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मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटैरया साल में एक दो किताबें तो लिख ही देते हैं। उनके इस अंदाज पर भोपाल के प्रदेश टुडे अखबार के कॉलम सूरमा की फैंक में खूब लिखा गया है।
सूरमा ने लिखा -ए खुदा अता कर मुझे इल्म की दौलत, इतनी अता कर जितना समंदर का पानी। शिवअनुराग पटैरया, सूबे के वो सहाफी हैं जो इल्मो-अदब से भी बावस्ता हैं। गोया के पत्रकार तो भोत सारे होते हैं बाकी ज्ञान, रिफरेंस और भाषा पे हरएक का अधिकार नहीं होता। पटैरयाजी के बारे में इस बात से हर कोई इत्तफाक रखता है कि मियां खां पत्रकारिता के साथ ही सूबे की तारीख, रिवायत, कल्चर वगैरह का जीता जागता रिफरेंस हैं। मध्यप्रदेश की सियासत और यहां के तमाम मुख्यमंत्रियों की खासियतें और किस्सों की तो खान हैं पंडितजी। जाहिर है छतरपुर के इस बुंदेली खांटी पत्रकार ने सहाफत में अड़तीस-चालीस साल ऐसेई नर्इं बिता दिये। चीजों को समझना, मेहसूस करना और अपने इल्म को दूसरों में बांटने की इनकी अदा ही निराली है। पत्रकारिता का कोई भी तालिबे इल्म इनसे कभी भी कोई रिफरेंस या जानकारी बेखटके ले सकता है। भैया ने कई किताबें लिखीं। हाल ही में इनकी एक और किताब आई है। मध्यप्रदेश: अतीत और आज। 453 पेज की इस किताब को मप्र हिंदी ग्रंथ अकादमी ने शाया किया है। इसके 56 चेप्टरों में सूबे की भाषा, बोली, शिल्प, कल्चर, मेले, तीज-त्यौहार, लोकनाट्य, खानपान वगैरह पे बेहद सटीक सामग्री है। इसे लिखने में कोई ढाई साल रिसर्च की पटैरयाजी ने। बिलाशक ये किताब पत्रकारिता के तालिबेइल्म बच्चों के लिए भी भोत सटीक साबित होगी। इस नायाब किताब के लिए मुबारकबाद कुबूल करें जनाब।
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