पूर्व महापौर कमला बुआ ने कहा लक्ष्मी त्रिपाठी किन्नर नहीं बल्कि समलैंगिक
kinnar ujjain

 

 

किन्नर महामंडलेश्वर बोली  ये उन्हें कैसे चला पता?... कि मैं समलैंगिक हूं, 

 

 

सिंहस्थ में पहली बार बना किन्नर अखाड़ा अब आपसी झगड़ों से विवादों में आ गया है। सागर की पूर्व महापौर कमला बुआ ने किन्नर अखाड़ा की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी को समलैंगिक कहा था। इस पर लक्ष्मी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कमला बुआ को कैसे पता? वहीं, कमला बुआ ने किन्नर अखाड़े के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

 तीन दिन पहले सागर की पूर्व महापौर कमला बुआ ने कहा था कि लक्ष्मी त्रिपाठी किन्नर नहीं बल्कि समलैंगिक है।

 कमला बुआ के बयान पर रविवार को प्रतिक्रिया देते हुए लक्ष्मी त्रिपाठी ने कहा कि मैं समलैंगिक हूं, यह कमला बुआ को कैसे पता? इसके अागे मैं कुछ नहीं कहूंगी। सीमाएं नहीं लांघ सकती। लक्ष्मी त्रिपाठी भोपाल में थी।

 लक्ष्मी त्रिपाठी के इस बयान पर जब कमला बुआ से बात की गई तो उन्होंने किन्नर अखाड़े के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया।

 उन्होंने कहा कि लक्ष्मी महामंडलेश्वर बनी है, उनके काम महामंडलेश्वर जैसे नहीं हैं। उन्हें कई चीजों का त्याग करना पड़ेगा।

 कमला बुआ ने कहा कि अखाड़े में बने महामंडलेश्वर और पीठाधीश्वर लोगों को शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए। किसी को धर्म का ज्ञान नहीं है और वो पीठाधीश्वर बन गए हैं।

 उल्लेखनीय है कि उज्जैन में किन्नर अखाड़े की स्थापना के वक्त कमला बुआ भी वहां मौजूद थीं। किन्नर उन्हें महामंडलेश्वर बनाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इससे इंकार कर दिया था।

 लक्ष्मी त्रिपाठी के मुताबिक सिहंस्थ में किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने वाली थीं।

 कमला बुआ पूरे समय अखाड़े में साथ रहीं, लेकिन जब महामंडलेश्वर बनाने का समय आया तो कमला बुआ ने किनारा कर लिया।

 कमला बुआ के मुताबिक मैं हिंदू हूं, लेकिन मेरे घर में मस्जिद है। जो मेरे पुरखाें ने बनाई थी। महामंडलेश्वर बनने के बाद यदि मैं मस्जिद में रोजा इफ्तार करवाती तो कई लोग मेरे ऊपर सवाल उठाते। इसके साथ ही इस पर बैठने वालों को धर्म, शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए। त्याग करना पड़ता है।

 उज्जैन सिहंस्थ में पहली बार  किन्नरों का भी अखाड़ा बना। जो लगातार विवादों में  रहा  सिहंस्थ की शुरुआत में और खत्म होने के बाद किन्नर अखाड़े ने उज्जैन में शाही पेशवाई निकाली, जिसमें खूब भीड़ जुटी। अखाड़ा परिषद ने इसे मान्यता नहीं दी।

 शंकराचार्यों ने  भी इसे गलत कहा। कुछ संत पक्ष में आए थे  । 

Dakhal News 30 May 2016

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