जनता से जीतती, अफसरों से हारती सरकार
shivraaj singh ke afsar

 

राघवेंद्र सिंह
जिन्दगी का फलसफा है कि... किसी को हराना आसान है मगर जीतना कठिन। लब्बोलुआब यह है कि आप किसी को बुद्धिबल, धनबल और बाहुबल के जरिए हरा तो सकते हैं मगर जीत नहीं सकते। जीतने का ताल्लुक दिल से है। लोकतंत्र में जब पार्टियां चुनाव के बाद हुकूमत में आती हैं तो जनता के दुख दूर करने के वादों के साथ। इसलिए पार्टियां सरकार में आने के बाद वादों को पूरा कराने के लिए नौकरशाही को कसती हैं। मगर हो ये रहा है कि जो पार्टियां जनता से जीतती हैं, वे सरकार में आने के बाद अफसरों से हार जाती हैं। तेरह साल से मध्यप्रदेश से शासन कर रही भाजपा अफसरों से पटखनी खा रही है। जनता उम्मीद कर रही है कि कोई तो माई का लाल होगा जो इस अखाड़े में अफसरशाही को चित करे। हालांकि नौकरशाही इतनी ठीट है कि वह चित होने भर से नहीं बल्कि चीं बुलवाने पर ही काबू में आएगी। अभी तक तो सियासत को जो सीन है वह बहुत आशाजनक नहीं है।
नौकरशाही की नाफरमानी और उसके खतरे समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह बात काफी मदद करेगी कि – अगर राजनीतिक दल सदन में ठीक से काम नहीं करेंगे तो नौकरशाही काबू में नहीं रहेगी और इससे आखिरकार लोकतंत्र को ही खतरा पैदा होगा। मध्यप्रदेश के संदर्भ में मोदी की ये नसीहत और भी सटीक है। कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो इस खतरे को और साफ करती हैं। मसलन विधानसभा में विपक्ष के विधायक रामनिवास रावत के मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे से छात्रों के प्रवेश से जुड़े सवाल को ही बदल दिया जाना। किसी भी विधानसभा में सवाल को लेकर अपने तरह का पहला मामला होगा विधायक की सहमति के बिना बदला जाना। यह वो बीमारी है जो नौकरशाही की निरंकुशता से आगे बढ़कर अब विधायिका को भी अपनी गिरफ्त में ले रही है। संक्षेप में यह कि रावतजी ने एनआरआई कोटे से प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कितने विद्यार्थियों को प्रवेश दिया। उनके नाम, पते, पिता का नाम और कक्षा बारहवीं में उनके अंक प्रतिशत की जानकारी मांगी थी। बदला हुआ प्रश्न यह आया कि प्रदेश में कितने एनआरआई छात्रों को मेडिकल में प्रवेश दिया गया है। इस पर भी जो उत्तर आया वह चौंकाने वाला था-  कि जानकारी एकत्र की जा रही है। सवाल भी मन का और उत्तर भी अपना तो फिर भला सदन किसलिए है...यह तो हांडी का एक चावल है। पिछले दिनों मानसून सत्र में राजस्व विभाग से जुड़े सत्तावन सवालों में से एक का भी उत्तर विधानसभा में नहीं आया। यह भी अपने आप में एक रिकार्ड है। वैसे तो इस तरह के ढेरों किस्से हैं मगर एक मंत्री ने इस पर जो कहा वो सरकार की हकीकत बयां करने के लिए काफी है। वाक्या यह है कि ये मंत्रीजी सीएम के साथ बैठे थे। उन्होंने कहा कलेक्टर भगवान बने बैठे हैं, इसलिए सरकार को दिक्कतें आ रही हैं। मंत्रियों को आप थोड़ा फ्रीहैंड दें तो काफी कुछ सुधार आ सकता है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी बेलगाम नौकरशाही से तंग आ चुके हैं। यह इसलिए भी साबित होता है कि वे मैहर चुनाव से पहले कहते थे कि डंडा लेकर निकला हूं। ठीक कर दूंगा। इसके बाद जब वे शहडोल उपचुनाव से पहले उनकी सरकार एक फैसले में पचास अफसरों को एकतरफा कार्यमुक्त कर देती है। दरअसल ये अधिकारी तबादला होने के बाद कई महीनों से अपनी मौजूदा कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे। मंत्री, विधायक परेशान हैं भाजपा संगठन सरकार से शिकायत करते करते थक सा गया है। इसलिए भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ता तो ठीक जिलों से नेताओं ने भी आना बंद सा कर दिया है। किसी जमाने में भाजपा कार्यालय आने जाने वालों से गुलजार रहा करता था। अब कार्यालय बेरौनक सा है।
सांसद तो ठीक, मंत्री भी धरना देने को तैयार
दमोह के सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल ने थाने में धरना देकर सबको चौका दिया है। लेकिन कई ऐसे मंत्री हैं जिन्हें मर्यादा भंग करने का लिहाज न हो तो वे भी अपने मातहतों के खिलाफ धरना देने दे डाले। दमोह में पटैल और मंत्री गोपाल भार्गव का विवाद सामने आया है यह और भी गंभीर है। इसमें सरकार के साथ संगठन की भी असफलता बेपर्दा होती है। बेकाबू नौकरशाही ने सरकार की फजीहत कर रखी है। और इधर संगठन की प्रतिष्ठा भी तार-तार हो रही है। अभी तक तो प्रदेश अध्यक्ष नंदूभैया ही असहाय दिख रहे थे मगर अब तो संघ से संस्कारित सुहास भगत के लिए भी संगठन और सरकार के मसले कड़वाहट घोल रहे हैं। इस पूरे खेल का परिणाम क्या होगा... इसे कार्यकर्ता और जनता दम साधे देख रहे हैं।

Dakhal News 8 August 2016

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