Patrakar Priyanshi Chaturvedi
ISRO की ‘इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस रिपोर्ट-2025’ के मुताबिक, पिछले साल भारतीय उपग्रहों को अंतरिक्ष मलबे से बचाने के लिए अभूतपूर्व सतर्कता बरतनी पड़ी। वर्ष 2025 में करीब 1.5 लाख से अधिक अलर्ट जारी किए गए, जिनका विश्लेषण भारतीय वैज्ञानिकों ने अमेरिकी स्पेस कमांड से मिले डेटा के आधार पर किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) अब अत्यधिक भीड़भाड़ वाला और जोखिमपूर्ण हो चुका है।
इस दौरान इसरो को 18 बार ‘कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर’ करना पड़ा, ताकि संभावित टकराव से सैटेलाइट्स को सुरक्षित रखा जा सके। इनमें 14 बार लो-अर्थ ऑर्बिट और 4 बार जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के उपग्रह शामिल थे। इन मैन्यूवर्स के जरिए सैटेलाइट की दिशा और ऊंचाई में बदलाव कर उसे अंतरिक्ष मलबे से बचाया गया। साथ ही 84 बार मिशन योजनाओं में बदलाव भी करना पड़ा।
Chandrayaan-2 के ऑर्बिटर को भी 2025 में विशेष सतर्कता से संभाला गया, जिसमें 16 ऑर्बिटल मैन्यूवर किए गए ताकि नासा के लूनर ऑर्बिटर से संभावित टकराव से बचा जा सके। इसके अलावा कई लॉन्च मिशनों में भी प्री-लॉन्च कोलिजन एनालिसिस किया गया, और एक मामले में लॉन्च 41 सेकंड तक टालना पड़ा।
रिपोर्ट्स के अनुसार अंतरिक्ष में अब 12 लाख से अधिक छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े मौजूद हैं, जो 28,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अंतरिक्ष अभियानों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।
अंतरिक्ष मलबे के बढ़ते खतरे को देखते हुए कई देश अलग-अलग तकनीकों पर काम कर रहे हैं। अमेरिका उन्नत रडार और ट्रैकिंग सिस्टम से मलबे की निगरानी कर रहा है, जबकि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी कोलिजन अवॉइडेंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रही है। वहीं चीन और जापान जैसी एजेंसियां भी ऑर्बिटल रीफ्यूलिंग और मलबा हटाने वाली तकनीकों पर प्रयोग कर रही हैं, ताकि भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों को सुरक्षित बनाया जा सके।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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