धारणाएं, कुंठाएं और परंपराएं कूड़े में फेकनी ही होंगी
विनय द्विवेदी

 

विनय द्विवेदी

 

सबा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाला देश ओलंपिक में एक मैडल के लिए तरसे इससे दयनीय स्थिति भला क्या हो सकती है? जो समाज महिला को कमजोर मानता हो। उसके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करता हो। जिस समाज के अधिकतम पुरुष अपने पुरुषत्व के दम्भ में महिला को नोच कर खा जाने की मानसिकता रखते हों। उस समाज के गाल पर ओलंपिक में महिला खिलाड़ियों के मैडल थप्पड़ जैसे हैं. गनीमत है सिंधु और साक्षी भारतीय समाज की पित्रसत्तात्मक चेतना की शिकार नहीं हुईं जिस तरह लाखों बच्चियां होती हैं, जो अल्ट्रासाउंड मशीन से बच नहीं पाती हैं और जिनका कोख में ही क़त्ल कर दिया जाता है। ऐसी सोच के लोगों को शर्मसार होना चाहिए।

 

बड़ा सवाल यही है की क्या भारतीय समाज ओलंपिक में मैडल जीत के इस शानदार और फक्र करने वाले अवसर से कुछ सीखेगा? पुराने अनुभव बताते हैं कि शायद नहीं। क्योंकि इससे पहले भी कई महिला खिलाड़ी ओलंपिक में मैडल ले कर आई हैं। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर खूब चला की रक्षाबंधन के अवसर पर सिंधु की जीत देशवासियों के लिए एक बड़ी गिफ्ट है लेकिन कुछ दिन बाद हम सब भूल जाएंगे। ऐसा पहले भी हो चुका है. मैं खेलों का विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिए खेल की बारीकियों पर बात करने के बजाय ओलम्पिक में महिलाओं ने जो मैडल हासिल किये हैं उसके सामाजिक प्रभाव पर ही लिखूंगा।

 

भारतीय समाज में धर्म के धंधेबाज लड़कियों के कौमार्य बचाने के लिए जीन्स न पहनने का प्रवचन देते हैं, महिलायें को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं, हिज़ाब-बुरका पहनना जरुरी बताते हैं। अपने व्यवहार और विचार को लेकर कुख्यात हो चुकी खाप पंचायतें कितनों के सपनों की लील चुकी हैं। बलात्कार को एक खूंखार मानसिकता मानने के बजाय बहुत से लोग लड़कियों के कपड़ों को इसके लिए दोषी मानते हैं। बेटियां घर पर जल्दी आ जाएँ लेकिन बेटा आधी रात को आये तो इस समाज को कोई तकलीफ नहीं है। बहू को गुलाम की तरह होना चाहिए लेकिन उनकी खुद की बेटी ससुराल में राज करे। और भी बहुत कुछ नकारात्मक है जो समाज में घटित होता है।

 

गला फाड़ कर कहा जाता रहा है और कहा जा रहा है, देश तेजी से विकास कर रहा है। दरअसल जब विकास को देखने की चेतना और चश्मा ही भेदभावपूर्ण हो तो वास्तविकता से दो-चार होना चाहेगा कौन। GDP की तख्ती को गले में कई दशकों से हर प्रधानमन्त्री टाँगे घूमते रहे हैं लेकिन किसी की समझ में ये क्यों नहीं आता कि हमारी सामाजिक व्यवस्था अभी भी बहुत से मामलों में सडांध मार रही है। कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में आज भी कलंक बनी हुई है. महिलाओं पर होने वाले अपराध कम होने का नाम ही नहीं ले रहे. हर अपराध के लिए फांसी की सजा से क्या अपराध कम हो जाएंगे। घटनाओं के सामाजिक पहलुओं पर सरकारें कोई सकारात्मक पहल करने में नाकाम रही हैं, यही बड़ी समस्या भी है.

 

हमारा समाज नारी को देवी बताता है, देवियों को पूजा भी जाता है और यही समाज नारी को ताड़न का अधिकारी भी बताता है। महिला के मासिक धर्म को अपवित्र मानता है जबकि वो ये जानता है कि अगर महिला को माहवारी नहीं होगी तो वो बच्चे पैदा नहीं कर सकती। अगर वो विधवा हो गई हो तो उसके साथ यही समाज कौन सा अच्छा व्यवहार करता है ये बताने की जरुरत नहीं है। बच्चियां युवा होने से लेकर महिला की मौत तक उसकी रक्षा की जिम्मेदारी किसी ना किसी रिश्ते के पुरुष की होती है। दरअसल पुरुष यहाँ रक्षा नहीं कर रहा होता है बल्कि वो महिला पर भरोसा नहीं करता है इसलिए रक्षा के नाम पर चौकीदारी करता है। क्यों की हमारे ही समाज में एक सोच ये भी है कि महिला को कोई समझ नहीं सकता और महिला के चरित्र का सर्टिफिकेट पुरुष ही जारी कर रहा होता है जिसके चरित्रहीनता की शिकार ही महिला होती है।

 

आर्थिक विकास भर से सामाजिक चेतना का विकास नहीं हो जाता, ये समझना ही पडेगा। समाज को दोगले (इस शब्द को लिखने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, क्योंकि ये शब्द भी महिला के लिए गाली है और महिला के चरित्र पर ही सवाल खड़े करता है, लेकिन दूसरा शब्द मेरे पास नहीं है) व्यवहार से बाहर आना ही चाहिए। विज्ञान भी यही है कि बिना खराब चीजों के नष्ट हुए नई और अच्छी चीजें नहीं आ सकती। जो पहले से अच्छी हैं उन्हें और उन्नत होना होगा, नहीं तो ठहराव की शिकार होने पर वो भी ख़त्म हो जाएंगी। राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की तरह ही सामाजिक स्वच्छता अभियान की भारतीय समाज को बहुत जरुरत है। एक शानदार और बेहतर सामाजिक चरित्र के निर्माण के लिए दम्भ, जिद. पुरातन धारणाएं और कुंठाएं और परंपराएं कूड़ेदान में आज नहीं तो कल फेकनी ही होंगी।[लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ]

 

Dakhal News 22 August 2016

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