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राघवेंद्र सिंह
स्वराज की तरह क्या सुराज भी लड़कर लेना पड़ेगा..? आजादी के 70वें दिवस पर यह सवाल पूरे देशवासियों के दिलोदिमाग में उमड़-घुमड़ रहा है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हम दुशासन को सुशासन में बदलने की बात महज महज रस्मअदायगी के लिए नहीं करना चाहते। दरअसल गोरों की गुलामी से मुल्क को बचाने के बाद हम अपने घरों को गरीबी की दीमक से बचाने की कोशिश कर रहे मगर कुछ कुर्सी के कीड़े मुल्क खाने में जुट गए। 1942 में ‘अगस्त क्रांति’ में जब अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने भी कहा था, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो।’ अब देश कह रहा है, ‘दुशासन भारत छोड़ो।’ महात्मा ने इसके भी अागे अपनी गिरफ्तारी के वक्त एक और नारा दिया था, ‘करो या मरो...’ भले ही अब कोई महात्मा गांधी नहीं है मगर सुराज के लिए ‘करो या मरो’ के हालात बन चुके हैं। सियासी नहीं इमानदार-राष्ट्रवाद के बिना सुशासन की डगर वैसी ही है जैसे ‘आग का दरिया है और डूबकर जाना है...’ तरक्की के लिए देश की सियासत में शुचिता और सुशासन के वादे पर सरकार में आई पार्टियों ने भी जनता को अभी तक खुश कम दुखी ज्यादा किया है। एक-दो लीडर नहीं पार्टी की पार्टियां सपनों की सौदागर बन सरकार तो बना रही है लेकिन हकीकत में यह सब ख्वाब दिखाकर ठगी जैसा फौजदारी अपराध है जिसमें िसयासी तौर पर जमानत का हक भी नहीं बनना चाहिए। स्वराज के बाद सुराज के सपने पर एतबार के बाद नेताओं की कारगुजारियों से मिले धोखे ने समूची राजनीति पर ही विश्वास का संकट पैदाकर दिया है। नेताओं की बातें, नारे और वादे जुमलों में तब्दील हो गए हैं। 1942 में बापू के इस नारे पर कि ‘करो या मरो’ पर आजादी के लिए कोई जान की बाजी नहीं लगाता। हुकूमत में हुक्मरान जनता के लिए मां-बाप के माफिक होता है। जो जनता को ख्वाबों की घाटी पर जब उछालता है तो वह उन पर भरोसा कर उसकी झोली वोटों से भर देती है मगर साल-दर-साल उसे पार्टियों के संकल्प पत्र (घोषणा पत्र) जुमले और झूठ के पुलिंदे ही साबित हुए। संकल्पों के बावजूद आम आदमी और उसकी बहन-बेटियां महफूज नहीं हैं। वादों के बाद भी हकीकत में पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरियां का टोटा है। बढ़ने के बजाए रोजगार के अवसर घट रहे हैं। कल-कारखानों के लिए देश-दुनिया में उद्योगपतियों के सामने झोली फैलाने पर भी कोरे आश्वासन लाए और दिखाए जा रहे हैं। हालांकि देश में मोदी सरकार ने दो साल ही पूरे किए हैं मगर ‘पूत के पांव’ जो पालने में दिख रहे हैं उससे उसके चाहने वालों को भी खुशी कम दुख ज्यादा है। पूरी सरकार आर्थिक हरियाली के लिए आत्महत्या कर रहे किसानों की कम संसेक्स की चिंता में ज्यादा डूबी दिखाई देती है। अन्नदाता गिरे तो गिरे शेयर मार्केट नहीं गिरना चाहिए। जबकि अच्छा मानसून और बंपर फसल से ही उद्योग भी उछलता और शेयर भी खिलखिलाता है। आजादी की 69वीं सालगिरह (70वां दिवस) क्योेंकि यह साल के अंत में आता है। पूरे देश में खेती की बदहाली ने किसानों को जान देने के लिए मजबूर कर दिया है मगर सरकारें फिक्रमंद हैं तो खेत के लिए नहीं निवेश के लिए। इन मुद्दों पर हम आंकड़ों पर जाकर विषय को रूखा और बोझिल नहीं करना चाहते पर कोई तो समझाए इन सरकारों को, यह देश उद्योग नहीं कृषि प्रधान है। अगर जनता समझाएगी तो यह आजादी के आंदोलन की तरह इसके रक्तरंजित होने की भी आशंका है। यह नौबत न आए तो अच्छा है। किसानों को उसकी फसल का लागत मूल्य भी नहीं मिलेगा तो वो आत्महत्या करेगा। अगर किसान मरेगा तो उद्योग कैसे जिन्दा रहेगा और देश कैसे चलेगा। नेताओं की दौलत भले ही दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ जाए, सरकारी बाबुओं की तनख्वाह लाखों में पहुंच जाए, गरीबों की हाय उनका तन-खा जाएगी। हम देश की सीमाओं की सुरक्षा और फौज की हालत पर चर्चा नहीं करना चाहते, यह हमारे प्राणों से भी ज्यादा संवेदनशील मुद्दा है। मगर विदेश नीति को लें तो पड़ोसियों - चीन-पाकिस्तान से संबंध बिगड़ रहे हैं, सुधरने की हमें उम्मीद भी नहीं थी। देशवासियों की मंशा है कि हम सॉफ्ट नेशन नहीं रहना चाहते। कोई आंख दिखाए तो हम उसके सिर काट लाएं, जैसा नरेंद्र मोदी ने पीएम बनने के पहले कहा भी था। देश के दिलोदिमाग की इस आवाज को अनसुना करने के गंभीर खतरे हैं। मगर अभी तो हम यही कर रहे हैं। फिलवक्त तो... सुराज तुम कब आओगे। क्योंकि स्वराज तो 69 साल पहले ही आ गया था। अभी तो देश के हालात ऐसे हैं कि ‘इस दौर-ए-तरक्की के अंदाज निराले हैं, जेहन में अंधेरे और सड़कों पर उजाले हैं।’(लेखक IND24 मप्र/छग के समूह प्रबंध संपादक हैं)
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