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अरुण पटेल
शहडोल लोकसभा उपचुनाव जीतने के लिए भाजपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है और इसमें दलबदल का तड़का लगाने की प्रारंभिक कोशिशों को हेमाद्रि सिंह ने झटका दे दिया है। उसके बाद अभी भी दलबदल कराने में सिद्धहस्त रणनीतिकार निराश नहीं हुए हैं और उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। इस विश्वास के सहारे कि कोई न कोई ऐसा दलबदल चुनाव के वक्त करा सकते हैं जिससे कि कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक ढंग से तगड़ा झटका दिया जा सके। पिछले कुछ दिनों में जिस ढंग की रणनीति चली है और अभी तक प्रदेश भाजपा की कार्यशैली में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है उसको देखकर यह कहा जा सकता है कि भाजपाई राजनीति में संघ की पृष्ठभ्ाूमि से आये संगठन महामंत्री सुहास भगत पर उनके पूर्ववर्ती अरविंद मेनन की छाया भारी पड़ रही है। शायद यही कारण है कि वे न तो तौर-तरीकों में कोई परिवर्तन करा पाये न कारपोरेट कल्चर से मुक्ति दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठा पाये। जिन लोगों ने बदलाव की हसरतें पाल रखी थीं वे भी अब धीरे-धीरे निराश होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस भी शहडोल उपचुनाव को लेकर काफी गंभीर है और उसने शिवराज सरकार के मंत्रियों की फौज के मुकाबले अभी से अपने 8 विधायकों की 8 विधानसभा क्षेत्रों में तैनाती कर दी है।
जब सुहास भगत ने कमान संभाली थी तब उन्होंने काफी बदलाव के संकेत दिए थे और इससे उन कार्यकर्ताओं में उम्मीद की एक नई किरण जागी थी जो वर्षों से हाशिए पर पड़े हैं। स्वयं भगत ने कुछ अवसरों पर संकेत दिया था कि वे कारपोरेट कल्चर से पार्टी को मुक्त करायेंगे और जो अवसरवादी चेहरे हैं उनसे भी निजात दिलायेंगे और कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान मिलेगा। लेकिन ऐसा कुछ होता अभी तक नजर नहीं आया है। कार्यकर्ता की अभी भी शिकायत है कि उन्हें मंत्री तवज्जो नहीं देते हैं, उनकी बात नहीं सुनी जाती। सत्ता के जो करीब हैं वे मस्त हैं और बाकी कार्यकर्ता पस्त होता जा रहा है। जब तक कुछ बदलाव का अहसास नहीं होगा कार्यकर्ताओं में उदासी बनी रह सकती है। सत्ता में कार्यकर्ताओं को भागीदारी देने की बातें तो लम्बे समय से हो रही हैं लेकिन यह कब होगा इसका कार्यकर्ताओं को इंतजार है। अभी तो फिलहाल यही धारणा बनती जा रही है कि भगत ने जो बीतरागी भ्ाूमिका अपना ली है उसे वे कब छोड़ेंगे ताकि उन पर किंकर्तव्यविमूढ़ होने की धारणा भाजपाई खेमे में न बन पाये। यह भी माना जा रहा है कि भगत पर अभी भी मेननकाल की परम्पराएं और कार्यशैली भारी पड़ रही हैं।शहडोल और नेपानगर उपचुनाव हर हाल में जीतना भाजपा के लिए जरूरी है क्योंकि दोनों ही क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। अभी इस वर्ग के लोकसभा क्षेत्र झाबुआ उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद उसके लिए लाजिमी हो गया है कि अब इन दोनों क्षेत्रों में से कोई भी फिसलकर कांग्रेस के हाथों में न जा पाये। यदि भाजपा इन पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पाई या उसकी पकड़ कहीं ढीली हुई तो फिर कांग्रेस न केवल मध्यप्रदेश बल्कि समूचे देश में ऐसा माहौल पूरी ताकत से बनाने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखेगी कि आदिवासियों का भाजपा से मोह भंग हो गया है। इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं को आगे कर अभी से सुनिश्चित योजना के तहत राजनीतिक गोटियां बिठाना प्रारंभ कर दिया है। सबसे पहले कांग्रेस को पूरी तरह पस्त करने के लिए दलबदल कराने की कोशिश हुई और कांग्रेस की मजबूत प्रत्याशी समझी जाने वाली हेमाद्रि सिंह जो कि पूर्व केंद्रीय मंत्री दलबीर सिंह और कांग्रेसी सांसद रहीं राजेशनंदिनी सिंह की बेटी हैं, उन पर डोरे डाले गए। पूरी उम्मीद थी कि भाजपा से कांग्रेस में आये और नये राज्यमंत्री बने संजय पाठक इस अभियान में सफल होंगे, उनके सहित अनेक बड़े-बड़े कांग्रेस नेताओं को बिना भनक लगे भाजपा में लाने में अरविंद मेनन की अहम भ्ाूमिका रही है और पाठक भी मेनन के काफी नजदीक माने जाते हैं। लेकिन हेमाद्रि सिंह ने भाजपा में आने से स्पष्ट इन्कार कर दिया जिससे भाजपा के सामने अब नये सिरे से उम्मीदवार खोजने की कवायद करने की मजबूरी आ गई है। फिलहाल उसकी नजर केबिनेट मंत्री ज्ञान सिंह पर आकर टिक गई है जो 1996 और 1998 में यहां से लोकसभा सदस्य रह चुके हैं। इसके अलावा नरेंद्र मरावी को भी एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है, इनके अतिरिक्त एक-दो और चेहरे हैं। वैसे मंत्री ज्ञान सिंह स्वयं चुनाव लड़ने की जगह अपने बेटे को चुनाव लड़ाने के अधिक इच्छुक हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में हेमाद्रि सिंह ही सबसे मजबूत दावेदार बताई जा रही हैं। पूर्व मंत्री बिसाहूलाल सिंह भी पूरी ताकत से टिकिट की जुगाड़ में हैं। मध्यप्रदेश के दिल्ली में असर रखने वाले तीन बड़े नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव तथा पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह हेमाद्रि सिंह को मजबूत प्रत्याशी मान रहे हैं। बिसाहूलाल के साथ ही फुंदेलाल मार्को भी कोशिश में लगे हुए हैं। कांग्रेस ने भी अपने तेज-तर्रार आठ विधायकों की सुनिश्चित जिम्मेदारी तय कर दी है। जैतपुर में कमलेश्वर पटेल, भानपुर में संजय उइके, अनूपपुर में रजनीश सिंह, पुष्पराजगढ़ में फंदेलाल, कोतमा में मनोज अग्रवाल, बड़वारा में सौरभ सिंह, बांधवगढ़ में ओमकार सिंह मरकाम और जयसिंह नगर में रामपाल सिंह को तैनात कर उन्हें बूथ प्रबंधन से लेकर सभी इंतजामों की जिम्मेदारी दी गयी है। नेपानगर अजजा के लिए सुरक्षित विधानसभा सीट के उपचुनाव में वैसे पूर्व इतिहास को देखते हुए भाजपा की स्थिति मजबूत है लेकिन कांग्रेस यहां पर भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ना चाहती है। भाजपा सहानुभ्ाूति लहर के सहारे नैया पार लगाने की सोच रही है और वह एक सड़क दुर्घटना में मृत हुए विधायक राजेंद्र सिंह दादू की छोटी बेटी अंजू पर दांव लगाने का सोच रही है। कांग्रेस के पास में भी दो सशक्त दावेदार उभर कर सामने आ रहे हैं जिनमें एक रामकिशन पटेल कारकू और दूसरे अंतर सिंह बरडे राठिया हैं। इस क्षेत्र में वास्तव में प्रतिष्ठा भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव की दांव पर है क्योंकि यह क्षेत्र दोनों के ही संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रहा है।[लेखक की वॉल से ,लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं]
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