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योगेश कुमार सोनी
वैसे तो पाकिस्तान में धर्म के नाम पर उत्पीड़न की खबरें अब आम हैं। हिन्दू व ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन खुलेआम हो रहा है। लेकिन एक ऐसा मामला सामने आया है कि जो पाकिस्तान की न्याय प्रणाली पर भी गंभीर सवाल बनकर आया है। पाकिस्तान की चौदह वर्षीय ईसाई लड़की को अगवाकर उसका धर्म बदलवाकर अपहरणकर्ता ने उससे शादी कर ली। लड़की के परिजनों ने इस मामले में जब कानून का दरवाजा खटखटाया तो वहां की एक निचली अदालत ने घटिया व बेतुकी दलील देते हुए कहा कि ‘लड़की की उम्र भले कम है लेकिन शरिया कानून के अनुसार उसका पहला मासिक धर्म हो चुका है तो इस हिसाब से शादी वैध मानी जाएगी।’ हालांकि इस फैसले के बाद लड़की के परिजनों ने वहां की सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है। लड़की की मां ने कैथोलिक समाज से जुड़ी वेबसाइटों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले में मदद मांगी है।
लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी को अब्दुल जब्बार नामक शख्स ने पिछले चार महीने से अगवा कर रखा था, जिसके लिए वह लगातार संबंधित पुलिस स्टेशन जा रहे थे लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। किसी माध्यम से लड़की का पता चला तो पुलिस प्रशासन ने तब भी कोई कार्रवाई नहीं की तो लड़की के परिजन कोर्ट गए और न्याय व्यवस्था के ठेकेदारों ने भी घटिया दलील देकर उन्हें निराश किया। इस तरह की कार्यशैली से स्पष्ट है कि वहां का सारा सिस्टम अल्पसंख्यकों की नस्ल मिटाने में लगा है। कानून के मुताबिक इस तरह की शादियों पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2014 में सिंध बाल विवाह एक्ट पारित हुआ था। इसके अंतर्गत 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगाने का जिक्र है। इस कानून को पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों की जबरदस्ती शादी के आधार पर बनाया था लेकिन पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कानूनों का कोई मतलब नहीं है।
ह्यूमन राइट सर्व रिपोर्ट के अनुसार बंटवारे के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी उन्नीस प्रतिशत थी जो अब मात्र दो प्रतिशत भी नहीं रह गई है। यदि हिन्दुओं की बात करें तो उस समय हिन्दू आबादी 15 प्रतिशत थी जो अब 1 प्रतिशत पर सिमट गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले उन्नीस साल में पाकिस्तान में एक भी अल्पसंख्यक नहीं बचेगा। इसका सबसे बड़ा कारण या तो वहां के अल्पसंख्यकों को डराकर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है या फिर उनको जान से मार दिया जाता है। लड़कियों के धर्म परिवर्तन से भी यह आंकड़ा बहुत तेजी से गिर रहा है।
पाकिस्तान की इन हकरतों पर यदि विश्वस्तरीय कार्रवाई नहीं की गयी तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लेकर वहां के हालात और बिगड़ सकते हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘जब से इमरान खान ने पाकिस्तान की कमान संभाली है तब से धर्म के नाम पर अत्याचार बढ़ गया। आयोग के अनुसार तहरीक-ए-इंसाफ सरकार द्वारा भेदभावपूर्ण कानून से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिए कट्टरपंथियों के हौसले बढ़े हैं। दिसंबर 2019 में पेश की गई रिपोर्ट में आयोग ने ईशानिंदा कानून के राजनीतिकरण व शस्त्रीकरण और अहमदिया विरोधी कानूनों को लेकर चिंता जाहिर की थी। जिसका उपयोग इस्लामी समूह न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने बल्कि राजनीतिक आधार भी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। ऐसे मामलों में शासन-प्रशासन पूर्ण रूप से बहुसंख्यक मुसलमानों का सहयोग करता है, जिस वजह से आरोपियों पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती। यही कारण है कि पीड़िता अपने घर वापस नहीं लौट पाती। इसके अलावा ज्यादा विरोध करने पर उसे जान से भी मार दिया जाता है। पाकिस्तान में पूर्ण रूप से जंगलराज स्थापित हो चुका।'
एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में अत्याचार से परेशान होकर करीब 20 हजार अल्पसंख्यक परिवार भारत आ चुके हैं और बीती 3 फरवरी को 187 हिन्दुओं का जत्था स्थायी नागरिकता लेने आया है। मौजूदा समय में पाकिस्तान में अपहरण व धर्म परिवर्तन के आंकड़ों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वहां अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने के लिए संगठित रूप से काम हो रहा है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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