राज्य शासन ने बनायी प्रशासकीय समिति
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर नवम्बर में नर्मदा संरक्षण अभियान के तहत नर्मदा तट पर यात्रा होगी।
यात्रा के लिये आवश्यक व्यवस्थाएँ करने राज्य शासन ने प्रशासकीय समिति का गठन कर दिया है। अपर मुख्य सचिव वन एवं योजना, आर्थिक, सांख्यिकी को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। समिति के सदस्यों में संस्कृति, उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण, किसान-कल्याण तथा कृषि विकास और पंचायत एवं ग्रामीण विकास के प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय के सचिव और पर्यटन सचिव को शामिल किया गया है। जन-अभियान परिषद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी समिति के सदस्य सचिव होंगे। समिति आवश्यकतानुसार अन्य विभाग के अधिकारियों को बैठक में विशेष आमंत्रण पर बुला सकेगी।
स्कन्द पुराण का सम्पूर्ण रेवाखण्ड नर्मदा के प्रतिपादन में पर्यावसित होता है। नर्मदा, राजा पुरुकुत्स की पत्नी थी और इनके त्रसद्दस्यु नामक एक पुत्र था। वैसे इन्हें भगवान शंकर की पत्नी कहा जाता है। रेवाखंड में स्पष्ट है कि चंद्रवंशीय राजा हिरण्यतेजा की तपस्या से नर्मदा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। विंध्य श्रृंखला के अमरकंटक से निकलकर पश्चिम की ओर 1,200 किलोमीटर की यात्रा करके नर्मदा अरब सागर में समाहित हो जाती है। अमरकंटक अथवा पर्यकंगिरी को विंध्य पर्वत का पुत्र बताया गया है।
अरब सागर में गिरने वाले मुहाने को भृगुक्षेत्र कहते हैं। यहीं भरूच या भड़ौच में राजा बलि द्वारा दस अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान हुआ था। शंखोद्वार, दशावमेद्य, धूतपाप, कोटीश्वर, ब्रह्मतीर्थ, भास्करतीर्थ, गौतमेश्वर आदि तीर्थ नर्मदा के पचपन तीर्थों में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। करनाली और नर्मदा के संगम पर जहां चंद्रमा ने घोर तप किया था, सोमेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। इस नदी के तट पर ओंकरेश्वर, मंडला, केदारेश्वर, ब्रह्माण्डघाट, होशंगाबाद, बागदा संगम आदि कई मुख्य तीर्थ हैं। नर्मदा के बारे में मत्स्यपुराण, अध्याय 186/11 में श्लोक हैं:-
त्रिभीः सास्वतं तोयं सप्ताहेन तुयामुनम्
सद्यः पुनीति गांगेयं दर्शनादेव नार्मदम्
अर्थात सरस्वती में तीन दिन, यमुना में सात दिन तथा गंगा में एक दिन स्नान करने से मनुष्य पावन होता है लेकिन नर्मदा के दर्शन मात्र से व्यक्ति पवित्र हो जाता है। भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण और रुक्मणी के भ्राता रुक्मक का युद्ध-स्थल भी यहीं है। पुराणों क अनुसार राजा शर्याति का यज्ञ भी इसी तट पर हुआ था। अग्नि देव उत्पत्ति भी नर्मदा क्षेत्र से है। रत्नों की खान वैदूर्य पर्वत भी नर्मदा के उद्गम के नीचे है। मत्स्य पुराण में 186 से 194 तक के अध्याय नर्मदा महात्म्य से ही संबद्ध हैं।
नर्मदा, सोन, महानदी तथा ज्वालावती नदियों का उद्गम स्रोत अमरकंटक है। पौराणिक कथानुसार सोन नदी सम्पूर्ण नदियों की नायक है, अतएव इसे सोन नद भी कहा जाता है। जिस प्रकार नर्मदा नदी के सब पाषाण शिव तुल्य पूजनीय माने जाते हैं उसी प्रकार सोन नदी के सब पाषाण गणपति की भांति भक्तों द्वारा सम्मान प्राप्त करते हैं। महानदी के उद्गम मैकाले पर्वत का सघन वन है। अपने उद्गम स्थान पर महानदी रुद्रगंगा के नाम से जानी जाती है। भगवान रुद्र के शीश से निकलने के कारण रूद्र गंगा का मूल भी नर्मदा के समान पवित्र तीर्थ के समान है। अमरकुंड में नर्मदा माता का कुंड ही नर्मदा का उद्गम स्थल है।
नर्मदा के पावन कुंड से लगभग 4 किलोमीटर दूर सोन नदी का उद्गम स्थान है, जो सोन मूढ़ा के नाम से प्रख्यात है। जहां चट्टानों को काटकर सोन नदी एक पतली धारा के रूप में प्रवाहित होती है।
नर्मदा को शिव की पुत्री होने के कारण शांकरी भी कहा गया है। धार्मिक-पौराणिक कथानुसार तीसरे नेत्र द्वारा संसार को भस्म करते हुए शिव मैकाले पर्वत के स्थान पर पहुंचे तो उनके शरीर से निकले पसीने की कतिपय बूंद यहां गिरी। इन्हीं बूंदों से एक कुंड का प्रादुर्भाव हुआ और इस कुंड से एक बालिका प्रकट हुई जो सांकरी तथा नर्मदा कहलायी। शिवजी के आदेशानुसार वह जनहित के लिए देश के बहुत बड़े भाग से प्रवाहित होने लगी। इसका उद्गम मैकाले पर्वत पर है। इसलिए यह मैकाले सुता के नाम से भी जानी जाती है। जब ये पर्वतीय क्षेत्र में बहती है तो “रव” (आवाज) करती हुई आगे बढ़ती है इसलिए इसे रेवा के नाम से भी पुकारा गया है।