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रजत मिश्रा
प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दौर में जैसे ही सोशल मीडिया खास कर वेब पोर्टल की शुरुआत हुई लोगों का फटा-फट और बगैर मैनेज होने वाले मीडिया से भरोसा जुड़ गया।चेनल जो फर्जी तरीके से सरकार पर अपने झूठे ID फर्जी स्ट्रिंगर और मार्फिन वीडियो के बल पर दबाव बनाकर येन केन प्रकारेण मोटी राशि वसूल रहे थे ,उनकी दुकान बंद होती दिखी, प्रिंट मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा। फर्जी सरकुलेशन आंकड़े डीएवीपी को घूस देकर जिन्होंने विज्ञापन लेकर अपने खजाने चुपचाप भर लिए थे उनका भी पेट दर्द होने लगा। सोशल मीडिया को बढ़ाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहल करते हुवे एक विज्ञापन नीति बनाकर "जितने हिट उतने विज्ञापन" के फार्मूले पर 10 वर्ष पुरानी 5 वर्ष पुरानी और 3 वर्ष पुरानी अलग अलग वेब पोर्टल नीति के अनुसार 1 वित्तीय वर्ष में विज्ञापन दिए जिसका अब दुष्प्रचार हो रहा है यह बात सही है कि भीड़ में असली के बीच नकली भी जम गए ।पिछले दिनों ऐसे ही एक जलते भूनते आधे अधूरे पत्रकार ने कम पढ़े लिखे और जनहित से दूर स्वहित के सवाल पूछने वाले विधायक से विधानसभा में जानकारी बुलवा ली। विधायक की जानकारी को अब सार्वजनिक करके वे फूले नहीं समा रहे । विज्ञापन लेना देना और उसे प्रसारित करना क्या घोटाला है ?यदि विज्ञापन देना घोटाला है तो आजादी के बाद से अब तक जितने पत्र-पत्रिकाओं चैनल्स स्मारिका आदि व्यक्तियों संगठनों उनके मालिकों ने जो लाभ लिया है शासन की योजनाओं के प्रचार के बदले उन्हें मिला उपहार है ....।तो वह सब अपना रिकॉर्ड सार्वजनिक करें और खुद को बेदाग साबित करें वेब पोर्टल 15 हजार से ₹50 हजार प्रतिमाह हिट संख्या के आधार पर गूगल एनालिटिक्स के जरिए जो पा रहा है उसका और उसके मालिकों का इनकम टैक्स से रिकॉर्ड भी निकाला जाए साथ ही जो कथित ईमानदार बन रहे हैं और पर्दे के पीछे सरकार के साथ अखबार और चैनल के माध्यम से अब तक जनता का पैसा हजारों करोड़ लूटते आए हैं उन्हें अपना हिसाब देना चाहिए ।
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