आनंद विभाग यानी रेत में पानी निकालना
raghvendr singh
 
 
राघवेंद्र सिंह
सियासत में सुतंगे और जुमलों की अहमियत जबरदस्त होती है। मिसाल के तौर पर देश में नरेंद्र मोदी अच्छे दिन आने वाले नारे के साथ भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने में कामयाब हुये। मोदी जैसा तो नहीं (मोदीजी बुरा न मानें इसलिये) मगर उनसे कमतर भी नहीं तीसरी दफा भाजपा की सरकार बनाने का करिश्मा शिवराज चौहान ने कर दिखाया है। चौथी बार म.प्र. में सरकार बनाने की तरफ बढ़ रहे शिवराज सिंह ने खाली से दिखने वाले तरकश से आनंद रूपी तीर निकाला है। बस यही तीर सत्ता से संगठन और आमजनों की परेशानी का सबब बनने वाला है। मुख्यमंत्री की मंशा पर किसी को शक नहीं है मगर वे आनंद देने की बात उस नौकरशाही के जरिये कर रहे हैैं जो मंत्रियों में सिंधिया की राजकुमारी यशोधरा राजे से लेकर सत्ता के दामाद और सदा सुहागिन कहे जाने वाले अफसर बाबू से दुखी हैैं, कार्यकर्ता व जनता का नंबर तो बहुत बाद में आता है।
शिवराज कैबिनेट विस्तार के बाद दो मंत्रियों के इस्तीफे से हुई हलचल थोड़ी शांत हो रही थी कि आनंद विभाग के शंखनाद ने फिर सबका ध्यान सरकार के नवाचार की तरफ खींचा है। आम जनता के आनंद के पहले सरकार के सामने सत्ता-संगठन के दुख दूर करने की चुनौती है। राजकुमारी यशोधरा राजे से जिस ढंग से एक बाबू के कहने पर उनसे उद्योग विभाग छीना गया वे अपमान, क्रोध और दुख की आग में तप रही हैैं। एक बार जब मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे तब उनकी सरकार में उप मुख्यमंत्री जमुना देवी  ने ऊपर के इशारे पर परेशान कर रहे अफसरों के संबंध में यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि वे दिग्विजय के तंदूर में जल रही हैैं। मामला कांग्रेस का था और दिग्विजय सिंह उस समय तक सचिन-धोनी-सहवाग और युवराज की तरह अपने विरोधियों की बॉल पर जब, जैसे और जिधर चाहे चौके-छक्के उड़ा रहे थे। ठीक वैसे ही जैसे ही महाभारत में अर्जुन दोनों हाथों से तीरंदाजी करते थे। धनुष विद्या में उनके इस कौशल को देख कृष्ण ने उन्हें सव्यसाची नाम भी दिया था। इसका अर्थ है दोनों हाथों से तीर चलानेे वाला धुनर्धर...
भाजपा में सव्यसाची जैसा असाधारण काम मुख्यमंत्री चौहान कर रहे हैैं। दिग्विजय सिंह के शासनकाल में हालात उनके पक्ष में अधिक थे। तब उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव व कांग्रेस में उनके विरोधी अर्जुन सिंह के बीच समन्वय-संतुलन रखने का कठिन काम करना था और उसमें दिग्विजय सिंह सफल हो रहे थे। शिवराज सिंह के सामने कई विपरीत परिस्थितियां हैैं। पहले उन्होंने केंद्र की मनमोहन सरकार से लड़-झगड़ कर प्रदेश के लिये मदद ली। फिर स्थितियां बदलीं, भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी के लाड़ले होने के कारण पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को प्रेम स्नेह को कोड़ा मारकर सब अपने हिसाब  से करने में सफल रहे। अब वो मोदी के भी मनपसंद बन गए हैं, इसलिये संगठन व सरकार संचालन में उनका बराबर अधिकार दिखता है। संगठन में अध्यक्ष से लेकर संघ परिवार संगठन महामंत्री और प्रभारी सब उनकी इच्छा का सम्मान करते हैैं। अरविंद मेनन अलबत्ता अचानक प्रदेश संगठन महामंत्री के पद से हटा दिये गये थे। ये उनके आनंद में अवश्य एक झटका था। मगर जिस तरह से मेनन के उत्तराधिकारी सुहास भगत जिस क्षिप्रा गति (मंथर गति) से काम कर रहे हैैं वह सरकार के आनंद में इजाफा करने वाली ही साबित होगी। संगठन का केंद्र भी मुख्यमंत्री और उनका आसपास जो होने लगा है। एक जमाना था जब संगठन की अहम बैठकें कोर ग्रुप से लेकर अन्य संवाद प्रदेश भाजपा कार्यालय में हुआ करते थे अब सब सत्ता केंद्रित हो गया है। प्रदेश प्रभारी व प्रदेश अध्यक्ष तो पोस्टमेन की भूमिका में कैबिनेट विस्तार के दौरान सबको नजर आये थे। दोनों की साफगोई भी काबिले तारीफ थी। उन्होंने अपने डाकिया गिरी को स्वीकार बताया कि भले ही नई तकनीक के दौर में  डाक तार का जमाना गया मगर वे गौर-सरताज के इस्तीफे में पोस्टमेन बन इसे जीवित रखे हैैं।
बहरहाल, बात आनंद विभाग के गठन के दौर में खुशियों के सैलाब की उम्मीद की है। मुख्यमंत्री आनंद को अपने पास रखेंगे। इसलिये उम्मीद है थोड़ा न थोड़ा उनको भी मिले जो लंबे समय से दुखों का पहाड़ ढोते आ रहे हैैं। मोदीजी के अच्छे दिन और अमित शाह के उस जुमले की तरह न हो  जिसमें उन्होंने कहा था कालाधन भारत लायेंगे और इससे हर भारतीय के खाते में लाखों रुपये आयेंगे। हम अपने मुख्यमंत्री पर भरोसा रखें...आनंद भरे दिन आयेंगे। फिलहाल आनंद विभाग दिल बहलाने के लिए ख्याल अच्छा है गालिब...
बैल को दोहने जैसा ... 
एक लतीफा है ... एक प्रतिस्पर्धा थी, कोन गाय-भैंस से कितना अधिक दूध दुह सकता है। किसी ने 10 लीटर, तो कोई 25 लीटर तक दूध निकालने वाले थे, मगर जीता वो जिसने पसीना पसीना होने के बाद भी सिर्फ सौ ग्राम दूध निकाला। इनाम की घोषणा के समय विजेता भी हैरत में था। लेकिन जजों ने जब इसकी वजह बताई तो सभी आश्चर्य में डूब गए थे। दरअसल विजेता ने दूध गाय से नहीं बल्कि बैल से निकाला था। नेता भी गाय-भैंस नहीं बैल और भैंसे से दूध निकालने का करिश्मा करते हैं। वे और उनके दल एक ही मुद्दे पर आखिर कई कई बार वोट ले लेते हैं। सियासत में सफलता का मतलब असाधारण पराक्रम। अच्छे दिन और विभाग बनाने से आंनद का मतलब दूध दुहने में विजेता...बधाइयां
(लेखक IND24 के समूह प्रबंध संपादक हैं)
 
 
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Dakhal News 19 July 2016

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