कुछ तो शर्म करिए...ऐसे कौन करता है भाई...?
राघवेंद्र सिंह

 

||राघवेंद्र सिंह||

दो दिन पहले की बात है। पुणे के पहले टेस्ट मैच में नंबर वन रेंक वाली टीम इंडिया आस्ट्रेलिया से खेलते हुये औैंधे मुंह जा गिरी। स्पिन होती पिच भारत के अनुकूल और 333 रन से हराया आस्ट्रेलिया ने। इस शर्मनाक पराजय से पूरे देश से दुख-नाराजगी की प्रतिक्रियाएं  आईं। मसलन विराट कोहली और उसकी टीम ने घुटने टेके, हार नहीं समर्पण है, ये आस्ट्रेलिया ने कुचला, रौैंदा आदि-आदि।  खेल के नतीजों में ऊंच-नीच हमें जरा भी बर्दाश्त नहीं।  बहुत भावुक और संवेदनशील हैैं हम जबकि खेल तो होते ही हैैं हार - जीत के लिये। मगर जिन बातों का आगे जिक्र करने जा रहे हैैं उन पर भूचाल जैसी स्थिति दिखनी चाहिये थी। मगर सन्नाटा पसरा हुआ है चौतरफा।

कुछ ऐसी अनहोनियां हो रही हैैं जो कल्पना से परे हैैं। बात पिछले विधानसभा सत्र की है। एक विधायक के प्रश्न को ही अधिकारियों ने बदल डाला। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।  मगर कोई हल्ला नहीं। दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं। यह लोकतंत्र के लिये बेहद खतरनाक है। दोबारा ऐसा न हो इसकी कोई व्यवस्था नहीं। मंत्री के कहने पर विभाग से अधिकारी तो हटाये जाते रहे हैैं मगर शर्मनाक यह हुआ कि अफसर के कहने पर मंत्री के महकमे बदले जाने लगे हैैं। अब मंत्री से अफसर नहीं डरते बल्कि माननीय, अफसरों से डरने लगे हैैं। मंत्रियों को गलती करने से रोकने के लिये अफसर हुआ करते थे मगर अब लगता है मंत्रियों को काम करने से रोकने के लिये अधिकारी हैैं। इस पर भी माननीयों में खामोशी... मिसाल के तौर पर एक - दो घटनाओं का जिक्र कर रहे हैैं इसमें वरिष्ठ मंत्री यशोधरा राजे को एक अधिकारी ने विकास कार्यों के लोकार्पण करने से रोक दिया।  राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता का खून तब खौला जब भोपाल में नगर निगम अतिक्रमण अफसर ने एक महिला के पेट पर लात मार दी। गुप्ता ने उस पर कार्रवाई करने के लिये पत्र लिखा। कार्रवाई तो हुई नहीं उल्टे दो अधिकारी आकर उन्हें समझा गये। नतीजतन गुप्ता जी शांत और अफसर सलामत।  इस पर एक कार्यक्रम में मंत्री  ने अपनी पीड़ा  कुछ यूं जाहिर की - जब  मन को मार कर निर्णय लिये जाते हैैं तब शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी तकलीफें होती है। सरकार के अंदरूनी हालात पर मंत्री जी की इस  टिप्पणी  को  चिट्ठी की जगह तार समझा जा सकता है। हमने इन्हें हांडी के चावल  की तरह आपके सामने परोसा है। कुछ  कंकण लगे तो कृपया क्षमा करें। हम तो यही कहेंगे कुछ तो शर्म करिए.... ऐसे कौन करता है भाई...? 

मंत्रियों के बाद विधायकों के दर्द से भी जुड़े कुछ किस्से हैैं मगर हम नमूने के तौर पर एक का ही उल्लेख कर रहे हैैं।  म.प्र. पर्यटन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष रहे विधायक मोहन यादव ने छह सौ पचास करोड़ रु. की नर्मदा -क्षिप्रा  योजना को असफल बताया और सरकार की नीति व क्रियान्वयन  को कटघरे में खड़ा किया। सिंहस्थ के समय नर्मदा माई का जल क्षिप्रा में मिलाकर देशव्यापी  प्रशंसा शिवराज सरकार को मिली थी। इस योजना से पूरे साल क्षिप्रा जल से लबालब रहने वाली थी। लेकिन उसका पानी सूख रहा है। प्रदूषण के साथ क्षिप्रा में कीचड़ हो रही है। आचमन करने लायक भी पानी नहीं बचा है। अब सरकार से लोग यही कहेंगे - ऐसे कौन करता है भाई....?

अफसरों को लेकर सत्ता संगठन में तो आये दिन किचकिच होती रहती है। मगर पिछले कुछ महीनों से अत्यंत भद्रजन कहे जाने वाली आईएएस और आईपीएस भी आपस में दो-दो हाथ तो नहीं पर देवरानी-जेठानी जैसी कलह जरूर करने लगे हैैं। सबको पता ही है एसीएस राधेश्यान जुलानिया और उनके अधीन सचिव रमेश थेटे के विवाद-बहस तो थाने तक पहुंच चुकी थी। मगर ताजा किस्सों में एक आईपीएस अफसर राजेंंद्र मिश्रा को लेकर दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीपक खांडेकर और ए पी श्रीवास्तव आमने-सामने  हैैं। मामला मुख्यमंत्री के पाले में है। इसके पहले भी वन विभाग में एक करोड़ रु. की वित्तीय अनुमति को लेकर ये एसीएस स्तर के अफसर टकरा चुके हैैं। क्या कहेंगे इसे... ऐसे कौन करता है भाई...? प्रदेश में अभी भी बिना नंबरों के डम्पर से रेत की ढुलाई जारी है। अगर रोक है तो भोपाल के गांधी भवन में जनसंगठनों की बैठकों पर। अब गांधी भवन में कोई बैठक होगी तो उसके लिये पुलिस की अनुमति जरूरी है। पहले ऐसा नहीं होता था।

असल कपिल शर्मा लाफ्टर शो में दो मशहूर गुलाटी (बीबीएनएचएम) किरदार निबाहने वाले अक्सर हंसी ठहाके  के बीच एक डायलाग उछालते हैैं कि... ऐसे कौन करता है भाई..... यह तब ज्यादा होता जब शो के मुख्य किरदार कपिल शर्मा उनकी बेइज्जती करते हैैं। डाक्टर अपने परिचय में डिग्र्री का जिक्र बीबीएनएचएम करते हैैं। अर्थ पूछने पर बताते हैैं बेइज्जती बर्दाश्त नहीं है मुझे। कपिल का  यह शो हिट है। म.प्र. में शिवराज सरकार का शो भी हिट है। लेकिन मंत्री, विधायक और अफसरों में जो हो रहा है उसे लेकर जनता, कार्यकर्ता और संगठन यही कह रहे हैैं बीबीएनएचएम यानि बेइज्जती बर्दाश्त नहीं है.... सूबे का सियासी सीन एक शेर से कुछ यूं बयां होता है...

जब हुकूमत का इकबाल कमजोर होता है तो..देव कामद वो दरख्त जब तेज आंधी से गिरा। तस्तकद जितने थे पेड़ वो कदावर हो गए।

सुर्खियों में संचालन की मलिका

म.प्र. सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को आवाज देने वाली एक संचालिका सुर्खियों में है। वे शानदार संचालन करती हैैं इसकी सभी प्रशंसा करते हैैं मगर उन्हें दी जाने वाली फीस और वीआईपी सुविधा को लेकर भी सुर्खियां बटोरती हैं। आमतौर पर पहले समारोह का संचालन स्थानीय प्रतिभाओं से ही कराया जाता था लेकिन कारपोरेट कल्चर में बाहरी वस्तुओं  और व्यक्तियों का महत्व ज्यादा होता है। उनके मुरीद  उन्हें पेश ही कुछ ऐसे करते हैैं। इससे लोकल टेलेंट तो घाटे में रहता है।राघवेंद्र सिंह की वॉल से ]

 

Dakhal News 27 February 2017

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