आतंकवाद का प्रतिकार करें पाकिस्तानी कलाकार
रजनीश अग्रवाल

रजनीश अग्रवाल 

पाकिस्तानी कलाकारों के भारत में काम करने को लेकर फिर हल्ला है।  हालाँकि ये बहस पहली बार नहीं है। पर अब इस मुद्दे की पहले से ज्यादा अहमियत हो गई है।

दरअसल राजनीतिक नेतृत्व, कूटनीतिज्ञों और रणनीतिकारों  द्वारा कहा जा रहा है कि अब आतंकवाद के विरुद्ध हमारी लड़ाई अंतिम दौर में है। ऐसे अवसर में हमारी लड़ाई को कमजोर करने का प्रयास हमारे भीतर से हो, ये कतई स्वीकार नहीं हो सकता। सरकारें समग्र दृष्टिकोण से विचार करती हैं। वे भले ही सांस्कृतिक संबंधों पर प्रतिबन्ध न लगा पाएं पर हमारे समाज का मानस दुनिया जरूर पढ़ती है। मैं ये भी नहीं मानता कि किसी को कानून से ऊपर जाकर २४/४८ घंटों का अल्टीमेटम देकर कहा जाये कि अपने देश रवाना हो जाओ। 

भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक व्यवहार बराबरी का क्यों नहीं होना चाहिए ? आखिर भारत में भी हर विधा के जोरदार कलाकार हैं, उनको वहां कितना काम और सम्मान मिला ? कितने न्यौते सरकारी और गैर सरकारी मिलते हैं ? आतंकवाद के विरुद्ध बनी भारत की फिल्मों को क्यों प्रतिबंधित कर दिया जाता है ? क्या इसके विरोध में कोई प्रदर्शन या बयान इन कलाकारों का आया ? 

वहीँ दूसरी ओर पाकिस्तानों कलाकारों की कला ,भावना और संवेदना के पक्ष में खड़े होने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि ये संवेदना की उपज आतंकी घटनाओं पर क्यों नहीं होती !!! क्यों नहीं बॉलीवुड व्  टेलीवुड में काम कर रहे पाकिस्तानी कलाकारों ने मिलकर और खुलकर आतंकी घटना का विरोध किया ? वे जानते हैं कि उनके देश की जमीन पर,उनके देश द्वारा उनके ही टैक्स के पैसों से आतंक की खेती हो रही है पर यदि आतंकवाद मानवता का दुश्मन है तो उस पर कलाकारों का हमला क्यों नहीं होता ? जानी मानी गायिका सलमा आगा ने भी यही कहा कि आखिर ये पाकिस्तानी कलाकार इन घटनाओं के विरोध में क्यों नहीं सामने आये ? दूसरा एक तर्क  हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव का भी उल्लेखनीय है कि हमारे विशाल देश में हर श्रेणी के कलाकार हैं तो आखिर क्यों पाकिस्तानी कलाकारों को आयात किया जाता है ? फिर भौंडे तर्क दिए जाते हैं कि यदि उनके वापस जाने से आतंकवाद की समस्या का हल होता हो तो ही उनको उनके देश जाने को कहा जाये।

कदाचित अपने देश के ही कथित बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल जो इनके पक्षकार बनकर उभरते हैं, वे अपनी ओर से तर्क देते हैं भई वे खुद के देश के खिलाफ कैसे खड़े हो सकते हैं !!! तो क्या कला में संवेदना  अभिव्यक्ति में क्या अलग तरह मानवीय संवेदना होती है जिसके दायरे में आतंकवाद के शिकार हुए लोग नहीं आते। जब चाहे तब अपने मन के मुताबिक देश की सीमाओं की आड़ ले लो। जब चाहे तब छोड़ दो। पैसा कमाओ घर जाओ। टैक्स दो जो आतंक को पाले पोसे।

.....पर हमारे देश में जरूर ऐसे लोग हैं जो आपके देश के भेजे हुए आतंकियों के मानवाधिकारों पर आंसूं बहाते हैं। हाँ ,मेरे देश में हैं वे लोग जो अफजल गुरुओँ,इशरतों,याकूब मेमनों को महिमा मंडित करते हैं। भले ही शहीद सैनिको की अंतिम यात्रा में शामिल न हों पर इनके जनाजे में दल बल के साथ पहुंचते हैं। हमारे यहाँ ऐसे संवेदनशील प्राणी हैं। आप अपने देश के साथ खड़े रहें ये बात भी ये अपनी मातृभूमि को धोखा कर करते हैं। ये वे लोग हैं जो सेना के त्याग को उसका अपना काम बताकर उनका जिक्र करने पर झल्ला जाते हैं।

आतंकवाद के विरुध्द लड़ाई मात्र सैनिकों और सरकारों के दम पर ही पूरी नहीं हो सकती। ये लड़ाई १२५ करोड़ देशवासियों को मिलकर लड़नी होगी। २५० करोड़ आँखों की नजर इस लड़ाई पर होगी तो पूर्ण विजय हमारी होगी। जैसे आतंकवाद गुड या बेड नहीं होता वैसे ही मानवाधिकार/संवेदना अलग अलग नहीं हो सकते। 

प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने कोझिकोड की रैली में पाकिस्तान की जनता से कहा कि “पाकिस्तान की अवाम अपने हुक्मरानों से पूछे कि दोनों देश साथ आजाद हुए। फिर क्या कारण है कि हिंदुस्तान सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट करता है और आपका देश टेररिज्म एक्सपोर्ट करता है।”

क्या भारत में काम कर रहा पाकिस्तानी कलाकार ये सवाल अपने देश में उठाएगा ? क्या वह भारत के विरुद्ध आतंकवाद को पैदा करने की हर कोशिश को चुनौती बनेगा ? यदि हाँ , तो शायद स्कूल में जाने वाले  उनके अपने बच्चे भी अपने जीवन को रोशन करेंगे जो आतंक के उस मुहाने पर बैठे हैं जहाँ हर पल अपने को आतंकित महसूस करते होंगे। [ लेखक रजनीश अग्रवाल मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता हैं ]

Dakhal News 5 October 2016

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