लोगों को हंसने पर मजबूर कर दिया |   हैनसन रोबोटिक्स ने ह्यूमनॉएड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रोबोट सोफिया को तैयार किया था, जब उन्हें सऊदी अरब की नागरिकता दी गई थी तो उन्होंने खुद इसी घोषणा की थी और कहा था कि मैं अपनी पहचान पाकर काफी सम्मानित महसूस कर रही हूं  | सोफिया हमेशा यही चाहती है कि वह आम लोगों के साथ रहे और उन्हें समझे इसके साथ ही मनुष्य की तरह की भावनाएं भी प्रकट कर पाए  |    इंटरनेशनल राउंड स्क्वेयर कांफ्रेंस में कई जानी-मानी हस्तियां शामिल हो रही हैं  | कांफ्रेंस में 55 देशों के करीब एक हजार छात्र-छात्राएं देश-विदेश से शामिल होने आए हैं  इस कार्यक्रम में  कैलाश सत्यार्थी ने कहा - जीवन को बेहतर करने के लिए तीन डी यानी थ्री डी का ध्यान रखना बहुत जरूरी है  सबसे पहले डी को ड्रीम माने  इसके लिए हमें बड़ी सोच रखनी होगी  |  इसी के हिसाब से हमें तैयारी करनी होगी  दूसरा डी डिस्कवर है  | सपनों को साकार करने के लिए अपनी क्षमताओं को पहचानें   तीसरा डी डू है  आप खुद को कभी कमजोर या किसी का जैसा होने का अहसास न करें  |  

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Dakhal News 5 October 2019


कमलनाथ बंगला

  अब मध्यप्रदेश भवन में रहेंगे कमलनाथ   एमपी के मुख्यमंत्री कमलनाथ  को  दिल्ली का अपना दो दशक से भी ज्यादा पुराना बंगला  छोड़ना पड़ा है  | अब वह मध्य प्रदेश भवन में शिफ्ट हो गए हैं  दिल्ली आने पर अब वे वहीं रुकेंगे | बतौर मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश भवन में पहले से ही उनके लिए एक बड़ा सुइट आरक्षित था  |   कमलनाथ को सांसद और केंद्रीय मंत्री होने के नाते दिल्ली के तुगलक रोड पर बँगला मिला हुआ था  | अब जब कमलनाथ सांसद भी नहीं रहे हैं तो उन्हें वः बँगला खाली करना पड़ा है  | कमलनाथ का यह एक नंबर का बंगला दिल्ली के तुगलक रोड पर था  |  बतौर छिंदवाडा सांसद 1998 में यह बंगला उन्हें मिला था  |  बाद में वह इसी बंगले में रहते हुए केंद्र में मंत्री भी बने वह इसी बंगले से प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने, तब भी वह उसी बंगले में रहे  दो दशकों के बीच यह बंगला कमलनाथ की पहचान बन गया था  | लोग इसे उनके स्थाई ठिकाने के रूप में जानने लगे थे  | यह बँगला  उनके जीवन के कई सारे उतार-चढाव का गवाह भी  रहा  |  मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने और छिंदवाड़ा की लोकसभा सीट से इस्तीफा देने के बाद ही यह तय हो गया था कि अब यह बंगला ज्यादा दिन उनके पास नहीं रहेगा  |  हालांकि अब तक वह इसे अपने पास रखे हुए थे, लेकिन गुरुवार को उन्होंने इसे केंद्रीय लोक निर्माण विभाग  को सौंप दिया  |वहीं मुख्यमंत्री के मध्य प्रदेश भवन में शिफ्ट होते ही भवन में हलचल बढ़ गई है  वरिष्ठ अधिकारियों ने इस दौरान भवन की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक मीटिंग भी की है  | बता दें कि इससे पहले मध्य प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी लोकसभा चुनाव में हार के बाद सालों पुराने अपने बंगले को खाली कर दिया था |   

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Dakhal News 4 October 2019


कश्मीर -अमित शाह

  वंदे भारत एक्सप्रेस से विकास की शुरुआत   कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद केंद्र सरकार प्रदेश का ज्यादा से ज्यादा विकास करने की कोशिश में है | दिल्ली में कटरा वंदे भारत ट्रेन का उद्घाटन करने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कश्मीर के विकास को लेकर बड़ा बयान दिया है | अमित शाह ने कहा कि जम्मू कश्मीर का अनुच्छेद 370 की वजह से विकास रुका हुआ था | अब वहां से अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर अगले दस सालों में देश के सबसे विकसित राज्यों में से एक बन जाएगा |   वन्दे भारत ट्रेन का उद्घाटन करने के बाद  गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन के दौरान कश्मीर और आर्टिकल 370 का जिक्र करते हुए कहा कि 'कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के पहले राज्य के विकास के बीच में कई रोड़े थे | अगले 10 सालों में जम्मू कश्मीर सबसे ज्यादा विकसित राज्यों में से एक बन जाएगा | वंदे भारत एक्सप्रेस की शुरुआत के साथ राज्य के विकास की शुरुआत हो गई है | इस ट्रेन की मदद से राज्य में पर्यटन को बढ़ावा मिल सकेगा |   कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने संकल्प पत्र के जरिये 5 अगस्त को बेअसर कर दिया था | इसके बाद राज्य में हालातों को काबू में रखने के लिए बड़ी संख्या में सेना को तैनात किया गया है | अफवाहों की वजह से हिंसा ना भड़के इसलिए शुरुआती दौर में संचार सेवाएं भी अस्थाई तौर पर बंद कर दी गई थी हालांकि अब घाटी की जिंदगी दोबारा पटरी पर आने लगी है |  

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Dakhal News 3 October 2019


Gondwana Express

  आधा दर्जन से ज्यादा यात्री हुए  घायल   सोमवार देर रात जबलपुर से हजरत निजामुद्दीन जा रही गोंडवाना एक्सप्रेस ग्वालियर में  रायरू के पास ट्राले से टकरा गई  |  यह हादसा ट्रोला चालक की गलती से हुआ और वो मौके पर ट्रोला छोड़कर भाग गया | इस हादसे ने तक़रीबन दस यात्री घायल हो गए  | इनमे कुछ की हालत गंभीर बानी हुई है  |   ये हादसा ट्राले के ड्राइवर की लापरवाही से हुआ और इसके बाद वो मौके से भाग गया  |  हादसे की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंचीं और घायलों को एंबुलेंस की मदद से जयारोग्य अस्पताल पहुंचाया   घायलों में कुछ की हालत गंभीर है  |  उन मुसाफिरों को ज्यादा चोट आई है, जो हादसे के वक्त ट्रेन के गेट के पास बैठे हुए थे  | सुबह खुद डीआरएम घायलों का हाल-चाल जानने के लिए अस्पताल पहुंचे और उन्हें 25 हजार रूपए की आर्थिक सहायता   दी   वहीं डीआरएम ने इस घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं  |   जबलपुर से चली गोंडवाना एक्सप्रेस देर रात डेढ़ बजे ग्वालियर स्टेशन पहुंचीं थी  | यहां कुछ मुसाफिर दिल्ली के लिए ट्रेन में चढ़े  इसके बाद ट्रेन कुछ दूर ही चली थी तो रायरू स्टेशन के पास ट्रैक पर खड़े ट्राले से वो टकरा गई  | जिस ट्राले से ट्रेन की टक्कर हुई है वो आंध्र प्रदेश का है  |  ट्राले का ड्राइवर रास्ता भटककर रेलवे ट्रैक पर आ गया था और जैसे ही उसे ट्रेन के आने का पता चला तो वो ट्राला रिवर्स करने लगा |  लेकिन ट्रैक पर कीचड़ होने के चलते ट्राले का पहिया उसमें फंस गया  |  उधर से ट्रेन तेजी से आ रही थी   |  ऐसे में ट्राले का ड्राइवर घबराकर भाग गया और उससे  ट्रेन की टक्कर हो गई  ... कई घंटों की मशक्कत के बाद ट्रैक पर फंसी गोंडवाना एक्सप्रेस को दूसरे इंजन की मदद से आगे लाया गया  | इस घटना के बाद ट्रेन 4 घंटे तक रेलवे ट्रैक पर खड़ी रही और ग्वालियर-दिल्ली रूट कई घंटों तक बाधित रहा  |    

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Dakhal News 2 October 2019


Gandhi Jayanti

बापू की 150वीं जयंती पर उन्हें पूरा देश याद कर रहा हैआज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती है|और इस मौके पर पूरा देश उन्हें याद कर रहा है बापू की जयंती के साथ ही आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री की भी जयंती है और आज के दिन उन्हें भी देश श्रद्धांजलि दे रहा है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी सहित तमाम नेताओं ने राजघाट पहुंचकर राष्ट्रपिता को श्रद्धासुमन अर्पित किए |गांधी और शास्त्री जयंती के मौके पर आज इन दोनों ही महापुरुषों की समाधियों पर विशेष आयोजन हुए  | वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उपराष्ट्रपति वैकेंया नायडू के अलावा कईं नेताओं ने दोनों की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी  | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुबह ही महात्मा गांधी की राजघाट स्थित समाधि पर पहुंचे और श्रद्धांजलि अर्पित की  |  इसके बाद वे कुछ देर यहां आयोजित भजन कार्यक्रम में शामिल हुए | प्रधानमंत्री के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने भी बापू को श्रद्धांजलि अर्पित की  | प्रधानमंत्री मोदी  पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री की समाधि पर पहुंचे और पुष्प अर्पित किए | इस दौरान वहां दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अलावा अन्य लोग मौजूद थे लाल बहादूर शास्त्री के बेटे और उनके परिवार ने भी पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की |

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Dakhal News 2 October 2019


SC/ST Act/दिल्ली

  अब पहले की ही तरह होगी गिरफ्तारी अब इन मामलों में बिना जांच के गिरफ्तारी होगी   SC/ST Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने  बड़ा फैसला सुनाया है  | सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए गए आदेश को रद्द  कर दिया है और अब इसके बाद इससे जुड़े मामलों में तुरंत गिरफ्तारी होगी | मार्च 2018 में कोर्ट के ही एक आदेश में इन मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी | कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि शिकायत दर्ज होने पर पुलिस पहले मामले की जांच करेगी और दोषी पाए जाने पर गिरफ्तारी हो   | हालांकि, इस आदेश का देशभर में विरोध हुआ था और सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय से अपील की थी कि वो इस आदेश को वापस ले ले  |   सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए गए आदेश को रद्द  कर दिया है और अब इसके SC/ST Act  से जुड़े मामलों में तुरंत गिरफ्तारी होगी  | 20 सितंबर को SC/ST एक्ट के प्रावधानों को हल्का करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था  | केंद्र सरकार द्वारा 20 मार्च 2018 को सुनाए गए फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी  | जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने मंगलवार को सुनाए अपने फैसले में कहा कि एससी/एसटी को सदियों से बहिष्कृत किया जाता रहा है और समाज में अब भी अस्प्रश्यता खत्म नहीं हुई है  | कोर्ट ने ऑब्जर्व किया कि पिछड़े वर्गों को अब भी समानता और नागरिक अधिकार नहीं मिले हैं और यह लोग अब भी विकास का फल चखने से विलग हैं  |  इस दौरान कोर्ट ने उन कर्मचारियों का भी जिक्र किया जो सीवर सफाई करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं  | कोर्ट ने इस दौरान कहा कि अनुच्छेद 15 के तहत एससी और एसटी के लोगों को संरक्षण मिला हुआ है लेकिन फिर भी उनके साथ भेदभाव होता है  |  

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Dakhal News 1 October 2019


बेबी हिप्पो  जन्म

  चिड़ियाघर में जन्मा 40 किलो का बेबी हिप्पो   ग्वालियर चिड़ियाघर में एक नन्हे मेहमान ने दस्तक दी है यह नन्हा मेहमान हिप्पोपोटामस यानी कि दरियाई घोड़ा है | मादा दरियाई घोड़ा डिंपी ने बेबी हिप्पो को जन्म दिया है | जिसका वजन चालीस किलो है |   ग्वालियर चिड़ियाघर में एक बेबी हिप्पो का जन्म हुआ है | अब यहाँ नर और मादा हिप्पो के साथ उनका बेबी भी है |  वर्ष 2011 में एक  नर हिप्पो अप्पू को दिल्ली से  ग्वालियर गांधी प्राणी उद्यान चिड़ियाघर में लाया गया था | जिसके बाद केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की गाइडलाइन के आधार पर अप्पू के लिए मादा हिप्पोपोटेमस डिंपी को वर्ष 2018 में कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय से लाया गया | जिसके बाद  बेबी हिप्पो का जन्म हुआ | जू प्रबंधन के अनुसार बेबी हिप्पो ने फीडिंग करना शुरू कर दिया है और उसका वजन भी 40 किलो के लगभग है जो कि पूरी तरह स्वस्थ होने की पुष्टि करता है, फिलहाल प्रबंधन मादा हिप्पो डिम्पी ओर बेबी हिप्पो  को  निगरानी रखे हुए है, साथ ही जल्द बेबी हिप्पो का नामकरण किया जाएगा जिसके लिए स्थानिय स्तर पर बच्चो के लिए प्रतियोगिता आयोजित की जायेगी |     

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Dakhal News 27 September 2019


honey trap khulasa

  हरभजन  ठेके और  नौकरी का झांसा दे रहे था आरती ने कहा कोरे कागज़ पर करवाए साइन   हनीट्रैप कांड की आरोपित आरती दयाल नौ दिन बाद पुलिस के सामने टूट गई और बड़ी हस्तियों को ब्लैकमेल करना कबूल कर लिया  आरती ने यह भी कबूला कि हरभजन करोड़ों के ठेके और मोनिका को नौकरी का झांसा दे रहा था  | इसके बाद ही उससे तीन करोड़ रुपए की मांग की गई   इस खुलासे के बाद पुलिस ने हरभजन को कोर्ट में बयान और पूछताछ के लिए नोटिस जारी किया है  | आरती ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उससे कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए हैं |    नेताओं ,अफसरों ,मीडिया और व्यवसाइयों की अय्याशी के हनीट्रैप से संभव है धीरे धीरे पर्दा उठे  ये मामला पुलिस की जाँच के साथ राजनेतिक भी हो गया है   इसमें अपनों को बचाने और बाकियों को फंसाने का काम भी हो सकता है  | हनीट्रैप की एक आरोपी आरती दयाल इस मामले की मुख्य कड़ी है  आरती अभी तक बीमारी का बहाना बनाकर पूछताछ में सहयोग नहीं कर रही थी  | लेकिन  गुरुवार को एसआईटी सदस्य एसपी साइबर विकास शहवाल, क्राइम ब्रांच एएसपी अमरेंद्रसिंह, सीआईडी निरीक्षक मनोज शर्मा की टीम पूछताछ में वह टूट गई  | उसने स्वीकार कर लिया कि श्वेता जैन के गिरोह से जुड़ कर अधिकारी, नेता व कारोबारियों को ब्लैकमेल कर रही थी  |  एसएसपी के अनुसार, आरती से कई बैंक खातों की जानकारी भी मिली है  |   आरती से पूछताछ के बाद पुलिस ने फरियादी इंजीनियर हरभजनसिंह को भी नोटिस जारी कर दिया है  | बताया जाता है पुलिस मानव तस्करी का केस दर्ज करने के बाद हरभजन से पूछताछ करना चाहती है  | आरती व श्वेता को फोन में कई मैसेज और नंबर कोडवर्ड में मिले हैं  | सूत्र बताते है इस गैंग से बॉलीवुड की कुछ  सी और बी ग्रेड हीरोइन भी जुडी हुई थीं  | इनके साथ  40 से ज़्यादा थीं कॉल गर्ल्स भी जुडी थीं  .. इधर आरती दयाल ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उससे कई कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए हैं  |   हनीट्रैप गैंग की महिलाएं और लड़कियां  नेताओं और अफसरों के करीब जाकर  बेहद शातिराना तरीके से उनकी वीडियो  बना लेती थीं  | इनकी दूसरी टीम ने उन्हीं पिक्चरों को अपने शिकार से पैसे ऐंठने का काम करती थी और तीसरी टीम उनसे सरकारी काम निकलवाती थी  | मुमकिन है कि जल्द ही ये साफ हो जाए कि पर्दे के पीछे से आखिर ये सिंडीकेट चला कौन रहा था  |  

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Dakhal News 27 September 2019


 ठगी  मामला

  24 लोगों से ठगे एक करोड़ रुपये   विश्व पर्यटन स्थल खजुराहो में जापान में नौकरी दिलाने के नाम पर लगभग 1 करोड़ की ठगी का मामला सामने आया है | खजुराहो के 2  दर्जन से अधिक लोग इस ठगी का शिकार हुए है | पुलिस इस मामले की पड़ताल में जुट गई है |   खजुराहो के दो दर्जन लोगों के साथ नौकरी के नाम पर ठगी की वारदात को अंजाम दिया गया | शिकायतकर्ताओं की माने तो खजुराहो का दिनेश मिश्रा लम्बे अरसे से जापान में रह रहा है | उसी ने लोगों के साथ ठगी की है | पीड़ितों का कहना है  नौकरी दिलाने और वीजा बनवाने के  नाम पर उसने सभी से मोटी रकम वसूली है |   दिनेश मिश्रा दो दर्जन से अधिक  लोगों  से लगभग 1 करोड़ रूपए ठग लिए और अब वह उनके पैसे खाकर भाग गया है | ठगी का शिकार हुए लोगों ने   दिनेश मिश्रा के खिलाफ थाने में शिकायत की है | अब  पुलिस पूरे मामले की जाँच में जुट गई है |               

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Dakhal News 27 September 2019


डोकरीखेड़ा सिंचाई परियोजना जलाशय को पूरा भरने 52.35 करोड की योजना स्वीकृत

  सिंचाई रकबा बढ़ेगा 4602 हैक्टेयर; लाभान्वित होंगे 3000 किसान क्षेत्र की जनता द्वारा जल संसाधन मंत्री का आभार व्यक्त   राज्य शासन ने होशंगाबाद जिले की डोकरीखेड़ा मध्यम सिंचाई परियोजना, पिपरिया, के जलाशय को पूर्ण क्षमता तक भरने के लिए 52.35 करोड रुपए की योजना स्वीकृत की है। योजना के अंतर्गत जलाशय को तवा परियोजना की पिपरिया शाखा नहर के 18वें कि.मी. से पम्प द्वारा भरा जाएगा। जल संसाधन मंत्री  हुकुम सिंह कराड़ा ने बताया कि इस योजना के पूर्ण होने पर इस जलाशय से सिंचित रकबा बढ़कर 4482 हैक्टेयर हो जाएगा, जो पूर्व में 2670 हैक्टेयर था।   पिपरिया शाखा नहर की दांई ओर स्थित ग्राम, जिनमें अभी तक इस परियोजना से सिंचाई नहीं हो पाती थी, वहाँ के लिए माइक्रो इरिगेशन परियोजना स्वीकृत की गई है। इसके माध्यम से वहां की आदिवासी बहुल जनता को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इससे 2792 हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी, जिससे 18 गाँव लाभान्वित होंगे। दोनों योजनाओं के पूर्ण हो जाने पर सिंचाई क्षेत्र में 4602 हैक्टेयर की वृद्धि होगी तथा 3000 किसान लाभान्वित होंगे।    पिपरिया क्षेत्र के लोगों ने योजना के स्वीकृत हो जाने पर आज जल संसाधन मंत्री  हुकुम सिंह कराड़ा का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर  रामेश्वर नीखरा भी उपस्थित थे।   डोकरीखेड़ा मध्यम सिंचाई परियोजना होशंगाबाद जिले की तहसील पिपरिया में स्थित है। परियोजना का निर्माण वर्ष 1956 में किया गया था। यह वर्षा आधारित जलाशय है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक बरसात होने पर ही यह पूर्ण क्षमता तक भर पाता था। पिछले वर्षों में वर्षा की कमी के कारण इसमें काफी कम जल भराव होता था।   जनसम्पर्क मंत्री का उनके निवास पहुँचकर किया आभार व्यक्त   इस योजना से लाभान्वित होने वाले किसान प्रतिनिधियों ने योजना को मूर्त रूप देने में किसानों के साथ शासन स्तर पर पिछले 6 माह से प्रयासरत जनसम्पर्क मंत्री एवं होशंगाबाद जिले के प्रभारी मंत्री  पी.सी. शर्मा का आज उनके निवास पर पहुँचकर आभार व्यक्त किया।    

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Dakhal News 26 September 2019


 लालजी टंडन

    राज्यपाल  लालजी टंडन ने आज राजभवन में प्रमुख सचिव महिला-बाल विकास  अनुपम राजन के साथ प्रदेश में कुपोषण उन्मूलन के लिये किये जा रहे प्रयासों की समीक्षा की। राज्यपाल के सचिव  मनोहर दुबे भी मौजूद थे।   राज्यपाल  टंडन ने कहा कि स्वस्थ और सशक्त भारत के निर्माण के लिये केन्द्र सरकार द्वारा योजनाएँ संचालित की गई हैं। योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन के साथ-साथ प्रभावी मानीटरिंग भी जरूरी है।   प्रमुख सचिव राजन ने राज्यपाल को प्रदेश में राष्ट्रीय मिशन अंतर्गत संचालित गतिविधियों का ब्यौरा दिया। उन्होंने बताया कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के समन्वय से सितंबर माह को पोषण आहार माह के रूप मे मनाया जा रहा है। इस दौरान जन-जागृति के विशेष कार्य किए जा रहे हैं। इसमें मीडिया का सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है। मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया गया है। पोषण आहार संबंधी गतिविधियों का कैलेण्डर बनाकर गतिविधियों की मानीटरिंग की जा रही है। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश पोषण आहार गतिविधियों के संचालन में देश का अग्रणी राज्य है। राज्य को केन्द्र सरकार ने पोषण आहार की गतिविधियों के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिये प्रथम पुरस्कार 3 करोड़ रूपये प्रदान कर सम्मानित किया है। उन्होंने बताया कि आंगनबाड़ी स्तर पर पोषण सभाओं का आयोजन किया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं के हिमोग्लोबिन की जांच और बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के कार्य भी किए गए हैं।   प्रमुख सचिव ने बताया कि आंगनवाड़ी केन्द्र स्तर पर प्रतिदिन कैलेंडर के अनुसार गतिविधियों संचालित की जा रही हैं। परियोजना स्तर पर भी प्रति सप्ताह 2 से 3 बार पोषण गतिविधियाँ और जिला स्तर पर प्रति सप्ताह स्वास्थ्य पोषण संबंधित थीम गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। उन्होंने बताया कि गणेश चतुर्थी पर्व के दौरान हर घर पोषण आहार का त्यौहार मनाया गया। नवरात्रि के समय यह पुनः मनाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अन्य गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं।  

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Dakhal News 24 September 2019


बाढ़ पीड़ित चिंतित न हों, सरकार पूरी मदद देगी

  बाढ़ पीड़ितों को बचाने में जान गंवाने वाले शहजाद मंसूरी के परिवार को चार लाख आर्थिक सहायता मुख्यमंत्री कमल नाथ मंदसौर जिले के ग्राम पायाखेड़ी और बेटिखेड़ी के बाढ़ प्रभावितों से मिले     मुख्यमंत्री  कमल नाथ ने आज मंदसौर जिले के बाढ़ प्रभावित गाँव पायाखेड़ी और बेटिखेड़ी का दौरा किया। कमल नाथ ने बाढ़ प्रभावितों से कहा कि वे चिंतित न हों, सरकार उनके साथ है और उन्हें पूरी मदद दी जाएगी।  नाथ ने इस मौके पर बाढ़ पीड़ितों को बचाते हुए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले स्वर्गीय शहजाद मंसूरी के परिवार को चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की।   मुख्यमंत्री  कमल नाथ ने सुवासरा तहसील के ग्राम पायाखेड़ी और बेटिखेड़ी पहुँचकर नष्ट हुई फसलों, क्षतिग्रस्त मकानों के साथ हुए अन्य नुकसानों को देखा। मुख्यमंत्री ने प्रभावितों से चर्चा भी की। मुख्यमंत्री ने प्रभावितों से कहा कि सरकार उनके साथ है, उनके हर नुकसान की भरपाई की जाएगी। जिला प्रशासन को बाढ़ से हुए नुकसान का सर्वे करने के निर्देश दे दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने किसानों को बताया कि राहत पहुँचाने का कार्य शुरू कर दिया गया है। सभी प्रभावितों को 15 अक्टूबर तक राहत पहुँचा दी जाएगी।    मुख्यमंत्री ने बाढ़ पीड़ितों से कहा कि अधिकारियों को फसलों का वास्तविक आकलन करने और सर्वे कार्य ईमानदारी के साथ समय-सीमा में करने के निर्देश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने स्व. शहजाद मंसूरी के परिवार को सांत्वना प्रदान करते हुए कहा कि उन्हें हर संभव मदद सरकार देगी।   मुख्यमंत्री के साथ जिले के प्रभारी जल संसाधन मंत्री हुकुम सिंह कराड़ा, विधायक  हरदीप सिंह डंग, पूर्व सांसद  मीनाक्षी नटराजन और संभाग तथा जिले के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।  

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Dakhal News 24 September 2019


साहित्यकारों का सभ्यता और समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान

  नव लेखक संघ के सम्मान समारोह में जनसंपर्क मंत्री  शर्मा   जनसंपर्क, विधि और विधायी कार्य मंत्री पी.सी. शर्मा ने कहा है कि साहित्यकारों का सभ्यता और समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मंत्री  शर्मा हिन्दी भवन में मध्यप्रदेश नव लेखक संघ के सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे। मंत्री श्री शर्मा ने नव लेखकों को शाल, फल और मोमेंटो देकर सम्मानित भी किया।  

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Dakhal News 23 September 2019


गोवा में जीएसटी काउंसिल में मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर हुए शामिल

  प्रदेश सरकार का रखा पक्ष     वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने गोवा में 37वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक में मध्यप्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व किया।  राठौर ने अनेक बिन्दुओं पर राज्य सरकार का पक्ष रखा।  राठौर ने कहा कि जून 2022 तक कंपनशेसनसेस की राशि को यथावत रखा जाए।   मंत्री  राठौर ने कहा कि सोना, चाँदी और रत्न आभूषण आदि के परिवहन पर ई वे बिल को लागू किया जाय। इन महंगी धातु और रत्न आभूषणों को जब परिवहन किया जायगा तो उसके लिए वर्तमान सीमा 50,000 से बढ़ाकर 5 लाख कर दिया जाए तथा ई वे बिल के प्रावधान केवल अंतर-राज्य विक्रय के लिए लागू किए जाएं।  राठौर ने कहा कि जीएसटी के नियमों के अनुसार यदि राज्य शासन या उनकी कोई एजेंसी किसी भूमि को इंडस्ट्रियल प्लॉट के रूप में किसी उद्योग को या किसी प्लॉट को वित्तीय कार्यों के लिए डेव्हलप करने के लिए देती है तो ऐसी लीज पर दी गई भूमि पर लीज रेंट पर जीएसटी से छूट है।   मंत्री  राठौर ने कहा कि वर्तमान समय लिबराइजेशन का है, जहाँ शासन निजी व्यावसायिक संस्थानों को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने और सुविधा प्रदाता की महत्वपूर्ण भूमिका में है वहाँ यह आवश्यक है कि प्राइवेट व्यावसायिक संस्थाओं को भी आगे बढ़कर शासन को सहयोग करना होता है। ऐसी स्थिति में यदि शासन अथवा शासकीय संस्था किसी भूमि को प्राइवेट एंटिटी अथवा व्यावसायिक संस्थानों को टूरिज्म होटल रिसोर्ट अथवा इंडस्टियल पार्क आदि के निर्माण के लिए लीज परदे, तो भी जीएसटी से मुक्ति होनी चाहिए।  राठौर ने 7500 रुपये से अधिक प्रतिदिन किराए वाले होटल पर टैक्स की दर 28 से घटाकर 18 प्रतिशत करने और 1000 से 7500 रुपये तक के होटलों के लिए कर की दर 12 प्रतिशत करने तथा 1000 रुपये से नीचे के प्रतिदिन किराये वाली होटलों को कर मुक्त रखने का प्रस्ताव का समर्थन किया।   वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने 4 वार्षिक विवरण पत्र को प्रस्तुत करने में आने वाली कठिनाइयों से जीएसटी काउंसिल को अगवत करवाते हुए इसके सरलीकरण की बात भी कही।  

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Dakhal News 23 September 2019


बंदरगढ़ा में "आपकी सरकार-आपके द्वार" शिविर में शामिल हुए नगरीय विकास मंत्री

    नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्द्धन सिंह ने कहा कि ग्रामीण जनता की समस्याओं का निराकरण करने के उद्देश्य से 'आपकी सरकार-आपके द्वार' शिविर के माध्यम से सरकार जनता के दरवाजे तक पहुँच रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य जनता की समस्याओं का उनके नजदीक पहुँचकर निराकरण करना और शासन की योजनाओं का लाभ पहुँचाना है। नगरीय विकास मंत्री  सिंह राघौगढ़ विकास खण्ड की ग्राम पंचायत बंदरगढ़ा में 'आपकी सरकार-आपके द्वार' शिविर को संबोधित कर रहे थे।    सिंह ने बंदरगढ़ा, खेराई, बिजोरिया, कुंदा, नादेर पंचायतों से आए ग्रामीणों से समस्याएँ सुनी और उनका निराकरण किया। उन्होंने शिविर में निराकृत नहीं हो सके आवेदनों का समय-सीमा मे निराकरण करने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि कुंदा में निर्बाध विद्युत प्रदाय की पुख्ता व्यवस्था की जाये। ग्राम दतिया से बंदरगढ़ा विद्युत लाईन के कार्य में वन बाधक नहीं बनें। सिंह ने निर्देशित किया कि बंदरगढ़ा अथवा आसपास की किसी भी पंचायत में हाईस्कूल नहीं है, अत: हाईस्कूल का प्रस्ताव बनाया जाये। सिंह ने इसके पहले राघौगढ़ में अधिकारियों की बैठक में अति-वृष्टि से उत्पन्न स्थिति की जानकारी लेकर जरूरी निर्देश दिये।

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Dakhal News 22 September 2019


नौजवानों को रोजगार और किसानों का कल्याण सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता

  प्रदेश में चिकित्सा क्षेत्र में उच्च-स्तरीय सुविधाएँ विकसित की जाएंगी मुख्यमंत्री  कमल नाथ द्वारा जबलपुर में सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का लोकार्पण     मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि नौजवानों को रोजगार और उनके बेहतर भविष्य के साथ किसानों का कल्याण राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।  नाथ ने कहा कि प्रदेश में चिकित्सा क्षेत्र में उच्च-स्तरीय सुविधाएँ विकसित की जाएंगी जिससे प्रदेश के लोगों को बाहर से अस्पतालों में इलाज के लिए न जाना पड़ेगा। नाथ आज जबलपुर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज परिसर में 150 करोड़ की लागत के 220 बिस्तरीय सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का लोकार्पण कर रहे थे। जबलपुर जिला प्रभारी और ऊर्जा मंत्री  प्रियव्रत सिंह भी उपस्थित थे। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर 42 करोड़ 16 लाख की लागत के कार्यों का भी भूमि-पूजन किया।   मुख्यमंत्री नाथ ने कहा कि प्रदेश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। सरकार ने पिछले नौ माह में कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाने और किसानों को बेहतर लाभ देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हम कृषि क्षेत्र में विकास की नई संभावनाओं को साकार कर रहे हैं ।  नाथ ने कहा कि प्रदेश में अधिक से अधिक रोजगान्मुखी निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे हमारे नौजवानों को रोजगार मिलेगा और वे पूरी ऊर्जा के साथ प्रदेश के विकास में अपना योगदान देंगे।   मुख्यमंत्री ने कहा कि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रदेश को पूरे देश में अव्वल बनाने के लिए सरकार विशेष प्रयास कर रही है। जबलपुर में सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल बनने से पूरे महाकौशल अंचल में उच्च-स्तरीय चिकित्सा सुविधाएँ लोगों को उपलब्ध होंगी। वहीं नौजवान चिकित्सकों को काम करने के बेहतर अवसर मिलेंगे। उन्होंने कहा कि संस्कारधानी जबलपुर का सुनियोजित विकास किया जाएगा। उन्होंने जबलपुर में हुई कैबिनेट बैठक का उल्लेख करते हुए कहा कि इस बैठक में लिये गये निर्णयों को पूरा किया जा रहा है।   चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ ने कहा कि पिछले नौ माह में मुख्यमंत्री  कमल नाथ के नेतृत्व में प्रदेश के चिकित्सा क्षेत्र को एक नया आयाम मिला है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 800 मेडिकल सीट को बढ़ाकर 2 हजार किया गया है। आने वाले समय में हम इसे 3 हजार सीट तक ले जाएंगे।   वित्त मंत्री तरुण भानोट ने कहा कि जबलपुर के विकास के लिए मुख्यमंत्री ने कई सौगातें दी हैं। सभी परियोजनाओं की डीपीआर बन गई है और शीघ्र ही उन्हें स्वीकृति दी जाएगी। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने जबलपुर में मेट्रो रेल और मेट्रोपॉलिटिन सिटी की योजना बनाने के निर्देश भी दिए हैं।   कार्यक्रम को सामाजिक न्याय और नि:शक्तजन कल्याण मंत्री लखन घनघोरिया, सांसद  विवेक तन्खा ने भी संबोधित किया।  

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Dakhal News 22 September 2019


अति-वृष्टि और बाढ़ से प्रदेश को अब तक 11 हजार 906 करोड़ की क्षति

  अंतर मंत्रालयीन केन्द्रीय दल से तत्काल राहत उपलब्ध कराने का अनुरोध छोटी अवधि के कृषि ऋण को मध्यम अवधि ऋण में बदलने की मांग मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बैठक सम्पन्न   मुख्य सचिव एस.आर.मोहन्ती ने निर्देश दिए हैं कि, प्रदेश में अति-वृष्टि और बाढ़ से हुए नुकसान की जानकारी सभी विभाग 24 सितम्बर तक राहत आयुक्त को सौंप दें। प्रदेश के 52 में से 36 जिलों में क्षति बहुत अधिक हुई है। उन्होंने कहा कि राहत पहुँचाने, आगामी रबी फसल के संधारण और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए केन्द्रीय सहायता की तत्काल आवश्यकता है।  मोहन्ती मंत्रालय में अंतर मंत्रालयीन केन्द्रीय दल के साथ बैठक को सम्बोधित कर रहे थे। बैठक में केन्द्रीय दल को वर्षा ऋतु में अति-वृष्टि और बाढ़ से प्रदेश में अब तक हुई क्षति की जानकारी दी गई।   राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण नई दिल्ली के संयुक्त सचिव  संदीप पौण्डरिक के नेतृत्व में आया केन्द्रीय दल दो दिन में प्रदेश के पाँच जिलों क्रमश: विदिशा, रायसेन, राजगढ़, मंदसौर और आगर-मालवा का भ्रमण करेगा। केन्द्रीय दल में ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार के उप सचिव  के.एम. सिंह, जल संसाधन मंत्रालय के संचालक  मनोज पोनीकर, कृषि मंत्रालय के संचालक डॉ.ए.के. तिवारी, वित्त मंत्रालय के संचालकअमरनाथ सिंह तथा ऊर्जा मंत्रालय के सहायक संचालक  सुमित गोयल सम्मिलित हैं।   प्रमुख सचिव राजस्व  मनीष रस्तोगी ने कहा कि प्रदेश में वर्षा निरंतर जारी है।  रस्तोगी ने केन्द्रीय दल के सम्मुख अब तक हुई क्षति की जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि सभी विभागों से जानकारी प्राप्त होने तथा मानसून समाप्ति के बाद क्षति की जानकारी अंतिम रूप से प्रस्तुत की जा सकेगी। रस्तोगी ने बताया कि जनहानि और पशुधन की हानि के मामलों में तत्काल राहत उपलब्ध कराई गई है। एसडीआरएफ के अंर्तगत अब तक 125 करोड़ रूपये की राहत प्रदान की जा चुकी है। फसलों को हुए नुकसान का सर्वेक्षण 24 सितम्बर तक पूर्ण होगा। तत्पश्चात 27 सितम्बर तक सहायता के लिए अंतिम रूप से मांग प्रस्तुत की जा सकेगी। राज्य सरकार ने छोटी अवधि के कृषि ऋण को मध्यम अवधि ऋण में बदलने की मांग भी रखी।   बैठक में जानकारी दी गई कि राज्य में 18 सितम्बर तक 1203.5 एम.एम. वर्षा हुई, जो सामान्य से 37 प्रतिशत अधिक है। लगभग 24 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 22 लाख किसानों की 9 हजार 600 करोड़ रूपये की खरीफ फसल प्रभावित हुई है। प्रदेश में मकानों को हुई क्षति लगभग 540 करोड़ है। इसी क्रम में सड़कों की क्षति का अनुमान 1566 करोड़ रूपये और लगभग 200 करोड़ रूपये का अन्य नुकसान भी हुआ है। केन्द्रीय दल को अवगत कराया गया कि प्रदेश को अब तक 11 हजार 906 करोड़ रूपये की क्षति हुई है। प्रदेश में बाढ़ और आकाशीय बिजली से 225 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1400 से अधिक जानवरों की मौत हुई।   केन्द्रीय दल को अति-वृष्टि के दौरान प्रदेश के बांधों, तालाबों और नदियों की स्थिति तथा बचाव के लिए किये गए कार्यो से अवगत कराया गया।   बैठक में कृषि उत्पादन आयुक्त प्रभांशु कमल, अपर मुख्य सचिव उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण  इकबाल सिंह बैस, अपर मुख्य सचिव पशुपालन  मनोज वास्तव, अपर मुख्य सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास मती गौरी सिंह, अपर मुख्य सचिव वित्त  अनुराग जैन, अपर मुख्य सचिव ऊर्जा  मोहम्मद सुलेमान सहित विभिन्न विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।  

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Dakhal News 20 September 2019


वेटरनरी प्रदर्शन

  सरकार की अर्थी निकलकर किया आंदोलन शुरू   जबलपुर वेटरनरी विश्वविद्यालय के छात्रों ने मध्यप्रदेश सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए सरकारी की अर्थी निकाली  |  अपने आंदोलन का आगाज करते हुए छात्रों ने भूख हड़ताल भी शुरू कर दी है  |    अपनी उचित मांगें पूरी न होते देख  वेटरनरी विश्वविद्यालय के छात्रों  ने अपना क्रमबद्ध आंदोलन शुरू कर दिया है  | छात्रों ने आरोप लगाया कि छात्रों के हित में सरकार कोई निर्णय नहीं ले रही है | उन्होंने कहा कि जब तक हमारी मांगे नहीं मानी जाती हमारा आंदोलन और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी रहेगी  जबलपुर के साथ महू और रीवा वेटरनरी कॉलेज के छात्रों ने भी प्रदर्शन किया  | छात्र लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं  | 

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Dakhal News 19 September 2019


kamalnath

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने सुप्रसिद्ध हास्य कवि एवं व्यंग्यकार श्री माणिक वर्मा के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। श्री कमल नाथ ने शोक संदेश में कहा कि श्री माणिक वर्मा ने कविता एवं व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों और तंत्र की खामियों पर सटीक रचनाएँ लिखीं। श्री वर्मा के निधन से देश ने रचनाओं के जरिए समाज और सत्ता को झकझोर देने वाला व्यक्तित्व खो दिया है।   मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की शांति और परिजनों को यह दु:ख सहन करने की शक्ति देने की ईश्वर से प्रार्थना की

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Dakhal News 18 September 2019


Kavi Manik Verma

  अपने व्यंगों से धूम मचाते थे माणिक वर्मा   अपने चुटीले व्यंगों से धूम मचाने वाले देश के प्रख्यात कवि माणिक वर्मा का इंदौर में निधन को गया  मूलतः मध्यप्रदेश के हरदा के रहने वाले माणिक वर्मा ने मंगलवार सुबह अंतिम संसा ली |   देश के प्रख्यात कवि माणिक वर्मा का मंगलवार सुबह इंदौर में निधन हो गया | सुबह जब परिवार के लोग उन्हें जगाने के लिए पहुंचे तब पता चला कि वे नहीं रहे | हरदा निवासी माणिक वर्मा  पिछले कुछ समय से वे इंदौर में ही परिवार के साथ रह रहे थे  | तबीयत खराब होने के बाद भी कविताओं को लेकर वो लगातार सक्रिय बने रहे  | माणिक वर्मा जी अपने व्यंगों के जरिए हमेशा मंचों की शान रहे  |  कुछ समय पहले ही उन्होंने राइटर्स क्लब के मंच पर कविता पाठ  किया था  |  माणिक वर्मा की हास्य कविताओं में छिपे व्यंग करारी चोट करते थे  | उनकी प्रमुख रचनाओं में  से एक  ''मांगीलाल और मैने ''  के लोग खासे दीवाने थे उनके व्यंग हिला के रख देते थे  | सब्जी वाला हमें मास्टर समझता है धनिया लोगे एक रूपये रत्ती  ... जैसी उनकी रचनाएँ हमेशा साहित्य रसिकों को उनकी याद दिलाते रहेंगे  |  

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Dakhal News 17 September 2019


प्रद्युमन सिंह तोमर

  शासकीय खाद्यान्न चोरी की घटनाओं पर अंकुश लगाने के निर्देश खाद्य-नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्री प्रद्युमन सिंह तोमर ने वेयर हाउस से शासकीय खाद्यान्न चोरी और स्टॉक की कमी की खबरों के सम्बन्ध में प्रमुख सचिव से वस्तु-स्थिति की रिपोर्ट मांगी है। मंत्री श्री तोमर ने समाचार-पत्रों में बरमेन्द्र वेयर हाउस उचेहरा, जिला सतना में दाल, गेहूँ-चावल के गोलमाल की खबरों का उल्लेख कर, सम्बधितों की जवाबदारी निर्धारित करने के लिये कहा है। उन्होंने प्रमुख सचिव से कहा है कि तथ्यों की जाँच कर तीन दिन में दोषियों के विरूद्ध कार्रवाई करें। मंत्री श्री तोमर ने भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के निर्देश भी दिए हैं।

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Dakhal News 16 September 2019


बबुली मारा गया

  डकैत बबुली पर था साढ़े छ लाख का इनाम     फिरौती की रकम को लेकर डकैत बबुली कोल की गैंग में झगड़ा हुआ और गैंग के एक अन्य डकैत लाली कोल ने बबुली और उसके करीबी लवलेश को मौत के घाट  उतार दिया | पुलिस ने जंगल से दोनों डकैतों के शव बरामद कर लिए हैं | बबुली की मौत के बाद विंध्य इलाके के एक बड़े डकैत का सफाया हो गया है | इधर पुलिस ने दावा किया है कि बबुली कोल और उसका साथी मुठभेड़ में मारे गए हैं |   पुलिस की बात पर भरोसा करें तो यूपी और मध्य प्रदेश में आतंक का दूसरा नाम बने  डकैत बबुली कोल पुलिस एनकाउंटर में मारा गया | उसके एक और साथी लवलेश कोल की भी एनकाउंटर में मौत हो गई है | पुलिस ने सतना के जंगल से दोनों के शव बरामद कर लिए हैं | इन दोनों के खात्मे के साथ ही सतना और विंध्य में डकैतों का सफाया हो गया है | रीवा रेंज के आईजी चंचल शेखऱ, डीआईजी अविनाश शर्मा और एसपी रियाज इकबाल खुद पिछले कई दिनों से सतना में कैंप किए हुए थे और आज पुलिस ने इन दोनों के मारे जाने की पुष्टि कर दी  | बबुली कोल पर 6 लाख पचास हजार का नाम था तो लवलेश कोल पर एक लाख 80 हजार का इनाम था |     इससे पहले देर रात खबर आई थी कि फिरौती के रकम के बंटवारे को लेकर बबुली कोल गिरोह में फूट पड़ गई थी और गैंग में नए शामिल हुए लाली कोल ने इन दोनों को मौत के घाट उतारा दिया |  और पुलिस को इस घटना की जानकारी दी | हालाँकि पुलिस इससे इंकार करती रही | पिछले हफ्ते बबुली ने एक किसान का अपहरण कर फिरौती लेकर उसे छोड़ा था | उसके बाद डकैत ने अपना एक वीडिओ भी जारी किया था | बबुली कोल का केवल मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में भी आतंक था  | वो इतना शातिर था कि वारदात करने के बाद दूसरे राज्य में भाग जाता था | इस वजह से वो पुलिस के हाथ नहीं आ रहा था |   

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Dakhal News 16 September 2019


weather

  गांधीसागर बांध के सभी 19 गेट खोले     तेज बारिश के चलते मंदसौर जिले के कई हिस्सों में बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं  |   चंबल, शिवना, तुम्बड़, रेतम, सोमली, अंजनी, रेवा सहित सभी नदी-नाले उफान पर हैं  तेज पानी के चलते गांधीसागर बांध के सभी 19 गेट खोल दिए गए है   वहीं शिवना नदी ने एक बार फिर पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश कर लिया है  | पूरे मंदिर परिसर में शिवना नदी का पानी घुस गया है  |  एहतियातन यहां सुरक्षाकर्मी तैनात कर दिए गए हैं   कलेक्टर ने लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के निर्देश  दिए हैं  |   गांधीसागर डेम का लेवल 1312 फ़ीट तक पहुंच गया है  |   मंदसौर जिले के साथ-साथ इंदौर, उज्जैन, प्रतापगढ़, रतलाम और आसपास के सभी जिलों में लगातार भारी वर्षा होने से गांधीसागर डेम के सभी गेट खोलने के बाद भी पानी का स्तर बढ़ रहा है  |   कम होने की वर्तमान में कोई संभावना नहीं दिख रही है  कलेक्टर मनोज पुष्प ने सभी अनुविभागीय अधिकारियों, तहसीलदारों, नायब तहसीलदारों, थाना प्रभारियों, सरपंच, सचिव, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं, आशाओं और सभी तरह के प्रशासनिक अमलों को निर्देश दिए हैं कि ऐसे स्थान जहां पर पानी घुसने की पूरी संभावना है या  घुस सकता है  | वहां से लोगों को निकालकर तुरंत सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए   कलेक्टर ने सभी लोगों से आग्रह करते हुए कहा है कि अगर गांव व घरों में पानी घुसा है  | तो तुरंत सुरक्षित स्थान पर पहुंचे।   पानी और अधिक बढ़ने की संभावना है  |  नदी, नाले सभी अपने खतरे के स्तर से ऊपर बहने लगे है  पानी की लगातार आवक बनी हुई है। इसलिए अब सुरक्षित स्थानों पर पहुंचना बहुत जरूरी है। गांधीसागर बांध के सभी 19 गेट खोले गए हैं   | . चंबल नदी का पानी भगोर गांव के घुसने की सूचना पर गांधीसागर बांध के इंचार्ज को सभी 19 गेट खोलने को कह दिया हैैं  |  सभी गेट से 4.76 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है  मंदसौर में शिवना नदी का पानी बढ़ने से कालाभाटा बांध के चार गेट खोले गए है   सुवासरा में रात भर से बरसात का दौर जारी है एक हादसे में कार के बहाने के कारण दो युवक नाले में फंस गए जिन्हे   | . थाना अफजलपुर की डायल 100 के चालक राकेश बैरागी व आरक्षक सुरेंद्रसिंह शक्तावत ने नाले  से बाहर निकाला  पटेला में जोरदार बारिश से तालाब का पानी गांव में आने लगा है  नाहरगढ क्षेत्र में रात भर से भारी बारिश हो रही है  |  वानीमंडी में स्टेशन से भेसोदा जाने वाले रोड पर दो पेड़ गिरने से मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। अफजलपुर थाना क्षेत्र के ग्राम इशाकपुर में तुम्बड़ नदी का पानी घुसने की सूचना है  |  गांव से निकलने के सभी मार्ग बंद हो गए है  | वहां के ग्रामीण प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे है  | गाँधीसागर में सुसाइड पॉइंट में एक हादसे में एक कार चम्बल नदी में गिरी  |  कोई जनहानि नही हुई हैं  | मंदसौर में तेलिया तालाब में पानी की आवक बढ़ने से रेवास-देवड़ा रोड पर पूर्व की तरह ही पानी सड़क पर आ गया है  | कालाभाटा डेम के छह गेट 11.5 फ़ीट तक खोले गए है  | ग्राम रूनिजा में कंठाली नदी उफान पर होने से पानी बाजार में घुसा, कई दुकाने पानी की चपेट में हैं  | अफजलपुर थाना क्षेत्र के ग्राम खजूरी आंजना में एक तरफ से पुल का हिस्सा पूरी तरह से कट चुका है  | इस बारिश में करीब पुल पर 20 से 25 फिट पर पानी आया है |  

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Dakhal News 14 September 2019


priyanka

  क्रिकेट के जरिये राजनैतिक प्रहार   प्रियंका गांधी ने सैयद मुश्ताक ट्रॉफी का एक वीडियो शेयर किया जिसमें एक शानदार कैच को लपकते हुए दिखाया गया है  | इसी वीडियो से  प्रियंका गांधी  ने मोदी सरकार पर निशाना  साधा और लिखा | भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जनहित में जारी  |   कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बार फिर अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर मोदी सरकार पर निशाना साधा है | प्रियंका गांधी ने  सैयद मुश्ताक ट्रॉफी का एक वीडियो शेयर किया  और लिखा  भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जनहित में जारी  प्रियंका ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘सही कैच पकड़ने के लिए अंत तक गेंद पर नजर और खेल की सच्ची भावना होनी जरूरी है | वरना अपना सारा दोष ग्रेविटी, गणित, ओला-उबर और इधर-उधर की बातों पर मढ़ते हैं| प्रियंका गांधी का ये तंज केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा हाल ही में दिए गए बयानों को लेकर है | पीयूष गोयल ने गुरुवार को एक बयान में कहा था कि अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए किसी भी तरह के गणित या उससे जुड़े आंकड़ों को देखने की जरूरत नहीं है, अगर आइंस्टीन इस गणित में उलझ जाते तो वे कभी भी ग्रेविटी की खोज नहीं कर पाते | वहीं प्रियंका ने निर्मला सीतारमण के उस बयान को भी निशाना बनाया है जिसमें निर्मला ने ऑटो सेक्टर में आई गिरावट के लिए ओला-उबर को जिम्मेदार बताया था |

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Dakhal News 13 September 2019


प्रभुराम चौधरी

स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी ने आज नागपुर से भोपाल पहुँची एन.सी.सी. कैडेट्स की अखिल भारतीय स्वच्छता साइकिल रैली को मोतीलाल नेहरू स्टेडियम से राजस्थान के लिये रवाना किया। डॉ. चौधरी ने एन.सी.सी. कैडेट्स के सामाजिक कार्यों की सराहना की। उन्होंने रैली में शामिल कैडेट्स को बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए स्वच्छता की शपथ दिलाई। यह रैली 16 जत्थों के साथ विगत 8 अगस्त को नई दिल्ली से रवाना हुई है। रैली देश के सभी राज्यों से होते हुए 30 सितम्बर को वापस नई दिल्ली पहुँचेगी। हर जत्थे में एन.सी.सी. के 25 से 30 कैडेट्स प्रतिदिन 50 से 70 किलोमीटर की दूरी तय कर रहे हैं। रैली का उद्देश्य नागरिकों को स्वच्छता का महत्व समझाना है।   कार्यक्रम में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ एन.सी.सी. निदेशालय के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल श्री मुकेश के. दत्ता, भोपाल के ग्रुप कमाण्डर ब्रिगेडियर श्री अनिल हूडा और कैडेट्स उपस्थित थे  

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Dakhal News 12 September 2019


sardar sarovar

सरदार सरोवर जलाशय में जल भराव समय-सारणी का पालन कराने गुजरात सरकार को निर्देशित करे केन्द्र मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने केन्द्र सरकार से सरदार सरोवर जलाशय में जल भराव के संबंध में तय की गई समय-सारणी का पालन करने के लिए गुजरात सरकार को निर्देशित करने का आग्रह किया है। श्री कमल नाथ ने केन्द्रीय मंत्री जल शक्ति, जल संसाधन श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को पत्र लिखकर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की बैठक तत्काल बुलाने का आग्रह किया है जिससे इस मुद्दे पर जल्द से जल्द चर्चा हो सके। उन्होंने लिखा कि मध्यप्रदेश के लिए यह विषय अत्यधिक महत्व रखता है क्योंकि सरदार सरोवर परियोजना के प्रभावित क्षेत्र में बड़ी संख्या में राहत और पुनर्वास के काम चल रहे है।  मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में कहा है कि तयशुदा समय-सारणी के अनुसार 31 अगस्त 2019 तक सरदार सरोवर जलाशय को 134 मीटर की ऊँचाई तक भरा जाना था। सितम्बर माह के दौरान जलाशय को सिर्फ 135 मीटर तक भरा जाना था और 15 अक्टूबर 2019 तक जलाशय को 138.68 मीटर के अंतिम स्तर भरा जाना था।  मुख्यमंत्री ने पत्र में लिखा कि हालांकि 4 सितम्बर 2019 को दोपहर 12 बजे तक जलाशय 135.47 मीटर तक भर चुका था। इससे स्पष्ट है कि नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराई गई समय-सारणी का उल्लघंन हुआ है जो प्राधिकरण ने दिनांक 10 मई 2019 को जारी की थी। उन्होंने कहा कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि बांध सुरक्षा के मान्य उपायों को अपनाया गया है या नहीं। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जाना समझ से परे है। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा इस संबंध में स्वत: कार्रवाई की जाना अपेक्षित है। श्री कमल नाथ ने कहा कि सरदार सरोवर परियोजना में जल भराव को समय-सारणी अनुसार नियंत्रित किया जाना अपेक्षित है जैसा कि इस पर सहमति हुई थी। इसी बीच गुजरात सरकार को तयशुदा समय-सारणी का पालन करने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए जैसा कि नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के 10 मई 2019 के पत्र में उल्लेख किया गया है।   

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Dakhal News 11 September 2019


Kolar Dam Overflows

  तीन साल बाद छलका है कोलार बांध   दो दिन से हो रही बारिश से भोपाल की प्यास बुझाने वाला  कोलार डैम भी लबालब हो गया | फुल टैंक लेवल के करीब पहुंचते ही   डैम के दो गेट खोल दिए गए   इस दौरान घने जंगलों से घिरे इस विशाल डैम का मनोहारी दृश्य देखते ही बन रहा था  |  शहर की जरूरत के हिसाब से इस बार तीन साल का पानी जमा हो गया है  |  पिछले 32 साल में चौथी बार कोलार डैम फुल हुआ है     भारी बारिश के तीन साल बाद कोलार डैम छलका है  |  इससे पहले 2016 में कोलार डैम के गेट खोले गए थे  |   सोमवार की शाम  कोलार डैम के दो गेट खोले गए बीते शनिवार से लगातार हो रही बारिश के कारण रविवार दोपहर 12 बजे के बाद कोलार डैम के जलस्तर में इजाफा होने लगा था  | इसके अलावा कलियासोत डैम के इस सीजन में रिकार्ड 18 घंटे गेट खोले गए  |  कोलार की जल विस्तार क्षमता अधिक होने के कारण एफटीएल की स्थिति बारिश के तीन माह बाद बनी है  |  गेट खोलने से पहले जलसंसाधन विभाग ने जिला प्रशासन व नगर निगम को सूचना दी थी। ..  ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में हालात को काबू में किया जा सके  |  साथ ही कोई अप्रिय घटना न हो  कोलार बांध का एफटीएल 462.20 मीटर है  |  कोलार डैम से 61 एमसीएम पानी शहर के लिए जाता है   |  सीहोर जिले में सिंचाई के लिए यहां के पानी का उपयोग होता है  | कोलार की 265 एमसीएम कुल पानी भराव की क्षमता है  |   मतलब शहर में कोलार से होने वाले तीन साल तक पानी सप्लाई की समस्या नहीं होगी  | भोपाल के लिए कोलार से प्रतिदिन 1.65 क्यूसेक पानी लिया जाता है   डैम की अधिकतम जलभराव क्षमता को बनाए रखने के लिए डैम से 3.29 क्यूसेक पानी की निकासी की गई   |  मतलब छोड़े गए पानी से शहर को दो दिनों तक पानी सप्लाई की जा सकती थी |  

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Dakhal News 10 September 2019


bus takra

  तीन लोगों की मौत कई घायल   धार में एक तेज रफ़्तार से जा रही बस अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा गई |  जिससे तीन लोगों की घटना स्थल पर ही मौत हो गई |  और तीन से ज्यादा लोग घायल हो  गए |   धार के  धरमपुरी मुनि आश्रम के पास एक निजी बस तेज गति से जा रही थी  | और  अचानक अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा गई | बस की रफ्तार इतनी तेज थी कि |  बस के दो टुकड़े हो गए | बताया जा रहा है की  निजी बस मनावर से इंदौर जा रही थी  | टक्कर इतनी जोरदार थी की मौके पर ही  3 लोगों की  मौत हो गई | और  3 से ज्यादा लोग  घायल  हो गए |  घायलों को इंदौर रेफर किया गया है |  मरने वाले लोगों में  एक धर्मपुरी का  और दो मनावर के बताये जा रहे है | पुलिस ने बस को कब्जे में लेकर  जांच शुरू कर दी है |  

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Dakhal News 9 September 2019


shanidev

शनि न्याय के देवता हैं जो कहते हैं की स्वम मार्ग पर आ जाओ नहीं तो वे मार्ग पर ले आएंगे  | जो अपने माता पिता की सेवा करने वालों का शनि कभी कुछ नहीं बिगड़ते | मगर शवि की दृष्टि से सभी को दर लगता हैं | अप्रैल माह में शनि ग्रह के वक्री होने से पीड़ित लोगों के लिए अच्छी खबर है। शनि ग्रह 18 को मार्गी हो रहे हैं। शनि के मार्गी होते ही वृश्चिक, धनु, वृष व कन्या राशि वाले व्यक्तियों को राहत मिलेगी। वहीं मिथुन, तुला व कुंभ राशि वालों पर शनि की ढैय्या का आंशिक प्रभाव नजर आने लगेगा।यानि थोड़ी सी परेशानियां जीवन में शुरु हो सकती हैं। पंडित विपिन कृष्ण भारद्वाज के मुताबिक आमतौर पर जन्म कुंडली या ग्रह बाधाओं को मानने वाले लोग शनि का नाम सुनते ही डर जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। पंडित के अनुसार शनि ग्रह दंडाधिकारी है यानि वह लोगों को उनके कर्म के अनुसार ही फल देते है। पांडित के अनुसार 30 अप्रैल को शनि धनु राशि में वक्री हुए थे। 18 सितंबर को शनि सुबह 11.48 मिनट पर मार्गी हो रहे है। ऐसे में शनि के वक्री होने पर जिन राशियों के व्यक्तियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा था। शनि के मार्गी होते ही उनकी परेशानियों का अंत हो जाएगा।   किस राशि पर क्या प्रभाव दिखाएंगे मार्गी हो रहे शनिदेवः   मेष- राज्यकारण, पदोन्नाति होगी   वृष- भाग्य वर्धक, चिंता, परेशानियों से राहत   मिथुन- स्वास्थ्य ठीक रहेगा। सावधानी रखें   कर्क- धन लाभ, व्यापारिक उन्नाति   सिंह- शत्रु हानि, रोग   कन्या- लाभ, संतान वृद्धि   तुला- यात्रा, तनाव, परिश्रम   वृश्चिक- लाभ, उन्नाति, यश   धनु- शुभ, अशुभ, मिला जुला रहेगा   मकर - मतभेद, रोग, हानि   कुभ- विवाह, परिश्रम, अपयश   मीन- आर्थिक उन्नाति, सम्मान   शनि को कुछ  करके खुश किया जा सकता हैं |  पंडित के अनुसार शनि ग्रह यानि साढ़े साती, ढैय्या या कुंडली में शनि ग्रह की स्थिति अच्छी न होने पर शनि को प्रसन्ना करने का सबसे अच्छा उपाय है कि अधिक से अधिक शुभ कार्य करें, दीनहीनों की सेवा करें, झूठ, छल, प्रपंच के बचे। पीपल के पेड़ पर शनिवार को मीठा जल चढ़ाए। सरसों के तेल का दीपक रखें। शनि की दशा के दौरान मांस, मदिरा का सेवन नहीं करें। अपने खाने में काली मिर्च व काले नमक को शामिल करें। इससे शनि प्रसन्ना होते है। मीठी रोटी में तेल लगा कर काले कुत्ते को खिलाए। काला कुत्ता नहीं मिले तो किसी भी कुत्ते को खिला दें।

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Dakhal News 9 September 2019


bandh alert

  बारिश के चलते  निचले इलाकों में अलर्ट जारी     सिवनी जिले में बना एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का भीमगढ़ बांध अच्छी बारिश से लबालब हो गया है |  उच्चतम जल भराव होने के बाद शनिवार सुबह बांध के दो गेट से 500 क्यूसिक मीटर पानी प्रति सेकेंड छोड़ा जा रहा है |     भारी बारिश के चलते भीमगढ़ बांध के दो गेट खोले गए हैं |  निचले इलाकों में अलर्ट जारी कर दिया गया हैं | भीमगढ़ डैम के प्रभारी सहायक यंत्री यूबी मर्सकोले ने बताया कि बांध के दो गेट 45-45 सेटीमीटर उठाकर प्रति सेकेण्ड 500 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है |   वर्तमान में बांध का जलस्तर 518 मीटर को पार कर चुका है | क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश से जितना अतिरिक्त पानी बांध में आ रहा है |  उतना ही पानी दो गेट से छोड़ा जा रहा है। बांध के जलस्तर 518 मीटर पर स्थिर रखा जा रहा है |  सहायक यंत्री मर्सकोले ने बताया कि बांध का पानी छोड़े जाने से बांध के निचले हिस्सों को अलर्ट कर दिया गया है |  हालांकि कम मात्रा में बांध से पानी छोड़े जाने से निचले इलाकों में जल भराव का खतरा नहीं हैं | 

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Dakhal News 2 September 2019


Weather Alert

  बंगाल की खाड़ी में एक कम दबाव का क्षेत्र   मध्यप्रदेश में बुधवार को प्रदेश में कहीं-कहीं मामूली बौछारें पड़ीं लेकिन  मौसम विज्ञानियों  का कहना है |गुरुवार को बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनने जा रहा है |  उसके प्रभाव से शुक्रवार-शनिवार को प्रदेश में कई स्थानों पर झमाझम बरसात का दौर शुरू होने की संभावना है|   मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक बुधवार को प्रदेश के कुछ हिस्सों में हलकी बारिश हुई |  मौसम विज्ञानी पीके साहा ने बताया कि मंगलवार को पूर्वी मप्र और उससे लगे छत्तीसगढ़ पर बना ऊपरी हवा का चक्रवात समाप्त हो गया था जिस कारण  बारिश में कमी आई | हालांकि मानसून ट्रफ वर्तमान में प्रदेश के गुना और सीधी से होकर बंगाल की खाड़ी तक जा रहा है  | इसके  साथ ही गुरुवार को बंगाल की खाड़ी में एक कम दबाव का क्षेत्र बना है  | इस सिस्टम के आगे बढ़ने से शुक्रवार से प्रदेश में एक बार फिर अच्छी बरसात का दौर शुरू होने की संभावना है |बारिश का ये दौर एक बार फिर तीन दिन तक चल सकता है  |  

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Dakhal News 29 August 2019


Chandrayaan-2

  अब हुआ पृथ्वी की कक्षा से हुआ बाहर चंद्रयान-2 चांद के सफर पर निकल गया है |  बुधवार अल सुबह इसने धरती की कक्षा छोड़ दी और रवाना हो गया चांद के उस सफर पर जिसका सभी को इंतजार था  |  20 अगस्त को यह चांद की कक्षा में प्रवेश करेगा और वहां भी एक के बाद एक कक्षाएं बदलते हुए चांद की धरती पर उतरेगा  | इसरो के बेंगलुरु स्थित मुख्यालय द्वारा जारी बयान के अनुसार चंद्रयान ने रात 2.21 बजे धरती की कक्षा छोड़ी और लुनार ट्रांसफर ट्रेजेक्टरी में प्रवेश कर गया |अपने ट्वीट में इसरो ने लिखा है, 'आज के ट्रांस लुनार ट्रांजिट के बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा से बाहर हो गया और आगे के सफर पर निकल गया है |   चंद्रयान-2 के स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जा रही है और लॉन्च होने के बाद से ही इसके सभी फंक्शन पूरी तरह से काम कर रहे हैं  |भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत के दूसरे चंद्रयान लॉन्च किया था  |  तब से यह यान धरती की कक्षा में घूम रहा था  |  इसरो के अनुसार, 20 अगस्त को यान चांद की कक्षा में प्रवेश करेगा  |  इसके बाद चांद की अलग-अलग कक्षाओं में घूमते हुए सात सितंबर को चांद पर इसकी लैंडिंग होनी है |  लॉन्चिंग के बाद से इसरो अब तक पांच बार इसकी कक्षा में बदलाव कर चुका है  | पांचवां बदलाव छह अगस्त को किया गया था | चंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं- ऑर्बिटर  | लैंडर 'विक्रम' और रोवर 'प्रज्ञान' |  ऑर्बिटर सालभर चांद की परिक्रमा करते हुए प्रयोगों को अंजाम देगा  |  वहीं लैंडर और रोवर चांद पर उतरेंगे। इनके प्रयोग की अवधि 14 दिन की रहेगी |  लैंडर और रोवर चांद के दक्षिणी धु्रव पर उस हिस्से में उतरेंगे, जहां अब तक कोई यान नहीं पहुंचा है  | चांद पर लैंडिंग के साथ ही भारत यह उपलब्धि हासिल करने वाला चौथा देश बन जाएगा |

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Dakhal News 14 August 2019


nadi

बचाने गए  दो युवको से एक की डूबने से हुई मौत    आफत की बारिश से सभी नदी नाले उफान पर हैं  |  ऐसी उफनती नदी में बह कर आने वाली लकड़ियों को  जरुरत मंद लोग उठाते हैं |  जो बेहद खतरनाक होता हैं  .... इसका खामियाजा एक महिला को भुगतना पड़ा हैं | मगर हर बार किस्मत साथ दे ये जरुरी नहीं होता ....  और ऐसा ही हुआ एक युवक उस महिला को बचते - बचते जिन्दी का खेल हार गया  ....   झिगराघाट की उफनती सुरपन नदी में लकड़ी पकड़ने एक महिला पुल से निचे फिर कर डूबने लगी  | दरसल  मंडला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी जान की परवाह किये बगैर   .....  उफनती नदी तथा नालों में बहकर आनें वाली लकड़ियों को पकड़नें का खतरनाक खेल बदस्तूर जारी है  .... गुरुवार शाम लगभग 5 बजे उप तहसील मुख्यालय अंजनिया के पास  ग्राम केवलारी और  बोकर के बीच सुरपन नदी पुल में लकड़ी पकड़ रही एक महिला बह गई  ..... जिसे बचानें के लिए नदी में उतरे दो युवकों नें महिला को तो बचा लिया परंतु तेज बहाब में एक युवक बह गया जिसका देर शाम तक कोई पता नहीं चल पाया था   ..... प्राप्त जानकारी अनुसार ग्राम केवलारी निवासी सम्मो बाई नदी में बहकर आ रही लकड़ियों को पुल पर खड़े होकर पकड़ रही थी   .... इसी दौरान उसका पैर फिसल गया और वह पुल से नीचे गिर गई  ..... महिला को नदी में बहता देख पुल के पास खड़े दो युवक सत्यम पटेल और शिवम पटेल उसे बचने नदी में कूद गये  .... इसी दौरान सत्यम नें महिला को बचा लिया परंतु खुद तेज बहाब में फंस कर बह गया  .... युवक सत्यम का देर शाम तक पता नहीं चल पाया हैं  ....   

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Dakhal News 10 August 2019


sambal yojna

अपात्र लोगों ने लिया योजना का फायदा एमपी के श्रम मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया ने सम्बल योजना में हुए घोटाले को लेकर बड़ा बयान  देते हुए कहा की सम्बल योजना में पाए जाने वाले अपात्र कार्डों  पर कार्यवाई की जाएगी सिसोदिया ने आशंका जताई है  कि संबल योजना के 40 से 50 फीसदी हितग्राही फर्जी हो सकते हैं | जांच में दोषी पाए जाने वालों  के खिलाफ  एफआईआर भी होगी | पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  द्वारा श्रमिकों के लिए चलाई गई  जनकल्याण सम्बल योजना में घोटाला  सामने आने की बात कही जा रही है | श्रम मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया ने इस पर बयान देते हुए  कहा की  जो लोग इस योजना का लाभ ले रहें है ,  अपात्र होने पर उनपर कार्यवाई की जाएगी  | आरोप लगाए जा रहे हैं की सम्बल योजना के तहत बीजेपी कार्यकर्ताओं ने मजदूर बनकर फर्जी कार्ड बनवाये हैं | गरीब श्रमिकों के लिए बनी सम्बल योजना का लाभ अपात्र लोगों द्वारा उठाया जा रहा है | महेंद्र सिंह सिसोदिया ने  आशंका जताई कि संबल योजना के 40 से 50 फीसदी हितग्राही फर्जी हो सकते हैं श्रम मंत्री ने बताया कि सेम्पल सर्वे में सिंगरौली की कुल जनसंख्या से लगभग दोगुने श्रमिकों का पंजीयन योजना में हुआ  अन्य जिलों में भी बड़ी मात्रा में कुल आबादी के 85 फीसदी श्रमिकों का पंजीयन किया गया  इस सब की एक से पंद्रह जुलाई के बीच जांच कराई जाएगी दोषी पाए जाने पर ऐसे लोगों के खिलाफ  एफआईआर भी दर्ज करवाई जाएगी

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Dakhal News 26 June 2019


shram daan

राजनीति  के साथ सामाजिक दायित्व जरूरी   जल रक्षा अभियान में जुटे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और जबलपुर के सांसद  राकेश सिंह ने  गौर नदी के उद्गम स्थल पर  हजारों लोगों के साथ श्रमदान करते हुए कहा ,   अगर आने वाली पीढ़ियों का जीवन सुरक्षित बनाना है तो हर कीमत पर जल की रक्षा करनी  पड़ेगी राजनीति के अलावा हमें अपने सामाजिक दायित्वों को भी निभाना पड़ेगा  | जबलपुर में जल संरक्षण को लेकर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने गौर नदी के उदगम  स्थल पर कार्यकर्ताओं के साथ श्रमदान किया  | राकेश सिंह ने स्वयं तस्सल और फावड़ा उठाकर श्रमदान करते नजर आए | राकेश सिंह ने कहा कि राजनीति के अलावा हमें अपने सामाजिक दायित्वों के लिए न सिर्फ जागरूक होना पड़ेगा बल्कि  आगे बढ़कर काम भी करना पड़ेगा | अगर आने वाली पीढ़ियों का जीवन सुरक्षित बनाना है तो हर कीमत पर जल की रक्षा करना पड़ेगी |उल्लेखनीय है कि राकेश सिंह पिछले कई वर्षों से जल रक्षा के अभियान में जुटे हुए हैं | लेकिन इस बार उन्होंने जो अभियान प्रारंभ किया है उसके परिणाम दूरगामी हों, ऐसी ठोस योजना तैयार की गई है |

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Dakhal News 26 June 2019


aarakshan

  मुख्‍यमंत्री कमलनाथ की अध्‍यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में सामन्य वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण को हरी झंडी देने के साथ साथ कई और महत्वपूर्ण मुद्दों  पर चर्चा की गई | मंत्री पीसी शर्मा  ने  कैबिनेट में लिए गए फैसलों की जानकारी देते हुए बताय की मॉब लिंचिंग  के मामले में जिम्‍मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी बार लाइसेंस में बदलाव, इंदौर और भोपाल  मेट्रो , शिक्षा विभाग  सहित कई विषयों पर कैबिनेट में चर्चा की गई |  मुख्‍यमंत्री कमलनाथ की अध्‍यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में सामान्य वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के  प्रस्‍ताव को हरी झंडी दे दी गई | आरक्षण को  निर्धारित करते हुए कहा गया की  जिसकी आय 8 लाख से कम होगी उनको आरक्षण का लाभ दिया जायेगा  | कैबिनेट मंत्री पी सी शर्मा ने बताया की  मॉब लिंचिंग के मामले में जिम्‍मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी इसमें 3 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है | इंदौर और भोपाल में मेट्रो चलाने के प्रस्‍ताव के साथ ही बैठक में अन्‍य महत्‍वपूर्ण प्रस्‍तावों पर भी चर्चा की गई  | बैठक में बताया गया कि इंदौर मेट्रो में 7500 करोड़ और भोपाल मेट्रो पर 6900 करोड़ की लागत प्रस्‍तावित की गई है | बैठक में  फैसला लिया गया की   राज्‍य में  निजी पशु चिकित्‍सा महाविद्यालय खोले जायेंगे |  विधि विभाग कोर्ट फीस में इजाफा करने के प्रस्‍ताव को भी स्‍वीकृति दे दी गई | बार लाइसेंस में बदलाव करते हुए  इसमें कमरों की संख्‍या दस से बढ़ाकर 25 कर दी  गई  है |    

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Dakhal News 26 June 2019


धर्मेंद्र प्रधान

धर्मेंद्र प्रधान हालिया चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत मोदी सरकार के विकास कार्यों पर जनता-जनार्दन की मुहर है। लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम भले ही राजनीतिक विश्लेषकों के लिए अप्रत्याशित रहे हों, लेकिन इस चुनाव ने भारत में राजनीति के परंपरागत तौर-तरीकों को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है। जाति-समीकरणों की बुनियाद पर टिके सियासी दल और उनकी स्वार्थपरक राजनीति न सिर्फ ध्वस्त हुई है, बल्कि पहली बार विकास की आकांक्षा से युक्त समाज ने सकारात्मक वोट कर मौजूदा सरकार को ही दोबारा जनादेश दिया। 2015 में एक्ट ईस्ट पॉलिसी को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान सिर्फ औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह सरकार और उसके तंत्र के लिए पूर्वी भारत में विकास की गाथा लिखने का 'मंत्र था, जिसके आधार पर पांच साल में मोदी सरकार ने विकास के मोर्चे पर देश के पूर्वी हिस्से के लिए कमाल काम कर दिखाया। हालिया चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत वास्तव में विकास कार्यों पर जनता-जनार्दन की अभिव्यक्ति है। प्रधानमंत्री ने स्वयं इसे ईमानदारी के लिए व्याकुल नागरिकों की आशा-आकांक्षा की विजय बताया। यह विजय एक-दो सफल सियासी रणनीतियों का नतीजा नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के विकास की उन समावेशी नीतियों का परिणाम है जिसमें देश के सभी हिस्सों और खासकर पूर्वी छोर को आजादी के बाद पहली बार बराबर का हक मिला। सरकार के साथ यह भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए अथक परिश्रम की पराकाष्ठा की भी विजय है। सरकार और संगठन समान ध्येय के बावजूद अपनी-अपनी मर्यादाओं से युक्त होते हैैं, किंतु प्रधानमंत्री मोदी के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी कार्यशैली से यह सिद्ध कर दिया कि अब राजनीति 'वंशवाद, 'जातिवाद और 'तुष्टीकरण से नहीं, बल्कि 'विकासवाद की बुनियाद पर आगे बढ़ेगी। अब दौर 'पॉलिटिक्स ऑफ परफॉर्मेंस का है, यानी जो परिणाम देगा, जनता उसे ही शासन करने का मौका देगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में गूंज रहे इस विकासवादी स्वर को समझने के लिए 2019 की इस विजयगाथा को समझना होगा। पूर्वी भारत देश की एक तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। तरक्की के शिखर को स्पर्श करने के लिए जरूरी सभी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों की उपलब्धता के बावजूद पिछड़ेपन का जितना दंश इस क्षेत्र ने झेला, शायद ही किसी भूभाग ने झेला हो। 2014 में मोदी सरकार ने सर्वप्रथम पिछली सरकारों द्वारा पूर्वोत्तर के विकास के नाम पर शुरू किए गए अधूरे कार्यों को संपूर्णता तक पहुंचाने का प्रयास किया। असम में 21 सालों से लंबित देश का सबसे लंबा डबलडेकर बोगी बिल रेल-सह-रोड ब्रिज इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड सुपर हाईवे प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'एक्ट ईस्ट नीति का ही नतीजा है। 2017 के बजट में मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर में रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 13,500 करोड़ रुपए रखे और 2018 में 43 परियोजनाओं पर 9,000 करोड़ रुपए की राशि नियोजित की गई। पूर्वोत्तर में जीवन की मूलभूत सुविधाएं पहुंचाकर वहां लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने का श्रेय मोदी सरकार को जाता है। लाखों लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का घर मिल चुका है। दुर्गम गांवों में बिजली पहुंचाई जा रही है। साथ ही करीब 30 लाख परिवारों को आयुष्मान भारत योजना के तहत सालाना पांच लाख रुपए तक मुफ्त स्वास्थ्य बीमा भी दिया गया। पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ-साथ पूर्वी भारत को दक्षिण-पूर्वी एशिया का एनर्जी गेटवे बनाने पर भी मोदी सरकार ने प्रमुखता से काम किया है। पूर्वोत्तर ग्रिड अब न सिर्फ पूर्वी भारत, बल्कि देश के शेष हिस्से की ऊर्जा जरूरतों को भी पूरी करेगी। असम को दी गई तेल रिफाइनरी और गैस पाइपलाइन की सौगात हो या फिर प्रधानमंत्री 'ऊर्जा गंगा परियोजना से पूर्वोत्तर के राज्यों को राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जोड़ा जाना, समग्र रूप से यह पूर्वोत्तर के विकास में 'हीरा (अर्थात हाईवे, इंटरनेट और रेलवे) जड़ने जैसा है। मोदी सरकार ने जो समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया, वह केंद्र-राज्य संबंधों को नई ऊंचाई देने वाला है। उत्तर प्रदेश के बलिया में मई 2016 में जब पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का शुभारंभ किया, तब राज्य में सपा सरकार थी। सियासी हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल के साथ भी केंद्र सरकार ने योजनाओं में कभी भेदभाव नहीं किया। यहां दुर्गापुर में रेलवे के 294 किमी लंबे रेल खंड का विद्युतीकरण, हिजली-नारायणगढ़ के बीच तीसरी रेल लाइन और जलपाईगुड़ी में 1938 करोड़ रुपए की योजनाओं की शुरुआत की। यही वजह है कि बंगाल जैसे राज्य में विपरीत हालात में भी भाजपा जनता का विश्वास जीतने में कामयाब हुई। पश्चिम बंगाल की तरह भाजपा को ओडिशा, झारखंड और असम जैसे राज्यों में भी खूब जन-समर्थन मिला। ओडिशा में केंद्र द्वारा कौशल विकास, जन-धन, उज्ज्वला, सौभाग्य, प्रधानमंत्री आवास योजना को सफलतापूर्वक लागू करने का नतीजा यह रहा कि वहां भाजपा अपना वोट प्रतिशत 38 प्रतिशत तक पहुंचाने के साथ ही आठ सीटें पर जीतने में सफल हुई। यदि अरुणाचल, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों की बात करें तो यहां पहले दिल्ली के नेता तभी देखे जाते थे, जब लोकसभा चुनाव हुआ करते थे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी हर साल पूर्वोत्तर के किसी न किसी राज्य के दौरे पर गए और अपनी सरकार की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। सरकार के लगभग हर मंत्रालय ने विकास के 'पूर्वोदय के लिए पूर्वी भारत को अपनी प्राथमिकता में शामिल किया। पिछले पांच साल में शायद ही ऐसा कोई महीना रहा हो जब किसी केंद्रीय मंत्री ने पूर्वोत्तर राज्यों में खुद जाकर केंद्र की योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट न ली हो। इससे बरसों तक खुद को अलग-थलग महसूस करने वाले लोगों को भी दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में रहने वाले दूसरे लोगों की तरह से भारतीय नागरिक होने का एहसास होने लगा। झारखंड, बिहार के साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा व पूर्वोत्तर के राज्यों की 88 में से 44 सीटों पर राजग की कामयाबी देश की तरक्की में 'पूर्वोदय की भूमिका को लेकर किए गए उसके संकल्प को साबित करती है। भारत भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी विविधताओं का देश है। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं पूर्वी भारत की संस्कृति के वैश्विक ब्रांड एंबेसडर बने। वह जिस राज्य में गए, उसकी बोली, भाषा के साथ उसके पहनावे को अपनाकर सांस्कृतिक समन्वय का संदेश दिया। इस जीत के संदेश को भारतीय सियासी व्यवस्था के साथ ही विश्व को भी समझना होगा। पूर्वी भारत विश्व के लिए आर्थिक एवं सांस्कृतिक संपन्न्ता का एक ऐसा केंद्र बिंदु बन रहा है, जो पड़ोसी देशों के साथ ही पूरे विश्व की शांति और समृद्धि की आकांक्षाओं की पूर्ति करेगा।(लेखक केंद्रीय मंत्री हैं)

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Dakhal News 2 June 2019


satish chandr varma

छत्तीसगढ़ सरकार के महाधिवक्ता का पद फिर एक बार चर्चा में है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि कनक तिवारी ने महाधिवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया है। उनकी जगह पर नई नियुक्ति कर दी गई है। वहीं, तिवारी का कहना है कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है। इधर सरकार ने अतिरिक्त महाधिवक्ता सतीशचंद वर्मा को नया महाधिवक्ता नियुक्त कर दिया है। तिवारी के महाधिवक्ता पद छोड़ने की खबर शुक्रवार की शाम अचानक आई। मुख्यमंत्री भूपेश उसी वक्त बस्तर से रायपुर लौटे थे। पुलिस लाइन स्थित हैलीपेड पर मीडिया से चर्चा में उन्होंने कहा कि तिवारी ने आगे कामकाज को संभालने में असमर्थतता जताते हुए इस्तीफा दिया है। इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया गया है। उन्होंने तिवारी के स्थान पर नई नियुक्ति की भी पुष्टि की।  जब तिवारी से बात की, तो उन्होंने अपने इस्तीफे की बात का खंडन किया। उन्होंने कहा कि मैं दृढ़तापूर्वक कह रहा हूं कि मैंने इस्तीफा नहीं दिया है। जब इस्तीफे पर दस्तखत नहीं किया तो मुख्यमंत्री के पास इस्तीफा कैसे पहुंच गया? इसके पहले एक बार और तिवारी के महाधिवक्ता पद से इस्तीफे की खबरें आई थीं। इस कारण तिवारी ने कहा कि ऐसा एक-दो बार नहीं, तीसरी और चौथी बार भी हो सकता है। सच्चाई यह है कि उन्होंने महाधिवक्ता का पद नहीं छोड़ा है। इधर, महाधिवक्ता पद पर नई नियुक्ति को लेकर अतिरिक्त महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने नईदुनिया को बताया कि उनके नाम की घोषणा हो गई है। उन्हें शासन से इस विषय में आदेश की प्रति मिली है।

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Dakhal News 1 June 2019


nabalig

पुलिस और परिवार को नहीं लगी भनक    पुलिस एक नाबालिग लड़की की तलाश कितनी शिद्दत से कर रही थी।इसका उदहारण तब देखने को मिला  जब उसी नाबालिग लड़की की शादी का रिशेप्शन थाने से महज कुछ ही दूरी पर नगरपालिका के मंगल भवन में चल रहा था। और पुलिस को भनक तक नहीं थी | हद तब हुई जब लड़की के घर वालों को पता चला।और पुलिस को सुचना दी। तब पुलिस हरकत में आई। अब कहा तो यही जायेगा की मध्यप्रदेश की पुलिस वाकई गज़ब है सबसे अज़ब है | पुलिस जिस नाबालिग लड़की की पिछले कई दिनों से तलाश कर रही थी। उसी नवालिक की शादी का रिसेप्शन धूम धाम से हो रहा था | हैरानी की बात यह हैं की। नगर पालिका का मंगल भवन बुक किया गया।  शादी और रिशेप्शन के कार्ड छपे और पुरे गावं में बाटे गए। लेकिन न तो घर वालों को पता चला और ना ही पुलिस वालों को जब धूमधाम से रिशेप्शन हो रहा था और लोग दुल्हन बनी खड़ी नाबालिग को आशीर्वाद दे रहे थे तो गावं के ही किसी व्यक्ति ने घर वालों को उनकी बेटी के बारे में बताया।  और जब घर वाले पहुंचे तो पूरी घटना की सुचना पुलिस को दी जिसके बाद पुलिस लड़का और लड़की को थाने ले गयी अब पुलिस मामला दर्ज कर कार्यवाही की बात कर रही हैं। आपको बता दे की मामला गाडरवारा थाने का है जहां सुब्बा बाई ने अपनी नाबालिक लड़की के  गुमशुदगी की 7 मई को थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी | पर 10 दिनों तक लड़की का कुछ पता नहीं चला था | सवाल यही उठता हैं की पुलिस लड़कियों की गुमशुदगी को कितनी गंभीरता से लेती हैं। और उनको तलाशने के क्या प्रयास करती हैं |  

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Dakhal News 1 June 2019


rewa murder

  रीवा में कानून व्यवस्था कितनी ख़राब है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की आसिफ अंसारी नामक युवक को सरेआम  चाकू मारकर  हत्या कर दी गयी  ... मोटरसाइकल सवार युवकों ने इस वारदात को अंजाम दिया रीवा के अमहिया मोहल्ले में दिनदहाड़े सरेआम कुछ बाइक सवार युवकों ने  आसिफ अंसारी नामक युवक को चाकू मारकर हत्या कर दी   ... बताया जा रहा है की अमहिया स्थित बड़ी दरगाह के सामने नकाबपोश बाइकसवार युवकों ने अचानक एक व्यक्ति पर  चाकुओं से हमला कर दिया   ... हमले में आसिफ अंसारी नामक युवक की मौके पर ही मौत हो गयी  ...घटना की सूचना मिलते ही सिविल लाइन  पुलिस मौके पर  पहुँची पर तब तक आरोपी फरार हो चुके थे  ...कुछ स्थानीय लोगों द्वारा आरोपियों को रोकने का प्रयास किया गया  , लेकिन आरोपी पल्सर बाइक छोड़ कर भागने में कामयाब हो गए   ...  सिविल लाइन टी आई शशीकांत चौरसिया का कहना है कि  अभी मामले की विवेचना की जा रही है    ...  जो पल्सर गाड़ी मिली है उसका रजिस्ट्रेशन दिखाया जा रहा है और हम जल्द इस मामले का खुलासा करेंगे   ... आये दिनों रीवा में बढ़ते अपराधों से कानून व्यवस्था सवालों के खेरे में आ चुकी है  ... 

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Dakhal News 1 June 2019


namo modi

रायपुर में विजय संकल्प मोटर सायकल रैली निकालकर भाजपा ने लोकसभा चुनाव का शंखनाद किया। पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने भाजपा कार्यालय एकात्म परिसर में रैली को झंडी दिखाकर रवाना किया। नमो अगेन के नारे के साथ सभी 90 विधानसभा में एक साथ बाइक रैली निकाली गई। रायपुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में रैली डीडीनगर गोल चौक से प्रारंभ होकर भारत माता चौक गुढ़ियारी में सम्पन्न हुई। सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने रैली की अगुवाई की। दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के जोश और उत्साह के साथ बुढ़ापारा से बुढ़ीमाता चौक होते हुए सिविल लाइन तक रैली का आयोजन किया गया। रैली में प्रमुख रूप से दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के विधायक बृजमोहन अग्रवाल, सुनील सोनी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। रायपुर ग्रामीण विधानसभा की पचपेड़ी नाका से देवपुरी तक एवं भनपुरी से बिरगांव तक रैली निकली। इसमें सधिादानंद उपासने, राजीव कुमार अग्रवाल शामिल हुए। भाजपा कार्यालय एकात्म परिसर में उत्तर विधानसभा क्षेत्र की रैली को डॉ. रमन सिंह ने झंडी दिखाकर रवाना किया। रैली की अगुवाई सांसद रमेश बैस ने की। रैली में श्रीचंद सुन्दरानी, संजय श्रीवास्तव एवं छगनलाल मूंदड़ा उपस्थित थे। एकात्म परिसर से प्रारंभ होकर यह रैली जेल रोड चौक, फाफाडीह चौक, स्टेशन चौक, तेलघानी नाका, राठौर चौक, तात्यापारा चौक होते हुए फूलचौक, जयस्तंभ चौक, कचहरी चौक, बस स्टैंड, लोधीपारा चौक, अशोका टॉवर चौक से भगतसिंह चौक, गौरव पथ होते हुए मरीन ड्राईव में सम्पन्न् हुई। सांसद रमेश बैस ने कहा कि भाजपा कार्यकर्ता को इस बात का फर्क नहीं पड़ता कि वह सत्तापक्ष में है या विपक्ष में। जनता के लिए कार्य करना अंत्योदय के सिद्धांत पर चलना, जनहित के साथ देशहित को सर्वोपरि रखना ही भाजपा कार्यकर्ताओं की पहचान है। विजय संकल्प मोटर सायकल रैली में लोकेश कावड़िया, अशोक पांडेय, राजेश पांडेय, अकबर अली, उमेश घोड़मोड़े, फनीन्द्र तिवारी, आकाश तिवारी, रायपुर ग्रामीण से राहुल ठाकुर, भोला साहू सहित अन्य मौजूद थे। बृजमोहन अग्रवाल अपनी एक्टिवा लेकर निकले, उनके पीछे भाजपा अनुसूचित जन जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविचार नेताम बैठे थे। अग्रवाल ने कहा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सफलता के शिखर की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्र में सुशासन, विकास और सुरक्षा के लिए मोदी की सरकार जरूरी है। नेताम ने कहा कि देश के गांव, गरीब और किसानों की चिंता इमानदारी के साथ किसी ने की है तो वह मोदी हैं।  

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Dakhal News 3 March 2019


इमरती देवी

  महिला बाल विकास मंत्री श्रीमती इमरती देवी ने आज सुबह अंकुर स्कूल स्थित आँगनवाड़ी केन्द्र का आकस्मिक निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिये कि सभी आँगनवाड़ियों में बिजली और पानी की व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करें। अगर कहीं परेशानी आ रही हो, तो वे स्वयं ऊर्जा मंत्री से इस संबंध में चर्चा करेंगी। श्रीमती इमरती देवी ने कहा कि शासन द्वारा बालिकाओं में स्वच्छता की आदत को बढ़ावा देने की योजना को मूर्तरूप दिया जा रहा है। इस योजना में आँगनवाड़ी से सम्बद्ध 12 वर्ष से अधिक उम्र की बच्चियों को दो वर्ष के लिए नि:शुल्क सेनटरी नेपकिन दिया जायेगा। महिला बाल विकास मंत्री ने आँगनवाड़ी में उपस्थित लगभग 82 बच्चों, दस दात्री महिलाओं तथा 6 गर्भवती महिलाओं से सीधा संवाद किया और मंगल दिवस, मातृ वंदना योजना तथा आँगनवाड़ियों में दिये जा रहे भोजन आदि के संबंध में जानकारी प्राप्त की। श्रीमती इमरती देवी ने बच्चों को चॉकलेट और बिस्कुट भी वितरित किये।  

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Dakhal News 18 January 2019


 यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम अक्टूबर में लागू होगी

    अम्बिकापुर में  स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में इसी साल अक्टूबर के महीने से यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम का लाभ प्रदेशवासियों को मिलना शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत सितंबर महीने तक की राशि बीमा कंपनी के पास जमा है। उक्त अवधि तक छत्तीसगढ़ सरकार यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम को व्यवस्थित तरीके से लागू करने उप स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक सारी व्यवस्था सुनिश्चित कर लेगी। अंबिकापुर में चर्चा के दौरान स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में लगभग 500 प्रकार के बीमारियों के इलाज के लिए जो दर निर्धारित की गई है उससे चिकित्सक संतुष्ट नहीं है। यदि वे उक्त योजना के तहत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा रहे हैं तो यह उनका अपना आउटलुक है। राज्य सरकार को जनता के हित का दायरा बढ़ाना है। हमारा मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्वास्थ्य का अधिकार दिलाना है। इसे एक दायरे तक बांध कर नहीं रखना है। आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत जारी स्मार्ट कार्ड चलायमान हैं। सरकार की मंशा यह है कि प्राथमिक स्तर पर ही लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलें। यह बात निकलकर सामने आई है कि पचासी से 90 फीसद लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर साधारण बीमारियों की दवाइयां और डायग्नोस्टिक सुविधा मिलनी चाहिए। इस व्यवस्था को सरकार मितानिन से लेकर उप स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि शेष गम्भीर मरीजों के लिए बड़े अस्पताल में व्यवस्था होगी। इसमें इलाज के खर्चे की कोई सीमा निर्धारित नहीं रहेगी। जिसे 10 रुपये की दवा की जरूरत होगी वह भी मिलेगी और जिनके इलाज में 20 लाख खर्च होगा उस खर्चे की भरपाई भी सरकार करेगी। टीएस सिंहदेव ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत बीमा कंपनी को 184 करोड़ से अधिक की राशि देनी पड़ रही है। इसके बावजूद चिकित्सक योजना की सफलता की दर को लेकर असंतुष्ट हैं।    

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Dakhal News 18 January 2019


मुठभेड़ में  सामान छोड़कर भागे नक्सली

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश की सीमा पर राजनांदगांव जिले में शुक्रवार को पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हो गई। इस मुठभेड़ के दौरान दोनों ओर से गोलियां चलीं, लेकिन नक्सली मोर्चा छोड़कर भाग गए। मुठभेड़ स्थल पर नक्सली अपना सामान भी छोड़कर भाग खड़े हुए। घटना स्थल से बड़ी तादात में बम बनाने का सामान और नक्सली कैंप के सामान बरामद किए गए हैं। घटना के बारे में जानकारी देते हुए जिले के पुलिस अधीक्षक कमल लोचन कश्यप ने बताया कि गातापार थाना क्षेत्र में स्थित भावे के जंगल में नक्सलियों के जमावड़े की खबर मिली थी। वे यहां कैंप लगाने की तैयारी में थे। यह क्षेत्र मध्यप्रदेश की सीमा से करीब 10 किलोमीटर पहले है। मौके पर फोर्स भेजी गई। फोर्स की आहट लगते ही नक्सलियों ने दूसरी ओर से फायरिंग शुरू कर दी और वहां से भाग गए, लेकिन कैंप का सारा सामना और बम बनाने की सामग्री छोड़ गए। क्षेत्र में अभी भी सघन सर्चिंग जारी है। फोर्स नक्सलियों का पीछा कर रही है।  

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Dakhal News 18 January 2019


बीना-इटारसी में सोलर ऊर्जा से बिजली पैदा करेगा रेलवे

भोपाल रेलवे स्टेशन के बाद अब रेलवे बीना और इटारसी में भी सोलर ऊर्जा से बिजली पैदा करेगा। इसे लेकर रेलवे ने तैयारी शुरू कर दी है। बीना में सोलर प्लांट बनाने का काम शुरू कर दिया है। यहां 1000 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है। इटारसी में भी सोलर ऊर्जा से बिजली बनाने का प्लान है। लेकिन, बीना में प्रस्तावित प्लांट का काम पूरा होने के बाद इटारसी में काम चालू किया जाएगा। सोलर ऊर्जा से बनने वाली बिजली का उपयोग रेलवे स्टेशन व रेलवे में दफ्तरों में किया जाएगा। इन दो सेक्शनों में बिजली उपयोग करने के बाद जो बिजली बचेगी उसे ओएचई लाइन से जोड़कर ट्रेनों के संचालन में दी जाएगी। भोपाल स्टेशन के प्लेटफार्म के शेडों की छतों पर सोलर पैनल लगाए गए थे। यह काम गुजरात की एक निजी कंपनी को दिया गया था। कंपनी ने पांच प्लेटफार्म के शेडों पर ये पैनल लगवा कर बिजली बनाना शुरू कर दिया है। एक प्लेटफार्म पर 150 मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है। इस तरह 750 मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य है। इसमें से करीब 50 फीसदी बिजली बनने लगी है, जो स्टेशन के उपयोग में खर्च की जा रही है। वहीं भोपाल स्टेशन की तर्ज पर हबीबगंज स्थित डीआरएम दफ्तर की छत पर भी सोलर पैनल लगाए गए हैं, यहां भी बिजली बन रही है जो दफ्तरों में उपयोग की जा रही है। भोपाल रेल मंडल में सोलर पैनल से 1000 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है। यह बिजली अकेले रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मों पर लगे शेडों की छतों पर पैनल लगाकर बनाई जानी है। बीना प्लांट में तो अलग से बिजली तैयार की जाएगी। प्लेटफार्मों के शेड पर जो कंपनी सोलर पैनल से बिजली तैयार कर रही है वह रेलवे को फ्री में बिजली नहीं देगी। बल्कि रेलवे को एक यूनिट बिजली के बदले 5 रुपए 20 पैसे तक चुकाने होंगे। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि सिस्टम लगाने का काम निजी कंपनियां कर रही हैं। रेलवे ने इन कंपनियों को केवल प्लेटफार्म के शेड की छतें दी हैं, बाकी का पूरा खर्च कंपनियां ही उठा रही हैं। इसलिए पैदा होने वाली बिजली पर कंपनी का ही हक होगा। रेलवे को शुल्क चुकाकर बिजली खरीदनी होगी। डीआरएम शोभन चौधरी का कहना है सोलर ऊर्जा से बिजली तैयार करने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। भोपाल में बिजली बनने लगी है। अगला लक्ष्य बीना का है। सोलर ऊर्जा से बिजली बनाने से पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा। प्राकृतिक संसाधन के दोहन से भी बच सकेंगे

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Dakhal News 26 December 2018


sarafa

इस साल की दीपावली सराफा के लिए उतनी अच्छी नहीं रहने की बात कही जा रही है। भले ही अभी मार्केट में गहनों की नई डिजाइनें आ गई हो लेकिन इन डिजाइनों के अलावा और नई डिजाइन अगर आप चाह रहे हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। बताया जा रहा है कि इसका कारण त्योहारी सीजन के साथ ही इन दिनों चुनावी सीजन का शुरू होना है। इसके चलते त्योहार के ठीक पहले सराफा में बाहर से आने वाले कच्चा माल नहीं आ पा रहा है और अगर पहुंच भी रहा है तो इतना विलंब हो जा रहा है कि माल पहुंचने का कोई मतलब नहीं हो पा रहा है। सराफा कारोबारियों का कहना है कि इसके चलते इस साल दीपावली में कारोबार पिछले सीजन की अपेक्षा 20 फीसद तक कम हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार कुछ समय पहले तक त्योहारों को देखते हुए राजधानी में 10 करोड़ का कच्चा माल और बने हुए आभूषण आ रहे थे, लेकिन बताया जा रहा है कि इन दिनों कच्चा माल आने में काफी परेशानी हो गई है। माल मंगाने में होने वाली परेशानियों को देखते हुए बहुत से कारोबारियों ने तो माल मंगाना ही बंद कर दिया है। कारोबारियों का भी कहना है कि गहनों की जितनी नई रेंज मार्केट में आ चुकी है,उसे दीपावली में पेश किया जाएगा। अगले हफ्ते ही सराफा के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाला पुष्य नक्षत्र भी है,जिसकी वजह से कारोबारी अब माल मंगाने से ज्यादा कारोबार पर ही फोकस करने लगे हैं। कम हुए बाहर के आर्डर बताया जा रहा है कि माल आने में परेशानी को देखते हुए इन दिनों बाहर के आर्डर भी कम हो गए हैं तथा त्योहार की नजदीकी को देखते हुए कारोबारी उनके पास रखे स्टॉक पर ही कारोबार की रफ्तार बढ़ाने की सोच रहे हैं। कारोबारियों का भी कहना है कि इस साल पिछले साल की तुलना में बाहर के आर्डर भी अब काफी कम हो जाएंगे। आ रही परेशानियों को देखते हुए कारोबारी भी हाथ खींचने में लगे हैं। -रायपुर सराफा एसोसिएशन के हरख मालू का कहना है व्यापारी के पास अगर पूरे कागजात मिलते हैं तो उसे किसी भी प्रकार से परेशान नहीं किया जाना चाहिए।  

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Dakhal News 23 October 2018


डिजियाना की स्‍कार्पियो से 60 लाख बरामद

  छतरपुर में  आदर्श आचार संहिता के दौरान सघन चेकिंग अभियान के दौरान पुलिस ने एक स्कार्पियो वाहन से 60 लाख रुपए कैश जब्त कि या है। पुलिस ने कै श जब्त कर मामला इनकम टैक्स विभाग को सौंप दिया है। उधर जिस डिजियाना कंपनी के वाहन से यह कैश जब्त कि या गया है उसने जिला कलेक्टर को पैन कार्ड नंबर सहित दस्तावेज सौंपे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पुलिस द्वारा संपूर्ण जिले में वाहनों की नियमित चेकिंग की जा रही है। इसी के तहत सोमवार को जिला मुख्यालय के महोबा रोड पर आरटीओ कार्यालय के पास पुलिस द्वारा चेकिंग अभियान चलाया जा रहा था। मुखबिर की सूचना पर सरबई से छतरपुर के लिए आ रही एक नीले रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी क्रमांक एमपी 16 सी 8759 को रोककर जब पुलिस ने तलाशी ली तो उसमें से 60 लाख रुपए की बड़ी रकम नगद प्राप्त हुई। पुलिस ने स्कॉर्पियो में सवार तीन व्यक्तियों अरविन्द्र कु मार, अनिल सोलंकी और एक अन्य से पूछताछ की और बाद में रुपए जब्त कर मामला इनकम टैक्स विभाग के सुपुर्द कर दिया। सोमवार को जिस स्कार्पियो वाहन से बड़ी रकम जब्त की गई वह वाहन और कर्मचारी जिले में बालू का ठेका लेने वाली डिजियाना कंपनी के हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए छतरपुर जिला आयकर अधिकारी रामचंद्र और अनुविभागीय अधिकारी कमलेशपुरी भी पहुंच गए हैं। कंपनी ने तुरंत इस मामले में सक्रिय होकर छतरपुर कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी रमेश भंडारी के नाम एक आवेदन देकर बताया है कि कंपनी छतरपुर जिले की के न नदी में नेहरा, बारबंद1, बारबंद2, बारीखेड़ा नामक बालू की खदानें चलाती है। पुलिस द्वारा पकड़ी गई रकम कंपनी के एक्सिस बैंक के खाता क्रमांक 917020075930197 में जमा करने के लिए लाया जा रहा था। डिजियाना कंपनी ने अपना पेन नम्बर बताते हुए कहा कि उनकी पकड़ी गई रकम पूरी तरह से वैध है। बहरहाल, मामले का पर्दाफाश आयकर विभाग की जांच के बाद माना जा रहा है।  

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Dakhal News 23 October 2018


गुजरात में  23 शेरों की मौत

गुजरात स्थित गिर के जंगल में मंगलवार को दो और शेरों की मौत हो गई। इन मौतों के साथ ही गिर में 12 सितंबर के बाद शेरों की मौत की संख्या 23 पहुंच गई है। शेरों की इस तरह हो रही मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। सर्वोच्च न्यायलय ने मामले में संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र सरकार से पूछा है कि यह मौते क्यों हो रही हैं। मामले में वन विभाग के अपर मुख्य सचिव राजीव कुमार गुप्ता ने बताया कि मंगलवार सुबह दोनों शेरों को इन्फेक्शन के चलते बचाव गृह लाया गया था। जहां दोनों की मौत हो गई। बता दें कि इसके पहले सोमवार को 7 और शेरों के शव मिले थे। अज्ञात वायरस के चलते 14 शेरों की मौत पहले ही हो चुकी थी। शेरों के एनआइवी सैंपल जांच के लिए पुणे भेजे गए हैं। एफएसएल की टीम भी जंगल का निरीक्षण कर रही है। वनमंत्री गणपतसिंह वसावा ने पिछले दिनो ही जूनागढ़ के पास गिर का दौरा कर मृत शेरों के बारे में जानकारी हासिल की थी। चार शेरों में वायरस मिलने के बाद शेरों को संक्रमण से बचाने के लिए अमरीका से विशेष इंजेक्शन मंगाए जा रहे हैं। शेरों की मौत की घटना के बाद करीब 550 वनकर्मियों की 140 टीमों ने 24 सितंबर से शेरों के निरीक्षण का काम शुरू किया था। इस दौरान 600 शेरों में से 9 बीमार पाए गए, जिनमें से 4 का वहीं उपचार किया और 5 को उपचार के लिए बचाव गृह लाया गया था। यहां इलाज के दौरान मंगलवार को दो और की मौत हो गई।

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Dakhal News 3 October 2018


bastar naxli

  छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में मंगलवार को पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में तीन नक्सली ढेर हो गए। मिली जानकारी के मुताबिक सुकमा जिले के मर्कागुड़ा और मुलेर के जंगल में डीआरजी और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की सूचना मिली है। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस मुठभेड़ में तीन नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। हालांकि उनके शव बरामद नहीं हुए हैं। इसके अलावा कई नक्सलियों के घायल होने की भी सूचना है। पुलिस ने एक नक्सली को जिंदा गिरफ्तार कर लिया है। फूल बगड़ी थाना क्षेत्र में हुई इस वारदात में पुलिस को घटना स्थल से एक 315 बोर पिस्टल, 4 भरमार, एक पाइप बम और दैनिक उपयोगी सामग्री बरामद हुई है। 5 लाख की इनामी महिला नक्सली ने किया समर्पण पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा बस्तर में चलाए जा रहे प्रभावी अभियान और शासन की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर बस्तर क्षेत्र में लगातार नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इसी कड़ी में बुधवार को बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा के समक्ष 3 नक्सलियों ने आत्म समर्पण किया। आत्मसर्पण करने वाले नक्सलियों में एक 10 लाख का इनामी कमाण्डर सहित एक 5 लाख की इनामी महिला नक्सली शामिल है। आत्मसर्पण करने वाले नक्सलियों का बस्तर आईजी विवेकानंद सिन्हा ने समाज की मुख्यधारा में स्वागत किया है साथ ही उन्हें सहयोग और पुनर्वास का आश्वासन दिया गया है। जानकारी के मुताबिक आत्मसर्पण करने वाला 10 लाख का इनामी सोभी उर्फ नागू कतलाम नारायणपुर जिले के अंतर्गत अमदईघाट में एरिया कमाण्डर के रूप में पिछले कई वर्षों से काम कर रहा था। साल 2004 में सोभी को बाल नक्सली के रूप में संगठन में बलपूर्वक शामिल किया गया था। सोभी पर नारायणपुर जिले में कई बड़ी वारदातों में शामिल होने का आरोप है। वहीं आत्मसर्पण करने वाली महिला नक्सली सुमित्रा साहू पर भी पांच लाख का इनाम घोषित है। सुमित्रा अपने पति सोभी के साथ अमदईघाट क्षेत्र में एरिया कमेटी सदस्य के रूप में कार्यरत थी। उसके खिलाफ भी कई गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं। इनके साथ ही एक अन्य नक्सली बुधसन उर्फ भारत पदामि ने भी आत्मसमर्पण किया है। बुधसन इरकानार डीलएकेएमएस का सदस्य था।  

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Dakhal News 3 October 2018


सायबर क्राइम

  बाल आयोग की कार्यशाला में बोले सायबर क्राइम एआईजी सुदीप गोयनका वाट्सएप, फेसबुक या ईमेल के जरिए बच्चे किसी न किसी रूप में सायबर बुलिंग (धमकाना या भद्दे कमेंट) के शिकार हो जाते हैं। साथ ही सायबर स्टॉकिंग में भी फंस जाते हैं। कई बार ऐसा होता है कि कोई अनजान व्यक्ति बार-बार आपका प्रोफाइल चेक करता है और बार-बार फे्रंड रिक्वेस्ट भेजता है तो इसे सायबर स्टॉकिंग कहते हैं। जब तक आप सामने वाले को पूरी तरह से न जान जाएं, तब उसकी रिक्वेस्ट को स्वीकार न करें। यह बात सायबर क्राइम एआईजी सुदीप गोयनका ने शुक्रवार को समन्वय भवन में मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से आयोजित कार्यशाला में कही। उन्होंने बताया कि स्कूलों में प्राचार्यों और संचालकों को बच्चों को सायबर क्राइम के प्रति जागरूक करना होगा। साथ ही स्कूलों के पाठ्यक्रम में सायबर क्राइम को शामिल करना चाहिए। भले ही इसकी परीक्षा न ली जाए, लेकिन 5वीं से 12वीं तक सायबर क्राइम को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने वाट्सएप व फेसबुक के माध्यम से बच्चों द्वारा जाने-अनजाने में किए गए अपराधों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे से फेसबुक, वाट्सएप या ईमेल पर कोई गलती हो जाती है तो उसके बारे में अभिभावक, टीचर या पुलिस को जरूर बताएं। कार्यक्रम में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीआर) के तकनीकी सलाहकार रजनीकांत, मप्र बाल आयोग के अध्यक्ष राघवेंद्र शर्मा, सदस्य आशीष कपूर, जिला शिक्षा अधिकारी धर्मेंद्र शर्मा, राज्य शिक्षा केंद्र के रामाकांत तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थे। एआईजी गोयनका ने कहा कि 13 वर्ष की उम्र से बच्चा अपना फेसबुक प्रोफाइल और 18 वर्ष के बाद ईमेल आईडी बना सकता है। उन्होंने डिजिटल फुटप्रिंट को मैनेज करने के लिए विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने की सलाह भी दी। साथ ही उन्होंने कहा कि हर खाते का पासवर्ड वैसे ही अलग रखना चाहिए, जैसे हर कमरे का एक ताला और एक चाबी होता है। वहीं, राघवेंद्र शर्मा ने कहा कि आज समाज में संवेदना की कमी के कारण लैंगिक अपराध बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के मौलिक अपराधों का हनन आपराधिक श्रेणी में आता है। एनसीपीआर के तकनीकी सलाहकार रजनीकांत ने बताया कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर अलग-अलग विभागों की अलग-अलग गाइडलाइन बनी हुई है। इसके लिए एनसीपीआर ने सभी को मिलाकर एक गाइडलाइन की बुक तैयार की है। इसमें सुझाव भी आमंत्रित किए गए हैं। उन्होंने बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों में शिकायत पेटी लगाने पर जोर दिया। साथ ही कहा कि स्कूल की संरचना, प्रबंधन, सेनीटेशन, यातायात सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उनका मानना था कि 5वीं कक्षा के बाद ही बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा दी जानी चाहिए। बस्ते का बोझ कम करने के लिए साल भर के कोर्स की किताब को 3-3 महीने में बांटकर कोर्स की बुक बनानी होगी॥ सायबर क्राइम से बचने के उपाय अलग-अलग खाते का पासवर्ड अलग रखें।  किसी अनजान की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करें। कभी भी मोबाइल में भी अपना ईमेल या फेसबुक लॉगइन न रखें, बल्कि लॉग आउट कर दें। मोबाइल को पैटर्न नंबर या थंब लॉक न कर, पिन नंबर से लॉक करें। वाईफाई घर या ऑफिस में लगाए हैं तो पासवर्ड प्रोटेक्शन रखें।अपना ओटीपी शेयर न करें।सोशल अकाउंट में अपनी फोटो सही जानकारी या फोन नंबर न डालें। स्टेटस अपडेट में समय और स्थान न लिखें। किसी अनजान से चैटिंग न करें। कम्प्यूटर व मोबाइल के प्रति एडिक्ट न हों।  

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Dakhal News 29 September 2018


raman singh

अटल विकास यात्रा के तहत मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह शनिवार को पखांजूर पहुंचे। उन्होने यहां श्यामप्रसाद मुखर्जी स्टेडियम में जनसभा को संबोधित करते हुए पखांजूर में आगामी सत्र से कृषि महाविद्यालय खोले जाने की घोषणा की। डॉ रमन ने यहां अलग-अलग विकास कार्यों का लोकार्पण, भूमिपूजन व नई योजनाओं की आधारशिला रखते हुए लगभग 189 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात दी। उन्होंने कहा कि नीली क्रांति में पखांजूर पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर है। यहां का मछली पालन उद्योग दूसरे राज्यों के लिए मॉडल बन रहा है। यहां जिस तरह से तलाबों का विकास और मछली उत्पादन का विकास हुआ है, वह अपने आप में दूसरों के लिए मॉडल है। यहां लोगों में मछली पालन के द्वारा आत्मनिर्भरता आई है। लोगों की वार्षिक आय बढ़ी है। पूरा पखांजूर इलाका विकास की दृष्टि से आगे बढ़ रहा है। विभिन्न विकास कार्यों के शिलान्यास के साथ ही डॉ रमन ने यहां नवनिर्मित 132 केवी विद्युत उपकेंद्र का लोकार्पण भी किया प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद जो माहौल तैयार हुआ वह पूरी तरह विकास का समर्थन करता है। प्रदेश में गांवों से लेकर शहरों तक विकास हो रहा है। पहले न यहां सड़कें थीं, न बिजली थी। छत्तीसगढ़ में सरकार की ओर से विद्युत उत्पादन, वितरण, पारेषण, संधारण में लगातार बेहतर काम हुआ है। फ्लैट रेट पर 12 लाख लोगों को अब बिजली देने की व्यवस्था सरकार ने की है। एक पावर स्टेट के रूप में छत्तीसगढ़ ने देश भर में अपनी पहचान बनाई है।  

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Dakhal News 29 September 2018


ayodhya

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को इस मुद्दे पर सुनवाई हुई कि 'नमाज के लिए मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं?' तीन जजों की पीठ ने 1994 के उस फैसले पर फिर से विचार करने और केस को 7 जजों की बड़ी पीठ को भेजने से इन्कार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद जरूरी नहीं। यूं तो कहा जा रहा है कि इस फैसले का अयोध्या केस पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन जानकारों के मुताबिक, इस केस से जुड़ी दो बाते सीधी अयोध्या केस से जुड़ी हैं। दरअसल, 'नमाज के लिए मस्जिद' केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय कर दिया कि 29 अक्टूबर से अयोध्या केस की नियमित सुनवाई होगी। यानी इस फैसले के बाद अयोध्या केस की नियमित सुनाई का रास्ता साफ हो गया है। अगर यह केस बड़ी बेंच को जाता तो शायद अयोध्या केस भी अटक जाता। इस केस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम फैसला यह लिया है कि अयोध्या मामले को भी पांच जजों की बेंच को नहीं भेजा जाएगा। अब इस केस की सुनवाई भी तीन जजों की बेंच ही करेगी।

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Dakhal News 27 September 2018


raman singh

  रायपुर में  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को मंत्रालय (महानदी भवन) में कैबिनेट की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में लिए गए कई निर्णयों के साथ ही नक्सलियों के लिए आत्मसमर्पण नीति में सरकार ने और ज्यादा उदारता दिखाते हुए बड़े निर्णय लिए हैं। अब अलग-अलग तरह के हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने लिए अनुग्रह राशि की नई दरें तय की गई हैं। मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए निर्णय के मुताबिक हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को उनके विभिन्न शस्त्रों पर अनुग्रह राशि देने के पूर्व के प्रावधानों में शामिल हथियारों के अलावा अब अन्य शस्त्रों के लिए भी अनुग्रह राशि तय की गई है। नए निर्णय के मुताबिक रॉकेट लांचर 84 एमएम के साथ आत्मसमर्पण करने पर 5 लाख, त्रिर्ची असाल्ट (टीएआर) पर 3 लाख, इंसास रायफल के साथ आत्मसमर्पण करने पर 1.50 लाख, एक्स 95 असाल्ट रायफल/एमपी 9 टेक्टिकल पर 1 लाख, एक्स केलिबर 5.56 एमएम पर 60 हजार, यूबीजीएल अटेचमेंट पर 40 हजार, 315 बोर रायफल पर 30 हजार, ग्लाग पिस्टल 9 एमएम पर 25 हजार, प्रोजेक्टर 13/ 16/मस्केट रायफल/यूबीजीएल सेल पर 2 हजार की अनुग्रह राशि शासन द्वारा दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि राज्य शासन द्वारा 16 नवम्बर 2015 को जारी आदेश में नक्सल पीड़ित व्यक्तियों और आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास के लिए विस्तृत प्रावधान किए हैं, जिनमें एक प्रावधान यह भी है कि आत्मसमर्पित नक्सलियों ने यदि शस्त्रों के साथ समर्पण किया है, तो उसे समर्पित शस्त्रों के बदले मुआवजे के रूप में शासन द्वारा अनुग्रह राशि स्वीकृत की जा सकेगी, जिसमें एलएमजी के लिए 4.50 लाख, एके-47 के लिए 3 लाख, एसएलआर रायफल के लिए 1.50 लाख, थ्री-नॉट-थ्री रायफल के लिए 75 हजार, 12 बोर बंदूक के लिए 30 हजार, 2 इंच मोर्टार के लिए 2.50 लाख, सिंगल शॉट गन के लिए 30 हजार, 9 एमएम कार्बाइन के लिए 20 हजार, पिस्टल/ रिवाल्वर के लिए 20 हजार, वायरलेस सेट के लिए 5 हजार, रिमोट डिवाईस के लिए 3 हजार, आईआईडी के लिए 3 हजार, विस्फोटक पदार्थ के लिए 1000 स्र्पये प्रति किलो, ग्रेनेड/जिलेटिनरॉड के लिए 500 रुपए और सभी प्रकार के एम्युनिशन के लिए 5 हजार प्रति एम्युनिशन का प्रावधान रखा गया है। इस कड़ी में गुरुवार को केबिनेट की बैठक में नए प्रावधान जोड़े गए।    

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Dakhal News 27 September 2018


anup mishra

अगले दो महीने में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन सांसद अभी भी अपने क्षेत्र में सक्रिय नहीं हैं। इस वजह से एक बार फिर सांसदों को क्षेत्रीय जनता के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दिनों अनूप मिश्रा और भागीरथ प्रसाद को इस गुस्से से दो-चार होना पड़ा, जब स्थानीय लोगों ने संसदीय क्षेत्र में ही लापता होने के पोस्टर लगा दिए और पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत भी दर्ज की। अनूप मिश्रा के बारे में जानकारी देने पर 51 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया गया। यह सभी भाजपा के सांसद हैं। यह पहली बार नहीं है, जब सांसदों के लापता होने के पोस्टर उनके क्षेत्र में चिपकाए गए हैं। एक साल में भाजपा के आधा दर्जन से ज्यादा सांसदों के खिलाफ ऐसे अभियान चल चुके हैं। हालांकि पिछले दिनों ओबीसी और सामान्य वर्ग के लोगों ने एससी-एसटी एक्ट के विरोध में पोस्टर लगाए थे। दरअसल, भाजपा के कई सांसद अब अपने लिए विधानसभा सीट ढूंढ रहे हैं। भागीरथ प्रसाद खुद गोहद से विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक माने जा रहे हैं, वहीं अनूप मिश्रा की विधायक बनने की इच्छा किसी से छुपी नहीं है। गुमशुदगी के पोस्टर लगने के बाद भिंड सांसद भागीरथ प्रसाद ने कहा कि महज कुछ लोग क्षेत्र में मेरा विरोध कर रहे हैं। यह विरोध भी एससी-एसटी एक्ट को लेकर है। मैं लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहा हूं। पिछले एक हफ्ते से क्षेत्र से जुड़े विषयों पर ही बैठकें कर रहा हूं। कुछ लोगों के विरोध से मेरे द्वारा कराया गया विकास नहीं छुपेगा। नागेंद्र सिंह: अप्रैल 2018 में खजुराहो सांसद नागेंद्र सिंह के लापता होने के पोस्टर फेसबुक पर जारी किए गए। उनके संसदीय क्षेत्र में भी यह पोस्टर लगाकर लोगों ने नाराजगी जाहिर की। सुभाष पटेल: खरगोन सांसद सुभाष पटेल के खिलाफ ऐसे अभियान एक नहीं दो बार चल चुके हैं। पिछले साल कुछ ग्रामीणों ने उनके खिलाफ पोस्टर लगाए थे। ज्यादातर लोग सांसद के रवैये से नाराज थे। ज्ञान सिंह: मंत्री पद छोड़कर बेमन से सांसद बने ज्ञान सिंह को भी पिछले साल इस विरोध का सामना करना पड़ा। ज्ञान सिंह को गुमशुदा बताने वाला मैसेज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। सुषमा स्वराज: विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के खिलाफ भी विदिशा में पोस्टर अभियान चल चुका है। सुषमा स्वराज काफी समय अपने संसदीय क्षेत्र से दूर रहीं।  

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Dakhal News 17 September 2018


anandiben patel

  एमपी की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि भारत की भूमि इंजीनियरिंग की प्रयोगशाला रही है। भारत में कई ऐसे इंजीनियर हुए, जिन्होंने अकल्पनीय को कल्पनीय बनाया और इंजीनियरिंग के दुनिया में चमत्कार कहे जाने वाले उदाहरण प्रस्तुत किये। देश के इंजीनियर पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। राज्यपाल ने यह बात यहां इंजीनियर दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कही। इस अवसर पर उन्होंने उत्कृष्ट कार्य करने वाले इंजीनियरों को शाल, श्रीफल और स्मृति चिंह भेंट कर सम्मानित किया। समारोह का आयोजन मध्यप्रदेश यांत्रिकी सेवा संघ द्वारा किया गया। राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि देश के विकास और नागरिकों की समृद्धि में इंजीनियरों की भूमिका संरक्षक की तरह है। देश को ईमानदार, कर्मठ और समय के प्रति वचनबद्ध इंजीनियरों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा किइंजीनियर आधुनिक तकनीक का उपयोग कर निर्माण को गुणवत्तापूर्ण बनाने का प्रयास करें।युवा इंजीनियर देश के निर्माण में ईमानदारी और समय के प्रति वचनबद्ध होकर कार्य करें।राज्यपाल ने कहा किहमारे देश में सदियों पहले बनी कई इमारतें उत्कृष्ट इंजीनियरिंग कौशलता का प्रमाण है। लालकिला, ताजमहल, कई राजाओं के महल, नदियों पर बने घाट आज भी मौजूद है। राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि भारत में उत्कृष्ट नौकरी के अवसर देने में इंजीनियरिंग का क्षेत्र बहुत विकसित है। जब बात इंजीनियरिंग की सर्वश्रेष्ठ शाखाअथवा सबसे अधिक वेतन वाली शाखाओं के चयन की आती है, तो छात्र अक्सर भ्रमित हो जाते हैं। वर्तमान में इंजीनियरिंग की सही शाखा का चुनाव करना बहुत मुश्किल है। इंजीनियरिंग के क्षेत्रों में कम्प्यूटर साइंस/आईटी इंजीनियरिंग पिछले दशक में भारतीय अर्थ-व्यवस्था की मुख्य आधार के रूप में उभरी है। श्रीमती पटेल ने कहा कि आधुनिकता और इंजीनियरिंग के बढ़ते प्रभाव से हमें मानवता को नहीं भूलना चाहिए। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए इंजीनियरों को स्वयं विचार करना चाहिए। सहकारिता मंत्री श्री विश्वास सारंग ने कहा कि मध्यप्रदेश को बीमारू राज्य से विकसित राज्य बनाने में इंजीनियरों का महत्वपूर्ण योगदान है। समाज और देश के विकास में इंजीनियरों की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता है। मध्यप्रदेश यांत्रिकी सेवा संघ के अध्यक्ष श्री अखिलेष उपाध्याय ने अतिथियों का स्वागत किया।  

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Dakhal News 17 September 2018


naksli bastar

    सुकमा इलाके में पुलिस और सुरक्षा बलों की तेज कार्रवाई से बैकफुट पर आए नक्सली इन दिनों ग्रामीणों को अपना निशाना बना रहे हैं। बस्तर क्षेत्र में आए दिन ग्रामीणों की हत्या नक्सलियों द्वारा की जा रही है। सुकमा जिले के चिंतागुफा थाना क्षेत्र के मेटागुडेग इलाके में नक्सलियों द्वारा लगाए गए एक प्रेशर बम की चपेट में आने से दो ग्रामीणों की दर्दनाक मौत हो गई। ये ग्रामीण जंगल में मवेशी चराने गए थे। इसी बीच वे प्रेशर बम की चपेट में आ गए। मृतकों में एक महिला भी शामिल है। नक्सलियों ने यह प्रेशर बम पुलिस जवानों को निशाना बनाने के लिए लगाया था। क्षेत्र में सर्चिंग के लिए निकलने वाली पुलिस पार्टियां इसी रास्ते से होकर गुजरती हैं। पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा ने इस घटना की पुष्टि की है। हालांकि यह घटना 3 दिन पहले की है, लेकिन रिमोट एरिया होने की वजह से पुलिस को सोमवार को इस घटना की जानकारी मिली। सर्चिंग पर निकले सुरक्षा बलों को जंगल में दो शव नजर आए। ब्लास्ट की वजह से शवों के कई टुकड़े हो गए थे। मृतकों की अभी शिनाख्त नहीं हो पाई है। सुरक्षा के मद्देनजर क्षेत्र में सर्चिंग की जा रही है।  

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Dakhal News 17 September 2018


निकाह योजना गरीब परिवारों के लिये वरदान

एमपी के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने कहा है कि गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में मुख्यमंत्री कन्यादान और निकाह योजना वरदान सिद्ध हुई है। योजना में वर्ष 2006 से अभी तक लगभग पौने पाँच लाख बेटियों के हाथ पीले करने में सरकार ने मदद की है। इन परिवारों को 838 करोड़ 62 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। मंत्री श्री भार्गव ने बताया कि गरीब परिवारों की अविवाहित, तलाकशुदा, परित्यक्ता, विधवा बेटियों को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिये वर्ष 2006 से प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना प्रारम्भ की गई। लोगों की माँग और उपयोगिता को दृष्टिगत रखते हुए मुख्यमंत्री की पहल पर वर्ष 2012 से मुस्लिम बेटियों के लिये पृथक से मुख्यमंत्री निकाह योजना प्रारंभ की गई। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत अभी तक 4 लाख 59 हजार 336 परिवारों को 814 करोड़ 38 लाख 17 हजार रुपये तथा मुख्यमंत्री निकाह योजना के तहत 12 हजार 452 परिवारों को 24 करोड़ 24 लाख 76 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। आयुक्त सामाजिक न्याय ने बताया कि मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना में वर्ष 2006 में 13 हजार 438 परिवारों को 13 करोड़ 27 लाख रुपये, वर्ष 2007 में 33 हजार 321 परिवारों को 13 करोड़ 62 लाख रुपये, वर्ष 2008 में 43 हजार 737 परिवारों को 43 करोड़ 29 लाख, वर्ष 2009 में 19 हजार 597 परिवारों को 24 करोड़ 85 लाख रुपये, वर्ष 2010 में 39 हजार 647 परिवारों को 39 करोड़ 64 लाख, वर्ष 2011 में 36 हजार 651 परिवारों को 41 करोड़ 56 लाख, वर्ष 2012 में 45 हजार 252 परिवारों को 67 करोड़ 87 लाख, वर्ष 2013 में 55 हजार 334 परिवारों को 104 करोड़ 52 लाख रुपये, वर्ष 2014 में 20 हजार 77 परिवारों को 60 करोड़ 74 लाख, वर्ष 2015 में 44 हजार 835 परिवारों को 117 करोड़ 75 लाख, वर्ष 2016 में 44 हजार 818 परिवारों को 112 करोड़ 5 लाख, वर्ष 2017 में 34 हजार 446 परिवारों को 96 करोड़ 44 लाख तथा वर्ष 2018 में जुलाई माह तक 28 हजार 123 परिवारों को 78 करोड़ 74 लाख की सहायता राशि मुहैया करवाई गई है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री निकाह योजना के अंतर्गत वर्ष 2012 में 1766 परिवारों को 2 करोड़ 61 लाख, वर्ष 2013 में 2579 परिवारों को 4 करोड़ 74 लाख, वर्ष 2014 में 1248 परिवारों को एक करोड़ 23 लाख, वर्ष 2015 में 2139 परिवारों को 3 करोड़ 81 लाख, वर्ष 2016 में 1681 परिवारों को 4 करोड़ 70 लाख तथा वर्ष 2018 में जुलाई माह तक 1373 परिवारों को 3 करोड़ 85 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई।  

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Dakhal News 7 September 2018


atal bihari vajpeyi

  एक शिक्षक होना महज नौकरी नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है। देश में आने वाली पीढ़ी कैसी होगी, यह एक शिक्षक की सोच पर ही निर्भर करता है। प्राथमिक स्कूल के शिक्षक की जवाबदारी तो और अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसी भावना के साथ बड़वानी जिले में राजपुर स्थित प्राथमिक विद्यालय क्रमांक-4 की शिक्षिका सुश्री कमला जमरे ने बच्चों को शिक्षित करने के लिये अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।  राजपुर प्राथमिक विद्यालय क्रमांक-4 की शिक्षिका सुश्री कमला जमरे ने स्वयं के खर्च से स्मार्ट क्लॉस के लिये सुविधायें जुटाई हैं। उन्होंने एलसीडी टी.व्ही., शुद्ध पेयजल के लिये आर.ओ. मशीन, रेडियो और म्यूजिक सिस्टम स्कूल के लिये खरीदे हैं। शिक्षिका सुश्री कमला ने विद्यालय परिसर में जन-भागीदारी से बगीचा भी तैयार करवाया है, जहाँ बच्चों के लिये झूला और फिसलपट्टी लगवायी है। इसी शाला में पदस्थ एक अन्य शिक्षिका सुश्री राखी सोनी ने बच्चों को स्वच्छ पर्यावरण में रखने, पढ़ाने की जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है। जन शिक्षक श्री नवीन गुप्ता ने बताया कि क्षेत्र की अन्य दो प्राथमिक शालाओं में भी एलसीडी टी.व्ही. के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने की पहल शुरू की गई है।  

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Dakhal News 7 September 2018


mig

  राजस्थान के जोधपुर में सेना का विमान क्रैश हो गया है। जोधपुर में एयरफोर्स का एक लडाकू विमान मिग 27 मंगलवार सुबह बनेड़ा क्षेत्र के देवलिया गांव में गिर गया। इस विमान में एक पायलट था और दुर्घटना को भांपते हुए प्लेन से समय पर निकल गया जिससे उसकी जान बच गई। देवलिया गांव के पास दुर्घटना ग्रस्त विमान के कुछ देर बाद ही सेना का हेलीकॉप्टर मौके पर पहुंचा और पायलट को मिलिट्री हॉस्पिटल ले गए। वायु सेना ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं। जानकारी के अनुसार जोधपुर वायुसेना के एयरबेस से सुबह करीब आठ बजे नियमित उड़ान पर निकले मिग 27 में कुछमिनिट बाद ही पायलट को तकनीकी समस्या के संकेत मिल गए थे। पायलट इसे खुले मैदान की तरफ ले गया और खुद निकल गया। पायलट के एग्जिट होने के एक मिनट के अंदर ही यह विमान जमीन पर औंधे मुंह जा गिरा और इसमें आग लग गई।घटना स्थल से करीब दो किमी दूर पायलट जमीन पर गिरा। इसके कुछ देर बाद ही सेना का हेलीकॉप्टर पहुंचा और पायलट को लेकर चला गया। इस दौरान सेना ने विमान के मलबे के आस पास का क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिया।  

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Dakhal News 4 September 2018


mohnish mishra

  एमपीनगर में युवती को कार से अगवा करने वाले वाले मुख्य आरोपी समेत सात लोगों को पुलिस वारदात के चार दिन बाद भी गिरफ्तार नहीं कर पाई है। युवती ने कोर्ट में बयान देते समय एक बार फिर से दोहराया है कि क्रिकेटर मोहनीश मिश्रा आरोपित के साथ पहले से कार में बैठा था। सीसीटीवी में वह मारपीट करते हुए कैद हो गया है। इसके बाद भी एमपीनगर पुलिस उसको गिरफ्तार नहीं कर पाई है। बताया जा रहा है कि शहर के रसूखदारों ने पुलिस अफसरों को फोन कर आरोपितों को गिरफ्तार करने से रोक रखा है। हम यहां बता दें कि एमपी नगर इलाके में शुक्रवार की दोपहर सात लोगों ने कोचिंग की अकाउंटेंट युवती को कार में अगवा कर जमकर पिटाई की। इतना ही नहीं कोचिंग के वाइस प्रेसिडेंट से अफेयर होने की शंका में उसका गला दबाकर मारपीट करने के बाद कार से बाहर फेंककर चले गए। पुलिस वारदात के सात आरोपियों में घटना के चार दिन बाद भी गिरफ्तार नहीं कर सकी है। युवती ने कोर्ट में दिए बयान में एक बार फिर से दोहरा दिया है कि आरोपित आशीष के साथ क्रिकेटर मोहनीश मिश्रा बैठा था, लेकिन पुलिस उसको गिरफ्तार नहीं कर रही है। पुलिस अफसरों को रसूखदार मोहनीश को गिरफ्तार करने से रोक रहे हैं। एमपी नगर टीआई उपेंद्र भाटी का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है। आरोपियों के कई ठिकानों पर दबिश दी गई, लेकिन उनका पता नहीं चल सका है।    

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Dakhal News 4 September 2018


MP

वन अधिकारियों को जारी हुए विस्तृत निर्देश मध्यप्रदेश में इस वर्ष भी एक से 7 अक्टूबर, 2018 तक वन्य-प्राणी संरक्षण सप्ताह मनाया जायेगा। लोगों में वन और वन्य-प्राणियों के प्रति लगाव और जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से सप्ताह के दौरान विभिन्न आयोजन के लिये अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री आलोक कुमार ने प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व क्षेत्र संचालक, क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक, राष्ट्रीय उद्यान के संचालक, समस्त वन मण्डलाधिकारियों को निर्देश जारी कर दिये हैं। उल्लेखनीय है कि विगत वर्षों में बच्चों ने वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताओं में बहुत रुचि और उमंग से भाग लिया। इससे बच्चों में वन और वन्य-प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है। वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह के दौरान प्रदेश में स्कूली छात्र-छात्राओं के लिये वन्य-प्राणी संरक्षण पर व्याख्यान, निबंध, पेंटिंग आदि विभिन्न प्रतियोगिताएँ होंगी। प्रत्येक परिक्षेत्र में 2 से अधिक संयुक्त वन प्रबंध समितियाँ कार्यक्रम आयोजित करेंगी। कार्यक्रम में स्थानीय समुदाय और सांस्कृतिक धरोहर का भी समावेश होगा। स्थानीय भजन मण्डलियों द्वारा संरक्षण संबंधी गीतों का गायन, स्थानीय कलाकारों द्वारा गाँव के भवनों की दीवारों पर वन्य-प्राणियों का चित्रण और वन्य-प्राणी पर केन्द्रित नाटिका का मंचन आदि कार्यक्रम भी होंगे। व