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अमित मंडलोई
जब आपने संसद में प्रवेश से पहले मंदिर की तरह सीढिय़ों पर मत्था टेका था, तब मुझे ही नहीं सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों को लगा था कि वक्त संसद की गरिमा का एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। अपेक्षाएं सातवें आसमान पर थीं, हौसले भी बुलंद थे, लेकिन इन दो-ढाई सालों में संसद से लेकर देश के गली-कूचों तक 56 का सीना पता नहीं क्यों वह भरोसा दोबारा नहीं जगा पाया। सब अच्छा न जाने क्यों प्रायोजित लगता है और खराब सुनियोजित। 15 अगस्त पर लाल किले की प्राचीर से भाषण के लिए आपने हमसे सुझाव मांगे हैं। मैं चाहता हूं इस बार आप कुछ ना बोलें।
हमने आपसे पहले एक प्रधानमंत्री वापरे हैं, जो इतना खामोश रहते थे कि उनके दफ्तर ने गिनकर बता दिया कि कुल जमा कितनी बार बोले हैं। जब बोले तो कैमरामैन से तस्दीक भी कर ली कि ठीक है। और एक आप हैं, जो बोल ही रहे हैं। मन की बात की मासिक किस्त से लेकर देश-दुनिया के हर मंच पर बोल रहे हैं, बुलवा रहे हैं मोदी-मोदी-मोदी, लेकिन माफ कीजिए अब इसकी प्रतिध्वनि कहीं सुनाई नहीं पड़ रही। कहीं सुनाई देती भी है तो ऐसा लगता है, जैसे कोई कानों में जबरदस्ती ठूंस रहा है।
शुरुआत से बात करते हैं, बुजुर्गों को परामर्श मंडल में भेजकर आपने मिनिमम गर्वमेंट और मैक्सिमम गर्वनेंस का नारा देकर युवा सरकार का भरोसा दिलाया था। राजनाथसिंह जैसे कद्दावर नेता को अपनी पसंद का सेक्रेटरी तक नहीं रखने दिया। हमारा दिल बल्लियों उछल गया कि अब सिर्फ काम होगा, लेकिन धीरे-धीरे लगा सत्ता का केंद्रीकरण सहज कामकाज में रोड़ा बन रहा है और हुआ भी वही। मंत्रालयों को स्वतंत्रता नहीं मिली तो काम गोल-गोल घूमने लगा, अब तक वहीं हो रहा है। राउंड-राउंड एंड नेवर स्टॉप। बहुत जल्दी ये समझ में आ गया कि प्राथमिकताएं पसंद-नापसंद से तय हो रही हैं। स्मृति ईरानी के उत्थान-पतन की कहानी इसकी जिंदा गवाह है।
फिर सरकार की राजनीति का जो रूप देखने को मिला वह अनूठा था। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए जिन विजय गोयल ने खूब दौड़-धूप की वे दरकिनार कर दिए गए, डॉ. हर्षवर्धन जिन्हें योग्य समझा जाता था, उन पर विचार नहीं किया गया। उम्मीद की किरण लेकर आए, जिन्होंने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और आपको पहला सबसे बड़ा झटका दिया। आप जितनी सकारात्मक ऊर्जा के साथ चुनाव प्रचार में लोगों से रूबरू हुए थे, उतने ही नकारात्मक ढंग से दिल्ली के चुनाव में भाजपा उतरी। बिहार में भी यही नकारात्मक सोच ले डूबी। बड़े-बड़े नेता बहुत छोटी और नीची बातें करने लगे। कुछ चुनाव जीते-कुछ हारे, हिसाब चल रहा है, लेकिन साजिश और षड्यंत्र की जिस राजनीति का चेहरा बेनकाब हुआ था उसने कई की उम्मीदों को धराशायी कर दिया।
देश को नेता नहीं चाहिए था। 30 वर्ष में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत भी देशवासियों ने इसी लिए दिया था। उन्हें एक कर्म योद्धा चाहिए था, जो सबको साथ लेकर काम करे, देश के सामने मुंह बाएं खड़ी चुनौतियों के आगे चट्टान की तरह खड़ा हो जाए। एक बार कह दे इस देश से कि मैं भी देखता हूं, हमें आगे बढऩे से कौन रोकता है। क्योंकि उन्हें गुजरात के जुझारू मुख्यमंत्री में देश का भविष्य दिखता था साबरमती की स्वच्छता को वे गंगा और ब्रह्मपुत्र में महसूस करना चाहते थे। वाइब्रेंट गुजरात को कश्मीर से कन्या कुमारी तक में रूपांतरित होते देखना चाहते थे।
माफ कीजिएगा लेकिन इसके बदले हासिल क्या हुआ दादरी, कैराना, रोहित वैमुला, ऊना, जेएनयू। ऐसा लगता है जैसे हर कहीं से कोई पॉलिटिकल एजेंडा थोपने की कोशिश हो रही है। एक राजनीतिक दल के लिए ऐसा लाजमी है, लेकिन देश की सरकार के लिए यह शोभा नहीं देता। लाखों के सूट से शुरू हुई दास्तां अडानी, अंबानी के लिए तरक्की के नए रास्ते खोलती चली गई। माल्या भाग गए और विश्व मंच पर शेरों की तरह दहाडऩे वाले तमाशबीन बनकर रह गए।
महाराष्ट्र के किसान परिवारों का मातम खत्म नहीं हो पाया, गंगा की सफाई पर हजारों करोड़ न जाने कहां खर्च हो गए, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने का दम भरा गया, लेकिन कश्मीर फिर हिंसा की चपेट में आ गया। नौकरियां नहीं बढ़ी लेकिन एनसीजी की सदस्यता के लिए पूरा जोर लगाया गया। चीन ने खुलेआम विरोध किया, लेकिन हमने उसकी कंपनियों के लिए वैसे ही अपने बाजार खुले रखे। दुनिया जीतने की कोशिश में देश का दिल हारने लगे। लोग विरोध पर आए तो दमन पर उतारू हो गए। आलोचना तक बर्दाश्त नहीं कर पाए। अभी कुछ सुर बदले हैं, राजनाथसिंह ने पाकिस्तान में खलबली मचाई तो आप तथाकथित गोरक्षकों के खिलाफ आवाज बुलंद की है। हालांकि उसके बाद भी घटनाएं नहीं रुकीं। जब आप दलितों के बजाय खुद को गोली मारने का कह रहे थे, तब पता नहीं कोई कानों में यूपी-यूपी बोल रहा था।
इसलिए मैं चाहता हूं कि इस बार 15 अगस्त पर आप कुछ मत बोलिए और अगर बोलना जरूरी है तो कह कर तो देखिए एक बार कि ‘अरविंद मैं प्रधानमंत्री हूं और तुम दिल्ली के मुख्यमंत्री, डंके की चोट पर जनता की सेवा करो, मैं देखता हूं तुम्हे कौन रोकता है। दलितों पर उठ रहे हाथ कानून की जंजीर से बांध दीजिए। जुबान बंद कर दीजिए उन योगियों और साध्वियों की जो धर्म के नाम पर ऊल-जलूल बयान दे रहे हैं।’ लाल किले की प्राचीर से कह दीजिए कि ‘सरकार की कोई जाति, कोई धर्म नहीं है, अगर कुछ है तो सिर्फ राष्ट्रधर्म है और वह इसी का पालन करेगी।’ उन फंदों को काट दीजिए, जो किसानों की जान ले रहे हैं। कह दीजिए एक बार सारे संगठनों, धन्ना सेठों और रसूखदारों को कि ये सरकार जितनी तुम्हारी है, उतनी ही गरीब, आम आदमी और किसानों की है।
प्रायोजित प्रलापों से बाहर निकलकर एक बार खालिस होकर बोल दीजिए, हम सच में सुनना चाहते हैं। वरना चुप रहिए, आपका मौन तो आपसे ज्यादा मुखर होकर बोल ही रहा है। (लेखक अमित मंडलोई पत्रिका ग्वालियर के संपादक हैं ,वॉट्सऐप से )
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