बर्निंग-पोलिटिक्स बनाम सत्ता का अंडा देने वाला मुद्दा राम मंदिर
राम मंदिर

उमेश त्रिवेदी

उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राजनीतिक द्दष्टि से काफी अनुकूल और गुदगुदाने वाली है कि कई दशक से चले आ रहे राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को कोर्ट से बाहर आपसी बातचीत से हल किया जाना बेहतर होगा। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी की पिटीशन पर सुनवाई करते हुए भारत के चीफ जस्टिस जगदीश चन्द्र खेहर ने कहा कि दोनो पक्षो के मिलकर मुद्दे को कोर्ट के बाहर हल करने चाहिए। मामला धर्म और आस्था से जुड़ा है। इसलिए दोनो पक्ष मिलकर इसे सुलझाने का प्रयास करें। योगी आदित्यनाथ ने भी कह दिया है कि वो दोनो पक्षो के बीच बातचीत के मामले में मदद के लिए तैयार हैं।  

मामले में जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता के लिए करने के लिए तैयार है। इसके लिए वार्ताकार तय कर सकते हैं। दोनो पक्षो के बीच वार्ता नाकाम रहने पर कोर्ट इस मामले की सुनवाई करके फैसला देने को तैयार रहेगा। सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट से आग्रह किया था कि वह छह साल से लंबित राम मंदिर की अपील पर रोजाना सुनवाई करके जल्द से जल्द अपना फैसला सुनाए। चीफ जस्टिस के सुझाव पर सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि दोनो समुदाय इस मुद्दे को लेकर काफी हठी हैं, और साथ नही बैठेगें।  

सुब्रमण्यम स्वामी के राजनीतिक ऑब्जर्वेशन अपनी जगह सही और देश के राजनीतिक यथार्थ को रेखांकित करने वाले हैं। राजनीतिज्ञों को यह पसंद नही है कि मंदिर-मस्जिद विवाद किसी सर्वमान्य नतीजे तक पहुंच सके। मंदिर-मस्जिद का यह अदालती-मुकदमा लगभग सवा सौ साल पुराना है। सबसे पहले 1885 में अदालत ने  महंत रघुबर दास की इस मांग को खारिज कर दिया था कि  बाबरी मस्जिद के सामने चबुतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए। 1950 के पहले और बाद भी अलग-अलग घटनाक्रमोंल में मंदिर-मस्जिद विवाद की चिंगारियां उड़ती रही और बुझती रही। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण  आडवाणी की रथ-यात्रा के बाद 1990 में इस आग ने दम पकड़ा और अब राम मदिंर-बाबरी मस्जिद विवाद की गरमी भारतीय राजनीति का स्थायी भाव बन चुका है।

राम-मंदिर विवाद ने भारत की रंगहीन, गंधहीन और पंथहीन राजनीतिक-धाराओं को अलग-अलग सियासी रंगों में ढाल दिया है।  मंडल-कमंडल की सियासत मंदिर-मस्जिद के बहाने ही परवान चढ़ी और दंगे-फसाद का सबब बनी। इस एक मुद्दे की बदौलत देश में कई राजनेताओं की हैसियत मे चार चांद लगे, तो कई रसातल में चले गए। देश और प्रदेशों को सरकारें गिराने और बनाने में भी मंदिर-मस्जिद का बड़ा योगदान रहा है। दुनिया में कदाचित ही ऐसे उदाहरण मौजूद होंगे कि बरसों चलने वाले कोई एक मुद्दा समाज के अलग-अलग सिरों को पकड़ कर राजनीति को इतना संगठित और सघन कर दे कि  देश की दीगर राजनीतिक ताकतें खुद को अपाहिज महसूस करने लगें।

तीस सालों में छह बार कोर्ट के बाहर मंदिर-मस्जिद विवाद को सुलझाने की कोशिश हो चुकी हैं। राजीव गांधी, चंद्रशेखर और पीवी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्रित्व काल में ऐसे प्रयास हुए थे। लेकिन राजनीति में धर्म और धर्म मे राजनीति के दुरूह समीकरणों के सामने मंदिर-मस्जिद विवाद को सुलझाने के सभी राजनीतिक प्रयास बौने सिध्द हुए है। वस्तुत भारत के राजनेताओं और राजनीतिक दलो के लिए राम मंदिर- बाबरी मस्जिद का मुद्दा सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जैसा है। इसलिए सभी मंदिर-मस्जिद की 'बर्निंग-पोलिटिक्स' को जिंदा और गतिशील रखना चाहते हैं।  यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हिन्दुस्तान में मंदिर-मस्जिद की बर्निंग-पोलिटिक्स का अंतिम अध्याय लिखने सबब बनेगी अथवा नही बन पाएगी? 

हिन्दु-मुस्लिम ध्रुवीकरण के बहाने इस राजनीति का सबसे ज्यादा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला है। महज संयोग है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी उस वक्त सामने आई है, जबकि केन्द्र में भाजपा की सरकार है और उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ के रूप में भाजपा का कट्टरपंथी माना जाना वाला मुख्यमंत्री मौजूद है। राम-मंदिर का मुद्दा भाजपा की प्राथमिकताओं में जरूरत के मुताबिक ऊपर-नीचे सरकता रहा है। भाजपा कोर्ट की आड़ में राम मंदिर को हाशिए पर डालती रही है। पहली बार भाजपा पूरी तरह और बेहिचक हिन्दुत्व पर सवार है। उप्र में भाजपा की जीत के बाद हिन्दु-मुस्लिम ध्रुवीकरण के स्केल में तुष्टिकरण के पैमाने बदले हैं। हिन्दुत्व के एकतरफा ध्रुवीकरण के नीहितार्थ और उलझाव को मुसलमान बखूबी समझ रहे है। तुष्टिकरण का पिरामिड उलटा पड़ा है और सत्ता की जागीरों में केशर लहलहा रही है। सुप्रीम कोर्ट की हिदायत हिन्दु-मुसलमानो के लिए राजनीतिक अवसर है कि वो मिलकर देश में समन्वय, सामंजस्य और समरसता की फसल लहलहाने का उपक्रम करें। [ यह आलेख  सुबह सवेरे से ,उमेश त्रिवेदी सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

 

Dakhal News 22 March 2017

Comments

Be First To Comment....

Video
x
This website is using cookies. More info. Accept
All Rights Reserved © 2025 Dakhal News.