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उमेश त्रिवेदी
क्या यह बात आश्चर्यजनक नहीं है कि भारतीय सोशल मीडिया में 'पप्पू' नाम के उपहास पूर्ण 'कार्टून-फिगर' के माध्यम से अभिव्यक्त होने वाले राहुल गांधी के भाषणों पर प्रतिक्रियाएं देने के लिए भाजपा जैसे ताकतवर राजनैतिक संगठन और उसके पावरफुल केन्द्रीय मंत्रियों की समूची फौज मैदान संभाल ले...? अमेरिका में बर्कले की कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में युवा छात्रों के साथ मन की बात करते हुए कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ऐसा क्या कह दिया कि उसका जवाब देने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, सूचना एवं प्रसारण स्मृति ईरानी सहित भारतीय जनता पार्टी के 26 वरिष्ठ नेताओं की फौज को उतरना पड़ा?
भाजपा नेताओं की शाब्दिक गोलाबारी से उठने वाली धूल के पीछे कई सवाल अंगड़ाई लेते नजर आते हैं। राजनीति की दीवार पर सवालों की इस धूल का आकार-प्रकार समय के गर्त में छिपा है, लेकिन इन प्रतिक्रियाओं का राजनीतिक-तर्जुमा भाजपा के चोर-मन के दरवाजों के पीछे चल रही ऊहापोह के राज खोल रहा है कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत के राजनीतिक रोड-मैप को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है और ना ही वह राहुल गांधी को 'पप्पू' की तरह हल्का-फुल्का मानती है। राहुल के भाषणों पर भाजपा जैसे सशक्त राजनैतिक-संगठन और पावर-फुल मंत्रियों की अतिरंजित प्रतिक्रियाओं को ध्यान से समझना होगा। क्या भाजपा मानती है कि राहुल गांधी ने युवकों के सवाल-जवाब के दौरान जो बातें कहीं, उनमें मौजूद सच की खराश मोदी-सरकार के चेहरे पर खरोंच का सबब हो सकती है?
बर्कले यूनिवर्सिटी में राहुल गांधी ने कश्मीर से लेकर नोटबंदी जैसे मुद्दों पर छात्रों को जवाब दिए थे। अमेरिका में उन्हें वंशवाद और कांग्रेस की हकीकत को कुरेदने वाले सवालों का सामना करना पड़ा था। वाक-चातुर्य में अपेक्षाकृत कमजोर राहुल गांधी यहां खुद को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त करते नजर आए। बेतकल्लुफ और बेलाग शैली के कारण राहुल के संभाषणों को अमेरिका के साथ-साथ भारत में भी बहुतायत लोगों ने पसंद किया है। भाजपा की चिंताओं का सबब शायद यही है कि फ्लोरिडा, बॉस्टन जैसे अमेरिकी शहरों के परफार्मेंस से राहुल गांधी के आत्म-विश्वास में काफी इजाफा हो सकता है। राहुल ने जो बोला, सच के करीब बोला। अमेरिका की भाषण-प्रतियोगिताओं में राहुल बगैर कृपांक (ग्रेस-मार्क्स) पास हुए हैं। राहुल की सफलता का राज शायद सैम पित्रौदा और शशि थरूर जैसे लोगों की टीम है, जो उनके साथ जुटी है।
कांग्रेस और खुद की कमियों की स्वीकारोक्ति के कारण राहुल श्रोताओं के बीच यह स्थापित करने में कामयाब रहे कि वो सच बोलने वाले व्यक्ति हैं। इस रणनीति ने मोदी-सरकार की उनकी आलोचनाओं को मजबूती दी, जो नोटबंदी जैसे कदमों के बाद जमीन पर उभर कर सामने आ रही हैं। राहुल ने यह स्वीकार करने में कोई झिझक महसूस नहीं की कि नरेन्द्र मोदी उनसे कई गुना ज्यादा बेहतर वक्ता हैं, जो हजारों लोगों की भीड़ को अपनी बातों से सम्मोहित कर सकते हैं। इसके अलावा 2014 में कांग्रेस की हार का कारण 'एरोगेंस' था, जो दस साल की लगातार सत्ता के कारण कांग्रेस के विभिन्न हलकों में गहराई तक पैठ गया था। अपनी 'पप्पू-इमेज' पर स्पष्टीकरण देते हुए राहुल ने कहा कि सोशल मीडिया पर भाजपा के एक हजार लोगों की टीम रोजाना मेरी इमेज को अलग-अलग तरीके से पेंट करने का काम करती है। आज मैं आपके सामने बाते कर रहा हूं, मुझे देखकर और सुनकर मेरे बारे में इमेज बनाना बेहतर और न्यायसंगत होगा।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कश्मीर पर, स्मृति ईरानी ने वंशवाद जैसे राजनीतिक मुद्दों पर, केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बारस नकवी ने देश की उन्नति के मामले में राहुल के आरोपों का जवाब दिया। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पलटवार करते हुए कहा कि राहुल अमेरिका जाकर अपने देश की बुराई कर रहे हैं, यह उनकी निराशा का परिचायक है। राहुल गांधी पर संबित पात्रा का यह आरोप इसलिए नाजायज है कि विदेशी जमीन पर देश की राजनीतिक-आलोचना का सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रारंभ किया है। अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों के प्रवास के दौरान मोदी के लिए अप्रवासी भारतीयों की रैलियों के विशेष आयोजन होते रहे हैं। इन रैलियों में मोदी के भाषणों की विषय-वस्तु ही देश में व्याप्त राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता और असफलताएं होती थीं। मोदी के पहले किसी भी प्रधानमंत्री व्दारा विदेशी जमीन पर देश की आंतरिक राजनीति और शासन-प्रशासन पर प्रतिकूल टिप्पणियों के दूसरे उदाहरण मौजूद नहीं हैं।[लेखक उमेश त्रिवेदी सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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