मध्यप्रदेश:डोंट डिस्टर्ब अभी सरकार सो रही है...!
मध्यप्रदेश सरकार सो रही है...!

मध्यप्रदेश:डोंट डिस्टर्ब  अभी सरकार सो रही है...!

 

राघवेंद्र सिंह 

भाषण, नारे, जुमले अभी जारी हैं। जमीनी हकीकत को जानने के बाद आखें मूंदने का दौर अभी जारी है….इसलिए अभी डोंट डिस्टर्ब। बकौल नेताजी अभी तो मुर्दों में जान फूंकने, जीतने के लिए उप चुनाव में एलान करने, जरूरतमंदों को भरोसा देने का दौर जारी है। जाने क्यों समाज से लेकर सियासत तक सिरदर्द होने पर पुख्ता इलाज के बदले सेरिडान खिलाने का दौर जारी है। इस बार हम फोकस कर रहे हैं बच्चों और किसानों पर। लेकिन सरकार का फोकस है कर्मचारियों को वेतनमान देने पर। उसे लगता है कि हल्ला मचाने वाले और चुनाव जिताने की चाबी कर्मचारियों के पास ही है। इसलिए जनता ना कार्यकर्ता, स्कूल ना कॉलेज और अस्पताल, किसान सब ऊपर वाले के भरोसे हैं। 

जुलाई में चला स्कूल चलो अभियान लेकिन स्कूल में बच्चों की भर्ती पर अड़ंगों के बाद भी आ रहे विद्यार्थियों के पठन-पाठन की कोई चिंता नहीं। शिक्षा मंत्री कहते हैं, हमारे यहां बच्चे इसलिए भोंदू हैं क्योंकि यहां आदिवासी ज्यादा हैं। सितम्बर समाप्त हो रहा है और स्कूल में सिलेबस के अनुसार पढ़ाई का कोई अभियान नहीं। मंत्री से लेकर संतरी तक कोई मास्साबों से नहीं पूछ रहा है कि परीक्षा के् हिसाब से पढ़ाई हो रही है या नहीं। मासिक टेस्ट, तिमाही परीक्षा में कैसे नतीजे आ रहे हैं। प्रायवेट स्कूलों से ज्यादा वेतन पाने वाले शासकीय शिक्षक कैसा पढ़ा रहे हैं? निजी और सरकारी स्कूल के परीक्षा परिणामों की तुलना कोई कर रहा है क्या? अभी से इसकी जवाबदारी तय होनी चाहिए। टीचर, हेडमास्टर, जिला शिक्षा अधिकारी, लोक शिक्षण आयुक्त से लेकर मंत्री तक जिम्मेदारी तय हो। विद्यार्थी फेल तो मंत्री पास कैसे हो सकते हैं। अभी से सरकार या सिस्टम नहीं जागा तो नवंबर-दिसम्बर आते-आते विद्यार्थी तनाव में आएंगे, फिर शुरू होग डिप्रेशन का दौर। माता-पिता परेशान होंगे, टीचर कहेंगे साल भर से पेरेन्टस ने ध्यान नहीं दिया। अब दिसम्बर-जनवरी में कोर्स कैसे कवर होगा। अगस्त से अक्टूबर तक पढ़ाई नहीं होने पर बच्चे पहले पढ़ने से बचते हैं और आगे जाकर स्कूल जाने से कतराते हैं। फिर परीक्षा आते-आते डर की वजह से अवसाद में डूबने लगते हैं। इसी समय स्कूल और मीडिया में डिप्रेशन को लेकर काउंसिलिंग की बातें होती हैं। डाक्टर और मनोवैज्ञानिक की सलाह ली जाती है। बहुत लम्बी कहानी है इसकी। मगर बच्चों और माता-पिता से पूछिए क्या गुजरती है उन पर। पूरा साल बर्बाद नहीं बल्कि भविष्य चौपट होने का खतरा नजर आता है तब परीक्षा के पहले ही बच्चे आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगते हैं। परिणाम आने पर तो घर से भागने और जहर खाने के किस्से मीडिया की सुर्खियां बनने लगते हैं। हम आंकड़ों पर नहीं जा रहे हैं लेकिन एक एक प्रतिशत पर बच्चों में जो संघर्ष पैदा हो रहा है वह सरकारी स्कूलों की लचर पढ़ाई के कारण हर साल जानलेवा साबित हो रहा है। इस मुद्दे को अभी से उठाने का मकसद है कि स्कूल चलो के बाद अब विद्यालयों में पढ़ाई करो अभियान भी शुरू होना चाहिए। 

शिक्षा के बाद जो दूसरा संकट दिसम्बर में आने वाला है वो खेती को लेकर है। मध्यप्रदेश में सोयाबीन का रकबा घटा लेकिन बासमती धान का क्षेत्रफल बढ़ गया। अच्छी बारिश के कारण धान की बंपर फसल आने के संकेत हैं। अब समस्या आने वाली है धान के उचित मूल्य की। दो साल पहले चार हजार प्रति क्विंटल से ऊपर मध्यप्रदेश की धान बिकी थी। लेकिन पिछले साल उसे पन्द्रह सौ-अठारह सौ के बीच बेचना पड़ा। इससे घाटे में गया किसान आत्महत्या करने की तरफ बढ़ गया था। धान के मूल्य को लेकर इस बार भी हालात ठीक नजर नहीं आ रहे हैं। लागत दो हजार से ढाई हजार प्रति क्विंटल आती है और कीमत अगर पन्द्रह सौ मिली तो किसान फिर आत्मघात की तरफ जाएगा। ऐसे में सरकार में अभी से समर्थन मूल्य जैसा कोई फार्मूला नहीं अपनाया तो हालात गंभीर हो सकते हैं। धान कोई प्याज और टमाटर है नहीं कि उसे सड़कों पर फेंक दिया जाए या फ्री में बांट दिया जाए। और न ही सरकार इसे प्याज की तर्ज पर खरीद सकती है। लेकिन इस आने वाले संकट का न तो सरकार स्तर पर पूर्वानुमान है और न ही शासन स्तर पर कोई तैयारी। दिसंबर में जब धान तैयार हो जाएगी तो राइस मिल और व्यापारी औने-पौने दाम पर इसे खरीदेंगे और भुगतान भी महीनों तक अटका कर रखेंगे। यह सब पुराने तजुर्बे के आधार पर  कहा और लिखा जा रहा है। ऐनवक्त पर फिर सरकार प्यास लगने पर कुआ खोदने जैसी स्थिति पर आएगी। मंडीदीप में जो धान खरीदी की मिलें या व्यापारी हैं वे अक्सर उच्चस्तर पर सांठ-गांठ कर किसानों की मजबूरी का लाभ उठाकर सस्ती दर पर खरीदी करते हैं। इस बात की जानकारी मुख्यमंत्री तक को रहती है। स्कूल, कॉलेज और किसान के मामले में सरकार की प्राथमिकता अभी ऊपर नजर नहीं आती है। स्कूल फिसड्डी हो रहे हैं कॉलेजों में पढाई का माहौल नहीं है और किसान तो कुछ सालों से इस कदर निराश है कि वह आत्महत्या करने पर उतारू हो गया है। यह सब तब हो रहा है जब दस साल से मुख्यमंत्री खेती को लाभ का धंधा बनाने की बात कर रहे हैं। फिलहाल तो सरकार को डोंट डिस्टर्ब।(लेखक IND24 समूह के प्रबंध संपादक हैं )

Dakhal News 27 September 2016

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