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premउमेश त्रिवेदी
महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल अपने साथियों के बीच जगदम्बाप्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ के इस नगमे को अक्सर गुनगुनाया करते थे कि– ‘शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...।‘ सरफरोशी की तमन्नाओं को पालने वाले दीवानों के लिए यह शायरना-आश्वासन मर-मिटने का वह सामान था, जिसे छाती से लगाए वो लोग कुर्बान हो जाते थे। शहीदों की मजारों पर मेले के ख्वाब सजाने वाले इस कौमी-तराने का रचना काल 1916 माना जाता है। पिछले सौ सालों से इस नगमे के भावुक-तूफानों से उठने वाली धूल को माथे पर रखने का नाटक इस देश में बखूबी जारी है। लेकिन क्या हम सही में अपने शहीदों के प्रति चिर-अनुरागी और चिर-अनुगामी हैं? और क्या सही अर्थो में उनकी मजारों पर हमारी धूप-बत्ती की भाव-नाटिका उनके प्रति श्रध्दा का इस्पाती-जज्बात है...? देवरिया के शहीद प्रेम सागर के साथ वहां के शासन-प्रशासन ने जो सलूक किया, वह रामप्रसाद बिस्मिल को जज्बातों को आहत करता है। यहां शासन-प्रशासन के कारिन्दों का कृत्यर शर्मसार करने वाला है।
ऐसी खबरें सरकार और उसके प्रवक्ताओं को पसंद नहीं आती हैं। इनको शाया करने वाले अखबार और अखबारनवीस भी आंखों में किरकिरी के समान होते हैं। किस्सा उत्तर प्रदेश की योगी-सरकार का है, जिसकी राष्ट्र्वादी धुनों पर पूरा देश थिरक रहा है। एक मई को जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में नियंत्रण रेखा पर गश्त करते समय देवरिया के रहने वाले बीएसएफ के हेड कांस्टेदबल प्रेम सागर के गश्ती दल पर पाकिस्तानी सेना ने घात लगाकर हमला कर दिया था। उस गोलाबारी में शहीद हुए प्रेम सागर के परिजनों की जिद थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके अंतिम संस्कार में शरीक हों, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। योगी आदित्यनाथ से बात करने के बाद परिजनों ने दाह-संस्कार कर दिया। गौरतलब है कि योगी अपने वादे के मुताबिक 12 मई को शहीद के परिजनों से मिलने भी पहुंचे, लेकिन उनकी इस यात्रा के व्यवस्थापकों ने उनके जाने के बाद शहीद-परिवार के प्रति जिस बदगुमानी का परिचय दिया, वह हैरान करने वाला है। सरकारी मशीनरी ने योगी की यात्रा के लिए जो भी सरंजाम जुटाया था वह वैसे भी गैर-जरूरी था, लेकिन यात्रा के समापन के बाद उसे जिस प्रकार उठाया, वह शहीद-परिवार के प्रति बदसलूकी की श्रेणी में आता है। यह समझ से परे है कि मुख्यमंत्री की कुछ मिनटों की इस यात्रा के लिए क्याक सोचकर देवरिया-प्रशासन ने शहीद प्रेम सागर के मेहमान कक्ष को कीमती कालीन, महंगे परदे, खूबसूरत सोफा-सेट से सजाया? दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री को गरमी से निजात दिलाने के लिए बल्लियों पर एसी टांगने का हास्यापद उपक्रम करने से भी वे लोग बाज नहीं आए। शासन-प्रशासन की यह गैर-जरूरी सतर्कता उस वक्त संवेदनहीनता में बदल गई, जब योगी के मुंह फेरते ही अधिकारियों ने उजाड़ने के अंदाज में मेहमान-कक्ष को बेनूर कर दिया।
गरीब शहीद परिवार के खपरैली-कस्बाई रहवास में मुख्यमंत्री के लिए पांच सितारा इंतजाम की अपेक्षा खुद योगी आदित्यनाथ ने भी नहीं की होगी, लेकिन उनके कारिन्दों की मनोवृत्ति उन संवेदनाओं को पथरीला बना देती हैं जो एक शहीद परिवार के लिए जरूरी है। यह घटना अपवाद हो सकती है, लेकिन यही अपवाद हमारे सामाजिक मनोविज्ञान का कड़ुआ सच हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल का प्रिय कौमी नगमा सुनने के बाद बदन में सुरसुरी सी छूटने लगती है, आज भी रोएं खड़े हो जाते हैं... लहू के कतरों में गरमी का एहसास करवटें लेने लगता है...। हम शायद भूलने लगे हैं कि शहीदों और उनके परिवारों के लिए शायर का यह आश्वासन महज एक जज्बाती शगल नहीं हैं। शायर के जहन में जब कभी भी यह खयाल आया होगा तो यह महज उसका अपना निजी जज्बा नहीं रहा होगा...। यह जज्बा वतन, कौम और इंसानियत की ओर से शायर की जुबां पर शहीदों के लिए आया है। इसमें समाज की जिम्मेदारियों के तकाजे छिपे हैं, इसमें संकल्प की धरोहर है और प्रतिबध्दता की कसम की अभिव्यक्ति है...। शहादत के सवाल पर यदि हम मंचों पर कही जाने वाली कुछ आदर्शवादी बात करें तो राजनीति और समाज के कर्ताधर्ता कुछ यूं दहाड़ते नजर आएंगे कि देश के लिए शहीद होना सेना के जवानों का सबसे बड़ा बलिदान है। साहित्य या कविता में इसकी अभिव्यक्ति के सुर मार्मिक होकर मन की कोरों को गीला कर देते हैं, उसकी प्रेरक-शक्ति की अभिव्यजनाएं दिलों को छूकर तात्कालिक रूप से गुम नही हो जाती हैं। लेकिन, न जाने क्यों, एक अवांछनीय पथरीलेपन की गरमी में दिल की आर्दता और आंसू सूखने लगे हैं...।[ लेखक उमेश त्रिवेदी भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। ]
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