Patrakar Vandana Singh
उमेश त्रिवेदी
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि उप्र सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दरम्यान एक बार भी लोगों के जहन में यह सवाल नहीं उठा कि इतने हाय-प्रोफाइल चुनाव अभियान के लिए नोटों की बरसात कहां से हो रही है? जुनून की हद तक राजनीतिक चर्चा करने वाले लोगों के मन में यह सवाल क्यों नहीं उठा कि कालेधन की इस चकाचौंध का सबब क्या है? चौबीसों घंटे दूरबीन लेकर राजनीति में बेइमानियां तलाशने वाले मीडिया ने एक बार भी पलट कर किसी नेता से यह नहीं पूछा कि करोड़ों रुपयों का यह इंतजाम कैसे और कहां से हो रहा है? यह अनदेखी इसलिए समझ से परे है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नोटबंदी के कालाधन विरोधी राजनीतिक-कोलाहल की पृष्ठभूमि में हो रहे थे। समूचा मीडिया और अर्थ जगत केन्द्र सरकार की इन दलीलों से असहमत था कि नोटबंदी काला धन रोकने का कारगर उपाय है। चुनाव में काले धन की चकाचौंध सीधे-सीधे सरकार की दलीलों को खारिज कर रही थी, फिर भी सब लोग काले धन के इस शक्ति प्रदर्शन के मूक दर्शक बने रहे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर, 2016 को देश में नोटबंदी का ऐलान करते हुए दावा किया था कि वो यह कदम देश में काले धन पर रोक लगाने के लिए उठा रहे हैं। काले धन के नाम पर हजार-पांच सौ के नोटों के जरिए लोगों के पास जमा 95 प्रतिशत से ज्यादा नगद राशि बैंकों की तिजोरियो में जमा हो गई थी। नोटबंदी के हालात पूरी तरह सामान्य नहीं होने के बावजूद राजनेताओं ने पहले की तुलना में ज्यादा काला धन खर्च करके व्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुए असामान्य तरीके से ये चुनाव लड़े हैं।
उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच एडीआर ने चुनाव अभियान शुरू होने के बाद अपने प्रारंभिक आकलन में बताया था कि प्रत्याशी 200 वोट हासिल करने के लिए 20 हजार रुपए तक खर्च कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में काले धन का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। पांच राज्यों के चुनाव के पहले सरकारी एजेन्सियों ने सिर्फ उत्तर प्रदेश के चुनाव में ही 5000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया था। माना गया था कि इसमें 1500 करोड़ रुपये राजनीतिक दल औपचारिक रूप से खर्च करेंगे। शेष 3500 करोड़ रुपए काले धन के रूप में खपाए जाने वाले थे।
आयकर अधिकारियों का कहना है कि विधानसभा चुनावों में मतदाताओं की खरीद-फरोख्त में काले धन के इस्तेमाल पर नोटबंदी का बिल्कुल असर नहीं हुआ है। चुनाव में नगदी, शराब और ड्रग्स का जमकर उपयोग हो रहा है। चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त निगरानी दल ने पांच राज्यों के मौजूदा चुनाव में 2012 की तुलना में ज्यादा शराब, ड्रग्स और नगद राशि पकड़ी है। सिर्फ उप्र में ही चुनाव के पांचवां चरण पूरा होने तक 116 करोड़ रुपए की नगदी जप्त की जा चुकी है। 57.69 करोड़ की 20.19 लाख बैरल शराब और आठ करोड़ की ड्रग्स छापेमारी में पकड़ी गई है। पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में भी भारी मात्रा में यह सामग्री पकड़ी जा चुकी है ।
चुनाव में काले धन की अनदेखी जन मानस के उस मनोविज्ञान को दर्शाती है कि उसने राजनीति में काले धन के इस्तेमाल को नियति मान लिया है। भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव अभियान की रैलियों में एक-दूसरे की सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में कोताही नहीं बरती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में सबसे ज्यादा मुखर थे। उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी भ्रष्टाचार के मामले में एक दूसरे को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन कोई भी नेता खुद की ओर नहीं देख पा रहा था कि विरोधियों पर उंगली उठाने वाले उनके हाथों की तीन उंगलियां खुद की ओर भी इशारा कर रही हैं। चुनाव अभियान खत्म होने के बाद देश की राजनीति 11 मार्च तक सुस्ताने के मोड में है। चुनाव के कैनवास पर काले धन की काली रेखाओं के काले स्ट्रोक वैसे भी राजनीति को उद्वेलित नहीं करेंगे। चुनाव में काले धन के इस्तेमाल की रिपोर्ट कहीं कोने में पड़े-पड़े नोटबंदी की गौरव-गाथा गुनगुनाती रहेगी। [ लेखक भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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