Patrakar Priyanshi Chaturvedi
अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने के लिए देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। एनसीआर के फरीदाबाद में लगातार खनन के कारण अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई घटने से पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय लोग चिंतित हैं। जिले में अरावली करीब 10 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है, जो लगभग 20 गांवों को कवर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि 1980 के दशक में खनन की अनुमति न दी गई होती तो आज भी ये पहाड़ियां कहीं अधिक ऊंची और सुरक्षित होतीं।
पर्यावरणविदों के अनुसार अस्सी के दशक में अरावली क्षेत्र में पत्थर और सिलिका सैंड का बड़े पैमाने पर खनन शुरू हुआ। पत्थर दिल्ली के लाल कुआं क्रेशर ज़ोन में और सिलिका सैंड बदरपुर भेजी जाती थी। सरकार की मंजूरी के बाद पहाड़ियों को काटकर करीब 500 फुट गहरी खदानें बनाई गईं, जो आज झीलों में बदल चुकी हैं। बताया जाता है कि उस समय फरीदाबाद क्षेत्र में 5 हजार से अधिक खदानें सक्रिय थीं, जिससे अरावली को भारी नुकसान पहुंचा।
हालिया सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद अरावली की परिभाषा को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली न मानने की परिभाषा से बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा और अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा। इसी वजह से नई परिभाषा को वापस लेने और अरावली के सख्त संरक्षण की मांग तेज हो गई है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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