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उमेश त्रिवेदी
नोटबंदी के होलिकोत्सव के बाद काले धन की काली राख में दबे सवालों के जिंदा अंगारे ठंडा होने का नाम नहीं ले रहे हैं। संसद की लोक लेखा समिति के सवालों के आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर उर्जित पटेल के पास अपने बचाव में ज्यादा कुछ कहने को नहीं है। समिति के आगे निरुत्तर बने रहना गवर्नर की मजबूरी है। समिति के दस सवालों के जवाब में उर्जित पटेल की असहाय खामोशी अपने आप बड़े खुलासे कर रही है। पहला खुलासा यह है कि नोटबंदी का फैसला देश की आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों को कम, राजनीतिक मुद्दों को ज्यादा ’एड्रेस’ कर रहा है।
लोक लेखा समिति के दस सवालों की प्रतिध्वनि में देश के सामने यह ग्यारहवां सवाल सिर पर आसमान उठा रहा है कि- ’क्या देश की मुद्रा या करंसी का राजनीतिक-हथियार के रूप में इस्तेमाल हो सकता है?’ अभी तक राजनीति की जमीन पर पैसे के पेड़ उगते थे। विमुद्रीकरण के बाद पैसे को पथरीली जमीन के नीचे गाड़ कर राजनीति के वट-वृक्ष लगाने की कोशिशें हो रही हैं, जिसकी छांव में बैठ कर केन्द्र सरकार की असफलताएं सुस्ताती रहें या कोने में दुबकी रहें।
’राजनीति के लिए मुद्रा और मुद्रा के लिए राजनीति में परस्पर पूरक होने का भाव है।’ राजनीति और मुद्रा की आपसी साझेदारी में राजनीति शास्त्र और मुद्रा विज्ञान का व्यवहार एक-दूसरे की धाराओं का अतिक्रमण नहीं करते हैं। मोदी-सरकार ने देश की 86 प्रतिशत मुद्रा के कब्रिस्तान में राजनीति की नई नस्ल को गांठने का अभूतपूर्व उपक्रम किया है। यह कितना जायज है और इसके दुष्परिणामों का खामियाजा आम लोगों को क्यों भुगतना चाहिए?
शब्दों और तथ्यों की हेराफेरी के साथ लोक लेखा समिति के दस सवालों के आधे-अधूरे और कमजोर उत्तर मिल भी सकते हैं। केन्द्र सरकार ने समिति के सवालों के तकनीक-जवाब ढूंढना शुरू भी कर दिए हैं। केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक का सबसे बड़ा ’डिफेन्स’ यह है कि रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 के तहत केन्द्र सरकार जन-हित में रिजर्व बैंक को किसी भी मुद्दे पर विचार करने के लिए निर्देशित कर सकती है। इसके बावजूद राजनीति और प्रशासन के नैतिक धरातल पर करंसी के राजनैतिक इस्तेमाल से जुड़े इस ग्यारहवें सवाल का उत्तर मिलना आसान नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चेतावनी सटीक है कि ’विमुद्रीकरण के परिणामों को देखने, परखने और आकलन करने के लिए हममें से कई लोग मौजूद नहीं रहेंगे...।’ राजनैतिक-हथियार के रूप में करंसी के इस्तेमाल के मूर्त और अमूर्त प्रभावों और परिणामों को तत्काल आंकना मुश्किल है। पैसे की तासीर में अमीरी का लावा गरीबी की बेरहम बस्तियों पर हमेशा बरसता रहता है। गरीबी-अमीरी के इंडेक्स में जमीन-आसमान का फर्क है।
अर्थ-शास्त्रियों के अनुसार मुद्रा का उपयोग अर्थ-व्यवस्था के संचालन के लिए होता है। मूलरूप से करंसी लोगों के व्यवसाय और सुविधाओं का सबब होना चाहिए, न कि उन सवालों और कमजोरियों का जवाब, जो सरकार की राजनीतिक असफलताओं के कारण उपजते हैं। अर्थ-तंत्र में काले धन की भयावहता, महंगाई की फजीहत और नकली मुद्रा के काले प्रवाहों को नियमों के कठोर नियंत्रण से रोकना सहज प्रशासनिक प्रवृत्ति होना चाहिए। इन संदर्भों में मोदी-सरकार से इस सवाल का उत्तर अपेक्षित है कि मुद्रा का संचालन और नियमन वित्तीय विधि और दंड विधान से होना चाहिए अथवा राजनीतिक विधान से होना चाहिए? इसीलिए यह सवाल जहन को कुरेदता रहता है कि क्या इसके पहले करंसी का राजनीतिक-हथियार के रूप में किसी ने उपयोग किया है?
सत्ता और सरकार की ’बेसिक-थ्योरी’ है कि ’राजा’ कभी गलत नहीं होता अथवा उसकी नीयत की अच्छाई-बुराई को नापने का कोई बैरोमीटर उपलब्ध नहीं है। मान्यताओं के इस धरातल पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुद्धता प्रश्नोत्तर और जवाबदेही से परे है। सत्तासीनों की सीनाजोरी के आगे खामोश बने रहना लोगों की नियति भी है और बेहतरी भी है। मोदी नोटबंदी के जरिए समूचे विपक्ष को तबाह कर सकने वाली राजनीतिक-सुनामी पैदा करना चाहते हैं। इसीलिए उनके भाषणों में अर्थ शास्त्र कम, राजनीति-शास्त्र ज्यादा गरजता है।
यह महज संयोग है कि विमुद्रीकरण की खंदकोें में मोदी को राजनीतिक मुश्किलें इसलिए कम महसूस हो रही हैं कि विपक्ष की विश्वसनीयता डूबी हुई है। अनुकूलता यह भी है कि नोटबंदी ने नव धनाढ्य मध्यम वर्ग की जिंदगी में ज्यादा खलल नहीं डाला है। मोदी को देश के सौ करोड़ से ज्यादा गरीबों की सरलता, सहजता और अज्ञानता का बोनस मिल रहा है। इन गरीबों को पता ही नहीं है कि उनके साथ क्या हुआ है? वो महज इसलिए खुश हैं कि पड़ोसी की काली तिजोरियां चटक रही हैं। [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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