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उमेश त्रिवेदी
महागठबंधन के बहाने देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकल्प की तलाश में बेचैन विपक्षी नेताओं की तलाश समुन्दर में भंवर की तरह घूम-घूम कर अपनी ही लहरों में गुम हो जाती प्रतीत हो रही हैं। महागठबंधन की नजरें कई नेताओं पर हैं, लेकिन जब चर्चा के केन्द्र राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटने लगते हैं, तो लगता है कि भाजपा के मुकाबले में खड़ा होने के लिए विपक्ष को ज्यादा व्यावहारिकता के साथ अपनी रणनीति पर गौर करना होगा।
उम्र राहुल गांधी के साथ है, लेकिन वक्त साथ नहीं है। राहुल के साथ वक्त की बेवफाई यूं ही नहीं है। वक्त इसलिए साथ नहीं है कि राजनीति में वक्त की लय को समझने के लिए एक भिन्न किस्म की रियाज की जरूरत होती है। वक्त के साथ जुगलबंदी करने की महारथ राहुल को हासिल नहीं हो पाई है। वक्त के साथ रोमांस का सबसे बड़ा तकाजा यह है कि आप वक्त की रवानी को अपनी बाहों में बांध कर रखें। लेकिन राजनीति के बेहद रोमान्टिक क्षणों में राहुल मंच से गायब हो जाते हैं। यदि राजनीति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अठखेलियां कर रही है, तो उसका एक मात्र कारण यह है कि वक्त की नब्ज पर उनका हाथ है। वो किसी भी क्षण राजनीति को नहीं छोड़ते हैं, इसीलिए राजनीति भी पूरी वफाओं से उनके साथ खड़ी है।
वैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राहुल अनुभवों से सीखते नजर नहीं आते और नसीहतें उन्हें पसंद नहीं हैं। दूसरों के अनुभवों को साझा करने की उनकी फितरत नहीं है। फिर भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पंवार ने राहुल को नसीहत दी है कि यदि कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक नजर में आने वाले राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती देना चाहते हैं, तो उन्हें अपने तौर-तरीके ठीक करना होंगे। उन्हें राजनीति में अधिक निरंतरता दिखानी होगी। शरद पंवार की इस सच-बयानी पर कांग्रेस के हलकों में सन्नाटा पसरा है। कोई कुछ बोलेगा भी नहीं, क्योंकि अपने गले में घंटी कोई भी बांधना पसंद नहीं करेगा।
राहुल गांधी से निरन्तरता की अपेक्षा के पीछे शरद पंवार के मंतव्य साफ हैं कि राजनीति एक सतत प्रक्रिया है। गौरतलब है कि जब भी राहुल गांधी ब्रेक के नाम पर लंबे समय के लिए तथाकथित अज्ञातवास पर विदेश-यात्राओं पर निकलते हैं, प्रधानमंत्री मोदी के मीडिया प्रबंधक उसी दरम्यान भिन्न-भिन्न तरीकों से यह खबर प्रसारित कर देते हैं कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन सालों में एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया है। उनकी थका देने वाली दिनचर्या के महिमा-मंडन के जरिए बहुत ही आसानी से राहुल गांधी की 'प्रिसेंस-इमेज' राजनीतिक-फलक पर स्थापित कर दी जाती है। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि राजीव गांधी के पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके 'न्यू-इअर' सैर-सपाटों को भी कभी सहजता से नहीं लिया जाता था।
वैसे भी पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय के बाद राजनीतिक फलक पर राहुल गांधी की गुमशुदगी ने उन्हें सवालिया निशानों से घेर लिया है। कांग्रेस के पास मीडिया के इन सवालों का कोई जवाब नहीं है कि वह हार के कारणों से बचने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार क्यों कर रही है? उप्र में जीतने के तत्काल बाद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के गुजरात-कूच की रणनीति से जाहिर है कि अपने लक्ष्यों को हासिल करने के मामले में भाजपा कितनी आगे चल रही है? वैसे शरद पंवार की राजनीतिक-सीख के सामने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा राहुल गांधी का कवच बन कर आए हैं। उनका कहना है कि राहुल गांधी के बारे में शरद पंवार को अपना दृष्टिकोण रखने का अधिकार है। उनके दृष्टिकोण पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकता, लेकिन राहुल के मोदी के मुकाबले खड़े होने के सवाल पर आनंद शर्मा कहना था कि राजनीतिक नेता एक दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते...। आनंद शर्मा अपनी जगह सही हैं कि राहुल गांधी मोदी का राजनीतिक-क्लोन नहीं हो सकते...लेकिन कांग्रेसजनों की यह अपेक्षा भी है कि राहुल राजनीति की आंधियों में शुतुरमुर्ग भी नहीं बनें... कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ और सामने बने रहें। पिछले दिनों कांग्रेस की वयोवृध्द नेता शीला दीक्षित की यह नसीहत भी सुर्खी बनी थी कि राहुल को सोनिया गांधी की तरह रोजाना दो-तीन घंटे कांग्रेस के दफ्तर में बिताना चाहिए...।[लेखक भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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