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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के बाद सात विसर्जन कुंडों में जल प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है। आरोप है कि प्रशासन की गाइडलाइन के बावजूद प्रतिमाओं को कई घंटों तक पानी में छोड़ दिया गया, जबकि उन्हें तय समय के भीतर बाहर निकालना था। प्रेमपुरा, कमलापति और खटलापुरा घाट सहित अन्य विसर्जन स्थलों पर मूर्तियों और उनके अवशेषों के जमा होने से पर्यावरण और जलीय जीवों पर खतरा मंडरा रहा है। इससे प्रतिमा विसर्जन की व्यवस्था और नियमों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं।
पर्यावरणविद् डॉ. विपिन व्यास के अनुसार, मूर्तियों में इस्तेमाल किए गए रंगों और अन्य सामग्रियों के रसायन पानी में घुलने से जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और लेड व कैडमियम युक्त सिंथेटिक रंगों से पानी दूषित होने और उसमें ऑक्सीजन का स्तर घटने की आशंका है। प्रेमपुरा घाट के कुंड में 350 से अधिक मूर्तियां और उनके अवशेष जमा होने की जानकारी सामने आई है। वहीं, कमलापति घाट पर 300 से अधिक मूर्तियों के ढांचे, फूल-मालाएं और बांस के फ्रेम दिखाई दिए, जबकि खटलापुरा घाट पर भी बड़ी संख्या में मूर्तियां और उनके ढांचे पानी में मौजूद थे।
विशेषज्ञों के मुताबिक, जल प्रदूषण को रोकने के लिए विसर्जन के तुरंत बाद मूर्तियों को कुंड से बाहर निकालना और अवशेषों का सुरक्षित निपटान करना जरूरी है। इसके साथ ही प्राकृतिक मिट्टी और गैर-हानिकारक रंगों से बनी मूर्तियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। कृत्रिम विसर्जन कुंडों के दूषित पानी को प्राकृतिक जल स्रोतों में मिलने से रोकने के लिए वैज्ञानिक तरीके से उसका उपचार और निष्कासन किया जाना चाहिए। अब सवाल यह है कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए प्रशासन विसर्जन संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित कराने और जल स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाता है।
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