Patrakar Priyanshi Chaturvedi
गिरीश उपाध्याय
अच्छा खासा वह मामला ठंडा पड़ गया था। सरकार से लेकर पार्टी तक, सबने राहत की सांस ली थी। विपक्ष का भी मुंह लगभग बंद ही हो चला था, लेकिन ये जो इतने बड़े नाम वाला भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) नामक जीव है ना, उसने सब गुड़ गोबर कर दिया।
मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के अंतिम दिन सदन के पटल पर रखी गई ‘कैग’ की रिपोर्ट में, पिछले कई सालों से प्रदेश की राजनीति को रह रहकर हिलाने वाला व्यापमं का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया। कैग ने सरकार की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाते हुए कहा कि यदि समय रहते तत्कालीन मंत्री की सिफारिश को मान लिया जाता तो यह घोटाला नहीं होता।
व्यापमं को लेकर ‘कैग’ ने भारतीय जनता पार्टी सरकार के मंत्रियों और नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस सरकार के भी एक मंत्री को लपेटा है। रिपोर्ट के मुताबिक इन लोगों की भूमिकाएं संदिग्ध रही हैं। इन लोगों ने ऐसे अफसरों को व्यापमं यानी व्यावसायिक परीक्षा मंडल के उन पदों पर बैठाया, जिन पदों के लिए या तो वे पात्रता ही नहीं रखते थे या फिर उनके नाम पैनल में ही नहीं थे।
‘कैग’ की इस रिपोर्ट ने मृतप्राय कांग्रेस को जैसे संजीवनी सुंघा दी। उसने आनन फानन में मौके को लपका और हमेशा की तरह एक बार फिर मांग कर डाली कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को इस्तीफा दे देना चाहिए। वैसे में कई बार सोचता हूं कि यदि राजनेता इस तरह की जाने वाली इस्तीफों के मांगों पर यदि सचमुच इस्तीफे देने लगे, तो वह भी अपने आप में अनोखा विश्व रिकार्ड हो सकता है।
खैर… जैसाकि तय था भाजपा ने कांग्रेस की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद तत्काल पलटवार किया। लेकिन इस बार सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष के बजाय भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को निशाना बनाया। भाजपा का गुस्सा इस बात पर था कि आखिर ‘कैग’ को व्यापमं मामला इतना हाईलाइट करने की जरूरत क्या थी? इस तरह सनसनी फैलाना लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा के खिलाफ है आदि आदि…
ये प्रतिक्रियाएं देखने के बाद मुझे समझ नहीं आया कि ‘कैग’ को लेकर एक पार्टी के तौर पर भाजपा का ‘ऑफिशियल स्टैण्ड‘ क्या है? जिस समय ‘कैग’ ने 2 जी, कोयला घोटाला और कॉमनवेल्थ जैसे घोटाले उजागर किए थे, उस समय वो किस तरह लोकतंत्र की सेहत का ध्यान रख रहा था और आज किस तरह वह लोकतंत्र को टीबी या एचआईवी का इंजेक्शन लगा रहा है? क्या आपको इस तर्क या प्रतिवाद में और उत्तरप्रदेश चुनाव हारने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा सारा ठीकरा ईवीएम पर फोड़े जाने में कोई समानता नहीं लगती?
यह ठीक है कि व्यापमं में तमाम आरोप प्रत्यारोप के बावजूद अभी तक कुछ भी साबित नहीं हो पाया है। कांग्रेस ने सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था उसकी भी सुप्रीम कोर्ट में हवा निकल चुकी है। व्यापमं को चुनावी मुद्दा बनाए जाने के बाद प्रदेश में हुए तमाम चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस को पटकनी दी है।
ऐसे में यदि ‘कैग’ ने कुछ कह भी दिया तो उससे होना जाना क्या है, फर्क क्या पड़ना है…? वैसे भी तमाम भारी भरकम विशेषणों से युक्त ‘कैग’ नाम की इस संस्था की ज्यादातर रिपोर्ट्स केवल सदन के पटल की शोभा(?) बनकर ही रह जाती हैं। ये रिपोर्ट्स सुर्खियों के ऐसे बुलबुलों के समान होती हैं जो चंद घंटों से ज्यादा जिंदा नहीं रहते।
और इसीलिए इन तमाम स्थितियों को देखते हुए केंद्र व राज्य में सत्तारूढ़ दल से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह हमारी संवैधनिक संस्थाओं के प्रति थोड़ा तो सम्मान प्रदर्शित करें। महालेखाकार हों या नियंत्रक महालेखा परीक्षक, ये संस्थाएं सरकारी विभागों और उपक्रमों के वित्तीय हिसाब किताब को जांचने परखने वाली संस्थाएं हैं। यदि उन्हें कोई गड़बडी मिलती है तो, मोटे तौर पर वे इस बात की परवाह किए बिना कि, उसका किस पर क्या असर होगा, अपनी राय देती हैं।
‘कैग’ द्वारा मीडिया को जानकारी दिए जाने को ‘सनसनी फैलाने वाला कदम’ बताना और यह आरोप लगाना कि ‘’कैग ने तकनीकी शिक्षा विभाग के ऑडिट के बहाने व्यापमं के गैर जरूरी विषयों को निशाना बना कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश की है…’’ मूल रूप से एक संवैधानिक संस्था की स्थिति को कमजोर करना है। यदि राजनीतिक दल यह तय करने लगेंगे कि ‘कैग’ के लिए कौनसा विषय जरूरी है और कौनसा गैर जरूरी, तो फिर इस संस्था की स्वायत्तता का मतलब ही क्या रह जाएगा?
और ये ‘सस्ती लोकप्रियता’ का मतलब क्या है भाई? पता लगाया जाना चाहिए कि आखिर यह कितनी सस्ती होती है? क्या जिसको यह ‘लोकप्रियता’ महंगी पड़ती हो, उसके नजरिये से इसे ‘सस्ता’ माना जाए? और यदि ‘सस्ती लोकप्रियता’ होती है तो फिर ‘महंगी लोकप्रियता’ भी जरूर होती होगी। अगर ऐसा है तो राजनीतिक दलों की सलाह मानकर ये ‘कैग’ जैसी संस्थाएं सस्ती के बजाय महंगी लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास क्यों नहीं करतीं?
थोड़ा बहुत खर्चा पानी करना पड़े तो कर दें, लेकिन खुद पर लगा ये ‘सस्ता’ होने का दाग तो दूर करें… ‘महंगा’ होने में जो मजा है, वह ‘सस्ता’ होने में कहां।
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