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मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में ओबीसी वर्ग को फिलहाल 14 प्रतिशत आरक्षण ही मिलेगा। अदालत के मुताबिक, आरक्षण बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के पक्ष में राज्य सरकार पर्याप्त आंकड़े पेश नहीं कर सकी। साथ ही, कोर्ट ने 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का निर्देश दिया है। इस फैसले से लंबे समय से लंबित सरकारी भर्तियों और नियुक्तियों को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में लिया गया था। इसके बाद आरक्षण से जुड़े कई मामले अदालत में पहुंच गए और अलग-अलग याचिकाओं के कारण मामला लंबे समय तक लंबित रहा। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित मामलों पर एक साथ निर्णय लेने के लिए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को निर्देश दिए थे। इसके बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने करीब 15 दिनों तक सुनवाई की और 5 अगस्त 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। ओबीसी पक्ष की ओर से आरक्षण बढ़ाने के समर्थन में आबादी और प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन अदालत ने 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग स्वीकार नहीं की।
इस फैसले का असर पीएससी, शिक्षक भर्ती, पटवारी और पुलिस भर्ती सहित विभिन्न सरकारी नियुक्तियों पर पड़ सकता है। ओबीसी आरक्षण विवाद के कारण कई भर्तियों में 13 प्रतिशत पदों को होल्ड पर रखा गया था, जिनमें शिक्षकों के पद भी शामिल हैं। अब अदालत के निर्देश के बाद इन पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो सकता है। वहीं, ओबीसी वर्ग से जुड़े अभ्यर्थियों और संगठनों का कहना है कि प्रदेश में इस वर्ग की आबादी के अनुपात में 14 प्रतिशत आरक्षण पर्याप्त नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट के फैसले से भर्ती प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट होने के साथ आरक्षण के मुद्दे पर बहस भी जारी रहने की संभावना है।
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