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उमेश त्रिवेदी
भारतीय जनता पार्टी के इन आरोपों के कोई मायने नहीं हैं कि अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनके कार्यकर्ता मध्य प्रदेश में जारी किसान आंदोलन की आड़ में अपनी राजनीतिक-रोटियां सेंक रहे हैं। एक विपक्षी दल के नाते कांग्रेस वही कर रही है, जो विपक्ष में रहते हुए भाजपा कांग्रेस के खिलाफ करती थी। स्मरण नहीं आ रहा है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में घटित ऐसे हादसों की आग में कभी भी पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने राजनीतिक-रोटियां सेंकने का काम नहीं किया हो?
गोलीबारी में मारे गए 6 किसानों की मौत व्यवस्था की हिम शिलाओं पर जमा खून के वो कतरे हैं, जिन्हें कुरेद कर बने बरफ के लड्डुओं का रस-पान राजनीति में लंबे समय तक होता रहेगा। किसानों की मौत पर मर्सिया गाने के लिए भाजपा की अपनी भजन-मंडली है और कांग्रेस के अपने झांझ-मंजीरे हैं, अपनी कविताएं, अपने संवाद और अपने प्रतिवाद हैं। दिल्ली में केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू और मंदसौर में राहुल गांधी के डायलॉग उसी पिटी-पिटाई राजनीतिक-स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं, जिसके मीडिया-मंचन में नेताओं के चेहरे पर नकली आक्रोश झलकता है और दिल में असली हिंसक-गुदगुदी दहकती महसूस होती है।
नायडू ने राहुल गांधी के मंदसौर दौरे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मुद्दे का राजनीतिकरण करके कांग्रेस गैरजिम्मेदाराना काम कर रही है। उन्होंने याद दिलाया कि 12 जुलाई 1998 को दिग्विजय-सरकार के वक्त भी 24 किसान गोलीबारी में मारे गए थे, लेकिन नायडू ने यह नहीं बताया कि उस समय भाजपा की भूमिका क्या थी और दिग्विजय सिंह ने इस्तीफा नहीं दिया था। मंदसौर में राहुल गांधी की राजनीतिक-प्रस्तुति की स्क्रिप्ट में भी कुछ चौंकाने वाला नहीं था। लेकिन किसानों के बीच, किसानों के मुद्दे पर किसानों से बातचीत की अपनी जमीन, अपने जज्बात और अपनी जहनियत होती है। देशज जमीन पर उगे मुहावरे अभिव्यक्ति में उनका साथ नहीं देते हैं, इसलिए उनके भाषणों के ’टेक्स्ट’ में उनींदापन टपकने लगता है। मंदसौर में भी ’राहुल गांधी’ ठेठ ’राहुल गांधी’ के अंदाज में ही बोले कि ’मोदी-सरकार संघ की विचारधारा का पालन-पोषण करनेवाली सरकार है, जो कर्ज-माफी के नाम पर किसानों के सीने पर गोलियां चलाती है और अडानी-अंबानी के बैंक-कर्जों को माफ करती है।’
राहुल की ’डायलॉग-डिलिवरी’ में थोड़ा आत्म-विश्वास इसलिए नजर आ रहा था कि इस मामले में भाजपा सरकार बैक-फुटिंग पर रक्षात्मक है। पारसी-थिएटर की तर्ज पर कांग्रेस की अति-नाटकीय राजनीतिक स्क्रिप्ट के सभी पात्र अपनी भूमिकाओं में चूक कर रहे थे। मंदसौर आने से पहले दिल्ली जाने के लिए बेचैन उनकी भाव-भंगिमाओं के खुलासे किसानी-प्रतिबद्धताओं को स्वत: ही खारिज कर देते हैं। किसानों की मौत से गमजदा माहौल की कराह, उसका भीगापन हुड़दंग की गरम हवाओं में खो सा गया था। फिर मोटर-साइकल पर सवार होकर सरकार को चकमा देने के उनके प्रयास अनचाहे ही एक ऐसे राजनीतिक-स्टंट में परिवर्तित हो गए, जहां लोगों की सराहना और सहानुभूति गुम होने लगती है।
किसानों की मौत बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, जिसको भुनाने के लिए राहुल का घटना-स्थल पर आना बनता है। राहुल का मंदसौर प्रवास मप्र में कांग्रेस की जमीन को पुख्ता करने की कोशिशों का हिस्सा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बारह साल के कार्यकाल में राजनीतिक चहलकदमी के लिए राहुल गांधी या कांग्रेस को इतना खुला मैदान कभी नहीं मिला है। पक्ष-विपक्ष में जो कुछ हो रहा है, वही राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति है। किसान-आंदोलन के आकाश पर भाजपा और कांग्रेस की हरी-पीली राजनीतिक पतंगबाजी ने नए आयाम अख्तियार कर लिए हैं। भाजपा के मासूम से इस राजनीतिक आरोप की मासूमियत पर प्रदेश का हर बंदा कुरबान (?) हुआ जा रहा है कि किसान-आंदोलन में होने वाली तोड़-फोड़ और हिंसा के पीछे खड़ी कांग्रेस के जरिए भाजपा सरकार को बदनाम करने की साजिश है? किसानों का सारा बखेड़ा कांग्रेस ने खड़ा किया है। भाजपा के इस रुख में सत्ता का मद छलक रहा है कि हिंसा के मामले में उससे कोई चूक नहीं हुई है। शिवराज-सरकार इन मामलों में यूं ही आत्म समर्पण करने वाली नहीं है। भाजपा को यह सोचना और सावधानी रखना चाहिए कि खुद को सही साबित करने की जिद हमेशा सही नहीं होती है। राहुल भले ही इस एपीसोड में कुछ राजनीतिक-थ्रिल महसूस करें, लेकिन कांग्रेस कुछ हांसिल करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि प्रदेश के जितने बड़े नेता उनके साथ आए थे, उनके साथ ही लौट गए हैं...यह पब्लिक है, सब जानती है...। [लेखक उमेश त्रिवेदी भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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