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देशभक्ति का खमीर
अरशद अली
मीडिया इसी तरह का हाइप बनाता है जैसे सिंधू का बनाया। मीडिया के तमाम कैमरे गोपीचंद अकादमी में पूरे दिन जमे रहे। सिंधू के घर जमे रहे। उनको पूरे दिन उत्तेजना बनाए रखनी थी क्योंकि अब खिलाड़ी का मतलब देश था, राष्ट्र था। ‘‘गो फॉर गोल्ड’ और ‘‘इंडिया मांगे गोल्ड’ होता रहा। सिल्वर तो जेब में था ही। लगे हाथ गोल्ड हो जाए तो एक देश को एक नया ‘‘सुपर आइकन’ मिल जाए! खेलना सिंधू को था। उसे हमें खेलते देखना था! हम, जिनमें से ज्यादातर बैडमिंटन के खेल की बारीकियों से शून्य हैं, जिन्हें जीत और हार ही समझ में आती है। लेकिन जिस तरह का हाइप किया गया उससे सिंधू का मैच शायद सर्वाधिक देखा गया मैच हो गया! इस हाइप में कई चीजें मिक्स रहीं : देश, राष्ट्र, राष्ट्राभिमान एक खिलाड़ी के कंधे पर धर दिए गए। वो तो सिंधू ने इस बीच न मोबाइल रखा, न टीवी देखा! लेकिन प्रेशर प्रेशर होता है। शायद इसीलिए वर्ल्ड चैंपियन मरीन करोलिना के आगे वह हर वक्त ‘‘नरवस’ दिखीं। मीडिया इसी तरह प्रेशर बनाकर देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति बनाता है। देशभक्ति की आकांक्षाओं में लपेट खिलाड़ी को दर्शकों में फेंकता है और एक गोल्ड मेडल के लिए तरसते दर्शकों में ‘‘तुरंता देशभक्ति’ बनने लगती है। जीतने वाले की जय जय होती है तो हारे हुओं को भुला दिया जाता है। इस हल्ले में खेल प्राधिकरण की राजनीति गायब हो जाती है। हमारी देशभक्ति उसी ढर्रे पर लौट आती है, जिसमें सब बड़े लोग जीत की बहती गंगा में अपने ट्वीटों से डुबकी लगाकर अपनी ‘‘महिमा’ को रिकॉर्ड कराने लगते हैं! एक दिन पहले तक यही साक्षी के साथ हुआ। कुश्ती में कांस्य लेने के बाद वो पूरे दिन चैनलों में छाई रहीं। सरकार ने ढाई करोड़ रुपये के इनाम का ऐलान कर दिया। साक्षी की मां ने पीएम के ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे को ‘‘इंप्रोवाइज’ करते हुए उसमें ‘‘बेटी खिलाओ’ और जोड़ दिया। लेकिन असली बात इसके आगे आई। साक्षी की मां ने कैमरों के सामने यह भी कहा कि ‘‘जो पैसा देना है एक दो महीने में दे दिया जाए’! यानी कहीं ऐसा न हो कि इसके बाद कहीं वे सरकार का चक्कर ही लगाते न रह जाएं! इस तुरंता गरमागरम देशभक्ति के हाइप के बीच उस मां का उक्त ‘‘कटाक्ष’ खेल के प्रति कथित ‘‘प्रेम’ की असलियत की पोल खोलने वाला था। लेकिन हल्ला बेचने वालों को इसकी क्या परवाह? अपना मीडिया तुरंता देशभक्ति कुछ इसी फिल्मी स्टाइल से बनाकर गाना गाने लगता है कि ‘‘चाहे जितना जोर लगालो..बुरी नजर ना हम पे डालो सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी’! हमारे जैसे एक दो पदक वालों पर किसे पड़ी है, जो बुरी नजर डाले? एक दिन की इस देशभक्ति को अपना बनाकर बेचने के लिए सबसे ज्यादा तो ब्रांड इतराते हैं कि ‘‘ये स्वाद इंडिया’ का, ‘‘ये नमक इंडिया का’ ‘‘ये मिल्क इंडिया का’! जैसा हाइप हो-हल्ला ओलंपिक में जीते के दो पदकों के जीतने के वक्त बना है वैसा ही हल्ला क्रि केट के मैचों कि लिए बनाया जाता है, उसी तरह का प्रेशर कि ‘‘लंका में डंका बजाओ’, ‘‘उसे पीटो इसे हराओ!’ उधर, खिलाड़ी की जान लड़ती है। इधर यारों को देशभक्ति सूझती है ‘‘खेल की बारीकियां’ और ‘‘जोखिम’ गए तेले लेने! स्टूडियोज में बैठे एंकर और कथित विशेषज्ञ देशभक्ति का खमीर उठाते हैं, और देशभक्ति का तड़का लगाकर प्रायोजक-विज्ञापक अपने ब्रांडों को पेश करने लगते हैं कि ये स्वाद इंडिया का!
वह नरसिंह यादव, जो रियो जाकर डोप टेस्ट के आरोप पर ‘‘अपना पक्ष शायद कायदे से न रख पाने’; उसके कोच के कथन के कारण खेल से बाहर कर दिया गया, उसका ‘‘दुख’ किसी से न बताया गया। जिन लोगों की वजह से वह वंचित हुआ, उसकी जांच कैसी थी कि दुनिया के मानकों पर खरी नहीं उतर सकी? कौन जवाबदेह है? किसी ने पूछा!
खेलों के प्रति देश के कथित ‘‘प्रेम’ का असली चेहरा यही है। देशभक्ति का यह संस्करण मंत्रियों, संत्रियों को बिजनैस क्लास में ले जाता है, खिलाड़ियों को इकनामी क्लास में सड़ने दिया जाता है। हाकी के खिलाड़ियों को रियो में ठीक से जगह तक नसीब नहीं होती! असली मेडल अपने खेल मंत्रियों और उनके संत्रियों को मिलने चाहिए जिनने रियो के अधिकारियों तक से धक्का-मुक्की की! देशभक्ति का खमीर एक दिन के लिए उठता है, फिर बैठ जाता है और फिर वही ढाक के तीन पात और फिर वही राजनीति के मुक्के और लात! और इधर स्टूडियो में बैठे रिटार्यड खेलने वाले खिलाड़ी की खूबी के मुकाबले खामियों के बारे में दर्शकों को बताया जाने लगता है। [लेखक मध्यप्रदेश के जानेमाने पत्रकार हैं ]
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