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उमेश त्रिवेदी
देश के मौजूदा राजनीतिक दौर में राजनेताओं के इर्द-गिर्द जमा होने वाले साधु-संतों और तांत्रिकों की उपयोगिता के बारे में उन्मादी चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन साठ, सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक की राजनीति में इन बाबाओं के भस्मावतार को लेकर माहौल में भाव-विव्हलता देखने को नहीं मिलती थी। आज, जबकि संत-समागम की सांस्कृतिक थाप पर सत्ता की राजनीति थिरकती है, राजनीति के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चित रहे तांत्रिक चंद्रास्वामी के निधन के बहाने सत्तालीन साधु-संतों के भस्मावतारों की कहानियां खुद-ब-खुद सुर्ख होने लगी हैं।
सत्ता, सिंहासन और राजनीति के मायालोक में साधु-संतों के चमत्कारों का दबदबा हमेशा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में भी कतिपय अपवादों को छोड़कर ज्यादातर नेता तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक की कुत्सित चालों से जन-भावनाओं के साथ हेराफेरी करते रहे हैं। पहला अपवाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं। गांधी इन हथकण्डों से कोसों दूर थे। उनके आत्म-बल और कर्म-साधना के आगे नतमस्तक दुनिया उन्हें महात्मा संबोधित करती थी। बगैर किसी गंडा-ताबीज के गांधी का महात्मा होना अपने आप में अद्भुत घटना है। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की स्वस्फूर्त वैज्ञानिक तात्विकता ने कभी भी इस 'कम्युनिटी' को पास फटकने नहीं दिया था। नेहरू के अलावा लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई और चौधरी चरणसिंह जैसे प्रधानमंत्री भी इन काली विद्या के काले कारनामों से कोसों दूर थे। अल्पावधि स्थानापन्न प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा का नाम भी इसी श्रेणी रख सकते हैं।
कांग्रेस के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के सौर-मंडल में चंद्र-धुरी पर राजनीति को नचाने वाले चंद्रास्वामी का नाम सबसे ज्यादा उभरा था। इससे पहले श्रीमती इंदिरा गांधी के दौर में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी सुर्खियों में आए थे। 'पावर-कॉरीडोर' में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की कहानी में भी चंद्रास्वामी जितने ही चटखारे हैं। ब्रह्मचारी इंदिराजी को योग सिखाते थे। भारत के क्षितिज पर योग-गुरू के रूप में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का अभ्युदय उस वक्त हुआ था, जबकि जगप्रसिध्द योगी बाबा रामदेव का नामोनिशान नहीं था। इंदिराजी से उनकी नजदीकियां महज योग के कारण नहीं थीं। ब्रह्मचारी ने 1975-76 में इंदिराजी की कुंडली में अनचाही कुलांचें भरते शनि और राहु-केतु के प्रकोपों को नियंत्रित और संयमित करने के विधान सम्पन्न कराए थे। इंदिराजी के प्रभा-मंडल से आच्छादित धीरेन्द्र ब्रह्मचारी सत्ता के गलियारों में स्वत: ताकतवर शख्सियत बनते गए। देश के सभी सीबीएससी स्कूलों में योग की शिक्षा का शुभारंभ स्वामी रामदेव से काफी पहले धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की बदौलत हुआ था। अपने रसूख की बदौलत ब्रह्मचारी ने योग-साधना के दौरान जम्मू-कश्मीर में अरबों की सम्पत्ति का निर्माण किया था। वो खुद अपने हेलीकॉप्टर में चलते थे और हथियार बनाने की फैक्टरी के मालिक थे। कालान्तर में हथियारों की तस्करी और गैर-कानूनी गतिविधियों में उनकी लिप्तता के किस्से भी सामने आए।
नब्बे के दशक में तांत्रिक चंद्रास्वामी ने भी प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की बदौलत धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जैसा रुतबा हासिल कर लिय़ा था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी नरसिंहराव जितने ही चंद्रास्वामी के मुरीद थे। चंद्रास्वामी के बारे में अच्छा लिखने और कहने लायक घटनाएं लगभग नगण्य हैं। ब्रह्मचारी ने तो योग-शिक्षा के महाव्दार से सत्ता के गलियारों में दाखिल होकर करोड़ो रुपयों का चमत्कारी साम्राज्य खड़ा किया था, लेकिन सिर से पैर तक 'फ्रॉड' चंद्रास्वामी की प्रभावशीलता कौतुक पैदा करती है। सत्ता के नजदीक चंद्रास्वामी दंत-कथाओं जैसे कहे और सुनाए जाते हैं। अरब के हथियार कारोबारी और तस्कर अदनान खशोगी की काली गुफाओं का अवैध अंधियारा उनकी स्याह-रोशनी का सबब था। इस स्याह-रोशनी के किनारे सेक्स, हथियार, हवाला और दलाली के अंधेरे कोनों पर खुलते थे। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह अपनी किताब 'वॉकिंग विद लायंस' में हैरानी जताते हैं कि 1979-80 में पेरिस में उनकी बीमारी के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति के निजी फिजिशयन के साथ चंद्रास्वामी को अपने सामने खड़ा देख कर वो चौंक गए थे। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने उन्हें लेने के लिए अपना निजी विमान भेजा था। किस्से कई हैं, जो बोफोर्स, सेंट किट्स या हथियारों से जुड़े मुकदमों में बयां हो रहे हैं। प्रसिध्द फिल्म निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन व्दारा अभिनीत अपनी फिल्म 'सरकार' में चंद्रास्वामी की वेश-भूषा और चरित्र को खलनायक के रूप मे पेश किया है। सत्ता के लाल-कालीनों पर अच्छे-बुरे संत-समागमों की राम-कहानियां इन दिनों भी जोरों पर हैं। मठाधीशों के आंगन में करोड़ों रुपए उलीचे जा रहे हैं और अरबों रुपयों के व्यापारिक-साम्राज्य पर फूलों की वर्षा हो रही है। सिर्फ अनुष्ठान के तरीके बदल गए हैं। चित्रलेखा में साहिर लुधियानवी का गीत मामूली संशोधन के साथ मौजूं है - 'ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या, 'राजनीति' पर धर्म की मुहरें हैं... हर युग में बदलती 'राजनीति' को कैसे आदर्श बनाओगे...?' [ लेखक उमेश त्रिवेदी भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। ]
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