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उमेश त्रिवेदी
नर्मदा सेवा यात्रा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की 'राजनीतिक-रूमानियत' का एक ऐसा नमूना है, जो सार्वजनिक जीवन में सामान्य तौर पर नजर नहीं आता है। यह 'राजनीतिक-रूमानियत' नर्मदा किनारे एक ऐसे कृष्ण-युगीन गोकुल को रचने की परिकल्पना है, जिसे हम कविता-कहानियों में पढ़ते-बूझते आए हैं। नर्मदा के सैकड़ो मील लंबे घाटों के किनारे शिवराज सिंह की कल्पनाओं के मधु-मास में लरजते फल-बागों की महक और पेड़ों के झुरमुटों का बीच सुभद्रा कुमारी चौहान की यह कविता जहन में खनकने लगती है कि- 'यह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे, मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे...।' कहना मुश्किल है कि नर्मदा के घाटों पर सुभद्रा कुमारी चौहान के गोकुल की यह बाल-सुलभ आकांक्षा पूरी होगी या नहीं, लेकिन यह निर्विवादित है कि सतपुड़ा के वक्ष पर नर्मदा की जल-तरंगों में पर्यावरण-राग के नए सुरों की नई तलाश की रूहानी कहानी में 'फैंटेसी' का पुट होने के बावजूद सच्चाई का जज्बा है।
शिवराज का बचपन नर्मदा की विहंसती लहरों की बांहों में बीता है और जवानी फेनिल लहरों की रवानी के साथ अठखेलियां करते हुए खिली है। इसलिए नर्मदा के प्रति उनका रुझान और समर्पण निरापद और नेकनीयत मानने में किसी को भी कोई उज्र नहीं है...। मान सकते हैं कि दर्शन-शास्त्र के इस विद्यार्थी के मानस के किसी कोने में सुभद्रा कुमारी चौहान के 'कदंब का पेड़' में जीवंत यमुना नदी के किनारे, अंगड़ाई लेते रहे होगें...शायद इसीलिए शिवराज के मन में नर्मदा के दोनों किनारे एक किलोमीटर तक संतरा, मौसंबी, आम और जामुन जैसे फलोद्यान से पाट देने की कल्पना जागी होगी...। पत्रकारिता का ऐसा सोचना मुनासिब नहीं है कि उन्होंने ऐसा सोचा होगा, लेकिन जब कुछ अच्छा घटता है, तो लगता है कि उसका रूपांकन भी अच्छा ही होना चाहिए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डेढ़ सौ दिन पहले नर्मदा सेवा यात्रा का सूत्रपात किया था। इन डेढ़ सौ दिनों में लहरों के उतार-चढ़ाव के साथ नर्मदा-यात्रा की अवधारणाएं और आकांक्षाएं बदलती रही हैं।
इस समूचे उपक्रम का सबसे आकर्षक पहलू नर्मदा किनारों की तासीर और तस्वीर बदलने की कल्पना है, जिसे आकार देने के लिए शिवराज-सरकार ने 534.20 करोड़ रुपयों की प्रशासकीय स्वीकृति जारी कर दी है। मध्यप्रदेश में नर्मदा के उद्गम-स्थल अमरकंटक से आलीराजपुर तक नर्मदा नदी के दोनो तटों के किनारे फलों से आच्छादित वन-मंडल कायम करने की अद्भुत योजना पर काम शुरू हो गया है। मध्यप्रदेश में नर्मदा के घाट को सोलह जिलों की सीमाएं स्पर्श करती हैं। सोलह जिलों में 1077 किलोमीटर लंबे नर्मदा के दोनों किनारों पर एक किलोमीटर के दायरे में आम, संतरा, मौसंबी, सीताफल, बेर और चीकू के फलोद्ययान की परिकल्पना अपने आप में रोमांचित करने वाली है। यह परिकल्पना पर्यावरण के साथ-साथ नर्मदा-घाटों की तकदीर और तस्वीर बदल देगी। नर्मदा अमरकंटक से आलीराजपुर तक मध्यप्रदेश के सोलह जिलों के 1077 किलोमीटर लंबे किनारों को आप्लावित करती हुई 1310 किलोमीटर का फासला तय करके खंभात की खाड़ी में गिरती है।
शिवराज की नर्मदा-सेवा-यात्रा के दरम्यान लगातार विवादों के बुलबुले फूटते रहे हैं। नर्मदा नदी कभी भी राजनीतिक और प्रशासनिक विवादों से परे नहीं रही है। पक्ष-विपक्ष में राजनीतिक-शास्त्रार्थ नर्मदा–विवाद का स्थायी-भाव है। इसके बावजूद पहली बार किसी नेता ने नर्मदा को केन्द्र में रख कर उसकी रक्षा के मिशन को आगे बढ़ाया है। यह पहल अच्छी है। शिवराज अपनी राजनीतिक रूमानियत से मध्यप्रदेश में नर्मदा किनारों पर एक ऐसी दुनिया रचना चाहते हैं, जो कुछ अलग है। पानी-पहाड़ और पवन-परिन्दे जीवन के हर क्षेत्र में रूमानियत के मुहावरे रचते हैं। राजनीतिज्ञ भी इसमें शरीक हैं। अपनी बाजू में खेलने वाले लोगों को पानी, पहाड़ और परिन्दे ज्यादा स्पर्श करते हैं। शिवराज का नर्मदा-रुझान इसी का सबब है। रूमानियत की भाव-भूमि में कल्पनाओं की श्लाघा होती है और सच के धरातल पर आत्म-प्रवंचना का पुट भी होता है। रूमानियत के इर्द-गिर्द जिंदगी का 'इनर्जी-लेवल' हमेशा ऊंचा होता है। यही ऊर्जा-तत्व शिवराज की राजनीतिक रूमानियत में नजर आता है। इसीलिए उनकी राजनीतिक-रूमानियत में परिंदों की वही उड़ान चहक रही है, लहरों का कल-कल नाद गूंज रहा है, पहाड़ों का निनाद सुनाई पड़ रहा है, हवाओं के निर्झर बह रहे हैं। शिवराज की यह रूमानियत प्राण-वायु बनकर नर्मदा की पर्यावरण की समस्याओं का निदान करे, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता, लेकिन रूमानियत के अपने खतरे हैं। रूमानी-दुनिया जितनी रंगीन दिखती है, हकीकत में उतनी होती नहीं है। लेकिन हमें भरोसा करना चाहिए कि नर्मदा की इस रूमानी परिक्रमा के बाद लोगों को कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि – ' शिवराज, तेरी नर्मदा मैली...?' [लेखक उमेश त्रिवेदी सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है]
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