अमरीक
पंजाबी के नामी शायर सुरजीत पातर का शेर है- 'ऐस अदालत च बंदे बिरख हो गए; सुक्क गए फैसले सुनदयां-सुनदयां/ आक्खौ ऐहनां नूं हुण घरे जाण आपणे ऐ कदों तीक ऐत्थे खड़े रहणगे...' यानी अदालत में फैसले सुनते-सुनते मनुष्य वृक्ष हो गए, इनसे कहिए अब वे अपने घरों को लौट जाएं, कबतक मरते-सूखते यहीं खड़े रहेंगे! 84 के सिख कत्लेआम पीड़ितों पर यह शेर पूरी तरह प्रासंगिक है। नवंबर 1984 के सिख विरोधी एकतरफा भीषण कत्लेआम के जख्म 36 साल के बाद आज भी रिस रहे हैं। पीड़ित पीढ़ी-दर-पीढ़ी इंसाफ के लिए भटकते फिर रहे हैं। उम्मीद ने एकबारगी फिर उनकी दहलीज पर दस्तक दी है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एस एन ढींगरा की अगुवाई वाली एसआईटी की सिफारिशें मंजूर कर ली हैं तो फिर लगने लगा कि शायद अभीतक कोसों दूर खड़ा न्याय पास आ जाएगा। 84 की हिंसा की जांच के लिए गठित जस्टिस ढींगरा विशेष जांच टीम से पहले 10 आयोग और जांच कमेटियां काम कर चुकी हैं लेकिन शिकार और वहशी शिकारी वहीं के वहीं हैं जहां 36 साल पहले थे। जाहिर है कि 1984 के सिख विरोधी कत्लेआम को राजनीतिक संरक्षण में अंजाम दिया गया। आयोगों तथा जांच कमेटियों की कवायद के बावजूद दोषी बचते रहे। अपवाद की तरह कुछ सजाएं हुईं लेकिन उन्हें अधूरे इंसाफ का हिस्सा ही माना जाएगा। पूरा इंसाफ अभी होने की प्रक्रिया में है और न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो चुकी यह प्रक्रिया खत्म कब होगी- कोई नहीं जानता। फिर भी उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गठित जस्टिस ढींगरा के नेतृत्व वाली एसआईटी की सिफारिशों ने आस की नई खिड़की यकीनन खोली है।
इससे पहले केंद्र सरकार ने 2014 में 293 ऐसे मामलों की जांच के लिए आयोग की घोषणा की थी। जस्टिस ढींगरा ने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी है वह साफ बताती है कि बेगुनाह सिखों के बेरहम कातिलों को तमाम एजेंसियों ने किस तरह बचाया। यह रिपोर्ट कई ऐसे दाग उजागर करती है जो भविष्य के लिए नजीर अथवा सबक हैं। उक्त रिपोर्ट का एक अहम पहलू पुलिसिया व मजिस्ट्रेट जांच और ट्रायल की घोर विसंगतियां हैं। अनगिनत आपराधिक मामलों पर फैसला सुनाने वाले जस्टिस एसएन ढींगरा ने हैरानी जताई है कि कानून के मुताबिक ज्यादा से ज्यादा पांच एक जैसे मामले, एक साथ जोड़े जा सकते हैं लेकिन यहां पुलिस ने पांच हत्यारों के मामलों में एकसाथ चार्जशीट दायर की थी, उनमें से भी सिर्फ पांच मामलों पर ही दोष आयद किए गए। 498 हिंसक घटनाओं की एक ही एफआईआर दर्ज की गई और महज एक अन्वेषण अधिकारी लगाया गया। अदालत ने भी पुलिस को मामले अलग-अलग करने के आदेश नहीं दिए। हद देखिए कि चश्मदीद गवाहों ने अदालतों में कहा कि वे दोषियों को बखूबी पहचान सकते हैं लेकिन सरकारी वकीलों ने दांवपेंच बरतकर गवाहों को शिनाख्त नहीं करने दी और दोषी बरी हो गए। एसआईटी की रिपोर्ट में साफ शब्दों में लिखा है कि इन मामलों में सुनवाई को थका देने वाली लंबाई तक इस तरह खींचा गया कि पीड़ित और गवाह बार-बार अदालतों के चक्कर काटते बेहाल हो गए और उनमें से कईयों ने खुद ही हार मान ली।
रिपोर्ट में कई अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ एक ऐसे इंस्पेक्टर को साजिश का हिस्सेदार बताया गया है जिसने जानबूझकर छह सिखों को हिंसा से बीचबचाव के लिए रखे गए लाइसेंसी हथियारों से मौके पर मरहूम कर दिया ताकि दंगाई आराम से उन्हें निशाना बना सकें। इसका खुलासा होने पर इस इंस्पेक्टर को पहले नौकरी से निलंबित करने का नाटक किया गया और फिर बहाल करके तरक्की देकर एसीपी बना दिया गया! जस्टिस ढींगरा ने लिखा है कि सिख यात्रियों को रेलगाड़ियों से निकालकर रेलवे स्टेशनों पर कत्ल किया गया लेकिन पुलिस ने मौके पर एक भी गिरफ्तारी नहीं की। बाद में बहानेनुमा सफाई दी कि दंगाइयों की तादाद ज्यादा थी। विभिन्न स्टेशनों पर 426 लोग मारे गए, जिनमें से 84 की शिनाख्त नहीं हो पाई। जस्टिस ढींगरा ने सिर्फ 186 बंद मामलों की जांच के आधार पर ऐसे निष्कर्ष दिए हैं जबकि ऐसे केसों की संख्या हजारों में है और निर्दोष मरने वालों की भी हजारों में है।
सिख विरोधी कत्लेआम में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के हाथ खून से सने हैं। बीते दिनों पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भरे समारोह में कहा था कि उस वक्त के गृहमंत्री नरसिंह राव ने इंद्रकुमार गुजराल और उनके कुछ साथियों की सलाह मान ली होती तो कत्लेआम थम सकता था। ढेरों प्रमाण हैं कि उस समय लगभग समूची सरकारी मशीनरी ने कम-से-कम दिल्ली में तो दंगाइयों का खुला साथ दिया। तब के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह खुद सिख थे लेकिन जिन राजीव गांधी को उन्होंने बगैर संसदीय बोर्ड का नेता चुने प्रधानमंत्री पद की शपथ निहायत गैर संवैधानिक ढंग से दिलाई, उन्हीं राजीव गांधी ने पेड़ वाले मुहावरे का इस्तेमाल कर सिख विरोधी कत्लेआम को जायज ठहराया। जब राष्ट्रपति खामोश बैठे रहें और प्रधानमंत्री कातिलों के बचाव में सरेआम बोलें, तब कहां न्याय मिलना था? खैर, जस्टिस एसएन ढींगरा की अगुवाई वाली एसआईटी की रिपोर्ट केंद्र सरकार ने स्वीकार करते हुए कहा है कि इसकी सिफारिशों पर यथाशीघ्र सख्ती तथा लाग लपेट के बगैर अमल किया जाएगा। यह तो 186 मामलों पर आधारित रिपोर्ट है जबकि पीड़ितों की संख्या हजारों में है। ऐसे सैकड़ों मामले या तो बंद कर दिए गए या अदालतों तक जाने ही नहीं दिए गए। उन्हें भी इसी तरह से खोला जाना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)