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उमेश त्रिवेदी
'आग लगी है हिम-शिखरों पर, धधक रहा उत्तुग हिमालय...कश्मीर की घाटी में अब केशर नही, आग उगती है...।' वीर-रस की भावनाओं से ओतप्रोत कविता की ये पंक्तियां 1965 के भारत-पाकिस्तान युध्द के दरम्यान मालवा के विभिन्न हिस्सों में होने वाले कवि सम्मेलनों में सेना के जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए जोश-खरोश के साथ गूंजती रहती थी। उस वक्त कश्मीर की क्यारियों में केशर की चिंगारियां पाकिस्तान की तबाही का प्रतीक थीं। भारत-पाकिस्तान युध्द के पचास साल बाद, आज भी कश्मीर में केशर की क्यारियों से चिंगारियां चटक रही हैं, लेकिन फिलवक्त इनकी तपन से खुद कश्मीर का चेहरा झुलस रहा है..। और, भारतीय सेना कश्मीर में आतंकियों की तमाम साजिशों को नेस्तनाबूद करने के बावजूद व्याकुल और बेचैन है।
यह बेचैनी कश्मीर में सेना के सर्वोच्च कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेएस संधु के संडे-एक्सप्रेस के साथ इंटरव्यू में भी झलक रही है। संधु का कहना है कि कश्मीर में सुरक्षा बलों को गोलियों के माध्यम से युध्द जीतने के बजाय दिमाग की लड़ाई को जीतना होगा...। कश्मीर में आतंकवादियों को मिलने वाला समर्थन और संरक्षण चिंता का विषय है। कट्टरता का विस्तार खतरे के निशान तक पहुंच चुका है। युवाओं को तंजीमों (आतंकी-संगठनों) से जुड़ने से रोकने के लिए मनोवैज्ञानिक-युध्द की रणनीति बनाना होगी। जुलाई 2016 में आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद स्थानीय युवाओं का रुझान आतंकवाद की ओर बढ़ा है। पिछले साल 100 से ज्यादा लोगों ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया। 2017 में 13 स्थानीय लोग आतंकवाद से जुड़े हैं। कश्मीरी युवाओं की आंखों में सुनहरे सपने संजोने की जरूरत है। कश्मीर के सरोकारों और संवेदनाओं को सहलाते हुए हर तबके से संवादों को मुकम्मल करना होगा। संवेदनाओं के मर्म की ढाल युद्ध के धर्म को नैतिकता प्रदान करेगी।
घाटी के बिगड़ते हालात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनाने के निर्णय भाजपा की अपनी ही 'कथनी और करनी' के खिलाफ खतरों से भरपूर 'राजनीतिक-प्रयोग' था। कश्मीर-घाटी में भाजपा-पीडीपी का यह 'राजनीतिक-प्रयोग' लगभग असफल होता दिख रहा है। दो साल पुरानी गठबंधन-सरकार के कार्यकाल में हालात बदतर हुए है। सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बैठक में इस 'राजनीतिक प्रयोग' को मियाद और मोहलत मिल गई है। अभी कश्मीर में राष्ट्रपति शासन का संकट टल गया है। भाजपा और पीडीपी राजनीतिक-निदान की कोशिशें आगे बढ़ाने पर सहमत हो गए है। कश्मीर मामलों में भाजपा के प्रभारी संगठन महामंत्री राम माधव मानते हैं कि तीन-चार महीनों में परिस्थितियां नियंत्रण में आ जाएंगी।
सोमवार को दिल्ली में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करने के बाद फिर दोहराया कि जहां से भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सिलसिला छोड़ा था, कश्मीर-मसले में वहीं से बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाना होगा, अन्यथा कश्मीर के हालात सुधारे नहीं जा सकेंगे। इसमें हुर्रियत नेताओं से बातचीत भी शरीक है। अटलजी ने 18 अप्रेल 2003 का 'गुड-फ्रायडे' के दिन श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में इसकी रूपरेखा रखी थी। अटलजी के भाषण को लोग 'गुड-फ्रायडे' स्पीच की संज्ञा भी देते हैं। कुछ महीने पहले संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने भी एक कार्यक्रम कहा था कि अटलजी कुछ साल और प्रधानमंत्री रह जाते तो शायद कश्मीर का मामला सुलझ जाता।
अटलजी तीन बिंदुओं को केन्द्र में रखकर संवाद करना चाहते थे। उन्होंने जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत के आधार पर विवाद को सुलझाने का क्रम आगे बढ़ाया था। लालकृष्ण आडवाणी को अलगाववादियों से बात करने के लिए अधिकृत किया था। कश्मीर को देश की मुख्य धारा में लाने के साथ ही पाकिस्तान से शांति-बहाली की कोशिशे भी इस फार्मूले में शरीक थीं। फारूक अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि कश्मीर के मामले में अटलजी की राहों पर चलने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अटलजी की कश्मीर नीति से इत्तेफाक जताते रहे हैं। भले ही मोदी अटलजी की नीतियों से सहमत हों, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। देश में अटलजी के प्रति स्वस्फूर्त विश्वास का माहौल था, जो कठोर हिन्दुत्व के चलते मोदी के लिए संभव नहीं है। मोदी अपनी ही लक्ष्मण-रेखाओं से घिरे राजनेता हैं। देखना दिलचस्प होगा कि अटलजी की सरकार में टूटे संवादों के सिरों को ढूंढकर नए संवादों की गांठो से जोड़ने की महबूबा मुफ्ती की मुराद कैसे पूरी हो सकेगी...?[वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक हैं।]
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