Patrakar Priyanshi Chaturvedi
मुफ्त उपहार और नकद हस्तांतरण योजनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणियां की हैं, जिससे मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों की सरकारों की चिंता बढ़ गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि राजस्व घाटे से जूझ रहे राज्य मुफ्त बिजली, नकद सहायता और अन्य लोकलुभावन योजनाओं का खर्च कैसे उठाएंगे। कोर्ट ने ऐसी योजनाओं को देश की आर्थिक सेहत और कार्य संस्कृति पर संभावित बोझ बताया।
मध्य प्रदेश में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए लाड़ली बहना योजना पर 23 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है, जो कुल बजट का लगभग 7 प्रतिशत है। इसके अलावा किसानों को सब्सिडी, करीब 2 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और सस्ती बिजली जैसी योजनाओं पर भी भारी खर्च हो रहा है। अन्य राज्यों—जैसे कर्नाटक और महाराष्ट्र—में भी नकद हस्तांतरण योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जिससे वित्तीय संतुलन पर सवाल उठ रहे हैं।
लाड़ली बहना के अलावा साइकिल, स्कूटी, लैपटॉप, कन्यादान और रसोई गैस सब्सिडी जैसी योजनाएं भी राज्य के खजाने पर दबाव बढ़ा रही हैं। अनुमान है कि ऐसी योजनाओं पर सालाना करीब 52 हजार करोड़ रुपये तक का व्यय हो रहा है, जबकि राज्य का कुल बजट लगभग 4.38 लाख करोड़ रुपये है। राजनीतिक रूप से इन योजनाओं को लाभकारी माना गया है, लेकिन बढ़ता व्यय भविष्य की वित्तीय स्थिरता को लेकर बहस को तेज कर रहा है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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