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राघवेंद्र सिंह
कोई भी शरीर या संस्था एकदम से नहीं मरती। सब धीरे धीरे होता है। वक्त रहते इलाज हो गया तो ठीक,वरना इस दुनिया में आए हैं जाने के लिए। संगठन,सरकार या सिस्टम ये रफ्ता रफ्ता ही लकवाग्रस्त होते हैं। सियासत के हिसाब से पहले कभी कांग्रेस इस दौर से गुजरी है और अपनी दशा भोग रही है। इस दौर से अब भाजपा मुकाबिल है। चन्द हफ्तों में हुई घटनाओं को देखें तो काफी कुछ साफ हो जाता है। सरकार के बारे में काफी कुछ लिखा और कहा जाता है। हम रुख कर रहे हैं देव दुर्लभ कार्यकर्ताओं वाले मध्यप्रदेश भाजपा का। रुखसत किए गए ग्वालियर के वफादार नेता राज चड्डा के बाद अब जिक्र कर रहे हैं रुखसती के दरवाजे पर खड़े किए गए पूर्व मंत्री कमल पटेल का।
इस किस्सागोई में कमल पटेल का किरदार बतौर नायक बनकर उभरता दिख रहा है। वजह मुख्यमंत्री के 'नमामिदेवी नर्मदे यात्रा' में दिलाए गए माई को बचाने के संकल्प की और इसके समापन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आव्हान की। दरअसल कमल पटैल प्रदेश भाजयुमो के अध्यक्ष रहने के बाद शिवराज सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। मोर्चा नेताओं में इस जाट की धमक खूब रही है। यही कारण है कि नर्मदा से रेत लूट को रोकने के लिए उन्होंने अपने गृह जिले हरदा से जो अभियान छेड़ा वो माफिया को खटकने लगा। पहले उन्होंने मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बुदनी(सीहोर) से लेकर होशंगाबाद,देवास में भी रेत चोरी रोकने को मुद्दा बनाया। हफ्तेभर तक वे रेत माफिया और प्रशासन की सांठगांठ को एनजीटी की शिकायतों से लेकर मीडिया तक में उजागर करते रहे। इस पर भाजपा के संगठन ने कोई नोटिस नहीं लिया। लेकिन जब पटैल ने अपने क्षेत्र के नर्मदा घाटों पर बीच धार तक बनाई गई सड़क और माई की छाती से पोकलेन व जेसीबी से रेत उलीचनें के वीडियो जारी किए तब नींद से जागी सरकार और भाजपा संगठन। किसी ज्ञानी ने सलाह दी कि यह सब तो सरकार विरोधी है और भाजपा की छवि खराब करने वाला है। लेकिन छवि तो दस साल से रेत की लूट होने से हो रही थी। इस आग को हवा तब लगी जब मीडिया ने भी इसे सुर्खियों में लाना शुरू किया। धोखे से ही सही एक महिला अफसर समेत कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के परिजनों समेत अवैध रेत ला रहे डंपरों को पकड़ा। हालांकि यह सब रेत चोरी की अति होने पर हुआ। ऐसे में मुख्यमंत्री के नर्मदा सेवा यात्रा अभियान में नर्मदा बचाने के जगह जगह दिलाए गए संकल्प में कमल पटैल जैसे नेताओं को भी जगाया। जब कमल जागा तो कमल वाली पार्टी नाराज हो गई। उन्हें तीन दिन पहले नोटिस थमा दिया गया कि क्यों न आपको पार्टी से निलंबित कर दिया जाए। नोटिस की भाषा निलंबित करने से ज्यादा पटैल को पीड़ा पहुंचाने वाली है। पहली ही पंक्ति में लिखा है कि अत्यंत खेद का विषय है कि आप जैसे जिम्मेदार एवं अनुभवी व्यक्ति द्वारा सुनियोजित तरीके से अनावश्यक रूप से बदनियति से भाजपा की सरकार एवं प्रशासन के खिलाफ लगातार सार्वजनिक तौर पर तथ्यहीन बयानबाजी की जा रही है जिससे भाजपा व भाजपा सरकार की छवि को आघात पहुंचा है। आपका यह कृत्य घोर अनुशासनहीनता की परिधि में आता है। आपके इस कृत्य के लिए क्यों न आपको पार्टी से निलंबित किया जाए ? सात दिन में प्रत्यक्ष उपस्थित होकर स्पष्टीकरण दें अन्यथा आपके विरुद्ध निलंबन की कार्यवाही की जाएगी। इस नोटिस की भाषा ने ही इसे आलेख में जगह देने के लिए मजबूर किया है। एक वरिष्ठ नेता के लिए इस शैली में नोटिस देना ही उसकी बर्खास्तगी जैसा ही माना जाए। एक गांव में पेड़ काटने की परंपरा नहीं थी ग्रामवासी जरूरत पड़ने पर जिस पेड़ को काटना होता था उसके पास जाकर उसे खूब अपशब्द बोल आते थे इसके कुछ दिनों बाद अपमानित हुआ पेड़ खुद ही सूख जाता था और बाद में उसे काट दिया जाता था। कमोवेश यही स्थिति कमल पटेल जैसे नोटिस प्राप्त कार्यकर्तांओं की हो रही होगी। वे भले ही पार्टी में रहें लेकिन सूख तो जाते ही हैं।
कमल पटेल का गुनाह यह है कि उन्होंने मुख्यमंत्री की मंशा और प्रधानमंत्री की इच्छा के मुताबिक नर्मदा बचाने का बहुत ही देशी और ठेठ अंदाज में अभियान शुरू किया। हो सकता है सरकार और संगठन में बैठे रेत प्रिय और माफिया के मुन्सिफों का रास नहीं आया हो। नतीजा सामने है अगर आलाकमान ने दखल नहीं दिया तो पार्टी से निकाले जाने की औपचारिकता भर बाकी है।
इसके पहले ग्वालियर के राज चड्डा भी भ्रष्टाचार हटाने या ऐसा न होने पर खुद को हटाने की मांग पार्टी से कर चुके थे। भाजपा ने उन्हें हटाना मुनासिब समझा। असल में संगठन और सरकार को ये सब बातें सबके सामने करना पसंद नहीं आता। और खासबात ये है कि पार्टी फोरम पर सरकार और संगठन की खामियों को कहने की इजाजत नहीं है। अब तो पार्टी के खैरख्वाहों ने ये लाईन तय कर दी है कि सरकार और प्रशासन की कोई निगेटिव बात प्रदेश कार्यसमिति की बैठकों में नहीं होगी। मगर कोई यह नहीं बताता कि आखिर भ्रष्टाचार, अव्यवस्था,रेत चोरी और नौकरशाही की मनमानी को रोकने की बात कहां और कैसे की जाए। लेकिन कोई कहता है तो उसका टेंटुआ दबाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।
संवादहीनता के हालात...
सागर के सांसद समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता लक्ष्मीनारायण यादव ने पिछले दिनों कहा कि प्रशासन में मनमानी है और काम कराना मुश्किल हो गया है। परेशान यादव ने अगला चुनाव नहीं लड़ने का भी ऐलान किया है। ऐसे ही संगठन और सरकार में अराजकता का दूसरा उदाहरण बालाघाट के सांसद बोध सिंह भगत और कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन की एक मंच पर हुई तकरार से भी सामने आया है। भगत को कार्यक्रम में बोलने का अवसर नहीं मिला तो वे वहीं पर कहते हैं कि पार्टी किसी की बपौती नहीं है। बाद में दोनों के बीच तकरार भी हुई। इसी तरह भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष ने लंबे इंतजार के बाद संगठन को बताए बिना पदाधिकारियों की सूची जारी कर दी। भाजपा में इस तरह के मामले अजूबे के तौर पर हैं। पहले कभी ऐसा कांग्रेस में अलबत्ता होता था। मिसालें तो बहुत हैं हम इन चुनिंदा घटनाओं का जिक्र कर यह बताना चाहते हैं कि भाजपा संगठन लकवाग्रस्त हो रहा है। सरकार में मुख्यमंत्री कहते हैं कलेक्टर से मिलना भगवान से भेंट करने के बराबर है। कार्यकर्ता कहते हैं पार्टी कार्यालय में आने के बाद भी जिम्मेदारों से मिलना देवताओं से मिलने सरीखा दुर्लभ है। मंत्री गोपाल भार्गव केबिनेट की बैठक में सीएम से पूछ चुके हैं कि वे अपनी बात किस अफसर से कहां और कब कहें कि आप तक पहुंच जाए। कमल पटेल औऱ राज चड्डा के मामले में मशहूर शायर दुष्यंत कुमार का शेर,गुस्ताखी माफी के साथ..."हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग। रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही"। काफी सटीक बैठता है।
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