Patrakar Priyanshi Chaturvedi
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिन की आधिकारिक भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन बेहद अहम माना जा रहा है। दोनों नेता लंबे समय से एक-दूसरे के करीबी माने जाते हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद यह मुलाकात वैश्विक स्तर पर अधिक संवेदनशील हो गई है। भारत ने रूस की निंदा नहीं की और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों में शामिल हुआ, वहीं यूक्रेन को मानवीय मदद और संवाद का रास्ता भी खुला रखा। यही भारत की संतुलित विदेश नीति को दिखाता है, जो किसी बाहरी दबाव में बदलती नहीं।
इस दौरे में रक्षा, ऊर्जा, परमाणु और व्यापारिक संबंधों को नई दिशा देने वाले बड़े समझौते होने की उम्मीद है। S-400 सिस्टम की बची खेप, ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात, कुदनकुलम परमाणु संयंत्र के नए यूनिट और रूपे-मीर पेमेंट सिस्टम को जोड़ने पर चर्चा प्रमुख रहेगी। भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर व्यापार को रिकॉर्ड स्तर तक ले गया है। चीन ने पुतिन के इस दौरे का स्वागत किया है, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देश खुले तौर पर चुप हैं, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर अपनी असहमति जताते दिख रहे हैं।
इस यात्रा पर यूक्रेन भी कड़ी नजर रखे हुए है। पिछले वर्ष यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने उन देशों पर कटाक्ष किया था जो “आक्रमणकारी से गले मिलते हैं।” यह बयान तब आया था जब जुलाई 2024 में मोदी-पुतिन की मुलाकात के दिन कीव पर रूसी हमला हुआ था। इसी पृष्ठभूमि में पुतिन की भारत यात्रा को यूक्रेन की असहज प्रतिक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह शिखर सम्मेलन और भी चर्चित बन गया है।
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