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उमेश त्रिवेदी
उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ की कहानियां राजनीतिक फलक पर हर रंग में दर्ज हो रही हैं। चौबीस घंटों में उनके जीवन के हर हिज्जे को लोगों के सामने परत-दर-परत इस कदर परोसा जा चुका है कि उनके बारे में कहने-सुनने को कुछ बचा ही नहीं है। योगी आदित्यनाथ का देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनना सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। राजनीतिक रंज-ओ-गम और खुशियों के बीच इसकी कहानियों के सिरे कई दिशाओं में खुलते हैं। इसे नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कमतर इसलिए नही आंका जाना चाहिए कि उनका मुख्यमंत्री होना देश में हिन्दुत्व के राजनीतिक एजेण्डे और रोडमेप को सुनिश्चित कर रहा है। नरेन्द्र मोदी के चुनाव अभियान में उनका हिन्दुत्व विकास के इंद्र-धनुष की ओट में छिपा था, जबकि योगी आदित्यनाथ निखालिस हिन्दूवाद पर सवार होकर राजनीति के इस मुकाम पर पहुंचे हैं। उनका सत्तारोहण भाजपा की हिन्दुत्ववादी राजनीति पर पुष्टि की मुहर है।
योगी आदित्यनाथ के माथे पर उप्र का ताज रख कर आरएसएस और भाजपा ने अपने परम्परागत विरोधियों के सामने भविष्य की राजनीति का एजेण्डा सेट कर दिया है। भविष्य में भाजपा की राजनीतिक कमान हिन्दुत्व को साध कर आगे बढ़ने वाली है। उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों के विश्लेषण में एक बात साफतौर पर उभर रही है कि भारत में अब राजनीति का ’डिस्कोर्स’ बदल चुका है। राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति को त्याज्य मानने वाली राजनीतिक-थीसिस के पन्ने फट चुके हैं। और सोशल-इंजीनियरिंग के जंग लगे पुर्जे खारिज होने लगे हैं। उप्र में साम्प्रदायिक और जातीय वोटों का ’डि-पोलराइजेशन’ और ’रि-सेटलमेंट’ देश के ’राजनीतिक-पर्सेप्शन’ में बड़े बदलाव की ओर इंगित कर रहा है। ’सेक्युलरिज्म’ या ’सेक्युलर-राजनीति’ देश की राजनीति में खोटे सिक्कों की तरह अस्वीकृत हो चुके हैं। कट्टर हिन्दुत्व के परिदृश्यों में ’सेक्युलरिज्म’ का अप्रांसगिक या ओझल हो जाना सामान्य घटना नही है। समाज के वैचारिक-मंचों पर ’सेक्युलरिज्म’ में यह पिघलन कांग्रेस सहित लेफ्ट विचारकों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती है। लेकिन यह चुनौती एकतरफा नहीं है। ’सेक्युलरिज्म’ की अनुपस्थिति भाजपा और संघ के विचारकों के लिए भी समान रूप से मुश्किलें पेश करने वाली सिद्ध होगी। सेक्युलर-राजनीति की शून्यता को भरना आसान नहीं है। ’सेक्युलरिज्म’ को छद्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण की खाइयों में ढकेल कर खारिज करना आसान है, लेकिन उसके एवज में समाज को खंगाल कर हिन्दुत्व के सर्वमान्य स्वरूप की संरचना करना भी आसान नहीं है। समग्रता से इसके सभी पहलुओं की पड़ताल जरूरी है कि मुस्लिम-विरोध की आबोहवा में हिन्दुत्व का पालन-पोषण कितना दीर्घजीवी और राष्ट्र हितकारी होगा?
योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व में समाहित उग्र हिन्दुत्व के हाथ थामकर भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। फिलवक्त हिन्दुत्व के ध्रुवीकरण की यह राजनीति अकाट्य और आसान है। भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के पास उसके मुकाबले के लिए कोई रणनीति मौजूद नहीं है। उप्र के चुनाव परिणाम भाजपा विरोधी दलों के लिए सदमे का गणित है, जिसके राजनीतिक-गुणांकों को समझना और सुलझाना आसान नहीं है। कांग्रेस सहित सभी सेक्युलरवादियों के सामने बड़ी चुनौती है कि वो हिन्दुत्व के कौन से सांचे में राजनीति को फिट करें, जो भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व की परिभाषाओं के मुकाबले खड़ा हो सके।
मुस्लिम बहुल उत्तर प्रदेश में उनकी ताजपोशी के जमीनी-मायने बिल्कुल भिन्न हैं। उनके राजनीतिक-अलाव में जमा राख में छिपे अंगारे पूरी तरह ठंडे नहीं हुए हैं, ना ही उनके विरोधी उन्हें ठंडा होने देंगे। योगी के इर्द-गिर्द समुन्दर में उफनते ज्वार-भाटों जैसे भावनात्मक उतार-चढ़ाव मौजूद हैं। लखनऊ से 135 किलोमीटर दूर अयोध्या में रामलला आज भी तंबुओं में विराजमान हैं एवं बाबरी मस्जिद का ढांचा हिन्दू-मुसलमानों के ’सेण्टीमेंट्स’ को कुरेद रहा है। मुजफ्फर नगर के घाव हरे हैं और मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं के विस्थापन की कथित कथाएं योगी आदित्यनाथ खुद सुनाते रहे हैं।
मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के लिए सब कुछ सहज-सरल नहीं है। वो हिन्दुत्व के फायरब्राण्ड नेता हैं और उनके हिन्दुत्व के अलाव की राख जल्दी ठंडी होने वाली नहीं है। राम-मंदिर आंदोलन और हिन्दुत्व की आग में तपे-पगे योगी आदित्यनाथ को जितना बाहरी चुनौतियों से जूझना है, उससे ज्यादा उन्हें अपने अंतर्मन की चुनौतियों से जूझना होगा। योगी आदित्यनाथ का हिन्दुत्व भी भाजपा में सर्व-स्वीकृत और सर्वमान्य नहीं है। उनके राजनीतिक-कथोपकथन से भाजपा का बड़ा तबका असहमत रहा है। भाजपा के प्रवक्ताओं को भी कई बार योगी के बयान से खुद को अलग-थलग जाहिर करना पड़ा है।[लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। संपर्क : 09893032101]
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