मकर द्वार की मर्यादा और राजनीति की कसौटी
संसद परिसर का मकर द्वार किसी कॉलेज का गेट नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा का प्रतीक है। ऐसे स्थान पर नेताओं का आचरण सिर्फ व्यक्तिगत भावनाओं का नहीं, बल्कि संस्था की मर्यादा का भी प्रतिनिधित्व करता है। राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई नोकझोंक ने इसी गरिमा पर सवाल खड़े किए। नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल गांधी से अपेक्षा थी कि वे संयम और राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देंगे, लेकिन क्षणिक आवेग में दिया गया “गद्दार” जैसा शब्द न सिर्फ अनावश्यक था, बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी को भी कमजोर करता दिखा।
यह सच है कि राजनीति में रिश्ते बदलते हैं और दल परिवर्तन अक्सर भावनात्मक टकराव लेकर आता है। रवनीत सिंह बिट्टू कभी राहुल गांधी के करीबी रहे, फिर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा। इस पृष्ठभूमि में कटुता स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर व्यक्तिगत खुन्नस का प्रदर्शन राजनीतिक शालीनता को नुकसान पहुंचाता है। प्रतिक्रिया में बिट्टू का “देश का दुश्मन” कहना भी उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण रहा। दोनों तरफ से आई तीखी भाषा ने बहस के स्तर को गिराया और मुद्दों की जगह व्यक्तियों को केंद्र में ला खड़ा किया।
राहुल गांधी की राजनीति में प्रतीकों की अहम भूमिका रही है—कभी संविधान की प्रति, तो अब पूर्व सेना प्रमुख की किताब। ये प्रतीक सरकार से सवाल पूछने का माध्यम हो सकते हैं, लेकिन आचरण और भाषा ही नेता की असली छवि गढ़ते हैं। संघर्ष के लंबे दौर में धैर्य का टूटना मानवीय है, पर नेतृत्व की कसौटी यही है कि कठिन क्षणों में भी संयम बना रहे। लोकतंत्र में तीखापन हो सकता है, पर मर्यादा के भीतर—ताकि संसद का मकर द्वार राजनीति का अखाड़ा नहीं, संवाद का द्वार बना रहे।