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अवधेश बजाज
जिस देश में दिल्ली है, मुम्बई है, बैंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे, अहमदाबाद, सूरत है- जिस देश में करोड़पति मंत्री, विधायक हैं, लाखों वेतन पानेवाले नौकरशाह, आईटी मजदूर, मैनेजमेंट पेशेवर हैं, जहाँ सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और धोनी है, जिस देश में अर्णब गोस्वामी की देशभक्ति है, जिस देश के मीडिया के लिए दिल्ली ही देश है, जहां गायों के लिए घर बनते हैं और गरीब लोग ठण्ड से फुटपाथ पर मर जाते है, जिस देश में कुछ लोगों के पास अश्लील ढंग का पैसा है, जिस देश में सलमान खान की 300-400 करोड़ कमानेवाली फ़िल्में हैं, जिस देश की राष्ट्रीय खबर एक टेलीविज़न अदाकारा की शादी है, जिस देश का बाबा आटा से लेकर ब्यूटी क्रीम तक बेचता है- उस महान विशाल देश में सवा अरब लोगों की ओलिम्पिक में पदक पाने की उम्मीदों को पूरा करने का सारा दारोमदार त्रिपुरा की एक लड़की पर डाल दिया गया।
ये इतिहास का एक दिलचस्प क्षण था, जब आजादी के बाद बनाये गए भारत ने खुद को ही खारिज कर दिया। इस देश में कितने लोगों को पता है कि त्रिपुरा भारत का ही एक राज्य है.. त्रिपुरा न लोगों की बातों में है न सोच में है.. भारत से पक्की विस्मृति के फासले पर त्रिपुरा की राजधानी है अगरतला, जहाँ तक न मीडिया का कैमरा पहुँचता है न देश चलानेवालों की नजरे इनायत।
इसी अगरतला में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हिसाब से मामूली, लगभग अनुपस्थित सुविधाओं के सहारे एक लड़की जिमनास्ट बनने का दुस्साहस करती है और सिर्फ अपने दुस्साहस के बल पर वह उस मंच तक पहुँचती है, जहाँ उसका होना भी एक चमत्कार की तरह है। एक रिबेलियन है। उसकी उपस्थिति वहां बगैर निमंत्रण के अनधिकार प्रवेश की तरह देखी जाती है। अगरतला की वो लड़की अपने जीवन को जोखिम में डाल कर प्रोदुनोवा वॉल्ट पर छलांग लगाती है, हवा में लहराते हुए जमीन पर इस तरह लैंड करती है, जैसे उसका जन्म ही बस यही करने के लिए हुआ हो...
दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई, अहमदाबाद ......... भोपाल..
में बैठे लोग तालियां बजाते हैं, ईश्वर से दुआएं माँगते हैं...दशमलव के देढ अंक से उस लड़की के हाथ से पदक फिसल जाने पर दुखी होते हैं-फिर ट्विटर, फेसबुक को अपनी संवेदनाओं से रंग देते हैं।
दीपा करमाकर सिर्फ और सिर्फ निजी सफलता की पुरकशिश महाकाव्यात्मक कहानी है, जो भारत के कारण नहीं, भारत के बावजूद सपनों को पूरा करने के लिए अनदेखे में छलांग लगाने के हौसले से जन्म लेती है। वह भारत की सफलता की नहीं, 70 साल की विफलता की कहानी है।
दीपा करमाकर की ये कहानी बहुत जल्द भुला दी जायेगी क्योंकि वास्तव में वह भारत को शर्मसार करती है। इसकी झूठी और खोखली महानता की कलई खोल देती है। बड़े-बड़े शहरों में बैठे हम जैसे लोगों में पास यह नैतिक अधिकार नहीं कि हम दीपा करमाकर पर कुछ लिखें या बोलें।
हम सबको अपनी उसी दुनिया में रहना और लौट जाना है जहाँ भारत का मतलब दिल्ली है, नरेंद्र मोदी है सलमान खान है, विराट कोहली है, कपिल शर्मा है, अर्णब गोस्वामी है, बाबा रामदेव है। जहाँ देशभक्ति का सर्टिफिकेट आईटीओ चौराहे पर 10 रुपये का झंडा खरीदकर अपनी गाड़ी में लगा लेने से पाया जा सकता है। हमें यही करना चाहिए। हम दीपा करमाकर को डिज़र्व नहीं करते।
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