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पत्रकार विजय दास और राष्ट्रीय हिंदी मेल एक दूसरे के पर्याय है। कोई 21 बरस पहले भोपाल से इस अखबार का प्रकाशन शुरू किया था तो कई सारे किन्तु परन्तु सामने आये थे। लेकिन विजय दास के साथ हिंदी मेल का सफर भी अपनी गति से चलता रहा।
अब दास और उनके अखबार को लेकर प्रदेश टुडे अखबार में सूरमा भोपाली ने अपनी कलम चलाई है। सूरमा ने लिखा है कि हौसले बुलंद कर रास्तों पर चल दे, तुझे तेरा मुकाम मिल जाएगा, अकेला तू पहल कर काफिला खुद बन जाएगा। राष्ट्रीय हिंदी मेल आज इक्कीस बरस का हट्टा-कट्टा नौजवान हो गया। 26 अक्टूबर 1996 को जब शहर के भन्नाट पत्रकार विजय दास ने इस अखबार की इब्तिदा करी तो कईयों ने इसके मुस्तकबिल को लेके शक-शुबहे बयां किए। बाकी दास साब तो खां धुन के पक्के थे, लोगों की बातों को दरकिनार कर लग गए अपने काम में। समूह की प्रेसीडेंट मेडम माया दास ने भी उने हिम्मत दी। तब का दिन है और आज का दिन इन बीस बरसों में राष्ट्रीय हिंदी मेल ने अपनी अलग पहचान गढ़ी और अपने रीडरों की जरूरत बन गया। आज सियासी और प्रशासनिक खबरों में इस अखबार का जवाब नहीं है। बकौल विजय दास पूंजिपतियों के अखबारी कुनबों के सामने एक मामूली पत्रकार की हिम्मत कहां टिक पाती। फिर भी मैदाने जंग में डटे रहे। आज अपनी खबरों और भरोसे के बूते ये अखबार भोपाल के अलावा इंदौर, ग्वालियर और रायपुर से भी शाया हो रहा है। मियां खां केते हेंगे के हमने एडिटर नाम की इंस्टिट्यूट को हमेशा जिंदा रखा। इसी लिए हमारे यहां विजयदत्त श्रीधर, दाऊलाल साखी, राजेन्द्र नूतन, यशवंत अरगरे जैसी दिग्गज हस्तियां संपादक रहीं। इनके अलावा इस अखबार में रवीन्द्र जैन, अजीत सिंह, रवि भोई, प्रकाश भटनागर और ज्ञानेश उपाध्याय जैसे पत्रकारों ने भी अपनी अलग पेहचान बनाई। दास साब भरोसे के साथ केते हैं के उन्ने अभी भी मील का पत्थर नहीं देखा है, उनका कारवां मंजिल की तलाश में चल रहा है। तो साब... आपका ये सफर यूं ही लगातार चलता रहे सूरमा यही कामना करता है और इक्कीसवीं सालगिरह पे दिली मुबारकबाद पेश करता है।
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