Patrakar Priyanshi Chaturvedi
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने गृहिणियों के काम की अहमियत को न्यायिक मान्यता देते हुए मोटर दुर्घटना में मृत महिला के मुआवजे को लगभग दोगुना कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर संभालने वाली महिला को “अकुशल मजदूर” मानना गलत है और उसका योगदान आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है। इस फैसले से गृहिणी शब्द का अर्थ अब सिर्फ घर संभालने तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसका मूल्यांकन आर्थिक रूप में भी किया जाएगा।
यह मामला मनोज एवं अन्य द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें अधिकरण ने मृतका की मासिक आय केवल 3,500 रुपए मानकर मुआवजा तय किया था। न्यायाधीश हिरदेश ने कहा कि मृतक एक गृहिणी भी थी, जो पूरे घर और परिवार को बिना किसी तय समय या छुट्टी के संभालती थी। ऐसे योगदान को किसी अकुशल मजदूर के काम के बराबर नहीं माना जा सकता। अदालत ने गृहिणी का योगदान अमूल्य बताते हुए न्यूनतम आय 5,975 रुपए प्रति माह तय की।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए भविष्य की आय, आश्रितों की संख्या और अन्य मदों को जोड़ते हुए कुल मुआवजा 12,20,720 रुपए निर्धारित किया। याचिकाकर्ताओं को पहले से दिए गए 6,97,200 रुपए के अलावा 5,23,520 रुपए की अतिरिक्त राशि देने का आदेश भी दिया गया। यह फैसला गृहिणियों के सामाजिक और आर्थिक मूल्य को न्यायिक मान्यता देने में मील का पत्थर साबित हुआ है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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