नेताओं की बंगलाखोरी के सच्चे किस्से
sarkari banglo

सत्तारूढ़ों की सौदेबाजी का जरिया बनते बंगले 

सुप्रीमकोर्ट द्वारा पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगलों से बेदखल करने के आदेश पर सारे मुख्यमंत्रियों को मानों सांप सूंघ गया है।  हो भी क्यों ना, आखिर सभी को एक दिन भूतपूर्व होना है.चूँकि यूपी की याचिका पर आदेश है इसलिए मुख्यामंत्री इसके खिलाफ सामने आ गए है।  उनके पिताश्री पूर्वों में शामिल हैं और हो सकता है अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव भी इस जमात में दिखाई दें।  उधर उनके चचेरे भाई के श्वसुर और सास अर्थात लालू यादव और राबड़ी देवी दोनों बिहार के भूतपूर्वों में हैं।  बंगलाखोरी की बुराई किस हदें तक जड़ें जमा चुकी है यह सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से पता चलता है की भगवान भी धरती पर उतर आए तब भी इस देश का कुछ नहीं हो सकता।  

मध्यप्रदेश सरकार ने मोतीलाल वोरा को भोपाल में पूर्व मुख्यमंत्री के नाते मिला बँगला खाली करा लिया है।  ऐसा सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर नहीं बल्कि वोराजी के छत्तीसगढ़िया होने पर किया गया  है।  दिल्ली में वोराजी के कब्जे वाले बंगलों के बारे में हैरतअंगेज खबरें छपती रहीं हैं।  साल-दो-साल पहले छपी खबर के मुताबिक़ तब वोराजी को १४ सरकारी फ़्लैट आवंटित थे और कुछ को नोटिस देकर खाली कराने के बाद भी आठ-नौ बंगले उनके कब्जे में थे।  अर्जुनसिंह के निधन बाद भी मंत्री की हैसियत उन्हें मिले विशाल बंगले पर सालों तक पत्नी कब्ज़ा किए रहीं। चार छह महीने पहले केंद्र ने उनसे बंगला खाली कराया।  यह तब जब भोपाल में अर्जुनसिंह की विशाल केरवाँ कोठी है।   चरणसिंह को गृहमंत्री के नाते जो बँगला मिला था उस पर उनके बेटे अजीतसिंह का चार-छह महीने पहले तक कब्ज़ा रहा।  हारने पर उन्होंने चरणसिंह का स्मारक बनाने की आड़ में इस पर ताउम्र कब्जे का दांव चला जो खाली गया।  उनका दांव भले खाली चला गया पर स्वर्गीय जगजीवनराम की बेटी और लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीराकुमार पिता के नाम पर बने फाउंडेशन के नाम वह बँगला एलाट कराने में कामयाब रहीं जो लम्बे समय से परिवार के कब्जे में है। 

मायावती ने मनमोहन सरकार को समर्थन के एवज में लुटियंस जोन में तीन बंगले एलाट करवा कर उन्हें सुपर बंगले में तब्दील कर लिया है।  ये तीन बंगले क्रमशः उनके,बसपा और पार्टी के ट्रस्ट के नाम एलाट कराए गए हैं।  इन बंगलों के अलावा मायावती के नाम पर एक बँगला और है।  मनमोहनसिंह जाते-जाते लालूप्रसाद यादव को बँगला एलाट कर गए जबकि वे ना तो सांसद थे और ना ही किसी राष्ट्रीय पार्टी के मुखिया ही।  उमर अब्दुल्ला से अलग हो चुकीं पत्नी पायल अब्दुल्ला लम्बे समय से सरकारी बंगले पर काबिज रहीं और नोटिस मिलने पर हाईकोर्ट चली गईं।  उन्हें राहत देने के बजाए कोर्ट ने पूछा की आप शराफत से बँगला खाली करेंगी या हम बेदखली का आदेश दें..? उन्होंने शराफत नहीं दिखाई सो जबरदस्ती बेदखल कर दी गईं।  

भोपाल में भी नेताओं की बँगलाखोरी के कई किस्से हैं।  यहाँ उन्हें पत्रकार कोटे से बँगला एलाट करने का नायाब तरीका खोज लिया गया है। भाजपा के दिग्गज कैलाश सारंग, कांग्रेस के अनजाने से महासचिव महेंद्रसिंह चौहान और कांग्रेस के दिग्गज ललित श्रीवास्तव सभी बाहैसियत पत्रकार बँगलासुख भोगते रहे हैं। ललित श्रीवास्तव को स्वर्गीय हुए सात-आठ साल होने को आए पर बँगला परिजनों ने खाली नहीं किया।  कांग्रेस नेता महेश जोशी पता नहीं किस संस्था के नाम पर लम्बे समय तक शामला हिल्स के समीप सरकारी बंगले पर काबिज रहे। 

मायावती से बगावत कर चुके फूलसिंह बरैया पांच साल तक बंगले पर अवैध कब्जा किए रहे और जब १० लाख जुर्माना वसूल कर इसे खाली कराने की पहल की गई तो शिवराज सिंह  ने उन्हें बंगला एलाट कराने का फैसला केबिनेट से करा लिया। पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सुन्दरलाल पटवा, कैलाश जोशी, दिग्विजयसिंह, उमा भारती और बाबूलाल गौर सरकारी बंगलों का सुख भोग रहे हैं।  इस मामले में शिवराजसिंह चौहान से उम्मीद करना बेमानी है क्योंकि वे खुद मुख्यमंत्री के नाते मिले विशाल बंगले के अलावा दस बरस से उस बंगले पर भी कब्ज़ा किए हैं जो बतौर सांसद उन्हें मिला था।  ये तो महज कुछ ही किस्से हैं जिनकी मुझे जानकारी है, यदि पिटारा पूरा खुला तो बँगलाखोरी के हमाम में सारी नेता बिरादरी निर्वस्त्र नजर आएगी। [तमाम अख़बारों से साभार ]

Dakhal News 7 September 2016

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