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प्रकाश भटनागर
हनी के ट्रैप में पत्रकारिता भी
कांदा (प्याज) और फंदा (यहां हनी ट्रैप के संदर्भ में) कोई तालमेल नहीं है लेकिन एक विचित्र संयोग है। प्याज लगातार महंगी हो रही है। परत दर परत खुलने वाली इस खाद्य सामग्री की कीमत आसमान छूने लगी है। इधर हनी ट्रैप वाला फंदा भी लगातार भारी-भरकम कीमत वाले खेल के तौर पर सामने आ रहा है। परत-दर-परत नये-नये नाम (अघोषित रूप से) सामने आ रहे हैं। अभी किसी छिलके पर किसी राजनेता की तस्वीर दिख रही है तो कहीं कोई अफसर भी नजर आ जा रहा है। लेकिन एक छिलके में कोशिकाओं की तरह छिपी उन असंख्य तस्वीरों का सामने आना अभी बाकी है, जो इस सारे घटनाक्रम की जड़ हैं। जिनका सहारा लेकर इस घिनौने काम को बीते लम्बे समय से अंजाम दिया जा रहा था। किस्सा हनी-मनी कांड में मीडिया खासकर टीवी मीडिया की भूमिका का है।
बात शुरू से शुरू करते हैं। कहानी को कुछ ऐसे समझें। इस काम को सहारा देने का समय तब आया, जब कई मीडिया हाउस भयावह मंदी की चपेट में आ गए हैं। कुछ एक रीजनल टीवी चैनल तो अपने मालिकों के पापों को पिछले लंबे समय से भोग रहे हैं। यहां तक कि मनु वादी कहे जाने वाले मीडिया समूह के कर्मचारियों तक को तो इसलिए ही लंबे समय से वेतन के लाले हैं। घोर संकट का समय। दूसरी जगह नौकरी मिलने की संभावनाएं भी कम थी। तब प्रिंट मीडिया की पीत पत्रकारिता को मात देने वाले ये हनी-मनी टाईप के ट्रेप की कोमल सी कठोर आकांक्षाए रची गई जिसके तार दिल्ली तक जुड़ गए। योजनाबद्ध तरीके से ब्लैकमेलिंग के ताने बाने रचे गए। मीडिया से जुड़ी आधी आबादी के अति महत्वाकांक्षी कुछ हिस्से का इसमें चतुराई से उपयोग किया गया। अलग-अलग समूहों में कुछ लोगों की फौज मछली के चारे के तौर पर तैयार की गयी। इनमें उन तितलियों को सहारा लिया गया जो कम समय में बड़ा नाम ना सही दौलत बनाने सरकारी लाभ कमाने की ख्वाहिशमंद थी, जो केवल ग्लैमर के लालकालीन पर अपने पैर बढाती मीडिया इंडस्ट्री में आई थीं। रात के अंधेरे में जो करना है, उसकी भूमिका सुबह की रोशनी में बनायी जाती। टारगेट पहले से ही तय रहते। महिला पत्रकार उनके पास बाइट लेने के नाम पर पहुंचतीं। यह औपचारिकता पूरी करने के बाद क्वालिटी समय बिताने की बात छेड़ी जाती। शाम ढले किसी खास जगह पर, किसी छिपे हुए कैमरे के सामने मामला शराब से शबाब के सेवन तक पहुंचता। इसके बाद ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू किया जाता। भोपाल/इंदौर तक नये शिकार की तलाश में जुट जाते। पुराने शिकार से डील करने का काम दिल्ली के स्तर पर होता। इसके बाद होने वाली हिस्सा-बांट की व्यापकता इस बात से समझी जा सकती है कि कई मीडिया हाउस में असंख्य कर्मचारी लम्बे समय से तन्ख्वाह न मिलने के बावजूद एक दिन के लिए भी आर्थिक तंगी के शिकार नहीं हो पाये। बल्कि उनके संसाधन ऐसे तमाम पत्रकारों से कई गुना ज्यादा बेहतर हैं, जो नियमित रूप से वेतन पाने के बावजूद आर्थिक संतुष्टि की परिधि से कोसो दूर हैं।
मामला बेहद संजीदा होता जा रहा है। लिहाजा कुछ पल के लिए माहौल हलका कर देते हैं। 'अनुरोध' फिल्म का एक गीत है, 'तुम बे-सहारा हो तो, किसी का सहारा बनो...' तो यहां भी ऐसा ही हुआ। बे-सहारा और सहारा का ऐसा घालमेल बना, जिसने कि पीत पत्रकारिता को भी कई सदियों पीछे धकेल दिया। यह प्रीत पत्रकारिता बन गयी। प्रीत, पैसे के लिए। संसाधनों के लिए। प्रीत के जरिये लोगों को फंसाया गया और फिर 'भय बिन होय न प्रीत...' की तर्ज पर भयग्रस्त लोगों से इस प्रीत की तगड़ी कीमत वसूली गयी। इस कांड के नाम पर आपको अखबार तथा सोशल मीडिया पर जिन महिलाओं की तस्वीरें दिख रही हैं, वो तो महज मुखौटा हैं। कठपुतली हैं। जिनकी डोर कई अन्य लोगों के हाथ में थी। जबकि मुख्य डोर दिल्ली से खींची जाती रही।
तीन दशक से अधिक की पत्रकारिता में मैंने पीत पत्रकारिता के कई अध्याय देखे हैं। तब ऐसा करने वालों पर क्रोध आता था। आज उन पर दया आ रही है। क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से ऐसा करने के लिए बदनाम थे। पढ़ने-लिखने वाले मीडिया के बीच वे शर्मिंदगी के भाव से घिरे नजर आते थे। लेकिन हनी ट्रैपनुमा पत्रकारिता वाले तो इस पेशे के रसूखदार लोगों में गिने जाते रहे हैं। पद, प्रतिष्ठा और सम्मान की उन्हें कभी भी कमी नहीं आयी। यहां तक कि इस घटनाक्रम का खुलासा होने के चार दिन बाद भी पुलिस तथा कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंच सके हैं। यह हमारे सिस्टम की कमजोरी तो नहीं, मजबूरी जरूर हो सकती है।क्योंकि इतना बड़ा माफिया भारी-भरकम बैकिंग के बगैर कतई संचालित नहीं किया जा सकता। तो अब इंतजार इस बात का है कि इस सबको पीछे से मिल रहा सहारा कब हटे और कब असली गुनाहगारों का चेहरा सामने लाया जाएगा। फंदे में बड़े भारी भरकम लोग हैं, इसलिए संभावना कम है।
मामले की गंभीरता एक खयाल से और बढ़ जाती है। जो शिकार बने, वे सभी सरकारी तंत्र के असरकारी नाम बताये जा रहे हैं। जाहिर-सी बात है कि ब्लैकमेलर्स ने इन लोगों से उनके पद का दुरूपयोग भी करवाया होगा। कहा जा रहा है कि कई वरिष्ठ अफसरों सहित सत्तारूढ़ दल और प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के जन प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में इस सबके मजे से शिकार हुए हैं। तो क्या यह नहीं पता लगाया जाना चाहिए कि इन सभी ने मायाजाल से बाहर निकलने के लिए किस-किस तरह के गलत कामों को अंजाम दिया होगा। यह जांच हुई तो निश्चित ही यह भी पता चल जाएगा कि ऐसे गुनाहगारों को सहारा प्रदान करने वालों ने गलत तरीके से सरकारी काम करवाने का ठेका भी ले रखा था। देर-सबेर यह सच सामने आकर रहेगा। नाम चाहे सार्वजनिक न हो पाएं। डर है कि पहले ही किसी पतित-पावन को तरस रही पत्रकारिता के दामन पर इसके बाद और कितने दाग नजर आने लगेंगे। इस सबकी इबारत उसी दिन लिख दी गयी थी, जब पत्रकारिता को ग्लैमर से जोड़ने का महा-गुनाह किया गया। ऐसा पाप करने वालों की फौज अब गुजरे कल की बात हो चुकी है, लेकिन उनके द्वारा रोपा गया विषवृक्ष का बीज आज इस पूरी बिरादरी में भयावह प्रदूषित हवा का संचार कर रहा है। यह हवा दमघोंटू है। इससे बचने के लिए नई खिड़कियां खोलने की संभावनाएं कोई और नहीं मीडिया में ही लोगों को तलाशनी होगी। प्रिंट मीडिया तक तो विश्वसनीयता बाकी थी लेकिन इलेक्ट्रानिक, डिजीटल और सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की आत्मा 'विश्वसनीयता' घायल पड़ी हुई है। इसलिए खबरें बेअसर हो रही हैं। ताजी हवा का यह प्रसार पत्रकारिता के मूल्यों की दोबारा स्थापना से ही संभव हो सकेगा। माना कि यह बहुत दुश्वारी वाला काम है, लेकिन इस पेशे में सिर उठाकर चलने का दौर वापस लाने के लिए इस कड़ी मेहनत के अलावा और कोई चारा बाकी नहीं रह गया है। तो जो ये दमघोंटू माहौल है, इससे बाहर आने खिड़की खोलिए.....रोशनी आएगी तो चेहरे भी साफ साफ दिखाई देंगे.....और डिओडरेंट की खुशबूओँ में छिपाई गई दुर्गन्ध भी बाहर होगी.....
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