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राघवेंद्र सिंह
मध्यप्रदेश में नौकरशाही अड़ंगे लगाती है। डंडे लेकर निकलने की चेतावनी के बाद हालात बेकाबू हैैं। दस साल बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अफसरों से पूछ रहे हैैं कहां है सिंगल विंडो... ये हाल है सरकार और नाकरशाही के। आखिर कौन है जिम्मेवार और जनता का गुनाहगार..? भाजपा संगठन के हाल यह है कि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल कहते हैैं नेता पार्टी फोरम पर ही अपनी बात कहें। पर कुछ घंटों में ही दो विधायक, मंत्री से सार्वजनिक रूप से इस्तीफा मांग लेते हैैं। दिन भले ही नवरात्रि के चल रहे हैैं मगर शिव से तांडव की दरकार है। संघ के स्वयं सेवक को पुलिस पीट रही है। जनता के साथ भी नापाक हरकतें जारी हैैं। ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक की सख्त जरूरत है।
प्रदेश में क्या भाजपा, क्या कांग्रेस और क्या सरकार... सबकी हालत खराब है। कुपोषण व संघ के जिला प्रचारक पर पुलिस का हमले से कलई खुल रही है। सीन निराशा भरा है। सियासी किस्सागोई के पहले इस मौके पर मेरे दिवंगत मित्र श्री महेश जोशी के करीब तीस बरस पहले लिखे गीत की चार पंक्तियां याद आ रही हैैं जो सूबे की जमीनी हकीकत को काफी हद तक बयां करेगी।
‘मांगते हैैं रोटी पर मिले आश्वासन
नेता सारे देश के हुये दु:शासन
भूख से सिकुड़ जैसे पेट हुआ दौना
और मेरे देश में न जाने क्या-क्या होना’
प्रदेश में बच्चे भूख और कुपोषण का शिकार हो रहे हैैं। इलाज के लिये अस्पतालों में उनकी रगों में से खून निकाला जाता है तो इंजेक्शन की सुई सूखी और खाली लौटती है। यह लिखते वक्त मेरी कलम और शब्द दोनों कांपते से महसूस हो रहे हैैं। हड्डियों का ढांचा बने बच्चों की काया और शरीर से बाहर निकलती पसलिया देख लगता है इनकी जान खतरे में है तो नौकरशाही, सरकारें और सियासी दलों को क्यों महफूज रहना चाहिये..? मगर सब सुरक्षित हैैं क्योंकि मौत के मुंह में खड़े बच्चों में उनका अपना कोई नहीं है। ये मामला उड़ीसा की बदनाम कालाहांडी या इथोपिया का नहीं है। गेहूं पैदा करने में पंजाब को टक्कर देने वाले मध्यप्रदेश का है। साथ ही एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री का है जो दस साल से प्रदेश को बीमारू से विकसित और स्वर्णिम राज्य बनाने के नारे को दो के पहाड़े की तरह बच्चों-बच्चों तक को रटवा चुके हैैं। उनका भाषण प्रारंभ होने के साथ ही सुनने वाले उनके आने वाले वाक्यों को पहले ही बोलने लगते हैैं। यहां तक तो सब ठीक है। इसीलिये तीसरी बार "फिर भाजपा फिर शिवराज" का नारा चला। मगर अब चौतरफा असंतोष और असफलता के किस्से चल पड़े हैैं। कांग्रेस ने श्योपुर में कुपोषण के संगीन मुद्दे को सियासी रंगमंच पर उठाया। इसकी शुरूआत महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजसी ठाठ से नीचे उतरकर प्रेस से चर्चा में की। इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस के युवा अध्यक्ष अरुण यादव ने आग उगलने और अंगारे बरसाने के बजाये अपने बड़े हथियार मौन के साथ धरना दिया और बस कहानी खत्म। कांग्रेस इससे और करे भी तो क्या...? जनता का दिल और चुनाव जीतने का जहां तक सवाल है वे पहले ही बहुत जीत चुके हैैं। पचास-पचास साल तक राज किया है। जनता भाजपा से ऊब जायेगी और जब भाजपा सत्ता से उकता (जैसा कि उसे लग रहा है) जायेगी तो फिर है कौन कांग्रेस के अलावा जिसे राज करना आता हो। कांग्रेसी कहते हैैं जहां तक धन कमाने का प्रश्न है तो भाजपा सरकार ने कई नुस्खे दे दिये हैैं। इनमें रेत, पहाड़, जंगल, व्यापमं के अलावा कई ट्रेड सीक्रेट हैैं। सिंधिया महाराज और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष झाबुआ के हीरो कांतिलाल भूरिया जब भोपाल आते हैैं तो वे पार्टी कार्यालय न तो सूचना देते हैैं और न ही वहां जाना मुनासिब समझते हैैं।
प्रदेश भाजपा ने तीन बार लगातार चुनाव जीत कर सत्ता तो पाई मगर संगठन की मर्यादा और अनुशासन की मजबूती को उसने काफी खोया है। हाल यह है कि संगठन की न तो सरकार सुन रही है और न कार्यकर्ता उधर सरकार की अफसर नहीं सुन रहे हैैं। सब जगह निरंकुशता और अराजकता है। कुलीन भाजपा में कर्कश, कलह और कटुता ने ऊपर से नीचे तक डेरा डाल दिया है। सत्ता संगठन के शीर्ष पर जो चार नेता हैैं वे लगता है असफलता की फिसलपट्टी पर आ गये हैैं। तीसरी बार सबसे लंबे समय तक सीएम बनने का रिकार्ड बनाने वाले शिवराज सिंह चौहान के पास खोने के लिये कुछ नहीं है। कल तक उनके सामने नौकरशाही को काबू में करने के अलावा कोई बड़ी चुनौती नहीं थी न पार्टी के भीतर और न कांग्र्रेस से। लेकिन हाल ही प्रदेश भाजपा की ग्वालियर बैठक में प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे ने तंत्र के हावी होने के मंत्र के बेकार हो जाने की बात कह मुख्यमंत्री पर सीधा आक्रमण किया था। हालांकि तब शिवराज विलायत में थे। दूसरे दिन वे लौटे तो सरकार से उपकृत नेताओं ने थोड़ा लिहाज किया। मगर उसके पहले बगलाघाट के बैहर में संघ के जिला प्रचारक सुरेश यादव की पुलिस ने जिस निर्ममता से संघ कार्यालय में पिटाई की उसने असंतोष की आग में घी का काम किया। नया इंडिया ने इसी कालम में बेलगाम अफसरों के कारण जनता के साथ अन्याय का कई दफा जिक्र भी किया था। झाबुआ में विस्फोट से लगभग नब्बे लोगों की मौत से लेकर सूखे से आत्महत्या करते किसानों को मुआवजा में गड़बड़ी, आपरेशन में आंखें फूटना, स्कूलों में पढ़ाई नहीं होना, बाढ़ के पहले आपदा प्रबंधन की तैयारी नहीं होना जैसे कई मुद्दे थे। नाफरमान नोकरशाहों को कौन बचाता है जैसे मुद्दों पर कड़ी कार्रवाई होती तो न कुपोषण की घटनाएं बढ़ती और न बैहर में संघ स्वयं सेवक की पिटाई होती। अब सरकार अपनी खाल बचाने के लिये घबराहट में पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई कर रही है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से लेकर टीआई और छोटे पुलिस कर्मियों पर कैस दर्ज कर दिये गये हैैं। यदि पहले ही सूचना और शिकायतों पर संगठन - सरकार गूंगी बहरी और अंधी न बनी रहती तो बैहर कांड नहीं होता। ऐसी कार्रवाई आम आदमी के दुःख पर भी होनी चाहिए।
संगठन निस्तेज...
भाजपा संगठन की एक समय ऐसी धमक थी कि मंत्री तो क्या सीएम भी इनके नेताओं के आग्र्रह को आदेश मान काम करते थे। अब संगठन तो सत्ता की देहरी के चक्कर काट रहा है। पहले संगठन महामंत्री, प्रदेश प्रभारी और अध्यक्ष कभी कभार किसी लाभ की बातें करते थे। निर्णय केंद्र में कार्यकर्ता होते थे। अब उलटा है। इसलिये सरकार की नजर में संगठन के नेताओं का कद घटा है। पार्टी हित का स्थान निजी पसंद ने ले लिया है। राजनीति में कमजोर विद्यार्थी की भांति संगठन महामंत्री भाजपा और कार्यकर्ताओं को समझने में थोड़ा ज्यादा वक्त ले रहे हैैं। प्रदेश प्रभारी राज्य भाजपा की नाजुक होती हालत के बाद भी समय नहीं दे पा रहे हैैं। असल में ज्यादातर पदाधिकारियों को उनकी वरिष्ठता, अनुभव, आचरण व हैसियत से अधिक वजनदार पद दे दिये हैैं। पहले तो उन्हें चुनौती है अपने से वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ताओं में अपनी स्वीकार्यता की। इसके लिये मुंह में शक्कर, पैर में चक्कर और सीने में आग के साथ माथे पर बर्फ जरूरी है। एक तो संगठन महामंत्री नये हैैं और प्रदेश प्रभारी की दिलचस्पी संगठन गढऩे के बजाये जो है उसका उपभोग करने में ज्यादा है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष को और गंभीर होना पड़ेगा। संगठन पर पकड़, तालमेल, कार्यकर्ताओं से संवाद और उनके काम करने होंगे। रिक्त पदों पर नियुक्तियां करानी होगी।
फोटो - नंदूभैया-शिवराज-सुहास भगत
तार-तार होता अनुशासन
अनिश्चितता का माहौल है पदाधिकारियों की बैठक को लेकर ही तदर्थवाद है। विनय सहस्रबुद्धे कहते हैैं तंत्र हावी है इसलिये मंत्र बेकार हो जाता है। राष्ट्रीय महामंत्री लगातार आक्रामक हैैं। माहौल बिगड़ता देख राष्ट्रीय महामंत्री रामलाल ग्वालियर में कहते हैैं प्रवक्ताओं को छोड़ शेष नेता बाहर नहीं पार्टी फोरम पर अपनी बात कहें। कुछ घंटे में इसकी धज्जियां उड़ गई भिंड के कार्यकर्ताओं में सांसद भागीरथ प्रसाद व जिला अध्यक्ष संजीव कांकर के खिलाफ नारेबाजी की। बैहर कांड में एक दो दिन के अंतर से दो विधायकों संजय शर्मा व जालम पटेल ने कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के खिलाफ बयान दिया और उनसे इस्तीफे मांग कर डाली। संगठन ने दोनों को नोटिस दिया है। यह सब रामलाल के निर्देशों के बाद हुआ। इसका क्या मतलब निकाला जाना चाहिये। इसके पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री के एक सहयोगी ने वाट्सएप पर गृहमंत्री से इस्तीफा मांगा। साथ ही कहा कि उनके पास पहले ही परिवहन जैसा मलाईदार विभाग है। पार्टी में अचानक असंतोष व अनुशासनहीनता की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैैं। संस्कृति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष रहे राजेश भदौरिया ने तो व्यापमं कांड पर पार्टी को जनता से माफी मांगने जैसी मांग प्रेस वार्ता में कर डाली थी। ऐसे ही मीडिया में पार्टी का चेहरा रहे प्रकाश मीरचंदानी ने सोशल मीडिया में सरकार के खिलाफ अपने विचार व्यक्त किये थे। संगठन ने इन दोनों के खिलाफ अलबत्ता निलंबन की त्वरित कार्रवाई की। मगर माहौल सुधरता नजर नहीं आता। तेरह साल की भाजपा सरकार में बड़ी संख्या में नेता कार्यकर्तागण राजनैतिक व प्रशासनिक लाभ नहीं ले पाये चौथी बार सत्ता में आना उन्हें कठिन लगता है। इसलिये अब वे भी रूतबा और लाभ चाहते हैैं।
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