बड़े पत्रकारों में भिड़ंत से पत्रकारिता की समीक्षा ही होगी
arnav goswami
बड़े पत्रकारों में भिड़ंत से पत्रकारिता की समीक्षा ही होगी
 
प्रदीप मांढरे
आजकल चोटी के पत्रकारों के बीच भिडंत देखने-पढऩे-सुनने को मिल रही है। वैसे इसे दो बड़े मीडिया हाऊस का एक दूसरे पर निशाना साधना भी कह सकते हैं। कारगिल विजय दिवस के दौरान अपने शो 'न्यूज ऑवर' में टाइम्स नाउ अंग्रेजी न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ अरनव गोस्वामी ने कुछ पत्रकारों पर कश्मीर में अलगावाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। अरनव ने बरखा दत्त का भी नाम लिया।  इस शो में अरनव ने यह भी कहा था कि मीडिया में कुछ लोग बुरहान वानी के लिए हमदर्दी दिखाते हैं यह वही ग्रुप है जो अफजल गुरू के लिए काम करता है और उसकी फांसी को साजिश बताता है। अरनव ने मीडिया के ऐसे पाकपरस्त लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की भी मांग की। 
एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त ने अरनव के शो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे खुद को पत्रकार कहलाने में शर्म आती है, क्योंकि अरनव जैसे लोग इस पेशे में हैं। बरखा ने यह भी लिखा कि अरनव उन्हें डरा नहीं पाएंगे। अरनव ने हमें सेना के साथ युद्वरत के रूप में पेश किया जो झूठ और मक्कारी भरा है। बरखा ने अरनव पर यह भी तंज कसा कि कहीं वह सरकार की चमचागिरी तो नहीं कर रहे? 
एनडीटीवी के एक वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने अपने ब्लॉक में अरनव की आलोचना करते हुए कहा कि एन्कर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाए। जिस दिन पत्रकार सरकार की तरफ हो गया समझ लीजिए वो सरकार जनता के खिलाफ हो गई। 
जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी ने भी अरनव पर निशाना साधा-अरनव अपने शो में किसी थानेदार की तरह हड़काते हैं और वहां बोलने की आजादी नहीं होती। 
लेकिन अनुपंम खेर जो जाने-माने फिल्म अभिनेता है, ने अपने वीडियो संदेश में अरनव के पक्ष में कहा कि, ये ऐसे लोग हैं, जिनके लिए भारतीय सेना के शहीद जवानों के बजाए मारे गए आतंकी के लिए आंसू बहाना ज्यादा अहम है। मैं आपको यह मुद्दा उठाने के लिए धन्यावाद देता हूं। 
बीबीसी हिन्दी रेडियो आज शनिवार की रात 7:30 बजे अपने आजतक बुलेटिन में पत्रकारों की इस तू-तू मैं-मैं पर कार्यक्रम आयोजित करेगा कि क्या मीडिया के लिए देशभक्ति ज्यादा अहम है या निष्पक्ष पत्रकारिता?
भारतीय पत्रकारिता के भीतर एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू से होता आया है और यह पत्रकारिता के स्वास्थ्य के लिए ठीक भी है। इससे वर्तमान पत्रकारिता की कमियां मालूम पड़ती हैं और यह भी सार्वजनिक हो जाता है कि कौन पत्रकार या कौन सा मीडिया हाऊस किस खेमे से जुड़ा है? कौन सत्ता के पक्ष में है  और कौन सत्ता के खिलाफ है? बरखा, रविश कुमार और उनका पूरा एनडीटीवी ग्रुप शुरू ेसे मोदी सरकार के खिलाफ रहा है।  इसलिए सोशल साइट पर भाजपा और मोदी से जुड़े लोग बरखा और रविश कुमार जैसे पत्रकारों की आलोचना करते रहे हैं। शायद बरखा की कश्मीर पर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ रिर्पोटिंग की वजह से ही पाकिस्तान के आतंकवादी नेता हाफिज सईद ने पिछले दिनों बरखा दत्त की प्रशंसा की थी। इसी प्रकार जब कश्मीर में राष्ट्र विरोधी युवाओं की भीड़ पुलिस और अर्धसैनिक बल पर पत्थर फंै क रही थी, जवाब में भीड़ पर आशु गैस और गोली बरसाई जा रही थीं, उस समय रविश कुमार ने अपने शो में  कहा था कि इन युवाओं की समस्याओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। 
आज अरनव और उनके चैनल को सरकार का भोंपू कहा जा रहा है तो उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अरनव को विस्तार से इंटव्यू दिया था। उस समय अरनव पर आरोप लगे थे कि मोदी पर सवाल पूछने में अरनव ने अपनी धारदार शैली का इस्तेमाल नहीं किया था। वैसे यही टाइम्स नाउ है जिसने लगभग एक-डेढ़ साल पहले ललित मोदी प्रकरण में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की कुर्सी हिला दी थी। वसुुंधरा और उनके सांसद बेटे दुष्यंत ने  बाद में टाइम्स नाउ और अरनव गोस्वमी पर मानहानि का मुकदमा भी किया था। 
हो सकता है टाइम्स नाउ ने अपनी सम्पादकीय नीति में परिवर्तन कर लिया हो।
जहां तक राष्ट्र भक्ति की बात है पत्रकार हो या किसी अन्य पेशे के लोग, सबसे पहले देश हित है। राष्ट्र भक्ति और सरकार की चमचागिरी में अंतर है। 
Dakhal News 1 August 2016

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