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पत्रकारों की सुरक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून को केंद्र सरकार ने कुछ सवालों के साथ लौटा दिया है। यह कानून पिछले वर्ष तैयार कर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था। महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस (प्रिवेंशन ऑफ वायलेंस एंड डैमेज ऑर लॉस टू प्रॉपर्टी) एक्ट 2017 को पिछले वर्ष राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया था।
राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी और राज्यपाल के दस्तखत के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था। केंद्र ने 15 दिन पहले इसे राज्य सरकार को लौटा दिया। यह कानून बनवाने के लिए मुंबई प्रेस क्लब सहित राज्य के कई पत्रकार संगठन करीब एक दशक से प्रयासरत थे। 2011 में जागरण समूह के अंग्रेजी दैनिक "मिड डे" के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की दिनदहाड़े हत्या के बाद राज्य सरकार पर पत्रकार संगठनों का दबाव बढ़ गया था। लेकिन यह कानून फड़नवीस सरकार में ही बन सका।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर यह कानून राज्य सरकार को लौटाने की जानकारी देते हुए सूचना एवं जनसंपर्क सचिव बृजेश सिंह का कहना है कि कानून वापस नहीं हुआ है, बल्कि इससे संबंधित कुछ सवाल पूछे गए हैं। जिसका उचित समाधान राज्य सरकार द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा इस प्रकार सवाल पूछा जाना एक सामान्य प्रक्रिया है। राज्य सरकार केंद्र के सवालों के उचित समाधान तैयार कर जल्द ही पुनः मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेज देगी।
इस कानून में पत्रकारों या मीडिया संस्थानों पर किसी भी प्रकार के हमले को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसके तहत आरोपी की गिरफ्तारी गैरजमानती होगी और पुलिस उपाधीक्षक स्तर से नीचे का अधिकारी इस मामले की जांच नहीं कर सकेगा। अपराध सिद्ध होने पर दोषी को तीन साल तक की कैद एवं/अथवा 50,000 रुपये का जुर्माना भी हो सकता है। यही नहीं, दोषी सिद्ध व्यक्ति को पीड़ित को हर्जाना देना पड़ सकता है। यह हर्जाना तोड़फोड़ में हुए नुकसान की भरपाई से लेकर पीड़ित के इलाज के खर्च तक हो सकता है। इस कानून में मीडिया संस्थानों एवं मीडियाकर्मियों को भी परिभाषित किया गया है।
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